Tuesday, 2 February 2021

शब्दवेध (100) खोटा सिक्का खरे को बाहर कर देता है

हमारी समस्या  भारतीय संदर्भ में  पणियों की सही पहचान करने की नहीं है।  हम इसका निबटारा कर चुके हैं,  फिर भी यदि पणियों की मातृ-देवियों की उपासना के आधार पर कोई कहे कि वे कुल्ली संस्कृति  से संबंधित रहे  हो सकते हैं,  या मोहेंजोदड़ो से  प्राप्त  लिंग के रोम से उसके  प्रतिरूप की प्राप्ति के आधार पर  उनको  मोहेंजोदड़ो की प्रशाखा बताना चाहे तो, यह हम इस पर  बहस नहीं करेंगे। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के पूरे प्रसार में  मान-बाट,  नगर योजना,  नागर व्यवस्था,  सुरुचि, संस्कार, भाषा,  लिपि,  मुद्रांकन  आदि  की  समानताओं के नीचे  आंचलिक   विविधताएं थीं,  (इसे हेंफिल के दल ने नृतात्विक दृष्ट् से मोहेंजोदड़ो और मेह्रगढ़  के संदर्भ में  उठाया भी था, और उपादान संस्कृति में क्षेत्रीय भिन्नताओं की बात कुछ पुरात्तविदों ने भी की है), इसलिए हमारे लिए महत्वपूर्ण  यह नहीं है कि निर्वासित होने वाले पणियों की सटीक पहचान किससे की जाए।  महत्वपूर्ण ये तथ्य हैं कि 
(1) वे  देव सभ्यता   के विरोधी थे; 
(2) संस्कृत भाषा का, कम से कम,  व्यापक संपर्क के लिए  प्रयोग करते थे, 
(3) वे अपनी भाषा का पारिवारिक दायरे में और अपने पारिवारिक संपर्क में आने वालों के साथ करते थे;  
(4) अपने देवी देवताओं की उपासना करते थे;  
(5) उनके समाज में स्त्रियों को अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी; 
(6)  नौवहन,  उद्योग और  शिल्प में  देववादी   समाज  उन पर ही निर्भर था; 
(7)  जीवनशैली, साहित्य, परंपरा, दर्शन के मामले में यदि संपर्क में आने वाले समाज वैदिक स्वामिवर्ग का अनुकरण करते थे, तो उद्योगविद्या,  कौशल, रीति-व्यवहार के मामले में सीधे जनसंपर्क का महत्व अधिक था और इसलिए उपादान संस्कृति के मामले में इनका ही बोल बाला था। 
 
इतिहास का विचित्र व्यंग्य है कि सभ्यता की दिशा में बढ़ने वाले पहले चरण में 
 - कृषि के प्रयोगों का प्राणपण से विरोध करने वालों (असुरों/राक्षसों) ने एक बड़े भूभाग में कृषि के प्रसार में परोक्ष भूमिका निभाई, क्योंकि उनके आतंक के कारण कृषि कर्मियों को भारतीय भूभाग में और इसके बाहर भी इधर उधर भागते रहना पड़ा।  यदि किसी रहस्यमय योजना या कर्ता की कल्पना करें तो यह उसके द्वारा सभ्यता के बीज बिखेरने जैसी परिघटना है। मानव इतिहास को देखते हुए  जितनी कम अवधि में भूमध्य सागर तट से ले कर फिलीपीन  और चीन तक खेती का आरंभ हुआ वह यातायात की बाधाओं को देखते हुए लगभग एक ही काल में आश्चर्यजनक रूप में घटित परिघटना प्रतीत होता है।  ऐसा  असुर/राक्षसों के उपद्रवों के कारण ही संभव था। जब देवों के अनुनय विनय (नो अपि अस्यां भागं इति) के बाद उन्हें अपने खेती बारी का एक कोना मिल गया (शत.ब्रा. 1.2.5.5-6)  और उन्होंने कुपोषण से मुक्ति पा ली,  तब भी घुड़की और धौंस जारी रही: “तुम लोग अपनी इंद्र-भक्ति लिए-दिए कहीं दूर चले जाओ (उत ब्रुवन्तु नो निदः निः अन्यतः चित् आरुज, दधाना इन्द्रे इत् दुवः, ऋ. 1.4.5)।

देववादियों की संख्यावृद्धि और साथ ही उनके  अधिक संगठित और शक्तिशाली हो जाने  के बाद इनके वनांचलों के निरंतर अधिक्रमण के कारण, इन्हें  निराश्रय हो कर उन्हीं देववादियों (कृषि के उन्नायकों) से कृषि उत्पाद के लिए उनकी सोवा को तैयार होने के बाद समुचित  लाभांश के लिए होने वाली तकरारों के बाद दमन और उत्पीड़न से बचने के लिए देशान्तर को पलायन करने वालों ने सभ्यता और वैदिक भाषा  और भारतीय संस्कृति  का प्रसार किया।

यहाँ हम एक बौद्धिक उलटबाँसी की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहेंगे।  भारतीय इतिहास की बहुत मार्मिक व्याख्या करते हुए नीरद चंद्र चौधरी लिखते हैं:
To consider cultural history first, there has never been any civilization in India which had not have a foreign origin, has not have foreign inspiration behind it, and has not been created substantially by incoming foreign ethnic elements.  
(An Autobiography of an Unknown Indian, 1998, 563)
इसे वह इतने ही ठोस प्रमाणों से पहले वह समझा आए हैं जिससे अपने अपने तरीके से दूसरे सभी ‘प्रबुद्ध’ भारतीय जानते और मानते हैं।  इसे मान लेने पर आप का सम्मानजनक प्रवेश उस बिरादरी में हो जाता है जिसमें सभ्यता, वस्तुपरकता और मतनिरपेक्षता के विरुद वितरित किए जाते है। असहमत होते ही आप कहते क्या हैं, किस आधार पर असहमत होते हैं यह सुनने को, यह पता चल जाने के बाद कि आपके निष्कर्ष उस मान्यता से भिन्न हैं आप का लिखा पढ़ने को भी उस बिरादरी के सदस्य तैयार नहीं होते, इसका मुझे लंबा अनुभव है । उनकी फटकार मुस्कराते हुए सुनने के बाद अपने संदेहों का निवारण करने के लिए जब उनसे अनुरोध किया तो वे सभी बगलें झाँकने लगे, जब कि वे सभी पुरातत्व, नृतत्व, इतिहास और तुलनात्मक भाषाविज्ञान की अनन्य विभूतियाँ थीं।  

अधिक संभव है कि आप भी उस धारणा के कायल हों, क्योंकि इसे मुख्वेय विजारधारा माना जाता है, और जो दावा किया गया है वह हवाई  नहीं, कतिपय दृष्टांतों पर आधारित हैं। अब इस संदर्भ में  निम्न तथ्यों पर ध्यान दें जिनको मैंने  उन धुरीण दिद्वानों के सामने कभी इस रूप में नही रखा। चौधरी की सारगर्भित  ठिप्पणी के बाद, आप को भा उनसे सहमत मान कर पहली बार आप के सामने रखना जरूरी है।  सभ्यता के प्रवाह की दिशा तय करने के लिए लेखन पूर्व की परंपरा इतिहास का उतना ही अपरिहार्य स्रोत है जैसे लेखन।  

अब सुमेर जिसे सभ्यता के जनक के रूप में याद  किया जाता है, उसका, बेरोसस, उनके अपने ही इतिहासकार, के अनुसार रहस्य यह है:
Oannes, in Mesopotamian mythology, an amphibious being who taught mankind wisdom. Oannes, as described by the Babylonian priest Berosus, had the form of a fish but with the head of a man under his fish’s head and under his fish’s tail the feet of a man. In the daytime he came up to the seashore of the Persian Gulf and instructed mankind in writing, the arts, and the sciences. Oannes was probably the emissary of Ea, god of the freshwater deep and of wisdom. 
(Wikipedia).

हम कृषिकर्मियों द्वारा अपनी भूसंपदा से वंचित, उशना के नेतृत्व में निर्वासित, पाताल लोक में पहुँचने की कथा का इससे संबंध पहले दिखा चुके हैं। 

ईरान के विषय में हर्त्जफील्ड ने (Zoroaster and His World, II, 1947 , 330)  वहां की परंपरा का उल्लेख किया है जिसके अनुसार वहाँ सभ्यता का सूत्रपात करने वाले आदि पुरुष  (यम जमशीद) भारत में तब तक हो चुके समस्त विकासों का ज्ञान लेकर पहुँचते हैं।  पाठकों  के मन में इनमें से कुछ के विषय में आशंका पैदा हो सकती है, इसलिए उद्धृत अंश में उनके साथ कोष्ठक में वैदिक शब्द दे दिया है:
Yama-Djashid teaches the fabrication of weapons(आयुधानि), saddles, bridles(रश्मि),   other tools and implements, spinning and weaving of silk(ऊर्णा), linen(तार्प्य कोशेय)  and cotton, the whole national economy, quarrying(खनि, आकर) and massoning of stones, making chalk and cement, architecture, hydraulic wheels(कूचक्र) and mills(चक्री), bridge building(सेतु), mining, perfumery(सुगंधि), pharmaceutics(ओषधि/, medicine(भेषज), shipbuilding and pearl fishery (कृशनम्). .   

यदि किसी स्थल से भारत के विलक्षण माने जाने वाले - मोर, गन्ना, चंदन, आदि के निर्यात का उल्लेख पढ़ कर हम बिना किसी आशंका के यह कह सकते हैं कि वह भारतीय व्यापारियों का अड्डा था, या वहाँ के व्यापारी भारतीय संपर्क में थे, उसी तरह भारत में किसी चरण के समस्त  विकासों  को लेकर पहुँचने वाले व्यक्ति या आदि पूर्वज के विषय में दो टूक फैसला कर सकते हैं कि वह वहाँ भारत से पहुँचा था।।

हम विलियम जोंस द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के माध्यम से देख चुके हैं  कि यूनानी परंपरा के अनुसार ग्रीस और रोम के लोग मानते थे कि सभ्यता के सभी तत्व दक्षिण में अवस्थित भारत (इथियोपिया) से वहीं पहुँचे थे। ठीक यही विचार जर्मन अध्येता Hans G. Niemeyer के सीथियनों (पणियों) के संबंध में (शबवेध 94)हैं।

अब नीरद चंद्र चौधरी की भारतीय इतिहास  विषयक उस ‘सुचिंतित’, ‘निष्पक्ष’ और सभी ‘संकीर्णता से मुक्त धारणा’ पर दुबारा विचार कीजिए तो पूरी तस्वीर ही बदल जाएगी। अब इसका नया पाठ बनेगा:
To consider cultural history first, there has never been any civilization in  the world which had not have an Indian origin, has not have Indian inspiration behind it, and has not been created initially by outgoing Indian ethnic elements.  ,  

परंतु यदि आपने इस सही और प्रामाणिक पाठ को इतिहास का सत्य कहा तो आप हिंदुत्ववादी, संकीर्ण, पूर्वाग्हों से ग्रस्त घोषित कर दिए जाएँगे जब कि यूरोपीय आततायियों के प्रवेश से पहले भारत पूरे विश्व के लिए सपनों और विचित्रताओं का, संपन्नता और वैभव का देश था। प्रसिद्ध जुमला ऑल रोड्स लीड टु रोम केवल यूरोप के संदर्भ में, तीन चार सौ सालों के लिए सही था।  यदि आप कहें, सारे जहाज भारत या भारतीय अड्डों तक पहुँचने के इरादे से रवाना होते थे तो यह विश्व इतिहास का सच होगा, परंतु सच को कह पाना और झूठी कहानियों को सच मानने और सर्वज्ञात और सर्वमान्य सत्य को सुनने तक को तैयार न होने वालों को इसे समझा पाना, कितना कठिन है। संचार और प्रचारसाधनों के बल पर प्रचारित झूठ सच को आपकी चेतना और विचार-परिधि से बाहर कर देता है, और सच के पक्षधर का मुँह झूठ पर पली इस उन्मादी भीड़ के द्वारा काला कर दिया जाता है।
( समाप्त )

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


शब्दवेध (99) समझ का संकट

जो कुछ पहले सोचा और लिखा जा चुका है यदि उससे हमारी समस्याओं का समाधान हो जाता तो हमें सोचने समझने की झंझट मोल न लेनी पड़ती। यह झमेला उन समस्याओं के बारे में बना रहता है, जिनमें कोई न कोई असंगति बनी रहती है। 

मैं सभ्यता के प्रसार में पणियों की गतिविधियों पर विचार करना चाहता था कि इसी बीच मेरे विद्वान मित्र कल्याणरमण  ने पणियों की पहचान पर एक लेख के अंश और पुरातात्विक साक्ष्य दे कर यह याद दिलाना चाहा कि पणि मूलतः वणिक थे। उनका मंतव्य 'शब्दवेध 98' पर टिप्पणियों में है।

समस्या शब्दार्थ की नहीं है, सन्दर्भगत अर्थों/आशयों ओर अर्थ-विकास/-ह्रास/-विस्तार की है। यदि कोई कहता है कि हमने कूट भाषा में अपनी बात कही है (नीहारेण प्रावृता जल्प्या) तो उस कूट का प्रचलित अर्थ ग्रहण करने पर हम उसका सही आशय नहीं ग्रहण कर सकते न ही कूट का अनमेल अर्थ कर सकते हैं।  व्युत्पत्ति पर जाएँ तो पण (पत्>पन -जल) है। कुछ बोलियों में रानी को राणी और पानी को पाणी कहते हैं। इननें पन>पण हो गया। इसका अर्थ विकास धन, ज्ञान, दक्षता, महिमा, भर्त्सना आदि दिशाओं में  हुआ। ऋग्वेद के समय तक पण का प्रयोग धन/संपदा के लिए और पणि का प्रयोग एक तो ऐसे समुदायों के लिए होता था जिनके अधिकारक्षेत्र में खनिज संपदा हो पर जो पर उसका न तो स्वयं उपयोग करता हो न दूसरे को करने देता हो  (कबीले और दूसरे  जानवर भी अपने अधिकारक्षेत्र में किसी दूसरे का प्रवेश सहन नहीं करते) दूसरे धनी व्यक्ति के लिए।

पहले का प्रयोग बहुत लंबी और दुर्गम दूरी के क्षेत्र के घुमक्कड़  कबीले के लिए हुआ है अतः बहुवचन (पणयः/पणीनां/ पणिभिः) का प्रयोग किया गया है।  जैसा कि हिल्ले्ब्रांट ने (वेदिक माइथॉलोजी) सुझाया था इसका संबंध उत्तरी अफगानिस्तान के लाजवर्द की खानों के क्षेत्र के कबीलों (पार्नियन्स) से है।  इस पर हम रामकथा के प्रसंग में विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। दूसरे का प्रयोग अपने निकट संपर्क के भिन्न उपासना पद्धति वाले (अन्यव्रत), वैदिक आराधना पद्धति के आलोचक (निद या निंदक) ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए हुआ है जो धनी होते हुए भी पुरोहितों को दान-दक्षिणा नहीं देते थे और इसलिए निंदा के पात्र थे और जिनकी अमंगल कामना भी की जाती है। 

यद्यपि पण के समानार्थी - काटना, खंडित करना, वितरित करना - वण से यह प्रलोभन होता है कि इसे वाणिज्य से जोड़ा जाय, पर ये व्यापारी नहीं हो सकते क्योंकि अर्थतंत्र पर देववादियों का अधिकार था।  साथ ही  ऋग्वेद में खरीद, बिक्री या विनिमय के लिए पणन का प्रयोग नहीं मिलता। पण का अर्थविकास पंड (पंडारम्), भंड (भंडारी, भंडार,) खान, आगार, अं. फंड की दिशा में हुआ।  क्रय और विक्रय के लिए क्रीणन (क्रीणाति) और वापसी के लिए पुनर्दान का (क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः, यदा   वृत्राणि  जंघनत्  अथ एनं मे पुनर्ददत् ।। 4.24.10) और आमदनी के लिए आदान का प्रयोग देखने में आता है।  व्यापार के लिए धनन - समुद्रस्य चित् धनयन्ति पारे - होता था। पणन, पण्य, विपणन का  प्नयोग देखने में नहीं आता, यद्यपि साहित्य में किसी शब्द का न आना इस बात का प्रमाण नहीं कि उसका व्यवहार नहीं होता था पर उसी आशय के लिए किसी अन्य का चलन इसकी पुष्टि करता है।  पनयन - कीर्तिगान (महो महानि पनयंति अस्य इन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि)  विपन्य - ज्ञानी (तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते) का प्रयोग अवश्य देखने में आता है।  उस चरण पर व्यापारी के अर्थ में इसका प्रयोग आरंभ नहीं हुआ लगता, व्यापारी के लिए वणिक/वणिज (औशिजाय वणिजे ) का ही प्रयोग देखने में आता है।  

पणि (फिनीशियन) भूमध्य सागर क्षेत्र में उद्योग और व्यापार में निश्चय ही अग्रणी प्रतीत होते हैं और लगता है अर्क -जल/अर्घ  - जल, अर्धाली (गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कं), अर्चना (अर्कमर्चन्तु कारवः), अर्हत - पूज्य, अर्घ - धन,  और महार्घ - बहुमूल्य की तरह महिमा के लिए जल>पमहिमा और मूल्य के विकासक्रम से पण जो धन का अर्थ ले  चुका था, और  धनन् को पदस्थ करके व्यापारिक लेन-देन के लिए पणन - विनिमय, लेनदेन(व्यापार)  के लिए आरंभ हुआ और उसके बाद धनन् व्यवहार से बाहर हो गया।

अब समस्या यह सामने आती है कि वे  पणि कौन थे जिनसे देववादियों की शत्रुता थी फिर भी जो उनके लिए इतने उपयोगी थे कि उनके बिना इनका काम नहीं जल सकता था। यहीं पर हमारा ध्यान  उस  मोलभाव  की  ओर जाता है जिसमें  समुद्री व्यापार  के संदर्भ में  जोखिम भरे  अभियान में  अपनी सेवाएँ -श्रम और दक्षता के प्रतिलाभ को लेकर उनका देववादियों से झगड़ा होता है जिसका प्रतीकांकन  समुद्र मंथन और अमृत (अमृतं हिरण्यं) के बटवारे के क्रम मे छल और दमन में हुआ।  रोचक वात यह कि देव इस समय भी असुरों से डरे रहते हैं ।

विभिन्न उपक्रमों और कौशलों से जुडे विशेषज्ञ वैदिक   व्यवसायियों से मोलभाव में जो कुछ पाते थे उसे मौजमस्ती में खर्च करते थे, जोड़ने सहेजने की आदत न थी। भोगवादी थे। खुशहाल थे, और पुरोधा वर्ग की तुलना में मालामाल थे। 

वर्ग उत्पादकों  और स्वामियाों  के बीच टकराव और उत्पादकों  के दमन का सबसे पुराना हवाला इन्द्र द्वारा विश्वरूपा के वध में मिलता है।  उसकी विशेषता क्या है? वह ज्ञान और दक्षता में ब्रह्मा का प्रतिस्पर्धी है।  इंद्र को वज्ह्मार मनाने वाले त्वष्टा का पुत्र है।  ब्रह्मा के चार सिर हैं, उसके तीन, ब्रह्मा विश्व के निर्माता, विश्वरूपा विश्व की समस्त वस्तुओं का निर्माता।  उसका अपराध क्या है कि इन्द्र उसका शिरच्छेद कर देते है? वह इतना संपन्न है कि वह देवों (सोम), असुरों (सुरा) और मानव सुलभ (अन्नादि) सभी प्रकार का भोग करता है।  यह इस बात का सूचक हो सकता है कि कारीगर और कतिपय पेशों से जुड़े लोग काफी खुशहाल और लाभ-हानि-दिवालियापन के जोखिम से मुक्त होने के कारण अपना धन मौज-मस्ती में खर्च करते थे।  परंतु इनमें से कुछ उपक्रमकों से जुड़े लोग अपने प्राप्य भाग से असंतुष्ट हो कर स्वयं व्यापार में भी पहल करने लगे थे जिसका प्रतिबिंबन भृगुओं की तकनीकी दक्षता के साथ व्यापारिक महत्वाकांक्षा में  है।  

इस बात की अधिक संभावना दिखाई देती है कि पणि मूलतः तक्षण - चक्र, रथ, नौनिर्माण, नौचालन से जुडे़ रहे हो सकते हैं जिन्होंने असंतुष्ट हो कर व्यापारिक गतिविधियों में रुचि लेना आरंभ किया और पणियों (फिनीशियनाें) का संबंध इन्हीं से है।  यह मात्र एक संभावना है जिसमें नई सूचना या व्याख्या आने पर सुधारा भी जा सकता है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


शब्दवेध (98) सभ्यता का प्लावन

हमारे सामने एक टेढ़ी समस्या है जिसका ओर-छोर हमें भी दिखाई नहीं देता।  यह समस्या अज्ञानजन्य नहीं हैं,  ज्ञान के अलग-अलग स्रोतों के बीच तनाव से पैदा हुई है। जिस वास्तविकता से आतंकित हो कर भाषावैज्ञानिक ऊहापोह आरंभ हुआ, वह था रंगभेदी सोच और औपनिवेशिक सरोकारों से किसी न किसी तरह संस्कृत की श्रेष्ठता का नकार।  इससे प्रबु्द्ध अंग्रेजों और दूसरे यूरोपीयों में संस्कृत  अध्ययन की पैदा हुई रुचि के बाद यातना और उत्पीड़न के माध्यम से प्रचारित की जाने वाली ईसाइयत की तुलना में हिन्दू  धर्म की श्रेष्ठता का और संवेदनशील ईसाइयों के हिंदू मूल्यों से लगाव का नया संकट पैदा हो गया।  

पहले संकट को टालने के प्रयत्न में संस्कृत और संस्कृत भाषी ब्राह्मणों को भारत में घुसपैठिया बताते हुए विलियम जोंस ने उसके मूलनिवास की जो खोज शुरू की उसके अंत में उन्होंने घोषित किया की वह बोली तो ईरान में नोआ की एक संतान द्वारा बोली जाती थी, पर अब उसे तलाशा नहीं जा सकता था। यह नई खोज नहीं थी, अपने तीसरे भाषण में ही वह जानते थे कि भारत को छोड़ कर वह भाषा अन्यत्र मिलेगी ही नहीं इसलिए अपने उस महावाक्य में उन्होंने जोड़ दिया था कि शायद वह साझी भाषा बची ही न हो some common source, which, perhaps, no longer exists। भले वह बची न रह गई हो पर उस मरी हुई भाषा और खोए हुए भूगोल से एक नया विज्ञान पैदा हो गया जिसे ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषाविज्ञान की संज्ञा दी गई। यह विज्ञान ऐसा है जो आज तक उसी खोज में लगा हुआ है जिसकी खोज की जरूरत न थी और जब तक आप पश्चिमी दिमाग की काबिलियत पर भरोसा बनाए रहेंगे यह खोज जारी रहेगी। जननी भाषा और ब्राहमणों की जन्मभूमि भले न मिले, जोंस इस नए विज्ञान के जनक अवश्य मान लिए गए - कभी किसी नतीजे पर न पहुँचने वाले विज्ञान के जनक और उसे विज्ञान मानने वाले घामड़ विद्वानों के जनक। 

दूसरे संकट के निवारण के लिए जोंस जैसी ही लफ्फाजी के धनी मैक्समूलर मंच पर आए।  उन्होंने ठान लिया कि वह हिंदुओं की धार्मिक आस्था के स्रोत वेद की खोज करेंगे और सिद्ध कर देंगे कि ईसाइयत के सामने दूसरे सभी मजहब और धर्म ओछे हैं। उन्होंने वेद को खोज निकाला उसका पाठ तैयार किया, उसे सर्वसुलभ कराया और उसकी असलियत भी बता दी : 
(1) यह भारत से लेकर यूरोप तक के सभी की  आदिम भाषा में रचित है: 
(2)  सभ्यता के शैशव की भाषा है इसलिए उसके कुछ शब्द तो (डेड लेटर ) हैं जाे कभी समझे ही नहीं जा सकते और इसकी कुछ उक्त्तियाँ नितांत बचकानी (चाइल्डिश टु दि इक्स्ट्रीम)  हैं। ऋचाएं चरवाहों  के उद्गार हैं परंतु उनमें दार्शनिकता भी है जो केवल भारत के चरवाहों में भी हो सकती थी, और इसका नाम श्रुति था इसलिए इसे कंठस्थ किया जाता था जो इस बात का प्रमाण है कि समाज निरक्षर था, पर इसका एक एक अक्षर ईसा से 1000 साल पहले गिना जा चुका था और उसमें कोई अंतर आज तक नहीं आया है, यह है वह स्मरणशक्ति जो केवल भारतीयों में ही हो सकती है।  पर वैदिक मूल्य बचकाने हैं,   बौद्धधर्म  उसकी अगली अवस्था है परन्तु  सभी का लक्ष्य उस ऊँचाई तक पहुँचना था जिसे  ईसाइयत मूर्त करती है।  इससे मैक्समुलर जोंस के दाय के अनुसार ‘तुलनात्मक धर्मशास्त्र’ का जनक बनना चाहते थे।  वेद का प्रकाशन, सैक्रेड बुक्स ऑफ दि ईस्ट सीरीज का प्रकाशन इसी योजना का हिस्सा है फिर भी मैक्समुलर  ‘तुलनात्मक धर्मशास्त्र’ के जनक न बन सके, क्योंकि शास्त्र अनुभववादी होने के बाद भी तर्क पर आधारित होते हैं,  जब कि ईसाइयत सहित सभी मजहब विश्वास पर आधारित हैं। शास्त्र का औजार तर्क है, विश्वास का औजार हिंसा और उत्पीड़न और धोखाधड़ी जिसका भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया गया ।  यह सराहनीय है कि मैक्समूलर ने ईसाइयत को भी तर्कसम्मत  या शास्त्रसम्मत बनाना चाहा पर उसके लिए तो ईसाइत का कायाकल्प जरूरी था।  

जो भी हो, मैक्समूलर तुलनात्मक धर्मशास्त्र के जनक न बन पाए।  उन्हें आज भी कुछ लोग भाषाविज्ञानी और कुछ भारतविद के रूप में ही याद करते हैं और यह भूल जाते हैं कि वह संस्कृत साहित्य का इतिहास ब्राह्मणों के धर्म को आदिम सिद्ध करने के लिए कर रहे थे और पुष्पित भाषा के साथ सारा लेखन नकारात्मक है और उसका उल्टा पाठ करके हम सचाई पर पहुँच सकते हैं। 

हमें  नवोदित पश्चिम की सीमाओं और विवशताओं का पता है, इसलिए  ‘हमसे बड़ा न कोय’ की इस खींचतान से कोई शिकायत नहीं।  हमारा अपना इतिहास इस चरण से बहुत पहले गुजर चुका है ।  

इतिहासकार के रूप में हमारी शिकायत इस बात से है कि इस इकहरीऔर सीमित लक्ष्य की दौड़ में न भाषाओं के साथ न्याय हुआ, न मनुष्य के अंतर्लोक की उस उधेड़बुन को समझने का गंभीर प्रयत्न हुआ जिससे वैज्ञानिक जिज्ञासा  के आदिम रूपों  को समझा जा सकता था, जो कार्य-कारण की तर्क शृंखला का अनुकरण करता हुआ परमेश्वर/परमेश्वरी  तक और देव समाज की कल्पना की गई और जिनसे निकटता कायम करने और लाभान्वित होने के प्रयत्न में धर्म विश्वास और  उपासनापद्धतियों का जन्म हुआ।  
े
ऐसा इकहरापन स्रोतों की विश्वसनीयता और अविश्वसनीयता के मामले में भी देखने में आया जिसमे किसी समस्या को समझने में सहायक सबसे उपयोगी स्रोतों को व्यर्थ कर दिया गया। मिलावट वाचिक  प्रसार  में होता है परंतु  यह याद रखना जरूरी है कि लेखन में उससे अधिक घालमेल किया जाता है। पुरातत्व तो इतिहास को आँखों के सामने पेश कर देता है, पर उसकी जो गति मार्शल और व्हीलर ने की वह उनके किए कराए पर पानी फेर देता है। किसी भी स्रोत अविश्वसनीय मान कर उससे उपलब्ध रोशनी को त्याग कर हम अँधेरापन बढ़ाते हैं।
 
हम  लिखित प्रमाणों  पर भरोसा करते हैं तो  तो पता चलता है भारत का सुमेरिया से संपर्क 2300 ईसा पूर्व में हुआ  हो सकता है, और पौराणिक सूचनाओं की मदद लेते हैं तो पता चलता है कि वहां सभ्यता का सूत्रपात करने वाले ओएनेस (उशनस्) ने किया था जो भारत से गए थे और उनका संपर्क मूल देश से बाद में भी बना रहा था । (देखें, 1 अक्तूबर 2019 की पोस्ट)।    

वेद का सतही पाठ करते हैं तो भारोपीय क्षेत्र में भाषा, संस्कृति का प्रसार करने वैदिक साहित्य में प्रमुखता से अंकित नेताओं/राजाओं और ऋषियों को जाता है।  जब उसी का गहराई से पाठ करते हैं तो पाते हैं इस प्रभुवर्ग से जुड़ा हुआ और फिर भी उससे हर मामले में तनाव की और टकराव की स्थिति में विद्यमान देवेतर परंपरा से जुड़ा, नौचालन, पशुपालन, खनन, धातुशोधन, तक्षण, आदि विविध उपक्रमों से जुड़ा वर्ग लाभ में अपनी बराबरी का दावा करता है, समुद्र मंथन में अमृत (अमृतं हिरण्यम्) के बँटवारे में अपने उचित हिस्से की माँग करता है, उससे हेराफेरी की जाती है, उसका दमन और उत्पीड़न होता है, वह बदले की कार्रवाई भी करता है जो  विश्वरूपा/ त्वष्टा  और इन्द्र और सौत्रामणि के प्रायश्चित्त में कथाबद्ध है।  देववादियों की तुलना में आंतरिक कलह से खिन्न हो कर देशान्तर में पलायन करने वाले और वहाँ सभ्यता का सूत्रपात करने में अग्रणी भूमिका इनकी है। इसी परिप्रेक्ष्य में हम सुमेरी, मिस्री और यूनानी तथा रोमन ही नहीं फिनो- उग्रियन क्षेत्र में वैदिक संपर्क भाषा के समानान्तर अपनी बोलिेयों, अपने आराध्य देवी-देवताओं और विशेष रूप से कौशलों, उद्यमों और व्यापारिक गतिविधियों के प्रसार का एक नया अध्याय सामने आता है जो अबतक छिपा रह गया था और जिसकी और ध्यान जाने पर लगभग समूचे पुराने जगत में सभ्यता के प्रसार का एक अधिक बड़ा और बहु-आयामी चित्र उभरता है जिसे समझने में पणियों की भूमिका सहायक होती है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


Monday, 1 February 2021

शब्दवेध (97) एक अचरज हम अइसा देखा मूरख बाँटे ज्ञान

जब हम यथार्थ को उसके नियम से समझने का प्रयत्न करते हैं, तो हमें ऐसी सचाइयों का सामना करना पड़ता है  जो हमें चकित कर देती हैं, कारण हम उससे पहले यह सोच भी नहीं पाते कि ऐसा हो भी सकता है। इस दृष्टि से विज्ञान सबसे बड़ा जादूघर है।  म्यूजियम (अपनी विचत्रता से उत्फुल्ल करने वाला संग्रह) में भी यह भाव छिपा है, पर अजायबघर इसे अधिक सही बयान करता है। अज्ञात सत्य से अधिक आश्चर्यजनक कुछ नहीं होता। मैं अपने लेखन में कितने आश्चर्यों से गुजरता हूँ इसकी गिनती नहीं, पर चौंकाने के लिए कुछ नहीं लिखता, यह विश्वास है।
 
जब हम अपनी जरूरत से अपने नियम गढ़कर सचाई को देखना चाहते हैं तो सच्चाई मरीचिका में बदल जाती है और हम उसे पकड़ने की कोशिश में हम नई जुगत तैयार करते रहते हैं, पर वह और पीछे हटती जाती है।   ‘अब हाथ आई, आई,  पर नहीं आई’  का  खेल कभी खत्म नहीं होता।  सिद्धांतों के पहाड़ खड़े हो जाते हैं और वे स्वयं भी समाधान को असंभव ही नहीं बनाते जाते हैं, लौटने का रास्ता भी बंद कर देते हैं। 

सत्य की ‘खोज’ करने वाले इस मामूली बात को नहीं समझ पाते किसी दूसरे के नियम से किसी चीज को नहीं समझा जा सकता।  पाश्चात्य इतिहास और समाजशास्त्र की सबसे बड़ी सीमा यही रही है।  मानविकी के क्षेत्र में उसने अपनी जरूरत से गढ़े गए नियम यथार्थ पर लादने के प्रयत्न किए,  इसलिए उसके सहारे सचाई को नहीं समझा जा सकता। उसके नियमों से सर्वोपरि बने रहने की उसकी लालसा को अवश्य समझा जा सकता है।

पाश्चात्य ज्ञानशास्त्र ने  समाधान के प्रयास में  निरंतर नई समस्याएं पैदा कीं,  परंतु किसी भी समस्या का निर्णायक हल नहीं कर सका । अधूरे समाधान,  उल्टी प्रस्तुति,  और वह भी इस योजनाबद्ध रूप में जिसमें यूरोप के सभी विद्वानों की साझेदारी लगती है, इसलिए, उसी अनुपात में,  शोधविधि (मेथडालॉजी) के मामले में उनकी विलक्षणता के बावजूद, उनके निष्कर्षों पर भरोसा नहीं होता। 

हमने पहले जिन खाइयों और असंगतियों का  उल्लेख  किया था, वे उनके उस  ‘विवेचन’ से पैदा हुई हैं जिसमें विवेक पर लालसा हावी थी । उनका विवेचन सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर झुठलाने की कोशिश का दूसरा नाम है।  टुकड़े टुकड़े में वे सभी बातों को जानते और मानते हैं,  परंतु संयोजन की जगह जानबूझकर कुयोजन करते हैं।  समझ की कमी से अधिक बड़ा आरोप है नीयत में खोट पाया जाना, परंतु जब तक औपनिवेशिक खुमार में सोचने की जगह ऊँघने और बर्रा देशों  के बुद्धिजीवी उनके निर्भर करते हैं तब तक उनको  इस  खोट के  पकड़े जाने की भी चिंता नहीं होती। 

वे मानते हैं कि भारोपीय संपर्क में आने से पहले पूरा यूरोप  पशुचारण की अवस्था में था।  इसलिए  उनकी भाषा ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकती थी  जिसकी पुष्टि  ग्रीक, रोमन और संस्कृत में प्रतिबिंबित होती है। 

बोगाज़कोई  के अभिलेखों से, जिसे  इंडो-हित्ताइत (हित्ती) की संज्ञा दी गई, यह भी प्रकट हुआ कि यह भाषा भारतीय आर्यभाषा है,  फिर भी इसे बदल कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया कि  यही मूल भाषा का सबसे प्राचीन रूप है और  समानता रखने वाली भाषाओं की तरह’भारतीय आर्य-भाषा  भी इसी की उपज भारत-ईरानी की उपशाखा  है, जब कि हित्ती का ईरानी से कोई संबंध न था, भारतीय से सीधा नाता था। इसके साथ ही उन्हें यह भी पता था  कि लघु एशिया में  प्रतिष्ठित होने वाले भारतीय आर्य-भाषा भाषी वहां मध्येशिया के अश्वक्षेत्र से, जिसे शिंतास्ता (सिंधियों का उपनिवेश)  से पहुंचे थे, इसलिए  इंडो-हित्ताइत मूल भाषा का प्राचीनतम रूप नहीं हो सकती। उससे अधिक प्राचीन मध्येशिया की भाषा हुई। यहां वे  सभी एक सुर से  सच्चाई को उलट कर  पेश करते हैं और बताते हैं कि हित्ती भारत आने के रास्ते में मध्येशिया पहुंचे थे और इसलिए  मध्येशिया की भाषा जिसका कोई खाका उनके पास नहीं, भारतीय आर्य भाषा का पूर्वरूप हुई, जब  कि शिंतास्ता नाम से भी प्रकट है कि मध्येशिया में  बसने वाले भारत से वहां पहुंचे थे।   इतने उलटफेर में सभी विद्वानों की साझेदारी यदि नीयत की खोट नहीं है तो इसे और कौन सी संज्ञा दी जा सकती है। और नियत में खोट का पता चलने के बाद,  जितने  भी  आडंबर के साथ  किसी विषय में  दावे किए जायं, आडंबर के अनुपात में ही अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं।   

हमारी चुनौती, एक ओर तो,  उन्हीं के द्वारा, टुकड़ों-टुकड़ों में पेश की गई सचाई को सँजोने की है, क्योंकि  हमारे पास सत्तर साल की आजादी के बाद भी बाहरी जानकारी का अपना कोई स्रोत नहीं है,  और दूसरी ओर उनके कोलाज  को दरकिनार करके  एक सुसंगत चित्र बनाने की है जिसमें सच्चाई स्वयं अपने निखरे रंग में प्रस्तुत हो जाय।  पाश्चात्य आधे अध्येताओं ने ज्ञान के स्रोतों को नष्ट करके  विशाल मलबा का तैयार किया है और हमारी चुनौती उस मलबे से टुकड़े जुटाते हुए,  जहां तक संभव है, उन्हें  जोड़कर उनके पूर्व रूप में लाने की है।   इन टुकड़ों को जोड़ने के लिए जरूरी सूचना जो गोंद या आसंजक  का काम करेगी, उसे हमें अपने प्रयत्न से अब तक उपेक्षित स्रोतों से भी जुटाना होगा जिन तक हमारी पकड़ किसी अन्य से अधिक अच्छी हो सकती है।

इसमें किसी तरह का संदेह नहीं कि मध्येशिया के  रास्ते से लघु एशिया पहुंचने वाले जत्थे नौचालन में दक्ष नहीं हो सकते थे। इसलिए  हम यह भी नहीं कह सकते कि  यूनानी और  रोमन क्षेत्रों को  सभ्य बनाने में इंडो-हित्ताइत शाखा का ही हाथ था। इसका अधिक श्रेय फिनीशियनों   को दिया जाता रहा है,  जिनके लिए, अब,  हम  आश्वस्त होकर  ‘पणि’ शब्द का प्रयोग इसलिए कर सकते हैं  कि यह सकी भी है और सुविधाजनक भी। 

परिवहन की इस खाई को पाटते हुए हम एक नई खाई के सामने पहुँचते हैं।  वह यह कि यदि हम ग्रीक स्रोतों पर भरोसा करें तो पणि पर्णक्षेत्र या फिनीशिया में 2500 ई.पू. में पहुँच गए थे। यह तिथि बोगाज़कोई के अभिलेखों से और  कुछ रियायत देते हुए क्षेत्र में आर्य वासियों के पहुंचने की  तिथि 2000 ख्रिस्ताब्द पूर्व से भी पीछे जाती है,  परन्तु क्रीत की मिनोअन (मानव) संस्कृति की काल रेखा को देखते हुए (The Minoan civilization was a Bronze Age Aegean civilization on the island of Crete and other Aegean Islands, flourishing from c. 3000 BC to c. 1450 BC until a late period of decline, finally ending around 1100 BC. It represents the first advanced civilization in Europe, leaving behind massive building complexes, tools, artwork, writing systems, and a massive network of trade.) अतिरंजना को घटाने के बाद अधिक बेमेल नहीं लगती।  यदि ऐसा है तो  यूनानियों  और रोमनों के बीच भारतीय भाषा और सभ्यता का प्रसार देव परंपरा  से संबंध रखने वालों से पहले असुर परंपरा के उत्तराधिकारियों ने किया था जिनकी उपासनापद्धति शाक्त थी।  इसके कुछ प्रमाण जोंस ने अपने आठवें अभिभाषण में दिया था और इसके पुरातात्विक साक्ष्य निम्न लिंक पर देखे जा सकते है यद्यपि इनमें रोम से प्राप्त सभी नमूनों का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता:
 https://in.pinterest.com/lindapullis1/roman-phallic-symbols/पर भूमध्य सागरीय क्षेत्र में नौचालन और इसका ज्ञान लेकर वे सीधे  नहीं पहुँच सकते थे।  इसका उत्तर इथिओपिया पर उनके अधिकार के रूप में देखा जा सकता है, जिसकी वकालत जोंस ने पुरजोर की है परंतु यहाँ कुछ तथ्य तथ्य उनकी विचार परिधि से छूट गए लगते हैं।  इन्हें  हम सही क्रम में रखें तो इथिओपिया में प्रवेश के शताब्दयों बाद वहां अपनी धाक जमाने के बाद उनकी पहुँच मिस्री सभ्यता तक हो सकती थी, जिसे पहले नौचालन का अनुभव पहले से इसलिए नहीं रहा हो सकता था कि उसे मूलतः आबाद करने वाले नूबियन सूखे क्षेत्रों से आए थे।  स्वेज नहर बनने से युगों पहले लालसागर से एक नहर नील नदी से जोड़ी गई थी।  इसके प्रेरक और आरंभिक उपयोक्ता पणि ही रहे हो सकते है. इसके अभाव में  पणि अपने जलयानों के साथ भूमध्यसागर क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकते थे।  अब इस नए कालबोध के साथ पीछे के सभी अनुक्रम बदल जाते हैं। हमने पहले यह देखा था कि लेखन के प्रयोग और नए सुधार असुरों के द्वारा किए गए और अब हम कहने जा रहे हैं कि भारोपीय क्षेत्र में भाषा और संस्कृति के प्रसार में अग्रणी भूमिका असुरों की थी।  क्या यह कड़वी खूराक हजम की जा सकती है?  इंतजार फिर भी खत्म न हुआ। कल की फिर कल को देखी जाएगी, घने बादल हैं आसमानों में।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (96) साँप और सीढ़ी का खेल

कभी-कभी अपने पाठकों के धैर्य पर आश्चर्य होता है।  पिछले कुछ समय से मैं, एक ही बात को, एक बार निष्कर्ष तक पहुँचा लेने के बाद, फिर दुहराता हूं उसी को, एक नए कोण से देखने और लगभग उसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए।  कब से हम फिनीशियन या सामी लिपि से ब्राह्मी की उत्पत्ति की धारणा के विपरीत सिंधु-सरस्वती लिपि से ब्राह्मी और सामी दोनों के निकलने की चर्चा कर रहे हैं। चर्चा लगभग पूरी हो जाती है और फिर शुरू हो जाती है एक दूसरे सिरे से।  कारण यह  कि हमें एक साथ अपनी स्थापना के भीतर की कुछ  ग्रंथियों  से भी निपटना होता है,  आपके भीतर बद्धमूल धारणा  को भी  शिथिल करना होता है,  और  इसके व्यापक संदर्भ  को  उजागर  करने का सम्मोहन भी काम करता है। 

मैं अपनी बात को कुछ खोल कर रखूँ तो  हिंदी के बौद्धिक समाज की एक बड़ी त्रासदी यह है कि वह अपने समाज तक नहीं पहुंच पा रहा है। वह जिसे गलत समझता है, उसे, भारत का, पहले की तुलना में बहुत बड़ा हिस्सा, सही मानता है और बुद्धिजीवियों को अविश्वसनीय तक नहीं कहता।  

त्रासदी यहीं समाप्त नहीं होती बुद्धिजीवी वर्ग स्वयं समूचे बुद्धिजीवी समाज तक नहीं पहुंच पाता।   राजनीतिक बंटवारे ने बुद्धिजीवियों को एक दूसरे के लिए  असह्य, अगम्य, और अलभ्य  मानने की सीमा तक बांट रखा है।   मेरा  फेसबुक का लेखन  शिकायत के कई चरणों से गुजरा है।  पहले यह कि इतने गंभीर और लंबे लेख को कौन पढ़ेगा? फेसबुक हल्की-फुल्की चुटकुले बाजी के लिए बना मंच है। यह गंभीर विषय विचार विमर्श का मंच नहीं हो सकता। लोकप्रिय होना है तो लोकधुन पर नाचना भी होगा।  मुझे इस मंच का इस्तेमाल इसलिए करना था कि इस पर दर्ज वायरस का शिकार नहीं होता।  पर साथ ही यह विचार ङी काम कर रहा था कि पत्रों पत्रिकाओं  और संचार के दूसरे माध्यमों  के संकट के दौर में गंभीर चिंतन के लिए उपलब्ध इस मंच का सही उपयोग न किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।  मैं अपने पाठकों को खुश करने के लिए नहीं लिखता, यह लेखक को चंपी करने वाले की भूमिका में पहुँचा देता है।  जो सच मुझे दीखता है वह मेरे लेखन में चीखता है।  मैं लेखक की भूमिका जनरंजन नहीं लोकशिक्षण मानता रहा।   मेरे अनुभव ने मुझे निराश नहीं किया।  आज ऐसे लोगों की संख्या काफी बढ़ी है जो गंभीर विषयों पर मुझ से भी अधिक लंबे और गंभीर, तथ्यपरक,  लेख लिखते हैं और पढ़े जाते हैं ।  

 मेरी एक दूसरी शिकायत बौद्धिक  समाज में पारस्परिक संवादहीनता की रही है।   यदि आप जिन विचारों को मानते हैं उन्हीं को मानने वालों के बीच संचार कर पाते हैं तो आपकी बौद्धिक भूमिका शून्य हो जाती है।  विचार कीर्तन का रूप ले लेता है, जो भक्तिभाव से, भक्त-समुदाय के बीच, पवित्रता का अनुभव करते हुए, बार-बार दुहराया जाता है।  इसलिए मेरा आग्रह, समस्त हिंदी लेखन में हस्तक्षेप करते हुए,  जो कमियां किसी लेखन में दिखाई दें, उन को इंगित करते हुए टिप्पणी करने का रहा है। हस्तक्षेप तो दूर की बात है,   पढ़ने वालों का  विभाजन हो चुका है।   मैं जिस विषय पर लिख रहा हूं यदि उसे पढ़ने वालों का एक समुदाय यह सोचकर पढ़े  कि  इससे भारतीय समाज की महिमा प्रकट होती है,  भारतीय इतिहास का उज्जवल पक्ष सामने आता है,  तो यह सत्यान्वेषण नहीं हुआ। 

 यह सच है कि मोटे तौर पर मेरा लेखन इस तरह की भ्रांति पैदा कर सकता है,  परंतु  यह औपनिवेशिक चिंतन के  विरोध में किया जाने वाला सत्यान्वेषण है जिसे दबाने के लिए हजार तरह के  फरेब योजनाबद्ध रूप में किए गए।  ऐसा करना  साम्राज्यवादियों की राजनीतिक जरूरत थी। हमारी ऐसी कौन सी राजनीतिक जरूरत है कि हम उस षड्यंत्र को जारी रखना चाहते हैं और उनका खंडन करने वालों को  अतीतोन्मुखता  या देशानुराग से ग्रस्त मान कर  पढ़ना तक पसंद नहीं करते या पढ़ने पर डर जाते हैं कि  यह तो  अमुक राजनीति के पक्ष में जा सकता है,   इसलिए  चुप्पी  साध जाते हैं:  आलोचना या खंडन करना तक पसंद नहीं करते।  यह दूसरी बात है कि  आलोचना या खंडन के लिए जिस स्तर का अध्ययन और ज्ञान होना चाहिए, उसे अर्जित करने का उन्होंने प्रयास भी नहीं किया, क्योंकि उन्हें सिखाया गया था  कि ऐसा अध्ययन भी  प्रतिक्रियावादी है या  किसी प्रगतिवादी  को  भी प्रतिक्रियावादी बना सकता है। ये  तर्क नए नहीं हैं,   उपनिवेशवादियों के हैं। वे इसका प्रयोग अपनी आलोचना करने वालों को  निष्प्रभाव करने के लिए   किया करते थे  और स्वयं  नस्लवादी,  वर्चस्ववादी दुराग्रहों का  तांडव खुलकर किया करते थे।  यूरोपीय वर्चस्ववाद  और औपनिवेशिक मानसिकता को शिरोधार्य करते हुए हमने अपनी “स्वतंत्रता” पाई थी।   भारत स्वतंत्र हो रहा है।  वर्षों पहले  डोमिनियन स्टेटस  सौंपा जा रहा था, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया था,   और जब  स्वतंत्र हो रहा था  तो कॉमनवेल्थ की सदस्यता स्वीकार करते हुए नेहरू ने चोर दरवाजे से  उसे स्वीकार कर लिया था, जबकि जिन्ना में  इतनी समझ थी  कि उन्होंने  उसे ठुकरा दिया था, माउंटबेटन को स्वतंत्र देश का पहला गवर्नर जनरल मानने से इंकार कर दिया था, जिसे नेहरू ने स्वीकार कर लिया था।   कौन  कह सकता है कि अपनी  मर्दबदल  आदत के लिए कुख्यात  बुढृिया  को  नेहरू को  परोस कर  माउंटबेटन ने कुछ हासिल नहीं किया था?

इस  राजनीतिक दुर्दशा का चित्रण एक ही कवि ने किया था, पर कुछ विलंब से- महारानी के आगमन पर-  आओ रानी हम ढोएँगे पालकी,  जय कन्हैया लाल की।  पालकी  आजतक  ढोई जा रही है,  परंतु  किनके द्वारा? किन राजनीतिक दलों और संगठनों के द्वारा,  इसका जवाब  उन्हें ढूंढना होगा, जिनको इस बात की शिकायत है  उनकी आवाज  जनता से टकरा कर वापस आ जाती है। वे जो आरोप लगाते हैं  जनता की  अमोघ  चट्टान से टकरा कर प्रति-ध्वनि के रूप में उन्हें स्वयं सुनाई पड़ती है।  

परंतु जो लोग इस अनुसंधान-श्रृंखला के नियमित पाठक  हैं, और जिनके न होने का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था, उनमें से सभी की सत्यनिष्ठा पर भी  पूरा भरोसा नहीं हो पाता।  वे मेरी कुछ टिप्पणियों से, जो वर्णवाद (जिसे ब्राह्मणवाद कहने में संकोच नहीं, क्योंकि समाज का बौद्धिक नेतृत्व उनके हाथ में रहा है) विरोधी होती हैं उनसे वे खिन्न अनुभव करते हैं जिसका पता चल जाता है और जिससे यह भी पता चलता है कि मेरे पाठक होने के बाद भी वे रैशनल नहीं हो पाए हैं, अतः कुछ को लगता होगा कि मैं ब्राह्मणद्वेषी हूँ। 

 मैं केवल वस्तुनिष्ठ हूँ, वैज्ञानिक बने रहने का प्रयत्न करता हूँ और यह जानने के लिए उत्सुक रहता हूँ कि मैं अपने लेखन में अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह कर पाता हूँ या नहीं। गलती का पता चलने पर, उसे मानने, और अपने मत को बदलने के लिए तैयार रहता हूँ। केवल इस तत्परता को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूँ इसलिए अपने इस दृष्टिकोण को समझाने का जितनी बार, जितने तरीकों से समझाने का प्रयत्न किया है वह भी एक कीर्तिमान ही माना जाएगा।  अपने दृष्टिकोण को समझा पाने में विफलता  हिंदी  समाज के  वर्तमान और भविष्य के प्रति  दुश्चिंता पैदा करती है। जो भी हो, यह एक कारण है कि मैं पहले से बनी हुई गलत धारणाओं को निर्मूल करने का प्रयत्न करूं; उसे हर पहलू से जांचने परखने  का प्रयत्न करूं,  जिससे मेरे पाठकों के मन में किसी तरह का संदेह न रह जाय। 

दूसरा पहलू यह है  हमने बहुत पहले पश्चिम एशिया पर  हित्ती (प्रा. खत्तिओ),  मित्र (मितन्नी), कश (कस्साइट) जनों  द्वारा स्थापित और कई शताब्दी तक चलते रहने वाले शासन  का हवाला देते हुए यह दावा किया था यूरोप में तथाकथित भारोपीय भाषा का प्रचार भारतीय उपनिवेशों से हुआ।  प्रसार वहां से हुआ  इसे सभी आधुनिक भाषाविज्ञानी मानते हैं,  वे केवल इस बात पर बहस करते रहे हैं    कि वे भारत से  वहां नहीं पहुंचे थे बल्कि  वहां से भारत आए थे। उन लेखों में हमने दिशा सही कर दी थी, इससे अधिक कुछ करने को था नहीं। पश्चिम एशिया पर इनका अधिकार अश्व व्यापार  के क्रम में हुआ था। मध्य एशिया में अश्वपालन के क्षेत्र पर  इन्होंने उससे पहले अधिकार किया था और उत्तरी यूरोप की भाषाओं को इसी क्षेत्र का ऋणी होना पड़ा था, इसलिए यूरोप में भारोपीय के प्रचार के  दो केंद्र बन जाते हैं, एक मध्य एशिया से जुड़ा हुआ और दूसरा पश्चिम एशिया से जुड़ा।   

इसके बाद   इस समस्या के  जनक सर विलियम जॉन्स  के व्याख्यानों पर विचार करते हुए हमने पाया  कि रोमन और ग्रीक भाषाओं को प्रभावित करने वाले ही नहीं बल्कि उन्हें सांस्कृतिक रूप में  आप्लावित करने वाले भारतीय इथोपिया मे और भूमध्य सागर के पूर्वी तटीय क्षेत्र पर अधिकार करने वाले फिनीशियन थे, जो वैदिक देवी देवताओं को नहीं मानते थे अपितु  मातृदेवी के उपासक थे।

यहां आकर हमारी अपनी स्थापनाओं,  जो हमारी अपनी स्थापनाएँ भी नहीं है,   इनका आधार भी   एक दूसरे स्रोत हैं जिन्हें  हम सही मानते हैं।  अब इस वाद में  एक विरोधाभासी स्थिति पैदा होती है, जिसका निराकरण किए बिना  हम समस्या का संतोषजनक समाधान नहीं कर सकते।  इसके साथ ही साथ एक नया फलक  इनके पीछे से उभरता है जो केवल भारोपीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता अपितु सभ्यता के व्यापक प्रसार का रूप ले लेता है जिस पर भी पहले विचार किया गया है परंतु विकृत ढंग से विचार किया गया है इसलिए विचारों के बीच गहरी   खाइयाँ बनी रह गई हैं जिनका समाधान सभ्यता-विमर्श की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।

क्या इन खाइयों को पाटना आज की चरचा में संभव है? Wait!  They also work who only stand and wait.

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


शब्दवेध (95) फिनीशियन या पणि

वैदिक संदर्भ में  पणि शब्द लंबे ऊहापोह  का विषय बना रहा है क्योंकि पणियों के विषय में उपलब्ध सूचनाओं में  परस्पर  विरोध है।  एक के लिए इंद्र के उपासक उनकी निधि के दोहन को तत्पर दिखाई देते हैं ( स सत्पतिः शवसा हन्ति वृत्रं अग्ने विप्रो वि पणेर्भर्ति वाजम् ।)  

दूसरे में वे उनकी कृपा के लिए अनुनय करते मिलते हैं (अथेमस्मभ्यं रन्धय ।। 6.53.7) वे दान में कुछ दें इसकी कामना करते हैं (अदित्सन्तं चिदाघृणे पूषन् दानाय चोदय ।) वे धनी हैं, इंद्र से उनका विरोध है, उनके देवता और उपासना पद्धति भिन्न है (न रेवता पणिना सख्यमिन्द्रोऽसुन्वता सुतपाः सं गृणीते।)

उनके दूसरे रूप का  सही परिचय नहीं मिल पाता परंतु इतना स्पष्ट है कि उपासना पद्धति में विरोध  के  बाद  भी वैदिक आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण घटक थे और समृद्ध होने के साथ ही साथ खासे कंजूस थे और इसी आधार पर राजबली पांडे ने  यह सुझाव रखा था कि  पणि  फिनीशियन  थे। 
पाश्चात्य  लेखकों  में भी फिनीशियनों के विषय में  तरह तरह  की अटकलबाजियां की जाती रही हैं जिनमें उनकी पहचान से अधिक पहचान को छिपाने का प्रयत्न अधिक दिखाई देता है। नई सूचनाएँ पुरानी जानकारी के अधूरेपन को पूरा करके उनका अधिक विश्वसनीय चित्र नहीं प्रस्तुत करतीं अपितु उनको नकारते हुए पहले से अधिक अधूरापन और खालीपन पैदा करती हैं।  इसके बाद भी कुछ चीजें अपनी अपरिहार्यता के कारण उनसे भी स्पष्ट हो कर  उनके दावे विरोध में खडी होती हैं। वे उन्हें  भूमध्यसागरीय परिधि तक सीमित रख कर उन्हें सामी सिद्ध करना चाहते हैं, जब कि उनके विवरणों से ही यह सिद्ध होता है कि:
वे भूमध्यसागरीय क्षेत्र में एक आश्चर्यजनक उपस्थिति थे जिनके पास ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, लेखन कला, ज्योतिष-गणना, नौचालन, स्थल-परिवहन सभी कुछ था और भूमध्यसागर के तटीय क्षेत्रों में जहाँ का समाज पशुचारण से आगे नहीं बढ़ पाया था, इन सभी का प्रसार   इनके माध्यम  से हुआ। 
 
स्वतःसिद्ध है कि वे एक भिन्न सांस्कृतिक परिवेश से आए थे और इसकी सूचना उन यूनानी स्रोतों में थी जिनको भुलाने का प्रयत्न किया जाता है।  उसके अनुसार वे पूर्व के किसी तटीय भूभाग से वहाँ इसलिए 2500 ई.पू. में पहुँचे थे कि उस देश में लगातार भूचाल के झटके आ रहे थे। प्राचीन  ग्रीक लेखकों ने उस स्थल को फारस की खाड़ी के दक्षिणी भाग में स्थित माना था। पर वे अपने ही अनुमान के अनुसार फिनीशियनों के उस क्षेत्र मे पहुँचने के लगभग 2000 साल बाद पुरानी कहानियों के आधार परअटकलें लगा रहे थे, इसलिए इसमें कुछ समायोजन संभव है।
 
यदि सभ्यता के अन्य घटकों के साथ भूगर्भीय उपद्रव को भी इनकी पहचान में निर्णायक मानें तो संयोगवश उसी काल रेखा पर सिंधु सारस्वत क्षेत्र ऐसी ही एक आपदा से गुजरा था जिसका एक अवशेष ढोलावीरा के राजप्रासाद का 14 मीटर चौड़ा प्राचीर  था जो फट कर टेढ़ा हो  गया था और उसके सहारे के लिए पाँच  मीटर मोटी दीवार बनाई गई थी।  इसकी पुष्टि के लिए मैंने ढोलावीरा की खुदाई करने वाले आर एस बिष्ट से बात की तो इसकी काल रेखा वही (2500 ई.पू.)  निकली जो परिपक्व हड़प्पा से पहले और सारस्वत चरण के अवसान का प्रतीत होता है।
 
ऋग्वेद की एक ऋचा में लंबे समय तक चलने वाले उपद्रव का बहुत  जीवंत चित्रण देखने में आता है - 
यः पृथिवीं व्यथमानामदृंहद् यः पर्वतान् प्रकुपिताँ अरम्णात् । यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तभ्नात् स जनास इन्द्रः ।। 2.12.2  

इससे इस बात का आभास होता है कि यह भूगर्भीय उपद्रव लंबे समय तक चलता रहा था।  ऐसे में कोई कोई समुदाय प्राणरक्षा की चिंता से पलायन के लिए बाध्य हुआ हो तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। 

इसका दूसरा पक्ष यह है कि इस काल के आसपास के सुमेरी अभिलेखों में जिन अड्डों से माल लेकर आने वाले जहाजों के हवाले मिलते हैं वे सभी भारतीय या भारतीय व्यापारियों के नियंत्रण में थे।  नौवहन के क्षेत्र में भारत का एकाधिकार सा था, इसलिए भी नौवहन में अग्रणी फिनीशियन भारत से ही वहाँ पहुँचे हो सकते थे। जोंस ने इसके न केवल इसके बहुपक्षीय प्रमाण दिये थे  कि यूनानी इथियोपिया में अपने उपनिवेश कायम करने वाले भारतीय थे,  उन्होंने मिस्र को, मिस्र की संस्कृति को भी बहुत गहराई से प्रभावित किया और भूमध्यसागर के पूर्वी तट को आबाद कर रखा था और दोनों का आपस में गहरा संबंध था (देखें शब्दवेध 84)

आगे बढ़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि यह तय कर लिया जाय कि उनका अपना नाम क्या था।  हम पीछे (शब्दवेध 85) में प्रचलित धारणा का उल्लेख करते हुए यूनानियों द्वारा उनके पर्पल रंग के वस्त्रों की माँग के आधार पर दिया गया नाम बताया था, परंतु कुछ ऐसे प्रमाण हैं जिनसे लगता है कि वे अपने को जिस नाम से पुकारते थे उसका, नामों का सत्यानाश करने वाली यूनानी परंपरा के कारण, भ्रष्ट लेखन और उच्चारण करने के कारण उनका नामकरण फिनीशियन पड़ा, न कि रंग के नाम पर:
Robert S. P. Beekes has suggested a pre-Greek origin of the ethnonym The oldest attested form of the word in Greek may be the Mycenaean po-ni-ki-jo, po-ni-ki, possibly borrowed from Ancient Egyptian: fnḫw] (literally "carpenters", "woodcutters"; likely in reference to the famed Lebanon cedars for which the Phoenicians were well-known), although this derivation is disputed.( Aubet Semmler, María Eugenia (2001). The Phoenicians and the West: Politics, Colonies and Trade. Cambridge University Press. p. 9. ISBN 

 अब इस नामकरण की पण/ पणि से अभिन्नता स्पष्ट है, यद्यपि इसका संबंध सीधे धन से न जुड़कर काटने गढ़ने के मूल आशय (पण-वण खंडने) से जुड़ता है जो ही उस चरण के अनुरूप है क्योंकि उस दौर में सिक्के के रूप में पण का चलन संभव न था।  हाथ के लिए पाणि का प्रयोग तक्षण/दक्षता प्रकट करने के इसी से जुड़ा है।

यहाँ इस तथ्य पर भी ध्यान जाता है कि तक्षण में भृगुओं की विशेषज्ञता थी (ब्रह्माकर्म भृगवो न रथम्), व्यापारिक गतिविधियों में उनकी संलिप्तता थी ( येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ ।। 8.3.9) इसके कारण ही सुदास के विरुद्ध  वे लामबंद होने वाले प्रतिस्पर्धियों मे वे भी शामिल थे और उनके नाम से जुड़ा भृगुकक्ष समुद्री व्यापार का प्रमुख बंदरगाह था।  इसके अतिरिक्त उससे निकट समुद्र में डूबे एक नगर का प्रमाण मिला है, जो उसी भूगर्भीय उपद्रव का परिणाम रहा लगता है। द्वारका भी इसी उपद्रव में जलमग्न हुआ हो सकता है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


किसान आंदोलन और पुलिस की भूमिका / विजय शंकर सिंह

किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के लाल किले में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुयी। एक तो लाल किले में तिरंगा ध्वज से कुछ दूर हट कर सिख धर्म का प्रतीक निशान साहिब फहराया गया और वहां उपस्थित किसानों की भीड़ और पुलिस के बीच झड़प हुयी। अखबार और मीडिया की मानें तो, कुल 400 पुलिसजन घायल हुए। शुरू में यह भ्रम फैलाया गया कि वहां से तिरंगा को हटा कर उसकी जगह निशान साहब को फहराया गया लेकिन कुछ ही देर में जब स्थिति स्पष्ट हुयी तो यह साफ हो गया कि तिरंगा अपनी जगह है और निशान साहब को कुछ दूर एक अलग पोल पर फहराया गया है।  पुलिस ने, लाल किला पर जो विवाद और हंगामा हुआ उसके बारे में किसान नेताओ के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए और कुछ की गिरफ्तारी भी गई, हालांकि इसमें कोई महत्वपूर्ण किसान नेता नहीं है। बाद में इस पूरी घटना को अंजाम देने वाले, दीप सिद्धू का नाम सामने आया, जो गुरुदासपुर से भाजपा सांसद सन्नी देओल का करीबी है और उसकी निकटता, प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री से भी है। अब इस विवाद ने राजनीतिक रंग ले लिया, और यह कहा जाने लगा कि, यह सारा हंगामा भाजपा के लोगों के साथ मिलकर किसान आंदोलन को तोड़ने के लिये सरकार की शह पर कराया गया है और इस मामले में दिल्ली पुलिस की भी मिलीभगत है।

इस घटना पर कुछ वरिष्ठ पुलिस अफसरों की भी प्रतिक्रिया आयी। पंजाब के डीजीपी रह चुके देश के सम्मानित पुलिस अफसर जेएफ रिबेरो ने दिल्ली पुलिस के राजनीतिकरण पर सवाल उठाते हुए यह कहा कि ऐसे जनांदोलनों में पुलिस की भूमिका एक प्रोफेशनल पुलिस बल की तरह होनी चाहिए। यह बात सबको समझ लेनी चाहिए कि, सरकार की भी यह जिम्मेदारी है कि वह पुलिस बल को किसी भी राजनैतिक विवाद से बचाये और कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये पुलिस का गैरराजनीतिक और प्रोफेशनल स्वरूप बनाये रखे। एक नागरिक बल होने के कारण, पुलिस, सेना की तरह अराजनीतिक बल तो नहीं हो सकती है, लेकिन जन आंदोलन के दौरान बिना किसी राजनीतिक झुकाव के अपने दायित्व का निर्वहन तो कर ही सकती है, और उसे ऐसा करना भी चाहिए। 

लाल किले की घटना के बाद 29 जनवरी को सिंघू बॉर्डर पर प्रदर्शनस्थल ने सौ मीटर दूर करीब सौ-डेढ़ सौ लड़के आए और प्रदर्शनकारी किसानों की ओर पत्थर फेंकने लगे। जब किसानों ने भी जवाब दिया तो, दोनों तरफ से पत्थर चलने लगे। फिर पुलिस ने हस्तक्षेप तो किया पर पत्थर फेंकने वालों को, भगाया नहीं। वे सौ मीटर दूर खड़े होकर रह - रह कर पत्थर फेंकते रहे। यहीं यह सवाल उठता है कि पुलिस ने उन्हें वहां जाने से रोका क्यों नहीं, जहां पीने का पानी ले जाने पर भी पाबंदी है ? इन्हें दिन भर मीडिया, ‘नाराज स्थानीय लोग’ बताता रहा, पर वे हिंदू सेना के लोग निकले, जिन्होंने, विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। ऑल्टनयूज़ ने अपनी एक जांच पड़ताल में विस्तार से इस घटना और साज़िश का उल्लेख किया है। 

ऐसी ही एक घटना पिछले साल, जेएनयू में हुयी थी, जहां पुलि‍स संरक्षण में गुंडे घुसे थे, दंगे हुए, और आज तक दंगे करने वाले गुंडे पहचाने जाने के बाद भी गिरफ्तार नहीं किये गए। इसी प्रकार की साज़िश, दिल्ली दंगो के दौरान भी हुयी थी। कपिल मिश्र और रागिनी तिवारी के भड़काऊ भाषणों के बावजूद भी आज तक दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नही की। क्या यह पुलिस का राजनीतिक एजेंडे के अनुसार सेलेक्टिव कार्यवाही करना नहीं कहा जायेगा ? 

किसान आंदोलन के दौरान ऐसे अनेक वीडियो और खबरे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे है, जिनमे पुलिस कार्यवाही पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।  यह आंदोलन, निश्चित रूप से, सरकार के खिलाफ है और सरकार द्वारा बनाये गए कुछ कानूनो के खिलाफ है। आंदोलन, धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि जन अंसन्तोष के लोकतांत्रिक अधिकार हैं। यदि यह आंदोलन शांतिपूर्ण है और सरकार बदलने की मंशा से भी है, तो भी पुलिस का दायित्व यह है कि वह इस आंदोलन को शांतिपूर्ण ढंग से चलने दे। लेकिन जब आंदोलन विरोधी असामाजिक तत्व इस आंदोलन को जानबूझकर कर उकसा रहे हैं और पुलिस उनके साथ खड़ी दिखती है तो, जितने सवाल असामाजिक तत्वों की भूमिका पर नही उठेगे, उससे अधिक सवाल पुलिस की भूमिका पर उठेंगे और यह सवाल उठ भी रहे है। एक महत्वपूर्ण विंदु यह भी है कि क्या गुंडों के दम पर किसी लोकतांत्रिक जन आंदोलन को खत्म या दबाया जा सकता है ? 

लाल किला और सिंघू बॉर्डर से जुड़े, मुख्य दंगाइयों की फ़ोटो भाजपा नेताओं के साथ सोशल मीडिया पर लगातार आ रही हैं। यह भी एक दुःखद तथ्य है कि, आज तक देश के किसी भी गृहमंत्री के साथ दंगाइयों की इतनी तस्वीरे सोशल मीडिया पर नहीं नज़र आयीं जितनी आज कल नज़र आ रही है। इससे साफ साफ यह निष्कर्ष निकल रहा है कि कानून व्यवस्था से निपटने के लिये पुलिस की यह रणनीति, चाहे वह राजनीतिक दबाव के कारण हो या किसी अन्य स्वार्थ के वशीभूत, कानून व्यवस्था को तो और खराब करेगी ही, साथ ही पुलिस की साख और क्षवि पर ऐसा बट्टा लगा देगी, जिससे उबरने में बहुत समय लग जायेगा। सरकार को भी, तमाम राजनीतिक और आर्थिक एजेंडे के बीच यह ध्यान रखना होगा कि, जब तक कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक नही रहती है, तब तक किसी भी प्रकार के आर्थिक, सामाजिक औऱ भौतिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है। जिस चौराहे पर रोज रोज बवाल होता है उस चौराहे पर गोलगप्पे वाला भी अपना ठेला लगाने से मना कर देता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि कोई सरकार यह धारणा बना ले कि देश मे, किसी भी मसले पर कोई जन अंसन्तोष, कभी उभरेगा ही नहीं, सर्वत्र स्वर्गिक संतोष व्याप्त रहेगा और किसी भी प्रकार का कोई आंदोलन नहीं होगा तो, यह सोच, न केवल एक अकर्मण्य शासन की पहचान है, बल्कि यह एक प्रकार से अलोकतांत्रिक और तनाशाही सोच भी है। कानून में ऐसे अंसन्तोष के उभरने की संभावना भी की गयी है और उनसे निपटने के लिये कानून भी बने है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई आदेशों में ऐसे धरना प्रदर्शन को, लोकतांत्रिक अधिकार माना है। पुलिस को प्रोफेशनल रूप से, कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये बने, उन कानूनो को ही लागू करना है, न कि ऐसा कुछ करना है जिससे वह राजनीतिक तुला पर संतुलन साधने की कोशिश में खुद को ही विवादित कर ले । 

अब यह धारणा बनती जा रही है कि, लगभग 70 दिन से चल रहे किसान आंदोलन को, जब सरकार बातचीत से हल नहीं करा पाई तो, अब वह इस आन्दोलन को, उन असामाजिक तत्वों के भरोसे खत्म कराने की कोशिश कर रही है जिनके फ़ोटो और विवरण सरकार के बड़े मंत्रियों के साथ घटना के तुरंत बाद ही सोशल मीडिया में बवंडर की तरह छा जाते हैं। सारी योजना खुल जाती है। क्या इससे सरकार की क्षवि खराब नहीं हो रही है ? हालांकि, यह भी कहा जा सकता है कि, इस तमाशे से पुलिस की साख और क्षवि पर कोई बहुत प्रभाव नही पड़ता है। क्योंकि पुलिस की साख और क्षवि तो, अब जन सामान्य में जो बन चुकी है, उसे यहां बताने की ज़रूरत नही है। हर व्यक्ति उक्त क्षवि से रूबरू है और अपनी धारणा अपने अनुभवों के अनुसार, बना ही रहा है। लेकिन सरकार और सत्तारूढ़ दल की साख और क्षवि पर ज़रूर असर पड़ रहा है। विशेषकर उस दल पर, जो खुद को अ पार्टी विद अ डिफरेंस कहती रही है।

किसानों का यह धरना एक न एक दिन  हट भी जाएगा। यह भी हो सकता है कि किसानों की मांग सरकार ले और यह भी हो सकता है कि बिना मांग पूरी कराये किसान हट जांय और अपने अपने घर चले जांय। पर इन सबके बावजूद अगर इन तीन कृषि कानूनो पर उठ रही किसानों की शंकाओं का समाधान नहीं हुआ तो यह अंसन्तोष तो बरकरार रहेगा ही। मूल समस्या, किसानों द्वारा किया जा रहा, दिल्ली का घेराव नहीं है। वह एक तात्कालिक समस्या है जो यह मूल रूप से प्रशासन से जुड़ी है। पर असल समस्या है इन कानूनों के बाद कृषि और कृषि बाजार पर इनका क्या प्रभाव पड़ेगा ? आंदोलन खत्म कराने के लिये विभाजनकारी एजेंडे और सरकार के नजदीकी गुंडों का साथ लेना एक बेहद गलत परंपरा की शुरुआत है। इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और इसके दुष्परिणाम गुंडे नही झेलेंगे, सरकार और जनता को ही झेलना पड़ेगा।

यदि किसी लोकतांत्रिक जन आंदोलन का समाधान राजनीतिक रूप से निकालने के बजाय उसे किराए के सरकारी गुंडों के द्वारा दबाया जा रहा है तो, यह सत्ता के राजनैतिक सोच और विचारधारा का दिमागी दिवालियापन तो है ही, साथ ही प्रशासनिक अक्षमता का भी प्रदर्शन है। इसीलिए मैं बार बार कहता हूं कि, सरकार में आने के बाद सरकार के मंत्री को ऐसे तत्वों से दूरी बना लेनी चाहिए और सरकार को भी चाहिए कि वह ऐसे लोकतांत्रिक आंदोलनों का राजनैतिक समाधान ढूंढे। 

यह सवाल एक पूर्व पुलिस कर्मी होने के नाते मेरे मन मे भी उठ रहा है कि, क्या कानून व्यवस्था बनाये रखने के दौरान, गुंडों का सहयोग लेना अनुचित नही है ? आज तक तो, एक भी जन आंदोलन या जन समागम नही हुआ होगा, जिंसमे अपराधी और गुंडा तत्व घुसपैठ न कर गए हों। यहां तक की धार्मिक मेलों और कुम्भ के मेले में भी चोरों और गिरहकट, लुटेरे आदि आसानी से घुसपैठ कर जाते है। गुंडों और अपराधियों की यह घुडपैठ, हो सकता है उन जनआंदोलनों से जुड़े कुछ नेताओं की मिलीभगत भी हो, और यह भी हो सकता है कि आयोजको को, गुंडों की इन घुसपैठों के बारे में पता ही न हो। यही हाल इस किसान आंदोलन में हुए हिंसा के बारे में कहा जा सकता है। शांतिपूर्ण जुलूसों में भी दुकान आदि लूटने का काम कुछ मुट्ठी भर लुटेरे ही करते है, न कि पूरा जुलूस उक्त अपराध में लिप्त होता है।

पर दिल्ली पुलिस का गुंडों और लफंगों के सहारे किसी भी आंदोलन, धरना और प्रदर्शन को तोड़ने और फिर हिंसा फैला कर उसे तितर बितर कर देने का यह नायाब आइडिया, उन्हें कहां से मिला है, यह तो वे ही जानें। पर गुंडों के बल पर न तो शांति व्यवस्था बनायी रखे जा सकती है औऱ न ही, अपराध नियंत्रित किया जा सकता है। राजनीतिक लाभ के लिए, गुंडों के एहसान पर कानून व्यवस्था को बनाये रखने के कृत्य का मूल्य, पुलिस को ही चुकाना पड़ता है। और जब यह मूल्य चुकाया जाता है तो कोई राजनीतिक आका, पुलिस के हमदर्द के रूप में दूर दूर तक नज़र नहीं आता है।दिल्ली देश की राजधानी है और वहां पर होने वाली एक एक घटना पर दुनियाभर के मीडिया की निगाह रहती है। ऐसी दशा में पुलिस को क़ानून व्यवस्था से निपटने के लिये किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े गुंडों को, अपने साथ नहीं रखना चाहिए। इसी प्रकार की गुंडा नियंत्रित या निर्देशित, अनप्रोफेशनल पुलिसिंग का कोई उदाहरण सामने आता है तो, इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस एएन मुल्ला की एक बेहद अफसोसनाक टिप्पणी भी याद आती है।

सत्ता तो बदलती रहती है। बेहद ऐश्वर्य पूर्ण साम्राज्य भी बदलते रहे हैं। पर यदि पुलिस और गुंडों की मिलीभगत भरी, यह जुगलबंदी कहीं, पुलिस की आदत बन गयी तो इसका खामियाजा सिर्फ और सिर्फ उन लोगों को भुगतना पड़ेगा जो पुलिस से विधिसम्मत कार्य की अपेक्षा रखते हैं। समाज मे आज भी ऐसे लोग अधिक संख्या में हैं जो पुलिस को साफ सुथरा और प्रोफेशनल देखना चाहते हैं। राजनीतिक लोगों की मजबूरी यह हो सकती है कि, वे गुंडों और आपराधिक तत्वों को पालें या उनकी पनाहगाह में पले। क्योंकि हमारी चुनाव प्रक्रिया अब तक अपराधियों की घुसपैठ रोक नहीं पायी है। पर एक वर्दीधारी, औऱ संविधान के प्रति शपथबद्ध पुलिस अफसर की ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती है। कानून को कानूनी तऱीके से ही लागू किया जाना चाहिए। पुलिस की निष्ठा, प्रतिबध्दता और शपथ, कानून और संविधान के प्रति है, न कि किसी सरकार के प्रति या किसी व्यक्ति विशेष के प्रति ।

पुलिस बल के राजनीतिक दुरुपयोग के बाद भी यह आंदोलन दिनों दिन मज़बूत होता जा रहा है। किसान इन तीनों कृषि कानूनों को अपने लिये  डेथ वारंट समझ रहे हैं। एक सवाल बार बार उठाया जा रहा है कि यह तो सम्पन्न किसान हैं और आंदोलन में राजनीतिक उद्देश्य से बैठे हैं। ऐसा लगता है कि कॉरपोरेट के दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती आर्थिकी के बारे में, जो उसके कारणों की तह में नहीं जाना चाहते हैं, उन्हें सम्पन्न किसानों से नफरत सी है। वे इस आंदोलन को सम्पन्न किसानों का आंदोलन बता रहे है। यह बात सच है कि इस आंदोलन में सम्पन्न किसान भी हैं। क्योंकि वे सम्पन्न किसान, यह जानते है कि, यह तीनों कृषि कानून उन्हें बर्बाद कर देंगे। लेकिन वे ही लोग जो इन सम्पन्न किसानों से नफरत कर रहे है, गिरोहबंद पूंजीपतियों की बढ़ती हुयी पूंजी से खुश हैं। लॉक डाउन के दौरान जब देश की जीडीपी माइनस - 23.9% तक गिर गयी थी और सत्ता के निकट रहने वाले अम्बानी और अडानी ग्रुप की सम्पत्तिया कई गुना बढ़ गयी। यदि यह सवाल आप के मन मे नही उठ रहा है कि जब आप सूख रहे है तो वे फल फूल कैसे रहे हैं, तो यह अचरज की बात है।

अब किसान यह समझ चुके हैं कि यह तीनों कृषि कानून उनकी सम्पन्नता, खुशहाली, बेहतर जीवन के लिए एक प्रकार से डेथ वारंट है। आज पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के खुशहाल किसान यह भी देख रहे है  कि बिहार के किसान कैसे साल 2006 के बाद से एपीएमसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के खत्म होने के बाद, विपन्नता के पंक में धँसते चले गए। बिहार की भूमि भी शस्य श्यामला है। उर्वर है। लोग भी मेहनती हैं। पर सरकार की प्राथमिकता में वे नही है। इसीलिए दिल्ली घेरे किसान,  यह नहीं होने देना चाहते कि, उनकी उपज की कीमत भी कॉरपोरेट  तय करें। मनचाही मात्रा में मनचाहे समय तक जमाखोरी कर के मुनाफाखोरी भी यही कॉरपोरेट करें और अपनी रिटेल से सामान्य व्यापारियों को बेरोजगार औऱ बेव्यवसाय कर के, हम सामान्य उपभोक्ताओं को भी, अपनी ही मर्जी पर तय किये दामों, पर सामान बेचें। यह चौतरफा शोषण होगा। एक तरफ किसानों को उनकी उपज की कीमत नहीं मिलेगी औऱ दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर सामान नहीं मिलेगा। किसान यह खतरा महसूस कर रहे है और हम उन्हें पुलिस संरक्षण में गुंडों से पिटते देख अपने अपने ख्वाबगाह में अशनि संकेत के बावजूद, अफीम की पिनक में हैं !

आज कॉरपोरेट, सरकार नियंत्रित कर रहे हैं, कल यह उपज की कीमत नियंत्रित करेंगे। परसों पूरा बाजार उनके कब्जे में होगा। कॉरपोरेट नियंत्रित  मीडिया से इन्होंने देश के लोगों का दिमाग तो नियंत्रित करना शुरू ही कर दिया है। सरकार की इतनी हिम्मत भी शेष नही है कि वह एक भी ऐसा कदम उठाए जो इन कॉरपोरेट के हित के विरुद्ध हो और जनता के हित मे हो। सरकार समर्थक मित्रो की तो अब यह भी हैसियत नहीं है कि वह सरकार से यह भी पूछ सके कि कोरोना आपदा से निपटने के लिये 20 लाख करोड़ के पैकेज का लाभ किस जनता को मिला औऱ कितना मिला है।

पिछले कई सालों से ऐसी घटनाएं घट रही है जिनके कारण, दिल्ली पुलिस के कई फैसलों पर न सिर्फ पुराने और अनुभवी पुलिस अफसरों ने सवाल उठाए हैं, बल्कि अदालत ने भी तीखी टिप्पणियां की है। एक टिप्पणी के काऱण तो दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज साहब का तबादला भी रातोरात कर दिया गया। अभी 2019 में सरकार के दुबारा आने के बाद भी, जबकि अभी दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं, दिल्ली में दो बार दंगे भड़क उठे। गणतंत्र दिवस के समारोह, बीटिंग रिट्रीट के समय, इजरायल दूतावास में बम धमाका हो गया है। बार बार इंटरनेट बंद करना पड़ रहा है। अब तो एक राज्य हरियाणा में पूरा इंटरनेट बंद कर दिया गया है। रेड एलर्ट की तमाम सतर्कताओ के बीच, उपद्रवी लाल किला पहुंच गए। उन्होंने वहां अपनी मनमानी और हिंसा की, 400 पुलिसजन घायल हुए, और उन उपद्रवियों के खिलाफ आज तक कोई प्रभावी कार्यवाही तक नहीं की गयी। औऱ अब पुलिस संरक्षण में सत्तारूढ़ दल के अराजक तत्वो द्वारा किसानों पर पथराव की घटना ने, दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली और नेतृत्व पर स्वाभाविक  सवाल खड़े कर दिये हैं। पुलिस की जिम्मेदारी राजनीतिक दल, सत्तारूढ़ दल और सरकार के राजनीतिक दलीय एजेंडे को पूरा करना नहीं है बल्कि हर परिस्थिति में कानून को कानूनी तरह से ही लागू करना है। हो सकता है यह स्थिति सरकार के लिये कभी कभी असहजता उत्पन्न कर दे, पर पुलिस को ऐसे ही मुश्किल भरे लहरों से खुद को निकालना होता है। 

पुलिस के बल प्रयोग और भाजपा के कुछ नेताओं की गुंडई से, किसान आन्दोलन की सड़क भले ही खाली हो जाय, पर उत्तर भारत और कुछ हद तक देश भर के गांवों में जो आक्रोश पनप रहा है, उसे कम होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। यदि वह आक्रोश इसी प्रकार बढ़ता रहा तो, उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा। या तो रोज रोज ऐसे ही हंगामे होंते रहेंगे, जिससे,  प्रशासन तथा पुलिस पर अनावश्यक दबाव पड़ेगा या फिर यह चिंगारी और दूर तक फैलती  जाएगी। 

आंदोलन और असंतोष तथा आक्रोश में अंतर है। आंदोलन उस आक्रोश और असंतोष की अभिव्यक्ति है। यह तात्कालिक रूप या प्रतिक्रिया है। लेकिन असंतोष और आक्रोश अभिव्यक्ति, नहीं भाव होता है। वह कुछ कारणों से उपजता है। उन कारणों का निदान या समाधान जब तक नही होता है, वह पनपता रहता है और जैसे और जहां ही उसे अवसर मिलता है, वह मुखर हो जाता है। इस आंदोलन के आयोजकों को अब भी गांधी के आंदोलन के आजमाए नुस्खे को छोड़ना नहीं चाहिए। उस नुस्खे ने दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य को नष्ट किया है। अब यह लड़ाई धर्म के आधार पर बंटवारे की सोच और फर्जी राष्ट्रवाद तथा गांधी की सोच और, संविधान की मूल आत्मा के बीच है। 

आज जो इस आंदोलन के खिलाफ, पुलिस को लाठी चलाने के लिये उकसा रहे है, वे सब यह समझ नहीं पा रहे हैं कि, वे एक ऐसे भयावह भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहां कानून को कानूनी रूप से लागू करने के लिये गठित, कार्यपालिका का यह सबसे महत्वपूर्ण तंत्र, एक संगठित गिरोह में बदल कर रह जायेगा। कहाँ तो सरकार से उम्मीद थी कि, वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, पुलिस सुधार कार्यक्रमों को लागू कर एक विधिपालक और अनावश्यक स्वार्थी राजनीतिक दबावों से मुक्त पुलिस बल विकसित करती पर यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार खुद ही एक राजनीतिक एजेंडा ओरिएंटेड पुलिस को प्रश्रय दे रही है। पुलिस के वरिष्ठ अफसरों को स्वतः पुलिस के इस स्वार्थी राजनीतिकरण के विरुद्ध सचेत और सजग रहना होगा। एक अच्छे और सबल नेतृत्व का यह तकाज़ा है और उनके समक्ष एक गंभीर चुनौती भी। 

( विजय शंकर सिंह )