Tuesday, 19 September 2023

अडानी घोटाले की जांच के लिए गठित, एक्सपर्ट कमेटी के तीन सदस्यों पर अडानी से निकटता और हितों के टकराव का आरोप / विजय शंकर सिंह

अडानी-हिंडनबर्ग मामले के संदर्भ में, एक ताजे घटनाक्रम के अनुसार, अडानी समूह की कंपनियों के खिलाफ अदालत की निगरानी में जांच की मांग करने वाले याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में एक नया हलफनामा दायर किया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के खिलाफ आशंकाएं जताई गई हैं। याचिकाकर्ता अनामिका जयसवाल द्वारा दायर हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि समिति के छह में से तीन सदस्य अपने बैकग्राउंड और अडानी समूह के साथ संबंधों के चलते, "देश के लोगों के बीच, निष्पक्षता का विश्वास पैदा करने में विफल रहे।" 

उल्लेखनीय है कि, 3 मार्च, 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने अडानी-हिंडनबर्ग मुद्दे के, संदर्भ आलोक में, नियामक तंत्र SEBI  सेबी द्वारा जांच और समीक्षा के लिए, एक एक्सपर्ट कमेटी समिति का गठन किया था। इस कमेटी में, ओपी भट्ट, जस्टिस जेपी देवधर, बॉम्बे HC के पूर्व न्यायाधीश, केवी कामथ, नंदन नीलेकणि और श्री सोमशेखर सुंदरेसन, सदस्य हैं, और इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस (सेवानिवृत्त) अभय मनोहर सप्रे बनाए गए। 

अनामिका जायसवाल के हलफनामे के अनुसार, "विशेषज्ञ समिति के सदस्यों में से एक, भारतीय स्टेट बैंक एसबीआई के पूर्व अध्यक्ष ओपी भट्ट, वर्तमान में ग्रीनको के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।  हलफनामे में इसे प्रमुखता के साथ रेखांकित किया गया है कि, मार्च, 2022 से ग्रीनको और अडानी समूह, भारत में अडानी समूह के साथ,  ऊर्जा सेक्टर में, "एक करीबी साझेदारी" के रूप में काम कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि, "हितों के इस स्पष्ट टकराव (Conflict of interest) को खुद भट्ट द्वारा, समिति का सदस्य नामित होते ही, सुप्रीम कोर्ट को, इस तथ्य से अवगत कराया जाना चाहिए था।

इसके अतिरिक्त, हलफनामे में कहा गया है कि, "ओपी भट्ट से, मार्च 2018 में भगोड़े आर्थिक अपराधी, विजय माल्या को ऋण देने में कथित लिप्तता के आरोप में, भी पूछताछ की गई थी।"  
यह भी आरोप लगाया गया है कि, "भट्ट ने 2006 और 2011 के बीच एसबीआई के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त थे, जबकि उसी अवधि में, एसबीआई द्वारा, अधिकांश ऋण, विजय माल्या की कंपनियों को दिए गए थे। सीबीआई ने आरोप लगाया है कि एसबीआई के नेतृत्व वाले ऋणदाताओं के संघ ने माल्या की कंपनियों की 'खराब वित्तीय स्थिति' के बारे में पता होने के बावजूद कोई 'फॉरेंसिक ऑडिट' नहीं किया।"

हलफनामे में समिति के सदस्य के रूप में एक नाम,  सोमशेखर सुंदरेसन का भी है। इनके खिलाफ भी, आरोप और आशंकाएं जताई गई हैं। हलफनामे में, दावा किया गया है कि, "सुंदरेसन सेबी बोर्ड सहित विभिन्न मंचों पर अडानी का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील रहे हैं।" इसके अलावा, हलफनामे के अनुसार, "याचिकाकर्ता द्वारा पहले भी हितों के इस टकराव की ओर इशारा किया गया था।"

अंत में, हलफनामे में कहा गया है कि, "केवी कामथ, जो 1996 से 2009 तक आईसीआईसीआई ICICI बैंक के अध्यक्ष थे, का नाम आईसीआईसीआई बैंक धोखाधड़ी मामले में सीबीआई की एफआईआर में आया था। धोखाधड़ी का यह मामला, चंदा कोचर से संबंधित है, जिन्होंने 2009 से 2018 तक आईसीआईसीआई बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ के रूप में कार्य किया।"

हलफनामे के अनुसार, "सीबीआई CBI ने आरोप लगाया है कि, उन्हें और उनके परिवार को उनके कार्यकाल के दौरान वीडियोकॉन समूह को प्रदान किए गए ऋणों के बदले विभिन्न रिश्वतें मिलीं, जिनमें से कई गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) में बदल गईं। केवी कामथ उस समय बैंक के गैर-कार्यकारी अध्यक्ष थे, जब कुछ  उन ऋणों को मंजूरी दी गई थी।" 

इसी संदर्भ में, याचिकाकर्ता ने विशेषज्ञ समिति को भंग करने और एक नई समिति के गठन की मांग की है। हलफनामा में यह प्रार्थना किया गया है कि, "ऐसी आशंका है कि वर्तमान विशेषज्ञ समिति (एक्सपर्ट कमेटी) देश के लोगों में विश्वास जगाने में विफल रहेगी। इसलिए आदरपूर्वक प्रार्थना की जाती है कि एक नई विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए।"

इस हलफनामे के, ठीक एक सप्ताह पहले, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि, "भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के मामले की जांच में स्पष्ट रूप से 'हितों का टकराव' था और बाजार नियामक उल्लंघनों और मूल्य हेरफेर के आरोप में, अडानी समूह को, एक बचाव 'ढाल' देने के लिए, सेबी में, कई संशोधन किए गए थे। मई में, विशेषज्ञ समिति ने अडानी समूह की कंपनियों के संबंध में सेबी की ओर से नियामक विफलता के आरोप को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Sunday, 17 September 2023

ईडी की नोटिस, को सीएम झारखंड, हेमंत सोरेन की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती / विजय शंकर सिंह

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जारी नवीनतम समन/नोटिस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेता हेमंत सोरेन ने पहले केंद्रीय एजेंसी ईडी, द्वारा पहले जारी किए गए समन को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें उन्हें रांची में भूमि पार्सल की धोखाधड़ी की बिक्री से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के संबंध में पूछताछ के लिए उपस्थित होने के लिए कहा गया था।  .

