Friday, 11 August 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, 'यादों की बारात का' अंश (20) कुछ व्यक्तिचित्र (1) पंडित जवाहर लाल नेहरू / विजय शंकर सिंह

चित्र : एक मुशायरे की सदारत करते नेहरू। जोश भी इस चित्र में हैं।

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा 'यादों की बारात' में, जवाहरलाल नेहरू का जिक्र कई बार और प्रमुखता से आया है। जोश ने नेहरू को पहली बार तब देखा था जब वे अपने पिता के साथ इलाहाबाद गए थे और वे आनंद भवन में ठहरे थे। मोतीलाल नेहरू, जोश के पिता और दादा के वकील भी थे और उनकी जमीदारी के मुकदमे देखते थे। फिर जोश कांग्रेस से जुड़े पर वे पूरी तरह राजनीति में शामिल नहीं हो पाए। लेकिन, नेहरू से उनकी दोस्ती बनी रही और यह दोस्ती नेहरू की मृत्यु तक बनी रही। जोश का लिखा, जवाहरलाल नेहरू का यह व्यक्तिचित्र, पठनीय है। जोश के ही शब्दों में यह अंश पढ़े... 
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वह अपनी मोहिनी सूरत के आकर्षण, अपने रंग की चमक-दमक, अपनी तीखी की मुरव्वत अपने लहजे की कड़ाई, अपने उच्चारण के संगीत अपनी मुस्कुराहट की मृदुता, अपनी कुल प्रतिष्ठा, अपने हृदय की असीम विशालता, अपने स्वभाव की अद्वितीय शालीनता और अपने चरित्र की बेजोड़ दृढ़ता के एतबार से एक ऐसे इंसान थे जो इस धरती पर सदियों के बाद पैदा होते है और जो यह आवाज बुलंद कर सकते हैं, 
मत सहल हमें समझो फिरता है फलक बरसों 
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं।

उनका अस्तित्व हिन्दुस्तान का गौरव एशिया की प्रतिष्ठा और समूची मानव जाति का विश्वास है। यह शरीरधारियों की दुनिया के ऐसे सजीव ताजमहल थे, जिसे शाम अवध की लालिमा और सुबहे बनारस की उषा ने इलाहाबाद के अर्थपूर्ण संगम पर छेनियों से तराशकर तामीर किया था।

उन्हें उर्दू जबान से बड़ी मुहब्बत थी। उन्होंने मुझसे एक दिन कहा था कि उर्दू के बारे में मेरी जाती राय और है, और मेरी गवर्नमेंट की राय और है। लेकिन में गवर्नमेंट पर अपनी राय थोपना नहीं चाहता, इसलिए कि यह मामला डेमोक्रेसी के खिलाफ़ है।

एक रोज़ लखनऊ स्टेशन पर उन्होंने रेलवे अफसरों को बुलाकर बहुत बुरी तरह फटकारकर कहा कि आप लोगों ने मुझे निरा जाहिल बनाकर रख दिया है। हर तरफ हिन्दी के बोर्ड लगे हुए हैं। कुछ पता नहीं चलता कि यह खाने का कमरा है या लेवेटरी।

एक बार पाकिस्तान से रुखसत लेकर में जब दिल्ली में उनसे मिला तो उन्होंने बड़े तंज के साथ मुझसे कहा था, "जोश साहब, पाकिस्तान को इस्लाम, इस्लामी कल्चर और इस्लामी जवान यानी उर्दू की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, लेकिन अभी कुछ दिन हुए, मैं पाकिस्तान गया और वहाँ यह देखा कि में शेरवानी और पायजामा पहने हुए हैं, लेकिन वहाँ की गवर्नमेंट के तमाम अफसर, सौ फीसदी अंग्रेजों का लिबास पहने हुए हैं। मुझसे अंग्रेज़ी बोली जा रही है और हद यह है कि मुझे अंग्रेज़ी में संबोधित भी किया जा रहा है। मुझे इस सूरतेहाल से बेहद सदमा हुआ और मैं समझ गया कि 'उर्दू-उर्दू-उर्दू' के जो नारे हिन्दुस्तान में लगाए गए थे, ये सारे ऊपरी दिल से और खोखले थे। जब में खड़ा हुआ तो मैंने उसका उर्दू में जवाब देकर सबको हैरान और परेशान कर दिया, और यह बात साबित कर दी कि मुझे उनके मुक़ाबिले में उर्दू से कहीं ज़्यादा मुहब्बत है। जोश साहब, माफ कीजिए, आपने जिस उर्दू के लिए अपना वतन तंज दिया, पाकिस्तान में उसे कोई मुँह नहीं लगाता। और जाइए पाकिस्तान?" मैने शर्म से आँखें नीची कर ली। उनसे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उनकी बातें सुनकर मुझे एक घटना याद आ गई। मैने पाकिस्तान के एक बड़े शानदार मिनिस्टर साहब को जब उर्दू मैं ख़त लिखा और उन साहब़ बहादुर ने अंग्रेजी में जवाब भेजा तो मैंने जवाबुल जवाब में यह लिखा था कि जनाबे वाला मैंने आपको अपनी मादरी जबान में ख़त लिखा था, लेकिन आपने उसका जवाब अपनी पिदरी (बाप की) जवान में तहरीर फ़रमाया।

चूं कुफ अज काबा बरखेज़द कुजा मानद
मुसलमानी ।
(अगर काबा ही से कुछ उठने लगे तो इस्लाम कहाँ जाए?)

अब चंद घटनाएँ उनकी अदबनवाजी, उनकी गैरमामूली शराफ़त और उनकी बेनजीर नाज़बरदारों की भी सुन लीजिए।

जब केंद्रीय सरकार के सूचना विभाग में मेरी नियुक्ति सरकारी रिसाले 'आजकल' में हो गई तो मैंने उन्हें खत लिखा कि मेरे पर्चे (पत्रिका) के वास्ते अपना पैगाम जल्द भेज दीजिए। अगर आपने सुस्ती से काम लिया तो मेरी आपसे जबरदस्त जंग हो जाएगी। एक हफ्ते के अन्दर उनका पैगाम आ गया। अपने पयाम के आखिर में उन्होंने यह भी लिखा था कि में जल्दी में पयाम इसलिए भेज रहा हूँ कि जोश साहब ने मुझे धमकी दी थी कि अगर देर हो गई तो वह मुझसे लड़ पड़ेंगे। जब मैंने पैगाम के शुक्रिये में उन्हें खत लिखा तो दबी जबान से यह शिकायत भी कर दी कि आपने मेरे ख़त का जवाब खुद अपने हाथ से लिखने के एवज सेक्रेटरी से लिखवाया है। मेरे साथ आपको यह बरताव नहीं करना चाहिए था।

उनकी शराफत देखिए कि मेरी इस शिकायत पर उन्होंने खुद अपने हाथ से मुझे यह लिखा कि "अधिक व्यस्तता के कारण मैं सेक्रेटरी से खत लिखवाने पर मजबूर हो गया। आप मेरी इस गलती को माफ करें।"

एक बार में उनके यहाँ पहुँचा तो देखा कि वह दरवाजे पर खड़े किदवई साहब (रफी अहमद किदवई) से बातें कर रहे हैं। लेकिन जैसे ही मैंने बरामदे में क़दम रखा और उन से, आँखें चार हुई तो यह एक सेकेंड के अन्दर, गायब हो गए।

मैने किदवई साहब से कहा कि मैं तो अब यहाँ नहीं ठहरूंगा। आप पंडित जी से कह दीजिएगा कि लीडरी और प्राइम मिनिस्टरी को लीडरी और प्राइम मिनिस्टरी तक सीमित रखें और उसे इस कंदर न बढ़ाए कि वह मोनार्की बादशाही से टक्कर लेने लगे। किदवई साहब ने मुस्कुराकर पूछा कि आप किस बात पर इस कदर बिगड़ गए हैं? मैंने कहा, "अरे आप अभी तो खुद देख चुके हैं कि मेरे आते ही यह गायब हो गए हैं। मिज़ाजपुरसी तो बड़ी चीज है, उन्होंने मुझसे साहब-सलामत तक नहीं की।" इतने में जवाहरलाल आ गए। मैं मुँह मोड़कर खड़ा हो गया। उन्होंने कहा, "जोश साहब, मामला क्या है?" किदवई साहब ने सारा माजरा बयान कर दिया। वह मेरे करीब आए और मेरे कान में कहा, "मुझे इस कदर ज़ोर से पेशाब आ गया था कि अगर एक मिनट की भी देर होती तो पायजामे ही में निकल जाता। "यह बहाना सुनकर मैंने उन्हें गले से लगा लिया।

एक बार कुँवर महेंद्रसिंह बेदी ने मुझसे कहा कि मेरे वज़ीर श्री सच्चर ने दिल्ली से मेरा तबादला कर दिया है। मैंने कहा, यह श्री सच्चर है या मिस्टर खच्चर?" वह हँसने लगे, कहा, "क्या खूब काफिया मिलाया है। तो में आपसे यह कहने आया हूँ कि आप और बेगम पटौदी दोनों मिलकर पंडित जी के पास जाएं और मेरा तबादला रुकवा दें।

दूसरे ही दिन हम दोनों प्रधानमंत्री की कोठी पहुंचे। अपने आने की सूचना दी। बेगम पटौदी को तुरन्त बुला लिया गया और मैं मुह देखता रह गया। जवाहरलाल की इस अशिष्टता पर मुझे बड़ा ताव आया और यह सोचकर कि मैं वहाँ से उसी वक्त चला जाऊ, कि उनसे फिर कभी न मिलूं, मैं उठा ही था कि उनके सेक्रेटरी शायद प्यारेलाल साहब आ गए। उन्होंने मेरी तरफ आँख उठाकर कहा, 'क्या बात है जोश साहब? इतना पानी बरस रहा है और आप आगबबूला बने खड़े हैं?" मैने उनसे सारा माजरा बयान करके कहा, "अब में यहां नहीं ठहरने का। सेक्रेटरी ने कहा,आप सिर्फ दो मिनट मेरी खातिर ठहर जाए में ठहर गया। यह सीधे उनके कमरे में दाखिल हो गए। और दो मिनट के अन्दर-अन्दर मैंने यह देखा कि यह मुस्कुराते चले आ रहे हैं। उन्होंने कहा, जोश साहब, आपके तशरीफ लाने की मुझे किसी ने सूचना नहीं दी। आपने किससे सूचना देने को कहा था?" मैंने कहा, बिमला कुमारी जी को।" उन्होंने विमला कुमारी को बुलाकर पूछा कि "तुमने मुझे जोश साहब के आने की सूचना क्यों नहीं दी?" विमला कुमारी ने कहा कि "लेडीज फर्स्ट के खयाल से मैंने जोश साहब का नाम नहीं लिया।" पंडित जी ने डांटकर कहा, "नॉनसेंस" और मेरा हाथ पकड़कर अन्दर ले गए और कहा, "आप भी महेंद्र सिंह का तबादला रुकवाने के ख्वाहिशमंद है?"  मैने कहा जी हां। उन्होंने जवाब दिया कि, "यह डेमोक्रेट उसूल के खिलाफ है कि मैं इस मामले में दखल दूँ।" मैंने कहा, "पंडित जी में जानता हूँ कि आपका दिमाग मेड इन इंगलैंड है, लेकिन कुछ अपवाद भी जरूरी होते हैं। मैं जानता हूं प्राइम मिनिस्टर से किसी के तबादले के रद्द करने की इच्छा प्रकट करना ऐसा ही है जैसे हम किसी हाथी से कहें कि मेज़ पर से जरा मेरी दियासलाई उठा ला। लेकिन आज तो में हाथी से दिवासलाई उठवाकर दम लगा।" वह हँसने लगे और तबादला रद्द कर दिया।

एक मर्तबा गर्मी की छुट्टियाँ मनाने के लिए में शिमले गया हुआ था। तीन-चार रोज़ के बाद मालूम हुआ कि पंडित जवाहरलाल भी आ गए हैं। मैंने फोन किया और बदकिस्मती से रिसीवर उठाया उनके ऐसे नये सेक्रेटरी ने, जो लहजे से मदरासी मालूम हो रहा था। मैने अपना नाम बताकर कहा कि मैं पंडित जी से मिलना चाहता हूँ। आप उनसे टाइम लेकर मुझे सूचना दें। उसने बार-बार मेरा नाम पूछा। मैने कहा, जोश मलीहाबादी। लेकिन उसकी समझ में नहीं आया। आखिर मैंने झल्लाकर कहा, जे. ओ. एस. एच. उसने कहा, "मिस्टर जोश, आपके पर्टीकुलर्स" मैंने कहा, "जो शख्स मेरे पर्टीकुलर्स नहीं जानता उसे यह हक नहीं है कि हिन्दुस्तान में रहे। " यह सुनकर उसने कहा, "ओह ऐसा बोलगा।" मैंने कहा, "इससे ज्यादा बोलेगा।" उसने कहा, 'आप होल्ड किए रहें हम पंडित जी से पूछकर बताएगा। दो मिनट के बाद उसने कहा, 'पंडित जी ऐसा बोलता है कि हम यहाँ मजे करने आया है, आप दिल्ली में मिली।"

मेरे तन-बदन में आग लग गई। मैंने बीवी से कहा कि मैं अभी उन्हें ऐसा ख़त लिखूंगा कि तिगनी का नाच नाचने लगेंगे। बीवी ने कहा कि "हमारे सर की कसम, अभी खत न लिखो। इस वक़्त गुस्से में भरे हुए हो जाने क्या-क्या लिख मारोगे पानी पीकर थोड़ी देर लेट जाओ।"

पानी पीकर में लेट तो गया; मगर दिल की आग भड़कती रही। आध घंटे से ज्यादा लेट नहीं सका। बिस्तर पर अंगारे दहकने लगे। में उठ बैठा और ऐसा ख़त लिखा कि अगर उस किस्म का खत किसी थानेदार को लिख भेजता तो वह भी तमाम उम्र मुझे माफ़ न करता।"

दूसरे दिन इंदिरा गांधी का फोन आया कि आज तीन बजे सह पहर को मेरे साथ चाय पीजिए। मैंने कहा, "बेटी, वहां तुम्हारे बाप मौजूद होंगे। में उनसे मिलना नहीं चाहता।" उन्होंने कहा, "मैं पिताजी को अपने कमरे में बुलाऊँगी ही नहीं।" में तैयार हो गया।

शाम को जब बरामदे में पहुंचा तो एक चपरासी ने अन्दर की तरफ इशारा कर दिया। जब में उनके कमरे की तरफ बढ़ा तो पंडित जी ने पीछे से मेरा हाथ पकड़कर कहा, "आइए मेरे कमरे में" में ठिठक्कर खड़ा हो गया, उन्होंने मेरा हाथ खींचा और मुहब्बत के दबाव में आकर में उनके साथ हो गया।

उनके कमरे में पहुँचा तो देखा मेरे बुजुगों के मिलने वाले सर महाराज सिंह बैठे हुए हैं। पंडित जी ने कहा, "महाराज, यह वही जोश साहब है, जिन्होंने मुझे ऐसा गर्म खत लिखा कि शिमले की ठंडक में भी पसीना आ गया। " महाराज सिंह ने कहा, गनीमत समझिए कि यहाँ तक नौबत आई। इनके बुजुगों से आप वाकिफ नहीं। वे जिस पर गर्म हो जाते थे, उसे ठंडा कर दिया करते थे।" पंडित जी हँसने लगे। घण्टी बजाई, उस मदरासी सेक्रेटरी को बुलाया और जैसे ही उसने कमरे में क़दम रखा, यह उस पर बरस पड़े कि "तुमने मुझसे पूछे बगैर जोश साहब को ऐसा बेहूदा जवाब क्यों दिया। मैं अभी तुम्हारा ट्रांसफर किए दे रहा हूँ। कल से तुम मिनिस्टरी ऑफ कॉमर्स में चले जाओ।"

उनका यह बताँव देखकर में पानी-पानी हो गया और उनकी बेमिसाल रवादारी और शराफत पर निगाह करके में उन्हें गले लगाकर रोने लगा।

अब एक आखिरी घटना और सुन लीजिए।

उनके इंतकाल से चंद महीने पहले में हिन्दुस्तान गया और उनसे दरख्वास्त की कि आप किसी दिन मेरी जाए-कयाम (निवास स्थान) पर आकर मेरे साथ खाना खाएँ। हरचन्द में उनका दिल तोड़कर पाकिस्तान आ गया था, लेकिन इसके बावजूद वह आए, खाना खाया और दो घण्टे से ज्यादा बैठे रहे। इस दावत में उनकी आवाज़ की कमज़ोरी और मुस्कुराहट के फीकेपन से यह अंदाज़ा करके मेरा दिल बैठने लगा कि अब वह अपनी ज़िन्दगी के दिन पूरे कर चुके हैं। चुनांचे वही हुआ। मेरे पाकिस्तान वापस आने के दो-तीन महीने बाद वह शराफत के आसमान का सूरज डूब गया और हिन्दुस्तान ही में नहीं सारे एशिया में अंधेरा छा गया।
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अगला व्यक्तिचित्र, सरोजनी नायडू पर है। कुल 53 व्यक्तियों पर जोश ने व्यक्तिचित्र लिखे हैं पर मैने उनमें से चार महत्वपूर्ण व्यक्तियों को ही इस सीरीज के चुना है। जिनमे दो राजनेता हैं, और दो महान शायर। 
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

'जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, 'यादों की बारात का' अंश (19) जोश की आखिरी भारत यात्रा और पाकिस्तान वापसी के बाद, वहां उठा विवाद / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/08/19.html



Thursday, 10 August 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (2) / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट, भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 निरस्त करने के कानून  को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। यह विवरण दूसरे दिन की अदालती कार्यवाही का है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है।

दूसरे दिन की कार्यवाही में वरिष्ठ एडवोकेट, कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि, "अनुच्छेद 370 अब 'अस्थायी प्रावधान' नहीं है और जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के विघटन के बाद इसने स्थायित्व ग्रहण कर लिया है।"
इस पर  पीठ ने पूछा कि "फिर अनुच्छेद 370 को संविधान के भाग XXI के तहत एक अस्थायी प्रावधान के रूप में क्यों रखा गया है?"
जिस पर सिब्बल ने जवाब दिया कि, "संविधान निर्माताओं ने जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के गठन की बात कही थी, और यह समझा गया था कि, उक्त विधानसभा के पास वह अधिकार होगा जो, अनुच्छेद 370 के भविष्य के प्राविधानों को निर्धारित करेगा। इस प्रकार, संविधान सभा के विघटन की स्थिति में, जिसकी सिफारिश अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए आवश्यक थी, इस प्रावधान को रद्द नहीं किया जा सकता है।"

यह लेख वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा अदालत में दूसरे दिन की सुनवाई पर दी गई दलीलों पर आधारित है। कपिल सिब्बल ने मामले के महत्व पर जोर देते हुए, अपनी दलीलें शुरू कीं और इसे "कई मायनों में ऐतिहासिक" बताया।  भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के संबंधों की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए सिब्बल ने सवाल किया कि, "क्या ऐसे रिश्ते को अचानक खारिज किया जा सकता है।" 
यह स्पष्ट करते हुए कि "जम्मू-कश्मीर का भारत में एकीकरण निर्विवाद था, सिब्बल ने हालांकि कहा कि "संविधान ने जम्मू-कश्मीर के साथ एक विशेष संबंध की परिकल्पना की है।"
उन्होंने कहा कि, "इस मामले में निम्नलिखित चार विंदु शामिल होंगे - 
1. भारत का संविधान;  
2. जम्मू-कश्मीर में लागू भारत का संविधान;  
3. जम्मू-कश्मीर का संविधान और;  
4. धारा 370.

कपिल सिब्बल आगे कहते हैं, "मैं यह क्यों कहता हूं कि भारत का संविधान जम्मू-कश्मीर पर लागू होता है, इसका कारण यह है कि समय के साथ, कई आदेश जारी किए गए जिन्हें संविधान में शामिल किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि अधिकांश शक्तियां भारत के संविधान के अनुरूप थीं। सभी कानून लागू थे. इसलिए, इसे हटाने का कोई कारण नहीं था।"

० भारतीय संसद स्वयं को संविधान सभा में परिवर्तित नहीं कर सकती

कपिल सिब्बल ने तब अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के साथ सहमति की आवश्यकता पर अपनी दलील दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि, "क्षेत्र के संवैधानिक भविष्य को निर्धारित करने में "संविधान सभा" के सार को समझना महत्वपूर्ण था।"  
संविधान सभा को परिभाषित करते हुए सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि, "यह एक राजनीतिक निकाय है, जिसे संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए गठित किया गया था, जो कानूनी होने के  साथ साथ, एक राजनीतिक दस्तावेज भी था।  एक बार अस्तित्व में आने के बाद, संविधान के ढांचे के भीतर सभी संस्थान इसके प्रावधानों से बंधे हैं।"

इसके बाद उन्होंने जोर देकर कहा कि "मौजूदा संवैधानिक ढांचे के तहत भारतीय संसद खुद को संविधान सभा में परिवर्तित नहीं कर सकती है।" 
उन्होंने कहा, "आज, भारतीय संसद एक प्रस्ताव द्वारा यह नहीं कह सकती कि हम संविधान सभा हैं। कानून के मामले में वे ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वे अब संविधान के प्रावधानों द्वारा सीमित हैं। उन्हें संविधान की मूल विशेषताओं का पालन करना होगा। उन्हें  आपात स्थिति या बाहरी आक्रमण को छोड़कर, लोगों के मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है। वह भी संविधान के प्रावधानों द्वारा सीमित और मर्यादित है। कार्यपालिका कानून के विपरीत काम नहीं कर सकती है। और न्यायपालिका  कानून की समीक्षा कर सकती है और करती है। लेकिन कोई भी संसद, इसे परिवर्तित नहीं कर सकती है।"

० जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति और आईओए (विलय पत्र) का इतिहास

अपने तर्कों को जारी रखते हुए, कपिल सिब्बल ने विलय पत्र (आईओए) और जम्मू-कश्मीर राज्य और भारत सरकार के बीच संवैधानिक संबंधों के संदर्भ में, एक ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान किया। उन्होंने उन परिस्थितियों को याद करते हुए, अपने तर्क की शुरुआत की, जिनके कारण जम्मू-कश्मीर के महाराजा को अक्टूबर 1947 में विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लेना पड़ा। सशस्त्र आक्रमण, राजनीतिक उथल-पुथल और गतिरोध, समझौते के रूप में भारत से समर्थन की कमी का सामना करते हुए, शासक (जम्मू कश्मीर के राजा) को यह एहसास हुआ कि, वह भारत में शामिल हुए बिना, अपने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते।"
आगे सिब्बल ने कहा, "15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस था। उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। अन्य सभी महाराजाओं ने इसे स्वीकार किया, लेकिन वह कभी ऐसा नहीं चाहते थे। केवल अक्टूबर में ही ऐसा हुआ।"

कपिल सिब्बल ने तब आईओए की अनूठी प्रकृति पर जोर दिया, जिसने अन्य भारतीय राज्यों के विपरीत, जम्मू-कश्मीर राज्य को अवशिष्ट शक्तियां प्रदान कीं है, जिससे यह "वास्तव में, एक "संघीय विवाह" बन गया। महाराजा हरि सिंह की 5 मार्च, 1948 की उद्घोषणा को पढ़ते हुए, सिब्बल ने इस बात पर प्रकाश डाला कि "दिसंबर 1947 से सितंबर 1949 तक शासक द्वारा किसी भी संशोधित (IoA) विलय पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया गया था, जो राज्य की अलग स्थिति की निरंतरता का संकेत देता है।"
आगे कपिल सिब्बल ने 26 जनवरी, 1950 के संविधान (जम्मू-कश्मीर में लागू) आदेश का हवाला दिया, जिसमें माना गया था कि "भारतीय संविधान के प्रावधान राज्य पर तब तक लागू नहीं होंगे, जब तक कि उन्हें जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा सहमत, राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से लागू नहीं किया जाता।"  

इस प्राविधान ने राज्य की विशेष स्थिति और इसकी अलग संवैधानिक संरचना की पुष्टि की। उन्होंने कहा,
"यह एक सहयोगात्मक संबंध था। लगातार बातचीत चल रही थी, यही कारण है कि अधिकांश कानून लागू होते रहे। एक तरह से, उन्हें जम्मू-कश्मीर के लिए, आवेदन में भारत के संविधान में अलग से शामिल किया गया था। केवल एक चीज और वह एक चीज थी कि,  एक अनोखी संरचना - एक संवैधानिक संरचना। उस संरचना को अचानक हटा दिया गया...कोई परामर्श नहीं किया गया। राज्य के राज्यपाल और संसद ने अचानक एक दिन, इसे समाप्त करने का फैसला किया और इस प्राविधान को, निकाल कर बाहर फेंक दिया गया।"

० संविधान सभा के विघटन के बाद अनुच्छेद 370 को स्थायी मान लिया गया
 
दलीलों के एक दिलचस्प मोड़ में, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अनुच्छेद 370 के "अस्थायी प्रावधान" होने के अर्थ को विस्तार से बताया।  उन्होंने कहा कि "अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रावधान केवल इसलिए कहा गया क्योंकि जब भारत का संविधान लागू हुआ था, तब जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा अस्तित्व में नहीं थी।  हालाँकि, एक बार जब संविधान सभा अस्तित्व में आई, तो उसने राज्य के लिए संविधान बनाया, और फिर 1951 से 1957 तक अपने कार्यकाल के बाद संविधान सभा का अस्तित्व समाप्त हो गया, और यह अनुच्छेद 370, संविधान की एक स्थायी विशेषता और अंग बन गया।  ऐसा इसलिए था, क्योंकि अनुच्छेद 370(3) के प्रावधानों के अनुसार, अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक थी, और विधानसभा के बिना, प्रावधान को रद्द नहीं किया जा सकता था।"

हालांकि, सीजेआई ने संविधान सभा के कार्यकाल के बाद अनुच्छेद 370 की निरंतरता पर सवाल उठाए.  सीजेआई चंद्रचूड़ ने बताया कि "अनुच्छेद 370(3) में एक गैर-अड़ियल खंड शामिल है जो इसके विशेष प्रावधानों सहित पूरे अनुच्छेद 370 को ओवरराइड करता प्रतीत होता है।"
पीठ ने पूछा, "तो इसलिए, 7 वर्षों की समाप्ति के साथ, संविधान सभा की संस्था ही समाप्त हो जाती है। फिर प्रावधान का क्या होता है?...जब संविधान सभा समाप्त हो जाती है तो क्या होता है? किसी भी संविधान सभा का जीवन अनिश्चित नहीं हो सकता।  .. खंड (3) का प्रावधान राज्य की संविधान सभा की सिफारिश को संदर्भित करता है... एकमात्र सुरक्षा यह है कि राष्ट्रपति को निरस्त करने से पहले, संविधान सभा की सिफारिश की आवश्यकता होती है। जब संविधान सभा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है तो फिर क्या होता है? यदि प्रावधान  इस तथ्य के आधार पर कि संविधान सभा का कार्यकाल समाप्त हो गया है, कार्य करना बंद हो गया है, निश्चित रूप से (3) का मूल भाग अभी भी जारी है?"

सिब्बल ने तर्क दिया कि यह गैर-अड़ियल खंड केवल संविधान सभा के अस्तित्व के दौरान ही वैध था। उन्होंने कहा, "अनुच्छेद 370 में संविधान सभा का उल्लेख करने का क्या कारण था जब यह अस्तित्व में ही नहीं था? वे जम्मू-कश्मीर सरकार कह सकते थे। उन्होंने अनुच्छेद 370(3) में संविधान सभा शब्द क्यों शामिल किया?"
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने आगे सवाल किया कि, "अनुच्छेद 370 को संविधान के 'अस्थायी और अस्थायी प्रावधानों' के अध्याय के तहत क्यों शामिल किया गया था।"
सिब्बल ने दोहराया कि अनुच्छेद 370 की अस्थायी प्रकृति संविधान सभा के अस्तित्व से जुड़ी थी, जिसकी इसे निरस्त करने में भूमिका थी।"

हालाँकि, सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जो असहमत लग रहे थे, ने कहा, "भारत के प्रभुत्व की संप्रभुता की स्वीकृति पूर्ण थी। उन्होंने सभी इरादों और उद्देश्यों के लिए संप्रभुता को स्वीकार किया। वह स्वीकृति पूर्ण थी लेकिन उन्होंने कुछ विधायी विषयों पर कुछ अधिकार सुरक्षित रखे। इसलिए विलय पूर्ण था। इसके अनुरूप, उन्होंने कहा कि  खंड (3) के अनुसार राष्ट्रपति के पास 370 को निरस्त करने का अधिकार होगा।"
हालाँकि, सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसा केवल जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिश पर किया जाना था, जिसका अस्तित्व 1957 में समाप्त हो गया था।

"क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि अनुच्छेद 370 को कभी भी निरस्त नहीं किया जा सकता," न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पूछा तो कपिल सिब्बल ने जवाब दिया, "हाँ! यही पूरा मुद्दा है। यही हमारा मामला है। इसीलिए मैंने कहा कि संविधान सभा का गठन एक राजनीतिक प्रक्रिया है... आप जम्मू-कश्मीर के लोगों को दरकिनार कर निर्णय नहीं ले सकते। फिर इसमें और संविधान सभा के अधिनियम में क्या अंतर है  जूनागढ़ या हैदराबाद का ताज या विलय? यदि आप एक ऐसी प्रक्रिया पर सहमत हुए हैं जिसे दो संप्रभु अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया है तो आपको इसका पालन करना चाहिए।"
इस मौके पर जस्टिस एसके कौल ने पूछा, "तो अगर एक निर्वाचित विधानसभा अनुच्छेद 370 को हटाना चाहे तो भी यह संभव नहीं है?"
सिब्बल ने जवाब दिया, "संभव नहीं!"

संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 370 को भाग XXI के तहत 'अस्थायी' प्रावधान के रूप में क्यों रखा? बेंच इस पर विचार कर रही है।
अनुच्छेद 370 की अनुमानित स्थायित्व पर सिब्बल की दलीलों के बाद, सीजेआई ने पूछा, "लेकिन यह केवल इस आधार पर है कि संविधान सभा का अस्तित्व समाप्त होने के बाद 370 स्थायी हो जाता है। यदि परिकल्पना स्वीकार नहीं की जाती है तो एकमात्र तरीका यह है कि स्वतंत्रता-पूर्व समझौते को लागू करना होगा। क्या राज्य की शक्तियां, संसद सीमित कर सकती है ?"

इसके बाद अदालत ने अनुच्छेद 370(1) की संरचना और निर्धारण पर गौर किया।  ऐसा करते हुए, CJI ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "दूसरे शब्दों में, सहमति और परामर्श का पूरा क्षेत्र संघ और समवर्ती सूची की प्रविष्टियों तक ही सीमित है। यह योजना से स्पष्ट है। राष्ट्रपति को यह निर्दिष्ट करने की निर्बाध शक्ति दी गई है कि संविधान के कौन से प्रावधान लागू होते हैं। यह शक्ति, पहले और दूसरे प्रावधान पर आधारित है। ये प्रावधान संविधान के मूल प्रावधानों का बिल्कुल भी उल्लेख नहीं करते हैं। वे केवल संघ और समवर्ती सूची में शासित मामलों का उल्लेख करते हैं।"

हालाँकि, सिब्बल ने कहा कि "अनुच्छेद 370 के अनुसार, भारतीय संसद की सामान्य कानून बनाने की शक्ति, संघ सूची और समवर्ती सूची के उन मामलों तक सीमित होगी, जिन्हें राज्य सरकार के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा अनुरूप घोषित किया जाता है।"
उन्होंने कहा, "तो संसद केवल सूची में मौजूद मामलों में ही कानून बना सकती है और वह भी परामर्श से। यह तर्क का पहला अंग है - कानून बनाने की शक्ति पर प्रतिबंध।"

सीजेआई ने तब सवाल किया कि "क्या संविधान सभा के अस्तित्व में नहीं रहने पर अनुच्छेद 370(3) के तहत शक्ति अनिश्चित काल तक जारी रहेगी।"  
सिब्बल ने कहा कि "अनुच्छेद 370 को अस्थायी करार दिया गया था क्योंकि इसे निरस्त करने का अंतिम अधिकार जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के पास था।" 
उन्होंने उस खंड की ओर इशारा किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि "ऐसे किसी भी निर्णय के लिए "संविधान सभा की सिफारिश एक शर्त होगी"।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने बताया कि संविधान के भाग XXI में तीन अभिव्यक्तियाँ हैं- अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष।  उन्होंने कहा कि "संक्रमणकालीन" शब्द का इस्तेमाल किसी भी हेडनोट या सीमांत नोट में नहीं किया गया था।  हालाँकि, "अस्थायी" और "विशेष" शब्दों का उपयोग सीमांत नोटों में किया गया था। उन्होंने आगे कहा, "अनुच्छेद 370 विशेष रूप से 'अस्थायी' कहा जाता है। तो क्या हम कह सकते हैं कि संविधान सभा के समाप्त होते ही खंड (3) के तहत शक्ति चली जाती है? इसे एक स्थायी प्रावधान में बदल दें, भले ही इसका इरादा नहीं था? ऐसा क्यों किया गया  संविधान ने इसे भाग XXI में रखा है?"

इस पर, सिब्बल ने इस बात पर प्रकाश डाला कि "संविधान निर्माताओं ने संविधान सभा के गठन की भविष्यवाणी की थी, और यह समझा गया था कि इस सभा के पास अनुच्छेद 370 के भविष्य के पाठ्यक्रम को निर्धारित करने का अधिकार होगा। किसी भी निरस्तीकरण का उद्देश्य एक सहयोगात्मक प्रक्रिया का परिणाम था,  भारतीय संसद द्वारा एकतरफा कार्रवाई नहीं।"

० अवशिष्ट शक्तियां, जम्मू-कश्मीर राज्य के पास हैं
 
अपने तर्कों में, सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि आईओए के अनुसार, सभी अवशिष्ट शक्तियां जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार के पास हैं।  इस संदर्भ में पीठ के एक प्रश्न पर सिब्बल ने तर्क दिया-

"कश्मीर में यह (अवशिष्ट शक्ति) शुरू से ही थी। यह आईओए में है। अवशिष्ट शक्ति पूरे राज्य विधानमंडल और राज्य सरकार के पास थी - यही वह शर्त थी जिस पर विलय हुआ था। मैं इसे प्रदर्शित करूंगा।"

० राज्य का केंद्रशासित प्रदेश में परिवर्तन अस्वीकार्य
 
पीठ को संबोधित करते हुए सिब्बल ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 राज्यों की सीमाओं को बदलने और यहां तक ​​कि विभाजन के माध्यम से छोटे राज्य बनाने की शक्ति देता है, लेकिन इसका इस्तेमाल पहले कभी भी पूरे राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के लिए नहीं किया गया था।  न्यायमूर्ति कौल ने सिब्बल के तर्क का विरोध करते हुए कहा कि "एक राज्य से, दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने की अनुमति दी गई थी।" 
हालांकि, सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि पूरे राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलना देश के इतिहास में एक अनोखी और अनसुनी कार्रवाई थी।

सिब्बल ने तर्क दिया कि इस तरह के आमूल-चूल परिवर्तन ने प्रभावी रूप से इस क्षेत्र को, प्रतिनिधि लोकतंत्र (Representative democracy') से दूर कर दिया और इसे केंद्र सरकार के सीधे शासन के अधीन कर दिया। उन्होंने कहा,  "तो आप प्रतिनिधि लोकतंत्र से दूर चले जाएं, इसे अपने प्रत्यक्ष शासन के तहत केंद्र शासित प्रदेश में बदल दें, और 5 साल बीत गए!"

कपिल सिब्बल ने, विभाजन के ठीक तीन महीने बाद, संसदीय चुनाव होने के बावजूद, राज्य में चुनाव न होने पर भी चिंता जताई। इस पर उन्होंने कहा, "कृपया एक बात नोट करें- मई 2019 में, जम्मू-कश्मीर राज्य में संसदीय चुनाव हुए थे। इसके तीन महीने बाद! यह 6 अगस्त में हुआ और मई में - संसदीय चुनाव। इसलिए आप संसदीय चुनाव करा सकते हैं लेकिन आप राज्य चुनाव नहीं कराएंगे ?"

इसके साथ ही पीठ ने दूसरे दिन की सुनवाई समाप्त कर दी। सुनवाई अभी जारी है। 

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

भाग (1)
'अनुच्छेद 370 की पृष्ठभूमि और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/08/370.html 

Monday, 7 August 2023

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की तीन महिला जजों की कमेटी और अन्य एसआईटी का गठन मणिपुर हिंसा की जांच के लिए किया / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह "कानून के शासन में विश्वास की भावना बहाल करने और विश्वास की भावना पैदा करने" के लिए मणिपुर हिंसा मामलों के संबंध में कई निर्देश पारित करेगा। मानवीय प्रकृति के विविध पहलुओं को देखने" के लिए,  उच्च न्यायालय की तीन पूर्व महिला न्यायाधीशों की एक समिति गठित करेगी। यह एक "व्यापक आधार वाली समिति" होगी जो राहत, उपचारात्मक उपाय, पुनर्वास उपाय, घरों और पूजा स्थलों की बहाली सहित अन्य चीजों को देखेगी।

इस समिति की अध्यक्षता न्यायमूर्ति गीता मित्तल (जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश) करेंगी, और इसमें न्यायमूर्ति शालिनी फंसलकर जोशी (बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति आशा मेनन (दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश) शामिल होंगी।

जांच के संबंध में, अदालत ने कहा कि केंद्र ने यौन हिंसा से संबंधित 11 एफआईआर, केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपने का फैसला किया है।  कोर्ट ने कहा कि वह इन मामलों को सीबीआई को ट्रांसफर करने की इजाजत देगा। हालाँकि, इसमें अन्य राज्यों से लिए गए एसपी नहीं तो कम से कम डीएसपी रैंक के 5 अधिकारी भी शामिल होंगे। "यह सुनिश्चित करने के लिए कि विश्वास की भावना और निष्पक्षता की समग्र भावना है" ऐसा फैसला किया गया है।  कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये अधिकारी सीबीआई के प्रशासनिक ढांचे के भीतर काम करेंगे।

इसके अलावा, न्यायालय ने कहा कि वह सीबीआई जांच की निगरानी के लिए एक अधिकारी नियुक्त करके "सुपरविजन का एक और स्तर" नियुक्त करेगा, जो न्यायालय को, रिपोर्ट करेगा। महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी और मुंबई पुलिस आयुक्त श्री दत्तात्रेय पडसलगीकर आईपीएस को न्यायालय ने पर्यवेक्षण अधिकारी के रूप, नियुक्त किया है। 

राज्य पुलिस जांच के संबंध में, न्यायालय ने राज्य के इस कथन पर गौर किया कि वह उन मामलों की देखभाल के लिए 42 एसआईटी का गठन करेगी जो सीबीआई को हस्तांतरित नहीं किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "इन एसआईटी के लिए वह अन्य राज्य पुलिस बलों से कम से कम एक इंस्पेक्टर को शामिल करने का आदेश देगा.  इसके अलावा, राज्य एसआईटी की निगरानी 6 डीआइजी रैंक के अधिकारियों द्वारा की जाएगी जो मणिपुर राज्य के बाहर से हैं।"

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने प्रस्तावित निर्देशों का खुलासा करने के बाद कहा कि उपरोक्त शर्तों पर एक औपचारिक आदेश आज दिन के अंत तक अपलोड किया जाएगा।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ मणिपुर हिंसा से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।  पिछले सप्ताह पारित आदेश के अनुसार मणिपुर के डीजीपी व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित थे।

पिछली सुनवाई पर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने पुलिस जांच को "धीमी" बताया था।  पीठ ने कहा था कि घटनाओं के कई दिनों बाद एफआईआर दर्ज की गईं और गिरफ्तारियां बहुत कम हुई हैं।

० अदालत में क्या हुआ...

आज जब मामले की सुनवाई हुई तो भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पीठ को एक नोट सौंपा जिसमें पीठ द्वारा मांगे गए विवरण थे। 

एजी ने कहा, "सरकार बहुत परिपक्वता  के साथ, स्थिति को संभाल रही है।"  
उन्होंने पीठ को सूचित किया कि "सुझाव यह है कि हत्या के मामलों की जांच एसपी रैंक के वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों द्वारा की जाए और यौन हिंसा के मामलों की जांच केवल महिला अधिकारियों की एक टीम द्वारा की जाएगी। आज स्थिति अभी भी संवेदनशील है...बाहर से निर्देशित कोई भी जांच विश्वास को प्रेरित नहीं कर पाएगी।" 

भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि "यौन हिंसा के ग्यारह मामलों की जांच सीबीआई द्वारा की जाएगी और राज्य अन्य मामलों के लिए एसआईटी का गठन करेगा।"

'वीमेन इन गवर्नेंस-इंडिया' संगठन की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने बताया कि "ज्यादातर एफआईआर इंफाल में दर्ज की गई हैं, पीड़ित अन्य न्यायक्षेत्रों में रहते हैं और उनमें से कुछ राहत शिविरों में हैं।"

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि "आगे की हिंसा को फैलने से रोकने के लिए उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए। उन्होंने सेवानिवृत्त महिला न्यायाधीशों वाली एक "उच्चाधिकार प्राप्त समिति" के गठन के संबंध में स्वयं, अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, निज़ाम पाशा और शोभा गुप्ता द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए कुछ सुझाव भी पढ़े, जो "अदालत की आंख और कान" के रूप में कार्य करेंगे।".  

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि विशेष जांच दल में मणिपुर राज्य के बाहर से बेदाग रिकॉर्ड वाली महिला अधिकारियों को शामिल किया जाना चाहिए। इंदिरा जयसिंह ने भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए तहसीन पूनावाला मामले (2018) में पारित निर्देशों को लागू करने का भी न्यायालय से आग्रह किया।

ज़ोमी स्टूडेंट्स फेडरेशन के वकील निज़ाम पाशा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए एसआईटी अधिकारियों का चयन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए।  उन्होंने अस्पतालों में लावारिस पड़े आदिवासियों के शवों के मुद्दे पर भी प्रकाश डाला।  उन्होंने कहा कि स्थिति ऐसी है कि पीड़ित शवों की पहचान करने और दावा करने के लिए इंफाल के अस्पतालों में आने की स्थिति में नहीं हैं।  इसलिए, उन्होंने सुझाव दिया कि शवों को किसी पहाड़ी जिले में स्थानांतरित कर दिया जाए या एक ऐसी प्रणाली बनाई जाए जिससे शवों की पहचान ऑनलाइन की जा सके।

मणिपुर ट्राइबल फोरम दिल्ली के वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने पहले के मौकों पर उनके द्वारा की गई दलील को दोहराया कि हिंसा के पीछे मौजूद "कोर रिंग लीडर्स" को गिरफ्तार किया जाना चाहिए और आगाह किया कि जब तक ऐसा नहीं किया जाता, हिंसा कम नहीं होगी।

वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने कहा कि हिंसा में विदेशी आतंकवादी शामिल हैं और पीड़ित केवल एक विशेष समुदाय से नहीं हैं।  उन्होंने कहा, "इन विदेशी उग्रवादियों के पास स्वचालित राइफलें हैं। मूल मुद्दा पोस्त की खेती है जिससे उन्हें धन मिलता है...वे बस सीमा पार जा सकते हैं और सीमा से वापस आ सकते हैं।"

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


Sunday, 6 August 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, 'यादों की बारात का' अंश (19) जोश की आखिरी भारत यात्रा और पाकिस्तान वापसी के बाद, वहां उठा विवाद / विजय शंकर सिंह

पाकिस्तान में जोश साहब को जब उचित सम्मान नहीं मिला तो, वे आम मुसलमान, जो इस्लाम के नाम पर, यूपी बिहार से, हिजरत कर के पाकिस्तान गए , उन्हे क्या सम्मान मिला होगा। वे आज तक, वहां के समाज में घुलमिल नहीं पाए।  बहरहाल, जोश वहां अपने हक के लिए पाकिस्तानी हुक्मरान से लड़ते भिड़ते रहे, पर मलीहाबाद के इस पठान ने, अपने स्वाभिमान पर कोई आंच नहीं आने दी। 

1967 में वे आखिरी बार, पाकिस्तान से भारत आते हैं, और इसी यात्रा में, अपनी पूर्व जमींदारी का हाल चाल लेने आखिरी बार मलीहाबाद जाते हैं, और कुछ दिन वहां गुजारते हैं। उनके बेहद अजीज़ जवाहरलाल नेहरु तब जीवित नहीं थे, तो उनका मन भी लगता था। नेहरू के प्रति उनका क्या दोस्ताना संबंध था, यह आप आगे अगले अंश में, पढ़ेंगे। 

इसी यात्रा में, वे अपने पुराने दोस्तों से मिलने, बंबई जाते हैं और वही एक इंटरव्यू देते हैं। वह इंटरव्यू, जोश के अनुसार तो एक सामान्य बातचीत थी, पर उसी इंटरव्यू को, पाकिस्तान में, पाक विरोधी नजर से देखा गया। जोश, जब वापस पाकिस्तान तशरीफ ले जाते हैं, तो वहां उनके खिलाफ एक जंग का एलान हो चुका होता है, और वे फिर नौकरी छोड़ देते हैं। फिर वे यह ठान लेते हैं कि, अब वे कोई नौकरी किसी भी कीमत पर न तो खोजेंगे और न ही किसी नौकरी का ऑफर स्वीकार करेंगे।

अब उन्ही के शब्दों में पढ़िए....
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शायद अगस्त 1967 में छुट्टी लेकर में अपने मलीहाबाद के बाग़ों के फ़ैसले के लिए हिन्दुस्तान गया। इस मामले ने इस कदर तूल खींचा कि मुझे वहां चार महीने रहना पड़ा। बाग़ों और मुशायरे के सिलसिले में बम्बई पहुंचा तो अंसारी साहब किसी अखबार के नुमाइंदे को लेकर इंटरव्यू के लिए आए और मेरा इंटरव्यू किसी अंग्रेजी अखबार में छप गया। छुट्टी खाता होने पर जब लाहौर पहुंचा तो मुझसे कहा गया कि मेरे बम्बई के निरीह इंटरव्यू को नये नये मानी पहनाकर यहाँ के अखबारों ने खूब उछाला और मुझे पाकिस्तान दुश्मन ठहरा दिया है। मुझे यह सुनकर अफसोस तो जरूर हुआ लेकिन ताअज्जुब बिलकुल नहीं। जब हदीस और कुरजान को, अपने साँचे में डालने के लिए व्याख्याओं द्वारा बदल दिया जाता है तो मेरा इंटरव्यू क्या चीज है। लाहौर में अखबारों के झूठ का जवाब देकर जब कराची आया तो हक्की साहब ने बड़े गुस्ताखाना अंदाज में मुझसे पत्र-व्यवहार शुरू कर दिया। आखिर इस गैरशरीफाना सिलसिले को बन्द कर देने के वास्ते मैंने हक्की को लिख भेजा कि, "मैं जिस खानदान का सदस्य हूं और जिस मिजाज का आदमी हूं, उस मिजाज का आदमी टूट तो सकता है; लेकिन लचक नहीं सकता। अगर आप मेरी रोजी पर चोट लगाने की ठान चुके हैं तो-
निगाहे गर्म से हालत हो दिल की और तबाह
अगर यही है इरादा तेरा तो बिस्मिल्लाह

मेरी इस तहरीर के जवाब में हक्की ने लिखा कि मेरी नौकरी की मुहलत अब और नहीं बढ़ेगी, मैं दफ्तर से तअल्लुक तोड़कर घर आ गया और हक्की के घर में घी के चिराग जलने लगे।

लेकिन इस खबर को हक्की साहब ने किसी अखबार में छपने नहीं दिया, ताकि उनकी पोल न खुलने पाए। जब हिन्दुस्तानी रेडियो ने मेरे निलम्बन का ऐलान किया तो यहाँ के अखबारों ने बड़ी ढीठाई के साथ उसको नकारते करते हुए उल्टा, उसे ही झूठा करार दे दिया।

मेरी नौकरी को छूटे अब एक मुद्दत गुजर चुकी है, जिस रोज मैं हज़रते हक के फसलो करम और हककी साहब के कलमे-फिज़ रकम से निलम्बित कर दिया गया था, उस रोज पूरे दिन न सही, चन्द घन्टे तो जरूर परेशानी रही थी। लेकिन मेरी बीवी की हिम्मत और मेरे मजबूत इरादे ने, उस काली परेशानी को शाम होते-होते कुहनी की चोट की मानिंद भुला दिया था।

अब चूंकि यह सारा मामला, 
रोने-धोने वाले, रो चुके और हँसने वाले हंस चुके,
इक पुराना वाक्या है खाना वीरानी मेरी ।

इसके साथ-साथ चूंकि मैं अपने बुजुर्गों और अपनी इज्जत को गवाह बनाकर यह क़सम खा चुका हूँ कि मर जाऊंगा लेकिन अब सरकारी मुलाजमत का गुनाह नहीं करूंगा, यानी 'खाई सो खाई अब खाऊं तो राम दुहाई', इस मंजिल में अपनी पोजीशन साफ करने का इरादा करूंगा तो मुझे पूरा यकीन है कि मेरे इस अमल को हुकूमत की खुशामद या मुलाज़मत की आरज़ू नहीं समझा जाएगा। इसी बिना पर में खुल्लम-खुल्ला ऐलान कर देना चाहता हूँ कि 1967 के आखिर में मेरे खिलाफ जो यह प्रोपेगंडा फरमाया गया था कि, में पाकिस्तान का दुश्मन या पाकिस्तान के राष्ट्रपति का मुखालिफ हूं, कतई तौर पर गलत और बेबुनियाद था। हैरत यह है कि इस मोटी-सी बात को कोई नहीं समझ सकता कि, में पाकिस्तान का दुश्मन होता तो अपनी दौलत, अपनी इज्जत अपनी फरागत अपने दोस्त अपने बुजुगों की हड्डिया से मुंह मोड़कर और अपने नाज़बरदार जवाहरलाल नेहरू का दिल तोड़कर यहां आता क्यों?

थोड़ी देर के वास्ते अगर यह भी मान लिया जाए कि मुझे लालच खींचकर यहाँ लाई थी। लेकिन जब नक़वी और सिकन्दर मिर्जा के पतन के बाद मुझ पर जीना दूभर हो चुका था और मेरी परेशानियों का हाल सुनकर, जब पंडित जी ने मुझसे कहला भेजा था कि, में पाकिस्तान को छोड़कर हिन्दुस्तान आ जाऊं तो, उस वक्त मैंने हिन्दुस्तान जाने से क्यों इनकार कर दिया था?

अब जबकि पाकिस्तान में में अपना मकान भी बनवा चुका हूं और यहाँ की खाक में दफन हो जाने के लिए भी आमादा हूं, तो किसके मुंह में इतने दांत है कि, मुझे पाकिस्तान का दुश्मन कहकर, अपनी शैतानियत और बेवकूफी का ऐलान फरमा दे।

मैं इस सियासी नफरत से भरे जमाने में, जब एक मुल्क दूसरे मुल्क को अपने पेट में रख लेने पर तुला बैठा है, बल्कि मुलक ही नहीं एक सूबा दूसरे सूबे पर छुरी ताने खड़ा है, यह बात किससे कहूँ कि, मैं तमाम मानव जाति का दोस्त हूं, और यह कहूं भी, तो यकीन कौन करेगा? लेकिन मैं अपने सच को इस खौफ से दबा नहीं सकता कि उसे झूठ खयाल किया जाएगा। इसलिए मैं यह कह देना चाहता हूं कि, अब एक मुद्दत से मेरे सीने में अबुल इंसान हजरते आदम का दिल धड़क रहा है। मैं इस दुनिया के हर करीबो-दूर मुल्क को अपना वतन और हर अच्छे-बुरे इंसान की अपना बच्चा समझता है।

जब किसी के घर में जश्न होता है तो मैं समझता हूं कि, वह जश्न मेरे ही घर में होता है और जब किसी के घर से कोई जनाज़ा निकलता है तो मैं यह महसूस करता हूं, कि यह जनाजा मेरे ही घर से निकल रहा है। सभी इंसान एक ही किस्म के तत्त्वों से बने हैं, जिनमें सिर्फ नाम और जिस्म का फर्क है। इस दुनिया में गैरियत का कहीं कोई नाम ही नहीं है। अगर किसी से नफरत या दुश्मनी करूँगा तो, इसके सिवा और कोई मानी भी नहीं हो सकते कि मैं खुद अपनी ही जात से नफरत या दुश्मनी कर रहा है-

ऐ दोस्त, दिल में गर्दै कुदरत न चाहिए
अच्छे तो क्या बुरे से भी वहशत न चाहिए
कहता है कौन फूल से रगबत न चाहिए
कांटे से भी मगर तुझे नफ़रत न चाहिए 
कांटे की रंग में भी है लहू सब्जाज़ार का 
पाला हुआ है वह भी नसीमे बहार का।
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इस तरह, जोश मलीहाबादी की बहुचर्चित आत्मकथा, यादों की बारात, पुस्तक का अंत होता है। लेकिन आत्मकथा के बाद उन्होंने कुछ उन व्यक्तियों के व्यक्तिचित्र भी संकलित किए है, जो उनके करीब रहे हैं। मैं उनमें से, जवाहरलाल नेहरू, सरोजनी नायडू, मजाज लखनवी और फिराक गोरखपुरी के व्यक्तिचित्र आगे प्रस्तुत करूंगा। 
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

'जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, 'यादों की बारात' का अंश (18) पाकिस्तान उर्दू बोर्ड की नौकरी और वहां भी विवाद / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/08/18.html 

Friday, 4 August 2023

अनुच्छेद 370 की पृष्ठभूमि और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं / विजय शंकर सिंह

केंद्र सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करने के लगभग चार साल बाद, केंद्र सरकार के इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की बहुप्रतीक्षित सुनवाई 2 अगस्त, 2023 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने शुरू की है। यह मामला  मार्च 2020 में, अपनी आखिरी लिस्टिंग के बाद से, तीन साल से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट में बिना सुनें पड़ा है और अब लगातार, अंतिम निर्णय के आने तक, सुनवाई के लिए शीर्ष अदालत ने लिया है। 

० धारा 370 क्या है?

1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, इंडियन  इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के अनुसार, ब्रिटीश भारत को, भारत और पाकिस्तान के दो स्वतंत्र और संप्रभु देशों में विभाजित कर दिया गया।  इसके साथ ही, इंस्ट्रुमेंट ऑफ एक्सेशन (आईओए), जो 600 देसी रियासतों के संबंध  में था भी लाया गया। आईओए ने उन रियासतों को, जो ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन थीं, भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या खुद ही आजाद होने के विकल्पों के बीच चयन करने का प्राविधान देता था। जम्मू-कश्मीर राज्य ने, अचानक और अप्रत्याशित हुए पाकिस्तान से आए कबायलियों के आक्रमण का मुकाबला, करने के लिए भारत की सहायता प्राप्त करने के लिए, भारत के साथ विलयपत्र पर, आईओए के प्राविधान के अनुसार, हस्ताक्षर कर दिया।

इस विलय में, तीन महत्वपूर्ण मामले रक्षा, विदेशी मामले और संचार छोड़ कर, शेष मामले, भारत सरकार के अधीन रखने की बात तय थी। जब, भारत अपने संविधान का मसौदा तैयार कर रहा था, तब यह प्रस्तावित किया गया था कि, मूल आईओए के अनुरूप भारतीय संविधान के केवल वे ही प्रावधान, जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू होने चाहिए। यानी, रक्षा, विदेशी मामले और संचार, संघीय सरकार के पास रहेगा और अन्य सब विषयों पर, राज्य सरकार को निर्णय लेने का पूरा संवैधानिक अधिकार रहेगा। जम्मू कश्मीर के लिए यह एक विशिष्ट स्थिति थी। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 370 को भारतीय संविधान में शामिल किया गया और तदनुसार, जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया।  यह अनुच्छेद राज्य को अपना संविधान बनाने की अनुमति भी देता है। इसके अलावा, इस प्राविधान ने, जम्मू-कश्मीर के संबंध में, भारतीय संसद की विधायी शक्तियों को सीमित कर दिया, जिसमें कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद, रक्षा, विदेशी मामलों और संचार से संबंधित अनुच्छेदों को छोड़कर, राज्य की संविधान सभा की सहमति से ही, राज्य पर लागू होंगे।

अनुच्छेद 370 को 17 अक्टूबर, 1949 को भाग XXI के तहत संविधान में शामिल किया गया था, जिसका शीर्षक था "अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान।"  शुरुआत में इसे एक अस्थायी प्रावधान के रूप में माना गया था, लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य के संविधान के निर्माण और उसे अपनाने तक इसके प्रभावी रहने की उम्मीद थी।  हालाँकि, राज्य की संविधान सभा ने 25 जनवरी, 1957 को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने या संशोधन की सिफारिश किए बिना खुद को भंग कर दिया, जिससे प्रावधान की स्थिति अनिश्चित हो गई।

 समय के साथ साथ, भारत के सर्वोच्च न्यायालय और जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से, अनुच्छेद 370 को स्थायी दर्जा प्राप्त माना जाने लगा। इसका मतलब यह था कि, आईओए में शामिल विषयों के संबंध में राज्य में केंद्रीय कानून लागू करने के लिए राज्य सरकार के साथ "परामर्श" की आवश्यकता थी। दूसरी ओर, रक्षा, विदेशी मामलों और संचार से अलग मामलों से संबंधित केंद्रीय कानून के लिए, राज्य सरकार की "सहमति" अनिवार्य थी।

० अनुच्छेद 370 को हटाना

अनुच्छेद 370(3) भारतीय संसद को जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सहमति के बिना अनुच्छेद 370 को संशोधित करने से रोकता है। हालाँकि, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, राज्य की संविधान सभा 1957 में भंग कर दी गई थी। इसलिए, जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करने के लिए, 5 अगस्त को संविधान (जम्मू और कश्मीर पर लागू) आदेश, 2019 की घोषणा के माध्यम से, दो-चरणीय प्रक्रिया में निष्पादित किया गया । इन कदमों का कार्यान्वयन इस कारण हो सका कि, जम्मू कश्मीर राज्य, दिसंबर 2018 से ही राष्ट्रपति शासन के अधीन था और अब भी है। 

सबसे पहले, संविधान (जम्मू और कश्मीर पर लागू) आदेश, 2019, जिसे सीओ 272 आदेश के रूप में भी जाना जाता है, पारित किया गया। इस आदेश ने संविधान (जम्मू और कश्मीर पर लागू) आदेश, 1954 को हटा दिया और घोषणा की कि भारत के संविधान के सभी प्रावधान जम्मू और कश्मीर पर लागू होंगे। इसके अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 367 में भी संशोधन किया गया। चूंकि अनुच्छेद 370 को केवल जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सिफारिश से संशोधित किया जा सकता था, सीओ 272 आदेश ने, अनुच्छेद 367 में एक खंड जोड़ा गया। इस खंड में कहा गया है कि, यह कथन, "राज्य की संविधान सभा", अनुच्छेद के खंड (2) में संदर्भित है, के स्थान पर, 370 को "राज्य की विधान सभा" के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। यानी जम्मू कश्मीर की संविधान सभा की जगह, जम्मू कश्मीर की विधानसभा को समझा जाना चाहिए। चूंकि जम्मू-कश्मीर की विधान सभा भंग थी, और राज्य राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत था, इसलिए विधान सभा के बजाय, संसद की सिफारिश (अनु.370 को हटाने) को विधान सभा की सिफारिश के बराबर माना गया। यह एक घुमावदार व्याख्या थी। 

इसके अलावा, सीओ 272 ने अनुच्छेद 367 में अतिरिक्त खंड जोड़े गए, जिसमें कहा गया कि, "जम्मू-कश्मीर सरकार" के संदर्भ को "जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल" के रूप में समझा जा सकता है। यानी विधान सभा भंग थी तो संसद ने उसकी जगह ली और, मंत्रिमंडल की जगह, राज्यपाल ने ले ली। 

इसके बाद केंद्र सरकार ने दूसरा कदम उठाया। अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की सिफारिश करने वाला एक वैधानिक प्रस्ताव, लोकसभा द्वारा 351/72 मतों के बहुमत के साथ पारित किया गया और बाद में यही प्रस्ताव राज्यसभा द्वारा भी पारित कर दिया गया।  6 अगस्त, 2019 को संसद द्वारा पारित वैधानिक संकल्प के आधार पर, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक अधिसूचना (सीओ 273) जारी की, जिसमें कहा गया कि, 6 अगस्त, 2019 से अनुच्छेद 370 के सभी खंड लागू नहीं होंगे। इससे जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति, प्रभावी ढंग से रद्द हो गई।

राष्ट्रपति ने इन अधिसूचनाओं को जारी करने के लिए अनुच्छेद 370(3) के तहत प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल किया। अनुच्छेद 370(3) राष्ट्रपति को यह घोषित करने की शक्ति देता है कि, यह अनुच्छेद लागू नहीं होगा या केवल ऐसे अपवादों और संशोधनों के साथ और ऐसी तारीख से लागू होगा जो वह निर्दिष्ट कर सकता है। विशेष रूप से, संसद ने जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक 2019 भी पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में विभाजित किया गया।

० सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और संविधान पीठ का गठन 

 राष्ट्रपति की अधिसूचना के ही दिन, अधिवक्ता एमएल शर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में जाकर संविधान (जम्मू और कश्मीर में आवेदन) आदेश, 2019 को चुनौती दी।  इसके बाद, तहसीन पूनावाला और जम्मू-कश्मीर के वकील शाकिर शब्बीर ने भी उसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर कीं। बाद में, कानून स्नातकों, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं, पूर्व नौकरशाहों, रक्षा कर्मियों और राजनेताओं सहित विभिन्न वर्गों से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ याचिकाओं की एक बाढ़ सी सुप्रीम कोर्ट में आ गईं। इन याचिकाओं में जम्मू-कश्मीर के विभिन्न मुद्दों पर चिंता जताई गई, जैसे मीडिया की स्वतंत्रता, राजनीतिक नेताओं की हिरासत, घाटी में लॉकडाउन की चुनौतियां, इंटरनेट शटडाउन आदि आदि।

याचिकाओं की बढ़ी संख्या और उनके महत्व को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने एक संविधान पीठ का गठन करके, इनकी सुनवाई करने का निश्चय किया। संविधान पीठ का गठन किया गया जिसमें तत्कालीन सीजेआई एन वी रमना, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस सूर्यकांत शामिल थे। इस पीठ को अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई और फैसला सुनाने का काम सौंपा गया था, जिसके परिणामस्वरूप राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द कर दिया गया था।  इसके अतिरिक्त, जम्मू-कश्मीर में लॉकडाउन उपायों और संचार शटडाउन से संबंधित याचिकाओं पर न्यायमूर्ति एनवी रमना की अगुवाई वाली 3 न्यायाधीशों की पीठ ने अलग से सुनवाई की।

 ० संविधान पीठ के सामने रखीं दलीलें

संविधान पीठ के समक्ष आठ दिनों तक चली सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं द्वारा कई दलीलें पेश की गईं और केंद्र द्वारा जवाबी दलीलें पेश की गईं।

 1. राष्ट्रपति शासन की प्रकृति पर

याचिकाकर्ताओं का तर्क: सबसे पहले, याचिकाकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की वैधता पर अपना पक्ष रखा जिसे, संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत लागू किया गया था। यह कहा गया कि, यह अनुच्छेद 356,  अस्थायी प्रकृति का होता है।  इस प्रकार, जब कोई भी राज्य, राष्ट्रपति शासन के अधीन होता है तो राष्ट्रपति और संसद की शक्ति का प्रयोग भी अस्थायी और पुनर्स्थापनात्मक प्रकृति का होता है। राष्ट्रपति शासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि, फिर से ऐसी स्थिति बने, जहां राज्य में संवैधानिक सरकार का गठन संभव हो सके।  इस प्रकार, अनुच्छेद 356 के तहत शक्ति का उपयोग अपरिवर्तनीय संवैधानिक परिवर्तन लाने के लिए नहीं किया जा सकता है। 

 केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि राज्य में राष्ट्रपति शासन संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप सख्ती से लागू किया गया था और यह विभिन्न तथ्यों के आकलन पर आधारित था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि, राज्य का प्रशासन चल रहा है।  संविधान के अनुसार बाहर.  इसके अलावा, राष्ट्रपति शासन के लिए अनुच्छेद 356 के तहत संसद द्वारा अपेक्षित मंजूरी भी दी गई और दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित किए गए।

 2. राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता पर याचिकाकर्ताओं का तर्क है, चूंकि जम्मू-कश्मीर राज्य दिसंबर 2018 से अक्टूबर 2019 तक, राष्ट्रपति शासन के अधीन था, इसलिए राज्य में सभी निर्णय राज्यपाल द्वारा लिए गए थे।  याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्यपाल केवल राष्ट्रपति का एक प्रतिनिधि था, जो एक आपातकालीन उपाय के रूप में एक लोकप्रिय निर्वाचित सरकार का स्थान लेता था। इसलिए, जम्मू-कश्मीर के लोगों की इच्छा की, राज्यपाल द्वारा प्रदान की गई राज्य सरकार की सहमति में, कोई अभिव्यक्ति नहीं मिली।  इस प्रकार, राज्यपाल द्वारा दी गई सहमति अमान्य थी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि सहमति भी अलोकतांत्रिक थी क्योंकि न तो राष्ट्रपति और न ही राज्यपाल ने इस मुद्दे पर,  जनता या विधान परिषद के सदस्यों के साथ कोई परामर्श किया था।

केंद्र ने प्रतिवाद प्रस्तुत किया कि, चूंकि राज्य, उस समय पर राष्ट्रपति शासन के अधीन था, इसलिए संसद में, राज्य के विधानमंडल द्वारा अन्यथा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां भी निहित थीं।  इस प्रकार, अनुच्छेद 356(बी) के अनुसार, संसद इस मामले में कानून बनाने की अपनी शक्तियों के अंतर्गत सक्षम थी।

 3. अनुच्छेद 370(1)(डी) के तहत राष्ट्रपति की शक्तियों पर याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अनुच्छेद 370(1)(डी) के तहत राष्ट्रपति की शक्ति एक "घटक शक्ति" नहीं थी, बल्कि केवल "संशोधनों और अपवादों" के साथ प्रावधानों को लागू करने की शक्ति थी।  इस प्रकार, राष्ट्रपति के पास केवल स्वाभाविक रूप से सीमित शक्ति थी।  तदनुसार, अनुच्छेद 370 को केवल तभी निरस्त किया जा सकता है जब इसे समाप्त करने का प्रस्ताव राज्य की संविधान सभा (या कानून में इसके उत्तराधिकारी, यदि कोई हो) से आया हो।  चूँकि उस समय जम्मू-कश्मीर संविधान सभा अस्तित्व में नहीं थी, इसलिए ऐसी कोई राष्ट्रपति अधिसूचना पारित नहीं की जा सकती थी।

 केंद्र ने इसके जवाब में, अनुच्छेद 370(1)(डी) के तहत राष्ट्रपति की शक्ति की व्यापक प्रकृति को रेखांकित करते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 (1)(डी) के तहत शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा छह मौकों पर किया गया था, जब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू था, और किसी भी समय इस अभ्यास के खिलाफ कोई मुद्दा या चुनौती नहीं उठाई गई थी।  यह शक्ति इस आधार पर कि जम्मू-कश्मीर की विधान सभा या जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार अस्तित्व में नहीं थी।  इसके अलावा, पुरातलाल लखनपाल बनाम भारत के राष्ट्रपति, (1962) 1 एससीआर 688 पर भरोसा किया गया था जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 370(1)(डी) के तहत संविधान के प्रावधानों को उनके आवेदन में संशोधित करने की व्यापक शक्ति थी। 

4. राज्य के विभाजन के विंदु पर, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू और कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करने की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 3 का उल्लंघन है।  ऐसा इसलिए था क्योंकि किसी राज्य के चरित्र को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करके पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता था।  यह तर्क दिया गया कि ऐसा करना संविधान के संघीय चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है क्योंकि अनुच्छेद 3 उस सीमा को सीमित करता है जिस तक संघ की संघीय प्रकृति को कम किया जा सकता है।  मूल रूप से, यह कहा गया था कि राज्यों को मौजूदा राज्यों से अलग किया जा सकता है, जैसे तेलंगाना को आंध्र प्रदेश से अलग किया गया था, राज्यों को पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील किया जा सकता है।

केंद्र ने इस दलील को प्रथम दृष्टया अस्थिर बताते हुए तर्क दिया कि अनुच्छेद 3 के स्पष्टीकरण में स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि अनुच्छेद 3 में "राज्य" के संदर्भ में "केंद्र शासित प्रदेश" का संदर्भ शामिल है।  इस प्रकार, केंद्र वास्तव में एक राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर सकता है।  केंद्र ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का विभाजन घाटी में व्याप्त आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद की गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए किया गया था।  इस कदम को राज्य में पर्यटन की संभावनाओं की खोज और उद्योगों की स्थापना के माध्यम से रोजगार के अवसरों को बढ़ाकर घाटी के आर्थिक उत्थान के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बताया गया।

5. जम्मू-कश्मीर के संविधान की प्रयोज्यता पर
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि, केंद्र की कार्रवाई जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 147 का भी उल्लंघन है। अनुच्छेद 147 के अनुसार, जम्मू-कश्मीर संविधान के अनुच्छेद 3 और 5 में सीमित संशोधन किए जा सकते हैं।  यह तर्क देते हुए कि जम्मू-कश्मीर और भारत के संविधान एक-दूसरे के समानांतर और स्वतंत्र थे, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि शक्ति का कार्यकारी प्रयोग संवैधानिक शक्ति का स्थान नहीं ले सकता।

केंद्र ने प्रस्तुत किया कि जम्मू-कश्मीर संविधान का अनुच्छेद 147 किसी भी तरह से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत भारत के राष्ट्रपति को प्रदत्त शक्ति को प्रभावित, कमजोर या नियंत्रित नहीं कर सकता है।  समान रूप से, यह भारत के संविधान के तहत अपने कार्यों के निष्पादन में संसद को बाधित नहीं कर सकता है।  यह जोड़ते हुए कि अनुच्छेद 370(1)(डी) और 370(3) सहित भारत के संविधान के प्रावधान जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 147 के अधीन नहीं थे, केंद्र ने एसबीआई बनाम संतोष गुप्ता के फैसले पर भरोसा किया।  , (2017) 2 एससीसी 538। इस मामले में यह माना गया कि जम्मू-कश्मीर का संविधान ''भारत के संविधान के अधीन'' था।

7. संविधान पीठ के समक्ष कार्यवाही के दौरान, पत्रकार प्रेम शंकर झा का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने दो महत्वपूर्ण मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की समन्वित पीठों द्वारा दी गई परस्पर विरोधी राय के कारण मामले को 7-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजने का आग्रह किया: प्रेम  नाथ कौल बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य [1959 एआईआर 749] और संपत प्रकाश बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य [1970 एआईआर 1118]।  वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने भी इस अनुरोध का समर्थन किया.

उनके तर्क का सार, संपत प्रकाश और प्रेम नाथ कौल के पहले के फैसले के बीच विरोधाभास पर केंद्रित था।  चिंता की बात यह थी कि संपत प्रकाश ने वर्ष 1957 के बाद अनुच्छेद 370 के तहत पारित राष्ट्रपति के आदेश को बरकरार रखा, जब जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा पहले ही भंग हो चुकी थी।  दूसरी ओर, प्रेम नाथ कौल ने स्थापित किया था कि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के विघटन के बाद राष्ट्रपति और संसद के पास अनुच्छेद 370 के तहत ऐसे आदेश जारी करने की शक्तियां नहीं हैं।

एडवोकेट द्विवेदी और पारिख ने तर्क दिया कि इस मुद्दे की सुनवाई करने वाली 5 न्यायाधीशों की पीठ भी इस मुकदमे को हल करने में सक्षम नहीं होगी, क्योंकि इसकी संरचना पहले के मामलों की पीठों की तरह ही है। विशेष रूप से, एक बड़ी बेंच के संदर्भ का तत्कालीन अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल सहित अन्य वरिष्ठ वकीलों ने समर्थन नहीं किया था।  .

आख़िरकार, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि याचिकाओं को बड़ी पीठ के पास भेजने की कोई ज़रूरत नहीं है।  यह माना गया कि प्रेम नाथ कौल मामले का संदर्भ अलग था, क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की बैठक से पहले जम्मू-कश्मीर के युवराज द्वारा पारित कानून की वैधता से निपट रहा था।  इसलिए, परिस्थितियों के साथ-साथ उठाए गए मुद्दों में अंतर के कारण, यह नहीं माना जा सकता कि दोनों निर्णयों में कोई विरोधाभास था।

एक बार जब 2 मार्च, 2020 को 7 न्यायाधीशों की पीठ के संदर्भ को अस्वीकार कर दिया गया, तो मामला लंबे समय तक सूचीबद्ध नहीं किया गया था।  अंततः, अप्रैल 2022 को, वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना के समक्ष लंबे समय से लंबित याचिकाओं को सूचीबद्ध करने की तत्काल आवश्यकता का उल्लेख किया।  जबकि सीजेआई रमना ने कहा कि वह मामले की दोबारा सुनवाई के लिए 5-न्यायाधीशों की पीठ का पुनर्गठन करने पर विचार करेंगे, मामला अंततः उनके या उनके पूर्ववर्ती सीजेआई यूयू ललित के कार्यकाल में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया था।  तीन अलग-अलग मौकों पर वर्तमान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के समक्ष मामले का उल्लेख किए जाने के बाद, अंततः इसे 2 अगस्त, 2023 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 


Wednesday, 2 August 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, 'यादों की बारात' का अंश (18) पाकिस्तान उर्दू बोर्ड की नौकरी और वहां भी विवाद / विजय शंकर सिंह

               चित्र: कराची सचिवालय

जब तक जोश साहब, पाकिस्तान में थोड़ा व्यवस्थित होते, तब तक वहां निजाम ही बदल जाता। वैसे भी पाकिस्तान में जो निजाम आता या आनेवाला होता, जोश की उनसे कभी वैचारिक तादात्म्य था भी नहीं। उन्हे बार बार अपने फैसले पर अफसोस होता कि, किस घड़ी में वे नकवी साहब के इसरार पर रीझ कर अपना मलीहाबाद छोड़ कर एक नए परिवेश में आ गए, जहां बस धर्म ही समान था, शेष सब जुदा जुदा। 

इसी बीच पाकिस्तान में सरकार बदल जाती है और सुहरावर्दी वहां के प्रधान मंत्री बन जाते हैं। उनसे जोश साहब का एक संपर्क सूत्र निकलता है और सुहरावर्दी साहब से कुछ काम सधने वाला होता है तब तक, उसी संपर्क सूत्र से सुहरावर्दी नाराज हो जाते हैं। काम फिर पीछे छूट जाता है। लेकिन ऐसे गाढ़े वक्त में काम आती है, सुहरावर्दी साहब की बहन, जो जोश की अच्छी परिचित रहती हैं, और जोश का काम, जो वे देश में उर्दू की तरक्की और सरक्षण के लिए एक बोर्ड बनाना चाहते थे, का काम बढ़ता है। 

पर यह भी इतनी आसानी और जोश के मनमुताबिक नहीं हुई। हर कदम पर जोश को दुश्वारी का सामना करना पड़ा, अपने स्वभाव के विपरीत , समझौते करने पड़े, पर उन्हे कामयाबी मिली और फिर जिंदगी में कुछ बेहतर और ठहराव के पल आए। आगे उन्ही के शब्दों में पढ़े...
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उन्हीं दिनों सुहरावर्दी साहब को प्रधानमंत्री बना दिया गया। मैं इस फिक्र में पड़ गया कि लाइसेंसों के चक्कर से निकलकर मैंने अकादमी ऑफ़ लेटर्स का जो मंसूबा तैयार किया है, उसे सुहरावदी साहब की खिदमत में क्योंकर पेश करूँ। जब मैंने अपने एक दोस्त मन्नान खाँ एडवोकेट से इसके मुतअल्लिक मशविरा किया तो उन्होंने कहा कि मेरे एक बहुत अच्छे दोस्त महमुदुलहक उस्मानी सुहरावर्दी साहब के खासुलख़ास आदमी है, उनसे कहूंगा कि वह आपको सुहरावर्दी साहब से मिला दें। चुनांचे एक रोज़ मन्नान खाँ, उस्मानी साहब को लेकर मेरे घर आ गए और बात तय हो गई। दूसरे ही दिन उस्मानी साहब ने मुझे सुहरावर्दी साहब से मिला दिया। उन्होंने मेरी तजवीज़ को बहुत पसंद किया और वादा फरमाया कि मैं अकादमी कायम करा दूंगा।

लेकिन मेरी बदलती देखिए कि दूसरे ही दिन उस्मानी और सुहरावदी में ऐसा बिगाड़ पैदा हो गया कि उनका आना-जाना बंद, और मैं बे-आसरा होकर रह गया।

इसके बाद ख़ुदा का करना यह हुआ कि बेगम शाइस्ता अकराम कराची आ गई और आफताब अहमद खाँ प्रधानमंत्री के सचिव बल्कि दायें हाथ बन गए। चूंकि ये दोनों मुझे बहुत पहले से जानते थे; इसलिए उन्होंने मेरी बड़ी मदद की।

बेगम साहिबा सुहरावदी की रिश्ते की बहन थी। उन्होंने मेरी कुछ इस तरह बढ़ा-चढ़ाकर तारीफ़ की कि सुहरावर्दी साहब, जो खुद भी एक अदबी आदमी थे, मुझ पर बेहद मेहरबान हो गए और मुझे इजाज़त दे दी कि मैं जब भी चाहूँ बिला रोक-टोक उनके पास आ जाया करूँ।

आफ़ताब अहमद साहब ने भी सुहरावर्दी पर मेरा सिक्का जमाना और मेरा हाथ बँटाना शुरू कर दिया और मेरी तजवीज हरकत में आ गई।

इतफ़ाक़ या मेरी खुशकिस्मती कहिए कि उसी दौरान जुबेरी साहब शिक्षा सचिव बन गए। वह निहायत पढ़े-लिखे और अदब की कदर करने वाले थे, मेरी मदद पर तुल गए अपनी जबरदस्त सिफारिश के साथ उन्होंने मेरी तजवीज़ फाइनेंस (वित्त मंत्रालय) में भेज दी और मुझे मशविरा दिया कि में फिनांस सेक्रेटरी मुमताज़ हसन साहब से मिल लूँ।

मुमताज़ हसन साहब का नाम सुनकर में चकरा गया।

इस चकराने के दो सबब थे। एक यह कि 1942 में दिल्ली के एक मुशायरे में शरीक होने के सिलसिले में हमारे दरमियान एक नाखुशगवार वाकया पेश आ चुका था। इसलिए मैं समझता था कि वह देश के लाभ के किसी भी काम में मेरा साथ नहीं देंगे। दूसरे में सुन चुका था कि मुमताज साहब उस सूबे के जानी दुश्मन हैं, जिसे यू.पी. कहते हैं। लेकिन में उनसे क्योंकर न मिलता। शादी के गुनाह के बाद बाप और नाना बन चुका था, उन सबको पालता क्योंकर? इसलिए अपनी औकात पर लानत भेजता हुआ दफ्तरे माल (वित्त मंत्रालय) पहुँचा। क़दम दो-दो मन के हो गए। ठंडी अंगुलिया से अपना नाम लिखकर पर्चा अंदर भेज दिया।

चपरासी ने आकर कहा कि इस वक्त एक साहब यहाँ बैठे हुए हैं। आप पी. ए. के कमरे में इंतजार करें। दिल ने कहा, और आओ पाकिस्तान। खून के घूँट पिए और पी.ए. के कमरे में जाकर बैठ गया। पी. ए. साहब न तो खड़े हुए, न हाथ मिलाया, मुझे फिरऑन की तरह देखा और काम करने लगे। दिल ने कहा, मुबारक हो खाँ साहब! पाकिस्तान की तरफ़ से यह इज़्ज़त-अफजाई जी चाहा कि कमरे से बाहर निकल जाऊँ। फिर सोचा कि हम तो तारिक की तरह किश्ती जलाकर आए हैं। अब कहां जा सकते हैं?

अभी मुश्किल से छह-सात मिनट इस अजाब में गुजरे थे कि, क्या देखता हूं, खुद मुमताज़ हसन साहब मेरे सामने खड़े माफ़ी मांग रहे हैं। इस गैर मामूली शराफ़त ने मेरे दिल को उनकी तरफ झुका दिया और बदगुमानी के लिए मैं अपने को दिल ही दिल में मलामत करने लगा।

अपने कमरे में ले जाकर उन्होंने मुझसे कहा कि आपकी अकादमी की तजवीज बहुत लम्बी चौड़ी है। अगर आप उसे सिर्फ लुगत (कोश) तक सीमित कर दें तो फाइनेंस उसकी मंजूरी दे देगा। मुझे अपनी इस तजवीज़ के भिंचाब पर अफसोस हुआ; लेकिन में बेचारा कर ही क्या सकता था। नाचार, इसी शक्ल को गनीमत समझा। मैंने उनकी बात मान ली। उर्दू बोर्ड अस्तित्व में आ गया। मेरी कई साल की मेहनत ठिकाने लगी।

बोर्ड बन गया तो अंजुमन तरक्की -ए-उर्दू के सदर मौलवी अब्दुलहक को मेम्बर बनने की दावत दी गई। वह मुझे नापसंद करते थे। इसलिए उन्होंने जवाब दिया कि अगर मुझे लुगत का चीफ एडीटर न बनाया गया तो में मैम्बरी की दावत को ठुकरा दूंगा।

मुमताज़ हसन साहब ने अब्दुलहक साहब की इस जिद पर कुछ मुँह बनाया, लेकिन कुछ सोचकर मंजूर कर लिया। अब क्या था। अब्दुलहक चीफ एडीटर हो गए। अंजुमने तरक्की-ए-उर्दू के दफ्तर में लुगत का काम होने लगा। मैंने दौड़-धूप करके बोर्ड के लिए जो इमारत किराये पर ली थी, वहां चंद क्लर्क रह गए और मैं। मुमताज हसन ने मुझे 'मुशीर अदब का ओहदा दे दिया, सबसे ज्यादा मेरी तनख्वाह मुकर्रर की। लेकिन अब्दुलहक ने कोई सवा या डेढ़ बरस तक मुझसे कोई काम ही नहीं लिया और मैं दफ्तर में बैठा तनख्वाह लेता, मक्खियाँ मारता और यह सोचता कि जिस दफ्तर को मैने कई साल खून पसीना एक करने के बाद कायम कराया था, उसी दफ्तर में में 'तुम किस बाग़ की मूली हो' बनाकर रख दिया गया हूँ। बेकारी और मुफ्त की तनख्वाहदारी से तंग आकर मैंने आखिर मुमताज साहब को लिखा कि मुझसे लुगत-नवीसी का काम लिया जाए। जब उन्होंने मुझे इस काम पर लगा दिया तो मौलवी अब्दुलहक को इस कदर ताव आ गया कि वह एडीटरी और मेम्बरी दोनों से दस्तबरदारी पर आमादा हो गए।

इसके बाद बोर्ड के सेक्रेटरी शानुलहक हक्की का मौलवी अब्दुलहक और शीकत सब्जबारी से सख्त बिगाड़ हो गया और गर्मागर्म ख़तो किताबत का सिलसिला छिड़ गया। मौलवी साहब के इंतकाल के बाद लुगत का काम बोर्ड के दफ्तर में होने लगा और हल्क़ी साहब और सब्ज़वारी साहब में जाहिर तौर पर समझौता हो गया। लेकिन दिलों में नफरत बाकी रही और इंशाअल्लाह ता कयामत रहेगी (इसलिए कि यू. पी. वालों औरbदिल्ली वालों की फितरत ही यहीं है)।

अब वक्री साहब के दिल में मुझसे भी गाठ पड़नी शुरू हो गई। बर्ताव तो हमारे दरमियान अज़ीज़ और बुजुर्ग का ही रहा: लेकिन चूंकि हक्की साहब के अन्दर ये ख़्वाहिश रहती है कि लोग उनके रू-ब-रू झुकते रहे और मैंने उनकी इस ख़्वाहिश को खुराक नहीं पहुंचाई। जब वह ख़्वाहिश मुसलसल भूखी रहने लगी तो वह सोचने लगे कि मुझे किस तरह नुक़सान पहुंचा सकते हैं। आखिरकार अल्लाह ने उन्हें वह मौका दे ही दिया।
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विवाद फिर शुरू हो गया। जोश की खुद्दारी को फिर चुनौती मिली। वे आखिरी बार, भारत अब आते हैं। पर रहने के लिए नहीं, अपना घर, जमीदारी, मलीहाबाद के अपने आम के बागात, लखनऊ की अपनी हवेली और भारत में रह रहे अपने मित्रों से मिलने। यह उनकी आखिरी भारत यात्रा होती है। वे भारत आकर भावुक हो जाते है। उन्हे अपने पाकिस्तान जाकर बसने के फैसले पर कभी कभी कोफ्त भी होती है। वक्त का बदलाव देखिए, कहा भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उनके निजी दोस्त थे, और कहां पाकिस्तान के अफसरों से मिलने के लिए उन्हे, अफसर के पीए की खुशामद करने की जिल्लत सहनी पड़ती है। भारत में आखिरी बार आने पर, उनका हाल आप आगे पढ़ेंगे... 
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh

'जोश मलीहाबादी की आत्मकथा, यादों की बारात का अंश (17) पाकिस्तान में जोश को जो कुछ भी मिला, हांथ नहीं आया...यहां तक कि, शराब भी छिन गई / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/07/17.html



Tuesday, 1 August 2023

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मणिपुर कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त, डीजीपी मणिपुर, शुक्रवार को हाज़िर हों और, जांच के लिए एसआईटी गठित करने का संकेत / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जातीय हिंसा के संबंध में मणिपुर पुलिस द्वारा की गई जांच को "सुस्त" बताया और यहां तक ​​कहा कि "राज्य की कानून-व्यवस्था और मशीनरी पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है"।
अदालत यह जानकर हैरान थी कि घटनाओं के बाद, लगभग तीन महीने तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी और हिंसा पर दर्ज 6000 एफआईआर में से अब तक केवल कुछ ही गिरफ्तारियां हुई हैं। शीर्ष कोर्ट ने मणिपुर के पुलिस महानिदेशक को शुक्रवार दोपहर 2 बजे व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया।

लीगल वेबसाइट, लाइव लॉ के अनुसार, 
"प्रारंभिक आंकड़ों के आधार पर, प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि, जांच में देरी की गई है। घटना का दिन और समय, तथा, एफआईआर दर्ज करने की तारीख और समय, दर्ज एफआईआर पर,cगवाहों के बयान दर्ज करने और यहां तक ​​कि, मुल्जिमों की गिरफ्तारियों के बीच काफी अंतर है और यह एक बड़ी चूक है। इस क्रम में, अदालत को आवश्यक जांच की प्रकृति के सभी आयामों का अध्ययन करने के लिए, हम मणिपुर के डीजीपी को निर्देश देते हैं कि, वह शुक्रवार (04/08/23) दोपहर 2 बजे अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों और अदालत के सवालों का जवाब देने की स्थिति में हों।'' 
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा.

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ, मणिपुर हिंसा से संबंधित कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें यौन हिंसा के पीड़ितों द्वारा दायर याचिकाएं भी शामिल थीं।  हिंसा की प्रणालीगत प्रकृति पर प्रकाश डालने के बाद, कल पीठ ने राज्य से कई प्रश्न पूछे थे।

राज्य की ओर से पेश हुए भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आज पीठ को सूचित किया कि 6532 एफआईआर दर्ज की गई हैं और उनमें से 11, महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित हैं।

सीजेआई ने पूछा कि "इनमें से कितनी 'शून्य', एफआईआर हैं?"  सीजेआई ने उन तारीखों के बारे में भी पूछा जिन पर 'शून्य' एफआईआर को नियमित एफआईआर के रूप में परिवर्तित किया गया था।  एसजी ने, इसपर कहा कि, "वह तत्काल प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि 6532 एफआईआर से संबंधित चार्ट अधिकारियों द्वारा रात भर में तैयार किया गया था और उन्हें दिन के दौरान जानकारी दी गई थी।"

सीजेआई ने यौन हिंसा वीडियो से जुड़े मामले में गिरफ्तारी की तारीख के बारे में भी पूछा   एसजी कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे सके लेकिन, उन्होंने कहा, "ऐसा प्रतीत होता है कि वीडियो सामने आने के बाद इसमें कुछ कार्यवाही की गई है।"

एफआईआर दर्ज करने में काफी देरी;  कानून एवं व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई, राज्य पुलिस ने नियंत्रण खो दिया है।

पीठ ने कहा, "एक बात बहुत स्पष्ट है। एफआईआर दर्ज करने में इतनी अधिक देरी हुई है", सीजेआई ने एसजी द्वारा प्रस्तुत नोट को देखने के बाद कहा।  
सीजेआई ने एक महिला को कार से बाहर खींचने और उसके बेटे की पीट-पीटकर हत्या करने की घटना का जिक्र करते हुए कहा, "4 मई की घटना के संबंध में 7 जुलाई को एफआईआर दर्ज की गई थी। जबकि, यह एक गंभीर घटना थी।"
सीजेआई ने कहा, "ऐसा प्रतीत होता है कि एक या दो मामलों को छोड़कर, अन्य किसी मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।"

सीजेआई ने कहा, "जांच बहुत सुस्त है। दो महीने के बाद एफआईआर दर्ज की गई। गिरफ्तारी नहीं हुई। लंबे समय के बाद बयान दर्ज किए गए।"  एसजी ने कहा कि जमीन पर हालात खराब थे और जैसे ही केंद्र को पता चला, कार्रवाई की गई।
"इससे हमें यह आभास होता है कि मई की शुरुआत से लेकर जुलाई के अंत तक, राज्य में कोई कानून था ही नहीं। मशीनरी पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी कि, आप एफआईआर तक भी दर्ज नहीं कर सके? क्या यह इस तथ्य की ओर इशारा नहीं करता है कि लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है।" सीजेआई ने पूछा।

सीजेआई ने कहा, "राज्य पुलिस, जांच करने में असमर्थ है। उन्होंने नियंत्रण खो दिया है। वहां बिल्कुल भी कानून-व्यवस्था नहीं है।"  
सीजेआई ने कहा, "6000 एफआईआर में आपने 7 गिरफ्तारियां की हैं!"  
एसजी ने स्पष्ट किया कि 7 गिरफ्तारियां वायरल वीडियो घटना के संबंध में की गईं और कुल मिलाकर 250 गिरफ्तारियां की गईं और 12000 गिरफ्तारियां निवारक उपायों के रूप में की गईं।"
एसजी ने कहा, "मी लॉर्ड, आप द्वारा, अदालत में, कहे शब्दों के भी परिणाम हो सकते हैं, इसका उपयोग या दुरुपयोग उन तरीकों से किया जा सकता है जिनका इरादा भी नहीं था।"

सीजेआई ने यह भी पूछा कि क्या महिलाओं को भीड़ के हवाले करने वाले पुलिसकर्मियों से पूछताछ की गई?" "महिलाओं के बयान हैं जो कह रहे हैं कि, पुलिसवालों ने उन्हें भीड़ के हवाले कर दिया। क्या उन पुलिसकर्मियों से पूछताछ की गई है? क्या डीजीपी ने पूछताछ की है? डीजीपी क्या कर रहे हैं? यह उनका कर्तव्य है", सीजेआई ने कहा।

सीजेआई ने कहा, "यह स्पष्ट है कि दो महीनों के लिए, राज्य पुलिस प्रभारी नहीं थी। उन्होंने प्रदर्शनात्मक गिरफ्तारियां की होंगी, लेकिन वे प्रभारी नहीं थे। या तो वे ऐसा करने में असमर्थ थे या इसमें, उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी।"

० एफआईआर को अलग अलग करें

पीठ ने यह भी कहा कि, "सभी एफआईआर को सीबीआई को स्थानांतरित करना असंभव है क्योंकि इससे केंद्रीय एजेंसी टूट जाएगी।"  
एसजी ने कहा कि "फिलहाल मौजूदा प्रस्ताव यौन हिंसा के 11 मामलों को सीबीआई को ट्रांसफर करने का है।"

सीजेआई ने कहा, "इसलिए इन 6500 एफआईआर को विभाजित करने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता है। क्योंकि सभी 6500 का बोझ सीबीआई पर नहीं डाला जा सकता है अन्यथा इसके परिणामस्वरूप सीबीआई का तंत्र भी टूट जाएगा।"

अपराधों की प्रकृति के आधार पर एफआईआर के विभाजन पर पीठ के सवाल के संबंध में, एसजी ने एक्सरसाइज शुरू करने के लिए शुक्रवार तक का समय देने का अनुरोध किया।  पीठ ने राज्य को यह बताने का निर्देश दिया कि, कितनी प्राथमिकी,
० हत्या और बलात्कार,
० आगजनी;  
० गृह संपत्ति का विनाश;  
० शील का अपमान;  
० धार्मिक स्थलों का विनाश;  और 
० गंभीर चोट. आदि से संबंधित है। 

पीठ ने एक विवरण दाखिल करने को कहा, जिसमें कहा गया-
1. घटना की तारीख
2. जीरो एफआईआर दर्ज करने की तारीख
3. नियमित एफआईआर दर्ज करने की तारीख
4. वह तारीख जिस दिन गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं
5. दिनांक जिस दिन 164 के बयान दर्ज किये गये
6. गिरफ़्तारी की तारीख

० कोर्ट ने एसआईटी, समिति गठित करने की अपनी योजना का खुलासा किया

सीजेआई ने संकेत दिया कि न्यायालय उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों की एक समिति गठित करने के बारे में सोच सकता है जो स्थिति, पुनर्वास, घरों की बहाली का समग्र मूल्यांकन करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि बयान दर्ज करने से संबंधित पूर्व-जांच प्रक्रिया उचित तरीके से चले।  

सीजेआई ने संबंधित पक्षों से उस इकाई पर भी राय मांगी जिसे मामलों की जांच सौंपी जानी चाहिए।  उन्होंने कहा कि सभी मामलों को "लॉक, स्टॉक और बैरल" सहित, सीबीआई को स्थानांतरित करना अव्यावहारिक है। साथ ही राज्य पुलिस जांच करने की स्थिति में नहीं है.  इसलिए एक स्वतंत्र संस्था के गठन की जरूरत है।

सीजेआई चंद्रचूड़ ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ितों की पहचान की परवाह किए बिना एक समान दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, "मैं दोहराता हूं, हमारा दृष्टिकोण इस बात की परवाह किए बिना है कि अपराध किसी ने भी किया है। अपराध तो अपराध है, भले ही पीड़ित/अपराधी कोई भी हो।"

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh