Sunday, 14 February 2021

लद्दाख डिसइंगेजमेंट - 'पीछे लौटो' होगा या 'जैसे थे' ? / विजय शंकर सिंह

अप्रैल 2020 से चल रहा, भारत चीन का लद्दाख सीमा विवाद अब सुलझ गया है। डिसइंगेजमेंट की लंबी वार्ता के बाद, चीन और भारत अपनी अपनी सेनाएं पीछे हटाएंगे। यह सरकार का अधिकृत बयान है। पर सुलझाव वाले इस अधिकृत बयान ने इस गुत्थी को और उलझा कर रख दिया है। कुछ बेहद तीखे और असहज करने वाले सवाल, सरकार से पूछे जा रहे हैं। न सिर्फ विरोधी दल के नेताओं ने बल्कि, सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं ने अनेक शंकाएं इस समाधान पर उठायी हैं। साथ ही रक्षा मामलो के विशेषज्ञ, ब्रह्म चेलानी और पूर्व कर्नल अजय शुक्ल ने भी समझौते पर सवाल उठाए हैं। सबकी एक प्रमुख शंका है कि, इस 'पीछे लौटो' कमांड के बजाय 'जैसे थे' कमांड क्यों नहीं बोला गया ? पीछे लौटने का अर्थ है कि फिलहाल ट्रूप जहां हैं, वहां से पीछे लौटें। यानी दोनो ही सेनाओं ने एक दूसरे की सीमा में घुसपैठ किया था, अब वे अपनी अपनी सीमा में घुसपैठ कर के पीछे लौटेगे। जबकि जैसे थे का अर्थ होता है कि अप्रैल 2020 के पहले की स्थिति को बहाल किया जाय। जिस सेना ने घुसपैठ की पहल की, और अपनी सीमा को तोड़ कर पड़ोसी देश की सीमा में घुसपैठ किया है वह, जैसे घुसपैठ के पहले जिस स्थिति में थी, उसी स्थिति में वापस चली जाय। यानी जैसे थे, वैसे हो जांय। जैसे थे एक फौजी वर्ड ऑफ कमांड है, जिसका अर्थ है, जैसे पहले की फॉर्मेशन में थे, वैसे हो जांय। 

जैसे थे, था क्या ? अब जरा इसे अतीत में जा कर देखते हैं। 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया था तब गलवां घाटी और पैंगोंग झील के आगे 8 पहाड़ियों वाले घाटी का इलाका जिसे फिंगर्स कहते हैं, एक अनौपचारिक रूप से तय की हुयी सीमा रेखा बन गयी, जिसे एलएसी ( लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल ) कहा गया। वास्तविक सीमा के निर्धारण और भौगोलिक जटिलता के कारण कभी हम उनके तो कभी वे हमारे क्षेत्र में चले आते थे। सच तो यह है कि इस दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में ज़मीन पर सीमा निर्धारण का कोई काम गम्भीरता से कभी हुआ ही नहीं। न तो ब्रिटिश काल मे और न ही उसके बाद। दुर्गमता, विपरीत मौसम के कष्ट, निर्जनता और उक्त भूमि की उपयोगिता के अभाव के कारण सीमा निर्धारण पर किसी सरकार ने ध्यान नही दिया। जब 1962 ई में चीन ने घुसकर हमला किया और तब वह जहां रुका वही सीमा अस्थायी रूप से बन गयी। अगर पूर्व सेनाध्यक्ष और अब केंद्रीय मंत्री जनरल बीके सिंह के हालिया बयान का संदर्भ लें तो, उससे यह पता चलता है कि इस तरह की घुसपैठ आम थी और एलएसी का उल्लंघन दोनो ही सेनाएं करती रहती थी। इसी के कारण 1993 ई में भारत चीन के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ, जिंसमे कुछ शर्तें तय हुयी। 1993 में हुए एक भारत चीन समझौते के अंतर्गत यह तय किया गया, कि उभय पक्ष हथियार का प्रयोग नहीं करेंगे। लेकिन अचानक, 15 जून हमारे एक कर्नल संतोष बाबू सहित 20 सैनिक चीनी हमले में शहीद हो गए। 15 जून 2021 को बेहद गम्भीर और व्यथित कर देने वाली यह खबर, भारत चीन विवाद के इतिहास में 1962 ई के बाद की सबसे बड़ी घटना थी, जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया देश भर में हुयी थी। 

15 जून की हृदयविदारक घटना और चीन के धोखे के बाद पूरा देश उद्वेलित था, और इसी की कड़ी में 19 जून को प्रधानमंत्री द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाई गयी, और उस सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री जी ने कहा, 
" न तो हमारी सीमा में कोई घुसा था, और न ही हमारी चौकी पर किसी ने कब्जा किया था। हमारे 20 जवान शहीद हो गए। जिन्होंने, भारत माता के प्रति ऐसा दुस्साहस किया है, उन्हें सबक सिखाया जाएगा। " 
प्रधानमंत्री के इस यह बयान से, भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी और तत्काल निम्न सवाल उठ खड़े हो गए। 
● जब कोई अंदर घुसा ही नहीं था और किसी चौकी पर कब्जा तक नहीं किया गया था,तो फिर विवाद किस बात का था ?
● जब विवाद नहीं था तो फिर 6 जून 2020 को जनरल स्तर की फ्लैग मीटिंग क्यों तय की गयी थी ? 
● जब कोई घुसा ही नहीं था तो हमारे अफसर और जवान क्या करने चीन के क्षेत्र में गए थे जहाँ 20 जवान और एक कर्नल संतोष बाबू शहीद हो गए ? 

हालांकि, प्रधानमंत्री के पहले, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री ने चीनी घुसपैठ की बात स्वीकार की थी। इसी सम्बंध में 2 जून को रक्षामंत्री ने कहा था,
" महत्वपूर्ण संख्या ( साइज़ेबल नम्बर ) में चीनी सेनाओं में लदाख में घुसपैठ की है, और अपने इलाके में होने का दावा किया है। "
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि, चीन की पीएलए हमारे इलाके में घुस कर बंकर बना रही है। 
13 जून को, थल सेनाध्यक्ष जनरल प्रमोद नरवणे ने कहा था,
" चीन से लगने वाली हमारी सीमा पर स्थिति नियंत्रण में है, दोनों पक्ष, चरणों में अलग हो रहे हैं। हमलोगों ने उत्तर में गलवान नदी क्षेत्र से शुरुआत की है ।" 
यह सवाल आजतक पूछा जा रहा है कि, लद्दाख में इतनी बड़ी शहादत के बाद हमने अब तक क्या पाया ? 

अभी छः फरवरी 2021 को ही विदेश मंत्री ने बताया कि, 
" पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर दस महीनों से चले आ रहे सैन्य गतिरोध को दूर करने के लिए चीन से अब तक हुए सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता के नौ दौरों का जमीन पर कोई असर नहीं हुआ है। हमें लगता है कि कुछ प्रगति हुई है, लेकिन उसे समाधान के तौर पर नहीं देखा जा सकता। " 
लेकिन रक्षामंत्री ने संसद में इसी विषय मे फरवरी में ही बताया कि 
" उक्त गतिरोध दूर करने के प्रयासों में ‘एक बड़ी सफलता’ मिल गई है। वह यह कि, भारत व चीन दोनों पैगोंग झील के दक्षिणी व उत्तरी किनारों पर स्थित क्षेत्रों से अपनी सेनाएं पीछे हटाने पर सहमत हो गये हैं।" 
लेकिन रक्षामंत्री के इस बयान पर अनेक सन्देह उठ खड़े हुए, विशेषकर तब, जब उन्होंने कहा कि, दोनो ही सेनाएं पीछे होंगी। यानी पीछे लौटेंगी। जैसे थे, नहीं। 

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ, ब्रह्मा चेलानी ने कई ट्वीट कर के सरकार से इस समझौते पर कई सवाल पूछे और अपनी शंकाये जताई। सरकार द्वारा संसद में दिए गए बयान पर विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते के तहत चीन को फिंगर-4 तक बफर जोन बनाने की बात की गयी है। यानी हम अपने ही इलाके में पीछे लौटे हैं न कि घुसपैठ पूर्व की स्थिति बहाल की गयी है। हमारी ही सीमा में बफर जोन बना कर हमें और पीछे धकेल दिया गया है।

अगर गंभीरता से घुसपैठ पूर्व की स्थिति, घुसपैठ के दौरान दोनों सेनाओं की सीमा पर ज़मीनी कैम्पिंग और अब लम्बे दौर की वार्ता के बाद डिसइंगेजमेंट की कथित 'सफलता' का मूल्यांकन करें तो एक बात तो तय है कि, अप्रैल, 2020 के पूर्व की स्थिति की बहाली यह नहीं है, जिसकी भारत की ओर से लगातार मांग की जाती रही है। अब जो स्थिति उभर कर सामने आ रही है, उसके अनुसार, 
● भारत के जवान फिगर-3 के अपने बेस में रहेंगे, 
● चीन फिंगर-8 के पूर्व में और परम्परागत स्थलों की, जिनमें फिंगर-8 भी शामिल है रहेगा और गश्त स्थगित रहेगी, जब तक कि इस विषय में सैन्य या राजनयिक वार्ता में समझौता नहीं हो जाता।
● डेप्सोंग और अन्य क्षेत्रों में चीनी अतिक्रमणों को लेकर क्या तय हुआ है, यह स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। जबकि चीनी सेना का असल मकसद डेप्सोंग पर कब्जा करना रहा है।
● चीनी सेना के बयान में अप्रैल, 2020 से पहले की स्थिति की बहाली का कोई जिक्र फिलहाल नहीं है। 

चीनी घुसपैठ को लेकर सरकार के अंदर से विरोधाभासी बयान न केवल 19 जून 2020 को आये थे, बल्कि वे बयान आज जब डिसइंगेजमेंट हो रहा है तब भी आ रहे हैं। या तो पीछे लौटो की शर्तें अभी तय नहीं हैं या तय हैं तो उन्हें लेकर सरकार में कहीं न कही संशय का भाव है। विदेशमंत्री के 6 फरवरी के बयान और रक्षामंत्री के समाधान के बयान में ध्वन्यात्मक अंतर है। एक बात और महत्वपूर्ण है कि चीन का अतिक्रमण सिर्फ लद्दाख तक सीमित नहीं है। उसने हमारे अरुणाचल प्रदेश में सुबनसिरी जिले के त्सारी चू नदी के किनारे एक गांव बसा लिया है,जिसमें चीनी नागरिक रह रहे हैं औऱ यह भारतीय सीमा के साढ़े चार किलोमीटर अंदर है। 2017 में डोकलाम में भारतीय सेना के हाथों मात मिलने के बाद ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तिब्बत में ‘बॉर्डर डिफेंस विलेज’ बनाने की शुरुआत कर दी थी। अरुणाचल प्रदेश में बसाया गया चीनी गांव भी इसी एजेंडे का हिस्सा बताया जाता है। सरकार जिस समझौते को समाधान बता रही है, उसे यह भी याद रखना होगा कि, भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी एलएसी को लेकर विवाद है और यह केवल लद्दाख या तक ही सीमित नहीं है। देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मसलों को राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिये से ही देखना और उसका समाधान ढूंढना उचित नहीं होगा। 

सत्यहिन्दी वेबसाइट और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रक्षामंत्री ने सदन में कहा कि, 
●  दोनों पक्ष अपनी-अपनी सेनाओं की गतिविधियों को स्थगित रखेंगे। 
● पिछले साल के गतिरोध से पहले वाली स्थिति बहाल हो जाएगी। 
● चीन के साथ कई दौर की वार्ता के बाद भारत ने कुछ नहीं खोया है।
● दोनों पक्ष सैनिकों को हटाने पर सहमत हैं। कई मुद्दों पर वार्ता बाक़ी है। 
● पैंगोग लेक से सेना हटने के 48 घंटों के भीतर सीनियर कमांडर्स की बैठक। 
● दोनों देश फ़ॉरवर्ड डिप्लायमेंट को हटाएँगे। 
● अप्रैल, 2020 के बाद से पैंगोंग त्सो के नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में निर्माण को हटाया जाएगा। 

इस बयान पर विपक्ष विशेषकर कांग्रेस और कुछ रक्षा विशेषज्ञों ने, निम्न संदेहों को उठाया, 
●  चीन की सेना डेप्सोंग, गोगरा और हॉट स्प्रिंग से बाहर क्यों नहीं गई? 
● हमारी ज़मीन फ़िंगर 4 तक है और सेना फ़िंगर 3 पर आ जाएगी। फिर 3 से फिंगर 4 तक की भारत की ज़मीन क्या चीन के पास नहीं चली जाएगी ? 
● भारतीय सेना अब फिंगर 3 तक सीमित हो जाएगी। क्या यह सीधे-सीधे भारत के हितों पर कुठाराघात करने का काम नहीं है?
● डेप्सोंग में चीन अंदर तक आया है, गोगरा और हॉट स्प्रिंग की ज़मीन के बारे में क्या स्थिति है ?
● सरकार केवल पैंगोंग त्सो लेक इलाके से ही ‘डिसइंगेज़मेंट’ का समझौता क्यों कर रही है और वह भी एलएसी की रूपरेखा बदलकर ?
●‘कैलाश रेंजेस’ पर अपनी प्रभावी व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मौजूदगी से वापसी का समझौता क्यों किया जा रहा है ? 
● चीन ने एलएसी के 18 किमी अंदर तक (वाई जंक्शन तक) घुसपैठ की हुई है और भारत की सेना को अपने ही पेट्रोलिंग प्वाइंट्स में पेट्रोलिंग करने से रोक रखा है। 
● गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स में चीनी घुसपैठ के बारे में चुप्पी क्यों है ?
● चीनी सेना चुमुर, दक्षिणी लद्दाख तक पेट्रोलिंग कर रही है। इसका क्या कारण और निदान है ?

