Wednesday, 4 November 2020

कविता - तितली / विजय शंकर सिंह

पत्थर की हो रही है, 
यह दुनिया, 
जहां न फूल बचे हैं, 
न सुगंध, न तितली, 

इंसान भी हुए तो, 
दिल पत्थर के, 
ज़ुबा, बेजुबां जैसी, 
न कोई जज़्बात, 
न कशिश, न मुहब्बत, 
न मुहज्जब.

बस चलते फिरते बुत, 
खूबसूरत पत्थरों के तराशे, 
किसी काबिल और 
हुनरमंद संगतराश के औजारों 
के खूबसूरत नमूने जैसे.

क्या कीजे, 
इस बेरंग दुनिया का, 
न फूल, न खुशबू, 
न नमी, न तितली, 
न रंग, न रंगत, 
न सोहबत, न इश्क़।

हर तरफ, चलते फिरते, 
दौड़ते भागते, 
बुत, बेजान और बेदिल से.

कहां चली गयी वह दुनिया, 
इसी फिक्र में मुब्तिला है, 
वह नन्ही सी खूबसूरत, 
रंगों  भरी तितली !!

( विजय शंकर सिंह )
यह कविता आप इस लिंक पर मेरी आवाज में सुन भी सकते हैं। 
https://youtu.be/wPvIFuRtc28

संस्मरण - दंगा 1984 : धर्म और जाति से प्रेरित दंगे देश की एकता के लिये अभिशाप हैं / विजय शंकर सिंह

धर्म के नाम पर हुए उन व्यापक दंगो या नर संहारो को याद रखा जाना चाहिए। उन्हें याद रखना इसलिए भी ज़रूरी है कि ताकि धर्मान्धता या अन्य पागलपन के दौर में हम, जो अक्सर भूल जाते हैं कि हम एक अदद इंसान भी हैं, उसे न भूले। सन 84 हमारे आंखों के सामने गुजरा है। तब हम नौकरी में थे और ऐसे हादसे देखे भी और सुने भी। धर्म और जाति से प्रेरित दंगे देश की एकता के लिये अभिशाप हैं। 1984 के दंगों के बाद पंजाब ने आतंकवाद का जो दौर देखा वह अब तक के इतिहास का सबसे दुःखद दौर रहा है। लेकिन वह दौर भी बीत गया। लेकिन उस दौर में जिनके घर के लोगों ने चाहे वे सुरक्षा बलों में रहे हों या निर्दोष नागरिक, अपने मित्र और परिजनों को खोया है, उनकी कसक आज भी उनके घर परिवार के दिलों में चुभती होगी। मृत्यु का दंश कभी नहीं भूलता, औऱ अगर वह असामयिक और अपराधजन्य हो तो उसकी टीस जीवन भर सालती रहती है। दंगो में होने वाली मौतें ऐसी ही व्यथित करती रहती हैं।

कहते हैं ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के कारण आहत दो सिख सुरक्षा अधिकारियों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी। ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार, अमृतसर के दरबार साहिब में फौजी ऑपरेशन का नाम था। दरबार साहिब, जरनैल सिंह भिंडरावाले के आतंकी साथियों की पनाहगाह बन गया था। अंदर ऐसे आतंकियों का कब्ज़ा हो गया था जो पूरे पंजाब के लिये खतरा बन गए थे। उसी दरबार साहब में एक डीआईजी की जब वे दर्शन करने जा रहे थे तो उनकी हत्या कर दी गयी थी। तब सेना ने अंदर से भिंडरावाले और उसके साथियों को निकाल बाहर करने के लिये यह ऑपरेशन किया गया था।

इस ऑपरेशन में भिंडरावाला तो मारा ही गया, साथ ही, अधिकृत आंकड़ो के अनुसार, 493 आतंकी और अन्य नागरिक भी मारे गए । इस ऑपरेशन का नेतृत्व ले.जनरल के सुंदरजी ने किया था। यह घटना सिख समाज को आहत करने वाली थी। इसका असर भी बहुत व्यापक पड़ा। न केवल इस कारण इंदिरा गांधी की हत्या हुयी बल्कि रामगढ़ स्थित सिख लाइट इन्फैंट्री में विद्रोह भी हो गया, जिसे समय रहते नियंत्रित कर लिया गया। 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या होती है और पहली नवम्बर की शाम तक दिल्ली में सिख विरोधी दंगे भड़क उठते हैं। यह बिल्कुल इकतरफा दंगे थे और इन दंगों में सरकारी सूचना के अनुसार 3,500 लोग मारे गए थे। हालांकि गैर सरकारी सूत्र यह आंकड़ा 8 हजार से 10 हजार के बीच बताते है। देश भर के कुल 40 शहर इन दंगों से प्रभावित रहे।

मैं 1984 में चुनार में सीओ चुनार था। चुनार, मिर्जापुर जिले का एक कस्बा है  जो बनारस से लगा हुआ है। अचानक 2 नवम्बर की सुबह सुबह मेरे इंस्पेक्टर कैसी मिश्र मेरे आवास पर आए औऱ उन्होंने कहा कि, सर बनारस में बड़ा बवाल हो गया है और वहां लोग सरदारों को मार रहे हैं और उनकी दुकान जला रहे हैं। पहले तो हैरानी हुयी कि, यह कैसा दंगा ? हम सब तो हिंदू मुस्लिम दंगे देखने और सुनने के आदी थे पर यह तो बिल्कुल ही एक नयी बात थी। तब थानों में फोर्स कम रहती थी औऱ अतिरिक्त फोर्स मुख्यालय से मांगने पर मिलती थी। सुबह के 5 बज रहे थे। मैं चुनार तहसील कैम्पस में ही बने एक आवास में रहता था और मेरे बगल में ही एसडीएम का आवास था। मेरे साथ एसडीएम वर्मा जी थे जो नौकरी में मुझसे सीनियर थे। तब फोन जैसी सुविधा कम ही थी। मैंने इंस्पेक्टर साहब से कहा कि, वे एसडीएम साहब को भी यह सब बता दें तब तक मैं दैनिक क्रिया से निवृत होकर एसडीएम साहब के ही यहां आ जाता हूँ। फिर इंस्पेक्टर साहब, एसडीएम आवास की तरफ चले गए और मैं तैयार होने चला गया।

थोड़ी देर में जब मैं वर्दी पहने बाहर आया तो देखा कि एसडीएम साहब और इंस्पेक्टर साहब मेरे घर के लॉन में चहलकदमी कर रहे थे। हम तीनों आकर ड्राइंगरूम में बैठ गए। एसडीएम साहब ने तहसीलदार को भी बुला लिया और तब हमने इंस्पेक्टर साहब से पूछा कि अब क्या किया जाना चाहिए। इंस्पेक्टर साहब ने कहा कि पूरे चुनार में लगभग 20 परिवार ही सिख हैं, जिन्हें अगर चुनार के किले में स्थित पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के बैरक और आवास में कुछ दिनों के लिये रख दिया जाय तो ठीक होगा। कम से कम इनके साथ कोई हादसा तो नहीं होगा। फिर इनके घर मकान और दुकानों के लिये कुछ फोर्स लगा दी जाएगी। हमे उनकी बात जमी। अब एसडीएम साहब ने कहा कि आप तब तक पीटीएस के कमांडेंट साहब से बात कर यह व्यवस्था देखिए, तब तक मैं तैयार होकर डीएम साहब से संपर्क करता हूँ।

इसके बाद ही मिर्जापुर मुख्यालय से हमारे एसपी साहब का फोन आ गया। उन्होंने भी स्थिति की गम्भीरता बताई और उनके फोन से ही यह जानकारी मिली की दिल्ली, कानपुर आदि शहरों में बडे दंगे शुरू हो गए हैं। मैं सीधे चुनार के किले में जहां पीटीएस था वहां पहुंचा और सुबह के 8 बज रहे थे तो सीधे ही कमांडेंट आवास पर ही चला गया। कमांडेंट साहब को सारी बात बताई गई और उन्होंने तुरंत ही क्वार्टर मास्टर को बुला लिया और कहा कि आज कल कोर्स तो चल नहीं रहा है, जितनी ज़रूरत हो बैरक खुलवा दीजिए और मेस भी चालू करा दीजिए। मैं यह सब इंतज़ाम कर के सीधे चुनार थाने पर आया और फिर इंस्पेक्टर साहब से कहा कि आप अब सबको किले में भेजने और वहां रुकने की व्यवस्था कीजिये। यह कह कर मैं फिर सीधे एसडीएम साहब के यहां आ गया। उन्हीं के यहां नाश्ता कर के हम दोनों अपने दफ्तर में आ गए। एसडीएम और सीओ के दफ्तर एक ही भवन में अगल बगल थे।

दोपहर तक जब तक कस्बे में सबको कुछ पता चलता, सारे सिखों के परिवार किले में पहुच गए थे और उनके घरों तथा दुकान की सुरक्षा व्यवस्था हो गयी थी। शाम तक कस्बे के कुछ गणमान्य लोगो को जब यह सब पता चला तो उनमे से कुछ लोग मेरे पास आये और कहा कि यह तो हम सबके प्रति एक अविश्वास करना हुआ, हम सब यह भरोसा दिलाते हैं कि चुनार में ऐसा कुछ नही होगा। उनको, देश भर से जो खबरें आ रही थीं बताया गया और कहा गया कि कोई असामाजिक तत्व ऐसे माहौल का लाभ उठा कर कोई अपराध न कर दे, इस लिये यह इंतज़ाम एहतियातन किया गया है। आप सब किले में जाकर उनसे मिल सकते हैं। उनके घर और उनकी दुकानें कस्बे में ही हैं, उनकी हिफाजत करें। तब तक एसडीएम भी आ गए और फिर सबको समझा कर वापस भेज दिया गया और यहां की स्थिति से डीएम एसपी को भी अवगत करा दिया गया।

3 नवंबर को अचानक मेरी ही सर्किल के एक थाने कछवा में कुछ घटना हो गयी। चुनार से कछवा जाने का रास्ता गंगा नदी को पीपे के पुल से पार कर जाना पड़ता था और कछवा पुलिस सर्किल चुनार में था पर वह राजस्व मामलो में, तहसील सदर में पड़ता था, जिसके एसडीएम गणेश शंकर त्रिपाठी थे जो मिर्जापुर में रहते थे। उन्होंने सुबह सुबह यह खबर भेजी कि आप चुनार से कछवा पहुंचिए और मैं मिर्जापुर से वहां पहुंचता हूँ। दोनो ही थाना कछवा पर मिलेंगे। डेढ़ घँटे में हम दोनों कछवा पहुंच गए और वहा दोपहर मे एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। हमारे थानाध्यक्ष को यह सूचना थी कि सभा के बाद ही हो सकता है बवाल हो। तब तक बनारस इलाहाबाद कानपुर में जगह जगह कर्फ्यू लग गए थे। जब हर जगह बवाल था तो अतिरिक्त पुलिस मिलती भी कहाँ से। बाद में यह सभा स्थगित करा दी गयीं और कस्बे में ही सारी दुकानें बंद करा दी गयी। लोग आक्रोशित होकर थाने आये। थाना कैम्पस में ही एक शोक सभा आयोजित की गयी। इन्दिरा जी के एक चित्र पर माल्यार्पण हुआ और कुछ लोगों ने भाषण दिए। एक घँटे में यह कार्यक्रम खत्म करा कर, रात होते होते बाजार खाली करा दिया गया।

4 नवंबर को बनारस से सारे अखबार आये तब जाकर इस दंगे की भयावहता का पता लगा। मिर्जापुर एक छोटा शहर है और चुनार तो एक कस्बा ही है। अब ज़रूर कुछ जनसंख्या बढ़ गयी होगी। वहां कोई ऐसी बड़ी घटना इसलिए भी नही हुयी कि लोग भी काफी समझदार थे और लोगो मे आपसी प्रेम भी था। लेकिन जब मैं दो साल बाद 1986 में कानपुर स्थानांतरित होकर आया तब इस दंगे की भयावहता के चिह्न दिखे और लोगो से किस्से सुने। यूं तो यह खबर अखबारों में भी आ चुकी थी कि, दिल्ली, कानपुर और बोकारो में सबसे अधिक हिंसा और लूटपाट हुयी थी। इन सबकी जांच के लिये जस्टिस रंगनाथ मिश्र जांच आयोग भी बैठा था। मैं जब कानपुर पहुंचा तो जस्टिस रंगनाथ मिश्र न्यायिक जांच आयोग का काम खत्म हो चुका था और आयोग ने दंगो से जुड़े मुकदमो की तफ्तीश करने के लिये एक प्रकोष्ठ का गठन किया था, जिंसमे कुछ इंस्पेक्टर और सब इंस्पेक्टर थे जो इन मुकदमो की तफतीशें कर रहे थे।

27 जलाई 1986 को मैं कानपुर पहुंचा और वहां मुझे सीओ स्वरूपनगर बनाया गया। साथ ही 1984 के दंगों में दर्ज मुकदमो की तफ़्तीशो के लिए गठित सेल का प्रभारी भी। अधिकतर मुकदमे निपटाए जा चुके थे। कुछ शेष थे। इसके अलावा पुलिस दुर्व्यवहार की कुछ जांचे थी। इन जांचों के दौरान मुझे कानपुर के सिख समाज से बहुत मिलना जुलना हुआ और उनसे जब उन दंगो के बारे में पूछताछ की गयी तो ज्ञात हुआ कि जितनी भयावहता का अनुमान मैं लगा रहा था, दंगे उससे कहीं अधिक भयावह थे। जले हुए घर, लुटी दुकानें और अपने प्रिय परिजनों को खोए हुए सिख परिवार, अपनी बर्बादी और दुःख की कहानी बताते बताते उदास तो हो जाते थे, पर उनकी जिजीविषा बची थी। कम से कम सत्तर अस्सी सिख परिवारों में जाने और उनसे मिलने का अवसर मुझे मिला और वे सभी समृद्ध कारोबारी थे। मैंने सोचा, क्या नियति है। 1947 के बंटवारे को झेल कर ये परिवार अभी अपने जीवन को सुव्यवस्थित कर,  तरक़्की की राह पर चढ़ ही रहे थे कि फिर उन्हें यह हादसा झेलना पड़ा। पर यह भी समझ मे आ गया कि संकटों के इस झंझावात से जूझने की गजब की क्षमता इस कौम में हैं।

1984 के दंगों में दोषी पकड़े भी कम गए। अधिकतर मुकदमे भीड़ के खिलाफ थे और भीड़ की पहचान मुश्किल से ही होती है। तब न सीसी टीवी कैमरे थे और न ही मोबाइल फोन के कैमरे क़ि मुसीबतों में कुछ सुबूत मिल सकें। कुछ को लोग पहचान भी रहे थे तो उन्होंने उनके नाम लेने से मना भी कर दिया। पुलिस के पास कुछ के बारे में जानकारी थी पर सुबूत नहीं थे। ऐसे ही जांच कार्य मे निकलने पर जब ड्राइवर से बात होती थी तो ड्राइवर ने बताया कि, दंगे के समय, हर तरफ तो आग और धुआं था, यह तय करना मुश्किल था कि किधर पहले जाया जाय। फ्रिज, टीवी, कूलर लूट कर ऐसे घरों में भरे थे जिनके घर बिजली के कनेक्शन तक नही थे।  बाद में यह मुनादी कराई गयी कि, जिसके घर मे लूट का सामान हो वह वापस सड़क पर रख दे। इस मुनादी से लोगो ने काफी सामान सड़क पर फेंक भी दिया।

धीरे धीरे सब चीजें सामान्य हो गयीं, पर यह पागलपन का दौर पीड़ित लोगों के मन में कीचट सा जम गया था। सिख विरोधी दंगो का कोई इतिहास है भी नही और यह दंगे भी अचानक भड़के थे। लेकिन इस अचानक भड़के दंगे में भी लूटपाट और हिंसक गतिविधियां सुनियोजित तरीके से ही हुयी। कुछ बेहद नामचीन लोगों के नाम इन दंगों के भड़काने वालों में शामिल थे, जिनका नामोल्लेख करना अब उचित नही होगा। 1987 के बाद यह सारे मुकदमे क्राइम ब्रांच सीआईडी को भेज दिए गए। अधिकतर मामले अंतिम आख्या से ही समाप्त हुए। कुछ में चार्ज शीट लगी भी तो उनमे अभियुक्त छूट गए। अगर कुछ मामलों में सज़ा हुयी भी होगी तो, उनके बारे में मुझे जानकारी नही है।

भीड़ द्वारा लूटपाट और सामूहिक हिंसा के मामलों में अक्सर सज़ा नही होती है। इसका एक बड़ा कारण होता है अभियुक्त की पहचान औऱ उसके खिलाफ सुबूतों का न होना। दंगे चाहें  मेरठ, अलीगढ़ मुरादाबाद आदि शहरों के हों या 1984 के सिख विरोधी दंगे या 2002 के गुजरात के दंगे, इन सबमे भीड़ द्वारा हिंसा की गई और सबमे मुकदमे दर्ज हुए हैं। अधिकतर लोगों को दंगे कराने वालों के बारे में भी पता है, पर जब सब कुछ शांत हो जाता है तो फिर लोग इसे नियति समझ कर भुला देना चाहते हैं। सिख दंगो की जांच के दौरान मैंने यह अनुभव किया कि, जब लिखित बयान लिए जा रहे थे तो लोग उन नामो को जो असरदार और राजनीतिक रसूख वाले लोग थे, को बताने में संकोच करते थे पर जब कागज़ कलम रख दिया जाता था तो फिर अनौपचारिक रूप से उन सबके नाम वे खुल कर बताते भी थे और उनके द्वारा की गयी हरकतें भी। यह स्थिति तो पुलिस तफतीश के समय की है। अब जब यह मुकदमा अदालत में ट्रायल पर जाएगा तो गवाह कितना मज़बूत होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अधिकतर मुकदमो के अदालत से छूटने का यह भी एक बड़ा काऱण है।

दिल्ली में ही देख लें, जहां सबसे हिंसक दंगे भड़के थे उसके अपराधियों का क्या हुआ ? 1984 में सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में दिल्ली की एक अदालत ने 34 साल बाद नवंबर 2018 में, दोषी यशपाल को मौत की सजा और दूसरे दोषी नरेश को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। एक और अभियुक्त और कांग्रेस के नेता सज्जन कुमार को भी पहले सज़ा दी जा चुकी है जो अपील में रद्द हो गई। इन आरोपियों को हत्या, हत्या की कोशिश, लूटपाट, आगजनी व अन्य धाराओं में दोषी करार दिया गया था। लम्बे इंतज़ार के बाद यह सजा , आपराधिक न्याय प्रणाली का एक उपहास ही है। इसी प्रकार कानपुर में भी दंगों के दौरान 127 सिखों की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में बहुत दिनों तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई। बाद में जब एफआईआर दर्ज की गई तो स्टेटस रिपोर्ट में कोई पुख्ता सबूत न होने की बात कह कर केस खत्म कर दिया गया। सिख संगठनों का कहना है कि यह शर्मनाक है कि 127 लोगों की हत्या हो गई और पुलिस को कोई सबूत इन मामलों में नहीं मिला।

आज जब हम श्रीमती इंदिरा गांधी को उनकी दुःखद और जघन्य हत्या के लिये खालिस्तानी आतंकियों को दोषी ठहराते हैं और वे हैं भी, तो चार पांच दिनों तक चलने वाले इस जघन्यतम एकतरफा दंगे के अपराधियों और उनके अपराध की चर्चा भी की जानी चाहिये। अगर अब भी कोई मुकदमा चल रहा है तो यह उम्मीद की जानी चाहिये कि दोषियों को कानून सज़ा दे। आज के दिन हम कम से कम उन निरीह और मासूम व्यक्तियों को,  जिन्हें एक धर्म विशेष का होने के कारण 1 नवम्बर से 5 नवम्बर 1984 तक चुन चुन कर बेहद वहशियाना तरीके से मार डाला गया था, याद किया जाना चाहिये। हमे यह उम्मीद भी करनी चाहिए कि, अब देश मे ऐसा पागलपन न फैले जैसा 1984 के सिख विरोधी दंगो और 2002 के गुजरात दंगों सहित ऐसे ही अन्य दंगो में फैल चुका है।

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 3 November 2020

विश्व राजनीति और नयी विश्व व्यवस्था

अमेरिकी जॉर्नल  "Foreign Policy"  में वरिष्ठ पत्रकार माइकल हर्श की एक आर्टिकल में  इन वाक्यों से शुरआत है कि  इतिहास में जितने भी निरंकुश शासक हुए हैं, अपने अंत का  शिल्प उन्होंने ख़ुद रचा। आज ट्रंप, पुतिन, अर्दोगान, मोदी, जायर बोल्सोनारो या जिनपिंग अगर सत्ता को निरंकुशता की ओर धकेलते हैं तो कल वे अपनी पतनगाथा भी स्वयं तैयार करते मिलेंगे। 
यह चिंता तब पैदा लेती है जब ये शासक वर्ग अपनी सत्ता के लोकतांत्रिकरण से बचते तथा  जनता में अपनी तात्कालिक लोकप्रियता को साधन बनाकर अपनी सत्ता को  स्थायी अथवा शाश्वत बनाने के स्वप्न को साकार करने में अहर्निश जुटे दिखते हैं। जनता के बीच लोकप्रिय बनने के लिए ये शासक जिन अस्त्रों का इस्तेमाल करते हैं वे वही चिरपरिचित अस्त्र हैं जिन्हें अतीत में फ़ासीवादी, सैन्यवादी शासक मुसोलिनी और हिटलर समेत  20वीं सदी के अन्य सर्वाधिकारवादी सत्ताधीशों स्पेन के फ़्रैंको, पोर्तूगाल के सालाज़ार, तुर्की, पाकिस्तान, लीबिया,चिली, अल्जीरिया, इंडोनेशिया, बर्मा, ज़ायरे इत्यादि मुल्क़ों के सैनिक तानाशाहों ने किया था। 

लोकतांत्रिक देशों में अधिकारवादी सत्ता की स्थापना का उपक्रम उन्हीं आर्थिक संकटों से पैदा राजनीतिक संकटों का परिणाम है जिसने 1930-31 के महामंदी को फ़ासीवादी सत्ता की पृष्ठभूमि बनाया था। शीतयुद्धोत्तर काल में जब समाजवादी विश्व का ध्वंस हुआ तो पूंजीवाद को खुला खेलने की छूट मिल गयी। बाधारहित शोषण से विश्व पूंजीवाद ने जो आक्रमकता दिखाई वह आमजनता या राष्ट्रों की समस्याओं के समाधान के बज़ाय उसको और अधिकगहरे आर्थिक संकट में ढकेलते चला गया।  इस गहरे संकट से उबरने के जितने प्रयास हुए या हो रहे हैं जनता पर मुसीबतों के उतने पहाड़ टूटते चले जा रहे हैं। अमेरिका से लेकर भारत तक  अर्थव्यवस्था तथा रोजगार की दशा में रिकार्ड गिरावट के जारी दौर के आँकड़ों से यह स्वयं सिद्ध है।

ज्यों ज्यों यह संकट बढ़ता जा रहा है, त्यों त्यों वर्ग संघर्ष की आसन्न आशंकाएं भी बढ़ती जा रही है । वर्ग संघर्ष की बढ़ती इन आशंकाओं से तथा क्रोनी कैपिटलाइजेशन के तहत इज़ारेदार कारपोरेट हाउस द्वारा ग़ैर इज़ारेदार घरानों के द्वारा पूंजी बटोरने और अत्यधिक मुनाफे की अंधी होड़ के चलते पूंजीपति वर्ग में भी अंतर्विरोध अपरिहार्य रूप से गहराता चला जा रहा है। 

ऐसी अवस्था में सत्ता पर उठनेवाली आँच की संभावना की भी अनदेखी अधिक देर तक नहीं की जा सकती है जो इन शासकों के अहंकारोन्माद से सीधे टकराव का रूप ग्रहण करता है। कोरोना संकट ने और आग में घी का काम कर दिया। भारतीय प्रधानमंत्री की इस घोषणा को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है जब वह कहते हैं कोरोना की आपदा को अवसर में बदलना हम जानते हैं। 

इस दिशा में चाहे अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप हो, रूस के राष्ट्रपति पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, तुर्की के प्रधानमंत्री रासिप तैयब अर्दोगान, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या लातिनी अमेरिकी देश ब्राज़िल के तानाशाही निज़ाम के नेता राष्ट्रपति बाल्सनारो सभी कोरस में गान कर रहे मिलते हैं। आक्रामक विदेश नीति, आक्रामक राष्ट्रवाद, आक्रामक केंद्रीयकृत सत्तावाद, और बहुलतावाद के स्थापित मूल्य की ज़गह आक्रामक धर्मोन्मादी बहुसंख्यावाद इन शासकों की नीतियों की कमोबेश पहचान बन चुकी है। 

प्रधानमंत्री मोदी के "नमस्ते मित्र"  और "हाउ दी मोदी" के नायक सबसे शक्तिशाली पार्टनर ट्रंप की विदेशनीति के लक्ष्य को आँकिए। विश्ववर्चस्वतावाद के ज़रिए अपने देश की जनता की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को तुष्ट करना उनका परम उद्देश्य है जहाँ इनके दो प्रतिस्पर्धी पुतिन और शी जिनपिंग इन्हें चुनौती देकर अपनी अपनी जनता की राष्ट्रीय मानसिकता को शांत कर अपनी सत्ता के लिए लोकप्रिय समर्थन जुटाते हैं। 

मोदी जी का  इस्लामिक चेहरा अर्दोगान को कह सकते हैं। जैसे मोदी जी और उनकी पार्टी ने शर्की वास्तुकला का अद्भुत नमूना ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद को मिसमार कर यहाँ राममंदिर की तामीर कर रहे हैं उसी तरह तुर्की के यूरोपीय शहर इस्तांबुल में जो पहले बिजेंताइन ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन साम्राज्य जिसे पूर्वी रोमन साम्राज्य भी कहते हैं की राजधानी कुस्तुंतुनिया कहलाता था, 6ठी शताब्दी के अया सोफिया के गिरिजाघर को, जो म्यूजियम का रूप ले चुका था पुनः मस्ज़िद में तब्दील कर  दिया है। अर्दोआ़न सिर्फ़ इतना ही कर अपनी जनता से वाहवाही लूट कर काम समाप्त नहीं समझते हैं बल्कि लीबीया से लेकर, ग्रीस, उत्तर पश्चिम भूमध्यसागरीय तट से दक्षिण पूरब भूमध्यसागर के तेलभंडार तक तथा सीरिया, इराक़ी कुर्दिस्तान और ईरान तक अपनी धौंस अजमाकर तुर्क जनता को राष्ट्रोन्माद-धर्मोन्माद के नशे में डूबे देना चाहते हैं ताकि पूंजीवादी संकट से उपजी परेशानियां उन्हें दिखाई न दे। ज्ञातव्य है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तुर्की की अर्थव्यवस्था 5% की जीडीपी के रेकॉर्ड निचले स्तर के साथसबसे घोर संकट मे है जहाँ बेरोजगारी की दर 17% पर पहुँची हुई है। स्वभाविक है इस वास्तविक मुद्दे से जो असंतोष ही नहीं विप्लव के लिए काफ़ी है ध्यान बंटाने के लिए धार्मिक उन्माद और राष्ट्रोन्माद से बेहतर आसान उपाय क्या होगा! 

 रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी चेचन्या, जॉर्जिया,क्रीमिया, उक्रेना, सीरिया आदि में अपने कारनामे से अपनी जनता की भावना को गुदगुदाकर अपनी सत्ता के चिरस्थायित्व के लिए  स्वीकृति ले ली है । इतिहास गवाह है कि पहले भी जिन जिन ने इस प्रकार स्वीकृति ली वे आजीवन सत्ता पर क़ायम नहीं रह पाये । इंडोनेशिया के सुकार्णो भी इसी श्रेणी में थे। पहले ही सत्ता से गिरा दिये गए। पुतिन ने इसके लिए संवैधानिक संस्थानों के साथ वही व्यवहार मचा रखा है जो व्यवहार उनके समकक्ष भारत, तुर्की, ब्राजील, अमेरिका तथा चीन में करते हुए मिलते हैं। 

चीन के वही राष्ट्रपति शी जिनपिंग हैं ट्रंप के बाद अगर किन्हीं का सर्वाधिक स्वागत  मोदी जी ने किया तो वही हैं। और डेढ़ दर्जन की मुलाक़ात के बाद भी शी जिनपिंग ने अपने राष्ट्रीय एजेण्डे से मोदी जी के स्वागत का अप्रत्याशित उत्तर दिया क्योंकि उन्हें भी इन्हीं की तरह अपने मुल्क को चीनी राष्ट्रीयतावाद की नयी पहचान देनी थी जिसे वह  अन्य बातों के साथ अपने चिरपरिचित अंदाज़ में देश के सीमाविस्तार द्वारा देना चाह रहे हैं। दक्षिणी चीन सागर से लेकर काराकोरम तक चीन के सदर शी जिनपिंग इसके लिए सक्रिय हैं। इतना ही नहीं, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव- BRI  जो  सिल्क रूट का नया अवतार है, के ज़रिए अपने विश्व व्यापार को निरापद ऊँचाई तक ले जाने की तैयारी में जिस तरह अहर्निश जुटे देखे जाते हैं वह ब्रिटिश साम्राज्य की माल्टा से लेकर मलक्का तक की निरापद समुद्री मार्ग और उसके बंदरगाहों और मुहानों , मसलन, सुदूर पश्चिम में जिब्राल्टर से प्रारंभ होकर साइप्रस, स्वेज, बाबलमंदव, अदन, कराँची, बंबई, कोच्चि, कोलंबो, कोलकता होते हुए सूदूर पूरब में, रंगून और सिंगापुर पर उसके एकाधिकार नियंत्रण की याद दिलाता है। क्या इतना काफ़ी नहीं चीन की जनता के लिए जो चालीस साल के सबसे आसन्न आर्थिक मंदी की मार को सहन कर ले, कोरोना की त्रासदी भुला दे और राष्ट्रपति शी जीन पिंग को अपनी ही राजनीतिक परंपराओं को धता बताकर दस बरस के बजाय आजीवन राष्ट्रपति चुनले? अगर और चाहिए तो हाँगकाँग और लद्दाख लाकर दे देंगे? 

वही अंदाज़ हमारे प्रधानमंत्री जी का भी है। जनता की भावनाओं और स्वप्नों से खेलो जैसे ट्रंप खेलता हैहै-- कालों , अफ़रीकियों, हस्पानियों, हिंदुस्तानी उपमहाद्वीप के लोगों के साथ तिरस्कार भाव को व्यक्त कर  वैसे यहाँ अक़्क़लियतों , सेकुलरों, विवेकवादियों, प्रतिरोधी स्वरों और दलितों के साथ घृणा को उभरने देकर, देशद्रोही का तमगा लगाकर जैसे ट्रंप केंद्रीय संवैधानिक संस्थाओं और न्यायपालिका, व्यवस्थापिका के सदनों, तथा ख़ुद कार्यपालिका की संस्थाओं की लगातार अवहेलना कर या भयभीत करके उनको स्वायत्त स्थिति से  अपने अधीनस्थ स्थिति में लाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनी सत्ता की निरंकुशता की राह में "चेक एंड बैलेंस" या "शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत"  क रोड़ा बनने नहीं देना चाहते, वैसे ही मोदी जी भी अपने विश्वमंच के सबसे चहेते चितेरे आदर्श उसी ट्रंप के ही नक्शेकदम पर चलते हुए विभिन्न युक्तियों, उपायों और तरीक़ों के द्वारा सत्तर साल की लोकतांत्रिक परंपराओं को तिरोहित करने में अपनी सत्ता के अहंकारोन्माद  की चिरशाश्वतता एवं एकाधिकार के लिए कोई हिचक नहीं दिखा रहे होते हैं। बहुलतावाद उनकी ज़ुबान पर ट्रंप, अर्दोगान और बोल्सनारो की तरह  होता है लेकिन व्यवहार में व सांप्रदायिक बहुसंख्यकवाद मिलेगा इनके दूसरे परम मित्र बेन्जामिन नेतन्याहू की तरह। 

विदेश नीति की आक्रमकता ऐसी कि पूरी दुनिया को कई क़ी बार लांघने का रेकॉर्ड इनके नाम हो चुका है।  फिर भी, पड़ोसी राष्ट्रों के साथ इनके ताल्लुकात में जो खटास देखने को मिल रहा है और जिस पैमाने व उम्मीदों के जोशोखरोश से इन यात्राओं का यशोगान होता रहा, उपलब्धि के रूप में वह कोई उल्लेखनीय शक्ल के रूप में सामने नहीं आ पा रहा है वह इनके यशोगान पर अक्सर सवाल खड़ा करता रहता है। लेकिन तब भी जनता उन्माद में है । हमारे प्रधानमंत्री ने एलिज़ाबेथ से लेकर ह्वाइट हाउस तक भारत की प्रतिष्ठा को चार चाँद लगा दिया। 

इसका निश्चय ही लाभ प्रधानमंत्री जी को  मिल रहा है इस विपरीत तथ्य के होते हुए कि देश की अर्थव्यवस्था आज़ादी के बाद सबसे निचले स्तर पर है और बेरोजगारी सबसे ऊँचे स्तर पर । कोरोना काल की आपदा में लगे अदूरदर्शिता पूर्ण लॉकडाउन में थाली पीटने और दीये जलानेवाले लाखों की संख्या में मज़दूरों की लंबी लंबी क़तारें शाहराहों पर उत्तर पश्चिम और दक्षिण से निकलकर पूरब की ओर रुख करते अभूतपूर्व प्राणांतक दृश्य देखे गए। बंटवारे के बाद पलायन की ऐसी नंगी डरावनी तस्वीरें आम जनता की  सत्तर साल के इतिहास में नहीं देखी गयीं। लेकिन इसके बावजूद विश्व के अपने अन्य दक्षिणपंथी समकक्षों की तरह आम जनता को वर्गसंघर्ष की राह पर आगे बढ़ने से रोकने की राह में इसलिए सफ़ल हैं कि इनके पास फ़ासिस्ट नीति के तमाम आज़माये हुए नुस्खे  अद्यतन अज़माने के लिए उपलब्ध हैं। नैतिक अनैतिक, वैधिक अवैधिक, जहाँ सच न चले वहाँ झूठ सही, सभी तरीक़े भी इनके पास मौज़ूद हैं। 

ब्राजील का यह संवेदनहीन राष्ट्रपति बाल्सनारो को प्रधानमंत्री मोदी ने जिस साल यह राष्ट्रपति चुना गया था, गणतंत्र दिवस के मुख्य परेड पर मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया था। वह अभी पूरे लैटिन अमेरिका में नया राष्ट्रोन्मादी तूफ़ान बरपा किये हुए है । अमेरिका के इशारे पर उसने अपने देश में और पूरे महाद्वीप में अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए तथा अपनी ही तरह की दूसरी सत्ताओं की सुरक्षा के लिए भी लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया है । उसकी क्रूरता तब देखी गई जब राष्ट्रोन्माद के आवेग और अहंकारोन्माद में  उसने कोरोना को जनसंहार के लिए छा जाने दिया। आज जिसका परिणाम पूरा महाद्वीप, खासकर उसके अपने देश ब्राजील की जनता  भुगत रही है । ऐसे में वह पूरे लैटिन अमेरिका में अपनी धौंस को राष्ट्रोन्माद का साधन बनाकर आम जनता में अपनी मक़बूलियत को बढ़ाने में वह अपने दाएं बाजू के हममनसबों का ही हमराही बना  है। बोलीविया मे चुनी हुई लोकप्रिय सरकार का सत्ता पलट करवा कर ट्रंप से वाहवाही लूटी। वेनेजुएला में उसका खेल जारी है। देश के अंदर लोकतांत्रिक देशभक्त नेताओं पर दमन चलाकर वाशिंगटन को ख़ुशकर सोचता है कि टूटती बिखरती अर्थतंत्र को अमेरिका संभाल देगा और  उसकी अपनी सत्ता को बचाते रहेगा। 

ये सारे काम और अभियान निस्संदेह इन शासकों के लिए अपने प्रभाव में वृद्धि करने में तत्काल सहायक हो रहे हैं और चुनावी हार से भी उन्हें अभी बचा रहे हैं। लेकिन, "अंबुधि अंतस्थल बीच छिपी यह सुलग रही है कौन आग"  की तरह यह सवाल भी एक सच्चाई है जो सुषुप्त ज्वालामुखी बनकर अनेकों बार व इतिहास में विस्फोटक साबित हुई है और जिसने बड़े सै बड़े लोकप्रिय शासकों की प्रतिमाएँ ध्वस्त कर दी है।

लोकतंत्र की आंतरिक शक्ति से कोई भी शासन या शासक बड़ा नहीं हो पाया , उससे जीत नहीं पाया !

भगवान प्रसाद सिन्हा
( Bhagwan Prasad Sinha )

Monday, 2 November 2020

फ्रांस, धर्मांधता, ईशनिंदा और हिंसक प्रतिक्रियाएं / विजय शंकर सिंह

फ्रांस में एक अध्यापक की बर्बर और गला रेत कर की गयी हत्या के कारण दुनिया भर में धर्मांधता, ईशनिंदा और ईशनिंदा पर हत्या तक कर देने की प्रवित्ति पर फिर एक बार बहस छिड़ गयी है। हालांकि यह बहस धर्मों के प्रारंभ से लेकर अब तक चलती रही है। धर्मो में आपसी प्रतिद्वंद्विता और मेरी कमीज तुम्हारी कमीज से अधिक धवल है की लाइन पर अक्सर बहस होती रहती है। धार्मिक और आध्यात्मिक मुद्दों पर विचार विमर्श और शास्त्रार्थ की परंपरा का स्वागत किया जाना चाहिये, पर जब धर्म, राज्य के विस्तार मोह की तरह खुद के विस्तार की महत्वाकांक्षा से ग्रस्त हो जाता है तो वह राजनीति के उन्ही विषाणुओं से संक्रमित हो जाता है जो राज्य विस्तार के अभिन्न माध्यम होते हैं, यानी, छल, प्रपंच, षडयंत्र, हिंसा, पाखंड आदि आदि। तब धर्म अपने उद्देश्य, मनुष्य में नैतिक मूल्यों की स्थापना और व्यक्ति को नैतिक और मानवीय मूल्यों से स्खलित न होने देने से ही भटक जाता है। फिर धर्म, राज्य सत्ता के एक नए कलेवर में अवतरित हो जाता है, जो कभी कभी इतना महत्वपूर्ण और असरदार हो जाता है कि वह राज्य को ही नियंत्रित करने लगता है। इससे राज्यसत्ता को धर्मभीरु जनता का स्वाभाविक साथ भी मिल जाता है। 

फ्रांस में एक स्कूल के अध्यापक ने वहां की एक व्यंग पत्रिका, शार्ली हेब्दो के एक पुराने अंक में छपे एक कार्टून को जब अपने क्लास रूम में दिखाया तो, उसे देख कर एक मुस्लिम छात्र भड़क उठा और उसने उक्त टीचर, सैमुअल पेटी की गला रेत कर हत्या कर दी। वह भड़काऊ कार्टून पैगम्बर हजरत मोहम्मद का था। इस्लाम की मान्यता के अनुसार, पैगम्बर के चित्र बनाना वर्जित है। इस हत्या के बाद फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष समाज मे आक्रोश फैल गया औऱ उस पर राष्ट्रपति मैक्रां ने जो बात कही, उसकी व्यापक प्रतिक्रिया मुस्लिम देशों में हुयी। फ्रांस में स्थिति यहीं नहीं थमी बल्कि, उक्त अध्यापक पेटी की हत्या के बाद फ्रांस के एक चर्च में कुछ हमलावरों ने, एक महिला का गला काट दिया और दो अन्य लोगों की भी चाकू मारकर हत्या कर दी। फ्रेंच राष्ट्रपति के बयान के बाद तुर्की की प्रतिक्रिया सामने आयी और फिर, फ्रांस और मुस्लिम देशों के आपसी  संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं। 

फ्रांस में हुयी इन घटनाओं पर, राष्ट्रपति मैक्रों ने बीबीसी से एक इंटरव्यू में कहा है कि, 
''मैं मुसलमानों की भावनाओं को समझता हूं जिन्हें पैगंबर मोहम्मद के कार्टून दिखाए जाने से झटका लगा है।  लेकिन, जिस 'कट्टर इस्लाम' से वो लड़ने की कोशिश कर रहे हैं वह सभी लोगों, खासतौर पर मुसलमानों के लिए ख़तरा है। मैं इन भावनाओं को समझता हूं और उनका सम्मान करता हूं. पर आपको अभी मेरी भूमिका समझनी होगी. मुझे इस भूमिका में दो काम करने हैं: शांति को बढ़ावा देना और इन अधिकारों की रक्षा करना.''
आगे वे कहते हैं, वे अपने देश में बोलने, लिखने, विचार करने और चित्रित करने की आज़ादी का हमेशा बचाव करेंगे। 
फ़्रांसीसी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि 
" वे मुसलमान कट्टरपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करेंगे। फ़्रांस के अनुमानित 60 लाख मुसलमानों के एक अल्पसंख्यक तबक़े से "काउंटर-सोसाइटी" पैदा होने का ख़तरा है। "
काउंटर सोसाइटी या काउंटर कल्चर का अर्थ है, एक ऐसा समाज तैयार करना, जो कि उस देश के समाज की मूल संस्कृति से अलग होता है। इमैनुएल मैक्रों के इस फ़ैसले पर कुछ मुस्लिम देश में नाराज़गी ज़ाहिर की गई। कई देशों ने फ़्रांसीसी सामान के बहिष्कार की भी अपील की है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने कहा था कि,  
" अगर फ़्रांस में मुसलमानों का दमन होता है तो दुनिया के नेता मुसलमानों की सुरक्षा के लिए आगे आएं. फ़्रांसीसी लेबल वाले सामान न ख़रीदें।" 

फ़्रांस में नीस शहर के चर्च नॉट्रे-डेम बैसिलिका में एक व्यक्ति द्वारा चाकू से हमला कर दो महिलाओं और एक पुरुष की हत्या कर दिए जाने पर,  राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा, 
''मेरा ये संदेश इस्लामिक आतंकवाद की मूर्खता झेलने वाले नीस और नीस के लोगों के लिए है। यह तीसरी बार है जब आपके शहर में आतंकवादी हमला हुआ है। आपके साथ पूरा देश खड़ा है। अगर हम पर फिर से हमला होता है तो यह हमारे मूल्यों के प्रति संकल्प, स्वतंत्रता को लेकर हमारी प्रतिबद्धता और आतंकवाद के सामने नहीं झुकने की वजह से होगा। हम किसी भी चीज़ के सामने नहीं झुकेंगे. आतंकवादी ख़तरों से निपटने के लिए हमने अपनी सुरक्षा और बढ़ा दी है। मुझे लगता है कि मेरे शब्दों को लेकर बोले गए झूठ और उन्हें तोड़मरोड़ कर पेश करने के चलते ही इस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।  इससे लोगों को लगा कि मैं उन कार्टून का समर्थन करता हूं। वे कार्टून सरकारी प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं थे नहीं थे बल्कि स्वतंत्र और आज़ादा अख़बारों में दिए गए थे जो सरकार से जुड़े नहीं है। ''

इमैनुएल मैक्रों ने इंटरव्यू में यह भी कहा कि,
''आज दुनिया में कई लोग इस्लाम को तोड़-मरोड़ रहे हैं। इस्लाम के नाम पर वो अपना बचाव करते हैं, हत्या करते हैं, कत्लेआम करते हैं। इस्लाम के नाम पर आज कुछ अतिवादी आंदोलन और व्यक्ति हिंसा कर रहे हैं। यह इस्लाम के लिए एक समस्या है क्योंकि मुस्लिम इसके पहले पीड़ित होते हैं। आतंकवाद के 80 प्रतिशत से ज़्यादा पीड़ित मुस्लिम होते है और ये सभी के लिए एक समस्या है।"

इमैनुएल मैक्रों ने इस इंटरव्यू में कहा है कि,  
" हिंसा को सही ठहराना मैं कभी स्वीकार नहीं करूंगा। मैं मानता हूं कि हमारा मकसद लोगों की आज़ादी और अधिकारों की रक्षा करना है। मैंने देखा है कि हाल के दिनों में बहुत से लोग फ़्रांस के बारे में अस्वीकार्य बातें कह रहे हैं। हमारे बारे में और मेरे बयान को लेकर कहे गए झूठों का समर्थन कर रहे हैं और हालात बुरी स्थिति की तरफ़ बढ़ रहे हैं । हम फ्रांस में इस्लाम से नहीं बल्कि इस्लाम के नाम पर किए जा रहे आतंकवाद से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं।" 

फ्रेंच राष्ट्रपति की यह बात समझने के लिये फ्रांस के इतिहास में भी झांकना पड़ेगा। आज दुनियाभर में जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात की जा रही है, उसका श्रेय महान फ्रेंच क्रांति को दिया जाता है। जब दुनिया मध्ययुगीन सामंतवाद के काल मे पड़ी हुयी थी तभी फ्रांस में एक ऐसी क्रांति हुयी जिसने दुनिया के मानवाधिकारों और नागरिक अधिकार की अस्मिता की एक नयी रोशनी दिखाई। पहली बार दुनिया ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के त्रिघोष का नाद सुना और यह घटना दुनिया की उन अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं में शुमार की जाती है जो दुनिया के लिये टर्निंग प्वाइंट घटनाएं मानी जाती है। आज जो कुछ भी फ्रांस में हो रहा है उस पर कोई भी चर्चा हो, इसके पहले, फ्रांस की राज्यक्रांति की पृष्ठभूमि,  कारण और परिणामो का अध्ययन कर लिया जाना चाहिए। फ्रांस की जनता ने लुई सोलहवें के शासन को उखाड़ फेंका और संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की। हालांकि यह यूरोप का पहला लोकतंत्र नहीं था, बल्कि इंग्लैंड में संसदीय लोकतंत्र की परंपरा का आरंभ, 1215 ई के मैग्ना कार्टा और 1600 ई के ग्लोरियस रिवोल्यूशन से हो चुका था।  पर कहा इंग्लैंड की रक्तहीन क्रांति और कहाँ फ्रांस की यह जनक्रांति, दोनो के स्वरूप में मौलिक अंतर था। हालांकि फ्रांस में नेपोलियन के समय मे राजतंत्र कुछ बदले स्वरूप में पुनः आया लेकिन वह लंबे समय तक नहीं रह सका। फ्रांस अपनी राज्यक्रांति से उद्भूत मूल्यों के साथ मज़बूती से जुड़ा रहा। 

धर्मनिरपेक्षता, फ्रेंच संविधान का मूल भाव है। लेकिन, सेक्युलरिज्म का फ्रेंच स्वरूप हमारे देश के सर्वधर्म समभाव से अलग है।  सेकुलरिज्म की फ्रेंच अवधारणा का जन्म भी, 1789 ई की फ्रेंच राज्यक्रांति का परिणाम है। परिवर्तन की वह पीठिका, तत्कालीन फ्रेंच विचारकों,  रूसो ,वोल्टेयर तथा अन्य महानुभावों द्वारा तैयार की गयी थी। पहली बार राज्य को चर्च से अलग करने की बात की गयी। यूरोप के इतिहास में यह एक क्रांतिकारी बदलाव था। इस परिवर्तन में राजा और सामन्त तो जनता के निशाने पर थे ही, पर पौरोहित्य वर्ग भी इससे बच न सका। क्रान्तिकारी राष्ट्रीय असेंबली ने 1789 में चर्च की सारी भू संपदा को जब्त कर लिया। धार्मिक जुलूसों और सलीबों के प्रदर्शन पर भी पाबन्दी लगा दी गई थी। 2 सितंबर 1792  को पेरिस की सड़को पर आक्रोशित भीड़ ने 3 बिशपों और 200 से ज़्यादा पादरियों की हत्या कर दी, जिसे फ़्रांस के इतिहास में, सितंबर जनसंहार के नाम से जाना जाता है । इस क्रांति के बाद, राज्य और चर्च पूरी तरह अलग हो गए।  राजसत्ता ने चर्च का बहिष्कार कर दिया। लंबे समय तक चर्च और राज्यसत्ता के अविभाज्य होने के बाद, चर्च का राज्य से अलग हो जाना, यूरोपीय इतिहास की एक बड़ी घटना थी। धर्म के प्रति उदासीन और उसे अप्रासंगिक कर देने का जो भाव, तब विकसित हुआ था वह अब फ्रेंच समाज का स्थायी भाव बन गया है। यह मनोवृत्ति आज भी फ्रेंच सेकुलरिज्म में मौजूद है। 

फ्रांस की वर्तमान स्थिति पर समर अनार्य का यह उद्धरण पढिये, 
"1805 ई में फ़्रांस ने बाक़ायदा एक क़ानून पास किया- सेपरेशन ऑफ़ द चर्चेज़ एंड स्टेट- और राज्य के चर्च से संबंध पर प्रतिबंध लगा दिया। फिर 1946 ई में तो और कमाल किया: सारी धार्मिक इमारतों- चर्च और यहूदी सिनेगाग्स को राज्य की संपत्ति बना दिया। मस्जिदें तब बहुत कम थीं- अब भी बहुत कम हैं। आज भी फ़्रांस में किसी धर्म का दिखने वाला कोई प्रतीक किसी सार्वजनिक जगह पर नहीं पहना जा सकता। क्रॉस भी नहीं। यह प्रतिबंध 2004 ई में लगा- इसमें ईसाई क्रॉस, यहूदी स्टार ऑफ़ डेविड (और किप्पा), सिख पगड़ी, इस्लामिक हिजाब- सब सार्वजनिक जगहों से प्रतिबंधित किए गए। फिर आया 2011 ई, अबकी बार सभी अस्पतालों में दशकों से चल रहे ईसाई उपदेश प्रतिबंधित हुए। फ़्रांस की यह लड़ाई इस्लाम से नहीं है- धर्मांन्धता से है, उसके नाम पर कत्लोगारत से है। " 

आज धर्म को लेकर जो मज़ाक़ वहां की कैरिकेचर पत्रिका शार्ली हेब्दो अक्सर बनाता रहता है उसके पीछे यही मानसिकता है। फ्रांस में केवल 30 % जनसंख्या आस्तिक है। वैज्ञानिक सोच, तर्कशील उर्वर विचारकों और अस्तित्ववाद के दर्शन ने वहां जिस सेक्युलरिज्म का विकास किया, वह हमारी धर्म निरपेक्षता के मापदंड से अलग है। यदि आप भारतीय सन्दर्भ से, फ्रांस के सेक्युलरवाद का मूल्यांकन करेंगे तो फ्रांस के सेकुलरिज्म को समझ नहीं पाएंगे। भारत मे सनातन धर्म मे जहां मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना पहले ही कह दिया गया है और हर विंदु पर शास्त्रार्थ की दीर्घ और समृद्ध परंपरा है, वहां आहत भाव बहुत ही कम दिखता है। काशी में कबीर की मौजूदगी और उनका धर्म, ईश्वर, पौरोहित्यवाद के खिलाफ खुला तंज इस बात का प्रमाण है कि समाज बहुत कुछ ऐसी आलोचनाओं से आहत नही होता था। भारत मे धर्म का ऐसा व्यापक जनविरोध हुआ भी नही। क्योंकि यहां सनातन धर्म मे ही, अनेक सुधारवादी आंदोलन लगातार चलते रहे और यह क्रम स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्यसमाज के आंदोलन तक निरन्तर जारी रहा। जिससे धर्म समय समय पर प्रक्षालित होकर नए कलेवर में सामने आता रहा। अतीतजीविता तो थी पर जड़ता कम ही रही। 

जब फ्रांस की घटना पर समस्त मुस्लिम देश एकजुट हुए तो इसकी वैश्विक प्रतिक्रिया भी हुयी। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। लेकिन एक नयी बहस छिड़ गयी कि, क्या आहत होने पर किसी को, किसी की भी, हत्या कर देने का अधिकार है ? यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि, अगर फ्रांस के उस अध्यापक की हत्या का समर्थन किया जा रहा है, तो फिर पिछले कुछ सालों से, भारत मे, आस्था के आहतवाद के अनुसार, होने वाली मॉब लिंचिंग का विरोध किस आधार पर किया जा सकता है ? फिर यही मान लीजिए कि जिसकी आस्था आहत हो वह फिर, आहत करने वालों की हत्या ही कर दे। फिर एक बर्बर और प्रतिगामी समाज की ओर ही तो लौटना हुआ ? आस्था से हुआ आहत भाव कितना भी गंभीर हो, पर उसकी प्रतिक्रिया में की गयी किसी मनुष्य की हत्या एक हिंसक और बर्बर आपराधिक कृत्य है। जो कुछ भी उस किशोर द्वारा अपने अध्यापक के प्रति फ्रांस में किया गया है, वह अक्षम्य है, और उसका बचाव बिल्कुल भी नहीं किया जाना चाहिए। 

शार्ली हेब्दो का कार्टून आपत्तिजनक और निंदनीय है। इस कार्टून के खिलाफ फ्रेंच कानून के अंतर्गत अदालत का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था, न कि हत्या का अपराध। अगर आहत भाव पर ऐसी हत्याओं का बचाव किया जाएगा और आहत होने पर हत्या या हिंसा की हर घटना औचित्यपूर्ण ठहराई जाने लगेगी तो फिर कानून के शासन का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। शार्ली हेब्दो पहले भी पैगम्बर के आपत्तिजनक कार्टून छाप चुका है। उसने न केवल इस्लाम के ही बारे में आपत्तिजनक कार्टून छापे है, बल्कि उस अखबार में, कैथोलिक धर्म और चर्च के खिलाफ भी कार्टून छापे गए हैं। पहले भी 2012 में, पैगम्बर के आपत्तिजनक कार्टून छापने के बाद शार्ली हेब्दो के कार्यालय पर आतंकी हमला हुआ था और उसके 12 कर्मचारी मारे गए थे। लेकिन उस जघन्य आतंकी घटना के बाद भी उक्त अखबार की न तो नीयत बदली और न नीति। शार्ली हेब्दो ने अस्थायी कार्यालय से अपना अखबार निकालना जारी रखा और ऐसे ही कटाक्ष भरे, आपत्तिजनक कार्टून फिर छापे गए। पूरे फ्रांस या यूरोप में मैं हूँ शार्ली का एक अभियान चलाया गया। 

किसी की धर्म मे आस्था है तो किसी की संविधान में और किसी की दोनो में। आस्था नितांत निजी भाव है। लेकिन, देश, धर्म की आस्था से नहीं चलता है बल्कि संविधान के कायदे कानून से चलता है। फ्रेंच कानूनो के अंतर्गत वहां के आस्थावान लोगों को शार्ली हेब्दो के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए थी, न कि आतंकी हमला और अध्यापक की हत्या। धर्म के उन्माद और धर्म के प्रति आस्था के आहत होने की ऐसी सभी हिंसक और बर्बर प्रतिक्रियायें, चाहे वह गला रेत कर की जाने वाली हत्या हो, या मॉब लिंचिंग या भीड़ हिंसा, यह सब आधुनिक और सभ्य समाज पर एक कलंक है। इसमे कोई दो राय नही है कि ऐसा कार्टून बनाना निंदनीय है और ईश्वर धर्म और पैगम्बर से जिनकी भी आस्था जुड़ी हो, उसे, आहत नही किया जाना चाहिए। पर इसका यह अर्थ यह बिल्कुल भी नही है कि, ऐसा कुकृत्य करने वालो की हत्या ही कर दी जाय और फिर उस हत्या के पक्ष में खड़ा हो जाया जाय। 

पैगम्बर हजरत मोहम्मद ने अरब के तत्कालीन समाज मे एक प्रगतिशील राह दिखाई थी। एक नया धर्म शुरू हुआ था। जो मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करता था, समानता और बंधुत्व की बातें करता था और इस धर्म का प्रचार और प्रसार भी खूब हुआ। वह धर्म इस्लाम के नाम से जाना गया। पर आज हजरत मोहम्मद और इस्लाम पर आस्था रखने वाले धर्मानुयायियों के लिये यह सोचने की बात है कि उन्हें क्यों बार बार कुरान से यह उद्धरण देना पड़ता है कि, इस्लाम शांति की बात करता है,पड़ोसी के भूखा सोने पर पाप लगने की बात करता है, मज़दूर की मजदूरी, उसका पसीना सूखने के पहले दे देने की बात करता है और भाईचारे के पैगाम की बात करता है। आज यह सारे उद्धरण जो बार बार सुभाषितों में दिए जाते हैं उनके विपरीत इस्लाम की यह क्षवि क्यों है कि इसे एक हिंसक और आतंक फैलाने वाले धर्म के रूप में देखा जाता है। यह मध्ययुगीन, धर्म के विस्तार की आड़ में  राज्यसत्ता के विस्तार की मनोकामना से अब तक मुक्त क्यों नहीं हो पाया है ? 

फ्रांस में जो कुछ भी हुआ, या हो रहा है वह एक बर्बर, हिंसक और मध्ययुगीन मानसिकता का परिणाम है। उसकी निंदा और भर्त्सना तो हो ही रही है, पर इतना उन्माद और पागलपन की इतनी घातक डोज 18 साल के एक किशोर में कहाँ से आ जाती है और कौन ऐसे लोगों के मन मस्तिष्क में यह जहर इंजेक्ट करता रहता है कि एक कार्टून उसे हिंसक और बर्बर बना देता है ? फ्रांस में जो कुछ भी हुआ है वह बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। पहले पैगम्बर मोहम्मद के एक कार्टून का बनाया जाना और फिर उस कार्टून के प्रदर्शन पर एक स्कूल के अध्यापक की गला काट कर हत्या कर देना। बाद में चर्च में घुस पर तीन लोगों की हत्या कर देना। यह सारी घटनाएं यह बताती है कि धर्म एक नशा है और धर्मान्धता एक मानसिक विकृति।  

एक सवाल मेरे जेहन में उमड़ रहा है और उनसे है, जो इस्लाम के आलिम और धर्माचार्य हैं तथा अपने विषय को अच्छी तरह से जानते समझते हैं। एक बात तो निर्विवाद है कि, इस्लाम में मूर्तिपूजा का निषेध है और निराकार ईश्वर को किसी आकार में बांधा नहीं जा सकता है। इसी प्रकार से पैगम्बर मोहम्मद की तस्वीर भी नही बनायी जा सकती है। यह वर्जित है और इसे किया भी नहीं जाना चाहिए। यह भी निंदनीय और शर्मनाक है। पर अगर ऐसा चित्र या कार्टून, कोई व्यक्ति चाहे सिरफिरेपन में आकर या जानबूझकर कर बना ही दे तो क्या ऐसे कृत्य के लिये पैगम्बर ने कहीं कहा है कि, ऐसा करने वाले व्यक्ति का सर कलम कर दिया जाय ? अब एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि जो कुछ खून खराबा, पैगम्बर के कार्टून पर फ्रांस में हो रहा है, क्या इस्लाम मे वह जायज है ? एक शब्द है ईशनिंदा यानी ब्लासफेमी। क्या ईशनिंदा की कोई अवधारणा, इस्लाम मे है और यह एक जघन्य अपराध है तो क्या इसकी सज़ा खुल कर हत्या ही है ? 

2012 में जब शार्ली हेब्दो ने विवादित कार्टून छापा था दिल्ली के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान ने इस विषय पर टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख लिखा था। उक्त लेख का एक अंश पढ़े, 
" कुरान में ईशनिंदा के लिए कोई प्रावधान नहीं है। कुरान में बहुत साफ-साफ यह बात लिखी है कि, इस्लाम में ईशनिंदा के लिए सज़ा नहीं बल्कि इस पर बौद्धिक बहस का प्राविधान है। कुरान हमें बताता है कि प्राचीन काल से ईश्वर ने हर शहर हर समुदाय में पैगंबर भेजे हैं। कुरान बताता है कि हर दौर में पैगंबर के समकालीन लोगों ने उनके प्रति नकारात्मक रवैया अपनाया। कुरान में 200 आयतें ऐसी हैं, जो बताती हैं कि पैगंबरों के समकालीन विरोधियों ने ठीक वही काम किया था, जिसे आज ईशनिंदा कहा जा रहा है। सदियों से पैगंबरों की आलोचना उनके समकालीन लोगों द्वारा की जाती रही है (कुरान 36:30)। कुरान के मुताबिक पैगंबर के समकालीन लोगों ने उन्हें झूठा (40:24), मूर्ख (7:66) और साजिश रचने वाला (16:101) तक करार दिया था। लेकिन कुरान में यह कहीं नहीं लिखा है कि जिन लोगों ने ऐसे शब्द कहे या कहते हैं उन्हें पीटा, मारा या और कोई सज़ा दी जाए। इससे पता चलता है कि पैगंबर की आलोचना करना या उन्हें अपशब्द कहने से ही सज़ा नहीं दी जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो अपशब्द या आलोचना करने वाले व्यक्ति को शांतिपूर्ण तरीके से समझाया जा सकता है या उसे चेतावनी दी जा सकती है। पैगंबर को अपशब्द कहने वाले व्यक्ति को किसी तरह की शारीरिक सज़ा नहीं दी जानी चाहिए। ऐसे व्यक्ति को सुतर्क के जरिए समझाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में सज़ा देने की बजाय शांतिपूर्ण ढंग से समझाबुझाकर उस व्यक्ति को बदलने की कोशिश करनी चाहिए। जो लोग पैगंबर के खिलाफ नकारात्मक भाव रखते हैं, ईश्वर उनका फैसला करेगा। ईश्वर उनके हृदय की गहराइयों में छुपी बातों को भी जानता है। ईश्वर में आस्था रखने वाले लोगों को नकारात्मक बातों को टालने की नीति अपनानी चाहिए। इसके अलावा उन्हें सभी के शुभ की इच्छा रखना और ईश्वर के संदेश के प्रचार-प्रसार करने जैसी बातों में खुद को व्यस्त रखना चाहिए।इस सिलसिले में एक अन्य अहम बात यह है कि कुरान में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि अगर कोई व्यक्ति पैगंबर के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल करता है तो उसे ऐसा करने से रोकना चाहिए। कुरान में कहा गया है कि पैगंबर के विरोधियों के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए।
आगे वे कहते है,
" कुरान की इन आयतों से साबित होता है कि इस्लाम में आस्था रखने वाले लोगों का यह काम नहीं है कि वे पैगंबर की आलोचना करने वाले या अपशब्द कहने वालों पर नज़र रखें और उन्हें मारने की योजना बनाएं। इन बातों के मद्देनजर आज के दौर में कई मुसलमान कुरान के उपदेशों और संदेशों के ठीक उलट काम कर रहे हैं।" 

धर्म और राज्य का कॉम्बिनेशन सबसे खतरनाक कॉम्बिनेशन होता है। राज्य विस्तार की अवधारणा पर चलता है और धर्म जब राज्य के विस्तार के वाहक की भूमिका में आ जाता है तो फिर वह धर्म स्वतः अपने उद्देश्य से भटक जाता है। सेमेटिक धर्मों की सबसे बडी त्रासदी भी यही रही है कि वह राज्य से नियंत्रित होता रहा है। यही नियंत्रण इस्लाम और ईसाई संघर्षों जिसे इतिहास में क्रुसेड के नाम से जाना जाता है का परिणाम रहा है। राज्य और धर्म का घालमेल घातक, हिंसक, बर्बर और एक मध्ययुगीन कांसेप्ट है। 

ऐसे कार्टूनों के प्रकाशन अभिव्यक्ति की आज़ादी के दुरुपयोग हैं, यह मानते वालों के लिये इसे फ्रांस के ही सन्दर्भ में सोचना पड़ेगा। सभी समाजों की धार्मिक आस्था की सहनशीलता नापने का कोई एक सर्वमान्य मापदंड नहीं हो सकता है । 1789 ई की फ्रेंच क्रान्ति के वक्त’ मनुष्य के अधिकारों की घोषणा ‘नामक दस्तावेज जारी किया गया था जिसके अनुच्छेद  4 औऱ 5 में मनुष्य की व्यक्तिगत आज़ादी की अवधारणा दी गयी है। इनमें कहा गया है कि 
" मनुष्य को वह सब कुछ करने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है, जिससे किसी अन्य के समान अधिकार प्रभावित न हों और सार्वजनिक अहित उत्पन्न न हो रहा हो ।इस आज़ादी की हद वह होगी जिसे क़ानून द्वारा तय किया जाएगा ।" 
यह प्राविधान आज भी फ़्रांस के संविधान का अंग है । अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अक्सर बहस तय होती रहती है। उसकी सीमा क्या हो, इसपर विचार करने के दौरान यह सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए कि, आप को सड़क पर खड़े होकर छड़ी घुमाने का अधिकार है, पर वहीं तक जब तक कि वह किसी की नाक पर न लग जाय। हमारे समाज मे सत्य बोलने को सर्वोपरि माना गया है पर वहीं अप्रिय सत्य यानी ऐसा सत्य जो किसी को आहत करे से बचने की बात भी कही गयी है। " सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात्सत्यमप्रियम” । 

लेकिन इन सारे तर्क वितर्क और विमर्श के बीच एक बात निश्चित तौर पर ध्रुव सत्य मान ली जानी चाहिए कि हत्या एक जघन्य और दंडनीय अपराध है जिसका किसी भी दशा में बचाव नहीं किया जाना चाहिये। 

( विजय शंकर सिंह ) 


शब्दवेध (10) भाषा परिदृश्य - 2.

लिखते हुए डरते हैं  गलत कुछ न लिखा जाए।
फिर  लिख कर सोचते हैं  सही कुछ भी नहीं है।

एक खेल है  और खेल पहेली से कम नहीं
जो खेल में शामिल है बहुत खुश भी नहीं है।।

कुछ लिखने से छूट जाता है और कुछ लिखने के बाद संदेह के दायरे में रहता है।  यदि पाठक  मुझे अधिकारी मानकर नहीं,  खोजी मान कर पढ़ें तो पाएँगे, खोजी  जानता नहीं है,  जानने  की कोशिश में  लगा रहता है,  और कई बार आगे का रास्ता उन लोगों से पूछता है जो रास्ता तो जानते हैं उस मुकाम तक कभी गए नहीं हैं।

मुंह से विविध क्रियाओं के दौरान कई तरह की ध्वनियाँ निकलती हैं।  इनमें से एक ध्वनि  का अनुकरण  बोलियों की   आदिम  अवस्था की  सीमाओं के कारण पक, फक, बक, भक या पग, फग, बग, भग के रूप में किया गया लगता है।  एक ही  प्राकृतिक  नाद को कई रूपों में  सुना जा सकता है, इसे हम सभी जानते हैं। बचपन में रेल की पटरियों से आने वाली आवाज को सुनने वाले "लाल लाल पइसा, चल कलकत्ता" के रूप में सुन लेते थे। सुन कर देखिए, आप को भी सुनाई दे सकता है। 

प्राचीन वैयाकरण  इस तरह की  भिन्नता को  ध्वनि नियमों से होने वाले  परिवर्तन  मानते रहे हैं।  परंतु  उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो इन  ध्वनियों को एक ही अर्थ में प्रयुक्त होने वाली  स्वतंत्र  धातुएं  मानते थे।  जैसे, 

20.      उर्द मानेमानं परिणामं क्रीडायां च
21.      कुर्द -
22.      खुर्द - 
23.      गुर्द -
24.      गुद क्रीडायां 

81.      सेकृ- 
82.      स्रेकृ-
83.      स्रकि-
84.      श्रकि-
85.      ष्लकि गतौ 

ग 
94.      ककि - 
95.      वकि - 
96.      ष्वकि - 
97.      त्रकि - 
98.      डौकृ -  
99.      त्रौकृ -  
100.   ष्वष्क - 
101.   वस्क - 
102.   मस्क - 
103.   टिकृ -  
104.   टीकृ - 
105.   तिकृ - 
106.   तीकृ - 
107.   रघि -
108.   लघि गत्यर्थे भोजननिवृत्तौ च 

धातु का निर्धारण करने वालों ने यह  नहीं  बताया  की एक सी  लगने वाली  इन  धातु के साथ  उस विशेष   आशय का  संबंध कैसे जुड़ा, या  उस अर्थ के लिए इन  ध्वनियों का  निर्धारण उन्होंने कैसे किया?  वे भाषा में प्रयुक्त  शब्दों के बहुनिष्ठ  लघुतम  घटक का  चयन कर रहे थे,  और ऐसा लगता है इनमें से उसकी दृष्टि बोलचाल की भाषा में मिलने वाले विभिन्न प्रयोगों की ओर भी गई थी।  

उनसे  हमारी भिन्नता  यह है   कि हम  नाद  के स्रोत  या स्रोतों को उतना ही महत्व देते हैं,  जितना ध्वनि को और इससे  शब्द और अर्थ  की  वह  एकान्विति सामने आ जाती है  जिसका बोध  बहुत पहले से भारतीय चिंता धारा में विद्यमान था और जिसे कालिदास ने वाणी और अर्थ  की  संपृक्ति कहा था (वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥)  और तुलसीदास ने वायु के स्पर्श से जल और तरंग का अभेद (  गिरा  अनिल  जल- बीचि सम कहियत भिन्न, न भिन्न) कहा है ।

मुंह से उत्पन्न होने वाली जिन ध्वनियों की हमने ऊपर चर्चा की है वे केवल  मुंह से उत्पन्न नहीं होती,  किसी भी ऐसी क्रिया से  जिससे  वायु का झटके  उन्मोचन (स्फोट्), या   निर्वात जन्य संघात  (इंप्लॉजन) हो उससे उत्पन्न नाद है यह।  यह मुंह से तेजी से ही वायु के निकलने,  या किसी चीज के फटने,  या  आग से जलने से  ऑक्सीजन की पूर्ति करने की  तेजी से  उत्पन्न होने वाली ध्वनि,  या आग के  एकाएक बुझने से  उत्पन्न होने वाली ध्वनि है।   इसलिए  एक ओर  इसे बोलने,  खाने,  खाने के योग्य बनाने, भूख,   आदि के लिए  प्रयोग में लाया जाता है तो दूसरी ओर  तोड़ने,  बांटने,  आदि के लिए,    और तीसरी और प्रकाश,  प्रकाश के स्रोत,   प्रकाशित होने की क्रिया,  बुझने की क्रिया   आदि के लिए।

हमारी जातीय चिंता में  एक अतिसूक्ष्म अंडाणु में  समस्त सृष्टि के लीन  (प्रलय) होने और  अनंत काल तक उसी अवस्था में पड़े रहने के बाद   उसी के  फटने से  उत्पन्न  अत्यंत सूक्ष्म भण् की  ध्वनि के साथ  सृष्टि के आविर्भाव की  कल्पना की गई थी।  इसीलिए  नाद ब्रह्म या शब्द ब्रह्म की अवधारणा  हमारी  चिंता धारा  में अति प्राचीन काल से विद्यमान रही है। 

समय  और  दिक् का प्रसार  विज्ञान की महिमा से कल्पनातीत हुआ है जिसके लिए  प्राचीन मनीषियों ने  अपनी समझ से  आइंस्टाइन  से पहले के  पाश्चात्य जगत के लिए  अकल्पनीय, बहुत लंबी कालावधि  का निर्धारण किया था।   अन्यथा  भी आधुनिक विज्ञान सृष्टि के विषय में लगभग  उन्हीं निष्कर्षों  पर पहुँचा है जिस पर  प्राचीन भारतीय चिंतक पहुंचे थे। गॉड पार्टिकल  जिसमें  गॉड  व्यंग्य है,   स्रष्टा के रूप में  ईश्वर को कल्पित करने वालों  को बताया गया है,  कि सृष्टि  किसी ईश्वर द्वारा नहीं हुई थी,  अपितु  इसका उद्भव  एक सूक्ष्मातिसूक्ष्म (अणोः अणीयान्) से हुई थी ।  भारतीय  चिंता धारा में  विविध विचारों के बीच,  होते-हुए-भी-न होने जैसी एक भावसत्ता (न सत् आसीत् न असत् आसात् तदानीं) जिसे  हिरण्यगर्भ अर्थात्  बाद में उसे निकलने वाली समस्त सृष्टि के गर्भ के रूप में  कल्पित किया जाना,   एक  ईश्वरेतर  पार्थिव सत्ता की कल्पना   और आधुनिक विज्ञान की अंतिम  तलाश  से उसकी  आश्चर्यजनक निकटता  प्राचीन  ऋषियों के प्रति समर्पण की नहीं, तो भी श्रद्धा और विनय की भावना पैदा करती है।  

भटकने की आदत है परंतु नई सचाइयों से  हमारा सामना राह पकड़ कर चलने की जगह भटकने से ही होता  है।  इस दृष्टि से ‘अच्छी नहीं है, फिर भी यह आदत  बुरी नहीं।’ 

 हम आज  इसी आदत के कारण हम  मुंह से उत्पन्न होने वाली  ध्वनियों  पर भी यथेष्ट विचार नहीं कर पाएंगे,  और   यदि  संक्षेप में अपनी बात कहना चाहें, तो  यह उम्मीद करना कि पाठक स्वयं अपने प्रयत्न से उन रूपों को  आंक और भाँप लेंगे अब तक के अनुभवों से,  सही नहीं लगता। फिर भी कोई दूसरा चारा नहीं है:
पक् - पक पक करना =अनावश्यक और  निरर्थक बातें करना.
पक् - मनसा ग्रहण करना, (  कंप्रिहेंड> ग्रहण करना) पकड़ना,   
पक् - पकाना (तु. श्रपयति), भो. पकावल; पाक  = पकायी हुई वस्तु;  पकवान, पकौड़ी; पक्व - पका हुआ; पाक = ज्ञानी (पाकः पृच्छामि);  पाक= पवित्र, 
फक् -  *फाँकना = खाना,  चूर्णीकृत खाद्य या ओषधि काे खाना; फाँका (उपवास);  फक्कड़ - जिसे धन-दौलत की चिंता न हो, बे परवाह;  फूँक - मुँह से तेजी से हवा निकालना; फकीर - जो अपने पास कुछ न रखता हो, अपनी जीविका के लिए दूसरों के दान पर निर्भर करता हो। 
बक् - बकना, बकवास,  बक के संस्कृतीकरण से वक, वाक्य, वच्, वचन, वाचन।
भक् - भो. में तिरस्कार सूचक अव्यय;  भकोसना, भक्षण,  भाखना - कहना,  पूर्वकथन करना; भकुआना- समझ न पाना, बोल न पाना,   सं. करण > भाषा, भाषण,  भाष्य आदि; >भूख, भुक्खड़, >बुभुक्षू -भूखा, भीख >भिक्षा- अन्नदान, भिखारी,  भिक्खु>  भिक्षु ।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


शब्दवेध (9) भाषा परिदृश्य - 1.

हम ‘शब्द’ पर विचार करते हुए इस नतीजे पर पहुँचे थे कि “यह होठों से उत्पन्न ‘सप’ ध्वनि की नकल है, और इसका प्रयोग उन क्रियाओं - कथन, आर्द्र पदार्थ के ग्रहण- और  संज्ञाओ -साप/शाप, सूप, त. साप्पाडु, सापिडुगरेन, अं, सूप, सपर, आदि में देखने में आता है। 

इसका एक अन्य पक्ष रोचक है। यह है बोली से संस्कृत में बदलने और फिर बोली में बदलने का और संस्कृत में कुछ समय तक इसके एक नए अर्थ में प्रयोग में आने के बाद इसके लोप और बोली में बने रहने का लुका छिपी का खेल। 

पर इससे पहले हम भारत की शेष बोलियों से सारस्वत क्षेत्र की उस भाषा की भिन्न प्रकृति को समझ लें जिसके कारण न केवल पूरबी बोली का संस्कृतीकरण हुआ, बल्कि भारतीय भाषा परिदृश्य की वह समस्या पैदा हुई जिसकी व्याख्या के लिए आर्यों के दो आक्रमणों की अर्थात पहले आक्रमण से उत्तर भारत पर अधिकार जमा चुके आर्यों पर आर्यों के दूसरे आक्रमण की, मध्यदेश की आर्यभाषा और परिमंडल की भाषा (हार्नले और ग्रियर्सन) की अटकलबाजी की गई, परन्तु जिसका आधार ही गलत सिद्ध हुआ (चटर्जी ) क्योंकि जिस दिशा से इस दूसरे जत्थे के  प्रवेश करने की कल्पना की गई थी,  उसकी  बोलियाँ (दरद आदि) अधिक दूषित थीं। 

भारतीय भाषा परिदृश्य में बाँगड़ू  अकेली ऐसी बोली है जो व्यंजन प्रधान है,  जबकि दूसरी सभी बोलियां  स्वर-प्रधान है।  व्यंजन प्रधान भाषाओं की विशेषता वेग या त्वरा है और इसीलिए इनमें स्वरलोप की प्रवृत्ति तो पाई ही जाती है, अन्तस्थ (य,र, ल, व, स, त, द )का आगम (शब्द के अंत या मध्य में जोड़ कर नादसौंदर्य  पैदा करने का प्रयत्न देखने में आता है जिससे नई व्यंजनाएँ भी पैदा होती हैं (सत, सत्, सत्व, सत्य, श्रत्, श्रद्धा)। 

यद्यपि आज इसमें ऊष्म ध्वनियों के सभी रूप - श, ष, स - पाए जाते हैं, जिनमें ‘स’ इसकी ध्वनिसंपदा से मेल न खाता था और इसलिए इसके उच्चारण में काफी परेशानी होती थी जिसे स्, र्, श्,  विसर्ग (:), ओ आदि में परिवर्तित होना पड़ता था। राजवाडे ने किसी प्राचीन चरण पर उच्चारण की इस समस्या के पैदा होने की बात की है और यह पूरबी बोली के इस क्षेत्र में प्रवेश के समय की समस्या प्रतीत होती है। 

जिस संस्कृत (भारतीय) वर्णमाला से हम आज परिचित हैं उसमें किसी न किसी चरण पर सारस्वत क्षेत्र में पहुँचने वाली सभी बोलियों की ध्वनियों का समावेश है, परन्तु आरंभ में बाँगड़ू की ध्वनिमाला क्या थी या भोजपुरी, अवधी, बांग्ला आदि की वर्णमाला क्या थी इसका सही ज्ञान हमें नहीं है। किसी बोली में इन सभी ध्वनियों का उच्चारण नहीं होता।

 स्वयं वैदिक में तवर्गीय ध्वनियों की जगह टवर्गीय ध्वनियाँ थीे। अतः ऊष्म ध्वनियों में ‘ष’ की ध्वनि प्रधान रही लगती है जिसका प्रयोग विशेष स्थितियों में स-कार के लिए देखने में आता है (सोम/ अग्नीषोमा)। ऐसा तभी हो सकता है जब, नकार इसमें न रहा हो, जैसा आज भी बाँगड़ू मे है। पूरबी मे आग ‘अगन’ था, बाँगड़ू में ‘अग्णि’ बना, कुछ समय बाद स्थिरीकरण से अग्नि के स्थिर हुआ।  यदि इस नियम का विस्तार करें तो आरंभिक संक्रमणकालीन समस्या बहुत विचित्र दिखाई देगी। शकार और लकार का इसमें प्रवेश मागधी प्रभाव के कारण हुआ लगता है परंतु इसकी जितनी गहन छानबीन जरूरी है वह मुझसे न केवल हो न सका अपितु उसकी योग्यता भी न थी।

स्वरप्रधान भाषाओं में गेयता और लालित्य की प्रधानता होती है और इसका आग्रह बढ़ने से स्वर और विलंबित होता जाता है और कौरवी का अर्ध अकार भो. में अs  > अss जो ‘आ’ के निकट प्रतीत होता है बांग्ला तक ऑ में बदल जाता है। दक्षिण भारतीय भाषाओं में संस्कृत और हिंदी का यथालिखित उच्चारण होने के कारण उत्तर  भारत के लोगों को वह हास्यकर प्रतीत होता है।  आदि भारोपीय स्वर प्रधान थी।  उसमें जहाँ सभी शब्द (अजन्त) स्वरांत थे  कौरवी क्षेत्र में हलन्त या व्यजनांत हो गए,   मध्यस्वर का भी लोप हो गया।  लिखने को भले अजंत लिखें उच्चारण हलंत होगा। रामनाथ का हिंदी  उच्चारण में राम्नाथ् है पर दक्षिण भारतीय उच्चारण में रामानाथा का श्रुतिभ्रम पैदा करता है।  हिंदी में गुप्ता, चन्द्रा, सिन्हा, श्रीवास्तवा, आदि उच्चारण उसी प्रभाव की देन हैं।  अंग्रेजी शिक्षा को आगे बढ़ कर अपनाने,  अंग्रेजों के प्रति  अधिक भक्तिभाव रखने के फलस्वरूप,  लंबे समय तक  दक्षिण भारतीयों और बंगालियों  के  सर्वाधिक  पदों पर विराजमान रहने के कारण,  उत्तर भारतीयों में  यह ग्रंथि पैदा हो गई थी  बंगाली और मद्रासी   निसर्गजात रूप में अधिक प्रतिभाशाली होते हैं,  और उपनामों को अकारांत बनाने की प्रवृत्ति उसकी क्षतिपूर्ति है। 

जैसे द्रविड़ भाषाओं में वर्गीय ध्वनियाें में केवल प्रथम और अनुनासिक ध्वनियाँ ही पाई जाती हैं और यह इस कारण है कि मौर्य और गुप्तकाल में भी दक्षिण उत्तरी साम्राज्य का हिस्सा नहीं बना, इसलिए वे भाषाएँ, उनमें भी तमिल, अपने मूल रूप को सुरक्षित रख सकी, अतः इस सीमा को हम समझ पाते हैं उसी तरह इस बात की संभावना कि दूसरी बोलियों में भी  बहुत कम ध्वनियों से काम चलता रहा  हो। यदि देववाणी घोषमहाप्राण से प्रेम करती थी तो दूसरी बोलियों की अलग सीमाएँ थीं जो अध्ययन का अलग विषय है।

हम लुकाछिपी की जिस  क्रीड़ा की बात कर रहे थे, उसका एक कारण मूल ध्वनियों की ये सीमाएँ भा हैं।  दूसरी ओर इसके ही चलते  सप कौरवी क्षेत्र में  पहुँच कर शब् हो जाता है और इसमें द प्रत्यय के रूप में जुड़ता है तब शब्द- ध्वनि, सार्थक पद, कथन, वाचन (निगदेनेव शब्दते- रटा हुआ  वाक्य  दुहराता है), आदि आशयों का द्योतक होता है।

अन्तस्थ ध्वनि ‘र’ के आगम से शप/शाप के विकल्प के रूप में  संस्कृत में श्रप/श्राप भी प्रचलित हुआ ।  इसका तद्भव ‘सराप’ ‘सरापल’ - शाप, शाप देना भोजपुरी में आज तक प्रचलित है।  परन्तु संस्कृत में इसका प्रयोग  पकाने, उबालने के आशय में होने लगा - नैऋृत्र्यं चरुं श्रपयति, इसलिए शाप के लिए इसका वैकल्पिक प्रयोग बंद हो गया और आगे चल कर पकाने, उबालने के लिए भी प्रयोगबाह्य हो गया, परंतु शाप देने के अर्थ में श्राप का तदभव रूप भोजपुरी में आज तक व्यवहार में आता है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

Sunday, 1 November 2020

कविता - अब बहस के मुद्दे बदलो / विजय शंकर सिंह

अब बहस के मुद्दे बदलो ,
कब तक झांसा दोगे तुम ,
जब जब बात चली रोटी की ,
जबरन बात बदल देते हो।

भूख , भय और बेकारी की
जब भी मैं बातें करता हूँ ,
चुपके से तुम बहका कर ,
मंदिर, मस्ज़िद पर लाते हो ,

प्यार नहीं तुमको मंदिर से ,
और नहीं मस्ज़िद पर अक़ीदा ,
दिखने में मासूम बहुत हो ,
अंदर से कितने शातिर हो.

आज मुखौटा उतर रहा है ,
कितनी बदरंगी शक्लें हैं ,
लाशों पर तुम राज करोगे
घर घर आग लगा बैठे हो,

कितनी कसमें , कितने वादें
किये थे तुमने याद है कुछ ,
फिर फिर आते उन्ही को लेकर
सारी शर्म गवाँ बैठे हो,

नहीं भरोसा तुम पर मेरा ,
आशंका से भरा बैठा हूँ ,
अब तो बहस के मुद्दे बदलो ,
कब तक झांसा दोगे तुम !!

© विजय शंकर सिंह )
इस कविता को निम्न लिंक पर आप मेरी आवाज में सुन भी सकते हैं। 
https://youtu.be/gOS5nw13e60