Sunday, 21 May 2023

नोटबंदी-2 का निर्णय यह बताता है कि, सरकार ने नोटबंदी-1 की खामियों से, कुछ नहीं सीखा / विजय शंकर सिंह

8 नवंबर 2016 को रात 8 बजे पहली नोटबंदी की गई थी, जब प्रधानमंत्री ने, जनता से रूबरू होते हुए घोषणा की थी कि, रात बारह बजे के बाद, एक हजार और पांच सौ रुपए के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे। यह नोटबंदी, किसकी सलाह पर, किस उद्देश्य से, और क्यों की गई थी, यह रहस्य आज भी बना हुआ है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर हुई, उसकी सुनवाई भी की गई, लेकिन आज तक उक्त नोटबंदी के उद्देश्य जो उस समय सरकार ने घोषित किए थे, उन्हे पा लिया गया या नहीं, यह आजतक सरकार देश को नहीं बता पाई। 

लेकिन, नोटों को बदलवाने के लिए बैंकों के सामने लाइनों में खड़े खड़े लगभग 150 लोग मर गए। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की कमर टूट गई। असंगठित क्षेत्र जो, अधिकतर नकदी लेनदेन पर चलता है, वह लगभग तबाह हो गया। खुदरा व्यापार, जो समाज के निचले स्तर पर जनता के जीवन यापन का मुख्य आधार था, वह भी उजड़ गया। इन खुदरा और परचून व्यापार के तबाह होने की दशा में, उनकी जगह, बड़े कॉर्पोरेट के बड़े बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर खुल गए, जिससे इस असंगठित क्षेत्र में भी, कॉरपोरेट की पैठ शुरू हो गई। इसका सीधा प्रभाव निम्न मध्यम वर्ग के असंगठित व्यापार क्षेत्र पर पड़ा। 

2016 की नोटबंदी के सरकार ने निम्न उद्देश्य गिनाए थे,
० काला धन का खात्मा,
० नकली नोट के चलन को खत्म करना,
० आतंकी फंडिंग को रोकना
० भ्रष्टाचार पर रोक लगाना 
लेकिन आज तक सरकार के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है कि, वह बता सके कि, 
० कितनी धनराशि का कलाधन सामने आ पाया है,
० काले धन का एकत्रीकरण किस क्षेत्र में अधिक है।
० कितने प्रतिशत नकली नोट चलन में पकड़े गए,
० आतंकी फंडिंग रुकने के कारण, क्या आतंकी घटनाओं पर, असर पड़ा या नहीं।

जब इन सारे बिंदुओं पर, जब सरकार कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाई, तब एक नया शिगूफा छोड़ा गया कि, यह कदम डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए लाया गया है और तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली, जिनके बारे में तब अखबारों में भी यह छपा था कि, नोटबंदी के बारे में भी उन्हे अंतिम समय में ही पता चला था, ने कैशलैस आर्थिकी, यानी नकदी विहीन अर्थव्यवस्था की ओर, देश को ले जाने हेतु, यह कदम उठाया गया था। जब कैशलेस का जुमला फेल होने लगा तो इसे लेसकैश कहा जाने लगा। लेकिन, 2016 की नोटबंदी, सरकार का एक सनक भरा निर्णय था, जिसका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला और सरकार ने भी फिर इसे अपनी उपलब्धियों के रूप में कभी कहीं, उल्लेख भी नहीं किया। आज भी सरकार और सत्तारूढ़ दल, इसे उपलब्धि बताने से कतराते हैं। 

2016 की नोटबंदी पर पूर्व प्रधानमंत्री और जाने माने अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह ने इसे एक संगठित लूट कहा था। मोदी सरकार का यह सबसे मूर्खतापूर्ण आर्थिक निर्णय था जिसके कारण देश की जीडीपी विकास दर 2% तत्काल गिर गई और आज, सात साल बाद भी, देश की आर्थिकी, नोटबंदी पूर्व की स्थिति में नहीं आ पाई है। इसका एक कारण, कोरोना महामारी, भी लोग कहते है, लेकिन, महामारी के आगमन के पहले ही देश की जीडीपी 2% तक गिर चुकी थी। 

नोटबंदी- 2 के समय जब हजार और पांच सौ के नोट रद्द हो गए तो सरकार ने ₹2000 के नए नोट जारी किए। जल्दीबाजी में जारी किए गए ये नोट आकार प्रकार में ऐसे नहीं थे, जो तब प्रचलित एटीएम मशीनों की करेंसी ट्रे में फिट हो सकें। फिर इन नोटों को एटीएम मशीनों के लायक बनाने के लिए, देशभर के सभी बैंकों की एटीएम मशीनों को कैलिब्रेट किया गया, क्योंकि नोट तो पहले ही बिना इस बात की पड़ताल किए छापे जा चुके थे कि, यह नोट, एटीएम की करेंसी ट्रे में आ भी पाएंगे कि नहीं। नोट छापने के आंकड़े का अक्सर उल्लेख किया जाता है, लेकिन एटीएम के कैलिब्रेट किए जाने पर, देशभर के बैंकों ने, कितना धन व्यय किया था, इसका आंकड़ा मुझे कहीं नहीं मिलता है। 

अब वही दो हजार के नोट फिर आरबीआई (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) के आदेश से, धारकों से वापस लिए जा रहे है। अब यहां फिर भ्रम की एक स्थिति, आरबीआई के आदेश से उत्पन्न हो गई है, क्योंकि एक तरफ तो आरबीआई का कहना है कि, ₹2000 का नोट लीगल टेंडर बना रहेगा और यह बताते हुए इसमें किसी प्रकार की समय सीमा का उल्लेख नहीं है। हालांकि, यह भी कहा गया है कि, इन नोटों को बदलने की सुविधा 30 सितंबर तक ही खुली है। यानी 30 सितंबर के बाद, इन नोटों की कानूनी स्थिति क्या रहेगी। बैंक तो ₹2000 के नोट लेंगे नही, और जब बैंक यह नोट नहीं लेंगे तो, कोई भी व्यक्ति यह नोट क्यों लेगा ?

क्या ऐसी स्थिति में, 1 अक्तूबर के बाद,  ₹2000 के नोट, लीगल टेंडर के रूप में रहते हुए भी लीगल टेंडर नहीं रह जायेंगे ? ऐसी विषम स्थिति का सामना आम जनता को करना पड़ेगा क्योंकि, कोई भी इसका उपयोग सामान और सेवाएं खरीदने के लिए नहीं कर सकता है ? देश की मुद्रा लेने के लिए, उसे वैध लीगल टेंडर रहते हुए भी, लोग इसे मानने से इंकार कर सकते हैं। देश की मुद्रा, देश में ही, न चले, क्या यह विडंबना नहीं है? अगर इनमें से कुछ भी सच नहीं है, तो समय सीमा तय करने का क्या मतलब है?  

