Monday, 19 October 2020

गिरती अर्थव्यवस्था से उबरने की आखिर हमारी योजनाएं क्या है ? / विजय शंकर सिंह

हाल ही में जारी, विश्व भुखमरी सूचकांक या ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़ों में हनारी रैंकिंग 94 पर है। अन्नम ब्रह्म, और अतिथि को कभी भी बिना भोजन कराएं न जाने देने की परंपरा वाले महान देश की स्थिति भुखमरी के मामले में 94 पर गिर जाय तो यह देश की सरकार और सरकार की आर्थिक नीतियों पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। कंसर्न वर्ल्डवाइड और वेल्थ हंगर लाइफ द्वारा, संयुक्त रूप से किये गए, इस अध्ययन में दुनियाभर के देशों के बारे में, भूख और पोषण से जुड़ी,तरह तरह की रपटें होती है। हंगर इंडेक्स के अध्ययन का उद्देश्य, यह है कि 2030 तक दुनिया, भूख के कारण होने वाली मौतों से मुक्त हो जाय। कोई व्यक्ति कितनी कैलोरी ग्रहण करता है, यह हंगर या क्षुधा सूचकांक के अध्ययन का एक सामान्य आधार है। लेकिन, ग्लोबल हंगर इंडेक्स किसी भी देश के बारे में अन्य चार मानदंडों पर भी अध्ययन करता है और, कई स्तरों के परीक्षण के बाद, तब अंतिम निष्कर्ष निकाले जाते हैं। 

ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, 27.2 के अंकों के साथ भारत भूख के मामले में 'गंभीर' स्थिति में है। पिछली बार 117 देशों में भारत की रैंकिंग 102 पर थी, और इस तुलना में भारत की रैंकिंग में ज़रूर कुछ सुधार हुआ है, लेकिन इस बार यह आंकड़ा 117 देशों के सापेक्ष नही बल्कि इससे कम देशों के अनुसार है। दुःखद और हैरान करने वाला एक तथ्य यह भी है कि, भारत अपने पड़ोसी देशों,  नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, से भी इस इंडेक्स में नीचे है। इस रिपोर्ट के अनुसार, केवल 13 देश ऐसे हैं जो हंगर इंडेक्स में भारत से पीछे हैं, जिनमे, रवांडा (97), नाइजीरिया (98), अफगानिस्तान (99), लीबिया (102), मोजाम्बिक (103), चाड (107) जैसे देश शामिल हैं। रिपोर्ट में भारत की लगभग 14% जनसंख्या को कुपोषण का शिकार बताया गया है, जिसका असर भावी पीढ़ी के शारिरिक विकास पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि, भारत के बच्चों में स्टंटिंग रेट 37.4 प्रतिशत है। स्टन्ड बच्चे वो कहलाते हैं जिनकी लंबाई उनकी उम्र की तुलना में कम होती है और यह गम्भीर कुपोषण के कारण होता है। 

ग्लोबल हंगर इंडेक्स ही नही, कुछ और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सूचकांक है, जिनमे भारत की परफॉर्मेंस अच्छी नही कही जा सकती है। ऑक्सफैम इंएक्वेलिटी इंडेक्स में, 157 में 147 वें स्तर पर हम हैं तो, जल शुद्वता के सूचकांक ( वाटर क्वालिटी इंडेक्स ) में, 122 में 120, एयर क्वालिटी इंडेक्स में, 180 में 179, संयुक्त राष्ट्र विश्व खुशहाली सूचकांक ( यूएन वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स ) में, 156 में 144, वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में, 180 में 140, और पर्यावरण परफॉर्मेंस इंडेक्स में, 180 में 167 अंकों पर भारत  है। 2025 तक 5 ट्रिलियन आर्थिकी की बात करने वाले हमारे नेता और सरकार, इन महत्वपूर्ण आर्थिक सूचकांकों की इस गिरावट पर क्या कहेंगे यह मुझे नहीं मालूम, पर यह तो अब निश्चित हो गया है पिछले 25 वर्षों से दुनिया की सबसे तेज गति से विकसित हो रही आर्थिकी, अब 2016 के बाद सबसे तेज़ गति से अधोगामी अर्थव्यवस्था बन गयी है। आखिर, इस का कारण क्या है ? सरकार की आर्थिक नीतियां या कुछ और ? फिर यह सवाल उठेगा कि आखिर सरकार की नीतियां क्या हैं ?

हंगर इंडेक्स सहित अन्य सूचकांकों में दर्ज हुई गिरावट के बाद आईएमएफ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अध्ययन ग्रुप वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक ( डब्ल्यूईओ ) के एक अध्ययन रिपोर्ट ने, हमारी आर्थिक नीतियों का ही नही बल्कि गवर्नेंस का खोखलापन भी उजागर कर दिया है। उक्त अध्ययन के अनुसार, 2020 में हमारी प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से भी कम होगी। बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी, डॉलर के मूल्य के अनुसार, 2020 में 4 % बढ़ कर 1,888 डॉलर हो जाएगी। भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10.5% नीचे गिर कर, 1,877 डॉलर रह जायेगी। यह गिरावट पिछले चार साल में सबसे अधिक है। इन आंकड़ो के अनुसार, भारत दक्षिण एशिया में, पाकिस्तान और नेपाल के बाद, तीसरा सबसे गरीब देश हो जायेगा, जबकि बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका और मालदीव, आर्थिक क्षेत्र में, भारत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन आंकड़ो के अनुसार, कोरोना महामारी का असर, श्रीलंका के बाद सबसे अधिक भारत पर पड़ा है। इस वित्तीय वर्ष में, श्रीलंका की प्रति व्यक्ति जीडीपी भी 4 % से नीचे गिरेगी। इसकी तुलना में नेपाल और भूटान की अर्थव्यवस्था में इस साल सुधार आएगा।

हालांकि, आईएमएफ ने 2021 में भारत की आर्थिकी में तेजी से वृद्धि की संभावना भी जताई है। 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी, बांग्लादेश से थोड़ी ऊपर हो सकती है। डॉलर के मूल्य के अनुसार, 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी के 8.2% बढ़ सकने की संभावना है। इसी अवधि में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी के 5.4% होने की संभावना व्यक्त की गयी है। इस सम्भावित वृद्धि से भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी, 2,030 डॉलर होगी जबकि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी, 1990 डॉलर रहेगी। आईएमएफ ने यह भी कहा है कि, 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी, बांग्लादेश से भी नीचे जा सकती है। आईएमएफ की इस चेतावनी को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। 

उपरोक्त आंकड़े, देश की ताजा आर्थिक स्थिति को बता रहे है और अब देश को उन सब सूचकांकों में ऊपर उठ कर अपनी पूर्व की स्थिति बहाल करनी है, जो सरकार कैसे करेगी, क्या सरकार के पास कोई ऐसा आइडिया है ? फिलहाल तो केवल बदहवासी भरे निजीकरण जिसे देश की सार्वजनिक संपत्ति को औने पौने दाम पर बेचबाच कर, किसी तरह से सरकार का खर्च निकले, को छोड़ कर और कोई योजना तो, सरकार की दिख नहीं रही है। अर्थशास्त्र में, नोबल पुरस्कार विजेता, अभिजीत बनर्जी ने एक इंटरव्यू में बताया है कि, 
" भारत की अर्थव्यवस्था, दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से गिरने वाली अर्थव्यवस्था बन कर रह गयी है। सरकार इससे उबरने के लिये जो स्टिमुलस पैकेज यानी उठाने के लिये जो आर्थिक उपाय कर रही है, वह अर्थव्यवस्था के हालात को देखते हुए नाकाफी है। "
हालांकि उन्होंने यह उम्मीद भी जताई है कि हम इस संकट से अगले साल उबर सकने की स्थिति में होंगे। 

इस गिरावट के लिये निश्चित रूप से कोरोना एक बड़ा और उचित कारण है और यह एक वैश्विक कारण भी है, पर हमारी अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर कोरोना काल के पहले से है। वित्तीय वर्ष, 2017 - 18 में हमारी विकास दर 7% थी जो वर्ष 2018 - 19 में गिर कर 6.1% और फिर 2019 - 20 में और नीचे गिरते हुए 4.2% तक आ गयी। फिर तो कोरोना काल ही शुरू हो गया और अब यह दर माइनस 23.9% तक गिर गयी है। आखिर 2017 - 18 से आर्थिक विकास दर में गिरावट का दौर शुरू क्यों हुआ ? निश्चित रूप से इसका एक बडा कारण, नोटबन्दी औऱ फिर, जीएसटी का तृटिपूर्ण क्रियान्वयन रहा है। ऊपर से लॉकडाउन तो है ही। जब भी कोई आर्थिक योजना बिना उसके प्रभाव का गम्भीरता से अध्ययन किये  लागू की जाती है तो ऐसे ही दुष्परिणाम सामने आते है। 2017 के बाद ही अर्थव्यवस्था में मंदी की आहट मिलना शुरू हो गयी थी। सरकार ने इसे रोकने के लिये, कुछ कदम उठाये, पर उसका अधिकतम लाभ उद्योगपति उठा ले गए और निम्न तथा मध्यम वर्ग जिनसे बाजार में रौनक आती है, या तो अपनी नौकरियां खोता रहा, या उसकी आय घटती रही, जिसका सीधा असर परंपरागत बाज़ार पर पड़ा। 

जब वर्तमान वित्तीय वर्ष ( 2020 - 21 ) की आर्थिक विकास दर गिर कर माईनस 23.9% तक पहुंच गयी तो गोल्डमैन क्रेडिट रेटिंग संस्था ने 2020 - 21 में विकास दर के संकुचन को जहां पहले 10.5% पर माना था उसे और घटा कर 14.8% पर निर्धारित कर दिया। यानी सुधार की गुंजाइश जितनी की गयी थी, उतनी नहीं है। अभिजीत बैनर्जी, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये सरकार द्वारा जिस स्टिमुलस पैकेज की घोषणा की है, को अपर्याप्त मानते हैं। उनके अनुसार अभी और स्टिमुलस पैकेज की ज़रूरत है। स्टिमुलस पैकेज और राहत पैकेज में अंतर होता है। राहत पैकेज तो किसी कारण से यदि किसी स्थान या क्षेत्र में किसी आपदा, जैसे बाढ़, सूखा या अकाल के कारण, अर्थव्यवस्था को हानि पहुंच रही हो तो उसे तात्कालिक राहत देकर संभाला जाता है, जबकि स्टिमुलस पैकेज धराशायी आर्थिकी को पुनः खड़ा करने का एक उपचार है। आज भारत मे आर्थिक मंदी का दौर किसी एक क्षेत्र में नहीं है बल्कि, देशव्यापी है। कृषि, बाजार, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, रीयल एस्टेट, निर्माण सेक्टर, सहित लगभग सभी आर्थिक क्षेत्र इस समय मंदी से संक्रमित हैं, और बाजार मांग की कमी से त्रस्त है तो ऐसे में अर्थचक्र के थम चुके पहिये को फिर गति कैसे दी जाय, सरकार के सामने, यह सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है, क्योंकि अब गति में संवेग भी नही रहा। 

