Friday, 11 February 2022

नेताजी सुभाष (4) काबुल से यूरोप / विजय शंकर सिंह

         (फ़ोटो - नेताजी सुभाष और एमिली)

31 जनवरी 1941 की रात तक सुभाष मुहम्मद ज़ियाउद्दीन के वेश में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंच गए थे। 16/17 जनवरी की रात कलकत्ता के एल्गिन रोड से उनका यह सफ़र शुरू हुआ था, और 31 जनवरी से वे काबुल में थे। अब करना क्या है, इसकी रूपरेखा सुभाष के दिमाग मे तैयार थी। काबुल उनकी मंज़िल नहीं थी, एक पड़ाव था। वे इस शहर से, विराट युद्धक्षेत्र में तब्दील हो चुके यूरोप की ओर जाना चाहते थे। उनके सामने तीन विकल्प थे। या तो वे रूस चले जांय, जो फिलहाल इस युद्ध से अलग था। रूस का जर्मनी से युद्ध न करने का समझौता था। यह समझौता हिलटर और स्टालिन के बीच हुआ था। दूसरा विकल्प जर्मनी था। जहां का तनाशह एडोल्फ हिटलर था। जो धुरी राष्ट्रों की एक मज़बूत धुरी था। तीसरा विकल्प इटली था। नेताजी सुभाष ने सोचा कि रूस सबसे बेहतर होगा और उन्होंने रूस जाने की योजना फिलहाल बनाई। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में अंतरराष्ट्रीय जासूसी का केंद्र बन चुके काबुल में, सुभाष चंद्र बोस को यूरोप पहुंचने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिये एक कष्टप्रद प्रतीक्षा भी करनी पड़ी। मियां अकबर शाह से उनकी बस यही उम्मीद थी कि, वे सुभाष को, निरापद रूप से काबुल पहुंचा देंगे और अकबर शाह ने सुभाष की यह उम्मीद पूरी भी कर दी थी। सुभाष ने सोचा था कि, रूसी दूतावास, उन्हें शरण दे देगा और उन्हें मास्को सुरक्षित पहुंचाने में मदद कर देगा। रूस विश्वयुद्ध में शामिल है भी नहीं तो, उन्हें कोई दिक्कत भी नहीं होगी। पर यह इतना आसान भी नहीं था।

31 जनवरी को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंचने पर, रहमत खान और उनके मूक-बधिर रिश्तेदार जियाउद्दीन उर्फ सुभाष को काबुल शहर के लाहौरी गेट के पास एक सराय में ठहरने की जगह मिली। 17 दिन की लगातार यात्रा, जगह जगह प्रवास, पश्चिमी पहाड़ो की ठंड, विपरीत खानपान ने उन्हें शारिरिक रूप से थोड़ा अस्वस्थ भी कर दिया था। पर उनका उत्साह और ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का दृढ़ संकल्प, जस का तस था। गोमो रेलवे स्टेशन से सुभाष को विदा करने के बाद जब, अशोक, शिशिर और मीरा अपने घर, बरारी पहुंचे तो रात में आपस मे बातचीत करते हुए अशोक ने शिशिर से कहा था कि, काकू शायद रूस, निकल जांय। अशोक बोस का यह अनुमान, रूस की अफ़ग़ानिस्तान से सटी सीमा और रूस में कम्युनिस्ट शासन होने के कारण था। शिशिर ने रूस में क्रांतिकारी शासन होने के तर्क की बात तो मानी, पर उनका अनुमान था कि, सुभाष, भले ही रूस के रास्ते से जांय, पर वे जर्मनी ही जाएंगे। शिशिर, इस पूरी योजना के सबसे बड़े राजदार थे और नेताजी सुभाष के सबसे प्रिय भतीजे भी वे थे। उधर, काबुल में पहले कुछ दिनों के दौरान, भगत राम उर्फ ​​रहमत खान ने सोवियत रूस के दूतावास से संपर्क स्थापित करने के लिए कुछ प्रयास किये पर वे सफल नहीं हो सके। नेताजी कब तक सराय में पड़े पड़े, दिन काटते। आखिर उन्होंने, भगत राम उर्फ रहमत अली के बजाय खुद ही अपने स्तर से, यूरोप जाने के मिशन पर लग जाने का निश्चय किया।

सुभाष बाबू का उद्देश्य रूस में डेरा जमाना नहीं था, बल्कि रूस की सहायता से जर्मनी पहुंचना था। सुभाष अपने मिशन के बारे में स्पष्ट थे कि, उन्हें उन भारतीय युद्धबंदियों को धुरी राष्ट्रों की सैनिक जेल से छुड़वा कर एक सैन्य अभियान ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ छेड़ना है। ब्रिटेन के साथ तो जर्मन और इटैलियन युद्ध लड़ रहे थे, न कि सोवियत रूस। युद्ध मे जैसा कि, खबरें आ रही थीं, ब्रिटिश हार रहे थे तो, वे युद्धबंदी भी, या तो जर्मन जेल में होंगे या इटालियन। जब जर्मनी ही जाना है तो क्यों न जर्मन दूतावास से ही संपर्क किया जाय। यह सोचकर सुभाष अचानक, एक सुबह, काबुल स्थित जर्मन दूतावास पहुंच गए। जर्मनी और रूस के रिश्ते दोनों देशों के बीच, हो रखी अनाक्रमण संधि के कारण, फिलहाल दोस्ताना थे। काबुल के जर्मन दूतावास में वहां नियुक्त मंत्री (दूतावासों में भी मंत्री पदनाम से अधिकारी होते हैं, पर वे सरकार के मंत्री नहीं होते हैं)  हैंस पिगर ने 5 फरवरी को सुभाष से मुलाकात की और सुभाष ने अपने आने का उद्देश्य उन्हें बताया। यूरोपियन के लिये सुभाष का नाम न तो अनजाना था, और न ही सुभाष के लिये यूरोप के देश अनजाने थे। सुभाष इस दौरे के पहले भी अपना अच्छा खासा समय यूरोप में बिता चुके थे। जब अंग्रेज़-सरकार ने सुभाष को 1934 में देश से निर्वासित किया था तो वियना पहुंचे थे। वहां उनका इरादा अपनी आत्मकथा लिखने का था। यूरोप में ही, उन्होंने अपने एक मित्र डॉक्टर माथुर से कहा कि, "उन्हें एक ऐसा स्टेनो चाहिए, जो अंग्रेज़ी समझता हो और टाइपिंग में तेज़ हो, ताकि वह वियना में अपने समय का उपयोग आत्मकथा लिखने में कर सकें." डॉक्टर माथुर वियना में ही डॉक्टर थे। वह एमिली शेंकल को जानते थे, जो जर्मन के साथ अंग्रेज़ी भाषा की भी जानकार थी और स्टेनोग्राफ़र का कोर्स कर चुकी थी। यही एमिली, सुभाष बाबू की स्टेनोग्राफर बनीं और सुभाष की पुस्तक द इंडियन स्ट्रगल, वहीं लिखी गयी। 1937 में, सुभाष बाबू ने, एमिली से विवाह भी कर लिया था, पर इसे कुछ कारणों से सार्वजनिक नहीं किया गया। इस प्रकार, सुभाष के लिये, यूरोप और वहां की परिस्थितियां अपरिचित नहीं थीं।

काबुल के जर्मन दूतावास के मंत्री, हेंस पिंगर ने सुभाष के जर्मन दूतावास में आने, उनके उद्देश्य और उनसे मुलाकात का पूरा विवरण, जर्मनी के विदेशमंत्री, को फोन से बताया और एक लिखित रिपोर्ट तार से भेजी। सुभाष को, हेंस पिंगर ने कहा कि, 'वे अपनी सुरक्षा पर ध्यान दें और काबुल में जो उनके भारतीय दोस्त हैं, उनके बीच मे ही रहें और जर्मन सरकार की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करें।' सुभाष इस मुलाकात की पहली प्रतिक्रिया से संतुष्ट हुए और वे वापस अपने ठिकाने पर आ गए। उधर, जर्मन दूतावास ने रूसी दूतावास से सम्पर्क कर, सुभाष के बारे में बताया और उन्हें यूरोप पहुंचने के लिये सहयोग करने के लिये समझाया। पहले तो रूसी राजदूत थोड़ा सशंकित हुआ और एक विचित्र संदेह व्यक्त किया कि, "रूस के माध्यम से यूरोप की तरफ यात्रा करने की सुभाष बोस की इच्छा के पीछे कोई ब्रिटिश साजिश भी हो सकती है। कहीं यह रूस और अफगानिस्तान के बीच संघर्ष पैदा करने की कोई योजना तो नहीं है?" लेकिन फिर हेंस फ़िल्गर ने रूसी राजदूत को भारत के स्वाधीनता संग्राम की भूमिका और सुभाष के बारे में विस्तार से समझाया और जानकारी दी। यह भी कहा कि, " सुभाष की यूरोप यात्रा को संभव बनाने के लिए आगे की कार्रवाई के रूप में मास्को स्थित, सोवियत रूस की सरकार को, यह मामला भेजा जाय और जर्मनी भी इस विषय पर रूसी सरकार से बात करेगा।" हेंस फ़िल्गर ने काबुल स्थित इतालवी राजदूत को, पहले ही यह सब जानकारी दे दी थी, और इतालवी राजदूत ने इन सब गतिविधियों और सुभाष के बारे मे सारी सूचनाएं, अपनी सरकार के संज्ञान में ला भी दिया था। 8 फरवरी  1941 को बर्लिन में इतालवी चार्ज डी'एफ़ेयर ने, जर्मनी के विदेश विभाग के बड़े अफसर, अर्नस्ट वोरमैन से बात की और कहा कि, "जर्मन विदेश मंत्रालय, रूस के रास्ते से सुभाष बोस की जर्मनी यात्रा सम्पन्न कराने के लिये, यदि जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने अपनी सहमति दी तो, इटली की सरकार भी, मास्को से, अपने बेहतर संबंधों के चलते, सहयोग का अनुरोध कर सकती है।" इस पर अर्नेस्ट वोरमैन ने इटली के चार्ज डी'अफेयर को उत्तर दिया कि "इतालवी राजदूत को "मास्को में जर्मन राजदूत," काउंट शुलेन बर्ग के संपर्क में रहना चाहिए।" अब सुभाष को जर्मनी के साथ साथ इटली का भी सहयोग मिल गया। अब सोवियत रूस का सहयोग लेने की जिम्मेदारी, जर्मनी के साथ साथ इटली की भी हो गयी। सुभाष बाबू के मिशन के लिये यह एक बेहद सकारात्मक कदम था। सुभाष अब निश्चिंत होने लगे थे।

जब तक, बर्लिन और मॉस्को में उच्चतम स्तर से, सुभाष की यूरोप यात्रा की अनुमति नहीं मिल जाती, तब तक सुभाष बोस को, प्रतीक्षा करने के लिये कहा गया। उन्हें यह भी कहा गया कि, वे जर्मन और इतालवी दूतावास में खुद न आएं, बल्कि उन्हें संपर्क बनाए रखने के लिये जर्मन दूतावास ने एक संपर्क सूत्र भी दिया। वह व्यक्ति था, जर्मनी के मशीनरी उद्योग की प्रमुख कम्पनी, सीमेंस के एक अधिकारी, हेर थॉमस। हेर थॉमस के माध्यम से काबुल में जर्मनों के संपर्क में सुभाष को अब रहना था। लेकिन, सुभाष और भगत राम अब भी मुहम्मद ज़ियाउद्दीन और रहमत अली के छद्म रूप और नाम से, सराय में ही रुके हुए थे। पर सराय में मुहम्मद जियाउद्दीन और रहमत खान के लिए, अब अधिक दिनों तक, रुकना, खतरनाक होता जा रहा था। एक अफगानी पुलिसकर्मी जो सराय में ख़ुफ़िया सूचनाओं की तलाश में नियमित रूप से आता रहता था, उसे इन दोनों पर संदेह होने लगा था। यह बात नेताजी सुभाष और भगत राम दोनों ही भांप गए थे। उसे शांत करने के लिये, रिश्वत देनी पड़ी। पहले उसे कुछ पैसे दिए गए बाद में उसने सुभाष बाबू से, उनकी सोने की कलाई घड़ी मांग ली, जो उनके पिता ने, उन्हें उपहार में दी थी। सुभाष को उसकी खुफियागिरी से बचने के लिये पिता का उपहार, कलाई घड़ी दे देनी पड़ी। अब उन्हें लगा कि, सराय में रुकना निरापद नहीं है तो, फरवरी के दूसरे सप्ताह में, भगत राम ने पेशावर में, अपने  एक पुराने परिचित उत्तम चंद मल्होत्रा ​​की तलाश की, जो काबुल के भारतीय इलाके में एक दुकान के मालिक थे। भगत राम ने सुभाष बोस को उत्तम चन्द्र मल्होत्रा के घर में शरण देने के लिए तैयार किया और वे राजी भी हो गए। पर वहां भी उत्तम चंद्र मल्होत्रा के एक पड़ोसी को कुछ संदेह होने लगा। उत्तम चंद इससे घबरा गया। सुभाष, उत्तम चंद्र की घबराहट देखकर कहीं और ठिकाना बनाना चाहते थे, लेकिन कोई और सुरक्षित स्थान मिल भी नही रहा था और वे उस समय कुछ अस्वस्थ भी हो गए थे। जर्मनी से स्पष्ट संकेत मिलने में देरी के कारण भगत राम ने पेशावर के एक भगोड़े की सहायता से सुभाष बोस को सोवियत रूस की सीमा में अवैध रूप से भेजने पर भी विचार किया। वह भगोड़ा, भगत राम का दोस्त था और अफगानिस्तान सोवियत सीमा पर ही स्थित एक गांव में रहता था। लेकिन इसमें और भी जोखिम थे। सुभाष को, अब केवल जर्मन दूतावास से आने वाली अच्छी खबर का इंतजार था।

उहापोह के इस कठिन काल में, अचानक सुभाष बाबू को एक अच्छी खबर मिली। उन्हें सीमेंस कम्पनी के हेर थॉमस, जो उनके और जर्मन दूतावास के बीच एक संपर्क सूत्र थे, द्वारा एक संदेश प्राप्त हुआ कि सुभाष चंद्र बोस को, 'यदि वे अपनी कार्ययोजना को लेकर गम्भीर हैं तो, उन्हें काबुल स्थित इटली के दूतावास में जाकर, इतालवी राजदूत पिएत्रो क्वारोनी से मिलना चाहिए।' सुभाष के लिये इससे उत्साहवर्धक खबर, दूसरी हो ही नहीं सकती थी। 22 फरवरी, 1941 की शाम को सुभाष बोस इतालवी राजदूत और उनके सहयोगियों से मिलने इतालवी दूतावास पहुंचे। सुभाष की वह रात, दूतावास में ही बीती। इतालवी राजदूत से, सुभाष की विस्तार से चर्चा हुयी और रात्रि भोज के बाद भी, सुभाष, क्वारोनी से रात भर तरह तरह की संभावनाओं और समस्याओं पर चर्चा करते रहे। क्वारोनी, सुभाष से मिलकर, सुभाष के मिशन, कार्ययोजना, देश की आज़ादी के प्रति, उनके निष्ठापूर्ण समर्पण से गहरे प्रभावित हुए। 'हिज मैजेस्टीज ओप्पोनेंट' में सुगता बोस लिखते हैं कि,
"क्वारोनी की सुभाष के प्रति धारणा बनी कि, थे, "वे बुद्धिमान, सक्षम, जुनून से भरे हुए और निस्संदेह सबसे यथार्थवादी, भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं में एकमात्र यथार्थवादी हो सकते हैं।" दोनों ने, अफगानिस्तान से बाहर निकलने के वैकल्पिक तरीकों और रास्तों पर विचार किया। क्वारोनी अभी अपनी सरकार से कुछ और निर्दशों की प्रतीक्षा में थे। उन्होने इस आत्मीय और विस्तृत मुलाकात का विवरण, इटली के विदेश मंत्री को भेज दिया और वे इसकी प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे। क्वारोनी ने एक विकल्प यह सुझाया कि,
"सुभाष को यूरोप तक की यात्रा के लिये इतालवी डिप्लोमेटिक पासपोर्ट भी दिया जा सकता है, अगर सोवियत रूस, उन्हें ट्रांजिट वीजा जारी करने के लिए सहमत हो जाय तब। एक विकल्प यह सोचा गया कि, सुभाष, ईरान और इराक के रास्ते यूरोप की यात्रा कर सकते हैं। पर यह विचार कि सुभाष बोस अपने दम पर ही अफगान-सोवियत सीमा पार करने की कोशिश कर सकते हैं, को अव्यवहारिक और जोखिम भरा मानते हुए, सिरे से खारिज कर दिया गया था।"
कुल मिला कर सुबह हो रही थी और सुभाष इस मुलाकात से खुश नजर आएं। अब निर्णय , इटली सरकार को करना था, और सुभाष बाबू को उत्तम चंद्र मल्होत्रा के यहां रुक कर एक अच्छी खबर का इंतजार था।

इटालियंस, बोस की मदद करने की कोशिश कर रहे थे। सुभाष की इतालवी राजदूत से चर्चा के बाद सबकुछ सकारात्मक हो रहा था। इसी बीच एक और महत्वपूर्ण घटना घट गई। 27 फरवरी 1941 को, अंग्रेजों ने 23 फरवरी का एक इतालवी टेलीग्राम इंटरसेप्ट किया और उसे जब डिकोड किया, तो उन्हें पता चला कि उनका सबसे प्रखर दुश्मन यानी सुभाष, काबुल में हो सकते हैं। ब्रिटेन के स्पेशल ऑपरेशंस एक्जीक्यूटिव (एसओई) ने इस्तांबुल और काहिरा में अपने प्रतिनिधियों को सूचित किया कि सुभाष, "अफ़ग़ानिस्तान से ईरान और तुर्की के रास्ते, जर्मनी के लिए एक महत्वपूर्ण गोपनीय जानकारी के साथ यात्रा कर रहे है।" इसके बाद, इसी सन्देश में पूछा गया कि, "वे उनकी हत्या के लिए वे क्या व्यवस्था कर सकते हैं।" सुभाष के यूरोप मार्ग का यह भी एक वैकल्पिक रूट था। पर सुभाष तो उस रूट पर गए ही नहीं। उन्होंने मध्य पूर्वी मार्ग का विकल्प अभी तो चुना ही नहीं था। सच तो यह है कि वे अभी काबुल में ही थे, और वे किस रास्ते से यूरोप पहुंचेंगे, यह अभी तय भी नहीं था। इसे सुभाष को तय करना भी नहीं था, बल्कि सुभाष को किस रास्ते से भेजना है यह तय तो इटली और जर्मनी को करना था। अब यह तार, ब्रिटिश इंटेलिजेंस एजेंसी को भ्रम में रखने के लिये भेजा गया था या यह कोई और षडयंत्र था, यह साफ नहीं हो सका। बहरहाल, सुभाष सुरक्षित थे और काबुल में थे। 3 मार्च को, जर्मन राजदूत काउंट शुलेनबर्ग ने मास्को से बर्लिन को फोन किया: "विदेशी मामलों के लिए कमिश्रिएट ने सूचित किया कि सोवियत सरकार सुभाष बोस को वीजा देने के लिए तैयार है। अफगानिस्तान से जर्मनी की यात्रा के लिए कमिश्रिएट से अनुरोध किया गया है कि वह तदनुसार काबुल में सोवियत दूतावास को निर्देश दे।"

अब तक जो गतिविधियां सुभाष को यूरोप भेजने के लिये की जा रही थी, उससे सुभाष कुछ कुछ निश्चिंत हो चले थे। जर्मन, रूसी और इटालियंस ने मिलकर सुभाष बाबू के अफगानिस्तान से बाहर निकालने और यूरोप तक पहुंचाने का इंतजाम कर दिया था। ईरान और तुर्की का रास्ता नहीं चुना गया था, जहां ब्रिटिश सरकार ने उनकी हत्या की साज़िश रच रखी थी। अचानक 10 मार्च, 1941 को, इतालवी राजदूत की पत्नी, जो रूसी थीं, सुभाष चंद्र बोस के लिए, इटली सरकार का एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर, उत्तम चंद मल्होत्रा की दुकान पर आईं। सुभाष से उनकी मुलाकात हुयी। उन्होंने सुभाष के फोटो खिंचवाये और उनके लिये नए यूरोपियन परिधान की व्यवस्था की। सुभाष की नयी पासपोर्ट फ़ोटो, एक इतालवी  राजनयिक कूरियर ऑरलैंडो माज़ोट्टा के पासपोर्ट पर चिपकाई जाएगी, और मुहम्मद ज़ियाउद्दीन, उर्फ सुभाष को एक नया नाम और पहचान प्राप्त होगा। वे अब ऑरलैंडो माज़ोट्टा के नए रूप में सबके सामने आने वाले थे। यह सब इतना गोपनीय था कि, राजदूत क्वारोनी को, इस काम के लिये अपनी कुलीन पत्नी को भेजना पड़ा। 17 मार्च 1941 को, कलकत्ता छोड़ने के ठीक दो माह बाद वे, ऑरलैंडो माज़ोट्टा के रूप में, एक अन्य इतालवी राजनयिक, सिग्नोर क्रेस्किनी के घर में स्थानांतरित कर दिये  गये थे। उन्होंने 22 मार्च को अपनी राजनीतिक थीसिस तैयार की, साथ ही, अपने देशवासियों के लिये अपना संदेश लिखा और भेजने का स्थान लिखा, "यूरोप में कहीं से", तथा, बांग्ला में एक निजी पत्र अपने बड़े भाई शरत चंद बोस के नाम लिख कर भगत राम को दिया और कहा कि, यह सब उनके काबुल से निकल जाने के बाद डाक से भेजा जाए। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थी। वे उत्तम चंद्र और भगत राम का आभार व्यक्त करके इतालवी दूतावास में आ गये थे। ऑरलैंडो माज़ोट्टा का पासपोर्ट पर, सुभाष, दो दिन बाद, जब कार से काबुल छोड़ रहे थे, तो भोर होने वाली थी और ठंड भी पड़ रही थी। उनके साथ वेंगर नामक एक जर्मन इंजीनियर और दो अन्य सज्जन थे।  ऐतिहासिक शहर समरकंद पहुंचने के पहले, उन्होंने हिंदुकुश रेंज के पहाड़ी दर्रों को पार किया और ऑक्सस नदी को पार करके अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से वे बाहर आ गए। अब वे सोवियत रूस की सीमा में थे। रूस की सीमा से सुभाष और उनके सहयात्रियों ने कार छोड़ दी और ट्रेन से मास्को के लिये रवाना हो गए। मास्को के जर्मन राजदूत, काउंट शुलेनबर्ग ने, मास्को से, 31 मार्च 1941 को, बर्लिन को यह संदेश भेजा कि, "सुभाष चंद्र बोस, जिनके पास ऑरलैंडो माज़ोट्टा के नाम से एक इतालवी पासपोर्ट है, वह दूतावास में आ गए हैं।" साथ ही यह भी उस संदेश में जोड़ा कि, उन्हें बता दिया गया है कि, "जैसे ही वे बर्लिन पहुंचें, तत्काल जर्मनी के विदेश मंत्रालय से संपर्क करें।"

अब यह एडवेंचर यात्रा समाप्त होने वाली थी। सुभाष 2 अप्रेल की सुबह, अपनी मंज़िल बर्लिन पहुंच गए थे। बर्लिन पहुंचते ही सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी एमिली को एक पत्र लिख कर अपने बर्लिन पहुंचने की सूचना दी। सुभाष का कठिन यात्रागत प्रवास फिलहाल खत्म हुआ। " तुम मेरा यह पत्र पाकर हैरान होगी। और उससे अधिक तुम्हे आश्चर्य यह जानकर होगा कि, मैं यह पत्र बर्लिन से लिख  रहा हु।" सुभाष के पत्र की यह शुरुआती पंक्तियां थीं, जो उन्होंने एमिली को लिखी थी। उन्हें जर्मनी के विदेश मंत्रालय में जाकर अपने आगमन की सूचना देनी थी। भविष्य की योजनाएं बनानी थीं और फिर उन योजनाओं को धरातल पर लाना भी था। पूरे ढाई महीने हो गए थे सुभाष को कलकत्ता छोड़े। सुभाष से मुहम्मद ज़ियाउद्दीन, फिर ऑरलैंडो माज़ोट्टा होते हुए फिर से वे सुभाष चंद्र बोस के अपने असली रूप में आ गए थे। यूरोप में दूसरा विश्वयुद्ध जारी था। धुरी राष्ट्र जर्मनी और इटली का यूरोप में, और जापान का पूर्व में सैनिक अभियान, प्रगति पर था। ब्रिटिश साम्राज्य अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर में था, और नेताजी, बर्लिन से सिंगापुर जाने की योजना बना रहे थे।
(समाप्त)

(विजय शंकर सिंह)

यह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कलकत्ता से स्वनिर्वासित होकर यूरोप तक पहुंचने की कथा थी। यह विवरण उनकी जीवनी पर लिखी कई पुस्तकों पर आधारित है। जिनमे प्रमुख हैं, शीतांशु दास की सुभाष अ पॉलिटिकल बायोग्राफी, मिहिर बोस की द लॉस्ट हीरो, सुगता दास की हिज मैजेस्टीज ओप्पोनेंट।

(यह पूरा विवरण, चार लेखों में है। पहले के तीन लेखों का लिंक नीचे है, इसे आप यहां पढ़ सकते हैं)

1. नेताजी सुभाष (1) आमार एकटा काज कोरते पारबे ?
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/01/blog-post_72.html

2. नेताजी सुभाष (2) मुहम्मद जियाउद्दीन उर्फ नेताजी सुभाष - गोमो से काबुल.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/02/blog-post.html

3. नेताजी सुभाष (3) सुभाष के कलकत्ता से निकल जाने के बाद कलकत्ता की गतिविधियां.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/02/blog-post_4.html
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Thursday, 10 February 2022

प्रवीण झा - दक्षिण भारत का इतिहास - तीन (13)


तमिलनाडु में भ्रष्ट मुख्यमंत्रियों और नेताओं की फ़ेहरिस्त उत्तर भारत से कम नहीं। वहाँ के मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक भ्रष्टाचार के लिए जेल काटते रहे हैं। लेकिन, अगर आप तमिलनाडु जाएँ तो जमीन पर अच्छी सड़कें, उद्योग, बिजली, शिक्षा, परिवहन सब दिख सकता है। 

यह राज्य महाराष्ट्र के बाद सकल घरेलू उत्पाद में दूसरे नंबर पर है। 54 प्रतिशत तमिलनाडु शहरीकृत है। प्रति व्यक्ति आय 1,28,366 है, जो राष्ट्रीय औसत 86,879 से कहीं अधिक है (2014-15 के आँकड़े)। साक्षरता लगभग अस्सी प्रतिशत है। इसमें अगर कामराज ने ज्योति जलायी, तो करुणानिधि ने इसे रफ्तार दी। 

वह ‘शो-मैन’ तो थे ही, पूँजी-प्रबंधन में भी उस्ताद। वह और एमजीआर साथ मिल कर सिनेमा कंपनी चलाते थे, और एमजीआर धन का हिसाब रखते थे। जब डीएमके की पहली सरकार बनी, तो करुणानिधि ने एमजीआर को ही दल का कोषाध्यक्ष बनाया। पेरियार और अन्नादुरइ भी कुशल व्यवसायी रहे थे। पेरियार सफल पत्रिका तो चलाते ही थे, बाद में हर मंच या साक्षात्कार के लिए एडवांस फीस लेते थे। फोकट में किसी उद्घाटन में नहीं पहुँच जाते।

करुणानिधि को यह भी लगा कि उद्योगों की राह में कम्युनिस्ट रुकावट बन सकते हैं। इस कारण उन्होंने तमाम वामपंथी ट्रेड यूनियनों से अलग अपनी एक ट्रेड यूनियन बना ली। उसके बाद उन्होंने कम्युनिस्टों के साथ साम-दाम-दंड-भेद सभी किए। उन्होंने कहा, 

“आप यूनियनबाजी कर अगर उद्योगों की प्रगति रोक देंगे, तो न उद्योग बचेगा, न श्रम।”

डीएमके में कुछ दबंग-प्रवृत्ति के लोग पहले से थे। उन्होंने कम्युनिस्ट यूनियन नेताओं को धमका कर किनारे करना शुरू किया। एक उदाहरण देता हूँ। 

अप्रिल, 1971 में मद्रास रबर फ़ैक्ट्री (MRF) में कम्युनिस्ट यूनियनों ने हड़ताल किया। यह महीनों खिंचता गया। करुणानिधि उस समय उद्योगों को तमिलनाडु में ला रहे थे, तो यह हड़ताल उनकी छवि खराब कर रही थी। हज़ारों लाल झंडे मद्रास में मार्च कर रहे थे। उस समय करुणानिधि ने पुलिस दमन तो किया ही, कम्युनिस्टों को ‘नक्सल’ और ‘मलयाली’ कहा, जो तमिलों की प्रगति से जलते हैं। कम्युनिस्ट मैथिली शिवरामन के अनुसार डीएमके ने कुछ नकली मजदूरों को सौ रुपए प्रति दिन देकर काम पर भेज दिया, और दिखाया कि हड़ताल से सबकी सहमति नहीं है। 

बड़े कम्युनिस्ट नेताओं को जेल में बंद किया गया। सबसे प्रखर ट्रेड यूनियन नेता वी. पी. चिंतन एक दिन बस से जा रहे थे, कि डीएमके के बीस-बाइस गुंडे आए और उनको लाठियों और चाकू से मारा। एक चाकू उनकी छाती में घुसेड़ दी गयी, और फेफड़े के ऑपरेशन के बाद वह जैसे-तैसे बचे।

केरल में कम्युनिस्टों की सत्ता और मद्रास में उनके लगभग माउथपीस ‘द हिंदू’ होने के बावजूद तमिलनाडु में कम्युनिस्ट क्यों नहीं चल सके? 

इस प्रश्न का एक उत्तर काले चश्मे में बैठे करुणानिधि हैं, जिन्होंने उनकी जगह अपने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम से बदल ली। ऐसा नहीं कि उनकी सोच कम्युनिस्टों से बहुत अलग थी। नास्तिक तो थे ही, स्तालिन की मृत्यु से चार दिन पूर्व जन्मे अपने पुत्र का एक नाम भी उन्होंने स्तालिन रखा। लेकिन, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को उन्होंने दबा कर रखा, ताकि एक तरफ़ उद्योग बढ़ सके, दूसरी तरफ़ दलित वोट न बँटे।

कम्युनिस्ट तो निपट रहे थे, मगर इंदिरा गांधी के साथ-साथ करुणानिधि की 1971 की भारी चुनावी जीत के बाद एक काँटा उभर गया था। एमजीआर खुल कर आरोप लगा रहे थे कि करुणानिधि धन को अपने परिवार की ओर मोड़ रहे हैं। वह पारदर्शिता की माँग कर रहे थे। यह बात ग़लत नहीं थी। करुणानिधि अब अपने पुत्र एम. के. मुथु को फ़िल्मों का सुपरस्टार बनाना चाहते थे।

एमजीआर ने जब प्रेस में सार्वजनिक विरोध शुरू किया, तो उनको दल से निकाल दिया गया। पेरियार ने भी कहा, 

“वह हम में से एक था ही नहीं। एक अभिनेता था जो टैक्स चुराने के फेर में राजनीति में आ गया। उसे हमारे आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था।”

1972 में तमिलनाडु में एक नयी पार्टी बनी। एम जी आर की पार्टी जिसे करुणानिधि ने कुछ ‘अभिनेताओं का जमावड़ा’ कह कर ख़ारिज किया। 

पहले बनी थी पेरियार की ‘द्रविड़ कड़गम’ 
फिर अन्नादुरइ ने बनायी ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’
अब एमजीआर ने बनायी ‘अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’
जो बाद में बदल कर बनी, ‘ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’

दलों के नाम चुटकुलों के तमिल नामों की तरह लंबे होते जा रहे थे।
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

दक्षिण भारत का इतिहास (12)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/02/12.html 
#vss

Wednesday, 9 February 2022

साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का एजेंडा न पूरा होने दें / विजय शंकर सिंह

समझदार और विवेकवान सोच के लोगों के लिये यह बेहद चुनौतीपूर्ण क्षण है। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के भरोसे, सत्ता में आने वाले दल का बस एक ही एजेंडा है यूपी चुनाव में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, किसी भी प्रकार से हो जाय। परम्परागत मीडिया तो उस एजेंडे पर लगा ही हुआ है, पर राहत की बात है कि सोशल मीडिया, इस एजेंडे को पहचान चुका है। समझदारी और विवेक से काम लीजिए। असल मुद्दे पर सवाल उठाइये। धर्म के मुद्दों से दूरी बनाइये। विवादित और आग लगाऊ, ध्यान भटकाऊ मुद्दों पर मौन रहें और लक्ष्य स्पष्ट रखें। 

धर्मांध घृणावाद आप के घर मे घुसने को आतुर है। नौकरी मांगती बेरोजगारों की फौज को धर्मांधता की अफीम चटाना जारी है। आप जितना ही समझदार और शांत बने रहेंगे यह उतने ही बौखलायेंगे। उनकी सबसे बड़ी समस्या ही यह है कि, लोग न बहक रहे हैं और न भड़क रहे हैं। शायद यह दुनिया के इतिहास में पहली सरकार होगी जो अपने ही देश प्रदेश में हिंसक वातावरण बना कर राजनीतिक सत्ता में आना और उसे बचाये रखना चाहती है। न इन्हें धर्म से कोई मतलब है, न राम से कोई सरोकार।

मर्यादा पुरुषोत्तम की इनकी नज़र में बस इतनी ही मर्यादा शेष बची है कि, भगवा गमछे कंधे पर रखे, गले में लटकाए, कहीं एक अकेली लड़की को, खुले आम जयश्रीराम का नारा लगाते, दौड़ा लेना। और फिर वे अपने आचरण पर शर्म नहीं, बल्कि, उसे हिंदुत्व कहते हैं और उस पर गर्व करते हैं। अपने घर के युवा होते किशोरों को बचाइए कि वे पढ़े लिखें, पर इस धर्मांध लफंगई और गुंडई से दूर रहें। यह एक ऐसी जमात तैयार की जा रही है जो आगे जाकर एक धर्मांध आतंकी जैसी ही बन जाएगी। इस वायरस से बचें।

संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं कि 'धर्म संसद में कही गयी भड़काऊ बातें हिंदुत्व नहीं है।'
कर्नाटक में जो कुकर्म राम के नाम पर भगवाधारी गुंडों ने किया है, क्या वह हिंदुत्व है मोहन भागवत जी ?
उम्मीद है, आप कर्नाटक की उस घटना का भी समर्थन नहीं करेंगे। फिर तो, जो यह गुंडे कर रहे हैं, उनके खिलाफ, सख्त से सख्त कानूनी कार्यवाही के लिये, सरकार से कहिये।

फिर यह मत कह दीजिएगा कि, आप और आरएसएस का सरकार और राजनीति से कुछ लेना देना नही है। यह बात अब किसी के गले नहीं उतरेगी। संघ, हर चुनाव में भाजपा को जिताने के लिये पूरी ताकत झोक देता है, यह आप, हम, सब जानते हैं। यदि आप इस गुंडई और भड़काऊ आचरण के खिलाफ हैं तो, आप को खिलाफ खड़े दिखना भी होगा सर।

अब भी सत्तारूढ़ दल और संघ के मित्र, बार बार कर्नाटक की घटना पर बहस को हिजाब पहनने या न पहनने पर केंद्रित कर रहे हैं, पर  शातिराना ढंग से जय श्रीराम के नारे लगाती भगवा लपेटे गुंडो के आचरण को दरकिनार कर नज़रअंदाज़ कर दे रही है। हिजाब गलत है या सही, यह तय करने के लिये वह स्कूल और कॉलेज अधिकृत है, न कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सारी मर्यादाओं को तार तार करती हुयी गुंडो की यह उन्मादी भीड़।

किसे क्या पहनना है, कैसे पहनना है, कब पहनना है, यह वह खुद तय करेगा या वह संस्था, जहां हर अवसर का कोई ड्रेसकोड निर्धारित है। जिसने ड्रेसकोड निर्धारित किया है, उसने उसके उल्लंघन पर सज़ा का भी विधान रखा होगा। पर इन लफंगों और गुंडो को किसने यह अधिकार दे दिया कि, वे किसी को इसलिए बेइज्जत करें कि वह उनकी मर्जी के कपड़े नहीं पहने है ?

राम का नाम लेकर, उनका जयघोष करते हुए एक लड़की का पीछा करते हुए यह गुंडे, किसकी मर्यादा बढ़ा रहे हैं? कौन हैं वह लम्पटों का सरदार, जो इनकी गुंडई का अनुमोदन कर रहा है? यह गुंडे और लम्पट एक दिन ऐसा आएगा जब इस महान धर्म की सारी प्रतिष्ठा नष्ट और मर्यादा तार तार कर देंगे। इस खतरे को समझिए और बचिए।

आज खतरे में, राम हैं, उनकी मर्यादा है, भारत की सनातन चिंतन और दर्शन परंपरा है। देश की बहुलतावादी संस्कृति है, हज़ारों साल की साझी विरासत समेटे एक शानदार सभ्यता है। खतरे में रोजगार है, शिक्षा स्वास्थ्य और प्रगति के मुद्दे हैं। खतरे में युवाओं का कल है, देश का भविष्य है। गौर से देखिए, आप के घर के वे युवा हैं, जिनका मस्तिष्क, धर्मान्ध कट्टरपंथियों के द्वारा भेजे जा रहे व्हाट्सएप संदेशों से, योजनाबद्ध तरह से प्रदूषित और पंगु किया जा रहा है। इसके पहले कि यह आतंक आप के घर मे पैठे, आप इनका प्रवेश वर्जित कर दें। 

(विजय शंकर सिंह) 



Tuesday, 8 February 2022

प्रवीण झा - दक्षिण भारत का इतिहास - तीन (12)


             (चित्र: फ़िल्म ‘असुरन’ से)

हिंसा का दौर धीरे-धीरे शुरू हुआ। राजनैतिक और सामाजिक हिंसा। तमिल फ़िल्मों में भी हिंसा। 

वर्ग-संघर्ष खत्म करने के लिए पेरियार अपनी कलम और ज़बान से लड़ते रहे, लेकिन कभी बंदूक उठाने नहीं कहा। न ही कभी किसी मंदिर में जाकर तोड़-फोड़ को बढ़ावा दिया। उनकी लड़ाई ब्राह्मणों से अधिक थी, और वह ब्राह्मणों की सत्ता के अंत को ही ब्राह्मणवाद का अंत मानते थे। वह सामंतवाद या अ-ब्राह्मणों द्वारा किए जा रहे जातिवाद से बहुत अधिक नहीं लड़ पाए। निजी समर्पणों के बावजूद उन्होंने ज़मींदारी खत्म करने और दलितों (SC-ST) के विशेषाधिकार पर कार्य कम किया। 