इस डिसइंगेजमेंट पर इतने सवाल खड़े हुए कि, अब रक्षा मंत्रालय को, भ्रम दूर करने के लिये बयान जारी करना पड़ा। रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में निम्न बाते कहीं।
" पैंगोंग त्सो में वर्तमान में जारी डिसइंगेजमेंट के संबंध में कुछ ग़लत और भ्रामक टिप्पणियाँ मीडिया और सोशल मीडिया पर की जा रही हैं। संसद के दोनों सदनों को अपने बयानों में रक्षा मंत्री द्वारा पहले ही स्पष्ट रूप से स्थिति साफ़ कर दी गई है। हालाँकि, मीडिया और सोशल मीडिया में ग़लत तरीक़े से समझी जा रही जानकारी के कुछ मामलों को सीधे काउंटर करना ज़रूरी है। 
● यह दावा कि भारतीय क्षेत्र फिंगर 4 तक है, स्पष्ट रूप से ग़लत है। भारत के क्षेत्र को भारत के नक्शे द्वारा दर्शाया गया है और इसमें 1962 से चीन के अवैध कब्जे में वर्तमान में 43,000 वर्ग किमी से अधिक शामिल हैं। यहाँ तक ​​कि भारतीय धारणा के अनुसार, वास्तविक नियंत्रण रेखा फिंगर 8 पर है, फिंगर 4 पर नहीं। यही कारण है कि भारत ने चीन के साथ वर्तमान हालात में भी फिंगर 8 तक गश्त का अधिकार बनाए रखा है।
● पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर दोनों पक्षों के स्थायी पोस्ट पहले से ही हैं। भारतीय पक्ष में, यह फिंगर 3 के पास धन सिंह थापा पोस्ट है और फिंगर 8 के पूर्व में चीनी है। वर्तमान समझौते में दोनों पक्षों द्वारा फॉरवार्ड की तैनाती को रोकने और इन स्थायी पोस्टों पर तैनाती जारी रखने का प्रावधान है।
● भारत ने इस समझौते के परिणामस्वरूप किसी भी क्षेत्र को नहीं खोया है। इसके विपरीत इसने यथास्थिति में किसी भी एकतरफ़ा बदलाव को रोका है।
● रक्षा मंत्री के बयान ने यह भी साफ़ किया है कि हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और देपसांग सहित कई मुद्दों का समाधान किया जाना बाक़ी है। पैंगोंग त्सो के डिसइंगेजमेंट के पूरा होने के 48 घंटे के भीतर बकाया मुद्दों को उठाया जाना है।
● पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में हमारे राष्ट्रीय हित और क्षेत्र की प्रभावी सुरक्षा हो गई है क्योंकि सरकार ने सशस्त्र बलों की क्षमताओं पर पूरा विश्वास किया है। जो लोग हमारे सैन्य कर्मियों के बलिदान से संभव हुई उपलब्धियों पर संदेह करते हैं वे वास्तव में उनका अपमान कर रहे हैं।

अभी जिस डिसइंगेजमेंट की बात की जा रही है, उसके बारे मे रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि, डेप्सोंग से चीन को पीछे हटने के लिये बाध्य न करना एक बडी भूल साबित हो सकती है। क्योंकि चीन हमारी सीमा में 18 किमी तक अंदर आ गया है और इस समझौते के बाद भी उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। पिछली गर्मियों में भी, जब भारत गलवा घाटी में कुछ पीछे हटने को राजी होने की बात सोच रहा था, तब भी सरकार के इस कदम से कुछ रक्षा विशेषज्ञ हैरान थे कि, हम अपनी ही ज़मीन में हैं तो पीछे क्यों हटें और हमारी अपनी ज़मीन में कोई बफर जोन क्यों बने ? बफर जोन वह अनिश्चित ज़ोन होता है जहां यह किसी एक पक्ष की नही होती है, और वह किसी भी देश की भूमि नहीं होती है। पहले फिंगर 4 तक हमारी कैम्पिंग साइट थी और गश्त हम फिंगर 8 तक करते थे। अब हम फिंगर 3 पर आ गए हैं। चीन की यह पुरानी विस्तारवादी नीति है कि वह पहले सीमा के अंदर अधिक घुसता है और फिर जब बातचीत होती है तो वह थोड़ा पीछे चला जाता है। ऐसा करने में वह कुछ न कुछ अपनी सीमा या तो बढ़ा लेता है या फिर उसे बफर जोन में बदलवा कर के विवादित बनाये रखता है। उसकी यह रणनीति माओ की तिब्बत और उसकी पांच अंगुलियों के सिद्धांत पर आधारित है। 

द टेलीग्राफ में छपी एक खबर में एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल के हवाले से यह कहा गया है कि, 
" भारत द्वारा पैंगोंग झील क्षेत्र से पीछे हटना और अपने ही नियंत्रण वाले इलाके के कुछ भाग को बफर जोन में बदल देने पर सहमति व्यक्त करना, इसका आगे चल कर एक घातक परिणाम हो सकता है। यह एक बड़ी भूल है कि, बिना अप्रैल 2020 की स्थिति में वापस लौटे इस प्रकार के बफर जोन पर राजी हो जाया जाय। क्या हम पैंगोंग झील के उस हिस्से को छोड़ दे रहे हैं जो हमारे अधिकार में था, और चीन के दावे को स्वीकार कर ले रहे हैं कि यह उसका है और हम आगे बढ़ आये थे ?" 

रिटायर्ड कर्नल अजय शुक्ल जिन्होंने अप्रैल 2020 में हुयी घुसपैठ और 20 सैनिकों की शहादत और फिर उसके बाद लगातार होने वाली कोर कमांडर स्तर की वार्ता पर लेख लिखते रहे हैं का यह ट्वीट पढ़े, 
भारतीय और चीनी सेनाएं, अब पैंगोंग झील से डिसइंगेज होना शुरू हो गयी हैं।  फिंगर 3 से फिंगर 8 तक 10 किमी लम्बे  टुकड़े में एक बफर जोन अब बन जायेगा। 1962 के भारत चीन युद्ध के समय से ही, भारतीय सेना इस इलाके में फिंगर 8 तक गश्त करती रही है, लेकिन अब वह फिंगर 8 तक गश्त नहीं कर सकेगी।" 
इस प्रकार, भारत का दावा फिंगर 8 उत्तरी किनारे के क्षेत्र तक था, लेकिन अब चीन बढ़ कर फिंगर 4 तक आ गया है। जबकि वह फिंगर 8 तक था। अभी जो डिसइंगेजमेंट का समझौता हुआ है उसके अनुसार, चीन फिंगर 8 के पूर्व में रहेगा और भारत फिंगर 3 पर स्थित अपने स्थायी आधार पर आ जायेगा। कोई भी देश बफर जोन में गश्त नहीं कर सकता जो अब फिंगर 3 से 8 तक हो गया है, जब तक कि यह सीमा विवाद, उभय देशों द्वारा सुलझा न लिया जाय। यह कहा जा सकता है कि यह अस्थायी व्यवस्था है। पर इस अस्थायी व्यवस्था में भी हमे अपनी ही भूमि और फिंगर 8 तक के गश्त की अधिकारिता छोड़नी पड़ रही है। 

सितंबर में सेना ने कैलाश रेंज की ऊंचाइयों पर कब्ज़ा किया था। यह ऊंचाइयां सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। डिसइंगेजमेंट में यह स्पष्ट नही है कि उनसे भी हम पीछे हटेंगे या वहां भारत का कब्ज़ा बरकरार रहेगा। समझौते में कैलाश रेंज को बनाये रखने का कोई स्पष्ट उल्लेख नही है, इसलिए रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने एक ट्वीट कर के कहा है कि
" हम कैलाश रेंज से क्यों हट रहे हैं ? समझौते में वहां से कब्जा न छोड़ने का उल्लेख होना चाहिए।"
द टेलीग्राफ ने सूत्रो के हवाले से यह भी खबर छापी है कि, नौ दौर की बातचीत में चीन इस बात पर अड़ा था कि, भारत कैलाश हिल की ऊंचाइयों पर से भी अपना कब्जा हटाये, इसीलिए दोनो देशों में समझौता होने में गतिरोध था। अभी यह पूरी तरह से निश्चित नहीं है कि, कैलाश हिल के मुद्दे पर सरकार ने क्या तय किया है। इसी प्रकार, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है कि, डेप्सोंग मैदान, गोगरा और हॉट स्प्रिंग जहां चीन घुस कर बैठा है, उसे खाली करेगा या नहीं। अजय शुक्ल कहते है कि 
" सियाचिन के बारे में हम पाकिस्तान के समक्ष जितने दृढ़ होते हैं उतने चीन के संबंध में मज़बूत स्टैंड नही ले पा रहे हैं। जब पाकिस्तान कहता है कि सियाचिन का विसैन्यीकरण करना चाहिए तब भारत का स्टैंड रहता है कि नहीं, सियाचिन कश्मीर समस्या का ही एक हिस्सा है। " 
सियाचिन भी अपनी ऊंचाई और सामरिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण विंदु है, जिसे कब्जे में लेने के लिये कारगिल की बड़ी घुसपैठ पाकिस्तान द्वारा की गयी और फिर पाकिस्तान को वहां से खदेड़ दिया गया। ऐसा ही सामरिक महत्व, कैलाश रेंज की ऊंचाइयों का भी है।

भारत चीन के बीच इस समझौते को लेकर संशय के अनेक कारण है। सबसे पहला और प्रमुख कारण है चीन की नीयत कभी भी भारत के साथ उसके संबंधों को लेकर स्पष्ट और दुर्भावना रहित नहीं रही। चाहे चाउ एन लाई का भारत के साथ पंचशील समझौता हो, या 1959 ई में हॉट स्प्रिंग में घात लगा कर सीआरपीएफ जवानों की, हमारे इलाके में घुसकर उनकी हत्या करनी हो, या अरुणाचल में उसकी लगातार बढ़ती दिलचस्पी और दखल हो, या भारत द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार के समय, चीन से बेहतर सम्बंध बनाने की कोशिशें रही हो, चीन ने भारतीय सदाशयता की बराबर उपेक्षा की है और हर कदम पर हमें धोखा दिया है। जब परस्पर भरोसे में इतना अधिक क्षरण हो गया हो, और परस्पर विश्वास बार बार टूटा हो तब हर समझौते पर सन्देह का उठना स्वाभाविक है। 
दूसरा कारण है, सरकार के मंत्रियों और प्रधानमंत्री के इस घुसपैठ को लेकर परस्पर विरोधी बयान। 19 जून 2020 को न तो कोई घुसा था और न कोई घुसा है का पीएम द्वारा कहा गया वाक्य न केवल चीन की घुसपैठ को ही नकार देता है बल्कि उसके बाद की होने वाली समस्त वार्ताओं और समझौतों पर संशय खड़ा कर देता है। हालांकि सरकार का, दृष्टिकोण, पीएम के उक्त बयान से अलग शुरू से ही रहा है। 
तीसरा, कारण है, मंत्री बीके सिंह का बयान, जिसमे वे कहते हैं कि दस बार चीन घुसता है तो पचास बार हम भी घुसते हैं। यह खुद को आक्रामक और निर्भीक दिखाने के लिये कहा गया बयान हो सकता है पर अंतरराष्ट्रीय राजनय में सीमा शुचिता के उल्लंघन के रूप में भी व्याख्यायित किया जा सकता है। 

उपरोक्त तमाम संशय के बीच अगर इस समझौते पर अविश्वास भरी टीका टिप्पणियां की जा रही है, तो इसका पर्याप्त आधार भी है। पर समझौते पर सवाल उठाने वालों से असहमत होते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ने ट्वीट कर के खहा है कि, 
'यह समझौता उचित है और इससे दोनो देशों के बीच आगे भी सैन्य तनाव घटेंगे। जो इसकी आलोचना कर रहे हैं वे या तो ज़मीनी हक़ीक़त से वाकिफ नहीं हैं या इसे समझ नहीं पा रहे हैं।'
आलोचकों का मुख्य विंदु डेप्सोंग मैदान से चीन का पीछे न हटना और कैलाश ऊंचाइयों से भारत के पीछे हटने की संभावनाओं को लेकर है। लेकिन सरकार का कहना है कि पैंगोंग झील से दोनो पक्षो को हट जाने के 48 घन्टे के अंदर अन्य मुद्दों पर बात होगी। 

डेप्सोंग मैदान से चीन का पीछा लौटना ज़रूरी है, क्योंकि यदि यहाँ पर चीन की मौजूदगी बनी रहती है तो, वह हमारी सामरिक महत्व की हवाई पट्टी दौलत बेग ओल्डी के लिये बराबर खतरा बना रहेगा जो 16000 फिट की ऊंचाई पर है। यह हवाई पट्टी 1962 में चीनी हमले के समय बनायी गयी थी। यह सड़क हाल ही में बनाई गयी सामरिक महत्व की दर्बुक - श्योक - डीबीओ ( दौलत बेग ओल्डी ) सड़क जो एलएसी के समानांतर जाती है,को जोड़ती है। यह 14000 फिट से 16000 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। आगे जाकर यह सड़क, लेह को डीबीओ से जहां काराकोरम दर्रा चीन के स्वायत्त प्रदेश जिनजियांग को अलग करता है, जोड़ती है। यह सड़क हमारी सप्लाई लाइन के लिये बहुत ज़रूरी है, जिसके महत्व से चीन भी अनजान नहीं है। इसीलिए रक्षा विशेषज्ञ डेप्सोंग मैदान से चीन के पीछे हटने को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि इस समझौते से एलएसी की अप्रैल 20 की स्थिति क्या बहाल हो जाएगी यानी भारत और चीन 'जैसे थे' की स्थिति में आ जाएंगे या हम अपनी ज़मीन कुछ खो देंगे ? 

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 13 February 2021

बढ़ती बेरोजगारी, निजीकरण का दुष्प्रभाव और बजट 2021 / विजय शंकर सिंह

कहने को तो हमारा सालाना बजट आम बजट कहलाता है, पर यह धीरे धीरे खास बजट बन गया है। आम लोगों की संसद में, आम लोगों के नाम पर, आम चुनावों द्वारा चुनी गयी सरकार द्वारा पेश किया जाने वाला यह वार्षिक आय व्यय का लेखा जोखा, खास लोगों को ध्यान में रख कर बनाया हुआ बजट बन गया है। पेश किये गए, बजट 2021 के बारे में सारे अर्थशास्त्रियों की एक राय  बहुमत से है कि, यह बजट आय व्यय के किसी लेखे जोखे के बजाय, सरकारी संपत्तियों के विनिवेश का एक घोषणापत्र है। विनिवेश, यानी, सरकारी कंपनियों में सरकार की जो हिस्सेदारी है, उसे बेचने का तकनीकी नामकरण है। सच तो यह है कि सरकार अपनी कम्पनियों को कॉरपोरेट सेक्टर को बेच रही है। कभी निवेश आमंत्रित करने को सतत उत्सुक रहने वाली सरकार अब अपनी पूंजी अपनी ही बनाई सरकारी कम्पनियों से निकालने की जुगत में है। यहीं यह सवाल उठता है कि सरकार आखिर अपनी सम्पत्तिया बेच क्यों रही है। निर्मला सीतारमण, वित्तमंत्री ने इसका एक कारण यह बताया है कि, जब सरकार अपनी कम्पनियों को चला ही नहीं पा रही है तो, वह उसे रख कर क्या करेगी ? बात भी सही है कि एक अक्षम सरकार, अपनी सम्पत्तियों की रक्षा, प्रबंधन और विकास नहीं कर सकती, तो वह उसे बेचने की ही बात सोचने लगती है। एक गीत की खूबसूरत पंक्ति की तरह, वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना बेहतर ! अब सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कम्पनियां, जिन्होने, देश के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, अब अफसाने के ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुयी हैं, कि सरकार उन्हें अब विनिवेश जैसे खूबसूरत नाम के साथ ही छोड़ देना चाहती है। 

2014 के चुनाव में लोकप्रियता के पंख पर सवार जब एनडीए या बेहतर हो यह कहें कि भाजपा की सरकार आयी तो सबसे अधिक उम्मीद, इस सरकार से युवा, व्यापारी, किसान और उद्योगपतियों की थी। अन्ना आन्दोलन ने युवाओं की अपेक्षाओं को जगा दिया था। गुजरात के विकास की अंतर्कथा की जानकारी से वंचित लोग, गुजरात जैसे विकास की उम्मीद में मुब्तिला थे। 2 करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष का वादा, युवाओं को लुभा रहा था। और लोगों को लग रहा था, 12 साल में गुजरात की तकदीर बदल देने वाले विकास पुरूष की पट्टिका से अलंकृत नरेंद मोदी, देश का काया पलट कर देंगे। पर 2016 की नोटबन्दी के बाद, हम बजट दर बजट खिसकते जीडीपी के साथ साथ नीचे आने लगे और, 2020 की 31 मार्च को जीडीपी 5 % पर आ गयी। फिर तो उसके बाद, कोरोना महामारी ने देश की अर्थव्यवस्था को ही संक्रमित कर दिया। मार्च 2021 में जीडीपी में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गयी और माइनस 23.9% पर आ गयी। इस साल अनुमान है कि 11% की वृद्धि होगी, लेकिन, इतनी वृद्धि के बावजूद भी जीडीपी माइनस में ही रहेगी। दस साल पहले भारत दुनिया की सबसे उभरती हुयी आर्थिकी था, अब वह दुनिया की सबसे गिरती हुयी आर्थिकी बन गया है। कोरोना आपदा, इस स्थिति के जिम्मेदार है, लेकिन यदि आर्थिकी के पिछले 6 साल के आंकड़ों का, यदि अध्ययन किया जाय तो, साल 2016 के 8 नवम्बर, की रात 8 बजे, देश की 84 % मुद्रा का विमुद्रिकरण कर देना, आधुनिक भारत के आर्थिक इतिहास में, किसी भी सरकार द्वारा उठाया गया सबसे अपरिपक्व और आत्मघाती कदम कहा जायेगा, और यह एक ऐतिहासिक भूल थी। 

नये बजट के अनुसार, सरकार व्यापक स्तर पर सरकारी उपक्रमो का निजीकरण करने जा रही है। बिजनेस स्टैंडर्ड के एक लेख के अनुसार, इस साल 23 कंपनियों में निजीकरण या उन्हें बेचने की मंजूरी दी जा चुकी है। साल, 2019 के पब्लिक इंटरप्राइजेस सर्वे के अनुसार, भारत में कुल 348 सरकारी कंपनियां हैं। नीति आयोग, जो इस समय निजीकरण आयोग की तरह काम करने लगा है, ऐसी कंपनियों की एक सूची बना कर इस कार्ययोजना पर काम कर रहा है जिन्हें सरकार निजी क्षेत्र को बेच देना चाहती है। इन कंपनियों में बैंक और बीमा कंपनियां भी शामिल हैं। जीवन बीमा निगम, यानी एलआईसी भी नीति आयोग की सूची और कार्ययोजना में शामिल है। सरकारी उपक्रमो के बारे में अध्ययन करने वाले कंपनी कानून के विशेषज्ञों के एक समूह का अनुमान है कि, अगले कुछ वर्षों में सरकारी कंपनियों की संख्या सिमटकर लगभग 25 के आसपास बच जाएगी। पिछले 70 सालों में जनता के टैक्स से बनायी गयी, 348 सरकारी कंपनियों में से 330 कंपनियां निजी क्षेत्र को बेंच दी जायेंगी।  

यह विनिवेश या कम्पनी बेचो अभियान का असर, न केवल बेरोजगारी पर पड़ेगा, बल्कि इसका एक घातक प्रभाव, संविधान में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिये, आरक्षण के अधिकार पर भी पड़ेगा। 348 से सिमट कर 25 सरकारी कम्पनियां हों जाने पर, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उन युवाओं के सामने, नौकरी की नयी चुनौती खड़ी हो जाएगी, जिन्हें सरकारी नौकरियों में अब तक 49.5% तक आरक्षण मिलता था। निजी क्षेत्र, आरक्षण के उक्त संवैधानिक प्राविधान से मुक्त हैं, तो उनकी ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं है कि वे, देश के आरक्षित समूहों को नौकरी दें। बिजनेस स्टैंडर्ड ने इस समस्या का अध्ययन,  देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम के संदर्भ में किया है। सरकार बीपीसीएल की 53.3% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है।

बिजनेस स्टैंडर्ड के लेख में, बीपीसीएल के ह्यूमन रिसोर्स पर किये अध्ययन के अनुसार,
" इस कम्पनी में,  1 जनवरी 2019 तक 11,894 कर्मचारी काम कर रहे थे। इनमें पिछड़ा वर्ग के 2042, अनुसूचित जाति के 1921 और 743 अनुसूचित जनजाति के कर्मचारी थे। इनमें 90% से ज्यादा भर्तियां आरक्षण के तहत हुई थीं। प्राइवेटाइजेशन के बाद वहां की चार हजार से ज्यादा आरक्षित भर्तियों को भी खुली भर्ती से भरा जाएगा। यह एक उदाहरण है।" 
इसी उदाहरण के पैटर्न पर अन्य सरकारी कंपनियों का सिसिलेवार अध्ययन किया जा सकता है। इससे जिन उद्देश्यों से समाज के वंचित वर्ग के सामाजिक उत्थान के लिये आरक्षण की सुविधा, संविधान में दी गयी है, वे उद्देश्य पूरे नहीं हो सकेंगे। 

एक अनुमान के अनुसार, सरकारी कंपनियों के निजी हाथों में चले जाने से करीब 7 लाख आरक्षित नौकरियों पर संकट आ सकता है। पब्लिक इंटरप्राइजेस सर्वे की साल 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी कंपनियों में कर्मचारियों की कुल संख्या करीब 15 लाख है। इसमें से 10.4 लाख स्थायी कर्मचारी हैं। इन नौकरियों में अनुसूचित जाति के लिए 15%, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5% और ओबीसी के लिए 27% आरक्षण है। सरकारी कंपनियां विनिवेश के बाद निजी हाथों में जाएंगी तो नौकरियों से आरक्षण की कोई गारंटी नहीं रहेगी। इससे 49.5 प्रतिशत भर्तियां होंगी, जिनकी संख्या करीब 7 लाख हो सकती है।

ऐसा नहीं है कि इन सब विसंगतियों पर अध्ययन और प्रतिक्रियाये नहीं आ रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया तो, यहां तक कहते हैं कि, 
" सरकारी कंपनियों का प्राइवेटाइजेशन आरक्षण खत्म करने के लिए ही किया जा रहा है। अब रिवर्स आरक्षण का दौर चल रहा है। सरकार ने पहली बार आर्थ‌िक तौर पर कमजोर सवर्ण के नाम पर कथ‌ित जातीय आरक्षण लागू किया है। आने वाले दिनों में एक बार फिर से समाज में एक बड़ी खाई देखने को मिलेगी।" 
ऐसी प्रतिक्रिया केवल अनिल चमड़िया की ही नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया पर सामाजिक न्याय के मुद्दों को लगातार उठाने वाले, वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल सरकार पर आरक्षण को खत्म करने की साज़िश करने का, सीधा आरोप लगाते हैं। वे कहते हैं, 
"आरक्षण पर भाजपा सरकार ने 5 बड़े हमले किए हैं। हाल ही में लैटरल एंट्री वाली नौकरियां निकली थीं। इनमें आरक्षण लागू नहीं था। ओपन सीटों में 10% आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्ण को आरक्षण दिया जा रहा हैं, जबकि निजीकरण के जरिए पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग में आरक्षण खत्म करने की तैयारी में हैं। आरक्षण से बचने के लिए ही सरकार इन दिनों भर्तियां निकालने के बजाय कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों से काम करा रही हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण नहीं देना पड़ता।"

आरक्षण एक संवेदनशील मुद्दा है, और जब बेरोजगारी की गति बढ़ने लगती है, नौकरियों के अवसर सिकुड़ने लगते हैं तो, यह मुद्दा और संवेदनशील हो जाता है। जैसे-जैसे प्राइवेटाइजेशन बढ़ा, आरक्षण से मिलने वाली नौकरियां वैसे वैसे कम होती गयीं। वर्ष 2001 से 2004 के बीच अब तक का सबसे बड़ा निजीकरण अभियान चलाया गया। 14 बड़ी सरकारी कंपनियों को पूरी तरह प्राइवेटाइज करने की कोशिश की गई। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित क्रिस्टोफर जैफरलॉट के एक लेख के अनुसार, 2003 में केंद्र सरकार के अनुसूचित जाति/जनजाति के 5.40 लाख कर्मचारी थे जो 2012 तक 16% घटकर 4.55 लाख हो गए।
इसी प्रकार उसी लेख के अनुसार,
" साल 1992 में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये आरक्षण की शुरुआत हुई। तब 2004 तक केंद्र की सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी 16.6% थी, 2014 आते-आते 28.5% हो गई। देश में ओबीसी की जनसंख्या करीब 41% है। आरक्षण के चलते सरकारी नौकरियों में वे बराबरी की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन प्राइवेटाइजेशन के बाद इसकी भी गारंटी नहीं रह जाएगी।" 

इन बड़ी कंपनियों के अतिरिक्त, भारत सरकार ने, होटल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, एचटीएल लिमिटेड, आईबीपी कॉर्पोरेशन लिमिटेड, इंडियन टूरिज्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड को भी प्राइवेट कर चुकी है। इसका सबसे बड़ा असर नौकरियों में पड़ा। केंद्र सरकार की नौकरियों में साल 2003 में 32.69 लाख लोग थे। प्राइवेटाइजेशन के चलते 2019 आते-आते 50% से ज्यादा घटकर सिर्फ 15.14 लाख कर्मचारी ही बचे। यानी 16 सालों में केंद्र सरकार की नौकरियों में 17.55 लाख की कमी आई। मई 2014 से अब तक सरकार ने 121 कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेच दी है और साल 2014 के बाद से आई भर्तियाेें का आंकड़ा जारी नहीं किया गया है। 

इंडियन पोलिटिकल ड्रामा में 19 जनवरी  2021 को त्रिरंजन चक्रवर्ती ने देश की बढ़ती बेरोजगारी पर एक शोधपरक लेख लिखा था। लेख में उन्होंने बेरोज़गारी की समस्या की विकरालता पर एक छोटी मगर सारगर्भित टिप्पणी की है। उक्त लेख के अनुसार, दिसंबर 2020 में बेरोजगारी की दर, नवम्बर 2020 की बेरोजगारी की दर, जो 6.50% थी से, तेजी से बढ़ कर, 9.06% हो गयी है। यह आंकड़ा, सरकार के ही विभाग, सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी ( सीएमआईई ) द्वारा जारी किया गया है। पिछली बार बेरोजगारी में इतनी तेज वृद्धि, जून 2020 में हुयी थी। जून 2020, कोरोना आपदा का सबसे कठिन काल था, जब देश भर में लॉकडाउन था, और सारी औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियां, लगभग ठप थीं। उस समय बेरोजगारी दर में इतनी तेज बढोत्तरी का काऱण एक कारण था, और वह काऱण उचित तथा वैश्विक था। उस समय सीएमआईई के अनुसार, बेरोजगारी की दर 10.18% थी। लेकिन जुलाई से औद्योगिक और व्यायसायिक गतिविधियों में तेजी आयी और बाजारों में रौनक भी बढ़ी, लेकिन क्या कारण है कि बेरोजगारी दर जून 2020 के ही आसपास दिसंबर 2020 में ही रही ? इस पर त्रिरंजन चक्रवर्ती अपनी राय देते हुए कहते हैं कि, हमारी आर्थिकी, लॉक डाउन और कोरोना आपदा के बाद सामान्य होती हुयी परिस्थितियों में भी नौकरी या रोजगार के उतने अवसर नहीं पैदा कर सकी, जितनी की उसे करना चाहिए था। अगर शहरी और ग्रामीण सेक्टरों में बांट कर अलग अलग इस दर को देखें तो, बेरोजगारी की दर, ग्रामीण क्षेत्र में अधिक भयावह और चिंताजनक है। 

अब सीएमआईई के दो आंकड़ो की चर्चा करते है। एक आंकड़ा है, जुलाई 2020 से दिसंबर 2020 तक, देश मे कुल और फिर शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रो के अलग अलग बढ़ती हुए बेरोजगारी दर की। जुलाई 2020 में, कुल बेरोजगारी दर, 7.40% रही है और फिर हर माह कुछ न  कुछ बढ़ते घटते हुए, अगस्त में, 8.35%, सितंबर में, 6.68%, अक्टूबर में, 7.02%, नवंबर में,6.50 और दिसंबर में,  9.06% तक पहुंच गयी। 
इसी प्रकार, शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी दर, जुलाई में, 9.37%, अगस्त में,9.83%, सितंबर में, 8.45%, अक्टूबर में,7.18%,   नवंबर में, 7.07% और दिसंबर में, 8.84% रही है।
इसी अवधि में ग्रामीण क्षेत्रो में बेरोजगारी दर, जुलाई में, 6.52%, अगस्त में, 7.65%, सितंबर में,5.88%, अक्टूबर में,   6.95%, नवंबर में, 6.24% और दिसंबर में, 9.15% रही है। 

सीएमआईई, जब बेरोजगारी के आंकड़े तैयार करती है तो वह एक तकनीकी शब्द प्रयुक्त करती है, लेबर पार्टिसिपेशन रेट ( एलपीआर ). एलपीआर का अर्थ है कि, रोजगार की तलाश में कितने लोगों की संख्या में वृद्धि हुयी है। यदि यह संख्या बढ़ रही है तो इसका एक अर्थ यह भी है कि वर्कफोर्स में हो रही वृद्धि की तुलना में नौकरी या रोजगार के अवसर उतने नहीं बढ़ रहे हैं। यानी या तो औद्योगिक, व्यावसायिक औऱ अन्य नौकरी प्रदाता संस्थान बढ़ नही रहे हैं या उनकी क्षमता कम हो रही है। ऐसी स्थिति में बेरोजगारी का दर बढ़ना लाज़िमी ही होगा। सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2020 में, 4 करोड़ 27 लाख लोग काम की तलाश में थे, जबकि नवम्बर 2020 में यह आंकड़ा, 4 करोड़ 21 लाख का था। एक माह में यह वृध्दि 6 लाख की है। यही कारण है कि दिसम्बर 2020 में बेरोजगारी के आंकड़ो में चिंताजनक वृध्दि हुयी है। देश मे सबसे अधिक श्रम बल, कृषि क्षेत्र देता है और दिसंबर मे खेती का काम कम हो जाता है तो उसका सीधा असर, देश के बेरोजगारी के आंकड़ों पर पड़ता है। यह इस बात को भी बताता है कि सरकार देश को सबसे अधिक काम देने वाले सेक्टर के प्रति सबसे अधिक उपेक्षा भाव से ट्रीट करती है। 
 
अब कुछ राज्यों के बेरोजगारी दर के आंकड़े देखिये। दिसंबर 2020 में, सबसे  अधिक बेरोजगारी दर, 32.5%, हरियाणा में रही। उसके बाद, 28.2% राजस्थान मे रही है। दो अंकों में जिन राज्यो की बेरोजगारी दर रही है, वे हैं, झारखंड, 12.4%, बिहार 12.7%, गोवा 13.2%, उत्तर प्रदेश 14.9%, जम्मूकश्मीर 16.6% और त्रिपुरा 18.2%. इसके अतिरिक्त देश के अन्य राज्य और केंद्र शासित राज्यो की बेरोजगारी दर, एक अंक में रही है। 

बेरोजगारी का बढ़ना, महज कुछ आंकड़ो का परिवर्तन ही नही है बल्कि समाज में व्याप्त अंसन्तोष, आक्रोश और अवसाद का भी एक बड़ा कारण है। बढ़ती हुयी बेरोजगार युवाओं की संख्या का असर, समाज के तानेबाने और अपराध की स्थिति पर पड़ता है। यह जब जनअसंतोष का रूप ले लेता है, तो बेरोजगारी की समस्या तो अलग छूट जाती है और अन्य नयी समस्यायें पैदा होने लगती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बेरोजगारी का कारण सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयों पर सरकार की आर्थिक नीतियों का असर पड़ना है। नोटबन्दी का सबसे बुरा प्रभाव, एमएसएमई कम्पनियों पर पड़ा। जिन्हें हम कुटीर उद्योग के रूप में कभी जानते थे। स्थानीय लोगो को अपने घर गांव के आसपास रोजगार और नौकरियों का अवसर देने वाला यह सेक्टर बुरी तरह से तबाह हो गया था। अब यह धीरे धीरे सुधर तो रहा है, पर इसे और बेहतर तरह से तरक़्की करने के लिये सरकार को अपनी प्राथमिकता में इस सेक्टर को लाना पड़ेगा। जबकि सरकार की प्राथमिकता में कॉरपोरेट है और अब तो यही स्थिति हो गयी है कि कॉरपोरेट की ही सरकार है और शेष कॉरपोरेट के शोषित उपनिवेश की तरह हैं। स्थानीय स्तर पर एमएसएमई के विस्तार और उनकी सबलता से न केवल कामगारों के पलायन और विस्थापन पर असर पड़ेगा,  बल्कि, इससे ग्रामीण क्षेत्रो का सम्यक विकास भी हो सकेगा। अब यह तो समय ही बता पायेगा कि, बजट 2021 देश की बेरोजगारी की समस्या को दूर करने मे कितना सक्षम होता है। 

( विजय शंकर सिंह )




Thursday, 11 February 2021

आन्दोलनजीविता और किसान आंदोलन 2020 / विजय शंकर सिंह

किसान आंदोलन 2020 की, सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि, इसने धर्म केंद्रित राजनीति जो 2014 के बाद, जानबूझकर जनता से जुड़े मुद्दों से भटका कर, सत्तारूढ़ दल भाजपा और संघ तथा उसके थिंक टैंक द्वारा की जा रही है को लगभग अप्रासंगिक कर दिया है। सरकार 2014 में ही गिरोहबंद पूंजीपतियों के धन के बल पर, जनता के वोट, और संकल्पपत्र के लोकलुभावन वादों के सहारे आयी थी। सरकार अपने पोशीदा एजेंडे के प्रति न तब भ्रम में थी न अब है। धीरे धीरे, योजना आयोग के खात्मे और पहला भूमि अधिग्रहण बिल से सरकार ने कॉरपोरेट तुष्टिकरण के अपने पोशीदा एजेंडे पर जिस संकल्प के साथ काम करना शुरू किया था, वह साल दर साल जनविरोधी और कॉरपोरेट फ्रेंडली होता ही गया। यह तीन नए कृषि कानून, देश का सबकुछ कॉरपोरेट को सौंप देने के एजेंडे का ही एक चरण है। पर सबसे अच्छी बात यह है कि जनता अब सरकार के गिरोहबंद पूंजीवादी एजेंडे को समझने लगी है। लोकसभा में भी विपक्ष इस पर बिना लागलपेट के बोलने लगा है। लोग यह समझने लगे हैं कि, यह सरकार दो पूंजीपतियों के प्रति अपना स्वाभाविक झुकाव रखती है। राहुल गांधी का हम दो हमारे दो, का स्पष्ट कथन और उस पर सदन में ही, देश के दो बड़े पूंजीपतियों के घराने, अम्बानी और अडानी के पक्ष में, सत्ता पक्ष का जाने अनजाने खड़ा दिखना, इस भ्रम को तोड़ने के लिये पर्याप्त है कि, सरकार अपने फैसले जनहित में ले रही है। 

सरकार का लक्ष्य देश का आर्थिक विकास न तो वर्ष 2014 में था, न ही वर्ष 2019 में । सरकार का एक मात्र लक्ष्य था और, अब भी है कि, वह अपने चहेते कॉरपोरेट साथियों को लाभ पहुंचाए और देश मे ऐसी अर्थ संस्कृति का विकास करे, जो क्रोनी कैपिटलिस्ट ओरिएंटेड हो। सरकार द्वारा उठाया गया हर कदम, पूंजी के एकत्रीकरण, लोककल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा के विरुद्ध रहा है। चाहे नोटबन्दी हो, या जीएसटी, कर राहत के कानून हों या बैंको से जुड़े कानून, लॉक डाउन से जुड़े निर्देश, इन सबका यदि गहराई से अध्ययन किया जाय तो, सरकार का हर कदम, पूंजीपतियों के हित की ओर ही जाता दिखता है। इसी कालखंड में जीडीपी में भारी गिरावट आयी, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में शून्य से नीचे अधोविकास की गति हो गयी, बेरोजगारी अब तक के सबसे बुरे दौर में आ गयी। सरकार निश्चिंत नौकरियों के बजाय संविदा आधारित नौकरियों की बात करने लगी। पर इन सारे भयावह आर्थिक गिरावट के दौर में, यदि तरक्की होती रही तो, सिर्फ दो पूंजीपति घरानों की।  

अभी तो किसान आंदोलित हैं। उनसे जुड़े कानून बदले गए हैं। इसके अतिरिक्त, श्रम कानूनो में भी बदलाव पूंजीपतियों के इशारे पर होने लगे जो पहली ही नज़र में श्रम विरोधी हैं। महत्वपूर्ण नवरत्न सरकारी कंपनियों को, निजीकरण और विनिवेशीकरण के नाम पर, बेचा जाने लगा है। अपनी लाभ कमाने वाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल कम्पनी एचएएल को दरकिनार कर, पंद्रह दिन पहले बनाई गयी एक नयी कम्पनी को इस सरकार के कार्यकाल का सबसे बड़ा रक्षा सौदों थमा दिया गया। केवल इस लिये कि वह पूंजीपति सरकार या प्रधानमंत्री के बेहद करीब है, यह अलग बात है कि वह पूंजीपति खुद को दिवालिया घोषित कर चुका है। 

वैसे तो देश की हर सरकार, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की तरफ झुकाव वाली रही है, लेकिन साल 2014 के बाद की यह सरकार, पूंजीपतियों के ही लिए काम करने के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है। साल, 2014 में लाये गए पहले भूमिसुधार कार्यक्रम, जो भूमि अधिग्रहण बिल था, से लेकर 20 सितंबर 2020 को पारित नए कृषि कानून तक, सरकार द्वारा लिये गये, हर महत्वपूर्ण आर्थिक  सुधार कानूनो के केंद्र में, आम जनता कहीं है ही नही। यह तीनों कानून जिन्हें कृषि सुधार के नाम पर लाया गया है, वे मूलतः कृषि व्यापार से जुड़े कानून हैं जो किसानों को नही बल्कि, कृषि उपज का व्यापार करने वाले लोगों और कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाने के लिये लाये गए है। इनसे किसानों का, खेती से जुड़े, खेतिहर मजदूर वर्ग का क्या लाभ होगा, यह आज तक दर्जन भर की सरकार - किसान वार्ता के बाद भी सरकार, जनता को समझा नहीं पायी है। 

साल 2014 में जब सरकार बन गयी तो, सरकार सनर्थक लोग और भाजपा ने यूपीए 2 से जुड़े भ्रष्टाचार, बदइंतजामी, महंगाई आदि आर्थिक मुद्दों से किनारा कर लिया और वे अपने उसी चिरपरिचित हिन्दू मुस्लिम के विभाजनकारी एजेंडे पर आ गए जिनसे जनता धर्म के नाम पर आपस मे बंटने लगती है। हर प्रकार के जन असंतोष को विभाजनकारी चश्मे से देखने की आदत संघ और भाजपा की आदत गयी भी नहीं थी, और हर असंतोष का निदान केवल धार्मिक संकीर्णतावाद में ढूंढा जाने लगा। यही रणनीति किसान आंदोलन 2020 के साथ भी अपनाई गयी, जो आंदोलन की व्यापकता को देखते हुए लगभग बैक फायर हो गयी है। 

इस आंदोलन की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुयी जब कुछ प्रसिद्ध सेलेब्रिटीज़ ने किसान आंदोलन के दौरान, नागरिक अधिकारों के हनन को मुद्दा बना कर ट्वीट किया। आज के प्रचार युग मे, सेलेब्रिटीज़ हम सबके मन मस्तिष्क पर, इस प्रकार से आच्छादित हो जाते हैं कि हम उनकी प्रतिक्रियाओं के न केवल मोहताज हो जाते हैं बल्कि उनकी प्रतिक्रियाओं की ही दिशा में सोचने भी लगते हैं। रियाना जो एक बड़ी पॉप स्टार हैं, 8 ग्रेमी अवार्ड्स जीत चुकी हैं ने, जब सीएनएन की एक खबर जो किसान आंदोलन से सम्बंधित थी, के लिंक को साझा करते हुए जब यह ट्वीट किया कि, इस पर कोई बात क्यों नहीं करता है, तब लगा दुनिया मे भूचाल आ गया है। इस हड़बड़ी में हमारे विदेश मंत्रालय ने तुरंत प्रतिक्रिया भी देनी शुरू थी, जो लगभग गैर जरूरी भी कुछ विदेशनीति के जानकारों द्वारा कही गयी। रियाना भारत को कितना जानती हैं और वे कितना इस आंदोलन और इस आंदोलन के मूल कारण कृषि कानूनो के बारे में जानकारी रखती हैं, यह मुझे नहीं मालूम, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोगों का दो महीनों से सड़क पर बैठना, इंटरनेट बंद कर देना, और सड़कों पर गाजा पट्टी स्टाइल मे कील कांटे बिछा देना, जैसी मानवाधिकार हनन जैसी पुलिस कार्यवाही ने, उन्हें अचरज से भर दिया होगा और उन्होंने अपनी बात कह दी। 10 करोड़ फॉलोवर्स वाले ट्विटर हैंडल से सरकार भी चौंकी औऱ सरकार के सनार्थक तथा  ज़विरोधी दोनो भी। सरकार ने कहा कि उन्हें पूरी बात जानने समझने के बाद ही कहना चाहिए था। फिर तो, रियाना, तथा अन्य के ट्वीट के जवाब में, आईटी सेल सक्रिय हुआ, और हमारे सेलेब्रिटीज़ भी सक्रिय हो गए। रिहाना के बाद फिर नोबेल पुरस्कार से सम्मानित ग्रेटा और पॉर्न स्टार मिआ खलीफा ने भी किसान आंदोलन के बारे मे ट्वीट किये। फिर तो ट्वीटर पर सेलेब्रिटीज़ के बीच सरकार के समर्थन और निंदा की प्रतियोगिता ही छिड़ गयी। 

यह संभवतः पहला अवसर है, जब लोकतांत्रिक रूप से चुनी गयी एक सरकार के मुखिया, प्रधानमंत्री ने, लोकतंत्र के सर्वोच्च सभागार में, जिसे हमने, एक लंबे जनआंदोलन के बाद हासिल किया है, आन्दोलन के जनअधिकार को, निंदात्मक रूप में चित्रित किया है। वे यह कहते समय शायद भूल गए कि, आन्दोलनजीविता, चैत्यन्तता का प्रमाण है। जनता की समस्याओं के समाधान के लिये खड़े हो जाना, और उनके असंतोष को स्वर देना, या जहां भी,  जो भी है, जिस प्रकार से भी सक्षम है, जन सरोकारों से जोड़ कर उनके साथ उसका खड़े हो जाना, यह न केवल एक सामाजिक दाय है, बल्कि एक मानवीय गुण भी हैं। प्रधानमंत्री, किसान आंदोलन के कारण, अच्छे खासे दबाव में हैं। वे चाहते हैं कि यह आंदोलन समाप्त हो जाय। सरकार के प्रमुख के रूप में उनकी यह इच्छा अनुचित भी नहीं है। पर जनता या किसान, जो इन तीन कृषि कानूनों को अपनी कृषि संस्कृति के लिये खतरा मान रहे हैं, को वे समझा नहीं पा रहे हैं कि कैसे यह कानून उनके हित मे है। आन्दोलनजीविता शब्द के प्रयोग का एक कारण, कानून को समझा न पाने की उनकी कुंठा भी है। 

आन्दोलनजीविता ज़िंदा रहने की पहली पहचान है। मुर्दे कभी आंदोलित हो ही नहीं सकते हैं। यह जीवंतता ही है जो हर समय  अपने अधिकारों, समाज से जुड़े सवालों, और भविष्य के प्रति सजग और सचेत रखती है। यही चैत्यन्तता है जो चेतना से जुड़ी है और जड़ता के निरन्तर विरोध में खड़ी रहती है। भारत के हज़ारो साल के बौद्धिक इतिहास में यही आन्दोलनजीविता सम्मान पाती रही है। पर यह चैत्यन्तता और आन्दोलनजीविता, सत्ता को अक्सर असहज भी करती रही है, और वह सत्ता चाहे, धार्मिक सत्ता हो, या राजनीतिक सत्ता या सामाजिक एकाधिकारवाद की सत्ता। सत्ता को अक्सर खामोश, सवालों से परहेज करने वाले, पूंछ हिलाते हुए, दुम दबाकर आज्ञापालक समुदाय रास आते हैं। उन्हें श्रोता पसंद आते हैं, पर तार्किक और सवाल पूछने वाले नहीं। जब सवाल पूछा जाने लगता है तो, वे झुंझलाते हुए कहने लगते हैं, मैं तुम्हे यम को दूंगा। पर सवाल पूछने वाला यम से भी जब अवसर मिलता है तो, बिना सवाल पूछे नहीं रह पाता है। जी यह कहानी नचिकेता की है। यह उस समय की कहानी है जब चेतना शिखर पर थी, मस्तिष्क दोलायमान रहा करता था और उस दोलन भरी आन्दोलनजीविता को समाज तथा बौद्धिक विमर्श में एक ऊंचा स्थान प्राप्त था। 

आन्दोलनजीविता, भारतीय परंपरा, साहित्य, धर्म और समाज का अविभाज्य अंग रही है। आज तमाम आघात प्रतिघातों के बावजूद, यदि भारतीय दर्शन, सोच, विचार और तार्किकता जीवित है तो उसका श्रेय इसी आन्दोलनजीविता को ही दिया जाना चाहिए। ऋग्वेद के समय, जैनियों के प्रथम तीर्थंकर अयोध्या के राजा ऋषभदेव हों या चौबीसवें तीर्थंकर महावीर, बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन हो, या बौद्धों की चारो महासंगीतियाँ, या आदि शंकराचार्य का, अद्वैत दर्शन पर आधारित, एक नए युग का सूत्रपात हो, या मध्यकाल का भक्ति आन्दोलन, या ब्रिटिश हुक़ूमत के समय बंगाल और महाराष्ट्र के पुनर्जागरण जिसे इंडियन रेनेसॉ के रूप में हम पढ़ते हैं, और जिसकी शुरुआत राजा राममोहन राय से मानी जाती है या समाज सुधार से जुड़े अनेक स्थानीय आंदोलन, यह सब आन्दोलनजीविता के ही परिणाम रहे है। 

राजनीतिक क्षेत्र में भी चाहे, झारखंड और वन्य क्षेत्रो में हुए आदिवासियों के अनाम और इतिहास में जो दर्ज नहीं है, ऐसे आन्दोलन, 1857 का स्वतंत्रचेता विप्लव, अनेक छोटे मोटे हिंसक और अहिंसक आंदोलनों के बाद गांधी का एक सुव्यवस्थित असहयोग आंदोलन यह सब आन्दोलनजीविता ही तो है। यह सब रातोरात या किसी रिफ्लैक्स एक्शन का परिणाम नहीं था। यह उस आग की तरह थी, जो अरणिमंथन की प्रतीक्षा में सदैव सुषुप्त रह्ती है। विवेकानंद, दयानंद, अरविंदो, से लेकर रजनीश ओशो तक हम जो कुछ भी पढ़ते हैं वह सब इसी चेतना का ही परिणाम है जो देश के लम्बे इतिहास में समय समय पर विभिन्न आंदोलनों के रूप में उभरते रहते हैं। दुनियाभर के इतिहास में, आन्दोलनजीविता की इस चेतना ने सदैव सत्ता को चुनौती दी है। ऐसा भी नहीं है कि यह चेतना सिर्फ हमारे यहां ही प्रज्वलित होती रही हो। ईसा और मुहम्मद का धर्म उनके समय मे उनके समाज की धार्मिक और राजनीतिक सत्ता को एक चुनौती ही थी। इस्लाम का सूफी आंदोलन, मंसूर का अनल हक़, कबीर का धर्म के पाखंड के खिलाफ खड़े हो जाना, नानक का समानता और बंधुत्व पर आधारित सिख पंथ, गोरखनाथ, कीनाराम का अघोरपंथ, यह सब भी ऐसे ही आंदोलनों का परिणाम रहा है। यह भी एक विडंबना है कि जब यही सारे आंदोलन सफल होकर सत्ता में आ गए तो वे जड़ बन गए । अधिकार सुख मादक होता ही है। लेकिन सत्ता तो जड़ बनी रही, पर जनता के मन मे प्रज्वलित चेतना ने फिर सत्ता की जड़ता को ही चुनौती देनी शुरू कर दी। यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। यही चरैवेति है, और चरैवेति ही आन्दोलनजीविता है। ज़िंदा समाज की यही पहचान है और यही जिजीविषा है।

क्या यह अमानवीय और शर्मनाक नहीं है कि, सरकार, किसानों की मौत पर अफसोस करने के बजाय जिओ के टावर टूटने का शोक मना रहे हैं। जबकि हर टावर इन्श्योर्ड होता है। उसका एक एक पैसा उन कंपनियों को मिल जाएगा, जिनके टावर टूटे थे। पर किसान, उनका बीमा है भी या नहीं क्या पता। और अगर बीमा हो भी तो क्या कोई मरना चाहेगा ? 11 फरवरी को जब विपक्ष, 200 दिवंगत किसानों की मृत्यु पर शोक प्रदर्शित करते हुए 2 मिनट का मौन रख रहा था तो, सत्ता पक्ष का एक भी सांसद जो सदन में उपस्थित था, अपने स्थान पर खड़ा नहीं हुआ। यह काम अध्यक्ष को करना चाहिए था और दो मिनट के मौन का प्रस्ताव सरकार की तरफ से आना चाहिए था। पर यह प्रस्ताव भी विपक्ष की तरफ से आया और दो मिनट का मौन भी उन्होंने ही रखा। 

देश मे लगभग अस्सी दिन से किसानों का एक व्यापक आंदोलन चल रहा है और न केवल वह शांतिपूर्ण है, बल्कि दिनोंदिन और व्यापक होता भी जा रहा है। किसानों के इस आंदोलन के साथ, कामगारों, उन सरकारी उपक्रमो के कर्मचारियों, जिनकी सरकार बोली लगाने वाली है, निजी क्षेत्रो को बेचे जाने वाले सरकारी बैंको के अधिकारियों कर्मचारियों, और बेरोजगार युवाओं को जुड़ना चाहिए और इसी तरह का शांतिपूर्ण आंदोलन जगह जगह आयोजित करना चाहिए। 

यह जो एक नए किस्म के वर्ल्ड ऑर्डर लाने की बात कोरोना आपदा के बाद से बार बार कही जा रही है, उसमे शिक्षा, स्वास्थ्य, सहित सभी लोककल्याणकारी योजनाएं, निजी क्षेत्रों को धीरे धीरे सौंप दी जाएगी। स्कूल कॉलेज रहेंगे, पर वे आम जनता की पहुंच के बाहर रहेंगे। या तो महंगे लोन लेकर बच्चे पढ़ेंगे या धनाभाव से पढ़ नहीं पाएंगे। अस्पताल रहेंगे, पर वे आम जनता की पहुंच से दूर होते जाएंगे, और जनता का स्वास्थ्य ठीक रहेगा या नही रहेगा, मेडिक्लेम करने वाली बीमा कंपनियों का स्वास्थ्य ज़रूर ठीक हो जाएगा। नौकरियां रहेंगी, पर अधिकतर नौकरियां, संविदा पर रहेंगी, और जब चाहेगी कंपनियां, उन्हें निकाल देंगी। इसे ही कॉरपोरेट में हायर एंड फायर कहते हैं। अब तब देश का स्टील फ्रेम कही जाने वाली नौकरियां, जो एक खुली प्रतियोगिता से मिलती हैं, वे जब संविदा पर मिलने जाने लगीं तो, देश की अन्य नौकरियों के बारे में क्या कहा जाय। 

यह नया वर्ल्ड ऑर्डर, संविधान के नीति निर्देशक तत्वो को तो अप्रासंगिक कर ही रहा है, मौलिक अधिकारों को भी बस एक अकादमिक बहस के रूप में रख छोड़ेगा। इस मदहोशी की मोहनिद्रा से बाहर आइये और अपने अधिकारों के लिये सजग और सचेत बने रहिये। इतिहास में ऐसे मौके कम ही आते हैं, जब सबको एकजुट होकर अस्तित्व की रक्षा के लिये खड़ा होना पड़ता है। यह साम्रज्यवाद और उपनिवेशवाद के एक नए खतरे का आगाज़ है, जिसका सामना हथियारों से नहीं, वैचारिक स्पष्टता से ही सम्भव है। 

( विजय शंकर सिंह )

Friday, 5 February 2021

वैयक्तिक आलोचनाये, जनांदोलनों के साथ एकजुटता का प्रदर्शन हैं / विजय शंकर सिंह

यदि आज विश्व भर में इतनी कम उम्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बन चुकी स्वीडन की चर्चित पर्यावरण एक्टिविस्ट, ग्रेटा टूनबर्ग के ट्वीट के ख़िलाफ़ राजधानी दिल्ली की पुलिस, टूलकिट के संदर्भ में मुकदमा कायम कर रही है तो, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में गर्व करने वाले भारत को अपनी विरासत, परंपराओं औऱ लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक बार पुनः गम्भीरता से अन्तरावलोकन करना होगा। शुरू में खबर आयी कि ग्रेटा टूनबर्ग पर मुकदमा दर्ज हुआ है, और जब इस पर लगातार प्रतिकूल प्रतिक्रियाये आने लगीं तो, दिल्ली पुलिस ने यह स्पष्ट किया है कि, मुक़दमा ग्रेटा पर नहीं, बल्कि उनके टूलकिट पर जिसके बारे में सन्देह है कि वह, भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़ा है, कायम किया गया है। हालांकि ग्रेटा ने अपना वह ट्वीट डिलीट कर के पुनः किसान आंदोलन को अपना समर्थन दिया है। 

सरकार के विरोधियों, विपक्ष के लोगों और अन्य आलोचकों की ओर से उठते अनेक सवालों और आशंकाओं को दरकिनार भी कर दें तो, डेमोक्रेसी इंडेक्स के ताजे आंकड़ों में हमारी स्थिति नीचे ही गिरी है। दुनिया भर के देशों में लोकतंत्र के स्तर की पड़ताल कर उसकी स्थिति का आकलन करने वाला सांख्यिकीय आंकड़ा,  ‘डेमोक्रेसी इंडेक्स’ की ताज़ा रिपोर्ट में भारत पिछले साल के मुक़ाबले दो अंक और नीचे लुढ़क गया है । साल 2014 की तुलना में आज हम लगभग आधे स्थान तक गिर गए हैं । मीडिया के अनुसार, इस इंडेक्स में 2014 में भारत की रैंकिंग 27 वीं थी, जो 2020 में घटकर 53 वें अंक पर आ गयी है। नार्वे का नाम, दुनिया मे पहले नंबर पर और अंतिम पायदान पर उत्तर कोरिया का नाम है।    

किसान आंदोलन के समर्थन में या, यूं कहें किसानों की समस्या, उनके सत्तर दिन से धरने पर बैठे रहने, सरकार द्वारा किसानों से दर्जन भर बातचीत करने के बाद भी इस समस्या का हल न ढूंढ पाने, दिल्ली को गाजा पट्टी बना कर कंक्रीट की बैरिकेडिंग, सड़को पर कील और कंटीले तारो की बाड़ लगा देने और इंटरनेट बंद कर देने के कारण दुनियाभर के कुछ सेलेब्रिटीज़ के ट्वीट क्या आने लगे, सरकार ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला औऱ अपने आंतरिक मामलों में दखल देना बता दिया। 

पर, 20 सैनिकों की शहादत के बाद भी प्रधानमंत्री का यह मासूम बयान कि, न तो कोई घुसा था और न कोई घुसा है, क्या यह चीनी घुसपैठ को नजरअंदाज करना नही था ? 
सरकार के समर्थक इस बयान में लाख कूटनीतिक तत्व ढूंढ निकालें, पर यह बयान एक स्वाभिमानी और मज़बूत राष्ट्रप्रमुख का नहीं कहा जा सकता है। 

आज देश की अर्थव्यवस्था अमेरिकन आर्थिक मॉडल पर आधारित है और नीति आयोग, अमेरिकी थिंकटैंक के ही दिशा निर्देशों पर काम कर रहा है। यह जो सुधार के कार्यक्रम दिख रहे हैं वे निश्चित रूप से सुधार के लिये लाये जा रहे हैं, पर वे सुधार, पूंजीपतियों की लॉबी का ही करेंगे न कि देश की जनता की बहुसंख्यक आबादी का। जब यह सवाल उठेगा कि, क्या अमेरिका निर्देशित थिंकटैंक के आधार पर अपने कानून बनाना क्या सम्प्रभुता के प्रति  चुनौती नही है ? तब यह कहा जा सकता है कि, यह तो ग्लोबलाइजेशन का दौर है और यह तर्क सही भी मान लिया जाएगा। दुनिया एक गांव बन चुकी है और हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं । आज समाज मे आत्मनिर्भरता का अर्थ समाज से कट कर जीना नहीं होता है। 

देश, देश होता है, कारागार नहीं। आज जब दुनिया एक वैश्विक गांव में तब्दील हो गयी है, दुनियाभर में घटने वाली हर घटना का असर, दुनियाभर में पड़ रहा है तो यह एक मूर्खतापूर्ण सोच है कि, लोग हमारे देश मे घट रही किसी घटना के बारे मे टीका टिप्पणी न करे, और ऐसी टिप्पणियों से हम असहज होने लगें। आलोचना पचाने की भी एक कला होती है और यदि ऐसी कला किसी मे विकसित हो जाय तो, वह अक्सर कई तरह के तनाव और असहजता से मुक्त भी रखने लगती है। सरकार  द्वारा, विदेशी सेलेब्रिटीज़ के किसान समर्थक वैयक्तिक ट्वीट के विरोध में हमारा राजनयिक स्टैंड लेना, यह बताता है कि हम कितने अस्थिर दिमाग से केभी कभी चीजों को लेने लगते हैं और इस मामले में हमारी प्रतिक्रिया का स्तर भाजपा आईटी सेल के लोगों के ही स्तर पर आ कर स्थिर हो जाता है। 

किसान आंदोलन का समर्थन करते समय, किसी भी सेलेब्रिटी ने देश की सम्प्रभुता, संसद, संसद द्वारा कानून बनाने की शक्ति, सरकार, और देश के कानून को चुनौती नही दी है। इन ट्वीट्स में जन आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन देने की बात कही गयी है या फिर इंटरनेट बंद करने की आलोचना की गयी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के युग मे ऐसी प्रतिक्रियाओं को सामान्य उद्गार के रूप में लिया जाना चाहिए। यह सब वैयक्तिक प्रतिक्रियाये है न कि, किसी सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।सरकार की प्रतिक्रिया के उत्तर में, उसका राजनयिक उत्तर दिया जाना चाहिए । याद कीजिए, जब कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रुडो ने इस आंदोलन के बारे में कुछ कहा था तो हमारी सरकार ने उनके हाई कमिश्नर को बुला कर अपना विरोध जता भी दिया था। यह कूटनीतिक औपचारिकताये होती हैं और  इनका निर्वाह किया जाता है। हालांकि कनाडा के प्रधानमंत्री ने अपने कहे का औचित्य यह कह कर के सिद्ध करने की कोशिश की कि, कनाडा दुनियाभर में मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के प्रति सजग और सचेत रहता है। भारत ने भी अक्सर दुनियाभर में होने वाली मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के हनन पर अपनी आवाज़ उठायी है। 

अक्सर वैयक्तिक टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं , जनता या किसी खास जनांदोलन के साथ एकजुटता दिखाने के लिये की जाती है। एकजुटता प्रदर्शन की यह मानवीय और सामाजिक परंपरा, आज से नहीं है बल्कि यह समाज के इतिहास के प्रारंभ से ही है। संप्रभुता का यह अर्थ, कदापि नहीं है कि, हम दुनियाभर से आने वाली हर प्रतिक्रिया से इम्यून हो जाने की बात सोचने लगें। संप्रभुता का अर्थ है कि हम अपने राजकाज, संविधान, कानून, सीमा आदि के बारे में खुद ही मालिक हैं और दुनिया के किसी देश के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। 

रहा सवाल दुनियाभर में घटने वाली घटनाओं के बारे मे वैयक्तिक प्रतिक्रिया का तो, उसे न तो रोका गया है और न ही रोका जा सकता है। हाल ही में नए नागरिकता कानून का सन्दर्भ लें। उस कानून में हमने पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले वहां के अल्पसंख्यक समुदाय को नागरिकता देने की बात कही है। यह बात सच है कि इन देशों मे वहां के अल्पसंख्यक समुदाय, हिन्दू सिख और ईसाई आदि पर अक्सर उत्पीड़न होता रहता है। वहां के उत्पीड़न पर हम अक्सर आवाज़ उठाते रहते है। हमारी सरकार ने यूएनओ में भी ऐसे उत्पीड़न पर आवाज़ उठायी है। तो क्या इसे भी वहां के आंतरिक मामलों में दखल मान लिया जाय ? हालांकि पाकिस्तान यही तर्क देता भी है। पर पाकिस्तान का यह तर्क गलत है। एक राज्य के रूप में पाकिस्तान भले ही, ऐसे उत्पीड़न में शामिल न हों, पर उत्पीड़न करने वाले अधिकारियों, व्यक्तियों, समूहों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की जिम्मेदारी से वहां की सरकार, यह तर्क देकर नहीं बच सकती है। 

जैसे आप अपने घर मे अपनी पत्नी, बच्चों, बूढ़े मातापिता को प्रताड़ित करके यह आड़ नही ले सकते कि यह आंतरिक मामला है, उसी प्रकार कोई भी देश यह कह कर बच नही सकता है कि वह अपने नागरिकों पर जो भी कर रहा है वह उसका आंतरिक मामला है। नागरिकों के मूल अधिकार और नागरिक अधिकार हमारे यहां किसी भी देश की तुलना मे अधिक उदात्त हैं। अगर उत्पीड़न की बात की जाय तो, दुनियाभर की तुलना में हमारे यहां उत्पीड़न भी कम ही है। लोकतांत्रिक इंडेक्स में गिरावट के बावजूद हम कई देशों से मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में बेहतर हैं। 

दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद, कू क्लक्स क्लान की व्हाइट सुपरमैसी या गोरा श्रेष्टतावाद, आईएसआईएस, तालिबान, आदि कट्टर इस्लामी संगठनों, चीन द्वारा उइगूर मुसलमानों पर किये गए अत्याचारों आदि  पर दुनियाभर में आवाज़ें पहले भी उठती रही है और इन सब जुल्मों पर दुनियाभर की सरकारें समय समय पर आलोचना और कार्यवाहियां करती रही है। जनता के लोगों या सेलेब्रिटीज़ ने भी इन पर अपनी बात कही है और आलोचना की है। वैयक्तिक आलोचनाये, टीका टिप्पणी, सेमिनार, आलोचना के केंद्र में आये देशों के  दूतावास के सामने जनता के धरने प्रदर्शन होते ही रहते हैं। पर इसे, किसी देश की सम्प्रभुता पर हमला नही माना जाता है, भले ही सरकारें सम्प्रभुता की आड़ में ऐसी आलोचनाओं को नजरअंदाज करने की कोशिश करें।

अब दुनियाभर में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भारत के बारे में करते हुए ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ (ईआईयू)  ने डेमोक्रेसी इंडेक्स जारी करते हुए कहा है कि 
" भारत के सत्ताधारियों के ‘लोकतांत्रिक मूल्यों से पीछे हटने’ और नागरिकों की स्वतंत्रता पर ‘कार्रवाई’ के कारण देश 2019 की तुलना में 2020 में दो स्थान  और फिसल गया है। भारत  6.9 अंकों के साथ 2019 के लोकतंत्र सूचकांक में 51वें स्थान पर था और  जो 2020 में घटकर 6.61  रह गये और वह 53 वें पायदान पर लुढ़क गया। 2014 में भारत की रैंकिंग 27वीं थी। भारत को 2014 में 7.29 अंक मिले थे जो अब तक का सर्वोच्च प्रदर्शन है। 

‘डेमोक्रेसी इन सिकनेस एंड इन हेल्थ’ शीर्षक से जारी ईआईयू के ताज़ा‘डेमोक्रेसी इंडेक्स’ में नॉर्वे को शीर्ष स्थान मिला है। इस सूची में आइसलैंड, स्वीडन, न्यूजीलैंड और कनाडा शीर्ष पांच देशों में शामिल हैं।"
डेमोक्रेसी इंडेक्स में 167 देशों में से 23 देशों को पूर्ण लोकतंत्र, 52 देशों को त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र, 35 देशों को मिश्रित शासन और 57 देशों को सत्तावादी शासन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भारत को अमेरिका, फ्रांस, बेल्जियम और ब्राजील के साथ ‘त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र’ के तौर पर वर्गीकृत किया गया है।

ईआईयू की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने,
‘‘भारतीय नागरिकता की अवधारणा में धार्मिक तत्व को शामिल किया है और कई आलोचक  इसे भारत के धर्मनिरपेक्ष आधार को कमजोर करने वाले कदम के तौर पर देखते हैं।’’ 
रिपोर्ट में कहा गया, 
‘‘कोरोना वायरस वैश्विक महामारी से निपटने के तरीके के कारण 2020 में नागरिक अधिकारों का और दमन हुआ।’’
भारत के पड़ोसियों में से श्रीलंका 68 वें, बांग्लादेश 76 वें, भूटान 84 वें और पाकिस्तान 105 वें स्थान पर रहा। श्रीलंका को भी त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी में रखा गया है, जबकि बांग्लादेश, भूटान और पाकिस्तान ‘मिश्रित शासन’ के वर्ग में है। अफगानिस्तान 139 वें स्थान पर है और उसे ‘सत्तावादी शासन’ के तौर पर वर्गीकृत किया गया है।

ईआईयू  की रिपोर्ट में एशिया और ऑस्ट्रेलिया क्षेत्र के देश न्यूजीलैंड का चौथा स्थान बरकरार है, लेकिन इस क्षेत्र का देश उत्तर कोरिया अंतिम 167 वें स्थान पर है। जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान 2019 की तुलना में इस सूची में ऊपर आ गये हैं। आस्ट्रेलिया का भी ‘पूर्ण लोकतंत्र’ का दर्जा बरकरार है। ऑस्ट्रेलिया इस इंडेक्स में नौवें स्थान पर है।

डेमोक्रेसी इंडेक्स में  नॉर्वे  9.8 अंकों के साथ पहले नंबर पर है। दूसरे नंबर पर आइसलैंड है जिसे  9.37 अंक मिले हैं। स्वीडन  9.26 अंकों के साथ तीसरे, न्यूज़ीलैंड 9.25 अंक के साथ चौथे और कनाडा  9.24 अंक के साथ पाँचवे नंबर पर है। नीचे से पाँचवे यानी 163वें स्थान पर चाड है जिसे 1.55 अंक मिले हैं। 164 स्थान पर सीरिया को 1.43 अंक मिले हैं। 165वें स्थान पर केंद्रीय अफ्रीकन गणराज्य है जिसे 1.32 अंक मिले हैं। 166 वांँ स्थान कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य का है जिसे 1.13 अंक मिले हैं और सबसे आख़िरी यानी 167 वें स्थान पर उत्तर कोरिया  है जिसे महज़ 1.08 अंक मिले हैं।

किसान आंदोलन 2020 की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने धर्म केंद्रित राजनीति जो 2014 के बाद जानबूझकर जनता से जुड़े मुद्दों से भटका कर सत्तारूढ़ दल और उसके थिंक टैंक द्वारा की जा रही थी को लगभग अप्रासंगिक कर दिया है। साल, 2014 में ही गिरोहबंद पूंजीपतियों के धन के बल पर, जनता के वोट, और संकल्पपत्र के लोकलुभावन वादों के सहारे आयी यह सरकार, न तो अपने पोशीदा एजेंडे के प्रति न तब भ्रम में थी, न अब है। धीरे धीरे, योजना आयोग के खात्मे और पहला भूमि अधिग्रहण बिल से सरकार ने कॉरपोरेट तुष्टिकरण के अपने पोशीदा एजेंडे पर काम करना शुरू किया। सरकार का लक्ष्य देश का आर्थिक विकास न तो वर्ष, 2014 में था, न ही 2019 में । सरकार का एक मात्र लक्ष्य था और है कि वह अपने चहेते कॉरपोरेट साथियों को लाभ पहुंचाए और देश मे ऐसी अर्थ संस्कृति का विकास हो जो क्रोनी कैपिटलिस्ट ओरिएंटेड हो। सरकार द्वारा उठाया गया हर कदम, पूंजी के एकत्रीकरण, लोककल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा के विरुद्ध रहा है। 

( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 3 February 2021

रामकथा या समाज के उत्थान और विकास की कथा - 2 - पारिभाषिक शब्द

4. राक्षस और असुर में तात्विक भेद नहीं है। पहले में उत्पादन के निषेध का भाव है और दूसरे में पर्यावरण की रक्षा का। 

5. यातुधान में आए यातु के लिए हम जादू का प्रयोग करते है और यह आदिम समाज के ओझा और सोखा थे। ये अलौकिक सिद्धि का दावा करते हुए सब कुछ जानने, इच्छित परिणाम अपनी सिद्धि के बल पर प्राप्त करने का दावा करते थे। योग, तंत्र, टोना ही नहीं, पुरोहिती यज्ञ, शैव, शाक्त, जैन तथा बौध मत के विकास में भी इनकी सीधी या तिर्यक भूमिका है, ऐसा हमारा विचार है। अपने प्राकृतिक स्रोत से वंचित किए जाने के बाद खेतिहर समाज में इस दावे के साथ  उनके प्रवेश के बाद कि वे हारी-बीमारी, सूखे से अपने मंत्र के बल पर मुक्ति दिला सकते हैं, यज्ञ का नया रूप आया जिसमें खेती की नहीं जाती, उसका अभिनय करके उपज बढ़ाई जा सकती है और वृष्टि कराई जा सकती है, प्रजावृद्धि कराई (पुत्रेष्टि), शत्रु का नाश किया और राज्य/क्षेत्र-विस्तार किया और अपनी सुरक्षा खी जा सकती है।

6. दिति, अदिति और आदित्य -  
दिति- उदार दानशीला प्रकृति, जो अपना सब कुछ देती है। अदिति - खेती के लिए साफ की गई धरती जो स्वतः कुछ नहीं देती, उल्टे जोताई , बीज,पानी, खाद की माँग करती है।  उससे जो कुछ पाना है, अपने प्रयत्न से उत्पादित करना होता है। यह देवमाता है। आदित्य - खेती में बोआई के सही ऋतुकाल का ज्ञान होना जरूरी था। इसमें चूक होने पर कुछ नहीं मिलता था इसलिए कई बार खेती अपना चुके कुछ लोगों को निराशा में पिछली अवस्था में लौटना पड़ा। इन असफलताओं से चांद्र मास से अलग सौर वर्ष और मास का निर्धारण और ज्योतिर्विज्ञान का आरंभ हुआ इसे ही अदिति के द्वादश पुत्रों या सौर मासों की उत्पत्ति हुई। इसे ही कथा की भाषा में अदिति पुत्रों आदित्यों के रूप में रखा गया।

7. दानव, दैत्य, दनुज– 
यदि आप दिति की दानशीलता वाले भाव को दानवी और उसके पुत्रों को दानशील अर्थात् दानव, दैत्य, दनुज कहें तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। असुर, राक्षस, दानव कृषिकर्मियों को डरावने लगते  थे न कि इन शब्दों में ऐसा कोई भाव था।  यह प्रचारके साधनों का कमाल है कि प्रकृति के साथ किसी तरह का हस्तक्षेप सहन न करने वालों को और इसके लिए किसी सीमा तक जाने वालों को,  जो सच कहें तो आज के पर्यावरणवादियों के पूर्वज थे,  इतने अमानुषिक रूप में चित्रित किया गया जितना सभ्यताद्रोही आतंकवादियों को भी नहीं किया जाता और आज के पर्यावरणवादियों को अनेक बार इसी  रूप में चित्रित किया जाता है।  दानव, दैत्य  प्रशासन के लिए समस्या पैदा करने वाले आज के आंदोलनों, संगठनों और विचारधाराओं को जिनके मानवीय सरोकार से इन्कार नहीं किया जा सकता,  सत्ता ओर उसके पीछे काम करने वाली शक्तियों के प्रचार के माध्यम से देखना और समझना चाहें तो वे राक्षसों जैसे लगेंगे भी और राक्षस (परिरक्षणवादी) हैं भी।  

उनका दोष यह हे कि  वे पर्यावरणवादी, समतावादी तो हैं पर इसके साथ ही, यथास्थितिवादी भी हैं। उनकी चलती तो मनुष्य पशुऔ के बीच एक पशु प्रजाति बना रह जाता। देव आरंभ से ही स्वार्थी थे यह कहना गलत होगा, परन्तु वे यथास्थितिवाद के विरोधी थे। यह एक मात्र गुण सभ्यता की सबसे संक्षिप्त परिभाषा है, इसे बहुत देर से पहचाना गया और  गलत या तात्कालिक संदर्भ में ही समझा गया। शुंपीटर के सर्जनात्मक विध्वंश के मुहावरे से हम परिचित हैं वह पूँजीवाद के संदर्भ में मार्क्स की टिप्पणी पर आधारित थी,   पर मार्क्स ने भी इसको उस गहराई से न समझा, जिससे भारत की मूल कृतियों से परिचित होने पर अपनी निजी व्याख्या से समझते। तब उन्हें पता चलता कि सर्जनात्मक विध्वंश मानव सभ्यता का अनिवार्य लक्षण है और यह मानवीयता की कसौटी पर भले खरा न उतरे, प्रगति की एकमात्र शर्त है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


रामकथा या समाज के उत्थान और विकास की कथा - 1.

रामकथा केवल अयोध्या के राजा राम की कथा नहीं है, सभ्यता के उत्थान और विकास की कथा है। मनुष्य द्वारा अपने प्रयत्न से अपनी जीविका के साधन जुटाने के प्रयोगों और इसके विरोधी, प्रकृति पर निर्भर जनों के उपद्रव की कथा है। इन उपद्रवकारियों को असुर और राक्षस कहा गया, जब कि कृत्रिम उत्पादन की दिशा में पहल करने वालों को सुर, देव या भाभन । हजारों साल के अंतराल में घटित सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के कारणों पुराने शब्दों के अर्थ बदल गए, यह अचरज की बात नहीं। भाषा में ऐसा होता रहता है। अचरज की बात यह है कि इस परिवर्तन के बाद भी कई हजार साल तक जातीय चेतना में यह एक धुँधली याद बनी रह गई कि इनका रूप पहले कुछ और था। पश्चिमी विद्वान भारतीय अवधारणाओ को अपनी जातीय सीमाओं में रख कर देखने का प्रयत्न करते रहे इसलिए इनकी सही व्याख्या करने में असमर्थ रहे जब कि ज्ञान और शोध की नई दिशाएँ खुलने के बाद इनका वह मर्म आधुनिक विश्लेषण से ही समझा जा सकता था जो हमारी अपनी परंपरा के लिए भी दुर्बोध हो चुका था। इसके विपरीत वे अपनी शक्ति त्रुटियाँ तलाशने और आविष्कार करने में लगाते रहे इसलिए उन तथ्यों पर भी अविश्वास करते और उन्हें अतिरंजित और कल्पनाप्रसूत कह कर उपहास करते रहे जिनको विज्ञान की प्रगति के साथ सचाई के सर्वथा अनुरूप पाया गया। हमारे अपने पंडित भी इनकी गहराई में उतर कर इनकी तार्किक मीमांसा करने में असमर्थ रहे या आधे-अधूरे रूप में करते रहे। उदाहरण के लिए कोसंबी को और इनकी ही तर्ज पर देबीप्रसाज चट्टोपाध्याय को वैदिक समाज में गणप्रतीकात्मक नाम तो दिखाई देते हैं  परंतु गीध, बानर, रिक्ष/भल्ल, मतंग, मीन, आदि नहीं अन्यथा उनका खेल ही बिगड़ जाता। अतः अन्य मामलों में अच्छी समझ रखने वाले विद्वान भी उन शब्दों और संकेतों को समझने में असमर्थ रहे हैं जिसके कारण हमारी समझ में कुछ झोल रह जाते हैं।  इसलिए हम आरंभ में ही रामकथा से संबंधित कतिपय शब्दों का अर्थ स्पष्ट करना चाहेंगे:

1. यज्ञ का अर्थ है उत्पादन। इसमें संतानोत्पादन, पशुपालन और पशुप्रजनन, कृषिउत्पादन, जल उत्पादन, धन उत्पादन और धन-उत्पादन से जुड़े विविध उद्यम और उपक्रम जैसे खनन और खनिजों का शोधन, जीवन को सुखद और उन्नत बनाने के सभी आयोजन, कहें, सभ्य जगत के सभी कार्यव्यापार आते हैं, इसलिए इसके अनुष्ठाताओं और संपादकों में सभी पेशों से जुड़े शूद्र से लेकर ब्राह्मण तक सभी लोग आते हैं। इसकी सबसे सटीक व्याख्या ऋग्वेद में मिलती है।  बृहदारण्यक उपनिषद में भी इसकी सविस्तार व्याख्या है  परन्तु उसमें वह व्यापकता नहीं है जो ऋग्वेद की व्याख्या में। यह अर्थ प्राचीन है जिसकी महिमा को पुरोहितों ने अपने कर्मकांडीय नकल में बदल कर सीमित कर दिया, समाज के दूसरे उत्पादकों को इस नकली यज्ञ से वंचित कर दिया। अर्थसंकोच इतना हो गया कि पुराना अर्थ पढ़ने के बाद भी समझ में नहीं आता।  जो काल्पनिक है वह वास्तविक और जो वास्तविक था वह काल्पनिक प्रतीत होता है।  

2. धर्म – भारतीय संदर्भ में धर्म को परिभाषित करना करना बहुत कठिन है. कारण इसका एक अर्थ है यज्ञ अर्थात् मानवता की उन्नति, समृद्धि और कल्याण के लिए जो कुछ जरूरी है उसका निर्वाह, और उन गुणों का विकास जिनके बिना यह संभव नहीं, इसलिए यज्ञ ही सर्वोत्तम कर्म है – यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म और इस समझ के दार्शनिक ऊँचाई लेने के बाद यह समझ कि सृष्टि के सभी पदार्थों की अपनी सत्ता इस बात पर टिकी है कि वे उन गुणों के अनुरूप कार्य करते हैं या नहीं जो उनकी संज्ञा और सत्ता का आधार है।  निर्वाह करने की उनकी क्षमता ही उनका धर्म है और धर्म से च्युत होने पर उनकी सत्ता समाप्त हो जाती है।  पर एक विरोध वहाँ पैदा होता है, जहाँ आदिम अवस्था में जीविका के एक ही साधन - प्रजापति – की दो माताओं की संतानें अस्तित्व में आती हैं या कुछ लोगों द्वारा जीवन यापन के लिए प्रकृति की कृपा पर एकान्त निर्भरता और अभाव के दिनों में भुखमरी की बाध्यता से बचने के लिए कृत्रिम उत्पादन का सहारा लिया जाता है। एक का धर्म हो जाता है प्रकृति और पर्यावरण में किसी तरह के बदलाव का विरोध और इसके लिए प्राण देने और लेने को तत्पर हो जाना,  दूसरे का धर्म यज्ञ को प्राण संकट में डाल कर भी जारी रखना। पहले के धर्म में समता, अपरिग्रह या तात्कालिक आवश्यकता से अधिक न रखना,  मिल बाँट कर खाना, सत्यनिष्ठा आदि के वे गुण आते हैं जिन पर हम गर्व करते हैं और जिनका विल द्यूराँ ने अवर ओरिएंटल हेरिटेज में मुग्ध भाव से उल्लेख किया है। इस धर्म में पशुपालन भी संभव नहीं क्योंकि सभी माताओं का दूध उनकी संतान के लिए है। यज्ञ उन सभी मर्यादाओं के अतिक्रमण के साथ आरंभ होता है, अपने श्रम से उत्पादित पर श्रम करने वाले के अधिकार से संपदा का निजीकरण हो जाता है, सामाजिक संबंधों में निजता आ जाती है, संख्या में कम होने के कारण उत्पादन का विरोध करने वालों से बचने के लिए छल कपट का सहारा लेना पड़ता है।  इसलिए देवों को सभी अवगुणों की खान बताया जाता है। हम आदिम समाज की मूल्यव्यवस्था में आए इस बदलाव और अंतर को समझने में सावधानी नहीं बरतते। बलि अपने वचन के निर्वाह के लिए अपना सर्वस्व खोने को तैयार हो जाते हैं और अपने ही भूभाग से निर्वासित हो जाते है और यज्ञ के मूर्त रूप वामन धूर्तता से उस पर अधिकार कर लेते हैं।      

3. असुर -  अधिकारी विद्वानों ने इसकी व्युत्पत्ति – असु = प्राण , शक्ति, ज्ञान  से जोड़ी है। इसका प्रयोग अग्नि, वरुण, रुद्र आदि के लिए हुआ है। एक तीसरा कारण यह है कि असुरों को बलवान (बलीयांस) कहा गया है और लोकविश्वास में भी उनका यही रूप है। हम इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते, पर इसमें इतना जोड़ सकते हैं कि जिस असुर को देवविरोधी के रूप में चित्रित किया गया है वे यज्ञविरोधी विरोधी हैं, प्रजापति की दूसरी पत्नी की संतान या जीविका के आदिम पद्धति से अविचलित रूप में जुड़े जन हैं।  अतः यह असुर असु धातु से व्युत्पन्न नहीं है अपितु सुर – उत्पादक का निषेधार्थी है और सुर की भाँति इसकी धातु सू – उत्पादन है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

नागरिक अधिकारों के समर्थन को किसी देश का आंतरिक मामला नही माना जाना चाहिए / विजय शंकर सिंह

जन सरोकारों, नागरिक अधिकारों, मौलिक अधिकारों, और सम्मान से जीने के अधिकारों को किसी राज्य या देश की सीमा में बांट कर नहीं रखा जा सकता है। आज किसान आंदोलन भी सम्मान पूर्वक जीने और अपनी कृषि संस्कृति को बचाने का आंदोलन बन गया है। इसके समर्थन में, दुनियाभर के सजग और सचेत नागरिक यदि अपनी बात कह रहे हैं औऱ इस आंदोलन को नैतिक, समर्थन दे रहे हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह समर्थन न तो देश की संप्रभुता को चुनौती है और न ही सरकार के खिलाफ कोई विदेशी हस्तक्षेप। यह सजग और सचेत जनता का परस्पर संकट में साथ साथ खड़े होने का भाव है। धरती के नक्शे में खींची गयी रेखाएं देश, उसकी संप्रभुता, उनके कानून, आदि को भले ही परिभाषित करती हों, पर समस्त मानवीय आवश्यकतायें और उनके मौलिक अधिकार उस सीमाओं में आबद्ध नही है।

दुनियाभर में सभी देशों की जनता, ऐसे नगरिक अधिकारों के उल्लंघन पर एकजुटता दिखाती रहती है। किसान आंदोलन के समर्थन में दुनिया के अन्य देशों के नागरिकों द्वारा किया गया समर्थन न तो अनुचित है और न ही इससे सरकार को आहत होने की ज़रूरत है। अभी हाल ही में हुए अमेरिका के ब्लैक लाइव्स मैटर्स आंदोलन, फ्रांस में इस्लामी उग्रवादी तत्वों द्वारा चार्ली हेब्दो द्वारा बनाये गए कार्टून के बाद भड़काई गयी हिंसा का विरोध सभी लोकतांत्रिक देशों ने किया था और इसे अमेरिका और फ्रांस के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं माना गया था। इसी प्रकार चीन के थ्येन एन मेन स्क्वायर पर हजारों छात्रों को मार देने के विरोध में भी दुनियाभर से आवाज़ें उठी थीं।

साठ और सत्तर के दशक में अमेरिका द्वारा वियतनाम पर किये गए हमले के दौरान भारत मे जगह जगह वियतनाम के पक्ष में आवाज़ें उठी थीं, प्रदर्शन हुए, धन एकत्र किया गया, पर उसे अमेरिका और वियतनाम का निजी मामला किसी ने नहीं कहा। 1970 - 71 में जब पाकिस्तान ने अपने पूर्वी भूभाग पर अत्याचार करना शुरू कर दिया तो भारत ने पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बांग्लादेश है की जनता के अधिकारो और उनके जीवन रक्षा के लिये सभी जरूरी कदम उठाए। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, जब दुनियाभर में, ऐसी आवाज़ें उठती रहती हैं। इस प्रकार के समर्थन में उठने वाली सारी आवाजे, जनता के मूल अधिकार और उसकी अस्मिता से जुड़ी हुयी हैं।

यूएन का मानवाधिकार चार्टर किसी एक देश के लिये नही बनाया गया है, बल्कि, पूरी दुनिया के लिये ड्राफ़्ट किया गया है। पहले और दूसरे विश्व युद्ध मे, भले ही दुनिया के कुछ देशों के गुट ने आपसी स्वार्थों और मुद्दों पर युद्ध किये हों, पर इसका असर, समस्त मानवजाति पर पड़ा। इसीलिए यूएन का मानवाधिकार चार्टर सामने आया। यह बात अलग है कि, सभी देशों में मानवाधिकार के उल्लंघन होते रहते हैं। इस व्याधि से वे बड़े देश भी मुक्त नही हैं जो खुद को मानवाधिकार का ठेकेदार समझते हैं।

आज किसान कानून देश का आंतरिक मामला है। हमारी संसद ने उसे पारित किया है। उसमें कुछ कमियां हैं तो जनता उसके खिलाफ है। सरकार किसान संगठनों से बात कर भी रही है। पर जिस प्रकार से, धरने पर बैठे, आंदोलनकारियों की बिजली पानी काट दी जा रही है, गाजा पट्टी की तरह, उन्हें अलग थलग करने के लिये, कई स्तरों की किलेबंदी की जा रही है, देश के नागरिकों को ही देशद्रोही कहा जा रहा है, और सरकार इन सब पर या तो खामोश है या ऐसा करने की पोशीदा छूट दे रही है, यह सब नागरिकों द्वारा शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और असंवैधानिक भी। हालत यह है कि अब धरने पर बैठे किसान आंदोलनकारियों तक, स्वयंसेवी संस्थाएं, यदि कुछ मदद भी पहुंचानी चाहें तो नही पहुंचा पा रही है। क्या यह देश की जनता को जो अपने हक़ के लिये सत्तर दिनों से शांतिपूर्ण धरने पर बैठी है, के प्रति, सरकार द्वारा शत्रुतापूर्ण व्यवहार करना नहीं है ?

दुनियाभर के सजग नागरिक, यह बिलकुल नही कह सकते हैं कि, यह कानून गलत बना है या सही बना है, इसे वापस लिया जाय या न लिया जाय, पर वे इस बात पर चिंता ज़रूर जता और एकजुटता दिखा सकते है कि शांतिपूर्ण नागरिक प्रदर्शन को न तो उत्पीड़ित किया जाय और न ही, उनकी इतनी किलेबंदी कर दी जाय कि उनकी मौलिक आवश्यकताएं ही बाधित हो जांय। बिजली, पानी, चिकित्सा आदि, किसी भी भीड़, समूह की ऐसी मौलिक आवश्यकताए हैं जिनकी सरकार द्वारा आपूर्ति की जानी चाहिए न कि, उन्हें बाधित कर के दुश्मनी निकालने की बात सोचनी चाहिए।

26 नवम्बर 2020 से अब तक, लगभग 70 दिन हो गए हैं। लाल किले की घटना को छोड़ कर किसानों का यह आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण रहा है। लाल किले पर जो भी हिंसक घटना हुयी वह निश्चित ही निंदनीय है और उस घटना को अंजाम देने वालों और उसके सूत्रधार के खिलाफ सुबूत एकत्र कर, कार्यवाही की जानी चाहिए। उस घटना की जांच हो भी रही है। यदि वर्तमान जांच मे कोई कमी हो तो, सरकार चाहे तो, उस घटना की न्यायिक जांच भी करा सकती है। पर आज पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग, राजस्थान और देश के अन्य भागों में, जो किसान जागरण हो रहा है उसकी गम्भीरता को सरकार द्वारा अनदेखा नही किया जाना चाहिए। देश का स्वाधीनता संग्राम मूल रूप से, किसानों का ही आंदोलन रहा है। किसान और जनता को अलग करके देखने की भूल मूर्खता होगी।

इस आंदोलन को ले कर,  दुनियाभर में हो रही, प्रतिक्रिया, आलोचना और टिप्पणियों को भी सरकार को, ध्यान में रखना चाहिए। सरकार किसानों से बात करने को राजी है, और दर्जन भर बार, बात कर भी चुकी है। कुछ बड़े संशोधनो के लिये भी सरकार कह रही है कि, वह राजी है। पर वे संशोधन क्या होंगे, यह अभी सरकार ने खुलासा नहीं किया है। इन तीनो कृषि कानून को सरकार, होल्ड करने के लिये भी सहमत है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे फिलहाल स्थगित कर भी रखा है। हालांकि, अदालत का यह भी कहना है कि वह अनन्त काल तक इसे स्टे रख भी नही सकती है। एक तरफ से देखिए तो सरकार की यह सारी पेशकश, उसके द्वारा उठाये जाने वाले, सकारात्मक कदमों की तरह दिखेंगे। पर सरकार ने इन पेशकश का कोई औपचारिक प्रस्ताव भी रखा है क्या ? संसद का अधिवेशन चल रहा है। सरकार अपने इन सकारात्मक कदमो के बारे में सदन में अपनी बात कह सकती है। इससे जनता के सामने कम से कम सरकार का स्टैंड तो स्पष्ट होगा।

एक तरफ बातचीत की पेशकश और दूसरी तरफ, सड़को पर कील कांटे, कंक्रीट की दीवारें, कंटीले तार, पानी बिजली की बंदी, देशद्रोह के मुकदमे, इंटरनेट को बाधित करना, यह सब सरकार और जनता के बीच, पहले से ही कम हो चुके परस्पर अविश्वास को और बढ़ायेंगे ही। यह बैरिकेड्स, कीलें, और कंटीले तार, इस बात के भी प्रतीक हैं कि, किसानों और सरकार के बीच गहरा अविश्वास पनप रहा है। ऐसे गहरे अविश्वास के लिये सरकार के ही कुछ मंत्री, मूर्ख समर्थक और भाजपा आईटी सेल के लोग जिम्मेदार हैं। यह अविश्वास जनता के लिये उतना नहीं, बल्कि सरकार के लिये ही आगे चल कर घातक सिद्ध होगा। सरकारें बनती बिगड़ती रहती हैं, न कि जनता। जब सरकार और जनता के बीच परस्पर विश्वास ही नही जम पा रहा है या जो भी आपसी भरोसा है, वह निरन्तर कम होता जा रहा है तो, सरकार और किसानों के बीच, किसी भी बातचीत के तार्किक अंत तक पहुंचने की उम्मीद मुश्किल से ही की जा सकती है।

( विजय शंकर सिंह )