अभिजीत बैनर्जी स्टिमुलस पैकेज की अपर्याप्तता पर अपने एक इंटरव्यू में कहते है कि, 
' सरकार द्वारा दिया गया स्टिमुलस पैकेज, ने निम्न और मध्यम आय वर्ग की मांग में कोई वृध्दि नही की है। जबकि बाजार में मांग और रौनक तभी बढ़ेगी जब निम्न और माध्यम आय वर्ग के पास नकदी पहुंचेगी और मांग बढ़े, इसलिए, उनके हांथ में नकदी पहुंचानी पड़ेगी। "
बहुत ही तामझाम के साथ, सरकार ने कोरोना जन्य अर्थव्यवस्था में सुधार के लिये 20 लाख करोड़ के स्टिमुलस पैकेज की घोषणा की थी। लेकिन उसका क्या असर सुस्त और मंद पड़े बाजार पर पड़ा ? पैकेज की घोषणा के बाद भी जितनी वृद्धि अपेक्षित थी उतनी हुयी या नही ? इस पर सरकार खामोश है। इसे जीएसटी की वसूली से समझने की कोशिश करें तो, आज सरकार का राजस्व गिरता जा रहा है। बाजार में उतनी चहल पहल नहीं है जितनी होनी चाहिए। नवरात्रि के बाद दीपावली तक त्योहारों का महीना रहता है और शादी विवाह भी होने लगते हैं, ऐसी स्थिति में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि, लोग बाजार में उतरेंगे और खरीददारी बढ़ेगी। पर कैसे ? लोगों की नौकरिया जा रही हैं, महामारी के अंदेशे ने लोगों को एक अजीब सी आशंका में डाल दिया है।  केवल खाने पीने और बेहद ज़रूरी चीजों पर लोग धन व्यय कर रहे हैं और बडे खर्चे लोग, भविष्य के लिये टाल रहे हैं। ऐसे में बाजार को 2017 के पहले की स्थिति में कैसे लाया जाय, यह सरकार और अर्थ विशेषज्ञों के लिये एक बडी चुनौती है। 

उपरोक्त आंकड़ो और बाजार की स्थिति देखते हुए भी, इस निष्कर्ष पर पहुंचना कोई कठिन नहीं है कि हमारी आर्थिकी संकुचन की ओर बढ़ रही है। हम जीडीपी गिरने की बात तो कह रहे हैं पर हम संकुचन जिसे अर्थशास्त्री, कांट्रैक्शन कहते हैं, शब्द का प्रयोग करने से बच रहे हैं। विकास दर के इतिहास की बात करें तो, 1996 के बाद, जब से तिमाही जीडीपी के आंकड़े जारी होने की प्रथा शुरू हुयी है, तब से वित्तीय वर्ष 2020 - 21 के जीडीपी का माइनस 23.9% का आंकड़ा सबसे कम है। ऐसी संकुचन की स्थितियां, लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर मैत्रिश घटक के अनुसार, वर्ष 1957 - 58, 1965 - 66, 1972 - 73 और 1979 - 80 में भी आ चुकी हैं। पर उन संकुचन से हम जल्दी उबर भी गए। अगर हम एक भयावह कल्पना करें, ( जो लगभग असंभव है ) कि इसी वित्तीय वर्ष के शेष तीन तिमाही के भी आंकड़े यही रहेंगे तो,  इस वित्तीय वर्ष की संकुचन की स्थिति आज़ादी के बाद के सबसे बुरी हालत में रहेगी। 

कोरोना आघात ने दुनियाभर की आर्थिकी को प्रभावित किया है। अब डॉ घटक द्वारा दिये गए आईएमएफ के वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक के आंकड़ो के अनुसार, 2020 - 21 में दुनियाभर की जीडीपी 4.9%, विकासशील आर्थिकी में 3%  और निम्न आयवाली आर्थिकी में 1% रहेगी। लेकिन भारत के सम्बंध में इतनी भी जीडीपी रहे, इसकी संभावना कम ही दिखती है। भारत की जीडीपी में आधा योगदान अनौपचारिक सेक्टर का है, जिसमे कृषि, निर्माण आदि सेक्टर आते हैं। इनके बारे में अक्सर आंकड़े मिलते नहीं हैं। अज़ीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी ने 12 राज्यों के स्वरोजगार, कैजुअल और दिहाड़ी कामगारों की, अप्रैल मई की स्थिति पर अध्ययन किया तो, इनकी आय में 64% की गिरावट आयी है। इसी प्रकार का एक अध्ययन, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सेंटर फॉर इकॉनोमिक परफॉर्मेंस ने किया तो उन्हें भी जनवरी फरवरी की तुलना में अप्रैल मई में यह गिरावट 48% की मिली है। डॉ घटक के अनुसार अगर अनौपचारिक क्षेत्र की स्थिति नहीं सुधरती है तो,जीडीपी में सुधार मुश्किल दिखता है।  माह दर माह बढ़ती बेरोजगारी इस मुश्किल को और बढ़ा सकती है। बेरोजगारी के आंकड़ो की स्थिति यह है कि 2016 के बाद सरकार ने नियमित आंकड़े जारी करने ही बंद कर दिये थे। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट से यह जानकारी मिली है, कि अगस्त 2020 में भारत में बेरोजगारी की दर 8.35 फीसदी दर्ज की गई, जबकि पिछले महीने जुलाई में इससे कम 7.43 फीसदी थी। बहरहाल हर अर्थविशेषज्ञ इस बात पर एकमत है कि बेरोजगारी एक बड़ा और आक्रोशित करने वाला मुद्दा है। 

औद्योगिक क्षेत्र की गिरावट के आकलन का एक आधार, बिजली का उपभोग भी है। वर्ल्ड बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, 2020 - 21 की पहली तिमाही के महीने अप्रैल, मई, जून में बिजली के उपभोग में, क्रमशः 24%,13.5% और 8.2% ,कमी आयी है। अनौपचारिक क्षेत्र में आय कम होने और औद्योगिक क्षेत्रों में इंडस्ट्री बंद रहने के कारण जीडीपी के दर में गिरावट तो आनी ही थी। बहरहाल, जीडीपी के मापदंड का जो भी आधार हो, इस तिमाही की माईनस 23.9% की गिरी हुयी जीडीपी के आंकड़े से, प्रोफेसर मैत्रिश घटक के अनुसार, दो निष्कर्ष साफ साफ निकलते है।
पहला, अर्थव्यवस्था के इस अधोगामी ग्राफ से यह स्पष्ट है कि भारत एक गम्भीर आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है। 
दूसरा, मैक्रो इकनॉमिक्स, ( जिंसमे राष्ट्रीय आय, उत्पादन, रोजगार/बेरोजगारी , व्यापार चक्र, सामान्य कीमत स्तर, मुद्रा संकुचन, आर्थिक विकास, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आदि का विश्लेषण किया जाता है ) के अनुसार निकाले गये जीडीपी के आंकड़ो की गिरावट से, देश के अनौपचारिक क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है। इसका कारण एक बहुत बड़ी आबादी का उक्त क्षेत्र में होना और उनके आंकड़ो का अभाव भी है। अनौपचारिक क्षेत्र को अगर इसमे गंभीरता से जोड़ा जाएगा तो हो सकता है आर्थिक स्थिति की तस्वीर और चिंताजनक हो। 

अब इस स्थिति से उबरा कैसे जाय, और मांग बढ़े कैसे, इसके लिये विशेषज्ञों का सुझाव है कि जनता को सीधे धन दिया जाय। यह धन ज़रूरतमंद को दिया जाय जो इसे व्यय करें और पैसा बाजार में आये और फिर अर्थचक्र चल पड़े। विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर शोध कर चुके अभिजीत बैनर्जी और ज्यां द्रेज जैसे अर्थशास्त्री इस बात पर एकमत हैं कि, निम्न और मध्यवर्ग के लोगो को सरकार नक़द सहायता पहुंचाए। यह कैसे किया जाय इसे पूछने पर अभिजीत बैनर्जी इसके एक उपाय के रूप में मोनेटाइजेशन स्कीम का उल्लेख करते हैं। मोनेटाइजेशन, यानी मुद्रीकरण से आर्थिकी को उर्जिकृत किया जा सकता है। यह नोटबन्दी का प्रतिलोम है यानी नोटबन्दी जहां नक़दी के प्रवाह को बाधित करता है वहीं मुद्रीकरण बाजार में मांग को बढ़ाने के लिये लोगो के पास अधिकतम धन देने और उन्हें व्यय करने के लिये प्रोत्साहित करता है।

इसलिए, अभी हाल ही में सरकार एलटीसी अग्रिम की एक योजना लेकर आयी है जिंसमे एलटीए यानी अग्रिम यानी एडवांस के साथ जो शर्ते जुड़ी हैं उन्हें भी देखिये,  
● यात्री को विमान / रेल किराया के तीन गुने का सामान और सेवाएं खरीदना होगा। 
● यह खरीद 31 मार्च 2021 से पहले होनी चाहिए।
● उन्हें जीएसटी पंजीकृत विक्रेता से 12 प्रतिशत या उससे अधिक जीएसटी वाला सामान खरीदना है या ऐसी ही सेवा पर खर्च करना है।
● इसका भुगतान केवल डिजिटल मोड से होना चाहिए ।
यानी,  25,000 रुपए के एलटीसी एडवांस के लिए, किसी को भी कम से कम 75,000 रुपए डिजिटली खर्च करने होंगे। करीब 10,000 रुपए बतौर जीएसटी चुकाना होगा और 25000 के अग्रिम भुगतान को बाद में लौटाना होगा या एडजस्ट होगा। 
यह योजना, उसी समस्या के समाधान के लिये लायी गयी है, जिससे बाजार जूझ रहा है। अब कितना सफल होती है यह तो बाद में ही बताया जा सकता है। 

सरकार को बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के प्रोफेशनल अर्थविशेषज्ञो की टीम गठित कर के इस समस्या का समाधान ढूंढना होगा। अभी तो यही लगता है कि, सरकार अपने आर्थिक नीतियों की सोच और क्रियान्वयन में विफल हो रही है। न तो कोई स्पष्ट आर्थिक सोच दिख रही है और न ही, भविष्य की कोई योजना। हर आर्थिक दुरवस्था का एक ही उपाय सरकार की समझ मे आता है, निजीकरण यानी देश की संपदा को अपने चहेते गिरोही पूंजीपतियों को औने पौने दाम बेच देना और जब विरोध के स्वर उठें तो विभाजनकारी एजेंडे पर आ जाना। 

( विजय शंकर सिंह )


देश की सबसे पहली दर्ज एफआईआर / विजय शंकर सिंह

आइपीसी लागू होने के बाद सबसे पहली एफआईआर 156 साल पहले हुयी थी। 1861 मे भारतीय आपराधिक न्यायतंत्र के अंग के रूप में भारतीय दंड संहिता, यानी आइपीसी, इंडियन पैनल कोड, यानी ताजीरात ए हिन्द को अपराधों के वर्गीकरण, उनकी परिभाषा, प्रकार और दंड की प्रकृति के आधार पर, लागू किया था। इसी के बाद आधुनिक पुलिस तंत्र का औपचारिक स्थापना हुयी। 

दिल्ली में आइपीसी के अंतर्गत पहली प्रथम सूचना रिपोर्ट या फर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट, जिसे लघुरूप में एफआईआर कहते हैं,और उर्दू में चिक दस्तंदाजी कहते हैं 18 अक्टूबर 1861 को दर्ज हुयी थी। इसे देश की पहली रिकॉर्डेड दर्ज एफआईआर भी माना जाता है। आइपीसी केवल ब्रिटिश भारत मे लागू थी और लगभग आधे से अधिक भारत, रियासतों के अधीन था तो उनके अपने अलग कानून और पुलिस थी। कुछ रियासतों ने आइपीसी के तर्ज पर अपने दंड विधान बनाये थे, और कुछ ने ब्रिटिश न्याय और पुलिस तंत्र को थोड़े बहुत फेरबदल से अपनाया था। जम्मूकश्मीर में अलग दंड विधान था।  

दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गयी यह एफआईआर, 18 अक्टूबर 1861 की है, जो उर्दू में लिखी गयी थी। यह एफआईआर 17 अक्टूबर 1861 को हुयी एक चोरी की वारदात की है। चोरी गए सामान की सूची, जो वादी द्वारा दी गयी है, उसमे, एक हुक्का, कुछ बर्तन, महिलाओं के पहनने वाले कुछ कपड़े, और एक कुल्फी से भरा हुआ घड़ा है। यह एफआईआर, मईउद्दीन पुत्र मोहम्मद, निवासी कटरा शीश महल, द्वारा दिल्ली के थाना सब्ज़ी मंडी में दर्ज करायी गयी थी। चोरी गए समस्त संपत्ति की कीमत 2 रुपये 14 आने बताई गई थी। 
इस मुकदमे की विवेचना में चोर पकड़े गए और माल की बरामदगी हुयी या नही  इसका कोई उल्लेख मुझे नही मिला है। दिल्ली पुलिस के म्यूजियम में इस एफआईआर की प्रतिलिपि और विवरण उपलब्ध है। यह भी उल्लेख है कि सब्ज़ी मंडी थाने में उसी एफआईआर की एक और प्रतिलिपि भी टँगी हुयी है। 

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 17 October 2020

विचारविमर्श - गाँधी, आम्बेडकर और मार्क्स

सन 2003 में जनसत्ता के अपने लेख में मैंने यह निवेदन किया था कि भारत में सामाजिक परिवर्तन के लिए गाँधी, आम्बेडकर और मार्क्स की वैचारिक धाराओं में सम्वाद अनिवार्य है। तब तीनों विचारों से जुड़े थोड़े से लोगों को छोड़कर अधिकांश ने विरोध किया था। लेकिन लगभग दो दशक बीतने से पहले ही इस दिशा में सोचने वाले लोग दृढ़ता से सामने आने लगे हैं। इनमें एक हैं हम सबके मित्र और मराठी के दलित लेखक सूर्यनारायण रणसुभे। 

सूर्यनारायण रणसुभे बहुत सुलझे हुए विचारक हैं। उनसे मेरी मित्रता 23-24 वर्ष पुरानी है। उन्होंने आम्बेडकर और गाँधी के विचार साम्य पर 'वागर्थ' अगस्त 2020 के अंक में अत्यंत महत्वपूर्ण लेख लिखा है। (संपादक: डॉ. शंभुनाथ, कोलकाता) आम्बेडकर रचनावली के मराठी संस्करण और मराठी में आम्बेडकर पर हुए शोधपूर्ण कार्यों का हवाला देते हुए रणसुभे ने हिंदी दलित विमर्श में प्रचलित बहुत-सी मान्यताओं को निरस्त किया है। उदाहरण के रूप में यह एक विस्तृत अंश देखा जा सकता है:

"अगर सचमुच आम्बेडकर के मन में गाँधी के प्रति अनादर होता तो वे महाड सत्याग्रह के अवसर पर मंच पर गाँधी की तस्वीर क्यों लगते? अपने लेखों में वे अनेक स्थानों पर उनका सम्बोधन महात्मा के रूप में क्यों करते? धम्म परिवर्तन के पूर्व बुलायी गयी पत्रकार परिषद में वे गाँधी जी को दिये गये अपने शब्दों का पुनरुच्चार क्यों करते? और अंत में सरदार वल्लभभाई के पत्र के उत्तर में यह क्यों लिखते कि बापू आज होते तो वे हमें (पुनर्विवाह के उपलक्ष्य में) निश्चित ही आशीर्वाद देते? वे दलित बन्धुओं से चरखा कातने औऱ खादी के कपड़े पहनने के लिए क्यों कहते? ये सारे प्रमाण उनके लेखन से ही लिए गए हैं।"  (पृ.100) 

गाँधी से अपने जिस वचन का ज़िक्र आम्बेडकर कर रहे हैं, वह है: "अस्पृश्यता के प्रश्न सम्बन्धी चर्चा करते समय मैंने एक बार गाँधीजी से कहा था कि अस्पृश्यता की समस्या को लेकर मेरे और आपके बीच भले ही मतभेद हों, तो भी समय आने पर मैं इस देश को कम से कम ख़तरा हो ऐसा मार्ग चुनूँगा। इस कारण बौद्ध धम्म को  स्वीकार कर मैं इस देश का अधिकाधिक हित कर रहा हूँ।" (पृ.99) 

हिंदी के दलित विमर्श की एक प्रभावशाली धारा इस सत्य से या तो अनभिज्ञ है या इसे सचेत रूप में झुठलाती है। ऐसा करने का एक उद्देश्य है। समाज में परिवर्तन की जगह अपनी शक्ति मज़बूत करना। गाँधी और आम्बेडकर दोनों अपने देश और समाज का भाग्य बदलने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनमें मतभेद भी थे और दोनों एक-दूसरे को समझकर परस्पर विकास भी कर रहे थे। इसका अच्छा परिचय रणसुभे के लेख में मिलता है। जो लोग इन दोनों महापुरूषों को भिड़ाने में रुचि रखते हैं, वे दलितों के अलग निर्वाचन के विरुद्ध गाँधी के अनशन को मुद्दा बनाते हैं और गाँधी-आम्बेडकर के बीच हुए पूना समझौते को पराजय की तरह देखते हैं। 

ऐसे विचारक दलित हित और देश हित मे सम्भवतः विरोध मानते हैं। गाँधी के अनशन के आगे आम्बेडकर का झुकना और पूना समझौता करना दलित हित और देश हित  का सामंजस्य व्यक्त करता है।  रणसुभे ने उदाहरण देकर बताया है कि अगर अनशन में गाँधी की मृत्यु हो जाती तो सवर्ण और बहुजन (पिछड़ी जातियाँ) दलितों पर हमले करते, जैसा चितपावन ब्राह्मण नाथूराम गोडसे द्वारा गाँधी की हत्या के बाद हुए हमलों में दिखायी दिया; इन हमलों से गृहयुद्ध भी छिड़ सकता था जिससे अंग्रेजों को बहाना मिल जाता कि  "वह घोषित कर सकें ऐसी स्थिति में वे स्वतंत्रता नहीं देंगे।" जो गैर-दलित' 'प्रगतिशील' बुद्धिजीवी आम्बेडकर को अंग्रेजों का हिमायती मानते हैं, यह उनके लिए भी शिक्षाप्रद है। 

संविधान का लेखन आम्बेडकर ने किया। संविधान समिति में कुल 324 सदस्य थे। इनके बीच व्यापक बहसें हुई थीं। इन सदस्यों में 82% गाँधी और नेहरू का नेतृत्व मानते थे। रणसुभे ने सही कहा है कि यदि वे न चाहते तो आम्बेडकर संविधान में अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप प्रावधान नहीं कर सकते थे। गाँधी हत्या से पहले वे जो प्रावधान स्वीकृत करा चुके थे, उनमें "मुख्य रूप से अस्पृश्यता निर्मूलन, आरक्षण, राष्ट्रध्वज पर धम्मचक्र आदि" उल्लेखनीय हैं। उनकी इस सफलता का "एकमात्र कारण उन्हें इस कार्य में गाँधी और नेहरू का पूर्ण समर्थन प्राप्त था।" (पृ.107) रणसुभे यहाँ तक कहते हैं कि "अगर गाँधी जीवित होते तो हिन्दू कोड बिल भी आसानी से पारित हो सकता था।" (पृ.107)

इस लेख का अंतिम हिस्सा और भी महत्वपूर्ण है। रणसुभे ने बताया है कि "दक्षिण भारत में मार्क्स और आम्बेडकर के विचारों में साम्य बतलाने की दृष्टि से कार्य हो रहा है। उसका भी अपना महत्व है। सवाल यह है कि हिंदी पट्टी के दलित नेता, कवि, बुद्धिजीवी इस दिशा में क्या कर रहे हैं।"(पृ.109) 

यदि गाँधी और आम्बेडकर में अनेक समानताएँ थी, आम्बेडकर और मार्क्स के विचारों में समानता की पहचान की जा रही है, तो यह मानना चाहिए कि तीनों के बीच अनेक ऐसे वैचारिक सूत्र हैं जिनसे वर्तमान भारत की नियति का सम्बंध है। तीनों मनीषी यथास्थिति को स्वीकार न करके उसे मानव हित में बदलने के लिए तत्पर थे। रणसुभे ने बहुत सुलझे हुए रूप में कहा है कि "तीनों का लक्ष्य एक ही थे--समाज की आखिरी सीढ़ी पर बैठे हुए मनुष्य को अधिक समृद्ध, अधिक सुदृढ़ और अधिक स्वाभिमानी बनाना।" (पृ.110) 

मुझे सूर्यनारायण रणसुभे के इस निष्कर्ष पर बहुत सन्तोष है क्योंकि जैसा पहले बताया कि 2003 से ही मैं इस विचार की प्रस्तावना करता आ रहा हूँ। 

इतना मूल्यवान लेख लिखने के लिए रणसुभे को और उसे प्रकाशित करने के लिए शंभुनाथ को साधुवाद। 

अजय तिवारी
( Ajay Tiwari )

यह कहना एक छलावा है कि, नये कृषि कानूनो से किसानों की आय बढ़ेगी. / विजय शंकर सिंह


20 सितंबर 2020 को जब राज्यसभा ने बेहद अलोकतांत्रिक तरीके से सदन की समस्त संसदीय मर्यादाओं को ताख पर रख कर, तीनो किसान विधेयकों को उपसभापति हरिवंश जी ने पारित घोषित किया तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि वे किसी विधायी सदन का संचालन कर रहे हैं। आप तब के वीडियो जो यूट्यूब पर अब भी मौजूद हैं को देखे और उपसभापति की की देहभाषा पर गौर करें तो यही लगता है कि वे यह संकल्प लेकर उस दिन आये थे कि आज यह तीनों बिल सदन से पारित कराना ही है। यह संकल्प उनका था, या किसी का थोपा हुआ, यह बस कयास लगाया जा सकता है। भले ही बिल अब कानून बन गया हो, पर राज्यसभा में उस दिन की कार्यवाही, देश के विधायी इतिहास का एक विवादित पृष्ठ के रूप में याद किया जाएगा और, हरिवंश जी की भूमिका पर, जब जब इस कानून पर चर्चा होगी, सवाल उठेंगे और उन्हें उठने भी चाहिए। 

अब बात उस कानून की, जिस पर सरकार लगातार ऐसे दावे कर रही है कि यह कानून, किसानों के हित मे है, जबकि देश के लगभग सभी किसान  संगठन इसके विरोध में हैं। लेकिन सरकार के दावे वैसे ही हैं जैसे सरकार ने नोटबन्दी, जीएसटी और लॉकडाउन के समय किये थे और इन तीन मास्टरस्ट्रोक के लाभ भी गिनाए थे। पर आज तक न तो नोटबन्दी का लाभ मिला, न जीएसटी का और न लॉकडाउन का। काऱण इन तीनो का मूर्खतापूर्ण क्रियान्वयन और बिना सोचे समझे इनको लागू करना रहा है। अब फिर से यही कहा जा रहा है कि यह तीनों बिल गेम चेंजर, मास्टरस्ट्रोक और न भूतों प्रकार के कानून हैं जिससे देश का कृषि परिदृश्य ही बदल जायेगा। पर यह सब बदलेगा कैसे, यह न तो सरकार बता पा रही है और न ही इस कानून के पैरोकार। 

सरकार का कहना है कि इन कानूनो का उद्देश्य है, कि 
● किसान की आमदनी और  उनकी समृद्धि में वृद्धि हो। 
● कृषि क्षेत्र में निजी निवेश आए, नई टेक्नोलॉजी आए। 
● प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में अधिक से अधिक निवेश करे।
● निजी क्षेत्र खेती में उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक में न केवल निवेश बढ़ाए, बल्कि नई तकनीक का भी इस्तेमाल करे। 
● इससे किसानों को अपनी उपज की ऊंची कीमत मिलेगी और उनकी आमदनी बढ़ेगी।

भला इन सब बातों और ऐसे पावन उद्देश्य से किसे आपत्ति हो सकती है ? यह तो हम सब चाहेंगे कि यह सारे उद्देश्य पूरे हों। किसान तो अपनी बेहतरी के लिये लम्बे समय से सरकारों से भिड़ता रहा है कि, उसकी आमदनी बढ़े और उसे उपज का उचित मूल्य मिले। पर यह आज तक नहीं हो सका। आश्वासन, दावों और छलावे के बीच वह तब भी फंसा था, जब ज़मीदारी प्रथा थी और अब भी फंसा है जब अनेक प्रगतिशील भूमि सुधार हो चुके हैं। 

आय कैसे बढ़े, इस विंदु पर एक नयी थियरी आयी है कि, निजी क्षेत्र यानी निजी व्यापारी ही,  किसान को उनके उत्पाद की उचित कीमत दे सकता है, और उपज खरीदने के लिये किसी भी पैन कार्ड धारक या व्यापारी या कम्पनी या कॉरपोरेट को कानूनन अधिकृत करने के बाद, इसका लाभ किसानों को मिलेगा। लेकिन कृषि अर्थविशेषज्ञो को इस विंदु पर अनेक आशंकाए है। देश के अग्रणी कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने इस विंदु पर अनेक लेख लिखे हैं और अब भी वे इस विषय पर नियमित अपने विचार रख रहे हैं तो उनके अनुसार, इस उम्मीद के दो तीन पहलुओं पर कुछ गम्भीर शंकाये हैं, जिनका समाधान किया जाना जरूरी है। 

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक,  2020 पर चर्चा करते समय, डॉ देविंदर शर्मा कहते हैं कि, 
" अगर हम दुनिया भर में देखें तो ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि मार्केट रिफॉर्म्स की वजह से किसानों को फायदा हुआ हो। क्योंकि अमेरिका और यूरोप में कई दशकों पहले ओपन मार्केट के लिए कृषि उत्पादों को खोल दिया गया था। और अगर ओपन मार्केट इतना अच्छा होता और किसानों को उसका लाभ मिला होता तो विकसित देश अपने यहां कृषि को जीवित रखने के लिए भारी सब्सिडी क्यों देते हैं? " 
वे अमेरिका का उल्लेख करते हुए कहते हैं, जो आजकल हमारे थिंकटैंक, नीति आयोग का थिंकटैंक बना हुआ है,
" 2018 की बात करें तो अमेरिका और यूरोप में 246 बिलियन डॉलर की सब्सिडी किसानों को दी गई। अकेले यूरोप में देखें तो 100 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी गई। जिसमें तकरीबन 50 फीसदी डायरेक्ट इनकम सपोर्ट थी। और अमेरिका की बात की जाए तो अध्ययन बताते हैं कि अमेरिका के एक किसान को औसतन लगभग 60 हजार डॉलर सालाना सब्सिडी दी जाती है। यह सिर्फ औसत है, जबकि वैसे देखा जाए तो यह इससे भी अधिक हो सकती है। इसके बावजूद भी अमेरिका के किसान बैंकों के दिवालिया हैं, किसानों पर बैंकों की दिवालिया राशि लगभग 425 बिलियन डॉलर है।" 
यह स्थिति अमेरिका की है जहाँ की सरकार किसानों को सब्सिडी देकर कृषि को ज़िंदा रखे हुए हैं जबकि वहां कृषि कोई संस्कृति में रची बसी चीज है ही नही है। इससे यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि, कृषि को पालने पोसने के लिये जिलाना पड़ता है और उसे सरकार द्वारा हर प्रकार की सहायता दी जानी चाहिए। 

भारत मे किसानों द्वारा की गयी आत्महत्याओं का आंकड़ा भयावह है और यह लम्बे समय से चल रहा है। लेकिन अमेरिका के ग्रामीण क्षेत्रों में आत्महत्याये होती है, पर उनकी संख्या भारत की तुलना में कम है। भारत मे शहरी क्षेत्रों की तुलना में, ग्रामीण क्षेत्रों में आत्महत्याओं का प्रतिशत 45 % है। जिस खुलेपन के कानून पर सरकार आज यह कह रही है कि किसानों की  दुनिया बदल जाएगी, उसी खुलेपन के कारण, अमेरिका में धीरे-धीरे कृषि खत्म होती जा रही है। खेत बड़े बड़े कॉरपोरेट के हांथो में इकट्ठे होते जा रहे हैं। मशीनीकरण ने खेती पर आश्रित आबादी को शहर में फेंकना शुरू कर दिया और अब अमेरिका में ओपन मार्केट के 6-7 दशक बाद कृषि पर निर्भर आबादी घटकर 1.5 फीसदी रह गई है । क्या हम भी अगले कुछ दशको के बाद, इसी अमेरिकी मॉडल को अपनाने जा रहे हैं ? इसी को रेखांकित करते हुए, डॉ देविंदर शर्मा कह रहे हैं कि,
" इस पर दोबारा चिंतन करना चाहिए कि क्या वह मॉडल, जो अमेरिका और यूरोप में फेल हो चुका है, भारत के लिए उपयोगी रहेगा और भारत के किसानों के लिए फायदेमंद रहेगा?" 

हमारी सरकार, इन कानूनों द्वारा किसानों की आमदनी बढ़ाने के दावे कर रही है, पर जब इसी मॉडल पर हम अमेरिकी किसानों की हालत का जायजा लेते हैं तो एक दिलचस्प आंकड़ा सामने आता है। अमेरिका के, यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के चीफ इकोनॉमिस्ट का कहना है कि, 
" 1960 के दशक के बाद से अमेरिका के किसानों की आमदनी लगातार घट रही है। इसलिए किसानों को सब्सिडी देनी पड़ रही है।"
यही ओपन मार्केट, अमेरिकी किसानों की आय में कोई वृध्दि नहीं कर सका, जिसके सपने दिखा कर भारत सरकार किसानों की आय बढ़ाने के दावे कर रही है, तो यह मॉडल कैसे भारत के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है ? 
इसी पर टिप्पणी करते हुए डॉ शर्मा कहते हैं कि 
" इतना ही नहीं, अगर एक्स्पोर्ट की बात की जाए और अगर सब्सिडी हटा दी जाए तो अमेरिका, यूरोप और कनाडा का एक्सपोर्ट 40 फीसदी तक घट जाएगा।"
इसका मतलब यह हुआ कि, केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि एक्सपोर्ट भी गिर जाएगा। और जब उत्पादन और एक्सपोर्ट दोनो ही गिर जाएगा तो फिर आय कहाँ से बढ़ेगी ? यह तब की स्थिति है जब सरकार कृषि सब्सिडी कम करती जा रही है और उसका उद्देश्य ही यह है कि धीरे धीरे सब्सिडी कम कर दी जाय। यह दबाव अमेरिकी थिंकटैंक का है जो भारत के कृषि को तोड़कर देश के आर्थिकी के सबसे मजबूत आधार को ध्वस्त कर देना चाहती है। 

किसान संगठन के नेतागण इस खुली बाजार प्रणाली का सारा रागमाला समझ गए हैं। वे साफ साफ कह रहे हैं कि, किसानों को बाजार के हवाले करने से खेती मजबूत नही होगी। लेकिन सरकार इसी राह से किसानों की आय दुगुनी करने के हठ पर अड़ी है। आज देश में 34 हजार मंडियों की कमी है। आखिर किसान अपने किसान कहां बेचें अपने उत्पाद ? कहने को तो सरकार कह रही है अब तो बंधन मुक्त हो, कश्मीर से केरल तक मंडी ढूंढो और जहां अच्छा भाव मिले अपनी उपज बेचो। सुनने में यह मुक्त व्यापार और ओपन मार्केट सिस्टम बहुत मोहक है पर किसानों के लिये किसी मोह पाश से कम नहीं है। 

अमेरिका की चर्चा को थोड़ा दरकिनार कर के आइये बिहार की ओर चले। आजकल बिहार में विधानसभा के आमचुनाव भी हैं। सभी दल अपने अपने जुगाड़ में लगे हैं। इसी बिहार में 2006 में इस मुक्त बाजार का एक प्रयोग किया गया था। सन 2006 में बिहार में एपीएमसी (एग्री प्रोड्यूस मार्केट कमेटी) जो किसानों के उपज के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य एमरसपी तय करती है को,  भंग कर दिया गया था और कमेटी की मंडियों को यानी सरकारी मंडी सिस्टम को हटा दिया गया था। तब ओपन मार्केट के पैरोकारों ने यह तर्क दिया था कि, इससे प्राइवेट इंवेस्टमेंट आएगा और खेती का चतुर्दिक विकास होने लगेगा। फिर किसानों को उनकी उपज का इतना पैसा मिलने लगेगा कि सरकार की ज़रूरत ही बीच से हट जाएगी और इस प्रकार एक मुक्त कृषि व्यवस्था का विकास खुद ब खुद हो जाएगा। 

इससे पब्लिक सेक्टर बिल्कुल हट जाएगा। प्राइवेट मंडिया आएंगी और उससे प्राइस रिक्वरी होगी (यह टर्म अकसर देश के अर्थशास्त्री इस्तेमाल करते हैं)। प्राइस रिक्वरी का मतलब है कि किसानों को ज्यादा दाम मिलेगा। यानी किसानों को अपनी उपज के उचित मूल्य के लिये किसी की दया और कृपा पर निर्भर नहीं रहना होगा। उस समय यह कहा जा रहा था कि बिहार में एक नयी कृषि क्रांति आ जाएगी और बिहार पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन जाएगा। यह भी कहा गया कि अब पंजाब भूल जाएंगे और कृषि क्षेत्र के लिए बिहार देश का एक नया मॉडल साबित होगा। 14 साल हो चुके हैं, क्या ऐसा हुआ? जिन अर्थशास्त्रियों ने उस समय इस बात को प्रमोट किया था। वो आज आकर क्यों नहीं बताते कि इस रिफॉर्म से बिहार को क्या फायदा पहुंचा ? ऐसा नही है कि बिहार के खेत और ज़मीन कम उर्वर हैं, या वे मेहनती कम हैं, सरकार ने अपने शासन नीति में खेत, खलिहान और किसान को रखा ही नही। आज स्थिति यह है कि, बिहार के किसान पंजाब जाकर काम करते हैं ।  कहने का आशय है कि 2006 में अगर एपीएमसी मंडियां न हटाई गयी होतीं और इसके विपरीत, बिहार में मंडियों का नेटवर्क उसी तरह विकसित किया जाता, जिस तरह पंजाब में किया गया तो आज बिहार के हालात ऐसे नहीं होते। 

सरकार मंडियों को घाटे का सौदा समझती है और धीरे धीरे उपज की कीमत और मंडियां, सब कुछ कॉरपोरेट के हवाले कर के कृषि बाजार से ही हट जाना चाहती है। यह तो सरकार के नागरिक दायित्व से भागना हुआ। बात अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य की की जाती है, और सरकार इसे कह रही है कि यह जारी रहेगा, पर कैसे, कब तक, और किस तरह, इसका कोई उल्लेख नए कृषि क़ानून में नहीं है। एक बात हमे यह समझ लेनी चाहिए कि, एमएसपी फसल का उचित मूल्य नहीं है। यह न्यूनतम समर्थन मूल्य है। इससे कम कीमत पर की गयी खरीददारी पर रोक लगानी ही होगी अगर कृषि संस्कृति को जीवित रखना है तो। 

अब एमरसपी के बारे स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव जो कहते हैं उसे एक बार पढा जाना चाहिए। उनके अनुसार, 
● एमएसपी के बारे में पहला सच यह है कि, किसान की फसल का वाजिब दाम नहीं है। जैसे सरकार स्वयं कहती है, यह न्यूनतम मूल्य है। किसान को मेहनत का जितना कम से कम मेहनताना मिलना ही चाहिए, उसका सूचकांक है। यह देश का दुर्भाग्य है कि यह न्यूनतम भी किसान के लिए एक सपना बन गया है।
● दूसरा सच यह है कि इस न्यूनतम दाम की गिनती भी ठीक ढंग से नहीं होती। आज से 15 साल पहले स्वामीनाथन आयोग ने एमएसपी की सही गिनती का फार्मूला बताया था। आयोग का सुझाव था कि किसी किसान की संपूर्ण लागत पर 50% बचत जोड़कर एमएसपी तय होनी चाहिए। यानी कि अगर गेहूं की लागत ₹1600 प्रति क्विंटल है तो उसकी एमएसपी ₹2400 प्रति क्विंटल होनी चाहिए।
● तीसरा सच यह है कि यह एमएसपी भी देश के अधिकांश किसानों को नसीब नहीं होती। सरकार सिर्फ 23 फसलों में एमएसपी घोषित करती है। फल सब्जियों की एमएसपी घोषित ही नहीं होती। घोषणा के बाद सरकार सिर्फ दो-ढाई फसल में सचमुच न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देती है।
● चौथा सच यह है कि इस आधी अधूरी व्यवस्था को भी खतरा है। मोदी सरकार शुरू से ही एमएसपी से पिंड छुड़ाने के चक्कर में है। 2015 में शांताकुमार कमेटी सिफारिश कर चुकी है कि एफसीआई को सरकारी खरीद बंद कर देनी चाहिए।
● पांचवां बड़ा सच यह है कि सरकार चाहे तो इस व्यवस्था को दुरुस्त कर सकती है। किसान आंदोलन की मांग है कि सरकार एमएसपी को कानूनी दर्जा दे। यानी कि कॉन्ट्रैक्ट खेती और सरकारी मंडी के कानूनों में यह लिख दिया जाए कि कोई भी खरीद एमएसपी से नीचे मान्य नहीं होगी।

एमएसपी की गारंटी को सरकारी खरीद के अलावा अन्य कई व्यवस्थाओं से भी सुनिश्चित किया जा सकता है। सरकार बाजार में सीमित दखल देकर दाम बढ़ा सकती है, या किसान के घाटे की भरपाई कर सकती है। लेकिन ऐसी किसी भी व्यवस्था में सरकार का खर्चा होगा। सच यह है कि सरकार किसान को न्यूनतम दाम की गारंटी देने के लिए जेब से खर्च करने को तैयार नहीं है। और जबानी जमा खर्च से किसान को दाम मिल नहीं सकता। इन नए कृषि कानूनो से, किसानों की आय और खुशहाली उसी प्रकार बढ़ जाएगी, जैसे, नोटबन्दी से काला धन, और आतंकवाद खत्म हो गया है, जीएसटी से कर व्यवस्था सुधर गयी है और ताली थाली दीया बाती मार्का लॉकडाउन से कोरोना महामारी नियंत्रित हो गयी है। यह कानून किसी किसान के हित मे नहीं बल्कि सरकार के चहेते और गिरोही पूंजीपतियों के हित मे है, और इसका विरोध देश की कृषि संस्कृति को बचाये रखने के लिये आवश्यक है। 

( विजय शंकर सिंह ) 
 

Friday, 16 October 2020

स्वास्थ्य सेवाएं - क्या हम सच मे एक लोककल्याणकारी राज्य हैं ? / विजय शंकर सिंह


हमारा संविधान हमे एक लोककल्याणकारी राज्य का दर्जा देता है। लोककल्याणकारी राज्य का अर्थ समाज के हर तबके को उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति और उसके सम्यक विकास हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजी, रोटी, आवास की सुविधा प्रदान करना और एक ऐसे समाज तथा परिवेश का निर्माण करना, जो न केवल विचारों से प्रगतिशील हो बल्कि वह आर्थिक दृष्टि से भी उन्नतिकामी हो। पर हमारी सरकार अपने बजट का जितना स्वास्थ्य और चिकित्सा पर व्यय करती है वह दुनिया मे चौथे नम्बर पर सबसे कम है। यानी नीचे से हम चौथे नम्बर पर हैं। हर साल हमारी सरकार चुनाव में शहर शहर एम्स जैसे उन्नत और आधुनिक अस्पताल का वादा तो करती है पर वह वादा पूरा नहीं होता है तब तक नया चुनाव आ जाता है। अब नया चुनाव तो नया वादा। 

अब सवाल उठता है कि, क्या बजट 2020-21 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए किया गया आवंटन काफी है ? 
वित्तमंत्री  ने 2020-21 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में 10 फीसदी की वृद्धि ज़रूर की है, लेकिन तब भी विशेषज्ञों ने इस वृद्धि पर सवाल उठाया था और अब जब कोरोना के कारण हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा चरमरा रहा है, तब भी सवाल उठा रहे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वस्थ्य मिशन (एनआरएचएम) को इस साल बजट में मिला फंड पिछले साल के बजट के बराबर तो है पर अगर हम पिछले साल किये गए आवंटन के रिवाइज हुए आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि आवंटन कम ही हुए हैं। आंकड़े एक खूबसूरत तिलिस्म की तरह होते हैं, सच जानने के लिये उन्हें तोड़ना पड़ता है। 
 
एनआरएचएम को पिछले साल बजट में 27,039 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था। हालांकि नए आंकड़े बताते हैं कि असल में आवंटन इससे कुछ ज्यादा था। यह 27,833.60 करोड़ रुपए था। लेकिन इस साल का आवंटन पिछले साल के बजट में किये गए 27039.00 करोड़ रुपए के आवंटन के बराबर है। विशेषज्ञों के एक समूह द्वारा पन्द्रवें वित्त कमीशन को सौंपी गयी एक रिपोर्ट समेत कई अन्य रिपोर्ट्स ने यह बताया है कि ग्रामीण आबादी को उपचार मुहैया कराने वाली प्राथमिक चिकित्सा में ज्यादा फंडिंग की जरुरत है। एनएचआरएम का उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योकि, ग्रामीण स्वास्थ्य की यह एक धुरी है। समस्या, अपोलो, मैक्स, मेदांता में इलाज कराने वाले तबके के सामने नहीं है, समस्या उस तबके के सामने है जो कंधे, चारपाई और साइकिल पर कई किलोमीटर दूर से मरीज लेकर सरकारी अस्पतालों में पहुंचता है और फिर वहां सुविधाओं और डॉक्टरों के अभाव में धक्के खाता है। 
 
इस साल बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र का कुल 69,000 करोड़ रुपये का है जो,  पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी बढा हुआ है। अब अगर इसको मुद्रास्फीति दर के समानुपातिक लायें तो, दिसंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में सालाना आधार पर मुद्रास्फीति दर (इंफ्लेशन रेट) 7.5% ठहरता है । भारतीय स्वास्थ्य संगठन के सचिव अशोक केवी ने मीडिया को बताया कि, 
" बढ़े हुए आवंटन में से आधे से ज्यादा महंगाई दर को रोकने में ही चला जाएगा। इससे सरकार को क्या हासिल होगा। हम किसी भी तरीके से स्वास्थ्य को जीडीपी का 2.5 फीसदी आवंटन करने के 2011 के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाएंगे।" 
2011 में सरकार ने कहा था कि स्वास्थ्य बजट जीडीपी का 2.5 % होना चाहिए। पर यह हो न सका। अब तो फिलहाल जीडीपी की बात ही न की जाय क्योंकि वह माइनस 23.9% पर है। वित्त मंत्री ने पीपीपी मोड पर जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेजों से जोड़ने के नीति आयोग के प्रस्ताव पर भी मुहर लगाई। देश की सबसे बड़ी समस्या देश का नीति आयोग है जो हर योजना में पीपीपी का मॉडल घुसेड़ देता है जो सीधे सीधे निजीकरण की एक साजिश है। सरकार ने अभी इस स्कीम की डिटेल्स तय नहीं की है। जब विस्तृत शर्ते सामने आ जांय तभी कुछ इस बिंदु पर कहा जा सकता है । 

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने यह पहले ही साफ कर दिया है कि वे इस पीपीपी स्कीम को लागू नहीं करेंगे। आयोग का कहना है कि कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों ने कई टुकड़ों में पीपीपी मॉडल को लागू किया है। लेकिन उसके कोई बेहतर परिणाम नहीं निकले हैं। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे आप यह अंदाजा लगा सकें कि इन राज्यों का यह प्रयास सफल रहा है, क्योंकि इन राज्यों के बाद कहीं और इस स्कीम को लागू नहीं किया गया। साथ ही अगर निजी मेडिकल कॉलेजों को जिला अस्पतालों से जोड़कर डॉक्टरों की कमी पर ध्यान लाने की कोशिश की जा रही है, तो यह संभव नहीं है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने इस कदम का विरोध किया है और इसे, 'घर का सोना बेचने' जैसा बताया है।
 
अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री ने कहा था कि विदेश में हमारे स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी डिमांड है, लेकिन उनकी स्किल (योग्यता) वहां की जरूरतों के मुताबिक नहीं हैं। उन्होंने कहा 'मेरा प्रस्ताव है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और कौशल विकास मंत्रालय पेशेवर संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसे कोर्स डिजायन करें, जिससे हमारे स्वास्थ्य कर्मियों की क्षमताएं बढ़ सकें।' हालांकि विशेषज्ञों को ऐसे कोर्सेज की जरूरत नहीं लगती है। डाउन टू अर्थ नामक एक एनजीओ के अनुसार,
" हमारे यहां डॉक्टरों की कमी है। किसी भी सरकार को सबसे पहले भारतीय टैलेंट को यहीं बनाए रखने और उसे जरूरी संसाधन मुहैया कराने पर ध्यान देना चाहिए। आखिर जनता का पैसा ठीक इसका उलटा करने में क्यों ज़ाया किया जाए। " 
 
संक्रामक रोगों के प्रति आवंटन को पिछले साल के 5003 करोड़ रुपये से घटाकर 4459.35 रुपये कर दिया गया है। पिछले साल प्रकाशित हुई नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट में कहा गया था कि सभी बीमारियों में से संक्रामक रोग भारतीयों को सबसे ज्यादा बीमार बनाते हैं। ऐसे में सरकार द्वारा इस मद में आवंटन घटाने की बात समझ नहीं आती है। इन इन्फेक्शंस में मलेरिया, वायरल हेपेटाइटिस/पीलिया, गंभीर डायरिया/पेचिश, डेंगू बुखार, चिकिनगुनिया, मीसल्स, टायफॉयड, हुकवर्म इन्फेक्शन फाइलारियासिस, टीबी व अन्य शामिल हैं। विडंबना देखिये हम इस साल अब तक के सबसे जटिल और लाइलाज संक्रामक रोग, कोरोना 19 से रूबरू हो रहे हैं। इस संदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, किसी से छुपा नहीं है। 
 
एक योजना जिसके आवंटन में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है, वह है राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना। पिछले साल इस योजना को 156 करोड़ रुपये मिले थे, इस साल यह सिर्फ 29 करोड़ रह गए। आयुष्मान भारत के आवंटन में भी कोई वृद्धि नहीं की गयी है, यह भी तब जब इस योजना को बड़े धूमधाम से प्रधानमंत्री जी ने प्रचारित किया था।  भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक संस्थान को मिलने वाले फंड को भी 360.00 करोड़ रुपये से कम करके 283.71 करोड़ रुपये कर दिया गया है।जन औषधि केंद्रों का सभी जिलों तक विस्तार देने की बात कही गयी है। राज्य सभा में जून, 2019 में दी गई एक जानकारी के अनुसार, यह केंद्र खोलने के लिए केवल 48 जिले ही बाकी रह गए हैं।

सरकार हर योजना में पीपीपी मॉडल लाकर उनका निजीकरण करने की सोचती है। निजी क्षेत्रों में अस्पताल हैं और उनमे से कुछ बेहद अच्छे भी हैं। ऐसे अस्पतालों को सरकार रियायती दर पर ज़मीन देती है पर ये अस्पताल गरीब वर्ग की चिकित्सा में रुचि नही दिखाते हैं। हालांकि अदालतों के ऐसे आदेश भी हैं कि ऐसे अस्पताल, गरीब वर्ग के लिये कुछ प्रतिशत बेड सुरक्षित करें। सन 2000 ई में  में न्यायाधीश ए. एस. कुरैशी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी थी जिसका उद्देश्य निजी अस्पतालों में गरीबों के लिए निशुल्क उपचार से संबंधित दिशानिर्देश तय करना था। इस कमेटी ने सिफारिश की कि, रियायती दरों में जमीन हासिल करने वाले निजी अस्पतालों में इन-पेशेंट विभाग में 10 फीसदी और आउट पेशेंट विभाग में 25 फीसदी बेड गरीबों के लिए आरक्षित रखने होंगे। लेकिन यह धरातल पर नहीं हो रहा है। 

कोविड-19 महामारी जन्य स्वास्थ्य आपातकाल से बहुत पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस ( दुर्बल आय वर्ग ) के मरीजों की पहुंच निजी स्वास्थ्य सेवाओं तक हो सके, इसलिए उनके हक़ में, एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। जुलाई 2018 के उक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उन निजी अस्पतालों को, जो सरकारी रियायती दरों पर भूमि प्राप्त कर बने हैं को, आदेश दिया था कि, वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों को निशुल्क उपचार मुहैया कराएं। अदालत के अनुसार, 
" अगर अस्पताल इस आदेश का अनुपालन नहीं करेंगे तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।" 
अब सवाल उठता है कि अदालत के इन निर्देशों का पालन हो रहा है या नही इसे कौन सुनिश्चित करेगा ? उत्तर है सरकार।  पर सरकार क्या इसे मॉनिटर कर रही है ? क्या सरकार ने ऐसा कोई तंत्र विकसित किया है जो नियमित इन सबकी पड़ताल कर रहा है। 

हिंदी वेबसाइट कारवां के कुछ लेखों के अनुसार, सोशल जूरिस्ट नाम के एनजीओ के संचालक अशोक अग्रवाल कहते हैं,
“सरकारी जमीन पर बने दिल्ली के निजी अस्पतालों की पहचान की जा चुकी है। और उनमें आज कम से कम 550 बेड ईडब्ल्यूएस मरीजों के लिए आरक्षित हैं.” अग्रवाल नियमित रूप से जनहित याचिका दायर कर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के स्वास्थ और शैक्षिक अधिकारों को सुनिश्चित करने का प्रयास करते रहते हैं। 2002 में सोशल जूरिस्ट ने 20 निजी अस्पतालों के खिलाफ दिल्ली उच्च अदालत में याचिका दायर की थी क्योंकि इन अस्पतालों ने गरीबों का निशुल्क इलाज नहीं किया था। मार्च 2007 के फैसले में हाई कोर्ट ने कहा था कि न्यायाधीश कुरैशी समिति ने जो अनुशंसा की थी उनका पालन सिर्फ याचिका में उल्लेखित प्रतिवादी अस्पतालों को नहीं करना है बल्कि उनके जैसी स्थिति वाले सभी अस्पतालों को करना है। यह आदेश केवल दिल्ली के अस्पतालों के लिये नहीं है बल्कि देश भर के अस्पतालों के लिये दिया गया है। इसे मॉनीटर करने की जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार पर ही नहीं बल्कि समस्त राज्य सरकारों पर भी है। 

एक शोध पत्र के अनुसार, जो कारवां वेबसाइट पर है, 
" एक बड़ी समस्या यह है कि नियमों के होने के बावजूद निजी स्वास्थ्य क्षेत्र नियमों का पालन नहीं करते हैं।  डीजीएचएस के 14 मई के आदेश में यह बात दिखाई देती है। उस आदेश में डीजीएचएस ने निर्देश दिया था कि ईडब्ल्यूएस मरीजों के संबंध में जो नियम हैं उनका पालन अस्पताल करें। आदेश में लिखा है,  “हमारे ध्यान में लाया गया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चिन्हित अस्पतालों को पात्र मरीजों को निशुल्क उपचार देने के संबंध में जो निर्देश दिए हैं, उन नियमों के विपरीत जाकर ये अस्पताल ऐसे मरीजों से कोविड-19 किटी या जांच की फीस वसूल रहे हैं. ऐसा करना सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन है.” महानिदेशालय ने सभी चिन्हित निजी अस्पतालों को ईडब्ल्यूएस मरीजों को निशुल्क उपचार मुहैया कराने का आदेश देते हुए कहा है, 
“यदि ईडब्ल्यूएस के मरीज को उपचार देने से इनकार किया जाता है तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी.”

लेकिन अदालत के इस आदेश के बावजूद चीजें नहीं बदलीं है। निजी क्षेत्र द्वारा नियमों की अवहेलना का एक उदाहरण सोशल जूरिस्ट ने दिया जो इस प्रकार है।  
“1997 से दिल्ली सरकार ने दिल्ली सरकार कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (डीजीईएचएस) के तहत अपने कर्मचारियों और पेंशनधारियों का इलाज राहत दरों में करने वाले निजी अस्पतालों का पैनल बनाया था। जब ज्यादा मरीजों का सीजन होता है तो ये अस्पताल मरीजों को बेड देने से इनकार करते हैं। ये लोग उनको भाव देते हैं जो पैसा खर्च करते हैं. यह एक तरह का फ्रॉड है. अगर ये अस्पताल जरूरत के समय मरीजों का उपचार नहीं करेंगे तो मरीजों को वहां भेजा ही क्यों जाए? उन्हें पैनल में रखना ही क्यों?”

9 जून के डीजीएचएस के आदेश में लिखा है कि निजी अस्पताल डीजीईएचएस के उन लाभार्थियों को जिनमें कोविड-19 संक्रमण का शक है या जिन्हें कोविड-19 संक्रमण है उन्हें तब तक भर्ती नहीं कर रहे रहें जब तक कि ऐसे मरीज भारी-भरकम फीस जमा नहीं कर रहे। उस आदेश में लिखा है कि अस्पताल सामान्य दर पर मरीजों का इलाज कर रहे हैं जबकि उन्हें राहत दरों में उपचार करना चाहिए। आदेश में पैनल के अस्पतालों को याद दिलाया गया है कि 
" उन्हें कोविड-19 सहित सभी रोगों का इलाज स्वीकृत दरों में या पेंशनरों के मामले में निशुल्क करना होगा. अग्रवाल ने समझाया कि सरकारी स्वास्थ्य उपचार योजना के लाभार्थी सरकारी अस्पताल में उपचार नहीं कराना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि वे निजी अस्पताल में इलाज कराने के पात्र हैं. दूसरा कारण सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत है. गरीब से गरीब आदमी भी इन अस्पतालों में नहीं जाना चाहता।" 

कोरोना ने जिंदगी जीने का तरीका बदल दिया है। बदले हालात में सरकारी से लेकर निजी चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सा सेवा की सेहत व चाल बदलने लगी है। इससे देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों सहित स्वास्थ्य कर्मियों पर मानसिक, शारीरिक और प्रोफेशनल रूप से असर पड़ा है। शुरू में पीपीई किट, अस्पतालों में दवा, वेंटिलेटर के अभाव, बेड की अनुपलब्धता और जांच की समस्या तथा कोरोना से जुड़े भय ने, स्वास्थ सेवाओ को लगभग बेपटरी कर दिया है। अधिकतर चिकित्सक कोरोना के अतिरिक्त अन्य मरीजों को भी ठीक से न तो देख पा रहे थे और न ही, उनका नियमित इलाज कर पा रहे है। कई ऐसे भी चिकित्सक हैं जिन्होंने कोरोना के डर से अपने क्लीनिक बंद कर दिये तो कई चिकित्सक ऐसे भी हैं, जो चिकित्सा को  सेवा भावना के समकक्ष रख मरीजों का इलाज करने में जुटे हैं। अधिकतर निजी अस्पताल प्रबंधन कह रहे हैं कि कोरोना से निपटने के लिए लंबी लड़ाई लड़ने के लिए वृहत पैमाने पर कार्ययोजना बनानी होगी। किसी भी तंत्र की परख और परीक्षा संकट काल मे ही होती है, और कोरोना के इस संकट, आफत और आपातकाल ने हनारी स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारों की उनके प्रति नीयत तथा उदासीनता को उधेड़ कर रख दिया है। 

आज़ादी के पहले से अंग्रेजों ने देश भर में सिविल अस्पताल और कुछ मेडिकल कॉलेज खोले थे। लेकिन आज़ादी के बाद सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत देश भर में अस्पताल, प्राइमरी हेल्थ और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के रूप में सरकारी चिकित्सा सेवाओ का एक संजाल बिछाना शुरू कर दिया था। तब भी निजी अस्पताल थे पर कम थे। तब  अधिकतर निजी अस्पताल, किसी ट्रस्ट या, धर्मादा द्वारा संचालित थे, जो मूलतः  व्यावसायिक मनोवृत्ति के नहीं थे, बल्कि उनका उद्देश्य चैरिटी था। पर बाद में बड़े धनपतियों ने चैरिटी पर आधारित अस्पताल बनवाने और संचालित करने बंद कर दिए और 'दुनिया मे कुछ भी मुफ्त नही मिलता है' के स्वार्थी पूंजीवादी सिद्धांत पर महंगे अस्पताल बनवाने और संचालित करने लगे। अस्पताल अब उद्योग हो गया और वह जितना गुड़ डालियेगा उतना मीठा होगा के सिद्धांत पर चलने लगे। इसी के साथ साथ मेडिक्लेम जैसी चिकित्सा बीमा की योजनाएं आने लगी और इससे निजी अस्पतालों की एक नयी संस्कृति ही विकसित होने लगी। 

सरकारी अस्पताल कभी बजट की कमी से, तो कभी प्रशासनिक लापरवाही से तो कभी भ्रष्टाचार के कारण तो कभी निजी अस्पतालों के साथ सांठ गांठ से उपेक्षित होते चले गए और एक समय यह भी आया कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ही अपने मरीजों को उचित चिकित्सा के लिये निजी अस्पतालों के नाम बताने लगे और सरकार द्वारा निजी प्रैक्टिस पर रोक और नॉन प्रैक्टिसिंग भत्ता के बाद भी उनका झुकाव निजी अस्पतालों की ओर बना रहा। जिनके पास पैसा है, जिन्होंने मेडिक्लेम करा रखा है या जिनको सरकार और कंपनियों द्वारा चिकित्सा प्रतिपूर्ति की सुविधाएं हैं उन्हें तो कोई बहुत समस्याएं नहीं हुयी पर उन लोगो को जो असंगठित क्षेत्र में है और ऐसी किसी सुविधा से वंचित हैं, वे या तो अपनी जमा पूंजी बेचकर निजी अस्पतालों में इलाज कराते  हैं या फिर अल्प सांधन युक्त सरकारी अस्पताल की शरण मे जाते हैं। 

लोककल्याणकारी राज्य का पहला उद्देश्य ही है स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा सब नागरिकों को मिले। लेकिन सरकार स्वास्थ्य बीमा की बात करती है, पर बेहतर सरकारी अस्पतालों की बात नहीं करती है। सरकार का कोई भी नियंत्रण निजी अस्पतालों द्वारा लगाए गए शुल्क पर नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह निजी अस्पतालों के चिकित्सा दर को एक उच्चस्तरीय कमेटी बना कर कम से कम ऐसा तो कर ही दे, जिससे लोगो को उनकी आर्थिक क्षमता के अनुरूप स्वास्थ्य सुविधाएं तो मिल सके। अगर सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र में सरकारी अस्पतालों के प्रति उदासीनता बरतनी शुरू कर दी तो अनाप शनाप फीस लेने वाले निजी अस्पतालों का एक ऐसा मकड़जाल खड़ा हो जाएगा जो देश की साठ प्रतिशत आबादी को उचित चिकित्सा के अधिकार से वंचित कर देगा। सरकार द्वारा जिला अस्पतालों को पीपीपी मॉडल पर सौंपना, पूरी चिकित्सा सेवा के निजीकरण और सभी अस्पतालों को पूंजीपतियों को बेच देने का एक छुपा पर साथ ही अयां एजेंडा भी है। 

भारत मे ही, पहले भी सामुदायिक स्वास्थ्य के लिये मलेरिया, डिप्थीरिया, पोलियो, चेचक आदि संक्रामक रोगों से बचाव के लिये सघन टीकाकरण कार्यक्रम चलाए गए है, और यह सब एक अभियान के अंतर्गत निःशुल्क ही चलाये गए थे। लेकिन जब खुली अर्थव्यवस्था का दौर आया तो सब कुछ निजीकरण के उन्माद में सरकार ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी स्वास्थ्य को भी निजी क्षेत्रो के हवाले छोड़ दिया और पीपीपी मॉडल की बात करने लगी। निजी अस्पतालों का विकास हो, उन्हें सरकार जो सुविधा देना चाहे वह दे भी, पर सरकारी अस्पताल या सरकारी चिकित्सा इंफ्रास्ट्रक्चर जिंसमे गांव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर से लेकर एम्स जैसे सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और चिकित्सा विज्ञान संस्थान हैं की उपेक्षा तो न हो। अगर शिक्षा और चिकित्सा की मूलभूत सुविधाएं आम जनता को सरकार उपलब्ध नहीं करा सकती तो लोककल्याणकारी राज्य की बात करना महज एक पाखंड ही होगा। सरकार कोई साहूकार नही है जो हर काम व्यावसायिक लाभ के लिये ही करे। सरकार को चाहिए कि, वह एक सुगठित चिकित्सा तंत्र को विकसित करे जिससे समाज के उंस तबके को भी उपयुक्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो, जो बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों में धनाभाव के कारण इलाज कराने में सक्षम नहीं है। यह सरकार की कृपा नहीं बल्कि सरकार का दायित्व है और सरकारे इसीलिए चुनी भी जाती हैं। 

( विजय शंकर सिंह ) 

यह केयर्स फंड है या जबरन चंदा उगाहने का एक उपकरण ? / विजय शंकर सिंह

यह आंकड़ा केंद्र सरकार के 50 विभागों का है. 157.23 करोड़ रुपये के इस अनुदान में से 93 प्रतिशत से अधिक की धनराशि यानी क़रीब 146 करोड़ रुपये अकेले रेलवे के कर्मचारियों के वेतन से दान किए गए हैं.

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा सूचना का अधिकार कानून यानी कि आरटीआई एक्ट के तहत प्राप्त की गई जानकारी के मुताबिक इस राशि में से 146.72 करोड़ रुपये अकेले रेलवे से दान किए गए हैं. यह केंद्रीय कर्मचारियों द्वारा कुल 157.23 करोड़ रुपये के अनुदान का 93 फीसदी से अधिक है.

इसके बाद दूसरे नंबर पर अंतरिक्ष विभाग है, जिसके कर्मचारियों के वेतन से पीएम केयर्स फंड में 5.18 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया. विभाग ने बताया कि कर्मचारियों ने अपने स्तर पर ये राशि दान की है.

अंतरिक्ष विभाग के बाद पर्यावरण विभाग की ओर से 1.14 करोड़ रुपये का योगदान दिया गया है।

मालूम हो कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जनता से आर्थिक मदद प्राप्त करने के लिए 27 मार्च 2020 को पीएम केयर्स फंड का गठन किया गया था, लेकिन तभी से यह फंड अपने कामकाज में अत्यधिक गोपनीयनता बरतने को लेकर आलोचनाओं को घेरे मे है।

 विभिन्न मंत्रालय और विभागों की ओर पीएम केयर्स फंड में दान की गई राशि. (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)पीएमओ ने कहा है कि पीएम केयर्स फंड आरटीआई एक्ट, 2005 के तहत ‘पब्लिक अथॉरिटी’ नहीं है, क्योंकि इसका गठन केंद्र सरकार या किसी सरकारी आदेश के जरिये नहीं हुआ है. इस आधार पर प्रधानमंत्री कार्यालय पीएम केयर्स से जुड़ी कोई भी जानकारी को आरटीआई एक्ट के तहत सार्वजनिक करने से इनकार कर रहा है।

लंबे समय के बाद पीएम केयर्स ने सिर्फ ये जानकारी दी है कि इस फंड को बनने के पांच दिन के भीतर यानी कि 27 मार्च से 31 मार्च 2020 के बीच में कुल 3076.62 करोड़ रुपये का डोनेशन प्राप्त हुआ है. 

इसमें से करीब 40 लाख रुपये विदेशी चंदा है.आरटीआई के जरिये पता चला था कि महारत्न से लेकर नवरत्न तक देश भर के कुल 38 सार्वजनिक उपक्रमों यानी कि पीएसयू या सरकारी कंपनियों ने पीएम केयर्स फंड में 2,105 करोड़ रुपये से ज्यादा की सीएसआर राशि दान की है.

सार्वजनिक उपक्रम ओएनजीसी ने सबसे ज्यादा 300 करोड़ रुपये, एनटीपीसी ने 250 करोड़ रुपये, इंडियन ऑयल ने 225 करोड़ रुपये सीएसआर राशि पीएम केयर्स फंड में डोनेट की है.नियम के मुताबिक, सीएसआर राशि को उन कार्यों में खर्च करना होता है, जिससे लोगों के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, नैतिक और स्वास्थ्य आदि में सुधार हो तथा आधारभूत संरचना, पर्यावरण और सांस्कृतिक विषयों को बढ़ाने में मदद मिल सके.

इंडियन एक्सप्रेस की ही एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के कम से कम सात बैंकों और सात अन्य शीर्ष वित्तीय व बीमा संस्थाओं ने अपने कर्मचारियों के वेतन से कुल मिलाकर 204.75 करोड़ रुपये की राशि पीएम केयर्स फंड में दान की है.इसके अलावा कई केंद्रीय शिक्षण संस्थानों ने अपने स्टाफ की सैलरी से पीएम केयर्स में 21.81 करोड़ रुपये की राशि दान की है। 

( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 14 October 2020

वे किसानों को उद्यमी बनाना चाहते है, यह एक ताजा जुमला है / विजय शंकर सिंह


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, पूर्व केंद्रीय मंत्री बालासाहेब विखे पाटिल की आत्मकथा का विमोचन करते हुए कहा है कि, 
" उनकी सरकार आज किसानों को अन्नदाता की भूमिका से आगे ले जाकर ‘उद्यमी’ बनाने की ओर प्रयास कर रही है।"
वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए आयोजित इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने विखे पाटिल का उल्लेख करते हुए, अपने संबोधन में कहा है कि,
" गांव, गरीब, किसान का जीवन आसान बनाना, उनके दुख, उनकी तकलीफ कम करना, विखे पाटिल के जीवन का मूलमंत्र रहा। विखे पाटिल ने सत्ता और राजनीति के जरिए हमेशा समाज की भलाई का प्रयास किया। उन्होंने हमेशा इसी बात पर बल दिया कि राजनीति को समाज के सार्थक बदलाव का माध्यम कैसे बनाया जाए, गांव और गरीब की समस्याओं का समाधान कैसे हो।" 

किसान ‘अन्नदाता’ से ‘उद्यमी’ बनेंगे कैसे, इस का खुलासा करते हुए प्रधानमंत्री जी कहा है, कि, 
" उत्पादकता की चिंता में सरकारों का ध्यान किसानों के फायदे की ओर गया ही नहीं। उसकी आमदनी लोग भूल ही गए। लेकिन पहली बार इस सोच को बदला गया है। देश ने पहली बार किसान की आय की चिंता की है और उसकी आय बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास किया है। "
आगे वे कहते हैं, 
" चाहे वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लागू करने की बात हो या उसे बढ़ाने का फैसला, यूरिया की नीम कोटिंग हो या बेहतर फसल बीमा, सरकार ने किसानों की हर छोटी-छोटी परेशानियों को दूर करने की कोशिश की है। आज खेती को, किसान को अन्नदाता की भूमिका से आगे बढ़ाते हुए, उसको उद्यमी बनाने की तरफ ले जाने के लिए अवसर तैयार किए जा रहे हैं। कोल्ड चैन, मेगा फ़ूड पार्क और एग्रो प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी अभूतपूर्व काम हुआ है। गांव के हाटों से लेकर बड़ी मंडियों के आधुनिकीकरण से भी किसानों को लाभ होने वाला है। "

हालांकि, प्रधानमंत्री जी ने जिन जिन विन्दुओ का उल्लेख किया है अगर उन विन्दुओ की गहन समीक्षा की जाय तो सरकार की नाकामी, चाहे वह फसल बीमा का वादा हो, या मेगा फूड पार्क का, या कोल्ड चेन का या एग्रो प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का, हर विंदु में मिलेगी। इनपर अलग से समीक्षा की जाएगी। 

उनके हर भाषण की तरह यह विमोचन भाषण भी कर्णप्रिय था। पर तीन किसान बिलो पर जिसका किसान विरोध कर रहे हैं, का उन्होंने कोई उल्लेख अपने भाषण में नहीं किया। या तो उन्होंने, इन आंदोलनों और किसानों की व्यथा को गंभीरता से नहीं लिया या इसका कोई दलगत राजनीतिक कारण है, यह मैं स्पष्ट नहीं बता पाऊंगा। इन्ही कानूनो में, जमाखोरी को कैसे कानूनन वैधता दी गई, सरकारी मंडियों की तुलना में कैसे बडे कॉरपोरेट और कंपनियों को अपनी मण्डिया बनाने की खुली छूट और अपनी मनमर्जी से किसानों से उनका उत्पाद खरीदने की स्वतंत्रता और कॉट्रेक्ट फार्मिंग में कोई विवाद होने पर कैसे सरकार ने न्यायालय का रास्ता ही बंद कर दिया है, इस पर उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। सरकार के पिछले वादों का ट्रैक रिकॉर्ड यह बताता है कि, यह भाषण भी काला धन लाने, और अन्य जुमलों की फेहरिस्त में शुमार होकर अंततः ठंडे बस्ते में दफन होकर रह जायेगा। 

सरकार की मंशा अब साफ हो रही है। भारतीय जनता पार्टी, खेती किसानी के पक्ष में कभी रही ही नही। आज भी नही है। बीजेपी, खेती किसानी को, जो एक समृद्ध ग्रामीण संस्कृति है, से हटा कर कृषि में उद्योगपतियों को लाना चाहती है और किसानों को मज़दूर बना कर शहरों में पटक देना चाहती है। वर्ल्ड बैंक की एक लंबी योजना है कि भारत की ग्रामीण आबादी कम हो और अधिकतर लोग शहरों में बस जांय और वे या तो पूंजीपतियों के लिये सस्ते श्रम में बदल जांय या दस पंद्रह हजार रुपये के एक ऐसे मध्यवर्ग में तब्दील हो जांय जो सुबह से शाम तक अपनी दुश्चिंताओं में ही व्यस्त रहे और किसी भी व्यापक परिवर्तन के बारे में सोच ही न सके। 

वर्ल्ड बैंक लम्बे समय से इस एजेंडा पर काम कर रहा है। उसे यह पता है कि भारत की मरी गिरी अर्थव्यवस्था को भारतीय कृषि की उर्जा और जिजीविषा, उसे पुनः खड़ी कर देती है और यही ऊर्जा देश को आत्मनिर्भर बना सकती है। अतः इस सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट घुसना चाहते हैं और यह तीन किसान कानून, वर्ल्ड बैंक और कॉरपोरेट की चाल को कामयाब बनाने की ओर सरकार प्रायोजित एक कदम हैं। ऐसा नही कि वर्ल्ड बैंक का दबाव इसी सरकार पर पड़ रहा है। बल्कि यह दबाव पहले की सरकारों पर भी लगातार पड़ता रहा है। पर यह सरकार जितना अधिक आज  वर्ल्ड बैंक या अमेरिकी लॉबी के समक्ष नतमस्तक है, उतना पहले की सरकारे, कृषि सेक्टर के मामलों में नही रही हैं। 

आज किसान, जिसके पास थोड़ी बहुत ज़मीन भी है वह ज़मीन से जुड़े आत्मसम्मान पर गर्व करता है। 1954 में जब ज़मीदारी उन्मूलन किया गया तो काश्तकार अपने भूमि के स्वामी हो गए और जो भी ज़मीन उनके हिस्से में आयी उससे वे जो भी अनाज या अन्य कोई कृषि उत्पाद, उपजा सकते हैं, उपजा रहे हैं। यह बात सही है कि खेती एक लाभदायक कार्य नहीं है पर केवल इसी एक तर्क पर तो खेती छोड़ कर किसान शहर में जाकर रिक्शा तो नही चलाने लगेगा। 

सरकार ने आज़ादी के बाद खेती किसानी के लिये बहुत से कार्य किये। तरह तरह के कृषि विज्ञान से जुड़े संस्थान खोले गए, कृषि विश्वविद्यालय खुले, कृषि विज्ञान केन्दों की श्रृंखला खोली गयीं, एक एक उपज, जैसे गन्ना, चावल, आलू, दलहन, शाकभाजी आदि के लिये अलग अलग शोध केंद्र खोले गए और 1971 में हुयी हरित क्रांति ने भारत के कृषि क्षेत्र की तकदीर बदल कर रख दी। न केवल अनाज बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी देश का उत्पादन बढ़ा और हरित क्रांति के बाद भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया। 

सरकार ने किसानों को प्रोत्साहन देने के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रथा शुरू की। इसके लिये डॉ एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया जिसने एमएसपी के लिये एक तार्किक फॉर्मूला सरकार के समक्ष रखा। सभी सरकारों ने इस फॉर्मूले से सहमति प्रगट की और उसे लागू करने का आश्वासन भी दिया। पर इन सिफारिशों को लागू, किसी भी सरकार ने नहीं किया, न तो कांग्रेस की यूपीए सरकार ने और न ही भाजपा की एनडीए सरकार ने। सरकारों की इसी वादाखिलाफी से आज किसान सशंकित हैं और इसीलिए, जब प्रधानमंत्री बार बार यह कह कर, उन्हें आश्वस्त कर रहे हैं कि, मण्डिया रहेंगी और एमएसपी पर खरीद जारी रहेगी तो वे इस पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं और वे सड़को पर हैं तथा यह मांग कर रहे हैं कि इन आश्वासनों को एक संशोधन के ज़रिए उन कानूनो में जोड़ा जाय। सरकार ज़ुबानी तो कह रही है पर कानून में जोड़ने के नाम पर आनाकानी कर रही है। 

1991 के बाद सरकार की प्राथमिकताएं बदल गयी। सरकार को कृषि पर मिलने वाली सब्सिडी फिजूलखर्ची लगने लगीं। खुली अर्थव्यवस्था और वित्तीय सुधारों के नाम पर कृषि प्राथमिकता में नीचे होने लगी। खुली अर्थव्यवस्था और उदारीकरण पर आधारित वित्तीय सुधारो का लाभ भी हुआ और समृद्धि भी आई। पर यह विकास नगरकेन्द्रित रहा और कृषि कर्म उपेक्षित होता गया। इसका एक बड़ा कारण उद्योगपतियों की बढ़ती संख्या और धनबल ने उन्हें एक सशक्त दबाव ग्रुप में बदल दिया और किसान, अनेक संगठनों के बावजूद, असंगठित बने रहे। जनप्रतिनिधियों ने भी पूंजीपतियों का दामन थामा और किसान महज अन्नदाता झुनझुना लिये पड़ा रहा। 

औद्योगिकरण ज़रूरी है पर वह कृषि की तुलना में, कृषि से अधिक महत्वपूर्ण नही है। भारत की अर्थव्यवस्था की एक मजबूत रीढ़ खेती है। इसीलिए यदि एक साल भी मानसून का क्रम बिगड़ता है तो, वित्त मंत्रालय चिंता में पड़ आता है। आज जिस मांग की कमी सरकार महसूस कर रही है और एलटीसी के रूप में दस हज़ार रुपए अग्रिम देने का झांसा जिन शर्तो पर दे रही है, उससे सरकार की बदहवासी साफ जाहिर है। आज बिगड़ी हुयी अर्थव्यवस्था को सरकार,  भले ही कोरोना के मत्थे डाल दे,  पर वास्तविकता यह है कि 2016 की 8 नवम्बर को 8 बजे प्रधानमंत्री ने जिस नोटबन्दी के कदम की घोषणा की थी, वह आज आर्थिक दुरवस्था के लिये सबसे अधिक जिम्मेदार है। 

नोटबन्दी, अर्थव्यवस्था के पतनकाल का वह प्रारंभ था। उस अभूतपूर्व मूर्खता भरे कदम के लिए, सरकार का जो भी मंत्री या अफसर जिम्मेदार है, उसे इतिहास में देश को पतनोन्मुख होने वाली अर्थव्यवस्था के लिये जिम्मेदार माना जायेगा। उसके बाद तो फिर अन्य गलतिया भी होती गई। जैसे, जीएसटी का बेहद अकुशल क्रियान्वयन, बिना सोचे समझे लॉकडाउन का निर्णय, जब कोरोना देश मे फैलने लगा था तब नमस्ते ट्रम्प का तमाशा हर योजना के केंद्र में केवल कुछ चुने हुए पूंजीपति घराने, ओर आर्थिक नीति के नाम पर सरकारी सम्पदा का अतार्किक निजीकरण, कहने का आशय यह है कि आज आईएमएफ ने भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से भी कम का आंकड़ा जारी किया है। 

2014 में सरकार जब से आयी है उसके चेतन में गिरोहबंद पूंजीवाद और अवचेतन में पाकिस्तानी बसा हुआ है। गौरक्षा, लव जिहाद, धार्मिक मसले तो सरकार की प्राथमिकता में थे पर आर्थिक मसलों को सरकार ने कभी भी गवर्नेंस की प्राथमिकता में रखा ही नही। सिवाय इस भाषण के कि, 2025 तक 5 ट्रिलियन की आर्थिकी हो जाएगी और 2022 तक किसानों की आय दुगुनी हो जाएगी। और आज कहा जा रहा है कि, किसानों को सरकार उद्यमी बनाना चाहती है। जबकि हालत यह है कि किसान अपनी संस्कृति और ज़मीन बचा सकें तो यही बहुत है। 

बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार के अनुसार, भारत, दक्षिण एशिया में तीसरा सबसे गरीब देश होगा।
2020 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश से भी कम होगी।आईएमएफ के वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक ( WEO ) के अनुसार, बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी, डॉलर के मूल्य के अनुसार, 2020 में 4 % बढ़ कर 1,888 डॉलर हो जाएगी। भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10.5% नीचे गिर कर, 1,877 डॉलर रह जायेगी। यह गिरावट पिछले चार साल में सबसे अधिक है। दोनो देशों के यह आंकड़े उनके चालू बाजार भाव के आधार पर निकाले गए हैं। इन आंकड़ो के अनुसार, भारत दक्षिण एशिया में, पाकिस्तान और नेपाल के बाद, तीसरा सबसे गरीब देश हो जायेगा, जबकि बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका और मालदीव, आर्थिक क्षेत्र में, भारत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। 

डब्ल्यूईओ (WEO) के आंकड़ो के अनुसार, कोरोना महामारी का असर, श्रीलंका के बाद सबसे अधिक भारत पर पड़ा है। इस वित्तीय वर्ष में, श्रीलंका की प्रति व्यक्ति जीडीपी भी 4 % से नीचे गिरेगी। इसकी तुलना में नेपाल और भूटान की अर्थव्यवस्था में इस साल सुधार आएगा। WEO ने पाकिस्तान से जुड़े आंकड़े अभी जारी नहीं किये हैं। हालांकि, अच्छी खबर यह भी है कि, आईएमएफ ने 2021 में भारत की आर्थिकी में तेजी से वृद्धि की संभावना भी जताई है। 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी, बांग्लादेश से थोड़ी ऊपर हो सकती है। 

डॉलर के मूल्य के अनुसार, 2021 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 8.2% बढ़ सकने की संभावना है। इसी अवधि में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी के 5.4% होने की संभावना व्यक्त की गयी है। इस सम्भावित वृद्धि से भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी, 2,030 डॉलर होगी जबकि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी, 1990 डॉलर रहेगी। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, आईएमएफ ने कहा है कि, 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी, बांग्लादेश से भी नीचे जा सकती है। आईएमएफ की इस चेतावनी को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। 

सरकार अपने आर्थिक नीतियों में बुरी तरह विफल हो रही है। फिलहाल सरकार के पास, न तो कोई आर्थिक सोच  है और न ही कोई ऐसी योजना है, जिससे तरक़्क़ी की राह दिखे। ऐसी आलमे बदहवासी में हर आर्थिक दुरवस्था का एक ही उपाय सरकार की समझ मे आता है, निजीकरण यानी देश की संपदा को अपने चहेते गिरोही पूंजीपतियों को औने पौने दाम बेच देना और जब विरोध के स्वर उठें तो विभाजनकारी एजेंडे पर आ जाना। सरकार को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि को ऐसे दबाव और पूंजीवादी गिरोहबंदी से बचा कर रखना होगा अन्यथा देश आर्थिक रूप से अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट का ग़ुलाम बन कर रह जायेगा। भारतीय कॉरपोरेट भले ही आज सामने दिखे, पर अंततः व्यापार में बड़ी मछली द्वारा छोटी मछली को निगलने का सिद्धांत, पूंजीवाद का मूल चरित्र है। सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों, श्रम कानून, औद्योगिक नीतियों और कृषि नीतियों की समीक्षा करनी होगी, अन्यथा हम अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेट के लिये एक चारागाह बन कर रह जाएंगे। 

( विजय शंकर सिंह )