Tuesday, 22 November 2022

आरबीआई के पूर्व गवर्नर ऊर्जित पटेल ने नियुक्त होने के पहले ही, करेंसी नोटों पर दस्तखत कर दिए थे / विजय शंकर सिंह

करेंसी नोट प्रेस, नासिक ने RTI के जवाब में बताया है कि तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल के दस्तखत वाले नए डिजाइन के ₹500 मूल्य के नोट पीएम द्वारा 8/11/2016 को नोटबंदी की घोषणा के 19 महीने पहले 15/04/2015 को छापे गए थे। जबकि  उर्जित पटेल RBI के  गवर्नर 5/10/2016 में नियुक्त किए गए थे।

स्पष्ट है कि, उर्जित पटेल के आरबीआई गवर्नर नियुक्त होने के 17 महीने पहले ही उनके हस्ताक्षर वाले ₹500 के नोट छाप लिए गए थे। 
इतनी बड़ी अनियमितता कैसे हुई ? ऐसे ही नहीं डा.मनमोहन सिंह ने कहा था कि "नोटबंदी एक संगठित लूट है।"

अभी नोटबंदी के ठीक पहले, रहे आरबीआई गवर्नर डॉ रघुराम राजन और नोटबंदी के समय और उसके बाद काफी समय तक, गवर्नर रहे ऊर्जित पटेल, अभी हैं। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि नोटबंदी पर याचिकाओं की सुनवाई करते समय, इन दोनों महानुभावों को तलब करे और उनसे हलफनामा देकर अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहे। 

मैं अब भी इस मत पर दृढ़ हूं कि, नोटबंदी से, देश की आर्थिकी को नुकसान पहुंचा है और अनौपचारिक सेक्टर तबाह हुआ है। इस आर्थिक ब्लंडर का कोई भी लाभ देश को नहीं मिला है। हो सकता हो, बीजेपी को लाभ मिला हो। अब यह कदम, 'जैसे थे', तो नहीं हो सकता पर, देश को आर्थिक रूप से बरबाद करने वाले, वे कौन हैं या थे, उनके बारे में देश को जानने का पूरा हक है। 

2014 के बाद गवर्नेंस और राजकाज में ऐसे कई चमत्कार हुए हैं। ईडी प्रमुख को पुनः सेवा विस्तार देकर यह जता दिया गया है कि, वे इस सरकार के लिए कितने अपरिहार्य हैं। उनके बिना कोई ऑपरेशन संभव ही नहीं। इतने काबिल अफसर को जीवन पर्यंत के लिए ईडी का निदेशक बना देना चाहिए। आखिर योगता की कद्र तो होनी ही चाहिए !

The Hindu, अखबार की एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, केएम जोसेफ़ ने, मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर की जा रही नियुक्तियों पर कुछ सवाल उठाये और कहा कि केंद्र  विगत 2015 से 2022 तक, 7 सालों में, 8 सीईसी  की नियुक्ति कर, दिखावटी स्वतंत्रता की नीति पर चल रहा है। 

सीईसी का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 साल की उम्र तक निर्धारित है और उसे केवल, संसद में, महाभियोग प्रस्ताव लाकर ही हटाया जेसे सकता है। जस्टिस जोसेफ ने कहा है कि,
"जिनकी 65 वर्ष उम्र होने में कुछ दिन बचे थे, उन्हें इस पद पर बैठाया गया। 2004 से यह नीति अपनाई जा रही है।"
2004 से 20012 तक 6 मुख्य निर्वाचन आयुक्त, और 2015 से 2022 तक 8 मुख्य निर्वाचन आयुक्त हुए हैं। यह एक प्रकार की दिखावटी आज़ादी प्रदान करना हुआ। 

(विजय शंकर सिंह)

बिस्मिल, अशफाक और रोशन सिंह ने, कोई माफीनामा नहीं भेजा था / विजय शंकर सिंह

पुरानी कहावत है, एक झूठ को छुपाने के लिए हजार झूठ बोलने पड़ते हैं। आज  जब सावरकर के माफीनामे पर बहस छिड़ गई है तो, भाजपा, सावरकर के माफीनामे का औचित्य साबित करने के लिए, कभी शिवाजी के पत्रों तो कभी काकोरी के शहीद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह द्वारा एक दया याचिका में, माफी के इनग्रेडियेंट ढूंढ रही है। आज जिक्र करते हैं, काकोरी के शहीदों के कथित माफीनामे की, जिसे बीजेपी प्रवक्ता ने, कल एक टीवी चैनल पर सावरकर के माफीनामे के समतुल्य ठहराने की कोशिश की।दोनो में मौलिक अंतर है। सावरकर का माफीनामा, मुक्त करने, अंग्रेजों का वफादार रहने और उन्हें माई बाप मानने के वायदों से लबरेज था तो, काकोरी शहीदों की दया याचिका, विधि की परंपरा और क्रिमिनल जस्टिस की एक प्रक्रिया का अंग था। इसे खुद राम प्रसाद बिस्मिल ने ही, अपने एक लेख में, स्पष्ट कर दिया है जिसे भगत सिंह ने अपने एक लेख में उद्धरित किया है। 
  
भगत सिंह पर, आधिकारिक विद्वान और गंभीर शोधकर्ता, प्रोफेसर चमन लाल जिन्होंने, भगत सिंह के लेखों का संपादन और संकलन किया है, ने बिस्मिल, अशफाक और रोशन सिंह द्वारा दी गई दया याचिका के औचित्य और उद्देश्य पर, भगत सिंह द्वारा लिखे, एक लेख का विवरण दिया है, जो इस संबंध में सारी स्थिति, खुद ही, स्पष्ट कर देता है। एक क्रांतिकारी और लेखक, दोनों ही रूपों में भगत सिंह अलग ही दिखते हैं। वह 1923 में 16 साल की उम्र में क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गए थे और 1931 में फांसी पर चढ़ गए। कुल 8 साल का समय उन्हे मिला था, और कोई भी यह समझ सकता है कि, वह न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलनो में अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।  उन्होंने इस अवधि में न केवल राजनीतिक क्रांतिकारी कार्य किए, बल्कि, खूब लिखा भी। इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र या साहित्य की बेहतरीन किताबों को पढ़ने में, उन्होंने काफी समय बिताया।  उनका लेखन, चार भाषाओं, उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी में है। भगत सिंह ने सात वर्षों में 130 से अधिक दस्तावेज लिखे, जिनमें लगभग 400 सौ पृष्ठ शामिल थे!  कोर्ट स्टेटमेंट, पैम्फलेट, निबंध और स्केच के अलावा उन्होंने 50 से अधिक पत्र लिखे। उनके, एक जेल साथी की यादों के आधार पर, कई लोगों का मानना ​​है कि भगत सिंह ने जेल में चार अन्य किताबें भी  लिखीं थीं; लेकिन वे अब अनुपलब्ध हैं।

भगत सिंह ने काकोरी कांड के शहीदों पर पंजाबी/उर्दू पत्रिका कीर्ति में कुछ निबंध लिखे। उसी में एक लेख है,  "राम प्रसाद बिस्मिल का संदेश," जिसे, यहां 'भगत सिंह रीडर' से लेकर, पुन: प्रस्तुत किया जा रहा है।  यह लेख वर्तमान समय में उठे विवाद को स्पष्ट करने के लिए प्रासंगिक है। यह लेख राम प्रसाद बिस्मिल के लिखे एक संस्मरण रेखाचित्र पर आधारित है। बिस्मिल के लेख का यह अंश, विद्रोही नाम से कीर्ति पत्रिका में छपा था। प्रोफेसर चमन लाल का कहना है कि भगत सिंह, विद्रोही छद्म नाम से भी लेख लिखते थे और यह लेख भगत सिंह द्वारा, छद्म नाम से लिखा गया है। इस लेख में काकोरी के शहीदों द्वारा दिए गए मर्सी पेटिशन यानी दया याचिका का उल्लेख है। मैने यह लेख और संदर्भ अंग्रेजी पत्रिका फ्रंट लाइन (प्रिंट एडिशन) के 20 दिसंबर, 2019 के अंक से लिया है। 

लेख में लिखा है, 
"...'राष्ट्र के शहीद का अंतिम संदेश श्री राम प्रसाद बिस्मिल', जिसका अनुवाद यहाँ [कीर्ति में] पहली बार किया जा रहा है।  उन्होंने एक आत्मकथात्मक रेखाचित्र लिखा, जो गोरखपुर के एक पत्र स्वदेश में प्रकाशित हुआ है। इसका संक्षिप्त रूप पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि वे क्रान्तिकारी के अन्तिम विचारों को जान सकें।"
इस भूमिका के साथ भगत सिंह का यह लेख शुरू होता है। 

16 दिसंबर, 1927 को प्रकाशित, उक्त लेख में, भगत सिंह 'विद्रोही' नाम से, लिखते हैं:

“फांसी का समय 19 दिसंबर को सुबह 6.30 बजे तय किया गया है।  चिंता की कोई बात नहीं है, मैं ईश्वर की कृपा से बार-बार जन्म लूंगा और मेरा उद्देश्य दुनिया के लिए पूर्ण स्वतंत्रता सुनिश्चित करना होगा, कि प्रकृति प्रदत्त उपहारों को, सभी के द्वारा समान रूप से साझा किया जाना चाहिए और ऐसा होगा कि, कोई भी दूसरों पर शासन नहीं करेगा।  हर जगह लोगों की अपनी लोकतांत्रिक संस्थाएं होनी चाहिए। मैं अब उन बातों का भी जिक्र करना जरूरी समझता हूं जो 6 अप्रैल 1927 को सेशंस कोर्ट के फैसले के बाद काकोरी कैदियों के साथ घटी थी। 18 जुलाई को अवध मुख्य न्यायालय में अपील हुई।  वह केवल मौत की सजा पाए चार व्यक्तियों की ओर से की गई अपील थी। लेकिन पुलिस ने (क्रांतिकारियों की) सजा बढ़ाने के लिए काउंटर अपील दायर की थी।  फिर अन्य लोगों ने भी अपील दायर की, लेकिन श्री  शचींद्रनाथ सान्याल, भूपेंद्र नाथ सान्याल और सरकारी गवाह बनवारी लाल ने कोई अपील, दायर नहीं की थी। फिर प्रणवेश चटर्जी अप्रूवर (सरकारी या वायदा माफी गवाह) बन गया और उन्होंने अपनी अपील वापस ले ली।  मौत की सजा अपरिवर्तित रही, लेकिन जोगेश चटर्जी, गोबिंद चरण कर और मुकंदी लाल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।   सुरेश चंदर भट्टाचार्य और विष्णु शरण डबलिश की सजा को बढ़ाकर दस वर्ष कर दिया गया।  रामनाथ पांडे की सजा को घटाकर तीन साल और प्रणवेश चटर्जी की सजा को चार साल कर दिया गया।  प्रेम कृष्ण खन्ना की डकैती की सजा को घटाकर पांच साल कर दिया गया।  अन्य अपीलें खारिज कर दी गईं।  अशफाक की मौत की सजा अपरिवर्तित रही और शचींद्र नाथ बख्शी ने कोई अपील दायर नहीं की।" 

"अपील दाखिल करने से पहले, मैंने पहले ही गवर्नर को एक आवेदन भेजा था कि, 'मैंने किसी गुप्त साजिश में भाग नहीं लिया है और न ही मेरा इनसे कोई संबंध होगा'।  दया याचिका में भी इस अर्जी का जिक्र किया गया था। लेकिन जजों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी दलीलें जेल से मुख्य न्यायालय (अवध चीफ कोर्ट) को भेजीं, लेकिन न्यायाधीशों ने कहा कि यह राम प्रसाद का नहीं, बल्कि एक बहुत सक्षम व्यक्ति की मदद से लिखा गया है।  बल्कि उन्होंने नकारात्मक रूप से कहा कि 'राम प्रसाद एक खतरनाक क्रांतिकारी हैं और अगर रिहा हुआ तो वही काम करेगा।"

"बुद्धि, क्षमता आदि की, सराहना करने के बाद, उन्होंने कहा कि 'वह एक निर्दयी हत्यारा है, जो उसे गोली भी मार सकता है जिससे उसकी कोई दुश्मनी नहीं है'।  वैसे भी कलम तो उनके पास थी, चाहे कुछ भी लिख लें!  लेकिन चीफ कोर्ट के फैसले से पता चलता है कि हमें बदले की भावना से ही मौत की सजा दी गई है।"

"अपील खारिज कर दी गई, और फिर गवर्नर और वायसराय के पास दया याचिका दायर की गई। यूपी के लगभग सभी निर्वाचित सदस्य, विधान परिषद ने राम प्रसाद बिस्मिल, राजिंदर नाथ लाहिड़ी, अशफाकउल्ला और रोशन सिंह की मौत की सजा को कम करने के लिए एक हस्ताक्षरित अपील की थी। मेरे पिता (बिस्मिल के पिता) के प्रयास से दो बड़े जमींदारों और 250 ऑनरेरी मजिस्ट्रेटों ने अलग-अलग अर्जी दाखिल की थी। असेम्बली और काउंसिल ऑफ स्टेट के 108 सदस्यों ने भी वायसराय को हमारी फांसी की सजा को बदलने के लिए अर्जी दी। उन्होंने यह भी लिखा था कि, "जज ने कहा था कि 'अगर वे पछताएंगे तो सजा को काफी कम कर दिया जाएगा।'  हर तरफ से, सजा कम करने की अपीलें की जा रही थीं, लेकिन वे (ब्रिटिश) हर तरह से हमारे खून के प्यासे थे और वायसराय ने भी हमारी एक न सुनी।"

“पंडित मदन मोहन मालवीय, कई लोगों के साथ वायसराय से मिले।  सभी ने सोचा कि, अब मौत की सजा माफ कर दी जाएगी।  लेकिन क्या होना था।  चुपचाप दशहरे के दो दिन पहले सभी जेलों को तार भेज दिया गया कि फांसी की तारीख तय हो गई है। जब जेल अधीक्षक ने, मुझे इस तार के बारे में बताया तो, मैंने भी कहा कि, अब तुम अपना काम करो, लेकिन उनके (जेलर के) आग्रह पर बादशाह को दया का तार भेजा। उस समय प्रिवी कौंसिल में अपील दाखिल करने का विचार भी आया।  एक वकील, मोहन लाल सक्सेना को तार दिया गया और जब उन्हें बताया गया कि, वायसराय ने सभी आवेदनों को खारिज कर दिया है, तो किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया। उनके कहने पर, प्रिवी काउंसिल में भी, अपील दायर की गई; हालांकि, परिणाम हमें पता था, और अपील को, समय से पहले खारिज भी कर दिया गया। 

“अब सवाल उठेगा कि, सब कुछ पहले से जानते हुए भी, मैंने माफी नामा, दया याचिका और अपील दर अपील क्यों भेजी?  मुझे केवल एक ही कारण प्रतीत होता है कि, राजनीति शतरंज का खेल है।  बंगाल ऑर्डिनेंस बंदियों के बारे में सरकार ने विधानसभा में जोर देकर कहा है कि उनके खिलाफ पुख्ता सबूत हैं, जिन्हें हम गवाहों की सुरक्षा के लिए खुली अदालत में पेश नहीं कर सकते, हालांकि दक्षिणेश्वर बम और शोभा बाजार षड़यंत्र के मामलों की सुनवाई खुली अदालत में होती थी। सीआईडी सुपरिटेंडेंट ​​की हत्या का केस भी खुली अदालत में चला और काकोरी केस की सुनवाई में भी डेढ़ साल लग गए। अभियोजन पक्ष के 300 गवाह पेश किए गए, किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई, हालांकि यह भी कहा गया कि, काकोरी कांड की जड़ बंगाल में ही है। मैंने सरकारी घोषणाओं का खोखलापन और पाखंड को उजागर करने के लिए यह सब किया।  मैंने माफी भी मांगी, अपील भी की, लेकिन होना क्या था ? मुझे भी पता था। हकीकत तो यह है कि, जालिम मारता भी है और रोने भी नहीं देता!"

“हमारे जीवित रहने से कोई विद्रोह नहीं होने वाला था। अभी तक भारत में क्रांतिकारियों की तरफ से जनता के लिए ऐसी प्रबल अपील कभी नहीं की गई थी। लेकिन सरकार को इससे क्या लेना-देना? इसे (सरकार को) अपनी शक्ति पर गर्व है। इसे अपने दमन का अहंकार है।  सर विलियम मौरिस ने स्वयं शाहजहाँपुर और इलाहाबाद के दंगों की मृत्युदंड की सजा माफ कर दी थी।  और यह सजा माफी तब हुई, जब रोज दंगे हो रहे हैं। अगर सजा कम करने से दूसरों का हौसला बढ़ता तो यही बात साम्प्रदायिक दंगों के बारे में भी कही जा सकती थी।  लेकिन यहां मुद्दा अलग था।" 

यहां संकेत, अंग्रेजी राज की हिंदू मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ावा देने की नीति की ओर है, यह वाक्य, साम्रदायिक वैमनस्यता के प्रति क्रांतिकारियों की चिंता को भी स्पष्ट करता है। अब आगे पढ़े, 

“मैं अपने जीवन त्याग के इस समय में, निराश नहीं हूं कि यह (जीवन) बर्बाद हो गया। कुर्बानी कभी बेकार नहीं जाती।  शायद हमारी आहों के कारण ही लार्ड बीरकेनहेड के मन में शाही कमीशन भेजने का विचार आया, जिसके बहिष्कार के लिए हिन्दू-मुस्लिम फिर से एकत्र हो गए। भगवान उन्हें शीघ्र ही कुछ सद्बुद्धि दें और वे फिर से एक हो जाएं।  हमारी अपील खारिज होने के बाद मैंने अधिवक्ता मोहन लाल सक्सेना से कहा था कि कम से कम इस बार हमें मनाने के लिए हिंदू-मुस्लिम नेताओं को एक हो जाना चाहिए।"

लॉर्ड बरकेनहेड ने, जब साइमन कमीशन का विरोध हुआ तब 1928 में यह चुनौती दी थी, जो लोग साइमन कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल न किए जाने का विरोध (यह संकेत कांग्रेस की ओर था) कर रहे हैं, वे एक संविधान का मसौदा तैयार कर के दिखाए तो हम उस पर विचार करेंगे। कांग्रेस ने यह चुनौती स्वीकार की और मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक संविधान ड्राफ्ट कमेटी बनी जिसने, संविधान का एक मसौदा तैयार किया था, जिसे नेहरू रिपोर्ट कहते हैं। यहां उसी का उल्लेख है। 

अब आगे पढ़े, 
“सरकार ने उल्लेख किया था कि, अशफाकउल्ला खान, राम प्रसाद का दाहिना हाथ है। यदि अशफाक जैसा समर्पित मुसलमान क्रान्तिकारी आन्दोलन में रामप्रसाद की तरह आर्यसमाजी का दाहिना हाथ हो सकता है तो अन्य हिन्दू-मुस्लिम अपने तुच्छ स्वार्थों को भुलाकर एक क्यों नहीं हो सकते? अशफाक पहले ऐसे मुसलमान हैं, जिन्हें बंगाल क्रांतिकारी दल के सिलसिले में फाँसी दी जा रही है। भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली है।  मेरा कार्य समाप्त हो गया है। मैंने एक मुस्लिम नौजवान को, कुर्बानी की राह पर लाकर हिन्दुस्तान को दिखा दिया है कि, मुस्लिम नौजवान भी, हिन्दू नौजवानों से ज्यादा जोश से, देश के लिए, अपनी जान कुर्बान कर सकता है और वह (अशफाक) सभी कसौटियों पर खरा उतरा भी था।  अब कोई यह कहने की हिम्मत नहीं करेगा कि, मुसलमानों पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।  यह पहला प्रयोग था जो सफल रहा।"

"अशफाक!  भगवान आपकी आत्मा को शांति दे।  आपने मेरी और सभी मुसलमानों की लाज बचाई है और यह भी दिखाया है कि तुर्की और मिस्र की तरह भारत में भी ऐसे मुस्लिम नौजवान मिल सकते हैं।" 

“अब देशवासियों से मेरा एक ही निवेदन है कि यदि उन्हें हमारी मृत्यु पर रत्ती भर भी दु:ख है तो वे किसी भी प्रकार से हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करें; यही हमारी अंतिम इच्छा है और यही हमारा स्मारक हो सकता है।  सभी धर्मों और सभी दलों को, अब, कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मान लेना ​​चाहिए।  फिर वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेजों को, भारतीयों के आगे झुकना पड़ेगा।"

“मैं जो कुछ भी कह रहा हूं, वही अशफाक की भी राय है। अपील करते समय मेरी उनसे (अशफाकउल्ला खान) लखनऊ में बात हुई थी। वे, दया याचिका देने को राजी नहीं थे, मेरे कहने पर ही उसने ऐसा किया था।"

"मैंने सरकार से, यहां तक ​​कहा था कि, जब तक वह मुझ पर भरोसा करने को (सरकार) तैयार नहीं होती, तब तक वह मुझे जेल में रख सकती है या किसी दूसरे देश में निर्वासित कर सकती है और मुझे भारत लौटने की अनुमति नहीं दे सकती है। लेकिन सरकार क्या करने वाली थी?  सरकार तो हमें फाँसी देना चाहती थी, हिन्दुस्तानियों के कच्चे ज़ख्मों पर नमक छिड़कना चाहती थी, उन्हें दर्द से कराहते देखना चाहती थी।  कुछ चीजें संतुलित हो सकती हैं और जब तक हम पुनर्जन्म लेते हैं और काम करने के लिए तैयार होते हैं, तब तक देश की स्थिति में सुधार हो जाना चाहिए। 

अब राम प्रसाद बिस्मिल, अपील करने के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं, 
"अब मेरी स्पष्ट सलाह है कि न तो किसी को ब्रिटिश अदालतों के सामने कोई बयान देना चाहिए और न ही कोई बचाव करना चाहिए। अपील करने का एक कारण यह भी था कि, फाँसी की तारीख़ टलवा दी जाए और युवाओं की ताकत और देशवासियों की मदद को देखा जाए !  मैं वास्तव में इससे निराश था।  मैंने सोचा था कि जेल तोड़कर निकल जाऊं, अगर ऐसा हुआ होता तो बाकी तीनों की फांसी की सजा भी माफ कर दी गई होती। सरकार ने न किया होता तो मैं करवा देता।  मैं इसके तरीके अच्छी तरह जानता था।  मैंने जेल से छूटने की पूरी कोशिश की, लेकिन बाहर से कोई मदद नहीं मिली। मेरी मदद के लिए कोई युवा नहीं आया।  युवाओं से मेरा निवेदन है कि जब तक बहुत से लोग शिक्षित नहीं हो जाते;  गुप्त संगठनों (क्रांतिकारी आंदोलनों) पर ध्यान न दें। अगर उनमें देश सेवा करने की इच्छा है तो उन्हें खुलकर काम करना चाहिए। केवल खोखली लफ्फाजी सुनकर और हरे भरे चरागाहों की कल्पना करके, उन्हें अपने जीवन को संकट में नहीं डालना चाहिए।  गुप्त कार्य के लिए, अभी समय नहीं है।  इस ट्रायल के दौरान हमें काफी अनुभव हुए, लेकिन सरकार ने हमें इनका लाभ उठाने का कोई मौका नहीं दिया।  लेकिन भारत और ब्रिटेन दोनों की सरकारों को इस बात का मलाल रहेगा।"

भगत सिंह ने लगभग ऐसी ही बातें अपने एक साक्षात्कार में भी कही हैं, इसे पढ़े, 
"साक्षात्कार के समय उन्होंने यह भी कहा कि 'क्रांतिकारियों में साहस की कमी है और लोगों में अभी तक उनके लिए सहानुभूति नहीं है और उनमें क्षेत्रवाद बहुत है।  वे एक-दूसरे पर पूरा भरोसा नहीं करते, इसलिए इस वजह से उनकी इच्छाएं दबी रह गईं।  केवल मौखिक आश्वासन पर मुझे बार एट लॉ करने के लिए इंग्लैंड भेजने का वादा करते हुए पाँच हजार रुपये की पेशकश की गई;  लेकिन मैंने इसे एक गहरा पाप माना और इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।  लेकिन अफसोस की बात है कि कई भरोसेमंद और आत्म-बलिदानी माने जाने वाले साथियों ने अपनी निजी सुख-सुविधाओं के लिए पार्टी को धोखा दिया और हमारे साथ विश्वासघात किया।"

भगत सिंह का यह लेख जो बिस्मिल की आत्मकथात्मक प्रसंग पर आधारित है में, सारी बातें और उनकी चिंता सपष्ट रूप से सामने आ गई है। इन चिंताओं में, सबसे बड़ी चिंता हिंदू मुस्लिम में बढ़ रहे वैमनस्य की भी है तो क्रांतिकारियों के साथ युवाओं का न जुड़ना और कुछ साथियों का, सरकारी गवाह बन जाने की मनोवृत्ति भी है। अपील, दया याचिका और समवेत प्रार्थना, यह सब तो था, पर अपने लक्ष्य उद्देश्य और स्वाधीनता से विचलन, का संकेत लेशमात्र भी नहीं था। इन अपीलों का एक उद्देश्य यह भी था, न्यायिक परंपराओं का जो ढोल ब्रिटिश राज बार बार दिखता था, उसकी असलियत भी, सबके सामने उधेड़ कर रख दी जाय। काकोरी शहीदों की दया याचिका इसलिए दायर की गई थी कि, फांसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया जाय, इसलिए नहीं कि, उन्हे जेल से रिहा कर दिया जाय और वे फिर उन्ही अंग्रेजो की धुन पर नाचें जिन्हे उखाड़ फेंकने के लिए, उन्होंने सर पर कफ़न बांध रखा था। भाजपा के नेताओ और प्रवक्ताओं को, सावरकर के माफीनामे, और शिवाजी के कूटनीतिक पत्रों तथा काकोरी शहीदों की न्यायिक विधि परंपरा के अनुसार दी गई याचिकाओं के उद्देश्य, भाषा, और इरादे में अंतर समझने का विवेक विकसित करना चाहिए। 

(विजय शंकर सिंह)

प्रवीण झा / 1857 की कहानी - तीन (3)

“फ़ौज-ए-बाग़िया भांग, लड्डू-पेड़े, पूरी-कचौड़ी खा कर मदमस्त रहती…पूरी दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर, जो मर्जी आता वह करती। हाल-ए-दिल्ली थी अंधेर नगरी, चौपट राजा।”

- ज़हीर देहलवी (दास्तान-ए-ग़दर) 

दिल्ली 1857 के युद्ध और अराजकता दोनों की केंद्र थी। युद्ध इसलिए कि अंग्रेज़ दिल्ली टीला पर जम चुके थे, और लाल किले की परिधि में भारतीय बाग़ियों ने डेरा जमा लिया था। वहीं, अराजकता तो प्रशासन के अभाव में होनी ही थी। 

बंगाल रेजिमेंट के 1,39,000 सिपाहियों में 1,31,704 सिपाही विद्रोह कर चुके थे, और उनमें से लगभग साठ हज़ार सिपाही धीरे-धीरे दिल्ली की ओर रुख कर रहे थे या पहुँच चुके थे। 

वहीं दूसरी ओर मुसलमान मुजाहिद्दीनों की एक फ़ौज जामा मस्जिद से ज़ीनत-उल-मस्जिद के इर्द-गिर्द जमा हो गयी थी। इनमें गुड़गाँव से हिसार तक से आए मेवाती और अन्य मुसलमान, टोंक (वर्तमान राजस्थान) से आए वहाबी मुसलमान और अन्य जिहादी मंसूबों के मुसलमान शामिल हो गए थे। बरेली की ओर से बख़्त ख़ान के नेतृत्व में एक बड़ी फ़ौज आ रही थी। 

इनके अतिरिक्त आस-पास के गाँवों से जाट और गुर्जर दलों का आना-जाना लगा रहता। इनमें बड़ौत के शाह मल तोमर के नेतृत्व में जाट सेना उल्लेखनीय है, जिसमें तीन-चार हज़ार किसान शामिल थे।

अराजकता का नाज़ुक वक्त वह था, जब अंग्रेज़ दिल्ली से खदेड़े जा चुके थे, उनकी तरफ़ से युद्ध शुरू नहीं हुआ था मगर दिल्ली में लूट-पाट चल रही थी। 12 मई का ज़िक्र ज़हीर दहलवी ने कुछ यूँ किया है,

“वे किसी भी रईस का घर चुनते और कहते कि इसने मेमसाहेब या साहिब को छुपा रखा है। यह सुन कर दंगाइयों की फ़ौज घर में घुस जाती और उनको पूरी तरह लूट कर, बर्बाद कर बाहर निकलती”

कुछ आपसी झगड़े भी निपटाए गए। जैसे शिया समुदाय के प्रतिनिधि हामिद अली ख़ान पर गद्दारी का इल्जाम लगा कर घसीट कर लाया गया। वह बहादुर शाह ज़फ़र के हस्तक्षेप से बच पाए। दिल्ली की मशहूर मिठाई दुकानों और साहूकार महाजन नारायण दास की संपत्ति लूट ली गयी। एक ज़वेरी मोहनलाल का अपहरण कर दो सौ रुपए की फिरौती माँगी गयी, जो उन दिनों बड़ी रकम थी। इसी तरह दिल्ली की तवायफ़ों से ज़बरदस्ती करने के भी विवरण हैं। ये विवरण ब्रिटिशों के नहीं, बल्कि चुन्नी लाल, अब्दुल लतीफ़ और ज़हीर दहलवी जैसे भारतीयों के संस्मरण हैं।

जो बचे-खुचे अंग्रेज़ मिलते, उन्हें तो खैर मार ही दिया जाता। चुन्नी लाल का एक संस्मरण है-

“मुहम्मद अली के बेटे मुहम्मद इब्राहीम ने चार फिरंगियों को छुपा रखा था। पता चलते ही उन चारों को मार कर इब्राहीम का घर लूट लिया गया। एक फिरंगन हिंदू भेष में भाग रही थी, एलवबरो टैंक के पास मारी गयी।”

हिंदू सिपाहियों और मुसलमान जिहादियों के मध्य दरार भी आने लगी। जामा मस्जिद पर लग रहे ‘दर-उल-इस्लाम’ के नारे और मौलवियों के जिहादी फ़तवे उन्हें चुभने लगे थे। सिपाही जब उन मुसलमानों की तलाशियाँ लेने लगे, तो कुछ झड़प होने लगी। हिंदू सिपाहियों के मध्य बढ़ती शंकाओं को देख 14 जून को मौलवी मुहम्मद बकर ने दिल्ली उर्दू अख़बार में लिखा,

“मेरे हिंदू भाइयों! आपने अपने पवित्र ग्रंथों में पढ़ा कि हिंदुस्तान में कई हुकूमतें आयी और गयी। सभी एक न एक दिन खत्म हुई। आप तो यह भी जानते हैं कि रावण की राक्षसों की सेना को राजा रामचंद्र ने पराजित किया…आदिपुरुष के अतिरिक्त कुछ भी स्थायी नहीं।

आप यह समझें कि इस विदेशी कौम की सौ साल की हुकूमत ख़त्म करने की मियाद आपके भगवान ने दी है। क्योंकि इन्होंने आपके भाइयों और बहनों को हिकारत की नज़र से देखा है। यह वक्त आपके लड़ाई छोड़ कर जाने का नहीं, साथ लड़ने का है।”

अंग्रेज़ इस लुट रही दिल्ली, ठप्प पड़े व्यवसायों से हताश जनता, और मज़हबी तकरारों मे उन चेहरों को तलाशने लगी जो बन सकते थे उनके जासूस। उनके कुछ जासूसी चिट्ठे अब डिजिटाइज़ होकर भारत सरकार के अभिलेख-पटल वेबसाइट पर सार्वजनिक हैं। 
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

1857 की कहानी - तीन (3)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/11/1857-2_21.html 

Monday, 21 November 2022

प्रवीण झा / 1857 की कहानी - तीन (2)


                     चित्रः झोकन बाग,

जब रानी लक्ष्मीबाई की शर्तें डलहौज़ी ने नहीं मानी, तो झाँसी का किला कैप्टन स्कीन को सौंपना पड़ा। स्वयं रानी को एक दोमंजिला शाही महल और पाँच हज़ार मासिक पेंशन देकर शांत रखने की कोशिश की गयी। वह शांत तो नहीं रही। उनके और नाना साहेब के मध्य योजनाएँ बनने का एक प्रमाण तो कुछ चिट्ठियाँ हैं, दूसरी उनकी कार्यशैली (modus operandi) है। दोनों ही अंग्रेजों से संवाद बनाए रखते हुए गुप्त गतिविधियाँ कर रहे थे, जिसे कुछ ब्रिटिश वर्णनों ने, कपट कहा। 

मई, 1857 में कैप्टन स्कीन को सूचना मिली कि सिपाहियों में विद्रोह का षडयंत्र चल रहा है। दिल्ली से निकली एक चिट्ठी झाँसी की 12वीं इंफ़ैंट्री छावनी में मिला, जिसमें यह संदेश था- “जो सिपाही हमारा साथ नहीं देगा, वह हमारे जात का नहीं”। 5 जून को सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। कैप्टन स्कीन ने सभी ईसाइयों को झाँसी किले में बुलवा लिया, और अपनी क़िलाबंदी मज़बूत करने लगे। मगर उनके संसाधन बहुत कम थे।

8 जून को उन्हें विद्रोही सिपाहियों ने प्रस्ताव भिजवाया,

“अगर आप यह किला हमें वापस कर दें, तो हम आपके सभी लोगों को सुरक्षित रखने का वादा करते हैं।”

आगे के वर्णनों में अस्पष्टता है। छवि-निर्माण का दोतरफ़ा दबाव होता है और दस्तावेज पक्के नहीं मिलते। न ब्रिटिश इतिहासकारों और न ही भारतीयों में रानी लक्ष्मीबाई की शुरुआती भूमिका पर पक्की बात मिलती है। लेकिन, यह कम मुमकिन लगता है कि सिपाही-विद्रोह की पूर्व जानकारी उन्हें नहीं रही होगी।

कैप्टन स्कीन ने रानी को चिट्ठी भिजवायी, “आप सिपाहियों से यह हस्ताक्षरित आश्वासन दिलाएँ कि वह हमें सुरक्षित जाने देंगे।”

कानपुर में भी नाना साहेब के हस्ताक्षर कराने की बात कही गयी थी। यह अंग्रेज़ों को लगता होगा कि हस्ताक्षर पत्थर की लकीर है, मगर ऐसी कोई मान्यता 1857 के भारतीयों में नहीं दिखती। झाँसी के संदर्भ में यह भी वर्णित है कि लिखवाया गया- “अगर यह वचन तोड़ा गया, तो हिंदू गोमांस खाएँगे, और मुसलमान सूअर”। 

रानी से विमर्श के बाद सिपाहियों ने इस करारनामे पर हस्ताक्षर कर दिए। जब अंग्रेज़ झाँसी के किले से एक-एक कर निकल रहे थे, भारतीय सिपाहियों और नागरिकों का हुजूम यह नज़ारा देख रहा था। रानी लक्ष्मीबाई की आँखें अपने उस किले की वापसी देख रही थी, जो उनसे ‘हड़प नीति’ के तहत छीन लिया गया था। भले वास्तव में यह उतना फ़िल्मी न रहा हो, मगर घटनाक्रम कुछ यूँ ही थे।
                        मृतकों की सूची

किले के अंदर 18 पुरुष, 19 महिलाएँ और 19 बच्चे (कुल 56) यूरोपीय मूल के थे। उन सबको सिपाही बाहर निकाल कर झाँसी के एक छतरीदार बगीचे (अब मात्र मैदान) ‘झोकन बाग’ लेकर गए। वह स्थल उन दिनों झाँसी आने वाले संत-फ़कीरों का विश्राम-स्थल हुआ करता। उस दिन वहाँ उन्हें घेर कर तलवारों से काट दिया गया। एक गर्भवती महिला मिसेज मुटलो और उनके एक बच्चे को छोड़ कर हर अंग्रेज़ की हत्या कर दी गयी।

इस नरसंहार के बाद सिपाही हुंकार भरते हुए दिल्ली जाने की तैयारी करने लगे। 11 जून को पलटन दिल्ली रवाना हो गयी। 12 जून को रानी लक्ष्मीबाई ने सागर-नर्मदा क्षेत्र के कमिश्नर मेजर अर्सकिन को कुछ यूँ चिट्ठी लिखी, 

“मुझे इस बात का पश्चाताप है कि मैं आपके नागरिकों की रक्षा नहीं कर सकी। मेरे पास मात्र सौ-डेढ़ सौ रक्षक थे, जो उन सिपाहियों के लिए काफ़ी नहीं थे। बल्कि झाँसी के लोग और मैं स्वयं इस घटना के बाद घबराए हुए हैं।”

एक कुशल कूटनीति का नमूना 14 जून की अगली चिट्ठी में दिखता है,

“झाँसी और अन्य मुख्य नगरों की सुरक्षा के लिए हम अपनी सेना बढ़ा रहे हैं। किंतु हमें यूरोपीय आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होगी, ताकि अनुशासन बना रहे।”

2 जुलाई को मेजर अर्सकिन ने उत्तर लिखा,

“मुझे आपके हरकारे भवानी और गंगाधर द्वारा 12 और 14 जून के पत्र प्राप्त हुए हैं, और सामग्री को समझ लिया है।

मुझे उम्मीद है कि जल्द ही मैं झांसी में व्यवस्था बहाल करने के लिए अधिकारियों और सैनिकों को भेजने में सक्षम हो जाऊंगा। यूरोपीय सैनिकों को तेजी से देश को अशांत जिलों में भेजा जा रहा है, लेकिन जब तक कोई नया अधीक्षक झांसी नहीं आता, मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप जिले का प्रबंधन करें। ब्रिटिश सरकार के लिए राजस्व एकत्र करना, आवश्यक पुलिस जुटाना और अन्य उचित सरकार अनुमोदित व्यवस्था करना आपका उत्तरदायित्व है। जब नए अधीक्षक कार्यभार लेंगे, तो आपको कोई परेशानी नहीं देंगे और आपके सभी नुकसान और खर्च के लिए भुगतान करेंगे।

मैं आपको फारसी और हिंदी दोनों में अपनी मुहर और हस्ताक्षर के साथ एक उद्घोषणा भेजता हूँ जिसके अनुसार- आप अगले आदेश तक ब्रिटिश सरकार के नाम पर जिले पर शासन करेंगी…

आप मेरे वचन पर निर्भर हो सकती हैं कि भारत के सभी हिस्सों में जल्द ही व्यवस्था बहाल हो जाएगी। जो विद्रोही दिल्ली में एकत्र हुए थे, लगभग सभी युद्ध में मारे जा रहे हैं। जिन ग्रामीणों द्वारा लूट और हत्या की गई थी, उन्हें फांसी दी जा रही है। मैं आपको दिल्ली पर कब्जा करने की उद्घोषणा की एक प्रति संलग्न करता हूं।”

ब्रिटिश इतिहासकार जॉन केये तक ने लिखा है कि उनके पास कोई प्रमाण नहीं कि रानी लक्ष्मीबाई की नरसंहार में भूमिका थी। यह बात तो जुलाई में लॉर्ड कैनिंग के कानों तक पहुँचनी शुरू हुई कि, बिना रानी के गुप्त आदेशों के यह नरसंहार संभव नहीं था। इतिहासकार सॉल डेविड के अनुसार -

‘झाँसी और सतीचौरा एक जैसी ‘मराठा’ सोच थी, जिसमें अपने पत्ते तब तक पूरे नहीं खोले जाते जब तक जीत पक्की न हो’
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

1857 की कहानी - तीन (1) 
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प्रवीण झा / 1857 की कहानी - तीन (1)

चित्रः झांसी में स्कीन और उनकी पत्नी पर आक्रमण

“प्रातः पाँच बजे जाग कर इत्र-सुगंधित जल से स्नान करती थी। उसके बाद वस्त्र धारण करती। साधारण तथा सफ़ेद चंदेरी साड़ी उन्हें पसंद थी। तदनंदर पूजा पर बैठ जाती। विधवा होते हुए प्रायश्चित अर्घ्य देती, तुलसी वृंदावन में तुलसी की पूजा करती। उसके बाद पार्थिव पूजा करती।

दरबारी संगीतज्ञ साम-गायन करते। कथावाचक कथा सुनाते। मांडलिक सरदार वंदना करते। दरबार के साढ़े सात सौ दरबारियों में एक भी अनुपस्थित रहता तो कारण पूछती। पूजा-पाठ के बाद नाश्ता करती। कोई विशेष कार्य न होता तो एक घंटे आराम करती।

उसके बाद चाँदी की थालियों में रेशम वस्त्र से लपेट कर उपहार दिए जाते। उसमें पसंद की चीजें रख कर शेष सेवकों में वितरित करने कह देती। अपराह्न तीन बजे पुरुष वेश में दरबार जाती। उनकी वेशभूषा होती- पाजामा, गहरे नीले रंग का कोट, सर पर टोप और उसके ऊपर एक सुंदर पगड़ी। बूटी के काम किया हुआ दुपट्टा अपनी कमर में बाँधते जहाँ से एक तलवार लटक रही होती। इस वेश में वह साक्षात गौरी दिखती थी।

पुरुष वेश के अतिरिक्त कभी-कभी स्त्री वेश भी पहनती। विधवा होने के कारण नथनी आदि सौभाग्य अलंकरण नहीं धारण करती। कलाई में हीरे की चूड़ियाँ। गले में मोतियों का हार। कनिष्ठा उंगली में हीरे की अंगूठी। बालों में जूड़ा। सफ़ेद साड़ी और सफ़ेद कंचुकी।

दरबारी उन्हें प्रत्यक्ष नहीं देख पाते। उनका कक्ष अलग होता, जिसका दरवाज़ा दरबार में खुलता।”

- रानी लक्ष्मीबाई की दिनचर्या (मूल पुस्तक दत्रात्रेय बलवंत पारसनीस लिखित ‘महारानी लक्ष्मीसाहेब यांचे चरित्र’/ सावरकर की पुस्तक में भी उद्धृत) 

मार्च से जुलाई 1857 की गतिविधियों को अगर सिपाही विद्रोह मान भी लिया जाए, तो जुलाई के बाद पारंपरिक युद्धों के उदाहरण मिलेंगे। उनमें संगठित सेनाएँ, सेनापति, मोर्चे और युद्ध-क्षेत्र मिलते हैं। अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम से उसकी अप्रत्यक्ष तुलना हो सकती है। इसे धर्म-युद्ध कह कर समेटना इसलिए कठिन है क्योंकि यह किसी दो धर्मों के मध्य युद्ध नहीं था। यह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ़ कुछ रियासतों, ज़मींदारों, सिपाहियों, और आम नागरिकों के गुटों का संगठन था जो अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम में भी दिखता है। अंतर यह था कि वहाँ कि लड़ाई मूलतः ब्रिटिश मूल के लोगों और ब्रिटिशों के मध्य ही थी, जबकि भारत में यह भारतीय बनाम अंग्रेज़ थी। इस कारण भारतीय युद्ध को स्वतंत्रता संग्राम कहना अनुचित नहीं। 

जैसा मैंने पहले लिखा है कि पहले कार्ल मार्क्स ने इसे ‘वार ऑफ़ इंडिपेंडेंस’ कहा, और उसके बाद विनायक सावरकर ने स्वातंत्र्य संग्राम। आज की तारीख़ में दो विपरीत विचारधारा के लोग अगर इस नामकरण से सहमत थे, तो यह इतिहासकारों के मध्य सिर्फ़ अर्थ-विद्या (semantics) का प्रश्न रह जाता है।

इस युद्ध में दिल्ली, लखनऊ और कानपुर के मुख्य मोर्चों की भूमिका पहले बन चुकी है। झाँसी की एक घटना का विवरण यहाँ आवश्यक है, जो दिल्ली, सती चौरा, शाहजहाँपुर, बरेली आदि स्थानों पर हो रहे युद्धेतर नरसंहारों की शृंखला में है। 

क्रिस्टीना रोसेट्टी ने अलफ्रेड टेनिसन की तर्ज़ पर एक कविता लिखी ‘इन द राउंड टावर ऐट झाँसी’ जिसमें भारतीयों द्वारा ब्रिटिश अफ़सर स्कीन और उनकी पत्नी की हत्या का चित्रण है। यह कविता भारतीयों के खिलाफ़ है, और एक स्त्री कवि द्वारा एक रानी पर आक्षेप भी। लेकिन इससे सिद्ध होता है कि अंग्रेजों के मन में 1857 की छवि साधारण घटना नहीं बल्कि क्रीमिया युद्ध से मिलती-जुलती थी। 
 
“वे सौ आए, हज़ार आए
नहीं बची किरण आशा की
गर्जन करते झुंड नीचे
बढ़ते गए, बढ़ते गए, बढ़ते गए”

[A hundred, a thousand to one; even so; 
Not a hope in the world remained:
The swarming, howling wretches below
Gained and gained and gained.

Skene looked at his pale young wife:–
“Is the time come?”–“The time is come!”–Young, strong, and so full of life:
The agony struck them dumb.

Close his arm about her now,
Close her cheek to his,
Close the pistol to her brow–
God forgive them this!

“Will it hurt much?”–“No, mine own:
I wish I could bear the pang for both.”
“I wish I could bear the pang alone:
Courage, dear, I am not loth.”

Kiss and kiss: “It is not pain
Thus to kiss and die.
One kiss more.”–“And yet one again.”–
“Good bye”, “Good bye”]
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

1857 की कहानी - दो (19) 
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इतिहास की त्रुटिपूर्ण व्याख्या है, सावरकर के बचाव में, शिवाजी का उल्लेख / विजय शंकर सिंह

भाजपा के प्रवक्ता, सुधांशु त्रिवेदी ने यह कह कर कि, 'शिवाजी ने भी औरंगजेब को पांच पत्र लिखे हैं तो क्या उसे, उनका माफीनामा कहा जायेगा,' एक नया विवाद खड़ा कर दिया हे। शिवाजी ने निश्चित ही औरंगजेब को पत्र लिखे हैं, वे दिल्ली दरबार में भी हाजिर हुए थे, वहीं कैद भी हुए फिर कैद से निकल भागे और औरंगजेब से उनका लंबा युद्ध भी चला। फिलहाल, तो शिवाजी द्वारा, औरंगजेब को लिखा गया एक पत्र, पढ़िए। पत्र इस प्रकार है।

"बादशाह सलामत ! इस साम्राज्य-रूपी भवन के निर्माता बादशाह अकबर ने पूर्ण गौरव से 52 (चन्द्र) वर्ष राज्य किया। उन्होंने ईसाई, यहूदी, मुसलमान, दादूपन्थी, नक्षत्रवादी (फलकिया =गगनपूजक) , परीपूजक (मालाकिया), विषयवादी (आनसरिया), नास्तिक, ब्राह्मण, श्वेताम्बर-दिगम्बर, आदि सब धर्म सम्प्रदायों के प्रति सार्वजनीन मैत्री (सुलह-इ-कुल = सबके साथ शान्ति) की सुनीति को ग्रहण किया था। सबकी रक्षा और पोषण करना ही उनके उदार हृदय का उद्देश्य था । इसीलिए वे ‘जगद्गुरु’ कहलाए|
उसके बाद बादशाह जहाँगीर ने २२ वर्ष तक अपनी दया की छाया जगत और जगतवासियों के सिर के ऊपर फैलाई। उन्होंने बन्धुओं के तथा प्रत्यक्ष कार्य करने में अपना हृदय लगा दिया, और इस प्रकार मन की इच्छाओं को पूर्ण किया। बादशाह शाहजहाँ ने भी 32 वर्ष राज्य कर सुखी पार्थिव जीवन के फल स्वरूप अमरता अर्थात सौजन्य और सुनाम कमाया । फारसी का पद्य है- “जो आदमी जीवन में सुनाम अर्जन करता है, वह अक्षय धन पाता है, क्योंकि मृत्यु के उपरान्त उसके पुण्य-चरित्र की कथा ही उसके नाम को बनाए रखती है|”
(जदु नाथ सरकार, शिवाजी एंड हिस टाइम्स )

निश्चित ही जदुनाथ सरकार, का संदर्भ प्रमाणिक है क्योंकि वे, औरंगजेब पर एक आधिकारिक विद्वान माने जाते हैं। अब इस पत्र की तुलना, जब सावरकर द्वारा लिखे गए माफीनामे से करते है तो, हमें यह याद रखना होगा कि, यह पत्र, शिवाजी ने औरंगजेब को आगरा जेल से नहीं लिखा था। इतिहास में दर्ज है कि, जब मिर्ज़ा राजा जय सिंह के मनाने पर शिवाजी, औरंगजेब के दरबार में आते हैं तो, उन्हे कम मनसब वाले मनसबदारों की पंक्ति में खड़ा किया जाता है और जब शिवाजी अपनी आपत्ति जाहिर करते हैं तो, उनकी आपत्ति से उठा शोर सुनकर, औरंगजेब ने पूछा यह शोर कैसा है। तब मिर्ज़ा राजा जय सिंह ने कहा कि, दिल्ली की गर्मी से, शिवाजी असहज हो गया है। और कोई बात नही। पर औरंगजेब को यह बात समझ में आ गई कि, यह मामला दिल्ली की गर्मी का नहीं है और उसी समय शिवाजी को गिरफ्तार कर आगरा किले में बंद कर दिया जाता है।

शिवाजी आगरा किले से कैसे निकल भागते हैं और फिर मथुरा काशी होते हुए दक्षिण पहुंच जाते हैं, यह एक रोचक और लोकप्रिय किस्सा है। पर शिवाजी ने जेल से कोई माफी या कोई चिट्ठी नहीं लिखी थी। वे यह जानते थे कि, उनका मुकाबला एक बेहद समृद्ध और सशक्त सम्राट से है। शिवाजी ने युद्ध की रणनीति बदली। गुरल्ला युद्ध की शैली विकसित की और औरंगजेब के शब्दों में, इस पहाड़ी चूहे ने, औरंगजेब को इतना छकाया कि, उसके पच्चीस साल, दक्षिण में बीते और वहीं औरंगजेब का देहांत भी हो गया।

इस पत्र में शिवाजी, अकबर, जहागीर शाहजहां की तारीफ करते हैं और औरंगजेब को यह मशविरा भी देते हैं कि वह अपने पुरखों की तरह एक उदार नीति का अनुसरण करें। यह पत्र एक कूटनीतिक पत्र है। दो राजाओं के बीच का पत्र है। शिवाजी जितनी वीरता, युद्ध कौशल, जनता से संवाद, लोकप्रियता के लिए जाने जाते हैं, उतना ही, अपने कूटनीतिक दांव पेंच के लिए भी इतिहास में याद किए जाते हैं। उन्हे जाणता राजा यानी जनता का राजा, मराठी लोक साहित्य में कहा जाता है। 

सावरकर के आजीवन कारावास, अंडमान में उनको दी गई यातना, और अंडमान पूर्व उनके जीवन और स्वाधीनता संग्राम में, योगदान पर कोई विवाद नहीं है बल्कि जो कुछ भी उनपर आरोपित किया जाता है वह तो जेल से छूटने के लिए लिखे गए उनके माफीनामे, ब्रिटिश पेंशन, स्वाधीनता संग्राम से किनारा कर लेने और एक फासिस्ट तथा साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद की पैरोकारी से संबंधित है। पर आरएसएस और बीजेपी के मित्र, सावरकर के दोनो काल खंड को अलग अलग कर के नही। देखते हैं और वे निर्लज्जता तथा फूहड़ता से, माफीनामे से लेकर, जिन्ना से सावरकर की वैचारिक मित्रता और हमखयाली का भी बचाव करते हैं, और शिवाजी के बारे में यह कहना कि, शिवाजी ने भी, औरंगजेब को, पत्र लिखे थे तो क्या उसे माफी नामा कहा जायेगा, यह कुतर्क है, संदर्भ से अलग हटकर दिया गया बयान है और शिवाजी का अपमान करना भी है।

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान, राहुल गांधी का सावरकर के बारे में दिया गया उनका बयान और सावरकर के माफीनामे का उल्लेख, एक ऐतिहासिक तथ्य है और यह सब दस्तावेज,प्रकाशित हो चुके हैं और पब्लिक डोमेन में हैं। सावरकर के जीवन पर अध्ययन करने के लिये उनके जीवन को दो भागों में बांट कर देखना होगा। एक अंडमान के पहले का जीवन, दूसरा अंडमान के बाद का जीवन। अंडमान के काले पानी की सज़ा उनके जीवन मे एक टर्निंग प्वाइंट की तरह रही है। यह तथ्य कभी कभी अचंभित भी करता है कि 1857 के विप्लव को देश का प्रथम स्वाधीनता संग्राम घोषित करने वाला, ब्रिटेन में आज़ादी की अलख जगाने वाला, कैसे अंडमान की त्रासद यातनाओं से टूट कर माफी मांग कर आज़ाद हो गया और फिर वह उन्हीं अंग्रेज़ों के निकट भी आ गया जिनको उखाड़ फेंकने के वह मंसूबे बांधा करता था। कैसे एक नास्तिक व्यक्ति अचानक हिन्दुत्व की अलख जगाते जगाते, मुस्लिम लीग के सरपरस्त एमए जिन्ना का बगलगीर बन गया।

इतिहास और राजनीति संभावनाओं का खेल होती है, यहां कुछ भी हो सकता है। अखंड भारत और हिंदुत्व का सिद्धांतकार जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ मिलकर अंग्रेज़ों की कृपा से सरकार बनाता है, गांधी की हत्या के षडयंत्र का मुकदमा झेलता है और अंत मे उपेक्षित और खामोशी से आत्मार्पण कर के मर भी जाता है। अंडमान पूर्व और अंडमान बाद के सावरकर में यह विरोधाभासी अंतर क्यों है ? यह सावरकर के जीवन और कृतित्व पर अगर कोई शोध कर रहा है तो, उसे इन दृष्टिकोण से भी अध्ययन करना चाहिए।

प्रत्येक मनुष्य का जीवन एक ही पथ पर सदैव नहीं चलता है। पथ परिवर्तन होता रहता है। अंडमान के पहले के सावरकर, दृढ़ प्रतिज्ञ, स्वाधीनता संग्राम के सेनानी, एक इतिहासकार हैं, और अंडमान के बाद वही सावरकर, अंग्रेज़ो के समक्ष आत्मसमर्पित, क्षमा याचिकाओं का पुलिंदा लिये और स्वाधीनता संग्राम से अलग हटते हुए, नास्तिकता को तिलांजलि देकर धर्म की राजनीति करते हुए नज़र आते हैं। गांधी की हत्या के बाद, वही सावरकर, निंदित और हत्या के षड़यंत्र में, अदालत से बरी हो जाने के बाद भी, पूरी ज़िंदगी अकेले संत्रास में गुजारते हुये 1966 में प्राण त्याग देते हैं। ज़िंदगी के तीन पक्षों,अंडमान के पहले, अंडमान के बाद, और गांधी हत्या के बाद,  में यही सावरकर अलग अलग दिखते हैं। पर किस सावरकर की सराहना की जाय, किस सावरकर की आलोचना की जाय और किस सावरकर की भर्त्सना की जाय, यह सावरकर की, देश के प्रति भूमिका से ही, तय किया जा सकता है।

अंडमान पूर्व काल मे, सावरकर, न केवल स्वाधीनता-संग्राम से जुड़े थे, बल्कि उन्होंने 1857 के विप्लव के इतिहास को अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उन्होंने इस विप्लव को प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम कह कर इतिहास लेखन में एक नयी बहस की शुरुआत कर दी। अंग्रेजों की सिपाही विद्रोह की थियरी से बिल्कुल अलग यह दृष्टिकोण था। सावरकर एक नास्तिक और एक तर्कसंगत व्यक्ति थे जो, सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे ।

लेकिन वही सावरकर अंडमान की भयंकर यातना के कारण टूट गए और माफी मांग कर अंग्रेज़ो की सरपरस्ती में आ गए। उन्होंने धर्म की राजनीति शुरू कर दी। अगर आप, एमए जिन्ना का भी अतीत देखें तो धर्म के बारे में सावरकर और जिन्ना के बीच आश्चर्यजनक समता मिलेगी। जिन्ना भी मजहबी मुस्लिम नहीं थे। पर जब वह मुस्लिम लीग के सदर बने तो, मुसलमानों के सबसे बड़े नेता बन कर उभरे। सावरकर भी यही चाहते थे कि, वह हिंदुओं की एकल आवाज़ होकर उभरें। दोनों ही गांधी और उनके ब्रिटिश राज विरोधी आंदोलनों के विरुद्ध थे। दोनों ही अपने अपने धर्म के लिये अलग देश चाहते थे। अंग्रेज़ो के इशारे पर एक दूसरे के धर्म के विरुद्ध लड़ने वाले सावरकर और जिन्ना ने साझा सरकारें चलायी, अंग्रेजों का साथ दिया और स्वाधीनता संग्राम के सबसे प्रखर आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया ! पर जिन्ना, जहां धर्म के आधार पर अलग मुल्क पाने में सफल रहे, वही सावरकर, बुरी तरह से नकार दिए गए और उनके हिंदू राष्ट्र की थियरी को हिंदुओं ने ही कूड़ेदान में फेंक दिया।  लंदन में गांधी को मांसाहार न करने पर 'बिना मांस खाये कैसे अंग्रेज़ो से लड़ोगे' कह कर, गांधी की खिल्ली उड़ाने वाले सावरकर, गांधी के विराट प्रभामंडल में ब्लैक होल की तरह खो गये। हिंदू राष्ट्र का तर्क किसी भी सनातनी हिंदू के गले नहीं उतरा। सबने गांधी, पटेल, नेहरू, आज़ाद, सुभाष आदि धर्मनिरपेक्ष सोच के नेताओं का साथ दिया, और भारत आज़ाद होकर स्वाधीनता संग्राम की सांझी विरासत के सहारे ही समृद्ध होता गया और आज भी, तमाम झंझावत के बाद, उसी सोच पर अग्रसर है।

लेकिन इन तमाम पथ विचलन, और साम्प्रदायिक राजनीति और द्विराष्ट्रवाद के प्रवर्तन के बाद भी, सावरकर के अंडमान पूर्व जीवन को नजरअंदाज कर देना उनके साथ अन्याय होगा। हम अक्सर जब किसी की समीक्षा करते हैं तो या तो उसे नायक बनाकर न भूतो न भविष्यति के रूप में महिमामंडित कर चित्रित कर देते हैं या फिर उसे खलनायक बनाकर दशानन की तरह देखने लगते हैं। सावरकर की आलोचना और निंदा, उनकी अंडमान - बाद गतिविधियों और गांधी हत्या में भूमिका के लिये, की जानी चाहिये, क्योकि, अखंड भारत के सपने के साथ खंड खंड भारत करने वाली साम्प्रदायिक राजनीति के वे एक हिस्सा रहे हैं। पर अंडमान पूर्व जिस उत्साह और ऊर्जा के साथ वे स्वाधीनता संग्राम में थे, को भी याद किया जाना चाहिये।

सावरकर के प्रति किसी को भी अपनी श्रद्धा रखने का अधिकार है, पर सावरकर का घोर समर्थक भी इन तथ्यों से मुंह नहीं मोड़ सकता कि, अंडमान जेल से मुक्त होने के लिए, सावरकर ने कई माफीनामे ब्रिटिश सरकार को दिए थे, और ब्रिटिश सरकार ने, सावरकर को, कुछ शर्तो के साथ जेल से छोड़ा था।

अब सावरकर के माफीनामे के कुछ उद्धरण पढ़ें,"
० सरकार अगर कृपा और दया दिखाते हुए मुझे रिहा करती है तो मैं संवैधानिक प्रगति और अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादारी का कट्टर समर्थक रहूँगा जो उस प्रगति के लिए पहली शर्त है।
० मैं सरकार की किसी भी हैसियत से सेवा करने के लिए तैयार हूँ, जैसा मेरा रूपांतरण ईमानदार है, मुझे आशा है कि मेरा भविष्य का आचरण भी वैसा ही होगा।
० मुझे जेल में रखकर कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि रिहा करने पर उससे कहीं ज़्यादा हासिल होगा. केवल पराक्रमी ही दयालु हो सकता है और इसलिए विलक्षण पुत्र माता-पिता के दरवाजे के अलावा और कहां लौट सकता है?
० मेरे प्रारंभिक जीवन की शानदार संभावनाएँ बहुत जल्द ही धूमिल हो गईं. यह मेरे लिए खेद का इतना दर्दनाक स्रोत बन गई हैं कि रिहाई एक नया जन्म होगा. आपकी ये दयालुता मेरे संवेदनशील और विनम्र दिल को इतनी गहराई से छू जाएगी कि मुझे भविष्य में राजनीतिक रूप से उपयोगी बना देगी। अक्सर जहां ताकत नाकाम रहती है, उदारता कामयाब हो जाती है।"
० मैं और मेरा भाई निश्चित और उचित अवधि के लिए राजनीति में भाग नहीं लेने की शपथ लेने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. इस तरह की प्रतिज्ञा के बिना भी खराब स्वास्थ्य की वजह से मैं आने वाले वर्षों में शांत और सेवानिवृत्त जीवन जीने का इच्छुक हूँ. अब सक्रिय राजनीति में प्रवेश नहीं करूंगा।

लेकिन सावरकर ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया, 1937 में, पर आजादी के लिए नहीं, यूरोप के फासिस्ट राष्ट्रवादी मॉडल पर भारत को ले जाने के लिए। उन्हे साथ मिला जिन्ना का। एक नया सिद्धांत गढ़ा गया द्विराष्ट्रवाद, यानी हिंदू और मुस्लिम अलग अलग राष्ट्र हैं। श्रद्धा से इतिहास नहीं बदलता। 

सावरकर के अंडमान से छूटने के बाद, देश में जो महत्वपूर्ण स्वाधीनता संग्राम की घटनाएं घटी, वह इस प्रकार थीं।
० साइमन कमीशन का आना और उसका विरोध।
० लाला लाजपतराय पर बर्बर लाठी चार्ज और लालाजी की मृत्यु।
० भगत सिंह का असेंबली में बम फेंकना, उनकी गिरफ्तारी और ट्रायल।
० भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को फांसी। 
० कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज का संकल्प लेना।
० गांधी की दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह।
० भगत सिंह को फांसी।
पर सावरकर का कोई भी पैरोकार, यह नहीं बताता कि, इन सब गतिविधियों पर सावरकर की कोई भी प्रतिक्रिया क्यों नहीं मिलती है? वे खामोश क्यों रहे, इन सभी घटनाओं पर ? इन सब घटनाओं पर, उनकी चुप्पी ही उनकी माफी की शर्तों को प्रमाणित करती है। जब जब, सावरकर के बारे में कोई चर्चा छिड़ेगी तो, यह सवालात उठेंगे और इन्हे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। 

( विजय शंकर सिंह )


Sunday, 20 November 2022

अशोक ठाकुर / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पुण्यतिथि पर, उन्हे याद करते हुए.


बीसवीं सदी में फ़ैज़ जैसा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं हुआ!गुलामी से मुक्ति का महाकवि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़. आज फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पुण्यतिथि है। उनका देहांत 20 नवंबर 1984 को लाहौर (पाकिस्तान ) में हुआ था !

फ़ैज उन तमाम लेखकों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं जो समाज को बदलना चाहते हैं,  अमेरिकी साम्राज्यवाद की सांस्कृतिक-आर्थिक गुलामी और विश्व में वर्चस्व स्थापित करने की मुहिम का विरोध करना चाहते हैं,  सत्ता और राजनीतिक गुलामी से मुक्त होकर जनता की मुक्ति के प्रयासों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहते हैं। फ़ैज़ इन दिनों पश्चिम बंगाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। 

खासकर पश्चिम बंगाल में इन दिनों जिस तरह मार्क्सवाद को कलंकित करने का बांग्ला मीडिया और नव्य उदारपंथी बंगाली बुद्धिजीवियों ने उन्मादी प्रचार आरंभ किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है। मार्क्सवाद के बारे में फैलाए जा रहे घृणित मिथों को आज तोड़ने की जरूरत है। इन मिथों के निर्माण में मार्क्सवादी कट्टरपंथी  से लेकर नव्य उदार बांग्ला बुद्धिजीवियों की बड़ी भूमिका रही है!

मेरा मानना है कि मार्क्सवाद कोई मिथक नहीं हैं। रूढ़िवादिता भी नहीं है। किताबी तत्वशास्त्र नहीं है। यह जीवन और समाज को बदलने का विश्व दृष्टिकोण है। यह कोई पार्टीलाइन या पार्टी आदेश नहीं है। यह कम्युनिस्ट पार्टी की जी हजूरी भी नहीं है। यह किसी ममता बनर्जी या बुद्धदेव भट्टाचार्य का चारणशास्त्र नहीं है। मार्क्सवाद सामाजिक परिवर्तन का वैज्ञानिक नजरिया है।

आज भारत में अनेक प्रगतिशील कवियों और लेखकों ने भारत में सत्ता के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है। मजदूरों के पक्ष में बोलना बरसों से बंद कर दिया है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की मलाई खाने और प्रतिष्ठानी कर्मकांड का अपने को हिस्सा बना लिया है। खासकर उर्दू की प्रगतिशील कविता का तो और भी बुरा हाल है। उसमें मजदूरों-किसानें की हिमायत करके रहना तो एकदम असंभव हो गया है!

उर्दू के अधिकांश कवियों-साहित्यकारों ने मजलूमों के हकों के लिए जंग की बजाय सिनेमा उद्योग की जंग में सारी शक्ति लगानी बेहतर समझी है या आधुनिकतावादी चोगा पहन लिया है या फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है और खुल्लम-खुल्ला अमेरिकी नजरिए से उर्दू और मुसलमानों के मसलों को देख रहे हैं।

हिन्दी के जो प्रगतिशील आलोचक-लेखक-कवि फ़ैज़ पर सबसे ज्यादा समारोहों में नजर आ रहे हैं उनके हाथों में प्रतिवाद की कलम नहीं है। वे आजाद भारत में सत्ता के साथी रहे हैं,  खासकर आपातकाल में उनके हाथ जनतंत्र के खून से सने हैं। ऐसे लोग भी हैं जो अमेरिका और उसके सांस्कृतिक बदनाम संस्थानों को भारत में कला-संस्कृति के क्षेत्र में लेकर आए और उनके लिए कई दशकों से काम करते रहे हैं, ये लोग भी फ़ैज़ के जलसों में नज़र आएंगे।

 हमें थोड़ा ईमानदारी के साथ एक बार हिन्दी-उर्दू के साहित्यकारों और लेखकों के साहित्यिक कर्मकांड के बाहर जाकर फ़ैज़ की जिन्दगी के तजुर्बों की रोशनी में, उन मानकों की रोशनी में हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील साहित्य परंपरा और लेखकीय कर्म पर आलोचनात्मक नजरिए से विचार करना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ जिसके कारण फ़ैज़ ने सारी जिन्दगी सत्ता के जुल्मो-सितम के सामने समर्पण नहीं किया लेकिन उर्दू-हिन्दी के अधिकांश कवियों और लेखकों ने समर्पण कर दिया।

वह कौन सी चीज है जो फ़ैज़ को महान बनाती है ?
क्या कविता कवि को महान बनाती है ? क्या पुरस्कार महान बनाते हैं ? क्या सरकारी ओहदे महान बनाते हैं ? क्या कवि को राजनेताओं और पेजथ्री संस्कृति का संसर्ग महान बनाता है ?

 क्या लेखक को मीडिया महान बनाता है ? इनमें से कोई भी चीज कवि या लेखक को महान नहीं बनाती। कवि के व्यापक सामाजिक सरोकार,  उन्हें पाने के लिए उसकी कुर्बानियां और सही नजरिया उसे महान बनाता है।

कोई कवि महान है या साधारण है यह इस बात से तय होगा कि उसकी कविता और जीवन का लक्ष्य क्या है ? उस लक्ष्य को पाने के लिए वह कितनी कुर्बानी देने को तैयार है। कवि तो बहुत हुए हैं। फ़ैज़ से भी बड़े कवि हुए हैं।

 ऐसे भी कवि हुए हैं जो उनसे बेहतर कविता लिखते थे। ऐसे भी कवि हुए हैं जिनके पास सम्मान-प्रतिष्ठा आदि किसी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन यह सच है कि बीसवीं सदी में फ़ैज़ जैसा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं हुआ। मजदूरों-किसानों के हकों के लिए जमीनी जंग लड़ने वाला ऐसा महान कवि नहीं हुआ।

फ़ैज़ की कविता में जिन्दगी का यथार्थ ही व्यक्त नहीं हुआ है बल्कि उन्होंने अपने कर्म और कुर्बानी से पहले अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान में एक आदर्श मिसाल कायम की है।

 सर्वहारा के लिए सोचना, उसके लिए जीना और उसके लिए किसी भी कुर्बानी के लिए तैयार रहना यही सबसे बड़ी विशेषता थी जिसके कारण फ़ैज़ सिर्फ फ़ैज़ थे। मजदूरों की जीवन दशा पर उनसे बेहतर पंक्तियां और कोई लिख ही नहीं पाया। उन्होंने लिखा-

‘‘जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछा 
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.’’
मजदूरों के अधिकारों का हनन, उनका उत्पीड़न और उन पर बढ़ रहे जुल्म ही थे जिनके कारण उनकी कविता महान कविता में तब्दील हो गयी। मजदूर की पीड़ा उन्हें बार-बार आंदोलित करती थी, बेचैन करती। मजदूरों के हकों का इतना बड़ा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में दूसरा नहीं हुआ।

मात्र उर्दू कवि नहीं थे फ़ैज़ बल्कि मजदूर वर्ग के महाकवि थे। फ़ैज़ की कविता में जाति, धर्म, साम्प्रदायिकता, राष्ट्र, राष्ट्रवाद आदि का अतिक्रमण दिखाई देता है। उन्होंने सचेत रूप में समूची मानवता और मानव जाति के सबसे ज्यादा वंचित वर्गों पर हो रहे जुल्मों के प्रतिवाद में अपना सारा जीवन लगा दिया। वे मात्र उर्दू कवि नहीं थे। बल्कि मजदूर वर्ग के महाकवि थे। वे सारी जिंदगी सर्वहारावर्ग के बने रहे। वे अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान सर्वहारा की जंग के महायोद्धा बने रहे।

फ़ैज़ उन बड़े कवियों में हैं जिनकी चेतना ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सही अर्थों में अतिक्रमण किया था और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के मजदूरों-किसानों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कविता लिखने से लेकर जमीनी स्तर तक की वास्तव लड़ाईयों का नेतृत्व किया था। 

महाकवि फ़ैज़ का सियालकोट (पंजाब, पाकिस्तान) में 13 फरवरी 1911 को जन्म हुआ था।उर्दू कविता को नई बुलंदियों तक उन्होंने  पहुँचाया ।फ़ैज़ एक ही साथ इस्लाम और मार्क्सवाद के धुरंधर विद्वान थे। उनके घर वालों ने बचपन में उनको कुरान की शिक्षा दी।

 उर्दू-फारसी-अरबी की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अंग्रेजी और अरबी में एम.ए. किया था लेकिन वे कविताएं उर्दू में करते थे। फ़ैज़ ने 1942 से 1947 तक सेना में काम किया। बाद में लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्ता पलट करने की साजिश की जुर्म में 1951-1955 तक जेल की यातना भी सहनी पड़ी थी।

फ़ैज़ के व्यक्तित्व में जो बागीपन थे  उसका आधार है दुनिया की गुलामी,  गरीबी,  लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र। आज हमें 1983 के एफ्रो-अशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा दिए गए भाषण की याद आ रही है, यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है।फ़ैज़ ने कहा था इस युग की दो प्रधान समस्याएं हैं उपनिवेशवाद और नस्लवाद।

फ़ैज़ ने कहा था “हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है, कि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है, कि उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश साहित्य को सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद ज़रूरी है।”

फ़ैज़ ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा है: ”तमाम युद्धों के अंत की तरह, लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक, नैतिक और साहित्यिक बूर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग़ में अहं का उन्माद उफनने लगा था। ख़ुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मज़े में चल रहा था।"

" नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन, अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव, रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ ‘कला के लिए कला’ के उद्धबोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।”

आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढांचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो खयाल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया। फ़ैज़ इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे!

द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में फ़ैज़ ने लिखा,  
“युद्ध के बाद का हमारा समय,  विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग, विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग, उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग, बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का ज़माना। तीसरी दुनिया की जनता के लिए, एशियाई, अफ्रीकी और लातीनी अमेरिकी लोगों के लिए, कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए, किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जायेंगे-‘ वह बेहतरीन वक़्त था, वह बदतरीन वक़्त था।’ 

अपने दो-दो विश्वयुद्धों से थके हुए साम्राज्यवाद का कमज़ोर पड़ते जाना, सोवियत सीमाओं का विस्तार लेता और एकजुट होता समाजवादी ख़ेमा, संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म, राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति के आंदोलनों का उदय और उनकी सफलताएँ, सभी कुछ एक साहसी नयी दुनिया का वादा कर रहे थे जहां स्वतंत्रता, शांति और न्याय उपलब्ध हो सकता था। पर हमारी बदकिस्मती से ऐसा नहीं था।”

परमाणु हथियारों की दौड़ पर फ़ैज़ ने लिखा है:
“आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आज़ाद करते हुए अमेरिका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साये की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने झूल रही हैं .उतनी पहले कभी न थी।”

राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। 

इसके बारे में फ़ैज़ ने लिखा- “स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढ़ोल नगाड़ों के शोर के साथ अमेरिकन शासन तंत्र ने यहां वहां ढ़ेर सारे निरंकुश राजाओं-सुल्तानों, ख़ून के प्यासे अधिनायक-तानाशाहों, बेदिमाग़ दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों, जिस पर भी हाथ रख सकें, को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है। "

"यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमेरिकन विदाई के साथ कुछ वक़्त के लिए रुक सी गयी थी। फिर रोनाल्ड रीगन के ज़माने से हम अमेरिकनों और उनके नस्लवादी साथियों को यहां-वहां भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में जैसे बिखरे बारूद के ढ़ेरों के आसपास देख रहे हैं।”

अमेरिका द्वारा संचालित शीतयुद्ध और तीसरी दुनिया में स्वतंत्र सत्ताओं के उदय के साथ पैदा हुई परिस्थितियों ने समाज, साहित्य, संस्कृति और संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इसके कारणों पर प्रकाश ड़ालते हुए फ़ैज़ ने लिखा है- “नये शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढ़ह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग, सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गयी है। 

नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने, उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक को तमाम सामाजिक ज़िम्मेदारियों से मुक़्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। 

अब परिस्थिति बदलने की अथक चेष्टा हो रही है और इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है!
मैं उनको अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं !

अशोक ठाकुर 
© Ashok Thakur