Saturday, 23 June 2018

आतंकवादियों के शव का अंतिम संस्कार - एक व्यवहारिक और वैधानिक पक्ष / विजय शंकर सिंह

किसी भी आतंकवादी की मुठभेड़ में मृत्यु के बाद उसके शव के पंचायतनामा और पोस्टमार्टम की कार्यवाही होती है और फिर उसके शव का उसके धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाता है। अगर शव का कोई वैध दावेदार है तो उसे शव सौंप दिया जाता है अन्यथा उसका अंतिम सरकार पुलिस ही करती है।
यह एक कानूनी प्रावधान है। अब इसका व्यावहारिक पक्ष भी देखिये।

अगर, पुलिस और जिला प्रशासन को यह आशंका और उनके पास ऐसी खबरें हैं कि उसकी शव यात्रा को लेकर लोगों को भड़काया जा सकता है और इससे कानून व्यवस्था की और भी जटिल समस्या उत्पन्न हो सकती है तो, ऐसे शव का अंतिम संस्कार अपने सामने और अपनी देखरेख में पुलिस कराती है और उसे कराना भी चाहिये । घर के लोगों को बुलाया जा सकता है । अगर घर के लोग नहीं आते हैं तो अंतिम संस्कार उसके धर्म के आधार पर पुलिस ही कर देती है। इस हेतु बजट में धन की व्यवस्था भी सरकार करती है।

पर दुर्दांत आतंकवादियों के शव को लेने के लिये उसके घरवाले अक्सर नहीं आते हैं। वे नज़रंदाज़ करते हैं। तब पुलिस का यह दायित्व है कि वह अंतिम संस्कार कर दे । लावारिस और लदावा आतंकियों के शव का अंतिम संस्कार पुलिस करती ही है।

आज एक खबर बहुत तेज़ी से फैल रही है कि सरकार ने यह निर्णय लिया है कि आतंकवादियों के शव परिजनों को नहीं सौंपे जाएंगे। ऐसे निर्णय न तो सरकार लेती है और न ही लिया गया होगा। यह निर्णय स्थानीय परिस्थितियों के अंतर्गत स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी लेते हैं।  शव के अंतिम संस्कार का काम परिजनों का है या विशेष परिस्थितियों में पुलिस का,  इसका निर्णय, उनहीँ पर छोड़ दिया जाना चाहिये। 

मानवाधिकार और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्राविधान में शव का कुछ अधिकार होता है । संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या में कहा गया है, जिसका सम्मान और पालन करना संवैधानिक दायित्व है।

" The fundamental right to life and personal liberty guaranteed under Article 21 of the Constitution has been given an expanded meaning by judicial pronouncements. The right to life has been held to include the right to live with human dignity. By our tradition and culture, the same human dignity (if not more), with which a living human being is expected to be treated, should also be extended to a person who is dead. The right to accord a decent burial or cremation to the dead body of a person, should be taken to be part of the right to such human dignity. "

लेकिन इन सारे मानवाधिकार और मौलिक अधिकारों के प्रावधानों से ऊपर है, समाज मे शांति और व्यवस्था का बना रहना। अगर आतंकी का शव परिजनों को सौंप दिया जाय और इससे वे जुलूस निकाल, सभा कर या अन्य उपद्रव करें जिससे अराजकता फैले और जनजीवन प्रभावित हो तो उचित यही है कि उसका अंतिम संस्कार पुलिस खुद ही कर दे। यह सब पहलीं बार नहीं हो रहा है और पहले भी इसके उदाहरण हैं। कानून और व्यवस्था का बने रहना किसी भी सरकार और प्रशासन की प्रथम प्राथमिकता है।

इस मुद्दे को स्थानीय अफसरों को ही स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार हल करना है और यह दायित्व भी उनके विवेक पर छोड़ देना चाहिये।  समाज और इलाके में शान्ति व्यवस्था बनी रहे और जनजीवन सामान्य रहे, यह ज़रूरी है न कि शव के अंतिम संस्कार पर बहस कि, परिजन करें या पुलिस ।

सरकार के पुलिस मुठभेड़ों के बारे में भी स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। यह दिशा निर्देश मानवाधिकार आयोगों के निर्देशों के अनुरूप दिये गये हैं। सेना का मुझे पता नहीं लेकिन हर पुलिस मुठभेड़ की मैजिस्ट्रेट द्वारा जांच कराए जाने और मुक़दमा कायम कर तफ़्तीश कराए जाने का प्राविधान है। राज्य और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी मुठभेड़ों पर संज्ञान लेकर जांच करता है। इसी लिये पोस्टमार्टम और पंचायतनामा भरा जाता है। यह प्राविधान इस लिये हैं कि किसी निर्दोष व्यक्ति को मुठभेड़ के नाम पर मार न दिया जाय। मानवाधिकार आयोगों के अधिकार क्षेत्र में, सेना द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामले भी आते हैं। उनकी भी कोर्ट ऑफ इंक्वायरी होती है और दोषी पाए जाने पर दंडित भी होते हैं।

© विजय शंकर सिंह

Wednesday, 20 June 2018

जम्मू कश्मीर की सरकार - भाजपा का समर्थन वापसी या जिम्मेदारी से पलायन / विजय शंकर सिंह


कल तक सरकार या यूं कहिये नरेंद मोदी जी ने आतंकवाद की कमर तोड़ दी थी, पर आज जब समर्थन वापसी का औचित्य साबित किया जा रहा है तो, कहा जा रहा है कि आतंकवाद बढ़ गया था इसलिए हमने समर्थन वापस ले लिया। यह तो झोलाछाप डॉक्टरों जैसा इलाज हुआ। मरीज को न जाने क्या क्या दवा दी गयी, और जब मरीज अनाप शनाप बकने लगा सन्निपात में आ गया तो डेरा डंडा उठा झोला समेट कर सरपट भागे कि अब इसे शहर के अस्पताल ले जाओ। या तो अमित शाह झूठ बोल रहे हैं, या राम माधव या दोनों ही मिल कर एक शातिर मिथ्यावाचन की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। 

2015 में जब सरकार बनी तो सबको सन्देह था कि यह वैचारिक ध्रुवीय विरोधाभासी  सरकार है जो शायद ही अपना कार्यकाल पूरा करे । केर बेर का संग था यह । तब कहा गया कि व्यापक राष्ट्र हित मे यह सरकार बनी है और इसका एक साझा कार्यक्रम है। धारा 370 जो पीडीपी और भाजपा दोनों के लिये जीवन मरण का प्रश्न और मुद्दा था, उसे बस्ता ए ख़ामोशी में रख दिया गया। उचित भी था। ऐसा न किया जाता तो, सरकार ही नहीं बनती। खैर सरकार बनी और लुढ़कते हुयी ही सही, कुछ चली। लेकिन आतंकवाद मुख्य मुद्दा तब भी था और अब भी है। इंडो पाक कनफ्लिक्ट मॉनिटर की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में 62, 2012 में 114, 2013 में 349, 2014 में 581, 2015 में 405, 2016 में 449, 2017 में 971, 2018 में 28 मई तक 1252 बार पाकिस्तानी सेना द्वारा अतिक्रमण की घटनाएं हुई है। जिस साल एक मास्टरस्ट्रोक कहे जाने वाले कूटनीतिक कदम के अंतर्गत प्रधानमंत्री अचानक इस्लामाबाद में नवाज़ शरीफ़ के घर उनके एक पारिवारिक समारोह में भाग लेने उतर गये थे उस साल सीमोल्लंघन की घटनाएं और बढ़ी। इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि पाकिस्तान के प्रति हमारी नीति विफल और ढुलमुल रही है। 

इसी अवधि में आईएसआई द्वारा पठानकोट एयरबेस का मुआयना कराना, थोक भाव से पत्थरबाजों के विरुध्द कायम मुकदमों को वापस लेना, और सीमापार बिना किसी शांति का आश्वासन पाए ही इकतरफा युद्धविराम की घोषणा करना, सरकार के अनिश्चय और ढुलमुल रवैये को ही बताता है। पत्थरबाज, आतंकियों के लिये एक प्रकार से कवर का काम करते हैं। सबके खिलाफ मुक़दमे कापसी से दो सन्देश साफ साफ गये। आतंकियों ने इससे यह संदेश ग्रहण किया कि सरकार अपने राजनीतिक हित के प्रति अधिक सजग है, बनिस्बत कि प्रशासनिक हित के। सुरक्षा बल अनुशासित होते हैं। वे तो सरकार के किसी भी निर्णय पर कोई टीका टिप्पणी करेंगे नहीं पर वे भी समाचारों से अवगत हैं, सोशल मीडिया पर हैं, सारी बात जान बूझ रहे हैं तो उनके अंदर भी प्रतिक्रिया होती ही है। यह मान बैठना कि वे आदेश पालन करने वाले यंत्रमानव या रोबोट हैं, मूर्खता ही होगी। इन सब राजनीतिक निर्णयों से  उनके मनोबल पर असर पड़ता है , पर वे सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं।  किसी भी युद्ध या युद्ध जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मनोबल सबसे पहली और ज़रूरी चीज़ है। 

2015 से अब तक भाजपा की सरकार केंद्र में भी है और राज्य में भी रही है। महबूबा को भाजपा का बाहर से समर्थन नहीं था, बल्कि वह मजबूती से सरकार में थी। उनका उपमुख्यमंत्री भी था। केंद्र में सरकार होने के नाते महबूबा पर एक प्रकार का मानसिक दबाव भी था। संसाधनों की भी कमी नहीं थी। कहते हैं नरेंद्र मोदी जी को सत्ता में आने के पहले से ही कश्मीर के मानलों की समझ थी। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल खुद भी पाकिस्तान और कश्मीर मामलों के सर्वज्ञ हैं। मोदी जी, डॉ मनमोहन सिंह की तरह जनाधारविहीन नेता भी नहीं है। उनकी पार्टी में उनकी धाक इतनी है कि उनका कोई विकल्प ही नहीं है। फिर कमज़ोरी कहां है ? सेना, सभी सुरक्षा बल, आईबी, रॉ, सभी केंद्र के अधीन हैं फिर भी अगर आतंकवाद बढ़ जाने के कारण भाजपा को स्वयं जिम्मेदारी से पलायन करना पड़े यह स्पष्ट रूप से अकर्मण्यता है। 

कश्मीर में चार साल की सभी उपलब्धियों और अनुपलब्धियों कि जिम्मेदार भाजपा और पीडीपी दोनों ही संयुक्त रूप से हैं। भाजपा अधिक है, क्यों कि वह केंद्र में भी सत्ता में भी है। वह राष्ट्रीय दल है और उसके सामने व्यापक राष्ट्रहित के मुद्दे हैं। जब यह समझौता हुआ था तो यह उम्मीद जगी थी, संविधान की धारा 370, कश्मीरी पंडितों की वापसी, कश्मीर में विश्वास बहाली, हिंसक गतिविधियों पर लगाम, आदि कश्मीर से जुड़े मूल मुद्दों को पीडीपी भले ही नज़रंदाज़  कर जाय, पर भाजपा, इन मुद्दों पर कुछ न सार्थक कार्यवाही ज़रूर करेगी। पर बदामि च ददामि न। न तो संविधान की धारा, 370 पर कोई अध्ययन दल ही बना और न ही कश्मीरी पंडितों के वापसी के लिये ही कोई कदम उठाया गया। भाजपा को एक सुनहरा अवसर मिला था, जम्मू कश्मीर में शासन करने का। वह इस अवसर का लाभ उठा कांग्रेस की उन नीतियोँ के खिलाफ, जिसका यह अरसे से विरोध कर रही थी, के बजाय, अपनी उन नीतियों को लागू कर सकती थी, जिन्हें कश्मीर के हित मे समझती थी। चार साल का समय कम नहीं होता है। पर इनके लिये कठुआ के बलात्कारी गुंडो का साथ देना ज़रूरी था, न कि देश के व्यापक हित में काम करना। धारा 370, और कश्मीरी पंडितों की वापसी, यह दोनों ही मुद्दे भाजपा के प्रिय मुद्दे रहे हैं। चार साल के शासन के बाद भी अगर इन मुद्दों पर विचार करने के लिये कोई कदम तक नहीं उठाया गया तो यह मानना पड़ेगा कि यह सारे मुद्दे बस चुनाव जीतने के लिये ही थे। इन मुद्दों को ज़िंदा रखना, भाजपा की मज़बूरी भी है और उनकी रणनीति भी। चार साल में कश्मीर में सरकार ने क्या किया, इसकी पड़ताल जब विशेषज्ञ करेंगे तो स्वतः कई बातें सामने आएंगी। सरकार से मतलब, केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों से है। इस समर्थन वापसी का राजनीतिक लाभ भले ही भाजपा को हो पर यह उसकी प्रशासनिक अक्षमता भी है। अब कल से धारा 370 के खात्मे और पंडितों की वापसी पर इनका प्रलाप सुन लीजियेगा। 

जुमलों की बारिश से खुशनुमा मौसम बना कर चुनाव जीत लेना, कम सीटों के बावजूद भी साम दाम दंड भेद से सरकार बनाने में सफल हो जाना आसान है बनिस्बत सरकार चलाने और जनता को एक स्वच्छ प्रशासन देने के। यह महबूबा की विफलता कम है नरेंद्र मोदी जी की विफलता अधिक। पत्थरबाजों पर से मुक़दमे हटवा कर और रमज़ान में इकतरफा सीज फायर करा कर महबूबा ने अपना राजनीतिक हित तो साध लिया है पर भाजपा इस मुद्दे पर भी असफल रही है। 

© विजय शंकर सिंह 

कश्मीर घाटी में खीर भवानी - एक यात्रा संस्मरण / विजय शंकर सिंह

जब मैं श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतर कर सीआरपीएफ के ऑफिसर्स मेस में पहुंचा तो गाड़ी से उतरते ही मेस पर निगाह पड़ी तो लिखा देखा, कशिर ऑफिसर्स मेस। एक बार तो लगा कि यह कश्मीर लिखा होगा, हो सकता है लिखने में त्रुटि हो गयी हो। पर जब यही वहां के झंडों पर लिखा देखा तो कमरे में व्यवस्थित होने के बाद मेस तथा आरटीसी, ( यह रिक्रूट ट्रेनिंग सेंटर है ) के कैम्पस में घूमते हुये एक स्थानीय व्यक्ति से पूछा कशिर का क्या अर्थ है ? उत्तर मिला घाटी। वादी। श्रीनगर पहाड़ों से घिरे एक सुरम्य घाटी में स्थित है। इसी विस्तीर्ण घाटी में स्थित श्रीनगर के बीच से झेलम प्रवाहित होती है, और एक बड़ी झील है, जिसे डल कहते है।

इसी घाटी में श्रीनगर से 23 किमी दूर एक गांव है तुलमुला। यह गांव, बालटाल और सोनमर्ग जाने वाले रास्तों के बीच अंदर ग्रामीण क्षेत्र में पड़ता है। इसी गांव में कश्मीर राजपरिवार की कुल देवी खीर भवानी का मंदिर है। यह शक्ति के स्वरूप का मंदिर है। यह इक्यावन मान्यता प्राप्त शक्तिपीठों में नहीं आता है। यह मूलतः भवानी का ही मन्दिर है पर दुग्ध रूप में यहां अवतरित होने के कारण, क्षीर भवानी ( खीर भवानी ) नाम पड़ गया । यहां खीर का प्रसाद भी चढ़ता है और देवी के इस नाम के अतिरिक्त, महाराग्या देवी, रंग्न्या, रजनी, भगवती आदि नाम हैं। इस मंदिर की सुरक्षा का दायित्व सीआरपीएफ की एक कम्पनी के पास है। कश्मीर की स्थितियों को देखते हुये वहां की सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है।

एक सदी पहले तुलमुला गांव एक जंगल था। इसी जंगल मे यह स्थान सबसे पहले बकरवाल लोगों ने खोजा था। यहां मन्दिर के अंदर जो जानकारी दी गयी है, उसके अनुसार, इस देवी से जुड़ी निम्न कथा बतायी गयी।  महाराग्या देवी, की रावण ने पूजा की और देवी ने प्रसन्न होकर, लंका में निवास करने चली गयीं। जब रावण की आसुरी प्रवित्तियाँ बढ़ने लगी तो देवी ने, उसके अत्याचारों से दुःखी हो कर लंका को त्याग देने का निर्णय किया। देवी ने अपनी व्यथा हनुमान से कही, कि उन्हें लंका में नहीं रहना है, उन्हें हिमालय के बीच सतीसर ( जो कश्मीर का एक प्राचीन नाम है ) में जंगलों और उपत्यका में ले चलने की बात कही। हनुमान ने देवी को साथ ले जाने से, अपने अखण्ड ब्रह्मचर्य के खंडित होने की बात कही, और विनम्रता पूर्वक देवी को अपने साथ ले जाने से मना कर दिया। तब देवी ने हनुमान से कहा कि, वह एक कमंडल में दुग्ध के रूप में हनुमान के साथ जाएंगी और इस प्रकार हनुमान का अखण्ड ब्रह्मचर्य भी खंडित नहीं होगा। हनुमान मान गए। देवी ने क्षीर , दुग्ध का रूप ग्रहण किया और वे तुलमुला गांव जहां है वहां चिनार के घने जंगल के बीच आ बसी। यहां शहतूत के भी घने वृक्ष थे। कंबन रामायण में भी इस कथा का आंशिक उल्लेख मिलता है। उस कथा के अनुसार, सीता ,राग्या देवी का ही रूप है। सीता को रावण की पुत्री के रूप में कंबन रामायण में बताया गया है।

यह भी धारणा है कि जिस रात्रि राग्निया देवी ने कश्मीर में आगमन किया वह रात्रि राग्निया रात्रि के नाम से प्रसिद्ध है। राग्निया देवी के नाम पर तुलमुला गांव के इस खीर भवानी मन्दिर के अतिरिक्त कश्मीर में , टीकर, भुवनेश्वर, मज़गाम, ( नूराबाद ) , भेडा, लोकरीरपुर, मणिग्राम, रायथान, और बाइदपुर आदि स्थानों पर भी मंदिर हैं। लेकिन तुलमुला जहां बताते हैं कि कभी 360 जलश्रोत निकल कर सर्प सदृश्य एकत्र होते थे, यही देवी का मुख्य स्थान बना। यह देवी का सात्विक स्वरूप है। सनातन सम्प्रदायो में शाक्त परम्परा जिसे रहस्य या गुह्य परम्परा भी तंत्र साहित्य में कहा जाता है का मुख्य स्थान पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्र रहे हैं। शाक्तों का सबसे बड़ा तंत्र पीठ कामाख्या कामरूप जिले में हैं । लेकिन देवी का वैष्णवी रूप पश्चिम हिमालय की तलहटी में मिलता है। शाक्त वामचारी पूजा पद्धति में विश्वास करता है जब कि वैष्णवी स्वरूप उससे बिल्कुल उलट है। यह शांति की देवी हैं।

भारत के इतिहास लेखन में कल्हण की राजतरंगिणी का नाम सबसे प्रमुख है। यह कश्मीर के राजवंशों का इतिहास है। संस्कृत में लिखी इस प्रसिद्ध और ऐतिहासिक पुस्तक का हिंदी अनुवाद वाराणसी के विद्वान और राजनेता रहे, डॉ रघुनाथ सिंह ने किया है। लेकिन यह इतिहास की अकादमिक पुस्तक नहीं है, बल्कि इतिहास को इसमें से छानना पड़ता है। राजतरंगिणी में भी तुलमुला के जलस्रोतों का उल्लेख मिलता है। राजतरंगिणी के अनुसार, इतने जलश्रोत थे कि तुलमुला की भूमि दलदली हो गयी थी। अबुल फजल के आईन ए अकबरी के अनुसार, तुलमुला में सैकड़ों एकड़ की दलदली भूमि थी। यहां के पंडित जी जो मन्दिर में रहते हैं ने इस मंदिर की एक और कथा सुनाई। उनके अनुसार, तुलमुला कश्मीरी पंडितों का पुराना गांव था। गांव का नाम, भी तुलमुला के जंगलों के नाम पर ही पड़ा है। हज़ारो साल पहले यहां बाढ़ आती थी। यह बाढ़ पहाड़ों से बह कर आ रहे जलस्रोतों से लगातार आती रहती थी। इन बाढ़ों से बह कर आई मिट्टी से यहाँ मिट्टी का दलदली ढूहा बनता गया। कश्मीरी पंडित, योगी कृष्ण टपलू को स्वप्न में देवी दिखीं और, कहा कि वह इस कुंड में सर्प के रूप में तैर कर एक पेड़ के पास लिपट जाएंगी और वहीं उनका विग्रह होना चाहिये। जब बाढ़ का पानी कम हुआ तो पंडित जी ने उस स्थान की पहचान की। यह घटना, लगभग डेढ़ दो सौ साल पहले की बताई जाती है। योगी कृष्ण टपलू एक प्रसिद्ध ज्योतिषी भी थे, और लोग बताते हैं कि उनके पास ज्योतिष का प्रसिद्ध प्राचीन ग्रँथ भृगु संहिता की प्रति थी। भृगु संहिता की प्रति अपने पास होने का दावा बहुत से लोग करते हैं। मेरे एक मित्र के अनुसार, भृगु संहिता की एक प्रति होशियार पुर के एक सज्जन के पास भी है। सच क्या है, यह मैं नहीं बता पाऊंगा। वही पास में ही एक विशाल शिवलिंग भी है जिसके मन्दिर को बोहरी कदल कहते हैं। इन्ही टपलू परिवार के माखनलाल टपलू मन्दिर की व्यवस्था देखा करते थे। टपलू परिवार 1990 में जब कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ तो तुलमुला से पलायित कर गया और इन्ही परिवार के अनिल टपलू, दिल्ली में दिलशाद गार्डेन दिल्ली रहते हैं।

पंडित टपलू को दिखे स्वप्न के बाद डेढ़ सौ साल पहले जब देवी के स्थान की महत्ता सर्वज्ञात होने लगी तो यहां भीड़ बढ़ने लगी और दर्शनार्थियों के मेले लगने लगे। लोगों द्वारा, खीर, मिष्ठान्न आदि प्रसाद आदि चढ़ाने से कुंड और स्थान ढंक गया था। जब इसकी सफाई और खुदाई हुयी तो प्राचीन मंदिर के अवशेष निकलने लगे। बहुत सी छोटी छोटी मूर्तियां मिली और इन भग्नावशेषों को देख कर एक सुव्यवस्थित और समृद्ध मन्दिर का प्रमाण मिला। यह मंदिर किसके द्वारा किस काल मे बनाया गया था यह न तो वहां मेरे साथी गाइड बता पाए , न राजतरंगिणी के एक विद्वान मित्र मुझे स्पष्ट कर पाए और न ही गूगलेश्वर से मैं जानकारी कर पाया। 1911 के पहले जब तक इस भग्न मन्दिर का जीर्णोद्धार कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह के निर्देश पर नहीं हो गया था, तब तक इन्ही भग्नावशेषों की पूजा होती थी और इन्ही खंडहरों में मेला लगता था। महाराजा द्वारा कुंड का नए तरह से निर्माण कर के, कुंड के बीचोंबीच संगमरमर का एक छोटा सा देवी मन्दिर,  बनवाया गया जो आजकल मुख्य मंदिर है। कुंड और यह मंदिर कहा जाता है उसी स्थान पर है जिसे देवी ने स्वप्न में पंडित टपलू को बताया था। वहां के पुजारी खुद को उन्ही पंडित टपलू के वृहत्तर परिवार का होना बताते हैं।  तुलमुला गांव भी इस स्थान पर तुलमुल के वृक्षों की बहुतायत होने से पड़ा है। तुलमुल, कश्मीरी भाषा मे शहतूत को कहते हैं। यहां चिनार और शहतूत के घने जंगल थे। अब भी शहतूत के वृक्ष हैं पर वे जंगल नहीं गांव में उगे पेड़ों के उपवन की तरह हैं। तुलमुल नाम भी कश्मीरी भाषा मे संस्कृत के अतुल्य मूल्य से अपभ्रंश के रूप में आने की बात बताई गई। शहतूत के पत्तों पर पलने वाले रेशम के कीड़ों से कश्मीरी रेशम बनता था, अतः अपनी आर्थिक उपयोगिता के कारण यह वृक्ष अतुल्य मूल्य से तुलमुल हो गया और गांव तुलमुला।

प्राचीन तीर्थों से जुड़ी लोक और दंत कथाओं का विस्तार बहुत व्यापक है। टीएन धर, जो एक शिक्षाविद और कश्मीर पर एक आधिकारिक विद्वान हैं ने कश्मीर पर एक रोचक पुस्तक लिखी है, सेंटस एंड सेजेस ऑफ कश्मीर । Saints and sages of Kashmir, जो APH Publishing Corporations, नयी दिल्ली से प्रकाशित है के पृष्ठ 310 पर एक रोचक दंतकथा का उल्लेख है। उक्त दंत कथा के अनुसार, पंडित प्रसाद जू परिमू एक गृहस्थ संत थे जिनकी एक समृद्ध शिष्य परंपरा थी। वह श्रीनगर के सेकिदफ़र नामक गाँव मे रहते थे। झेलम के किनारे बसा यह गांव अब शहर का अंग हो गया है। उन्हें कोई संतान नहीं थी और निःसंतान होने के कारण उन्होंने माधव जू नामक एक बच्चे को गोद लिया। ( जू एक सम्मानजनक सम्बोधन है ). पंडित परिमू अपनी आराध्या खीर भवानी मंदिर में अक्सर जाते थे और इसी क्रम में जब वह वहां ध्यान में लीन थे, तो भवानी ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिया और कहा कि बच्चा गोद लेने की कोई आवश्यकता नहीं थी, वे स्वयं उनके संतान के रूप में जन्म लेने की इच्छुक थीं। देवी के इसी स्वप्न के बाद परिमू की पत्नी ने एक पुत्री को जन्म दिया। यह घटना, पुस्तक के अनुसार 1870 - 80 ई की है। इस प्रकार की तीन और लोकश्रुति की कथाओं का उल्लेख किया गया। संतान प्राप्ति के इच्छुक दम्पति यहां पूजा पाठ भी करवाते हैं।

भारत के दो महान संत, स्वामी रामतीर्थ और स्वामी विवेकानंद के भी खीर भवानी जाने का उल्लेख मिलता है। राजकीय डिग्री कॉलेज, भद्रवाह के फिजिक्स के सहायक प्रोफेसर राकेश कुमार पंडित के एक लेख जो उन्होंने स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयंती पर 2014 में लिखा था के अनुसार, जुलाई 27, 1898 को स्वामी विवेकानंद ने अपनी शिष्या निवेदिता के साथ अमरनाथ की यात्रा की थी। उनकी यह तीर्थयात्रा पहलगाम, चन्दनबाड़ी, शेषनाग आदि पड़ावों को पार करते हुये, 1 अगस्त 1898 को बाबा अमरनाथ की गुफा में पहुंची। वे हिम शिवलिंग देख अभिभूत हो गए। शिव, विवेकानंद के आराध्य देव थे। देर तक वे भूमि पर साष्टांग पड़े रहे। अपने इस दिव्य आध्यात्मिक अनुभव को साझा करते हुये सिस्टर निवेदिता से उन्होंने कहा कि यह हिम लिंग, शिव का प्रतीक नहीं बल्कि साक्षात शिव ही थे, उनके समक्ष। अमरनाथ से वे वापस श्रीनगर आये और जिस मुस्लिम की हाउस बोट में वह ठहरे थे, उसकी चार वर्षीय पुत्री की उन्होंने देवी मान कर, उसकी पूजा की और उसका नाम रखा उमा। एक सप्ताह के श्रीनगर प्रवास के बाद विवेकानंद उक्त मुस्लिम परिवार और उसकी चार साल की पुत्री जिसका उन्होंने नामकरण उमा किया था के साथ 30 सितम्बर 1898 को खीर भवानी के लिये प्रस्थान किया। खीर भवानी तब एक भग्न मन्दिर था। यह भग्नावशेष मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा तोड़े जाने के कारण बिखरा था। उसी भग्न मन्दिर में 1911 तक पूजा होती थी। वहां वे एक सप्ताह तक रहे और पूजा, अर्चना और ध्यान आदि किया। राकेश कुमार पंडित का यह लेख गूगल पर उपलब्ध है।

जो मुख्य जलधारा जिसके किनारे यह देवी स्थान स्थित है वह माता रागिनी कुंड कहलाता है। यह देवी कश्मीरी पंडितों की भी मुख्य आराध्या देवी हैं। यहां एक मेला भी जून के अंत मे लगता है। इसका भी वही समय है जो अमरनाथ यात्रा का होता है। मान्यता यह भी है, जल स्रोतों का रंग समय समय पर बदलता रहता है। इसका कारण तलहटी में पड़े, पहाड़ो से आये रंग बिरंगे पत्थर हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विशिष्ट रंगों के परिवर्तन से भविष्य की कुछ घटनाओं का भी संकेत मिलता है। 1886 में वाल्टर लारेंस जब जम्मू कश्मीर रियासत का सेटलमेंट कमिश्नर था, तो उसने अपनी रिपोर्ट में इन बदलते रंगों और रंगों से जुड़ी ज्योतिषीय मान्यताओं का उल्लेख किया है। उसने स्वयं रंग बदलते श्रोत को देखा था। अब वहां जल कुंड है, चारों ओर बसा गांव है और देवी स्थान है। जलश्रोत अब नहीं है।

हमलोग देर तक खीर भवानी मंदिर के परिसर में रहे। वहां और भी दर्शनार्थी थे। परिसर बड़ा है और चारो ओर माला प्रसाद से सजी हुई दुकानें हैं। अधिकतर दुकानें स्थानीय गांव वालों की ही हैं, जो लगभग सभी मुस्लिम है। पूरे गांव में आठ दस घर पंडितों के हैं जो मेले के समय आते हैं और फिर जम्मू चले जाते हैं। कश्मीर की अशनि स्थिति का अनुमान मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है। पर जितनी रोकटोक काशी विश्वनाथ और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर में हैं, वैसी यहां नहीं है। यहां मुख्य आशंका पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों से है न कि स्थानीय मुस्लिमों से। अमरनाथ यात्रा के समय ही यहां मेला लगता है तब यहां दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। अभी उतनी भीड़ नहीं है।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 17 June 2018

दिल्ली पर जमा हुआ धूल का बादल - उपराज्यपाल और केजरीवाल के बीच बढ़ती रस्साकशी - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

आज जैसी स्थिति दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और उप राज्यपाल के बीच तनातनी की आ गयी है अगर वैसी ही स्थिति किसी अन्य राज्य में होती तो क्या इसे उसी दृष्टिकोण से देखा जाता जिस तरह से आज देखा जा रहा है ? आप कहेंगे कि दिल्ली पूरा राज्य नहीं है अधूरा है। वहां के एलजी के पास सारी ताक़त है। वही सीएम की सारी फाइलें पास करता है। अगर हाई कोर्ट का आदेश देखें तो वही सचमुच में बॉस है। अब जब कानून ही ने एलजी को बॉस बता दिया तो क्या कहा जाय। कानून तो सबसे ऊपर है।

केजरीवाल  ने कुछ योजनाओं को लागू करने के लिये नियमानुसार एलजी के पास पत्रावली भेजी और उस पर एलजी बैठ गए। पत्रावली पर बैठ जाना सचिवालय और सचिव की पुरानी आदत है। एलजी सर भी ठहरे एक नौकरशाह। वह भी स्टील फ्रेम वाले। जंग भी थोड़ा बहुत खा जाय तो स्टील तो स्टील ही होता है। उन्होंने उन फाइलों पर कोई निर्णय ही नहीं लिया। अब केजरीवाल मय लवाजमा लिये दिये एलजी हाउस में दाखिल हो गये। लेकिन एलजी ने मिलने से इनकार कर दिया। सारा लवाजमा धरने पर बैठ गया। धरने से और कुछ हो न हो एक फ़िज़ा तो बनेगी, सो फ़िज़ा बननी शुरू हो गयी। दिल्ली वैसे भी इन दिनों अंधी है। खबर फरोश बता रहे हैं कि दिल्ली के ऊपर तो धूल ने डेरा जमा लिया है सो न दिल्ली ऊपर से किसी को दिख रही है और न दिल्ली वाले किसी को देख पा रहे हैं।

तीन दिन से अधिक हो गए दिल्ली की मुन्तख़ब हुयी सरकार को दिल्ली की कानूनी सरकार के दीवान ए खास में कब्ज़ा जमाये। अरविंद केजरीवाल भी वैसे तो हैं एक पूर्व नौकरशाह और टेक्नोक्रेट, पर उन्हें नौकरशाही कभी रास नहीं आयी। वे ठहरे एक्टिविस्ट। एक्टिविज्म का कीड़ा जिसे काट ले वह सदैव एक्टिव ही रहता है और एक्टिविस्ट तथा शासक प्रशासक की भूमिका में तालमेल कम ही बैठ पाता है। यह जंग या रस्साकशी जो दोनों सरकारों के बीच चल रही है वह लोकतंत्र के लिये सुखद संकेत नहीं है। एक तरफ तो उप राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि है और दिल्ली के सिलसिले में उसे अतिरिक्त और विशेष अधिकार प्राप्त है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री को जनता ने चुना है और उसकी जवाबदेही जनता के प्रति है। जब कि एलजी किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है सिवाय अपने आका के जो कि केंद्र सरकार है।

एक सहज सवाल उठता है कि, क्या एक मुख्यमंत्री अपने सहयोगियों के साथ, एलजी के राजकीय आवास में उनसे मिलने की प्रतीक्षा में बैठा है और एलजी उससे मिलने के लिये कुछ कमरों की दूरी तय नहीं कर पा रहा है ! क्या उसका आचरण औपनिवेशिक काल के सामन्त की तरह नहीं दिख रहा है ? इतनी भी तमीज एलजी साहब को नहीं है कि वे उन प्रस्तावों पर मुख्यमंत्री से मिल कर जो उन्ही के ड्राइंग रूम में बैठा है, जा कर विन्दुवार चर्चा कर लेते। अगर तत्काल चर्चा करना किन्ही तकनीकी कारणों से संभव नहीं है तो यह तो वे कह ही सकते हैं कि आप लोग अभी तशरीफ़ ले जाइए और चर्चा की कोई और तिथि तय कर दी जाती। पर उस दर्प के वायरस का वे क्या करें जो सिविल सेवा की परीक्षा पास करते ही स्वभावतः दिमाग के एक कोने में आ बैठती है और गाहे बगाहे सिस्टम को हैंग करती रहती है।

आज चार मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समर्थन में दिल्ली आए हैं। बंगाल, केरल, कर्नाटक और आंध्र के। इनका अनुराग केजरीवाल से है या नहीं, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता है पर ये अच्छी तरह से जानते हैं कि राज्यपाल केंद्र के इशारे पर चलता है और देर सबेर ऐसी ही या इसी प्रकार की मिलीजुली असहज स्थिति से इन्हें भी रूबरू होना पड़ सकता है। ये सभी क्षेत्रीय दल हैं या कुछ ही राज्यों में सीमित हैं। कांग्रेस का रवैया थोड़ा इनसे अलग है। कांग्रेस दिल्ली में आआपा द्वारा अपदस्थ की गई है और वह खुद को दिल्ली में केजरीवाल की प्रतिद्वंद्वी मानती है, और है भी। शीला दीक्षित जब यह कहती हैं कि उनके समय तो कोई बात ही नहीं हुई और एलजी से संबंध उनके मधुर थे, तो वे यह भूल जाती हैं कि अपने 15 साला शासन में वे दस साल उस समय थीं जब केंद्र में कांग्रेस का शासन था और पांच साल जिस भाजपा का शासन था उसके प्रधानमंत्री अटल जी थे जो इन सब क्षुद्र मामलों में पड़ने वाले राजनेता नहीं थे। दूसरे शीला दीक्षित कोई एक्टिविस्ट नहीं थी और अनुभवी नेता थीं और नौकरशाही में उनकी व्यक्तिगत पैठ भी थी। एलजी और मुख्यमंत्री विवाद से एक मौलिक प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि जनता का चूना हुआ व्यक्ति ही शक्तिशाली है या फिर केंद्र द्वारा थोपा हुआ नौकरशाह। लोकतंत्र, चुने हुए व्यक्ति की बात करता है।

दिल्ली में एलजी की चलेगी या सीएम की, यह तो बाद में तय होता रहेगा, पर मेरी समझ मे एलजी का यह दर्पयुक्त निर्णय कि चाहे जितना भी धरना दे लो मैं बिल्कुल नहीं मिलूंगा अनुचित और अभद्र फैसला है। उनके इस फैसले से जनता में यह क्षवि बन रही है कि केजरीवाल सच मे जनता के लिये कुछ बेहतर करना चाहते हैं, पर वे क्या करें, एलजी करने ही नहीं देता। एलजी का यह निर्णय चाहे उनका अपना हो पर सामान्य धारणा यही है कि वे यह सब केंद्र के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं। केंद्र को चाहिए कि यह अशोभनीय सिलसिला खत्म हो और जिसके जो जो संवैधानिक अधिकार हों उन्हीं के अंतर्गत मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल बात कर के यह तमाशा बंद करें। केजरीवाल को आप कितना ही कुछ कहें, पर एक बात ध्रुव सत्य है कि दिल्ली के वे निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं और उन्हें वही जनादेश प्राप्त हुआ है जो सभी निर्वाचित सरकारोँ को संसदीय लोकतंत्र में प्राप्त होता है।

अगर दिल्ली सरकार के अधीन नियुक्त आईएएस अफसरों पर दिल्ली के मुख्यमंत्री का वैसा ही पूर्ण नियंत्रण होता जैसा कि अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों का होता है तो ये अफसर, हड़ताल आदि कृत्य करने का जैसा आचरण कर रहे हैं, वैसा कदापि नहीं करते। वे तब एलजी की एक नहीं सुनते। नौकरशाही यह बात बखूबी जानती है कि किसकी बात सुननी है, किसकी नहीं सुननी है, किसकी बात कितनी सुननी है, किसकी सुन कर अनसुनी करनी है, किसकी बात नजरअंदाज करनी है और किसकी बात बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करनी है। दिल्ली में नियुक्त आईएएस अफसरों पर नियंत्रण केंद्र सरकार का बरास्ते उप राज्यपाल है, तो वे दिल्ली सरकार की अनदेखी करने की हिम्मत जुटा ले रहे हैं और खुल कर प्रेस से बात कर रहे हैं। नौकरशाही, घोड़े की तरह होती है वह सवार पहचानती है। लगाम का झटका और रकाब की एड़ का इशारा समझती है।

ऐसे आधे अधूरे राज्य से तो बेहतर है कि दिल्ली के राज्य का दर्जा ही समाप्त कर दिया जाय। देश की राजधानी होने के कारण, न तो इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना संभव है और यह आधा अधूरा राज्य अगर ऐसे ही क्षुद्र मनोवृत्ति के नेताओं से गठित सरकारे रही तो जन समस्याओं के समाधान के बजाय अन्य दूसरी समस्याएं ही उतपन्न करती रहेंगी।

© विजय शंकर सिंह