Tuesday, 27 September 2022

सच्चिदानंद सिंह / आइंस्टीन के शब्दों में सापेक्षता - रिलेटिविटी (8)



17. मिंकोव्स्की का चार-आयामी विश्व ~
(हर्मन मिंकोव्स्की एक गणितज्ञ थे जो कभी आइंस्टीन के शिक्षक भी रहे थे. आइंस्टीन के स्पेशल थ्योरी के प्रकाशन के शीघ्र बाद मिंकोव्स्की ने चार आयाम की दुनिया की बात रखी थी.) 

गणित से कम सरोकार रखने वाले लोग चार आयाम की दुनिया की बात सुनकर थोड़े असहज हो सकते हैं. लेकिन जैसे दिशा (स्पेस) का सातत्व (कॉन्टीनुअम) है, (हम दिशा में स्थित किसी बिंदु के निकट और बिंदुओं को पाने की सतत आशा रखते हैं, यदि किसी बिंदु के तीन कोआर्डिनेट x,y,z हों तो दूसरे किसी बिंदु के कोआर्डिनेट  x’,y’,z’   ऐसे हो सकते हैं कि x’ x के,  y’ y के, और z’ z के बिलकुल निकट हों,) इसी तरह हम काल के सातत्व को भी समझ सकते हैं. 

सच तो यह है कि हमारा विश्व, जिसमे ये सारी घटनाएं घट रहीं हैं स्वभावतः चार आयामों का है - चौथा आयाम है काल. तब हमें दिशा के सातत्व की जगह दिक्काल के सातत्व की बात समझनी चाहिए. आइंस्टीन के अनुसार यदि मिन्कोवस्की ने चार आयामों के विश्व को स्पष्ट नहीं किया रहता तो रिलेटिविटी का जेनेरल थ्योरी बस गुड्डों के कपडे भर रह जाता - यानी तब उसका पूरा विकास नहीं हो पाता.

स्पेशल थ्योरी के पहले भौतिकीविद काल के प्रवाह को स्वतंत्र मानते आये थे. यह मान्यता हमने देखा, तब बिलकुल टूट गयी जब समान गति v से चलते कोआर्डिनेट सिस्टम में समय t' का स्थिर कोआर्डिनेट सिस्टम के समय t से समबन्ध लॉरेंज के समीकरण से मिलता है: t’ = (t – v/c^2).x / sqrt(1 – v^2/c^2). यह संबंध दिखा रहा है कि गतिमान सिस्टम में समय प्रकाश की गति के साथ साथ उस सिस्टम की गति पर भी निर्भर करता है. यानी समय 'स्वतंत्र' नहीं है. यह रेफेरेंस सिस्टम की गति पर निर्भर करता है!    

कल्पना करिये कि कोआर्डिनेट सिस्टम K में दो घटनाएं घट रहीं हैं और उनके बीच का समय डेल्टा t  है. वही दोनों घटनाएं सिस्टम K' के अपेक्षा देखने से उनके काल का अंतर्, मानिये, डेल्टा t' है. t' के मान हमें  समीकरण से मिलेंगे. यह सर्वथा संभव है कि K सिस्टम में यदि वे घटनाएं समक्षणीय हो जाएं यानी डेल्टा t शून्य हो जाए तब भी K' सिस्टम के अपेक्षा वे समक्षणीय नहीं रह सकतीं हैं और डेल्टा t' शून्य नहीं रह सकता है. इसका अर्थ है कि एक सिस्टम में  'दिशा की दूरी' दूसरे सिस्टम में 'काल की दूरी' के रूप में दीख सकती है; अर्थात काल स्वतंत्र आयाम नहीं है.
(क्रमशः) 

सच्चिदानंद सिंह
Sachidanand Singh

आइंस्टीन के शब्दों में सापेक्षता - रिलेटिविटी (7) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/09/7.html 

जेपी नड्डा का अध्यक्ष चुना जाना खबर तो बनी पर बहस का मुद्दा नहीं बना, क्यों ? / विजय शंकर सिंह

जेपी नड्डा, दूसरी बार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष 'चुने" गए हैं। अब इन्हे चुना किसने है या किस प्रक्रिया से इनको अध्यक्ष पद के लिए चुना गया है, यह मुझे नहीं पता क्योंकि, उनके चुनाव के बारे में न तो सोशल मीडिया में कहीं कोई खबर उठी और न ही परंपरागत मीडिया ने ही इस बात की चर्चा की। पर इस तरह के चुनाव को, न तो अलोकतांत्रिक कहा जाएगा और न ही इस चुनाव पर कोई बहस ही छेड़ी जायेगी। जबकि यह सबको पता है कि जेपी नड्डा का इस पद दूसरा कार्यकाल मिलना, मोदी शाह युगल की पसंद का मामला है। 

कांग्रेस अध्यक्ष कौन बन रहा है, राहुल बन रहे हैं या कोई और, गांधी परिवार का कोई वफादार बन रहा है या कोई ऐसा व्यक्ति जो गांधी परिवार को चुनौती दे सकता है, आदि तरह तरह के, किंतु परंतु के साथ, हर टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर बहस हो रही है और टिप्पणियां की जा रही है। यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का खुलापन है कि हम सब जो घट रहा है उससे रूबरू हो रहे हैं और अपनी अपनी बात और अपने अपने मशविरे दे रहे हैं। 

हम सब, अधिकांश वे लोग हैं जो, न तो, कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में भाग लेने वाले हैं और न ही, उन्हे चुनने वाले। फिर भी मशविरे देकर, मोबाइल स्क्रीन स्क्रॉल कर के आगे बढ़ जा रहे है। हमें यह भी मालूम है कि यह सारे मशविरे यूं ही नेट पर पड़े रह जायेंगे, और इनमे से शायद ही किसी मशविरे को, कांग्रेस नेतृत्व, देखे या इन पर अमल करे। यह रुचि, मशविरा देने की उत्सुकता और लगातार होने वाली टीका टिप्पणी, इस बात का संकेत भी है कि, लोकतंत्र में जन विमर्श होते रहना चाहिए। 

लेकिन, लोगों के, इतने उदार और खुले जन विमर्श की कृपापत्र, कांग्रेस पार्टी ही क्यों हो, लोगों की लोकतंत्र के प्रति इतनी चिंता, केवल एक ऐसी ही पार्टी के बारे में क्यों हो, जो कि आठ साल पहले सत्ता से बेदखल कर दी गई है? और आज की सबसे बड़ी पार्टी जो चाल, चरित्र, चेहरे में पार्टी विद द डिफरेंस का बोधवाक्य लिए, शासन कर रही है, पर लोगों की यह कृपा दृष्टि क्यों नही हो रही है? क्यों नही मीडिया में से किसी ने, इस विंदु पर डिबेट आयोजित की, कि जेपी नड्डा का अध्यक्ष पद पर चुनाव किसने, कब और कैसे कर लिया? 

इन जिज्ञासाओं के, आप सबके अपने अपने उत्तर हो सकते हैं और होने भी चाहिए, लेकिन मेरा मानना है कि, लोग अब भी कांग्रेस को, लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार चलने वाली पार्टी के रूप में देखना चाहते है। यह अलग बात है कि, वह पार्टी, इन परंपराओं पर खुद को कितना दृढ़ रख पाती है। बीजेपी जिस वैचारिक स्रोत से आती है, उसमे लोकतंत्र के मूल्यों के लिए कभी, अनुराग और सम्मान रहा ही नही है। यह तो उनकी मजबूरी है कि, उन्हे, उस संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था दिखाना, गांधी पर माला चढ़ा कर, उन्हे प्रणाम करना, पटेल, सुभाष का गाहे ब गाहे नाम लेना, कभी कभी समाजवाद और गरीबों की बात भी कर लेना, सत्ता पाने और सत्ता में बने रहने की, अनिवार्यता के कारण करना पड़ता है, अन्यथा इन सब महानुभावों और संवैधानिक परंपराओं पर इनकी कोई आस्था नहीं है, बल्कि यह कभी कभी इन सब पर, खीज भी उठते हैं। इन सब महानुभावों को वह कभी दशानन के दस शीश के रूप में मानते हुए अपने एक अखबार में कार्टून के रूप में दिखा भी चुके हैं। 

राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी राजनैतिक दल हो, उसकी कोई भी गतिविधि, उस दल का आंतरिक मामला या गोपनीयता कह कर टाला नहीं जा सकता है। सभी राजनैतिक दलों की गतिविधियों से जनता प्रभावित होती है। यदि वह दल सत्ता में है तो उसकी नीतियों और गवर्नेंस का असर और वह दल विपक्ष में है तो उसकी निष्क्रियता का सीधा असर हम सब पर, पड़ता है। सत्तारूढ़ दल कितना भी मजबूत हो, पर विपक्ष का एक भी स्वर नज़र अंदाज नही किया जाना चाहिए, लोकतंत्र का यह अनिवार्य तत्व है।

लंबे समय से यह मानसिक अनुकूलन किया जा रहा है कि, विपक्ष नदारद है और नाकारा है, और यह मानसिक अनुकूलन, सत्तारूढ़ दल और गोदी मीडिया द्वारा लगातार बनाया जा रहा है। पर कभी भी गोदी मीडिया द्वारा सत्तारूढ़ दल के उन फैसलों पर सवाल नही उठाए गए, जिनमे संवैधानिक संस्थाओं को अप्रासंगिक करने, बड़ी और महत्वपूर्ण जांच एजेंसियों को केवल, सरकार गिराने और बनाने के एक औजार तक बना लेने के बेहद अलोकतांत्रिक फैसले भी शामिल हैं। ऑपरेशन लोटस अपने मूल चरित्र में ही, जनादेश विरोधी और अलोकतांत्रिक ऑपरेशन है, पर यह है क्या, इस पर बजाय सवाल उठाने, इसका अलोकतांत्रिक चरित्र उजागर करने के बजाय, तोड़फोड़ कर, इलेक्टोरल बांड से मिले धन से विधायको को खरीद कर, अपनी सरकार बना लेने को ही, कौशल से, हमने चाणक्य का नाम दे दिया। यह आचार्य चाणक्य का अपमान है। 

यह मानसिक अनुकूलन उन सबको हाशिए पर ला देता है जो, राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुसार चलते हुए देखना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति, सत्ता को हमेशा रास आती है। इसीलिए बात बात पर, यह जुमला भी उछाला जाता है कि, अमुक बात पर, राजनीति नहीं होनी चाहिए। राजनीति को सीमित करने की यह एक फासिस्ट सोच है कि, राजनीति केवल हम करेंगे और आप सब बस, टैक्स भरिए और जो मिल रहा है, उसे प्रभुकृपा मान कर स्वीकार कीजिए, और हां कोई सवाल न करें और मैं कोई जवाब दूंगा भी नहीं। सवालों की उपेक्षा और जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेने की प्रवृत्ति, एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के क्षरण का, एक प्रकार से प्रारंभ है।

विमर्श जारी रखिए। जब यह कहा जाने लगे कि, इन सब मशविरे को सुनता कौन है तो, यकीन मानिए आप की बात, उन तक पहुंच रही है, और उन्हे असहज भी कर रही है। एकाधिकार परस्त सत्ता की पूरी कोशिश रहती है जनता किसी भी तरह से राजनीतिक विमर्श, आंदोलन और जवाबतलबी से दूर हो जाय और वे अपना काम करते रहें। इसीलिए, बहस, आंदोलन, और सवाल को वे हतोत्साहित करते हैं और उनका मजाक उड़ाते हैं। पर ऐसा नहीं होने देना है। 

(विजय शंकर सिंह)

कमलाकांत त्रिपाठी / विशाखदत्त का प्रयोगधर्मी नाटक मुद्राराक्षसम्‌ (2)

चित्र, मुद्राराक्षसम्‌ नाटक के मंचन का एक दृश्य 

खंड-2--मुद्राराक्षसम्‌ का संक्षिप्त भावानुवाद: प्रथम अंक ~

नाटक का प्रारम्भ सूत्रधार की इस सूचना से होता है कि जिस नाटक का अभिनय होने जा रहा है, वह कवि विशाखदत्त ने लिखा है. और विशाखदत्त एक सामंत वटेश्वरदत्त के पौत्र और ‘महाराज’ कहे जानेवाले पृथु के पुत्र हैं. बस इतना ही. कवि ने परंपरा तो यहाँ भी तोड़ी लेकिन एक मर्यादा के भीतर. प्राचीन भारतीय परम्परा में कृतिकार नाशवान है, उसकी कृति अपेक्षाकृत दीर्घजीवी है, समाज के लिए, आनेवाली पीढ़ियों के लिए, कृति ही कमोबेश उपयोगी हो सकती है. जिसको अपने कृति-कर्म के कौशल से ही इतना सार्थकता-बोध और तुष्टि न मिले कि उसके लिए वह कर्म ही अपने-आप में लक्ष्य बन जाए, उसे अपना इतिवृत्त पेश करने, जीवनी लिखने-लिखवाने की अभीप्सा हो सकती है.  भारतीय परंपरा में यह वर्जित है. यहाँ कला और कवि-कर्म उनके लिए नहीं हैं जो इनके माध्यम से इनके बाहर कुछ तलाश रहे हों, क्योंकि तब उनका मन इनमें रमेगा नहीं, और मन नहीं रमेगा तो उनका सर्वोत्कृष्ट कैसे सामने आएगा? यही वजह है कि जब पश्चिमी इतिहासकार भारत का सांस्कृतिक इतिहास लिखने बैठता है तो बात-बात पर झुँझलाता है, कृतियाँ इतनी सारी, और इतनी उत्कृष्ट, लेकिन कवि-कलाकार का कुछ पता नहीं. सभी कवियों के काल, स्थान, माता-पिता, जीवन, असली नाम तक को लेकर घोर विवाद. कालिदास तक अपनी युवावस्था की मूर्खता और विदुषी पत्नी से दुत्कार खानेवाली किंवदन्ती का बोझ ढोते, ईसा पूर्व की पहली शताब्दी से लेकर चौथी-पाँचवीं शताब्दी तक लुढ़क रहे हैं. और ख़ुद अपने विशाखदत्त महाराज मुद्राराक्षम्‌ की हस्तलिखित प्रतियों में एक छोटे से पाठभेद (पार्थिवश्चन्द्रगुप्त:/ पार्थिवो दंतिवर्मा / पार्थिवोsवंतिवर्मा) के चलते चंद्रगुप्त मौर्य के समय (चौथी  शताब्दी ई. पू.) से कश्मीर-नरेश अवंतिवर्मा के समय (नवीं शताब्दी) तक थपेड़े खाने के बाद अब जाकर चौथी-पाँचवी शताब्दी के चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में स्थिर हुए हैं. तो परम्परानुसार वैयक्तिक सूचना से सजग परहेज के बावजूद विशाखदत्त जी किसी रौ में आकर अपने बारे में इतना उद्घाटित कर गए हैं—अपना और अपने  पिता व पितामह का नाम और उनकी पदवी. 

फिर सूत्रधार द्वारा गुणग्राही दर्शकों की तारीफ़ के ब्याज से धान की खेती के लेखकीय अनुभव का यथार्थ सामने आता है, जिसे ‘विद्वानों’ ने यह दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया है कि विशाखदत्त जी भारत के किसी पूर्वी इलाक़े से थे--

चीयते बालिशस्यापि सत्क्षेत्र पतिता कृषि:। 
न शाले: स्तम्बकारिता वस्तुर्गुणमपेक्षते॥1:3॥

[ज़मीन (यहाँ दर्शक-सभा) उपजाऊ हो तो नौसिखिए किसान द्वारा डाली गई फ़सल भी खेत में बढ़ती है. गुच्छों-गुच्छों में फैलकर सघन होते धान के पौधे बीज बोनेवाले के गुण की अपेक्षा नहीं रखते (नाटककार और दर्शकों के अंत:सम्बंध का एक मौलिक, ज़मीनी रुपक).]

नटी के घर उत्सव का माहौल है. उसी के बहाने लेखक के ज़माने में घरेलू जन-जीवन कैसा था, इसका एक सजीव चित्र उभरता है (जो गांवों में कम से कम मेरे बचपन तक तो चला ही आया था)--

वहति जलमियं पिनष्टि गंधान्‌
इयमियमुद्ग्रथते स्रजो विचित्रा:। 
मुसलमिदमियं च पातकाले
मुहुरनुयाति कलेन हुंकृतेन॥1:4॥ 

[इधर एक स्त्री पानी ला रही है, उधर दूसरी (सिल-लोढ़े से) सुगंधित मसाले पीस रही है, तीसरी रंग-बिरंगी मालाएँ गूँथ रही है, तो चौथी मूसल गिरने के साथ हूँ-हूँ की हुँकार से ताल मिलाती कुछ कूट रही है.] 

चाणक्य के प्रवेश के साथ कथा-सूत्रों को एक-एककर बिछाया जाने लगता है. ज्ञात होता है कि राक्षस द्वारा चंद्रगुप्त की हत्या के लिए नियुक्त विषकन्या को राक्षस के ही गुप्तचर जीवसिद्धि ने (जो दरअसल ‘मोल’ बना हुआ चाणक्य का गुप्तचर है) पर्वतक के पास पहुंचा दिया. वही पर्वतक या पर्वतेश्वर,  जिसने नंदों के विनाश में चंद्रगुप्त का साथ दिया था और जिसके लिए उसे नंदों का आधा राज्य देने का वादा किया गया था. इस तरह चंद्रगुप्त के बजाए पर्वतक ही उसका शिकार बन गया, जिससे नए मगध सम्राट चंद्रगुप्त के पूर्ववत् एकछत्र बने रहने की स्थिति बनी. इस हत्या से क्रुद्ध पर्वतक-पुत्र मलयकेतु के साथ राक्षस ने संधि कर ली है और मलयकेतु के प्रयास से उसके पाँच पड़ोसी ‘म्लेक्ष’ राजा (पारसीक, यूनानी, शक, कुषाण और वाह्लीक?) भी अपनी सेनाओं के साथ इस गठबंधन में शामिल होकर चंद्रगुप्त पर आक्रमण के लिए तैयार हैं. गुणग्राहक चाणक्य  नंदों के प्रति राक्षस की अप्रतिम निष्ठा की तारीफ़ करते हुए उसे मंत्रियों में बृहस्पति-तुल्य बताता है. चाणक्य द्वारा राक्षस का आकलन उसके खाँटे जीवनानुभव से नि:सृत है--  

ऐश्वर्यादनपेतमीश्वरमयं लोकोsर्थत: सेवते
तं गच्छन्त्यनु ये विपत्तिषु पुनस्ते तत्प्रतिष्ठाशया।
भर्तुर्ये प्रलयेsपि पूर्वसुकृतासंगेन नि:संगया
भक्त्या कार्यधुरां  वहन्ति कृतिनस्ते दुर्लभास्त्वादृशा:॥ 1:14॥ 

[यह संसार तो स्वार्थवश ऐश्वर्यशाली स्वामी की सेवा करता है.  जो विपत्ति में ऐसे स्वामी का अनुसरण करते हैं, वे भी इस आशा से कि पुन: उसकी उन्नति होगी. लेकिन राक्षस जैसे कृतज्ञ लोग, जो स्वामी के नष्ट हो जाने पर भी उसके द्वारा किए गये उपकार की याद करते हुए नि:स्वार्थ निष्ठा से उसके कार्य-भार का वहन करते हैं (उसे आगे बढ़ाते हैं), विरले ही मिलते हैं.]

सद्य:अर्जित मगध साम्राज्य की इस विकट परिस्थिति में चाणक्य अपने प्रतिरक्षात्मक उपायों पर विचार करता है. पर्वतक की हत्या के बारे में गुप्तचरों द्वारा यह अफ़वाह फैला दी गई है कि चंद्रगुप्त और (चाणक्य के उपकारी मित्र)  पर्वतक--इन दोनों में से किसी एक के भी विनाश से चाणक्य का अहित होगा—इस धारणा से राक्षस ने ही पर्वतक को विषकन्या द्वारा मरवा दिया. मलयकेतु का विश्वास अर्जित कर चुके चाणक्य के एक गुप्तचर (भागुरायण)  द्वारा एकांत में उसे यह कहकर डरा दिया गया कि वस्तुत: चाणक्य ने ही उसके पिता को मरवाया है, जिससे राक्षस के ख़िलाफ़ विश्वसनीय ढंग से यह अफ़वाह फैलाई जा सके (चंद्रगुप्त के साथ मगध पर आक्रमण करनेवाला पर्वतक शत्रु तो आख़िर राक्षस का ही था). नतीज़तन, मलयकेतु फ़िलहाल आधे राज्य का दावा भूलकर मगध से अपने देश भाग खड़ा हुआ है (जहाँ पहुंचकर राक्षस के उकसाने पर अन्य राजाओं को साथ लेकर मगध पर आक्रमण करने की अब उसमें हिम्मत आ गई है). भागते समय मलयकेतु को यदि पकड़ लिया जाता तो यह उसके साथ चाणक्य के विग्रह का सूचक होता और तब अफ़वाह द्वारा फैलाया गया राक्षस का अपयश धुल जाता, क्योंकि अफ़वाह की बुनियाद ही चाणक्य और मलयकेतु के पिता के बीच प्रगाढ़ मैत्री थी. इसलिए ऐसा नहीं किया गया. चाणक्य का निष्कर्ष है कि और सब तो ठीक है, बस राज्य का प्रधान अंग राजा (चंद्रगुप्त) ही कुछ उदासीन है, जिसे अभी सँभालना है. 

अगला दृश्य. यमपट दिखलाते हुए यमराज की महिमा के गीत गाने के बहाने लोगों के घरों में निर्बाध घुसकर ख़बर लानेवाला गुप्तचर ‘निपुणक’ अपनी रिपोर्ट देने चाणक्य के आवास में घुसना ही चाहता है कि द्वारपाल के रूप में तैनात उसका उद्धत शिष्य रोक देता है (द्वारपालों की प्रजाति तब से लेकर आज तक वैसी ही है). दोनों का संवाद दिलचस्प है. आज की शब्दावली में, संक्षेप में--

रुक-रुक, कहाँ जा रहा है? 

यह घर किसका है? ( उत्तर के बजाए प्रतिप्रश्न). 

हमारे प्रात:स्मरणीय आचार्य चाणक्य का, और किसका?

(हंसकर) जाने दो, यमपट फैलाकर तुम्हारे आचार्य को धर्म का उपदेश दूँगा.

(गुस्से में) तुम मेरे आचार्य से ज़्यादा धर्म जानते हो?

गुस्सा न करो भाई, सब लोग सब कुछ नहीं जानते.

अरे मूर्ख, वे सब कुछ जानते हैं.

अच्छा, तो पूछकर आओ कि चंद्र (चंद्रमा / चंद्रगुप्त) किसको प्रिय नहीं है.

यह कौन बड़ी बात है. इसे जानने, न जानने से क्या होगा?

यह तो तुम्हारा आचार्य ही जानेगा. तुम तो इतना ही जानते होगे कि कमल को चंद्र प्रिय नहीं है. कमल सुंदर, चंद्र सुंदर, लेकिन पूर्ण चंद्र हो तब भी रात में कमल सिकुड़कर बंद हो जाता है (कोई ज़रूरी नहीं कि बाहर से भले लगनेवाले चंन्द्रगुप्त के विरोधी न हों).

यह क्या उल्टी-पुल्टी बात करता है!

बात तो सीधी है लेकिन कोई सुननेवाला, जाननेवाला मिले तब न.

गनीमत है कि ‘चंद्र’ सुनकर और यह समझकर कि चंद्रगुप्त से असंतुष्ट लोगों की ख़बर लानेवाला गुप्तचर है, अंदर से चाणक्य ने यह कहकर बुला लिया कि निधड़क आ जाओ, सुनने और जाननेवाला इधर है, वरना द्वारपाल महोदय तो टस से मस  नहीं होनेवाले थे. 

निपुणक तीन असंतुष्ट लोगों की ख़बर देता है— जीवसिद्धि नाम का वह क्षपणक (बौद्ध भिक्षु) जिसने विषकन्या का गंतव्य बदल दिया था; राक्षस का पुराना निजी सचिव शकटदास कायस्थ; और राक्षस का घनिष्ठ मित्र जौहरी चन्दनदास. निपुणक नहीं जानता कि जीवसिद्धि चाणक्य का ही एक और गुप्तचर है जो ‘मोल’ के रूप में राक्षस के यहाँ चिपका दिया गया है और उसकी चंद्रगुप्त-विरोधी लगनेवाली गतिविधियों का कुछ और प्रयोजन है. (जब तक आवश्यक न हो, एक गुप्तचर दूसरे को नहीं जानता और चाणक्य को रिपोर्ट करनेवाले सभी गुप्तचरों को वह पहचानता है और उन्हें किस काम पर लगाया गया था यह भी उसे याद रहता है, जब कि उस ज़माने में कोड वगैरह के व्यवहार का कोई संकेत नहीं मिलता). चाणक्य  जीवसिद्धि का नाम टाल जाता है. दूसरे असंतुष्ट शकटदास को वह कोई बड़ी बाधा नहीं समझता, फिर भी उसके पीछे सिद्धार्थक नाम का एक दूसरा गुप्तचर लगाया जा चुका है, जो उसका विश्वासपात्र भी बन गया है. अब बचता है चन्दनदास, जिसके बारे में निपुणक के पास विशेष सूचना यह है कि कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) से मलयकेतु के यहाँ जाते समय राक्षस ने अपना परिवार उसी के संरक्षण में रख दिया है. यही नहीं, चंदनदास के यहाँ यमपट दिखाते समय निपुणक को अनायास एक ऐसी अँगूठी मिल गई है जिस पर राक्षस का नाम अंकित है और जिसे वह अपनी मुद्रा (मुहर) के रूप में इस्तेमाल करता था.

हुआ यह कि जिस समय निपुणक वहाँ यमपट फैलाकर गीत गा रहा था, घर के भीतर से महिलाओं में ‘निगल गया, निगल गया’ का कोलाहल उठा और तकरीबन पाँच साल का एक सुंदर बच्चा घर की ड्योढ़ी से निकल ही रहा था कि एक महिला ने उसे डाँटते हुए जल्दी से हाथ बढ़ाकर पकड़ लिया. इस जल्दबाज़ी में महिला की उँगुली में (पुरुष की होने के कारण नाप में बड़ी) अँगूठी ढीली होने से उसके अनजाने ही नीचे गिर गई और छिटककर उछलती हुई निपुणक के पैर के पास आ रुकी. उस पर राक्षस का नाम अंकित देखकर निपुणक ने चुपचाप उसे रख लिया. उस मुद्रांकित अंगूठी से चाणक्य को राक्षस के परिवार का चरणदास के आश्रय में होने का पक्का सबूत तो मिला ही, उसी के सहारे उसने राक्षस को वश में करने की एक कारगर योजना भी बना डाली. [इसी मुद्रांकित अँगूठी के केंद्र में होने से विशाखदत्त ने नाटक का नाम मुद्राराक्षसम्‌ रखा है--मुद्रया गृहीतो=वशीकृतो राक्षस: यस्मिन्‌ तत्‌ मुद्राराक्षसम्‌.]                    

निपुणक को विदा करने के बाद दावात और काग़ज़ मँगवाकर चाणक्य पत्र के एक नमूने का मसौदा तैयार करने बैठता है, जो है तो सामान्य नमूना , किंतु भेजनेवाले, पानेवाले और भेजने के उपयुक्त अवसर के चुनाव से विशेष और विस्फोटक अर्थ ग्रहण कर सकता है. तभी प्रतिहारी द्वारा चंद्रगुप्त से सूचना आती है कि वह दिवंगत राजा पर्वतक का श्राद्ध करके उसके बहुमूल्य आभूषणों का गुणी व्यक्तियों में दान करना चाहता है, इसके लिए उसने चाणक्य की सलाह (अनुमति ?) माँगी है. चाणक्य को इसमें अपनी योजना की एक और कड़ी दिख जाती है और वह राजा के इस काम का अनुमोदन करने के साथ-साथ यह भी संदेश भेज देता है कि दान लेने के लिए कुछ सुपात्र ब्राह्मणों को वह भेज देगा, जो वस्तुत: उसके गुप्तचर विभाग के लोग हैं. प्रतिहारी के जाने के बाद वह फिर से मसौदा पूरा करने लगता है और उसमें इन आभूषणों का भी, जिन्हें वह अपने ढंग से उपयोग करनेवाला है, ज़िक्र डाल देता है. फिर अपने तीन गुप्तचरों को आदेश देता है के वे राजा से आभूषणों का दान लेने के बाद उससे आकर मिलें. मसौदा आगे बढ़ाते हुए वह मलयकेतु के पाँचों सहयोगी राजाओं का पहले तो नाम के साथ ज़िक्र करना चाहता है, फिर कुछ सोचकर ज़िक्र तो करता है किंतु नाम छोड़ देता है, क्योंकि योजना में सहयोग करनेवालों से भी इसे गुप्त रखना ज़रूरी है.

मसौदा तैयारकर वह उसे एक शिष्य के हाथ गुप्तचर सिद्धार्थक के पास (जो शकटदास का क़रीबी बन गया है) इस संदेश के साथ भेजवा देता है कि वह शकटदास से इस नमूने की एक साफ़ नक़ल बनवा लाए, क्योंकि चाणक्य-जैसे वेदपाठी ब्राह्मण की लिखावट बड़ी अस्पष्ट होती है. साथ में यह हिदायत भी कि किसी से यह नहीं कहना है कि नमूने का मसौदा चाणक्य ने लिखा है. शकटदास लिखने-लिखाने के काम में माहिर कायस्थ और राक्षस का पूर्व निजी सचिव है लेकिन उसमें चौकन्नापन नदारद. नमूने के अर्थ के बारे में बिना कुछ सोचे उसने अपनी साफ़ लिखावट में उसकी नक़ल बनाकर सिद्धार्थक को पकड़ा दी, जो उसे लेकर चाणक्य के पास पहुँच गया. उसे देखकर गुणग्राही चाणक्य सुंदर लिखावट की तारीफ़ किए बिने नहीं रह सका. सिद्धार्थक से ही उस पर अँगूठीवाली राक्षस की मुहर लगवाकर उसे ‘समझा-बुझाकर’ पत्र के साथ एक जटिल मिशन पर रवाना कर दिया.

[शकटदास के हाथ से साफ़-साफ़ लिखे इस पत्र में आभूषण का और बिना नाम लिए पाँच राजाओं का ज़िक्र है. बाक़ी क्या है, विशाखदत्त अभी नहीं बताते, समय आने पर बतायेंगे. मुझे भी यही ठीक लगता है….तो इंतज़ार कीजिए.] 

‘समझाने-बुझाने’ में इतना ज़रूर ज़ाहिर कर दिया गया है कि सिद्धार्थक को फाँसी के स्थान पर जाकर शकटदास को फाँसी देने जा रहे जल्लादों को डाँटकर भगाना है और शकटदास को लेकर राक्षस के पास पहुँच जाना है, जहाँ अपनी सेवाओं से उसे ख़ुशकर (जैसा कि ऊपर कहा गया वह प्रकटत: राक्षस का ही गुप्तचर है) ‘पुरस्कार’ लेना है और तब मिशन का अंतिम चरण पूरा करना है.  [डाँटने से कहीं जल्लाद भागते हैं? जी नहीं,  डाँटते समय दाहिनी आँख दबाकर इशारा करना है और पहले से सधे-बदे जल्लाद तभी भागेंगे जब इशारा समझ जायेंगे....फाँसी का यह नाटक (फाँसी नहीं) अभी एक बार और होना है और उस बार बहुत हृदय-विदारक. विशाखदत्त, और उनके चाणक्य भी, बहुत भयंकर किस्म के अहिंसावादी हैं. बस राक्षस द्वारा चंद्रगुप्त की हत्या के लिए भेजी गई विषकन्या को भ्रमितकर  गुप्तचर  ने जो पर्वतक की हत्या करवा दी, उसमें चाणक्य की संलिप्तता का संदेह होना स्वाभाविक है. यह अभियान के कर्णधार चंद्रगुप्त का प्राण बचाने, और साम्राज्य को द्विखंडित न होने देने के लिए, ज़रूरी होने से क्षम्य हो तो हो, न हो तो न हो।]

सिद्धार्थक को विदा करने से पहले चाणक्य दो राजाज्ञाएँ जारी करता है. एक, राक्षस द्वारा नियुक्त (?) जीवसिद्धि ने विषकन्या से  पर्वतक को मरवाने में जो भूमिका निभाई उसके दण्ड में उसे देश-निकाला; और दो, राक्षस के समर्थन में राज-द्रोह के लिए उद्यत शकटदास को फाँसी की सज़ा व उसके परिवार को कारागार (दोनों आज्ञाएँ महज़ प्रायोजित और रणनीति का हिस्सा,  इसलिए  मात्र आभासी).

पत्र के साथ सिद्धार्थक के निकल जाने के बाद चाणक्य चंदनदास को उपस्थित करने का आदेश देता है. दोनों के बीच का संवाद दोनों के चरित्र का आईना है, और चाणक्य से परिचालित मौर्य-नीति की कुछ झलक भी देता है:--

चंदनदास: आर्य की जय हो. 

चाणक्य: स्वागत है, आसन पर विराजिए. 

चंदनदास: क्या आर्य को पता नहीं कि अयोग्य का सम्मान तिरस्कार से भी ज़्यादा दु:खदायी होता है. इसलिए ज़मीन पर ही बैठता हूँ. 

चाणक्य: नहीं सेठजी, ऐसा नहीं है. हमारे लिए आपका सम्मान ही उचित है, आसन पर ही विराजिए.

चंदनदास: (स्वगत) यह दुष्ट, अब ज़रूर कोई दोष मढ़ेगा.(प्रकट) जैसी आज्ञा. (आसन पर बैठ जाता है). 

चाणक्य: सेठजी, आपका व्यापार तो बढ़त पर है न ?

चंदनदास: (स्वगत) ज़्यादा आदर सशंकित करता है. (प्रकट) आर्य की कृपा से सब चल रहा है.

चाणक्य: चंद्रगुप्त के दोष दिवंगत राजा के गुणों की याद तो नहीं दिलाते प्रजा को? 

चंदनदास: (कान ढककर) पाप शांत हो ( ऐसा न कहिए). शारदीय पूर्णिमा के चंद्र की तरह प्रजा चंद्रगुप्त से आनंदित है.           

चाणक्य: यदि ऐसा है तो आनंदित प्रजा से राजा की भी कुछ अपेक्षाएँ होती हैं.

चंदनदास: आर्य, आज्ञा दें, क्या और कितना चाहिए. 

चाणक्य: सेठजी, यह चंद्रगुप्त का राज्य है, नंद का नहीं. धननंद (अंतिम नंद राजा का नाम) को ही धन से प्रसन्नता होती थी, चंद्रगुप्त तो आप लोगों के दु:खाभाव से ही प्रसन्न होता है.

चंदनदास: आर्य, अनुगृहीत हूँ. 

चाणक्य: लेकिन यह दु:खाभाव ज़ाहिर कैसे होता है, यह तो आपने पूछा ही नहीं. 

चंदनदास: आर्य आज्ञा दें. 

चाणक्य: राजा के प्रति अनुकूल आचरण से.

चंदनदास: आर्य, राजा के विरुद्ध कौन आचरण कर रहा है, यह तो आर्य ही जानते होंगे.

चाणक्य: सबसे पहले तो आप ही.
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चंदनदास ने इस बीच राक्षस के परिवार को अपने घर से किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया है लेकिन उसे शरण देने की बात वह अस्वीकार नहीं करता. चाणक्य भी मानता है कि राक्षस के परिवार को रखना कोई अपराध नहीं है, लेकिन शासन से छिपाना अपराध है और यदि चंदनदास अब भी परिवार को राज्य की सुरक्षा में दे दे तो उस पर राजकृपा चिरकाल तक बनी रहेगी . 

तभी पर्दे के पीछे कोलाहल होता है. चाणक्य के कहने पर शिष्य पता करके बताता है कि राजा की आज्ञा से राज्य का अहित करनेवाले क्षपणक जीवसिद्धि को तिरस्कारपूर्वक नगर से बाहर निकाला जा रहा है. चंदनदास को तोड़ने का यह प्रायोजित कोलाहल निष्फल जाता है. 

चंदनदास: हमारे घर में अमात्य का परिवार नहीं है.

पर्दे के पीछे फिर कोलाहल. शिष्य पता करके आता है कि शकटदास को फाँसी पर चढ़ाने के लिए ले जाया जा रहा है. यह भी उसी उद्देश्य से प्रायोजित.  

चाणक्य: यह राजा अहित करनेवाले को कठोर दंड देता है. इसलिए दूसरे के परिवार को सौंपकर अपने परिवार की रक्षा करो. 

चंदनदास: आर्य, मुझे भय मत दिखाओ. इस समय घर में अमात्य का परिवार नहीं है, होता तो भी मैं उसे नहीं सौंपता. 

चाणक्य: यही तुम्हारा निर्णय है.

चंदादास: हाँ, यही है. 

चाणक्य: (स्वगत) वाह चंदनदास, वाह,  दूसरे की वस्तु समर्पित कर देने से आसानी से पूरे होनेवाले मनोरथ को छोड़कर ऐसा दुष्कर  कार्य  महाराज शिबि के अलावा और कौन करेगा ! [पौराणिक आख्यान है कि राजा शिबि ने शरण में आए कपोत को बचाने के लिए उसके आखेटक बाज़ को बदले में अपने शरीर का मांस काट-काटकर दिया था और इस तरह इंद्र और अग्नि द्वारा ली गई परीक्षा में सफल हुए थे.]

[चाणक्य के सारे क्रिया-कलापों के पीछे आदमी को पहचानने की अद्भुत्‌ नज़र, शत्रु-मित्र में भेद न करनेवाली सार्वभौम गुणग्राहकता, स्वार्थपरता का आत्यंतिक अभाव, और अतिशय त्यागमय जीवन-पद्धति ही वे गुण हैं जो इतने विशाल और इतने अभेद्य संगठन को बनाने और चलाने की उसकी सफलता के कारक प्रतीत  होते हैं. चाणक्य के आलोचकों का ध्यान आज के लिए भी प्रासंगिक इस पक्ष की ओर प्राय: कम ही गया है]  

चंदनदास को दिखावे के लिए फांसी की सज़ा सुना दी जाती है, उसकी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाती है और, फाँसी दिए जाने तक के लिए (जिसकी नौबत नहीं आएगी) उसे परिवार-सहित बंदीगृह में डाल दिया जाता है. लेकिन यहाँ चंदनदास और उसके परिवार का त्रास तो वास्तविक है, भले ही वह अल्पकालिक हो. और वह कम हृदय-विदारक भी नहीं. चंदनदास का एक ही संतोष है कि उसका अंत मित्र के काम से हो रहा है, किसी व्यक्तिगत दोष के कारण नहीं. 

अपनी इस सफलता पर चाणक्य के मुँह से अनायास निकल जाता है कि अब आ गया राक्षस पकड़ में. जिस तरह राक्षस की विपत्ति में चंदनदास अपने प्राणों को  किसी अप्रिय वस्तु की तरह छोड़ने को तत्पर हो गया है उसी तरह ही चंदनदास की विपत्ति  में राक्षस भी अपने प्राणों का उत्सर्ग करने से बाज़ नहीं आएगा (और स्वत: हमारे जाल में आ फँसेगा).

[चंदनदास एक जौहरी है, सेठ है, लेकिन उदात्त मानवीय गुणों से सम्पन्न है. मार्क्सवाद की लोकप्रियता के साथ यह धारणा प्रचलित हुई कि सारे के सारे सम्पतिशाली लोग शोषक, षड्यंत्रकारी और क्रूर होते हैं क्योंकि व्यक्तिगत सम्पत्ति ही मानव-दुर्गुणों की जननी है. लोग मार्क्स के अभिन्न मित्र और अनन्य सहयोगी पूँजीपति एंजेल्स तक को भूल गए. आज के ही दौर में लोग जमशेद जी टाटा. अजीम प्रेमजी, नारायण मूर्ति और बिल गेट्स के योगदान को भूलकर केवल अंबानियों, अडानियों और सुब्रतो रायों की माला जपते रहे हैं. अधिसंख्य पूँजीपतियों के कारनामों ने वर्ग-स्वभाव को लेकर ऐसा पूर्वाग्रह पैदा कर दिया है कि लोग आदमी-आदमी के स्वभाव-गत भेद की जटिलता को सुविधापूर्वक दरकिनारकर मार्क्स के प्रमेय को लिंग, जाति, धर्म, रंग, नस्ल, राष्ट्रीयता तक खींच ले जाते हैं. जटिलता से बचने के लिए पूर्वाग्रहपूर्ण अतिसरलीकरण का सहारा लेना आदमी की पुरानी फ़ितरत है. यही पहले सभी विजातीयों के लिए barbaric और म्लेक्ष–जैसी संज्ञाओं के रूप में  व्यक्त होती थी.]

चंदनदास को ले जाए जाने के बाद पर्दे के पीछे फिर कोलाहल होता है तो ज्ञात  होता है कि सिद्धार्थक  वध-स्थल  से जल्लादों  को भगाकर और शकटदास को छुड़ाकर चंपत हो गया. चाणक्य भागुरायण ( जो दरअसल अत्यंत योग्य गुप्तचर है) को दौड़कर दोनों को पकड़ने का आदेश भिजवाता है. शिष्य फिर ख़बर लाता है कि पीछा करता हुआ भागुरायण भी भाग गया. 

चाणक्य ख़ुश कि ये सब योजनानुसार कुशलता से अपने-अपने मिशन पर निकल गए, लेकिन बनावटी क्रोध में आदेश देता है कि भद्रभट (गजसेनापति), पुरुषदत्त (अश्वसेनापति), डिङ्गरात (द्वारपाल-दल का प्रधान) बलगुप्त (चंद्रगुप्त का सम्बंधी) राजसेन (चंद्रगुप्त का पुराना सेवक),  लोहिताक्ष या रोहिताक्ष  (मालव का राजपुत्र) और विजयवर्मा (क्षत्रिय-गण का प्रधान) से कहा जाए कि वे शीघ्रता से पीछा करते हुए ‘दुष्टात्मा’ भागुरायण को पकड़ लें. शिष्य ख़बर देता है कि ये लोग तो उषाकाल में ही भाग निकले थे और इस तरह पूरा राज्य  अस्त-व्यस्त हो गया है.

चाणक्य संतुष्ट कि ये सब मलयकेतु के यहां (जहाँ राक्षस भी मौजूद है) प्रस्थान कर गए. आक्रमणकारी से निपटने की सबसे प्रभावी रणनीति प्रति-आक्रमण. लेकिन चाणक्य का प्रति-आक्रमण सैन्यबल से नहीं,  नीतिबल से है. और उससे ज़्यादा अमोघ है. 

अब उसे भरोसा हो जाता है कि तमाम विपरीतताओं के बावजूद वह युक्ति से, बलवान, मदयुक्त जंगली हाथी की तरह निरंकुश हुए राक्षस को वश में करके चंद्रगुप्त और राष्ट्र के काम में लगा देगा, क्योंकि इस युक्ति-जाल में राक्षस (चंदनदास को बचाने) ख़ुद चलकर आएगा. 

और इस तरह राजनीति की सारी जटिल बिसातें बिछाकर सबसे लंबा पहला अंक समाप्त होता है.
…………………
(क्रमश:)

कमलाकांत त्रिपाठी
Kamlakant Tripathi 

विशाखदत्त का प्रयोगधर्मी नाटक मुद्राराक्षसम्‌ (1) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/09/1_26.html 


गांधी की दांडी यात्रा (6) छात्रों, व्यापारियों, और जनता से इस युद्ध में शामिल होने का आह्वान / विजय शंकर सिंह



इकतीस हजार की आबादी वाले शहर नदियाड में गांधी लोगों को संबोधित करते हुए कह रहे हैं, 
"मैं अक्सर नदियाड आया हूं और यहां कई भाषण दिए हैं, लेकिन इससे पहले मैंने जनता का इतना बड़ा जनसमूह कभी नहीं देखा है।  गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए, आज हम कुचले जा रहे हैं और हम उन जंजीरों को हटाना चाहते हैं।  मुझे यकीन है कि आप आज यहां, मेरी खातिर या मेरी साथ चल रहे अस्सी लोगों की टुकड़ी के लिए नहीं आए हैं, बल्कि इसलिए है कि, आप पूरी आजादी चाहते हैं। जब से मैंने अहमदाबाद छोड़ा है, रास्ते में बड़ी संख्या में लोगों ने मुझ पर और मेरे इस अभियान पर अपना आशीर्वाद बरसाया है। जैसा कि यह दिख रहा है, एक हल्की सी बारिश, बढ़ियाई नदी में बदल गई है, और आप भी, ऐसा ही कुछ देख रहे हैं।"

खेड़ा सत्याग्रह की बार बार याद दिलाते हुए, गांधी आगे कहते हैं, 
"खेड़ा जिले के लिए वल्लभभाई की सेवाएं कई तरह से विविधता भरी रही हैं।  बाढ़ के समय उन्होंने,  हजारों आदमियों को बचाया। अब, वल्लभभाई, जेल की सलाखों के पीछे हैं।  मैंने भी इस जिले में कुछ काम किया है। आप का तीन गुना कर्तव्य था कि आप, बल्लभभाई की गिरफ्तारी का विरोध करते।  वल्लभभाई को जेल, तुम्हे, दी गई कैद है।  खेड़ा में उनको गिरफ्तार करना, पूरे खेड़ा को ही, गिरफ्तार करने जैसा है। निःसंदेह, सरकार ने वल्लभभाई को कैद करके, उनका सम्मान ही बढाया है, लेकिन आपने, उनकी गिरफ्तारी पर चुप रह कर, उनका अपमान किया है।"

लोग स्तब्ध, सुन रहे थे, और निर्भीक गांधी, बोलते जा रहे थे, 
"उनके इस अपमान पर, आपका क्या जवाब होना चाहिए ? आपका उत्तर, केवल पूर्ण स्वतंत्रता पाना हो सकता है। लेकिन, तुम ऐसा कैसे पा सकते हो?" 
फिर खुद ही उत्तर भी देते हैं, 
"मेरे बताए रास्ते पर चल कर ही।" 
और आगे कहना जारी रखते हैं, 
"मैं चाहता हूं कि सभी सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी छोड़ दें।  आखिर सरकारी सेवा की क्या कीमत है?  सरकारी नौकरी आपको दूसरों पर अत्याचार करने की शक्ति और अवसर देती है।  और आप नौकरी में क्या कमाते हैं?  स्वतंत्र श्रम के बल पर, एक व्यक्ति यदि चाहे तो हजारों कमा सकता है। कुछ स्थानीय मुखियाओं ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।  लेकिन क्या बस इतना ही, काफी है ?"

अब वे नाडियाड शहर के कुछ महत्वपूर्ण नागरिकों की चर्चा करते हुए लोगों को उस शहर का अतीत याद दिलाते हैं
"नाडियाड का निर्माण, गोवर्धनराम और मणिलाल नभुभाई द्वारा किया गया है।  यह विद्वानों का शहर रहा है। क्या अब इन विद्वानों के कोई वारिस, शहर में हैं?  पढ़े-लिखे लोगों के इस शहर के छात्रों का क्या कर्त्तव्य है ? और उनकी बहनों और माताओं का कर्तव्य क्या है?  इन सवालों का जवाब देना, आप सभी पर निर्भर है। आप सभी को, स्वयं को, स्वयंसेवकों के रूप में सूचीबद्ध कराना है। जैसे ही मैं, गिरफ्तार होकर, सलाखों के पीछे पहुंचा दिया जाता हूँ, या जैसे ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का फोन आता है, आपको स्वयं ही, स्वयंसेवकों के रूप में प्रस्तुत करने के लिए आगे आना होगा। जैसे ही समिति, (एआईसीसी) बुलाती है, आपको जेल जाने के लिए खुद को पेश करते हुए आगे आना चाहिए।  तभी मुझे विश्वास होगा कि, नाडियाड ने हमारे संघर्ष में अपना योगदान दिया है।"

गांधी को सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रारंभ से ही यह उम्मीद थी कि, उन्हे गिरफ्तार कर लिया जाएगा। वे मानसिक रूप से दांडी यात्रा की शुरुआत यानी 12 मार्च की सुबह ही खुद को बंदी बनाए जाने की आशा किए बैठे थे। पर यात्रा के चार दिन बीत चुके थे, और यह पांचवा दिन था, फिर भी उनकी गिरफ्तारी की बात कहीं हवा में भी नहीं थी। कांग्रेस नेतृत्व भी गांधी जी की संभावित गिरफ्तारी को लेकर, उनकी संभावित गिरफ्तारी को लेकर सतर्क था, और आगे की योजना बना रहा था। पर वायसरॉय और बॉम्बे के गवर्नर, गांधी की दांडी यात्रा को लेकर क्या सोच रहे थे, यह अभी, सबके सामने नहीं आ पाया था। उधर नाडियाड की सभा में अपने भाषण का समापन करते हैं।

नाडियाड तक, यात्रा के चार दिन बीत चुके थे। गांधी की दांडी यात्रा को लेकर, जनता में प्रत्यक्ष रूप से, उत्साह देखा जा रहा था। गुजरात ही नहीं, देश के लगभग हर कोने से, जनता इस यात्रा से, उत्साहित थी। 'महात्मा जी उनकी आजादी के लिए सड़कों पर हैं,' यह भावना जनता को अंदर तक प्रभावित करने लगी थी। बंबई का अखबार, बॉम्बे क्रॉनिकल, जिसके रिपोर्टर, यात्रा के साथ साथ ही चल रहे थे, ने अब तक की यात्रा को सारांशित करते हुए, जो रिपोर्ट भेजी, उसका कुछ अंश पढ़े, 
"यात्रा के चौथे दिन स्वराज सेना की इस प्रयाण की प्रगति को, उत्साह के अवर्णनीय दृश्यों के रूप में देखा जा सकता है। क्या अमीर और क्या गरीब, क्या करोड़पति और क्या मजूर, क्या सवर्ण हिंदू और क्या तथाकथित अछूत, सब एक स्वर और लय से मिलजुलकर, अपनी आजादी के संघर्ष के लिए संकल्पबद्ध हैं।  भारत के महान मुक्तिदाता के सम्मान में एक, दूसरे को ठेलते हुए, ... 'मैं कैसे बापू के "दर्शन" कर सकता हूं, यही सबकी चिंता थी,  भीड़ में धंसे जा रहे थे। सभी जातियों, पंथों, धर्मों और हितों को देशभक्ति की एक अप्रतिरोध्य लहर में, गांधी के इस सविनय अवज्ञा आंदोलन ने एकजुट कर दिया। सभी जगह एक आदर्श गांधी राज दिखाई दे रहा है। ब्रिटिश सरकार का अधिकार लगभग न के बराबर दिखाई दे रहा था।" 

इसी तरह के माहौल में गांधी उनका यात्रा दल, 15 मार्च की रात, गुजरात के एक प्रमुख शहर, आणंद पहुंचा। यह वही आणंद है, जहां आजकल श्वेत क्रांति का ब्रांड अमूल का मुख्यालय स्थित है। पर तब, न श्वेत क्रांति जैसी कोई चीज अस्तित्व में थी, और न ही अमूल के बारे में कोई जानता था। अगले दिन सोमवार था। और यह गांधी जी के मौनव्रत का निर्धारित दिन था। 17 सितंबर 1930 को गांधी जी, साबरमती आश्रम में स्थित मीरा बेन को लिखे, एक पत्र में उल्लेख करते हैं, "पांच दिन की यात्रा की थकान ने मुझे सोने के लिए बाध्य कर दिया और मैं दिन में सोता रहा।" 
उसी दिन उन्होंने जयप्रकाश नारायण को भी एक पत्र लिखा, जिसमे वे कहते है, 
"यज्ञ (सविनय अवज्ञा आंदोलन) के प्रति ऐसा जोश मैंने, और कहीं नहीं देखा, जैसा कि, आश्रम की महिलाओं ने प्रदर्शित किया है।  आजकल, महिलाएं काफी हद तक आश्रम के आंतरिक मामलों का प्रबंधन कर रही हैं। इस तरह का अनुभव, प्राप्त करने का मौका, आगे कभी दोहराया नहीं जाएगा। इसलिए मैं आपको सलाह दूंगा कि आप, प्रभावती (प्रभावती जी जेपी की पत्नी थीं) को वहां भेजें। मेरी गिरफ्तारी, (यदि हो जाती है तो) के बाद आश्रम की महिलाओं को भी जेल की सजा होगी। मुझे लगता है कि प्रभावती को उनके साथ जाना चाहिए। वह हर दृष्टि से योग्य हैं। मुझे आशा है कि आपका काम पहले से अच्छा चल रहा है।"

अगली जनसभा आणंद में आयोजित की गई। सभा में एक स्थानीय व्यक्ति ने गुजराती में गीत गया और उसके गीत का उल्लेख करते हुए कहा, 
"आपने अभी-अभी पंडित जी का गीत सुना है कि, प्रेम का मार्ग ज्वाला के समान होता है।  सत्याग्रही का मार्ग प्रेम का मार्ग है, शत्रुता का नहीं।  सत्याग्रही की यह महत्वाकांक्षा होनी चाहिए कि, वह प्रेम से कठोरतम शत्रुओं को भी जीत ले। कोई कैसे प्रदर्शित कर सकता है कि सविनय अवज्ञा के अंतर्गत प्रेम के सिवा कुछ नहीं है?  इसका प्रत्यक्ष अनुभव तो, प्रीतम को हुआ होगा, जिसका परिणाम यह हुआ कि, यह भजन उनके हृदय से निकला।"
गांधी एक राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व करते हुए जब वे अपनी बात कहते हैं तो, वह एक प्रवचन की तरह नजर आती है। धर्म, धार्मिक प्रतीकों, और तमाम धर्म ग्रंथो से चुनी हुई प्रेरक कथाओं के साथ वे अपनी बात जनता में रखते हैं। सत्याग्रही और सत्याग्रह, कैसा होना चाहिए इसे वे समझाते हुए कहते हैं,
"बीमार भावना की तुलना शायद आग से की जा सकती है।  इसे प्यार के बारे में कैसे कहा जा सकता है?  जबकि दुर्भावना दूसरों को जलाती है, प्रेम स्वयं को जलाता है और दूसरे को पवित्र करता है। जब प्रेम इतना तीव्र रूप धारण कर लेता है, तो कुछ लोगों को यह आग की तरह लग सकता है, लेकिन आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि अंत में यह अपने शीतलन प्रभाव को ही प्रदर्शित करेगा।  सत्याग्रहियों की यह टोली जो, दांडी के लिये, निकल चुकी है, वह कोई नाटक नहीं कर रही है;  इसका प्रभाव केवल अस्थायी नहीं होगा;  मृत्यु के द्वारा भी, यह अपनी प्रतिज्ञा निभाएगी, यदि मृत्यु आवश्यक हो जाती है तो।  अंत में सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि सत्याग्रह करने वाले, यह लोग सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने वाले लोग थे।  यदि सत्याग्रहियों का यह गिरोह नष्ट हो जाए तो, इससे बेहतर कुछ नहीं होगा।  यदि सत्याग्रहियों की मृत्यु हो जाती है, तो यह उनके दावे पर मुहर लगा देगा।"

सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा के इस आह्वान के बीच गांधी का दार्शनिक स्वरूप, उजागर हो रहा था, जब वे कह रहे थे कि,
"मृत्यु के समय न केवल किसी के हृदय में क्रोध होना चाहिए, बल्कि इसके विपरीत, उसे यह महसूस करना और प्रार्थना करना चाहिए: 'जो मुझे मारता है उसका भला हो!'  जब कोई इस तरह से मृत्यु से मिलता है, तो मैं, इसे सत्याग्रही की मृत्यु कहूंगा और ऐसी मृत्यु में ही मरने वाला व्यक्ति, अपनी प्रतिज्ञा के प्रति सच्चा माना जाएगा। अपने संबंध में भी, मैं आज कोई आश्वासन नहीं दे सकता।  यह केवल अन्य लोग हैं जो किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद इस परीक्षण से उसका न्याय कर सकते हैं।"
अब आणंद के बारे में चर्चा करते हुए कहते हैं, 
यहाँ आणंद में, आपके पास नरसिंहभाई की कुटिया है।  आनंद पाटीदारों का शिक्षा केंद्र है। खेड़ा जिला पाटीदारों का, वल्लभभाई का, मोतीभाई अमीन का, और चरोतार एजुकेशन सोसाइटी के स्वयंसेवकों का गृह नगर है। ऐसे शहर की जनसभा में आप के सामने नहीं तो,  मैं अपने भीतर की भावनाओं को, कहां अभिव्यक्त कर सकता हूं ? मैं बड़ी उम्मीदों से, आपके पास आया हूं।"

अब वे अपने मिशन पर आते हैं, 
"मैंने कई जगहों पर जोर देकर कहा है कि, इस बार मैं, भीख मांगने के लिए नहीं आया हूं।  मुझे पता है कि, यह कैसे किया जा सकता है। यह संघर्ष पैसों के लिए नहीं है। पैसे के बिना इसे, चलाया जा रहा है। आज सुबह, बंबई के सूत व्यापारियों ने मुझे रु. 2,501, डायमंड एसोसिएशन ने मुझे रु. 2,000 भेजे हैं। इसके अलावा, अगर मैं फंड के लिए एक मामूली अपील भी करूँ, तो गुजरात और भारत मुझ पर पैसे बरसाने लगेंगे। मैं उनके आभार के बोझ तले दब जाता हूं। मैं, आपसे बड़ा योगदान मांगने आया हूं। आपके हाथ में चरोतर के पाटीदारों की इज्जत है। आप पाटीदारों के समंदर में नमक की तरह हो। यदि नमक अपना स्वाद खो देता है, तो उसे कौन नमकीन कर पाएगा ? नमक चीनी या गुड़ की तुलना में अधिक रसीला होता है। एक चुटकी नमक, भोजन में स्वाद ला देता है। यदि आप का शहर, आणंद, अपना स्वाद छोड़ देता है, यदि साहस और इस तरह के अन्य गुण, जो पाटीदारों में हैं, इस समय आणंद के लोग उन्हें, प्रदर्शित नहीं करते हैं, तो, उन्हें और कहां, पाया जा सकता है?"

गांधी, शांत जनसमूह को देखते हैं, थोड़ा विराम लेते है, फिर बोलना जारी रखते हैं,
"इस विस्तार से आणंद के बारे में अपनी बात कहने का कारण तो आप समझ ही गए होंगे। क्या आणंद और खेड़ा जिले के छात्र, अपनी किताबें लेकर बैठ जाने वाले हैं, या वे विद्यापीठ के बताए मार्ग पर चलेंगे? विद्यापीठ के लिए डॉ. मेहता द्वारा खर्च किए गए ढाई लाख रुपये और अन्य शुभचिंतकों द्वारा किए गए योगदान के लिए, ब्याज के साथ रिटर्न हमें पहले ही मिल चुका है। आज विद्यापीठ ने अपनी पुस्तक-शिक्षा को समाप्त कर दिया है और अपने आदर्श वाक्य को सिद्ध कर दिया है: वह विद्या है जो मुक्त करती है। सा विद्या विमुक्तये।
अब वे विद्यार्थियों से आह्वान करते हैं, 
"सोलहवीं वर्ष में प्रवेश करने वाले सभी छात्र, अपनी पढ़ाई छोड़ने के लिए एकजुट हो गए हैं, और शिक्षक भी उनके साथ जुड़ गए हैं। उस जगह से और क्या उम्मीद की जा सकती है जहां सभी छात्र और शिक्षक शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करते हैं? आप भी यह रास्ता क्यों नहीं अपनाते?"

सविनय अवज्ञा की चर्चा करते हुए, वे कहते हैं, 
"मुझे उम्मीद है कि गुजरात देश के बाकी हिस्सों के लिए एक वस्तु-पाठ (उदाहरण) स्थापित करेगा।  अभी यह नहीं कहा जा सकता कि, लड़ाई लंबी चलेगी या जल्दी खत्म हो जाएगी।  हालांकि, अगर हमने आंदोलन में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया है, तो हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि यह लंबा होगा या छोटा।  मुझे खेड़ा जिले के पाटीदारों के प्रति, ऐसी आशायें पालने का अधिकार है। वे मेरे दक्षिण अफ्रीका के दिनों से ही, मुझे उम्मीद पर खरे उतरते आ रहे  हैं। खेड़ा सात लाख की आबादी का जिला है, जिसमें हमारे ठाकोर भाई भी शामिल हैं। अगर पाटीदार रास्ता दिखाते हैं तो, गरासिया उनके पीछे पीछे आयेंगे ही।  क्या तुलसीदास ने यह नहीं कहा है कि, 'आधार धातु परसमणि के स्पर्श से चमकती है।'

विद्यार्थियों और विद्यालयों को सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ने की उनकी पुरानी रणनीति रही है। असहयोग आंदोलन के काल में भी, उन्होंने विद्यार्थियों को, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को छोड़ कर, आजादी की लड़ाई में शामिल होने का आह्वान किया था। तब भी भारी संख्या में छात्रों, और सरकारी कर्मचारियों ने नौकरी छोड़ कर असहयोग आंदोलन में गांधी जी का साथ दिया था। अब फिर वे एक बार आह्वान कर रहे हैं, 
"जब तक यह संघर्ष जारी है, आप, विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई स्थगित कर देनी चाहिए।  इस समय मुझे स्वर्गीय देशबंधु (बंगाल के कांग्रेस के बड़े नेता, चितरंजन दास जिन्हे देशबंधु कहा जाता है और संक्षिप्त में, सीआर भी। सीआर दास, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक गुरु भी थे) के शब्द याद आ रहे हैं। वह स्कूलों में, असहयोग आंदोलन से, नाखुश थे। वे कहते थे कि अंतिम संघर्ष का समय आने पर हमें छात्रों को अवश्य बुलाना चाहिए लेकिन हमें, उन्हें इस समय अकेला छोड़ देना चाहिए। मैंने उनकी बात नहीं मानी और, स्कूलों के बहिष्कार का आह्वान किया। लेकिन यह बात 1920 की थी। तब से अब तक पांच नहीं, दस साल बीत चुके हैं। अब हमें, अंतिम लड़ाई लड़नी है। इसलिए, अब कोई कारण नहीं है कि, छात्र अब स्कूलों में क्यों रहें।"

गांधी, सविनय अवज्ञा आंदोलन को एक युद्ध की संज्ञा देते हैं, एक अहिंसक युद्ध, एक ऐसा युद्ध, जो, नैतिक मूल्यों, सत्य, अहिंसा, और शत्रु के विरुद्ध, मन में, बिना किसी दुर्भावना के, खुद, आजाद होने के लक्ष्य के लिए लड़ा जा रहा है। गांधी इस आंदोलन को, समय की पुकार के रूप में घोषित करते हैं और आगे कहते हैं, 
"आज मैं केवल एक युद्धक्षेत्र तैयार करने के लिए नहीं कह रहा हूं।  आज कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक और कराची से डिब्रूगढ़ तक हर कोई व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से असहयोग का अभ्यास कर सकेगा। पिछले दिसंबर तक, मुझे लगा कि सविनय अवज्ञा के लिए माहौल अनुकूल नहीं है और मैंने वही किया, जो मैंने महसूस किया। मैं अब दावा करता हूं कि यदि परिस्थितियां कभी अनुकूल हैं, तो वे आज हैं। यह शुभ क्षण है।  यदि इस शुभ समय पर, हम सविनय अवज्ञा की शक्ति विकसित नहीं करते हैं तो, हम ऐसा कभी नहीं करे सकेंगे।
अब वे विद्यार्थियों द्वारा स्कूल कॉलेज छोड़ने के मुद्दे और उसकी जरूरत को रेखांकित करते हैं, 
"वह कौन सा छात्र है जो ऐसे समय में पढ़ना जारी रखेगा?  पूर्व में, मैंने छात्रों को स्कूल छोड़ने और राष्ट्रीय स्कूल स्थापित करने के लिए कहा था।  आज मैं उन्हें स्कूल छोड़कर युद्ध के मैदान में आने के लिए कहता हूं, देश के लिए भिखारी बनो। यदि कोई व्यवसायी आज भी अपना व्यवसाय जारी रखता है, तो उसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि नहीं होगी।  यदि भारत, व्यापक स्तर पर सत्याग्रह शुरू करना चाहता है, तो यही समय है कि, उसे, ऐसा करना चाहिए। परमेश्वर, भोजन और पानी प्रदान करेगा;  अनगिनत लोग इसे प्रदान करेंगे।  यदि पूरे देश में भगदड़ मच जाती है, और यदि पूरा भारत सविनय अवज्ञा शुरू कर देता है, तो 30 करोड़ लोगों को अपने आप को एक लाख अंग्रेजों के प्रभुत्व से मुक्त होने में कितना समय लगेगा?  स्कूली बच्चे इसे तीन के नियम से हल करेंगे। सेना में 70 हजार अंग्रेज और सिख, पठान, गोरखा और मराठा सहित अन्य शामिल हैं। यह सेना हमारे दोनों कंधों पर सवार है। हमें उन कानूनों के पीछे और कुछ नहीं दिखता जो हमें दबाते हैं।  इस सेना के समर्थन के बल पर अंग्रेज हमें, अपनी धुन पर नचाते हैं।"

अंत में समापन करते हुए कहते हैं, 
"कृपया फिर से याद रखें, मैं आपको अपनी पढ़ाई को हमेशा लिए छोड़ने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि संघर्ष जारी रहने तक केवल, पुस्तक-शिक्षा को छोड़ने के लिए कह रहा हूं।  यह आप पर निर्भर है कि, यह लंबा चलेगा या नहीं।  यूथ लीग- यानी आप छात्र-छात्राएं-कई बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।  इस साल हमारे कांग्रेस अध्यक्ष घोड़े की सवारी करने वाले युवक हैं।  इसलिए इस संघर्ष का एक बड़ा हिस्सा, आप छात्रों को ही वहन करना है। ईश्वर आपको आंतरिक शक्ति दे।  यह आपकी बुद्धि के उपयोग का प्रश्न नहीं है।  यदि किसी चीज़ को बुद्धि के उपयोग से आश्वस्त करना है, तो उसे उसी तरह से निर्धारित किया जा सकता है जैसे ज्यामिति का प्रस्ताव।  इसके अंत में।  परन्तु यहाँ बुद्धि का बल न होने पर बुद्धि असहाय हो जाती है।  बुद्धि हृदय की दासी है। 
फिर अपनी बात कहते हुए अपना संबोधन समाप्त करते हैं, 
"मैं असहाय हूं, हालांकि, अगर आप दिल से महसूस करते हैं कि इस आदमी ने केवल एक स्टंट शुरू किया है, कि एक महीने के अंत में वह इस बात को बंद कर देगा कि उसने हिमालय जैसी, एक बड़ी गलती की है और, साबरमती के तट पर चुपचाप वापस चला गया है। हालांकि, आप इस मामले में विश्वास नहीं करते हैं, तो निश्चिंत रहें कि जहां तक ​​​​आप और मेरा संबंध है, यह वास्तव में अंतिम संघर्ष है और इस युद्ध मे, अपनाए जाने वाले साधन शांतिपूर्ण हैं, जिसमें सविनय अवज्ञा आदि शामिल हैं।"
(गुजराती पत्र नवजीवन, 23-3-1930)

आणंद की जनसभा जो देर तक चली थी और गांधी जी का लम्बा संबोधन भी हुआ था, के बाद, अगले दिन सुबह, यह यात्रा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ चली। 
....क्रमशः 

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

गांधी की दांडी यात्रा (6) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/09/5_22.html

Monday, 26 September 2022

कमलाकांत त्रिपाठी / विशाखदत्त का प्रयोगधर्मी नाटक मुद्राराक्षसम्‌ (1)

खंड-एक: मुद्राराक्षम्‌ का वैशिष्ट्य—उसका राष्ट्रीय संदर्भ ~

“राज्यं हि नाम राजधर्मानुवृत्तिपरस्य नृपतेर्महदप्रीतिस्थानम्‌. कुत:?

परार्थानुष्ठाने रहयति नृपं स्वार्थपरता
परित्यक्तस्वार्थो नियतमयथार्थ: क्षितिपति:। 
परार्थस्चेत्स्वार्थादभिमततरो हन्त परवान्‌
परायत्त: प्रीते: कथमिव रसं वेत्ति पुरुष:”॥मुद्राराक्षसम्‌--3:4॥ 

[राजधर्म का पालन करने में तत्पर राजा के लिए राज्यकर्म निश्चय ही बेहद कष्ट का विषय है. कैसे? 

दूसरों का हित साधने के लिए राजा को अपना हित छोड़ना पड़ता है. अपने इच्छित आमोद-प्रमोद का त्याग करने के लिए विवश राजा किस बात का ‘राजा’ ! यदि उसके लिए दूसरों का प्रयोजन अपने प्रयोजन से अधिक अभीष्ट है, तो वह पराधीन हुआ. और पराधीन व्यक्ति कैसे जान सकता है कि आनंदानुभूति का सुख क्या चीज़ है!] 

विशाखदत्त संस्कृत के ऐसे नाटककार हैं जिन्होंने भारतीय नाट्य-परंपरा से हटकर अपना रास्ता ख़ुद बनाया. उनके लिखे तीन नाटकों का संदर्भ  मिलता है, लेकिन इनमें से उनका अंतिम और सबसे परिपक्व नाटक ‘मुद्राराक्षसम्‌’ ही संपूर्ण उपलब्ध है; ‘देवीचंद्रगुप्तम्‌’ और ‘अभिसारिकवञ्चितकम्‌’ का अन्य ग्रंथों में ज़िक्र भर आता है, जहाँ इनके अंश उद्धृत हैं. तीनों में से कोई संस्कृत नाट्य-परंपरा के अनुकूल पूर्णत: काल्पनिक चरित्र लेकर लिखे गए प्रकरण (रूपक के दस भेदों में एक) की श्रेणी में नहीं आता। न ही अधिकांश नाट्य रचनाओं की तरह किसी पौराणिक प्रसंग पर  लिखे गए ‘नाटक’ की श्रेणी में आता है। तीनों ऐतिहासिक घटना-क्रम पर आधारित हैं और ये तीनों घटना-क्रम ऐसे हैं जो बहुत उदात्त क़िस्म की राष्ट्रीय भावना को पुष्ट करते हैं. इसलिए संस्कृत का एक ‘प्रयोगधर्मी’ नाटककार होने के साथ-साथ विशाखदत्त को इसालिए भी याद किया जाना चाहिए कि उनका एक स्पष्ट राष्ट्रीय क्षितिज है.

मुद्राराक्षसम्‌ चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य (शा.का. 322-298 ई. पू.) को केंद्र में रखकर लिखा गया उस कालखंड का रूपक है जब चंद्रगुप्त ने चाणक्य के पथ-प्रदर्शन में अत्याचारी और अलोकप्रिय किंतु संयोग से योग्य और कर्तव्यपरायण मंत्रियों एवं सेनानायकों के चलते अत्यंत शक्तिशाली नंदों का विनाशकर अभी-अभी मगध का साम्राज्य हासिल किया है. लेकिन पुराने राजवंश के प्रति स्वामिभक्त समर्थक अभी असंतुष्ट हैं, वे येन-केन-प्रकारेण चन्द्रगुप्त को दृश्य से हटाने, नहीं तो उसका तख़्ता पलटने के लिए प्रयत्नशील हैं. इस संक्रमण के दौर में भीषण षड्यंत्रों और कुचक्रों से नये शासन की स्थिति डाँवाडोल है. असंतुष्टों का नेतृत्व कर रहा है, नंदों का अमात्य-प्रवर और प्रधान सेनापति राक्षस, जो अपने पूर्व-स्वामी के शत्रु का विनाश करने के लिए कुछ भी करने, जान तक देने, को तैयार है. और चाणक्य की एक ही चिंता--जब तक राक्षस-जैसे अखंड स्वामिभक्ति, चारित्रिक दृढ़ता और प्रशासनिक दक्षतावाले व्यक्ति को चंद्रगुप्त का अमात्य-प्रवर नहीं बना दिया जाता, उसकी राजलक्ष्मी स्थिर  नहीं हो सकती. उधर राक्षस आर-पार के युद्ध के लिए आमादा है. इसके लिए वह नंदों के विनाश में चंद्रगुप्त का साथ देनेवाले पश्चिमोत्तर के  मृत राजा पर्वतक (सिकंदर का पोरस?) के पुत्र मलयकेतु और उसके राज्य के निकटवर्ती पाँच अन्य राज्यों {कुलूत (कलात: बलूचिस्तान), कश्मीर, सिंध, पारसीक (फ़ारस: ईरान) और मलय(?)} के विजातीय राजाओं को मिलाकर मगध पर दुर्धर्ष आक्रमण करने की तैयारी में है. चंद्रगुप्त प्रतियुद्ध के लिए छटपटा रहा है. किंतु चाणक्य युद्ध नहीं चाहता. उसे मालूम है, राक्षस के मार्गदर्शन में मलयकेतु और इन पाँचों राजाओं की सम्मिलित शक्ति चंद्रगुप्त की सेना को कितनी अपूरणीय क्षति पहुँचा सकती है. उससे भी बड़ा कारण यह है कि यदि युद्ध निर्णायक हुआ तो साहसी और निडर योद्धा राक्षस के मारे जाने की पूरी संभावना है. और तब उसे चंद्रगुप्त का अमात्य-प्रवर बनाने की योजना धरी की धरी रह जाएगी, और अमोघ निष्ठा एवं विरल प्रशासनिक गुणोंवाले राक्षस की सेवाओं से राष्ट्र वंचित हो जाएगा. वह तो राक्षस को बुद्धि के प्रयोग से चद्रगुप्त के और उसके माध्यम से राष्ट्र के काम में लगाना चाहता है, जैसे बलशाली जंगली हाथी को बल से नहीं, युक्ति से पकड़कर भार ढोने के काम में लगा दिया जाता है. इसी कठिन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए घात-प्रतिघात का जो लंबा सिलसिला चलता है और दोनों ओर के गुप्तचरों की जो विलक्षण टक्कर होती है, वही इस नाटक की कथावस्तु है. व्यक्तिगत स्वामिभक्ति और स्वामी के शत्रु के प्रति जाग्रत उत्कट द्वेष-भाव के उद्वेग में राष्ट्र के प्रति सुषुप्त पड़ी राक्षस की निष्ठा को जगाने में चाणक्य की सफलता ही नाटक का सुखांत है.

घटना-क्रम के इसी सीमित फलक से उस रीति-नीति का भी ख़ुलासा हो जाता है, जिसके चलते मौर्य सामाज्य थोड़े ही अंतराल में इतना सुदृढ़ और सुशासित बन जाता है कि कुछ ही दिनों बाद सिकंदर के सेनानायकों में से एक, यूनानी आक्रमणकारी सेल्यूकस को हराकर उसे संधि के लिए विवश कर देता है, जिसके तहत आज के बलूचिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान तक का सारा पश्चिमोत्तर भूभाग मौर्य साम्राज्य में शामिल हो जाता है. सेल्यूकस के साथ वैवाहिक एवं दौत्य सम्बन्ध स्थापितकर उधर की सीमा पर स्थाई शांति भी सुनिश्चित कर ली जाती है—यह इतिहास है.

काफ़ी विवादों के बाद अब यह मान लिया गया है कि, विशाखदत्त ईसवी की चौथी-पाँचवीं शताब्दी के प्रतापी, न्यायप्रिय और जनप्रिय शासक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (शा. का. 375-413 ई.) के संरक्षण में लेखन कर रहे थे. मुद्राराक्षसम्‌ के भरतवाक्य (नाटक के अंत में मंगल-पाठ) में जिस पाठभेद ने इस विवाद को जन्म दिया था, उसका सही पाठ अब ‘पार्थिवश्चंद्रगुप्त:’ [(पृथ्वी का) पालन करनेवाला चंद्रगुप्त] सिद्ध हो चुका है, जहां ‘चन्द्रगुप्त’ का अभिप्राय चंद्रगुप्त मौर्य नहीं, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य  है. नाटक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के लिए ही लिखा गया था और उसी की सभा में इसका पहला मंचन हुआ था. तो यह भारत के राष्ट्रीय गौरव के एक युग की कथा है जो राष्ट्रीय गौरव के दूसरे युग में नाट्य-विधा में लिखी गई और अभिनीत हुई. अकारण नहीं कि भारतीय नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी अनुवाद और मंचन के लिए संस्कृत के इसी नाटक को चुना था. 

मुद्राराक्षसम्‌ के दोनों प्रमुख ऐतिहासिक पात्रों ने मिलकर अपने समय में इस देश को वह बनाने में महती भूमिका अदा की जो यह आज है. चंद्रगुप्त मौर्य, भारतीय इतिहास का पहला ज्ञात सम्राट है, जिसके साम्राज्य में पश्चिमोत्तर के उपरोक्त भूभाग के अलावा उत्तर से दक्षिण तक भारत के अधिसंख्य घटक राज्य (पश्चिम में कलिंग और धुर दक्षिण में चोल, पांड्य और केरल राज्यों को छोड़कर) शामिल थे (अशोक के समय में कलिंग भी शामिल  हो गया था). और इस साम्राज्य को खड़ा करने, सुगठित और सुशासित बनाने में यदि किसी एक व्यक्ति का हाथ था तो वह था चाणक्य, जो नाटक का नायक है. चाणक्य के बिना एक राष्ट्र  और एक अविच्छिन्न प्राचीन संस्कृति के रूप में भारत का चित्र मुकम्मल नहीं होता. चाणक्य, कौटिल्य, विष्णुगुप्त--जो किसी राजकीय पद के गौरव से दूर, राजकीय सुख-सुविधा से दूर, पारिवारिक या रागात्मक ऊष्मा से दूर, निरंतर, आजीवन इस विशाल भूक्षेत्र की बेहतरी के एकमात्र लक्ष्य के लिए मनसा-वाचा-कर्मणा जूझता रहा--उसके लिए यही गति थी, यही जीवन था और यही मोक्ष था. 

और नैतिकता? अंग्रेजी की कहावत ‘End justifies the means’ का इससे उत्कृष्ट उदाहरण नहीं मिलेगा। एक  बृहत्तर, दूरगामी लक्ष्य की अपनी नैतिकता होती है, जो नैतिकता के सामान्य मानदंडों को आत्मसात्‌ कर लेती है, नहीं तो ख़ारिज कर देती है. चाणक्य न होता तो चंद्रगुप्त मौर्य न होता और चंद्रगुप्त मौर्य न होता तो उसका पौत्र अशोक न होता. अशोक न होता तो पूरे एशिया में बौद्ध धर्म का विस्तार न होता, एक जनोन्मुख, कल्याणकारी, धर्म-निरपेक्ष राज्य की विशुद्ध भारतीय अवधारणा न होती....नेहरू...विचित्र बात है, मुद्राराक्षसम्‌ पढ़ते हुए नेहरू की याद आती है.

विंसेंट स्मिथ ने भारत के दो महान शासकों—चंद्रगुप्त मौर्य (शा.का. 324-300 ई.पू.) और अकबर (शा.का.1556-1605 ई.‌)-- की प्रशासनिक उपलब्धियों की तुलना की है: 

“The Maurya State (of Chandragupta) was organized elaborately with a full supply of departments and carefully graded officials with well-defined duties. The accounts leave on my mind the impression that it was much better organized than was the Mugul Empire under Akbar, as described in Abul Fazl’s survey. Akbar’s officials, except certain judicial functionaries, all ranked as military officials. Even the underlings in the imperial kitchen were rated and paid as foot soldiers. The bulk of the army was composed of irregular contingents supplied either by subordinate ruling chiefs or by officials with territorial jurisdiction, and the standing army was quite small. The Mauryas, on the contrary, had a regular civil administration and maintained a huge standing army paid directly by the Crown—an instrument of power infinitely more efficient than Akbar’s militia, which failed miserably when confronted with small Portuguese forces, whereas the Maurya was more than a match for Seleukos. The control of the Mauryan central government over distant provinces and subordinate officials appears to have been far more extensive than that exercised by Akbar, who did not possess the terrible secret service of his early predecessor. The Maurya government, in short, was a highly organized and thoroughly efficient autocracy, capable of controlling an empire more extensive than that of Akbar, as long as the sovereign possessed the necessary personal ability.” 
(The Oxford History of India, fourth edition, p.100). 

यहाँ स्मिथ से एक ही चीज़ छूट गई है. यद्यपि अकबर के नौरत्नों में भी उस समय की विलक्षण प्रतिभाओं का समागम था, उनमें चाणक्य की सूझ-बूझ, त्याग और तेजस्विता वाला कोई नहीं था. राष्ट्र के प्रति इस तरह की एकात्म निष्ठावाला व्यक्तित्व हर युग में पैदा भी नहीं होता. इसमें दो राय नहीं कि चंद्रगुप्त मौर्य की असाधारण प्रशासनिक, कूटनीतिक और राजनयिक उपलब्धियों के पीछे चाणक्य की विलक्षण प्रतिभा, सूझबूझ, त्याग और राष्ट्र के प्रति एकात्म निष्ठा का अनन्य योगदन था।

[कम लोगों को ज्ञात होगा कि अपने देश से अधिक पड़ोसी देश पाकिस्तान के राजनयिक चाणक्य के अर्थशास्त्र, ख़ासकर विदेश नीति पर उसके ‘मंडल सिद्धांत’ (पड़ोसी शत्रु का पड़ोसी या शत्रु हमारा मित्र, वगैरह), का ख़ूब घोंटा लगाते रहे हैं. यही नहीं, वहाँ का पढ़ा-लिखा तबका हिंदू-मानसिकता समझने के लिए दो ही प्रतीक पकड़ता है—चाणक्य और ‘बनिया’ (उनकी निगाह में बनिया माने क्षुद्र, फ़रेबी और अविश्वसनीय, जिसमें वे सारे हिंदुओं को समेट लेते हैं; हाँ, कभी-कभी अनुसूचित जातियों की स्थिति जितनी शोचनीय है उससे कई गुना ज़्यादा शोचनीय बताकर उन्हें पृथक्‌ करने और शायद फोड़ने की कोशिश ज़रूर करते हैं). तो, और चाहे जो हो, चाणक्य का लोहा हमारे दोस्त-दुश्मन सभी मानते हैं.]  

जैसा कि पहले कहा गया, मुद्राराक्षसम्‌ लीक से हटकर, अपने-आप में एक अनोखा नाटक है. इसमें कोई नायिका नहीं, कोई धीरोद्दात्त नायक नहीं, नायक का मित्र विदूषक नहीं, प्रेमोपाख्यान नहीं, कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) के शारदीय कौमुदी महोत्सव के प्रसंग में शरद ऋतु-वर्णन को छोड़कर प्रकृति का विस्तृत मनोरम वर्णन नहीं, ललित पदावली नहीं, कविता-कामिनी का उन्मुक्त विलास नहीं, शृंगार रस की  मोहक छटा नहीं, वीर रस का गर्जन-तर्जन भी नहीं, लेकिन अर्थ-गर्भित संवाद और विस्मयकारी घटनाचक्र ही इतने रोचक हैं कि आद्यंत बाँधे रखते हैं. राजनीति के कठोर दाँव-पेंच और नायक चाणक्य तथा प्रतिनायक राक्षस (जो अंतत: दूसरे नायक-जैसा ही बन जाता है) के बीच चलता विकट स्नायु-युद्ध (war of nerves) ख़त्म होता है तो एक उदात्त राष्ट्रीय और मानवीय लक्ष्य पूरा हो चुका होता है. राक्षस ने  विकटतम प्रतिरोध का जो सरंजाम खड़ा कर रखा है, उसे तार-तार कर दिया जाता है. एक ऐसी मानवीय विडंबना का कृत्रिम सृजन होता है कि दृढ़ चारित्रिक निष्ठा से सम्पन्न राक्षस अपने सच्चे मित्र (चंदनदास) की रक्षा में अपने को उत्सर्ग करने के लिए स्वयं प्रकट हो जाता है और वस्तु-स्थिति से अवगत कराए जाने पर आत्मसमर्पण करके चाणक्य की इच्छानुसार चंद्रगुप्त  का अमात्य बनना स्वीकार कर लेता है. इस तरह  वह चाणक्य को बृहत्तर फलक पर ज़्यादा व्यापक परामर्श और देश के लिए ज़्यादा सार्थक चिंतन-मनन-लेखन के लिए मुक्त कर देता है. और यह संभव होता है बिना किसी वास्तविक युद्ध या अर्थहीन मारकाट के, मात्र चाणक्य के बुद्धि-कौशल और गुप्तचर-व्यवस्था के सुचारु संचालन से. कुशाग्र बुद्धि को भी छका देनेवाले गुप्तचर-व्यापार से असंभव को संभव बनानेवाली राजनीतिक रणनीति जिस चाक्षुष घटना-क्रम और मानव-व्यवहार के जिस यथार्थपरक किंतु नाटकीय और विडंबनापूर्ण घात-प्रतिघात को जन्म देती है, उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति किसी भी प्रेमोपाख्यान पर भारी पडेगी. राजनीतिक-प्रशासनिक जीवन के यथार्थ में लेखक की गहरी पैठ के बिना यह संभव नहीं हो सकता था.

जैसा कि प्रो. Weber ने उल्लेख किया है, नाट्य-साहित्य में कथा-सूत्र की मुद्राराक्षम् से बेहतर अन्विति का उदाहरण नहीं मिलेगा. नाटक के शुरू में जैसे कोई मछुआरा धीरे-धीरे एक विशाल जाल फैला रहा हो, उसके एक-एक तंतु खोल रहा हो. फिर वह जाल खींचता है तो सारे तंतु सिमटकर एक होने लगते हैं और असाध्य-सा लगता केंद्रीय लक्ष्य अंतत: मूर्तिमान होकर सामने खड़ा है. पानी में डूबे जाल-तंतुओं की तरह ही कथा-सूत्रों का परस्पर अंतर्सम्बंध पहले नहीं दिखता, लेकिन जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता है, ये अदृश्य और विशृंखलित सूत्र एक समेकित धारा में बहने लगते हैं और कथा-चक्र एक निश्चित दिशा की ओर बढ़ने लगता है. हर घटित के स्वतंत्र अस्तित्व का लोप हो जाता है और अंतिम अंक तक आते-आते सारे सूत्र मिलकर अभीष्ट को प्रस्तुत कर देते हैं.

पहले सोचा, मुद्राराक्षम्‌ का सार-संक्षेप देकर इसका आस्वाद करा दें. लेकिन सार-संक्षेप और मुद्राराक्षसम्‌ का!जिसने भी कोशिश की है, बस बरगलाया है, इस विकट जंगल में वह ख़ुद ही भ्रमित हो गया तो अन्य को क्या मार्ग दिखाएगा ! विशाखदत्त ही जानते हैं कि इस भूलभुलैयावाले सात खंड (नाटक के सात अंक हैं) के महल का कौन-सा दरवाज़ा पहले खोलना है और कितना खोलकर बंद कर देना है और फिर कौन-सा, कितना खोलना है. 

फिर जिन लोगों ने संक्षेप किया है अंग्रेजी अनुवाद पढ़कर. और अनुवाद ऐसे कि संस्कृत के अद्भुत्‌ अर्थ-गाम्भीर्य और द्विअर्थक उपमाओं और रूपकों को पकड़ने की कोशिश में अनूदित भाषा की टाँग ही तोड़ देते हैं; लगता है, किसी और ग्रह से उतरी विचित्र वस्त्रालंकारों  से लदी एक नई भाषा से साबका पड़ा हो. इस दृष्टि से भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा किया गया मुद्राराक्षसम्‌ का हिंदी अनुवाद कालातीत महत्व का है. 

अबसे सार-संक्षेप के लिए या तो ऊबड़-खाबड, दुर्बोध भाषा में किए गए अनुवाद पढ़ो, नहीं तो अपनी भाषा के परिचित मुहावरे में भाव को इस तरह उतारो कि बात भी आ जाए और भाषा भी सहज और सुबोध बनी रहे....कठिन कार्य है.

मुद्राराक्षसम्‌ एक पात्र-बहुल नाटक है. ऐसा नाटक मंच पर देखना एक बात है, पढ़कर, उसके विस्तार में जाकर, उसके ताने-बाने को समझना दूसरी. देखते समय पात्रों के चेहरे, वेश-भूषा, आवाज़ और बोलने के अंदाज़ से उनकी पहचान हो जाती है और दुबारा उनके मंच पर दाख़िल होते ही उनका पहले का किया-धरा याद आ जाता है. पढ़ते समय तो सिर्फ़ नाम का सहारा…..तो सब गड्डमड्ड हो जाता है. उसमें भी मुद्राराक्षसम्‌ की जटिलतम कथा! पहले तो पता करो कि पात्र जिस रूप में सामने है—मंत्री, श्रमण, संन्यासी, राजपुरुष, आम नागरिक--वह वही है या कोई गुप्तचर है. और गुप्तचर है तो किसका--चाणक्य का या राक्षस का. इतने से भी काम नहीं चलनेवाला, गुप्तचर के भीतर भी गुप्तचर हो सकता है, ऊपर से तो वह राक्षस का काम कर रहा है, लेकिन हो सकता है, चाणक्य का आदमी हो. फिर चाणक्य की अपने सभी गुप्तचरों को हिदायत—जो भी संभव हो, करो किंतु राक्षस की जान नहीं जानी चाहिए. तो विस्फोटक बिंदु तक पहुँचने से ठीक पहले वह पैतरा बदल देगा और दूसरी दिशा में काम करने लगेगा. विशाखदत्त जी महाराज ! शिव की इस बारात को आप ही सँभाल सकते थे....

बहुत सोचने-विचारने के बाद एहसास हुआ, औपचारिक फ़ॉर्मेट में अनुवाद करने से बात नहीं बनेगी. तो अपनी समझ से जैसे भी हो, नाटक की आत्मा का, उसमें निहित दृष्टि का, उसकी निर्मिति में अनुस्यूत प्रतिभा का, कुछ दीदार करा सकूँ, बस. नाटक के घटना-काल और रचनाकाल-में इस देश की मनीषा क्या थी, इसकी सोच क्या थी, इसका रहन-सहन कैसा था, जिसे आज idea of India कहते हैं उस वक़्त उसका तसव्वुर क्या था ? इधर कुछ बहुत प्रखर बौद्धिक इस मुद्दे पर एकमत हो गए हैं कि भारतीय इतिहास के मध्ययुग से पहले महात्मा बुद्ध के अलावा जो कुछ भी था, मानव-विरोधी कूड़ा-करकट था जिसे शोषण और उत्पीड़न के लिए बहुत चालाकी से सँजोया गया था. अस्तु, पूरे नाटक का, कुछ काट-छाँट के साथ, (अपनी समझ से) किया गया मंतव्यानुवाद या भावानुवाद ही (इच्छुक पाठकों के लिए) क्रमवार उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
(क्रमश:)

कमलाकांत त्रिपाठी
Kamala kant Tripathi

#संस्कृतसाहित्य #नाटक #विशाखदत्त #मुद्राराक्षसम् #vss

डॉ मनमोहन सिंह को, जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं / विजय शंकर सिंह


2014 का चुनाव समाप्त हो गया था । भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल चुका था । कांग्रेस अपने इतिहास के बुरे दिनों में थी । नरेंद्र मोदी का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था । शपथ ग्रहण के मुहूर्त की प्रतीक्षा थी । इतिहास का यह एक करवट था । मोदी जिस प्रचार और समर्थन के ज़ोर पर दिल्ली की गद्दी पर पहुंचे थे उसकी प्रतिध्वनि सुनायी दे रही थी । इन सब के बीच पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का एक अख़बार के लिये इंटरव्यू चल रहा था ।

डॉ सिंह स्वभाव से ही अल्पभाषी और मृदुभाषी हैं । ज़ोर से भी नहीं बोलते और नाटकीयता और मंचीय भंगिमा से दूर , किताबों की दुनिया में रमे रहने वाले शख्श हैं । नियति ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया और वे नेहरू , इंदिरा के बाद सबसे अधिक समय तक रहने वाले पीएम बने । अध्यापक , बैंकिंग प्रशासक, रिजर्व बैंक के गवर्नर, वित्त मंत्री के आर्थिक सलाहकार, फिर स्वयं वित्त मंत्री, और अंत में प्रधान मंत्री की कुर्सी तक वे पहुंचे ।

1991 के कठिन दिनों में जब देश अस्थिर था, राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी, रामजन्मभूमि आंदोलन से सांप्रदायिक वातावरण और मण्डल आयोग की संस्तुतियों के माने जाने के कारण जातिगत संघर्ष का वातावरण बन गया था। एक अनिश्चय, अविश्वास और अस्थिरता का माहौल, अर्थव्यवस्था में बन चुका था। ऐसे वातावरण में, तब पीवी नरसिम्हाराव ने देश की कमान संभाली और मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने ।

तब तक दुनिया एक ध्रुवीय बन चुकी थी। सरकार की नीति मुक्त व्यापार की बनी । देश की खिड़कियाँ और दरवाज़े खोल दिए गए । अचानक समृद्धि आयी । पर जीवन की मूल समस्या और नेताओं का प्रिय वाक्य कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उत्थान , अफ़साना ही बना रहा । फिर भी इंफ्रास्ट्रक्चर में वृद्धि, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में वैश्वीकरण जन्य प्रतियोगिता और निजीकरण से देश मे नौकरियाँ बढ़ी और जीवन स्तर भी लोगों का बदला।

फिर वही डॉ मनमोहन सिंह,  2004 से 2014 तक देश के प्रधान मंत्री बने । 2009 में वे दूसरे कार्यकाल के लिये चुने गए। पर यूपीए 2 के कार्यकाल के अंतिम तीन साल, उनके और सरकार के लिये कठिन बीते । कई घोटालों की शिकायतें हुयी,  और अकर्मण्यता और उनकी अनदेखी करने के आरोप भी उनपर  लगे । अंततः 2014 में इनके नेतृत्व में कांग्रेस को अत्यंत शर्मनाक हार झेलनी पडी ।

उस पत्रकार से बात करते हुए जब एक सवाल उनसे यह पूछा गया कि
" आप अपने कार्यकाल का आकलन कैसे करना चाहेंगे ? "
डॉ सिंह थोड़ी देर चुप रहे । क्या कहते । हार को पचाने में वक़्त लगता है । वह कोई जनाधार वाले लोकप्रिय नेता तो थे नहीं । उनका ज्ञान और उनकी प्रतिभा ही उनकी पूंजी है। उन्होंने फिर स्वभावतः धीरे से एक वाक्य कहा,
" इतिहास मेरा मूल्यांकन करते समय मेरे प्रति दयालु रहेगा । वह इतना निर्मम नहीं रहेगा जितना कि, आज मीडिया और विपक्ष है । "

मनमोहन सिंह एक खलनायक थे उस समय । जनज्वार भी अज़ीब होता है । उमड़ता है तो सारे अच्छे कामों को भी बहा ले जाता है । उसे दो ही श्रेणी दिखाई देती है । या तो देव या दानव । इंसान की कल्पना वह कर ही नहीं पाता । यह उन्माद की मोहावस्था होती है । जो परिपक्व नेता होते हैं वे इन परिस्थितियों को जानते हैं और वे इसकी काट भी रखते हैं । पर डॉ सिंह कोई पेशेवर नेता तो थे नहीं । उनका अपना कोई जनाधार भी नहीं था । बिरादरी , धर्म , जाति के समीकरणों में वे कभी पड़े ही नहीं । नौकरशाही का जो एक सतत आज्ञा पालक भाव होता है , वह उनमें बना रहा । यह उनकी कमज़ोरी भी आप कह सकते हैं और उनकी ताक़त भी ।

अब जब लग्भग साढ़े 8 साल से अधिक, नरेन्द्र मोदी की सरकार बने हो गया है, अर्थव्यवस्था को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सारी सरकारी संपदा को बेचकर जीवन यापन करने के कठिन दिन आ गए हैं। अर्थव्यवस्था में सुधार की गुंजाइश भी नही दिख रही है। हर तरफ महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक अनिश्चितता तथा नैराश्य के बादल उमड़े आ रहे हैं। आखिर, 2014 वाले अच्छे दिन के शोर कम हुये और मुगालता टूटा तथा गर्द ओ गुबार थमा तो फिर जिस तस्वीर पर घूल जम चुकी थी, उसे फिर साफ़ किया जाने लगा । डॉ मनमोहन सिंह बेहतर लगने लगे । लोग उन्हें सुनने लगे। वे अब भी तेज नहीं बोलते हैं, पर जो भी बोलते हैं सटीक और तथ्यपूर्ण बोलते हैं। अर्थव्यवस्था पर अक्सर आने वाले, उनके बयान से आप यह परिवर्तन महसूस कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन समसामयिक काल में नहीं किया जा सकता है । मूल्यांकन सदैव सापेक्ष होता है । उनके दस साल सदैव कसौटी पर परखे जाते रहेंगे , कभी तो उनके पक्ष में या उनके विरोध में । इतिहास किसी को नहीं छोड़ता है।  आज उन्ही डॉ मनमोहन सिंह का जन्म दिन है । वे स्वस्थ और सानंद रहें । यही शुभकामनाएं है।

( विजय शंकर सिंह )

Sunday, 25 September 2022

सच्चिदानंद सिंह / आइंस्टीन के शब्दों में सापेक्षता - रिलेटिविटी (7)


16. हमारे अनुभव और स्पेशल रिलेटिविटी थ्योरी ~
इलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म को समझने के लिए मैक्सवेल-लॉरेंज़ ने जिस इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिद्धांत को विकसित किया उन्ही से स्पेशल थ्योरी का उद्भव हुआ है. जो भी तथ्य या अनुभव इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिद्धांत को प्रमाणित करते हैं, वे सभी स्पेशल थ्योरी को भी प्रमाणित करते हैं. 

स्पेशल थ्योरी से हम सुदूर तारों से पृथ्वी पर आ रहे प्रकाश के विषय में बस सैद्धांतिक गणनाओं से कुछ पूर्वानुमान कर पाए थे जो बाद में प्रकाश की स्पेक्ट्रल लाइन्स में मिले. इसके अलावा मैक्सवेल-लॉरेंज़ के सिद्धांत को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रयोगों से, दो हमारे उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्हें मैक्सवेल-लॉरेंज सिद्धांत से समझने के लिए एक और मान्यता (अज़म्पशन) की जरूरत पड़ती है लेकिन स्पेशल थ्योरी से उन्हें समझने के लिए वैसी किसी मान्यता की जरूरत नहीं पड़ती.
 
कुछ रेडिओधर्मी पदार्थों से एक विशेष विकिरण निकलता है जिसे बीटा किरणें कहा जाता है. ये बीटा किरणें इलेक्ट्रॉन के प्रवाह हैं जिन पर ऋणात्मक विद्युत् 'चार्ज' रहता है. इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान (मास) बहुत कम होता है और उनकी गति बहुत तेज. इन इलेक्ट्रॉन की गति के लिए कोई नियम नहीं बन पा रहे थे जब लॉरेंज़ ने एक परिकल्पना का सहारा लिया. उन्होंने 'माना' कि प्रवाह में बहते दो इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी पहले जो दूरी उनके बीच थी उसका sqrt (1-v^2/c^2 ) रह जाती है. इसे मानने का कोई कारण नहीं था सिवा इसके कि इसे मानने पर बीटा किरणों में बहते एल्क्ट्रॉन की गति को समझने के लिए एक नियम मिल सका. यदि उन इलेक्ट्रॉन की गति को स्पेशल थ्योरी से समझने की कोशिश की जाए तो वही नियम मिल जाता है, बिना इस परिकल्पना के. 

दूसरा प्रयोग माइकेल्सन-मॉर्ले प्रयोग के नाम से विख्यात है. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में किये गए इस प्रयोग से यह जाँचने की कोशिश की गयी थी कि वास्तव में कोई 'ईथर' है या नहीं, जिसकी उपस्थिति उन दिनों प्रकाश की लहरों के चल सकने के लिए आवश्यक मानी जा रही थी. प्रयोग ने तो प्रमाणित किया की ईथर नहीं है लेकिन इस प्रयोग के नतीजे और अपेक्षित नतीजों में कुछ फर्क थे जिन्हे आइंस्टीन ने स्पेशल थ्योरी से स्पष्ट किया. 

नोट: आइंस्टीन की मृत्यु 1955 में हुई थी, 1962 में स्पेशल थ्योरी द्वारा प्रतिपादित समय का धीमा हो जाना प्रकृति में पाए जाने वाले एक बहुत छोटे कण म्युओंस की गणना के एक प्रयोग से सम्पुष्ट हुए थे. म्युओंस हमारे वातावरण की सबसे बाहरी सतह पर बनते हैं जहाँ कॉस्मिक किरणें हवा से पहली बार मिलतीं हैं. म्युओंस अस्थायी कण हैं, स्वतः नष्ट हो जाते हैं और उनकी "हाफ़-लाइफ़" 1.5 माइक्रोसेकण्ड (एक माइक्रोसेकंड = 1/1000,000 सेकण्ड) है. यानी यदि कहीं 1000  म्युओंस हों तो 1.5 माइक्रोसेकण्ड बाद बस 500 बचेंगे, उसके 1.5 माइक्रोसेकण्ड बाद 250 और तदनुसार. म्युओंस के द्रव्यमान (मास) बहुत कम होते हैं और उनकी गति बहुत तेज: 0.994 c  (c प्रकाश की गति है).
 
वैज्ञानिकों ने पाया कि 6000 फ़ीट ऊँची एक जगह, माउंट वाशिंगटन, पर घंटे में 570 म्युओंस गिरते हैं.   म्युओंस की गति 0.994 c है यानी 1 माइक्रोसेकण्ड में ये करीब 1000 फ़ीट चलते हैं. 1.5 माइक्रोसैकेण्ड में वे 1500 फ़ीट चलेंगे, यानी 1500 फ़ीट नीचे आने तक उनकी संख्या आधी हो जाएगी. यदि 6000 फ़ीट पर 570  म्युओंस प्रति घंटे गिर रहे थे तब 4500 फ़ीट पर 285  प्रति घंटे, 3000 फ़ीट पर 142  प्रति घंटे, 1500 फ़ीट पर 71 प्रति घंटे और सागर तल पर 35 प्रति घंटे गिरते मिलेंगे. 

लेकिन सागर तल पर नापने से देखा गया कि वहाँ करीब 400 म्युओंस प्रति घंटे गिर रहे थे. इसका कारण है कि उतनी तेजी से चल रहे म्युओंस के रिफरेन्स फ्रेम में बहुत कम समय बीता था. हमारे फ्रेम से हम देख रहे हैं म्युओंस को 6000 फ़ीट नीचे आने में 6 माइक्रो सेकंड लगेंगे. लेकिन उनके फ्रेम में t ' =  t *sqrt (1 -v^2 /c^2 ) = 6*sqrt (1 -0.994^2) माइक्रो सेकंड = 6*0.1094  = 0.66 माइक्रो सेकंड.       

जितनी देर में हमारे लिए 6 माइक्रोसेकन्ड बीते उतनी देर में म्युओंस के रिफरेन्स फ्रेम में बस 0.66 माइक्रोसेकण्ड बीते. इसी लिए म्युओंस की संख्या 570 से घट कर 35 नहीं बल्कि 400 रही.
(क्रमशः)

सच्चिदानंद सिंह
Sachidanand Singh 

आइंस्टीन के शब्दों में सापेक्षता - रिलेटिविटी (6) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/09/6.html