Saturday, 14 April 2018

उन्नाव बलात्कार कांड में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दखल और निर्देश - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

उन्नाव का बलात्कार कांड सुर्खियों में हैं। इस मुकदमे की तफ्तीश अब सीबीआई कर रही है। असल बात और मुक़दमे के तथ्यों की खोजबीन करने का दायित्व अब सीबीआई का ही है। सीबीआई एक विशेषज्ञ जांच एजेंसी है वह निश्चित रूप से घटना के तथ्यों का अन्वेषण कर लेगी।

लेकिन जब यह घटना अखबारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर बहु प्रचारित हुयी तो, अलग अलग जगहों से अलग अलग बातें कही गयीं। मामला राजनीतिक व्यक्ति से जुड़ा था तो और भी बातें पक्ष और विपक्ष में कही जाने लगी। सरकार इस मुकदमे की अहमियत नहीं समझ पायी या उसने इसे अपने दलीय प्रतिबद्धता के कारण नज़रअंदाज़ किया, जो भी हो, यह मुकदमा सरकार के लिये एक चुनौती बन गया और सरकार की काफी किरकिरी हुयी। कौन सी घटना कब किस तरह से अपना रूप बदल सकती है, इसका पूर्वानुमान लगा लेना भी एक अच्छे शासक प्रशासक का गुण है। यहां यह चूक हो गयी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इलाहाबाद के एक वरिष्ठ एडवोकेट गोपाल स्वरूप चतुर्वेदी ने इस मामले के सम्बंध में एक जनहित याचिका दायर की । यह याचिका क्रिमिनल रिट पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन संख्या 1 / 2018 के लिये मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दिलीप बी भोंसले तथा जस्टिस सुनीत कुमार की अदालत द्वारा विचार हेतु स्वीकार की गयी।

11 अप्रैल 2018 को गोपाल चतुर्वेदी द्वारा अदालत में कुछ पेपर कटिंग जो उन्नाव के विधायक कुलदीप सेंगर के विरुद्ध बलात्कार के एक मामले से जुड़े थे प्रस्तुत किया और अदालत का ध्यान इस पर कार्यवाही हेतु आकर्षित किया।

"Mr. Gopal S. Chaturvedi, learned Senior Advocate, presented a letter addressed to the Chief Justice, requesting to take a suo motu cognizance of the incident that has taken place in district Unnao, where a girl was allegedly raped by a Member of Legislative Assembly, Mr. Kuldeep Singh Sengar of Bangarmau Constituency and his aides. He submits that though the offence came to be registered on the basis of first information report lodged by father of the girl, naming Mr. Kuldeep Singh Sengar as main accused, the Investigating Agency has not arrested him till today. "

इसी याचिका में आगे कहा गया है कि,
" that the father of the prosecutrix, for no reason, came to be arrested and was in custody, where, we are informed, he was mercilessly beaten and succumbed to the injuries yesterday, i.e. 10.4.2018. We fail to understand why the Investigating Agency instead of arresting accused persons, they arrested complainant, in connection with this case. "

पीड़िता के पिता को थाने में बुलाना और फिर उसके साथ मारपीट कर के बंद कर देने की बात अदालत को विचलित कर गयी। इस पर अदालत ने यह आदेश दिया,
" We direct the office to register the letter of Mr. Chaturvedi, learned Senior Advocate dated 11.4.2018 as PIL and place it before this Court tomorrow, as fresh matter. We also direct Mr. Ramanand Pandey, learned Addl. Chief Standing Counsel for the State, to inform the Advocate General/Addl. Advocate General to appear in the case. We request Mr. Gopal S. Chaturvedi to appear in the case as Amicus Curiae.
S.O. to 12.4.2018. as fresh matter."

12 अप्रैल 2018 को यह मुक़दमा फिर सुना गया। आगे अदालत ने क्या कहा इसे पढिये,

" Yesterday when the matter was taken up, learned Advocate General, assisted by Additional Advocate General Mr. Neeraj Tripathi with two top police officers, including the one who led the SIT constituted by the Government of Uttar Pradesh, with the entire record of cases were present in the Court. We have heard Mr. Gopal Chaturvedi and Advocate General at considerable length and with their assistance gone through the material to which our attention was drawn.
At the outset, learned Advocate General has informed the Court that First Information Report (FIR) was registered by mother of the prosecutrix, bearing Case Crime No. 0316, on 20 June 2017, for the offences under Sections 363, 366 IPC, against Awdhesh Tiwari and Shubham. During investigation, one Brijesh Yadav along with the other named accused was taken into custody, and offence under Section 376-D IPC and 3/4 Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 (POCSO Act) was added. The investigation in this case got over long back and accused have been charge-sheeted, thereafter, enlarged on bail. This FIR was in connection with the alleged incident of kidnapping and gang rape occurred during 11 June and 20 June 2017. It is not in dispute that the prosecutrix is minor - aged about 17 years and has studied upto sixth standard. "

अदालत के अनुसार, उन्हें लगा कि, पुलिस ने जब कुलदीप सेंगर का नाम मुक़दमे में दर्ज नहीं किया तब वादी मुख्यमंत्री तक अपनी बात कहने पहुंचा। अदालत के ही शब्दों में पढ़ें,

" It appears, that according to the complaint and the prosecutrix, though they named Kuldeep Singh, MLA also in the said complaint, the police did not take down his name nor did they allow her to make any allegations/complaint against him. In other words, her complaint against Kuldeep Singh, was, however, not registered. Consequently, prosecutrix made a complaint to the Chief Minister, in her own hand writing, of the incidents that had occurred on 4 June 2017 and between 11th and 20th June 2017, making allegation of rape, in particular against Kuldeep Singh, who allegedly committed rape on that day (04.06.2017). The complaint was endorsed to the Superintendent of Police, Unnao, by the Special Secretary to the Chief Minister to make investigation and submit a report within a week. But till midnight of 11 April 2018, no crime/FIR was registered against Kuldeep Singh and his aid. "

सभी तथ्यों के अनुशीलन के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचती है,

" We have carefully gone through the complaint of the prosecutrix supplied by the Advocate General. As per the version of the prosecutrix, she was enticed on the night of 11 June 2017, by her neighbour on the pretext of providing her job. Awdhesh and Shubham in the car raped her repeatedly. She tried to escape, but was beaten and intimidated. She was kept in the custody of Shubham at his house, where, she was repeatedly raped by other persons.

इसी बीच सरकार ने इस मामले में बढ़ते विवाद के बाद इस अभियोग की विवेचना सीबीआई को सौंप दी। सीबीआई ने विवेचना ग्रहण कर शुरू भी कर दी। और कुलदीप सेंगर को हिरासत में ले लिया। वे अपनी कार्यवाही कर रहे हैं।

अदालत ने इस पीआईएल की सुनवाई के बाद यह निर्देश जारी किये हैं ,

(1) The Investigating Officer/CBI, as the case may be, shall
arrest Kuldeep Singh and the other accused in FIR No. 0096
registered on 12.04.2018 for the offences punishable under
Sections 363, 366, 376, 506 of IPC and Sections 3 and 4 of POCSO
Act forthwith and carry out further investigation within the time
stipulated under the provisions of CrPC. The IO is directed to
comply with this direction as long as he continues to be an IO and
also till the investigation is taken over by the CBI. It is needless tomention that if the CBI, before compliance of this direction by the
IO, takes over the investigation of crime, shall arrest Kuldeep
Singh and the other accused forthwith and carry out further
investigation within the time stipulated under the provisions of

(2) The CBI is directed to carry out further investigation/re-open
the investigation of the crime, bearing Case Crime No. 0316
registered on 20 June 2017 for the offences under Sections 363,
366, 376-D of IPC and Sections 3 and 4 of POCSO Act alongwith
other three crimes being Nos. 0089 of 2018, 0090 of 2018 and
0096 of 2018 and take it to its logical end within the prescribed

(3) The IO/CBI shall follow the procedure strictly as laid down
under the provisions of CrPC, for investigating the offences under
Sections 376/376-D of IPC and the provisions of POCSO Act, in

(4) The CBI may also consider whether cancellation of bail of all
the accused in Crime No. 0316 of 2017 is necessary for carrying
out free and fair further investigation.

(5) The IO/CBI shall place before this Court the status report on
02.05.2018 in the morning at 10.00 a.m. The office is directed to
place this matter first on board on the next date of listing.

यह आदेश 13 / 04 / 2018 का है। सीबीआई को इन निर्देशों को विवेचना में सम्मिलित करना है।

अखबारों में और सोशल मीडिया में अक्सर यह लोग छाप रहे है कि अदालत ने गिरफ्तारी का आदेश दिया है। कोई भी अदालत गिरफ्तारी का आदेश किसी फ़ैसले या निर्देशों के अंतर्गत नहीं देती है और न ही दे सकती है। न्यायिक मैजिस्ट्रेट गिरफ्तारी का वारंट जारी कर सकता है और वह आदेश पुलिस के लिये बाध्यकारी भी है। पर सीधे सीधे हाई कोर्ट किसी मुल्ज़िम की गिरफ्तारी का आदेश कैसे दे सकती है। हालांकि कि इसी पीआईएल में यह मांग की गयी है कि अदालत गिरफ्तारी का आदेश दे और ऐसा आदेश इस लिये दे क्यों कि अभियुक्त दबंग और प्रभावशाली हैं वे सुबूत मिटा सकते हैं। पर अदालत ने गिरफ्तारी पर जो कहा है वह आप इस निर्देश के प्रथम पैरे में पढ़ सकते हैं।

गिरफ्तारी कोई सज़ा नहीं है। यह एक प्रक्रिया है। यह विवेचना का एक अंग है। विवेचना पुलिस का विधि प्रदत्त अधिकार है जो उसे कानून ने सीआरपीसी के अंतर्गत दिया है। विवेचना प्रक्रिया में दखल देने का कोई अधिकार न्यायालय का नहीं है। केवल पुलिस के बड़े अफसर जो 36 सीआरपीसी के अंतर्गत पुलिस अफसर की शक्तियां पाते हैं वही दखल दे सकते हैं। गिरफ्तारी भी कोई मनमर्ज़ी की चीज़ नहीं है। गिरफ्तारी भी सुबूत के आधार पर होती हैं। गिरफ्तारी का आधार अभियुक्त के भाग जाने और सुबूतों पर उसके प्रभाव पड़ने की संभावना के कारण होता है। क्योंकि जब भी पुलिस गिरफ्तारी कर के मैजिस्ट्रेट के समक्ष मुल्ज़िम को पेश करेगी तो वहां पहली बहस जो जमानत के लिये होती है वह सुबूत पर ही होती है।

यहां भी अदालत ने गिरफ्तारी का कोई अदालती आदेश नहीं दिया है उसने गिरफ्तार करने और न करने का फैसला पुलिस पर ही छोड़ रखा है।अपने निर्देश में shall शब्द का प्रयोग किया है। हालांकि विधि शब्दावली में shall आदेशात्मक होता है। लेकिन मेरी राय में हाई कोर्ट द्वारा गिरफ्तारी का आदेश  देना विधि सम्मत नहीं है।यह विवेचक के विवेक, सुबूत और अभियुक्त के भाग जाने की संभावना और परिस्थितियों के आधार पर निर्भर है।

© विजय शंकर सिंह

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