Sunday, 13 May 2018

नेताजी सुभाषचंद्र बोस और साम्प्रदायिक राजनीति - एक चर्चा - 2 / विजय शंकर सिंह


सुभाष बाबू 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। उनके अध्यक्ष बनने के बाद ही कांग्रेस में वैचारिक संघर्ष भी छिड़ गया था। वे 1921 से 1940 तक कांग्रेस में रहे। फिर उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया। 1939 में उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक नामक दल का गठन किया जो प्रगतिशील विचारों का था। यह दल आज भी है और वामपंथी दलों के संयुक्त मोर्चे में है। अध्यक्ष का चुनाव उन्होंने 1939 में भी भी लड़ा था। पर 1939 में विश्वयुद्ध के समय उनकी राय युद्ध के मसले पर गांधी जी से अलग थी। अतः 1939 के कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष का पद जीतने के बाद भी उन्होंने गांधी जी की सहमति न होने पर त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैय्या को हराया था, जिनकी हार को गांधी जी ने अपनी हार कहा था। लेकिन जब वे1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो उन्हें गांधी सहित सबका व्यापक समर्थन था। 1938 में जवाहरलाल नेहरू भी अध्यक्ष पद के दावेदार थे, पर गांधी जी के सहमति से सुभाष बाबू कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

1937 के चुनावों में देश साम्प्रदायिक आधार पर कुछ कुछ बंटना शुरू हो गया था। जो दबा छुपा साम्प्रदायिक बिखराव था, वह अब सतह पर आ चुका था। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के रूप में एक नए मुस्लिम राज्य की कल्पना को मूर्त रूप देना तय कर लिया था, पर उसने उसका आकार, इलाका और नाम तय नहीं किया था और न ही औपचारिक प्रस्ताव ही पारित किया था। 1937 में ही एक और महत्वपूर्ण घटना घटी, जिसमे विनायक दामोदर सावरकर हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने। उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं का यह सिद्धांत दे दिया था। अब इन दोनों धार्मिक आधार पर, राष्ट्र की मांग करने वाले, सावरकर और जिन्ना ने खुद को , हिन्दू और मुस्लिम समाज का  मुखिया और प्रवक्ता मान लिया । जिन्ना का प्रभाव तो मुसलमानों में बहुत था और लेकिन सावरकर की हिन्दू महासभा का प्रभाव कांग्रेस के मुक़ाबले हिंदुओं में नगण्य था। 1938 में जब सुभाष बाबू अध्यक्ष बने तो कांग्रेस को तीन प्रतिद्वंद्वियों से एक साथ लोहा लेना था। एक तो ब्रिटिश राज था ही दूसरे थे, सवारकर और जिन्ना के धर्मांध नेतृत्व । कांग्रेस के लिये बड़ी चुनौती जिन्ना थे जो बेहद जिद्दी, शातिर, मेधावी , अंग्रेज़ो के नज़दीक और मुस्लिमों के एक तबके में लोकप्रिय थे। जब कि सावरकर की हिंदुओं पर बहुत अधिक पकड़ नहीं थी पर उन पर अंग्रेज़ मेहरबान थे। बाद में जब भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में 9 अगस्त को शुरू हुआ तो, एक समय ऐसा आया कि दोनों धर्मांध द्विराष्ट्रवादी अंग्रेज़ो के कंधे पर बैठ गए और कांग्रेस व्यापक जनाधार रहते हुये भी कुछ समय के लिये नेपथ्य में चली गयी। ऐसे ही समय जब साम्प्रदायिकता का उभार सतह पर दिखने लगा था तो, सुभाष बाबू ने कांग्रेस का नेतृत्व 1938 में ग्रहण किया।

2014 में जब एनडीए सरकार सत्ता में आयी तो, तब सुभाष बाबू से जुड़ी सीक्रेट फाइल्स का मुद्दा बहुत तूल पकड़ा था। तब दक्षिणपंथी ताक़तों ने सुभाष को गांधी नेहरू  विरोधी और दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक के रूप में पेश करने का षड्यंत्र किया। पर सुभाष दिल, दिमाग, परवरिश से लेश मात्र भी न तो साम्प्रदायिक थे और न ही दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। उनके लेखों के संग्रह में एक भी ऐसा लेख नहीं मिलता जिससे वे धर्मान्धता से संक्रमित नज़र आयें । हिन्दू महासभा से उनका विरोध जग जाहिर था। उनका मतभेद गांधी, नेहरू से भी था, पर यह विरोध सांप्रदायिक मुद्दे पर नहीं बल्कि द्वीतीय महायुद्ध में अंग्रेज़ो के खिलाफ क्या रणनीति अपनाई जाय इस पर था।

सुभाष बोस ने अपने भाषणों और लेखों में कांग्रेस के हिंदुओं को राष्ट्रवादी हिन्दू और हिन्दू महासभा से जुड़े हिंदुओं को सांप्रदायिक हिन्दू बार बार कहा है। उन्होंने ऐसा क्यों विभाजन किया ? यह सवाल उठ सकता है। ऐसा करने का आधार, बंगाल की परिस्थितियां थी। बंगाल में मुस्लिम लीग का अच्छा खासा प्रभाव पहले से था और उसकी प्रतिक्रिया में  वहां हिन्दू महासभा का भी प्रभाव बढ़ने लगा था। 1905 के बंग भंग और 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद बंगाल का साम्प्रदायिकरण होना शुरू हो गया था। लेकिन कांग्रेस का प्रभाव जनता पर कम नहीं हुआ था। 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद सुभाष बोस ने पहला काम यह किया कि उन्होंने कांग्रेस के सदस्यों को हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की सदस्य्ता ग्रहण करने पर रोक लगा दी। दोहरी सदस्यता के खिलाफ प्रतिबंध का यह पहला मामला था। वे हिन्दू महासभा को मुस्लिम लीग के बरक्स रख कर ही देखते थे। ' हिन्दू महासभा इन कोलोनियल नार्थ इंडिया' नामक पुस्तक जो प्रभु बापू द्वारा लिखी गयी है के पृष्ठ 40 पर लिखा यह अंश पढ़ें

" Under Subhas Bose as President, the Congress through a resolution on December 16, 1938 barred its members from joining the Hindu Mahasabha and the Muslim League.
(Reference : Hindu Mahasabha in colonial North India, Prabhu Bapu, Pg 40)
( सुभाष बोस की अध्यक्षता में कांग्रेस ने 16 दिसम्बर 1938 को एक प्रस्ताव पास किया जिसमें कांग्रेस के सदस्यों को हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के सदस्य होने पर रोक लगा दी गयी । )

1939 में जब उन्होंने गांधी जी से मतभेद होने के कारण कांग्रेस के अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था तो उन्होंने तभी फॉरवर्ड ब्लॉक ( अग्रगामी दल ) का गठन किया। यह दल साम्राज्यवाद के विरोध में गठित हुआ था, और वामपंथी विचारों का था। सुभाष यह चाहते थे 1939 में विश्वयुद्ध की शुरुआत होते ही अंग्रेज़ों को यह चेतावनी दे दी जाय कि 6 माह में वे भारत को आज़ाद करें। ब्रिटेन के समक्ष धुरी राष्ट्रों की चुनौती का वह राजनीतिक रणनीति के रूप में दोहन करना चाहते थे। हरिपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में ब्रिटेन को चुनौती पर जो प्रस्ताव उन्होंने पारित कराया, उसमें यह कहा गया कि,

" As per Haripura resolution Britain was given six months ultimatum to the British , failing to which, there will be revolt. But this was something Gandhi could not digest. Subhash did not endorse the nonvoilence and satyagrah tactics of Gandhi ji to throw the British away. The result was that there was great devide between Gandhi ji and Subhash "
( हरिपुरा कांग्रेस ने जो प्रस्ताव पारित किया था उसमें ब्रिटेन को 6 माह का अल्टीमेटम, भारत को आज़ाद करने के संबंध में निर्णय लेने के लिये दिया गया था। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर विद्रोह होगा। लेकिन गांधी जी इस से सहमत नहीं हुए। सुभाष ने अहिंसा और सत्याग्रह के रास्ते को भी , ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने के लक्ष्य प्राप्ति हेतु, स्वीकार नहीं किया था। यही वह मुख्य कारण था कि सुभाष और गांधी जी के बीच मतभेद हो गए )

यह प्रकरण The Lost Hero by Mihir Bose  और  कांग्रेस का इतिहास - डॉ पट्टाभि सीतारमैय्या , पुस्तकों में विस्तार से दिया गया है। सुभाष का रास्ता तभी अलग होने लगा। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा का पथ तो छोड़ दिया पर वे कांग्रेस के धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत पर अंत तक अडिग रहे। उनके लिये साम्प्रदायिकता देश की एकता, अखंडता और प्रगति की बाधक थी। उधर कांग्रेस ने बिना भारत की कांग्रेस सरकार से पूछे भारत को युद्ध मे शामिल करने के ब्रिटिश राज के  निर्णय के विरुद्ध त्यागपत्र  दे दिया था, जो कुछ समय पहले,  सुभाष की 6 माह के अल्टीमेटम के मुद्दे पर उनसे भिन्नमत थी।

सुभाष बाबू ने अपने दल फारवर्ड ब्लॉक के नाम से एक साप्ताहिक पत्र भी निकाला था । जिसके संपादकीय लेख " कांग्रेस एंड कम्युनल ऑर्गेनाइजेशन " में , वे हिन्दू महासभा के बारे में लिखते हैं,

‘That was a long time ago, when prominent leaders of the congress could be members of the communal organisations like Hindu Mahasabha and Muslim League. But in recent times, the circumstances have changed. These communal organisations have become more communal than before. As a reaction to this, the Indian National Congress has put into its constitution a clause to the effect that no member of a communal organisation like Hindu Mahasabha and Muslim League can be a member of an elective committee of Congress."
- Reference : Netaji Collected Works, Volume 10, Pg 98)
( बहुत समय से कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे साम्प्रदायिक दलों के सदस्य हो सकते थे। लेकिन वर्तमान समय मे ये दोंनो दल और अधिक साम्प्रदायिक हो गए हैं। इसके फलस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर के अपने संविधान में संशोधन कर दिया कि कोई भी व्यक्ति जो हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का सदस्य न हो कांग्रेस का सदस्य हो सकता है । )

यह सुभाष बोस का हिन्दू महासभा के प्रति दृष्टिकोण था। उन्होंने दोनों ही दलों हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग को अपने लेखों और भाषणों में साम्प्रदायिक कहा और माना है।

राजनीति संभावनाओं का खेल है। एक दिलचस्प प्रकरण भी मिलता है जब सुभाष बाबू ने कलकत्ता कॉरपोरेशन के चुनाव में ब्रिटिश वर्चस्व को चुनौती देने के लिये हिन्दू महासभा के साथ स्थानीय स्तर पर तालमेल का भी प्रयास किया। पर हिन्दू महासभा ने सुभाष बोस के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। यह बात उन्होंने 1940 में ही अपने पत्र फारवर्ड ब्लॉक में लिखा था। सुभाष यह चाहते थे कि हिन्दू महासभा का साथ ले कर कलकत्ता कॉरपोरेशन में वे ब्रिटिश वर्चस्व को तोड़ सकेंगे। पर हिन्दू महासभ ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। बोस ने हिन्दू महासभा के इस कदम पर कहा था,
“in fighting the Congress than in resisting British domination”
" महासभा, कांग्रेस के साथ लड़ने में अधिक रुचि दिखा रही थी बनिस्बत की ब्रिटिश का विरोध करने के । "
संपादकीय का यह अंश पढ़ें।

“… Moreover the tactics employed by some Hindu mahasabha leaders for whom we had great personal regard, as also by some Hindu Mahasabha workers in connection with the elections, have caused us pain and sorrow. The Hindu Mahasabha did not fight a clean fight.
( हिन्दू महासभा के कुछ नेताओं जिनके प्रति मेरे मन मे  व्यक्तिगत रूप से बहुत सम्मान था, साथ ही हिन्दू महासभा के कुछ कार्यकर्ताओं ने चुनाव के समय हमें बहुत निराश और व्यथित किया। हिन्दू महासभा ने नीतिगत रूप से चुनाव नहीं लड़ा )

" What is more, the Hindu Mahasabha candidates included men who had tried their level best to break the Congress Municipal Association and to that end had formed the United Party in the Corporation in co-operation with British and nominated groups of councillors. Some of them have been re-elected and one  could easily anticipate how they would behave in future."
( इतना ही नहीं, हिन्दू महासभा के प्रत्याशियों में वे तत्व अधिक थे, जिन्होंने म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में कांग्रेस को तोड़ने का काम किया और अंत मे उन्होंने ब्रिटिश पार्षदों और कुछ नामांकित सदस्यों के साथ मिल कर एक मोर्चा बना लिया। उनका यह कदम बताता है कि भविष्य में वे क्या कदम उठाएंगे । )

" The Hindu Mahasabha has given evidence of greater desire to do down the Congress than to save the Corporation from British domination."
( ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे यह प्रमाणित होता है कि हिन्दू महासभा ने हर उस अवसर का लाभ उठाया है जिससे कांग्रेस को नीचा देखना पड़े और कॉर्पोरेशन में ब्रिटिश वर्चस्व बना रहे । )
(Reference : Netaji Collected Works, Volume 10, Pg 88–90)

यहां यह ध्यान में रखने की बात है कि हिन्दू महासभा के अध्यक्ष ( 1937 - 43 ) वीडी सावरकर थे । सावरकर का ब्रिटिश आकाओं की तरफ झुकाव जग जाहिर था। जब डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा में आये तो उन्होंने अपनी डायरी में एक रोचक प्रसंग प्रस्तुत किया है। डॉ मुखर्जी भी बंगाल के बड़े प्रतिष्ठित और प्रबुद्ध परिवार के थे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे। पर सुभाष बोस से उनका साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर बहुत टकराव था। अपनी डायरी में डॉ मुखर्जी लिखते हैं,

" that Bose met him and told him if he went about building Hindu Mahasabha as a political body in Bengal, “He ( Subhash Chandra Bose) would see to it, BY FORCE IF NEED BE, THAT IT WAS BROKEN BEFORE IT WAS REALLY BORN.”
( एक बार बोस उनसे मिले थे, और यह कहा था कि, यदि आप हिन्दू महासभा को एक राजनीतिक दल के रूप में गठित करते हैं तो मैं देखूंगा , ( कैसे गठित करते हैं ) यदि आवश्यकता पड़ी तो बल प्रयोग से भी यदि यह सच मे गठित होती है तो इसे तोडूंगा। )

हिन्दू महासभा के 1937 में सावरकर के अध्यक्ष बनने के बाद धार्मिक स्तर पर इसे कांग्रेस के समानांतर राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करने के प्रयास के संदर्भ में यह उद्धरण है। डॉ शयमा प्रसाद मुखर्जी इसे बंगाल में एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते थे। बंगाल की राजनैतिक परिस्थितियों में सांप्रदायिकता का जहर अधिक फैल गया था। वहां यह हिन्दू समाज मे ध्रुवीकरण करने की एक साजिश थी। सुभाष इस तथ्य को समझ गए थे। वे ज़रूर कांग्रेस से बाहर थे और अपनी एक नयी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक उन्होंने बना लिया था पर वे यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि मुस्लिम लीग के समानांतर हिन्दू महासभा स्थापित हो।
डॉ मुखर्जी के इस कथन कि सुभाष बोस ने हिन्दू महासभा को रोकने के लिये बल प्रयोग करने की बात कही है को सुभाष बोस ने स्वीकार भी किया है। इसी संदर्भ में बलराज मधोक , जो स्वयं उस समय हिन्दू महासभा के एक नेता थे, के लिखे इस अंश को पढ़ें,

" Subhash Chandra Bose with help of his supporters, decided to intimidate the Mahasabha by use of force. His men would break-up all Mahasabha meetings and beat up the candidates. Dr Mookerjee would not tolerate it. He got a meeting announced, to be addressed by him. As soon as he rose to speak, a stone hit him in his head, and he began to bleed profusely."
(  सुभाष चन्द्र बोस, ने हिन्दू महासभा की सभी जन सभाओं में व्यवधान डालने की अपने समर्थकों की सहायता से योजना बनाई। उन्होंने कहा कि उनके समर्थक महासभा की सभाएं नहीं होने देंगे और महासभा को सभा नहीं करने देंगे और ज़रूरत पड़ी तो पीटेंगे भी। डॉ मुखर्जी इसे सहन नहीं कर पाए और उन्होंने एक सभा का आयोजन किया जिसमे उन्हें भाषण देना था। जैसे ही डॉ मुखर्जी सभा मे भाषण देने के लिये खड़े हुए तभी एक पत्थर उन्हें भीड़ से आ लगा और उनके माथे से खून निकलने लगा। )

यह प्रसंग बलराज मधोक जो डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे की आत्मकथा में है। सुभाष भारत की बहुलतावादी संस्कृति से परिचित थे और सामरदायिक राजनीति का क्या दुष्परिणाम हो सकता है इस से वे अच्छी तरह से समझते थे।
( क्रमशः )

© विजय शंकर सिंह

No comments:

Post a Comment