अब ₹2000 के करेंसी नोट का इतिहास भी, संक्षेप में, पढ़ लें, 

 1. ₹2000 के नोट की शुरूआत अपने आप में एक विचार के रूप में आत्म-विरोधाभासी था। जैसा कि ऊपर मैं लिख चुका हूं कि, प्रधान मंत्री ने, 08/011/2016 को, विमुद्रीकरण/नोटबंदी (500 रुपये और 1000 रुपये के उच्च मूल्य के नोटों को अमान्य करना) की घोषणा करके देश को चौंका दिया था। तब यह तर्क दिया गया था कि, इन उच्च मूल्य के नोटों के रूप में, जो काले धन और आतंकवाद के धन का बड़ा हिस्सा जमा है, वह सामने आ जाएगा और काला धन रखने वालों की कमर टूट जायेगी। 

लेकिन, ₹2000 का नोट जारी करना, इस तर्क को स्वतः झुठला देता है।  सच्चाई यह है - और आरबीआई इस बारे में रिकॉर्ड में है - अधिकांश काला धन सोने या संपत्ति जैसी अन्य संपत्तियों में जमा होता है, न कि मुद्रा में। वैसे भी आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 99% तक की मुद्रा, बैंकों में वापस आ गई थी। 

 2. मामला तब और उलझ गया, जब ₹2000 रुपये के नोटों का वितरण गड़बड़ियों से भरा हुआ किया गया।  इन नोटों को पहले आरबीआई अधिनियम की धारा 24 (2) के तहत "अधिसूचित" किया गया था।  लेकिन जल्द ही यह एहसास हो गया कि, यह गलत सेक्शन था। यह आरबीआई अधिनियम की धारा 24(1) है, जिसने केंद्र को घोषणा में आवश्यक संशोधन के लिए बैंक नोट जारी करने का अधिकार दिया गया है। यह नोट अलग आकार के थे और इसलिए मौजूदा एटीएम मशीनों में फिट नहीं हो सकते थे;  इसने सभी एटीएम को फिर से कैलिब्रेट करने के लिए मजबूर किया और "पुनर्मुद्रीकरण"  में और देरी हुई, जबकि पूरा देश, मुद्रा के लिए कतारों में खड़ा था और लोग मरे भी। 

 3. ₹2000 रुपये के नोटों में बहुप्रतीक्षित सुरक्षा अद्यतनों में से कोई भी मानक नहीं था। 26 नवंबर, 2016 की शुरुआत में, ₹2000 के नकली नोटों की खबरें तेजी से अखबारों में आईं थीं। कुछ लड़कों ने मुद्रा सुरक्षा की धज्जियां उड़ाते हुए घर के ही कंप्यूटर और प्रिंटर पर, ₹2000 की नकल बना ली। वे पकड़े भी गए। पुराने करेंसी नोटों की जालसाजी और नकली बनाना, आसान नहीं था, जबकि ₹2000 के नकली नोट, धड़ल्ले से बनए जाने की खबरें अखबारों में आईं थी। 

 4. अंत में, ₹2000 का नोट उन मूलभूत उद्देश्यों में से एक को प्राप्त करने में विफल रहा, जो, एक मुद्रा का उद्देश्य होता है। पैसे को विनिमय का माध्यम होना चाहिए। बाजार में, एक समय, अधिकांश के पास ₹2000 के नोट थे लेकिन कोई भी इसे भुनाकर, चीजों को खरीदने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता था।  विनिमय के माध्यम के रूप में, तब इसका बहुत सीमित उपयोग था। विशेष रूप से उस समय, जब ₹1000 और ₹500 के नोट, रद्द हो चुके थे, डिजिटल भुगतान के एप्प न तो इतने लोकप्रिय थे, और न ही इतने उपलब्ध। साथ ही लोगों का माइंडसेट भी डिजिटल भुगतान की प्रति तब इतना नहीं बन पाया था। ₹100, ₹50, ₹20, ₹10 के नोट कम थे। ऐसा इसलिए हुआ था कि, लगभग 88% मुद्रा जो 1000 और 500 के नोटों में थी, को चार घंटे की नोटिस पर रद्द कर दिया गया था।

आरबीआई ने निर्धारित किया है कि, ₹2000  के नोट का कोई भी एक्सचेंज एक समय में ₹20,000 से अधिक नहीं हो सकता है।  इसका मतलब यह है कि अगर किसी व्यक्ति ने इन नोटों में 2 लाख रुपये की बचत की है - मान लीजिए शादी के आयोजन के लिए - तो उसे वापस पाने के लिए 10 बार लाइन में खड़ा होना होगा (पूरे देश में आरबीआई के 19 क्षेत्रीय कार्यालयों में से एक के बाहर)। चूंकि नोटबंदी को व्यापक रूप से भारतीयों के बीच एक मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा गया था, इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं होगा कि, इसे भी, उसी तर्ज पर, मास्टरस्ट्रोक के एक नए संस्करण के रूप में देखा जाय। 

एक दिलचस्प आंकड़ा यह भी है कि, 8 नवंबर 2016 से 31 दिसंबर 2016 तक आरबीआई ने दो सौ से अधिक दिशा निर्देश जारी किये थे। वर्तमान आरबीआई गवर्नर, तब वित्त सचिव थे और हर रोज शाम को होनी वाली अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में, कोई न कोई नया फरमान सुना जाते थे। सुबह कुछ और शाम को कुछ जारी होने वाले यह आदेश/निर्देश, प्रशासन की अपरिपक्वता और बदहवासी ही बताते हैं। यह एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक था, कि, इसे लागू करने के पहले लगता है कोई होमवर्क किया ही नहीं गया था और रोज, देशभर से अफरातफरी की खबरें आ रही थी। अब नोटबंदी 2 के मामले में भी कुछ ऐसा ही भ्रम दिखाई दे रहा हैं। किसी भी देश की मुद्रा उस देश की अस्मिता से जुड़ी होती है। पर नौ वर्षों के कार्यकाल में, भारतीय मुद्रा के साथ जो तमाशा किया गया है, उसका विपरीत असर देश की अर्थव्यवस्था पर तो पड़ा ही है, मुद्रा को लेकर भी लोगों के मन में संशय उठने लगा है। ऐसा लगता है कि, नोटबंदी-1 के समय हुई प्रशासनिक गलतियों से, न तो आरबीआई ने और न ही सरकार ने कुछ सीखा है।

० विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

Saturday, 20 May 2023

केंद्र ने एक नया अध्यादेश जारी कर दिल्ली के एलजी को, दिल्ली सरकार पर पुनः नियंत्रण के अधिकार दिए / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले कि, "दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पास सार्वजनिक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर), पुलिस और भूमि से संबंधित मामलों को छोड़कर, राष्ट्रीय राजधानी की प्रशासनिक सेवाओं पर विधायी और कार्यकारी शक्तियां रहेंगी" के कुछ ही दिनों बाद, केंद्र सरकार ने एक नया अध्यादेश 'दिल्ली में 'राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण' के संबंध में जारी किया है। इस नए अध्यादेश के अनुसार, प्राधिकरण का नेतृत्व दिल्ली के मुख्यमंत्री करेंगे, तथा इसमें दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और गृह सचिव शामिल होंगे। इस अथॉरिटी को अब दिल्ली सरकार में सेवारत ग्रुप 'ए' अधिकारियों और दानिक्स अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग पर फैसला लेना है।

सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि, अनुच्छेद 239AA के उद्देश्य और मंतव्य को, प्रभावी रूप से लागू करने के लिए एक स्थायी प्राधिकरण का गठन किया जा रहा है और यह प्राधिकरण, स्थानांतरण पोस्टिंग, सतर्कता और अन्य प्रासंगिक विषयों से संबंधित मामलों में उपराज्यपाल (एलजी) को सिफारिशें करने के लिए विचार करेगा। 

अधिसूचना के अनुसार, 
"देश की राजधानी में लिया गया कोई भी निर्णय या कोई भी कार्यक्रम न केवल राष्ट्रीय राजधानी के निवासियों को बल्कि देश के बाकी हिस्सों को भी प्रभावित करता है और साथ ही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, छवि, विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा पर भी असर डालने की क्षमता रखता है। अंतरराष्ट्रीय वैश्विक स्पेक्ट्रम में भी दिल्ली की किसी गतिविधि का असर पड़ सकता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस अध्यादेश के अनुसार, यदि दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच कोई मतभेद उभरता है तो ऐसे मामालों में दिल्ली के एलजी का निर्णय अंतिम होगा।"
आगे लिखा गया है,
"केंद्र सरकार, प्राधिकरण के परामर्श से, प्राधिकरण को, उसके कार्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए आवश्यक अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की प्रकृति और श्रेणियों का निर्धारण करेगी और ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवाये,  प्राधिकरण को, जैसा वह उचित समझेगी, उपलब्ध कराएगी।" 

इस अध्यादेश पारित होने के कुछ ही घंटों के भीतर एक महत्वपूर्ण विवाद खड़ा हो गया है। अध्यादेश के बारे में कानूनी सर्किल में, यह तर्क दिया गया है कि, "अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय की हालिया संविधान न्यायाधीश पीठ के, निर्णय, जिसमे एलजी और सरकार के अधिकार, परिभाषित किए गए हैं, के उद्देश्य और इरादे के विपरीत है। उल्लेखनीय है कि, केंद्र सरकार वाया एलजी और दिल्ली एनसीटी की सरकार के बीच लंबे समय से हो रही रस्साकशी के बाद,  सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का हालिया फैसला जो, दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पक्ष में है, से केंद्र सरकार असहज महसूस कर रही है, और यह अध्यादेश उसी असहजता का परिणाम है। 

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एमआर शाह, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की खंडपीठ ने माना था कि, यदि सेवाओं को जीएनसीटीडी के विधायी और कार्यकारी डोमेन से बाहर रखा गया तो, एनसीटीडी के क्षेत्र में नीतियां बनाने वाले, जो 
मंत्री और कार्यकारी प्रभारी और ऐसे कार्यकारी निर्णयों को लागू करने वाले होंगे, वे, सिविल सेवा अधिकारियों को नियंत्रित नहीं कर पाएंगे। 
फैसले में कहा गया है कि "प्रविष्टि 41 सूची 2 के तहत, उपराज्यपाल, सेवाओं पर, दिल्ली सरकार द्वारा किए गए, जीएनसीटीडी के निर्णयों से बंधे होंगे जैसा कि ऊपर बताया गया है। यह स्पष्ट है कि, प्रासंगिक नियमों में लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि से संबंधित सेवाओं को छोड़कर उपराज्यपाल के किसी भी संदर्भ का अर्थ, उपराज्यपाल होगा।"

हालांकि, यह अध्यादेश, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के बिल्कुल विपरीत बनाया गया  है। जैसे, "किसी भी न्यायालय के किसी निर्णय, आदेश या डिक्री में निहित कुछ भी होने के बावजूद, संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 41 में उल्लिखित किसी भी मामले को छोड़कर, विधान सभा को अनुच्छेद 239एए के अनुसार कानून बनाने की शक्ति होगी।"
लगता था कि एलजी दिल्ली बनाम सीएम दिल्ली के बीच का विवाद अब हल हो गया है, लेकिन इस नए अध्यादेश से, यह विवाद फिर खड़ा हो जायेगा, और यह मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगा। केंद्र सरकार दिल्ली सरकार की कार्यकारी शक्तियों को, बरास्ते एलजी अपने नियंत्रण में रखना चाहती है तो दिल्ली सरकार, जनता द्वारा निर्वाचित होने के कारण, कार्यकारी शक्तियां, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के निर्णय के अनुसार, अपने पास रखना चाहती है। 

दिल्ली में अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर केंद्र सरकार द्वारा अध्यादेश जारी करने के बाद से आम आदमी पार्टी के नेताओं ने विरोध किया है। उन्होंने कहा कि, "यह अघ्यादेश। भारत के संविधान के खिलाफ है। केंद्र के इस रवैये के खिलाफ आम आदमी पार्टी सड़क से लेकर संसद तक अघ्यादेश का विरोध करेगी. उन्होंने कहा कि संसद में जब यह आयेगा तो मुझे उम्मीद है की पूरा विपक्ष इस अघ्यादेश के खिलाफ होगा. इतना ही नहीं, यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा।"

आम आदमी पार्टी के नेताओं संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज आदि ने कहा है कि, "संविधान के बाहर जाकर कोई अघ्यादेश जारी नहीं हो सकता है। भारत के संविधान से बाहर जाकर कोई अघ्यादेश कैसे लाया जा सकता है। यह अध्यादेश नहीं बल्कि जनता द्वारा चुनी सरकार के खिलाफ काला कानून है। इस अध्यादेश के जरिए चुनी हुई सरकार को मारा जा रहा है। यह अध्यादेश, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सीएम अरविंद केजरीवाल अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए मिले अधिकार को छीनने का प्रयास है। 

० विजय शंकर सिंह 

Friday, 19 May 2023

दिल्ली के, एलजी सीएम बीच टकराव का एक कारण, अहम भी है / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल का मामला हल कर दिए जाने के बाद भी उपराज्यपाल द्वारा दिल्ली सरकार की एक सिफारिश को लंबे समय तक लंबित रखे जाने की शिकायत आ रही है और, यह शिकायत, आज फिर से जब सुप्रीम कोर्ट में की गई तो अदालत ने फिर उपराज्यपाल को आड़े हाथों लिया। सुप्रीम कोर्ट ने आज, शुक्रवार को दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति के प्रस्ताव को पांच महीने से अधिक समय तक लंबित रखने के लिए दिल्ली के उपराज्यपाल को जमकर फटकार लगाई। 

दिल्ली सरकार द्वारा, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, न्यायमूर्ति राजीव कुमार श्रीवास्तव को डीईआरसी (दिल्ली विद्युत रेगुलेटरी अथॉरिटी) के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी देने में एलजी की ओर से देरी किए जाने के कारण, दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की।  भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। 

लाइव लॉ के अनुसार पूरा प्रकरण इस प्रकार है। जीएनसीटीडी की ओर से पेश एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड शादान फरासत के निर्देश पर वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ को सूचित किया कि, "एलजी को प्रस्ताव भेजे हुए पांच महीने बीत चुके हैं।  हालांकि, एलजी यह कहकर अपने फैसले में देरी कर रहे थे कि नियुक्ति करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति की आवश्यकता है या नहीं, यह पता लगाने के लिए उन्हें कानूनी राय की आवश्यकता है।"
इस संदर्भ में, सीनियर एडवोकेट, अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि, "विद्युत अधिनियम की धारा 84 (2) के अनुसार, नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति के मूल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श की आवश्यकता थी।"
मुख्य न्यायाधीश ने उसी पर सहमति व्यक्त करते हुए मौखिक टिप्पणी की, "यदि नियुक्त किया जा रहा व्यक्ति मद्रास उच्च न्यायालय का न्यायाधीश था, तो किससे परामर्श किया जाएगा? यह मद्रास उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होगा। यह कोई अन्य उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश क्यों होगा?"

एलजी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, एलजी एंट्री 1, 2 और 18 से संबंधित मामलों (सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस या भूमि) पर स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकते हैं। यह वे विंदु हैं, जिनमे एलजी को अधिकार और शक्तियां हैं। उन्होंने आगे कहा, "अन्य मामलों में, यदि कोई मतभेद है, तो राज्यपाल राष्ट्रपति को संदर्भित कर सकता है। और उस निर्णय के लंबित रहने तक, राज्यपाल अपने दम पर कार्य कर सकता है।"
इस पर CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, "गवर्नर इस तरह एक सरकार का अपमान नहीं कर सकते... असाधारण मामलों में संदर्भित करने की शक्ति का भी प्रयोग किया जाना चाहिए।"

विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 84(2) के प्रावधान को स्पष्टता प्रदान करते हुए, जो राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान करता है, सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने आदेश लिखवाते हुए कहा, "इस प्रावधान का मूल भाग इंगित करता है कि राज्य सरकार किसी भी व्यक्ति को 'जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है और रह चुका है' में से किसी भी व्यक्ति को नियुक्त कर सकती है। हालांकि, नियुक्ति उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जानी है। जहां एक मौजूदा न्यायाधीश  नियुक्त किया जाना है तो, उस मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद, किया जाएगा, जहां से न्यायाधीश लिया जाना है। इसी तरह, जहां तक एक पूर्व न्यायाधीश का प्रश्न है, उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श किया जाएगा जहां न्यायाधीश ने पहले सेवा की थी। इन स्पष्ट प्रावधानों के मद्देनजर, डीईआरसी के अध्यक्ष की नियुक्ति दो सप्ताह में तय की जाएगी।"

विवाद की पृष्ठभूमि इस प्रकार है। डीईआरसी के पूर्व अध्यक्ष, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, न्यायमूर्ति शबिहुल हसनैन ने 09.01.2023 को 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर, स्वतः रिटायर हो गए। याचिका में कहा गया है कि, "इसके परिणामस्वरूप, 04.01.2023 को सेवानिवृत्त मप्र उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति राजीव कुमार श्रीवास्तव को नियुक्त करने का प्रस्ताव दिल्ली के उपराज्यपाल के समक्ष रखा गया था। बताया गया कि तब से उपराज्यपाल ने सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई नहीं की है।  इसके अलावा, डीईआरसी पिछले 5 महीनों से, बिना किसी अध्यक्ष काम कर रहा है।  यह संकेत दिया गया था कि, अधिनियम, 2003 के अनुसार, न्यायमूर्ति श्रीवास्तव की नियुक्ति के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति पहले ही प्राप्त की जा चुकी थी।  ऐसा प्रतीत होता है कि उपराज्यपाल ने प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई करने के बजाय कानून और न्याय मंत्री को पत्र लिखकर 'उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श' वाक्यांश के स्पष्टीकरण की मांग की थी।"

यह याचिका गुजरात राज्य बनाम यूटिलिटी यूज़र्स वेलफेयर एसोसिएशन पर आधारित थी, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक अधिकारी की उपस्थिति या कानून की प्रैक्टिस में पर्याप्त अनुभव रखने वाले और उच्च न्यायालय या जिला न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के योग्य होने की बात कही थी।  निर्णायक कार्य करना अनिवार्य है। उसी के मद्देनजर यह तर्क दिया गया कि चूंकि डीईआरसी में कोई भी न्यायिक सदस्य मौजूद नहीं है, इसलिए उसे किसी भी न्यायिक कार्यों को करने से रोकना पड़ा।

याचिका में कहा गया है कि इन परिस्थितियों में उपराज्यपाल या तो सरकार के प्रस्ताव पर सहमति दे सकते हैं या इसे राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं।  इसने उल्लेख किया, क्योंकि यह मुद्दा सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस या भूमि के आरक्षित विषयों से संबंधित नहीं था, अतः उपराज्यपाल के पास, इस  मामले में, कोई स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति नहीं थी, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के एनसीटी बनाम भारत संघ (2018) के केस में व्यवस्था दी है। डीईआरसी के अध्यक्ष का चयन और नियुक्ति, सरकार की विशेष एक्जीक्यूटिव अधिकारों और शक्तियों के भीतर है।  याचिका में आरोप लगाया गया है कि उपराज्यपाल की ओर से की जा रही निष्क्रियता भी रूल्स ऑफ बिजनेस के नियमों का उल्लंघन थी। जिसके अनुसार, सात कार्य दिवसों की अवधि के भीतर, सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर, एलजी को अपने विचार दर्ज करने का प्राविधान है। मतभेद के मामले में पंद्रह कार्य दिवसों के भीतर मामले को सुलझाने और फिर इसके बाद इसे मंत्रिपरिषद के समक्ष रखा जाना चाहिए।  जिसका निस्तारण/निर्णय दस कार्य दिवसों के भीतर करना है। यदि फिर भी मतभेद बना रहता है तो मामला राष्ट्रपति के पास भेजने का स्पष्ट प्राविधान है। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और डीईआरसी के अध्यक्ष की नियुक्ति की पत्रावली, एलजी के पास छह महीने तक, बिना किसी कार्यवाही के लंबित रही। 

दिल्ली सरकार ने दायर याचिका में कहा है कि, "... अध्यक्ष के बिना कार्य करने के लिए डीईआरसी न केवल दिल्ली की निर्वाचित सरकार के जनादेश को नकारता है, बल्कि प्रशासनिक और नियामक असमंजस की स्थिति भी पैदा होती है, जिसके कारण, डीईआरसी, दिल्ली एनसीटी के अंतर्गत, प्रभावी शासन और प्रशासन के लिए आवश्यक कई महत्वपूर्ण कार्य संपन्न नहीं कर पा रहा है।"

एक बार जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह तय कर दिया गया कि, पब्लिक ऑर्डर, पुलिस और भूमि से जुड़े मामलों को छोड़ कर, दिल्ली एनसीटी से जुड़े शेष अन्य प्रशासकीय मामलों में, दिल्ली की निर्वाचित सरकार का क्षेत्राधिकार रहेगा और  उपराज्यपाल, दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल के फैसले के अनुसार कार्य करेंगे, तब उपराज्यपाल द्वारा बार बार किए जा रहे ऐसे, हठपूर्ण आचरण का कोई औचित्य नहीं है। मिथ्या अहम की इस मानसिकता से सबसे अधिक प्रभाव, दिल्ली एनसीटी के नागरिकों पर पड़ता है। 

० विजय शंकर सिंह 

Thursday, 18 May 2023

नहीं, पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने कांग्रेस को चुनने के लिए कर्नाटक को धन्यवाद नहीं दिया था। यह दुष्प्रचार आईटी सेल द्वारा फैलाया गया है / विजय शंकर सिंह

ऑल्ट न्यूज़ के वंश शाह ने फैलाये गए प्रोपगैंडा कि, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने, कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद, बधाई ट्वीट किया था कि पड़ताल की तो, इस ट्वीट को झूठा पाया। शहबाज शरीफ के नाम से एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रहा है जिसमें,  स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के प्रधान मंत्री द्वारा, कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणामों के दिन, 13 मई को कांग्रेस को चुनने के लिए कर्नाटक के लोगों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए दिखाया गया है।  

कई राइट विंग यूजर्स ने स्क्रीनशॉट शेयर किया और पार्टी का मजाक उड़ाया।  'ट्वीट', जो उर्दू में है, का अंग्रेजी में अनुवाद है, "मैं कांग्रेस को चुनने के लिए कर्नाटक के लोगों को दिल से धन्यवाद देना चाहता हूं।  मुझे उम्मीद है कि कांग्रेस हमारे एसडीपीआई के साथ भारत में इस्लाम को मजबूत करने और कर्नाटक की संप्रभुता के लिए काम करेगी!"

अखबारों मे कॉलम लिखने वाले, राकेश कृष्णन सिम्हा ने इस तस्वीर को कैप्शन के साथ साझा करते हुए लिखा, “इस्लाम = पाकिस्तान = कांग्रेस पार्टी = गांधी राजवंश”।  ट्वीट को बाद में डिलीट कर दिया गया था, लेकिन उसका स्क्रीनशॉट नीचे देखा जा सकता है:

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने इसे एक कैप्शन के साथ साझा किया “क्या यह वास्तविक है?  मुझे यह एक व्हाट्सएप अकाउंट से मिला है ”।
ट्विटर और फेसबुक पर कई अन्य सोशल मीडिया खातों ने स्क्रीनशॉट साझा किया:

ऑल्ट न्यूज़ के व्हाट्सएप हेल्पलाइन नंबर (7600011160) पर भी ट्वीट की सत्यता की पुष्टि करने का अनुरोध किया गया। और तथ्यों की जांच की गई। 
 
ऑल्ट न्यूज़ के अनुसार, 
"ऑल्ट न्यूज ने 13 मई को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के ट्वीट की जांच करने के लिए प्रासंगिक कीवर्ड और समय सीमा का उपयोग करते हुए एक उन्नत ट्विटर खोज की। हमें 13 मई, 2023 को शहबाज शरीफ के तीन ट्वीट मिले। उनमें से कोई भी कर्नाटक चुनाव के बारे में नहीं था।

हमने उनके ट्वीट्स के जवाब भी ढूंढे।  भारत में कांग्रेस की जीत या चुनावों का कोई जिक्र नहीं था।

सोशल ब्लेड और ट्रुथ नेस्ट जैसी सोशल मीडिया मॉनिटरिंग वेबसाइटों को देखते हुए, हम इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि शरीफ ने 13 मई, 2023 को केवल तीन ट्वीट साझा किए थे। इसकी पुष्टि उनके ट्विटर टाइमलाइन पर हमारे निष्कर्षों से हुई थी, जैसा कि ऊपर बताया गया है। 
आगे की जांच में, हमने पाया कि ट्वीट स्क्रीनशॉट को बीएचके ट्वीट्स नाम के एक ट्विटर हैंडल द्वारा 13 मई को शाम 4:01 बजे साझा किया गया था। उपयोगकर्ता का बायो कहता है "थ्रेड्स, मेम्स, कार्टून, व्यंग्य"। स्क्रीनशॉट बाद में दिन में 10 बजकर 18 मिनट पर लिया गया था।

दरअसल, यूजर ने कर्नाटक चुनाव से पहले और बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के ऐसे कई फर्जी ट्वीट शेयर किए।  उसी के स्क्रीनशॉट यहां (लिंक नीचे है, उस पर क्लिक कर के) देखे जा सकते है। 

हमने कर्नाटक चुनावों पर शरीफ की टिप्पणी पर भारतीय और पाकिस्तानी मीडिया आउटलेट्स में रिपोर्ट की तलाश की, लेकिन कुछ भी नहीं मिला।

इसलिए, पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ द्वारा कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत पर कांग्रेस को बधाई देने के बारे में सोशल मीडिया पर जो ट्वीट शेयर किया जा रहा है, वह वास्तव में एक व्यंग्य पेज द्वारा साझा किया गया एक फर्जी ट्वीट है।  ऑल्ट न्यूज़ की जाँच से पुष्टि होती है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने चुनाव परिणामों पर कुछ भी ट्वीट नहीं किया।"

No, Pakistan PM Shehbaz Sharif did not thank Karnataka for electing Congress - https://www.altnews.in/no-pakistan-pm-shehbaz-sharif-did-not-thank-karnataka-for-electing-congress/

(ऑल्टन्यूज AltNews के वंश शाह के लेख और Pratik Sinha की वॉल से साभार)
० विजय शंकर सिंह 

Wednesday, 17 May 2023

आर्यन खान केस और समीर वानखेड़े की याचिका / विजय शंकर सिंह

आर्यन खान मामले में सीबीआई की ओर से दर्ज एफआईआर में नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के पूर्व जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े के खिलाफ, दिल्ली हाईकोर्ट ने, 5 दिनों तक कोई भी एक्शन लेने से, सीबीआई को मना किया है। 

इस याचिका में समीर वानखेड़े और एनसीबी के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई बातचीत (चैट) भी कोर्ट के सामने रखी गई। एबीपी के अनुसार, यह चैट राहत मिलने की बड़ी वजह है। चैट से यह बात भी सामने आई है कि, समीर वानखेड़े, आर्यन खान से जुड़ा हर अपडेट वरिष्ठ अधिकारियों को बता रहे थे। एनसीबी के वरिष्ठ अधिकारी समीर वानखेड़े को मेसेज भेजकर आर्यन खान के ज्यादा दिनों की रिमांड के लिए जोर देने को कह रहे थे।

याचिका में उल्लिखित चैट के मुताबिक, आर्यन खान कॉर्डेलिया क्रूज ड्रग्स केस के दौरान एनसीबी के जोनल डायरेक्टर रहे समीर वानखेड़े जांच और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी हर डिटेल एनसीबी के महानिदेशक (डीजी) सत्यनारायण प्रधान , उपमहानिदेशक (DDG) अशोक मुथा जैन, उपमहानिदेशक (DDG) ज्ञानेश्वर सिंह और अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) संजय सिंह के साथ साझा कर रहे थे।

एबीपी की खबर के अनुसार, डीडीजी अशोक मुथा जैन ने कहा था कि डीजी का आदेश है कि, रिमांड के लिए मजबूती से लड़ा जाए। जैन ने वानखेड़े से इस मामले में अतिरिक्त सहायता के लिए इंदौर, अहमदाबाद से अधिकारी और स्टाफ की भी पेशकश की थी जिस पर समीर वानखेड़े ने हां कहा था। इसके बाद डीडीजी ने अतिरिक्त स्टाफ भेजने की बात कही। अब डीजी एनसीबी ने एक ऐसे मामले में, जिसमे बिना बरामदगी के, एनडीपीएस एक्ट का केस दर्ज है में, रिमांड पर लेने के लिए ऐसा क्यों कह रहे हैं, जैसे अनेक सवाल आगे उठेंगे। अभी तो सीबीआई की जांच शुरू हुई है, अभी कोई अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।

मुझे लगता है, समीर वानखेड़े, अदालत को अब यह समझा रहे हैं कि, आर्यन खान केस में जो कुछ भी हुआ था, वह अकेले उनके स्तर पर नहीं हुआ था। एनसीबी NCB मुख्यालय और वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा जैसा निर्देश मिल रहा था, वैसा ही वे कर रहे थे। रिमांड लेना या न लेना, जमानत का विरोध करना या न करना, यह जांचकर्ता का दायित्व है। महत्वपूर्ण मामलों में मुख्यालय से निर्देश मिलना भी कोई अनोखी बात नहीं है। महत्वपूर्ण मामलों में निर्देश मिलते भी रहते हैं। 

लेकिन समीर वानखेड़े का यह भी दायित्व था कि वे जमीनी स्थिति से अपने वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराते रहें। अब यह पता नही है कि केवल चैट ही के द्वारा मुख्यालय से उन्हे आदेश निर्देश मिलते रहे हैं, और समीर भी जमीनी हकीकत से अपने वरिष्ठों को अवगत कराते रहे हैं, या कोई अन्य विभागीय पत्र व्यवहार भी हुआ है। 

आर्यन खान के पास से कोई ड्रग बरामद नहीं हुआ था। फिर भी लंबी अवधि तक, उन्हे रिमांड पर रखा गया और जमानत का विरोध किया गया। यह भी अखबारों से पता चलता है कि, उन्हे छोड़ने और मामला रफा दफा करने के लिए, ₹25 करोड़ की रिश्वत, शाहरुख खान से, समीर वानखेड़े के नाम पर मांगी गई। इतनी बड़ी रकम, बिना समीर वानखेड़े की मर्जी से नहीं मांगी गई होगी। अब जब जांच पूरी हो तो पता चले। यह भी खबर है कि, ₹50 लाख की रकम एडवांस में ली भी गई। क्या इन सबका भी कोई उल्लेख चैट में होगा? मुझे नहीं लगता, इसका कोई उल्लेख चैट में होगा।  

यह मामला शुरू से ही संदिग्ध और एक्सटोर्शन का लग रहा था। न तो ड्रग की बरामदगी, न करनेलिया शिप से गिरफ्तारी, छोड़ने के लिए रिश्वत की मांग करना, रिमांड की अवधि में, इंटेरोगेशन के समय की फोटो सार्वजनिक रूप से मीडिया/सोशल मीडिया पर वायरल कराया जाना, यह सब कुछ ऐसी असामान्य गतिविधियां हैं,  जो समीर वानखेड़े द्वारा की गई कार्यवाहियों को संदेहास्पद बनाती हैं। 

० विजय शंकर सिंह 

मणिपुर की भयावह स्थिति / विजय शंकर सिंह

मणिपुर के रहने वाले, वैपेई, मध्यप्रदेश कैडर के आईपीएस अफसर हैं। अब वे सेवानृवित्त हैं तथा अपने परिवार सहित, इंफाल में रहते हैं। इसी 3 मई को, वह अपने 3 बच्चों और पत्नी के साथ, रात में 0130 बजे अपनी जान बचाने के लिए घर से भागे। वे अपनी खुद की चारदीवारी से कूद गए और एक पड़ोसी के घर के पीछे की दलदली जमीन में मय बाल बच्चों के छिपे रहे। इस उम्मीद में वे रात भर वहीं पड़े रहे कि कोई उन्हें नहीं मारेगा। 

लेकिन भोर होते ही, फिर हिंसा शुरू हो गई। किसी तरह से, वे पास ही स्थित एक सीआरपीएफ शिविर में पहुंचे और अपना परिचय दिया। उन्हें वहां शरण मिली। उनके पास न तो पैसे थे, न, कुछ अतिरिक्त कपड़े और न ही कुछ और जरूरी चीजें। दिन में, उन्हें खबर मिली, कि, उनका नवनिर्मित घर जला कर राख कर दिया गया। उनके घर का सारा सामान लूट लिया गया। उन्होंने अपने चचेरे भाई, पॉल, जो खुद 1991 बैच के आईएएस हैं से, एक जोड़ी जींस और जूते उधार लिए। अब वह शिलांग में एक शरणार्थी है।  

के.टी. वैपेई 1991 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं, जो 28 फरवरी, 2023 को सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने अंतर-राज्य प्रतिनियुक्ति पर मणिपुर में भी काम किया था। वह मणिपुर के मूल निवासी हैं और कुकी जनजाति से है। यह घटना एक वरिष्ठ पुलिस अफसर के परिवार के साथ घटी है, जिसके परिवार में अन्य लोग भी अखिल भारतीय सेवाओं में हैं। आम नागरिक, जिनका कोई पुरसा हाल नहीं है, उन पर क्या बीत रही होगी, यह हम आप, सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं। 

देश के अन्य हिस्सों में जमीनी हालात से अनभिज्ञ लोग इस सच्चाई पर विश्वास नहीं कर सकते हैं, कि मणिपुर में लगी यह आग, कितनी भयावह है। मणिपुर में आज जो, जनजातिगत संघर्ष छिड़ा है, वह विभाजनकारी ताकतों की राजनीति का परिणाम है। वहां स्थिति अब भी नाजुक है। आदिवासी और गैर आदिवासी समुदाय के बीच लगातार हिंसक संघर्ष जारी है। अखबार बता रहे हैं, गृहमंत्री ने वहां के मुख्यमंत्री को हड़काया है। सीआरपीएफ, वहां की स्थिति सुधारने के लिए जरूरी कार्यवाही कर भी रही है। पर समाज या समुदाय में विभाजनकारी वायरस इंजेक्ट कर के, शांति और सद्भावना की उम्मीद आप नहीं कर सकते है। 

० विजय शंकर सिंह 

Tuesday, 16 May 2023

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में आचार संहिता के उल्लंघन पर, निर्वाचन आयोग की निंदनीय चुप्पी / विजय शंकर सिंह

चुनाव, लोकतंत्र की धुरी है। यही वह महापर्व है, जो जनता को, अपने सरकार होने का भान कराता है। चुनाव, बिना किसी दबाव, लोभ, और भय के हो, इसके लिए केंद्रीय निर्वाचन आयोग का गठन किया गया है। संविधान, अनुच्छेद 324 में, निर्वाचन आयोग को, देश में, निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए शक्तियां और अधिकार देता हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त  का पद एक संवैधानिक पद माना जाता है। सीईसी को, उसके पद से, बिना संसद में महाभियोग लाए हटाया नहीं जा सकता है। यह विशेषाधिकार, इस पद से इसलिए जुड़ा है कि, सीईसी और उनके अन्य निर्वाचन आयुक्त, निर्भय होकर, बिना किसी लोभ और दबाव के अपने दायित्व का निर्वहन करें। 

संविधान में, सीईसी की नियुक्ति की कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई है, बल्कि यह अंकित है कि, सीईसी और अन्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। लेकिन राष्ट्रपति यह नियुक्ति स्वतः नहीं कर सकता है, वह यह नियुक्ति, केंद्र सरकार की सिफारिश पर ही कर सकता है। सरकार ही एक तरह से, इनकी नियुक्ति कर सकती है, पर सरकार, हटा नहीं सकती है। लेकिन इस नियुक्ति प्रक्रिया पर हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने, एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए, नियुक्ति प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया है। इस संशोधन के अनुसार, सरकार खुद ही सीईसी या ईसी का चयन नहीं करेगी, बल्कि यह चयन, एक पैनल द्वारा किया जाएगा, जिसके प्रधानमंत्री अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और नेता विरोधी दल अथवा लोकसभा में सबसे बड़े विरोधी दल के नेता सदस्य होंगे। इस पैनल द्वारा चुने गए नाम की ही सिफारिश राष्ट्रपति के पास भेजी जाएगी, जिसे राष्ट्रपति, स्वीकार कर, मुख्य निर्वाचन आयुक्त या अन्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त करेंगे। 

चुनाव को निष्पक्षता पूर्वक संपन्न कराने के लिए, किसी भी राज्य में चुनाव से पहले एक अधिसूचना जारी की जाती है। इसके बाद उस राज्य में ‘आदर्श आचार संहिता’ लागू हो जाती है और नतीजे आने तक जारी रहती है। आदर्श आचार संहिता, दरअसल ये वे दिशा-निर्देश हैं, जिन्हें सभी राजनीतिक पार्टियों को मानना पड़ता है और इनका मकसद चुनाव प्रचार अभियान को निष्पक्ष एवं साफ-सुथरा बनाना तथा सत्तारूढ़  दलों को, सत्ता का गलत लाभ उठाने और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से रोकना भी है। आदर्श आचार संहिता को राजनीतिक दलों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिये आचरण एवं व्यवहार का पैरामीटर माना जाता है।

लेकिन, आदर्श आचार संहिता, किसी संवैधानिक प्राविधान या किसी अन्य कानून के अंतर्गत नहीं बनी है बल्कि, यह सभी राजनीतिक दलों की सहमति से बनी और धीरे धीरे, समय तथा समस्याओं के बरअक्स विकसित हुई है।
० सबसे पहले 1960 में केरल विधानसभा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता को, चुनाव के दौरान, क्या करें और क्या न करें, के रूप में, लागू किया गया था। 
० 1962 के लोकसभा चुनाव में पहली बार चुनाव आयोग ने, एक आदर्श आचार संहिता का ड्राफ्ट तैयार कर,  सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में वितरित किया, तथा उनकी राय ली। फिर उसे उक्त चुनाव के समय, देशभर में लागू किया गया। 
० इसके बाद 1967 के लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में पहली बार राज्य सरकारों से आग्रह किया गया कि वे राजनीतिक दलों से, आदर्श आचार संहिता का अनुपालन करने को कहें और कमोबेश ऐसा हुआ भी। इसके बाद से लगभग सभी चुनावों में आदर्श आचार संहिता का पालन कमोबेश होता आ रहा है।

भारत में होने वाले चुनावों में अपनी बात वोटर्स तक पहुँचाने के लिये चुनाव सभाओं, जुलूसों, भाषणों, नारेबाजी और पोस्टरों आदि का इस्तेमाल किया जाता है। वर्तमान में प्रचलित आदर्श आचार संहिता में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के सामान्य आचरण के लिये दिशा-निर्देश दिये गए हैं। सबसे पहले तो 
० आदर्श आचार संहिता लागू होते ही राज्य सरकारों और प्रशासन पर कई तरह के अंकुश लग जाते हैं।
० सरकारी कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक निर्वाचन आयोग के तहत आ जाते हैं।
० सरकारी मशीनरी और सुविधाओं का उपयोग चुनाव के लिये न करने और मंत्रियों तथा अन्य अधिकारियों द्वारा अनुदानों, नई योजनाओं आदि का ऐलान करने की मनाही है।
चुनाव आयोग को यह अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के एस.आर. बोम्मई मामले में दिये गए ऐतिहासिक फैसले से मिला है। 1994 में आए इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि कामचलाऊ सरकार को केवल रोज़ाना का काम करना चाहिये और कोई भी बड़ा नीतिगत निर्णय लेने से बचना चाहिये।
० मंत्रियों तथा सरकारी पदों पर तैनात लोगों को सरकारी दौरे में चुनाव प्रचार करने की इजाजत भी नहीं होती।
० सरकारी पैसे का इस्तेमाल कर विज्ञापन जारी नहीं किये जा सकते हैं। इनके अलावा चुनाव प्रचार के दौरान किसी के निजी जीवन का ज़िक्र करने और सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने वाली कोई अपील करने पर भी पाबंदी लगाई गई है।
० यदि कोई सरकारी अधिकारी या पुलिस अधिकारी किसी राजनीतिक दल का पक्ष लेता है तो चुनाव आयोग को उसके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है। 
० चुनाव सभाओं में अनुशासन और शिष्टाचार कायम रखने तथा जुलूस निकालने के लिये भी गाइडलाइंस बनाई गई हैं।
० किसी उम्मीदवार या पार्टी को जुलूस निकालने या रैली और बैठक करने के लिये चुनाव आयोग से अनुमति लेनी पड़ती है और इसकी जानकारी निकटतम थाने में देनी होती है।
० हैलीपैड, मीटिंग ग्राउंड, सरकारी बंगले, सरकारी गेस्ट हाउस जैसी सार्वजनिक जगहों पर कुछ उम्मीदवारों का कब्ज़ा नहीं होना चाहिये। इन्हें सभी उम्मीदवारों को समान रूप से मुहैया कराना चाहिये।

इन सारी कवायदों का मकसद सत्ता के गलत इस्तेमाल पर रोक लगाकर सभी उम्मीदवारों को बराबरी का मौका देना है। सर्वोच्च न्यायालय इस बाबत 2001 में दिये गए अपने एक फैसले में कह चुका है कि चुनाव आयोग का नोटिफिकेशन जारी होने की तारीख से आदर्श आचार संहिता को लागू माना जाएगा। इस फैसले के बाद आदर्श आचार संहिता के लागू होने की तारीख से जुड़ा विवाद हमेशा के लिये समाप्त हो गया। अब चुनाव अधिसूचना जारी होने के तुरंत बाद जहाँ चुनाव होने हैं, वहाँ आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है।
यह सभी उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों तथा संबंधित राज्य सरकारों पर तो लागू होती ही है, साथ ही संबंधित राज्य के लिये केंद्र सरकार पर भी लागू होती है।

आदर्श आचार संहिता को और यूज़र-फ्रेंडली बनाने के लिये कुछ समय पहले चुनाव आयोग ने ‘cVIGIL’ एप लॉन्च किया। तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिज़ोरम और राजस्थान के पिछले विधानसभा चुनावों में इसका इस्तेमाल हुआ भी था । cVIGIL के ज़रिये चुनाव वाले राज्यों में कोई भी व्यक्ति आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की रिपोर्ट, आयोग को कर सकता है। इसके लिये उल्लंघन के दृश्य वाली केवल एक फोटो या अधिकतम दो मिनट की अवधि का वीडियो रिकॉर्ड करके अपलोड करना होता है। उल्लंघन कहाँ हुआ है, इसकी जानकारी GPS के ज़रिये स्वतः, संबंधित अधिकारियों को मिल जाती है। शिकायतकर्त्ता की पहचान गोपनीय रखते हुए रिपोर्ट के लिये यूनीक आईडी दी जाती है। यदि शिकायत, सही पाई जाती है तो एक निश्चित समय के भीतर कार्रवाई की जाती है। अब मुझे यह नहीं पता कि, कर्नाटक के इस चुनाव में, इस एप्प का प्रयोग हुआ था नहीं।

अब बात करते हैं, कर्नाटक विधानसभा चुनाव की। पहले आदर्श चुनाव संहिता का यह आदर्श वाक्य पढ़ लें..
"राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के द्वारा जाति, धर्म व क्षेत्र से संबंधित मुद्दे न उठाना।"

सेक्युलरिज्म, देश के संविधान की प्रस्तावना में लिखा केवल एक शब्द ही नहीं, बल्कि सेक्युलरिज्म, संविधान के मूल ढांचे, बेसिक स्टक्चर का एक मजबूत अंग है। प्रस्तावना एक औपचारिकता है और इस औपचारिकता में, जिस साल सेक्युलर शब्द जोड़ा गया था, उसके पहले संविधान अपने लागू होने की तिथि से ही सर्वधर्म समभाव पर आधारित है। लेकिन पिछले दस सालों में, इस शब्द और भावना को एक अपशब्द में बदलने का षडयंत्र, आरएसएस और बीजेपी द्वारा किया गया। और यह षडयंत्र, बीजेपी आईटी सेल द्वारा रोज गढ़े गए दुष्प्रचार भरे, व्हाट्सएप संदेश, अफीम के डोज की तरह, जनता के दिल दिमाग में, उतारे गए। यह सिलसिला अब भी जारी है, हालांकि अब इसका असर कम हो रहा है। इसीलिए जानबूझकर, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए, हर चुनाव में धर्म से जुड़े मुद्दे, धार्मिक प्रतीक और हिंदू देवी देवताओं को घसीटने का शर्मनाक प्रयास किया जाता रहा है। 

जैसे ही बजरंग बली की इंट्री कर्नाटक चुनाव में हुई, उनकी बांछे खिल गई। अधिकांश भारतीय जनता की मानसिकता आज भी सांप्रदायिक नहीं है। वह साफ सुथरा शासन चाहती है और रोजी, रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य की अपेक्षा अपनी सरकारों से करती है। राजनीतिक दल, चूंकि इन मूल समस्याओं को हल करने में, अक्सर खुद को अयोग्य पाते हैं, इसलिए वे जानबूझकर, धर्मांधता के मुद्दे को चुनावों के केंद्र में ले आते हैं और लोगों को वहीं ले भी आते हैं। धर्म की स्थापना करना, सरकारो का काम नहीं है। सरकार का काम, एक साफ सुथरी प्रशासनिक व्यवस्था और जनता के मूल मुद्दों को हल करना है। संविधान ने सभी धर्मों को एक ही पटल पर रखा है। हर नागरिक अपनी आस्था के अनुसार उपासना पद्धति अपनाने के लिए स्वतंत्र है।

आज जब कर्नाटक में बीजेपी ने शीर्ष नेता चुनाव प्रचार में उतरे थे तो उन्होंने न तो वहां व्याप्त भ्रष्टाचार की बात की, और न ही महंगाई की, न ही बेरोजगारी की और न ही शिक्षा स्वास्थ्य की। बात की, कि, बजरंगबली के नाम पर वोट दीजिए। लफंगों और गुंडों के गिरोह के रूप में, बदनाम हो चुके बजरंग दल को, बजरंग बली के रूप में चित्रित करना, कौन सी धार्मिकता है? यह तो हनुमानजी का अपमान करना हुआ। निश्चित रूप से, वे हनुमानजी के कथित अपमान से आहत नहीं थे, उनका उद्देश्य बजरंग बली के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर के वोट झटकना था। 

यही यह सवाल उठता है कि, निर्वाचन आयोग ने, प्रधान मंत्री द्वारा जनसभाओं में, बजरंग बली के नाम पर वोट मांगने पर, प्रधान मंत्री को कोई नोटिस जारी की? खुले आम धर्म के नाम पर वोट मांगना न केवल आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन है बल्कि यह संविधान की अवहेलना है। अपनी आदर्श चुनाव संहिता का पालन आदर्श रूप से, हो,  यह दायित्व चुनाव आयोग का है। यदि आयोग कहे कि उसके पास इस बारे में कोई शिकायत नहीं पहुंची तो यह एक बचकाना बचाव होगा। चुनाव के समय सारा प्रशासनिक अमला, निर्वाचन आयोग के आधीन रहता है। अगर इस तंत्र के बावजूद, आयोग को आदर्श चुनाव संहिता के इस गंभीर उल्लंघन की खबर नहीं लगी तो, क्या कहा जाय। आयोग को इस आरोप पर नोटिस भी जारी करनी चाहिए थी, और बीजेपी के खिलाफ कार्यवाही भी करनी चाहिए थी। 

यदि आयोग, अपनी ही आचार संहिता की धज्जियां उड़ते, देख कर भी चुप है, कोई कार्यवाही नहीं कर रहा है, आयोग के अधिकारियों में यह साहस ही नहीं है कि, वे प्रधानमंत्री द्वारा किए गए, आदर्श आचार संहिता का इस घोर उल्लंघन पर उन्हे नोटिस भेजे या अग्रिम कार्यवाही करें तो, यह आयोग की क्लीवता है। आयोग अपनी संस्था के, उद्देश्य, औचित्य और साख को खो रहा है। लगता है, आयोग, एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के बजाय, सरकार का एक विभाग बन कर रह गया है। सीईसी की नियुक्ति को लेकर भी सरकार पर सवाल उठे हैं। यह मामला भी अभी अदालत में है। सीईसी को खुद ही अपने विभाग की साख को बनाए रखने के लिए पक्षपात रहित कार्यवाही करनी चाहिए, विशेषकर उन परिस्थितियों में, जब निर्वाचन आयोग विवादो के घेरे में है। निकट भविष्य में अन्य कुछ राज्यों में भी विधानसभा के चुनाव इसी साल होने हैं, ऐसी स्थिति में सीईसी का दायित्व है कि वे न केवल पूरी निष्पक्षता से चुनाव संचालित कराएं, बल्कि यह निष्पक्षता दिखे भी। 

० विजय शंकर सिंह)