स्पष्ट कहूँ तो अम्बेडकर अगर दलितों के नेता थे, तो पेरियार ने पिछड़ा वर्ग (वर्तमान OBC) के विकास के लिए अधिक कार्य किया। जो सत्ता और आरक्षण अहीरों या अन्य पिछड़ा वर्गों ने उत्तर भारत में नब्बे के दशक से पानी शुरू की, वह मद्रास ने आज़ादी से ढाई दशक पहले ही हासिल कर ली थी। इस कारण इस बड़े वर्ग की शिक्षा-दीक्षा, आर्थिक उन्नति बहुत पहले ही हो गयी। लेकिन, दलित वहीं के वहीं रह गए। अछूत प्रथा भी कायम रही, और आज तक है। 

2016 में विधायक रवि कुमार ने यह बात कुछ यूँ रखी,

“तमिलनाडु में 21 प्रतिशत जनसंख्या दलित है, लेकिन आज तक एक भी दलित मुख्यमंत्री नहीं बना; जबकि बिहार में 16 प्रतिशत दलित होने के बावजूद महादलित मुख्यमंत्री* बने”

[*बिहार में जीतन राम माँझी के अतिरिक्त भोला पासवान शास्त्री और रामसुंदर दास भी दलित थे। आंध्र में संजीवय्या, महाराष्ट्र में सुशील शिंदे और उत्तर प्रदेश में मायावती दलित मुख्यमंत्री रहे]

तमिलनाडु की दलित राजनीति में कम्युनिस्टों (मार्क्सवादी) ने दखल देनी शुरू की। उनके कुछ गुट हिंसा को एक सशक्त माध्यम मानते थे, जो बाद में ‘नक्सलवाद’ कहलाया। इस बात के मायने हैं भी और नहीं भी, कि इन तमिल और मलयाली कम्युनिस्टों में कुछ मुखर नेता ब्राह्मण परिवार से थे। उनकी आवाज़ बना ‘द हिंदू’ अखबार भी ब्राह्मण परिवार संचालित रहा। एक ऐसी ही संभ्रांत ब्राह्मण परिवार की युवती मैथिली शिवरामन, की 1968 में तंजौर के गाँव से एक रिपोर्ट ने उन दिनों दिल दहला दिया।

तंजौर एक सामंतवादी क्षेत्र था, जहाँ सिर्फ पाँच प्रतिशत ज़मींदारों के पास अधिकांश जमीन थी। वहीं, इस क्षेत्र में भूमिहीन दलितों की संख्या सबसे अधिक थी। वे इन ज़मींदारों के लिए काम करते थे। कम्युनिस्टों ने इन मजदूरों को संगठित करना शुरू किया, और शुरू हुआ संघर्ष। वे अपनी माँग रखने लगे, और ज़मींदारों ने उनको हमेशा के लिए सबक सिखाने की ठान ली। 

25 दिसंबर, 1968 को कीलमेनवणी स्थित दलितों के गाँव को घेर कर आग लगा दी गयी। रिपोर्ट के अनुसार आग में जल रहे दलित अपने बच्चों को झोपड़ी से बाहर फेंक रहे थे कि वे बच जाएँ, और ज़मींदार उन्हें वापस आग में फेंक रहे थे। 

इस नरसंहार के बाद डीएमके की सरकार ने क्या किया? यूँ तो करुणानिधि दौरे पर आए, लेकिन न्यायालय ने दोनों पक्षों पर ज़िम्मेदारी तय की। एक जमींदार के एजेंट की भी हत्या हुई थी, इसलिए दलितों पर भी धाराएँ लगी। आश्चर्यजनक रूप से डीएमके सरकार ने कुछ ख़ास नहीं किया। मुख्य अभियुक्त गोपालकृष्ण नायडू बरी हो गया। उसी गाँव का एक दलित बालक नंदन, जो झाड़ियों में छुप कर अपने परिवार को जलता देख रहा था, उसने बारह वर्ष बाद नायडू को मौत के घाट उतार दिया। 2019 में आयी धनुष अभिनीत फ़िल्म ‘असुरन’ इस घटना से प्रेरित है।

करुणानिधि को यह लगने लगा कि दलित वोट-बैंक कम्युनिस्टों की ओर खिसक सकता है। उन्होंने यह कानून बनाया कि कोई भी व्यक्ति पंद्रह एकड़ से अधिक जमीन नहीं रखेगा, शेष जमीनें भूमिहीनों में बाँट दी जाएगी। मगर इस क़ानून में कई लूपहोल थे। लोगों ने परिवार में जमीन बाँट लिए। जो जमीनें दी भी गयी, वह दलितों से अधिक अन्य पिछड़ा वर्गों के हिस्से गयी। उन्होंने उसके बाद यह कानून बनाए कि मंदिरों के पुरोहित ग़ैर-ब्राह्मण बन सकते हैं, और विवाह के लिए ब्राह्मण पुरोहित आवश्यक नहीं। लेकिन, ऐसे धर्म-सुधार कानूनों में दलितों की रुचि कम थी। उनकी मामूली शिक्षा तो ठीक से हो नहीं पा रही थी, पुरोहितगिरी का क्या करते। 

दलितों को अपनी लड़ाईयों से अलग एक नायक बड़े पर्दे पर दिखने लगा था। एम जी रामचंद्रन अपनी फ़िल्मों में ट्विस्ट ला रहे थे। फ़िल्म ‘मत्तुकरा वेलन’ में एक गाय चराते गरीब नायक को उसके ज़मींदार की बेटी से प्रेम हो जाता है। उनकी नायिका एक ब्राह्मण परिवार की युवती थी, जिसने अभी-अभी बंबई में धर्मेंद्र के साथ हिंदी फ़िल्म भी की थी। पचास से अधिक बसंत देख चुके एमजीआर की वह बीस-बाइस वर्ष की नायिका थी - जयललिता।

मद्रास की गलियों में लगे इन फ़िल्मी पोस्टरों से तमिल राजनीति के किरदार एक-एक कर निकल रहे थे। 
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

दक्षिण भारत का इतिहास - तीन (11)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/02/11.html 
#vss 

Monday, 7 February 2022

देश के समक्ष आर्थिक चुनौतियां और बजट 2022 / विजय शंकर सिंह

वित्तीय वर्ष, 2022 - 23 का बजट लोकसभा में पेश किया जा चुका है और उस पर चर्चा भी सदन में जारी है। हर बजट के समय, सरकार देश की आर्थिकी के संबंध में देश के समक्ष जो चुनौतियां होती हैं, उनका समाधान करने की कोशिश करती है। वित्तमंत्री की पेशेवराना कुशलता इसी बात पर निर्भर करती है कि, उन्होंने इस प्रकार की कितनी चुनौतियों का समाधान करने में सफलता पाई। फिलहाल देश के सामने आर्थिक क्षेत्र में जो चुनौतियां है वे देश मे व्याप्त घोर आर्थिक असमानता, दिन प्रतिदिन बढ़ती महंगाई की दर और गांव गांव, शहर शहर फैले बेरोजगार युवाओ की भीड़ है। आज जिस प्रकार के आंकड़े और निष्कर्ष, ऑक्सफैम की रिपोर्ट से सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हम आर्थिक रूप से एक गम्भीर विषमता के काल की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमे देश की सकल पूंजी कुछ मुट्ठीभर पूंजीपतियों के हांथो में केंद्रित हो रही है और उस समृद्धि के द्वीप के चारों ओर, अभाव और विपन्नता का त्रासद सागर उफान मार रहा है। निश्चित ही यह भयावह स्थिति, देश, समाज और जनता के लिये एक प्रकार का अशनि संकेत है। 

किसी भी बजट में दो प्रमुख घटक शामिल होते हैं। एक यह कि चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमान की तुलना में खर्च का अनुमान क्या रहा है। यानी, मूल रूप से संशोधित अनुमानों के साथ, चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना। दूसरा अगले वित्तीय वर्ष के लिए बजट का अनुमान। यानी, वित्त वर्ष 2021-22 के बजटीय और संशोधित अनुमानों और वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजट अनुमानों की तुलना। किसी भी बजट का एक प्रमुख विंदु, यह होता है कि, चालू वित्त वर्ष में कितनी राशि, किस मद में आवंटित की गई है। चूंकि बजट वित्तीय वर्ष समाप्त होने से पहले प्रस्तुत किया जाता है, इसलिए हमें एक संशोधित अनुमान ही मिलता है, न कि वास्तविक आय व्यय के वास्तविक आंकड़े। 

आंकड़ो से यह बात स्पष्ट हो रही है कि, वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजटीय आवंटन की तुलना में, सरकार को वित्तीय वर्ष 2021-22 के संशोधित अनुमानों में वृद्धि हो जाने के कारण अधिक धन खर्च करना पड़ा।  इससे यह ज्ञात होता है कि, सरकार के अनियोजित खर्चों में वृद्धि हुई है।  वित्तीय वर्ष 2021-22 के वे अनुमान, जो जनवरी में पहले जारी किए गए थे, यह संकेत देते हैं कि अर्थव्यवस्था मे प्रति व्यक्ति खपत अभी भी महामारी पूर्व स्तर से काफी कम है।  इस कारण, सरकारी खर्च का बढ़ाना लाजिमी हो जाता है और यह, संशोधित अनुमान में 8% की वृद्धि से परिलक्षित हो रहा है।  सरकार ने संशोधित अनुमानों में वृद्धि के संकेत के रूप में और अधिक निवेश की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजटीय अनुमानों को, गत वर्ष के बजटीय आवंटन की तुलना में, 13% तक बढ़ा दिया है।

हाल में सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती की बात करें तो, वह स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में तो है ही, पर इन समस्याओं की जड़ कोरोना महामारी है, जो 2020 से कोविड के नए नए वैरिएंट के रूप में सामने आ रही हैं। हालांकि देश की आर्थिकी में गिरावट का दौर, 2020 के पहले से आ चुका था। सरकार, इसे स्वीकार करे या न करे, पर अर्थव्यवस्था और जीडीपी ग्रोथ के ग्राफ में गिरावट 2016-17 के वित्तीय वर्ष से शुरू हो चुकी थी। 31 मार्च 2020 के आंकड़ों तक जीडीपी विकास दर में 2% की गिरावट आ चुकी थी। कोरोना ने उस टूटती और गिरती अर्थव्यवस्था को और धक्का ही दिया है। यह अपेक्षित भी था कि, महामारी के दुष्प्रभाव को देखते हुए, बजट राशि से स्वास्थ्य और कल्याण में सरकार ने अधिक अनियोजित खर्च किया है। यह खर्च निश्चित ही अनुमान से अधिक था। तब भी कुछ अर्थशास्त्रियों की पिछले बजट के दौरान ही यह राय थी कि स्वास्थ्य के शीर्ष में धन का आवंटन अधिक होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नही किया गया। वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए आवंटित धनराशि वित्तीय वर्ष 2020-21 के वास्तविक खर्च से भी लगभग 7% कम ही रखी गयी। जबकि, वित्तीय वर्ष 2021-22 का संशोधित अनुमान, वास्तव में वित्तीय वर्ष 2020-21 में वास्तविक खर्च से 7% अधिक है। इस प्रकार, स्वास्थ्य बजट में आवंटित धनराशि से अधिक खर्च का कारण, जानबूझकर स्वास्थ्य के मद में कम धन का आवंटन है। जब बजट में, शुरू में ही धन कम आवंटित रखा जाएगा तो, आकस्मिकता में व्यय तो अधिक होगा ही। स्वास्थ्य के निजीकरण की बात सरकार इसीलिए करती है कि, निजी क्षेत्र एक उद्योग की तरह इस सेक्टर को चलाये और लोग स्वास्थ्य बीमा से प्राप्त धन से अपना इलाज कराए। एक प्रकार से यह निजी अस्पताल और स्वास्थ्य बीमा उद्योग के हित मे उठाया जा रहा सरकारी कदम है, जो कॉरपोरेट और पूंजीपतियों को ही लाभ पहुचायेगा। इसका सबसे अधिक नुकसान, गरीबो और ग्रामीण क्षेत्रो पर पड़ेगा।  

अब यदि हम कुछ प्रमुख सरकारी योजनाओं पर खर्च को देखें, तो यह पाते हैं कि, महामारी के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार नुकसान या संकुचन और ग्रामीण क्षेत्रों में, लॉक डाउन जन्य कामगारों के रिवर्स माइग्रेशन की समस्या से निपटने के लिये मनरेगा में खर्च बढ़ाना पड़ा। मनरेगा को भले ही कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, यूपीए की विफलता का स्मारक कह कर मज़ाक़ उड़ाया था, पर उस संकट काल मे ग्रामीण इलाकों में अचानक बढते रोजगार और लोगों की ज़रूरतों का समाधान काफी हद तक, मनरेगा से ही सम्भव हो सका। वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी उम्मीद थी कि, मनरेगा में बजट बढ़ेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है इस वित्तीय वर्ष में भी, मनरेगा का व्यय गत वित्तीय वर्ष से अधिक होगा। पीएम किसान डायरेक्ट मनी ट्रांसफर एक अहम योजना रही है।  हालांकि इस योजना के अंतर्गत अनुमान और वास्तविक खर्च में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई। कहने का आशय यह है कि, अक्सर अनुमानित व्यय और वास्तविक व्यय में अंतर आता ही है। कभी यह अंतर अधिक व्यय के रूप में होता है तो कभी कम खर्च होता है। पर अर्थव्यवस्था में गिरावट, नोटबन्दी से लेकर महामारी तक जिन समस्याओं के दौर से लोग भुगत रहे थे, रोजगार पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ रहा था, या यूं कहिये अब भी पड़ रहा है तो रोजगार से जुड़ी राहत योजनाओं पर अधिक धन व्यय होगा ही। 

अब चर्चा करते हैं, वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजट आवंटन पर। सरकारी खर्च के दो मुख्य घटक होते है, एक राजस्व व्यय और दूसरा पूँजीगत व्यय। पूंजीगत व्यय यानी इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च, स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, सड़कों, पुलों, बांधों, रेलवे लाइनों, हवाई अड्डों और बंदरगाहों जैसी संपत्तियों के निर्माण और रखरखाव में जाता है।  इस बार सरकार ने बुनियादी ढांचे के विकास में पूंजी निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हुए पीएम गति शक्ति योजना की घोषणा की है।  पिछले बजट से, इस बार, पूंजीगत व्यय के हिस्से में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 

सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर में आवंटन वृद्धि को, सही दिशा में उठाया गया कदम बता रही है। इसमें कोई संदेह नही कि, एक उच्च पूंजीगत व्यय का अर्थ होगा बुनियादी ढांचे में अधिक खर्च और इससे अधिक रोजगार पैदा होगा। इसके अलावा जैसे-जैसे सरकार पूंजीगत व्यय बढ़ाती है, इससे अर्थव्यवस्था में विश्वास बढ़ता है और निवेश को भी आकर्षित करता है। सकल घरेलू उत्पाद में निजी निवेश की घटती हिस्सेदारी लगभग एक दशक से चिंता का एक बड़ा कारण रही है। पूंजीगत व्यय हिस्सेदारी की यह वृद्धि उसी की ओर एक कदम बताई जा रही है। इंडियन पोलिटिकल डिबेट के अनिंद्य सेनगुप्ता द्वारा बजट समीक्षा पर लिखे एक लेख में बताया गया है कि, "पिछले बजट की तुलना में इस वर्ष पूंजीगत व्यय आवंटन में 35% की वृद्धि हुई है।"

अब वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिये शीर्षवार बजट आवंटन की चर्चा करते हैं। 
■ कृषि 

यह एक ऐसा क्षेत्र रहा है जिसने महामारी के वर्षों के दौरान उत्पादन के मामले में सकारात्मक वृद्धि दिखाई है। जब मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर शून्य से नीचे और अनौपचारिक सेक्टर लगभग तबाह हो चला था, तब कृषि ने न केवल सकारात्मक वृद्धि दर दिखाई बल्कि इसने गोता लगा रही जीडीपी विकास दर को संभालने का भी काम किया। भारत मे कृषि एक काम या रोजगार देने वाला उद्योग ही नहीं है, बल्कि एक संस्कृति है। इस सेक्टर पर, देश की एक बड़ी आबादी निर्भर है। 2018-19 से इस क्षेत्र के लिए सरकार की दो प्रमुख योजनाएं पीएम किसान सम्मान निधि (इन हैंड कैश डिलीवरी) और पीएम आशा (न्यूनतम समर्थन मूल्य) जारी रखी गयी हैं। लेकिन इस महत्वपूर्ण क्षेत्र पर भी कॉरपोरेट की गिद्ध दृष्टि पड़ी और उनके दबाव में तीन कृषि कानून, जो खेती, किसानी और किसानों को कॉरपोरेट के रहमो करम पर ला कर पटक सकते थे, लाये गए। पर एक साल से भी अधिक समय से चले किसान आंदोलन की सफलता और एकजुटता के कारण, सरकार को वे कानून वापस लेने पड़े। सरकार ने कानून तो वापस ले लिए, पर अपनी खीज नहीं छुपा पाई। उसका असर इस बजट में साफ दिख रहा है। पिछले बजट की तुलना में इस वर्ष इस क्षेत्र के लिए आवंटन में केवल 0.7% की वृद्धि देखी गई है।  पिछले तीन वर्षों में इस क्षेत्र के लिए आवंटन के हिस्से में उल्लेखनीय गिरावट आई है।  वित्तीय वर्ष 2020-21 में कुल आवंटन, 4.7% से 3.4% तक गिर गया है।  पीएम किसान सम्मान निधि के लिए आवंटन में भी समय के साथ गिरावट आई है।  पीएम आशा योजना में सिर्फ सांकेतिक आवंटन था।  यह शून्य के सबसे करीब है।  इसलिए कुल मिलाकर कृषि के प्रति सरकार की उपेक्षा साफ दिख रही है। 

अखिल भारतीय किसान सभा ने बजट में कृषि की उपेक्षा को निम्न विन्दुओं से रेखांकित किया है, जिसे मैं बादल सरोज जी की फेसबुक टाइमलाइन से लेकर यहां शेयर कर रहा हूँ। इसे पढ़ें, 
● किसानों की फसल के लाभकारी दाम देने और कर्ज मुक्ति की मांग के समक्ष पिछली साल के संशोधित बजट अनुमान 474750.47 करोड़ रुपये के मुकाबले इस बार 370303 करोड़ रुपयों का आवंटन किया है। 
● ग्रामीण विकास के लिए बजट आवंटन पिछले बजट में 5.59 % था इसे घटाकर 5.23% कर दिया गया है। 
● गेंहू और धान की खरीद के लिए पिछली बार 2.48 लाख करोड़ रूपये दिए गए थे जिसे इस बजट में घटाकर 2.37 लाख करोड़ कर दिया गया है। खुद सरकार मानती है कि इसके कारण जिन किसानो को लाभ मिलना है उनकी संख्या पिछली वर्ष की 1 करोड़ 97 लाख से कम होकर 1 करोड़ 63 लाख रह जाएगी।  
● एफसीआई और अन्य खरीदी केंद्रों के लिए आवंटन में 28% की कमी की गयी है।  
● जब खाद की कीमतों में  लगातार बढ़त हो रही है तब सब्सिडी में भी 25% की जबरदस्त कटौती की गयी है।
● प्रधानमंत्री फसलबीमा योजना की रकम 16 हजार करोड़ रुपयों से घटाकर 15500 करोड़ रुपये कर दी गयी है। 
● पीएम-किसान की राशि में भी 9% की कमी की गयी है। पिछली साल दावा किया गया था कि 14 करोड़ परिवार लाभान्वित होने का था , इस बार 12.5 करोड़ की बात कही गयी है। जबकि इस हिसाब से भी 6000 रु. प्रति परिवार जोड़ें तो 75000 करोड़ रूपये चाहिए थे - दिए हैं सिर्फ 68 हजार करोड़ रूपये। 
● क्रॉप हसबैंड्री में कटौती 18%, खाद्य भंडारण में 28% की कटौती की गयी है।  
● मनरेगा के बजट में पिछली साल संशोधित अनुमान 98000 करोड़ था - इस बार 73000 हजार करोड़ आवंटित किये गए हैं।  

■ शिक्षा

यह एक ऐसा क्षेत्र है जो महामारी के वर्षों के दौरान बुरी तरह से प्रभावित हुआ है।  ग्रामीण और शहरी, दोनों इलाक़ो के छात्रों का एक बड़ा वर्ग ऐसा रहा है जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया या लगातार दो वर्षों तक शिक्षा से चूक गए क्योंकि वे वर्चुअल मोड में पढ़ने के लिए तकनीकी सुविधा के अभाव के कारण, सक्षम नहीं थे।  मध्याह्न भोजन योजना लोगों को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने के लिए बनाई गई थी। लगातार स्कूल बंदी से बच्चों पर मनोवैज्ञानिक असर जो पड़ा वह अलग। इसलिए उम्मीद थी कि बजट 2022-23 में सरकार इस क्षेत्र में पर्याप्त ध्यान देगी। लेकिन इस क्षेत्र में आवंटन में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई। इस साल शिक्षा बजट में 12 फीसदी की बढ़ोतरी ज़रूर की गई है, लेकिन कुल आवंटन में शिक्षा का हिस्सा वास्तव में वित्त वर्ष 2020-21 के बजट अनुमानों में 3.3% से घटकर 2.6% रह गया।  स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा दोनों के लिए एक ही प्रकार की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

■ स्वास्थ्य

यह एक ऐसा सेक्टर है जिसमें हमने बजट में अनियोजित खर्चों में पिछले दोनों साल बढ़ोतरी देखी है। कोरोना की महामारी, इसका एक बड़ा कारण रहा है। स्वास्थ्य सेक्टर में सरकार को योजनाबद्ध तरीके से, शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों ही विन्दुओं को ध्यान में रख कर काम करना होगा। शॉर्ट टर्म यानी अल्पावधि योजनाओं में, सरकार ने  देर से ही सही कोविड टीकाकरण पर ध्यान केंद्रित किया है, और टीकाकरण की गति भी बढ़ी है। पर टीका बचाव है, इलाज नहीं। लांग टर्म, यानी दीर्घावधि योजनाओं में एक मजबूत और निरंतर स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को विकसित करने पर सरकार को ध्यान केंद्रित करना होगा। महामारी की दूसरी लहर के दौरान, बुनियादी ढांचे की कमी के कारण, काफी संख्या में लोग मरे हैं। यहां तक कि, ऑक्सीजन जैसी ज़रूरी आवश्यकता की भी आपूर्ति अस्पताल नहीं कर सके। श्मशान, कब्रिस्तान तो भरे ही रहे, उत्तर प्रदेश के कुछ इलाक़ो में गंगा में सैकड़ो शव बहते देखे गए। यह शुध्द रूप से प्रशासनिक विफलता थी। सरकार को स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को सुनियोजित तरह से बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। बजट आवंटन के संदर्भ में, इस वर्ष स्वास्थ्य बजट में 16% की वृद्धि हुई है जो कि कुल बजट आवंटन में 13% की वृद्धि से अधिक है।  यह एक स्वागत योग्य निर्णय है।  लेकिन फिर भी कुल आवंटन के प्रतिशत के रूप में स्वास्थ्य में हमारा आवंटन 2.4% है जो कई विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।  इसलिए स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे के लिए विशेष रूप से केंद्रित दृष्टि और उसी पर आवंटन के साथ एक दीर्घकालिक योजना की शुरुआत की उम्मीद का, इस बजट में अभाव है।

■ रोजगार सृजन

आज की सबसे ज्वलन्त समस्या है, रोजगार की कमी या बढ़ती हुयी बेरोजगारी। 2016 की आर्थिक त्रासदी नोटबन्दी, के बाद हम बेरोजगारी के मुद्दे पर लगातार पिछड़ते गए और अब हम एक ऐसे पड़ाव पर आ पहुंचे है कि देश अपनी सबसे बड़ी समस्या से रूबरू है। नवीनतम सीएमआईई डेटा के अनुसार, बेरोजगारी 8% से अधिक की स्थिति में, दिसंबर महीने के आंकड़े में दर्ज की गयी। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा 2017-18 में प्रकाशित पीएलएफएस आंकड़ों के साथ बेरोजगारी 2016 से ही, चिंताजनक रूप से बढ़ती रही है और यह अर्थशास्त्रियों के लिये, चिंता का एक विंदु रहा है। आज, बेरोजगारी का आंकड़ा, 45 साल में सबसे अधिक बढ़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त, हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि देश के 84% लोगों की आय, पिछले वर्ष की तुलना में गिरी है।  अनौपचारिक क्षेत्र जो देश के 90% के लिए रोजगार का स्रोत रहा है, उसमे 2016 से जो संकुचन आया, वह अब भी थमा नहीं है, बल्कि बढ़ा ही है बल्कि वह और सिकुड़ गया है। नोटबन्दी का निर्णय लेते समय इस विंदु पर ज़रा सा भी चिंतन, अध्ययन नही किया गया कि, नकदी विहीन या नकदी न्यून आर्थिकी का अनौपचारिक सेक्टर, जो नक़द लेनदेन पर ही निर्भर है, क्या असर पड़ेगा। 

ऐसे दौर में, रोजगार सृजन का एजेंडा, सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता पर होना चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर व्यय में वृद्धि से रोजगार के अधिक अवसर पैदा होंगे, यह कहा जा रहा है, और ऐसा संभव भी है। पर इसके लिये सरकारी और निजी उद्योगों में भी निवेश को बढ़ाया जाना चाहिए। सरकार को रोजगार सृजन को ही केंद्रित रखते  हुए, एक सुनियोजित योजना बनाना और उसे लागू करना होगा। आज नयी योजनाओं की तो बात छोड़ दीजिए, सरकार के अपने ही विभिन्न विभागों में भारी संख्या में रिक्तियां हैं और यह रिक्तियां साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। सेवायोजन से जुड़ी परीक्षाओं का समय पर न होना, यदि हों, तो उनका पर्चा लीक हो जाना, तरह तरह की कानूनी मामलों पर, अदालतों में फंस जाना, आदि आदि, इन प्रशासनिक कुप्रबंधन का समाधान किया जा सकता है, बशर्ते सरकार की नीति और नीयत इससे निपटने की हो तब। बजट से उम्मीद थी कि ग्रामीण भारत में रोजगार गारंटी देने वाली मनरेगा की तरह शहरी भारत के लिए भी ऐसी ही रोजगार गारंटी योजना शुरू की जाएगी।  इस संबंध में बजट में ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई है।  इसके अलावा 2021-22 के संशोधित अनुमानों की तुलना में मनरेगा के आवंटन में 25% की कमी की गई थी।  मनरेगा के लिए आवंटन का हिस्सा भी पिछले बजट में 2.1% से घटकर 1.9% रह गया। 

सरकार की प्राथमिकता में कॉरपोरेट है, और कुछ निजी पूंजीपति। यह बजट पूंजीवादी तो है ही बल्कि उसके और विकृत स्वरूप, गिरोहबंद पूंजीवाद, क्रोनी कैपिटलिज़्म की ओर ले जाता हुआ दिख रहा है। यह निश्चित रूप में घोर आर्थिक विषमता बढ़ाने वाला बजट है और नियमित रूप से आर्थिक असमानता पर जारी होने वाली ऑक्सफैम की रिपोर्ट, देश मे लगातार बढ़ रही, आर्थिक विषमता को दर्शा भी रही है। इस बजट को कुछ तात्कालिक मुद्दों को हल करने के एक प्रयास के रूप में माना जा सकता है, लेकिन, जनता से जुड़े असल मुद्दों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।  पूंजीगत व्यय पर निरंतर ध्यान देने से निवेश परिदृश्य को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन असमानता के सबसे कठिन और ज़रूरी मुद्दे के बारे में बजट लगभग दिशाहीन है। विशेष रूप से शॉर्ट टर्म योजनाओं में, भारी संख्या में गरीबो की आय में वृद्धि हो सके, इस विंदु पर, किसी सुगठित योजना का अभाव है। इसके अलावा, बाजार में मांग यानी डिमांड को बढ़ावा देने के लिए धन का कोई प्रत्यक्ष हस्तांतरण या कर में कमी करने जैसी कोई घोषणा नहीं हुई है जो अर्थव्यवस्था में मांग या डिमांड को बढ़ाती। अधिक निवेश का खपत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, लेकिन यह भी एक दीर्घकालिक उपचार है। तो संक्षेप में कहें तो इस बजट से जो, बहुत कुछ उम्मीद की जा रही थी, वह पूरी नहीं हुयी है। इसमें बेरोजगारी, गरीबी, मांग, औद्योगिक विकास, अनौपचारिक क्षेत्र का विकास, लघु, मध्यम, सूक्ष्म औद्योगिक इकाइयों में वृद्धि आदि मुद्दों को प्राथमिकता देने की नीयत का अभाव है। बस एक चीज साफ और स्पष्ट है कि, सरकार सभी सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को एक एक कर के जल्दी से जल्दी बेच देना चाहती है। सरकार ने खुद कहा है कि यह बजट दूरगामी प्रभाव वाला है, और वह 'दूर' कब धरातल पर आएगा, शायद सरकार को भी यह पता नहीं है। 

(विजय शंकर सिंह)

 

बलात्कारी राम रहीम की 21 दिन की फर्लो हरियाणा सरकार रद्द करे / विजय शंकर सिंह

डेरा सच्चा सौदा का गुरुमीत राम रहीम जो बलात्कार के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहा है, उसे हरियाणा सरकार ने 21 दिन का फर्लो (सज़ा के बीच छुट्टी) स्वीकृत की है। कहते हैं, राम रहीम का पंजाब में कुछ भागों पर असर है और वह चुनाव में अपने प्रभाव के इस्तेमाल के लिये जेल से 21 दिन के लिये निकाला गया है। 

अब फर्लो और पेरोल में क्या कानूनी अंतर होता है, उसे समझते हैं। 
● पैरोल और फर्लो दोनों सशर्त रिहाई हैं।
● छोटी अवधि के कारावास के मामले में पैरोल दी जा सकती है, जबकि लंबी अवधि के कारावास के मामले में फर्लो दी जाती है।  
● पैरोल की अवधि एक महीने तक होती है जबकि फर्लो के मामले में यह अधिकतम चौदह दिनों तक होती है।
● पैरोल संभागीय आयुक्त (डिविजनल कमिश्नर) द्वारा दी जाती है और फर्लो उप महानिरीक्षक कारागार द्वारा प्रदान की जाती है।
● पैरोल के लिए किसी विशेष कारण की आवश्यकता होती है, जबकि फरलो कारावास की एकरसता को तोड़ने के लिए होती है।
● कारावास की अवधि पैरोल की अवधि की गणना में शामिल नहीं होती है, जबकि यह फरलो में इसके विपरीत है।
● पैरोल कई बार दी जा सकती है जबकि फर्लो के मामले में एक सीमा तय होती है।
● चूँकि फर्लो किसी विशेष कारण से नहीं दिया जाता है, इसलिए इसे समाज के हित में अस्वीकार भी किया जा सकता है।

चुनाव के दौरान, सभी वांछित और अन्य अपराधी जो बाहर हैं, उन्हें चुन चुन कर एक अभियान चला कर जेल भेजा जाता है, ताकि, चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो सके। पर यहां तो हरियाणा सरकार एक गंभीर मामले में सजायाफ्ता उम्रकैदी को 21 दिन की छुट्टी देकर जेल से घर ला रही है। हरियाणा सरकार के मंत्रियों पर रामरहीम का विशेष प्रभाव है और यह बात सार्वजनिक भी है। 

हरियाणा में चुनाव नहीं है, जबकि पंजाब में चुनाव हो रहा है और वहां फरवरी के तीसरे हफ्ते में मतदान है। ऐसे में यह आदमी चुनाव में कोई असर न डाल सके, फर्लो की शर्तों का उल्लंघन न कर सके, इसे भी निर्वाचन आयोग को देखना होगा। फर्लो देनी ही है तो पंजाब के चुनाव के बाद दी जानी चाहिए थी। 

(विजय शंकर सिंह)

प्रवीण झा - दक्षिण भारत का इतिहास - तीन (11)

            (चित्र: इंदिरा-करुणानिधि)

“यह रामन कौन था? किस सिविल इंजीनियरिंग विभाग में पढ़ता था? उसने श्रीलंका जाने के लिए पुल कब बनाया? ये रामायण कुछ नहीं है, आर्यों और द्रविड़ों के संघर्ष पर आधारित मिथकीय रूपक-काव्य है”

- एम. करुणानिधि, हिंदू संगठनों द्वारा ‘सेतुसमुद्रम जहाजरानी नहर परियोजना’ के विरोध पर, 2007 [यह परियोजना राम-सेतु के ध्वंस होने की शंका के कारण रुकी हुई है]

अगर पेरियार को स्वयं चुनना होता, तो करुणानिधि को ही उत्तराधिकारी चुनते। अन्नादुरइ पेरियार के शिष्य होकर भी पूरी तरह नास्तिक नहीं थे। चुनाव के समय उन्होंने वोट-राजनीति के लिए अपने नाम में मुडलियार उपनाम भी जोड़ लिया था। एमजीआर तो कभी पेरियार-वादी थे ही नहीं। न ही पक्के तमिल थे (वह श्रीलंकाई मलयाली थे)। एक सुपरस्टार होने के नाते उन्हें करुणानिधि ने भीड़ इकट्ठा करने के लिए टिकट दिलवाया था। जबकि करुणानिधि बचपन से पेरियार-वादी, कट्टर ब्राह्मण-विरोधी और नास्तिक थे। 

1968 में अन्नादुरइ सरकार को विधानसभा में घेरा गया क्योंकि उनके अनुसार करुणानिधि के रजती नामक स्त्री से विवाहेतर अवैध संबंध थे। करुणानिधि ने आरोपों से बचाव करने के बजाय खुल कर कहा, 

“यह वैध-अवैध क्या किसी धर्मग्रंथ में लिखा है? रजती मेरी बेटी कणिमोली (kanimozhi) की माँ है, और माँ शब्द की व्याख्या के लिए किसी ग्रंथ की ज़रूरत नहीं”

एक कुशल पटकथा-लेखक ‘कलइनार’ करुणानिधि ने राजनीति की भी स्क्रिप्ट पहले से लिख दी थी। सलीम-जावेद से बहुत पहले पोस्टर पर निर्देशक की बजाय लेखक का नाम लिखा आता था- ‘करुणानिधि की फ़िल्म…’। वह हर फ़िल्म में चार-पाँच मिनट की कोई कचहरी दलील या यूँ ही एक ‘मोनोलॉग’ (एकालाप) रखते, जिसमें वह अपने क्रांतिकारी विचार डाल देते। कभी पर्दे पर उसे शिवाजी गणेशन, कभी एमजीआर, तो कभी शॉल लपेटे स्वयं करुणानिधि निभाते। 

वह एक उम्दा ‘मीडिया मैनेजर’ थे, जिन्होंने मद्रास में ‘कट आउट’ संस्कृति लायी। अन्नादुरइ, एमजीआर और अपने आदमकद कट-आउट सड़कों पर लगवाए। वह ये सिद्ध करना चाहते थे कि अन्नादुरइ के बाद अगले मुख्यमंत्री वही बनेंगे। इसका एक रोचक क़िस्सा और है। 

चुनावी जीत के बाद अन्नादुरइ ने भीड़ के सामने कहा, 

“आज इन युवा लफंगों ने हमारी पार्टी को इतनी बड़ी जीत दिलाई। मैंने पूछा कि क्या चाहिए, माँगो! करुणानिधि ने कहा कि एक अंगूठी चाहिए। मैंने कभी अपनी पत्नी के लिए एक अंगूठी नहीं खरीदी, मगर इसके लिए मुझे बाज़ार जाकर अंगूठी लानी पड़ी।"

बाद में पता लगा कि यह अंगूठी भी करुणानिधि ने दी थी, और भाषण का स्क्रिप्ट भी खुद ही लिखा था। वह जनता के सामने अन्नादुरइ से अंगूठी लेकर स्वयं को उत्तराधिकारी दिखाना चाहते थे। बाकी काम एमजीआर ने कर दिया। जब करुणानिधि के कहने पर उन्होंने प्रस्ताव रखा तो ‘कलाइनार’ को मुख्यमंत्री बनाना ही पड़ा। 10 फरवरी, 1969 को उन्होंने शपथ ली। 

कुर्सी पर बैठने के बाद तो सिनेमा खत्म, और असल खेल शुरू था। बहुत कुछ तेजी से बदल रहा था। सबसे पहले तो करुणानिधि ने मद्रास का नाम बदल कर ‘तमिलनाडु’ किया। लेकिन बात सिर्फ़ मद्रास की नहीं थी, देश बदल रहा था।

1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद के कामराज ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद तो दिया, लेकिन उनको लोहिया और अन्य नेता ‘गूँगी गुड़िया’ कहने लगे। कांग्रेस सिंडिकेट के बुजुर्ग भी उनसे प्रसन्न नहीं थे। इंदिरा गांधी नाप-तौल कर अलग राह बना रही थी। उन्होंने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई से मशविरे के बिना बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। पहाड़ तब टूट पड़ा जब उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रपति प्रत्याशी निजलिंगप्पा के बजाय स्वतंत्र प्रत्याशी तमिल नेता वी वी गिरि का समर्थन कर दिया। 

नवंबर, 1969 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाल दिया गया। कांग्रेस दो फाँकों में बँट गयी- कांग्रेस (O) यानी Organisation और कांग्रेस (R) यानी Requisition । कामराज, मोरारजी, निजलिंगप्पा जैसे सभी बुजुर्ग अब इंदिरा गांधी से अलग थे।

उस समय एम करुणानिधि ने इंदिरा गांधी को ऐसा ऑफर दिया, जिसे वह ठुकरा न सकी। उन्होंने कहा कि वह लोकसभा में उन्हें समर्थन देंगे, मगर बदले में उन्हें अगले विधानसभा चुनाव में पूर्ण समर्थन देना होगा। इंदिरा गांधी तमिलनाडु में अपना एक भी प्रत्याशी नहीं खड़ी करेगी, और डीएमके के लिए प्रचार करेगी।

यह शुरुआत थी करुणानिधि के उस खेल की, जिससे वह केंद्र सरकार की पेंच समय-समय पर कसते रहे। पेरियार ने कहा, 

“अब एक तरफ़ बूढ़े कामराज और राजाजी की जोड़ी है, दूसरी तरफ़ युवा इंदिरा और करुणानिधि की। अगर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री हाथ मिला कर राज्य चलाए, तो तमिलों का भला ही होगा। मैं इस युवा जोड़ी का समर्थन करता हूँ।”

इंदिरा और करुणानिधि, दोनों को, अब चुनाव में साबित करना था कि उनमें अकेले कितना दम है। करुणानिधि को अपने रास्ते में दो काँटे दिख रहे थे। एक तो कम्युनिस्ट, जो धीरे-धीरे एक नक्सल आंदोलन में बदल कर, दलितों के तारणहार बन रहे थे। 

दूसरे, उनके मित्र एमजीआर। करुणानिधि कुर्सी पाकर भी उस ग्लैमर को नहीं पा सके थे, जो एमजीआर के पास था। दोनों जब भी साथ मंच पर जाते, तमाम महिलाएँ और जनता करुणानिधि को छोड़, एमजीआर के ऑटोग्राफ़ के लिए दौड़ जाती।

अब उन्हें इस स्क्रिप्ट का आखिरी सीन लिखना था। इस सीन का थोड़ा-बहुत आइडिया इंदिरा गांधी से मिल ही गया था, लेकिन करुणानिधि को कुछ अपना कलइनार ‘टच’ डालना था। 
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

दक्षिण भारत का इतिहास - तीन (10)
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