Tuesday, 21 September 2021

असग़र वजाहत - पाकिस्तान में ट्रेन का सफ़र (2)

सफर करने के दौरान मैं बार-बार जेब से टिकट निकाल कर चेक करता रहता हूं। मुझे लगता है कि टिकट, टिकट नहीं है, कोई चिड़िया है जिसे मैंने जेब में  रखा हुआ है और वह मौका पाते ही उड़ जाएगी।

मैंने तीसरी बार मुल्तान से कराची जाने का टिकट निकाल कर बहुत ध्यान से पढ़ना शुरू किया। टिकट के पीछे उर्दू में साफ-साफ लिखा हुआ था की टिकट चेकर आईडी चेक करेगा। मैंने  अपने टिकट पर लिखी आईडी देखी तो मेरे होश उड़ गए। जाफरी साहब के नौकर ने टिकट खरीदा था और  टिकट पर अपनी आईडी लिखवा दी थी। अब टिकट चेकर जब देखेगा कि टिकट पर लिखी आईडी दूसरी है और मेरी आईडी एक हिंदुस्तानी पासपोर्ट है तो वह क्या करेगा?  फौरन पुलिस को रिपोर्ट करेगा कि एक हिंदुस्तानी या भारतीय फेक आईडी पर यात्रा कर रहा है । पुलिस को जैसे ही यह जानकारी मिलेगी वह मुझे ट्रेन से उतार लेगी। फेक आईडी पर कौन सफर करते हैं? जासूस या अपराधी या भगोड़े ।और इन तीनों को सजा दी जाती है। मुझे गिरफ्तार करते ही पुलिस किसी स्टेशन के  हवालात में बंद कर देगी।

ट्रेन के फर्स्ट  क्लास कूपे का जब यह हाल है तो हवालात कैसा होगा इसकी कल्पना करना बहुत मुश्किल न था।
पुलिस जब यह पूछेगी कि आपको वीजा तो दिया गया था लाहौर में फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' के जन्म शताब्दी समारोह में शामिल होने का।आप मुल्तान में क्या कर रहे थे? क्यों गए थे? और फिर कराची क्यों जा रहे हैं? क्या करेंगे ? इन सब सवालों का मेरे पास कोई जवाब न होगा तब  मेरे ऊपर मुकदमा शुरू हो जाएगा। पता नहीं कितना लंबा चलेगा। फिर सजा होगी। वह भी पता नहीं कितनी होगी। मोहनलाल भास्कर की किताब 'मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था' मेरी निगाहों के सामने से गुजरने लगी। मोहनलाल भास्कर को जितना टॉर्चर किया गया था उसका पांच परसेंट भी मुझे किया गया तो मैं पाकिस्तान से ही नहीं दुनिया से गुज़र जाऊंगा। ये  यह सब सोचकर चक्कर आने लगे । सबसे बड़ी मुश्किल तो यह थी कि अब कुछ न किया जा सकता था। मैं अगर जाफरी साहब को फोन भी करता तो वह क्या कर सकते थे?

मैं सिर पर कफ़न बांधे बैठा था कि टिकट चेकर आ गए। उन्होंने बैठते ही अपना चार्ट फैला दिया। मैंने अपना टिकट बढ़ाया। उन्होंने चार्ट पर ज्यादा गौर किया मेरे टिकट पर कम । और फौरन ही टिकट पर हिंदी के चार जैसी लाइन खींच कर टिकट मुझे वापस कर दिया और  बग़ैर कुछ कहे उठ कर चले गए। मेरी जान में जान आई।

मुझे लगा आस्थावान हो जाने का एक मौका मैंने खो दिया है। अगर टिकट चेकर के आने से पहले कोई मन्नत, मनौती मान ली होती तो कितना अच्छा होता है।

जैसे-जैसे रात बढ़ रही थी वैसे वैसे सर्दी लगना शुरू हो गयी थी । मेरे पास कोई गरम कपड़ा न था इसलिए एक कमीज के ऊपर दूसरी कमीज पहन ली। कुछ देर बाद फिर सर्दी लगने लगी तो तीसरी कमीज पहन ली। एक पेंट के ऊपर दूसरी पैंट पहन ली। 

इतना सब कुछ पहनने के बाद मैंने सोचा कि अगर इस कूपे में कोई दूसरा मुसाफ़िर आया तो मुझे यकीनी तौर पर पागल समझेगा। 
लेकिन मुश्किल यह थी कि मैं और कुछ न कर सकता था। वैसे कूपे की रोशनी मेरा साथ दे रही थी।
रात आधी से ज़्यादा गुज़र चुकी थी। अब तक कूपे में अकेला मैं किसी संभावित खतरे की शंका से मुक्त नहीं हो पाया था। कराची बहुत दूर थी।
( जारी ......)

असग़र वजाहत 
© Asghar Wajahat

पाकिस्तान में ट्रेन का सफर (1)
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#vss

Monday, 20 September 2021

आज़ादी के नायकों को तंगनजरी से न देखें / विजय शंकर सिंह


मुझे 1945 में अग्रणी में, छपा हिंदू महासभा और आरएसएस का वह कार्टून नही भूलता, जिंसमे सावरकर और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, तीर लेकर, दशानन रावण के रूप में चित्रित गांधी के ऊपर शर संधान कर रहे हैं। गांधी के दस शिर के रूप में नेहरू, पटेल, आज़ाद और अन्य स्वाधीनता संग्राम के महत्वपूर्ण नेता है। यह अकेला कार्टून यह स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि, आरएसएस और हिन्दू महासभा यानी डीवी सावरकर और डॉ एसपी मुखर्जी, दोनो ही स्वाधीनता संग्राम के विरुद्ध थे और वे अंग्रेजों और धार्मिक आधार पर, मुसलमानों के लिये एक नए मुल्क के रूप में, पाकिस्तान बनाने के लिये, बंटवारे की मुहिम चला रहे, एमए जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग के साथ थे। गांधी, सुभाष, भगत सिंह आदि की विचारधारा का विरोध किया जा सकता है, पर जब पूरा देश, आज़ादी के लिये सड़कों पर था, तब बार बार राष्ट्र निर्माण, देश भक्त आदि खूबसूरत शब्द का उच्चारण करने वाला संगठन, उस महासमर से अलग क्यों था ? यह सवाल अक्सर मेरे मन मे उठता है। पर आरएसएस और हिन्दू महासभा उंस महासमर से दूर और अलग थे, यह ऐतिहासिक तथ्य है।

गांधी, पटेल, नेहरू, सुभाष, मौलाना आज़ाद, भगत सिंह सबके बारे में इन संगठनो ने, कभी न कभी ऐसा बयान ज़रूर दिया है, जिससे इनकी खीज और चिढ़ सामने आ ही जाती है। स्वाधीनता संग्राम में आरएसएस की कोई भी भूमिका आज तक सामने नही आयी। इस हीन भावना से ग्रस्त होकर, यह लोग अक्सर स्वाधीनता संग्राम के महान नेताओ के कभी चरित्र की, तो कभी उनके फैसले की, तो कभी उनके निजी बातों की आलोचना करते रहते हैं। आज कल इनकी कृपा स्वाधीनता संग्राम सेनानी, राजा महेंद्र प्रताप पर पड़ रही है। साल, 2017 में अचानक भाजपा को याद आता है कि राजा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अपनी ज़मीन दी थी, तो उनकी जयंती एएमयू में मनाई जाय और एक अभियान इसके लिये चलाया गया। इस प्रकार एक महान व्यक्तित्व को याद करने के बजाय भाजपा की ज़िद और सक्रियता, बस यही थी कि, एएमयू में ही यह आयोजन हो। पर उन्हें यह याद नहीं होगा कि 1977 में जब एएमयू की स्थापना की शताब्दी मनाई जा रही थी, तो उसके मुख्य अतिथि राजा महेंद्र प्रताप ही बनाये गए थे।

राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर यूनिवर्सिटी की घोषणा के बाद लोगों का ध्यान इन महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी पर भी गया। लोग इनके बारे में पढ़ने लगे। पर ऐसा नही है कि, अलीगढ़ में राजा पर पहली बार चर्चा हो रही है। 2017 में भी राजा महेंद्र प्रताप की एएमयू में जयंती मनाने को लेकर अलीगढ़ के स्थानीय भाजपा नेताओं और एएमयू के प्रशासन के बीच विवाद हो चुका है। लेकिन एएमयू ने इस सम्बंध में स्थानीय भाजपा नेताओं की नही सुनी और जयंती जैसी किसी परम्परा की शुरुआत नही की। भाजपा नेताओं का उद्देश्य भी राजा महेंद्र प्रताप की जयंती मनाना कम, अपितु इस पर बखेड़ा खड़ा करना अधिक था। राजा महेंद्र प्रताप की राजनीतिक विचारधारा, भाजपा और आरएसएस की विचारधारा के सर्वथा विपरीत थी और जब राजा ने 1957 में, मथुरा लोकसभा से चुनाव लड़ा तो वे किसी दल के प्रत्याशी नही बल्कि उन्होंने निर्दल चुनाव लड़ा और जीता था। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी चौधरी दिगम्बर सिंह जो कांग्रेस के प्रत्याशी थे को हराया और उसी चुनाव में भारतीय जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी भी प्रत्याशी थे, उनको तीसरा स्थान मिला था। यह चुनाव राजा की लोकप्रियता का प्रमाण है। मथुरा हो या आगरा या अलीगढ़ यहां के किसी भी भाजपा के नेता ने न तो राजा महेंद्र प्रताप का कभी नाम लिया और न ही, उनकी स्मृति के लिये कभी कुछ किया। पर वे अलीगढ़ के एएमयू में केवल इसलिए राजा की जयंती मनाना चाहते थे जिससे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो और विवाद हो। स्वाधीनता संग्राम के प्रतीकों और योद्धाओं को जानबूझकर विवादित करना, और उनके माध्यम से अपनी राजनीतिक हैसियत बनाना इनका प्रिय एजेंडा है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राजा महेंद्र प्रताप की जयंती मनाने को लेकर, 2017 में, जब विवाद बढ़ने लगा तो इस विवाद में यूनिवर्सिटी के अध्यापक भी सामने आ गए थे। तब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन ने संघ और बीजेपी के नेताओं की आलोचना करने के साथ ही कुलपति की भी आलोचना की थी। एएमयू टीचर्स एसोसिएशन ने आरएसएस के नेताओं और कुलपति के बीच हुई कथित गुप्त मीटिंग पर भी नाराजगी जताई थी और इस पर कहा था कि, यूनिवर्सिटी को इस तरह की राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए। 
एएमयू टीचर्स एसोसिएशन ने तब कहा था, "शिक्षा के इस महान केंद्र को किसी का प्यादा नहीं बनने दिया जाएगा। टीचर्स एसोसिएशन ने किसी भी राजनीतिक दल के दबाव में जयंती मनाने का विरोध किया फिर चाहे वह केंद्र सरकार ही क्यों न हो।"
एसोसिएशन ने अपने बयान में कहा था,  'बीजेपी राजा महेंद्र प्रताप की विरासत पर कब्जा करना चाहती है। राजा धर्म निरपेक्ष थे, जो बीजेपी की नीतियों से मेल नहीं खाता। कुछ लोग इस मुद्दे को लेकर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं ताकि राजनीतिक लाभ लिया जा सके। राजा महेंद्र प्रताप सामाजिक परिवर्तन के क्रांतिकारी पुरोधा थे। 1957 में जनसंघ ने उनके खिलाफ प्रत्याशी उतारा था। जनसंघ के नए अवतार में बीजेपी गलत तरीके से उनकी विरासत पर दावा कर रही है।"

इस पर, एएमयू के तत्कालीन वाइस चांसलर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह ने यूनिवर्सिटी के अंदर बीजेपी के प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर कड़ी आपत्ति जताई थी और उन्होंने तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को लिखे अपने पत्र में इस कार्यक्रम की वजह से सांप्रदायिक तनाव फैलने की आशंका भी व्यक्त की थी।उन्होंने स्मृति ईरानी को लिखा था,  'यूनिवर्सिटी किसी भी तरह की राजनीति या किसी राजनीतिक आयोजन का हिस्सा नहीं बनना चाहती बल्कि आपकी मदद चाहती है, ताकि किसी भी तरह से कानून व्यवस्था न बिगड़े।"
इस मामले पर राजनीति भी तेज हो गई थी। बीजेपी ने एएमयू के इस फैसले का विरोध किया था तो, वहीं समाजवादी पार्टी समेत कई दूसरे संगठन कार्यक्रम के विरोध में उतर आए थे।

राजा महेंद्र प्रताप की जयंती मनाने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे थे, वे यह थे कि, उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अपनी ज़मीन दान में दी थी। यह बात बिल्कुल सही है कि राजा ने एएमयू को अपनी कुछ ज़मीन दान में दी थी। लेकिन यह बात सही नही है कि, पूरा एएमयू ही राजा महेंद्र प्रताप की दी हुयी ज़मीन पर बना है। अलीगढ़ के इतिहास पर काम करने वाले, डॉ राहत अबरार ने, राजा महेंद्र प्रताप से संबंधित भूमि विवाद की पड़ताल कर के एक तथ्यात्मक स्थिति प्रस्तुत की है। डॉ अबरार, उर्दू अकादमी, एएमयू के निदेशक हैं, जिन्होंने इस विषय पर आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उनके अनुसार,
" राजा महेंद्र प्रताप प्रसिद्ध स्वाधीनता संग्राम सेनानी, मानवतावादी और 1915 में काबुल में स्थापित निर्वासन में भारत की पहली अनंतिम सरकार के राष्ट्रपति थे। वे 20 वीं सदी के भारत में धर्मनिरपेक्षता के चैंपियन लोगों में से एक थे।"

भूमि विवाद का जिक्र करते हुए डॉ अबरार कहते है,
" महेंद्र प्रताप के पिता मुरसान के राजा घनश्याम सिंह और उनके पिता राजा टीकम सिंह सर सैयद अहमद खान के बहुत करीबी दोस्त थे।  इसके बाद जब राजा घनश्याम सिंह की मृत्यु हुई तो, राज परिवार ने सर सैयद अहमद द्वारा, युवा राजकुमार ( राजा महेंद्र प्रताप ) को अपने संरक्षण में लेने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और उन्हें एमएओ कॉलेज स्कूल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा शुरू की।"
डॉ अबरार आगे लिखते हैं, 
" राजा टीकम सिंह ने सर सैयद की साइंटिफिक सोसायटी के लिए 800/- रुपये और राजा घनश्याम सिंह ने एमएओ कॉलेज के पहले छात्रावास के निर्माण के लिए 1500/- रुपये का दान दिया था। राजा महेंद्र प्रताप ने भी 1929 में एमएओ कॉलेज स्कूल के लिए 1.2  हेक्टेयर जमीन, दो रुपये प्रति वर्ष की सांकेतिक राशि पर लीज में दी थी, जहां वह एक छात्र के रूप में पढ़ चुके थे।"
हालाँकि, डॉ अबरार ने यह भी स्पष्ट किया है कि,
" भूमि का यह भूखंड मुख्य विश्वविद्यालय परिसर के बाहर है। यूनिवर्सिटी के लिए सर सैयद अहमद खान ने सेना की छावनी से भूमि का अधिग्रहण, सरकार से करा कर लिया था। राजा महेंद्र प्रताप की भू संपत्ति से यूनिवर्सिटी की मुख्य भूमि, किसी भी तरह से जुड़ी नहीं थी।"
राजा महेन्द्र प्रताप ने एएमयू, अलीगढ़ को ही ज़मीन नही दी थी बल्कि उन्होंने अलीगढ़ और मथुरा जिलों में विभिन्न शैक्षिक और सामाजिक संगठनों को भी  व्यापक दान दिया है।

वर्ष 1895 में जब वे एमएओ में पढ़ रहे थे तो उन्हें सर सैय्यद अहमद खान ने एक अलग बंगले में रहने की अनुमति दी थी। डॉ अबरार, राजा साहब को दी गयी, इस विशेष सुविधा के पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि,
"यह विशेषाधिकार उन्हें इसलिए दिया गया था क्योंकि सर सैयद इस तथ्य से अवगत थे कि यह उनके दिवंगत मित्र के पुत्र थे, जिन्हें उनके संरक्षण में ही पढ़ने के लिये, राज परिवार ने दिया था। इसलिए यह महत्वपूर्ण था कि उन्हें सुविधापूर्ण ढंग से अच्छी शिक्षा मिले।"

अब जिस ज़मीन पर एएमयू बना है, उसके बारे में निम्नलिखित तथ्य है,

● मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल (एमएओ) कॉलेज, अलीगढ़ की स्थापना 8 जनवरी, 1877 को हुई थी। अधिकांश जमीन ब्रिटिश सरकार से खरीदी गई थी, जो अलीगढ़ छावनी (छावनी) को बंद करने की प्रक्रिया में थी, जिससे सर सैयद को 74 एकड़ जमीन मिली थी।
● राजा महेंद्र प्रताप (1886-1979) एमएओ कॉलेज के प्रतिष्ठित पूर्व छात्र थे।  एएमयू एक महान स्वतंत्रता सेनानी और परोपकारी राजा महेंद्र प्रताप का बहुत सम्मान करता है।
● राजा महेंद्र प्रताप के परदादा, राजा टीकम सिंह और मुरसान के पिता राजा घनश्याम सिंह भी सर सैयद अहमद खान के करीबी थे।  उनके परदादा ने रु.  800/- अलीगढ़ में साइंटिफिक सोसायटी भवन के निर्माण हेतु।  उनके पिता ने रुपये की राशि दान की।  1500/- बोर्डिंग हाउस के निर्माण के लिए दिया था।
● कुछ व्यक्तियों और संगठनों द्वारा फैलाई गई खबर कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय केवल राजा महेंद्र प्रताप द्वारा दी गई भूमि पर खड़ा है, तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि राजा महेंद्र प्रताप का जन्म एमएओ कॉलेज की स्थापना के नौ साल बाद 1886 में हुआ था।
● राजा महेंद्र प्रताप को 1895 में एमएओ कॉलेज में भर्ती कराया गया था। उन्हें एक बंगले जो जहूर वार्ड के सामने है, में वह रहते थे।
● 1929 में, राजा महेंद्र प्रताप ने 1.221 हेक्टेयर (3.04 एकड़) भूमि को ₹ 2 प्रतिवर्ष की सांकेतिक दर से पट्टे पर दिया था। अब, यह भूमि का उपयोग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा संचालित सिटी हाई स्कूल के खेल के मैदान के रूप में हो रहा है।  इस भूमि के अलावा, सिटी हाई स्कूल का क्षेत्रफल 1.96 हेक्टेयर है जो विश्वविद्यालय के पक्ष में भी पट्टे पर दिया गया है।
● एमएओ कॉलेज, अलीगढ़ के सबसे पुराने जीवित प्रतिष्ठित पूर्व छात्र के रूप में, राजा महेंद्र प्रताप को 1977 में एएमयू के शताब्दी समारोह में मुख्य अतिथि बनाया गया था।
● राजा महेंद्र प्रताप एक महान स्वाधीनता संग्राम सेनानी थे और उन्होंने 1 दिसंबर, 1915 को काबुल (अफगानिस्तान) में भारत की पहली अनंतिम सरकार की स्थापना की और इसके निर्वासन के राष्ट्रपति बने। उनका चित्र विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय, मौलाना आजाद पुस्तकालय के मुख्य हॉल में लगाया गया  है।

जिस समय एएमयू, बीएचयू जैसी यूनिवर्सिटी बन रही थी, उस समय उसके महान संस्थापकों, सर सैयद अहमद खान और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसी महान शख्शियतों को उनके मिशन में धन का योगदान देने के लिये देश भर के राजा, महाराजा, नवाब और अन्य धनिक वर्ग खुल कर सामने आया था। एएमयू और बीएचयू दोनो को ही इन रियासतों और कुलीन वर्गों का आर्थिक सहयोग मिला था। पर आज तक इन दानदाताओं की कोई भी जयंती, न तो एएमयू में मनाई गई और न ही बीएचयू में। ऐसी कोई परंपरा ही नहीं है। हां एएमयू के संस्थापक, सर सैयद और बीएचयू के संस्थापक, मदन मोहन मालवीय की जयंती ज़रूर, एएमयू में, सर सैयद डे और बीएचयू में मालवीय जयंती के नाम से मनाई जाती है। बीएचयू की पूरी ज़मीन काशी नरेश द्वारा दान में दी गयी है, और शुरुआती आर्थिक सहायता महाराजा दरभंगा ने प्रदान की थी। इनके अतिरिक्त, तमाम राजाओं और यहां तक कि निज़ाम हैदराबाद और प्रमुख व्यावसायिक घराना, बिरला परिवार ने भी बीएचयू को, धन दिया था, पर वहां पर कभी भी भाजपा के दिमाग मे नहीं आया कि वह काशी नरेश या अन्य किसी दानदाता की जयंती मना ले, पर केवल अपना साम्प्रदायिक एजेंडा बरकरार रखने के लिये 2017 में यह बखेड़ा, अलीगढ़ में किया गया था।

राजा से भाजपा की कभी निकटता नही रही है और न ही राजा की विचारधारा आरएसएस की वैचारिकी से मेल खाती रही है, बल्कि राजा जिस सोच औऱ वैचारिकी के थे, उससे तो संघ दूर ही भागता रहा है। आज राजा की विचारधारा पर, उनके योगदान पर, बात कम हो रही है, बात हो रही है तो केवल राजा की जाति, जाट पर और राजा के भूमिदान पर। जब देश भर के राजा महाराजा, अपने मंहगे और सजे सजाए पोशाक में ब्रिटेन के सम्राट के सामंत की तरह, उनके दरबार मे हाज़िरी लगाने को उत्सुक थे, तब 1915 में, राजा महेंद्र प्रताप, अपने साथी बरकतुल्लाह खान के साथ काबुल में आज़ाद भारत की सरकार गठित कर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन चुके थे। इस घटना को राजा के जज़्बे से देखिए, जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज नहीं डूबता था तब उसकी आंख में आंख डाल कर देखने का साहस, देश की एक मामूली सी रियासत, मुरसान का राजा कर रहा था। स्वाधीनता संग्राम के नायकों को उनकी जाति के कठघरे में सीमित कर के उनका आकलन करना और निहित चुनावी लाभ और स्वार्थ के लिये उन्हें विवादित करना, उन महानुभावों को अपमानित करना ही है।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 19 September 2021

असग़र वजाहत - पाकिस्तान में ट्रेन का सफ़र (1)

              ( मुल्तान रेलवे स्टेशन )

सन 2011 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन्म शताब्दी समारोह में पाकिस्तान जाना हुआ था। लौटकर मैंने  40 दिन की सघन यात्रा पर एक किताब लिखी थी जो  रवींद्र कालिया ने ज्ञानोदय में छापी थी  और उसे  ज्ञानपीठ ने  किताब की शक्ल में  छापा था।  उस किताब में  'पाकिस्तान में ट्रेन के सफर' का जिक्र भी है। लेकिन लॉकडाउन के दिनों में जब करने को कुछ नहीं है तो सोचा पाकिस्तान में ट्रेन के सफर को फेसबुक के दोस्तों के साथ शेयर कर दिया जाए।
मेरे पाकिस्तान जाने से पहले कई दोस्तों ने पाकिस्तान में दो काम न करने की सलाह दी थी। पहली सलाह  यह थी कि मैं पाकिस्तान में रेल यात्रा न करूं । दूसरी सलाह थी कि मैं कराची के डाउनटाउन इलाके में पैदल घूमने की कोशिश न करूं। शुभचिंतकों और दोस्तों  की सलाह के विपरीत मैंने यह दोनों काम किए।

पाकिस्तान में मेरी ट्रेन यात्रा को केवल मेरा व्यक्तिगत अनुभव माना जाए। इस आधार पर कोई बड़े निष्कर्ष न निकाले जाएं।

मुल्तान (मूल स्थान) का रेलवे स्टेशन एक शाहकार है, एक मास्टरपीस है। उसकी एक दिलचस्प तस्वीर मिली है जो  पार्टीशन से पहले की है। लेकिन तस्वीरों में मुल्तान रेलवेस्टेशन  की भव्यता ठीक से नजर नहीं आती।

स्टेशन पहुंचने पर पता लगा कि, बहाउद्दीन एक्सप्रेस जो मुल्तान  से कराची जाती है चार घंटा लेट है। अपने लोकल गाइड जाफरी साहब के साथ चाय पीते और गप्प मरते चार घंटे बिता दिए। ट्रेन आई। फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट के कूपे में बैठकर यह लगा के पूरा कोच बहुत पुराना है। 
सर्दियों के दिन थे। मैंने जाफरी साहब से पूछा कि क्या यहां बिस्तर वगैरह मिलेगा?  
जाफरी साहब ने कहा, यहां आपको एक रुमाल भी न मिलेगा।
मैंने कहा, तब तो रात में बहुत सर्दी लगेगी ।
जाफरी साहब ने बताया कि जैसे-जैसे ट्रेन कराची की तरफ बढ़ेगी वैसे-वैसे  सर्दी कम होती चली जाएगी...

कुछ देर के बाद जाफरी साहब चले गए और मैं डिब्बे का मुआयना करने लगा। छः बर्थ वाला कूपे  था । सीटों पर जो रक्सीन चढ़ा हुआ था  उस पर जगह जगह  सिलाई  की हुई थी  और  उस पर ER लिखा था। मैंने मतलब लगाया ईस्टर्न रेलवे । लेकिन पाकिस्तान में तो ईस्टर्न रेलवे जैसी कोई चीज  है नहीं। फिर ये क्या है?

डिब्बे की छत पर लाइट के पांच पॉइंट थे लेकिन चार पॉइंट्स से तारों के गुच्छे लटक रहे थे। पांचवें पॉइंट से एक तार लटक रहा था जिसमें एक बल्ब लगा था। स्विच बोर्ड से भी तारों का गुच्छा लटक रहा था। मतलब यह  कि बल्ब जलाने बुझाने या पंखा चलाने के लिए तारों को जोड़ना पड़ता है और जो नहीं जानता किस-किस तार से कौन सा तार जुड़ेगा वह बैठा रहे। खिड़कियों के जो शीशे बंद थे उन्हें खोलना और जिनके खुले थे उन्हें बंद करना मुझे अपने बस की बात नहीं लग रही थी। खिड़की के शीशों से बाहर देखने के लिए काफी कल्पना करना पड़ती थी जो मेरे लिए मुश्किल न था।

कूपे का एक टॉयलेट भी था। मैंने टॉयलेट का दरवाजा खोल कर देखा तो सीट की जगह एक इतना बड़ा 'होल' था कि पूरा आदमी नीचे चला जाय। इतना तय था कि टॉयलेट का इस्तेमाल टॉयलेट के अंदर जाकर नहीं किया जा सकता। हां टॉयलेट का दरवाजा खोल कर टॉयलेट के बाहर खड़े होकर  कुछ कोशिश की जा सकती थी। लेकिन दूसरे यात्रियों की मौजूदगी में ऐसा करना शायद अपराध  माना जाए।  मैं पाकिस्तान में सब कुछ कर सकता था लेकिन अपराध नहीं।

ट्रेन छूटने का नाम नहीं ले रही थी। मैं कूपे में अकेला था। अचानक कूपे के दरवाजे के अंदर आता मानव शरीर का एक ऐसा अंग नजर  आया जो पहले कभी नहीं देखा था। कुछ ही क्षण बाद पता चला कि यह एक भिखारी का कटा और सूजा हुआ  हाथ था जिसे उसने दरवाजे के अंदर डालकर मेरे अंदर भय और दया  का भाव पैदा करने की कोशिश की थी।  कुछ क्षण बाद उसका सिर भी दिखाई दिया। मैंने हाथ जोड़कर उससे माफी मांग ली और वह आगे बढ़ गया। इसके बाद एक - दो भिखारी और आये लेकिन मैंने किसी को कुछ नहीं दिया ।

ट्रेन बेमन से चलने लगी। ट्रेन के चलते ही टॉयलेट से चुड़ियों के चहचहाने जैसी आवाजें आने लगी। यह बात समझ में नहीं आई। क्या टॉयलेट की छत पर चिड़ियों ने अपना घोंसला बना रखा है ? और अगर ऐसा है तो ट्रेन चलने से पहले उनकी आवाज क्यों नहीं सुनाई दी? और फिर लगातार उनके बोलने की आवाज कैसे आ रही है? कुछ जांच करने पर पता चला कि ये चिड़ियों की आवाज नहीं है बल्कि लोहा लोहे से या तार तार से है या लकड़ी लकड़ी से या ये सब एक दूसरे से टकराते हैं तो यह आवाज़ पैदा होती है।

ट्रेन इतनी मंद गति से चली जा रही थी कि कोई भी बड़ी आसानी से चढ़ या उतर सकता था। सोचा, डिब्बे में अकेला हूं। कोई एक आदमी छोटा सा चाकू ले कर भी अगर आ गया तो मुझे अपना फोन और पर्स देना पड़ेगा। इसलिए मुझे लुट जाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। मैंने अपना पर्स खोल कर बड़ी रकम निकाल ली और उसे सामान के थैले में छुपा दिया । यह तय कर पाना थोड़ा मुश्किल था कि पर्स में लुटने के लिए कितनी रकम छोड़ी जाए ।अगर पर्स में लुटेरे को बहुत कम पैसे मिले तो हो सकता है उसे गुस्सा आ  जाए और वह मुझे मारना पीटना शुरू कर दे । इस तरह के किस्से मैंने सुने थे। इसलिए पर्स में पहले मैंने दो सौ छोड़े ....लगा बहुत कम हैं , फिर पांच सौ रखे,  उसके बाद हज़ार रख दिए।  मैंने सोचा  पाकिस्तानी एक हजार रुपया हमारे पांच सौ के बराबर होता है। अगर लुटेरा हजार रुपया ले भी गया तो यह मानकर मुझे कुछ तस्कीन मिलेगी कि वह सिर्फ पांच सौ ले गया है। मोबाइल फोन निकाल कर कुछ जरूरी नंबर एक कागज पर नोट किए। पर्स और  मोबाइल को बिल्कुल अपने बराबर इस तरह रख लिया कि अगर लूटने वाला आए तो उसे बहुत तकलीफ न हो और उसे तकलीफ नहीं होगी तो मुझे भी तकलीफ नहीं होगी।
(जारी रहेगा.....)

असग़र वजाहत 
© Asghar Wajahat
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Saturday, 18 September 2021

ई.वी. रामासामी पेरियार का लेख भविष्य की दुनिया

पेरियार मानव जाति के लिए कैसी दुनिया की कल्पना करते हैं, इसकी विस्तृत रूपरेखा उन्होंने ‘भविष्य की दुनिया’ शीर्षक अपने इस लेख में प्रस्तुत की है। 

ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ (17 सितंबर, 1879—24 दिसंबर, 1973) भारत की बहुजन-श्रमण परंपरा के आधुनिक युग के महानतम नायकों में एक हैं. वे एक ऐसे नायक हैं, जिन्हें अन्याय एवं असमानता का कोई रूप स्वीकार नहीं है. वे जाति एवं पितृसत्ता को भारतीय समाज के पांव की एक ऐसी बेड़ी मानते हैं, जिसे तोड़े बिना न्याय एवं समता आधारित आधुनिक लोकतांत्रिक भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता है। आजीवन अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले पेरियार का जन्म तमिलनाडु के इरोड कस्बे में  हुआ था. इनके पिता का नाम वेंकटप्पा नायकर और मां का नाम चिन्ना थयम्मल उर्फ मुथम्मल था.

प्रस्तुत अंश ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ में  एक कार्यक्रम में पेरियार द्वारा दिए गए एक भाषण का लिखित रूप है. तमिल भाषा में 1944 में यह ‘इनी वरुम उलहम?’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था. अंग्रेजी में इसका पहला संस्करण 1980 में ‘दी वर्ल्ड टू कम’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ. तमिल से अंग्रेजी में इसका अनुवाद प्रो.एस. वेणु ने किया था। इसे पुस्तिका के रूप में ‘द पेरियार सेल्फ-रिस्पेक्ट प्रोपेगेंडा इंस्टीट्यूट’ ने प्रकाशित किया. जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक ‘दि हिंदू’ में छपी थी, जहां पेरियार की तुलना बीसवीं शताब्दी के एच.जी.वेल्स से की गई थी.
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भविष्य की दुनिया
( ई.वी. रामासामी पेरियार )

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्यों के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात कहने का मेरा आधार क्या है?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाय दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हैं. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकार्यों को भी वे आवश्यकतानुसार और बिना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है, उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सब कुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन, जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नए पन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वास और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू-धर्म के अनुयायी; धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे धकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे धकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू-नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो, केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है.
लोग चाहे वे किसी भी देश अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही है. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है, जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की, न राजा होगा, न ही राज्य की जरूरत होगी. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित हैं. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि, दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है; अपने आपको ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं, जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं.

कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर दुनिया अग्रसर है. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं, जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं है. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में हैं. मगर ऐसे लोग भी हैं, जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, तो दूसरी ओर भुखमरी गरीबी और दुश्चिंताओं की भरमार है, जिसके चलते समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?
क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु, हमें ऐसा कोई नहीं मिलता, जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है; उसमें इन बुराइयों से निपटने की सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणी मात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं कि आखिर क्यों ऐसे महान् व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

युद्ध, जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी।

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चमत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा, जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु, भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास-प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह वैसा ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्त्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयां समाज द्वारा सही नहीं जाएंगी. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध, जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें; सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकारों, निजी व्यापारियों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ काम करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोतरी होगी. जनसंख्या वृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय-दृष्टि से देखा जा सकेगा. आने वाले समय में झाड़ू लगाने, मैला उठाने, जूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी।

मिसाल के तौर पर– कभी वे दिन थे, जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं, जो किस्म-किस्म के कपड़ों के 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट दो-तीन सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डैशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिए आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा, जब कोई आदमी दो सप्ताह श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं, जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी, जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा; विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लाभार्जन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहु-उपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे, मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा; न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ-न-कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे, जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय-दृष्टि से देखा जा सकेगा. आने वाले समय में झाड़ू लगाने, मैला उठाने, जूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मशीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे; ताकि वे नाम और शोहरत दोनों कमा सकें.

प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी।

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि, व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा, जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगी. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे; और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि, उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का खयाल दिल में लाएगा. वक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन् समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बर्बादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेश्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेश्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि, वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र गति से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हैट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे, मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी-भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक कैप्सूल में समा जाएगा, जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे. मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दोगुनी हो चुकी होगी. नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पशुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे. स्वस्थ और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्यदान के लिए तैयार किया जाएगा तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा, जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी; जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता की इच्छा और सहयोग से जनसंख्या नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं, जैसी वे आज हैं; भविष्य में उससे अलग होंगी. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पेट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दोबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा, ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि, उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए, स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.
उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइश नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन्, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी. मुश्किल है कि आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है; जो बड़ों द्वारा छोटों में संप्रेषित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है; कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा; किंतु बिना किसी अलौकिकताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है.

यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें; यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं; तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो, तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले, तो वह स्वर्ग के आकाश में तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इस तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे में ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन-से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं; जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि, वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में, जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं; आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईश्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है; यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि, उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए, स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो, तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. वह स्वर्ग के आकाश में तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है।

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा– ‘हम क्या करें? जब सब कुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उन पर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने-समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं; ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. वे उस दुनिया का विरोध करते हैं, जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके, जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे; वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करने के लिए हमें उनके साथ उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

तमिल से अंग्रेजी अनुवाद : प्रोफेसर ए.एस. वेणु, अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप।

( विजय शंकर सिंह )
#vss 

नितिन ठाकुर - भगत सिंह की फ़ोटो

दुर्भाग्यवश भगत सिंह का कोई वीडियो आज तक उपलब्ध नहीं है. जो हैं वो ले देकर चार फोटो हैं. यदि कोई फोटो या वीडियो होगा तो उनके संबंधियों या पुलिस रिकॉर्ड में हो सकता है जिनके सार्वजनिक होने की सूचना अब तक उपलब्ध नहीं है. जो चार तस्वीरें भगत सिंह की हम सबने देखी हैं उनके बारे में थोड़ी जानकारी साझा करूंगा. यहां पहली फोटो जो आप देख रहे हैं वो 11 साल के भगत सिंह की है.  साल 1907 में उनका जन्म हुआ था तो इस हिसाब से 1918 के आसपास ली गई होगी.

दूसरी फोटो दरअसल एक ग्रुप फोटो है. वहां से केवल भगत सिंह का धड़ से ऊपर का हिस्सा एडिट करके छापा गया है. मैं कमेंट बॉक्स में उस ग्रुप फोटो को अपलोड भी करूंगा तब देखिएगा. इस फोटो में भगत के केश लंबे हैं. ट्रिब्यून अखबार ने इस फोटो को 13 अप्रैल 1929 में प्रकाशित किया था यानि असेंबली कांड से जुड़ी खबरें छापने के सिलसिले में. मूल फोटो लाहौर सेंट्रल कॉलेज में 1924 में खींची गई थी यानि भगत 17 साल के थे. इस फोटो के बारे में कामा मैकक्लीन ने भी अपनी किताब में लिखा है.

तीसरी फोटो एक खाट पर बैठे भगत सिंह की है. इसके बारे में कई तरह के भ्रम हैं. कुछ लोग कहते हैं कि ये फांसी से पहले की है लेकिन ऐसा नहीं है. अपने जीवन में भगत दो बार गिरफ्तार हुए थे. एक गिरफ्तारी के बारे में हम सब जानते हैं लेकिन सबसे पहली गिरफ्तारी के विषय में उतनी जानकारी नहीं है. साल 1926 का दशहरा था. किसी ने बम विस्फोट कर दिया. पुलिस ने शक में कई लोगों को पकड़ा जिनमें भगत सिंह भी थे. साल 1927 की 29 मई को वो लाहौर थाने ले आए गए. यशपाल ने भी अपनी किताब में इसका वर्णन किया है. इसके अलावा प्रोफेसर चमनलाल ने फ्रंटलाइन पत्रिका के एक लेख में भी इस घटना से जुड़े कुछ खतों के बारे में लिखा है. भगत सिंंह को करीब पांच हफ्ते कोठरी में रहना पड़ा और फिर पुलिस ने कोर्ट में पेश किए बिना उन्हें करीब चालीस हज़ार की भारी भरकम जमानत पर छोड़ दिया. फोटो में भगत 20 साल के नौजवान हैं. जगह लाहौर का पुलिस थाना है. साथ में बैठे हैं गोपाल सिंह पन्नू जिनके पास लाहौर में सीआईडी के डीएसपी की ज़िम्मेदारी थी. फोटो चुपके से लिया गया है.

चौथा और अंतिम फोटो 21 साल के भगत सिंह ने खुद ही दिल्ली के रामनाथ फोटोग्राफर्स से अप्रैल 1929 में खिंचवाया था. उनके साथ बटुकेश्वर दत्त ने भी एक फोटो खिंचवाया था. केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के बाद इन तस्वीरों को ही क्रांतिकारियों ने प्रसारित किया. इन फोटो को खिंचवाने का मूल उद्देश्य भी यही था. इस फोटो में भगत के लंबे बाल गायब हैं क्योंकि वो फिरोज़पुर में कटवा चुके थे. मैकक्लीन ने इस तस्वीर पर भी काफी लिखा है.
#इतिइतिहास

नितिन ठाकुर 
© Nitin thakur

Friday, 17 September 2021

सरकार की आलोचना और आयकर, ईडी के छापों में क्या कोई अन्तर्सम्बन्ध है ? / विजय शंकर सिंह

आयकर और ईडी के छापे 2014 के पहले भी पड़ते थे और अब भी पड़ रहे हैं तथा आगे भी पड़ते रहेंगे। पर यह छापे अधिकतर व्यपारियो या संदिग्ध लेनदेन करने वालो, आय से अधिक संपत्ति की जांच में दोषी या संदिग्ध पाए जाने वाले अफसरों पर पड़ते थे। तब इन छापों की खबरों पर कोई बहुत ध्यान नही देता था और न ही जिन पर यह छापा पड़ता था, उनके प्रति कोई सहानुभूति, अधिकांश जनता के मन मे उपजती थी। आयकर और ईडी के छापों तथा पुलिस के छापों में मूल अंतर यह होता है कि पुलिस के छापे आपराधिक मामलों में लिप्त या संदिग्ध लोगों पर पड़ते हैं और जो भी सूचना मिलती है उसी के आधार पर तत्काल डाले जाते हैं जबकि आयकर के छापे काफी होमवर्क करने के बाद और निर्धारित टारगेट के सभी ठिकानों पर एक साथ डाले जाते हैं और वे लंबी अवधि तक चलते हैं । पुलिस के छापों की सफलता का प्रतिशत बहुत अधिक नही होता है, जबकि आयकर के छापे कम ही असफल होते हैं क्योंकि वे, छापा डालने के पहले काफी छानबीन करते हैं और उनके छापे विवादित भी कम ही होते हैं।  

पर 2014 के बाद पड़ने वाले आयकर और ईडी के छापों के बारे में एक आम धारणा यह बन रही है कि यह छापे विभागीय प्रोफेशनल दायित्व के बजाय जानबूझकर किसी पोशीदा एजेंडा के अंतर्गत डाले जा रहे हैं। जैसे इस समय  जो व्यक्ति, संस्थान या संगठन, वर्तमान सत्ता के विपरीत है, या सरकार का आलोचक है उसके यहां छापा पड़ जा रहा है। अब छापे में क्या मिल रहा है या छापे के बाद क्या कार्यवाही हुयी यह तो बाद की बात है, पर छापे के उद्देश्य, टाइमिंग और लक्ष्य पर काफी सवाल सोशल मीडिया में उठाये जाने लगे हैं। अमूमन आयकर या ईडी के विभागों में राजनीतिक दखलंदाजी बहुत अधिक नहीं होती है, विशेषकर उनके प्रोफेशनल कामकाज के संबंध में, और यदि कुछ  होता भी है, तो वह हस्तक्षेप दिखता भी कम ही है। पर अब, जैसे ही छापे की खबर आती है, और लक्ष्य का नाम सामने आता है, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं रहता है कि वह छापा किस उद्देश्य से डाला गया है और क्यों डाला गया है। ऐसे में सबसे अधिक असहज स्थिति छापा डालने वाले विभागों और उनके अफसरों की होती है जो यदि उचित कारणों से अपनी कार्यवाही कर भी रहे है तो उस पर संशय की अनेक अंगुलियां उठती रहती हैं। संशय की अंगुलियों से असहज हो जाने वाले अफसरों की मनोदशा का अनुमान आप लगा सकते हैं। 

2014 के बाद बड़े पूंजीपति या वे पूंजीपति जो सत्ता के नज़दीक हैं, के घर और अन्य ठिकानों पर, आज तक न तो किसी छापे की खबर आई और न ही किसी सर्वे की। यदि कोई यह तर्क दे कि उनके यहाँ कोई अनियमितता या चोरी नही होती है तो यह तर्क अपने आप मे ही हास्यास्पद बचाव होगा। लेकिन 2014 के बाद छापे पड़े, मीडिया संस्थानों पर, जिनपर अमूमन छापे कम ही पड़ते हैं, उन शख्शियतों पर, जो सरकार के मुखर आलोचक हैं और उन संस्थाओं पर जो सरकार की वैचारिकी से अलग या विपरीत राय रखते हैं। हाल ही में पड़ने वाले, कुछ महत्वपूर्ण छापों में द वायर, न्यूज़क्लिक, न्यूजलॉन्ड्री, दैनिक भास्कर, भारत समाचार, जैसे मीडिया संस्थानों पर पड़ने वाले छापे हैं। 'द वायर' तो शुरू से ही सत्ता विरोधी रुख रखता रहा है। उस के कार्यालय में तो, पेगासस जासूसी मामले में लगातार खुलासा करने के कारण, विनोद दुआ का नाम लेकर उन्हें तलाशती हुयी पुलिस भी गयी थी। दैनिक भास्कर और भारत समाचार पर महामारी से होने वाली मौतों पर लगातार रिपोर्टिंग से सरकार असहज थी, तो उनके यहां भी छापा पड़ा। हालांकि सरकार ने इन छापों को, रूटीन कार्यवाही कहा पर इस बयान के पीछे छिपे असल निहित और स्वार्थी सरकारी उद्देश्य की पहचान कर लेना कठिन नहीं था। इसमे, भास्कर कोई सत्ता विरोधी मनोवृत्ति का अखबार नही है लेकिन जब उसने खबरे सत्ता के खिलाफ छापनी शुरू की तो, उस पर भी नज़रें टेढ़ी हुई। जहां तक न्यूज़क्लिक और न्यूजलांड्री का सवाल है, यह दोनो वेबसाइट सत्ता के खिलाफ मुखर रहती हैं और इनकी खबरों से सरकार अक्सर असहज भी होती है। इनकी भी खबर सरकार ने ली।

हाल के छापों में न्यूज़क्लिक पर छापा खबरों में बहुत अधिक रहा। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीमें 100 से ज्यादा घंटों तक न्यूजक्लिक के एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ और लेखक गीता हरिहरण (जो कि पोर्टल में शेयरहोल्डर भी हैं) के घर पर छापे मारने के बाद वापस गयी। सौ घँटों की अवधि पर हैरान न हों, आयकर और ईडी के छापे अक्सर लंबी अवधि तक चलते हैं क्योंकि वे कर चोरी और वित्तीय अनियमितता से जुड़े होते हैं, अक्सर दस्तावेजों और कम्यूटर और अन्य तकनीकी उपकरणों की पड़ताल और उन्हें डिकोड आदि करने में समय लगता है। न्यूज़क्लिक ऑनलाइन न्यूज पोर्टल के करीब 10 परिसरों पर ईडी का छापा एक साथ शुरू हुआ था। इन छापों के बारे में, ईडी ने कहा है कि न्यूजक्लिक पर छापेमारी कथित मनी लॉन्ड्रिंग केस से जुड़ी हुई है और एजेंसी संगठन को विदेशों की संदिग्ध कंपनियों से धन मिलने की जांच कर रही है।

न्यूजक्लिक के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे 1977 की इमरजेंसी के समय में, छात्र आंदोलन में जेल भी जा चुके हैं। जबकि,  हरिहरण जानी-मानी लेखिका हैं और उन्हें उनके पहले उपन्यास, ‘द थाउजेंड’ के लिए कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज से सम्मानित किया जा चुका है। न्यूजक्लिक और उसके पत्रकारों के खिलाफ पहली छापेमारी, 9 फरवरी को ही हुयी थी। हाल की इस छापेमारी में, ईडी की अलग-अलग टीमों ने दिल्ली और यूपी के गाजियाबाद में 10 परिसरों में छापा डाला। इनमें न्यूजक्लिक का दक्षिण दिल्ली स्थित सुलाजाब स्थित ऑफिस भी शामिल था। इसके अलावा न्यूजक्लिक की पैरेंट कंपनी पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो पर भी छापेमारी की गई। 

अब इधर सबसे बडी खबर छापों के बारे में आयी कि रिटायर्ड आईएएस अफसर हर्ष मन्दर के यहां छापा पड़ा है। 16 सितंबर को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पूर्व आईएएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के घर और दफ्तर पर छापेमारी की है। ईडी ने सुबह करीब आठ बजे वसंत कुंज स्थित उनके घर, अधचीनी में उनके एनजीओ सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज और महरौली स्थित बाल गृह पर छापेमारी की है। यह कार्यवाई तब हुई है जब हर्ष मंदर और उनकी पत्नी नौ महीने की फेलोशिप के लिए जर्मनी के रोबर्ट बोस्च अकादमी गए हैं। पता चला है, कि यह छापेमारी मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले को लेकर की गई है। फरवरी में सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीएसई) के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. यह केस दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज किया गया था। 

हाल ही में हर्ष मंदर ने एक किताब, 'दिस लैंड इज माइन, आई एम नॉट ऑफ दिस लैंड' का संपादन किया था. यह किताब सीएए और नागरिकता पर लिखे लेखों का संग्रह है। साल 2020 में दिल्ली पुलिस ने हर्ष का नाम उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों से संबंधित चार्जशीट में भी दर्ज किया था। इसकी निंदा करते हुए देश भर के करीब 160 प्रमुख शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और कलाकारों ने उनके समर्थन में बयान जारी किया था। अक्टूबर 2020 में एनसीपीसीआर ने दिल्ली में दो बाल गृहों- उम्मीद अमन घर और खुशी रेनबो होम पर छापा मारा था, यह जानने के लिए कि कहीं यहां से किसी ने नागरिकता (संशोधन) बिल के विरोध में भाग तो नहीं लिया था। 

इन्ही छापों के क्रम में एक चर्चित छापा फ़िल्म अभिनेता सोनू सूद के यहाँ पड़ा छापा है। सोनू ने लॉक डाउन के दौरान कामगारो के पलायन के समय खुलकर समाज सेवा से जुड़े थे। सरकार तो उस अवसर पर कहीं दिखी ही नहीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री की घोषणा कि, बंदी के दौरान कामगारो को उनका वेतन दिया जायेगा, पर भी सरकार अमल नहीं करा सकी। जब सुप्रीम कोर्ट में पलायन का मामला उठा तो सरकार ने झूठ बोला कि कोई मजदूर सड़क पर नही है। जबकि लगभग 700 कामगार सड़कों पर सैकड़ो किलोमीटर पैदल या जो भी साधन मिला, उससे अपने घर जाते हुए रास्ते मे ही मर गए। जब पूंजीपतियों ने सुप्रीम कोर्ट में बंदी की अवधि का वेतन देने में वित्तीय असमर्थता का रोना रोया तो, सरकार उंस समय गरीब कामगारो के पक्ष में नहीं, बल्कि वह पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ी हुई और वेतन देने के लिये सरकार ने पूंजीपतियों पर कोई ज़ोर नही दिया। ऐसे कठिन समय मे देश की बहुत सी सामाजिक संस्थाएं और लोग कामगारो की मदद के लिये आगे आये थे। सोनू सूद भी उनमे से एक थे। सोनू अपनी सक्रियता से लोकप्रिय भी हुये। इस समय वह आम आदमी पार्टी से जुड़े हैं। ऐसे समय मे, उन पर, अचानक पड़ा यह छापा सरकार के इरादे के खिलाफ संदेह ही दर्शाता है। 

जिनके यहां छापा पड़ा है, हो सकता है उनके खिलाफ शिकायतें भी हों और उन शिकायतों में दम भी हो, पर जिनके यहां छापा पड़ा है, उन सबमे एक चीज समान है कि सभी की विचारधारा सरकार विरोधी है। आखिर क्या कारण है कि जो प्रतिष्ठान, संस्था और व्यक्ति सरकार के मुखर आलोचक हैं, उनके ही खिलाफ शिकायतेँ मिली है और उन्ही के खिलाफ छापे भी पड़े हैं ? ऐसा तो है नही कि, आजतक, ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी आदि न्यूज चैनल और दैनिक जागरण जैसे अखबार जो सरकार के प्रचार माध्यम तंत्र के रूप में लगभग बदल चुके हैं, वित्तीय रूप से बेहद साफ सुथरे हैं और उनके यहां कोई वित्तीय अनियमितता नहीं है ? क्या सरकार ने उनके यहां सर्वे कर के उन्हें पाक साफ पा लिया है, या वे सरकार के पाल्य हैं ?  यदि यही छापे सभी मीडिया संस्थान और अखबारों पर उनकी वित्तीय अनियमितता के बारे में छानबीन के लिये पड़ते तो इन छापों पर शायद ही चर्चा होती। पर यह छापे छांट छांट के बेहद ग़ैरपेशेवर तरीके से सिर्फ उन्ही लक्ष्यों पर डाले जा रहे हैं जो सरकार के खिलाफ हैं तो, संदेह तो उठेगा ही और चर्चा भी होगी।

अगर भ्रष्टाचार की बात करें तो पनामा पेपर्स का खुलासा साल 2017 के अप्रैल में हुआ था। पनामा पेपर्स की लिस्ट में विश्वभर के तमाम लोगों के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ नाम सामने आया था। पनामा पेपर्स में नाम होने के कारण आइसलैंड के प्रधानमंत्री को भी अपनी कुर्सी गवानी पड़ी थी। इस लिस्ट में भारत की भी 500 से ज्यादा नामी गिरामी हस्तियों के नाम मौजूद हैं जो भारत से लगभग हर क्षेत्र से हैं। इनमे अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन का नाम है तो बड़े कॉर्पोरेट घरानों में डीएलएफ के मालिक केपी सिंह तथा उनके परिवार के 9 सदस्य, अपोलो टायर्स और इंडिया बुल्स के प्रमोटर और गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी का नाम भी इस सूची में शामिल है। बंगाल के एक नेता शिशिर बजोरिया के अलावा लोकसत्ता पार्टी के नेता अनुराग केजरीवाल का भी नाम सामने आया है। तब तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संसद मे कहा था कि, भारतीयों की जांच करने के लिए  एक मल्टी-एजेंसी ग्रुप (मैग) का गठन किया गया था और वह अपना काम भली भांति कर रही है। अब यही यह सवाल उठता है इस पनामा लीक मामले की जांच में क्या कार्यवाही हुयी ? कोई दोषी मिला या नहीं ? क्या इस मामले में जुड़े व्यक्ति, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, विनोद अड़ानी या अन्य के ऊपर सर्वे या छापा जो भी आप कह लें मारने की हिम्मत आयकर या ईडी में है ? आज की स्थिति में तो बिल्कुल ही नहीं है। 

अक्सर कहा जाता है कि, छापों से करचोरी और वित्तीय अनियमितता करने वालों में भय उपजता है और ईमानदारी से कर अदा करने वाले विधिपालक नागरिकों में सिस्टम के प्रति सम्मान पैदा होता है। यह बात सही भी है। पर छापे ही किसी सिस्टम से नहीं, या सिस्टम तोड़ कर, डाले जांय तो इनका क्या असर जनता और ईमानदार कर दाताओं पर पड़ेगा ? क्या यह छापे वित्तीय अनियमितता को उजागर करने के लिये डाले जा रहे हैं या इस छापों के माध्यम से सत्ता विरोधी खेमे में यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि, यदि खिलाफ हुए तो बख्शे नहीं जाओगे। वर्तमान समय मे जो भी छापे आयकर और ईडी के डाले जा रहे हैं उनसे इसी बात की पुष्टि होती है कि यह छापे भयादोहन की रणनीति के अंतर्गत है, विशेषकर वे छापे जो अखबारों औऱ मीडिया के ऊपर डाले जा रहे हैं। 

लंबे समय मे पुलिस में राजनीतिक दखलंदाजी की चर्चा होती रहती है औऱ उंस दखलंदाजी को कम करने के रास्ते सुप्रीम कोर्ट से लेकर विभाग के आला अफसर तक ढूंढ रहे हैं। पर न तो वह दखलंदाजी कम हो रही है और न ही विभाग हिज मास्टर्स वॉयस के संक्रमण से बाहर आ रहा है। अब यही दखलंदाजी आयकर और ईडी में भी संक्रमित हो रही है। सीबीआई तो तोता घोषित हो ही चुकी है। लॉ इंफोर्समेंट एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थ और प्रतिशोध के रूप में यदि होता रहा तो इन संस्थाओं के पेशेवर कामकाज पर बहुत विपरीत असर पड़ेगा। इससे उन अफसरों और कर्मचारियों के मनोबल पर भी असर पड़ेगा, जो एक प्रोफेशनल तरीके से अपना दायित्व औऱ कर्तव्य निभाना चाहते हैं। राजनीतिक दलों को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि, कानून लागू करने वाली एजेंसियों को राजनीतिक द्वेष, प्रतिशोध और लाभ हानि का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिये। इसका परिणाम घातक ही होगा। यह प्रतिशोध का एक ऐसा अंतहीन सिलसिला शुरू कर देगा, जो राजनीतिक जमात के लिये भी कम घातक नहीं होगा और अपने उद्देश्य के लिये गठित यह लॉ इंफोर्समेंट एजेंसियां, अपने लक्ष्य, दायित्व और कर्त्तव्य से विचलित हो जाएंगी। 

© विजय शंकर सिंह 
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Thursday, 16 September 2021

मागधी से पालि, पालि से निकली संस्कृत; न है देवभाषा न ही जननी

बचपन से अब तक मानता आया था कि संस्कृत ही सभी भारतीय भाषाओं की जननी है और वह सामान्य नहीं, बल्कि देवभाषा है। लेकिन तीन महीने से पालि भाषा सीख रहा हूं तो जाना कि वह तो पालि से ठोंक-पीटकर गढ़ी गई भाषा है। खुद देख लीजिए। अहं गच्छामि, सो गच्छति, त्वं गच्छसि, मयं गच्छाम – ये सभी पालि के वाक्य हैं। संस्कृत में सो को सः और मयं को वयं कर दिया गया, बस! कुछ दिन पहले एक मित्र को मैंने बताया कि संस्कृत तो पालि से निकली है तो उन्होंने कहा कि ‘बुद्धं शरणम् गच्छामि, धम्मं शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि’ तो संस्कृत वाक्य हैं। लेकिन पालि सीखने के दौरान मैंने पाया कि ये शुद्ध रूप से पालि के वाक्य हैं।

दरअसल पालि उत्तर भारत और विशेष रूप से मगध जनपद की प्राचीन प्राकृत है। इसे मागधी भी कहते हैं, बल्कि कहा जाए तो यह मूलतः मागधी प्राकृत ही है। गौतम बुद्ध छह साल साधना करने के बाद वापस लौटे तो अनुभव से हासिल अपना ज्ञान घर-घर पहुंचाना चाहते थे। तब आम लोगों में लोकभाषा और खास लोगों में वेदों की छान्दस भाषा चलती थी। बुद्ध ने वैदिक छान्दस को न अपनाकर लोकभाषा का ही सहारा लिया। जहां उन्होंने अपने उपदेशों का छान्दस में अनुवाद करने से मना किया, वहीं दूसरी ओर “अनुजानामि भिक्खवे, सकाय निरुत्तिया” कहकर सभी प्राकृत भाषाओं में अपने उपदेशों को पेश करने की खुली अनुमति दे दी।

बाद में चूंकि सारी बुद्धवाणी मागधी प्राकृत में पालकर रखी गई (पहले कंठस्थ करके और फिर लिपिबद्ध करके) तो मागधी के इस अंश को पालि कहा जाने लगा। बुद्ध ने 45 साल तक मगध से लेकर गांधार तक इसी भाषा में लोगों के बीच अपनी बात रखी तो यह भाषा समूचे इलाके में प्रचलित हो गई। उसके शब्द अन्य प्राकृत भाषाओं में शामिल होते गए। मसलन पालि में मां के लिए बोला गया अम्मा शब्द अवधी बोलनेवाले हम लोगों के लिए बड़ा सहज है। पालि का पाहुन शब्द आज भी भोजपुरी में अतिथि के लिए इस्तेमाल होता है।

तब के भारतीय समाज में बुद्ध की बातों का इतना असर था तो भारत के पहले राजद्रोही ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग के दरबारी पाणिनि को इसकी काट के लिए पालि का ही सहारा लेना पड़ा, लेकिन उसे संस्कृत बनाकर। कहा जाता है कि कालिदास के नाटकों में जहां संभ्रांत चरित्र संस्कृत बोलते हैं, वहीं महिला व आम लोगों के पात्र पालि बोलते हैं। लेकिन यह भी दरअसल एक तरह का भ्रम है क्योंकि संस्कृत तो मूलतः पालि ही है और पालि की मूल भाषा मागधी है। हालांकि संस्कृत के पाणिनि व्याकरण में जहां लगभग 4000 सूत्र है, वहीं पालि के सबसे बड़े व्याकरण – मोग्गल्लान व्याकरण में सूत्रों की संख्या 800 के आसपास है। बनावट वाली चीज़ में ज्यादा तामझाम तो जोड़ना ही पड़ता है।

इस समय देश में जितने राज्य हैं, हर राज्य में जितने जिले हैं, उन जिलों में जितने शहर व तहसीलें हैं, इनकी संख्या से भी ज्यादा सस्कृत की पाठशालाएं हैं। मूल पालि के गिने-चुने पुछत्तर हैं। देश ही नहीं, विदेश तक के 99.99 प्रतिशत आम व खास लोग संस्कृत को सारी भारतीय भाषाओं की जननी मानते हैं। मैक्समुलर जैसे विदेशी विद्वान तो इसे आर्य परिवार की भाषा मानते हैं और इसका रिश्ता लैटिन तक से जोड़ते हैं।

21वीं सदी में अब हमें इस झूठ से मुक्त हो जाना चाहिए। तभी हम भारतीय जनमानस पर सदियों से लादे गए झूठ के पहाड़ को तिनका-तिनका काट सकते हैं। नकल को छोड़ हमें असल को अपनाना होगा। भारत के प्राचीन इतिहास को जानने के लिए संस्कृत के बजाय पालि को मूलाधार बनाना होगा, तभी हम अतीत की हकीकत जान पाएंगे।

अनिल सिंह (Anil Singh) के इस लेख पर Rakesh Mishra Kumar Mishra Kumar जी की यह टिप्पणी भी पढ़े। 

"नहीं । इस बेबुनियाद थ्योरी को कुछ दलित आग्रह वाले विमर्श कारों ने गति दी है। सैंधव नगरों के पतन के बाद सैंधव सभ्यता के बाशिंदे ज़्यादातर दक्षिण  और कुछ उत्तर भारत में फैल गए ।उनकी भाषा ठीक ठीक क्या थी ,यह ज्ञात नहीं है ।संभवत:इस भाषा की झलक दक्षिण की द्रविण तथा बलूचिस्तान के कुछ इलाक़ों की ब्राहुई भाषा में मिलती है ।आर्य कबीलों के सप्त सिंधु से गंगा घाटी में फैल जाने के क्रम में उनकी वैदिक संस्कृत के साथ सैंधवों की भाषा का इस तरह समागम हो गया कि अब यह पहचानना मुश्किल है कि वैदिक - लौकिक संस्कृत में कितना और कौन सा हिस्सा सैंधव भाषा है । पाणिनि का काल चौथी सदी ई पू है और वे महानन्द के समकालीन थे न कि पुष्य मित्र के शुंग के ।पुष्य मित्र शुंग की समकालीनता पतंजलि के साथ है न कि पाणिनि के साथ ।पाणिनि  ने ही वैदिक संस्कृत को  व्याकरण से सुसंस्कृत किया जिससे लौकिक संस्कृत निकली और आगे की सदियों में पुष्पित पल्लवित हुई । पालि -प्राकृत लौकिक संस्कृत की उसी तरह जन भाषा है जैसे कि आज की मैथिली , भोजपुरी ,ब्रज आदि ।बुद्ध का उद्देश्य था अपना उपदेश आम जन तक पहुँचाना ।इसी लिए अपने परिभ्रमण क्षेत्र की प्रचलित जन भाषा पालि का प्रयोग किया ।वैदिक -लौकिक संस्कृत धीरे धीरे ब्राह्मणों, क्षत्रियों के सत्तावर्ग में बदलते जाने के साथ साथ आभिजात्यों की भाषा बन गई ।इसी लिए संस्कृत भाषा के नाटकों में स्त्रियाँ और निम्न वर्गीय जन संस्कृत की जगह लोक भाषा प्राकृत का उपयोग करते हैं ।"

● इसी मूल लेख पर Bibhas Kumar Srivastav जी की यह टिप्पणी भी प्रस्तुत है। 

"आप को पं॰ काशीराम शर्मा की लिखी किताब ‘द्रविड़ परिवार की भाषा हिन्दी’ और ‘हिन्दी तॊल्काप्पियम्’ भी पढ़नी चाहिए। इस विषय पर राकेश मिश्रा कुमार सर से मेरी बात होती रहती है। काशीराम शर्मा केन्द्रीय अनुवाद निदेशालय के डायरेक्टर के पद से रिटायर हुए थे। 17 अक्टूबर 2015 को इस दुनिया से विदा लिए। उनके मतानुसार संस्कृत कभी भी वर्तमान पाकिस्तान और कश्मीर से आगे नहीं बढ़ पाई। बाक़ी आज के पूरे हिन्दुस्तान में प्राकृत ही बोली गई। इसका एक सर्वेक्षण मार्कण्डेय सन् 1556 में प्राकृत सर्वस्वम् नाम से प्रस्तुत कर चुके हैं। इसमें भारत में बोली जाने वाली प्राकृत भाषाओं का आठ वर्गों में बाँट कर सर्वे किया गया है। यह किताब मेरे पास है। एक प्रमाण कि संस्कृत इस भू-भाग में कभी नहीं बोली गई, यह है कि भारत के किसी गाँव और शहर का नाम संस्कृत में नहीं है, उर्दू-फ़ारसी-अरबी में भले हो। दूसरा प्रमाण है कि संस्कृत को रट्टा मारकर भी कोई नहीं सीख पाया। मज़े की बात यह है कि हिन्दी का रट्टा शब्द ही तमिऴ के रॆट्टु से बना है। ओढ़ना तमिऴ के ओडु से बना है। पूरे वर्तमान भारत में, कश्मीर को छोड़कर कहीं भी कभी भी संस्कृत बोली नहीं गई।"

● अब Arun Verma जी की इस टिप्पणी को भी पढिये। 

" संस्कृत से सभी भाषाओं का जन्म हुआ है ये विचार ब्राह्मणवादी और नागपुरी (संघ समर्थित) है। तीनों पोस्ट में अलग-अलग तथ्य हैं, राकेश मिश्रा जी सैंधव भाषा आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है। प्राकृतों (पालि) से ही संस्कृत का विकास हुआ है। चाहे वैदिक संस्कृत हो या लौकिक। लौकिक संस्कृत का ही व्याकरण पाणिनि ने तैयार किया जैसा कि वैदिक का निघंटु,निरुक्त और सायण ने। संस्कृत किसी भी युग में जनभाषा/आम बोलचाल की भाषा नहीं रही,चाहे संस्कृतज्ञ कितना भी आग्रह कर लें। प्राकृतों से ही संस्कृत पनपी। संस्कृति मनीषी और इतिहासकार डॉ भगवतशरण उपाध्याय ने भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण पुस्तक में " संस्कृत के विरुद्ध प्राकृतों का संघर्ष " निबंध में विस्तार से लिखा है। बुद्ध ने ही सबसे पहले जनभाषा प्राकृत(पालि) में अपने उपदेश,संदेश दिए।द्रविड़ो की तमिल कई लिहाज से संस्कृत से भी पुरानी है।

प्राकृतों/पालि वाली थ्योरी दलित चिंतन की खोज नहीं अपितु वामपंथी इतिहासकारों (राहुल सांकृत्यायन, डी डी कोसांबी, डॉ भगवतशरण उपाध्याय, डॉ देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, डॉ रामशरण शर्मा,डी एन झा) की शोध और मान्यता है। दुनिया की सबसे पुरानी किताब ऋग्वेद नहीं अपितु सुमेरियन महाकाव्य गिल्गमेश है जिसमें महाजलप्रलय की गाथा मिट्टी की बत्तीस ईंटों में उकेरी गई है और जो लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित हैं।जलप्रलय की कथा भारत में सबसे पहले शतपथ ब्राह्मण में मिलती है।

संस्कृत से जुड़े सारे मिथक उसदिन धराशायी हो जाएंगे जिसदिन सैंधव भाषा पढ़ ली जाएगी। हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी राखीगढ़ी की खोजें भी फिर से आर्यों के भारत से बाहर से आने का संकेत दे रहीं हैं।" 
#vss