Wednesday, 23 May 2018

Ghalib - Kazaa ne thaa mujhe chaahaa / क़ज़ा ने था मुझे चाहा - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 91.
क़ज़ा ने था मुझे चाहा, ' खराबे नादाए उल्फत, '
फ़क़त ' खराब ' लिखा, बस न चल सका कलम आगे !!

Qazaa ne thaa mujhe chaahaa, kharaabe naadaaye ulfat '
Faqat ' kharaab ' likhaa, bas na chal sakaa qalam aage !!
- Ghalib

मौत ने तो चाहा था कि मै प्रेम की मदिरा पी कर नष्ट हो जाऊं, पर जब लिखना प्रारंभ किया तो बस वह नष्ट ही लिख पाया। उसकी लेखनी थम गयी।

नियति ने तो मेरे भाग्य में , जीवन मे प्रेम की मदिरा पी कर नष्ट हो जाने की बात लिखनी चाही थी। ग़ालिब अपने नियति के लेख की कल्पना करते हुये कहते हैं। खराब ए नादा ए उल्फत , नष्ट हो जाऊं प्रेम की मदिरा पी कर। पर जब नियति ने ग़ालिब का भाग्य लिखना चाहा तो उसने बरबादी तो लिखी पर नियति की कलम, इस बरबादी के आगे कुछ नहीं लिख पायी। उसकी कलम ही नहीं चली। ग़ालिब को अपनी बरबादी पर कोई अफसोस नहीं है। वह तो नियति ने ही तय कर दिया था। वे नियति को भी दोष नहीं देते हैं और न हीं कोसते हैं। पर बेचारी मासूम नियति जो लिखना चाहती थी वह नहीं लिख सकी। वक़्त पर उसकी कलम ही नहीं चली।

अगर नियति ने कहीं नष्ट होने का कारण प्रेम की मदिरा पीने से होना लिखा होता तो, ग़ालिब को कोई गिला नहीं रहता। प्रेम की मदिरा के तो वे प्रेमी ही थे। उनका चषक तो ऐसी मदिरा हेतु सदैव रिक्त रहता था। नियति की असहायता पर तो वे अफसोस तो करते हैं पर नियति की नीयत पर नहीं।सर्वशक्तिमान नियति का इतनी खूबसूरती से बचाव ग़ालिब ही कर सकते है !

© विजय शंकर सिंह

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