Friday, 25 December 2020

#शब्दवेध (45) अंधेरे के लिए शब्द नहीं तम/तमस/तमिस्र

अंधेरे के लिए तम का प्रयोग नासदीय सूक्त में भी हुआ है- पहले तम के भीतर तम छिपा हुआ था - तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे।  परंतु  तमसा एक नदी का भी नाम था जिसे आजकल टोंस कहते हैं।[1]  अब कुछ दूसरे शब्दों पर ध्यान दे सकते हैं  जिनसे लालिमा,  आवेश, उल्लास आदि का  भाव प्रकट होता है -  तामर- पानी, तूँबा/तुमड़ी - जलपात्र;  *तमतम> टमटम- चलने वाला, वाहन: तमक- आवेश, तमतमाना,  तामा > सं. ताम्र,  तामझाम,  तामरस- 1.कमल, 2.ताँबा, 3.सुवर्ण;  तमस्विनी का एक अर्थ रात है तो दूसरा हल्दी।  फा. तमाशा, अ. तमन्ना - आकांक्षा । पराकाष्ठा सूचक प्रत्यय -तम पर भी हमारी दृष्टि जानी चाहिए क्योंकि लघुता और महिमा सूचक सभी शब्द जल के पर्याय हैं।  ध्यान तुलनात्मक -तर प्रत्यय पर भी जाना चाहिए, जो भी जलार्थक तर ही है।  हमें लगता  ‘तम’ और temp, temper, tempest, tame, timid,  time, temporary, Tames आदि शब्दों के संबंध पर पर नए ढंग से विचार किया जा सकता है, परंतु हम इसका खतरा नहीं उठाएंगे।

हम पाते हैं कि तम मूलतः अंधकार का द्योतक नहीं था और इसको नकारात्मक आशय में प्रयोग में लाया जाने लगा और अनेक नकारात्मक भावों - तमोगुण, तामसी स्वभाव, तमोवृध- निशाचर, तंबू> tomb आदि से भी जब कि उसी के समानान्तर लोक व्यवहार में,  उसी मूल से निकले  के शब्द दूसरे आशयों में प्रयोग में आते रहे।
---------------------------------
[1]  विरल अपवादों, जैसे अचिरावती- निरंतर धारा बदलने वाली,  को छोड़कर, सभी नदियों के नाम का अर्थ है जलवाली, सुजला या प्रवहमान है, इसलिए  नदियों के नाम के विश्लेषण से भी हम जल के पर्यायों को समझ सकते हैं। सामान्यतः इसका ध्यान विद्वान भी नहीं रख पाते। उदाहरण के लिए सुनीति बाबू की मान्यता थी कि गंगा का अर्थ नदी होता है और यह आस्त्रिक भाषा का है, मुझे उनको यह समझाने में कुछ समय लगा कि गंगा का अर्थ सुजला होता है, कि गं/कं का अर्थ जल है। समय इसलिए लगा कि उस समय मैं तटीय नामों के आधार कर अपना पक्ष रख रहा था। अधिक सटीक उदाहरणों- कं-ज= जलज; कनई, *गंगरा (गगरा), गगरी, गंगाल, की ओर हमारा भी ध्यान न था। आज भी गोमती, गोमल के साथ गाय का आशय जोड़ लिया जाता है, जब कि अर्थ है - जलवाली। गो का अपना नामकरण जल की गतिशीलता से प्रेरित है। गो हो या कम दोनों का अर्थ ‘चल’ है और इसलिए गोट और काउ का शाब्दिक अर्थ है चलने वाला, जैसे सर्प > सर्पेंट का अर्थ है सरकने वाला और ये भी सर- जल, > सरकना> सर्प, सरीसृप, सर्पेंट क्रम से उत्पन्न हैं। 
______________________________________________________
तिमिर 
तिम - जल;  तिमि - समुद्र,   तिमिंगल - महामत्स्य;  टीमटाम - सजावट, दिखावा;  टिमटिमाना; टेम- दीपशिखा ।
****
धूम/ धाम/ धुँआ/ धुंध/ धुँधला
धू-धू कर आग जलना,  धूमधाम से कोई उत्सव मनाना संदेह पैदा करता है कि धूम शब्द कालिमा का द्योतक रहा हो सकता है। शब्द जिस चीज के लिए टैग के रूप में प्रयोग में आता है, उसके रंग का शब्द पर आरोपण करने के कारण हम अपने को आश्वस्त कर लेते हैं कि इसका शाब्दिक अर्थ काला होगा।  परंतु ऋग्वेद में ललौहे धुँए का भी उल्लेख है (अच्छा द्यां अरुषो धूम एति, Aloft to heaven thy ruddy smoke ascendeth, ग्रि.) धुँए का रंग सदा काला नहीं दिखता।  कभी कभी सफेद भी लगता है।  धाम का प्रयोग ऋ. में स्थान और निवास के लिए, पर अनेक बार तेज के लिए भी  हुआ है - ‘पुरुहूतस्य धामभिः’  पुरुहूत इन्द्र के तेजों के साथ;’ धामसाचं अभिषाचं स्वर्विदम्’ स्वर्गीय तेजस्विता प्रदान करने  और समस्त तेजो के साथ ‘सप्त धामभिः’ जैसे प्रयोग देखने में आते हैं।  

यदि इस तरह की अनेकार्थता है तो धू/ धम् का स्रोत जल होना चाहिए। पहले मुझे कुछ सूझा नहीं।  परन्तु यदि हमने जो नियम स्थिर किए हैं वे निरपवाद हैं तो कोई शब्द होगा अवश्य। तब मेरा ध्यान ‘धोना’ क्रिया पर, ‘धवल’ वर्ण पर तो जाना ही था।  नदियों का एक पर्याय ‘धौती’ का  ऋग्वेद में केवल एक बार प्रयोग हुआ है- ‘यो धौतीनां अहिहन् अरिणक् पथः-2.13.5 (‘धौतीनां चलन्तीनां नदीनाम्’ , सायण)।  

अब धम् के वे अर्थ सामने आए जिनकी ओर पहले ध्यान नहीं गया था :  (1) चालन (धमन्तो बाणं,   ऋ. 1.85.10),   बाण चलाते हुए;  (वि सप्तरश्मिः अधमत् तमांसि, ऋ. 4.50.4), अपनी सातों रश्मियों से सभी प्रकार के अंधकारों को दूर भगा दिया  (2)  वध, (अभि दस्युं बकुरेणा धमन्तोरु ज्योतिश्चक्रथुरार्याय,  ऋ. 1.117.21), अपने प्रज्वलित क्षेप्यास्त्र से रहजनों का वध करते हुए सौदागरों के लिए प्रकाश फैला दिया, (3) ध्वनित करना,  (इन्द्रेषितां धमनिं पप्रथन् नि, ऋ 2.11.8),  इन्द्र प्रेरित ध्वनि करते रहे - धमनिं - शब्दं कुर्वाणां,  सायण;;  (4) विदीर्ण  करना,  (भृमिं धमन्तो अप गा अवृण्वत्, ऋ. 2.34.1) भागते हुए बादलों को विदीर्ण करके जल को मुक्त  किया; और (5) प्रवाह, (ये द्रप्सा इव रोदसी धमन्ति अनु वृष्टिभिः, उत्सं दुहन्तो अक्षितम्, 8.7.16),  They who like fiery sparks with showers of rain blow through the heaven and earth, Milking the spring that never fails ग्रि.. और इस अंतिम तर्क से ही हमारी रक्तवाहिकाओं का नाम धमनी पड़ा है। यूँ तो शिराएँ भी वाहिकाएँ ही हैं, परंतु हम केवल धू और धम् के अर्थविकास पर विचार कर रहे हैं।
      
आप भले पैंट या पाजामा पहनते हों, कभी कभार धोती तो पहना होगा, न पहना हो तो कुछ पुरुषों-स्त्रियों को धोती पहने तो देखा होगा, पर संभव है इसके अर्थ पर विचार न किया हो। धोती में जल का नहीं आवरण, आवास की तरह लिबास, या निवास की तरह वस्त्र का भाव  है। धू से धूम/धुन/ धुआँ ही नहीं धूप शब्द भी निकला है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (44) अंधेरे के लिए कोई शब्द नहीं

काला
------- 
काला उस शब्द समूह का हिस्सा है जिसमें  कल - जल > कलश- जलपात्र, कलेवा- जलपान; > (cool, cold, OE.col Ger- kuul)   कल (>क्ल), - पत्थर, ला. क्लैक्स; कलन- गणना (calculate -to count or reckon,< L.calx-stone), कल->सं. क्ल- जल,  स. क्लेद> अ. clay;   कला (calligraphy- a fine penmanship<Gk. callos- beauty), काल - चलने वाला, बीतने वाला (calk/ calque- < L. calcare- to tread,  calx- heel); - समय (calendar- Old F. calendier, L. calendarium - an accountbook ?),  काल > कलिया ( - kil, calamity)) काला (caligo- obscure, dim, dark;  L. caligo- fog) ,कोइला, (coal, charcoal, O.Narv. kol, Ger. Kohle) कल्हारल - भूनना, (kiln- oven आँवा, भट्ठा;  कृशानु ( Gr. kalein- to burn),  कळ/ /कड़- पत्थर,  निर्मम, ( callous - hardened, cruel, <L. callosus/ callus - hard skin),  कलाई/ कल्ला - गट्टा- जोड़;  कलन- निर्माण (caliology - science of birds  G. kalla/ kella- a nest :  कुल/कुलक; कल्मष (calumny - a false accusation)।

पहला प्रश्न यही उपस्थित होगा कि  इन सभी शब्दों में ध्वनि साम्य तो है,  परंतु अर्थ की इतनी विभिन्नता है   फिर   इन सभी को क्या एक मूल से जोड़ा,  या व्युत्पत्ति की दृष्टि से  एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। इन सभी की व्याख्या के लिए अनेक धातुओं की कल्पना की गई है, यद्यपि उसका कोई तार्किक आधार धातु में न तो मिलता है न हम उसकी अपेक्षा कर सकते हैं। उसकी शर्त है ध्वनि और अर्थ में समानता, पर जहाँ एक ही मूल से विविध अर्थ वाले शब्दों से पाला पड़ता वहाँ वह निरुत्तर हो जाती है।

हमने यह सुझाया है कि दूसरी वस्तुओं के नामकरण के पीछे उनके बीच का संबंध था।  परंतु अब लगता है कि  सृष्टि की कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिसका संबंध जल प्रकाश और ताप से न जोड़ा जा सके।  प्रकाश और ताप के लिए भी संज्ञा  उनकी ध्वनि हीनता के कारण जल से ही मिली है, इसलिए कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका संबंध जल से न जुड़ जाए।  जो भी हो संबंध  सूत्र की ओर संकेत करते हुए आगे बढ़ना अधिक वांछनीय है। 

ऊपर हमने यूरोपीय भाषाओं के  प्रतिशब्दों  के संदर्भ में यह पाया कि ग्रीक, लातिन, जर्मन, फ्रेंच, सभी   में कुछ ही सजात शब्द पाए जाते हैं, और सभी को मिला लिया जाए तो भी वे भारतीय भाषाओं में पाए जाने वाले प्रतिपदों  की तुलना में  बहुत कम पड़ेंगे। 

जो लोग मूल देश की तलाश में लुकाछिपी का खेल खेलते रहे हैं,  उनको उनके ही सिद्धांतों की याद दिला कर सही निष्कर्ष पर पहुंचने की सलाह देते भी तो भी उसकी अनसुनी कर देते। इतने लंबे समय में इतने परिश्रम से उन्होंने जो सांस्कृतिक आधिपत्य कायम किया है उसको छोड़ने से पहले वे एक-एक इन्च पर लड़ाई लड़ते हुए पीछे हटते हैं और इस जंग और वापसी में अपने बनाए हुए सारे  कानून-कायदे भूल जाते हैं। 

हम जिस बात की याद दिलाना चाहते हैं वह यह कि यूरोप तक जिसका प्रसार हुआ वह भाषा नहीं थी, बोली या बोलियाँ थी जिनमें स्वामिवर्ग द्वारा बोली जाने वाली बोली का प्रभुत्व था। भाषा इतनी विशद, बहु-आयामी और रहस्यमय उपस्थिति है जो अपने भौतिक परिवेश से बाहर जा ही नहीं सकती। भाषा और बोली में फर्क करते हुए सस्युर कहते हैं:
"What is la langue? For us, it is not to be confounded with speech (le langage); it is only a determinate part of this, an essential part, it is true. It is at once a social product of the faculty, of speech, and a collection of necessary conventions adopted by the social body to allow the exercise of this faculty by individuals. It is a whole in itself and a principle of classification. As soon as we give it the first place among the facts of speech we introduce a natural order in a whole which does not lend itself to any other classification." La langue is further "the sum of the verbal images stored up in all the individuals, a treasure deposited by the practice of speaking in the members of a given community; a grammatical system, virtually existing in each brain, or more exactly in the brains of a body of individuals; for la langue is not complete in any one of them, it exists in perfection only in the mass."

इससे मिलती-जुलती बात  वाइटहेड्  भी करते हैं,  परंतु  सीधी और दो टूक होते हुए भी C. K. Ogden ' I. A. Richards को यह विचार फैंटेस्टिक लगता है।  (द मीनिंग ऑफ मीनिंग, 1923, 5).  भाषाक्षेत्र से दूर रह कर, बोलियों की  सीमाओं के कारण इस विराट सत्य का साक्षात्कार करना भी कठिन है, यद्यपि एक तथ्य के रूप में इसे विलियम जोंस से लेकर आज तक दर्जनों भाषाशास्त्रियों ने स्वीकार किया था।

हम  रूपगत  अर्थगत विकास की ओर लौटें:
कल- जल जिसका एक गुण प्रवाह है इसलिए काल - जो चलता है;( त. काल् -पाँव, काल - समय और क्रिया के त्रिकाल,  समय के प्रभाव और विनाश से परे कुछ नहीं इसलिए कालन् - कालदेव), काल और समय का का एक पक्ष इसके उबलने या जलाने का है जिसने खौलने की अवस्था का हाथ है,(त. समै- पकाना)।   जलाने के सटीक अर्थ में कोई शब्द मेरे ध्यान में नहीं आ रहा है, पर कोयला-कोल, चारकोल , कोह्ल(kohl -सुरमा) ।  आदि से स्पष्ट है कि ऐसा कोई शब्द किसी बोली में है  । पानी जम जाय तो पत्थर (उपल - पत्थर, उपला - कंडा, गोबर का सूखा पिंड,  उपल- ओला. हिमखंड) अतः त. कल् हिं. कड़ - पत्थर (जिससे कड़ा, कड़ाके की {सर्दीः}, कऱका - ओला, कड़ाई, भो. कड़ेर,कड़ियल/अड़ियल आदि की उत्पत्ति है।  कड़ा/ कड़ी के कड़वा/कड़वी  में बदलाव को भी इसी से समझा जा सकता है )।      

इस तरह हम पाते हैं कि उन सभी संज्ञाओं और संकल्पनाओं के पानी से व्युत्पादन का एक तर्कसंगत आधार है। पर साथ ही यह भी पाते हैं कि इस कछुआ चाल से हम अपने लक्ष्य तक पहुँच ही न पाएँगे, अतः कल से छोटा रास्ता अपनाना होगा।

भगवान सिंह 
( Bhagwan Singh )

चार्ली चैप्लिन की फ़िल्म द ग्रेट डिक्टेटर और तानाशाह का भाषण / विजय शंकर सिंह

प्रख्यात फ़िल्म अभिनेता, चार्ली चैप्लिन की  आज पुण्यतिथि है। चार्ली विश्व सिनेमा के एक महानतम अभिनेता रहे हैं। उनका निधन, 25 दिसम्बर 1977 को हुआ था। वे कहते थे, हंसे बिना, गुज़ारा हुआ एक दिन, बरबाद हुए एक दिन के बराबर है। कॉमेडी के लीजेंड कहे जाने वाले इस महान कलाकार की प्रतिभा को एक लेख में समेटना बहुत ही मुश्किल है। चैप्लिन, मूक फिल्म युग के सबसे रचनात्मक और प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने अपनी फिल्मों में अभिनय, निर्देशन, पटकथा, निर्माण और संगीत भी दिया। चैप्लिन: अ लाइफ (2008) किताब की समीक्षा में, मार्टिन सिएफ्फ़ ने लिखा कि,
"चैप्लिन सिर्फ 'बड़े' ही नहीं थे, वे विराट् थे। 1915 में, वे एक युद्ध प्रभावित विश्व में हास्य, हँसी और राहत का उपहार लाए जब यह प्रथम विश्व युद्ध के बाद बिखर रहा था। अगले 25 वर्षों में, महामंदी और हिटलर के उत्कर्ष के दौरान, वह अपना काम करते रहे। वह सबसे बड़े थे। यह संदिग्ध है की किसी व्यक्ति ने कभी भी इतने सारे मनुष्यों को इससे अधिक मनोरंजन, सुख और राहत दी हो जब उनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।"

चार्ली को पढ़ना हो तो उन्हें उनकी आत्मकथा से पढा जाना चाहिए । उनकी आत्मकथा, आत्मकथा साहित्य के इतिहास में सबसे ईमानदार आत्म विवरणों में से एक मानी जाती है। चार्ली चैपलिन की कॉमेडी जहां आप को जीवंत कर जाती है वही वह आत्मा को भी झिंझोड़ देती है। मूक फिल्मों के इस महान कलाकार की कोई भी फ़िल्म आप देखना शुरू कर दें आप को उसमे कॉमेडी, परिहास के साथ साथ कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर मिलेगा जो आप को गम्भीर कर देगा। उनकी फिल्मों में, अंतरात्मा को झिंझोड़ने की गज़ब की सामर्थ्य है। 

चार्ली यहूदी थे और उनकी फिल्म द डिक्टेटर, यहूदियों का प्रबल शत्रु एडोल्फ हिटलर पर एक मार्मिक व्यंग्य के रूप में बनाई गयी है। यह चार्ली चैपलिन की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में, शुमार होती है। फिल्म ' द डिक्टेटर। ' हिटलर के एक स्तब्ध कर देने वाले भाषण से खत्म होती है जो दुनिया को, महायुद्ध की उस विभीषिका में शांति और मानवता का एक अद्भुत  सन्देश दे जाती है। चार्ली ने इस फिल्म में हिटलर का बेमिसाल अभिनय किया है। यह हिटलर की मिमिक्री है। चार्ली की बड़ी इच्छा थी की , इस फिल्म का प्रदर्शन , हिटलर के सामने हो और वह खुद ऐसे प्रदर्शन के समय हिटलर के साथ थिएटर में मौजूद रहें। चार्ली की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।

द ग्रेट डिक्टेटर , वास्तव में हिटलर पर बेहद साधा हुआ और मार्मिक व्यंग्य है। हिटलर को जब ज्ञात हुआ कि उस पर ऐसी मज़ाक़ उड़ाने वाली फिल्म बनायी जा रही है तो उसने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की , पर उसकी उत्कंठा अपने मज़ाकिया किरदार को देखने की थी। इस फिल्म की योजना चार्ली ने 1936 में नाज़ियों के प्रचार युद्ध का कला के माध्यम से जवाब देने के लिए बनायी थी। चैपलिन ने न केवल हिटलर जैसी मूंछे रखी बल्कि हिटलर के चलने और बात करने और केश विन्यास की भी नक़ल की। इस फिल्म की  स्क्रिप्ट , और लोकेशन दोनों में , वास्तविकता लाने के लिए कई बार बदलाव किया  गया । चार्ली ने हिटलर के भाषण देने के अंदाज़ , और उसके गर्दन तथा हाँथ झटकने की आदत की हू ब हू नकल करने के लिए , हिटलर से जुडी कई फिल्मों को बेहद संजीदगी के साथ देखा। 

चार्ली इस फिल्म का  अंत एक नृत्य के द्वारा करना चाहते थे। पर अंत में उन्होंने फिल्म का  क्लाइमेक्स बदल दिया। उन्होंने हिटलर के ही अंदाज़ में अपना अत्यन्त लोकप्रिय भाषण दिया जिसमें उन्होंने हिटलर के तानाशाही की धज्जियां उड़ा दीं। 100 मूक फिल्मों में अभिनय के बाद जब चार्ली मुखर हुए तो उनका हंसोंडपन खो गया और एक संजीदा अभिनेता सामने आया। फिल्म 1940 में रिलीज़ हुयी थी। उस समय युद्ध ज़ोरों पर था। यूरोप और एशिया में अफरा तफरी मची थी। अमेरिका तब तक युद्ध में शामिल नहीं हुआ था। लन्दन और पेरिस पर बमबारी हो रही थी। अमेरिका अपना उत्पादन बढ़ा कर , मुनाफ़ा कमा रहा था। यह फिल्म कलात्मक और चार्ली के अभिनय प्रतिभा का अप्रतिम उदाहरण होने के बाद भी अखबारों का उचित ध्यान नहीं खींच पायी और इसे जितना प्रचार मिलना चाहिए था, नहीं मिला। इसका कारण था, तब दुनोगी द्वितीय विश्वयुद्ध में उलझी थी और सारे अखबार युद्धों की ख़बरों और नेताओं के बयानों से भरे रहते थे।

लेकिन , हिटलर ने फिल्म देखी। तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार हिटलर ने यह फिल्म दो बार देखी। पर अकेले। चार्ली के साथ नहीं। बताते हैं कि जब उसे इस फिल्म , और उसकी मज़ाकिया भूमिका के बारे में भी बताया गया तो उसने इस फिल्म की प्रिंट मंगाई। अपने कार्यालय में एक विशेष प्रोजेक्टर पर यह फिल्म उसने देखी। उसे हैरानी हुयी कि कैसे कोई कलाकार , उसकी नक़ल करने के लिए , ढूंढ ढूंढ कर उसकी फिल्में देख सकता है। यह भी कहा जाता है कि चार्ली को अपशब्द कहने वाला , यह कठोर और उन्मादी तानाशाह , फिल्म में जब चार्ली का  भाषण जो , चार्ली ने हिटलर का अभिनय करते हुए दिया था , समाप्त हुआ तो , हिटलर फूट फूट कर रो पड़ा।अभिनय जब मर्म को छू जाय , तभी उसकी सार्थकता है , अन्यथा वह नाटक है।

फ़िल्म का सबसे मार्मिक और सन्देशयुक्त अंश है चार्ली का भाषण जो उसने हिटलर का किरदार जीते हुए दिया है। द ग्रेट डिक्टेटर’ फिल्म का भाषण कालजयी भाषण है। मशीनी युग की तार्किक आलोचना हो या तानाशाही की मुखर मुखालफत. या फिर मनुष्यता की भावना को सर्वोपरि रखने की सीख, यह भाषण सब कुछ समेटे हुए हैं, हर लिहाज़ से बार-बार सुना जाने लायक है। 

आप यह भाषण यहां पढ़ें, 
"मुझे खेद है, लेकिन मैं शासक नहीं बनना चाहता। ये मेरा काम नहीं है। किसी पर भी राज करना या किसी को जीतना नहीं चाहता। मैं तो किसी की मदद करना चाहूंगा – अगर हो सके तो – यहूदियों की, गैर यहूदियों की – काले लोगों की – गोरे लोगों की।

हम सब एक दूसरे की मदद करना चाहते हैं। मानव होते ही ऐसे हैं। हम एक दूसरे की खुशी के साथ जीना चाहते हैं – एक दूसरे की तकलीफ़ों के साथ नहीं। हम एक दूसरे से नफ़रत और घृणा नहीं करना चाहते। इस संसार में सभी के लिए स्थान है और हमारी यह समृद्ध धरती सभी के लिए अन्न जल जुटा सकती है।

‘जीवन का रास्ता मुक्त और सुन्दर हो सकता है, लेकिन हम रास्ता भटक गये हैं। लालच ने आदमी की आत्मा को विषाक्त कर दिया है – दुनिया में नफ़रत की दीवारें खड़ी कर दी हैं – लालच ने हमें ज़हालत में, खून खराबे के फंदे में फंसा दिया है। हमने गति का विकास कर लिया लेकिन अपने आपको गति में ही बंद कर दिया है। हमने मशीनें बनायीं, मशीनों ने हमें बहुत कुछ दिया लेकिन हमारी मांगें और बढ़ती चली गयीं। हमारे ज्ञान ने हमें सनकी बना छोड़ा है; हमारी चतुराई ने हमें कठोर और बेरहम बना दिया है। हम बहुत ज्यादा सोचते हैं और बहुत कम महसूस करते हैं। हमें बहुत अधिक मशीनरी की तुलना में मानवीयता की ज्यादा ज़रूरत है। चतुराई की तुलना में हमें दयालुता और विनम्रता की ज़रूरत है। इन गुणों के बिना, जीवन हिंसक हो जायेगा और सब कुछ समाप्त हो जायेगा।

‘हवाई जहाज और रेडियो हमें आपस में एक दूसरे के निकट लाये हैं। इन्हीं चीज़ों की प्रकृति ही आज चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है – इन्सान में अच्छाई हो – चिल्ला चिल्ला कर कह रही है – पूरी दुनिया में भाईचारा हो, हम सबमें एकता हो। यहां तक कि इस समय भी मेरी आवाज़ पूरी दुनिया में लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच रही है – लाखों करोड़ों – हताश पुरुष, स्त्रियां, और छोटे छोटे बच्चे – उस तंत्र के शिकार लोग, जो आदमी को क्रूर और अत्याचारी बना देता है और निर्दोष इन्सानों को सींखचों के पीछे डाल देता है। जिन लोगों तक मेरी आवाज़ पहुंच रही है – मैं उनसे कहता हूं – `निराश न हों’। जो मुसीबत हम पर आ पड़ी है, वह कुछ नहीं, लालच का गुज़र जाने वाला दौर है। इन्सान की नफ़रत हमेशा नहीं रहेगी, तानाशाह मौत के हवाले होंगे और जो ताकत उन्होंने जनता से हथियायी है, जनता के पास वापिस पहुंच जायेगी और जब तक इन्सान मरते रहेंगे, स्वतंत्रता कभी खत्म नहीं होगी।

‘सिपाहियों! अपने आपको इन वहशियों के हाथों में न पड़ने दो – ये आपसे घृणा करते हैं – आपको गुलाम बनाते हैं – जो आपकी ज़िंदगी के फैसले करते हैं – आपको बताते हैं कि आपको क्या करना चाहिए – क्या सोचना चाहिए और क्या महसूस करना चाहिए! जो आपसे मशक्कत करवाते हैं – आपको भूखा रखते हैं – आपके साथ मवेशियों का-सा बरताव करते हैं और आपको तोपों के चारे की तरह इस्तेमाल करते हैं – अपने आपको इन अप्राकृतिक मनुष्यों, मशीनी मानवों के हाथों गुलाम मत बनने दो, जिनके दिमाग मशीनी हैं और जिनके दिल मशीनी हैं! आप मशीनें नहीं हैं! आप इन्सान हैं! आपके दिल में मानवता के प्यार का सागर हिलोरें ले रहा है। घृणा मत करो! सिर्फ़ वही घृणा करते हैं जिन्हें प्यार नहीं मिलता – प्यार न पाने वाले और अप्राकृतिक!!
‘सिपाहियों! गुलामी के लिए मत लड़ो! आज़ादी के लिए लड़ो! सेंट ल्यूक के सत्रहवें अध्याय में यह लिखा है कि ईश्वर का साम्राज्य मनुष्य के भीतर होता है – सिर्फ़ एक आदमी के भीतर नहीं, न ही आदमियों के किसी समूह में ही अपितु सभी मनुष्यों में ईश्वर वास करता है! आप में! आप में, आप सब व्यक्तियों के पास ताकत है – मशीनें बनाने की ताकत। खुशियां पैदा करने की ताकत! आप, आप लोगों में इस जीवन को शानदार रोमांचक गतिविधि में बदलने की ताकत है। तो – लोकतंत्र के नाम पर – आइए, हम ताकत का इस्तेमाल करें – आइए, हम सब एक हो जायें। आइए, हम सब एक नयी दुनिया के लिए संघर्ष करें। एक ऐसी बेहतरीन दुनिया, जहां सभी व्यक्तियों को काम करने का मौका मिलेगा। इस नयी दुनिया में युवा वर्ग को भविष्य और वृद्धों को सुरक्षा मिलेगी।

‘इन्हीं चीज़ों का वायदा करके वहशियों ने ताकत हथिया ली है। लेकिन वे झूठ बोलते हैं! वे उस वायदे को पूरा नहीं करते। वे कभी करेंगे भी नहीं! तानाशाह अपने आपको आज़ाद कर लेते हैं लेकिन लोगों को गुलाम बना देते हैं। आइए, दुनिया को आज़ाद कराने के लिए लड़ें – राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़ डालें – लालच को खत्म कर डालें, नफ़रत को दफ़न करें और असहनशक्ति को कुचल दें। आइये, हम तर्क की दुनिया के लिए संघर्ष करें – एक ऐसी दुनिया के लिए, जहां पर विज्ञान और प्रगति इन सबकों खुशियों की तरफ ले जायेगी, लोकतंत्र के नाम पर आइए, हम एक जुट हो जायें!

हान्नाह! क्या आप मुझे सुन रही हैं?
आप जहां कहीं भी हैं, मेरी तरफ देखें! देखें, हान्नाह! बादल बढ़ रहे हैं! उनमें सूर्य झाँक रहा है! हम इस अंधेरे में से निकल कर प्रकाश की ओर बढ़ रहे हैं! हम एक नयी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं – अधिक दयालु दुनिया, जहाँ आदमी अपनी लालच से ऊपर उठ जायेगा, अपनी नफ़रत और अपनी पाशविकता को त्याग देगा। देखो हान्नाह! मनुष्य की आत्मा को पंख दे दिये गये हैं और अंतत: ऐसा समय आ ही गया है जब वह आकाश में उड़ना शुरू कर रहा है। वह इन्द्रधनुष में उड़ने जा रहा है। वह आशा के आलोक में उड़ रहा है। देखो हान्नाह! देखो!"

आज हम एक महामारी की त्रासदी से तो जूझ ही रहे हैं, पर इस त्रासदी की आड़ में नवउदारवाद और उसकी आड़ में जड़ पकड़ रहे पूंजीवाद के सबसे घृणित रूप से भी रूबरू हो रहे हैं। दुनिया मे एक नए प्रकार की तानाशाही और पूंजीवाद विकसित हो रहा है जो मशीनों की तरह ही संवेदनाशून्य है। देश की राजधानी दिल्ली की सीमा पर लाखों किसान अपनी बात कहने के लिये इस घोर सर्दी में एक महीने से शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हैं और वे अपनी उपज की वाजिब कीमत मांग रहे हैं, जो उनका मौलिक हक़ है। इस धरने में आज तक 40 किसान अपनी जान गंवा चुके हैं, पर आज तक सरकार या प्रधानमंत्री ने उन निरीह नागरिको की अकाल मृत्यु पर एक शब्द भी नहीं कहा।

क्या यह आचरण एक लोकतांत्रिक और ऐसे संविधान के अनुसार शासित देश का कहा जा सकता है जिसके नागरिकों को न केवल अभिव्यक्ति से जीने तक के मौलिक अधिकार और लोककल्याणकारी राज्य के नीति निर्देश तक संहिताबद्ध हों ? जहां धर्म ही सार्वजनिक कल्याण की नींव पर टिका हो वहां सरकार की ऐसी चुप्पी, लोकतांत्रिक राज्य के धीरे धीरे पूंजीवादी फासिस्ट तानाशाही में रूपांतरित होते जाने के लक्षणों की ओर संकेत करती है। हिटलर तमाम ताक़त, अनियंत्रित दुष्प्रचार तंत्र, और युद्ध मे अपार सैन्य बल, के बावजूद आज दुनिया का सबसे निंद्य और उपेक्षित तानाशाह है क्योंकि वह घृणा और संवेदना से हीन व्यक्तित्व था। राज्य को अपनी जनता के प्रति सदय और सम्वेदनशील होना चाहिए । प्रजा वत्सलता, प्राचीन भारतीय राजशास्त्र में राजा का एक प्रमुख गुण माना गया है। चार्ली का यह कालजयी भाषण आज भी ठस, अहंकारी और जिद्दी सत्ता के लिये एक उपदेश है, पर ठस अहंकारी और जिद्दी सत्ता अंधी और बहरी भी हो जाती है। 

( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 23 December 2020

तीनों कृषि कानूनों को तसल्ली से समझें / डॉ जया मेहता

पिछले अनेक वर्षों से भारत में कृषि अर्थव्यवस्था के गहरे संकट में फँसे होने की ख़बरें सुर्ख़ियों का हिस्सा बनती रहीं। यह बहुत दुखद है कि अपनी संकटपूर्ण स्थिति को दुनिया के सामने दर्ज करने के लिए पिछले क़रीब ढाई दशक में पाँच लाख से ज्यादा किसानों को आत्महत्या का रास्ता चुनना पड़ा। लोकतंत्र में चुनाव के वक़्त जब जनता सरकारें बदलती है तो नयी सरकार से वो अपनी हालत में बेहतरी के कदमों की उम्मीद करती है। तमिलनाडु के किसानों ने अपने मरे हुए भाई-बंधु किसानों की अस्थियाँ और नरमुंड लेकर संसद के सामने प्रदर्शन किया था। कर्नाटक के किसानों ने भी अपना विरोध दर्ज किया। महाराष्ट्र के पचास हज़ार किसानों ने नाशिक से मुंबई तक पैदल चलकर अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त किया और फिर सारे देश के क़रीब एक लाख किसानों ने पिछले वर्ष दिल्ली में इकट्ठे होकर सरकार के सामने अपनी माँगों की गुहार लगाई। इन सारी घटनाओं के जवाब में सरकार ने कोविड काल में किसानों के लिए तीन नये कानून प्रस्तुत किये, जो बात सुधार की करते हैं लेकिन दरअसल इनके ज़रिये सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफ़े सुधारने और भारत की खेती को और अधिक संकट में धँसाने का काम किया है। इस लेख में हम इन तीनों नये कृषि कानूनों और उनके प्रभावों को सरल भाषा में समझने की कोशिश करेंगे।

मौजूदा किसान संघर्ष की पृष्ठभूमि
देशभर में लॉकडाउन घोषित करने के डेढ़ महीने बाद प्रधानमंत्री महोदय को यह ख़्याल आया कि कोरोना वायरस की महामारी से निपटने में जनता की कुछ मदद भी करना चाहिए और 12 मई 2020 को उन्होंने बीस लाख करोड़ रुपए के एक राहत पैकेज की घोषणा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "ये पैकेज देश के मज़दूरों और किसानों के लिए है जिन्होंने हर हालत में, हर मौसम में और चौबीसों घंटे अपने देशवासियों के लिए काम किया।" बाद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अगले पाँच दिन तक इस पैकेज में शामिल प्रावधानों की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि खेती के क्षेत्र के लिए इस पैकेज में ग्यारह कदम उठाये गए हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर का कोष स्थापित किया गया है, जानवरों के लिए टीकाकरण, खाने-पीने की चीज़ों के छोटे उद्यम आदि के लिए इस पैकेज में प्रावधान किये गए हैं। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण घोषणा उन्होंने की खेती के बाज़ार की संरचना में किये जाने वाले तीन सुधारों के बारे में। इसमें एक सुधार आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 से संबंधित है, दूसरा विभिन्न राज्यों के कृषि उत्पाद मार्केटिंग कमेटी कानूनों को ख़त्म करने के बारे में और तीसरा ठेका खेती को संस्थागत रूप देने के बारे में है। ये तीनों सुधार मौजूदा कृषि उत्पादों के बाजार की संरचना पर से सरकार का नियंत्रण हटाने के मक़सद से किये गए हैं। जब कोविड और लॉकडाउन की वजह से खेती में पहले से चले आ रहे संकट में और भी इजाफ़ा हो गया, और जब वंचितों और हाशिये पर मौजूद परिवारों को राज्य की सहायता की ज़रूरत थी ताकि निर्दयी और निरंकुश बाज़ार की अनिश्चितताओं और क्रूरताओं से राज्य उनकी रक्षा करे, तब मोदी सरकार ने व्यापार को और अधिक खोलकर और अपना नियंत्रण हटाकर समाज के कमज़ोर तबकों को बाज़ार के सामने पूरी तरह असहाय छोड़ दिया। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश की जनता को 'आत्मनिर्भर' बनाने का एजेंडा यही था।

जब संसद का मानसून सत्र 14 सितंबर 2020 को शुरू हुआ तब ये तीनों विधेयक राज्यसभा एवं लोकसभा में रखे गए। लोकसभा में यह विधेयक पास हो गए लेकिन 17 सितंबर को शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इन विधेयकों के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया। 20 सितंबर को ये विधेयक राज्यसभा में रखे गए जहाँ समूचे विपक्ष ने इन विधेयकों की बारीक पड़ताल के लिए एक समिति बनाने की माँग की। विपक्षी सदस्यों ने यह भी माँग की कि इन विधेयकों को अमान्य करने के उनके प्रस्तावों पर राज्यसभा में मतदान करवाया जाए। राज्यसभा के उपसभापति ने उनकी माँग अस्वीकार कर दी और सदन में घमासान मच गया। सभी नियमों और प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर वैसी ही अफरा-तफरी में इन विधेयकों को आनन-फानन पारित कर दिया। तीसरा कानून, "आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन 1955" 22 सितंबर 2020 को पारित किया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ये तीनों विधेयक कानून बन गए।

पारित कृषि अधिनियम
1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020
आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में भारत में लागू किया गया था। तब इस नियम को लागू करने का उद्देश्य उपभोक्ताओं को आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता उचित दाम पर सुनिश्चित करवाना था। अतः इस कानून के अनुसार आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन, मूल्य और वितरण सरकार के नियंत्रण में था जिससे उपभोक्ताओं को बेईमान व्यापारियों से बचाया जा सके। आवश्यक वस्तुओं की सूची में खाद्य पदार्थ, उर्वरक, औषधियाँ, पेट्रोलियम, जूट आदि शामिल थे।

23 सितम्बर 2020 को पारित अधिनियम में संशोधन के बाद बने इस कानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया गया है। इस प्रकार, इन वस्तुओं पर जमाखोरी एवं कालाबाज़ारी को सीमित करने और इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने जैसे प्रतिबंध हटा दिए गए हैं। अब इन वस्तुओं के व्यापार के लिए लाइसेंस लेना ज़रूरी नहीं होगा। हालाँकि इस अधिनियम में प्रावधान है कि युद्ध, अकाल या असाधारण मूल्य वृद्धि जैसी आकस्मिक स्थितियों में प्रतिबंधों को फिर से लागू किया जा सकता है लेकिन जिस समय इस प्रतिबंध को हटाया गया है, क्या यह आपातकालीन समय नहीं है? आज कोविड-19 के दौर में करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए हैं। यह ऐसा समय है जब लोग अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने लायक भी नहीं कमा पा रहे हैं। इस अभूतपूर्व कठिनाई के दौर में लोकतान्त्रिक राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह लोगों को उनकी बुनियादी ज़रूरतों का सामान सस्ती कीमत पर उपलब्ध करवाए। जीने के लिए बुनियादी ज़रूरतों में खाद्य सामग्री सबसे पहले क्रम पर आती है, लेकिन कानून में इस तरह का बदलाव करके ज़रूरतमंदों को खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाने के बजाए अधिक मूल्य पर उपज बेचने जैसी बेहतर संभावनाओं एवं भंडारण की मात्रा पर प्रतिबंध हटाना बेहद शर्मनाक सोच है। इस कानून से जमाखोरों को वैधता मिल जाती है।

इस संशोधन को उचित ठहराते हुए सरकार तर्क देती है कि किसान अपनी कृषि उपज को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बेचकर बेहतर दाम प्राप्त कर सकेंगे। इससे किसानों को व्यापार एवं सौदेबाजी के लिए बड़ा बाज़ार मुहैया होगा और उनकी व्यापारिक शक्ति बढ़ेगी। इसी प्रकार खाद्य पदार्थों के भंडारण की मात्रा पर प्रतिबंध हटा देने से भंडारण क्षेत्र (वेयर हाऊसिंग) की क्षमता बढ़ाई जा सकती है और इसमें निजी निवेशकों को भी आमंत्रित किया जा सकेगा।

देश में किसान परिवारों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत को देखते हुए ऐसे किसान गिने-चुने ही हैं जो अपना कृषि उत्पाद मुनाफ़े की तलाश में दूर-दराज के इलाकों तक भेज पाते हों या जिनके पास इतने बड़े गोदाम हों जहाँ वो अपनी फसल का लम्बे समय तक भंडारण कर सकें। ज़ाहिर है इस संशोधन वाले कानून से केवल बड़े व्यापारियों और कंपनियों को ही फ़ायदा होगा। जो खाद्य पदार्थों के बाज़ारों में गहराई तक पैठ रखते हैं और ये अपने मुनाफ़े के लिए खाद्य पदार्थों की जमाखोरी और परिवहन करके संसाधनविहीन बहुत सारे ग़रीब किसानों का नुकसान ही करेंगे।

2. कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम, 2020
1970 के दशक में, राज्य सरकारों ने किसानों के शोषण को रोकने और उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए 'कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम’ (एपीएमसी एक्ट) लागू किया था। इस अधिनियम के तहत यह तय किया गया गया था कि किसानों की उपज अनिवार्य रूप से केवल सरकारी मंडियों के परिसर में खुली नीलामी के माध्यम से ही बेची जाएगी। मंडी कमेटी ख़रीददारों, कमीशन एजेंटों और निजी व्यापारियों को लाइसेंस प्रदान कर व्यापार को नियंत्रित करती है। मंडी परिसर में कृषि उत्पादों के व्यापार की सुविधा प्रदान की जाती है; जैसे उपज की ग्रेडिंग, मापतौल और नीलामी बोली इत्यादि। सरकारी मंडियों या लाइसेंसधारी निजी मंडियों में होने वाले लेन-देन पर मंडी कमेटी टेक्स लगाती है। भारतीय खाद्य निगम (फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया - एफसीआई) द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर कृषि उपज की ख़रीददारी सरकारी मंडियों के परिसर में ही होती है।
कृषि उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम, 2020 के अनुसार कृषि व्यापार की यह अनिवार्यता कि मंडी परिसर में ही उपज बेचना ज़रूरी है, ख़त्म कर दी गई। नए कानून के मुताबिक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित मंडियों के बाहर अपनी कृषि उपज बेच सकता है। यह कानून कृषि उपज की ख़रीद-बिक्री के लिए नए व्यापार क्षेत्रों की बात करता है जैसे किसान का खेत, फैक्ट्री का परिसर, वेयर हॉउस का अहाता इत्यादि इन व्यापार क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म की भी बात की जा रही है। इससे किसानों को यह सुविधा मिलेगी कि वे कृषि उपज को स्थानीय बाज़ार के अलावा राज्य के अंदर और बाहर दूसरे बाज़ारों में भी बेच सकते हैं। इसके अलावा, इन नये व्यापार क्षेत्रों में लेन-देन पर राज्य अधिकारी किसी भी तरह का टेक्स नहीं लगा पाएँगे। यह कानून सरकारी मंडियों को बंद नहीं करता बल्कि उनके एकाधिकार को समाप्त करता है, सरकार का दावा है कि इससे कृषि उपज का व्यापार बढ़ेगा।

इस नियम का विरोध इसलिए भी किया जाना ज़रूरी है क्योंकि यह कानून संविधान में निहित राज्य सरकारों के अधिकार की अवमानना करता है। सत्तर के दशक में कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम (एपीएमसी एक्ट) को राज्य सरकार की विधानसभाओं ने बनाया था और अब इस नये कानून से कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम (एपीएमसी एक्ट) निरस्त हो गए हैं और केंद्र सरकार ने इन्हें निरस्त करते समय राज्य सरकारों से बात करना भी ज़रूरी नहीं समझा। केंद्र सरकार राज्य सरकारों से सलाह लिए बिना उन्हें कैसे ख़त्म कर सकती है? सन 2003 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार थी तो यह निर्णय लिया गया था कि निजी कंपनियों को मंडी परिसर के बाहर कृषि उपज ख़रीदने की अनुमति दी जानी चाहिए। लेकिन इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, केंद्र सरकार ने केवल एक मॉडल अधिनियम तैयार किया और उसके मुताबिक राज्य सरकारों को मंडी अधिनियम में संशोधन करने की सलाह दी। इसके विपरीत मोदी सरकार की एनडीए गवर्मेंट ने हर क्षेत्र में, हर मामले में संवैधानिक उल्लंघन करने का रिकॉर्ड बनाया है।

राज्य सरकारों के अधिकारों के हनन से भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि किसान ख़ुद इस कानून को किसान विरोधी और कॉरर्पोरेट समर्थक मानते हैं। वे जानते और मानते हैं कि इन सुधारों से उन्हें अपनी उपज के लिए उच्च मूल्य प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा। इसके बजाय इन सुधारों से कॉरपोरेट्स को कृषि उपज की सीधी ख़रीद की सुविधा होगी, जिस पर किसी हद तक कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम (एपीएमसी एक्ट) होने की वजह से राज्य सरकार का कुछ तो नियंत्रण था। कॉरपोरेट घरानों और बड़े व्यापारियों को ख़रीद-फ़रोख़्त की खुली छूट मिल जाने से वे उन जगहों से ही किसानों की उपज ख़रीदेंगे जहाँ लेन-देन के लिए कोई शुल्क या टैक्स नहीं लिया जाएगा। शुरुआत में कंपनियों द्वारा किसानों को लुभाने के लिए कुछ आकर्षक मूल्य के प्रस्ताव दिए जाएँगे लेकिन बाद में फसल के दामों पर पूरा नियंत्रण कंपनियों और व्यापारियों का हो जाएगा। इस नये कानून का यह दुष्परिणाम होगा कि सरकार द्वारा अधिसूचित मंडियों में लेन-देन कमतर होने से व्यापार कम होने लगेगा और अंततः धीरे-धीरे सरकारी मंडियों का विघटन होता जाएगा और साथ ही साथ एफसीआई द्वारा ख़रीद भी ख़त्म हो जाएगी। इसका परिणाम यह होगा कि कृषि मंडियों पर सरकारी एकाधिकार के बजाय कॉरर्पोरेट का एकाधिकार होगा और किसान निजी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दया पर निर्भर हो जाएँगे। कृषि उपज के अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में आते उतार-चढ़ाव और अनुचित व्यापार के परिणामों से देश के किसानों के पास बचने के लिए कोई बफर ज़ोन नहीं होगी।

हालाँकि मोदी सरकार बार-बार आश्वासन दे रही है कि एफसीआई द्वारा कृषि उपज की खरीद जारी रहेगी और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा। किसानों को इस आश्वासन पर जरा भी भरोसा नहीं है। इस सरकार का रिकॉर्ड है कि पहले भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के बारे में कई वादे किए गए थे जिन्हें कभी पूरा नहीं किया गया। सन 2014 के अपने चुनावी घोषणापत्र में, भारतीय जनता पार्टी ने वादा किया था कि वह स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट में दिए गए सुझावों को लागू करेगी। इस घोषणा पत्र में किसानों को आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने का वादा किया गया था। स्वामिनाथन आयोग के अनुसार उत्पादन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में उत्पादन की सारी लागतों को शामिल किया जाना चाहिए जैसे श्रम की लागत, ज़मीन की परोक्ष-अपरोक्ष लागत, मशीन की लागत इत्यादि। फिर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते वक़्त इस कुल लागत पर पचास प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की जाना चाहिए।

लेकिन जब चुनाव जीत लिया और सरकार बन गई, तब 2015 में मोदी सरकार ने सर्वोच्च अदालत में एक हलफ़नामा दायर किया। इस हलफ़नामे में सरकार द्वारा कहा गया कि किसानों को आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिया ही नहीं जा सकता क्योंकि इससे पूरे बाज़ार में विकृति आ जाएगी। इसके बाद कृषि मंत्री ने कहा कि उन्होंने आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने के लिए कभी कोई वादा किया ही नहीं था। वर्ष 2018-19 में वित्त मंत्री ने एक बयान दिया कि वो स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट के सुझावों को पहले ही लागू कर चुकी हैं। कुल मिलकर सरकार ने इस संबंध में सभी प्रकार के ग़ैरज़िम्मेदाराना बयान दिए हैं और यह अंतिम कदम वास्तव में किसानों को किसी भी प्रकार के समर्थन मूल्य देने की ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश है। आख़िरकार इस तरह से सरकार द्वारा अपने आप को हर तरह की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर लेना शायद प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए "आत्मनिर्भरता" के नारे का अनुसरण है।

3. कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर करार (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 2020
इस अधिनियम का उद्देश्य अनुबंध या ठेका खेती के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक संस्थागत ढाँचा तैयार करना है। ठेका या अनुबंध खेती में वास्तविक उत्पादन होने से पहले किसान और ख़रीददार के बीच उपज की गुणवत्ता, उत्पादन की मात्रा एवं मूल्य के सम्बंध में अनुबंध किया जाता है। बाद में यदि किसान और ख़रीददार के बीच में कोई विवाद हो तो इस कानून में विवाद सुलझाने के प्रावधान शामिल हैं। इन प्रावधानों के अनुसार सबसे पहले तो एक समाधान बोर्ड बनाया जाए जो विवाद सुलझाने का पहला प्रयास हो। यदि समाधान बोर्ड विवाद न सुलझा सके तो आगे इस विवाद को सबडिविज़नल मजिस्ट्रेट और अंत में अपील के लिए कलेक्टर के सामने ले जाया जा सकता है लेकिन विवाद को लेकर अदालत में जाने का प्रावधान नहीं है। अधिनियम विवाद सुलझाने की बात तो करता है लेकिन इसमें ख़रीद के अनुबंधित मूल्य किस आधार पर तय होंगे इसका कोई संकेत नहीं है। एक बड़ी कम्पनी तरह-तरह के दबाव बनाकर छोटे किसान से कम से कम मूल्य पर अनुबंध कर सकती है, और चूँकि कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य को आधार नहीं बनाते हुए आस-पास की सरकारी या निजी मंडियों के समतुल्य मूल्य देने की बात की है, इसलिए ज़रूरी नहीं कि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य हासिल हो। कानून की भाषा की पेचीदगियों से किसान को गफ़लत में डालकर कंपनियाँ अपने मुनाफ़े को सुनिश्चित करने वाला मूल्य अनुबंध में शामिल करवाएँगी।
नवउदारवादी नीतियों के चलते पंजाब और हरियाणा में कई किसानों ने पेप्सिको और अन्य बड़ी कम्पनियों के साथ अनुबंध या ठेका खेती की है। ठेका खेती करने के बाद अनेक किसानों के अनुभव कड़वे रहे हैं। किसान बहुत सावधानीपूर्वक ठेका खेती के अनुबंधों के अनुसार काम करता है और कंपनियाँ खेत में खड़ी उपज को लेने से इंकार कर देती हैं। अनेक बार कम्पनियों द्वारा किसानों को समय पर भुगतान नहीं किया जाता है। अनुबंध होने के बावजूद किसान कंपनियों से लड़ने में सक्षम नहीं होता है क्योंकि अधिकांश किसानों के संसाधन कंपनियों की तुलना में बहुत कम होते हैं। यदि विवाद हो तो उसे इस कानून के तहत सुलझाने की प्रक्रिया तो बताई गई है लेकिन इससे इस बात की कोई गारंटी नहीं कि किसान को न्याय मिलेगा ही। कंपनियों के पास वकीलों की पूरी फौज होती है जबकि किसान कोर्ट-कचहरी के घुमावदार, पेचीदा चक्करों में बहुत लम्बे समय तक उलझा नहीं रह सकता। ठेका खेती को एक संस्थागत वैधानिक रूप देने से केवल वही किसान नहीं प्रभावित होंगे जो कॉन्ट्रेक्ट खेती कर रहे हैं, बल्कि ठेका खेती समूचे खेती के परिदृश्य को बदल देगी।

हाल में गुजरात में पेप्सिको कम्पनी ने कुछ ऐसे आलू उत्पादक किसानों से मुआवजे की माँग की जिन्होंने पेप्सिको के साथ खेती का कोई अनुबंध नहीं किया था। पेप्सिको का इन किसानों पर यह आरोप था कि बिना अनुबंध किए यह किसान आलू की वही किस्म उगा रहे थे जो पेप्सिको कम्पनी अनुबंध करके किसानों से उगवाती है और जिससे ले'ज़ ब्रांड के चिप्स बनते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि किसी ख़ास उत्पाद के लिए अगर कंपनियाँ किसानों के साथ ठेका खेती का अनुबंध करती हैं तो वे उस फसल के बीज पर भी अपना कॉपीराइट का अधिकार जताती हैं जो बीज उन्होंने किसान को दिया होता है। यानि जो किसान कंपनियों के साथ खेती का अनुबंध नहीं करेंगे वे कम्पनी के बीज की किस्म को उगा भी नहीं सकेंगे।
इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि भारत की खेती के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश और निर्यात बाज़ारों पर अधिक निर्भरता देश की खेती में फसलों के चयन को बदल देगी। इससे हमारी खेती की पूरी व्यवस्था को बुरी तरह क्षति पहुँचेगी। जिस तरह ग़ुलामी के दौर में हमारे किसान अपनी ज़मीन पर वह फसल उगाने के लिए स्वतंत्र नहीं थे जो वे उगाना चाहते थे या जो उनकी ज़रूरत थी, बल्कि उन्हें अंग्रेजों के डर से वह उगाना होता था जिसमें अंग्रेजों को
फ़ायदा था और जो अंग्रेजों की ज़रूरत थी। सन 1917 में चम्पारण में गाँधीजी ने अंग्रेजों द्वारा करवाई जा रही नील की जबरिया खेती के ख़िलाफ़ अपना पहला सत्याग्रह किया था। तब में और अब में फ़र्क इतना ही है कि अब यही काम डंडे, बूटों और हंटर के बजाये ऊँची कीमत के लालच और मुनाफ़े की राजनीति के द्वारा किया जा रहा है और हमारे किसान फिर से अपनी ज़रूरत की फसल चुनने के अधिकार से वंचित किए जा रहे हैं।
साम्राज्यवादी देशों का कृषि व्यापार में यह रवैया अनेक दशकों से रहा है। उष्णकटिबंधीय देशों यानि गर्म जलवायु वाले देशों में विभिन्न प्रकार के फलों, सब्ज़ियों, फूलों, मसालों और ऐसे अनेक कृषि उत्पादों की खेती की जा सकती है जो यूरोप और अमेरिका के ठंडी और मध्यम या समशीतोष्ण जलवायु वाले देशों में नहीं उगाये जा सकते हैं। साम्राज्यवादी व्यवस्था यह चाहती है कि उष्णकटिबंधीय देश अपनी खेती में उन कृषि उत्पादों की पैदावार करें जिनकी ज़रूरत विदेशों में है और इसके बदले में वे विकसित देशों में भारी मात्रा में उत्पादित होने वाले खाद्यान्न का आयात कर लें। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और आयात-निर्यात बाज़ार किसानों को खाद्यान्न उत्पादन को छोड़ देने और अपनी खेती को विकसित देशों के मुताबिक ढालने के लिए बहुत से लुभावने और आकर्षक प्रस्ताव दे सकते हैं। अफ्रीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और साम्राज्यवादी देशों ने ऐसा ही किया है और वहाँ की बड़ी आबादी की खाद्य सुरक्षा गंभीर खतरे में पड़ गई है। मौजूदा बदलावों को देखते हुए लगता है कि भारत भी अफ्रीका के रास्ते पर ही आगे बढ़ेगा और ऐसा करने में कंपनियों को भारतीय राज्य का सक्रिय समर्थन हासिल है।

उम्मीद जगाते संघर्ष
-------------------------
यह कानून उन बड़े बदलावों का एक हिस्सा हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था को साम्राज्यवादी देशों की ग़ुलाम अर्थव्यवस्था बनाने के लिए किये जा रहे हैं। हम नवउदारवाद के दौर में अपनी ही चुनी गई सरकारों द्वारा अपने ही देश के सार्वजानिक उद्यमों को निजी हाथों में औने-पौने दामों पर निजी कंपनियों को बेचा जाता देख रहे हैं। हाल ही में अनेक नए श्रम कानूनों को चार कोड के भीतर समेटकर उन्हें इस तरह बदल दिया गया है कि मालिकों को मज़दूरों और कर्मचारियों के शोषण की और ज़्यादा कानूनी आज़ादी हासिल हो जाये। यह तीन कृषि कानून भी उन व्यापक बदलावों का ही एक हिस्सा हैं जहाँ जनता द्वारा चुनी गई सरकार देशी-विदेशी महाकाय कंपनियों के मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए अपने मज़दूरों और किसानों की मेहनत को, उनकी आजीविका को और उनके जीवन को गिरवी रख रही है। किसानों का पिछले कई दिनों से दिल्ली घेराव का आंदोलन इन नीतियों के प्रतिरोध की एक पुरज़ोर कोशिश है और आने वाले वक़्त में प्रतिरोध की ऐसी बहुत सी ज़ोरदार कोशिशें उभरेंगी और शोषितों के अलग-अलग तबकों का सामूहिक प्रतिरोध एक दिन शोषण की व्यवस्था को ख़त्म कर एक नयी व्यवस्था कायम करेगा।
------------------------------------------
डॉक्टर जया मेहता वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं। वे जोशी अधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज, दिल्ली एवं संदर्भ केंद्र, इंदौर से संबद्ध हैं।

( विजय शंकर सिंह )

टैगोर का राष्ट्रवाद, आरएसएस का राष्ट्रवाद नही है अमित शाह जी ! / विजय शंकर सिंह

अगले साल बंगाल में चुनाव हैं। वहां राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं और भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी बंगाल के नियमित दौरे पर हैं। अपने एक दौरे में अमित शाह ने कहा कि वे रबीन्द्रनाथ टैगोर के सपनो का बंगाल बनाना चाहते हैं। अगर वे सरकार में आए तो टैगोर के सपनो को साकार करेंगे। टैगोर न केवल बंगाल और भारत के बल्कि वे विश्वकवि हैं। उनकी सोच, दृष्टि और दर्शन, अमित शाह की पार्टी भाजपा और भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस की सोच, दृष्टि और दर्शन के विपरीत है और बिल्कुल विरोधाभासी भी। पिछले चुनाव में नेताजी सुभाष बाबू भाजपा के एजेंडे में थे, इस बार टैगोर हैं। जबकि सुभाष और टैगोर दोनो की ही सोच और दृष्टि आरएसएस की मानसिकता के विपरीत थी। सावरकर, संघ और भाजपा जिस राष्ट्रवाद की बात करती है वह 1937 में सावरकर द्वारा प्रतिपादित धर्म आधारित राष्ट्रवाद था, जिसे बाद में एमए जिन्ना ने भी अपनी विचारधारा के रूप में विकसित किया और जो विचित्र तथा राष्ट्रघातक सिद्धांत निकला, वह द्विराष्ट्रवाद था जिसपर विभाजन की नींव पड़ी। भाजपा, सुभाष और टैगोर की बात तो करती है, पर वह डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बात बंगाल में नहीं करती है। वह नेताजी सुभाष और डॉ मुखर्जी के बीच जो वैचारिक और राजनैतिक द्वंद्व था, उसकी बात नहीं करती है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जो संघ, सावरकर और डॉ मुखर्जी की भूमिका थी, उसकी भी बात भाजपा नही करती है ! यह सवाल भाजपा से पूछा जाना चाहिए।

गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर एक अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व के थे। बंगाल के कुछ बेहद सम्पन्न लोगों में उनका परिवार आता था। उनके बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर, देश के प्रथम हिंदुस्तानी आईसीएस थे। वे 1864 बैच के आईसीएस थे। अपने माता पिता की आठ संतानों में एक टैगोर बांग्ला साहित्य और संगीत के शिखर पुरुषों में से एक थे। हम उन्हें उनके कविता संग्रह गीतांजलि पर मिले नोबल पुरस्कार से अधिक जानते हैं पर टैगोर ने गोरा, नौका डूबी जैसे बेहद लोकप्रिय और खूबसूरत उपन्यास भी लिखे हैं। रवींद्र संगीत के नाम से बांग्ला का सबसे लोकप्रिय संगीत भी उन्ही की यश गाथा कहता है।

टैगोर भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सीधे तो नहीं शामिल हुए पर अपने विख्यात शिक्षा केन्द्र शांतिनिकेतन जो अब विश्वभारती विश्वविद्यालय के रूप में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, के माध्यम से देश के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे। महात्मा गांधी को, महात्मा नाम, टैगोर ने ही दिया था। और कहते हैं टैगोर को गुरुदेव नाम से सबसे पहले गांधी ने ही उन्हें पुकारा था।

देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर टैगोर के विचार देशभक्ति और राष्ट्रवाद की परंपरागत परिभाषा से कुछ हट कर हैं। 1908 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की राष्ट्रवाद पर अपनी आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने कहा था,
" देशभक्ति मेरे लिये मेरा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकता है। मैं हीरे की कीमत में, शीशा नहीं खरीद सकता हूँ। जब तक मेरा जीवन है मैं देशभक्ति को मनुष्यता के ऊपर देशभक्ति की जीत हावी नहीं होने दूंगा। "
यह पत्र 1997 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक टैगोर के चुने हुये पत्र में संग्रहीत है।

" जब तक मैं जिंदा हूं, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत हावी नहीं होने दूंगा.’
यह बयान अगर आज कोई  भी देता, या खुद टैगोर ही जीवित रहते और कह देते, तो उन्हें  तुरंत आज़ादी की लड़ाई में खामोश रहने वाले तबके के समर्थक नवदेशभक्त  पाकिस्तान भेजने का फरमान जारी कर देते। लेकिन टैगोर ने यह बात खुल कर कही थी। उन्होंने भारतीय समाज,संस्कृति और परंपरा में खुल कर कहने की प्रथा का ही अनुसरण किया था। सौ साल पहले कही गयी गयी उनकी बात पर बौद्धिक बहस तो हुयी, पर उन्हें कोसा नहीं गया, वे निंदित नहीं हुए और उनका मज़ाक़ नहीं उड़ाया गया। ग़ुलाम भारत और ब्रिटिश उपनिवेश की किसी भी संवैधानिक अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार जैसी किसी चीज के न होते हुये भी भारतीय परंपरा में अपनी बात कहने और तर्क वितर्क करने की जो स्वाभाविक परंपरा आदि काल से हमे प्राप्त, है और वर्तमान अभिव्यक्ति की अवधारणा जैसी पाश्चात्य अवधारणा के बहुत पहले से भारतीय जन मानस में व्याप्त है के अनुसार उन्होंने अपनी बात कही थी ।

नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने एक बेहद विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है ' द आरगुमेंटेटिव इंडियन ' । यह पुस्तक उनके द्वारा समय समय पर लिखे गए, लेखों का एक संकलन है । इसमे उन्होंने भारतीय तर्क पद्धति और तर्क परंपरा का इतिहास खंगालने की कोशिश की है। अमर्त्य सेन ने इस किताब में टैगोर से संबंधित एक अध्याय ‘टैगोर और उनका भारत’ में टैगोर के राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़ी बातें और उनके विचार  बताये हैं, जो उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता और पादरी सी एफ एंड्रूज के हवाले से समय समय पर कहे गए हैं। राष्ट्रवाद के बारे में टैगोर की अवधारणा आजकल की राष्ट्रवादी अवधारणा जो एक प्रकार की प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली और जर्मनी मॉडल से उपजी राष्ट्रवाद की अवधारणा है से बिलकुल उलट है। यही नहीं यह भारतीय वांग्मय में वर्णित राष्ट्रवाद की अवधारणा से  भी बिलकुल अलग है।

उक्त लेख में टैगोर, सीएफ एंड्रयूज़ और गांधी जी के बीच होने वाले अनेक रोचक वार्तालाप का उल्लेख है जिसमे टैगोर के राष्ट्रवाद का पूरा खाका मिलता है। एंड्रूज, महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे, लेकिन गांधी और टैगोर के विचार एक दूसरे से अलग थे। टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चारदिवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है, साथ ही दूसरे देशों की जनता के दुख दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है. वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक नजरिया रखते थे। यह भी एक संयोग है कि अमर्त्य सेन का जन्म शांतिनिकेतन में हुआ था, और उनका नामकरण, गुरुदेव टैगोर ने ही किया था।

टैगोर ने 1916-17 के कालखंड में, जापान और अमेरिका की यात्रा के दौरान राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए थे, जो उनकी राष्ट्रवाद पर लिखी पुस्तक  के रूप में सामने आये। इसमें 1917 में दिए गए एक भाषण में टैगोर ने कहा था,
" राष्ट्रवाद का राजनीतिक और आर्थिक संगठनात्मक आधार उत्पादन में बढ़ोतरी और मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता हासिल करने का प्रयास है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि और राजनैतिक शक्ति में बढ़ोतरी करने में इस्तेमाल की गई है। शक्ति की बढ़ोतरी की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा और भय का वातावरण बनाकर मानव जीवन को अस्थिर और असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे-सीधे जीवन से खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाहरी संबंधों के साथ ही राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी स्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है. ऐसे में समाज और व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने की कोशिश राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है.। "

भारत के संदर्भ में टैगोर ने लिखा है,
" भारत की समस्या राजनैतिक नहीं सामाजिक है। यहां राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। हकीकत तो ये है कि यहां पर पश्चिमी देशों जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक काम में अपनी रूढ़िवादिता का हवाला देने वाले लोग जब राष्ट्रवाद की बात करें तो वह कैसे प्रसारित होगा? भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। "

टैगोर ने हमेशा नेशन स्टेट (राष्ट्र-राज्य) संकल्पना की आलोचना की है. उन्होंने उसे ‘यह शुद्ध यूरोप की देन है’ ऐसा कहा है. अपने 1917 के 'नेशनलिज्म इन इंडिया’ नामक निबंध में उन्होंने साफ़ तौर पर लिखा है कि,
" राष्ट्रवाद का राजनीतिक एवं आर्थिक संगठनात्मक आधार सिर्फ उत्पादन में वृद्धि तथा मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता प्राप्त करने का यांत्रिक प्रयास इतना ही है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः विज्ञापन तथा अन्य माध्यमोंका लाभ उठाकर राष्ट्र की समृद्धि एवं राजनीतिक शक्ति में अभिवृद्धि करने में प्रयुक्त हुई हैं। शक्ति की वृद्धि की इस संकल्पना ने राष्ट्रों मे पारस्परिक द्वेष, घृणा तथा भय का वातावरण उत्पन्न कर मानव जीवन को अस्थिर एवं असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे सीधे जीवन के साथ खिलवाड है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाह्य संबंधों के साथ-साथ राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है. ऐसी परिस्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है. फलस्वरूप, समाज तथा व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप प्राप्त कर लेता है। "

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसी आधार पर राष्ट्रवाद की आलोचना की है. उनके अनुसार,
" राष्ट्र के विचार को जनता के स्वार्थ का एैसा संगठित रूप माना है, जिसमें मानवीयता तथा आत्मत्व लेशमात्र भी नहीं रह पाता है। दुर्बल एवं असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार प्राप्त करने का प्रयास यह राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इस से उपजा साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है। राष्ट्र की शक्ति में वृद्धि पर कोई नियंत्रण स्वंभव नहीं, इसके विस्तार की कोई सीमा नहीं। उसकी इस अनियांत्रित शक्ति में ही मानवता के विनाश के बीज उपस्थित हैं। राष्ट्रों का पारस्परिक संघर्ष जब विश्वव्यापी युद्ध का रूप धारण कर लेता है, तब उसकी संहारकता के सामने सब कुछ नष्ट हो जाता है। यह निर्माण का मार्ग नहीं, बल्कि विनाश का मार्ग है। "
राष्ट्रवाद की यह अवधारणा किस तरह शक्ति के आधार पर विभिन्न मानवी समुदायों में वैमनस्य तथा स्वार्थ उत्पन्न करती है, इस बात को उजागर करता रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह मौलिक चिंतन समूचे विश्व के लिए एक अमूल्य योगदान है।

क्या भारतके लिए राष्ट्रवाद विकल्प बन सकता है ? इस विषय पर चर्चा करते हुये टैगोर कहते हैं,
" भारत में राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। वास्तव में भारत में यूरोप जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक कार्यों में रूढ़िवादिता का पालन करने वाले यदि राष्ट्रवाद की बात करें तो राष्ट्रवाद कहां से प्रसारित होगा? उस ज़माने के कुछ राष्ट्रवादी विचारक स्विटजरलैंड ( जो बहुभाषी एवं बहुजातीय होते हुए भी राष्ट्र के रूप में स्थापित है) को भारत के लिए एक अनुकरणीय प्रतिरूप मानते थे।"
लेकिन रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह विचार था कि
" स्विटजरलैंड तथा भारत में काफी अंतर एवं भिन्नताएं हैं। वहां व्यक्तियों में जातीय भेदभाव नहीं है और वे आपसी मेलजोल रखते हैं तथा सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध सामान्य रूप से हैं, क्योंकि वे अपने को एक ही रक्त के मानते हैं। लेकिन भारत में जन्माधिकार समान नहीं है। जातीय विभिन्नता तथा पारस्परिक भेद भाव के कारण भारत में उस प्रकार की राजनीतिक एकता की स्थापना करना कठिन दिखाई देती है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत आवश्यक है।  समाज द्वारा बहिष्कृत होने के भय से भारतीय डरपोक एवं कायर हो गए हैं। जहाँ पर खान-पान तक की स्वतंत्रता न हो, वहां राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ कुछ व्यक्तियों का सब पर नियंत्रण ऐसा ही होकर रहेगा। इस से निरंकुश राज्य ही जन्म लेगा और राजनैतिक जीवन में विरोध अथवा मतभेद रखने वाले का जीवन दूभर हो जाएगा. क्या ऐसी नाम मात्र स्वतंत्रता के लिए हम अपनी नैतिक स्वतंत्रता को तिलांजलि दे दें ? "

संकीर्ण राष्ट्रवाद के विरोध में वे आगे लिखते हैं कि
" राष्ट्रवाद जनित संकीर्णता यह मानव की प्राकृतिक स्वच्छंदता एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में बाधा है। ऐसा राष्ट्रवाद  युद्धोन्मादवर्धक एवं समाजविरोधी ही होगा। क्योंकि राष्ट्रवाद के नाम पर राज्य द्वारा सत्ता की शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग अनेक अपराधों को जन्म देता है। "
उनके इसी पुस्तक के अनुसार, व्यक्ति को राष्ट्र के प्रति समर्पित कर देना उन्हें कदापि स्वीकार नहीं था। राष्ट्र के नाम पर मानव संहार तथा मानवीय संगठनों का संचालन उन के लिए असहनीय था। उन के विचार में राष्ट्रवाद का सब से बड़ा खतरा यह है कि
" मानव की सहिष्णुता तथा उसमें स्थित नैतिकताजन्य परमार्थ की भावना राष्ट्र की स्वार्थपरायण नीति के चलते समाप्त हो जाएंगे। ऐसे अप्राकृतिक एवं अमानवीय विचार को राजनैतिक जीवन का आधार बनाने से सर्वनाश ही होगा। "
इसी लिए टैगोर ने राष्ट्र की धारणा को भारत के लिए ही नहीं, अपितु विश्वव्यापी स्तर पर अमान्य करने का आग्रह रखा था। वे मानते थे कि
"भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता को छोड़ अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। आर्थिक रूप से भारत भले ही पिछड़ा हो, मानवीय मूल्यों में पिछड़ापन उसमें नहीं होना चाहिए। निर्धन भारत भी विश्व का मार्ग दर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त कर सकता है। भारत का इतिहास यह सिद्ध करता है कि भौतिक संपन्नता की चिंता न कर भारत ने अध्यात्मिक चेतना का सफलतापूर्वक प्रचार किया है "

टैगोर के राष्ट्रवाद पर यह लेख, उनकी पुस्तक नेशनलिज़्म इन इंडिया और अमर्त्य सेन की पुस्तक द आरगुमेंटेटिव इंडियन में लिखे गए उनके विचारों पर आधारित है। 1916 - 17 का काल दुनिया मे युद्धों का काल था। उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी ताकतें अपने वर्चस्व के लिये लड़ रही थी। दुनिया मे अफरातफरी मची तो थी, पर उतनी नहीं जितनी 1939 से 45 के बीच हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मची थी। हो सकता है इसका एक कारण यह भी हो कि संहार के युद्धक उपकरण प्रथम विश्वयुद्ध तक उतने नहीं आविष्कृत हो सके हों। युद्ध मे सत्ता लड़ती है और जनता मरती है। यह एक कटु सत्य है। आप दुनियाभर के युद्धों के इतिहास का अध्ययन करेंगे तो मेरी बात से सहमत होंगे। ऐसा ही प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी हुआ आए अगर कोई तीसरा इस स्केल का युद्ध होगा तो उसमे क्या होगा, इसकी कल्पना ही भयावह है। क्या पता उसका इतिहास लिखने के लिये कोई व्यास बचेगा भी कि नहीं।

यह भी एक संयोग ही है कि जिस राष्ट्रवाद को 1917 में, टैगोर मानवता के लिये खतरा बता रहे थे, उसी खतरे के फलस्वरुप 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया। पर टैगोर, 6 अगस्त 1945 को हुयी हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी देखने और सुनने के लिये जीवित नहीँ रहे, उसके पहले ही उनका निधन हो गया था।

आज हम फिर उसी आक्रामक राष्ट्रवाद की चपेट में है। यह राष्ट्रवाद का वह चेहरा नहीं है जो हम अपने महान स्वाधीनता संग्राम के दौरान जनगणमन में देख चुके हैं। यह राष्ट्रवाद का वह चेहरा है जो यूरोपीय तानाशाही से भरी श्रेष्ठतावाद और मिथ्या तुच्छता के प्रति अपार और हिंसक घृणा से भरा पडा है। जो युयुत्सु है। जन विरोधी है। अनुदार है। और जिसका अंत महाविनाश के रूप में हो चुका है, उसी की पुनरावृत्ति है। ग्रह तो बहुत से है। पृथ्वी भी एक ग्रह ही है। पर इसका महत्व इसकी निर्झरता, शस्यश्यामला, हरीतिमा, इस धरती पर विचरने वाले जीव, जंतु, वनस्पतियों और मनुष्यों पर टिका है। राष्ट्र एक भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं है कि सब कुछ मिडास की तरह स्वर्ण की लालसा में जड़ बना दिया जाय। राष्ट्र उसके नागरिकों , नागरिकों के सुख और उनके जीवन स्तर, बौद्धिक विकास और सुख तथा प्रसन्नता के मापदंड पर आधारित है। टैगोर की यही अवधारणा है।

आज अमित शाह ही नहीं भाजपा और संघ के मित्रों को भी यह समझ और जान लेना चाहिए कि, जिस राष्ट्रवाद की बात वे अहर्निश करते रहते हैं वह राष्ट्र को विभाजित करने वाला द्विराष्ट्रवाद का ही एक रूप है। वह तिलक, गांधी, टैगोर,  सुभाष, अरविंदो आदि स्वाधीनता संग्राम के महान शिल्पकारों द्वारा वर्णित और अवधारीत राष्ट्रवाद नहीं है। राष्ट्र को धर्म, जाति, क्षेत्र, आदि के आधार पर विभाजित करने की सोच राष्ट्रवाद नहीं है, वह कुछ और हो तो हो। टैगोर का राष्ट्रवाद, सावरकर, हिंदू महासभा, आरएसएस, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय का राष्ट्रवाद नही है, अमित शाह जी ! टैगोर के राष्ट्रवाद को समझने के लिये संकीर्ण मन और दृष्टि दोनो को त्यागना पड़ेगा और साथ ही छल, प्रपंच और मिथ्यावाचन भी।

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 22 December 2020

किसान दिवस पर चौधरी चरण सिंह जी का स्मरण / विजय शंकर सिंह

आज चौधरी चरण सिंह जी का जन्मदिन है, जिसे किसान दिवस के रूप में देश भर में याद किया जाता है। किसानों पर जवाहरलाल नेहरू का लिखा एक उद्धरण पढिये, 

" गांधीजी चाहे लोकतंत्री हों या ना हों, वह भारत की किसान जनता के प्रतिनिधि अवश्य हैं. वह उन करोड़ों की जागी और सोई हुई इच्छाशक्ति के सार रूप हैं. यह शायद उनका प्रतिनिधित्व करने से कहीं ज़्यादा है, क्योंकि वह करोड़ों  के आदर्शों की सजीव मूर्ति हैं. हां, वह एक औसत किसान नहीं हैं. वह एक बहुत तेज़ बुद्धि, उच्च भावना और सुरूचि तथा व्यापक दृष्टि रखनेवाले पुरुष हैं- बहुत सहृदय, फिर भी आवश्यक रूप से एक तपस्वी जिन्होंने अपने विकारों और भावनाओं को दमन करके उन्हें दिव्य बना दिया है और आध्यात्मिक मार्गों में प्रेरित किया है. उनका एक ज़बर्दस्त व्यक्तित्व है, जो चुंबक की तरह हरेक को अपनी ओर खींच लेता है और दूसरों के हृदय में अपने प्रति आश्चर्यजनक वफादारी और ममता पैदा करता है. यह सब एक किसान से कितना भिन्न और कितना परे है? और इतना होने पर भी वह एक महान किसान हैं जो बातों को एक किसान के दृष्टि बिंदु से देखते हैं और जीवन के कुछ पहलुओं के बारे में एक किसान की ही तरह अंधे हैं, लेकिन भारत किसानों का भारत है और वह अपने भारत को अच्छी तरह जानते हैं और उसके हल्के से हल्के कंपनों का भी उन पर तुरंत असर होता है. वह स्थिति को ठीक ठीक और अक्सर सहज स्फूर्ति से जान लेते हैं और ऐन मौके पर काम करने की अद्भुत सूझ उनमें है.।"
( नेहरू, मेरी कहानी, पेज 306 )

आज़ादी के बाद सबसे व्यापक और प्रगतिशील भूमि सुधार कार्यक्रम जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रम रहा है जिसने ज़मीनों का मालिकाना हक किसानों को दिया। आज जब लगभग महीने भर से, कड़कती ठंड में, दिल्ली की सीमा पर किसान धरने पर हैं और 30 किसान ठंड से दिवंगत हो चुके हैं तो,  1978 की ऐतिहासिक किसान रैली के नायक रहे चौधरी चरण सिंह की याद आना स्वाभाविक है। सभी विश्लेषक एवं राजनीति के जानकार संख्या बल के लिहाज से 1978 की उस रैली को आजाद भारत की सबसे बड़ी रैली बताते हैं। बोट क्लब से लेकर इंडिया गेट के आगे नेशनल स्टेडियम के पार तक भीड़ ही भीड़ दिखती थी। मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल से चौधरी चरण सिंह व राज नारायण का निष्कासन हो चुका था, लेकिन चौधरी चरण सिंह किसान हितों को लेकर निरंतर चिंतित राजनेता के रूप में देशव्यापी ख्याति प्राप्त कर चुके थे। ग्रामीण उपेक्षा से उपजी बदहाली, गांव से शहर की ओर बढ़ता पलायन, गांव एवं शहर के  बीच बढ़ती आर्थिक-सामाजिक विषमता, किसानों को उनके उत्पाद का उचित दाम नहीं मिलना आदि प्रश्नों पर वह पंडित नेहरू के कार्यकाल से ही मुखर विरोध दर्ज कराते रहे।

जेडीयू नेता केसी त्यागी के अनुसार, 
" कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन नागपुर में आयोजित हुआ, जिसमें पार्टी की ओर से पंडित नेहरू ने प्रस्ताव किया कि भारत में भी सहकारी खेती को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश के प्रमुख मंत्री होते हुए चौधरी चरण सिंह ने प्रस्ताव का विरोध करने का फैसला किया। इससे पूर्व उत्तर प्रदेश में पंडित गोविंद बल्लभ पंत के राजस्व मंत्री के रूप में जमींदारी उन्मूलन लागू कर वह काफी वाहवाही लूट चुके थे। चौधरी चरण सिंह ने बिंदुवार अधिकारिक प्रस्ताव का विरोध प्रारंभ कर दिया। वह भारतीय समाज की मानसिकता एवं कृषि भूमि के प्रति किसान के व्यक्तिगत लगाव पर धाराप्रवाह बोलते रहे और अधिवेशन में उपस्थित कार्यकर्ता करतल ध्वनि से उनका स्वागत करते रहे। उनके भाषण की समाप्ति के बाद यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया। "

जबकि उस समय पंडित नेहरू कांग्रेस के पर्याय और पार्टी के वैचारिक सिद्धांतकार भी माने जाते थे। मंडी व्यवस्था के स्वरूप को लेकर भी चरण सिंह की राय स्पष्ट थी और किस प्रकार बिचौलिए मनमाने तरीके से किसान की फसल का दाम ओने-पौने दर पर तय करते हैं, इस पर उन्होंने कई लेख लिखे। वह इसे ज्यादा पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने के पक्षधर थे। इसी समृद्ध वैचारिकता के कारण “बोट क्लब” की वह रैली ऐतिहासिक बन गई थी। अपने सभी आलोचकों को उन्होंने अपने व्यापक जनसमर्थन से निरुत्तर कर दिया था। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर कोई असुविधाजनक टिप्पणी किए बिना उन्होंने गांव, कृषि, बढ़ती असमानता और भ्रष्टाचार पर अपने भाषण को केंद्रित किया। इस शक्ति का प्रदर्शन उनके लिए कई राजनीतिक संभावनाओं को जन्म दे गया। इसी भिन्न दृष्टिकोण ने उन्हें और अधिक प्रभावी एवं उपयोगी साबित किया। जनता पार्टी ने उन्हें उप प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। अपने पहले ही बजट में उन्होंने किसानों के लिए नाबार्ड जैसे संगठन की स्थापना की, जो आज भी कृषि हितों के संरक्षण की जिम्मेदारी में संलग्न है।

चौधरी चरण सिंह ने अपने जीवन का एक-एक पल कृषि सुधार और कृषक उत्थान के लिए ही जीया। भूमि सुधार एवं जमींदारी उन्मूलन कानून बनाकर उन्होंने ऐसा साहसी कार्य किया जिसकी सराहना देश में ही नहीं, विदेशों तक की गई थी। गरीब किसानों को जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाकर उन्हें भूमिधर बनाने के इस क्रांतिकारी कदम से उनकी ख्याति देश भर में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक फैल गई थी। उनके जीवन पर लिखी गई देशभक्त मोर्चा प्रकाशन की पुस्तक परंतप में उनके द्वारा किए गए भूमि सुधारों की सभी जानकारियां विस्तार से दी गई हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार कानून बनाकर श्रेष्ठतम क्रांति का श्रीगणेश किया। जमींदारी प्रथा समाप्त हुई, शोषण से मुक्त हुए किसान भूमिधर बन गए।

वे 1951 में सूचना एवं न्याय मंत्री बने और तीन महीने बाद ही कृषि मंत्रालय भी उनके पास आ गया। उधर मिटती हुई सामंतशाही ने जमींदारवाद बचाने के लिए पटवारियों की शरण ली। फिर से किसानों की जमीन को धोखे से जमींदारों को दिया जाने लगा। चौधरी चरण सिंह ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी, तो तिलमिलाहट में हजारों पटवारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया। उन्हें विश्वास था कि सरकार को उनके सामने घुटने टेकने पड़ेंगे, लेकिन चौधरी साहब के दृढ़ निश्चय ने उनका साहस तोड़ दिया। उन्होंने सभी त्याग पत्र स्वीकार कर उनके स्थान पर लेखपालों की भर्ती कर दी।

पटवारी शब्द ही राजस्वतंत्र से तिरोहित हो गया। इसके बाद 1954 में योजना आयोग ने निर्देश दिया कि जिन जमींदारों के पास खुद काश्त के लिए जमीन नहीं है, उनको अपने आसामियों से 30 से 60 फीसदी भूमि लेने का अधिकार मान लिया जाए। चौधरी साहब के हस्तक्षेप से यह सुझाव यूपी में नहीं माना गया लेकिन अन्य प्रदेशों में इसकी आड़ में गरीब किसानों से भूमि छीन ली गई। इसके बाद 1956 में चौधरी चरण सिंह की प्रेरणा से ही जमींदारी उन्मूलन एक्ट में यह संशोधन किया गया कि कोई भी वह किसान भूमि से वंचित नहीं किया जाए, जिसका किसी भी रूप में जमीन पर कब्जा हो। उन्होंने सहकारी कृषि एवं जमींदारी उन्मूलन पर पुस्तकें भी लिखीं, जिनकी सराहना दुनिया भर में की गई।

सरकार को कृषि सुधार लागू करने के लिये किसान संगठनों, कृषि अर्थ विशेषज्ञों से और देश की कृषि आर्थिकी की समझ रखने वाले लोगों से बात कर के ही कोई एजेंडा तय करना चाहिए। आखिर सरकार जब इंडस्ट्री ओरिएंटेड या इंडस्ट्री फ्रेंडली बजट बनाती है और एसोचैम, फिक्की और अन्य बड़े उद्योगपतियों से बात करती है और उनकी समस्याओं और सुझावों पर भी ध्यान देती है तब हम कृषि फ्रेंडली या खेती ओरिएंटेड बजट क्यों नहीं बना सकते हैं ?

पहले रैलियां बोट क्लब पर होती थीं। फिर वे जंतर मंतर पर ठेल दी गयीं। बाद में रामलीला मैदान में वे होने लगीं। अब दिल्ली किसानों, जनता के लिये एक वर्जित क्षेत्र बना दिया गया और किसानों को दिल्ली सीमा पर ही अपनी बात सत्ता को सुनाने के लिये लाखों की संख्या में इस घोर सर्दी में महीने भर से बैठना पड़ रहा है। आज का सरकारी रवैया यह दिखाता है कि, लोकमत से चुनी सरकार भी ठस, अहंकारी और अलोकतांत्रिक हो सकती है। सरकार को चाहिए कि, वह अब किसानों से बातचीत कर के इस समस्या का सार्थक समाधान निकाले। आज 23 दिसंबर चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन पर उनका विनम्र स्मरण और किसान दिवस जिंदाबाद।

( विजय शंकर सिंह )

Monday, 21 December 2020

शब्दवेध (43) अंधेर तो यह है कि अंधेरे के लिए कोई शब्द ही नहीं

विश्वास नहीं होता?  पहले मुझे भी नहीं हो सकता था।  50 साल पहले की बात है, कॉर्ल डार्लिंग बक (Carl D. Buck) द्वारा तैयार किया गया प्रमुख भारोपीय भाषाओं के कतिपय शब्दों के पर्यायवाची कोश (A Dictionary of Selected Synonyms in the Principal Indo-European Languages: A Contribution to the History of Ideas 1st Edition देख रहा था जिसमें प्रत्येक शब्द के सभी प्रमुख भाषाओं के पर्याय देकर उनको कुछ श्रेणी में बांटा गया है और फिर उनकी व्याख्या की गई है।  उसमें मकान के लिए जो पर्याय थे सभी का अर्थ था प्रकाशित, जगमग।  तब मुझे भी इससे हैरानी हुई थी, परंतु अचरज प्रकट करने के बाद, इसका समाधान उन्होंने इस रूप में निकाला है कि संभवत है आवास को आकाश के आवरण के रूप में कल्पित किया गया था और जगमगाते हुए आकाश से उनको मकान के लिए  वे संकल्पनाएं सूझी हों।  मैंने 1973 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में इसका  उपयोग करते हुए, उन पर्यायों की अपने ढंग से व्याख्या की थी।  लेकिन तब मेरे मस्तिष्क में भी यह बात नहीं आई थी कि आवरण के किसी रूप के लिए कोई ऐसा स्वतंत्र शब्द ही नहीं है, जिससे केवल अदृश्यता का बोध हो। यहाँ तक कि रात के लिए भी नहीं।  इनके जो भी पर्याय हैं उन सभी का अर्थ  या तो प्रकाश/चमक या जल है।   रंगो के लिए जो शब्द हैं उनमें सभी का एक अर्थ जल होता है। ऐसा इसलिए है कि न  तो अंधकार से कोई आवाज पैदा होती है न ही प्रकाश से। सच कहे तो अंधकार भी  काले रंग से अभिन्नता रखता है यद्यपि सही मानी में वह प्रकाश का अभाव है।  

हम कह आए हैं कि शब्दों का अर्थ  अकेले में नहीं खुलता ।  अकेले में तो रूढ़ार्थ समझ में आता है, - रूढ़ का अर्थ है उपर से लादा हुआ, जिसके लिए बिल्ला अं. टैग/लेबल का प्रयोग होता है। स्वयं हमारा नाम भी एक बिल्ला ही है। वह किसी का हो सकता है। कुछ संस्थाओं में वस्तु या व्यक्ति के लिए एक संख्या नियत कर दी जाती है, व्यक्ति के रूप में हम एक संख्या में बदल जाते हैं पर हम संख्या नही हैं। सो, रूढार्थ शब्दार्थ नहीं। हमारे लिए एक ही शब्द है, मनुष्य। शब्दार्थ जातिवाची होता है, व्यक्तिवाची संज्ञाएं मात्र टैग हैं।  किसी का कोई नाम रखा जा सकता है, पर उससे उसके बारे में इससे अधिक किसी बात का पता नहीं चलता जब कि शब्द नामित के रूप, गुण, (स्व-भाव) का परिचय देता है और उसे हम बिना किसी की सहायता के पहचान लेते हैं। 
अब हम अंधकार के पर्यायों पर विचार कर सकते हैं।  

कृष्ण
कृष्ण का प्रयोग काले के लिए होता है। इसके साथ आप को कृशानु - आग - की याद आनी चाहिए। इसके आदि मे आए ‘कृश्/कृष् का अर्थ है अंकन, रेखन।  इसका प्रयोग बहुत पहले से  साल के दिन  आदि की गणना के लिए होता आया था और निशान के रूप में खिची रेखा और दिन दोनोे के लिए वार के प्रयोग का यह एक कारण  हो सकता है। खेती आरंभ होने पर नम  जमीन में  लकीर खींच कर,  चिड़ियों से बचाने के लिए  बीज इसमें डाल कर  मिट्टी से ढक दिया जाता था। खेती के लिए इसी से कृषि संज्ञा मिली। कृष  भी  पानी के लिए प्रयुक्त कर/किर  निकला है, (कर- करमोना- भिगोना, करमुआ - पानी में उगने वाला एक साग) ।  प्रकाश रश्मि के लिए कर और किरण जल के इस कर/ किर मूल से ही निकला है।   इसी तर्क से आग के लिए कृशानु का प्रयोग हुआ।  कर, कर्ष - खींचना जल की गति की देन है जो कृषि के साथ अधिक लोकप्रिय हुआ लगता है। कृष्ण के तीन अर्थ हैं - जला हुआ, कट या जल कर क्षीण (कृश) हो चुका;  कोयले के रंग का या काला और तीसरा आकृष्ट या मोहित जिसकी आदत के कारण वह कुछ बदनाम भी है और स्वयं मोहन और मनमोहन भी हैं।

हमें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए भाषा की आवश्यकता होती है,  भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कला और साहित्य की आवश्यकता होती है,  परंतु   भाषा साहित्य और कला  हमारे विचारों और भावनाओं को किस तरह नियंत्रित करते हैं  इसकी ओर सामान्यतः हमारा ध्यान नहीं जाता।  इसका एक उदाहरण राधा और कृष्ण का नाम और चरित्र है जिसकी कुछ चर्चा यहाँ  संभव है। 

राध शब्द का अर्थ है, ऋद्धि या संपन्नता लाने वाला (पैसा)। राध का प्रयोग ऋग्वेद में धन के लिए और हमारी समझ से  ताँबे  के उन पिंडों के लिए, और संभवतः उस रंग के लिए भी होता  था, जिनके नमूने सिंधु-सरस्वती सभ्यता से मिले हैं।  इसका प्रयोग इसीलिए बहुवचन में भी हुआ है - इन्द्रा वरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे, हे इन्द्र और वरुण हम तुम दोनों की विविध प्रकार की संपदा के लिए गुहार लगाते हैं, या ‘करतां नः सुराधसः’ ‘में  राध का प्रयोग धन के सामान्य अर्थ में हुआ है। ‘स नो राधांसि आ भर’, वह हमें संपदाओं से भर दे, ‘ राधांसि याद्वानाम् - यदुओं की संपदाएँ में बहुवचन का प्रयोग देखने में आता है, पर इससे यह संकेत नहीं मिलता कि बहुवचन प्रयोग ताम्रपिंडों के लिए ही हुआ है। मेसोपोतामिया में इन पिंडों का नाम स्खलित हो कर  संभवतः रूड हो गया था। मैलरी (1989) का मानना है कि अं. रूड- कठोर और रेड - लाल दोनों इसी से निकले हैं। भारत में इसके रंग से साम्य के आधार पर हल्दी का एक पर्याय  राधा पड़ा जिसका राधा के गोरेपन से संबंध है । 

धन सदा किसी के पास नही रहता, मानवीकृत रूप में लक्ष्मी चंचला होती है, इन्द्र के लिए ‘राधानां पते’ का प्रयोग,  यादवों की राधाएँ (राधांसि याद्वावाम्) और इन्द्र के अवतार कृष्ण के साथ राधाओं/ गोपियों की लीलाएँ। इन सभी को मिला कर एक चित्र तैयार करें तो चीरहरण तक समझ में आ जाएगा क्योंकि धातु कोई हो, लेन-देन के प्रत्येक चरण पर उनकी शुद्धता की जाँच की जाती थी।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )