Monday, 23 November 2020

महिलाओं के प्रति अनुदार ही नहीं, हिंसक भी है समाज / विजय शंकर सिंह

देश और राज्यो की अपराध की स्थिति का अगर अध्ययन किया जाय तो सबसे चिंताजनक और भयावह आंकड़े, महिलाओं के प्रति अपराध या घरेलू हिंसा के मिलते हैं। महिलाओं के प्रति, सामान्य छेड़छाड़, आपराधिक मनोभाव से पीछा करना जैसे सामान्य अपराधों से लेकर, बलात्कार, गैंगरेप और फिर बेहद बर्बरतापूर्ण तरह से हत्या कर देने वाली घटनाओं में लगातार वृध्दि हो रही है। यह समस्या, किसी एक प्रदेश या समाज की नहीं है बल्कि यह देशभर में तेजी से बढ़ रही है। घरों के अंदर होने वाली हिंसा की घटनाएं, जो अक्सर कम ही रिपोर्ट होती हैं, वे भी इसमे जोड़ लें तो स्थिति और भी भयावह है। शायद ही किसी दिन के अखबार का कोई मुखपृष्ठ ऐसी दिल दहला देने वाली खबरों से वंचित दिखे। सरकार और समाज ऐसी घटनाओं पर चिंतित भी है, वीमेन हेल्पलाइन, महिला परामर्श केंद्र, ऑपरेशन शक्ति जैसे आकर्षक नाम वाली योजनाओं के बाद भी ऐसी घटनाओं में कमी नही आ रही है, बल्कि इनकी बर्बरता बढ़ती जा रही है। कानून सख्त भी होते जा रहे हैं, लोग इन सबके प्रति सजग भी हैं, अदालतो ने भी अपना रवैय्या सख्त कर दिया है, फिर भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं और सरकार तथा पुलिस जन आक्रोश के निशाने पर आए दिन आ जा रही है । 

अब कुछ आंकड़ो पर नज़र डालते हैं। एनसीआरबी, राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ो के अनुसार, 2019 में 2018 की तुलना में 7.3% की वृध्दि हुयी है। 2018 में देश मे दर्ज कुल अपराधों की संख्या, 3,78,236 थी जबकि 2019 में यह संख्या 7.3% बढ़ कर 4,05,167 हो गयी है। 2020 अभी चल रहा है। इनमे से अधिकतर मुक़दमे, विवाहित महिलाओं के पति या उनके अन्य परिजनों द्वारा उनके घरों में हुयी हिंसक घटनाओं के संदर्भ में दर्ज हुए हैं। ऐसी घटनाओं का प्रतिशत 30.9 है। महिलाओं से छेड़छाड़ से जुड़ी हिंसक घटनाओं का प्रतिशत 21.8, महिलाओं के अपहरण की घटनाओं का प्रतिशत 17.9,और बलात्कार की घटनाओं का प्रतिशत 7.9 है। प्रति एक लाख महिला आबादी पर, 2018 में अपराध का आंकड़ा, 58.8 रहा, जबकि 2019 में इस शीर्ष में अपराध की बढ़ोतरी से यह प्रतिशत बढ़ कर 62.4 हो गया। 

यदि मुकदमो की संख्या के आधार पर राज्यों का मूल्यांकन करे तो उत्तरप्रदेश महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के दर्ज मुकदमो में पहले स्थान पर हैं। हालांकि जनसंख्या के अनुपात में भी, उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश में महिलाओं के प्रति अपराधों की कुल दर्ज संख्या 59,853 है, जो देश मे कुल दर्ज महिलाओं के विरुद्ध अपराध का 14.7% है। इसके बाद, 41,550 दर्ज मुकदमो और 10.2% के साथ राजस्थान दूसरे स्थान पर और महाराष्ट्र, 37,144 दर्ज मुक़दमो और 9.2 % के साथ तीसरे स्थान पर है। प्रति एक लाख की जनसंख्या पर दर्ज 177.8 मुकदमो के साथ, महिलाओं के प्रति हिंसा के मामलो में असम सबसे ऊपर है। उसके बाद, 110.4 और 108.5 प्रति एक लाख महिला आबादी पर, राजस्थान और हरियाणा आते हैं। इस प्रकार दर्ज अपराधों की संख्या में भले ही उत्तर प्रदेश अग्रणी हो, पर प्रति एक लाख महिला आबादी पर अपराध के आंकड़ो में सबसे अधिक महिलाओं के प्रति हिंसा में असम सबसे आगे है और तब राजस्थान और हरियाणा क्रमशः दूसरे और तीसरे नंबर पर है। 

अब अगर बलात्कार से जुड़े अपराध के आंकड़ो को देखें तो, राजस्थान में सबसे अधिक, 5,997 मुक़दमे दर्ज हैं। इसके बाद, उत्तर प्रदेश, 3,065 और मध्य प्रदेश में 2,485 दर्ज मुक़दमो के साथ क्रमशः दूसरे और तीसरे नम्बर पर हैं। अगर इन्हें प्रति एक लाख महिला आबादी में बदल दें तो, राजस्थान 15.9 के साथ पहले स्थान पर और 11.1 के साथ केरल दूसरे और 10.9 अंक के साथ हरियाणा तीसरे स्थान पर आता है। 

नाबालिग बच्चे और लड़कियों के प्रति दर्ज अपराध जो पास्को कानून में दर्ज होते हैं, में 2019 में, देश भर में सबसे अधिक, कुल 7,444 मुक़दमे उतर प्रदेश में दर्ज हुए हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र में, कुल 6,402 और तीसरे नंबर पर, मध्य प्रदेश आता है, जहां कुल  6,053 मुक़दमे दर्ज हुए हैं। लेकिन, प्रति एक लाख की महिला आबादी पर, 27.1 अपराध के साथ सिक्किम, पहले स्थान पर, 15.1 के साथ एमपी दूसरे स्थान तथा तीसरे स्थान पर 14.6 अंक के साथ हरियाणा आता है। 

दहेज से जुड़ी हत्याओ के दर्ज मुकदमो मे यूपी में, कुल 2,410 मुक़दमे दर्ज हुए हैं, जो देश मे सर्वाधिक है। प्रति एक लाख महिला आबादी पर यह आंकड़ा 2.2 पर आता है। दहेज हत्या के मामलो में, 1,120 मुक़दमे बिहार के हैं। 2019 में कुल 150 एसिड हमले की घटनाएं देश भर में हुयी हैं, जिनमें से 42 उत्तर प्रदेश में और 36 पश्चिम बंगाल की हैं। 

अपराध के यह आंकड़े, एनसीआरबी की 1500 पृष्ठों की रिपोर्ट जो तीन खंडों में प्रकाशित है से लिये गए हैं। दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की सबसे अधिक 554 घटनाएं, राजस्थान में, 537, उत्तर प्रदेश और 510 मध्य प्रदेश में दर्ज हुयी हैं। लेकिन प्रति लाख महिला आबादी पर दलित महिलाओं से बलात्कार की दर केरल में सर्वाधिक है जो, 4.6 है। फिर एमपी और राजस्थान दोनो ही 4.5 अंक पर टिकते हैं। 

उपरोक्त आंकड़ो से यह ज्ञात होता है कि महिलाओं के प्रति हमारा समाज न केवल अनुदार है बल्कि हिंसक भी है। पूरे देश मे महिलाओं के प्रति हिंसा के अपराध कमोबेश जारी है। दिल्ली में जब निर्भया कांड हुआ था, तब पूरे देश मे गैंगरेप के खिलाफ एक व्यापक जनाक्रोश फैल गया था और अभियुक्तों को फांसी देने की मांग हुयी। कानून बदलने की और शीघ्र ट्रॉयल के लिये फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट गठन की भी मांग हुयी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस जनाक्रोश को भांपा और इस जघन्यतम अपराध के ट्रायल में शीघ्र सुनवाई के लिये कई निर्देश और सरकार को नोटिस जारी की। निर्भया बलात्कार कांड की गम्भीर घटना के बाद केंद्र सरकार ने भी एक 3 सदस्यीय कमेटी का गठन किया जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीजेआई, जस्टिस जेएस वर्मा और अन्य सदस्यों में हाई कोर्ट की सेवानिवृत जज जस्टिस लीला सेठ और देश के पूर्व सोलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम भी शामिल थे। जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी का गठन यौन अपराधों से संबंधित आपराधिक कानूनों में जरूरी संशोधन के लिये सुझाव  देने के लिए किया गया था। कमेटी को रेप, यौन उत्पीड़न, मानव तस्करी, बच्चों के यौन उत्पीड़न की घटनायें, पीड़ितों का मेडिकल परीक्षण के अतिरिक्त पुलिस और शिक्षा से संबंधित सुधार प्रक्रिया से संबंधित कानूनों पर सिफारिशें सुझाने का काम सौंपा गया था। इस कमेटी ने 23 जनवरी 2013 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। 

लम्बे समय तक, इस कमेटी की संस्तुतियां सरकार के पास लंबित रही। इन्हें लागू करने के लिये सुप्रीम कोर्ट में पुनः एक याचिका दायर की गयी तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा था। बाद में यह संस्तुतियां सरकार ने स्वीकार कर लीं। समिति ने कहा है कि 
● यौन उत्पीड़न की परिभाषा का दायरा बढ़ाते हुए किसी भी ‘अवांछित व्यवहार’ को शिकायतकर्त्ता की व्यक्तिपरक धारणा से देखा जाना चाहिये।
● यदि एक नियोक्ता यौन उत्पीड़न को प्रोत्साहन देता है, ऐसे माहौल की अनुमति देता है जहाँ यौन दुर्व्यवहार व्यापक और व्यवस्थित हो जाता है, जहाँ नियोक्ता यौन उत्पीड़न पर कंपनी की नीति का खुलासा करने और जिस तरीके से कर्मचारी शिकायत दर्ज कर सकते हैं, उस में विफल रहता है, साथ ही ट्रिब्यूनल को शिकायत अग्रेषित करने में विफल रहता है तो इसके लिये नियोक्ता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। 
● कंपनी शिकायतकर्त्ता को मुआवजे का भुगतान करने के लिये भी उत्तरदायी होगी।
● महिलाओं को आगे आने और शिकायत दर्ज करने हेतु प्रोत्साहित करने के लिये कई सुझाव भी दिये थे। मिसाल के तौर पर, समिति ने झूठी शिकायतों के लिये महिलाओं को दंडित करने का विरोध किया और इसे ‘कानून के उद्देश्य को खत्म करने से प्रेरित एक अपमानजनक प्रावधान’ कहा।
● शिकायत दर्ज करने के लिये तीन महीने की समय सीमा को समाप्त किया जाना चाहिये और शिकायतकर्त्ता को उसकी सहमति के बिना स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिये।

महिला अधिकारों के लिए देश में पिछले सालों से समाज मे जागरूकता आयी है विशेषकर निर्भया कांड के समय पूरा देश एकजुट था, जैसे लगता था कि जनता की सहनशक्ति अब चुक गयी है। दिल्ली में आंदोलन के दौरान एक नन्ही बालिका के हाथों में तख्ती पर लिखा एक कैप्शन, ‘नजर तेरी गंदी और परदा मैं करूं' बेहद लोकप्रिय हुआ था। निर्भया के कातिलों को तमाम कानूनी पेचदगियो के बाद भी फांसी हो ही गयी। पर गैंगरेप की घटनाओं में कमी नहीं आयी। हैदराबाद गैंगरेप और हाथरस गैंगरेप जैसी अनेक घटनाएं हुयी और उनपर पुलिस ने कार्यवाही भी की। हैदराबाद के अभियुक्त तो पुलिस मुठभेड़ में मार डाले गए। हाथरस घटना की जांच सीबीआई कर रही है। 

महिलाओं के आत्मनिर्भर होने के जो आंकड़े उपलब्ध हैं, के अनुसार,  देश में करीब 2.70 करोड़ महिलाएं कमाती हैं और अपने दम पर परिवार चलाती हैं। जहां तक देश में महिलाओं की सुरक्षा का सवाल है, कानून तो पर्याप्त हैं, लेकिन उन्हें दरकिनार कर अपराध होते रहते हैं। 2009 में सीबीआई के अनुमान के मुताबिक 30 लाख लड़कियों की तस्करी की गई, जिनमें से 90 फीसदी देह-व्यापार में धकेल दी गईं। नेशनल क्राइम ब्यूरो का कहना है कि 1971 से 2012 के बीच दुष्कर्म के मामलों में 880 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। गत तीन वर्षों में कन्या भ्रूण हत्या के 1.2 करोड़ मामले दर्ज हुए हैं, यहां तक कि ग्रामीण इलाकों की 56 फीसदी महिलाएं सुरक्षा कारणों से स्कूल-कॉलेज नहीं जातीं। हर साल 9 हजार महिलाएं दहेज हत्या की शिकार हो जाती हैं। दुनियाभर में नारी को समानता का अधिकार तो है,  लेकिन विडंबना यही है कि उसे बचपन से लेकर बुढ़ापे तक जुल्मों का शिकार बनाया जाता है। इन जुल्मों से निपटने के लिये कानून तो है ही, लेकिन समाज जब पूरी तरह जागरूक नहीं होगा तब तक यह ज़ुल्मत छंटने वाली नहीं है। साक्षर, स्वावलंबी और आत्म-निर्भर होने पर ही महिलाओं से जुड़े अपराध कम होंगे।

देश में स्त्री-पुरुष अनुपात का फासला भी कम होनेे की बजाय बढ़ रहा है। अनुमान है कि देश में हर साल 50 लाख बालिकाएं जन्म ही नहीं ले पातीं। गौ-हत्या के प्रति शास्त्रों का उद्धरण देने वाला हमारा समाज बालिका शिशु और कन्या भ्रूण की हत्या पर खामोशी ओढ़ लेता है ? पंजाब हरियाणा जैसे राज्यों में ही नहीं चंडीगढ़ दिल्ली जैसे आधुनिक महानगरों में भी स्त्री-पुरुष अनुपात का फासला बढ़ रहा है। इंंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार देश में हर वर्ष 50 लाख कन्या भ्रूणों का गर्भपात होता है। भ्रूण परीक्षण संबंधी पीएनडीटी, अधिनियम 1994 में लागू तो है, लेकिन उसका बहुत असर नहीं पड़ा है। महाराष्ट्र में एक स्वयंसेवी संस्था के सर्वेक्षण में यह बात सामने आई थी कि भ्रूण परीक्षण के बाद जो 8 हजार गर्भपात कराए गए थे, उनमें 7999 बालिकाएं थीं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर 15 सेकंड में एक महिला मारपीट या किसी प्रकार के अत्याचार का शिकार होती है। हर साल करीब 7 लाख महिलाएं दुष्कर्म की पीड़ा झेलती है। रिपोर्ट का दुखद पहलू यह है कि 40 प्रतिशत भारतीय महिलाएं पति की प्रताड़ना की शिकार बनती हैं। यह आंकड़ा तो तब है जब घरेलू हिंसा यौन शोषण के 50 प्रकरणों में से एक की ही शिकायत पुलिस तक पहुंच पाती है।

आज हम एक सामान्य संसार मे नही जी रहे हैं। पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में है। इसका असर हमारे उद्योग धंधों और आर्थिकी पर तो पड़ ही रहा है, पर इसका लोगों पर  मनोवैज्ञानिक असर बहुत पड़ रहा है। अर्थव्यवस्था की मंदी, और जिम्मेदारियो के निर्वाह में होने वाली बाधाओं के साथ लगातार घरों में कैद रहने की बाध्यता ने लोगों को अवसाद की ओर भी धकेलना शुरू कर दिया है। इसका असर महिलाओं के प्रति हिंसा और घरेलू हिंसा पर भी पड़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के क्षेत्रीय निदेशक हैंस क्लूज ने कहा है कि,   
" अप्रैल 2020 में घरों में रहने वाली महिलाओं को उनके पतियों द्वारा प्रताड़ित किये जाने वाले मामलों में 60 % तक की वृध्दि हुयी है।" 
यह वैश्विक आंकड़ा है। इसका कारण मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, घरों में निरंतर बंद रहने की बाध्यता तो है ही, साथ ही महामारी के प्रकोप की अनिश्चितता भी है। झुंझलाहट, चिड़चिड़ापन, और बात बात पर घरेलू विवादों के उठने से भी ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। 

आम तौर पर घर, सबसे सुरक्षित स्थान समझा जाता है, पर महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा चाहे वह घरेलू हिंसा हो या सड़क पर होने वाले अपराध, सबकी जड़ में अगर गम्भीरता से छानबीन की जाय तो, घर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मिलती है। कोरोना काल हो या सामान्य काल, समाज मे व्याप्त लैंगिग भेदभाव, स्त्री शिक्षा की कमी, पितृसत्तात्मक समाज का दंभ, लड़को या पुरुषों को तरजीह देने की मानसिकता, मर्दवाद की ग्रँथि, आदि तरह तरह के कारणों से समाज का जो माइंडसेट बन गया है, के कारण, यौन हिंसा या महिलाओं के प्रति हिंसा या घरेलू हिंसा की शुरुआत होती है। इस अपराध की एक बड़ी विडम्बना यह है कि पीड़ित ही पहली नज़र में दोषी या अभियुक्त भाव से देखी जाने लगती है। और उसकी न सिर्फ लानत मलामत होती है, बल्कि उसी से समाज, पुलिस और तंत्र यही उम्मीद करता है कि वह खुद को सुरक्षित रखने के बारे में अधिक सोचे या चिंतातुर रहे। यहां अभियुक्त अगर दोषसिद्ध भी हो जाय तो भी समाज के मन मे विकसित हो चुकी ग्रन्थि यही सोचने को बाध्य करती है कि,  लड़के ने तो जो किया सो किया, पर लड़की को तो सोचना चाहिए था। 

महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था का सर्वे कहता है कि भारत महिलाओं के लिए चौथे नंबर का सबसे खतरनाक देश है। भारतीय दंड संहिता, आईटी एक्ट, स्त्री का अशिष्ट रूपण (रोकथाम) अधिनियम 1986 तथा घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 में सुरक्षा के तमाम प्रावधान है, लेकिन बढ़ती समस्याओं के आगे वे भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। इस स्थिति में तब फर्क आएगा जब सोच में बदलेगी। कुछ धर्म गुरु, खाप पंचायतें और कट्‌टरपंथी संगठन भी अपनी उलजुलूल बंदिशोें, फतवों, बेतुके फैसलों से महिलाओं की असुरक्षा में इजाफा कर देते हैं। 

जब तक मनुष्य और मानव समाज है, तब तक अपराध का अस्तित्व रहेगा। अपराध का उन्मूलन न तो सम्भव है और न यह होने जा रहा है। अपराध नियंत्रित किया जा सकता है, अपराधियो को पकड़ कर उन्हें सजा दिलाई जा सकती है, पर अपराध को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता है। यह एक तल्ख हक़ीक़त है। कोई भी अपराध केवल, पुलिस या न्याय तंत्र के बल पर रोका भी नहीं जा सकता है। पुलिस कितनी भी आदर्श और सक्षम हो, पर जब तक समाज की मानसिकता में महिलाओं के प्रति सोच, लैंगिग भेदभाव, औऱ पुरुष सत्ता के श्रेष्ठतावाद का लेशमात्र भी शेष रहेगा, तब तक ऐसे अपराध होते रहेंगे। घरों से जन्मने वाले इस अपराध को रोकने की कवायद भी घरों से ही शुरू करनी होगीं। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी एक यह भी है कि मनुष्य उस व्यवस्था में एक उपभोक्ता या जिंस हो जाता है। हर चीज क्रय - विक्रय, क्रेता - विक्रेता, के पैमाने से देखी जाने लगती है। हम हैं मताए कुचा वो बाजार की तरह, उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। यह मनोवृत्ति, और स्त्री शासित होने के लिये ही है, का यह भाव ही इस प्रकार के अपराध के मूल मेंसेरिया को जन्म देता है। समाज की घृणा, आक्रोश, क्रोध, लोभ, मोह, वासना, हर्ष, विषाद, आदि सारे मनोभावों का नजला झेलती रहती है यह स्त्री। 

जो मानसिकता समाज की बन गयी है, कमोबेश वही सोच पुलिस की भी बन चुकी है। आखिर पुलिस आती भी तो इसी समाज से है। एक बार मेरे कार्यकाल में बलात्कार की एक घटना के बारे में जब थाने से उसका विस्तृत विवरण मेरे द्वारा पूछा गया तो, पहला ही उत्तर यह मिला कि, सर, लड़की बदचलन थी। अब अगर लड़की जो भी हो तो, क्या उसके साथ हुआ बलात्कार, अपराध की गुरुता को कम कर देगा ? बिलकुल नही । लेकिन लैंगिक भेदभाव की जड़े इतनी गहरी पैठी हैं कि यह वाक्य कहने वाले अफसर को लेशमात्र भी यह ध्यान नहीं रहा होगा कि वह कह क्या रहा है। निर्भया कांड ने निश्चित रूप से महिलाओं के अधिकारों के लिए एक नई सोच का सूत्रपात किया है। कानून और दंड प्रक्रिया संहिता में हुए सकारात्मक बदलाव से महिला अधिकारों को नए आयाम मिले हैं। एक सवाल महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनििधत्व का भी है। जब नारी, पुरुष के समान स्वतंत्रता अनुभव करेगी तब स्थितियां बेहतर होगी। 

( विजय शंकर सिंह ) 


Sunday, 22 November 2020

शब्दवेध (23) भण

अब इस वितंडावाद से मुक्त हो कर हम भाषा और इसके पर्यायों पर विचार कर सकते हैे।  जरूरी नहीं कि सभी का सीधा संंबंध मुख से निकलने वाली किसी न किसी ध्वनि से  हो, या जिस रूप में हम इन्हें संस्कृत ग्रंथों और धातुओं में पाते है वैसा रहा हो। इसकी संभावना अधिक है कि वह बोलियों में उपलब्ध सजात शब्द जैसा रहा हो  यद्यपि बोलियों में भी सीमित प्रयोग के कारण उनकी  प्रतिष्ठा इतना गिर गई हो कि वह उपयोगी से अधिक हास्यास्पद प्रतीत हो। शब्दों की सामाजिक हैसियत पर यहाँ चर्चा संभव नहीं, पर इतना याद रखा जा सकता है कि हम जहाँ, उसका अर्थ जानते हैं, यह भी पाते हैं कि किसी विशेष भाव को प्रकट करने के लिए वह अधिक सटीक  है फिर भी हम कुछ अधिक ‘संभ्रांत’ पर्याय की तलाश करते हैं।
  
मुझे यह समझ में नहीं आता कि भण् ध्वनि काे वाग्यंत्र के किसी अस्पष्ट या स्पष्ट उच्चारण के अनुरूप माना जा सकता था।  किसी पात्र के या खोखले भंगुर वस्तु के गिर कर टूटने से यह ध्वनि अवश्य पैदा हो सकती थी पर मनुष्य की वाणी के लिए - भणन,  भणित, भणिति - का प्रयोग, या अर्थोत्कर्ष, चकित करता है। 

किसी नाद का भण् को रूप में श्रवण और उच्चारण पूरबी बोलियों में संभव न था।  ‘ण’ ध्वनि का उनमें अभाव है।  कौरवी और बाँगड़ू में भी इसका उच्चारण संभव न था क्योंकि सघोष महाप्राण  ध्वनि, भ’ का उनमें अभाव था। (हम संस्कृत के ऐसे सभी शब्दों काे जिनमें  सघोष महाप्राण ध्वनियाँ  पाई जाती हैं,  उन्हें पूरबी  से आया हुआ  और शब्द भंडार में अपेक्षाकृत पुराना मान सकते हैं।   यद्यपि भण्  रूप लंबे समय तक कौरवी क्षेत्र में  पहुंचने वाले  पूर्वी  जमातों  के  कौरवी ध्वनि माला से अवगत  और  कौरवी के  पूर्वी ध्वनिमाला का अभ्यस्त हो जाने के बाद ही संभव था, परंतु उसके बाद भी  सघोष महाप्राण  ध्वनियों से बचने की  जो प्रवृत्ति है (पू. घना > गहन;  घन् > हन्) उसे देखते हुए  यह मानना होगा यह शब्द  पूर्वी से कौरवी में पूरबी से आया  और इसका  प्राचीन रूप भन् था , जो भनक, भान, (भानमती का अर्थ क्या डींग हाँकने वाली था?) भनभनाइल,  भन्नाइल, भन्नाहट, आदि में आज भी बचा रह गया है।  

भनभनाइल, भन्नाइल का समीकरण  मक्खियों और मच्छरों की  गूंज से होने के कारण इसमें अर्थह्रास आ गया,   इसलिए  मनुष्य की बड़बड़ाहट के लिए  भुनभुनाइल,  और मक्खियों के लिए  भिनभिन्नाइल रूप को वरीयता मिलने लगी। 

जो भी हो  भण के कौरवी में प्रचलन के बाद भी, यह उसकी प्रकृति के अनुरूप नहीं था, इसलिए  इस क्षेत्र में यह अधिक शब्दों का  जनक नहीं बन सका परंतु  इसका जिस रूप में अनुकूलन हुआ  उससे भण् > बण > वण में बदला और दोनों में अभेद हो गया।  इसे ही  हम ‘वण् भण खंडने’ सूत्र में  धातु के रूप में स्वीकृत पाते हैं।  इसी  नियम से  भणिति - वाणी बन गई और इसमें एक नया अर्थ यांत्रिक  भण् की ध्वनि के कारण जुड़ गया जो  भान,  भनक,  आदि में नहीं था,   जिनका प्रयोग उसमें  वाणी के लिए होता था।  

दूसरे शब्दों में कहें तो  भणिति  या वाणी का  मुख से उच्चरित ध्वनियों से सीधा संबंध नहीं था,  पर  इनके  पूर्वरूप -भन् का था। एक यांत्रिक  ध्वनि के योग और समायोजन इन दोनों के आशय - कथन और विच्छेदन वाणी में समाहित हो गए। कहें, भन् की भूमिका में पहले (पूरबी में) इसका अर्थ  व्यक्त करना ही रहा लगता है, परन्तु अब उसमें विखंडन और भीतरी मर्म को बारीकी से समझना जुड़ जाता है।  विवेचन स्वतः हथियार बन जाता है। वण् में अलगाने, वितरण करने के आशय के कारण, आयात वस्तुओं के समाज में वितरित करने वाले वणिक कहे जाने लगते हैं, उनका पेशा - वाणिज्य कहा जाने लगता है।  परन्तु भण् से वण् बनने के बीच बण रूप से बाण बनता है जिसका काम आघात पहुँचाना है।  कौरवी क्षेत्र की र-कार प्रियता के फलस्वरूप यदि वण् में रकार के आगम से वर्ण बनता है जिससे वर्णन बनता है तो बाण के आघात की दिशा में व्रण - घाव बनता है।  अब अक्षर के लिए प्रयुक्त  वर्ण का शाब्दिक अर्थ होना चाहिए, वाचिक ध्वनियों का विश्लिष्ट या अलग- अलग किया रूप।

(पर हम जो लिखते हैं उसे स्थापना की जगह ऊहापोह (musing) मान कर पढ़ना हमारे लिए भी हितकर है और आप के लिए भी। दावे के साथ कुछ कहने की स्थिति में हम इस पड़ताल के बाद ही आ सकेंगे।)

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (22) एक कदम आगे दो कदम पीछे

भाषाविज्ञान का विकास जिस यांत्रिक रूप में हुआ उसमें  भाषा की उत्पत्ति के विषय में  छान बीन  बहुत की गई,   परंतु मूलभूत  सिद्धांतों  का ध्यान नहीं रखा गया।  यह तब और विचित्र लगता है जब हम पाते हैं कि येस्पर्सन  (Otto Jesperson) जैसी विभूतियाँ इस दिशा में प्रयत्नशील थीं। उन्होंने स्वयं अपने द्वारा  उठाई गई आपत्तियों में भी सतहीपन से काम लिया।  

भाषा की उत्पत्ति की समस्या प्रखर होकर  19वीं शताब्दी में तब सामने आए जब यह माना जाने लगा  समस्त विश्व  आधुनिक संचार और यातायात  के साधनों के माध्यम से  एक दूसरे से इतना जुड़ चुका है कि विश्व में  एक सर्वस्वीकार्य  भाषा का प्रयोग करें तो एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था कायम की जा सकती है।   इसमें बाधक था  विविध  यूरोपीय  देशों का अपना अहंकार और स्वार्थ।  किसी दूसरे की भाषा को कोई अपने लिए स्वीकार्य नहीं  मानता था।  ऐसी स्थिति में कुछ विज्ञानियों के दिमाग में  यह ख्याल आया कि यदि  एक कृत्रिम भाषा ऐसी तैयार की जाए जिसमें वर्तमान भाषाओं की  व्याकरण और उच्चारण संबंधी  दुरूहताएं न हों, शब्द भंडार  अधिकतम यूरोपीय भाषाओं के अनुरूप हो तो उसे संपर्क भाषा के रूप में सभी स्वीकार कर लेंगे और भविष्य में स्थापित होने वाली विश्व संस्था  की भाषा  वही होगी।  

इस भाषा को गढ़ने के लिए उन्होंने इस समस्या पर बहुत गंभीरता से विचार करना आरंभ किया कि भाषा की उत्पत्ति हुई कैसे, जिससे वह उन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए नई भाषा तैयार कर सकें।  भाषा का आरंभ कैसे हुआ इसके लिए शिशुओं की भाषा सीखने पर जितना ध्यान दिया गया, वह  पर्याप्त नहीं था।  यह मानते हुए कि आदिम समाज की भाषा  आरंभिक अवस्था के अधिक निकट है इसलिए  वह उत्पत्ति को समझने में  सहायक हो सकती है, परंतु  इसे  यथेष्ट  नहीं पाया गया ।   प्राकृतिक ध्वनियों  की नकल से भाषा की  उत्पत्ति को समझने का प्रयास भी  इसी क्रम में किया गया।  

यह तो सर्वविदित है कि  बहुत सारे शब्द जीव जंतुओं की आवाज की नकल हैं।  परंतु यहां समस्या यह थी कि सभी भाषाओं में  उन्हीं ध्वनियों की नकल  अलग अलग की  गई है।  दूसरे इस नियम को  हम कुछ ही शब्दों पर लागू  पाते हैं।  वह शब्दावली भी  केवल  संज्ञा  तक सीमित है।  भाषा   का जटिल  ढांचा  जिसमें  संज्ञा के साथ  क्रिया, सर्वनाम,  विशेषण,   क्रिया विशेषण,  प्रत्यय,  उपसर्ग,   रुपावली,  सभी का विकास  शामिल है,  उसकी व्याख्या प्राकृतिक ध्वनियों के  माध्यम से संभव नहीं है।   और सबसे बड़ी आपत्ति  यह थी कि यदि भाषा का  उद्भव  प्राकृतिक ध्वनियों की नकल से हुई होती तो पूरे मानव समाज एक भाषा होनी चाहिए थी।  दुनिया में इतनी भाषाएँ उस दशा में नहीं सकती थी।

इसलिए में से किसी की भूमिका को पूरी तरह नकारना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने सोचा भाषा की उत्पत्ति और विकास में  इन सभी की कुछ न कुछ भूमिका थी  और इसलिए है सभी यूरोपीय भाषाओं से कुछ न कुछ लेते हुए उन्होंने जिस  भाषा को  कर तैयार किया  वह मेरी जानकारी में,  यूरो-केंद्रित  होती हुई भी,  दुनिया  की   सबसे सरल,  सबसे नियमित,   सबसे समृद्ध  भाषा तैयार की  जिसका नाम है एस्पैरांतो।[1]

[1] उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में ‘यूनिवर्सल लैंग्वेज तैयार करने पर अनेक विद्वान सक्रिय थे जिन्होंने उन्हें अलग अलग नाम दे रखे थे (डॉ. निकोलस- स्पोकिल Spokil ; स्पित्जर - पार्ला; बोलैक - ला लैंगू व्लूए la langue bleue),  यामेनोव (Zamenhof) की एस्पेरांतो इन्हीं में से एक थी। इनमें से कोई दूसरे की गढ़ी भाषा को भाव देने को तैयार न था। (येस्पर्सन,   सेलेक्टेड राइटिंग्स, एलेन ऐंड अनविन, 744-45)
  
इसमें ऐसे ही शब्दों को जो यूरोप के अधिकांश भाषाओं में प्रयोग में आते थे लातिन की सहायता से कुछ बदलते हुए स्वीकार कर लिया गया।  ऐन आन्सर - रेस्पोंडो,  आर्मी - आर्मेदो, आर्ट- आर्तो,  ऐरेस्ट - ऐरेस्तो, बैक- दोर्सो, बिफोर - ऐंताऊ, बिलो - सब,  कार्ड- कार्तो, फ्लड- इनुंदो,  नेटिव - इंडिजेनो, द नेचर - ला नैचुरा इत्यादि। नए शब्द गढ़ते समय लातिन से निकटता का ध्यान रखा गया था - नेटिव कंट्री - पैत्रोलांदो। उच्चारण सभी ध्वनियों का स्पष्ट, खूल कर किया जाता था। इसमें वक्ता या लेखक अपनी जरूरत के अनुसार नई व्यंजनाओं के लिए आसानी से शब्द गढ़ सकता था। इन सभी  विशेषताओं के बाद भी  इसे  विश्व राष्ट्र संघ से एक भाषा के रूप में स्वीकार किए जाने और  कुछ देशों ,  जैसे शाहकालीन ईरान से राजकीय प्रोत्साहन मिलने के बाद और  सर्वमान्य संपर्कभाषा की आवश्यकता अनुभव करते हुए भी, यह भाषा उपेक्षित ही रह गई ।

यह भाषा चल नहीं पाई। कारण क्या है।  एक कारण तो यही कि  व्यापारिक और राजनीतिक धाक बनाए रखने के लिए  संपर्क भाषा के रूप में भी इसे कोई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। परंतु इसके अतिरिक्त भाषा की उत्पत्ति और  बनावट संबंध में  भाषाविज्ञानियों की  समझ भी गलत थी और वे अपने असाधारण श्रम के बाद भी जल्दबाजी में काम कर रहे थे।  किसी पहलू की गहराई से छानबीन नहीं कर रहे थे इसलिए भाषा की प्रकृति को समझने में उनसे चूक हुई थी।   (आज कंप्यूटर ने  किसी भी भाषा को  किसी भी भाषा  में   कामचलाने लायक अनुवाद  प्रस्तुत करके इस समस्या का एक नया हल निकाल लिया है जिसमें  सब कुछ बचा रह गया है और इसके बाद भी सभी से संपर्क संभव है।)

मनुष्य  के काम करने के नियम अलग होते हैं।  वह  सांचों में ढाल कर   एक जैसी वस्तुएं बना सकता है,  अधिक सुथरी चीजें बना सकता है,  परंतु एक भी नई चीज उत्पन्न नहीं कर सकता।   -प्रकृति  असंख्य चीजें उत्पन्न कर सकती है और कोई दो चीज-  एक ही पेड़ की दो पत्तियां तक एक जैसी नहीं हो सकती,  फिर भी उसकी हर  रचना का  एक आंतरिक नियम होता है जिससे वह परिचालित होती है।   मनुष्य निर्मित किसी वस्तु में  आंतरिक विकास की क्षमता नहीं होती इसलिए उसे बनाया जा सकता है,  उपयोग किया जा सकता है,   परंतु वह स्वयं  किसी चीज को उत्पादित नहीं कर सकता,   अपने जैसे को भी नहीं। 
   
भाषा विज्ञानियों ने  आषा की उत्पत्ति के विषय में  एक सार्वभौमिक नियम को समझा होता और उसी पर काम करते रहते तो और कुछ करते या नहीं भाषा की उत्पत्ति और भाषाओं के अंतर्संबंध की बहुत मार्मिक व्याख्या कर सकते थे और उस व्याख्या से उन सभी विसंगतियों का निराकरण हो गया होता  जो सतही समझ के कारण दिखाई दे रही थी।

भाषा का यह सिद्धांत है  कि हम जैसा सुनते हैं वैसा ही बोलते हैं।   जो सुन नहीं सकते,  वह बोल नहीं सकते।   गूंगा बच्चा बहरा होता है।   बहरा होने के कारण  वह  उस नाद जगत से भी  अप्रभावित रह जाता है जिसे सुनकर एक शिशु अपनी ओर से वैसा ही  बोलने के प्रयत्न मे अपने एकांत में  तरह-तरह की ध्वनियाँ निकालता है जिसे हम शिशु संगीत कह सकते हैं।  इसी क्रम में उसके सुनने की क्षमता में भी विकास होता है और बोलने की क्षमता भी पैदा होती है।   जिसे जेनरेटिव ग्रामर ने  एक रहस्यवाद में  बदल दिया,  मनुष्य में निसर्ग जात  भाषिक क्षमता की कल्पना कर ली, वह  एकांत में परिवेश ही संगीत का यही अनुकरण है जिसके सध जाने पर कुछ ही सालों के भीतर एक शिशु का अपनी भाषा पर बहुत अच्छा अधिकार हो जाता है।

यदि उन्होंने  आदिम  भाषाओं में  अनुकारी शब्दों  और व्यंजनाओं के बारे में गहराई से सोचा होता  तो पता चल जाता  कि विकसित भाषाओं की तुलना में  आदिम भाषाएं अधिक समृद्ध क्यों है,  और इसी गति से यदि हम पीछे चलें  तो  उनकी पूरी भाषा की बनावट समझ में आ जाती,  अनुकारी शब्दों की संख्या क्रमशः बढ़ते हुए  समग्र भाषा अनुकारी ध्वनियों का संजाल बन जाती।
 गूँगों की सीमाओं को  जानते हुए भी  उन्होंने उससे सही शिक्षा ग्रहण नहीं की।

भाषाओं की  प्राथमिक निजी संपदा  बहुत सीमित थी,  और सबकी  प्राकृतिक परिवेश के कारण, अथवा प्रयत्न की भिन्नता के कारण अथवा जावट के  अतर के कारण,  सभी में   भिन्नताएँ थीं  और जहां ऐसी भिन्नता न हो वहां भी एक ही प्राकृतिक नाद का  कई रूपों में उच्चारण  किया जाता है और किया जाता रहा।   भाषा के विकास में सबसे प्रधान भूमिका वायु  और जल की है  ताप और शीत का है। ऐसे ही दूसरे अनेक कारण हैं जिनमें से सभी का न तो हम ध्यान रख सकते हैं नहीं हमें ज्ञान है,  परंतु  सभी की व्याख्या इसी एक नियम से हो जाती है।   भाषा के सभी घटकों की  उत्पत्ति  प्राकृतिक नाद के अनुनादन से संभव है  और  भारोपीय भाषा के संदर्भ में इसका विवेचन हम अपने आगे की चर्चा में करते रहेंगे।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

किसान आंदोलनों की परंपरा और संक्षिप्त इतिहास / विजय शंकर सिंह

26 नवम्बर को किसानों का दिल्ली कूच कार्यक्रम है। वे वहां पहुंच पाते हैं या नही यह तो अभी नही बताया जा सकेगा, लेकिन तीन नए कृषि कानूनो के असर देश की कृषि व्यवस्था पर पड़ने लगे है। धान की खरीद पर इसका असर साफ दिख रहा है। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है और इस प्रकार किसानों का जो शोषण हो रहा है इसके लिये कोई समाधान निकालने के बजाय सरकार खुद ही इस शोषण का एक उपकरण बन गयी है। न सिर्फ किसान अपने उत्पाद के उचित मूल्य से वंचित हैं, बल्कि उनके उत्पाद की जमाखोरी से बिचौलिए भरपूर लाभ कमा रहे हैं और इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है। सरकार ने इन्ही कृषि कानूनो के अंतर्गत आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म कर दिया है जो जमाखोरी के खिलाफ सरकार को एक मजबूत कानूनी प्राविधान देता था। लेकिन अब कोई ऐसा प्रभावी कानून नहीं रहा। इसका असर महंगाई पर पड़ रहा है। 

इन कृषिकानून के कारण, एक तो किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना बंद हो गया और दूसरे बाजार पर आधारित कृषि विपणन व्यवस्था पर  बाजार के दलालों और बिचौलियों का वर्चस्व हो गया। न्यूनतम समर्थन मूल्य अब केवल फ़र्ज़ अदायगी बन कर रह गया है और सरकारी मंडियां अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खोती जा रही है। इन्ही सब कारणों से देश भर के किसान आंदोलित हैं और वे नए कृषि कानूनो के खिलाफ हैं। सरकार एमएसपी की बात तो करती है पर जब यह कहा जाता है कि एमएसपी से कम कीमत पर कृषि उपज की खरीद को कानूनन दंडनीय अपराध बना दिया जाय तो, सरकार एक खामोशी ओढ़ लेती है। सरकार का पूरा दृष्टिकोण और रवैया न केवल किसान विरोधी है, बल्कि वह खुल कर पूंजीपतियों के पक्ष में है। इसी से किसान आंदोलित हैं और वे एक निर्णायक आंदोलन की ओर बढ़ रहे हैं। 

यह देश का पहला किसान आंदोलन नही है और न ही अंतिम है। देश के इतिहास में किसान आंदोलनों का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। प्रायः यह समझा जाता है कि भारतीय समाज और इतिहास में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल में किसानों की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही है, और किसान इन बदलाव की आंधी से अलग रहे हैं,  लेकिन यह धारणा, किसान आंदोलनों के इतिहास को देखते हुए सही नहीं है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में आदिवासियों, जनजातियों और किसानों के आंदोलनों का अहम योगदान रहा है और व्यापक जन जागरण में उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। स्वतंत्रता से पहले हुए बड़े किसान आंदोलन, गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे लेकिन उन आंदोलनों ने ब्रिटिश साम्राज्य को भी अपनी किसान विरोधी नीतियों को बदलने के लिये बाध्य कर दिया था। 

ऐसे आंदोलनों में चंपारण का निलहे गोरों के खिलाफ किया गया किसान आंदोलन सबसे महत्वपूर्ण है। दक्षिण अफ्रीका से आते ही महात्मा गांधी ने चंपारण के राज कुमार शुक्ल नामक एक किसान के द्वारा जब बिहार के एक बेहद पिछड़े इलाके चंपारण में किसानों की व्यथा सुनी तो वे वहां गए। वही गांधी जी की पहली गिरफ्तारी होती है और वही भारत मे ब्रिटिश हुक़ूमत ने गांधी जी की दृढ़ता और विनम्रता की पहली झलक भी देखी। हालांकि गांधी, साम्राज्य के लिये अनजान नहीं थे। दक्षिण अफ्रीका में उनके आंदोलनों से अंग्रेजी सरकार भलीभांति परिचित हो चुकी थी। चंपारण में भी गांधी का आंदोलन सफल रहा। यह आंदोलन भी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ किसानों का आंदोलन था। पर पूरी तरह से गांधी जी की अहिंसा और असहयोग पर आधारित था। चंपारण को भविष्य में होने वाले स्वाधीनता संग्राम की एक प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जा सकता है।

देश में नील पैदा करने वाले किसानों द्वारा पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली के प्रमुख आंदोलन हुए थे, पर किसानों के आंदोलन या उनके विद्रोह की संगठित शुरुआत सन् 1859 से हुई थी। चूंकि अंग्रेजों की मुनाफाखोरी पर आधारित नीतियों से किसान सबसे अधिक प्रभावित और पीड़ित हुए, इसलिए आजादी के पहले भी इन नीतियों के कारण, किसान आक्रोश औऱ आंदोलनों का सूत्रपात हुआ। 
 
सन् 1857 का विप्लव असफल रहा। इसके अनेक कारण हैं। लेकिन इस विप्लव ने अंग्रेजों और भारतीयों को भी कुछ सीखें दी। अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज खत्म कर भारत को सीधे क्राउन के अंतर्गत ले लिया और देश लगभग 600 देसी रियासतों को छोड़ कर,  सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में चला गया। रियासतें भी अपने स्थानीय प्रशासन को छोड़ कर वायसराय के आधीन ही थी। उक्त असफल विप्लव के बाद सरकार की नीतियों के विरोध का नेतृत्व समय समय पर, किसानों ने ही संभाला, क्योंकि अंग्रेजों और देशी रियासतों के सबसे बड़े आंदोलन, किसानों के शोषण के नतीजे थे। सच तो यह है कि, स्वाधीनता के पूर्व, जितने भी 'किसान आंदोलन' हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध थे। तत्कालीन समाचार पत्रों, जिंसमे वर्नाक्यूलर प्रेस अधिक महत्वपूर्ण हैं, ने भी किसानों के शोषण, उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों की ज्यादतियों,  पक्षपातपूर्ण व्यवहार और किसानों के संघर्ष को प्रमुखता से प्रकाशित किया। 

आंदोलनकारी किसान चाहे तेलंगाना के हों या नक्सलवाड़ी के हिंसक लड़ाके, सभी ने छापामार आंदोलन को आगे बढ़ाने में अहम योगदा‍न दिया था। सन् 1857 के विप्लव को अंग्रेजों ने कुछ देशी रियासतों की मदद और कुछ उनके अनियोजित होने के कारण, दबा तो दिया था, लेकिन देश में कई स्‍थानों पर आज़ादी के इस संग्राम की ज्वाला लोगों के दिलों में धधकती रही। इसी बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आंदोलन होने शुरू हो गए । इन आंदोलनों में, नील की खेती करने वाले किसानों का विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह, मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आंदोलन के रूप में इतिहास में दर्ज हैं। 

हालांकि किसानों का सबसे प्रभावी और व्यापक आंदोलन नील पैदा करने वाले किसानों का चंपारण आंदोलन था जो भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के खिलाफ बंगाल में सन् 1859-1860 में किया गया। अपनी आर्थिक मांगों के संदर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आंदोलन उस समय का एक विशाल आंदोलन था। अंग्रेज अधिकारी बंगाल तथा बिहार के जमींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिए ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे तथा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली-सी रकम अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाजार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को 'ददनी प्रथा' कहा जाता था। 

दीन बंधु मित्र द्वारा 1860 में लिखा गया बांग्ला का प्रसिद्ध नाटक, नील दर्पण, निलहे किसानों की व्यथा का एक जीवंत  उल्लेख है। नील दर्पण' एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नाट्यकृति है, जो अपने समय का एक सशक्त दस्तावेज भी है। 1860 में जब यह प्रकाशित हुआ था तब बंगाली समाज और शासक दोनों में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। जेम्स लॉग ने नील दर्पण का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया तो अँग्रेज सरकार ने उन्हें एक माह की जेल की सजा सुना दी। यह उन अंग्रेजों का कुकृत्य था जो खुद को दुनियाभर के संसदीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी का सिरमौर मानते हैं। शोषक, शोषक ही रहता है और सत्ता का मूल स्वरूप शोषक का ही रहता है। अंग्रेज भी उस पनप रहे पूंजीवादी व्यवस्था में अलग नही थे। 

पहला महत्वपूर्ण आंदोलन बंगाल के पबना का किसान आंदोलन था। 1873-76 में बंगाल के पबना नामक जगह में भी किसानों ने जमींदारी शोषणों के विरुद्ध विद्रोह किया था। पबना राजशाही राज की जमींदारी के अन्दर था और यह वर्धमान राज के बाद सबसे बड़ी जमींदारी थी। उस जमींदारी के संस्थापक राजा कामदेव राय थे। पबना विद्रोह जितना अधिक जमींदारों के खिलाफ था उतना सूदखोरों और महाजनों के विरुद्ध नहीं था। 1870-80 के दशक के पूर्वी बंगाल (अभी का बांग्लादेश) के किसानों ने जमींदारों द्वारा बढ़ाए गए मनमाने करों के विरोध में यह विद्रोह किया था। पबना में 1859 में कई किसानों को भूमि पर स्वामित्व का अधिकार दिया गया था। किसानों को मिले इस अधिकार के अंतर्गत किसानों को उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था। लगान की वृद्धि पर भी रोक लगाई गई थी। कुल मिलाकर किसानों के लिए पबना में एक सकारात्मक माहौल था. पर कालांतर में जमींदारों का दबदबा पबना में बढ़ने लगा। जमींदार मनमाने ढंग से लगान बढ़ाने लगे. अन्य तरीकों से भी जमींदारों द्वारा किसानों को प्रताड़ित किया जाने लगा। 

अंततः 1873 ई. में पबना के किसानों ने जमींदारों के शोषण के विरुद्ध एक संघ बनाया और किसानों की सभाएँ आयोजित की । कुछ किसानों ने अपने परगनों को जमींदारी नियंत्रण से मुक्त घोषित कर दिया और स्थानीय सरकार बनाने की चेष्टा भी की। उन्होंने एक सेना भी बनायी जिससे कि जमींदारों का सामना किया जा सके। जमींदारों से न्यायिक रूप से लड़ने के लिए धन चंदे के रूप में भी किसानों द्वारा जमा किया गया। किसानों ने लगान देना भी कुछ समय के लिए बंद कर दिया। यह आन्दोलन धीरे-धीरे सुदूर क्षेत्रों में भी, जैसे ढाका, मैमनसिंह, त्रिपुरा, राजशाही, फरीदपुर, राजशाही फैलने लगा। 

पबना विद्रोह एक शांत प्रकृति का आन्दोलन था। किसान शांतिपूर्ण तरीके से अपने हितों की सुरक्षा की माँग कर रहे थे. उनका आन्दोलन सरकार के विरुद्ध भी नहीं था इसलिए पबना आन्दोलन को अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का समर्थन प्राप्त हुआ। 1873 ई. बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर कैंपवेल ने किसान संगठनों को उचित ठहराया. पर बंगाल के जमींदारों ने इस आन्दोलन को साम्प्रदायिक रंग देना चाहा। एक अखबार हिंदू पेट्रियट ने लिखा कि यह आन्दोलन मुसलमान किसानों द्वारा हिन्दू जमींदारों के विरुद्ध शुरू किया गया गई है। पर कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस आन्दोलन को साम्प्रदायिक रंग देना इसलिए गलत है क्योंकि पबना विद्रोह में हिन्दू और मुसलमान दोनों वर्ग के किसान शामिल थे। आन्दोलन के नेता भी दोनों समुदाय के लोग थे, जैसे ईशान चन्द्र राय, शम्भु पाल और खुदी मल्लाह।  इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप 1885 का बंगाल काश्तकारी कानून पारित हुआ जिसमें किसानों को कुछ राहत पहुँचाने की व्यवस्था की गई। 

उल्लेखनीय है कि किसान चेतना, एक दो स्थानों तक ही सीमित नहीं रही, वरन देश के विभिन्न भागों में इसका व्यापक प्रसार हुआ। यह चेतना दक्षिण में भी फैलने लगी, क्योंकि महाराष्ट्र के पूना एवं अहमदनगर जिलों में गुजराती एवं मारवाड़ी साहूकार सारे हथकंडे अपनाकर किसानों का शोषण कर रहे थे। दिसंबर सन् 1874 में एक सूदखोर कालूराम ने किसान (बाबा साहिब देशमुख) के खिलाफ अदालत से घर की नीलामी की डिक्री प्राप्त कर ली। इस पर किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया। इन साहूकारों के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत सन् 1874 में शिरूर तालुका के करडाह गांव से हुई।
 
होमरूल लीग के कार्यकताओं के प्रयास तथा मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणामस्वरूप फरवरी, सन् 1918 में उत्तर प्रदेश में 'किसान सभा' का गठन किया गया। यह उत्तर प्रदेश या तत्कालीन यूनाइटेड प्रविन्सेस का पहला किसान संगठन कहा जाता है। सन् 1919 के अं‍तिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आ गया। उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने 'एका आंदोलन' नामक एक प्रभावी आंदोलन भी चलाया था। अवध किसान आंदोलन के नायकों में मदारी पासी निराले और हाशिये के समाज के विरले नायक थे। गरीब किसानों की बेदखली, लगान और अनेक गैर कानूनी करों से मुक्ति के लिए उन्होंने संगठित और विद्रोही आंदोलन चलाया था। जब दक्षिणी अवध प्रांत का उग्र किसान आंदोलन सरकार और जमींदारों के क्रूर दमन के कारण 1921 के मध्य में दबा दिया गया था तथा असहयोग आंदोलनकारियों द्वारा निगल लिया गया था, ठीक उसी समय, मदारी पासी का ‘एका आंदोलन’ हरदोई जिले के उत्तरी और अवध के पश्चिमी जिलों में 1921 के अंत में और 1922 के प्रारम्भ में प्रकाश में आया।
 
मोपला लोग केरल के मालाबार क्षेत्र में रहने वाले इस्लाम धर्म में धर्मांतरित अरबी एवं मलयाली मुसलमान थे।अधिकांश मोपला छोटे किसान या व्यापारी थे, जो अपनी गरीबी और अशिक्षा के कारण थंगल कहे जाने वाले काजियों और मौलवियों के प्रभाव में थे। मोपला किसान मालाबार के हिन्दू नम्बूदरी एवं नायर उच्च जाति , भूस्वामियों के बटाईदार या आसामी काश्तकार थे। नम्बूदरी और नायर जैसे उच्च जाति के भूस्वामियों को शासन, पुलिस और न्यायालय से संरक्षण प्राप्त था। मोपला या मोपला विद्रोह इसलिए सांप्रदायिक हो गया क्योंकि अधिकांश जमींदार या भूस्वामी हिन्दू थे और काश्तकार अधिकांश मुसलमान थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्नीसवीं सदी का मोपला विद्रोह ग्रामीण विद्रोह का विशिष्ट उदाहरण है,जिसकी जड़ें स्पष्टत: कृषि व्यवस्था में थीं। यह मोपला विद्रोह का प्रथम चरण था। 1920 - 21 में द्वितीय मोपला विद्रोह हुआ जिसके कारणों में भी कृषिजन्य असंतोष था, लेकिन कालांतर में असहयोग आंदोलन स्थगित किए जाने पर इस आंदोलन ने साम्प्रदायिक, राजनैतिक स्वरूप धारण कर लिया। 1921 में केरल के मालाबार जिले के काश्तकारों ने जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। 15 फरवरी 1921 को सरकार ने इस क्षेत्र में निषेधाज्ञा घोषित कर खिलाफत तथा कांग्रेस के नेता यू गोपाल मेनन, पी मोइनुद्दीन कोया, याकूब हसन तथा के माधवन नायर को गिरफ्तार कर लिया। मोपला विद्रोह की उग्रता को देखते हुए सरकार ने सैनिक शासन की घोषणा कर दी और परिणामस्वरूप मोपला विद्रोह को कुचल दिया गया।

इसी प्रकार पंजाब में 1871 - 72 में 
कूका लोगों (नामधारी सिखों) द्वारा एक सशस्त्र विद्रोह किया गया था। कूका लोगों ने पूरे पंजाब को बाईस जिलों में बाँटकर अपनी समानान्तर सरकार बना ली थी। कूका वीरों की संख्या सात लाख से ऊपर थी लेकिन अधूरी तैयारी में ही विद्रोह भड़क उठा और इसी कारण वह दबा भी दिया गया। सिखों के नामधारी संप्रदाय के लोग कूका भी कहलाते हैं। इस पन्थ का आरम्भ 1840 ईस्वी में हुआ था। इसे प्रारम्भ करने का श्रेय सेन साहब अर्थात भगत जवाहर मल को जाता है। कूका विद्रोह के दौरान 66 नामधारी सिख शहीद हो गए थे। नामधारी सिखों की कुर्बानियों को भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में 'कूका लहर' के नाम से अंकित किया गया है। कृषि संबंधी समस्याओं के खिलाफ अंग्रेज़ सरकार से लड़ने के लिए बनाए गए इस संगठन के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। सन् 1872 में इनके शिष्य बाबा रामसिंह ने अंग्रेजों का कड़ाई से सामना किया। कालान्तर में उन्हें कैद कर रंगून (अब यांगून) भेज दिया गया, जहां पर सन् 1885 में उनकी मृत्यु हो गई।
 
इसी प्रकार वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रामोसी किसानों ने जमींदारों के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया। इसी तरह आंध्रप्रदेश में सीताराम राजू के नेतृत्व में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध यह विद्रोह हुआ, जो सन् 1879 से लेकर सन् 1920-22 तक छिटपुट ढंग से चलता रहा। 
 
बिहार में एक अन्य किसान आंदोलन भी हुआ था, जिसे ताना भगत आंदोलन के नाम से जानते हैं। इस आन्दोलन की शुरुआत सन् 1914 में हुई थी। यह आन्दोलन लगान की ऊंची दर तथा चौकीदारी कर के विरुद्ध किया गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक 'जतरा भगत' थे। 'मुण्डा आन्दोलन' की समाप्ति के करीब 13 वर्ष बाद 'ताना भगत आन्दोलन' शुरू हुआ। यह ऐसा धार्मिक आन्दोलन था, जिसके राजनीतिक लक्ष्य थे। यह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नए 'पंथ' के निर्माण का आन्दोलन था। इस मायने में यह बिरसा मुण्डा आन्दोलन का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा मुण्डा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धारित किए थे।
 
किसान आन्दोलनों के इतिहास में सन् 1946 का बंगाल का तेभागा आन्दोलन सर्वाधिक सशक्त आन्दोलन था, जिसमें किसानों ने 'फ्लाइड कमीशन' की सिफारिश के अनुरूप लगान की दर घटाकर एक तिहाई करने के लिए संघर्ष शुरू किया था। बंगाल का 'तेभागा आंदोलन' फसल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीड़ित बटाईदार किसानों को दिलाने के लिए किया गया था। यह बंगाल के 28 में से 15 जिलों  में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। 'किसान सभा' के आह्वान पर लड़े गए इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मजदूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
 
आंध्रप्रदेश का तेलंगाना आन्दोलन जमींदारों एवं साहूकारों के शोषण की नीति के खिलाफ सन् 1946 में शुरू किया गया था। सन् 1858 के बाद हुए किसान आन्दोलनों का चरित्र पूर्व के आन्दोलन से अलग था। अब किसान बगैर किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे। इनकी अधिकांश मांगें आर्थिक होती थीं। किसान आन्दोलन ने राजनीतिक शक्ति के अभाव में ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया। किसानों की लड़ाई के पीछे उद्देश्य व्यवस्था-परिवर्तन नहीं था, लेकिन इन आन्दोलनों की असफलता के पीछे किसी ठोस विचारधारा, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों का अभाव था।
 
एक अनोखा आंदोलन, बिजोलिया किसान आंदोलन का भी उल्लेख मिलता है। यह 'किसान आन्दोलन' भारतभर में प्रसिद्ध रहा जो मशहूर क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में चला था। बिजोलिया किसान आन्दोलन सन् 1847 से प्रारंभ होकर करीब अर्द्ध शताब्दी तक चलता रहा। किसानों ने जिस प्रकार निरंकुश नौकरशाही एवं स्वेच्छाचारी सामंतों का संगठित होकर मुकाबला किया, वह इतिहास बन गया।  
 
आंदोलनों के साथ साथ किसान संगठन भी अस्तित्व में आये। सन् 1923 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 'बिहार किसान सभा' का गठन किया। सन् 1928 में :आंध्र प्रान्तीय रैय्यत सभा' की स्थापना एनजी रंगा ने की। उड़ीसा में मालती चौधरी ने 'उत्‍कल प्रान्तीय किसान सभा' की स्थापना की। बंगाल में 'टेंनेंसी एक्ट' को लेकर सन् 1929 में 'कृषक प्रजा पार्टी' की स्थापना हुई। अप्रैल, 1935 में संयुक्त प्रांत में किसान संघ की स्थापना हुई। इसी वर्ष एनजी रंगा एवं अन्य किसान नेताओं ने सभी प्रान्तीय किसान सभाओं को मिलाकर एक 'अखिल भारतीय किसान संगठन' बनाने की योजना बनाई। चंपारण का मामला बहुत पुराना था। चम्पारण के किसानों से अंग्रेज बागान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था, जिसके अंतर्गत किसानों को जमीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे 'तिनकठिया पद्धति' कहते थे। 19वीं शताब्दी के अंत में रासायनिक रंगों की खोज और उनके प्रचलन से नील के बाजार समाप्त हो गए। 
 
चंपारण के बाद गांधीजी ने सन् 1918 में खेड़ा किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया। खेड़ा गुजरात में स्थित है। खेड़ा में गांधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक 'किसान सत्याग्रह' की शुरुआत की। खेड़ा के कुनबी-पाटीदार किसानों ने सरकार से लगान में राहत की मांग की, लेकिन उन्‍हें कोई रियायत नहीं मिली। गांधीजी ने 22 मार्च, 1918 को खेड़ा आन्दोलन की बागडोर संभाली। अन्य सहयोगियों में सरदार वल्लभभाई पटेल और इन्दुलाल याज्ञनिक थे। सूरत, (गुजरात) के बारदोली तालुका में सन् 1928 में किसानों द्वारा 'लगान' न अदायगी का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में केवल 'कुनबी-पाटीदार' जातियों के भू-स्वामी किसानों ने ही नहीं, बल्कि सभी जनजाति के लोगों ने हिस्सा लिया। इसी आंदोलन के बाद गांधी जी के बल्लभभाई पटेल को सरदार कह कर सम्बोधित किया और सरदार, सच मे स्वाधीनता संग्राम के सरदार ही सिद्ध हुए। 

( विजय शंकर सिंह )

 

विचारविमर्श - संघ के हिंदुत्व और हिन्दूधर्म में अंतर

आरएसएस सरसंघकार्यवाह मोहन भागवत ने हिन्दूधर्म पर अपनी दावेदारी फिर से पेश की है। उनका मानना है हिन्दूधर्म की मान्य परंपराओं का वाहक है आरएसएसएस। सच्चाई इसके एकदम विपरीत है। मोहन भागवत कुछ सामान्यीकरणों का इस्तेमाल करते हैं और उनका जिक्र करके यह सिद्ध करते हैं कि वे हिन्दूधर्म के ध्वजवाहक हैं। इस प्रसंग में पहली बात यह कि हिंदूधर्म कोई राजनीतिक धर्म नहीं है। जबकि आरएसएस एक राजनीतिक-सांस्कृतिक संगठन है। वे जिस हिंदूधर्म को मानते हैं वह राजनीतिक है, उनका लक्ष्य है हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना, जबकि हिंदूधर्म के मानने वाले दार्शनिकों — लेखकों का लक्ष्य कभी भी हिन्दू राष्ट्र बनाना नहीं रहा। हिन्दूधर्म में धार्मिक, साहित्यिक और दार्शनिक कृतियों को धार्मिक बनाने या उनको राज्य के प्रचार का उपकरण बनाकर इस्तेमाल नहीं किया गया, मसलन्, श्रीमद्भगवतगीता को ही लें, यह सबसे पुरानी किताब है लेकिन राज्य के प्रचार का उपकरण नहीं रही, योग सबसे पुराने हैं लेकिन योगासन को कभी भी किसी हिन्दू राजा ने समाज और शिक्षा में अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया। सूर्य नमस्कार एक विधि है लेकिन कभी अनिवार्य नहीं थी, जबकि आरएसएस के जन्म के पहले अनेक यशस्वी हिन्दू राजा हुए, लेकिन उन्होंने धर्म, धार्मिक - दार्शनिक किताबों, जीवनशैली या व्यायाम के रूपों को समाज पर थोपने की कोशिश नहीं की, धर्म उनके लिए उपकरण नहीं था बल्कि जीवन को समझने और जीने का साधन था। आरएसएस के लिए धर्म, राजनीतिक उपकरण और वैचारिक अस्त्र है।

हिन्दूधर्म ने कभी राजनीति और राजसत्ता से अपने को नहीं जोड़ा, किसी राजा ने हिंदूधर्म के अनुसार राज्य संचालन नहीं किया, यहाँ तक कि आम जनता की जीवनशैली के बारे में भी मनुस्मृति तक का कभी इस्तेमाल नहीं किया।इसके विपरीत आरएसएस के लोग सत्ता से जुड़े हैं, राजनीति में खुलकर भाग लेते हैं, राजसत्ता का जमकर उपयोग करते हैं, जबकि हिन्दूधर्म में यह परंपरा नहीं है।परंपरागत हिन्दूधर्म सत्ता और राजनीतिरहित धर्म है। इस अर्थ में वह धर्मनिरपेक्षता के ज्यादा करीब है।

हिन्दूधर्म में धार्मिक, साहित्यिक और दार्शनिक कृतियों को धार्मिक बनाने या उनको राज्य के प्रचार का उपकरण बनाकर इस्तेमाल नहीं किया गया, मसलन्, श्रीमद्भगवतगीता को ही लें, यह सबसे पुरानी किताब है लेकिन राज्य के प्रचार का उपकरण नहीं रही, योग सबसे पुराने हैं लेकिन योगासन को कभी भी किसी हिन्दू राजा ने समाज और शिक्षा में अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया।
आरएसएस का मानना है हिन्दूधर्म में वैविध्य है तो उनके यहाँ भी वैविध्य है।वे हिन्दूधर्म की बहुलता और वैविध्य की संगति में अपने संगठन के विचारों को पेश करते हैं। इस प्रसंग में पहली बात यह कि संघ का बहुलता और वैविध्य का दावा शुद्ध कागजी है, उसका आचरण से कोई संबंध नहीं है। संघ के लोगों और सांगठऩिक ईकाईयों में हिन्दूधर्म के मर्म के कहीं दर्शन नहीं होते। हिन्दूधर्म की विशेषता है उसमें ज्ञान का सम्मान है, हर चीज ज्ञान यानी दार्शनिक स्तर पर विवादों के जरिए हल करने की परंपरा है। ज्ञान की जिन सरणियों को विचारधारा के रूप में विकसित किया गया उनमें अन्य और विरोधी के विचारों के साथ सम्मान और प्रेम के साथ बहस चलाई गयी। अन्य के विचारों के साथ मत-भिन्नता को सामने रखकर संवाद करने की परंपरा रही है, वे कभी अपने विचारों को मनवाने पर जोर नहीं देते, विचारों को तलवार से नहीं जोड़ा, शास्त्र को शस्त्र के साथ नहीं जोड़ा। विचारों को सत्ता के साथ नहीं जोड़ा। असहिष्णुता और घृणा के साथ नहीं जोड़ा। इसके विपरीत आरएसएस तो सीधे अन्य की सत्ता को नहीं मानता, उसके लिए हिन्दुत्व के सामने सभी धर्म दोयमदर्जे के हैं।

हिन्दूधर्म ने इस्लाम की सत्ता मानी उसके खिलाफ कभी घृणा का प्रचार नहीं किया, जैनियों और बौद्धों की सत्ता मानी लेकिन कभी इन धर्मों के खिलाफ घृणा और असहिष्णुता का प्रदर्शन नहीं किया। अनेकबार जैनियों और बौद्धों के साथ संघर्ष हुए लेकिन भारत में कहीं पर भी इनके खिलाफ घृणा का प्रचार नहीं किया। हिंदूधर्म में अनेक मत-मतान्तर हैं जिनके अंदर मूल विचारों और मान्यताओं को लेकर गहरे मतभेद हैं, लेकिन कभी भी अन्य के विचारों के प्रति घृणा का प्रचार नहीं किया गया। बल्कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में उन विद्वानों को ज्यादा सम्मान का दर्जा मिला जो गैर-हिन्दूधर्म के मानने वाले थे, नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों में उन सभी विद्वानों को सम्मान मिला जिन्होंने बुनियादी तौर पर हिन्दूधर्म और उसके दार्शनिक नजरिए की मुखालफत की थी। इसके विपरीत आरएसएस का आचरण देखें, वे जबसे सत्ता में आए हैं तबसे लगातार शिक्षा के क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं, पाठ्यक्रम बदल रहे हैं, गैर-संघी विद्वानों का अपमान कर रहे हैं, हमले कर रहे हैं, उनका विभिन्न तरीकों से उत्पीड़न कर रहे हैं, इस प्रसंग में जेएनयू में शिक्षकों और छात्रों का विभिन्न स्तरों पर हो रहा उत्पीड़न आदर्श उदाहरण है। हिन्दुस्तान में मध्यकाल में भी इस तरह वैचारिक उत्पीडन नहीं हुआ जिस तरह का वैचारिक उत्पीडन जेएनयू में आरएसएस के द्वारा नियुक्त वीसी ने किया है। इससे एकबात सिद्ध होती है कि आरएसएस का हिन्दूधर्म के वारिस होने का दावा खोखला है, क्योंकि आरएसएस तो ज्ञान की सत्ता, महत्ता और स्वायत्तता को नहीं मानता, ज्ञान की श्रेष्ठता, बुद्धिजीवी, लेखकों की स्वतंत्रचेता मेधा और सामाजिक - सांस्कृतिक भूमिका को सीधे खारिज करता है जबकि हिन्दूधर्म के सभी सम्प्रदायों में ज्ञान की सत्ता,महत्ता और स्वायत्तता को सम्मानित किया गया, लेखकों-बुद्धिजीवियों-दार्शनिकों आदि की स्वतंत्रता और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को सम्मान दिया गया, कभी किसी पर हमले नहीं हुए, कभी किसी को दण्डित नहीं किया, कभी किसी की हत्या नहीं की गयी, जबकि देश में विभिन्न धर्मों के मानने वाले राजाओं का शासन रहा है।

हिंदूधर्म में अनेक मत-मतान्तर हैं जिनके अंदर मूल विचारों और मान्यताओं को लेकर गहरे मतभेद हैं, लेकिन कभी भी अन्य के विचारों के प्रति घृणा का प्रचार नहीं किया गया। बल्कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में उन विद्वानों को ज्यादा सम्मान का दर्जा मिला जो गैर-हिन्दूधर्म के मानने वाले थे, नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों में उन सभी विद्वानों को सम्मान मिला जिन्होंने बुनियादी तौर पर हिन्दूधर्म और उसके दार्शनिक नजरिए की मुखालफत की थी।
इसी तरह हिंदू समाज में संत समाज, अखाडों आदि की स्वतंत्र अ-राजनीतिक भूमिका थी लेकिन 1980 के बाद से लगातार संत समाज और अखाड़ों को राजनैतिक प्रेशर ग्रुप के तौर पर आरएसएस ने विकसित किया है, आजस्थिति यह है कि सारे देश में हजारों-लाखों साधुओं को राजनीतिक प्रेशर ग्रुप के तौर पर वे इस्तेमाल कर रहे हैं, जितने परंपरागत संतों के मठ थे,मसलन्, कबीरपंथी-दादूपंथी आदि भक्ति सम्प्रदाय के संतों के मठों पर संघ का राजनीतिक कब्जा है, यहां तक कि आर्य समाज जैसे समाज-सुधार संगठन की अधिकांश शाखाओं पर संघ का कब्जा है, इसने एक नए किस्म के संगठित कट्टरपंथी धर्म की फिजा बनायी है, इसके अलावा पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल,तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश आदि में नव्य-संत समाज पैदा हुआ है, इसमें कुछ जाति विशेष को केन्द्र में रखकर संत काम कर रहे हैं। इस सबसे कुल मिलाकर संत समाज और समाज सुधार संगठनों के लिबरल रूझानों को नष्ट करके उनको आरएसएस के राजनीतिक लक्ष्यों के साथ अप्रत्यक्ष तौर पर जोड़ दिया है। यह नए किस्म का धार्मिक कट्टरपंथी राजनीतिक फिनोमिना है। इसने केजुअल नजरिए से नहीं देखना चाहिए। इससे यह भी पता चलता है कि संत समाज का राजनीतिकरण हुआ है, इसने आम आदमी के साथ धर्मनिरपेक्ष संवाद और धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया को जटिल और पेचीदा बना दिया है। इस समूची प्रक्रिया में धर्म और उसके मत-मतान्तर कहीं बहुत दूर पीछे छूट गए हैं। संत जब राजनैतिक प्रेशर ग्रुप के तौर पर काम करने लगें तो यह सीधे धर्म और राजनीति का घालमेल है, साम्प्रदायिकता है। अफसोस की बात है कि संतों के राजनीति में इसतरह खुलकर भाग लेने के खिलाफ कभी कोई प्रचार अभियान नहीं चलाया गया। हमने कभी सोचा ही नहीं कि धर्म और राजनीति के इस तरह के घालमेल से राजनीतिक तौर पर धार्मिक फंडामेंटलिज्म भी पैदा हो सकता है, विभिन्न किस्म के धर्मनिरपेक्ष संगठनों, व्यक्तियों और बुद्धिजीवियों, यहां तक कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर भी आघात पहुँच सकता है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने विभिन्न संत संगठनों और अखाडों को राज्य सरकार की ओर से 760 करोड़ रूपये की आर्थिक सहायता राशि दी है।संभवतः इतनी बड़ी सारी विगत 70 सालों में भी किसी सरकार ने नहीं दी थी। आश्चर्य की बात है इस तरह की घोषणाओं का राजनीतिक दलों की ओर से कोई प्रतिवाद नजर नहीं आता। इसके अलावा विभिन्न स्रोतों से भी इन संत संगठनों और अखाड़ों को मदद मिलती रहती है। अफसोस की बात है कि इन अखाड़ों और संतों की कोई सामाजिक भूमिका नहीं है। वे परंपरागत कामों के अलावा राममंदिर निर्माण आंदोलन और इसी तरह के दूसरे साम्प्रदायिक या अंधविश्वासों के सवालों पर सक्रिय होते हैं। यह नए किस्म का फिनोमिना है इसका परंपरागत संतई और अखाड़ा संस्कृति से कोई संबंध नहीं है।

मोहन भागवत ने अपने एक भाषण में हिन्दूधर्म की बहुलता का जिक्र किया और इस बात पर जोर दिया कि हिन्दूधर्म में जो बहुलता है वैसी ही बहुलता आरएसएस में भी है। जबकि सच्चाई यह है हिन्दूधर्म में व्याप्त बहुलता का संघी नजरिए से तीन-तेरह का रिश्ता है। आरएसएस हिन्दुत्व के नाम पर इकसार विचारों पर जोर देता है, हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना पर जोर देता है जबकि हिन्दू धर्म के विभिन्न सम्प्रदाय और दार्शनिकों की परिकल्पना में राष्ट्र या देश शामिल ही नहीं है, वे धर्म को देश, भाषा और जाति की सीमाओं में बांधकर नहीं देखते।धर्म अनंत है, वह देश और प्रांत की सीमाओं से बंधा नहीं है। उसमें गहरे वैचारिक अंतर्विरोध हैं, वैचारिक संघर्ष और वाद-विवाद हुए हैं। लेकिन इन सबकी धुरी है संवाद, सहिष्णुता और अहिंसा। वे मतभिन्नता पर जोर देते हैं, लेकिन इसके लिए जबरिया मतैक्य स्थापित करने की कोशिश नहीं करते, एक-दूसरे के खिलाफ घृणा का प्रचार नहीं करते। मसलन्, बौद्ध, जैन, ईसाईयत, इस्लाम आदि के बारे में कभी घृणा का प्रचार नहीं किया गया, किसी समुदाय विशेष के बारे में घृणा का प्रचार नहीं किया गया। यह सच है भारत में वर्णाश्रम व्यवस्था है, जातिप्रथा है, इसके प्रति अधिकांश हिन्दूधर्मों का रवैय्या कठोर नहीं रहा है। जाति के बंधनों को मानते हुए भी अनेक समूहों, मसलन् नाथों, सिद्धों, बौद्धों आदि ने जातिप्रथा पर करारे प्रहार किए, समाज को जातिबंधनों से मुक्त करने के प्रयास किए और उन प्रयासों को सहिष्णुभाव से समाज के एक वर्ग ने स्वीकार भी किया जिसके गर्भ से मिश्रित जातियों का जन्म हुआ,इसने समाज के बंधनों और रूढ़ियों को ढीला बनाने में मदद की, ये सभी धर्म को इकसार बनाने की प्रवृत्ति के खिलाफ हैं।

बहुलता का अर्थ है सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों और सामाजिक समूहों की मतभिन्नता साथ उपासना पद्धति के रूपों में मतभिन्नता। इसने बहुलतावाद का जो रसायन बनाया उसे आरएसएस मानने को तैयार नहीं है, आरएसएस की खूबी है कि वह लगातार विभिन्न मत-मतान्तरों और उनके सम्प्रदाय के संतों को साथ लाकर हिन्दुत्व के लक्ष्य के साथ एकीकृत करने की कोशिश कर रहा है, इसक्रम में वे सबसे पहले उन क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं जहां पर उनके मतभेद नहीं हैं, बाद में वे सांगठऩिक - राजनीतिक तौर पर कब्जा जमाते हैं।

आरएसएस के तहत काम करने वाले सैंकड़ों संगठन हैं, मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि तकरीबन 700 से ज्यादा संगठनों का संघ संचालन करता है। इनमें प्रत्येक संगठन की कहने को अपनी स्वतंत्र संरचना है, गतिविधियां हैं लेकिन सबके अंदर साझा तत्व है ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’। उसके प्रत्येक संगठन में सतह पर अलग-अलग किस्म के कार्यक्रम और लक्ष्य नजर आएंगे लेकिन सभी एक ही दिशा में सक्रिय हैं वह है हिदुत्व की दिशा। हिंदुत्व ही उनकी बुनियाद है जहां से वे अपनी पहचान बनाते हैं, ऊर्जा ग्रहण करते हैं।

आरएसएस के लिए कोई समूह, वर्ग, समुदाय आदि के विषय अछूत नहीं है। वह हरेक वर्ग, विषय, समूह आदि के आंदोलन-कार्यक्रम में शामिल होने को तैयार रहता है, आरएसएस की रणनीतिक सैद्धांतिक समझ है, हरेक काम सामाजिक है, जो सामाजिक है वह राजनीतिक है। इसके आधार वे सामाजिक कामों को राजनीतिक जनाधार में रुपान्तरित करते हैं। छोटी-छोटी सामाजिक गतिविधियों को राजनीति में रुपान्तरित करते हैं। इस रणनीति का अप्रत्यक्ष ढ़ंग से सामाजिक चेतना पर गहरा असर होता है। उनके काम करने की इस शैली से हर स्तर पर लोग प्रभावित होते हैं। इससे वर्गीय संरचनाएं और वर्ग संगठन भी प्रभावित होते हैं, उनकी काम करने की यह शैली ही जो वर्ग, जाति,धर्म और लिंग की स्वायत्त सत्ता को भीड़ में रुपान्तरित कर देती है।

आरएसएस के तहत काम करने वाले सैंकड़ों संगठन हैं, मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि तकरीबन 700 से ज्यादा संगठनों का संघ संचालन करता है। इनमें प्रत्येक संगठन की कहने को अपनी स्वतंत्र संरचना है, गतिविधियां हैं लेकिन सबके अंदर साझा तत्व है ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’। सामाजिक स्तर पर भीड़, भिन्न स्पेस और भिन्न गति से सक्रिय होती है। उसमें अपने वर्ग, धर्म, जाति, लिंग आदि से पलायन की भावना होती है। मसलन् भीड़ के हरेक पहलू पर सवाल खड़े कर सकते हैं। भीड़ हमेशा पहले वाले सामाजिक क्षेत्र का अतिक्रमण कर जाती है। मसलन्, जातिविशेष या धर्मविशेष या लिंग विशेष के लोग जब भीड़ का हिस्सा बनते हैं तो पुराने क्षेत्र और आधार को छोड़ देते हैं। नए क्षेत्र के लिए वे अपनी मांगों और हकों तक को छोड़ देते हैं।मसलन्, गुजरात में 2002 के दंगों में औरतों ने हिस्सा लिया तो वे भूल ही गयीं कि दंगों में बड़े पैमाने पर औरतें शिकार हो रही हैं, उनको दंगों में शामिल नहीं होना चाहिए। वे यह भूल ही गयीं कि हिंदुत्व के नारे के तहत औरतों के नागरिक अधिकार स्वतः खत्म हो जाते हैं, या फिर जब औरतें किसी बलात्कारी बाबा की हिमायत करती हैं तो अपने स्वत्व रक्षा के अधिकारों से वंचित हो जाती हैं। यानी एक औरत का हिंदुत्वमय होने का अर्थ है कि वह अपने आधुनिक स्त्री के स्पेस को छोड़ रही है और भीड़ में शामिल हो रही है।

इसी तरह जब आरएसएस ‘हिंदूराष्ट्र’ के नारे के इर्दगिर्द पूर्व सैनिकों को गोलबंद करता है और सैनिकों को आक्रामक राष्ट्रवादी प्रचार अभियान के जरिए संबोधित करता है और ‘पूर्व सैनिक’ को उसकी जगह से निकालकर ‘भीड़’ का हिस्सा बनाता है। युवाओं को जब आरक्षण विरोध के बहाने आरएसएस गोलबंद करता है तो युवाओं को उसके स्वायत्त स्पेस और हकों से वंचित करता है।युवा को ‘भीड़’ में तब्दील करता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जब ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के तहत छात्रों को गोलबंद करता है तो छात्र की स्वायत्त पहचान को रुपान्तरित करके उसे ‘भीड़’ का अंग बनाता है।

असल में ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ तो ‘भीड़’ का ही रुप हैं। ज्योंही कोई वर्ग, समुदाय, समूह, लिंग, जाति आदि को ‘हिन्दुत्व’ और ‘हिन्दूराष्ट्र’ के जरिए सम्बोधित करते हैं तो उन्हें भीड़ में रूपान्तरित कर देते हैं। यही बुनियादी वजह है कि भीड़ के हमले इनदिनों तेजी से बढ़े हैं। आज भीड़ कॉमर्शियल खेल का ही हिस्सा मात्र नहीं है, बल्कि राजनीतिक खेल का भी अंग बन गयी है। आरएसएस के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण इनदिनों जनता के विभिन्न सामाजिक समूह अपने दायरों का अतिक्रमण करके हिंदुत्ववादी भीड़ का अंग बन रहे हैं। ये वे लोग हैं जो हर चीज हिंदुत्व की नजर से देखते हैं। पहले भीड़ नायक का अंग थी, लेकिन हिंदुत्व की भीड़ नायक के साथ नायकहीन समाज के शोषण का अंग है।

आज लेखकों साहित्यकारों इतिहासकारों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे हिंदुत्व के रूपांतरित क्षेत्र और एक-दूसरे पर आरूढ़ क्षेत्र को नए सिरे से व्याख्यायित करें। मसलन्, हम यह देखें कि आरएसएस कैसे अंधभाषायी अस्मिता, अंधराष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, मुसलिम विरोध आदि के जरिए जनता को गोलबंद करते हुए कैसे उनको भीड़ में रूपान्तरित कर रहा है। असल चीज है ‘भीड़’ और ‘रूपान्तरण’ की प्रक्रिया। कोई समूह, समुदाय या लिंग कब, किस तरह अपने स्वत्व को त्यागकर ‘भीड़’ का अंग बन रहा है, किन कारणों से बन रहा है, इन सब पर गौर करने की जरुरत है। इस क्रम में उस वर्ग और जाति का लघु इतिहास कैसे बदला जा रहा है उसे हिंदुत्व के महा-इतिहास में कैसे रुपान्तरित किया जा रहा है, यह भी देखें। हम हमेशा आरएसएस के उठाए लघु-इतिहास के आख्यानों में उलझे रहते हैं, जबकि हमें लघु–इतिहास और महा-इतिहास के बीच की अंतर्कियाओं और रूपान्तरण की प्रक्रिया पर गौर करना चाहिए। इस क्रम में हमें ‘भीड़’ और ‘फ्लो’ इन दोनों की अंतर्क्रियाओं को ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही सोचें कि ये दोनों चीजें किस तरह अन्य वर्गों के संगठनों और विचारों को अपदस्थ करती हैं, स्थान बदलती हैं, क्षेत्र बदलती हैं, समाहार करती हैं, हजम करती हैं। किस तरह के संहिताशास्त्र को निर्मित करती हैं और किस मात्रा में करती हैं। उल्लेखनीय है उनके ऐसा करने से अन्य सिस्टम अपना काम करना स्थगित नहीं करते।

‘भीड़’ और ‘वर्ग’ के संगठन एक ही गति और फ्लो के साथ काम नहीं करते, उनमें बड़ा अंतर होता है। इन सबके विपरीत धर्म अपने भक्तों को भक्त ही रहने देता है, वे अपनी स्वायत्तता बनाए रखते हैं। इस अर्थ में धार्मिक प्राणी या धार्मिक जनता ‘भीड़’ से भिन्न है।

( जगदीश्वर चतुर्वेदी )
( ऑब्जर्बर रिसर्च फाउण्डेशन के वेबसाइट पर प्रकाशित )

Saturday, 21 November 2020

शब्दवेध (21) - भाषा का महावट

अभी तक विद्वानों ने  इधर का उधर का, कुछ भी,  समेटते हुए भाषा की समस्याओं को, विशेषतः भाषा की उत्पत्ति को समझने का प्रयत्न किया है।  महिमा विविधताओं का संचय नहीं होती, विविधता की संभावनाएँ उसके भीतर होती हैं। पैदा होने को बटवृक्ष  मात्र एक क्षुद्र बीज  से पैदा होता है और उसकी समस्त संभावनाएँ -   यद् भूतं यच्च भव्यम्  -  बीज में ही निहित होती हैं।  
 
ठीक यही हाल नाद  से उत्पन्न भाषा का है। पर, यहाँ एक अंतर है.  भाषा प्राकृत और कृत्रिम नाद का नैसर्गिक विकास नहीं है। मनुष्य द्वारा उन नादों काे, अपनी बोली की ध्वनि सीमा के कारण,  जिस रूप में सुना गया है यह उसका  वाचिक अनुकरण तो है,  पर इसमें उसकी अपनी रुचि या भावना के अनुसार हस्तक्षेप का भी देखने में आता  है (कृष्ण एक साथ कान्हा, कन्हाई,  कन्नन, कनू कितने रूपों में पुकारे जाते हैं)।  वही नाद बोली की ध्वनिमाला में भेद के कारण  अनेक रूपों में सुना और बोला जा सकता था और एक बार उस रूप में अपना लिए जाने के बाद मनुष्य की अपनी भावना के अनुसार कई रूपों में बदला और समझा जा सकता है।

कल्पना करें कि आग पैदा करने के लिए अरणि मंथन से जो ध्वनि पैदा होती है उसे एक ही समय में चार ऐसी बोलियाें के लोग सुन रहे हैे जिन्हें वह क्रमशः ची ची, ती ती, दी दी, धी धी सुनाई देती है, या एक ने इसके लिए इनमें से कोई ध्वनि अपना रखी है और उसके गहन संपर्क में आने पर दूसरे समुदाय उसे अपनाते तो हैं पर उसे उन उन रूपों में सुनते और उच्चरित करते हैं  जिसका आभास इनसे मिलता है। जब उन सभी का एक समुदाय में विलय हो जाता है तो एक ओर तो उस भाषा में इन सभी ध्वनियों का समावेश हो जाता है।

पहले इन ध्वनियों से आग के जलने के लिए जो आवर्ती ध्वनि और क्रिया और संज्ञा रूप चलन में आ गए थे वे सभी इस साझी भाषा में चलते रहते या ‘सही’ माने जाते हैं और फिर यह सूझता है कि इतने पर्यायों की आवश्यकता नहीं, क्यों न इनका विशेष अर्थ में प्रयोग करें ।  अब अनेक शब्द नए आशयों के लिए प्रयोग में आने लगते है।   

जो शब्द  नए अर्थ में रूढ़ हो जाते हैं उनके पहले के सभी प्रयोग बदले नहीं जा सकते थे, इसलिए इसके मूल  अर्थ अनेक प्रयोगों में बचे रहते हैं जिनसे हम आश्वस्त हो पाते हैं कि पहले इस शब्द का प्रयोग आग के लिए होता था। 

समस्या यहीं ठहरी नहीं रहती। किसी चरण पर वे ऐसे समाजों के संपर्क में आता है जिनकी ध्वनि माला में क्रमशः त और च की ध्वनि न थी, अपितु ट और स की ध्वनियाँ थीं। इसके मिलने के साथ ट की ध्वनि और दूसरी समीकृत बोलियों की धोष और महाप्राण के प्रभाव से कुछ नए रूप बनते हैं और इनको भी उस भाषा की संपदा में जगह मिल जाती हैं परंतु यह समुदाय पहले चरण पर संपर्क में नहीं आया था इसलिए इससे पैदा होने वाली शब्दावली अपेक्षाकूत कम होगी, और अमूर्त आशयों को ही प्रकट करेगी।

अब इस थका देने वाले सिद्धांत निरूपण को स्पष्ट और सूत्रबद्ध और उदाहृत करें तो वह निम्न प्रकार होगा:
भाषा का पहला चरण प्राकृत नाद या संगीत का वाचिक संगीत में ढालने का था, इसलिए यदि लय बनी रहे तो वाचिक ध्वनि कोई भी क्यों न हो, इससे अंतर नहीं पड़ता था।

यह संगीत आवर्ती ध्वनियों का अर्थात् क्रिया की बिशेषता को प्रकट करता था, इसलिए भाषा का आरंभ संज्ञा या क्रिया से नहीं क्रिया विशेषण से हुआ। संज्ञा अर्थात् वह वस्तु जिससे यह नाद फूटा, और क्रिया, जिससे यह नाद संभव हुआ उसका भी    यह  क्रिया विशेषण ही था।
आवर्ती ध्वनियों में आवर्तन को हटा कर, एकल बना कर संज्ञा और क्रिया का साझा पद बना - पानी - जल; पानी - (क)पानी बरस रहा है; (ख) पानी पिलाओ, (ग) आगे पानी है, बचो आदि। व्यंजना और आदेश कथन में आज भी इसका प्रयोग किया जाता है।

हमने अरणि मंथन (यह मेरी कल्पना है जो गलत सिद्ध हो सकती है) से उत्पन्न नाद के कारण हो या जैसे भी हम चिनगारी (चीं चीं> चिन्> +कार>कारी > चिनगारी, चिन+आर, चिनार- आग वाला, चिनचिनाहट, चिन्+ह (सं.चिह्न नहीं बोली का चीन्हल - पहचानना, चिन्हार - परिचित, चीन्हा - चिन्ह अधिक शुद्ध है)।

त.  ती- आग, (माना जाता है कि तमिल में यह शब्द सं. से लिया गया है) , पर यह शब्द संस्कृत में दी था या धी यह तय करना होगा। नियम है कि  सं. में जिन शब्दों मे घोष अल्पप्राण ध्वनियाँ  पाई जाती हैं वे अधिकतर महाप्राणित  रही हैं,  धार-धार> धाधार > सं. दाधार,  धाति > दाति (वे. दाति वारम्)  अतः मूल *धी- आग था, जिसको बुद्धि, ध्यान, धारणा की दिशा में कई  रूपों में स्थिर और रूढ़ कर दिया गया, परन्तु “धिकवल” - गर्म करना;  धिक्कार - आग लगे या भाड़ में जाओ के आशय में प्रयुक्त भर्त्सना में आग का भाव बचा रहा।  पूर्वी में ही इसका एक रूप दी चलता था जो दिकदिककाह - गर्म, देव आदि से प्रकट है।  कौरवी प्रभाव में दी > द्य (द्याव- आकाश), द्यु -आदि बने।  दी - दिवस, द्यौस़,दीप्ति, दीपक,  द्युति आदि का जनक बना।

यहाँ रोचक है 'ती' जो संस्कृत से उस बोली में दी/धी के पहुँचने के बाद का रूप है वह सं. में भी वापस आता है ,अर्थात् संस्कृत के निर्माण क्षेत्र से सटे या उसके संपर्क में उस बोली का प्रयोग होता था जिसे आज केवल तमिल ने बचा रखा है।  अतः दिवस का पर्याय  *ति-ति > तिथि, और विकास  तिलक, 
तीत> तिक्त,  लिलमिलाहट, प्र-तीक,   तिग्म आदि रूप सामने आते है।
ट ध्वनि वाला समूह कुछ विलंब से संपर्क में आता है और इसलिए टीकुर - सूखी जमीन, टिकरी - सीधे आग पर सेंकी  गई रोटी, टीस, को छोड़ कर शेष शब्दावली ज्ञानपरक - टीका, टीप, टिप्पणी, सटीक, ठीक  आदि में ही दिखाई देती है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (20) - शीर्षासन से बचते हुए

सिर से अधिक काम लेने वाले समस्याओं को सिर के बल खड़ा करके अपने बुद्धिबल से चलाना चाहते हैं।  बुद्धि पर कम भरोसा करने वालों को उन्हें पाँव पर खड़ा करना होता है। 

कभी-कभी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि  इतने प्रकांड विद्वान जिनमें से कुछ इस बात को लेकर चिंतित भी थे कि ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषा विज्ञान गलत दिशा में जा रहा है,  प्रयत्न करके भी  उस मामूली बात को क्यों न सुधार पाए जिसके बाद सारी ऊहापोह स्वतः  समाप्त हो जाती।  

आरंभ में भाषा के विकास का जो  जीवविज्ञानी  समाधान निकालने का प्रयत्न किया गया था उसकी सीमाओं को लक्ष्य करके  क्षेत्रीय सिद्धांत और भाषाई भूगोल के माध्यम से भी इस गुत्थी को  सुलझाने का  विचार  कुछ लोगों के दिमाग में आया था। वास्तव में वे भाषा की उत्पत्ति को नहीं, भारोपीय के प्रसार की गति-विधि (डाइनैमिक्स को समझना चाहते थे। उसका कुछ प्रभाव  लगता है माधव देशपांडे पर भी हुआ है।  वह जिस  उम्मीद को लेकर इस अध्ययन से उत्साहित थे, वह उन्हीं के अनुसार निम्न प्रकार है:
Hypotheses on Indian vocabulary.
The following hypotheses govern the semantic clustering attempted in this lexicon.
I. It is possible to re-construct a proto-Indian idiom or lingua franca of circa the centuries traversed by the Sarasvati-Sindhu doab civilization (c. 2500 to 1700 B.C.).
I. India is a linguistic area nurtured in the cradle of the Sarasvati-Sindhu doab civilization.

नहीं। ये पूर्वानुमान भाषा की उत्पत्ति और विकास की दिशा को समझने में संपादक की असमर्थता को प्रकट करते हैं। लगता है उत्साह सामान्य बोध पर भारी पड़ा है।  इससे  जो इकहरापन  और  असंतुलन पैदा हुआ है,   वह किसी आलोचक के फूँक से भी  धराशायी  हो सकता है और इतने परिश्रम से जुटाई गई सामग्री  वह भूमिका भी प्रस्तुत करने में  विफल  रह  सकती है, जिसका अधिकार अन्यथा इसे था।  सचाई की तलाश को छोड़कर किसी  आशय से किया जाने वाला अनुसंधान,  चाहे वह कितना भी पवित्र हो, दृष्टि को वर्णांध बना देता है,  और  उपलब्ध आंकड़ों में चुनाव,  उनके वर्गीकरण और विश्लेषण सभी को प्रभावित करता है।  हर एक  खोज के पीछे एक दृष्टि और प्रेरणा होती है उसी से अनुसंधाता को  दिशा भी मिलती है  परंतु विवेचन के समय उसे  अपने को  निरपेक्ष  और निर्वैयक्तिक बनाना होता है। 

 जब हम किन्ही भाषाओं की उत्पत्ति की बात कर रहे हैं  तो यह काम शब्दावली से नहीं किया जा सकता,  धातु तक के सिरे से नहीं किया जा सकता, इसके लिए हमें उन शब्दों और धातुओं के  स्रोत तक पहुंचना होता है  जहां से  वह नाद पैदा होता है।  इसका ध्यान  न तो  बरो  और इमैनो  ने रखा, न ही उन  अध्येताओं ने -   ब्लॉख, सिल्वयाँ लेवी, प्रित्सलुस्की, बागची और चटर्जी ने  रखा  जिनके निबंध प्री-आर्यन एंड  प्री-ड्रैविडियन इन इंडिया- मैं संकलित है  और जो संस्कृत के   धातुपाठ  से प्रेरित  और बरो तथा  इमेनो के प्रेरक रहे हो सकते हैं, और  जो ही उनके कामों के  लद्धड़पन के कारण बने लगते हैं।  देशपांडे ने  उनकी सीमाओं से कुछ नहीं सीखा और  अनेक बातों में असावधानी बरती जिसकी उनके जैसे प्रबुद्ध विद्वान से अपेक्षा नहीं थी।  

वह यह कैसे मान सके कि प्रोटो इंडियन से भारत के सभी भाषा-परिवारों की आदि भाषाएँ और उनसे उनकी बोलियां निकली, जिनमें से  एक  की बोलियां पूरब में मेगानेशिया (Maganesia) -  जावा-सुमात्रा - तक  और  पश्चिमोत्तर में   उक्रेन और फिनलैंड तक फैल गई, दूसरी एलाम  (Mac Alpin, David W. 1974 Dravidian and Elamite: A Real Break-through ? JAOS,Vol. 93, No.3, 384-85 Elamite and Dravidian: Further Evidence of Relationship, Current Anthropology, Vol.16, No.1, 105-15) तक जा पहुँची।

 इसके बाद भी उनका कोश इस दृष्टि से बहुत उपयोगी है कि पहली बार इतनी विपुल शब्दावली (8000) भाषा-परिवारों की सीमा पार करके इतने प्राचीन चरण पर साझी संपदा के रूप में पेश की गई है। 

इस दल को इस सीधे सादे प्राकृतिक नियम का और विकासवादी संकेतों का ध्यान रखना  चाहिए था किआरंभिक आहारसंग्रही चरण पर बड़े जत्थों का एक साथ निर्वाह नहीं हो सकता था।  यदि भाषाओं में विविधता है तो वह  आरंभिक चरण से रहा होगा। जैसे  छोटे  समुदायों के परस्पर मिलने से विशाल  समाज की रचना होती है उसी तरह उन समुदायों की बोलियों के मिलने से बहुत बड़े संपर्क क्षेत्र में समझी और बोली जा सकने वाली उन्नत भाषाओं का  प्रसार, बोलियों के ऊपर होता है ।   इसकी भी एक लंबी सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है  जिसका चरम बिंदु शहरीकरण है।   पारस्परिक  मिलन  और विलय बहुत पहले से होता रहा होता है।  भाषा  के विकास को सामाजिक-  आर्थिक विकास क्रम से अलग रखकर देखने वाले हमेशा गलती करेंगे और यही आज तक होने वाली गलतियों का प्रधान कारण है। 
  
इस दल से ठीक वही चूक हुई जो उनसे पहले त्रांबेत्ती से हुई थी। जो साझेदारी प्राकृतिक आपदा (हिमयुगीन) के कारण भारत में असंख्य जत्थों के संगम में लक्ष्य की जानी थी उसे उन्होंने भारत से बिखराव के रूप में देखा।  जो साझेदारी भारतीय बोलियों में कृषि के आरंभ से लेकर शहरीकरण तक के आर्थिक विकास के क्रम में पैदा हुई उसे इन्होंने उलट कर देखा और एक आद्य भारतीय भाषा से भारत की सभी भाषाओं  की उत्पत्ति दिखा दी। पूरी तस्वीर ही उल्टी पेश कर दी। 

हमारा अपना योगदान उल्टे को सीधा खड़ा करने का है। उल्टे सिरे से सहारा देने पर जो खड़ा दीखता था पर डाँवाडोल रहता था पर चल नहीं सकता था, सीधा खड़ा करने पर वही चलने ही नहीें दौडने भी लगता है और कहीं ठोकर नहीं खाता।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )