Thursday, 13 July 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, यादों की बारात का अंश (13) दिल्ली आगमन और कलीम, अखबार का संपादन / विजय शंकर सिंह

जोश, स्वाधीनता संग्राम के दौरान, कभी जेल नही गए और न ही वे कभी इंडियन नेशनल कांग्रेस के पदाधिकारी रहे। लेकिन इसके बावजूद, जोश, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, सरोजनी नायडू आदि से निजी तौर पर जुड़े रहे। नेहरू से तो उनका पारिवारिक नाता था। वे अपने पिता के साथ, जब इलाहाबाद गए तो, नेहरू के ही मेहमान बने। इन्ही महान शख्शियतों में से एक कवि थीं, सरोजनी नायडू। जन्म से बंगाली पर शादी, हैदराबाद के एक चिकित्सक, डॉ. एमजी नायडू के साथ होने से सरोजनी चट्टोपाध्याय, सरोजनी नायडू हो गई। सरोजनी नायडू, अंग्रेजी में कवितायेँ लिखती थीं और वे गांधी तथा जिन्ना की करीबी भी थीं। जिन्ना की पारसी पत्नी, रत्ती से, उनकी दोस्ती थी, हालांकि, रत्ती, सरोजनी की बेटी पद्मजा के उम्र की थी। शीला नायडू की किताब, मिस्टर एंड मिसेज जिन्ना में, सरोजनी नायडू के हवाले से, रत्ती - जिन्ना संबंधों पर अच्छी सामग्री दी गई है। 

सरोजनी नायडू ने ही, जोश की प्रसिद्ध नज़्म, तुलु ए सहर, का अंग्रेजी अनुवाद, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को सुनाया था और टैगोर ने, इस कविता को सुन कर, जोश की प्रशंसा भी की थी, उनका हौसला भी बढ़ाया था, और जोश को शान्तिनिकेतन में कुछ दिन रहने का आमंत्रण भी दिया था। जोश, शांतिनिकेतन, गए भी थे, और उन्होंने कुछ समय, वहां बिताया भी था। सरोजनी नायडू को जब, जोश के दर दर भटकने की खबर मिली तो वे, जोश की मदद के लिये आगे आईं और, जोश को, दिल्ली से एक उर्दू अखबार निकालने का प्रस्ताव दिया। अखबार के लिए, धन की व्यवस्था भी उन्होंने की और आगे भी जरूरी मदद का वादा भी किया। जोश ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और अखबार निकला। पर उस अखबार का भी हश्र बहुत अच्छा नहीं हुआ। 

आगे, उन्ही के शब्दों में पढ़ें...
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दिल्ली पहुंचा तो मिसेज़ नायडू बरस पड़ी कहने लगी, "जरा उसका नाम तो बताइए, जिसने आपको यह खबर दी कि सरोजनी मर चुकी है। मैंने हैरान होकर पूछा, "यह आप क्या कह रही है?" उन्होंने कहा, "यह में इसलिए कह रही हूँ कि अगर आप मुझे जिन्दा समझते तो सीधे मेरे पास आकर अपनी विपदा कहते।" अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि अगर घोष मुझे न लिखते तो यह पता ही न चलता कि आप धौलपुर में अपने किसी दोस्त रूप सिंह के पास ठहरे हुए हैं।

मैंने क्षमा-याचना के लिए लब खोले ही थे कि उन्होंने कहा, "मैं आपके टैम्प्रामेंट (मिज़ाज) से वाक़िफ़ हूँ, कुछ न कहिए। मेरे सोने के कमरे में जाइए। तकिए के नीचे एक बड़ा-सा लिफाफा रखा हुआ है, उसे खोले बगैर अपनी जेब में रख लीजिए। जरा सँभाल कर रखिएगा ताकि गिर न जाए। अब आपका काम यह होगा कि दिल्ली से एक नीम अदबी और नीम सियासी रिसाला निकालेंगे और किसी रियासत की तरफ मुड़कर भी नहीं देखेंगे। में इश्तहार भी दिला दूंगी।"

मैं रिसाले का नाम 'काखे बुलंद रखना चाहता था। मेरे दोस्त जुल्फिकार अली बुखारी ने राय दी कि यह नाम मुश्किल है, मैं रिसाले का नाम कलीम रखूं। मैंने यह राय मान ली।

रिसाला निकालना तिजारती मामला है। मेरी सात पीढ़ी भी तिजारत से वाक़िफ़ न थी इसलिए शुरू शुरू ही में बहुत- सा रुपया बरबाद हो गया। इसके साथ मेरे दिल्ली के दोस्तों ने मुझे घेर लिया। रोज़ बोतलें खुलने और दावतें उड़ने लगीं। कातिबों, कागजवालों, ब्लॉकसाजों और छापखानेवालों ने भी यह समझकर कि मैं सर से पाँव तक बेवकूफ़ आदमी हूँ, मुझे दोनों हाथों से लूटना शुरू कर दिया, जिसका नतीजा यह निकला कि अभी दूसरा पर्चा छपा नहीं था कि तमाम रुपया ख़त्म हो गया।

शर्म आई कि मिसेज़ नायडू से यह बात कैसे कहूं और सोचने लगा कि, अब क्या किया जाए। अभी कोई बात समझ में नहीं आई थी कि, बीमार पड़ गया। बुखार इस कदर तेज आया कि, हवास गुम हो गए और नजला इस कदर शदीद हुआ कि तमाम सीना रुँघकर रह गया। साँस भी रुक-रुककर आने लगी और मैं समझा कि अब बच नहीं सकूँगा।

मैं फतहपुरी के क्राउन होटल में ठहरा हुआ था। एक पर्चे पर मैंने मिसेज़ नायडू और जवाहरलाल का नाम लिखा और कराहता हुआ नीचे आया। मैनेजर को वह पर्चा देकर कहा, "अगर मैं मर जाऊ तो फ़ौरन इन दोनों को ख़बर कर दीजिएगा। मैनेजर बेहद घबराया। वह दौड़ा हुआ गया और डॉक्टर सैयद नासिर अब्बास को, जिनका दवाखाना वहाँ से दस कदम पर था, अपने साथ ले आया। डॉक्टर साहब पहले से मुझे जानते थे। मेरे सीने का मुआइना किया और दवाखाना जाकर अपने आदमी के साथ दवाएं भेज दीं।

दवाएँ पीकर अभी लेटा हुआ अपनी बेकसी पर गौर और अपनी मौत की आमद का इंतजार कर रहा था कि आहट महसूस हुई। पंडित शिवनारायण, जिनका छापाखाना होटल से मिला हुआ था और जिन्हें मतलबी फरीदाबादी मुझसे मिला चुके थे, कमरे में दाखिल हुए। मैंने कहा, "आइए शिवनारायण साहब, अफ़सोस कि मैं उठ नहीं सकता। आप मेरे सिरहाने बैठ जाएँ। " मिजाज पुरसी के बाद उन्होंने कहा, "जोश साहब, मुझे अन्दाज़ा हो गया है कि आप रिसाला नहीं निकाल सकते। मैं कारोबारी आदमी हूँ, मेरा अपना छापाखाना है; इसलिए अगर आप पसन्द करें तो मैं आपका पचास फीसदी हिस्सेदार हो जाऊँ। कलम आपकी चलेगी और रुपया में लगाऊंगा। जब तक रिसाला चलने न लगे पाँच सौ रुपये महीना आपको पेशगी देता रहूँगा। "मुझे और क्या चाहिए था, उनकी यह तजवीज़ फ़ौरन मंजूर कर ली।

दो-चार दिन के अन्दर पं. शिवनारायण ने होटल के सामने ही दो कमरों और खुले सेहन का फ्लैट, दफ़्तर और मेरी रिहाइश के वास्ते किराये पर ले लिया। मैं होटल से वहाँ उठ आया।

कुछ रोज़ के बाद जब मैंने उनसे कहा कि, मैं अपनी बीवी को भी यहां ले आना चाहता हूँ तो, उन्होंने करोलबाग में एक कोठी किराये पर लेकर उसे फर्नीचर से आरास्ता कर दिया। मैं धौलपुर जाकर बीवी को ले आया, जिससे यह कोठी आबाद हो गई। कलीम अच्छा खासा चलने लगा, माकूल आमदनी होने लगी। मेरी नज़्मों के दो संकलन भी छप गए। हैदराबाद से इताबी वज़ीफ़ा भी जारी हो गया और जिन्दगी चैन से गुज़रने लगी।

साल-दो साल आराम से गुज़रने के बाद मेरी जिन्दगी फिर एक संकट की जानिब मुड़ गई। एक रोज़ शाम के वक्त शिवनारायण खुश्क चेहरे के साथ आए और कलीम से अपनी दस्तबरदारी का ऐलान करके कह दिया कि कल से आप अपना पर्चा खुद संभालें।

यह सच है कि, शिवनारायण ने अपने भाइयों के दबाव में आकर यह बात की थी, मगर उनका यह इखलाकी फर्ज था कि वह मुझे कम से कम तीन महीने का नोटिस देते। लेकिन उन्होंने सिर्फ बारह घंटे का नोटिस देकर अलहदगी अख्तियार कर ली। मैं सीधा अपने पड़ोसी महमूद अली ख़ाँ जामई के पास पहुँचा और कलीम का कारोबार उनके सुपुर्द कर दिया। लेकिन जब एक महीने के बाद उन्होंने कलीम की आमदनी के सिर्फ नब्बे रुपये मेरे हवाले किए तो मैं दंग रह गया। मैं उनसे, कुछ कह न सका।

जब और कोई सूरत नज़र न आई तो मैने मिस्टर पानीक्कर को ख़त लिखा और उन्होंने तार भेजकर मुझे पटियाले बुला लिया और महाराजा पटियाला भूपेंद्रसिंह से मिलवाकर मेरा वज़ीफ़ा मुकर्रर करा दिया। अब दिल्ली आकर मैंने महमूदअली खाँ से रिसाला निकाल लिया और करोलबाग से दरियागंज उठ आया एक कोठी 'आदित्य भवन किराये पर लेकर ख़ुद रिसाला निकालने लगा। हकीम आज़ाद अन्सारी मेरा हाथ बँटाने लगे और हैरत है कि मेरी बीवी भी कलीम के कारोबार में मेरी मदद करने लगी। कलीम साज-सज्जा और विषय-वस्तु दोनों हैसियतों से दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा। पानीक्कर, जोश के मित्र और महाराजा पटियाला के सेक्रेटरी थे। मैने उसी जमाने में अपनी चचेरी बहन के बेटे अल्ताफ़ अहमद ख़ाँ से अपनी बेटी सईदा की धूमधाम से शादी भी कर दी।

कलीम की तरक्की ने मेरे बहुत-से दुश्मन भी पैदा कर दिए थे ऐसा क्यों न होता? फ़िरंगी हुकूमत से बग़ावत, सरमाएदारी का विरोध, समाजवाद का प्रचार और कांग्रेस की तरफदारी। नतीजा यह कि कांग्रेस के गुलामी परस्त मुखालिफ़ीन, मुस्लिम लीग के खिताब याफ्ता' मुजाहिदीन और हुकूमत के टुकड़ों और वजीफों पर पलने वाले हुक्काम और उल्माए - कराम लंगर-लंगोटे बाँधकर अखाड़े में उतर आए। उधर पलटने थीं और इधर मैं अकेला।

आए दिन मेरे खिलाफ कुछ के फतवे निकला करते और क़त्ल की धमकियों के गुमनाम खत आया करते थे। खुफ़िया पुलिस साये की मानिंद मेरे पीछे लगी रहती थी। बीवी चिल्लाती रहती थीं कि अरे मुँहअंधेरे टहलना छोड़ दो। न जाने कौन अँधेरे में पीछे से आकर छुरी मार दे। लेकिन मैं हर रोज़ तारों की छाँव में एक मोटा-सा डंडा लेकर जमुना के किनारे बड़े इत्मीनान से टहला करता था कि आख़िर में भी आफरीदी पठान हूँ, दो-चार को मारकर मरूंगा।
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दिल्ली भी जोश को, स्थायित्व नहीं दे पाई। कलीम अखबार निकला और ठीक ठाक चला भी। जोश को आमदनी भी होने लगी और जिंदगी में एक बेहतर ठहराव भी आया। पर तरक्की, दोस्त कम, दुश्मनी और मतलबी यार अधिक पैदा करती है। दिल्ली भी लम्बा सुकून नहीं दे सकी। जोश को, न तो चैन, निजाम के हैदराबाद में मिला और न ही देश की राजधानी दिल्ली में। जोश का तरक्कीपसंद मिजाज, यहां भी आड़े आ गया था। तब तक आजादी और साथ ही साथ, देश के बंटवारे की बात हवा में तैरने लगी थी। रह रह कर, उन्हे मलीहाबाद भी याद आता पर, मलीहाबाद तो, एक अरसा हुआ उन्हे छोड़े हुए। कुल मिला कर उनकी जिंदगी, कुछ कुछ अनिश्चित सी, दुबारा गुजर रही थी। जिंदगी जब 'यूं ही' गुजरने लगती है, तो जो कष्ट और अवसाद देती है, वह तो भुक्तभोगी ही जान सकता है। 
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

'जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, यादों की बारात का अंश (12) दतिया और धौलपुर में दर बदर घूमते टहलते, जोश / विजय शंकर सिंह '
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कुकी मैतेई विवाद का इतिहास और मणिपुर हिंसा / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हिंसा मामले में दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि, कानून व्यवस्था का मामला, राज्य का दायित्व है और सुप्रीम कोर्ट इस पर सिवाय निर्देश जारी करने के कुछ नहीं कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट अपने इस वक्तव्य में निश्चित रूप से अपनी सीमाओं को निर्धारित करते हुए, यह बात कह रही है। कानून और व्यवस्था, निश्चित रूप से राज्य की जिम्मेदारी है और इस जिम्मेदारी के वहन हेतु, पुलिस, अर्ध सैनिक बल, और सेना, उसके पास है और साथ ही कानूनी शक्तियां भी, राज्य को कानूनन मिली हैं। शीर्ष न्यायालय ने आगाह भी किया कि, अदालती कार्यवाही को हिंसा बढ़ाने के लिए एक मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और वकीलों से विभिन्न जातीय समूहों के खिलाफ आरोप लगाने में संयम बरतने को कहा।  मणिपुर राज्य द्वारा दायर नवीनतम स्थिति रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने याचिकाकर्ताओं से स्थिति को कम करने के लिए "ठोस सुझाव" लाने के लिए कहा और मामले को आगे के विचार के लिए कह दिया।  

लेकिन, यह भी एक विडंबना है कि, मणिपुर हिंसा का वर्तमान मामला,  मणिपुर हाईकोर्ट के एक फैसले का परिणाम है। हुआ यह कि, मणिपुर उच्च न्यायालय की सिंगल जज पीठ में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एम.वी. मुरलीधरन ने, एक याचिका की सुनवाई के बाद राज्य सरकार को एक विवादित आदेश के माध्यम से, निर्देश दिया था कि "राज्य अनुसूचित जनजातियों की सूची में मेइती समुदाय को शामिल करने की सिफारिश करने पर विचार करे।" मणिपुर हिंसा का वर्तमान मामला, मणिपुर हाईकोर्ट के उसी फैसले का परिणाम है। उक्त आदेश के ही कारण, मणिपुर मौजूदा अशांति से जूझ रहा है।  जबकि, इस मसले का समाधान राजनीतिक और विधायिका द्वारा किया जाना चाहिए था, न कि न्यायालय द्वारा।

इसकी अपील पर, सुनते हुए, सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने, 8 मई 2023 को, यह टिप्पणी की कि "मणिपुर के उच्च न्यायालय के पास राज्य सरकार को अनुसूचित जनजाति सूची के लिए एक जनजाति की सिफारिश करने का निर्देश देने का अधिकार नहीं है।"  

सुप्रीम कोर्ट की उक्त पीठ, मणिपुर से संबंधित, दो याचिकाओं पर विचार कर रही थी, एक, मणिपुर ट्राइबल फोरम दिल्ली द्वारा दायर याचिका, जिसमें हिंसा की एसआईटी जांच और पीड़ितों के लिए राहत की मांग की गई है, और दूसरी, मणिपुर की पहाड़ी क्षेत्र समिति (HAC) के अध्यक्ष, डिंगांगलुंग गंगमेई द्वारा दायर एक अन्य याचिका, जिसमें, मणिपुर उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती देते हुए कि, केंद्र सरकार को अनुसूचित जनजाति सूची में मेइती समुदाय को शामिल करने की सिफारिश को आगे बढ़ा दिया जाए। उल्लेखनीय है कि मेइती को एसटी दर्जे से जुड़े मुद्दे पर ही, मणिपुर में, दंगे भड़क रहे हैं।

हिल एरिया कमेटी के अध्यक्ष, गंगमेई ने अपनी याचिका ने यह तर्क दिया है कि, "किसी राज्य सरकार को अनुसूचित जनजाति ST सूची में किसी समुदाय को एक जनजाति के रूप में शामिल करने का निर्देश देने या सिफारिश करने का अधिकार, उच्च न्यायालय को नहीं है।" इस प्रकार, मणिपुर हाईकोर्ट ने, ऐसा निर्देश देकर, अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। ऐसे अनाधिकृत निर्देश का ही परिणाम है कि, आज मणिपुर जल रहा है और वहां की कानून व्यवस्था, संविधान के अनुच्छेद 355 के अंतर्गत फिलहाल केंद्राधीन है। 

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने सुनवाई के दौरान कहा कि, "सुप्रीम कोर्ट के ऐसे कई फैसले हैं, जिनमें कहा गया है कि हाई कोर्ट किसी समुदाय को एसटी का दर्जा देने का कोई निर्देश नहीं दे सकता है।" 
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने, इस पर कहा कि, "याचिकाकर्ता को, जब हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही थी, तो, सुप्रीम कोर्ट के ऐसे, निर्णयों को, उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट के यह निर्णय, हाईकोर्ट के लिए बाध्यकारी हैं। और हो सकता है, यदि ऐसा किया गया होता तो, हाईकोर्ट का ऐसा फैसला नहीं आता।" 

मुख्य न्यायाधीश ने एडवोकेट हेगड़े से, यह भी कहा, "आपने हाईकोर्ट को कभी नहीं बताया कि उसके पास यह शक्ति नहीं है। यह राष्ट्रपति की शक्ति है।"  सीजेआई चंद्रचूड़ ने महाराष्ट्र राज्य बनाम मिलिंद मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि "राज्य सरकारें या अदालतें या न्यायाधिकरण या कोई अन्य प्राधिकरण अनुच्छेद 342 के खंड (1) के तहत जारी अधिसूचना में निर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची को संशोधित, या बदल नहीं सकते हैं।"

हिल एरिया कमेटी के याचिकाकर्ता, गंगमेई द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि इस आदेश के परिणामस्वरूप मणिपुर में अशांति फैल गई है, जिसके कारण 60 लोगों की मौत हुई है और व्यापक स्तर पर लोगों का नुकसान हुआ है।" याचिका के अनुसार, "दिए गए आदेश के कारण दोनों समुदायों के बीच तनाव हुआ और राज्य भर में हिंसक झड़पें होने लगीं जो अब भी हो रही हैं। इसके परिणामस्वरूप अब तक साठ से अधिक, आदिवासी मारे गए हैं। राज्यों में विभिन्न स्थानों को अवरुद्ध कर दिया गया है  इंटरनेट पूरी तरह से बंद है और  मरने वालों की अधिक लोगों को अपनी जान गंवाने का खतरा है।" उल्लेखनीय है कि, मरने वालों की संख्या अब लगभग सवा सौ के पार हो चुकी है। 

इससे स्पष्ट है कि, मेइती समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का निर्णय एक राजनीतिक निर्णय या कोई राजनीतिक चुनावी वादा है या नही, बिना इस विषय पर विचार किए यह कहा जा सकता है कि, फिलहाल तो यह अशांति हाईकोर्ट के ऐसे आदेश का परिणाम है, जो उसके क्षेत्राधिकार के बाहर दिया गया है। अनुसूचित जाति जनजाति में शामिल करने या उसकी समीक्षा करने का अधिकार आयोग की सिफारिश पर सरकार और सरकार के अनुरोध पर राष्ट्रपति को है, न कि, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को। जिस तरह से हाईकोर्ट  में यह मामला उठाया गया और हाईकोर्ट को, सुप्रीम कोर्ट की उन रुलिंग्स से अवगत नहीं कराया गया, से यह संकेत मिलता है कि, इस याचिका का उद्देश्य राजनीतिक था और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अदालत के कंधे पर बंदूक रखी गई है। अभी सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं की सुनवाई चल रही है।

अब इस प्रकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझते है। मणिपुर में मैतेई, नागा और कुकी समूहों के बीच तीन-तरफा जातीय संघर्ष का एक इतिहास रहा है, जो ब्रिटिश काल और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917-19 के एंग्लो-कुकी युद्ध के बाद से ही शुरू हो चुका था। मणिपुर एक जनजातीय क्षेत्र है और ब्रिटिश काल में ईसाई मिशनरियां वहां काफी सक्रिय रहीं और ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार भी हुआ। वर्तमान, मणिपुर हिंसा को 'ईसाइयों पर हमले' के रूप में वर्णित करने वाली खबरें भी खूब सुर्खियों में,  नियमित रूप से छपती रहीं, हिंसा के आंकड़ों के अनुसार, 100 से अधिक चर्चों और कुछ मंदिरों पर हमला किया गया है।  यह धार्मिक विवाद,  मणिपुर के जटिल जातीय संबंधों और भूमि प्रबंधन प्रणालियों से उत्पन्न दशकों पुराने जातीय संघर्ष को सांप्रदायिक रंग देता है।  

उत्तर पूर्वी सामाजिक अनुसंधान केन्द्र के निदेशक, वॉल्टर फर्नांडिस ने, एक शोध परक लेख, मणिपुर के जातीय समीकरण पर लिखा है। उनके द्वारा लेख में दिए गए तथ्यों के अनुसार, "राज्य में तीन मुख्य जातीय परिवार हैं। मुख्य रूप से ईसाई नागा और कुकी आदिवासी और ज्यादातर हिंदू, गैर-आदिवासी मैतेई, जो घाटी में मणिपुर की 10% भूमि पर रहने वाली 2.86 मिलियन आबादी (2011 की जनगणना) का 53% हैं।  पहाड़ियों की 90% भूमि पर रहने वाली 40% आबादी जनजातियों की है।" हालाँकि, आदिवासी भूमि में अधिकांश वन क्षेत्र शामिल हैं जो, राज्य के भूभाग का 67% हैं।  मैतेई लोगों की शिकायत है कि वे पहाड़ी इलाकों में जमीन के मालिक नहीं हो सकते, जबकि आदिवासी घाटी में जमीन के मालिक हो सकते हैं;  वे इस प्रकार इस व्यवस्था को अन्यायपूर्ण बताते हैं।  

जनजातियाँ इस आरोप का, इस तर्क के साथ खंडन करती हैं कि "मैतेई लोगों का राज्य में नौकरियों के साथ-साथ आर्थिक और राजनीतिक शक्ति पर एकाधिकार है और वे, जो कुछ भी, उनके पास है उससे अधिक भूमि पर दावा नहीं कर सकते हैं।" वास्तविकता यह भी है कि, कुछ गरीब मैतेई परिवार पहाड़ियों में रहते हैं और कुछ संपन्न आदिवासी परिवार घाटी में रहते हैं। घाटी स्थित नेता आवश्यक रूप से गरीबों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं लेकिन जमीन का मुद्दा, इस संघर्ष के केंद्र में बना हुआ है।

भू असमानता के इन विवादों के समाधान हेतु, लपहाड़ों में भूमि-स्वामित्व की प्रकृति को बदलने के लिए कानूनी उपाय करने का प्रयास भी किया गया। लेकिन, जनजातियों ने इन प्रयासों का विरोध किया। जनजाति, अपने लिए, संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण की मांग कर रहे हैं और उन्हें, संविधान के अनुच्छेद 371सी के तहत कुछ रियायतें दी भी गई हैं। अपने हक के लिए, जनजातियों का, संघर्ष पहले से ही चल रहा था, लेकिन धीरे धीरे, यह राजमार्ग अवरोधों, हड़तालों और सामूहिक रूप से बंद के रूप में उग्र होता गया। इसके अलावा, यह एक प्रकार का, त्रिकोणीय संघर्ष है। नागा और कुकी जनजातियां, राज्य के उन कदमों का विरोध करने के लिए, एक साथ हो जाती हैं, जो कदम, उन्हे लगता है कि, मैतेई के हित में उठाए गए हैं। 

कूकियो का विवाद, ब्रिटिश हुकूमत से भी रहा है। अंग्रेजो ने, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, कूकियों को ब्रिटिश सेना के कुली के रूप में, भर्ती कर यूरोप ले जाने की योजना बनाई थी, जिसे, कूकी जनजाति के नेताओं ने विफल कर दिया था। इसके कारण, जब ब्रिटिश सेना ने उन पर हमला किया तो युद्ध की स्थिति बन गई। इतिहास में, इसे 1917-19 के एंग्लो-कुकी युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में, कूकी जनजातियों की पराजय हुई, और इस हार के बाद, ब्रिटिश शासन ने उन्हें, उनकी भूमि से बेदखल कर दिया। साथ ही, ब्रिटिश ने, पूरे पूर्वोत्तर में यह बात फैला दी कि, कूकी  खानाबदोश कबीले हैं, जो अन्य जातियों/ जनजातियों की भूमि पर कब्ज़ा करते रहते हैं।  अधिकांश लोग आज भी इस ब्रिटिश कालीन धारणा पर विश्वास करते हैं और यह भी मानते हैं कि, कूकी, शरणार्थी हैं और इनका भूमि पर कोई अधिकार नहीं है। इसी कारण, जब कूकी,  भूमि पर अपने अधिकारों को मान्यता देने की बात करते हैं तो, अन्य समुदाय इनका विरोध करते हैं। यह विरोध, मणिपुर के अंतर्जातीय संबंधों को और अधिक जटिल बना देता है।

इसी लिए, कुछ मैतेई नेताओं ने सोचा कि आदिवासी भूमि तक पहुंच पाने का एकमात्र  तरीका, मैतेई समुदाय को, आदिवासी अनुसूची में शामिल करा लेना है। इसी मुद्दे पर, मैतेई समाज ने, मणिपुर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। जिसके फैसले के बाद, यह हिंसा भड़क उठी है। इसी बीच, 26 अप्रैल को, राज्य सरकार ने चूड़ाचांदपुर जिले में कुछ कुकी परिवारों को उनकी भूमि से बेदखल करने के लिए 1966 की सीमा अधिसूचना का इस्तेमाल, यह तर्क देते हुए किया कि, यह वन भूमि थी। कुकियों पर यह भी आरोप लगाया गया कि कुकी लोग, अफीम  की खेती कर रहे थे। लेकिन राज्य सरकार ने पोस्ते की खेती करने वाले,  मास्टरमाइंड नेताओं को नहीं छुआ, बल्कि आम कुकियो पर कार्यवाही कर दी। इन घटनाओं ने, विवाद और हिंसा की शुरुआत कर दी। कुकियों ने, इसे अपने दमन के रूप में लिया और फिर तो, मणिपुर जलने ही लगा। 

वॉल्टर फर्नांडिस के लेख के अनुसार, 'तीन विशेषताएं, मणिपुर के वर्तमान जातीय संघर्ष को, वहीं के, पिछले संघर्षों से, अलग करती हैं। 

० पहला, हालांकि नागा और कुकि जनजाति समाज ने मैतेई को, जनजातीय दर्जा दिए जाने के कदम का विरोध करने के लिए, आपस में, हाथ मिलाया, लेकिन, मैतेई समुदाय के हमले, कुकियों पर ही हुए। वॉल्टर कहते हैं, "ऐसा प्रतीत होता है कि नागाओं को भड़काने और इसे नागा-कुकी संघर्ष में बदलने का प्रयास किया गया लेकिन वे असफल रहे।"  

० दूसरा, पहली बार, झगड़े को सांप्रदायिक रंग देने के लिए धार्मिक स्थलों पर हमला किया गया। यह एक नया ट्रेंड देखा गया, जो अमूमन, नॉर्थ ईस्ट में, असम को छोड़ कर कहीं नहीं दिखा था। 

० तीसरा, प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि चर्चों पर हमला करने के लिए युवकों के गिरोह इम्फाल से लगभग 50 किलोमीटर दूर मोटरसाइकिलों पर आए थे। इसके अतिरिक्त, प्रतिशोध में कुकी महिलाओं के साथ बलात्कार को उचित ठहराने के लिए निराधार अफवाहें फैलाई गईं कि चूड़ाचांदपुर में कुछ मैतेई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था।

हाईकोर्ट का फैसला, और मीडिया रिपोर्ट्स जो इन घटनाओं के बारे में नियमित आ रही हैं से, यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि, वर्तमान संघर्ष सुनियोजित, वित्तपोषित और सत्ता में बैठे लोगों द्वारा क्रियान्वित किया गया था और किया जा रहा है। हिंसा के ज्यादातर मामलों में सुरक्षा बल मूकदर्शक बने रहे। वॉल्टर फर्नांडिस उद्धृत करते हुए, "गौरतलब है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने कहा है कि कुकी उग्रवादी संघर्ष में शामिल नहीं थे।  लेकिन अगर स्थिति जारी रहती है, तो यह उग्रवादियों को हस्तक्षेप करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।" 

हालांकि, कई वर्षों से, तीनों समुदायों के नागरिक संगठनों ने जातीय समूहों के बीच, आपसी बातचीत को सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया है।  लेकिन पिछले कुछ सालों में, ऐसे स्वयंस्फूर्त प्रयासों को हतोत्साहित कर,  उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। उनकी जगह, हिंसक समूहों को तरजीह मिली और उनके पनपने से, जातीय विभाजन की प्रक्रिया तीव्र हुई। लेकिन, प्रत्यक्ष रूप से, अदालती मामले, बेदखली, संघर्ष और बातचीत के टूटने के बीच एक संबंध तो है ही।

हर विवाद में कुछ रोशनी की किरण भी होती है। एक वास्तविकता यह भी है कि, सभी मेइती, इस संघर्ष में शामिल नहीं हैं। उनके कई नेता और विचारक इस हिंसा और विवाद के विरोध में भी सामने आये हैं। उनमें से कुछ के घरों पर जवाबी कार्रवाई में, मैतेई उपद्रवियों ने हमला किया गया है और वे, फिलहाल छिपे हुए हैं। दूसरी तरफ, चूड़ाचांदपुर में, जब कुछ कुकी उपद्रवी, मैतेइयों पर हमला करने की योजना बना रहे थे, तो कुकी महिलाओं ने इन हमलों को रोकने के लिए एक मानव श्रृंखला बनाई और यह हमला रोक दिया। मोइरांग नामक स्थान पर, मैतेई माता-पिता और छात्र एक सशस्त्र समूह द्वारा, कुकी समुदाय पर हमले को रोकने के लिए जेसुइट स्कूल के गेट के पास खड़े थे।  ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि, यदि ईमानदारी से उभय पक्ष के बीच सुलह की दिशा में पहल किया जाय तो, इस समस्या का समाधान हो सकता है।  

यहां तक ​​कि जब संघर्ष के आयोजकों ने नागाओं को कुकी के खिलाफ करने की कोशिश की, तो कुछ नागा संगठनों और नागालैंड में स्थित कुछ राजनीतिक नेताओं ने उनके साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करने के लिए राहत सामग्री के साथ कुकी गांवों का दौरा भी किया। नागालैंड के मुख्यमंत्री ने कुकी-बहुल कांगपोकपी जिले में राहत की एक बड़ी खेप भेजी। अपने लेख में, ऐसे उम्मीद जगाने वाले, उदाहरण देते हुए, वॉल्टर फर्नांडिस लिखते हैं कि, "मणिपुर स्थित नागा संगठनों ने अभी तक कुकियों के साथ समान एकजुटता नहीं दिखाई है, लेकिन उन्होंने उनका विरोध भी नहीं किया है।  ये कार्रवाइयां आशा की किरण जगाती हैं कि नागाओं और कुकियों को एक साथ लाया जा सकता है और फिर, मैतेई लोगों के साथ बातचीत शुरू करके पुल बनाए जा सकते हैं।"

मणिपुर हिंसा मामले में सबसे आश्चर्यजनक तथ्य है प्रधानमंत्री की चुप्पी। हालांकि गृहमंत्री ने वहां का दौरा किया है, सभी दलों की बैठक भी बुलाई है, पर छोटे छोटे मामलों में भी ट्वीट करने वाले पीएम की चुप्पी हैरान करती है। हालांकि, कांग्रेस नेता, राहुल गांधी ने  मणिपुर का दौरा किया, वहां के राहत शिविर देखे, पीड़ित लोगों से संवाद भी किया। बीजेपी ने राहुल गांधी के इस दौरे को राजनीति कहा। लेकिन, झूठ फरेब, मिथ्या आश्वासनों और हिंसा  तथा विभाजनकारी मानसिकता से प्रदूषित हो रही राजनीति के बीच, राजनीति की ऐसी शैली, बहुत सुकून देती हैं और बेहतर भविष्य की उम्मीद भी जगाती हैं। लंबे समय बाद राजनीति के इस स्वरूप का स्वागत है। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है बल्कि अपने आप में ही एक समस्या है। हिंसा कभी भी केवल, सुरक्षा बलों और सेना के दम पर रोकी नहीं जा सकती है। इसका समाधान केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही संभव है।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


Tuesday, 11 July 2023

ईडी प्रमुख के सेवा विस्तार को, सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित किया / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने, आज 11 जुलाई, को कॉमन कॉज मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2021 के फैसले के आदेश का उल्लंघन करने के लिए प्रवर्तन निदेशालय के प्रमुख एसके मिश्रा के कार्यकाल को, दिए गए सेवा विस्तार को अवैध ठहरा दिया है और कहा है कि उन्हें और विस्तार नहीं दिया जाना चाहिए। हालाँकि, न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय निकाय एफएटीएफ FTF की सहकर्मी समीक्षा और सत्ता के सुचारू हस्तांतरण के संबंध में केंद्र सरकार द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें 31 जुलाई, 2023 तक अपने पद पर बने रहने की अनुमति दी। इस प्रकार, 31 जुलाई को वे रिटायर हो जायेंगे। 

शीर्ष अदालत ने केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम CVC Act और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम में किए गए संशोधनों को भी बरकरार रखा, जो केंद्र को ईडी और सीबीआई के प्रमुखों का कार्यकाल 5 साल तक बढ़ाने की अनुमति देता है। न्यायालय ने इन संशोधनों को बरकरार रखा और कहा कि जनहित में और लिखित कारण के साथ, उच्च स्तरीय अधिकारियों को सेवा विस्तार या एक्सटेंशन दिया जा सकता है।

जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ और संजय करोल की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने एसके मिश्रा की नियुक्ति के साथ-साथ केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम में हालिया संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।  याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस नेता, जया ठाकुर, रणदीप सिंह सुरजेवाला, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा और पार्टी प्रवक्ता साकेत गोखले शामिल हैं।  पीठ ने मई में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 

अदालत ने मोटे तौर पर दो मुद्दों पर विचार किया - 
पहला, संशोधनों की वैधता के संबंध में;  
दूसरा, एसके मिश्र के कार्यकाल के लिए दिए गए विस्तार की वैधता पर।
पहले मुद्दे पर, अदालत ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया, और दूसरे मुद्दे के संबंध में, न्यायालय ने माना कि, सेवा विस्तार स्पष्ट रूप से सामान्य कारण के फैसले के अनुरूप थे।

न्यायमूर्ति गवई ने फैसले के ऑपरेटिव भागों की घोषणा करते हुए कहा, "हालांकि किसी फैसले का आधार हटाया जा सकता है, विधायिका उस विशिष्ट परमादेश को रद्द नहीं कर सकती है जो आगे के विस्तार पर रोक लगाता है...यह न्यायिक अधिनियम पर अपील में बैठने के समान होगा।"  इसलिए, एसके मिश्रा को एक-एक वर्ष की अवधि के लिए विस्तार देने के 17 नवंबर, 2021 और 17 नवंबर, 2022 के आदेशों को अवैध माना गया।

इस मामले की पृष्ठभूमि इस प्रकार है ~

केंद्र सरकार, ईडी प्रमुख संजय कुमार मिश्रा के कार्यकाल को बढ़ाने के अपने फैसले को लेकर, लंबे समय तक राजनीतिक विवाद में उलझी रही है। वर्तमान ईडी प्रमुख, एसके मिश्र को,  पहली बार नवंबर 2018 में नियुक्त किया गया था। उस समय जारी हुए, नियुक्ति आदेश के अनुसार, 60 वर्ष की आयु पर जो अधिवर्षता की है, प्राप्त होने तक सेवा में रहते। हालाँकि, सरकार ने, नवंबर 2020 में, नियुक्ति आदेश को,  पूर्वव्यापी से संशोधित करते हुए, उनका कार्यकाल दो साल से बढ़ाकर तीन साल का कर दिया। 

इस आदेश के खिलाफ, कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में, इस पूर्वव्यापी संशोधन की वैधता और एसके मिश्रा के कार्यकाल को एक अतिरिक्त वर्ष के विस्तार के खिलाफ, सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि, विस्तार केवल 'दुर्लभ और असाधारण मामलों' में थोड़े समय के लिए दिया जा सकता है। एसके मिश्रा के कार्यकाल को बढ़ाने के कदम की पुष्टि करते हुए, शीर्ष अदालत ने आगाह किया कि, प्रवर्तन निदेशालय के प्रमुख को, अब कोई और सेवा विस्तार नहीं दिया जाएगा।

नवंबर 2021 में, मिश्रा के सेवानिवृत्त होने से तीन दिन पहले, भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 और केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 में संशोधन करते हुए दो अध्यादेश जारी किए गए।  दिसंबर में संसद द्वारा.  इन संशोधनों के आधार पर यह प्राविधान किया गया कि, सीबीआई और ईडी दोनों निदेशकों का कार्यकाल प्रारंभिक नियुक्ति से, पांच साल पूरा होने तक, एक बार में एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। इस प्राविधान के अनुसार, पिछले साल नवंबर में मिश्रा को एक साल का एक्सटेंशन और दे दिया गया था। उसी सेवा विस्तार को, चुनौती दी गई थी। 

केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम में हालिया संशोधन को भी कम से कम आठ अलग-अलग जनहित याचिकाओं में शीर्ष अदालत के समक्ष चुनौती दी गई थी।  याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस नेता जया ठाकुर, रणदीप सिंह सुरजेवाला, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा और पार्टी प्रवक्ता साकेत गोखले शामिल हैं।  कॉमन कॉज़ ने अपनी याचिका में कहा कि, इन अध्यादेशों द्वारा, शीर्ष अदालत द्वारा जारी निर्देशों का उल्लंघन हुआ है और सीबीआई और ईडी के निदेशकों की नियुक्ति और कार्यकाल पर केंद्र सरकार को "अनियंत्रित विवेक" प्राप्त हुआ है। इससे, कथित तौर पर, राजनीतिक दुरुपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा और जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता बाधित हो सकती है। इन तर्कों के आधार पर, इन अध्यादेशों को, सुप्रीम कोर्ट में, चुनौती दी गई थी। 

अपने जवाबी हलफनामे में, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि "याचिकाएं, परोक्ष रूप से राजनीतिक हितों से प्रेरित हैं क्योंकि वे उन राजनीतिक दलों से संबंधित याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर की गई हैं जिनके नेताओं के खिलाफ वर्तमान में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जांच चल रही है।" 
केंद्र सरकार का आरोप है कि "याचिकाएं यह सुनिश्चित करने के लिए दायर की गई हैं कि प्रवर्तन निदेशालय अपने कर्तव्यों का निडर होकर निर्वहन नहीं कर सकता है।"  
हलफनामे में यह भी कहा गया है, “याचिकाकर्ता को केवल तभी यह विश्वास होगा कि ये एजेंसियां ​​स्वतंत्र हैं यदि, ये एजेंसियां ​​उन राजनीतिक दल के राजनीतिक नेताओं द्वारा किए गए अपराधों पर आंखें मूंद लें।”

एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, फरवरी में, एमिकस क्यूरी केवी विश्वनाथन (जो अब सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए जा चुके हैं) ने न्यायमूर्ति गवई और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ को बताया कि "न केवल प्रवर्तन निदेशालय के प्रमुख को तीसरा विस्तार दिया गया है बल्कि, केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम में संशोधन, जिसमें केंद्र सरकार को कार्यकाल को एक बार में एक वर्ष तक, कुल पांच वर्ष तक बढ़ाने की अनुमति दी गई थी, अवैध था।" उन्होंने, विनीत नारायण, प्रकाश सिंह I, प्रकाश सिंह II, कॉमन कॉज़ I और कॉमन कॉज़ II के निर्णयों की लंबी, नजीर और उद्धरणों को अदालत के समक्ष रखते हुए यह राय दी थी कि, यह सेवा विस्तार आदेश और वैधानिक संशोधन अवैध हैं।"  
न केवल विस्तार अवैध है, बल्कि संशोधन भी, अवैध है। 

बहस के दौरान,  याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता के बारे में चिंता जताई और वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने टुकड़ों में केवल एक साल का विस्तार देने के आदेश को,  'गाजर और छड़ी की नीति' के रूप में वर्णित किया है। एडवोकेट  शंकरनारायणन ने समझाया, "अधिकारियों, पर एक्सटेंशन की तलवार लटकाने और उनके काम काज के आधार पर आगे एक्सटेंशन देने का निर्णय एक प्रकार से, स्टिक एंड कैरेट यानी गाजर-और-छड़ी नीति की तरह है। इस प्रकार का सेवा विस्तार पाने वाले, प्रमुख/निदेशक की अध्यक्षता वाली जांच एजेंसी, स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकती है।"

एमिकस क्यूरी, विश्वनाथन ने प्रवर्तन निदेशालय जैसे संस्थानों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के महत्व के बारे में भी, अदालत को अपनी राय दी और दृढ़ता से तर्क दिया कि "लोकतंत्र के व्यापक हित में ऐसे संस्थानों को कार्यकारी प्रभाव से अलग रखा जाना चाहिए।"  विशेष रूप से, उन्होंने पीठ से कहा, "ये एजेंसियां ​​महत्वपूर्ण काम करती हैं और इन्हें न केवल स्वतंत्रता बल्कि स्वतंत्रता की धारणा की आवश्यकता है।"

दूसरी ओर, सॉलिसिटर-जनरल ने ईडी निदेशक के कार्यकाल को बढ़ाने के सरकार के फैसले का इस आधार पर बचाव किया कि नेतृत्व में निरंतरता सुनिश्चित करना अनिवार्य था, खासकर आगामी वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) की सहकर्मी समीक्षा के मद्देनजर जो, 2023 में होने वाला है। वॉचडॉग के मानदंडों के अनुसार भारत के प्रदर्शन का मूल्यांकन इस वर्ष किया जाएगा।" 
उन्होंने यह भी बताया कि "इस मूल्यांकन के आधार पर, देशों को उनके प्रदर्शन के स्तर को इंगित करने वाली सूचियों में वर्गीकृत किया गया है, जो अंततः उन्हें विश्व बैंक और एशियाई विकास जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से न केवल वित्तीय सहायता प्राप्त करने के हकदार या वंचित होंगे।"

सॉलिसिटर-जनरल ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क का भी सख्ती से खंडन किया कि *एक-एक वर्ष की समय-समय पर विस्तार देने की नीति एक गाजर के समान होगी-  प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय जांच ब्यूरो जैसी जांच एजेंसियों के निदेशकों की आज्ञाकारिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा यह एक नियोजित रणनीति है।"
एसजी ने कहा, "यह तर्क दोधारी तलवार है। एक बार में एक साल का एक्सटेंशन देने की नीति वास्तव में यह सुनिश्चित करेगी कि अधिकारी खुद के लिए कानून न बनें, और दूसरा, ताकि वे गैर-निष्पादक न बनें।"

सभी वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस गवई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 8 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। वही फैसला आज खुली अदालत में, सुनाया गया। वैसे इस सरकार को एक्सटेंशन सरकार भी कह सकते हैं। तीन एक्सटेंशन के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के डायरेक्टर संजय मिश्र को रिटायर किया है। इसी प्रकार कैबिनेट सचिव, राजीव गौबा - 2019 से पद पर हैं और अगस्त 2023 तक, गृह सचिव, अजय भल्ला अक्टूबर 2024 तक, डिफेंस सेक्रेटरी, गिरिधर अरमने अक्टूबर 2024 तक और विदेश सचिव: विनय क्वात्रा अप्रैल 2024 तक एक्सटेंशन पर। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh

Monday, 10 July 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, यादों की बारात का अंश (12) दतिया और धौलपुर में दर बदर घूमते टहलते, जोश / विजय शंकर सिंह

जोश साहब की जिंदगी  में एक बार फिर दर-बदर का दौर शुरू हो गया था। हैदराबाद से वे रुखसत हो चुके थे, और उनकी मंजिल दतिया थी। दतिया, झांसी के नजदीक, मध्य प्रदेश की एक छोटी सी रियासत थी, वहां के दीवान ने उन्हे एक अखबार निकालने की सलाह दी। यह तो जोश साहब के अदबी स्वभाव से मेल खाता मशविरा था। वे खुशी खुशी राजी हो गए पर असल मुसीबत तो, मशविरे के बाद आनी थी। अखबार की पॉलिसी क्या होगी, जब, जोश के इस सवाल का जवाब मिला, प्रो ब्रिटिश, तो जोश फिर भड़क उठे और उन्होंने इस तरह के किसी अखबार को निकालने या उसमे काम करने से मना कर दिया, जो अंग्रेजों की खिदमत या समर्थन में शाया होता है। 

फिर वे धौलपुर आ गए। धौलपुर के ठाकुर रूप सिंह उनके परम मित्र थे। धौलपुर में ही उनके मामा की हवेली थी। अपना परिवार, जिसे उन्होंने, झांसी से ही सीधे, लखनऊ भेज दिया था, को भी बुला लिया। पर धौलपुर में जो नौकरी उन्हे मिल रही थी, उसकी एक शर्त यह भी थी कि, उन्हें, रूप सिंह से अपनी दोस्ती छोड़नी थी। जोश ने, नौकरी का ऑफर ठुकरा दिया, पर ठाकुर रूप सिंह की दोस्ती को नहीं छोड़ा। 

अब उन्हीं के शब्दों में, पढ़े...
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झाँसी पहुँचकर मैंने बीवी को अपने इरादे से आगाह किया तो उन्होंने कहा, "अच्छा यह भी करके देख लो। " वह बड़ी उदासी के साथ मलीहाबाद की तरफ रवाना हो गई और मैं रियासत दतिया जाने के लिए झाँसी स्टेशन पर उतर गया।

दतिया पहुँचकर काजी सर अजीजुद्दीन को मैंने अपनी सारी दास्तान सुना दी। उन्होंने कहा- "जोश साहब, आप शख्सी हुकूमत का बोझ उठाने के लिए बने ही नहीं अल्लाहताला ने आपको बहुत बड़ा जौहर अता फरमाया है मेरी राय है कि आप आगरे को अपना हैडक्वार्टर बनाकर वहाँ से एक हफ्तेवार अखबार निकालना शुरू कर दें। पर्चे का नाम रखिए 'सल्लनत'। आगरे में आपको रहने की दुश्वारी इसलिए नहीं होगी कि वहाँ आपके नाना का आलीशान महल मौजूद है।।

मैंने कहा, काजी साहब, राय तो बहुत अच्छी है, मगर किस बूते पर अखबार निकालूं?" उन्होंने कहा, आप रियासत दतिया के बूते पर अखबार निकालें। फिलहाल रियासत आपको साढ़े चार सौ रुपये हफ्ते के हिसाब से सोलह सौ रुपये महीना देगी और अगले साल के बजट में यह रकम दुगनी कर दी जाएगी। मंजूर है आपको?" अंधा क्या चाहे, दो आँखें मैंने उनकी इस तजवीज़ को फ़ौरन मंजूर कर लिया। उन्होंने कहा, "आप अल्लाह का नाम लेकर यह काम शुरु कर दीजिए में दूसरी रियासतों से भी आपको इमदाद दिला दूंगा।" काजी साहब की इस बात से मेरा दिल बाग बाग हो गया और में रात को आराम से सी गया। सुबह जब उनके साथ नाश्ता करने बैठा तो उन्होंने पूछा, "जोश साहब, आपके अखबार की पॉलिसी क्या होगी?" मैंने कहा- आप फरमाएँ।" उन्होंने कहा, 'प्रो-ब्रिटिश ! मेरा चेहरा मटमैला-सा होकर रह गया। काजी भांप गए। उन्होंने बड़े जोश के साथ मेज पर घूँसा मारकर कहा, "जोश साहब, ब्रिटिश एम्पायर एक नेमत है, और बहुत बड़ी नेमत अगर हुकूमत ख़ुदा न खास्ता बाकी न रही तो मेरी यह बात कान खोलकर सुन लीजिए कि हिन्दू हमें कच्चा चबा डालेगा। वह आपका जीना दूभर कर देगा। गाय आप की खेतियाँ चर लेगी। आप गाय पर हाथ उठाएँगे, तो कम-से-कम, आपका हाथ तोड़ डाला जाएगा और यह भी मुमकिन है कि आप क़त्ल कर डाले जाएँ। हिन्दू आपके खून से होली खेलेगा। आपके एम. ए. लड़कों पर हिन्दू मैट्रिक को तरजीह दी जाएगी। फरमाइए, क्या आप इस पर तैयार हैं?" मैंने कहा, काजी साहब, आप मेरे बुजुर्ग हैं और यह भी मानता हूं कि, आप मुझे फूलता-फलता देखना चाहते हैं। मैं आपकी इस हमदर्दी का शुक्रिया अदा नहीं कर सकता। लेकिन इसे क्या करूँ कि मुझे अंग्रेजी हुकूमत से नफरत है।" मेरी बात काटकर उन्होंने कहा, आप अपने दोस्त जवाहरलाल के बहकावे में आ गए। देखिए यह आपकी रोज़ी और तमाम मुसलमानों की भलाई का सवाल है, आप फैसल में जल्दी न कीजिए।"

लेकिन जब उनके बार-बार समझाने के बाद भी में फिरंगी की हिमायत के लिए आमादा न हुआ तो उन्होंने मायूस होकर कहा, "अगर आप ब्रिटिश हुकूमत की मुखालिफ़त करेंगे तो मुझे अफसोस है कि रियासत आपका हाथ नहीं बँटा सकेगी। और अगर मैं रियासत से आपकी इमदाद करूंगा तो मेरी प्राइम मिनिस्टी ही खत्म हो जाएगी।'

मैंने कहा, "क़ाज़ी साहब, मैं आपका बेहद शुक्रगुजार हूँ। आपने तो दिल से यह चाहा था कि मेरी जिन्दगी सुधर जाए लेकिन मेरे मिजाज ने सारा खेल बिगाड़कर रख दिया। खता आपकी नहीं, मेरी है।"

धौलपुर आया तो धौलपुर के सबसे बड़े जागीरदार और अपने सगे मामू की हवेली के एवज अपने पुराने दोस्त सरदार रूपसिंह के यहाँ ठहरा। 

मैंने अपनी दास्तान सुनाई और कहा, "महाराजा के पास आया हूँ। शायद वह कोई मुलाज़मत दे दें। रूपसिंह ने कहा, "महाराजा बड़ा पापी है। मुझे उससे कोई उम्मीद नहीं जब तक तुम्हारी कोई सूरत न निकले, तुम मेरे ही साथ रहो। मलीहाबाद जाकर भाभी को बुला लाओ। नवाब साहब (मेरे मामू) के बाई की हवेली में उन्हें ठहराओ जब तक कोई बंदोबस्त न हो जाए मैं पांच सौ रुपये महीना तुमको देता रहूंगा। जब अच्छे दिन आएं तो अदा कर देना।"

मैने कहा, "मैं तुम्हारा बेहद शुक्रगुजार हूँ कि मेरे बिना कहे तुम मेरी इमदाद पर आमादा हो गए।" रूपसिंह ने मेरी बात काटकर कहा, "यह कौन-सी अनोखी बात है? क्या हम दोनों पुराने दोस्त नहीं है? क्या हममें कोई ग़ैरियत है? में राजपूत हूँ तुम पठान तुम मुसलमान राजपूत हो, मैं हिन्दू पठान।"

मैंने कहा, "भाई रूपसिंह, मैं सोचकर जवाब दूंगा। " रूपसिंह ने कहा, "सोचकर जवाब देने वाले की ऐसी-तैसी। अभी-अभी जवाब दो वरना छाती पर चढ़कर गला दबा दूंगा। " मैंने हंसकर कहा, "ऐसी हौल-जील काहे की ज़रा सोच तो लेने दो। यह सुनते ही रूपसिंह ने छलांग लगाई। मुझे फर्श पर गिरा दिया और जोर जोर से मेरा गला दबा दबाकर कहने लगे कि मंजूर है कि नहीं या मार डालूँ? मैंने कहा, "मंजूर, मंजूर, ऐ जालिम, मंजूर।" मेरी आंखों से शुक्रिए के आँसू बहने लगे। मैंने तार देकर बीबी को धौलपुर बुला लिया। वह छोटे दादा और सखावत व जफर को साथ लेकर आ गई। मैं भी रूपसिंह के बाड़े से उठकर मामू के बाड़े आ गया और उनकी खाली हवेली में रहने लगा। कई बार महाराजा धौलपुर से मिला। हर बार उन्होंने मुलाज़मत का वादा किया; लेकिन पूरा होने की नौबत नहीं आई। जब इस असमंजस में दो-तीन महीने गुजर गए तो, में सोचने लगा कि, आखिर माजरा क्या है।

इसी बीच में सपना देखा कि, मौलवी अहमद हुसैन साहब फरमा रहे हैं कि महाराजा से कोई उम्मीद न रखिए। आप एक साफ़ दिल शराबी हैं और वह, बगुला भगत। सुबह एक तार आएगा, उस पर अमल कीजिए। मैंने रूपसिंह को यह सपना सुनाया तो उन्होंने कहा, "यह सपना तो ऐसा है कि इसके सच्चा-झूठा होने का पता आज ही चल जाएगा।'

कोई दो घंटे बाद जब हम लोग नाश्ते से फारिग होकर गपशप कर रहे थे, महाराजा के प्राइवेट सेक्रेटरी आ गए और मुझसे कहा कि मैं आपसे अलहदगी में कुछ बातें करना चाहता हूँ। जब मैं उन्हें दूसरे कमरे में ले गया तो उन्होंने कहा, "सरकार फरमाते हैं कि मेरा और जोश का मामला तो ऐसा है जैसा पेड़ और बक्कल का होता है। अगर वह यहां से चले गए तो में बे- बक्कल का पेड़ हो जाऊँगा। मैं जोश को एक अच्छा-सा ओहदा देना चाहता हूं, मगर दो शर्तें हैं। एक तो यह कि वह शराब छोड़ दें और दूसरी यह कि, रूपसिंह से मिलना छोड़ दें। मैंने कहा, "महाराजा से जाकर कह दीजिए कि उन्होंने मेरी जात के साथ जिस लगाव का इजहार किया है, में इसका दिल से शुक्रगुजार है। लेकिन इसके बावजूद न तो मैं शराब छोडूंगा, न रूपसिंह की मुहब्बत ही से दस्तबरदार हूँगा।"

रूपसिंह पद की आड़ से ये बातें सुन रहे थे। वह मेरा आखिरी वाक्य सुनकर कमरे में आए और कहा कि "सेक्रेटरी साहब, सरकार से जाकर कह दीजिए कि, जोश शराब भी छोड़ देंगे और रूपसिंह से भी मुँह फेर लेंगे।" मैंने कहा, "मैं शराब और रूपसिंह दोनों को नहीं छोडूंगा।" रूपसिंह ने डपट कर कहा, "तुम्हें छोड़नी पड़ेगी ये दोनों चीजें।" मैंने कहा, "नहीं छोडूंगा नहीं छोडूंगा। " सेक्रेटरी साहब इसी शोरो - गुल में "अरे राम, ऐसी पक्की धुन, ऐसी पक्की 'दोस्ती' कहते हुए रुखसत हो गए।"

अब हम फिर बरामदे में आकर बैठ गए। रूपसिंह ने कहा, "तुम्हारे सपने का पहला हिस्सा तो सच्चा निकला कि महाराजा से सम्बन्ध टूट गया। अब अगर तार आ गया तो पूरा सपना सच्चा साबित हो जाएगा।"
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इस तरह, जोश, तलाशे नौकरी में दर बदर ठहलते घूमते रहे। कभी उनका स्वभाव, आड़े आ जाता था तो कभी खुद्दारी, तो कभी सुराजी मानसिकता। वक्त बीतता रहा और वे, अच्छे वक्त का इंतजार करते रहे। 
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, यादों की बारात का अंश (11) हैदराबाद से जोश की घर वापसी / विजय शंकर सिंह 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/07/11.html

Saturday, 8 July 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, यादों की बारात का अंश (11) हैदराबाद से जोश की घर वापसी / विजय शंकर सिंह

जोश ने, इसके पहले कि, निजाम उन्हे अपनी सेवा से बर्खास्त करें, इस्तीफा दे दिया। निजाम उन्हे नौकरी से बर्खास्त कर, एक मुलाजिम को, बर्खास्त किए जाने का सुख, लेना चाहते थे, पर, जोश के स्वाभिमान ने, निजाम के इस इरादे पर पानी फेर दिया। लेकिन, जोश का स्वाभिमान भले ही जीत गया हो, पर उनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं हो पाई थी कि, वे इस्तीफा देकर, खुद अपने दम पर आगे जीवन गुजार सकें। कारण उनकी जमींदाराना स्वभाव, ऐश से जीने की आदत और शाहखर्ची की लत। 

उनकी मदद में, उनके एक मित्र, आगा जब फरमान लेकर आए तो उन्होंने फरमान की एक तकनीकी बारीकी, उन्हे बताई कि, यदि जोश, अब भी माफी मांग लेते हैं, तो इस्तीफा वापस हो जायेगा और वे पुनः नौकरी पर बहाल हो जायेंगे। पर जोश इस तकनीकी पहलू के खुलासे से, जो उनके ही हित में था, माफी मांगने के सवाल पर, फिर भड़क गए और यह बात यहीं की यहीं बंद हो गई। 

लेकिन, चूंकि, हैदराबाद के निजाम के यहां, काम कर चुके कर्मचारियों के लिए पेंशन यानी वजीफे की प्रथा थी तो, उन्होंने अनुरोध कर के, निजाम के खजाने से पांच हजार रुपए, इस वादे पर, अग्रिम ले लिए कि, यह रकम, उनकी पेंशन से, किश्तों में काट ली जाएगी। अब तो हैदराबाद से चल निकलने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था। 

आगे का हाल, उन्ही के शब्दों में...
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फ़रमान लेकर आग़ाजानी मेरे पास आए और कहने लगे, इस फरमान को समझें भी?" मैंने कहा कि इसमें समझने की क्या बात है। उन्होंने कहा कि मैं सरकारे-वाला का मिजाज पहचानता हूँ। इसलिए फरमान के दो नुक्ते बताने आया हूँ। पहला नुक्ता तो यह है कि सरकार जब किसी पर कहर फ़रमाते हैं तो उसे चौबीस घंटे के अन्दर निकाल देते हैं। आपको चौबीस घंटे के एवज पूरे पन्द्रह दिन की मोहलत दी गई है और वह इस मकसद से कि आप सूरतेहाल को ठंडे दिल से समझकर माफी मांग लें और यह फरमान वापस ले लिया जाएगा। दूसरा नुक्ता यह है कि इसमें 'जब तक दूसरा हुक्म न हो' लिखकर आपकी वापसी को नामुमकिन नहीं बनाया गया है। देखिए, अब भी कुछ नहीं गया है। अभी मेरे साथ सरकार की ख़िदमत में हाज़िर होकर माफ़ी मांग लीजिए। अगर इसी वक्त यह फरमान मंसूख न कर दिया जाए तो मेरी नाक काट लीजिएगा।

मैने आगाजानी को गले लगाकर उनका माथा चूम लिया और कहा, "आप वाकई मेरे पक्के दोस्त है; लेकिन में किसी तरह माफ़ी तलब नहीं करूंगा।" आगा ने सर पकड़कर कहा, "भाई, राजहठ, बालहठ त्रियाहट तो सुनी थी। आज मालूम हुआ कि चौथी हठ भी होती है जिसे 'शायरहठ' कहना चाहिए।" मैने अन्दर जाकर बीवी से कहा, "अब सामान बांधो हम यहाँ पन्द्रह दिन क्यों पड़े रहे, तीन-चार दिन में ही क्यों न चले जाएं?" बीवी ने कहा, "यह तो सोचो, जाओगे कैसे? जाने का दमदरूद (सामर्थ्य) भी है? तुम्हारे बहन-बहनोई, उनके बच्चे, हम लोग, छोटे दादा और दोनों नौकर इतने आदमियों का किराया-भाड़ा कहाँ से आएगा। फिर तुम्हारी यह जिदमी है कि, हम अपनी मोटर और दोनों कुते भी साथ ले जाएंगे और उन्हें यहाँ की गलियाँ में मारा-मारा नहीं फिरने देंगे। इन सबके लिए रुपया कहाँ से आएगा? इसी दिन के लिए में तुमसे कहा करती थी कि रोज़ दावतें न करो, गोल के गोल आदमियों को रोज शराब न पिलाओ इतने अलल्ले-तलल्ले न करो। अब बताओ क्या करोगे और कैसे जाओगे?

बीबी की बातें सुनकर में चकरा गया। मैंने कहा, “फिर अशरफ जहाँ क्या किया जाए?" उन्होंने कहा, "जाओ और शाहजादे और महाराजा (किशन प्रसाद) से कर्ज मांगो।" मैने कहा, "मैं कर्ज मांगने नहीं जाऊँगा। यह तो इन दोनों का फर्ज था कि किसी को मेरे पास भेजकर पुछ्वाते कि हम इस मौके पर आपकी क्या इमदाद कर सकते हैं। जब उन्होंने अपना फर्ज अदा नहीं किया तो मैं बेगरती लादकर उनके पास क्यों जाऊ। बीबी ने कहा, "हाँ, सच कहते हो। लेकिन में पूछती हूँ कि अब सुवीता क्या किया जाए?" गरज यह कि एक-एक करके दिन गुज़रने लगे और जाने की तारीख़ करीब से करीबतर आने लगी और कोई तदबीर समझ में नहीं आई।

एक रोज़ इसी बेचारगी के आलम में सर झुकाए बैठा था कि हकीम आजाद अंसारी ने आकर कहा, "कुछ ख़याल भी है, कि यहां से जाने में अब फकत चार दिन बाकी रह गए हैं?" मैंने कहा, "आजाद साहब, अब इसके सिवा कोई चारा नहीं है कि, मैं निकलने के दिन बड़े इत्मीनान से अपने फाटक के सामने आरामकुर्सी पर बैठ जाऊँ और निजाम की नाफरमानी के जुर्म में अपने को गिरफ्तार कराके जेल चला जाऊँ। लेकिन मेरे बाल-बच्चे क्या करेंगे?"

आज़ाद ने कहा, "गिरफ्तार हों, आपके दुश्मन में ऐसी तदबीर निकालकर आया हूँ, जो पट पड़ ही नहीं सकती। आपकोbइस बात का इल्म नहीं कि खानदाने आसक्रिया की यह एक पुरानी रवायत है कि शाही मातृबों" को आजीवन वज़ीफ़ा दिया जाता है। आप भी मातृब है, आपको भी वज़ीफ़ा दिया जाएगा। इसलिए आप अल्लाह का नाम लेकर इस मजमून की दरख्वास्त लेकर अकबर हैदरी के पास जाए कि आपको खजाना-ए-सरकारे आली से पाँच हजार रुपये की रकम बतौर कर्ज दे दी जाए और उस रकम को बजीफे में से किस्तों में काट लिया जाए।

मैने कहा, "तदबीर तो आपकी माकूल है; लेकिन क्या मुँह लेकर हैदरी के पास जाऊँ। उन्हें तो ख़िताब के मामले में जलील कर चुका हूँ। " आज़ाद ने कहा, "इससे क्या होता है? आप हैदरी से तो कर्ज़ नहीं मांग रहे हैं। कर्ज तो सरकारी खजाने से मिलेगा।" मैंने कहा, "बहुत अच्छा में तैयार हूँ। लेकिन दरख्वास्त लिखनी तो मुझे आती नहीं।" आजाद ने अपनी जेब से टाइपशुदा दरख्वास्त निकालकर मेरे हवाले कर दी और कहा, “इसी ख़याल से मैं आपके पास लैस होकर आया था कि दरख्वास्त लिखना आपके बस का रोग नहीं।"

अपने मिज़ाज के खिलाफ लाखों कोड़े मार-मारकर में हैदरी के पास गया। उन्होंने बड़ी नर्मी के साथ पूछा, "जोश साहब, मैं आपकी क्या ख़िदमत कर सकता है?" मैंने कहा, "आप मुझ पर दो इनायतें कर सकते हैं। पहली इनायत तो यह होगी कि आप मेरी इस कर्ज की दरख्वास्त को कुबूल फरमा लें। यह मुमकिन न हो तो फिर यह दूसरी इनायत करें कि मुझे नाफरमानी के जुर्म में गिरफ्तार कराकर जेल भिजवा दें। "

उन्होंने मेरी दरख्वास्त अपने हाथ में लेते हुए कहा, "आप गिरफ्तारी की बात न कहें। अगर आपको गिरफ्तार कर लिया तो लिटरेचर की हिस्ट्री, हैदराबाद को कभी माफ़ नहीं कर सकेगी।" दरख्वास्त पढ़कर वह दाढी खुजलाने लगे। मैंने कहा, "हैदरी साहब, आप अपने दिमाग़ पर बोझ न डालें। मैं हर मुसीबत के लिए बाखुशी तैयार है। उन्होंने कहा, "जोश साहब, यह फायनेंस का मामला है। इसमें पाँच-छह महीने लगेंगे।" मैंने कहा, "मुझे तो सिर्फ चार दिन की फुरसत है।"

वह सर झुकाकर सोचने लगे। अपनी खुशखुशी दाढी खुजलाई, ऐनक साफ करके दोबारा लगाई और आख़िरकार गर्दन के एक फैसलाकुन झटके के साथ मेरी दरख्वास्त मंजूर करके उस पर दस्तखत कर दिए। दूसरे ही दिन मुझे पाँच हजार रुपये मिल गए।

जाता है आसमां लिए कूचे से यार के
आता है जी भरा दरो-दीवार देखकर

कैसे बताऊं कि हैदराबाद से रवानगी के वक़्त मेरे दिल का क्या आलम था। एक तरफ़ गमें मे दौरां (दुनिया का गम) और एक तरफ गमे जाना (प्रेयसी का गम) मेरे रोजगार की शम्मा बुझकर धुआँ दे रही थी और मेरे इश्क़ का चाँद गहनाकर उदासी बरसा रहा था। बीवी रेल के डब्बे में उदास बैठी थी और महबूबा वेटिंग रूम में पछाड़ खा रही थी और मेरा यह आलम था कि बार- बार बीवी की नजर बचाकर वेटिंग रूम जाता, महबूबा को गले लगाकर रोता और आँसू पोंछकर बाहर आता और सैयद अली अखतर, सैयद अबुलखर मोदी और सैयद अलआला मौदूदी से, जो मुझे रुखसत करने आए थे, बातें करने लगता था।Vमैं इसी आलम में था कि नवाब जुलकदरजंग आ गए और एक कागज मेरी तरफ बड़ाकर कहा, "यह मेरे नाम का शाही फ़रमान है, इसे पढ़ लीजिए।" फरमान अक्षर-अक्षर याद नहीं, लेकिन मतलब यह था कि जोश मलीहाबादी आज हिन्दुस्तान जा रहे हैं। उनसे कह दो कि वह अपनी कलम को मेरे खिलाफ इस्तेमाल न करें। अगर माफ़ी पर तैयार हो तो अब भी गुंजाइश बाकी है। मैंने कहा, "नवाब साहब, आला हजरत की खिदमत में मेरा शुक्रिया अदा करके कह दीजिए कि मैं उनकी हिदायत पर अमल करूँगा, लेकिन माफी तलब करने पर आमादा नहीं हूँ।

इतने में रेल रंगने लगी। मैं दौड़कर सवार हो गया। सबको सलाम किया। मेरी महबूबा वेटिंग रूम से निकल आई। उसने आँसुओं से डबडबाई आंखों के साथ मुझे रुखसती सलाम किया। सलाम करके लड़खड़ा गई। मैंने आँखों ही आँखों में उसे गले लगा लिया और गाड़ी की रफ्तार तेज हो गई।
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इस अंश में जोश साहब की प्रेमिका का, जो उन्हे स्टेशन पर छोड़ने आई थी का उल्लेख किया है के बारे, इस प्रसंग के अलावा, और कहीं, उनकी प्रेमिका का उल्लेख, उनकी आत्मकथा में नहीं मिलता है। 
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

'जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, यादों की बारात का अंश (10) निजाम हैदराबाद की सेवा से जोश का इस्तीफा / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/07/10.html


विधि आयोग का UCC के संबंध में प्रसारित होने वाले फर्जी व्हाट्सएप टेक्स्ट, संदेशों आदि से कोई लेनादेना नहीं है

भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) ने आम जनता को समान नागरिक संहिता के संबंध में, विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाले फर्जी व्हाट्सएप टेक्स्ट, संदेशों और कॉल के प्रति सचेत किया है। विधि आयोग ने स्पष्ट किया है कि, इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर, लॉ कमीशन के हवाले से, प्रसारित और प्रचारित किए जा रहे किसी भी संदेश या तथ्य से उसका कोई लेनादेना या जुड़ाव या संबंध नहीं है।

एक अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) जारी करते हुए, विधि आयोग ने कहा है कि, "समान नागरिक संहिता से संबंधित कुछ व्हाट्सएप टेक्स्ट, कॉल और संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं, लेकिन इन्हें, विधि आयोग द्वारा जारी नहीं किया गया या किया जा रहा है। डिस्कलेमर इस प्रकार है-

"यह देखने में आया है कि कुछ फोन नंबर व्यक्तियों के बीच घूम रहे हैं, उन्हें गलत तरीके से भारत के विधि आयोग के साथ जोड़ा जा रहा है। यह स्पष्ट किया जाता है कि विधि आयोग का इन संदेशों या कॉल्स के संबंध में कोई भागीदारी नहीं है, और न ही कोई लेना देना है। आयोग, इन संदेशों या कॉल्स को यह अस्वीकरण जारी कर ख़ारिज करता है। आयोग ऐसे संदेशों का न तो कोई समर्थन करता है और न ही वह इन सब संदेशों के लिए जिम्मेदार है।"

इस डिस्कलेमार में आगे कहा गया है कि, "भारत का विधि आयोग पूरी तरह से अपने आधिकारिक चैनलों के माध्यम से संचार और संवाद करता है, जिसमें इसकी वेबसाइट और आधिकारिक प्रकाशन आदि शामिल हैं। यह व्यक्तियों को समान नागरिक संहिता के संबंध में जारी किसी भी सार्वजनिक सूचना तक पहुंचने के लिए आधिकारिक वेबसाइट पर जाने के लिए भी प्रोत्साहित करता है। अतः, यह आग्रह किया गया है कि जनता सटीक जानकारी के लिए आधिकारिक स्रोतों को देखे।"

14 जून को, विधि आयोग ने बड़े पैमाने पर जनता और धार्मिक संगठनों से नए विचार आमंत्रित करके यूसीसी पर बहस फिर से शुरू करने का फैसला किया था।जो लोग रुचि रखते हैं और इच्छुक हैं वे नोटिस की तारीख से 30 दिनों की अवधि के भीतर "यहां क्लिक करें" बटन या membersecretary-lci@gov.in पर ईमेल के माध्यम से भारत के विधि आयोग को अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं।  संबंधित हितधारक समान नागरिक संहिता से संबंधित किसी भी मुद्दे पर परामर्श/चर्चा/कार्य पत्र के रूप में "सदस्य सचिव, भारतीय विधि आयोग, चौथी मंजिल, लोक नायक भवन" को अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र हैं।  खान मार्केट, नई दिल्ली- 110 003।”  यदि आवश्यकता हुई तो आयोग किसी व्यक्ति या संगठन को व्यक्तिगत सुनवाई या चर्चा के लिए बुला सकता है।

हालांकि, इसके पहले, 2018 में, भारत के विधि आयोग ने, 'पारिवारिक कानून में सुधार' पर एक परामर्श पत्र जारी किया था, जिसमें उसने कहा कि "इस स्तर पर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के पारित होने की, न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है"।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


Friday, 7 July 2023

एक कस्टम अधिकारी को, कानून के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी की शक्तियां प्राप्त हैं या नहीं, इसे अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करने के लिए, एक याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है कि, क्या कस्टम अधिकारी, कानून के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी हैं या नहीं। साथ ही शीर्ष अदालत यह भी तय करेगी क्या, सीआरपीसी, सीमा शुल्क अधिनियम के तहत, की जा रही कार्यवाही के संबंध में लागू होगी या नहीं ?

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ, तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक फैसले से उत्पन्न, एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें राजस्व खुफिया निदेशालय DRI डीआरआई को, आरोपी की, हिरासत में लेने की अनुमति नहीं दी गई है।

अदालत, कानून के इन सवालों पर विचार करेगी... 

1. क्या डीआरआई अधिकारी, सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 28 के प्रयोजनों के लिए एक "उचित अधिकारी" है?
 
2. क्या सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 108 के तहत प्रतिवादी को डीआरआई अधिकारी द्वारा जारी किए गए समन को अधिकार क्षेत्र के बिना जारी किया जा सकता है?
 
3. क्या सीमा शुल्क/डीआरआई अधिकारी, एक पुलिस अधिकारी हैं और इसलिए, उन्हें सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 133 से 135 के तहत अपराध के संबंध में क्रमशः एफआईआर दर्ज करना आवश्यक है?
 
4. क्या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154 से 157 और 173(2) के प्राविधान सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के तहत कार्यवाही के संबंध में संहिता की धारा 4(2) के मद्देनजर लागू होंगे?
 
5. क्या सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की क्रमशः धारा 133 से 135 के तहत अपराधों के संबंध में, संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार करने और मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले एफआईआर का पंजीकरण अनिवार्य है?
 
इस महत्वपूर्ण मामले को 19.07.2023 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

उल्लेखनीय है कि, कैनन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने फैसला सुनाया था और तब सीमा शुल्क आयुक्त ने माना था कि, राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 28(4) के अंतर्गत शुल्क की प्रक्रिया या वसूली करने के  अधिकार से संपन्न, सक्षम अधिकारी' नहीं हैं। 

यह मामला, ड्यूटी फ्री बुलियन (सोने) को जिसे, एफटीपी की अग्रिम खरीद योजना के अंतर्गत, खरीदने के 90 दिनों के भीतर निर्यात किया जाना था, को घरेलू बाजार में बेच दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप आरोपी को गैरकानूनी रूप से लाभ हुआ। यह सीमा शुल्क कानून का उल्लंघन हुआ जिसे उक्त एक्ट में एक दंडनीय अपराध माना गया है। 

कस्टम विभाग ने पूछताछ के लिए आरोपी की हिरासत मांगी। सत्र न्यायाधीश ने, कस्टम्स विभाग को, हिरासत में लेने के उसके अधिकार क्षेत्र को न पाते हुए, हिरासत में पूछताछ के लिए राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के अधिकारियों के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और यह भी कहा कि, प्रतिवादी के बयान की रिकॉर्डिंग की अनुमति देने के लिए कोई वैध आधार मौजूद नहीं है।

हालांकि सीमा शुल्क विभाग ने यह भी कहा कि, अपराध का मोडस ऑपरेंडी यही कार्यप्रणाली का पता लगाने के लिए बयान दर्ज करने की आवश्यकता है और यह अधिकार, सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 108 के अंतर्गत, डीआरआई को कानून ने दिया है।

सत्र न्यायाधीश के इस फैसले के खिपाफ, याचिकाकर्ता (डीआरआई) ने यह कहते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया कि "प्रतिवादी, धोखाधड़ी से भरी इस पूरी गतिविधियों के पीछे का मास्टरमाइंड है और उससे उसकी कार्यप्रणाली का पता लगाया जाना जरूरी है। याचिका के अनुसार,  जांच को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिवादी के बयान की रिकॉर्डिंग भी आवश्यक है और सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 108 के अनुसार ऐसी शक्ति राजस्व खुफिया निदेशालय में निहित है। मामले की जांच करना और सच्चाई सामने लाना डीआरआई का दायित्व है।"

तेलंगाना उच्च न्यायालय ने माना कि सीमा शुल्क अधिकारी को आरोपी व्यक्तियों से आपत्तिजनक सामग्री एकत्र करने का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 108 का विश्लेषण करने के बाद कहा कि “सीमा शुल्क के राजपत्रित अधिकारी के पास किसी भी व्यक्ति को बुलाने की शक्ति होगी, जिसकी उपस्थिति वह सबूत देने या किसी पूछताछ में दस्तावेज़ या किसी अन्य चीज़ को पेश करने के लिए आवश्यक समझती है।  इसका मतलब यह नहीं है कि सीमा शुल्क अधिकारी के पास ऐसी जानकारी एकत्र करने की शक्ति निहित है जिसे अन्यथा उस व्यक्ति से आपत्तिजनक सामग्री कहा जाएगा जिसके खिलाफ आरोप लगाया गया है।"

उच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद,  21 और अनुच्छेद 20 (3) को उद्धरित करते हुए, यह कहा कि, "वे यह मानते हैं कि पुलिस या अन्य अधिकारी जो किसी मामले की जांच कर रहे हैं, उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति को दोषारोपणात्मक या दोषमुक्तिपूर्ण बयान देने के लिए, मजबूर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जिसके खिलाफ आरोप लगाया गया है।"

जांच के दौरान मुल्जिम की हिरासत में पूछताछ भी जरूरी होती है। सीआरपीसी के अनुसार, पुलिस कस्टडी रिमांड का प्राविधान, पुलिस के विवेचक आईओ को कानूनन प्रदत्त भी है। पर क्या पुलिस को मिली इन शक्तियों के अनुसार, यही शक्तियां, कस्टम विभाग के डीआरआई को भी है या नहीं, और वे भी एक पुलिस विवेचक के रूप में किसी आपराधिक मामले की तफ्तीश तथा मुल्जिम की हिरासत में रिमांड लेकर पूछताछ कर सकते हैं या नहीं, इन्ही महत्वपूर्ण सवालों पर, सुप्रीम कोर्ट अब विचार करने जा रही है। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh