Monday, 7 December 2020

शब्दवेध (32) बात आँखों पर आ गई अब तो

सच कहें तो हम आंखों पर बात नहीं करना चाहते। जो लोग आंखें चुराते रहे हैं, वे इसे पसंद नहीं करेंगे। हम किसी को नाराज नहीं करना चाहते।  चाहते हैं वे भी अपनी झेंप मिटाकर,आमने सामने होकर  कुछ कह और कुछ सुन सकें,  समझना बाद की बात।  रोशनी की बात करना चाहते हैं। और न चाहते हुए  पानी की बात करना चाहते हैं जो आंखों में भर जाता है तो कुछ दिखाई नहीं देता,  और जो मर जाए तो हम कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह जाते।

आँख अकेली ऐसी चीज है जिसका आना भी बुरा है, जाना भी। उठना भी बुरा है, और बैठना भी. लगना बुरा है और बदलना भी, दिखाना बुरा है और बचाना भी, तानना भी और झुकाना भी,  सूखना भी बुरा है और तर होना, भर जाना, उमड़ना भी, तानना भी और झुकाना भी,  और जो लोग आँख मिलाने को इसका विकल्प मानते हैं वे जानते ही नहीं कि उसके बाद क्या होता है। न चैन से रहती है न रहने देती हैं, पलकों से ढक दो तो सपने देखने लगती हैं। 

आपको  पता होगा  कि  तमिऴ  में आंख को कण् कहते हैं।  कन्नम् का अर्थ ‘गाल’ होता है। प्रयोग अटपटा  तो है ही गंड - कनकटी के लिए सं. शब्द जिसकी  चर्चा मतवाले मकुना (> मुकुंद) की चढ़ती जवानी और बहते मद के संदर्भ में ही आती है, और इसे गालों के लिए चुन लिया गया। बड़ा विचित्र लुकाछिपी है हमारी भाषाओं के बीच एक का कान दूसरे का गाल हो जाता है, कान के लिए  त. कादु से काम चलाया जाता है, ऊँचा सुनने को ‘कादुमंदम्’ कहते हैं। हिन्दी में मुँह बाना - कुछ पाने की आतुरता के लिए अवज्ञापूर्ण  प्रयोग है। बाना का शाब्दिक अर्थ है खोलना, परन्तु इसका प्रयोग केवल मुँह के संदर्भ में होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जानते हैं क्यों? तमिल में मुख के लिए ‘वाय’ प्रचलित है और यह प्रयोग उसी प्रभाव का परिणाम है।  

माना यह जाता है कि  कान  संस्कृत के कर्ण का तद्भव है। पूरबी में न ‘ण’ था, न असवर्ण संयोग, क्या कुरुक्षेत्र में पहुँचने से पहले कान भी नहीं थे, या कान पकड़ने के लिए थे, नाम उचारने के लिए नहीं।  लगता तो उल्टा है, कर्ण कान का संस्कृतीकरण हो और संभव है  बोलचाल में इसका रूप ‘कन्न’ भी चलता रही हो। भो. का अकनना - मंद ध्वनि या नाद को बहुत ध्यान से कान और अनुमान दोनों के सहारे सुनना इसी की देन है। सं. में आकर्णन गढ़ लीजिए पर बात बनेगी नहीं। भो. में बरसात में पेड़ की डाल पर उगे फफूँद के सूखे चट्टे का कनचट कहते हैं।  

यहाँ तक तो ठीक है पर आदमी एक आँख से विकलांग हो तो उसे काना क्याें कहते हैं, समस्या वहाँ खड़ी होती है कि सायणाचार्य जिनका संपादकमंडल दाक्षिणात्य था उन्होंने भी कण्व का एक स्थल पर काणा अर्थ किया जब कि होना विचक्षण चाहिए।  

काल्डवेल ने संस्कृत से पृथकता दिखाने के लिए तमिल और संस्कृत के कुछ शब्दों की तालिका दी है. उसमें त. कण् है तो सं. का अक्षि। 

आंख को  संस्कृत के जानने वाले अक्षि  का तद्भव  मानेंगे।  इसी का हड़पपाकालीन बोलचाल की भाषा में अधिक व्यवहार होता था, क्योंकि इसी का प्रसार भारोपीय भूभाग में हुआ या अधिक हुआ। 

फारसी में यह अक्स - प्रतिबिंब, छाया, प्रतिरूप हो गया और संभवतः इसी के प्रभाव से नख-शिख ने नक्श का रूप लिया जो इसके अर्थ ‘रूपाकार’, ‘बनावट’ और चित्राकृति का सूचक बना और जिससे ‘नक्शा’- मानचित्र के लिए शब्द मिला है। फारसी से ही हमें पता चलता है कि अक्षि का एक प्रतिरूप 'चक्षु' भी प्रचलन में था, जिसका सजात फारसी का ‘चश्म’ है।  

जो शुद्धतावादी लोग लोकप्रिय फारसी शब्दों तक के अटपटे सं. रूप गढ़ कर अपना काम भी मुश्किल बनाते हैं और भाषा की संचार क्षमता को भी पंगु बनाते हैं, वे यदि समझ सकें कि फारसी शब्द संस्कृत शब्दों के अपभ्रंश हैं और जिस सहज भाव से हम अपनी बोलियों में उनकी ध्वनि व्यवस्था में अनुकूलित शब्दों का प्रयोग करते हैं उसी तरह उनका भी किया जाना चाहिए, तो हिंदी की अक्कड-बक्कड़ तनावग्रस्तता को कम करके इसे अधिक प्रवाही भाषा बनाया जा सकता है। यह समझ नई भी नहीं है।  विलियम जोन्स ने ही इस तथ्य को कुछ जोखम उठाते हुए भी स्वीकार कर लिया था।   

परंतु हमारी व्याख्या में अर्थ का पक्ष गौण महत्व रखता है, और उसे वह अर्थ और रूप किस नाद के अनुकरण के फल-स्वरूप मिला है और वह किस उपादान या स्रोत से मिला है, यह अधिक प्रधान है। क्रिया का निर्धारण हम अधिकांश मामलों में नहीं कर सकते या अर्थ की सहायता से ही कर सकते हैं, क्योंकि उसकी यात्रा कठिन होगी पर हर मामले में लोगों के संपर्क और प्रचलन के रूप का पता नहीं चल सकता।   हमारी सामान्य स्थापना (1. ऐसी सभी वस्तुओं का नामकरण जिनसे स्वतः कोई ध्वनि नहीं पैदा होती उनका नामकरण अपने से किसी रूप में संबंधित ऐसी वस्तु से मिला है जिससे नाद पैदा होता है, और  इसी के अनुसार;  2.  सभी पादपों और ओषधियों का नामकरण जल और उसकी ध्वनि पर आधारित है) हमारे लिए अधिक उपयोगी है।  अब हम कुछ ऐसे नाम ले सकते हैं जो अर्थ निर्धारण में सहायक हों : अकवन/ आक - मदार का पौधा जिससे दूधिया रस निकलता है,; अकरा, अकरी- काफी छेटे दाने की मटर, अकोल/ अकोल्ह- एक जंगली पेड; पानी के आशय मे अक्-षर (अक्षर - जल ‘तेन क्षरति अक्षरम्) और अं. का एकुआ/ ला. (aqua - पानी)। यह रहा अक्षि का अनुनादी स्रोत जिससे जुड़ा है आर्थी आधार। 

जल के अनेक गुणों में एक है इसका मुकुर पक्ष। दर्पण के आविष्कार का प्रेरक और प्रकृति का दर्पण स्थिर निस्तरंग जल है यद्यपि तरंगित जल में भी बिगड़े शीशे जैसा प्रतिबिंब तो दिखाई देता ही है।  इस चमक के कारण ही एक ओर तो आग के लिए प्रायः वे ही शब्द  प्रयोग में आते दिखाई देते हैं जिनका अर्थ जल है (जल>ज्वाला;  जर - ज्वर); दूसरे यह कल्पना की गई कि आग जल का नाती है - अपां नपात - जल का पुत्र बादल और बादल की संतान आग जो बादलों की कौंध में दिखाई देता है और बिजली गिरने के साथ इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी हो ही जाता है; तीसरे आदिम चरण पर यह कल्पना की गई कि सूर्य रात को जल में सो जाता है, इसीलिए प्रातःकाल में उसमें गर्मी नहीं होती,  अग्नि का निवास जल है इसलिए अँधेरे में भी जल चमकता है। इस चमक और प्रकाश के गुण के कारण जल के किसी पर्याय से आँख के लिए शब्द निकलना सर्वथा स्वाभाविक था।

अब रहा इसका रूपगत आधार । यह एक छिद्र मे रूप में माना गया जिससे प्रकाश का भीतर प्रवेश होता है इसलिए जिसमें  भी छिद्राकृति हो उस तक इसका अर्थविस्तार हुआ -  आखा -  छानने का उपकरण जिसमें छेद बने होते है;  गवाक्ष बाहर देखने के लिए गोलाकार खिड़की;  जिसकी बनावट आँख के कोये जैसी हो - अक्ष- हारीतकी की गुठली जिससे जुआ खोला जाता था;   रुद्राक्ष - गोलाकार पर देखने में भयंकर आदि।

भगवान सिंह 
( Bhagwan Singh )

किसान आंदोलन और 8 दिसंबर का भारत बंद / विजय शंकर सिंह

8 दिसंबर, को किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में भारत बंद का आह्वान किया है। किसानों का यह आंदोलन, केंद्र सरकार द्वारा तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लम्बे समय से चल रहा है। पहले यह कानून एक अध्यादेश के रूप में जून 2020 में लाये गए, जिसे बाद में संसद से पारित करा कर क़ानून के रूप में लागू कर दिया। यह कानून, अनाज की मंडियों में निजी या कॉरपोरेट क्षेत्र के प्रवेश, जमाखोरी को अपराध मानने वाला कानून खत्म करने और कांट्रेक्ट फार्मिंग को वैधानिक स्वरूप देने के बारे में हैं। इसका सबसे अधिक विरोध पंजाब और हरियाणा में जहां उन्नत कृषि व्यवस्था और सरकारी मंडियों का एक सुनियोजित संजाल है, वहां से शुरू हुआ और फिर धीरे धीरे यह आंदोलन पूरे देश मे फैल गया। पंजाब में किसानों के धरने के बाद किसानों ने दिल्ली चलो का आह्वान किया और वे सरकार की तमाम बंदिशों के बाद भी दिल्ली पहुंचे पर जब उन्हें दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दिया गया तो, उन्होंने सिंघु सीमा पर धरना दे दिया। यह धरना 11 दिनों से चल रहा है और उसी के क्रम में 8 दिसंबर को भारत बंद का आयोजन किसान संघर्ष समिति की तरफ से किया गया है। शुरुआत में यह आंदोलन, पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित रहा, पर अब इसका प्रभाव, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक पहुंच गया है। साथ ही वे राज्य जो दिल्ली से दूर हैं, उनके यहां भी किसान अपनी अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलित हैं। 8 दिसंबर का बंद कितना व्यापक रहता है और इसका क्या असर सरकार पर पड़ता है इसका पता तो 9 दिसम्बर के बाद ही लग पायेगा। 

कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है और इस वार्ता का अगला क्रम 9 दिसंबर को भी प्रस्तावित है। 3 दिसंबर को, केंद्र सरकार के साथ हुई बातचीत को लेकर 4 दिसंबर को एक बार फिर किसान संगठनों ने आपस में चर्चा की और संयुक्त किसान मोर्च की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि  किसान, तीनों कानून को रद्द करे बिना, नहीं मानेंगे । हालांकि, सरकार इन कानूनों में, कुछ संशोधन करने के लिए तैयार है लेकिन किसानों ने सरकार से साफ कह दिया है कि सरकार तीनों कानून वापस ले। इन मांगों में प्रस्तावित बिजली अधिनियम 2020 को वापस लेने की भी मांग जुड़ गयी है। 

तीनो कृषि कानूनो को लेकर यह आशंका उठ रही है कि यह तीनों कानून खेती किसानी की संस्कृति और परम्परागत खेती को नष्ट कर देंगे और लंबे समय से हुए भूमि सुधार के अनेक कदम प्रतिगामी हो जाएंगे। इस आंशका का आधार आखिर क्या है ? कैसे किसान विरोधी यह तीन कानून देश की कृषि व्यवस्था की कमर तोड़कर किसानों को, कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के गुलाम बनाने के लिए और आम जनता के लिये खाने पीने की चीजों को महंगा कर कॉरपोरेट की जेबें भरने के लिए लाए गए हैं ? 

संक्षेप में इसे देखें, 
● कॉरपोरेट की पहली समस्या थी, कि, कृषि संविधान की समवर्ती सूची में है। अर्थात, इस विषय पर केंद्र और राज्य दोनों ही इससे संबंधित कानून बना सकते हैं। ऐसे में अलग अलग राज्यों में उनकी कृषि व्यवस्था के अनुसार, अलग अलग, कानून उन राज्यों ने बनाये हैं। उनके यहां फसल की खरीद, उन्ही नियम और कायदों से की जाती है। कॉरपोरेट को अलग अलग राज्यो में कृषि उत्पाद खरीदने के लिये अलग अलग नियम कायदों से रूबरू होना पड़ता है। अब कॉरपोरेट की इस समस्या का यही हल था कि, कोई एक कानून ऐसा बने जो सभी राज्यो पर समान रूप से लागू हो। 
कॉरपोरेट की इस समस्या के समाधान के लिये राज्यों के अधिकार का अतिक्रमण करते हुए, केंद्र सरकार ने, पूरे देश के लिए एक अलग एक्ट बना दिया। इस एक्ट में किसी को कहीं भी फसल बेचने का अधिकार दे दिया गया। 

● कॉरपोरेट की दूसरी समस्या थी कि, यदि कॉरपोरेट पूरे देश के किसानों से खाद्यान्न खरीदेंगे और उसका भंडारण करेंगे, तो इसमे सबसे बड़ी बाधा, विभिन्न राज्यों द्वारा बनाये गए जमाखोरी  रोकने के लिये बने कानून हैं। इसमें सबसे बड़ी बाधा, आवश्यक वस्तु अधिनियम, ईसी एक्ट था। यह कानून, भंडारण की सीमा तय करने और जमाखोरी को रोकने के लिये तरह तरह की बंदिशें लगाता था। इन कानूनो के कारण, कॉरपोरेट कोई भी खाद्यान्न अधिक मात्रा में लंबे समय तक अपने गोदामो में स्टोर नहीं कर सकता था। कॉरपोरेट का इरादा ही है फसल या खाद्यान्न किसानों से मनमाने दाम पर खरीद कर उसे स्टोर करना और जब बाजार में बढ़े भाव हों तो उसे बेचने के लिये बाजार में निकालना। इस प्रकार कॉरपोरेट बाजार पर अपना नियंत्रण बनाये रखना चाहता है। पर ईसी एक्ट कॉरपोरेट के इस इरादे पर अंकुश की तरह था। 
कॉरपोरेट की इस समस्या का समाधान, केंद्र सरकार नेआवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म कर और जमाखोरी को वैध बना कर, कर दिया। अब खाद्यान्न की जमाखोरी कितनी भी मात्रा तक और कितने भी समय तक करना अपराध नहीं रह गया।

● कॉरपोरेट के सामने तीसरी बड़ी  समस्या थी कि, किसान तो फसल अपनी ज़रूरत मर्जी से उगाते हैं, और इस पर सरकार या किसी का कोई दबाव नहीं है।
इस समस्या के समाधान के लिये केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून  बना दिया जिससे किसान को अब कॉन्ट्रेक्ट में बांध कर कॉरपोरेट ही निर्देशित करेगा की किस प्रकार की फसल किसान को उगानी है।

पंजाब ही नहीं भारत मे किसान आंदोलनों का एक समृद्ध इतिहास रहा है। पंजाब के किसान प्रतिरोध का इतिहास तो, 1906 - 07  से शुरू होता है, जब शहीद भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह ने पगड़ी सम्भाल जट्टा नाम से एक किसान आंदोलन की शुरूआत की थी। आज के इस आंदोलन के समर्थन में, कनाडा, यूरोप, अमेरिका, इंग्लैंड, हर जगह लोग प्रदर्शन औऱ एकजुटता प्रदर्शित कर रहे है। हालांकि भारत सरकार ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो के बयान पर अपने आंतरिक मामलों में दखल बताया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है। 9 दिसंबर की सरकार और किसानों की बातचीत में यह आशा की जानी चाहिए कि किसानों की मांग सरकार स्वीकार कर लेगी और अगर सरकार के पास कोई अन्य कृषि सुधार का एजेंडा है तो, सरकार उसे भी किसान संगठनों से बातचीत कर के आगे बढ़ेगी। 

सरकार का यह स्टैंड है कि, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो का किसान आंदोलन को समर्थन हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है। इसे कूटनीतिक परंपरा के विपरीत मानते हुए, विदेश मंत्रालय द्वारा, कनाडा के उच्चायुक्त को यह बात समझा भी दी गयी है। 
लेकिन, यूरोपीय यूनियन के देशो के सांसदों द्वारा , भारतीय सांसदों को दरकिनार कर कश्मीर घाटी का दौरा कराना, और उनसे यह सर्टिफिकेट लेना कि कश्मीर में  सब ठीक है, क्या हमारे आंतरिक मामलों में जानबूझकर कर यूरोपीय यूनियन को दखल करने के लिये आमंत्रित करना नहीं था ? 
हाउडी मोदी के दौरान, अब की बार ट्रम्प सरकार की बात सार्वजनिक रूप से एक जनसभा में प्रधानमंत्री जी द्वारा कहना, क्या अमेरिका की अंदरूनी राजनीति में वह भी तब, जबकि वहां चुनाव साल भर के अंदर होने वाले हों तो, एक हस्तक्षेप नहीं है ? 
किसान आंदोलन के समर्थन में अमेरिका, यूरोप, इंग्लैंड आदि देशों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रवक्ता ने भी इस आंदोलन के पक्ष में अपने बयान जारी किए हैं। 

किसान बिल पर बीजेपी का कहना है कि उसने कांग्रेस का ही एजेंडा पूरा किया है। सरकार के अनुसार,  कांग्रेस का वायदा एपीएमसी क़ानून को समाप्त करने का था, ताकि कृषि व्यापार को सभी बंदिशों से मुक्त किया जा सके। यह बात अर्धसत्य है। कांग्रेस ने इसके साथ कुछ राइडर भी रखे थे। सुरक्षा कवच के रूप में रखे गए यह राइडर, भी कांग्रेस के घोषणा पत्र का अंग थीं। पत्रकार आवेश तिवारी ने इन सुरक्षा कवच का उल्लेख अपनी फेसबुक वॉल पर किया है। उसे मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।
● पहला: अभी एक मंडी औसतन साढ़े चार सौ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करती है। काँग्रेस का  वायदा इसे समाप्त कर हर प्रमुख गांव में ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ किसान बाज़ार तैयार करने का था। 
● दूसरा: कांग्रेस  ने वायदा किया था कि किसानों के हितों की रक्षा के लिए कृषि आयात और निर्यात की एक विशेष पॉलिसी तैयार की जाएगी।
● तीसरा: कांग्रेस ने एमएसपी तय करने नया का सिस्टम सुझाया था। अभी एमएसपी का निर्धारण कमीशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस ( सीएसीपी ) तय करता है। कांग्रेस का वायदा था कि इसे हटाकर एमएसपी तय करने की ज़िम्मेदारी एक नेशनल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर डेवलपमेंट एंड प्लानिंग ( एंसीएडीपी ) की होनी चाहिए। इस नए कमीशन में किसान भी मेंबर होंगे और उनका परामर्श भी फसल की कीमत तय करते ध्यान में रखा जाएगा।ऐसा वायदा इसलिए किया गया था क्योंकि अभी किसानों की राय को मानना अनिवार्य नहीं है। उनकी राय को नकारा जा सकता है।
● चौथा: सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच कांग्रेस की न्याय योजना थी, जिसमें हमने देश की 20% सबसे ग़रीब परिवारों को 72,000 रुपया सालाना देने का वायदा किया था। ये परिवार सीमांत किसानों और खेतिहर मज़दूरों के हैं.
● पांचवां: सुरक्षा कवच के रूप में खाद्य सुरक्षा क़ानून को ठीक से लागू करना था। यह क़ानून यूपीए की सरकार ने बनाया था जिसके अंतर्गत देश के 70% लोग इसका फ़ायदा उठा सकते हैं। 
यदि इस क़ानून को ठीक से लागू किया जाता है तो किसानों से सरकारी ख़रीद बहुत बढ़ जाएगी।लेकिन मोदी सरकार तो इसे उल्टा कमज़ोर करने की तैयारी में है। 2020 के इकोनॉमिक सर्वे में सरकार ने खाद्य सुरक्षा क़ानून के दायरे में आने वाली जनता की संख्या को 70% से कम करके 20 प्रतिशत तक सीमित करने का सुझाव दिया है।

किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस काटजू ने अपने ब्लॉग में सरकार को इसका हल सुझाते हुए कुछ विकल्प बताए हैं। उन्होंने इस आंदोलन को हाल का सबसे बड़ा आंदोलन बताया है। उनके अनुसार, 
● बहुत लम्बे समय बात देश में कोई आंदोलन हो रहा है जो जाति/धर्म की सीमाओं को तोड़ रहा है...
● राम मंदिर का आंदोलन हिंदुओं का था।
● जाट, गुज्जर, एससी/एसटी, मुसलमान वग़ैरह भी अलग अलग आंदोलन करते रहे हैं।
● लेकिन किसानों का यह आंदोलन ऐतिहासिक है, जिसमें सभी जातियों/ धर्मों का समावेश है..क्योंकि सभी धर्म और जातियाँ किसी न किसी रूप में खेती किसानी से जुड़ी हैं। 

इसका समाधान सुझाते हुए, जस्टिस काटजू ने कहा है कि, 
● सरकार एक अध्यादेश जारी करके इन क़ानूनों को “कंडिशनल लेजिसलेशन” घोषित कर सकती है। 
● “कंडिशनल लेजिसलेशन” वे क़ानून होते हैं जो अस्तित्व में तो होते हैं लेकिन ज़रूरत पड़ने पर ही लागू किए जाते हैं।
● ऐसा हुआ तो ये क़ानून वापस भी नही होगा और इस पर तत्काल अमल भी नही होगा। यह बीच का रास्ता है। 
● इस बीच एक आयोग बने जिसमें सरकार, किसानों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ हों और वो इन क़ानूनों की समीक्षा करे। 
लेकिन यह तभी सम्भव है जब सरकार किसानों की समस्या के प्रति गम्भीर हो। 

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 5 December 2020

पंजाब और हरियाणा जैसा खुशहाल किसान, देश के अन्य राज्यो में भी क्यों न हो ? / विजय शंकर सिंह

अक्सर यह बात कही जाती है कि, पंजाब, हरियाणा का किसान खुशहाल है। वे एक बेहतर जीवन जीते हैं। वे जम कर खाते पीते हैं। होमसिकनेस जैसी कोई चीज उनके मन या समाज मे नहीं होती है। वे मेहनती भी होते हैं। उनकी खेती आधुनिक है और खेती को बोझ समझ कर नही, जीवन और संस्कृति का अंग समझ कर करते हैं। मैं उत्तर प्रदेश, और वह भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिले वाराणसी से हूं, तो हमारे यहां खेती का वह स्वरूप नही है जो पंजाब, हरियाणा या पश्चिम उत्तर प्रदेश के जिलों में है। हमारे यहां जोत भी कम है, और अक्सर खेतिहर मजदूरों की कमी भी रहती है। जबकि पंजाब में हमारे और बिहार के इलाके से गाड़ी भर भर के मज़दूर पंजाब जाते हैं। वे वहां खेती करते हैं। मैंने पंजाब का गांव वहां जा कर और उनके बीच रह कर नही देखा है। मेरी इच्छा है किसी पंजाबी गांव में जा कर कुछ दिन उनके परिवार में बिताने की। यूं तो पंजाब घूमा है मैंने, पर बस शहरों में। गांव को सड़कों से ही देखा है। पर वहां की जीवंतता के किस्से बहुत सुने हैं। 

अब सवाल उठता है, आखिर पंजाब के किसान खुशहाल क्यों है ? इसका उत्तर तो पंजाब के कृषक जीवन को नजदीक से देखने वाले ही दे पाएंगे। पर जो कुछ अब समझ मे आ रहा है उसका कारण है खेती के लिये सिंचाई, अधुनातन व्यवस्था, और सरकार द्वारा मंडियों का जाल बिछा कर कृषि उत्पाद की खरीद। पंजाब और हरियाणा में सरकारी खरीद बहुत होती है। वहां उपज भी अच्छी होती है और खेती को वे केवल अपने घर परिवार के खाने भर के अनाज उपजाने तक ही केन्दित नहीं रखते हैं, बल्कि उसे बेचते हैं, निर्यात भी करते हैं और इससे धन भी कमाते हैं। सरकारी मंडी,एपीएमसी और एमएसपी पर शांता कुमार की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, केवल 6% लोगों को एमएसपी की सुविधा मिलती है। यह कमेटी, सरकारी गोदामो की अकुशलता को तो बताती है पर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य कैसे मिले, इस पर कुछ नहीं कहती है। बिहार राज्य में 2006 से ही सरकारी खरीद बंद है। अब बिहार और पंजाब के किसानों की आर्थिक हालत और खुशहाली से आप एमएसपी और सरकारी मंडी के महत्व का अनुमान लगा सकते हैं। जहां जहां मंडी और सरकारी खरीद की सुविधा उत्तम है, वहां के किसान खुशहाल है। वे इस बात से निश्चिंत हैं कि, उन्हें अपनी फसल का कम से कम न्यूनतम मूल्य तो मिल रहा है। और यह खरीद सरकार कर रही है। ध्यान दीजिए, अगर यह न्यूनतम मूल्य है जो सरकार तय करती है और इससे अधिक मूल्य देकर भी कोई संस्था फसल खरीदना चाहे तो खरीद सकती है। 

लेकिन जहां के किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं पा रहे हैं, वे अपनी फसल बाजार और बिचौलियों द्वारा तय किये दर से बेच रहे है। क्या सरकार को उन्हें संरक्षण नहीं देना चाहिए ? 94% किसान जो शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार एमएसपी की सुविधा से वंचित है, उनके लिये सरकार को क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि जो खुशहाली पंजाब और हरियाणा के किसानों में इसी एमएसपी और सरकारी मंडियों के द्वारा आ रही है, वैसी ही खुशहाली देश के अन्य इलाक़ो के किसानों को भी मिले ? उनका भी तो जीवन खुशहाल हो। यह बात उन 94% किसानों को बताई जानी चाहिए और उन्हें सरकार के मंडी तंत्र के विस्तार के लिये सरकार पर दबाव डालना चाहिए। 

पर सरकार, एफसीआई ( फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ) जो अनाज का भंडारण करता है को भी निजी क्षेत्रों में देने जा रही है। एफसीआई के सारे गोदाम, मय ज़मीनों के कॉरपोरेट के हांथो चले जायेंगे। सरकार इसे सुधार कहती है, पर असल मे यह सुधार नहीं, देश के कृषि व्यवस्था और एक प्रकार से पूरी ग्रामीण संस्कृति की बर्बादी है। यह हाराकिरी है। सरकार, अपनी सरकारी मंडियों के समानांतर निजी और कॉरपोरेट की मंडियां खड़ी करने जा रही है। अडानी ग्रुप ने अपने गोदाम, मध्यप्रदेश और पंजाब में बना भी लिये है। निश्चित ही सरकार के भंडारण गोदामो की अपेक्षा वे बड़े, आधुनिक और बेहतर गोदाम होंगे। अब तो जमाखोरी भी अपराध नहीं रही और इसकी कोई सीमा ही नहीं रखी गयी। एक प्रकार से जमाखोरी को, आवश्यक वस्तु अधिनियम ईसी एक्ट को खत्म कर के सरकार ने कॉरपोरेट को जमाखोरी करने तथा मांग पूर्ति के अनुसार, बाजार  भाव बढ़ाने और घटाने का पूरा अधिकार दे दिया है। अब किसान और उपभोक्ता दोनो ही इन जमाखोरों और कॉरपोरेट के रहमो करम पर छोड़ दिये गए हैं।

सरकार ने एक और लाभ कॉरपोरेट को दिया है। वह है निजी मंडियों को करो से राहत। एक तरफ सरकार अपनी मंडियों पर तो टैक्स वसूल रही है पर कॉरपोरेट के मंडियों को सरकार ने टैक्स फ़्री कर दिया है। सरकार मंडियों पर जो टैक्स वसूलती है, उससे गांव की सड़कें तथा अन्य विकास कार्य होते है। जब मंडी सिस्टम कमज़ोर हो जाएगा तो सरकार की कर वसूली भी कम हो जाएगी। इसका सीधा असर, ग्राम और आसपास के स्थानीय विकास पर पड़ेगा। निजी क्षेत्र तो फसल खरीदेगा, जमाखोरी करेगा, और उसका तो समग्र विकास से कोई मतलब ही नहीं रहेगा। इससे ग्रामीण क्षेत्र की खुशहाली पर असर पड़ेगा और एक विपन्नता की ओर ग्रामीण समाज बढ़ने लगेगा। इसका एक परिणाम, खेती से किसान का मोहभंग होने लगेगा और जब खेती लाभ तथा खुशहाली नहीं दे पाएगी तो, खेती में कॉरपोरेट घुसेंगे और ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर व्यापक पलायन होगा। कॉरपोरेट यही चाहते हैं और सरकार यही उन्हें सुलभ करा रही है। 

यह वही शातिर चाल है जब, भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) को 4G का लाइसेंस तक नहीं दिया गया, उसे निकम्मा, अकुशल और भ्रष्ट बन जाने दिया गया, ताकि मुकेश अम्बानी का जिओ अपना एकाधिकार बीएसएनएल के संसाधनों में घुसपैठ कर बना सके। और जिओ ने ऐसा एकाधिकार बनाया भी। इसी तरह, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ( एचएएल ) को राफेल सौदे से सबसे उपयुक्त होते हुए भी, केवल दिवालिया अनिल अंबानी को ठेका दिलाने के लिये बाहर कर दिया गया। सबसे दुःखद पक्ष यह है कि सरकार के इस षडयंत्र में न्यायपालिका भी शामिल रही है। रंजन गोगोई को यूं ही नही राज्यसभा की सदस्यता प्रदान की गयी है। उच्चतम स्तर पर, क्विड प्रो क्वॉ यानी परस्पर हितैषी सौदेबाजी का यह एक निकृष्ट उदाहरण है। इसी प्रकार, धीरे धीरे कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और अन्य प्रशासनिक विफलता के बहाने से सरकारी मंडियां भी कम होती जाएगी। सरकार बजट का रोना भी रोयेगी। एमएसपी कागज़ पर रहेगी। पर जब सरकार के गोदाम और मंडी सिस्टम लुंज पुंज हो जायेंगे तब सरकार खरीद कैसे करेगी, अनाज रखेगी कहाँ और एमएसपी देगी कैसे ? यह भी होगा कि, कॉरपोरेट जिओ के फ्री ऑफर की तरह फसल के दाम  भी कुछ समय के लिये अधिक दे दे, पर अंत मे यह सब शिकार के हांके की तरह होगा औऱ कॉरपोरेट का दैत्य पसरता जाएगा। 

इसमे दो राय नही है कि सरकारी तंत्र में कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार है। पर इसका निदान तो कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार को दूर करना है न कि उस तंत्र को ही अपने चहेते पूंजीपति मित्रो को सौंप देना है। सरकार यही कर रही है। अगर यह सवाल पूछ लिया जाय कि, सरकार ने एफसीआई के भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये कितनी जांचे कराई और विगत 10 सालों में कितने अफसरों के खिलाफ कार्यवाही हुयी तो उसका उत्तर जब मिलेगा तो, इससे स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। 

सरकार एपीएमसी और एमएसपी के सिस्टम को जिसने पंजाब के समाज और खेती में खुशहाली लाई है, को देश के अन्य राज्यो में भी तो ले आये ? यह तो अजीब मूर्खता है कि वहां के किसान खुशहाल हैं तो उनकी भी खुशहाली छीन कर कॉरपोरेट को उनकी खुशी का हिस्सा दे दिया जाय। आज जो दिल्ली सीमा पर यह सबल आंदोलन हो रहा है, उसका कारण, पंजाब, हरियाणा, और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों की खुशहाली और संपन्नता ही है। ऐसी ही खुशहाली देश के अन्य राज्यो के किसानों के जीवन मे भी तो आये। पंजाब के किसान खुशहाल है और और राज्यों के किसानों को भी तो खुशहाल जीवन जीने का हक़ है। अगर सरकार यह सोचती है कि निजी क्षेत्र औऱ कॉरपोरेट किसान का जीवन खुशहाल बनाएंगे तो यह उसका भ्रम है। हालांकि सरकार भ्रम में नहीं है। वह आज कॉरपोरेट का एजेंडा ही पूरा कर रही है। आप को संशय हो तो हो, मुझे सरकार की नीयत पर कोई संशय नहीं है। 

आज कॉरपोरेट विरोधी दिवस मनाया जा रहा है और साथ ही आज सरकार, किसानों से बात भी कर रही है। हमे उम्मीद करनी चाहिए कि, सरकार यह तीनों कृषि कानून वापस लेगी और अगर किसी प्रकार के कृषि सुधार की ज़रूरत है तो वह किसान संगठनों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ेगी। सोशल मीडिया पर आदिवासी दर्शन पेज  ने कुछ सवाल उठाए है, उन्हें पढ़ना और उनके उत्तर ढूंढना समीचीन होगा। आप सब ताजा ताजा बने तीन कृषि कानूनों के समर्थकों से निम्न 15 सवाल जरूर पूछिये। 

● अगर सरकार की एमएसपी को लेकर नीयत साफ है तो वो मंडियों के बाहर होने वाली ख़रीद पर किसानों को एमएसपी की गारंटी दिलवाने से क्यों इंकार कर रही है?
● एमएसपी से कम ख़रीद पर प्रतिबंध लगाकर, किसान को कम रेट देने वाली प्राइवेट एजेंसी पर क़ानूनी कार्रवाई की मांग को सरकार खारिज क्यों कर रही है?
● कोरोना काल के बीच इन तीन क़ानूनों को लागू करने की मांग कहां से आई? ये मांग किसने की? किसानों ने या औद्योगिक घरानों ने?
● देश-प्रदेश का किसान मांग कर रहा था कि सरकार अपने वादे के मुताबिक स्वामीनाथन आयोग के सी-2 फार्मूले के तहत एमएसपी दे, लेकिन सरकार ठीक उसके उल्ट बिना एमएसपी प्रावधान के क़ानून लाई है। आख़िर इसके लिए किसने मांग की थी?
● प्राइवेट एजेंसियों को अब किसने रोका है किसान को फसल के ऊंचे रेट देने से? फिलहाल प्राइवेट एजेंसीज मंडियों में एमएसपी से नीचे पिट रही धान, कपास, मक्का, बाजरा और दूसरी फसलों को एमएसपी या एमएसपी से ज़्यादा रेट क्यों नहीं दे रहीं ?
● उस स्टेट का नाम बताइए जहां पर हरियाणा-पंजाब का किसान अपनी धान, गेहूं, चावल, गन्ना, कपास, सरसों, बाजरा बेचने जाएगा, जहां उसे हरियाणा-पंजाब से भी ज्यादा रेट मिल जाएगा? 
● सरकार नए क़ानूनों के ज़रिए बिचौलियों को हटाने का दावा कर रही है, लेकिन किसान की फसल ख़रीद करने या उससे कॉन्ट्रेक्ट करने वाली प्राइवेट एजेंसी, अडानी या अंबानी को सरकार किस श्रेणी में रखती है- उत्पादक, उपभोक्ता या बिचौलिया?
● जो व्यवस्था अब पूरे देश में लागू हो रही है, लगभग ऐसी व्यवस्था तो बिहार में 2006 से लागू है। तो बिहार के किसान इतना क्यों पिछड़ गए?
● बिहार या दूसरे राज्यों से हरियाणा में धान जैसा घोटाला करने के लिए सस्ते चावल मंगवाए जाते हैं। तो सरकार या कोई प्राइवेट एजेंसी हमारे किसानों को दूसरे राज्यों के मुकाबले मंहगा रेट कैसे देगी?
● टैक्स के रूप में अगर मंडी की आय बंद हो जाएगी तो मंडियां कितने दिन तक चल पाएंगी?
● क्या रेलवे, टेलीकॉम, बैंक, एयरलाइन, रोडवेज, बिजली महकमे की तरह घाटे में बोलकर मंडियों को भी निजी हाथों में नहीं सौंपा जाएगा?
● अगर ओपन मार्केट किसानों के लिए फायदेमंद है तो फिर "मेरी फसल मेरा ब्योरा" के ज़रिए क्लोज मार्केट करके दूसरे राज्यों की फसलों के लिए प्रदेश को पूरी तरह बंद करने का ड्रामा क्यों किया?
● अगर हरियाणा सरकार ने प्रदेश में 3 नए कानून लागू कर दिए हैं तो फिर मुख्यमंत्री खट्टर किस आधार पर कह रहे हैं कि वह दूसरे राज्यों से हरियाणा में मक्का और बाजरा नहीं आने देंगे?
● अगर सरकार सरकारी ख़रीद को बनाए रखने का दावा कर रही है तो उसने इस साल सरकारी एजेंसी एफसीआई की ख़रीद का बजट क्यों कम दिया? वो ये आश्वासन क्यों नहीं दे रही कि भविष्य में ये बजट और कम नहीं किया जाएगा?
● क्या राशन डिपो के माध्यम से जारी पब्लिक डिस्ट्रीब्युशन सिस्टम, ख़रीद प्रक्रिया के निजीकरण के बाद अडानी-अंबानी के स्टोर के माध्यम से प्राइवेट डिस्ट्रीब्युशन सिस्टम बनने जा रहा है।

एक बात हम सबको साफ समझ लेना चाहिए कि, यह तीनों कृषिकानून, सरकारी राशन की दुकान, पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम, खाद्य सुरक्षा कानून, गरीबों के लिये चलाई जाने वाली सस्ते अनाज की तमाम योजनाएं धीरे धीरे खत्म कर देंगी। किसान और खेतिहर मजदूर दोनो ही बर्बाद हो जाएंगे। 

( विजय शंकर सिंह )

Thursday, 3 December 2020

शब्दवेध (31) सांस और श्वास.

साँस और श्वास में कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी पूरबी और कौरवी में ?
श्वास और नि-श्वास  में,  नि-श्वास  और उत्-श्वास  (उछ्वास > उसाँस)/ प्र-श्वास में, श्वास और वि-श्वास में,  श्वास और *आ-श्वास> आ-श्वास-न में,  कितनी दूरी है? 

उतनी ही जितनी प्राकृत भाषा और  कृत्रिम भाषा में।  कृत्रिम जीवन के साथ  हमारी नैसर्गिक  क्षमताएँ घटती  जाती हैं,  और जो सहज था  वह लंबी शिक्षा के बाद भी उतना स्वाभाविक नहीं रह जाता जितना कृत्रिमता अभाव में। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मनुष्य की तैरने की निसर्गजात क्षमता (इंस्टिंक्ट) का लोप और उसे अर्जित करने के लिए अपेक्षित अभ्यास है।  हम यह तक भूल जाते हैं कि किसी प्राचीन चरण पर यह क्षमता हममें विद्यमान थी।  ऊपर के शब्दों का प्रयोग करते समय हममें से कितनों को याद रहता है कि ये शब्द हमारे साँस लेने से उत्पन्न ध्वनि के अनुवाचन (वाणी से उसके उच्चार हैं। 

एक और अंतर आता है। अपने (उपसर्जित) उपसर्गों की सहायता से वाले, स्व-नियंत्रित शब्दों को वह किसी आशय से जोड़ सकता है। शब्द और अर्थ की वह अभेद्यता समाप्त हो जाती हो जिसे कालिदास ने वागर्थाविव संपृक्तौ या तुलसी ने गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न कहा है। यही वह कारण है जिससे उपसर्जित शब्दों में अप्रत्याशित या अनियमित अर्थ का आरोपण हो जाता है जिसे   “उपर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते” में सूत्रबद्ध किया गया है।  ध्यान रहे कि ऐसा प्रत्ययों के साथ नहीं होता क्योंकि प्रत्यय का प्रयोग नैसर्गिक भाषा से आया हुआ है।
रोचक बात यह है कि आग्रहमुक्त भाव से जिसने भी भाषा पर विचार किया है वह इस सचाई के निकट पहुँचा है।  उदाहरण के लिए हर्बर्ट स्पेंसर के निम्न कथन को लिया जा सकता है:

In Primitive thought the name and object named are associated in such wise thai the one is regarded as a part of the other The imperfect separation of words from things characterizes Greek peculation in general" -HERBERT SPENCER 
और मिलते जुलते विचार 
The omission of all separate treatment of the ways in which speech, besides conveying ideas, also expresses attitudes, desires and intentions, is another point at which the work of this active school is at present defective. Dr Boas
तथा
language is defined as "a purely human and non-instinctive method of communicating ideas, emotions and desires by means of a system of voluntarily produced symbols" ( E Sapir, Chief of the Anthropological Section, Geological Survey of Canada,Language, 1922, p 7) But so little is the emotive element considered that in a discussion of grammatical form, as shown by the great variation of word order in Latin. we find it stated that the change from 'hominem femina videt'  
  
ये सभी मनीषी समस्या के काफी निकट पहुँच कर उन शास्त्रीय मान्यताओं के दबाव में यह समझते समझते रह जाते हैं कि भाषाएँ  अपने प्राथमिक चरण पर नैसर्गिक, यांत्रिक और सवायत्त नादों के (एकास्टिक स्पंद) या ध्वनि तरंगों  के  अनुश्रवण, जिसके अनगिनत रूप हो सकते हैे, को वाग्तंत्र से उच्चरित नाद व्यवस्था में ढाल कर दूसरों तक संचारित करने के विधान हैं।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (30) स्वस्तिक

जब तक साँस तब तक आस।   हमारा सुख सौभाग्य, जीवन और मृत्यु या विनाश से जुड़ गया हमारी साँस का चलना या बंद हो जाना।  श्वास ही प्राण है, साँस का जाना  प्राण चला जाना,  इक्सपायर (expire) प्राणान्त।  यह इंस्पायर (inspire)- प्राण भरना, प्रोत्साहित करना, का विलोम है । 

भो. में एक शब्द है सांसति जिसके लिए हिं. में ‘नाकों दम होना/करना’ प्रयोग में आता है पर सांसति में कष्ट का भाव प्रधान है जब कि नाकों दम में आजिजी का। सांसति का संबंध साँस से (साँस निकलने निकलने को होना) है, इस ओर पहले ध्यान नहीं गया था। 

 स्वस्ति इसके ठीक विपरीत कुशल और कल्याण का द्योतक है, और इसकी कामना प्रस्थान करने वाले के लिए निरापद मार्ग - पंथा स्वस्ति - से और इसके लिए सभी देवों की अनुकंपा और मार्ग में पड़ने वाले सभी तत्वों के कल्याणकारी होने का कामना से आरंभ हुआ। 

स्वस्तिक के साथ शुभ-लाभ लिखा इसलिए मिलता है कि अज्ञात या अल्पज्ञात क्षेत्रों की ये यात्राएँ व्यापारिक गतिविधियों के चलते होती थीं। स्वस्तिक का चिन्ह पहिए का प्रतीकांकन है जिसमें पहले सीधी रेखा में मुड़ी रेखा किंचित् वर्तुल होती थी न कि बाहर की ओर तनी हुई। हड़प्पा सभ्यता के संदर्भ में पिराक, मोहेंजोदड़ो, हड़प्पा, कोटदीजी से मिले स्वस्तिकों में विशेषतः कोटदीजी से प्राप्त मुद्राएँ (जोनाथन मार्क केनोयर, इंडस सील्स, ऐंश्येंट सिंध, ऐनुअल जर्नल ऑफ रिसर्च, खंड 9, 2006-7, 7-30) इस विकास रेखा को समझने में सहायक हो सकती हैं, यद्यपि यह दावा हमारा है, केनोयर का नहीं। वह भारत पर ‘आक्रमण’ करने वालों के साथ पहिए के हिमायती हो सकते हैं, यद्यपि इस विषय पर वह कूटनीतिक दूरी  बना कर  बात करते हैं।

स्वस्ति की व्याख्या संस्कृतज्ञ सु-अस्ति के रूप में करेंगे जो अर्थ के अनुकूल ही है, पर वे श्वसन की ध्वनि की उपेक्षा करके सु-असन करने से पहले रुक कर सोचेंगे ।  श्वसन साँस (सस/संस) का संस्कृतीकरण है जिसके तीन रूप   हो जाते हैं, 1. शंस (शंसा, प्रशंसा, प्रशस्ति), 3. शस् -काटना, मारना,  (शसति - वध करता है, काटता है;  विस्तृत करता है  -प्रशस्त), शसन - घायल करना, आहत करना और 3. श्वसन,  श्वास,  विश्वास।  शस् के खंडित करने, विच्छिन्न करना से एक ओर शस्त्र निकलता है तो दूसरी ओर शास्त्र।  और यह अलग से याद दिलाने की जरूरत नहीं कि शास्ता भी इसी से निकला है।

मैं जिस पद्धति से भाषा के स्वभाव को समझना चाहता हूँ वह परंपरागत व्युत्पत्ति से अलग है, उसके कोशों में दिए गए अर्थ को अकाट्य मानता हूँ, क्योंकि ये अर्थ उन्हें लोक-व्यवहार से मिले हैं इसलिए उन्होंने वहाँ भी उसकी रक्षा की है,  जहाँ उनके द्वारा अपनाई गई पद्धति से उनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता या अर्थ का अनर्थ (पूत- 1. पवित्र, 2, सड़ा हुआ)   हो जाता है। 

विद्वान इसकी अनदेखी कर जाते हैं जब कि नियम में अपवाद के लिए स्थान नहीं।  गुरुत्व का नियम है तो वह सभी पर समान रूप से लागू होगा।  यदि विकल्प का विधान है तो वह नियम नहीं हुआ, प्रवृत्ति हुई जो कुछ दूर तक साथ देगा और फिर बेकार हो जाएगा।  अनर्थ प्रवृत्ति को नियम मान बैठने और उसी से संतोष कर लेने के कारण होता है।  अपवाद इस बात का प्रमाण है कि नियम की तलाश नही हो सकी है।  इसलिए कोशगत  अर्थ का सम्मान करते हुए हम उनकी व्युत्पत्ति को लंगड़ा और वास्तविकता से दूर पाते हुए वैयाकरणों द्वारा पूरे तामझाम - एक आद्यभाषा, उसके विघटन या उसमें कालक्रम में आए विकारों से शाखाओं, प्रशाखाओं से एक विशद भाषा-परिवार के सिद्धान्त, मूलभाषा की धातुमाला और उससे पैदा हुए शब्द और  अर्थ -  को खारिज करके, विकास के सिद्धांत के अनुरूप और वैदिक भाषाविमर्श के भी अनुरूप पाकर हम इतने विश्वास से वाचिक अनुकार के अनुसार अपनी व्याख्या करते हैं कि श्रुतिलब्ध नाद का वाचिक प्रतिनाद ही भाषा है। कहें, हम पहली बार भाषा के उस नियम के अनुसार व्याख्या का भरोसा रख कर यह विवेचन कर रहे हैं।   इसे दुहराने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि लातिन या गाथिक या केल्टिक मूल से सजात शब्दों की या कल्पित पीआइई प्रतिरूपों को भी जहाँ गलत पाते हैं वहाँ उसे नकारने का दुस्साहस करते हैं और इसलिए हमारे प्रस्तावों को इनकी अंतःसंगित के आधार पर परखने का प्रयत्न करें। 

सामान्य विश्राम या निद्रा के समय को छोड़ दें तो सक्रियता और श्रम के अनुरूप हमारे साँस की गति और ध्वनि में भी अंतर आता है और इसी तरह हमारे नासारंध्रों की बनावट, उनकी अवरुद्धता आदि के अनुरूप ध्वनि में अंतर आता है जिनके सभी प्रभेदों को लक्ष्य तक नहीं किया जा सकता और जिनको लक्ष्य करके उनके अनुवाचन किए गए हैं उनके कारण, उनकी अपनी भाषा की ध्वनि सीमा के कारण अनुवाचन होने के बाद भी उनमें पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है फिर भी यह पहचान बनी रहती है कि यह नासिका से उत्पन्न ध्वनि का अनुवाचन है और यही बिना किसी व्याख्या के इसकी लोकप्रियता और अर्थसंचार में सहायक होता है। जिसे एक बोली में ससन (>श्वसन) कहा जाता है उसे दूसरी में ब्रीदिंग, एक में सन/सुन कहा जाता है वहाँ द्सरी में साउंड और सोनम् । इनके स्रोत और इसलिए भाव आसानी से पहचान में आ जाते हैं और अंतिम सुन>सोनम् किसी एक से दूसरे में प्रवेश का सूचक भी। 

हम यह पाते हैं कि श्वसन के लिए समान सजात शब्द शृंखला में संस/ संस अधिक पुराना है इसका आधार यह नहीं कि बोलियों से लेकर हिंदी तक में साँस प्रचलित है, बल्कि संस्कृत में भी हिंसक आशय के दोनों शस और शंस में भी यही रूप बना रह गया है। केवल साँस लेने के मामले में इसका रूप श्वसन हो गया। परंतु अंग्रेजी में भी श्वसन में हृदयाघात की स्थिति में श्वासरोध पैदा होने पर इसे तत्काल कुछ उपायों से जारी करने के लिए अं. में रि-ससि-टेट (resuscitate) में भी यह झलकता है। सस्पायर - आह भरना, साँस लेना (Suspire [L. suspirare]- to sigh, to breath).  सस का लातिन में सामान्यतः ,सब्स subs> sub अवर-, अध- सूचक उपसर्ग माना गया है, पर  sublime- aloft, lifted on high, suscitate - to exite, to rouse पर अर्थ बदल जाता है, रिससिटेट में सस प्राणवायु का पुनः संचार अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। 

भोजपुरी में विशेषतः महिलाओं की भाषा में एक प्रयोग चलता है संसि देना या न देना।  यह प्रयोग बहुत रोचक है, सामग्री वही है और यदि वह अपेक्षा से कम उतरती  है तो संसि नहीं देती और उससे अधिक की पूर्ति करती है तो संसि देती है। यहाँ संसि - जीवट, बृद्धि, का सूचक है।  संस का अंग्रेजी के सेंस (sense- faculty of receiving sensation, inward feeling> - सेंसेट( sensate) , सेंसेशन sensation, सेंसिबल sensible, सेन्सर ( sensor) आदि से संबंध लक्ष्य किया जा सकता है, अंतर केवल प्राणन का संवेदन और संज्ञान की दिशा में अर्थविस्तार का लगता है।  सुन - (तु. श्वन - श्वान> शून- कुत्ता), अंग्रेजी के सोन- और इससे जुड़ी शब्दावली - सोनोरस, सोनेंट, सोनेट (गीत), सोनोग्राफी आदि । सुनना ऐसी दशा में श्रवण का तद्भव नहीं उससे पुराना श्ब्द सिद्ध होता है।

साँस लेना/पाना  - अब जाकर तनिक साँस मिली है, ब्रीदिग ( breathing space),  साँस फूलना,  साँस चढ़ना, साँस लेने की फुरसत न होना, नीचे की साँस नीचे ऊपर की साँस ऊपर रह जाना जैसे मुहावरे बोलियों में ही चलते हैं।  इन्हें संस्कृत में स्थान नहीं मिला। हिंदी तक अपने प्रसार क्षेत्र  के मुहावरों और लोकोक्तियों को अपनाने में संकोच करती और संस्कृतापेक्षी बनी रहती है जिसका एस कारण यह भी हो सकता है कि कौरवी ही संस्कृत की जन्मभूमि रही है।
साँस और श्वास में कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी पूरबी और कौरवी में, जिसकी प्रकृति पू
श्वास और नि-श्वास  में,  नि-श्वास  और उत्-श्वास  (उछ्वास > उसाँस)/ प्र-श्वास में, श्वास और वि-श्वास में,  श्वास और *आ-श्वास> आ-श्वास-न में,  कितनी दूरी है? 
उतनी ही जितनी प्राकृत भाषा और  कृत्रिम भाषा में।  कृत्रिम जीवन के साथ  हमारी नैसर्गिक  क्षमताएँ घटती  जाती हैं,   और जो सहज था  वह लंबी शिक्षा के बाद भी उतना स्वाभाविक नहीं रह जाता जितना कृत्रिमता अभाव में। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मनुष्य की तैरने की निसर्गजात क्षमता (इंस्टिंक्ट) का लोप और उसे अर्जित करने के लिए अपेक्षित अभ्यास है।  हम यह तक भूल जाते हैं कि किसी प्राचीन चरण पर यह क्षमता हममें विद्यमान थी।  ऊपर के शब्दों का प्रयोग करते समय हममें से कितनों को याद रहता है कि ये शब्द हमारे साँस लेने से उत्पन्न ध्वनि के अनुवाचन (वाणी से उसके उच्चार  का ) है । 

एक और अंतर आता है। अपने (उपसर्जित) उपसर्गों की सहायता से वाले, स्व-नियंत्रित शब्दों को वह किसी आशय से जोड़ सकता है। शब्द और अर्थ की वह अभेद्यता समाप्त हो जाती हो जिसे कालिदास ने वागर्थाविव संपृक्तौ या तुलसी ने गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न कहा है। यही वह कारण है जिससे उपसर्जित शब्दों में अप्रत्याशित या अनियमित अर्थ का आरोपण हो जाता है जिसे   “उपर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते” में सूत्रबद्ध किया गया है।  ध्यान रहे कि ऐसा प्रत्ययों के साथ नहीं होता क्योंकि प्रत्यय का प्रयोग नैसर्गिक भाषा से आया हुआ है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

रामदेव साबित हुए मिलावटी बाबा, पतंजलि शहद के नाम पर बेचती है शक्कर / विजय शंकर सिंह

व्यापारियों के उत्पादों के सैम्पल परीक्षण होते रहते हैं और अक्सर महत्वपूर्ण ब्रांड में भी जब उनकी लैब टेस्टिंग होती है तो, गलतियां मिलती रहती है। पर सबसे आश्चर्यजनक है बाबा रामदेव की पतंजलि कम्पनी के उत्पाद में मिलावट का पाया जाना। रामदेव के उत्पाद पहले भी लैब टेस्ट में फेल हो चुके हैं, और अब भी वे फेल हो रहे हैं।

रामदेव एक व्यापारी के बजाय एक योगगुरु या आयुर्वेद के विश्वसनीय उत्पाद बनाने वाले के रूप में जाने जाते हैं। वे अक्सर शुद्धता, स्वदेशी, शुचिता, और विश्वसनीयता का ढिंढोरा भी पीटते रहते हैं। 2012 - 13 में देश मे चले अन्ना हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन के वे एक बड़े चेहरे थे। काले धन, आयकर, औऱ अन्य आर्थिक मुद्दों पर उन्होंने एक कुशल अर्थविशेषज्ञ के रूप में अपनी राय भी कभी रखी थी। उनके पास देश के काले धन के बारे में सबसे विश्वसनीय आंकड़े भी हैं। वे यह सब कागज़ पत्तर लेकर कई बार टीवी और जन सभाओं में रूबरू भी हो चुके हैं।

पर आज वह एक अपराधी है। आज उनकी कंपनी के उत्पाद में अगर मिलावट मिलती है तो यह निंदनीय है। यह तो उनके चोले और संतई के लबादे का अपमान है। इसका यही अर्थ हुआ कि, योग, आयुर्वेद, राष्ट्रभक्ति की आड़ में वे एक धंधा करते रहे हैं जो न सिर्फ मिलावटी सामान बेचता रहता है, बल्कि वे चीन के उत्पाद का भी प्रयोग करते है। चीन को दुर्लभ रक्त चंदन तस्करी से भेजते हुए भी उनका नाम उस गैंग में आया था। यह अलग बात है कि सत्ता की कृपा उन्हें इन सब झंझटों से बचाये रखती है।

प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी कह गए हैं कि जब अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र पर हावी हो जाता है तो पंडित जी जूते की दुकान खोल लेते हैं। बाबा ने भी एक मोहित शिष्य समाज बनाया। योग के कुछ टिप बताये। लोगों को स्वस्थ रहने के गुर समझाये। लोगों में इसका प्रभाव भी हुआ। कपाल भाति, अनुलोम विलोम, आदि आदिकाल से चले आ रहे विभिन्न प्राणायामों को उन्होंने, टीवी और अन्य प्रचार माध्यमों से घर घर पहुंचाया। लोगों को इसका लाभ भी हुआ। रामदेव की शिष्य और अनुयायी परंपरा में तेजी से वृद्धि भी हुयी।

फिर इस धर्मशास्त्र पर अर्थशास्त्र हावी हुआ और एक कम्पनी खुल गयी पतंजलि नाम से। देश मे स्वदेशी या आयुर्वेदिक चिकित्सा की एक लॉबी है जो इसके पक्ष में काम करती रहती है। इसी लॉबी में राजीव दीक्षित जी भी थे। उन्होंने मल्टीनेशनल कंपनियों और बड़ी दवा कंपनियों के खिलाफ एक अभियान भी छेड़ा था। उनसे मेरी मुलाकात थी। वे प्रतिभावान व्यक्ति थे। उनकी मृत्यु हो गयी और इस पर भी विवाद उठा था। अब भी विवाद उठता रहता है।

पतंजलि स्वदेशी और आयुर्वेद के झंडाबरदार कंपनी के रूप में सामने आयी। धीरे धीरे दवा के कारोबार से बढ़ कर यह कम्पनी, आटा चावल, दाल, से लेकर नूडल और कपड़ो तक के कारोबार में आ गयी। इनके वैद्य बालकिशन की आयुर्वेदिक डिग्री और ज्ञान पर भी सवाल उठ चुका है । हरिद्वार में जमीन के कब्जे औऱ हेराफेरी के भी आरोप इन पर लग चुके हैं । कहने का आशय यह है कि जो भी आपराधिक आरोप किसी भी कारोबारी कंपनी पर लगते रहते हैं, और लग सकते हैं, वे रामदेव, बालकृष्ण और इनकी कंपनी पर लग चुके हैं । इसी क्रम मे यह ताज़ा आरोप है कि इनके द्वारा बनाया जा रहा शहद, मिलावटी है।

रामदेव और उनकी कम्पनी पर लगा आरोप उत्पाद की गुणवत्ता को लेकर है। उनका अपराध मिलावट का है। खाद्य उत्पाद में मिलावट का अपराध जघन्य अपराधों की कोटि में आता है। पतंजलि सहित सभी कम्पनियों के उत्पाद अगर परीक्षण में फेल हो गए हैं और उनमे मिलावट सिद्ध हो गयी है तो, सरकार को चाहिए कि उनके खिलाफ आपराधिक धारा का मुकदमा दर्ज कर उनके खिलाफ कार्यवाही हो। रामदेव अब एक व्यापारी हैं, वैसे ही जैसे अन्य अन्य कम्पनियां व्यापार करती है। यह भी कंपनी, कॉरपोरेट के वे सभी हथकंडे अपनाते हैं जो अन्य कंपनियां अपनाती है। जो भी हो, मिलावट का सीधा असर जन स्वास्थ्य पर पड़ता है। इस अपराध पर सरकार को कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए।

( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 2 December 2020

धर्म के चश्मे से जन आंदोलनों को देखना आत्मघाती और राष्ट्रघाती / विजय शंकर सिंह

अब एक नया तर्क गढ़ा जा रहा है कि इन किसानों को भड़काया जा रहा है। यह भड़काने का काम कांग्रेस कर रही है। कांग्रेस एक विपक्षी दल है और इन कृषि कानूनो को चूंकि सरकार जो भाजपा की है, पारित किया है, तो यह इल्ज़ाम आसानी से कांग्रेस के माथे पर चिपक जाता है। भाजपा को लम्बे समय तक विपक्षी दल रहने का अनुभव प्राप्त है और जब वह विपक्ष में थी तो उसने भी बढ़ती कीमतों, आतंकवाद, भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर, आंदोलन किये हैं तो क्या यह मान लिया जाय कि जब वह विपक्ष में रहती है तो वह भी जनता को सरकार के खिलाफ भड़काती रहती थी। अगर यह तर्क सही है तो क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि जो भी दल जब भी विपक्ष में रहेगा, वह जनता को सरकार के विरोध हेतु भड़काता रहेगा ? फिर तो हर वह आंदोलन जो सरकार की नीतियों के खिलाफ कभी भी हुआ है या आगे होगा, वह नेताओ द्वारा भड़काया ही गया होगा, चाहे वह 1857 का विप्लव रहा हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1975 का जेपी आंदोलन या 1990 का रामजन्मभूमि आंदोलन या 2013 का अन्ना आंदोलन या अब यह आंदोलन जो किसानों द्वारा तीन कृषि कानून के खिलाफ किया जा रहा है। 

दुनिया मे कोई भी आंदोलन जो स्वयंस्फूर्त उठता है वह तार्किक परिणति पर नही पहुंच पाता है, वह अपने लक्ष्य पर पहुंचने के पहले ही विफल हो जाता है। क्योंकि स्वयंस्फूर्तता बिना किसी योजना के और आगा पीछा सोचे बगैर उत्पन्न होती है और ऐसे आंदोलन अक्सर नेतृत्व विहीन हो जाते है। यह अलग बात है कि बाद में आंदोलन के दौरान कोई नेतृत्व उपज जाता है, और अगर वह सक्षम हुआ तो, आंदोलन अपने लक्ष्य तक पहुंचता है अन्यथा वह बीच मे ही असफल होकर भटक जाता है। ऐसे आंदोलनों के भटकने का एक बड़ा कारण, आंदोलन के पीछे किसी स्पष्ट वैचारिकी का अभाव और आंदोलन की सफलता के बाद की क्या कार्य योजना होगी, उसकी अनिश्चितता होती है। 

अब बात मौजूदा किसान आंदोलन की, की जाय। यह आंदोलन स्वयंस्फूर्त नही है बल्कि इसके पीछे अनेक किसान संगठनों की एकजुटता और भूमिका है। विपक्षी दल अगर इस आंदोलन के साथ नही है तो वे फिर सरकार के ही साथ है यह अलग बात है कि वे चोला विपक्ष का ओढ़े हैं। विपक्ष के नेताओ को और किसान कानूनो के जानकारों को इस समय आगे आ कर इन किसान कानूनों के बारे में जनता और किसानों को जाग्रत करना चाहिए। जनता को सरकार की नीतियों के बारे में बताना, उसकी कमियों और खूबियों पर चर्चा करना, क्या परिणाम और क्या दुष्परिणाम होंगे इस पर लोगो को संतुष्ट और आश्वस्त करना, भड़काना नही होता है बल्कि यह एक प्रकार का जनजागरण है। सरकार भी अपने द्वारा बनाये कानून के बारे में लोगो को समझा सकती है और जनता को यह आश्वस्त कर सकती है कि, बनाये गए तीनो कृषिकानून, किसानों के व्यापक हित मे हैं और इससे उनकी आय बढ़ेगी। 

देश का सरकार सनर्थक तबका, जिंसमे पढ़े लिखे मिडिल क्लास के लोग भी हैं आज जिस मोहनिद्रा में लीन है, वह न केवल अपने लिये बल्कि आने वाली अपनी पीढ़ियों के लिये भी अनायास ही एक ऐसी राह पर चल पड़े हैं जो प्रतिगामी है और लंबे दौर में यह दृष्टिकोण, देश, समाज और आने वाली पीढ़ी के लिये घातक होगा। मिडिल क्लास के लिये मैं कुछ तथ्य रखते हुए अपनी बात कहता हूं। 

आप किसान नहीं है इसलिए आप किसानों के इस आंदोलन को फर्जी, देशद्रोह और खालिस्तानी कह कर इसकी निंदा कर रहे हैं। 

आप एक प्रवासी मज़दूर भी नही है, इसलिए आप जब हज़ारो किमी सड़को पर प्रवासी मजदूर घिसटते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे, तो न तो आहत हुए और न ही आप ने सरकार से इनकी व्यथा के बारे में कोई सवाल पूछा। 

आप फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूर भी नहीं हैं जो श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी बदलाव के खिलाफ खड़े हों और सरकार से कम से कम यह तो पूछें कि इन कानूनों में इस समय बदलाव की ज़रूरत क्या है और कैसे यह बदलाव श्रमिक हित मे होंगे।

आप के सामने देखते देखते, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, अन्य तकनीकी शिक्षा की फीस कई गुना बढ़ गयी। लाखो रुपये अस्पताल में इलाज पर खर्च कर के, इस महामारी में, लोग अपने घर या तो स्वस्थ हो कर आये या मर गए। पर सरकार की कितनी जिम्मेदारी है इस महामारी में जनता को सुलभ इलाज देने  की, इस पर एक भी सवाल सरकार से नहीं पूछा गया। आप इससे सीधे प्रभावित होते हुए भी मौन बने रहे। एक शब्द भी विरोध का नहीं कहा और न ही सरकार से पूछा कि ऐसा क्यों किया जा रहा है ?

आप के सामने देखते देखते लाभकारी सार्वजनिक कम्पनियों को, सरकार निजी  क्षेत्रो को अनाप शनाप दामो पर बेच रही है, पर आप इस लूट की तरफ से आंख मूंदते जा रहे है और सरकार से एक छोटा सा सवाल भी नहीं पूछ पा रहे हैं कि आखिर इन छह सालों में ऐसा क्या हो गया कि घर के बर्तन भाडे बिकने की कगार पर आ गए ?  

सरकार ने नोटबन्दी में देश की आर्थिकि गति को अवरुद्ध कर दिया। जो उद्देश्य थे , उनमे से एक भी पूरे नहीं हुए। प्रधानमंत्री ने सब ठीक करने के लिये 50 दिन का समय रिरियाते हुए मांगे थे।  न जाने कितने 50 दिन बीत गए, आप ने सरकार से तब भी नहीं पूछा कि आखिर नोटबन्दी की ज़रूरत क्या थी और इसका लाभ मिला किसे ? 

बाजार की महंगाई से आप अनजान भी नही है। आटे दाल का भाव भी आप को पता है। आप उस महंगाई से पीड़ित भी है, दुःखी भी, और यह सब भोगते हुए भी, आप सरकार के सामने, जिसे आपने ही सत्ता में बैठाया है, कुछ कह नहीं पा रहे हैं। जो कुछ कह, पूछ और आपत्ति कर रहा है, उसे आप देशविरोधी कह दे रहे है। क्योंकि आप के दिमाग मे यह ग्रँथि विकसित कर दी गयी है कि, सरकार से पूछना ईशनिंदा की तरह है। जब आप जैसी जनता होगी तो कोई भी शासक, तानाशाह बन ही जायेगा । 

बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, बैंकिंग सेक्टर से एक एक कर के निराशाजनक खबरें आ रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य जो सरकार का मूल दायित्व है से सरकार जानबूझकर पीछा छुड़ा रही है। पर द ग्रेट मिडिल क्लास अफीम की पिनक में मदहोश है। 

यह एक नए तरह का अफीम युद्ध है। यह एक नया वर्ल्ड आर्डर है जो असमानता की इतनी चौड़ी और गहरी खाई खोद देगा कि विपन्नता के सागर में समृद्घि के जो द्वीप बन जाएंगे उनमे द ग्रेट मिडिल क्लास को भी जगह नहीं मिलेगी वह भी उसी विपन्नता के सागर में ऊभ चूभ करने लगेगा। 

किसानों ने एक बड़ा मौलिक सवाल सरकार से पूछा है कि, 
● यह तीन कृषिकानून किन किसानों के हित के लिये लाये गए है ? 
● किस किसान संगठन ने इन्हें लाने के लिये सरकार से मांग की थी ? 
● इनसे किसानों का हित कैसे होगा ? 

आज तक खुद को जागरूक, अधुनातन और नयी रोशनी में जीने वाले द ग्रेट मिडिल क्लास का कुछ तबका यह ऐसा ही सवाल, नोटबन्दी, जीएसटी, लॉक डाउन, घटती जीडीपी, आरबीआई से लिये गए कर्ज, बैंकों के बढ़ते एनपीए आदि आदि आर्थिक मुद्दों पर सरकार से पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका। 

और तो और 20 सैनिकों की दुःखद शहादत के बाद भी प्रधानमंत्री के चीनी घुसपैठ के जुड़े इस निर्लज्ज बयान कि, न तो कोई घुसा था, और न कोई घुसा है,  पर भी कुछ को कोई कुलबुलाहट नहीं हुयी वे अफीम की पिनक में ही रहे। 

और जो सवाल पूछ रहे हैं, वे या तो देशद्रोही हैं, या आईएसआई एजेंट, अलगाववादी, अब तो खालिस्तानी भी हो गए, वामपंथी, तो वे घोषित ही है। पर आप क्या है। हल्का सा भी हैंगओवर उतरे तो ज़रा सोचिएगा। 

इसका कारण, है थोड़ा बहुत भी द ग्रेट मिडिल क्लास के पास खोने के लिये, जो शेष है, वही आप के पांवों में बेडियां बनकर जकड़े हुए है। जब खोने के लिये वह भी शेष नहीं रहेगा तब आप भी जगेंगे, और इस पंक से कीचड़ झाड़ते हुए उठेंगे, पर उठेंगे ज़रूर। पर तब तक बहुत कुछ खो चुका होगा। बहुत पीछे हम जा चुके होंगे। 

इस में आप शब्द किसी व्यक्ति विशेष को लेकर नहीं प्रयुक्त हुआ है। इस आप मे, आप सब भी हैं, मैं भी हूँ, हम सब हैं, फ़ैज़ के शब्दों में कहूँ तो, 'मैं भी हूँ औऱ तू भी है' जो इस द मिडिल क्लास की विशालकाय अट्टालिका में एक साथ रहते हुए भी अलग अलग कंपार्टमेंट जैसे अपार्टमेंट में  खुद को महफूज समझने के भ्रम में मुब्तिला हैं। 

जनता, सरकार विरोधी हो सकती है, उसे सरकार विरोधी होना भी चाहिए, क्योंकि उसने सरकार को, उसके वादों के आधार पर ही चुना है और जब सरकार वह वादे पूरा न करने लगे तो जनता का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि, वह सरकार के संवैधानिक दायित्व को याद दिलाये।सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं है बल्कि इतिहास में ऐसे क्षण भी आये हैं, जब सरकार ने खुद ही अपने लोगों के स्वार्थ में वशीभूत हो कर संविधान के विरुद्ध आचरण किया है। 

तब जनता का यह दायित्व और कर्त्तव्य है कि वह सरकार को संवैधानिक पटरी पर लाने के लिये सरकार का विरोध, सवैधानिक तरह से करे। सविधान के समस्त मौलिक अधिकार, इसी लिये जनता को शक्ति सम्पन्न भी करते हैं। 
लेकिन सरकार जनविरोधी नहीं हो सकती है। क्योंकि वह जनता द्वारा ही अस्तित्व में लायी गयी है। संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करता है, व्यक्तिगत अस्मिता की बात है, हर व्यक्ति को अपनी बात कहने और सरकार से निदान पाने का अधिकार है। 

अब जब यह कहा जा रहा है कि पंजाब के किसान ही क्यों सड़को पर हैं तो यह बात, सरकार को उन्ही से पूछनी चाहिए कि, वे क्यों सड़कों पर हैं और उनकी समस्या का निदान सरकार को ढूंढना चाहिए। जिसे कष्ट होगा, वही तो अपनी बात कहने सड़को पर उतरेगा। 

आज जिस खालिस्तान, पाकिस्तान औऱ हिंदू राष्ट्र की बात की जा रही है, वह मुर्दा द्विराष्ट्रवाद का एक बिजूका है बस। निर्जीव पुतला। खालिस्तान की अवधारणा भी उसी मानसिकता की देन है जिसने 1947 में पाकिस्तान बनवाया था और 1937 में हिंदू राष्ट्र का राग अलापा था। अगर आप धर्म आधारित राष्ट्र, जो आजकल एक नए मोड में हिंदू राष्ट्र कह कर  बहुप्रचारित किया जा है के समर्थन में हैं तो, खालिस्तान की अवधारणा के विरोध का कोई आधार आप के पास नहीं है। प्रकारांतर से हिंदू राष्ट्र के पैरोकार, धर्म आधारित एक और राष्ट्र खालिस्तान के विचारों का ही पोषण करते हैं। 1947 में देश ने धर्म आधारित राष्ट्र की अवधारणा को ठुकरा कर एक पंथनिरपेक्ष संविधान को अंगीकार किया है। पाकिस्तान, खालिस्तान और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा एक विभाजनकारी अवधारणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस मृत हो चुके द्विराष्ट्रवाद को एक बिजूके की तरह खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, उसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। खालिस्तान की अवधारणा को खुद सिक्खों ने ही खारिज़ कर दिया है। यह अब कहीं नही है। और अगर है भी तो यह केवल उन्ही के दिमाग मे है, जो 'धर्म ही राष्ट्र है' की थियरी की शव साधना यदा कदा करते रहते हैं। हम धर्म आधारित किसी भी राष्ट्र की चाहे वह पाकिस्तान हो, खालिस्तान हो या हिंदू राष्ट्र की अवधारणा हो, के खिलाफ थे, हैं और आगे भी रहेंगे। 

( विजय शंकर सिंह )