Saturday, 23 January 2021

शब्दवेध (87) लिपि और लेखन के जनक

लंबे समय तक इस विषय में लगभग  सहमति बनी रही कि वैदिक ऋषि लेखन कला से परिचित नहीं थे।   भारतीय पंडितों की दृष्टि में वे मंत्रद्रष्टा थे, लेखक  तो थे नहीं। वैसे मंत्रद्रष्टा सभी कवि और लेखक होते है, रचना लिखित रूप में उपस्थित नहीं होती। मनोलोक में उत्पन्न होती है और उसके बाद ही लिपिबद्ध होती है। मैक्समूलर ने  वेद का पता चलते ही  इसे मानवता के शैशव का काव्य  घोषित कर दिया था।  शिशु  साक्षर तो हो नहीं सकता।  

ज्ञान के क्षेत्र में सबसे ऊंची चोटी को आप इडियट पॉइंट (मूढ़ता का शिखर) कह सकते हैं  जहां दो पक्षों के ज्ञानी और अभिमानी लोग अपनी महिमा  सिद्ध करने के लिए आपस में हाथ मिलाते हैं, और एक ही कथन से उल्टे अर्थ निकाल लेते हैं।   मैक्समूलर हिंदुओं  को यह समझाना चाहते थे  कि ईसाइयत उसी विश्वासधारा की प्रोढ़ावस्था है जिसका शैशव ऋग्वेद में पाया जाता है। ध्वनि यह कि हिंदुओं को परिपक्वता का परिचय देते हुए अपना धर्म छोड़कर ईसाई बन जाना चाहिए।  अपनी असाधारण चालाकी में वह  स्वयं बचकानी हरकत कर रहे थे, क्योंकि भारतीयों के लिए उसी कथन का अर्थ था कि अब पश्चिम के विद्वान भी इस बात के कायल हैं कि वेद प्राचीनतम हैं और दूसरी सभी सभ्यताएँ उनके समक्ष शिशुवत हैं इसलिए वेद की खोज हो जाने के बाद उन्हें वैदिक धर्म अपना लेना चाहिए। अकेले दयानन्द सरस्वती थे जो मैक्समूलर को वैदिक ज्ञान के मामले में मूर्ख समझते थे।

हमने अपने अध्ययन  (1987; 1995) में वेद और वैदिक समाज के विषय में पूर्व और पश्चिम दोनों के नए पुराने सभी अध्येताओं को भटका हुआ पाया और जिसके विस्तार में जाने का अवकाश नहीं।  पर जिस समस्या पर हम विचार कर रहे हैं उसके संदर्भ में हमने इस बात के निर्णायक प्रमाण  दिए कि वैदिक काल से भी बहुत पीछे -  वाणी को दृश्य अंकनों से व्यक्त करने कीचित्रलेखन तक जाने वाली,  परंपरा थी और  उन चरणों को सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से सुरक्षित रखने का प्रयत्न भी किया गया;  कि  वैदिक समाज लेखन से अपरिचित नहीं था, बल्कि  वह टंकलिपि  और हस्तलिपि  दोनों मे दक्ष था।  पहली के लिए धातु के नुकीले यंत्र का प्रयोग किया जाता था जिसे आरा  कहा जाता था  और दूसरे के लिए  पंख के मूल का प्रयोग होता था जिसके कारण उसका एक नाम पक्ष्या भी था। मैंने इसके साथ ही यह भी निवेदन किया था वैदिक कवि अपनी रचनाओं को भी लिपिबद्ध करते थे,  और चित्रलेखन से आरंभ होकर  हड़प्पा काल  के बाद के काल तक लेखन का चलन भारत से कभी समाप्त नहीं हुआ।  हड़प्पा से ले कर ब्राह्मी के चलन तक लेखन के प्रचलन के संकेत प्राचीन कृतियों में मिलते हैं।  
 
ब्राह्मी और सामी लिपिचिन्हों में समानता पाए जाने और सिंधु-सरस्वती लिपि से परिचय के बाद लगातार यह विवाद का विषय बना रहा है कि ब्राह्मी का उद्भव कैसे हुआ।
 
सिंधु-सरस्वती सभ्यता से परिचय से पहले से ही यह बलवती धारणा रही है कि ब्राह्मी लिपि सामी से निकली है।
An origin in Semitic scripts (usually the Aramaic or Phoenician alphabet) is accepted by all script scholars since the publications by Albrecht Weber (1856) and Georg Bühler's On the origin of the Indian Brahma alphabet (1895). Bühler's ideas have been particularly influential, though even by the 1895 date of his opus on the subject, he could identify no fewer than five competing theories of the origin, one positing an indigenous origin and the others deriving it from various Semitic models. 
(विकीपीडिया)। 

कतिपय भारतीय विद्वान (गौरीशंकर हीराचंद ओझा, डी.सी. सरकार, चन्द्रबली पांडे) इसका प्रतिवाद करते रहे पर अहमद हसन दानी (Indian Paleography) ने लगभग निर्णायक रूप में यह प्रतिपादित कर दिया कि  ब्राह्मी लिपि सामी से प्रेरित है।

पर दो समस्यायें दानी को भी उलझन में डाल रही थीं। एक तो यह कि सामी के सभी चिन्ह सिन्धु-सरस्वती लिपि के किसी न किसी चिन्ह से मिलते हैं। दूसरे सामी  वर्णिक  लिपि है,  जबकि सिंधु-सरस्वती लिपि से लेकर भारत की आज तक की सभी लिपियाँ मात्रिक हैं। मात्रिक से वर्णिक लिपि निकल सकती है, इसके विपरीत विकासक्रम को उलटने जैसा है। 

इसी संदर्भ में इथियोपिया में बसे भारतीयों की भूमिका निर्णायक हो जाती है। इनके विषय में हमारी जानकारी बहुत स्पष्ट नहीं रही है। हमें  केवल इस बात का पता था मिस्र की रानी  Hatshepsut (15वीं शताब्दी ई.पू.) ने दो जहाज  इथियोपिया के व्यापारिक अड्डे (पुंत) को भेजे थे और उन पर  जो माल लद कर मिस्र पहुंचा था उसका उद्गम स्थान भारत था - इनमें  हाथीदाँत, चंदन, मोर, बन्दर, मसाले, गंधद्रव्य, गन्ना और इसके साथ ही कुछ कारीगर शामिल थे। इथियोपिया की लिपि के विषय मैं विलियम जोंस ने जो टिप्पणी की थी उसे मूल रूप में देना जरूरी है:
That the written Abyssinian language, which we call Ethiopick, is a dialect of old Chaldean, and a filter of Arabick and Hebrew, we know with certainty, not only from the great multitude of identical words, but (which is a far stronger proof) from the familiar grammatical arrangement of the several idioms: we know at the same time, that it is written, like all the Indian characters, from the left to the right, and that the vowels annexed, as in Devnagari,  to the consonants; with which they form a syllabick system extremely clear and convenient, but disposed in a lefts artificial order than the system of letters now exhibited in the Sanskrit grammar; whence it may justly be inferred, that the order contrived by Panini and his disciples is comparatively modern; and I have no doubt, from a cursory examination of many old inscriptions on pillars and caves, which have obligingly been sent to me from all  parts India, that Nagari and Ethiopic had a similar form.  
( विलियम जोन्स, आठवां व्याख्यान, एशियाटिक रिसर्चेज, खंड 3, पृ. 4 )

इस पर हम अपनी ओर से केवल यह जोड़ना चाहेंगे कि मात्रिक लिपि सिंधु-सरस्वती लिपि, ब्राह्मी और उसके प्रभाव में विकसित भारत , तिब्बत, बर्मा, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, कंबोज की लिपियों, ईरान की प्राचीन लिपियों को छोड़कर केवल सूडान (इथियोपिया में पाई जाती है) इसलिए इनको भारतीय लिपि का प्रसार मानने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं। इथियोपियो के फिनीशियनों के ही भूमध्य सागर तटीय बंधुओं ने कीलक लिपि के उस परिवेश में, उस लिपि का विकास किया था, जिसे सामी लिपि कहा जाता है, और जिसके चिन्ह ब्राह्मी से मिलते हैं।

इस संदर्भ में अमेरिकी नृतत्वविदा सुजान रेडालिया के  लेख के एक अंश को पुनः समय और स्थान सीमा के कारण मूल में देने की बाध्यता है:
Linear Elamite was a writing system from ancient Persia, contemporary with Indus script, and resembling it strongly. There was a bilingual monument called the Table of the Lion in the Louvre museum, in Akkadian, a known writing system, and with the same text in Linear Elamite, still undeciphered. 
Because of this bilingual monument, scholars gained knowledge of the sound values for a handful of Linear Elamite signs. Already having compiled a list of Indus script signs from examples of Indus seal photos at the website of Dr. Srinivasan Kalyanaraman, I compared Indus signs to Linear Elamite, and found matches; a broken line (na) and a triple S (shu). Then I compared Brahmi script to my Indus sign list, and was shocked to find more than a dozen similar or identical signs; a, o, ka, ga, da, dha, ja, nya, tha, ta, tha, pa, ba, ma, la, ya, and sa.(Cracking The Indus Script: A Potential Breakthrough: Suzanne Redalia.

हम उनके द्वारा तैयार किए और अपनी ओर से पठित लिपिचिन्हों की तालिका कापी पेस्ट करना चाहते थे पर उसकी अनुमति नहींं है।

अब हम जिस नतीजे पर पहुँचते हैं वह यह कि चीनी और तत्सम  लिपियों के अतिरिक्त विश्व की सभी लिपियाँ वैदिक या सिंधु-सरस्वती लिपि से निकली हैं। यह हम नहीं, प्रमाण अपने अकाट्य स्वर में कहते हैं।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


शब्दवेध (86) फिनीशियन - 2

कई स्रोताे को छानने के बाद पता चला कि पुरानी सूचनाओं को दरकिनार करते हुए उनको सामी सिद्ध करने के प्रयत्न में उनकी पूर्वी गतिविधियों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, उनकी यात्रा की अधिकतम दूरी ब्रिटिश द्वीप समूह तक ही दिखाई जा रही है, मानो भारत से वे अपरिचित रहे हों। ऐसा  उसी योजना के अन्तर्गत किया जा रहा है जिसमें भारत की अवज्ञा या अपमूल्यन के प्रयास किए जाते रहे हैं, या नहीं, यह हमें पता नहीं। हमारी पहले की सूचनाओं में दो बातें कुछ अटपटी लगती हैं। पहली, वे खेत की बोआई के बाद दो साल तक की लंबी यात्रा पर निकल पड़ते थे और अफ्रीका का चक्कर लगा कर भारत तक पहुँचते थे। इसकी बारीकी में जाना ठीक न होगा।  दूसरे पक्षों की पड़ताल उनकी पहचान और योगदान और परिणति पर पहुँचने के लिए जरूरी है, क्योंकि इससे भारतीय इतिहास के ऐसे पक्षों पर प्रकाश पड़ता है जिसे किसी अन्य स्रोत से समझा नहीं जा सकता। 

इतिहास के स्रोत के मामले में विलियम जोंस कुछ मामलों में सबसे कम भरोसे के हैं।  वह क्षीण सूचनाओं या सादृश्यों के आधार पर अपने तर्क कौशल से एक कहानी गढ़ लेते हैं, और उनका लेखन अपनी बात मनवाने की जिद का रूप ले लेता है। पर वहाँ भी तथ्यों की प्रस्तुति में वह किसी तरह का हेर फेर नहीं करते। एक ऐसी भ्रामक स्थिति में, जिसमें किसी को यह तक पता नहीं कि फिनीशिन अपने को कहते क्या थे,  उनका कोई एक राज्य क्यों न था, उनके जितने नगर थे - तायर, सीदोन,  गेलबल/बाइब्लस -आदि वे स्वतंत्र नगर राज्य थे और इसके बाद भी वे किस तरह इतने प्रभावशाली हो गए थे कि उन्होंने भूमध्य सागर के दोनों तटों पर स्पेन तक, जगह-जगह अपने अड़्डे कायम कर लिए थे और पूरे भूमध्य सागर पर उनकी तूती बोलती थी। 

जिसे हेरोदोतस ने फिनीशियन की संज्ञा दी उनको कई दूसरे नामों - एदीम, एदुमे, एरिथ्रा आदि-  से भी पुकारा जाता था, और इस बात के निर्णायक प्रमाण जोंस ने दिए हैं कि ये भारतीय थे। 
“very distinct from the Arabs; and whom from the concurrence of many strong testimonies, we may safely refer to the Indian stem.” 

ऐंश्येंट हिस्ट्री एनसाइक्लोपिडिया में भी जिसमें उन्हें सामी सिद्ध करने के लिए कुछ खींच-तान  की गई है, यह सचाई छिप नहीं पाती कि वे भारतीय मूल के थे।  उनके जहाजों के माथे पर जल के देवता के सम्मान में घोड़े के सिर की आकृति बनी होती थी। यह देवता थे यम अर्थात् मौत 
(The Phoenicians were a great maritime people, known for their mighty ships adorned with horses’ heads in honor of their god of the sea, Yamm, the brother of Mot, the god of death.) 
यम और उसका भाई मोत अर्थात् मौत विलियम जोंस के दावे पर मुहर लगाते हैं कि वे न केवल भारतीय मूल के थे अपितु वैदिक कालीन बोलचाल की भाषा का व्यवहार करते थे। उनके संपर्क में आने पर उत्तर के किसी क्षेत्र से इटली और ग्रीस में बसे पशुचारण करने वाले जत्थे इनकी भाषा को अपनी बोलियों की सीमाओं में अपनाते हुए वैदिक भाषी ही नहीं बने थे, अपितु कला, ज्ञान-विज्ञान और उद्योग-विद्या अपना कर, विशेषतः नौवहन अपना कर, उन द्वीपों पर भी बस गए थे जिनसे पहले संपर्क संभव न था।  

वे रंग-रूप में बाद तक उस क्षेत्र के दूसरे जनों से भिन्न, संभवतः पीत-रक्ताभ या गेहुँए रंग के थे।  इसे वस्त्र का रंग उनके पूरे समुदाय की त्वचा में  उतर आने के रूप में कल्पित किया गया जब कि इसके लिए तायर विख्यात था, 
“the Phoenicians being known as 'purple people’ by the Greeks (as the Greek historian Herodotus tells us) because the dye would stain the skin of the workers. वही।

हमारे सामने जो चित्र उभरता है वह यह कि भारत में सभी नगरों की अपनी स्वायत्तता थी। जिन्हें हम हड़प्पा के नगरों के रूप में जानते हैं, वे नगर राज्य थे। सभ्यता का क्षत्र सर्वमान्य था - वही मान, वे ही बाट, वही मुहरें, वही लिखावट एक पर भीतरी प्रतिस्पर्धा ऐसी कि जिस मार्ग से चेदि अपने अभियान पर जाते थे, उससे कोई दूसरा नहीं जा सकता था - माकिरेना पथा गाद्येनेमे यन्ति चेदयः।  इस कलह का सबसे गोचर रूप दाशराज्ञ युद्ध में देखने में आता है। हमने 1987 में ही, कुछ डरते डरते यह सुझाव रखा था कि सुदास और दूसरे प्रतापी लोग, राजा नहीं, व्यापारी थे (2011 संस्करण, पृ. 118)। आज मैं यह दावा अधिक विश्वास से कर सकता हूँ कि वे नगर सेठ थे जिनके हाथ में नगर प्रशासन भी था, जिसका एक आदर्श था जिसका पालन सभी करते थे और जिससे इस भ्रम को बढ़ावा मिलता था कि पूरा क्षेत्र एक शासन के अधीन था।

इसका अधिक अच्छा उदाहरण  यह है कि स्थल मार्ग के व्यापार में  हित्ती, मितन्नी, कस्साइट अनेक प्रतिस्पर्धी थे । ऐसी ही होड़ समुद्री व्यापार मे भी थी।  इन्होंने धीरे-धीरे, बहरीन, ओमान, यमन, पश्चिमी दक्षिणी अरब, इथोपिया, और लाल सागर पर्यन्त के भाग अपना दबदबा कायम कर लिया था।  इरिट्रियन का शाब्दिक अर्थ वही था जो पर्पल का।  इन जनों के लिए इरिट्रियन का प्रयोग यूनानियों द्वारा पहले भी होता था। इसका नतीजा यह कि कभी तो इरिट्रियन सागर का प्रयोग लाल सागर के लिए होता था पर मोटे तौर पर  अदन की खाड़ी,  फारस की खाड़ी और सिंध तक के अरब सागर  के लिए प्रयोग होता था।  दूसरे शब्दों में कहें तो इन जनों के उद्गग क्षेत्र से पूरे प्रसार क्षेत्र को इसी नाम से जाना जाता था:
The Periplus of the Erythraean Sea (Greek: Περίπλους της Ερυθράς Θαλάσσης, Períplous tis Erythrás Thalássis), also known by its Latin name as the Periplus Maris Erythraei, is a Greco-Roman periplus written in Koine Greek that describes navigation and trading opportunities from Roman Egyptian ports like Berenice Troglodytica along the coast of the Red Sea, and others along Horn of Africa, the Persian Gulf, Arabian Sea and the Indian Ocean, including the modern-day Sindh region of Pakistan and southwestern regions of India.  
(wikipedia Encyclopedia). 

आगे की चर्चा कल ही संभव होगी।  यह लेखन के इतिहास, भारत के इतिहास, ब्राह्मी (टंकलिपि)  और सौरी (लेख्यलिपि) के इतिहास के ऐसे पक्षों से जुड़ा है  जिनकी ओर  हमारा ध्यान इससे पहले नहीं गया था।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

नेताजी की 125 वी जयंती और 1942 में सावरकर और डॉ मुखर्जी की भूमिका / विजय शंकर सिंह

कोलकाता में नेताजी की 125 वी जयंती मनाई गयी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समारोह के मुख्य अतिथि थे। बंगाल  ने यूँ तो देश को अनेक रत्न दिए हैं, पर नेताजी सुभाष बोस और रवींद्रनाथ टैगोर का स्थान उनमे विशिष्ट है। टैगोर ने जहां बांग्ला साहित्य, संस्कृति और ललित कलाओं पर अपनी अमिट छाप छोड़ी वही सुभाष बाबू ने बांग्ला क्रांतिकारी और अदम्य जुझारूपन को अपनी पहचान दी। आज जब प्रधानमंत्री नेताजी भवन जा रहे थे तो, उनके साथ अन्य भाजपा नेताओं को, नेता जी के घर वालों ने नहीं जाने दिया। इसका कारण है नेताजी सुभाष और भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी में जबरदस्त वैचारिक मतभेद था। डॉ मुखर्जी हिन्दू महासभा के नेता और अध्यक्ष वीडी सावरकर के साथ थे और नेताजी देश मे पनप रहे साम्प्रदायिक खतरे को भांप चुके थे। नेताजी ही पहले कांग्रेस अध्यक्ष थे जिन्होंने कांग्रेस के सदस्यों को हिन्दू महासभा या मुस्लिम लीग के सदस्य होने पर भी अधिकृत रूप से रोक लगा दी थी। वे सांप्रदायिकता के इस परिणाम को संभवतः समझ चुके थे, लेकिन यह देश का दुर्भाग्य था कि आजादी और विभाजन के समय जब देश मे साम्प्रदायिक दंगे फैल चुके थे तो नेताजी देश मे नहीं थे। वे कहां थे, थे भी या नहीं रहे, यह सब अब भी एक रहस्य है। 

अब सवाल उठता है कि, नेताजी सुभाष बोस और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच कैसे रिश्ते थे ? इस रिश्ते को जानने के लिये हमें नेताजी के भाषणों, लेखों और उनसे जुड़े दस्तावेजों का अवलोकन  करना होगा। नेताजी ने हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग दोनो संगठनो को सांप्रदायिक संगठन कहा है। और यह बात वे बराबर जोर देकर कहते रहे हैं। हालांकि उनके लेखों और भाषणों में आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उल्लेख बहुत कम है। संघ तब भी पर्दे के पीछे ही था और सामने थी हिन्दू महासभा जिसके अध्यक्ष वीडी सावरकर थे जो 1937 में अध्यक्ष चुने गए थे। 1937 में ही धर्म और राष्ट्र के घालमेल पर हिन्दू राष्ट्र की थियरी विकसित की गयी और उसी के बाद सावरकर और एमए जिन्ना ने अपने अपने धर्म के आधार पर देश की बात करना शुरू कर दी। नेताजी इस खतरे को 1938 में ही भांप गए थे, तभी उन्होंने यह कहा था कि साम्प्रदायिक संगठनों से जुड़े लोग कांग्रेस के सदस्य नहीं रह पाएंगे। लेकिन हिन्दू महासभा और आरएसएस एक ही विचारधारा के संगठन थे। महासभा मंच पर थी और संघ, विंग्स से प्रॉम्प्टिंग करता था। 

प्रभु बापू ने तत्कालीन राजनीति में हिन्दू महासभा की भूमिका पर एक शोध ग्रँथ लिखा है। यह किताब है, हिन्दू महासभा इन कोलोनियल नार्थ इंडिया। इस पुस्तक के पृष्ठ 40 पर यह अंकित है कि, 
" सुभाष बोस के कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में 16 दिसम्बर 1938 को कांग्रेस के किसी सदस्य को हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की सदस्यता लेने पर रोक लगा दी गयी थी। उसके पहले ऐसी रोक नहीं लगायी गयी थी। 

जब नेताजी ने, पट्टाभिसीतारमैया को हराने के बाद गांधी जी की इस टिप्पणी कि, पट्टाभिसीतारमैया की हार मेरी हार है, पर कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया तो उन्होंने 1940 में अग्रगामी दल फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया। यह दल अब भी है और बंगाल में वाममोर्चा का एक अंग है। 30 मार्च 1940 में फॉरवर्ड ब्लॉक के मुखपत्र में अपने एक संपादकीय में नेताजी सुभाष लिखते हैं, 
उन्होंने, कलकत्ता कॉर्पोरेशन के चुनाव में  कांग्रेस और हिन्दू महासभा को एक साथ लाने की एक कोशिश की थी। लेकिन हिन्दू महासभा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के बजाय कांग्रेस से लड़ रही थी। उस समय बंगाल में हिन्दू महासभा के सबसे बड़े नेता डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। उसी संपादकीय का यह उद्धरण पढिये, 
" कुछ हिन्दू महासभा के नेताओ, जिनका हम सम्मान करते है, के निर्देश पर उनके कार्यकर्ताओं द्वारा जो रणनीति, कलकत्ता कॉर्पोरेशन के चुनाव के समय  अपनाई गयी थी उससे हमे बहुत ही दुःख और तकलीफ पहुंची है। हिन्दू महासभा ने साफ सुथरा चुनाव नही लड़ा बल्कि उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ जा कर अंग्रेजों का साथ दिया। यहाँ तक कि वे ब्रिटिश कॉर्पोरेटर के साथ मिल कर यूनाइटेड पार्टी का गठन भी किया, जिंसमे अंग्रेज काउंसिलर शामिल थे। कुछ अंग्रेजों को पुनः जितवाने में हिन्दू महासभा के लोगों का हांथ था। इससे यह अंदाज़ लगाया जा सकता है कि, भविष्य में हिन्दू महासभा क्या करने वाली है। हिन्दू महासभा की यह प्रबल इच्छा थी कि, कॉर्पोरेशन के चुनाव में कांग्रेस हार जाय और अंग्रेज जीत जांय। वह ब्रिटिश विरोध के बजाय कांग्रेस से लड़ने में ज्यादा दिलचस्पी रखती थी। ( नेताजी कलेक्टेड वर्क्स, वॉल्यूम 10, पृष्ठ 88 - 89 )

जब दोहरी सदस्यता का प्रतिबंध नेताजी सुभाष बाबू द्वारा 1938 में लगाया गया था, तब हिन्दू महासभा के अध्यक्ष वीडी सावरकर थे। सावरकर 1937 से 1943 तक हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे। हिन्दू महासभा द्वारा अंग्रेजों के पक्ष में खड़े होने और कांग्रेस का प्रबल विरोध करने पर सुभाष बाबू द्वारा की गयी महासभा की आलोचना एक प्रकार से सावरकर की ही आलोचना थी। अंडमान बाद के सावरकर बिल्कुल ही एक नए सावरकर थे और वे अंग्रेजी राज के एक पेंशन भोगी व्यक्ति बन चुके थे। फॉरवर्ड ब्लॉक के साप्ताहिक पत्र में 4 मई 1940 को लिखे अपने एक सम्पादकीय लेख में सुभाष बाबू हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग को खुल कर कहते हैं कि 'दोनों ही दल सांप्रदायिक दल हैं' और यह भी कहते हैं कि 'समय के साथ साथ दोनो ही दल कट्टरपंथी होते जा रहे हैं।'

1938 के बहुत पहले से कांग्रेस से जुड़े नेता मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा के सदस्य हुआ करते थे। इस प्रकार की दोहरी सदस्यता पर कोई भी न तो प्रतिबंध था और न ही ऐसा कोई प्रतिबंध लगाने बारे में सोचा भी गया था। हिन्दू महासभा से जुड़े लाला लाजपत राय और मदन मोहन मालवीय तो कांग्रेस के अग्रणी नेता थे। लाला लाजपत राय, तो लाल बाल पाल, जो लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति थी, के एक अंग थे, और मदन मोहन मालवीय जी तो चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। इसी प्रकार प्रसिद्ध अली बंधु, कांग्रेस के साथ साथ, मुस्लिम लीग के भी सदस्य थे। पर जब 1937 में पहली बार सावरकर की हिन्दू राष्ट्र की थियरी सामने आयी और उधर चौधरी रहमत अली तथा अल्लामा इक़बाल का धर्म आधारित राज्य का दर्शन सामने आया तो, इस खतरे को सबसे पहले सुभाष बाबू ने ही भांपा और उन्होंने इस प्रकार कांग्रेस के सदस्यों द्वारा सांप्रदायिक दलों के साथ किसी भी प्रकार की सांठगांठ करने और सदस्यता लेने से वंचित कर दिया। लेकिन, 1938 तक देश के माहौल में धर्मान्धता और धर्म निरपेक्षता का ज़हर फैलने लगा था। तब जाकर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सुभाष बाबू को यह प्रतिबंध लगाना पड़ा। यह पूरा विवरण, नेताजी - कलेक्टेड वर्क्स वॉल्यूम 10, पृष्ठ 98 पर है। 

आज़ाद हिंद रेडियो द्वारा 31 अगस्त 1942 को नेताजी द्वारा दिया गया भाषण, इस बात का प्रतीक है कि वह भारत छोड़ो आंदोलन के समय देश की मुख्य धारा से दूर होने के बावजूद कितनी गहराई से स्वाधीनता संग्राम के गतिविधियों की खबर रखते थे। उन्होंने इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिये कांग्रेस के लोगों को कुछ उपाय बताए। इस आंदोलन के समय कांग्रेस के प्रथन पंक्ति के सभी नेता जेलों में बंद थे। बस हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के नेता जो अपने अपने धर्म पर आधारित राष्ट्र के लिये चिंतित थे, बाहर थे औऱ वे अंग्रेजों के साथ थे। अपने ब्रॉडकास्ट में नेताजी ने सावरकर और जिन्ना दोनो की, उनके इस स्टैंड के लिये तीखी आलोचना की थी। 
एक उद्धरण पढिये, 
" मैं श्री जिन्ना और श्री सावरकर सहित उन सब लोगों से जो आज ब्रिटिश साम्राज्य के साथ हैं से अनुरोध करूँगा कि, कल ब्रिटिश साम्राज्य का अस्तित्व नहीं रहेगा। आज वे सारे लोग, सारे दल जो आज स्वाधीनता संग्राम में संघर्षरत हैं, उन्हें कल के भारत ( स्वाधीन भारत ) मे एक सम्मानजनक स्थान मिलेगा। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जो सनर्थक होंगे स्वतंत्र भारत मे उनका कोई स्वाभाविक अस्तित्व नहीं रहेगा। 
( संदर्भ - सेलेक्टेड स्पीचेस, सुभाष चंद्र बोस, पृष्ठ 116 - 117 और पब्लिकेशन डिवीजन, नेताजी कलेक्टेड वर्क्स वॉल्यूम 11, पृष्ठ - 144 )

देश के सबसे व्यापक जन आंदोलन जो स्वाधीनता संग्राम का एक अमिट भाग है के समय सावरकर ने अपने दल हिन्दू महासभा के कैडर को जो निर्देश जारी किया था, को भी पढ़े। सावरकर को यह आशंका थी कि जन आंदोलन की यह व्यापक आंधी उनके दल के लोगो को भी प्रभावित कर सकती है तो, इसे रोकने के लिये उन्होंने एक निर्देश जारी किया जिसका शीर्षक था, स्टिक टू योर पोस्ट ( जहां हो वही डटे रहो ) और इस लेख में, हिन्दू महासभा के सभी पदाधिकारियों को भारत छोड़ो आन्दोलन से दूर रहने का निर्देश दिया गया था। विडंबना है कि जब पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्य के विरोध में खड़ा था तब, बंगाल में हिन्दू महासभा के बड़े नेता डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अंग्रेजी हक़ूमत के अफसरों को यह सुझाव दे रहे थे कि कैसे इस आंदोलन का दमन किया जा सकता है। वे दमन के तरीके सुझा रहे थे, और कांग्रेस के नेताओ की मुखबिरी कर रहे थे। यह सब दस्तावेजों में हैं। नेताजी को यूरोप में जब वे जर्मनी में थे तो कलकत्ता की यह सारी खबरें मिला करती थी। नेताजी अपने मिशन में लगे थे, पर वे भारत मे हो रहे 1942 के आंदोलन की हर गतिविधियों की खबर रखते थे। 

सावरकर, डॉ हेडगेवार, गुरु गोलवलकर, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस, यह सब समकालीन थे। लगभग एक ही उम्र के रहे होंगे। थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है। पर इन नेताओं ने सुभाष के बारे में अपने समय मे क्या लिखा पढ़ा और कहा है यह ढूंढने और जानने की ज़रूरत है। स्वाधीनता संग्राम के समय, चाहे भगत सिंह और उनके साथी आज़ाद आदि हों, या गांधी के नेतृत्व में मुख्य धारा का आंदोलन, या फिर सुभाष के नेतृत्व में, औपनिवेशिक गुलाम भारत पर हमला कर के उसे आज़ाद कराने की एक अत्यंत दुर्दम्य और महत्वाकांक्षी अभिलाषा, इन सबका उद्देश्य एक था, भारत की ब्रिटिश दासता से मुक्ति। सबके तरीके अलग अलग थे, उनकी विचारधाराएं अलग अलग थीं, राजनीतिक दर्शन अलग अलग थे, पर यह तीनों ही धाराएं एक ही सागर की ओर पूरी त्वरा से प्रवाहित हो रही थी, वह सागर था, आज़ाद भारत का लक्ष्य। 

पर उस दौरान, जब कम्युनिस्ट भगत सिंह और उनके साथी, गांधी और उनके अनुयायी और सुभाष और उनके योद्धा, भारत माता को कारा से मुक्ति दिलाने के लिये, अपने अपने दृष्टिकोण से संघर्षरत थे, तब वीडी सावरकर, डॉ हेडगेवार, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, क्या कर रहे थे ? इस सवाल का उत्तर, इन महानुभावों के उन समर्थकों को भी जानना चाहिए।इतिहास के किसी पन्ने में भारत की आज़ादी के लिये किये गए किसी संघर्ष की कोई कथा, संघ और हिन्दू महासभा के नेताओं के बारे में दर्ज नहीं है। बस सावरकर एक अपवाद हैं। वे अपने शुरुआती दौर में ज़रूर स्वाधीनता संग्राम के एक प्रखर सेनानी रहे हैं, पर अंडमान पूर्व और अंडमान बाद के सावरकर में जो अंतर है वह स्पष्ट है। 

भगत सिंह, गांधी और सुभाष में वैचारिक मतभेद था। यह मतभेद उनके राजनीतिक सोच और दर्शन का था। भगत सिंह कम्युनिस्ट और मार्क्स तथा लेनिन से प्रभावित थे। वे न केवल ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी चाहते थे, बल्कि वह साम्राज्यवादी, पूंजीवादी शोषण से मुक्ति चाहते थे। गांधी, यह तो चाहते थे कि भारत आज़ाद हो, पर वह यह लक्ष्य अहिंसा और मानवीय मूल्यों को बरकरार रखते हुए प्राप्त करना चाहते थे। वे ब्रिटिश हुक़ूमत के खिलाफ थे पर ब्रिटिश लोकतंत्र के मूल्यों को सम्मान देते थे। नेताजी एक योद्धा थे। उनके लिये यह संघर्ष एक युद्ध था। वे आक्रामक थे और जब भी, जहां भी उन्हें अवसर मिला, उन्होंने ब्रिटिश के खिलाफ मोर्चा खोला और अपने इस पावन लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हिटलर से भी मदद लेने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। 

पर संघ और हिन्दू महासभा के लोग, एमए जिन्ना औऱ उनकी मुस्लिम लीग के साथ थे। जब देश एक होकर आज़ादी के लिये संघर्षरत था, जिन्ना औऱ सावरकर विभाजनकारी एजेंडे पर काम कर रहे थे। उनका लक्ष्य देश नहीं उनका अपना अपना धर्म था। वे अपने अपने धर्म को ही, देश समझने की अफीम की पिनक में थे। कमाल यह है कि दोनो ही आधुनिक वैज्ञानिक सोच से प्रभावित और नास्तिक थे। आज भले ही संघ के मानसपुत्र नेताजी सुभाष बोस की जयंती मनाये, पर सच तो यह है कि सुभाष के प्रति न तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कोई लगाव था न सावरकर का। मुझे कोई ऐसा दस्तावेज नही मिला जिंसमे इन दोनों महानुभावों ने नेताजी के संघर्ष और उनकी विचारधारा के बारे में कुछ सार्थक लिखा हो। 

नेताजी सुभाष की जयंती मनाने का हर व्यक्ति को अधिकार है और हमे उन्हें याद करना भी चाहिए। पर यह सच भी आज की नयी पीढ़ी को जानना चाहिए कि जब आज़ादी के लिये नेताजी सिंगापुर में आज़ाद हिंद फौज का नेतृत्व ग्रहण कर के अपने मिशन में लगे थे तब डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सावरकर के लोग, एमए जिन्ना के साथ मिलकर भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के खिलाफ थे। डॉ मुखर्जी मुस्लिम लीग के साथ मंत्री थे औऱ अंग्रेजों की मुखबिरी कर रहे थे। सावरकर द्वितीय विश्व युद्ध के लिये ब्रिटेन की तरफ से सैनिक भर्ती कर रहे थे । संघ या संघ के लोग आज चाहे जितनी बार भारत माता की जय बोले, खुद को बात बात पर देशभक्त घोषित करे, पर वे स्वाधीनता संग्राम में अपनी अंग्रेजपरस्त भूमिका के कलंक से कभी मुक्त नहीं हो सकते हैं। यह आज की पीढ़ी को जानना चाहिए। 

( विजय शंकर सिंह )



Friday, 22 January 2021

शब्दवेध (85) फिनीशियन - 1.

मेरी रुचि फिनीशियनों के विषय में आपकी जानकारी बढ़ाने में नहीं है। मेरी अपनी जानकारी ही बहुत गड़बड़ है।    पहले उनके बारे में जो कुछ जानता था उसका रूप अलग था; आज की जानकारियों का रूप बदल गया है, पर कोई किसी का खंडन नहीं करता।   यह दूसरी बात है कि जानकारी में वृद्धि के बाद भी हम यह नहीं जान पाते कि वे कौन थे ? कहाँ से लेवाँ (Levant) - लेबनान, सीरिया, फिलिस्तीन, इज्राइल की भूमध्य तटीय पट्टी  में पहुँचे और उस पर अधिकार जमा बैठे थे? इस पूरी पट्टी की एक देश के रूप में पहचान न थी, न वे इन्हें फिनीशिया कहते  थे।   इतना पता हैं कि यह नाम ग्रीक भाषा के Φοινίκη, Phoiníkē फोईनिके से निकला है,  जिसका अर्थ  अरुणाभ चटक बैगनी रंग (Purple) है [1]।  इस रंग को वे एक खास किस्म के घोंघे से रिसने वाले द्रव से तैयार करते थे, जो फीका नहीं पड़ता था, इसलिए यह अनमोल था और मिस्र तथा मेसेपोतामिया के राजसी पोशाक के लिए पसंद किए जाने के कारण यह सोने से भी मंहगा होता था।  एक अन्य अनुमान के अनुसार रँगाई के चलते उनका रंग भी ललौंहा बैगनी हो जाता था इसलिए इनको यह संज्ञा यूनानियों ने दी थी। पर यह अकेली अटकलबाजी नहीं है।  एक दूसरी के अनुसार वे साइप्रस के पेड़ की पूजा करते थे, जहाँ भी बस्ती बसाते पहले साइप्रस का पेड़ लगाते थे इसलिए इनको यह नाम मिला। अब यहाँ ग्रीक में फोईनिके की अर्थ प्रक्रिया बदल जाती है।  वे किसी अन्य चीज को फिनीक कहते हैं और उनकी सबसे प्रसिद्ध देन चटक लाल रंग से इसको जोड़ कर ग्रीक में उस रंग के लिए एक नया शब्द जुड़ जाता है और फिर उसी को उनकी संज्ञा का मूल मान लिया जाता है। 

आज से 50 साल पहले मेरी दिलचस्पी इन लोगों के प्रति  तब  बढ़ी थी,  जब कुछ विद्वानों को यह कहते सुना था कि ऋग्वेद में पणि शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए हुआ है, जिन्हें आज हम फीनीशियन के नाम से जानते हैं।  ऐसे लोगों में नामी लोग शामिल थे। यह वह दौर था जब यह माना जाता था कि पहले भारत के साथ यूरोग के व्यापार पर फिनिशियनों का एकाधिकार था जो उनके बाद रोमनों के हाथ में और फिर अरबों के हाथ में चला गया जिनको पुर्तगिलियों और फिर दूसरे यूरोपीय देशों ने अधिकार कर लिया।  भारत का नौवहन भारत से होरमुज तक जाता था।  इससे आगे नहीं।  ऐसी स्थिति में कुछ लोगों को जो वैदिक नौवहन क्षमता की सही जानकारी नहीं रखते थे,  पणियों और फिनीशियनों के साम्य से वैदिक समाज की सागरिक शक्ति, उनकी समृद्धि और उनके साथ वैरभाव के समाधान के रूप में यह सूझता रहा हो तो हैरानी की बात नहीं।  हम केवल यह कह सकते हैं कि हम यह दावे के साथ नहीं कह सकते कि हमें फिनीशियन शब्द की व्युत्पत्ति पता है।

हमारी पुरानी जानकारी के अनुसार, हेरोडोटस का यह मानना था कि ये लोग 2500 ई.पू. में पूर्व से,  संभवतः बहरीन के तट से, लंबे समय तक चलते रहने वाले भूकंपों से घबरा कर भूमध्य सागर क्षेत्र में पहुँचे थे। उनके भड़काऊ लाल रंग का हवाला उसमें भी था। वे समुद्र के सम्राट थे यह भाव भी उसमें था।  जो हैरान करने वाली बातें उस जानकारी में थीं वे यह कि वे अपने खेत बोने के बाद व्यापारिक यात्रा पर निकलते थे जो दो साल तक की भी लंबी हो सकती थी। ये अफ्रीका का चक्कर लगा कर भारत तक पहुँचते थे। इनके जहाज सबसे उन्नत थे और वे व्यापार के साथ गुलामों का भी व्यापार करते थे।  इनके जहाजों को देखने के लिए  उत्सुकतावश जो लोग पहुँचते थे, उनको उनकी सवारी का आनंद लेने के लिए प्रोत्साहित करते थे और फिर ले कर चंपत हो जाते थे और उनको गुलाम के रूप में बेच दिया करते थे। उनकी एक दूसरी कुरीति अपने देवी देवताओं को नरवलि देने की थी।

आजकल कई स्रोताे को छानने के बाद पता चला कि पुरानी सूचनाओं के आधार का खंडन किए बिना उनको सामी सिद्ध करने के प्रयत्न में उनकी पूर्वी गतिविधियों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जब कि उनका पूरा परिचय दोनों की सहायता के बिना संभव नहीं।
-------------------------
[1] वास्तव में पर्पल कोई एक रंग नहीं है। इसका प्रयोग पीताभ से लेकर नीलाभ तक के कई रंगों के लिए होता है। मेसोपोतामियाई राजसी वस्त्र के अवशेष का रंग केसरी प्रतीत होता है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (84) ज्यों ज्यों सुरझि भग्यो चहत...

मैं  भाषा के सवाल की ओर  मुड़ना चाहता हूँ पर इसकी तुलनात्मक प्रस्तुति में, यूरोप को सदा से सबसे आगे सिद्ध  करने के लिए जिस तरह की सुनियोजित धाँधली की गई,  इतिहास, भाषा समस्या और सभ्यता विमर्श को उलट दिया गया,  उसकी सचाई सामने लाने के लिए सभ्यता विमर्श में उलझ गया। यदि उलझ ही गया तो कुछ बातों को स्पष्ट कर देना जरूरी है। इसे बिन्दुवार रखें तो:

1. सभ्यता कृषि से आरंभ होती है। इसके दो चरण हैं, एक झूम खेती जिसके लिए दो शब्द प्रयोग में आते हैं।  एक शिफ्ट ऐग्रीकल्चर जो झूम खेती का अनुवाद है। दूसरा काटो, जलाओ  का तरीका - स्लैश ऐंड बर्न सिस्टम। दूसरा बाद का चरण है जब पेड़ों को काट गिराने के लिए कम से कम पत्थर के कुठार (अश्मन्मयी वाशी)  तैयार होने लगे थे।  

1.1 इसमें स्थान बदलने के दो कारण थे। पहला आसुरी समाज का उपद्रव  जिसकी विकरालता का आज अनुमान करना कठिन है और  दूसरा भूमि की उर्वरता का चुक जाना।  जैसा कि प्राचीन कृतियों में लिखा गया है, असुरों के उपद्रव के कारण खेती करने वालों काे प्राण रक्षा के लिए दूर दूर तक पलायन करना पड़ा, परन्तु इसका शुभ पक्ष यह था कि इसके फलस्वरूप बहुत थोड़े समय में जिसमें कौन पहले और कौन  बाद में तय करना कठिन है, अपनी स्थानीय सुविधाओं और सीमाओं में खाद्यन्नों की पहरेदारी और उत्पादन आरंभ हो गया। 

1.2 अन्यत्र कहीं उस तरह का लंबे समय तक चलने वाला विरोध नहीं सुनने में आता।  इन विरोधों और कष्टकथाओं की कहानियों ने मौखिक इतिहास और पुराण कथाओं  का रूप लिया। इस तरह खेती का आरंभ पौराणिक कथाओं का या ऐतिहासिक चेतना का भी आरंभ था। इसमें कितने समुदाय सक्रिय थे इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

2.  दूसरा चरण इनमें से एक जत्थे के द्वारा ‘पूर्वोत्तर’ की दिशा में एक सुरक्षित क्षेत्र में जहाँ  असुरों से उनका टकराव न था, स्थायी निवास करते हुए कृषिकर्म में उन्नति करने का है। आबादी बढ़ने और नए कछारों की खोज में ये मैदानी भाग में आए और जहाँ अधिक कुश-कास जलाने की समस्या कहीं कहीं पैदा हो सकती थी, अन्यथा न जंगल जलाना था न असुरों/राक्षसों से सीधा टकराव था।  इनके लिए देव शब्द का प्रयोग होता था।  सच कहें तो व्यवस्थित खेती का आरंभ इनसे जुड़ा है और इनकी सफलता के प्रभावित हो कर दूसरे समुदाय इनके संपर्क में आते रहे।  इन्हीं की बोली को तथाकथित भारोपीय का आदि रूप कहा जा सकता है।

2. 1 कृषिकर्म केवल अनाज पैदा करने तक सीमित न था, एक ओर यह भूमि की उर्वरता बढ़ाने, नए बीजों की खोज,  बोआई के लिए सही ऋतुकाल की पहचान,  सिंचाई के साधनों के उपयोग और निर्माण, खाद पानी की सही मात्रा का निर्धारण,  बीजों को घुन और पई से बचाने आदि की चिंताओं से जुड़ा था, जिसके लिए गणना, ज्योतिर्विज्ञान, ग्रहों-नक्षत्रों की पहचान और नामकरण आदि का विकास हुआ,  दूसरी ओर अनाज को सुपाच्य और सुस्वाद बनाने के लिए प्रसाधन के यंत्रों, भांडो, विधियों, अलंकरणों  अर्थात् मधु, लवण, मसालों आदि की पहचान, परिवहन के साधनों, पाशविक शक्ति का मनुष्य के पेशीय बल के सहयोगी या विकल्प के रूप में  उपयोग के लिए पशुपालन, प्रशिक्षण, पशु उत्पाद के उपयोग आदि के क्रम में अनेक प्रकार के ज्ञान, विज्ञान, कला आदि का संकुल या complex था, जिसे कृषि उद्योगविद्या कह सकते हैं। 

2.2  ये विकास चलंता खेती या झूम प्रणाली में संभव न था। यही कृषि के स्थायी बनने का अंतर था।   कृषि की ओर अग्रसर होने वालों को इसके लिए किसानी के क्षेत्र में दक्ष समुदाय की बोली सीखनी होती थी। कृषिकर्म के निषेध से बँधे होने के कारण कृषि उत्पाद पाने के लिए ऐसी योग्यताएँ विकसित करनी (पेशे अपनाने) होती थीं और इन दोनों स्थितियों में मन्दगति से ही सही किसानों का अनुसंगी बनना होता था, उनकी भाषा अपनानी होती थी और संधिकाल या भाषाई संक्रमण काल में उनकी अपनी बोली का, अदृश्य ही सही, प्रभाव किसानों की भाषा पर भी पड़ता था और उनकी ध्वनिमाला में कुछ नई ध्वनियाँ जुड़ जाती थीं।  

2.3  यह है स्थायी खेती अपनाने वाले गंडक मुख से सटे, नेपाल के तराई भाग में कुछ सौ साल रहने के बाद साहस जुटा कर मैदानी कछारों पर में मात्र छींटा पद्धति पर निर्भर किसानों का क्षेत्रविस्तार और उनकी भाषा का अन्य भाषा भाषियों के बीच प्रसार का रहस्य। भाषा उन्हीं की सर्वमान्य रहनी है पर उसे अपनाने वालों की भाषा से यह अप्रभावित नहीं रह सकती थी।  यह है कृषि के आविष्कार, विकास, प्रसाऱ और रूपान्तरण का बीज मंत्र।

3. जब हम विश्व-सभ्यता के भारत से आरंभ की बात करते हैं तो हमारे सामने  भारत नहीं, ये तथ्य होते हैं। भारत से सुमेरी सभ्यता के जन्म पर विचार करते समय एक लंबे अंतराल के बाद सुमेरियाई परंपरा का यह स्वीकार कि आगंतुक समुद्र मार्ग से आए थे, आरंभ में वे अपनी नौकाओं पर रहते थे, उनका नेता औएनेस था और उशना की समानता, बलि के विषय में यह विश्वास कि वह साल में एक बार अपनी प्रजा का हाल जानने आते हैं, सुमेरी पुरोधाओं का भी कृषिकर्म से परहेज और पुरोहिती तक सीमित रहना, सुमेर मे भैंस और धान की खेती के प्रवेश और सुमेरी जनों मे अभिजात वर्ग के डी एन ए की सिंधु-सारस्वत क्षेत्र से समानता और भारतीय स्रोत में असुरों का लाभ के बँटवारे मे भेदभाव को ले कर तकराऱ उनका पाताल भेजा जाना और साथ ही यह स्वीकार आता है कि असुरों ने पहले सुदूर देश मे नगर बसाए, फिर देवों को अपने नगर बसाने का ध्यान आया।  इसके बाद मेसोपातामियाई और मिस्री सभ्यताएँ आती हैं जो इसका ही विस्तार या इससे प्रेरित हैं।

4. अब इस संदर्भ में यूनानी, रोमन, कहें यूरोपीय सभ्यताओं के विषय में उनकी अपनी परंपर क्या कहती है इसे निम्न लंबे उद्धरण से समझें जिसका हवाला पहले भी एक लेख में दे चुका हूँ: 

Edim or Edume, and Erythra or Phoenice, had originally, as many believe, a similar meaning, and were derived from  word denoting a red colour, but, whatever be their derivation, it seems indubitable, that a race of men were anciently settled in Idume and Median, whom the oldest and best Greek authors call Erythreans; who were very distinct from the Arabs; and whom from the concurrence of many strong testimonies, we may safely refer to the Indian stem. M.D'Herbelot mentions a tradition, (which he treats, indeed, as a fable) that a colony of those Idumeans had migrated from northern shores of the Erythrean sea, and sailed across the Mediterranean to Europe, at the time fixed by the chronologers for the passage of Evander with his Arcadians  into Italy, and that both Greeks and Romans were the progeny of those emigrants: it is not on vague and suspected traditions, that we must build our belief of such events; but Newton, who advanced nothing in science without demonstration, and nothing in history without such evidence as he thought conclusive, asserts from authorities, which he had carefully examined, that the Idumean voyagers "carried with them both  arts and sciences, among which were their astronomy, navigation, and letters; for in Idume, says he, they had letters and the names of constellations, before the day of Job, who mentions them." JOB, indeed, or the author of the book, which takes its name from him, was of the Arabian stock, as the language of that work, incontestably proves; but the invention and propagation of letters and astronomy are by all so justly ascribed to the Indian family, that if Strabo and Herodotus were not grossly deceived, the adventurous Idumeans, who first gave name to the stars, and hazarded long voyages in ships of their own construction, could be no other than a branch of the Hindu race: in all events, there is no ground for believing them, till we meat them again, on our return, under the name of Phenicians. 
( William Jones, 8th Annual Discourse, Asiatick Researches, Vol. 3, P. 2-3.)

अब यहां दो प्रश्न खड़े होते हैं कि कहाँ वैदिक संस्कृति और वैदिक भाषा और देव समाज वाला  भारत और कहाँ फिनीशियन और उनसे मिलते जुलते समुदाय?  यहाँ यह याद रखना होगा कि समुद्रमंथन से ले कर दूसरी कहानियों में और वास्तविक जीवन में नौवहन में और शिल्प तथा उद्योग में भारतीय वर्चस्व असुरों की दक्षता पर निर्भर करता था, साहित्य से लेकर व्यवहार में वे बहुत अक्खड़ थे और भाषा और संस्कृति के मामलों में कभी समझौता किया न उस टैबू या कृषिकर्म  की वर्जना  का उलंघन किया जिसके कारण उन्हें शूद्र बन कर असुविधाएँ झेलनी पड़ीं।  

भारतीय सभ्यता का अर्थ वैदिक सभ्यता कभी न था, और जैसा पहले कह आए हैं  जिस भाषा का प्रसार हुआ वह केवल वैदिक या संस्कृत न थी़ यद्यपि सभी के बीच पारस्परिक संपर्क की भाषा वैदिक थी। फीनिशियाई वही नौचालक वर्ग था।  इसके विषय में एक पोस्ट और करनी होगी।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


शब्दवेध (83) - 2 - विश्व सभ्यता और मनुष्य

मैं सभ्यता को मानव मात्र की साझी विरासत मानता हूँ और इसी रूप में इसको प्रस्तुत करने की हिमायत करता हूँ वह इसलिए कि ऐसे इतिहास से ही वह वैज्ञानिक समझ पैदा हो सकती है जिससे मानव समाज की व्याधियों और विकृतियों का सही निदान और उपचार संभव है। जो अमृत बन सकता था उसका हम  विष बना कर सेवन करते रहे। अपार वैज्ञानिक प्रगति के समानान्तर सामाजिक समझ दयनीय होती चली गई। तार्किक कौशल के बाद भी समझ के स्तर पर पिछड़ते गए, सूचना के साधनों और माध्यमों में अकल्पनीय प्रगति के समानान्तर झूठ, पाखंड और भ्रम के पहाड़ खड़े होते गए और इन सभी विफलताओं का एकमात्र कारण है लोभ, स्वार्थ, अहंकार का बढ़ते जाना। इसके कारण ज्ञान का विवेक बनने की जगह चतुराई में रूपान्तरित होते जाना। बाह्य प्रकृति पर विजय के अनुपात में ही अंतःप्रकृति के समक्ष पराजित होते जाना। बौद्धिक ऊर्जा का विवेक-विरोधी उपक्रमों पर बर्वाद होते रहना। सत्य की खोज के नाम पर सत्य को झुठलाने पर व्यर्थ होते रहना। केवल एक झूठ को लें जिसे सही ठहराने के लिए तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के नाम पर यह जानते हुए कि इसकी एक एक कड़ी गलत है, अनुसंधान, अध्ययन, अध्यापन के नाम पर  कितने अनुशासनों के ज्ञान का सत्यानाश कर दिया गया।  

परंतु यह सचाई मुझ जैसे कामचलाऊ जानकारी रखने वाले की पकड़ में आ जाए, कोई दूसरा इसे उस रूप में भाँप न पाए,  यह मेरे लिए भी आश्चर्य की बात है और मेरे लिए अगम्य क्षेत्रों के धुरीण पंडितों  का मुझसे पाला पड़ता है तो उन्हें भी आश्चर्य  होता है। पिन की नोक से गुब्बारे की जो दशा होती है वही दशा उनकी होती है। कारण सीधा सा है, वे जिस कहानी को इतिहास मान कर आजीवन काम करते और नाम कमाते रहे उसमें छेद ही छेद हैं और उनकी याद दिलाते ही उनकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं कि इस ओर उनका ध्यान पहले क्यों न गया।

अपराध वहाँ होता है जब साक्ष्यों की उपेक्षा की जाती है, साक्ष्य जो कुछ कहते हैं आप उसके विपरीत नतीजों पर पहले ही पहुँचे होते है और विश्वास करते है कि आप बुद्धिबल से उनसे जो चाहें सिद्ध कर सकते हैं। आज तक यही किया जाता रहा है और आप यह सोच कर कि जब इतने लंबे समय  से इसे माना जाता रहा है, या यदि इतने बड़े विद्वान ऐसा मानते आए हैं तो इसे मान ही लेना चाहिए, हर बात की नए सिरे से जाँच संभव भी तो नहीं और यह जिन भी आग्रहों के कारण अब तक जो चलता आया हैं, उसे जारी रखना चाहिए। परिणाम होता है झूठ का पहाड़ ऊँचा होता चला जाता है और हम इसे ही ज्ञान मान लेते हैं।  
 
निम्न पंक्तियों पर ध्यान दें:   
“It is well known with reasonable certainty that the Italian and the Greek Peninsulas were colonised from the north. The occupation of France and the and British isles by Celts from Central Europe occurred at a comparatively late date (C. 500 BC.). The Iberian Peninsula remained predominantly non-Indo-European, and in modern Basque there still exists a survival of pre-Indo-European speech. 
(T.  Burrow, The Sanskrit Language,  Faber and Faber, 1956, p. 10).

अब गौर करें कि जिनके अपने ही घर का ठिकाना नहीं था, उनमें से सभी अपने को सच्चा आर्य सिद्ध करना चाहते हैं और वहाँ से निकल कर उन लोगों को अपने उस घर को पहुँचा सिद्ध करना चाहते हैं जिसके विषय में उनका विश्वास रहा है कि वे सृष्टि के आदि से ही उस देश में हैं,  और आप ‘शालीनता’ के मूर्तरूप सिद्ध होने के लिए उनके कहीं से भी आने की कहानी को सच मान भी लेते हैं।

जब इस बात मे प्रमाण मिलते हैं कि लघु एशिया और प्रांतर क्षेत्र में वैदिक भाषा बोलने वालों, वैदिक देवों को मानने वालों, वैदिक मूल्यों पर आचरण करने वालों का समाज में सम्मान और सत्ता पर अधिकार था तो पहले इसे इंडो-आर्यन बताया जाता है, फिर इसको  इंडोहित्ताइत की संज्ञा देते हुए इसे भारतीय आर्यभाषा से पुराना बताया जाने लगता है, और सिद्ध किया जाने लगता है कि भारत में वैदिक भाषा बोलने और वेदों की रचना करने वाले वहीं से आए हो सकते हैं, तो दुबारा आप बौद्धिक निष्कृयता वश मान कर उसी के अनुसार सोचने लगते हैं।  इंडो हित्ताइत की जननी भाषा - प्रोटाे अनातोलियन की भी कल्पना करके इसके साक्ष्य तैयार किए जाने लगते हैं कि यह सदा से यहीं थीऔर आप भकुआए देखते  और मानते चले जाते हैं और उस सचाई पर नजर तक नहीं डालते कि अकाट्य साक्ष्यों के अनुसार अधिक से अधिक 2000 ई.पू. में पहले से चले आ रहे अश्व-व्यापार के चलते असीरियनों को बिचवई से हटा कर इस व्यापार में पहल भारतीय व्पापारी ले लेते हैं और उनके व्यापारिक नगर कानेस (Kanes) पर अपनी आढ़त कायम कर लेते है। मामला व्यापार का है तो इसमें किसी एक जाति - उसे आर्य कहें या क्षत्रिय - का नहीं हो सकता।  इसमें स्वामिवर्ग के साथ सहकारी और अनुचर वर्ग भी शामिल था, इसलिए अश्वपालन पर पुस्तिका लिखने वाले का नाम हम किक्कुली पाते हैं जिसकी पहचान बहुत स्पष्ट है।  अब समस्या केवल वैदिक भाषा की रह ही नहीं जाती। जैसा हम लगातार याद दिलाते आए हैं इसमें भले संपर्क भाषा वैदिक के निकट रही हो पर अपने दायरे में वे अपनी बोलियाँ बोलते और अपने देवी देवता मानते थे।  अतः कोई भी कितने भी जोगाड़ से तैयार किया गया तर्क जो वैदिक भाषा और देवशास्त्र से आगे न बढ़ पाता हो, तैयार करे वह अधर में लटका रहेगा। जब सचाई सामने आएगी तो भारतीय मूलभूमि की पहचान दिन की रोशनी की तरह साफ हो जाएगी।  

अब इस संदर्भ में आप उस घोड़े के मुँह से सचाई पर नजर डालिए जिसने यह सारा बखेड़ा शुरू किया था:

..,we come again to the coast the Mediterranean, and the principal nations of antiquity, who first demand our attention, are the Greeks and the Phrygians, who though differing somewhat in manners, and perhaps in dialect, had an apparent affinity in religion and language; the Dorian, Ionian and Elian families having migrated from Europe, to which it is universally agreed that they first passed from Egypt.... I shall only observe, on the authority of the Greeks, that the grand object of mysterious worship in that of the Mother of the Gods, or Nature personified as we see her among the Indians in a thousand  forms and under a thousand names. She was called in the Phrysian dialect MA (माँ), and represented in a car drawn by lions, with a drum in her hand, and a towered coronet on her head:  her mysteries (which seem to be alluded to in the Masaick law) are solemnized at the  autumnal equinox in these provinces where she is named MA (माँ), is adored in all of them, as the Great Mother, is figured sitting on a lion, and appears in some of her temples with a diadem or mitre of turrets: a drum is called dimdima (डिमडिमा) both in Sanskrit and Phrygian and the title of Dindymne  seems rather derived from that word, than from the name of a mountain.  The Diana of Ephesus  was manifestly the same goddess in the character of productive Nature, and the Astarte of the Syrians and Phoenicians (to whom we now return) was I doubt not, the same in another form. 
(विलियम जोंस, एशियाटिक रिसर्चेज, खंड 3, Anniversary Discourse, 24 Feb.1791, पृ. 13-14.)

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (83) -1- विश्वसभ्यता और भारत

इतिहास के अध्ययन की एक ही वैज्ञानिक विधि हो सकती है और वह है समग्र मानवता का इतिहास और उसके विकास  के रूपों, अवरोधों, ह्रास और विलोप के कारणों. कारकों और परिस्थितियों का विवेचन - अर्थात् विवेकपूर्वक प्रस्तुतीकरण  इसके अभाव में इतिहास का लेखन नस्लवादी, भाववादी  या क्षेत्रवादी पूर्वाग्ग्रहों से ग्रस्त  अर्थात् विषाक्त होने को बाध्य है।  

मैं जिस भारत को सभ्यता का जनक मानता हूँ वह अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विश्व का वह भाग था, जिसने विगत हिमयुग में, हिमानी प्रकोप से प्राण रक्षा के लिए, अकल्पनीय दूरियों और परिस्थितियों से जीते-मरते आ कर शरण ली थी। ये कोरे नहीं थे।  इन्होंने  अपनी पिछली परिस्थितियों में, जीवन यापन के लिए अकल्पनीय युक्तियों और कौशलों और औजारों का विकास, किया था और आपसी संचार के लिए अकल्पनीय वाचिक संकेत-प्रणालियों का विकास किया था जिसे हम समझ के फेर से कभी भाषा कहते हैं, कभी बोली।  थी ये भाषाएँ ही क्योंकि भाषाविज्ञानी सिरफिरों की कल्पना की किसी प्रोटोटाइप के विघटन से  इनका जन्म नहीं हुआ था, यद्यपि इनके जत्थों  के टूटने, सुदूर भिन्न भाषाई परिवेश में अपना अटन या निवास क्षेत्र कायम करने  और अकल्पनीय अवधि के बाद, अकल्पनीय कारणों से उनसे मेलजोल बढ़ने या  विलय के बाद दोनों के तत्वों को समेटने वाली एक नई भाषा पैदा होती  गई थी पर थी यह भी भाषा न कि डाइलेक्ट। 

हम जिस तथ्य पर बल देना चाहते हैं वह यह कि महाप्रकृति ने जैसे अपनी एक  योजना के अंतर्गत विश्व मानवता को  भारतीय भूभाग में इस निमित्त  एकत्र कर लिया हो कि परस्पर मिल कर अपनी समस्याओं का हल  निकालो।

कहें विश्व मानवता ने किन्हीं विशेष परिस्थितियों में भारत में एकत्र हो कर उस रहस्यमय  चीज का आविष्कार किया जिसे विश्व सभ्यता कहते हैं। इसके विकास में समग्र मानवता का योगदान था। जैसे किसी विचार-विमर्श के लिए हम किसी सुविधाजनक स्थान पर गोष्ठियाँ करते है और जिस भी नतीजे या मतभेद पर पहुँचते हैं उसमें उस स्थान की भूमिका नहीं होती, विचार विमर्श में भाग लेने वाले लोगों की होती है उसी तरह भारतीय सभ्यता का अर्थ भी विश्वमानवों द्वारा आविष्कृत दक्षताओं का प्रसार और स्वीकार है। उसका श्रेय  समग्र मानवता को है।

भगवान सिंह 
( Bhgwan Singh )