हेमंत सोरेन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया गया है कि, प्रवर्तन निदेशालय ने सुप्रीम कोर्ट में, लंबित कानूनी चुनौती के बावजूद, उन्हें समन जारी करना, जारी रखा है। जारी नवीनतम समन पर रोक लगाने और उसे रद्द करने की मांग करने वाली अपनी हालिया याचिका में, मुख्यमंत्री ने उन्हें 'धमकाने, अपमानित करने और डराने-धमकाने' के लिए 'बार-बार' किए गए समन को 'राजनीति से प्रेरित' बताया है। हेमंत  सोरेन के अनुसार, ये सम्मन 'अपमानजनक, अनुचित और अवैध' होने के अलावा, किसी राज्य के मुख्यमंत्री के उच्च पद को कमजोर करने का भी प्रभाव रखते हैं।  इस संबंध में, उन्होंने आगे बताया कि सम्मन कथित तौर पर उन्हें झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में संबोधित किया गया है, न कि व्यक्तिगत क्षमता में।

 “…याचिकाकर्ता का संदर्भ और ‘झारखंड के मुख्यमंत्री’ के रूप में उनकी उपस्थिति की मांग करना न केवल अनुचित है, बल्कि उनके पद का अत्यधिक अपमान भी है।  सम्मन का स्वरूप, अपने आप में ही, प्रवर्तन निदेशालय के राजनीतिक मकसद और एजेंडे को उजागर करता है जिसने, अपने कार्यों से, उस उद्देश्य को कमजोर कर दिया है जिसके लिए इसे एक, वैधानिक प्राधिकरण के रूप में गठित किया गया था।"

सोरेन ने दावा किया है कि, केंद्रीय एजेंसी प्रमुख विपक्षी नेताओं का 'पीछा' करने के लिए केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही है। आगामी आम चुनावों के मद्देनजर और भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन, INDIA/इंडिया नामक विपक्षी मोर्चे के गठन के बाद कथित तौर पर इस तरह की टारगेटेड नोटिस में तेजी आई है।  

आवेदन में कहा गया है, 
“प्रवर्तन निदेशालय इस देश में विपक्ष को चुप कराने के लिए एक राजनीतिक उपकरण बनकर रह गया है। केंद्र सरकार उन विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए प्रवर्तन निदेशालय का उपयोग कर रही है जो एनडीए सरकार के साथ नहीं हैं और आम चुनावों की तारीख तेजी से नजदीक आने और विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A के गठन के साथ इस टारगेटेड नोटिस प्रक्रिया में तेजी आई है। आम चुनाव नजदीक आने के साथ, सत्तारूढ़ शासन द्वारा देश में राजनीतिक माहौल खराब कर दिया गया है और राजनीतिक नेताओं को अपमानित करने और डराने के सभी प्रयास किए जा हैं, खासकर, जब विपक्ष ने I.N.D.I.A बनाने के लिए एकजुट होकर गठबंधन कर लिया है तब। विवादित समन की टाइमिंग, I.N.D.I.A. के समानांतर है।  इंडिया एलायंस की बैठक,  मुंबई में, 1 सितंबर को हुई थी।"

हेमंत सोरेन ने परिणामस्वरूप तर्क दिया है कि, "प्रवर्तन निदेशालय को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'नियंत्रित' करने और उसके कामकाज की निगरानी करने की आवश्यकता है। "यह भी सुनिश्चित करने की जरूरत है कि जांच मशीनरी के इस तरह के बेशर्म दुरुपयोग की अनुमति नहीं हो।" 

"लोकतंत्र में कानून का शासन बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि [प्रवर्तन निदेशालय] की शक्तियों को [सुप्रीम कोर्ट] द्वारा नियंत्रित, नियंत्रित, सीमित और विनियमित किया जाए, और इसके लिए मानदंड निर्धारित किए जाय। अन्यथा यह एजेंसी, उन लोगों के विरुद्ध, वैसे ही काम करती रहेगी  करना, जो सत्तारूढ़ शासन के साथ अनुकूल स्थिति में नहीं हैं, उन लोगों को निशाना बनाने के लिए अपनी शक्तियों का बेशर्मी से दुरुपयोग करना।

 न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ केंद्रीय एजेंसी द्वारा पहले जारी किए गए समन को चुनौती देने वाली सोरेन द्वारा दायर रिट याचिका पर कल यानी सोमवार, 18 सितंबर को सुनवाई करेगी।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Friday, 15 September 2023

मीडिया ट्रायल और मुकदमों का ब्रीफिंग मैनुअल / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय को तीन महीने की अवधि के भीतर पुलिस कर्मियों द्वारा मीडिया ब्रीफिंग पर एक व्यापक मैनुअल तैयार करने का निर्देश दिया है।  सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) को मैनुअल के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया।  इसके अतिरिक्त, अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के इनपुट पर भी विचार किया जाए।

इस तरह के मैनुअल की जरूरत इसलिए पड़ी कि, लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा है कि, आपराधिक मुकदमों, की रिपोर्टिंग के समय, कुछ न्यूज चैनल, उन मुकदमों के बारे में, जो खबरें प्रसारित करते हैं, वे खबरें कम, एक प्रकार की समानांतर तफ्तीश होती है। कतिपय मुकदमों की पुलिस द्वारा की जा रही तफ्तीशों में, बहुत से तथ्य ऐसे होते हैं, जिनकी पुष्टि की जानी, अभी बाकी होती है और उनके सार्वजनिक हो जाने से, न सिर्फ उन मुकदमों की तफ्तीश पर असर पड़ता है बल्कि सुबूतों के साथ भी छेड़छाड़ होने की संभावना रहती है। इस तरह से कुछ टीवी चैनल, उन मुकदमों की ब्रेकिग न्यूज चला कर, जनमानस में एक पूर्वाग्रह का वातावरण भी बना देते हैं। अभियुक्त, सक्षम अदालत में, दोषी ठहराए जाने के पहले ही, मीडिया और मीडिया के इस संक्रमण के कारण, समाज में, दोषी की तरह देखा जाने लगता है। 

मीडिया ट्रायल की इन सब समस्याओं से निपटने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने एक ब्रीफिंग  मैनुअल बनाने का निर्देश दिया है। फिलहाल अदालत के सामने, यह  मामला दो महत्वपूर्ण मुद्दों से संबंधित है: पहला, मुठभेड़ों की स्थिति में पुलिस द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं, और दूसरा, चल रही आपराधिक जांच के दौरान मीडिया ब्रीफिंग करते समय पुलिस द्वारा कतिपय प्रोटोकॉल का पालन। जबकि मुठभेड़ वाला मुद्दा, पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य के 2014 के फैसले में संबोधित किया गया था और, सर्वोच्च न्यायालय, अब मीडिया ब्रीफिंग वाले मामले पर केंद्रित है।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने इस मुद्दे के बढ़ते महत्व, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रिपोर्टिंग के उभरते और बदलते परिदृश्य के मद्देनजर, जोर दिया है। उन्होंने कहा है कि, "इस मामले में सार्वजनिक हित की कई परतें शामिल हैं, जिनमें जांच के दौरान जनता के जानने का अधिकार (सूचना का अधिकार), जांच प्रक्रिया पर पुलिस के खुलासे का संभावित प्रभाव, आरोपियों के कानूनी अधिकार और न्याय का समग्र प्रशासन के विंदु शामिल है।

न्यायालय ने पहले वरिष्ठ अधिवक्ता, गोपाल शंकरनारायणन को अपनी सहायता के लिए न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया था। गोपाल शंकरनारायणन ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को, एक प्रश्नावली वितरित की थी, जिनमें से कुछ से प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं।  इसके अलावा, इस मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) द्वारा टिप्पणियां प्रस्तुत की गईं।  वरिष्ठ अधिवक्ता ने सिफारिश की कि, हालांकि मीडिया को रिपोर्टिंग से रोका नहीं जा सकता है, लेकिन सूचना के स्रोत, जो अक्सर सरकारी संस्थाएं हैं, को विनियमित (Regulate) किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य घटनाओं से जुड़ी, कई और अलग अलग  खबरों को, मीडिया में प्रस्तुत होने से रोकना है, जैसा कि पिछले कई मामलों में हुआ है, जबकि एक ही घटना की रिपोर्टिंग, मीडिया के अलग अलग चैनलों ने, अलग अलग तरह से प्रसारित की। जिससे भ्रम फैला। सीजेआई ने कहा, "हम मीडिया को रिपोर्टिंग करने से नहीं रोक सकते। लेकिन स्रोतों (खबरों की) को रोका जा सकता है। क्योंकि स्रोत राज्य (के आधीन) है।" 
शीर्ष अदालत ने आरुषि मामले में, मीडिया की भूमिका का विशेषरूप से उल्लेख भी किया। 

इसे ध्यान में रखते हुए, एमिकस क्यूरी, सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने मैनुअल तैयार करने के उद्देश्य से, विचार करने के लिए दिशानिर्देश प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि, "दिशानिर्देश लॉस एंजिल्स पुलिस विभाग (एलएपीडी) और न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (एनवाईपीडी) की मीडिया रिलेशंस हैंडबुक के साथ-साथ यूके के मुख्य पुलिस अधिकारियों के संघ और यहां तक ​​​​कि, सीबीआई की जन संपर्क शाखा की सलाह से लिए गए हैं।" 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार, निष्पक्ष जांच के दौरान, आरोपी के अधिकार और पीड़ितों की गोपनीयता के बीच स्थित नाजुक संतुलन पर भी जोर दिया गया है। कोर्ट ने आदेश में कहा है, "किसी भी आरोपी को फंसाने वाली मीडिया रिपोर्ट का प्रसारण अनुचित है। पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग से जनता में यह संदेह भी पैदा होता है कि उस व्यक्ति ने अपराध किया है। मीडिया रिपोर्ट में पीड़ितों की गोपनीयता का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए।"

अपने आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने अद्यतन (uptodate) दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। क्योंकि मौजूदा दिशानिर्देश एक दशक पहले बनाए गए थे, और अपराध की मीडिया रिपोर्टिंग (Crime Reporting) के पैटर्न तब से काफी विकासित और उसमें बदलाव हो चुका है, जिसमें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों की अपनी अपनी  महत्वपूर्ण भूमिका हैं। आदेश में कहा गया है कि, "भारत सरकार द्वारा,  लगभग एक दशक पहले 1 अप्रैल, 2010 को, दिशानिर्देश तैयार किए गए थे। तब से, न केवल प्रिंट मीडिया बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी अपराध की रिपोर्टिंग में वृद्धि होने के साथ, संतुलन बनाए रखने के लिए नए मैनुअल का निर्माण किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है।"

शीर्ष अदालत ने माना है कि, "मीडिया को दी जाने वाली जानकारी की प्रकृति, पीड़ितों और आरोपी व्यक्तियों की उम्र और लिंग जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए, प्रत्येक मामले की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए।" 
इसमें आगे कहा गया है, "खुलासे (केस के) की प्रकृति एक समान नहीं हो सकती है, क्योंकि यह अपराध की प्रकृति और पीड़ितों, गवाहों और अभियुक्तों सहित संबंधित अन्य हितधारकों पर निर्भर होना चाहिए। पीड़ित और अभियुक्त की उम्र और लिंग के खुलासे का, मुकदमे की प्रकृति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, जिसे, मीडिया को कोई भी सूचना देते समय पुलिस या जांच एजेंसी को, इसका ध्यान रखना चाहिए ।"
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि, "पुलिस के खुलासे का परिणाम "मीडिया-ट्रायल" के रूप में, नहीं होना चाहिये। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि, खुलासे के परिणामस्वरूप मीडिया ट्रायल न हो ताकि, आरोपी के अपराध का पूर्व-निर्धारण हो सके।"

इस तरह का एक विस्तृत और लगभग सभी प्रासंगिक बिंदुओं को, समेटते हुए एक मैनुअल तैयार करने के लिए गृह मंत्रालय को आदेश की तारीख से, तीन महीने तक की समय सीमा दी गई है।एक महीने के भीतर सभी डीजीपी को दिशानिर्देशों के लिए अपने सुझाव गृह मंत्रालय को बताने होंगे और, मैनुअल तैयार करते समय, एनएचआरसी की सिफारिशों पर भी विचार  किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "गृह मंत्रालय से अपेक्षा की जाती है कि वह तीन महीने के भीतर इस कार्य को समाप्त कर लेगा और दिशानिर्देशों की एक प्रति एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन और सुश्री शोभा गुप्ता, एनएचआरसी के वकील को देगा।  

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Wednesday, 13 September 2023

अडानी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट में दायर नया हलफनामा और सेबी की जांच पर सवाल / विजय शंकर सिंह

अडानी-हिंडनबर्ग मामले में, अडानी समूह की कंपनियों के खिलाफ, अदालत की निगरानी में जांच की मांग करने वाले, एक याचिकाकर्ता ने, अडानी समूह के बारे में, कुछ मीडिया घरानों द्वारा प्रकाशित कतिपय जांच रिपोर्टों के आलोक में,  सुप्रीम कोर्ट में एक नया हलफनामा दायर किया है। मीडिया रिपोर्ट्स में, बराबर यह खबर आ रही थी, सेबी को, जांच में कुछ प्रमाणिक तथ्य नहीं मिल रहे है, और सेबी के जांचकर्ता, गौतम अडानी के समधी है। इसके अतिरिक्त और भी तरह तरह की खबरें अखबारों तथा विभिन्न मीडिया समूहों में आ रही है। 

दरअसल, अडानी से जुड़े, टैक्स हेवेन समझे जाने वाले देशों से, संदिग्ध निवेश की खबरें तो आ ही रही हैं, साथ ही, प्रधानमंत्री मोदी जी के अडानी समूह से रिश्ते को लेकर, विपक्ष विशेषकर, कांग्रेस नेता राहुल गांधी काफी मुखर है। संसद में अडानी समूह के, 20 हजार करोड़ रुपए के संदिग्ध निवेश और नरेंद्र मोदी तथा गौतम अडानी के निजी रिश्तों को लेकर, राहुल गांधी ने, लोकसभा में एक बेहद तार्किक और तथ्यात्मक भाषण दिया था। इस भाषण से न केवल, प्रधानमंत्री, बल्कि पूरा सत्तापक्ष बौखला गया था। हालांकि, अडानी समूह के इस संदिग्ध निवेश से जुड़े राहुल गांधी के भाषण को, सदन की कार्यवाही से निकाल दिया गया, लेकिन अब भी प्रधानमंत्री की असहजता कम नहीं हुई है। 

सुप्रीम कोर्ट ने, इस मामले में दायर याचिकाओं पर, सेबी को, जांच करने और एक तथ्यात्मक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। सेबी ने जांच की और अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी है। लेकिन, इसी बीच, जब अखबारों में इस जांच को लेकर, तरह तरह की खबरें मीडिया में आई तो, एक याचिकाकर्ता अनामिका जायसवाल ने सुप्रीम कोर्ट में, एक हलफनामा दायर कर, उक्त हलफनामे में, यह आरोप लगाया है कि, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) सेबी, द्वारा की गई, इस मामले की जांच में स्पष्ट रूप से 'हितों का टकराव' (Conflict of interest) दिख रहा है। 

याचिकाकर्ता, अनामिका जायसवाल ने, यह भी आरोप लगाया है कि, "बाजार नियामक (सेबी) ने अडानी समूह द्वारा नियामक उल्लंघनों और मूल्य हेरफेर का बचाव हो सके, इसलिए, 'ढाल' के रूप में, (अडानी समूह को परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाने के लिए) कई संशोधन किये हैं।" हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सेबी द्वारा तथ्यों को कथित रूप से दबाने और साक्ष्यों को दरकिनार करने तथा, अडानी परिवार द्वारा अपनी ही कंपनियों में जानबूझकर, स्टॉक हासिल करने के दोष का सुबूतों सहित विवरण  भी दिया गया है।

० सेबी ने अडानी के पैसे निकालने के बारे में 2014 डीआरआई अलर्ट को छुपाया

अनामिका जायसवाल के हलफनामे में कहा गया है कि, "2014 में, राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), संयुक्त अरब अमीरात स्थित एक सहायक कंपनी से, अडानी समूह की विभिन्न संस्थाओं द्वारा, उपकरण और मशीनरी के आयात के अधिक मूल्यांकन (over valuation) के मामले की जांच कर रहा था।  उस समय, डीआरआई ने तत्कालीन सेबी SEBI अध्यक्ष को एक पत्र भेजकर, सचेत (alert) किया था कि अडानी समूह की कंपनियों द्वारा, बिजली उपकरणों के आयात में ओवरवैल्यूएशन के तौर-तरीकों का उपयोग करके, शेयर बाजार में हेरफेर किया जा सकता है, और अडानी समूह, पैसे भी निकाल सकता हैं।" 
पत्र के साथ एक सीडी भी, सलग्न की गई थी, जिसमें ₹2323 करोड़ की हेराफेरी के सबूत थे। डीआरआई द्वारा, इस मामले की जांच की जा रही थी। हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि, "सेबी ने इस जानकारी (डीआरआई द्वारा भेजी गई जानकारी) को दबाया और छुपाया तथा डीआरआई के उक्त अलर्ट पत्र के आधार पर कभी कोई जांच नहीं की।"

यहीं यह सवाल उठता है कि, आखिर सेबी ने, डीआरआई के इस अलर्ट पत्र पर कोई भी कार्यवाही या जांच करने के बजाय, इसे बस्ता खामोशी या ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया ? याद कीजिए, तब तक सरकार बदल चुकी थी, और अडानी समूह से नजदीकी संबंधों की चर्चा वाले, नरेंद्र मोदी, देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे। तब तक अडानी समूह से मोदी जी की निकटता की बात सार्वजनिक भी होने लगी थी। 

हलफनामे में आगे कहा गया है कि, "यह चौंकाने वाली बात है कि, सेबी ने माननीय न्यायालय के समक्ष आज तक उक्त पत्र (डीआरआई पत्र) की प्राप्ति और डीआरआई से साक्ष्य का खुलासा नहीं किया है।"
हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सेबी द्वारा अपनाए गए इस आश्चर्यजनक रुख की ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि, "सेबी ने अदालत में कहा है कि, उसने, जून-जुलाई 2020 में ही अदानी समूह के खिलाफ जांच शुरू कर दी थी।" 
हलफनामे में दावा किया गया है कि, "सेबी का अदालत ने दिया गया यह बयान, जानबूझकर,  तथ्यों को छिपाना और अदालत को,  झूठी जानकारी प्रदान करना है, जो झूठी गवाही (perjury) का अपराध है।"
हलफनामे में यह भी बताया गया है कि, "उस समय, साल 2014 में, यूके सिन्हा, सेबी निदेशक थे,  और अब वह एनडीटीवी जिसे 2022 में अदानी समूह द्वारा अधिग्रहित किया गया है, के गैर-कार्यकारी निदेशक हैं।"

स्पष्ट रूप से यह हितों का टकराव है, क्योंकि जब डीआरआई ने, सेबी को अडानी समूह के संदिग्ध लेनदेन की जांच करने के एक अलर्ट पत्र भेजा तो, तत्कालीन सेबी निदेशक ने, उसकी जांच में कोई रुचि नहीं ली, और जब वे रिटायर हुए तो, अडानी समूह ने उन्हें उपकृत करते हुए, अपने यहां एनडीटीवी में, गैर कार्यकारी निदेशक बना दिया। 

० सेबी ने किसी भी जांच के निष्कर्ष का खुलासा नहीं किया है
 
अनामिका जायसवाल के हलफनामे के अनुसार, सेबी ने (अदालत में) अपनी जो स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की है, उसमें कहा गया है कि, "अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग रिपोर्ट से उत्पन्न 24 जांचों में से 22 जांचे, पूरी हो चुकी हैं और 2 जांचे अभी अंतरिम हैं।" 
हालाँकि, हलफनामे में कहा गया है कि, "सेबी ने इनमें से, किसी भी जांच के निष्कर्ष का खुलासा नहीं किया है।"
इसे और स्पष्ट करते हुए, हलफनामा में कहा गया है कि, "प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) नियम, 1957 के नियम 19 ए के उल्लंघन से संबंधित पहली जांच की समयावधि साल 2016 से साल 2020 के बीच बताई गई थी। इसका तात्पर्य यह है कि, अक्टूबर 2020 से हिंडनबर्ग रिपोर्ट के प्रकाशन की तिथि, यानी जनवरी 2023 तक के समय को, इस मामले में जांच के दायरे से बाहर रखा गया।'' 
इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि, "सेबी की जांच के दायरे में 13 विदेशी संस्थाएं शामिल थीं, जिसमें उसकी (सेबी की) रिपोर्ट के अनुसार 12 एफपीआई (फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट) शामिल थे। हालाँकि, सेबी इन 12 एफपीआई के आर्थिक हित वाले शेयरधारकों का अडानी समूह से क्या संबंध रहा है, यह स्थापित करने में असमर्थ रहा क्योंकि यह  संस्थाएँ टैक्स हेवन देशों के क्षेत्राधिकार में स्थित थीं।

० सेबी द्वारा अडानी की जांच में स्पष्ट 'हितों का टकराव'
 
हलफनामे द्वारा, यह भी प्रस्तुत किया गया है कि, "सेबी द्वारा इस मामले में जांच करने में हितों का टकराव (Conflict of interest) स्पष्ट है। क्योंकि, सेबी के अधिकारी सिरिल श्रॉफ, लॉ फर्म, अमरचंद मंगलदास (सीएएम) के प्रबंध भागीदार हैं, जो कॉर्पोरेट प्रशासन में, सेबी की उस समिति के सदस्य रहे हैं, जो अंदरूनी व्यापार जैसे अपराधों पर निगरानी रखती है।"
हलफनामे के अनुसार, "श्री श्रॉफ की बेटी की शादी गौतम अडानी के बेटे करण अडानी से हुई है, इसलिए हितों का टकराव हो रहा है।" 
हलफनामे में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि, "सेबी की 24 जांच रिपोर्टों में से 5 अडानी समूह की कंपनियों के खिलाफ अंदरूनी व्यापार के आरोपों पर हैं।"

० संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट मॉरीशस में स्थित अपारदर्शी निवेश फंड दिखाता है जो अडानी शेयरों में निवेश कर रहा है
 
हलफनामे के अनुसार, "संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (ओसीसीआरपी) के जो, नए दस्तावेज सामने आए हैं, वह यह बताते हैं कि, मॉरीशस स्थित दो कंपनियों, इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड (ईआईएफएफ) और ईएम रिसर्जेंट फंड (ईएमआरएफ) ने साल, 2013 और 2018 के बीच अदानी कंपनियों के शेयरों की बड़ी मात्रा में निवेश और कारोबार किया था। इन दोनों कंपनियों के नाम सेबी की 13 संदिग्ध एफपीआई की सूची में हैं, हालांकि, सेबी उनके अंतिम लाभकारी मालिकों या आर्थिक हित वाले शेयरधारकों का पता लगाने में असमर्थ रही है।" 
हलफनामे में आगे कहा गया है कि, इस क्रम में  निवेश किया गया पैसा, बरमूडा-आधारित निवेश फंड जिसे ग्लोबल अपॉर्चुनिटीज फंड (जीओएफ) कहा जाता है, के माध्यम से भेजा गया था।" 

इसे और स्पष्ट करते हुए, हलफनामे में कहा गया है, "ओसीसीआरपी जांच से पता चला है, कि विनोद अडानी (गौतम अडानी के भाई) और अडानी प्रमोटर समूह के सदस्य के स्वामित्व वाली एक्सेल इन्वेस्टमेंट एंड एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड नामक यूएई स्थित एक पोशीदा फर्म (secretive firm) को, साल, 2012 से 2014 के बीच ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और जीओएफ कंपनियों के प्रबंधन से, सलाहकार शुल्क के रूप में 1.4 मिलियन डॉलर से अधिक की धनराशि प्राप्त हुई थी। ओसीसीआरपी ने, उन आंतरिक ईमेल का भी खुलासा किया, जिससे यह पता चलता है कि ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और जीओएफ कंपनिया, विनोद अडानी के आदेश पर अडानी समूह के शेयरों में धन निवेश कर रहे थे।"

 ० अन्य आपत्तिजनक तथ्य
 
अनामिका जायसवाल का हलफनामा, इसके अतिरिक्त, अन्य 'अपराधिक कृत्यों का भी उल्लेख किया गया है, जैसा कि गार्डियन जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचारपत्रों द्वारा प्रकाशित किये गये खुलासे हैं, जैसे, "मोदी से जुड़े अडानी परिवार ने गुप्त रूप से अपने शेयरों में निवेश किया था' शीर्षक से प्रकाशित एक लेख और कुछ  दस्तावेजों का संदर्भ दिया गया है। जिसके अनुसार ओसीसीआरपी द्वारा प्राप्त नए दस्तावेजों से पता चलता है कि, "मॉरीशस में एक अज्ञात और जटिल अपतटीय (offshore) ऑपरेशन" का विवरण, जो अडानी समूह के, सहयोगियों द्वारा नियंत्रित लगता है, और जिसका उपयोग, साल 2013 से 2018 तक अपने समूह की कंपनियों के शेयर की कीमतों का समर्थन करने के लिए किया गया था, के बारे में, यह अनुमान लगाया गया है कि, वे अडानी परिवार के सहयोगी हो सकते हैं। हलफनामे में रॉयटर्स द्वारा प्रकाशित इस विषय पर एक लेख का भी हवाला दिया गया है।

० सेबी ने अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए कई संशोधन किए
 
हलफनामे में कहा गया है कि, "सेबी ने न केवल आंखें मूंद लीं, बल्कि अडानी समूह के नियामक उल्लंघनों और मूल्य हेरफेर को बचाने और माफ करने के लिए नियमों और परिभाषाओं में लगातार संशोधन भी किए।"
इनका विवरण देते हुए कहा गया है, 
1. एफपीआई नियमों में संशोधन ~ 
नियमों में निर्दिष्ट किया गया था कि शेयर बाजार में नामित डिपॉजिटरी प्रतिभागी यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक के पास अपारदर्शी संरचनाएं न हों। 
इस प्राविधान को, 2018 में सेबी द्वारा संशोधित किया गया था, जिसके तहत 'अंतिम लाभकारी मालिकों' को पीएमएलए, 2002 के तहत परिभाषित 'लाभकारी मालिक' के समान अर्थ के लिए फिर से परिभाषित किया गया था। इसके बाद, 2019 में, एफपीआई नियमों में 'अपारदर्शी संरचना' खंड  को, पूरी तरह से ख़त्म कर दिया गया और इसकी जगह 'पीएमएलए के तहत सभी आवश्यकताओं का अनुपालन' कर दिया गया।

 2. एलओडीआर में संशोधन ~
सेबी एलओडीआर (सूचीबद्धता दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकता) ने 'संबंधित पक्ष' को कंपनी अधिनियम की धारा 2(76) के तहत वही अर्थ के रूप में परिभाषित किया गया था।  2018 में सेबी द्वारा 'संबंधित पार्टी' की परिभाषा में संशोधन किया गया, जिसमें एक अलग प्रावधान जोड़ा गया था, जो किसी सूचीबद्ध कंपनी के प्रमोटर समूह के किसी सदस्य या इकाई को, संबंधित पार्टी के रूप में तभी समझा जा सकता है, जब उस व्यक्ति की शेयरधारिता कम से कम 20% हो।

इस प्रकार अदालत में दाखिल अनामिका जायसवाल का हलफनामा, न केवल सेबी की लचर जांच का उल्लेख कर रहा है बल्कि यह भी तथ्यों और सबूतों सहित स्पष्ट कर रहा है कि, 
० सेबी ने, साल 2014 में डीआरआई के अलर्ट पत्र पर कोई कार्यवाही नही की और जिस समय सेबी डीआरआई के पत्र पर मौन बना बैठा रहा, उस समय सेबी के निदेशक यूके सिन्हा थे, जो बाद में अडानी समूह के ही मीडिया संस्थान एनडीटीवी के निदेशक बने। 
० सेबी के नियमों में बदलाव किया गया और पारदर्शिता की शर्त हटा दी गई। 
० सेबी के कॉर्पोरेट प्रशासन का काम देखने वाले सिरिल श्रॉफ, गौतम अडानी के समधी हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने अनामिका जायसवाल का यह हलफनामा, न सिर्फ नए आरोप को स्पष्ट करता है बल्कि सेबी के अंदर व्याप्त उन अनियमितताओं को भी उजागर करता है, जिनका लाभ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से, अडानी समूह को मिलता रहा है। अब देखना है, शीर्ष अदालत में इस हलफनामे के जवाब में सेबी अपना क्या पक्ष रखती है। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


Tuesday, 12 September 2023

मणिपुर हिंसा और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के खिलाफ एफआईआर / विजय शंकर सिंह

मणिपुर हिंसा से संबंधित, एक तथ्यान्वेषी रिपोर्ट (fact finding report) पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई) के सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने आज मौखिक रूप से टिप्पणी की कि, "यह मुद्दा सिर्फ एक रिपोर्ट से संबंधित है और  यह ज़मीन पर किसी के द्वारा अपराध करने का मामला नहीं है।" 
पत्रकार सीमा गुहा, संजय कपूर, भारत भूषण और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष द्वारा संयुक्त रूप से दायर रिट याचिका पर भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ सुनवाई कर रही है। अदालत ने यह भी कहा कि, "वह एफआईआर को रद्द करने के पक्ष में नहीं है और इस बात पर विचार कर रही है कि क्या मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिए या मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा सुना जाना चाहिए।"

सुनवाई के दौरान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की, "आखिरकार यह एक रिपोर्ट है। मूल प्रश्न यह है कि, वे जो तर्क दे रहे हैं वह यह है कि, उन्होंने एक रिपोर्ट बनाई है। यह उनकी व्यक्तिपरक राय का मामला है। क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है...यह इनमें से एक ऐसा मामला नहीं है, जहां किसी व्यक्ति ने, वास्तव में,  कुछ अपराध किया है। उन्होंने तो एक रिपोर्ट प्रकाशित की है।"
सीजेआई ने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो मणिपुर राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, से कहा, "आप बिना किसी रियायत या किसी अन्य भविष्य के मामले के, एक बड़ा बयान दे सकते हैं, इसमें कोई आपत्ति नहीं है..।"
पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने, याचिकाकर्ताओं को एफआईआर के सिलसिले में दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा दी थी।

प्रारंभ में, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोर देकर कहा कि, "ईजीआई ने स्वयं मणिपुर जाकर रिपोर्ट बनाने के लिए स्वेच्छा से काम नहीं किया। उन्हे, सेना द्वारा उसे ऐसा करने के लिए आमंत्रित किया गया था क्योंकि यह सेना ही थी जो मणिपुर राज्य में जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन चाहती थी।"
उन्होंने कहा, "हमने (EGI) स्वेच्छा से वहां जाने की इच्छा नहीं जताई थी। सेना ने हमसे अनुरोध किया था। यह बहुत गंभीर मामला है। कृपया एडिटर्स गिल्ड को दिया गया सेना का पत्र देखें। यह एडिटर्स गिल्ड को सेना का निमंत्रण है, देखें क्या है  वहां क्या हो रहा है - स्थानीय मीडिया द्वारा अनैतिक, एकपक्षीय रिपोर्टिंग। यह उनके निमंत्रण पर है कि हम गए थे।"

इस दलील पर सीजेआई ने पूछा, "लेकिन सेना ने एडिटर्स गिल्ड को मणिपुर आने के लिए क्यों कहा?"
सिब्बल ने जवाब दिया, "क्योंकि वे ज़मीन पर क्या हो रहा है इसका वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन चाहते थे।"
सिब्बल ने कहा कि, "एक बार ईजीआई ने अपनी रिपोर्ट दे दी, तो उस पर दंड संहिता के तहत अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।"

इस पर सॉलिसिटर जनरल, तुषार मेहता ने कहा, ईजीआई, अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर के खिलाफ, मणिपुर उच्च न्यायालय जा सकता है। पर वे इसे, एक 'राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा' बना रहे हैं। वह मामले की मेरिट पर बहस नहीं करेंगे। इस मामले की सुनवाई मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा की जा सकती है और याचिकाकर्ताओं को इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने की आवश्यकता नहीं है।"
हालाँकि, सिब्बल ने इस पर आपत्ति जताई और कहा, "ये अपराध कैसे टिके रह सकते हैं? हमें यहां उच्च न्यायालय में मामले पर मुकदमा चलाने की अनुमति दें।" 
कुकी प्रोफेसर की पैरवी करने वाले एक वकील पर हुए हमले का जिक्र करते हुए सिब्बल ने कहा, "क्योंकि वहां भी वकील पीछे हट रहे हैं. एक वकील हैं जिनका घर जला दिया गया है. इस वक्त वहां जाना खतरनाक है।"

इस दलील पर, एसजी ने कहा कि, "याचिकाकर्ता वस्तुतः उच्च न्यायालय के समक्ष भी उपस्थित हो सकते हैं।"
हालाँकि, सिब्बल ने अपनी पिछली बात दोहराई और मणिपुर के मुख्यमंत्री द्वारा ईजीआई के खिलाफ दिए गए बयानों का हवाला दिया। और कहा, "इसके आधार पर हम पर मुकदमा क्यों चलाया जाना चाहिए? यह रिपोर्ट 2 सितंबर को दर्ज की गई थी। 3 तारीख की रात, एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। 4 तारीख को, मुख्यमंत्री ने एक बयान दिया।"
एसजी (SG) ने कपिल सिब्बल के बयान पर जताई आपत्ति और कहा, "यदि आप इसे राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बनाना चाहते हैं, तो हम कर सकते हैं। अन्यथा, उच्च न्यायालय इससे निपट सकता है।"

सिब्बल ने अपनी दलीलें जारी रखीं और कहा, "हम ऐसी स्थिति नहीं चाहते जहां हमें वकीलों को शामिल करना शुरू करना पड़े क्योंकि वहां वकील पीछे हट गए हैं...वकीलों के घरों में तोड़फोड़ की गई है।"
इस समय, सीजेआई ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट एफआईआर को रद्द नहीं करने जा रहा है, बल्कि केवल इस पर विचार कर रहा है कि क्या उसे याचिकाकर्ताओं को मणिपुर जाने के लिए कहना चाहिए या मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करना चाहिए।"  
अब इस मामले की सुनवाई 15 सितंबर 2023 को होगी।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


संयुक्त सचिव और उसके ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ जांच करने और मुकदमे चलाने के लिए अब सरकार की पूर्व अनुमति की कोई जरूरत नहीं होगी ~ सुप्रीम कोर्ट / विजय शंकर सिंह

वरिष्ठ नौकरशाही (संयुक्त सचिव और उसके ऊपर के पदाधिकारियों) को प्रभावित करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने 11/09/23 को, दिए गए अपने एक फैसले में कहा है कि, 
"सुप्रीम कोर्ट का 2014 का फैसला, जिसके अनुसार, जिसने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 की धारा 6ए को असंवैधानिक घोषित किया गया था, अब पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू होगा।"

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच जिसमे, जस्टिस जेके माहेश्वरी, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एएस ओका, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस विक्रम नाथ थे, द्वारा, दिए, इस फैसले के अनुसार, 
"अब जॉइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के अफसरों पर भ्रष्टाचार का मुकदमा चलाया जा सकेगा और उनके खिलाफ आरोपों की, नियमानुसार, जांच भी हो सकेगी। जांच और अभियोजन के लिए उच्चाधिकारियों/शासन के अनुमति की, अब कोई जरूरत नहीं होगी।" 
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, यह आदेश, 11 सितंबर 2003 से मान्य और लागू होगा।

जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता में गठित, पांच जजों की पीठ का यह फैसला एकमत से दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2014 के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि, 
"तब दिल्ली स्पेशल पुलिस स्टेबलिशमेंट (DSPE) एक्ट 1946 के प्रावधान को रद्द कर दिया था। यह प्रावधान कुछ अफसरों को भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच से सुरक्षा (इम्यूनिटी) प्रदान करता है।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, "2014 का फैसला, 11 सितंबर 2003 से ही मान्य होगा। क्योंकि, 11 सितंबर 2003 से ही DSPE Act में धारा 6(A) जोड़ी गई थी, जिसके अनुसार, संयुक्त सचिव या उसके ऊपर के अधिकारियों के लिए,  किसी भी जांच या अभियोजन के लिए केंद्र सरकार के अनुमति की जरूरत होगी।"

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2014 को, दिए अपने आदेश में, डीएसपीई एक्ट की धारा 6A(1) को अमान्य ठहराया था और,  कहा था कि, धारा 6A में,  'भ्रष्टाचारियों को बचाने की प्रवृत्ति' है। उसी के बाद यह मामला, संविधान पीठ को संदर्भित हुआ। संविधान पीठ को यह तय करना था कि, 
"क्या किसी जॉइंट सेक्रेटरी लेवल के सरकारी अधिकारी को कानून के किसी प्रावधान के तहत गिरफ्तारी से मिला संरक्षण तब भी कायम रहता है, अगर उसकी गिरफ्तारी के बाद आगे चलकर उस कानून को ही रद्द कर दिया गया हो।" 
इस पर, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि, 
"जो अधिकारी, सेक्शन के रद्द होने से पहले गिरफ्तार किए गए थे, उनके खिलाफ केस चल सकता है।"

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पास, विचाराधीन सवाल था कि, 
"क्या किसी व्यक्ति को प्रतिरक्षा-अनुदान immunity प्रावधान को रद्द करने वाले फैसले के, पूर्वव्यापी प्रभाव यानी बैकडेट से, वैधानिक रूप से प्रदत्त किसी भी प्रतिरक्षा से वंचित किया जा सकता है?"
इस सवाल पर विचार करने के लिए, मार्च 2016 में कोर्ट की एक डिविजन बेंच ने इस मुद्दे को पांच जजों की बेंच के पास भेज दिया था।

यह मामला दिल्ली पुलिस विशेष स्थापना अधिनियम, 1946 के तहत बिना पूर्व मंजूरी के की गई एक गिरफ्तारी से उपजा था, जिससे धारा 6A के उल्लंघन के आधार पर कानूनी चुनौती मिली, जिसके तहत केंद्रीय जांच ब्यूरो को, भ्रष्टाचार के मामलों में संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के पद के किसी अधिकारी की जांच करने से पहले, सरकार की पूर्व मंजूरी लेनी आवश्यक थी। 

तब दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि, 
"चूंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो CBI ने गिरफ्तारी से पहले जांच शुरू कर दी थी, इसलिए स्पॉट गिरफ्तारी के लिए धारा 6ए की उप-धारा (2) में निहित अपवाद लागू नहीं होगा।"  
तदनुसार, उच्च न्यायालय ने एजेंसी को पुन: जांच के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी लेने का निर्देश दिया था।  

इस फैसले को 2007 में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन जब मामले की सुनवाई हो रही थी, तभी, सुब्रमण्यम स्वामी (2014) के एक मामले में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा, धारा 6ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।  हालाँकि, लंबित मामलों में इस फैसले का क्या परिणाम या असर होना चाहिए, यह अस्पष्ट रहा। इसी वजह से, मौजूदा मामले को, एक संवैधानिक पीठ को भेजा गया था, जिस पर, पांच जजों की बेंच द्वारा, दलीलें सुनने के बाद नवंबर 2022 में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। 

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा है कि, 
"एक बार जब किसी कानून को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया जाता है कि, यह संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों में से किसी का उल्लंघन करता है, तो इसे अधिनियमन की तारीख से अप्रवर्तनीय माना जाएगा।" 
फैसले का अंश कहता है, 
“यह बिल्कुल स्पष्ट है कि एक बार जब किसी कानून को संविधान के भाग III का उल्लंघन करते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया जाता है, तो इसे अनुच्छेद 13 (2) के मद्देनजर शुरू से ही शून्य, मृत, अप्रवर्तनीय और गैर-स्थायी माना जाएगा। इस प्रकार, सुब्रमण्यम स्वामी के मामले में संविधान पीठ द्वारा की गई घोषणा पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू होगी।"

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Sunday, 10 September 2023

तमिलनाडु का आत्मसम्मान विवाह यानी सुयमरियाथाई विवाह कानून / विजय शंकर सिंह

धार्मिक भेदभाव और अस्पृश्यता को लेकर देश में सबसे प्रखर आंदोलन, तमिलनाडु में चला है और ईवी रामासामी पेरियार, तमिल सुधार आंदोलनों के एक मजबूत स्तंभ रहे हैं। वहां एक विवाह पद्धति है, सुयमरियाथाई, जिसे आत्मसम्मान विवाह प्रथा के रूप में देखा और कहा जाता है। उसी विवाह पद्धति को, सुप्रीम कोर्ट ने, अपने एक हालिया आदेश में, विधि सम्मत घोषित किया है। यह विवाह पद्धति, हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन के बाद, तमिलनाडु सरकार ने अपने राज्य में लागू किया था। 

तमिलनाडु में, प्रचलित, इसी आत्मसम्मान विवाह के बारे में, सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद, सुयमरियाथाई यानी आत्मसम्मान विवाह पर पूरे देश में बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने, हाल ही में दायर एक याचिका पर, जो मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के बाद, अपील के रूप में, सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी, पर सुनवाई के बाद कहा कि, "जीवन साथी चुनना, मौलिक अधिकार है।" शीर्ष कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा है कि, "हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7(ए) के तहत 'आत्मसम्मान' विवाह या 'सुयमरियाथाई' को सार्वजनिक समारोह या घोषणा की आवश्यकता नहीं है।"

तमिलनाडु सरकार ने 1968 में, सुयमरियाथाई विवाह को वैध बनाने के लिए कानून के प्रावधानों में संशोधन किया था। इसका उद्देश्य, किसी भी शादी की प्रक्रिया को सरल बनाते हुए ब्राह्मण पुजारियों, पवित्र अग्नि और सप्तपदी (सात चरण) की अनिवार्यता को खत्म करना था।" यानी हिंदू विवाह पद्धति की सबसे अनिवार्य तत्व अग्नि और सप्तपदी को भी इस कानूनी संशोधन ने, मान्यता नहीं दी है। 

इसी आदेश  के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के 2014 के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि, "अधिवक्ताओं द्वारा कराई गई शादियां वैध नहीं हैं और ‘सुयमरियाथाई’ या ‘आत्म-सम्मान’ विवाह को संपन्न नहीं किया जा सकता है।" 

सुप्रीम कोर्ट ने 29 अगस्त को आत्मसम्मान विवाह पर फैसला सुनाते हुए है कहा, "तमिलनाडु में, संशोधित हिंदू विवाह कानून के तहत वकील परस्पर सहमति से दो वयस्कों के बीच 'सुयमरियाथाई' (आत्मसम्मान) विवाह संपन्न करा सकते हैं।" इस मामले में जस्टिस एस रवींद्र भट्ट और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने यह भी कहा कि, "वकील अदालत के अधिकारियों के रूप में पेशेवर क्षमता में काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से दंपती को जानने के आधार पर वो कानून की धारा-7(ए) के तहत विवाह करा सकते हैं।"

अब सुयमरियाथाई विवाह का कानूनी पक्ष देखें। आत्मसम्मान विवाह या सुयमरियाथाई विवाह प्रथा, तमिलनाडु में 1968 से शुरू हुई है। साल 1968 में हिंदू विवाह  (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 1967 पारित किया गया. जिसमें धारा 7A के तहत हिंदू विवाह अधिनियम 1955 को संशोधित किया गया था। यह विशेष प्रावधान उन "दो वायस्क स्त्री पुरुष को बिना, किसी, धार्मिक रीति-रिवाज का पालन करते हुये, शादी करने की अनुमति देता है, जिनकी उम्र कानूनी रूप से शादी के लायक हैं।"

आत्मसम्मान विवाह में पुजारी, अग्नि या किसी भी तरह की शादी के, धार्मिक या परंपरागत रीति रिवाजों के पालन करने की जरुरत नहीं होती है। दो वयस्क, स्त्री पुरुष द्वारा अपने जानने वालों की मौजूदगी में, एक-दूसरे को पति-पत्नी मान लेना भी, इस विवाह को स्वीकृति प्रदान करता और, विवाह को, वैध बनाता है। हालांकि ऐसी शादियों को कानूनी रूप से पंजीकृत करना भी जरूरी है। साथ ही, ऐसी शादियां आमतौर पर रिश्तेदारों, दोस्तों या अन्य लोगों की मौजूदगी में की जा सकती हैं। 

आत्मसम्मान विवाह या तमिल में, सुयमरियाथाई, पेरियार के सुधारवादी आंदोलनों का एक परिणाम है। तमिल समाज सुधारक पेरियार ने 1925 में आत्मसम्मान आंदोलन का नेतृत्व किया था, जिसका मकसद जात-पात के भेदभाव को दूर करना और समाज में जिन जातियों को नीचा दिखाया जाता है, उन्हें समाज में एक समान अधिकार दिलाना था।  आत्मसम्मान विवाह के अभियान को आत्मसम्मान आंदोलन के एक बड़े अंग के रूप में चलाया गया था। 

पहला स्वाभिमान विवाह 1928 में, खुद पेरियार ने संपन्न कराया था, जिसमें दो जातियों के भेदभावों को दूर कर, दो लोगों के एक-दूसरे के साथ जीने की आजादी की मांग भी थी. ये शादियां किसी भी जाति में की जा सकती हैं। 

आत्मसम्मान विवाह का वर्तमान विवाद, मद्रास हाईकोर्ट की एक कार्रवाई के बाद चर्चा में आया है। मई 2023 में मद्रास हाईकोर्ट ने, तमिलनाडु राज्य बार काउंसिल को, उन वकीलों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया था जो अपने कार्यालयों या ट्रेड यूनियन कार्यालयों में, इस आत्मसम्मान विवाह कानून के अंतर्गत, गुप्त शादियां करवा रहे थे और साथ ही विवाह प्रमाण पत्र भी जारी कर रहे थे। 

मद्रास हाईकोर्ट के मदुरै पीठ के जज एम. धंदापानी और न्यायमूर्ति आर. विजयकुमार की पीठ ने कहा कि, "आत्म-सम्मान विवाह सहित सभी विवाहों को तमिलनाडु विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 के तहत पंजीकृत किया जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा कि इसके लिए पार्टियों को अदालत में उपस्थित भी होना होगा।"
उच्च न्यायालय ने एस बालाकृष्णन पांडियन मामले में अपने 2014 के फैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि, "वकीलों के कार्यालयों और बार एसोसिएशन के कमरों में गोपनीयता से की गई शादी कानून के तहत वैध शादी नहीं हो सकतीं।"

हालांकि, एक अन्य कानून भी धर्म निरपेक्ष विवाह को मान्यता देता है। वह है विशेष विवाह अधिनियम, 1872 जो, ब्रिटिश सरकार द्वारा अंतर-धार्मिक विवाह की अनुमति देने के लिए बनाया गया था, जहां किसी भी पक्ष को अपने संबंधित धर्म को त्यागना नहीं पड़ता था। इस अधियनियम के तहत उचित नियमों का पालन करने के बाद दो लोग धर्म निरपेक्ष विवाह में बंध सकते हैं। इस अधिनियम को 1954 में संसद द्वारा तलाक और अन्य मामलों के प्रावधानों के साथ फिर से पारित किया गया। 

यह अधिनियम पूरे भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध सहित सभी धर्मों के लोगों पर लागू होता है। इस तरह के विवाह करने की इच्छा रखने वालें लोगों को उस जिले के विवाह अधिकारी को लिखित रूप में एक नोटिस देना जरूरी है, जिसमें नोटिस से ठीक पहले कम से कम एक पक्ष उस जिले में कम से कम 30 दिनों तक रहा हो। 

इस कानून के अंतर्गत, सबसे अधिक आलोचना, इसके प्रावधानों में से एक, धारा 7 की होती है, जिसके अनुसार, कोई भी व्यक्ति नोटिस दिए जाने की तारीख से तीस दिन पहले इस तरह की शादी पर इस आधार पर आपत्ति कर सकता है कि ये अधिनियम की धारा 4 की शर्तों का उल्लंघन होगा। ऐसे मामलों में यदि कोई आपत्ति की गई है तो संबंधित विवाह अधिकारी तब तक विवाह नहीं करा सकता, जब तक कि मामले की जांच न हो जाए और वो संतुष्ट न हो जाए कि ये आपत्ति विवाह के खिलाफ नहीं है.

आज जब समान नागरिक संहिता या यूसीसी को देश के नागरिक कानूनों में एकरूपता लाने वाले एक उपकरण के रूप में देखा जा रहा है, तो, भारतीय समाज में ऐसी बहुत सी प्रथाएं, सामाजिक परंपराएं, और समय समय पर बने कानून हैं, जो भारतीय बहुलतावाद को प्रतिबिंबित है, अक्सर एक चुनौती के रूप में खड़े दिखते हैं। हिंदू विवाह पद्धति में सप्तपदी का सबसे अधिक महत्व माना जाता है और इस प्रथा को, हिंदू विवाह को, पूर्ण मान्यता देने वाले कदम के रूप में स्वीकार किया जाता है, पर तमिलनाडु के 'आत्मसम्मान' विवाह में ऐसी किसी भी प्रथा को कानूनन अमान्य कर दिया गया है। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh