Thursday, 14 March 2019

पहले चोरी, फिर फोटोकॉपी और अब तीन पन्ने छूट गए हुज़ूर / विजय शंकर सिंह

इस सरकार में सबसे अधिक धर्मसंकट में अगर कोई है तो देश के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल हैं। यह धर्म संकट राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवायी को लेकर है। सरकार राफेल मामले में फंसी पड़ी है। पीएमओ ने सारी प्रक्रिया को ताक पर रख कर एक डिफाल्टर पूंजीपति को दसॉल्ट का ऑफसेट पार्टनर बनाने के लिये समानांतर बातचीत की जिसकी भनक तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर को भी नहीं थी। अब जब अदालत में जनहित याचिका दायर हुयी तो सरकार की तरफ से बचाव की जिम्मेदारी इन्ही दो आला सरकारी वक़ीलों पर आ पड़ी। बड़ा मुश्किल होता है हस्तिनापुर के साथ सारे आफत विपत में खड़ा होना। पर एजी के वेणुगोपाल और एसजी तुषार मेहता खड़े है  और उनका बचाव कर रहे हैं जिनके बचाव की गुंजाइश कम ही है। दोनों बड़े वक़ीलों की प्रतिभा और क्षमता में कोई कमी नहीं है। यह बात बिल्कुल सही है।

जब वह कागज, जो आज सुरक्षा के लिये खतरा बताया जा रहा है, बरास्ते द हिन्दू सार्वजनिक हुआ तो पहले सॉलिसिटर जनरल ने अदालत में कहा कि फाइल चोरी हो गई। फिर जब लगा कि यह प्रति प्रश्न उठेगा कि चोरी की एफआईआर कब हुयी और नहीं हुयी तो क्यों नहीं हुयी और हुयी तो क्या कार्यवाही हुयी आदि आदि। तब तुरन्त एजी ने गियर बदला और कहा कि
" फाइल चोरी नहीं हुयी थी, उसकी फोटोकॉपी हुयी है। "
इस पर भी वही सवाल उठेंगे कि,
" किसकी लापरवाही से यह फोटोकॉपी हुयी और यह कैसे बाहर गयीं ? "
इस पर सरकार और एजी दोनों चुप हैं।
अब कहा जा रहा है कि
" याचिकाकर्ता ने इसे अदालत में दाखिल करके गोपनीयता भंग की है और देश की सुरक्षा प्रभावित हुयी है ।"
सरकारी वकील वही कहता है जो सरकार चाहती है। सरकार के बड़े अफसर उसे ब्रीफ करते है। सरकारी वकील यह भी सरकार को बता देता है कि जो तर्क वह अदालत में प्रस्तुत कर रहा है वह कितना बहस और जिरह में टिकेगा।

याचिकाकर्ता द्वारा देश की सुरक्षा से समझौता एक गंभीर आरोप है। बेहद गंभीर। यह आरोप दो पूर्व मंत्रियों यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी और एक सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण पर है क्योकि वे याचिकाकर्ता हैं और उन्होंने यह दस्तावेज अदालत में दाखिल किये हैं। दोनों ही पूर्व मंत्री, कोई अनपढ़ राजनीतिक व्यक्ति नहीं है। यशवंत सिन्हा आईएएस अफसर रह चुके हैं, और अरुण शौरी एक प्रख्यात पत्रकार हैं। दोनों ही इस तथ्य से वाकिफ होंगे कि कौन से दस्तावेज का कौन सा अंश सुरक्षा के लिये खतरा हो सकता है। तीसरे याचिकाकर्ता प्रशान्त भूषण तो खुद ही सीनियर एडवोकेट हैं जो कानून की पेचीदगियां जानते हैं।

लेकिन ये दस्तावेज अदालत में दाखिल होने से पहले न्यूज़ एजेंसी एएनआई और द हिन्दू में छप चुके थे। और इन्ही दस्तावेजों को रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में पढ़ कर सुना भी दिया था। संसद की कार्यवाही पूरी दुनिया देखती है और सबने इस गोपनीय दस्तावेज को भी देखा था। अब इस गोपनीयता भंग का आरोप तीनो याचिकाकर्ता के साथ साथ एएनआई, द हिन्दू पर भी है। निर्मला सीतारमण का संसद में यह दस्तावेज प्रदर्शित करना गोपनीयता भंग का अपराध नहीं बनता क्योंकि संसद में किसी कृत्य के लिये कोई जांच सदन के स्पीकर के ही अधिकार क्षेत्र में आती है। सदन के अंदर हुये कदाचार के संबंध में सदन के बाहर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती है। और अगर होना ज़रूरी है तो स्पीकर की अनुमति आवश्यक है। यह सांसदों का विशेषाधिकार है। अब यह देखना है कि सरकार इस आरोप पर क्या वैधानिक कार्यवाही करती है। करती भी है या नहीं करती है।

लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर राफेल विमान सौदे में कथित गड़बड़ी का मामला चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट में आज राफेल डील पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई हो रही है।. केंद्र सरकार की ओर से बुधवार को दायर हलफनामा में कहा गया कि रक्षा मंत्रालय से राफेल के कागजात लीक हुए थे। जस्टिस जोसेफ ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि,
" जिन डॉक्यूमेंट्स की बात हो रही है हम उनके बारे में जानते ही नहीं हैं। ऐसा उन डॉक्यूमेंट्स में क्या है जो हम भी उन्हें नहीं देख सकते हैं.
। "
इसपर एजी ने कहा कि
" कोर्ट उन दस्तावेजों को देख सकता है. राफेल डील में साफ है कि ये सरकारों के बीच में सौदा है, इसलिए दाम नहीं बता सकते हैं ।"
तब प्रशांत भूषण ने कहा कि
" पत्रकार के लिए किसी भी कानून में सोर्स बताने की पाबंदी नहीं है।  2G में भी ऐसा ही हुआ था, किसी अनजान आदमी ने सीबीआई रंजीत सिन्हा के घर का एंट्री रजिस्टर दिया था, जिससे खुलासा हुआ था। "
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया है। तब प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि
" अगर राफेल पर दस्तावेज सही हैं तो फिर कोर्ट उसका संज्ञान ले सकता है, भले ही दस्तावेज कहीं से भी आए हों । "
इस पर उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की भी एक रूलिंग प्रस्तुत की।

केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि,
" क्योंकि ये दो सरकारों के बीच का मामला था इसलिए हमने सीएजी से कहा था कि रिपोर्ट में दाम का जिक्र ना करें। "
इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि
" इस मामले में भ्रष्टाचार हुआ है इसलिए सरकार कोर्ट को दखल न देने को कह रही है। "
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क रखते हुए कहा कि
" अगर चोरी हुई थी तो सरकार ने मुक़दमा क्यों नहीं दर्ज कराया ? सरकार अपनी जरूरतों के अनुसार इन दस्तावेजों का खुलासा करती रही है। ऑडिट रिपोर्ट में क्या होगा, यह सरकार को कैसे पता ? "

अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट में तर्क दिया कि,
" जिन कागजों की बात हो रही है उसमें राफेल के दाम भी शामिल हैं जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। अगर युद्ध होता है तो यह देश को नुकसान पहुंचा सकता है। सुरक्षा से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती हैं। "
जिस पर जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा कि
" जिन संस्थानों में ऐसा नियम है और अगर भ्रष्टाचार का आरोप है तो फिर जानकारी देनी ही पड़ती है। "
सुनवायी के दौरान जस्टिस कौल ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि
" आप अब दस्तावेज बदल रहे हैं और विशेषाधिकार की मांग कर रहे हैं. लेकिन आपने सबूत पेश किए हैं। "
इसके जवाब में एजी ने कहा कि डॉक्यूमेंट्स दूसरी पार्टी ने पेश किए हैं, हमने नहीं।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने बताया कि
" सीएजी की जो रिपोर्ट अदालत में दाखिल की गई थी, उसमें कुछ कागजात नहीं थे।  रिपोर्ट में शुरुआती तीन पेज शामिल नहीं थे। उनसे गलती से पेज दाखिल नहीं हो पाए थे। "
जिसपर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि,
" आप दस्तावेज़ों के विशेषाधिकार की बात कर रहे हैं, लेकिन इसके लिए आपको सही तर्क पेश करने होंगे। "

इससे पहले सरकार इसी कैग रिपोर्ट में गलती की बात कह चुकी थी, जिसके बाद ही इस पुनर्विचार याचिका को दाखिल किया गया था। पिछली सीएजी रिपोर्ट के उल्लेख के आधार पर ही मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली थी।
इस संबंध में फैसला सुरक्षित है।

© विजय शंकर सिंह

चीन द्वारा वीटो हमारी कूटनीतिक कूटनीतिक विफलता है / विजय शंकर सिंह

चीन ने मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने के प्रस्ताव को फिर वीटो कर दिया। यह चौथा अवसर है जब चीन ने पाकिस्तान के समर्थन में इस प्रस्ताव के विरोध में अपने विशेषाधिकार वीटो का प्रयोग किया। यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी कूटनीतिक असफलता है, पुलवामा के बाद ! और इसमें मोदी सरकार का बड़ा हाथ है- आरोप जैश पर है, करने वाले को कश्मीरी बता रहे, मुख्य मास्टर माइंड को भी. फिर फ़र्ज़ी या सही पर एयर स्ट्राइक का जुमला दाग पाकिस्तान सीमा उल्लंघन कर चीन को 'मित्र' देश के साथ खड़े होने का कारण और मुहैया करा रहे हो! ड्रम बजाने से कूटनीति चलती तो मंगोलिया महाशक्ति होता!

भारत चीन संबंधों पर समर अनार्य कहते हैं,  " प्रधानमंत्री बनते बनते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अहमदाबाद बुला के झूले पर बैठ के प्यार की पींगे लिये। अरुणाचल प्रदेश से आने की वजह से अपने गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू को उस कार्यक्रम में बुलाया भी नहीं, फिर भी चीन उसी समय अरुणाचल में घुसपैठ कर रहा था। उसके बाद चीन के 5 दौरे किये; 4 तो पठानकोट हमले के बाद के बाद भी चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के मसूद अज़हर को आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव के विरोध में वीटो के बावजूद।

पूंजीपति मित्रों के लिये विदेश जा जा कर उनके व्यापार की संभावनाएं ढूंढना और बात है पर व्यापक देशहित और जनहित के लिये अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन हासिल करना अलग बात है। गिरोहबंद पूंजीवाद ( Crony Capitalism ) से यही प्राप्त होगा। 1971 की भारत पाक जंग सैन्य सफलता तो थी ही पर वह देश की एक उल्लेखनीय कूटनीतिक सफलता का परिणाम भी थी कि रूस जैसा भरोसेमंद मित्र हमारे साथ था और उसने कदम कदम पर हमारा साथ दे अमेरिका की हर साज़िश विफल कर दिया था। अमेरिका ने सातवाँ जंगी बेड़ा तक (यूएस सेवंथ फ्लीट) तक मोड़ के भारत की तरफ भेज दिया था जिसके जवाब में सोवियत यूनियन ने अपनी फ्लीट घुमा दी. आज वही रूस पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास कर रहा है! नेपाल चीन के ! अमेरिका, तिलमिला कर रह गया था पर न हमारा कुछ बिगाड़ सका और न ही पाकिस्तान को कोई मदद पहुंचा सका। आज भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में ऐसा कोई भी विश्वसनीय मित्र नहीं है, यहां तक कि अमेरिका भी नहीं, जो वक़्त पड़ने पर हमारे लिये वीटो लेकर खड़ा रहे। अमेरिका के लिये हम बस कूचा ए बाज़ार है। जब तक हैं तब तक हैं। उसकी नज़र बस एक खरीददार की तरह ही उठती है।

गिरीश मालवीय के अनुसार, संगठन जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मसूद अजहर को एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में  वैश्विक आतंकी घोषित नहीं किया जा सका क्योकि चीन ने फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा मसूद के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाए गए प्रस्ताव के खिलाफ बुधवार को वीटो लगा दिया.

मोदी सरकार की यूएन में यह लगातार तीसरी नाकामी हैं सरकार ने सबसे पहले 2016 में मसूद को वैश्विक आतंकी मानने का प्रस्ताव रखा चीन ने पहले मार्च 2016 ओर फिर अक्तूबर 2016 में भारत की कोशिशों को नाकाम कर दिया।  2017 में एक बार फिर अमेरिका ने ब्रिटेन और फ्रांस की मदद से प्रस्ताव रखा लेकिन इस में चीन ने वीटो लगा दिया।

मोदी चार साल में चीन के चार चक्कर लगा चुके हैं तो आखिरकार क्या यह पूछा नही जाना चाहिए कि मोदी जब बार बार चीन दौरे करते हैं उसका क्या फायदा हुआ? चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अति महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट रोड इनिशिएटिव पर हमने क्या कड़े कदम उठाए हैं?

चीनी कम्पनियों को जो हर तरह की सुविधा दी जा रही हैं वह क्यो दी जा रही हैं? आज मोबाइल का मार्केट पूरी तरह से चीन के कब्जे में जा चुका है जहाँ देखिए वहाँ बाज़ार ओप्पो वीवो।जैसे चाइनीज ब्रांड का माल मिलता है लावा माइक्रोमैक्स सरीखी कंपनियां बंद जैसी ही हो गयी हैं आज यही से पैसा जाता है और बदले में चीन हमे आँखे लाल कर के दिखाता है.

अब मोदीजी चीन के लिए ऑटोमोबाइल सेक्टर भी  खोल रहे है, चीन से आयात रिकार्ड हाई पर पुहंच गया है और निर्यात कम होता जा रहा है चीन के साथ व्यापार घाटा देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी पड़ रहा है, उसके बावजूद भारत चीन पर प्रेशर नही डाल पा रहा है तो यह मोदीजी की विदेश नीति की असफलता क्यो नही मानी जाए ?

इसी विषय पर प्रसिद्ध पत्रकार प्रशांत टण्डन की यह टिप्पणी बेहद सारगर्भित है।
चीन ने कल दोबारा जैश - ए- मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का विरोध कर के इसे निरस्त कर दिया. ये मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक विफलता है जब विश्व के तमाम देश पुलवामा में हुये आतंकवादी हमले की निंदा कर चुके हैं.

मोदी सरकार आने के पहले भारत-चीन-रूस की तिकड़ी पश्चिम के लिए सर दर्द बनी हुयी थी. इसी तिकड़ी ने BRICS (ब्राज़ील, रूस, इंडिया, चाइना और साउथ अफ्रीका) का जलवायू परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पर अमेरिका और पश्चिमी देशो के खिलाफ मोर्चे बंदी के लिए प्रेशर ग्रुप बनाया जिसका बाद में इन देशो के बीच व्यापारिक और सामरिक हितों तक विस्तार हो गया. पश्चिम और खासकर अमेरिका इस तिकड़ी को तोड़ना चाहता था. मनमोहन सरकार के वक़्त ओबामा ने इस बावत कई बार कोशिश की पर उसे कामयाबी नहीं मिली.

मोदी अमेरिका के बुने हुये इस जाल में फसते चले गए और इस विदेश नीति को ऐसा मोड़ा कि भारत उसकी बड़ी कीमत चुका रहा है. पहले चीन ने भारत की न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप की सदस्यता पर अड़ंगा लगाया. मोदी ने एनएसजी की सदस्यता को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया पर कामयाब नहीं हुये. फिर चीन के डोकलाम में सैनिक कार्यवाही कर के भारत के लिये मुसीबत खड़ी की जो अभी भी पूरी तरह से सुलझी नहीं है.

इसके पहले चीन और रूस ने ब्रिक्स के प्रस्ताव में पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी गुटों का ज़िक्र नहीं लाने दिया. भारत की विदेश नीति की एक बड़ी कामयाबी रही है कि आतंकवाद पर वो विश्व समुदाय मे पाकिस्तान को अलग थलग करने में कामयाब रहा है. चीन का ये रुख भारत की मूहिम को धक्का है. 

चीन एक बड़ी ताकत है, भारत और चीन की 4000 किलोमीटर लंबी सीमा है और व्यापरिक रिश्ते हैं लेकिन उससे सूझबूझ से इंगेज करने के बजाय मोदी नेपाल और श्रीलंका को चीन के पाले में धकेल चुके हैं. भारत की विदेश नीति का उद्देश्य भारत के हितों की रक्षा करना होना चाहिए ना कि अमेरिका के।

क्या हम चीन के खिलाफ भी कुछ करेंगे या करने की सोचेंगे ?

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 12 March 2019

जी का जंजाल बनता जी का सम्बोधन / विजय शंकर सिंह

अपराधियों का सम्बोधन आदर सूचक शब्द से करना निंदनीय है। राहुल गांधी द्वारा, अज़हर को जी संबोधन से उल्लेख करने के बाद सोशल मीडिया पर राहुल गांधी की ट्रॉलिंग हो रही है। यह संबोधन आपत्तिजनक है, इसमे कोई संदेह नहीं है। पर तब तक खोजी और तफतीशी मित्रो ने तीन उदाहरण भाजपा के नेताओं के भी ढूंढ निकाले जहां आतंकी सरगनाओं को श्री कह कर संबोधित किया गया है। डॉ मुरली मनोहर जोशी, रविशंकर प्रसाद ने हाफिज सईद के सामने श्री लगाया और सम्बित पात्रा ने जी। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इन महानुभावों के मन मे इन आतंकी सरगनाओं के लिए आदर का भाव है। बल्कि यह जी और श्री के सारे संबोधन या तो जिह्वाविचलन के कारण है या तंज के कारण। 

पर आतंकियों को जी कहने की परम्परा तो, कुछ संस्कारवान लोगों ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे से शुरू की है । हत्यारे गोडसे को गोडसे जी कहा गया। आज भी कहा जा रहा है। गोडसे को जी कहना न तो जिह्वाविचलन है और न ही तंज। भारत मे कुछ संगठन आज भी गोडसे को सम्मान की नज़र से देखते हैं। उनकी संख्या कम है पर वे मौजूद हैं। आज भी गोडसे का महिमामंडन किया जाता है। उसका मंदिर बनाने की कोशिश समय समय पर की जाती है। उसके कुकृत्य और हत्या का टीवी पर नाट्य रूपांतरण किया गया। आज भी किया जा रहा है । और यह सब खुल कर हो रहा है।

यह आतंक का महिमामंडन है। यह वैचारिक विरोध के हिंसक अभिव्यक्ति का दुंदुभिवादन है। किसी भी हत्यारे, अपराधी और आतंक फैलाने वाले दुर्दांत को चाहे वह कितना ही महत्वपूर्ण व्यक्ति हो या महत्वपूर्ण पद पर  या अधिकारसम्पन्न क्यों न हो, के नाम के साथ आदरसूचक शब्द 'जी' लगाना निंदनीय है। अपराध की एक मनोवृत्ति होती है। महत्वपूर्ण होने मात्र से ही वह मनोवृत्ति खत्म नहीं होती है। हत्यारे और आतंकी हर दशा में यही कुकर्म करते हैं।

© विजय शंकर सिंह

Thursday, 7 March 2019

अयोध्या मामले में मध्यस्थता का निर्णय / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद मामले में मध्यस्थता कराने का निर्णय लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थों का एक पैनल बनाया है जिसके प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एफएम खलीलुल्लाह, होंगे और दो सदस्य, श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ एडवोकेट श्रीराम पांचू होंगे।

मध्यस्थता की कार्यवाही से सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को अलग रखा है। इससे संबंधित खबरें न तो छपेंगी और न ही प्रसारित की जाएंगी। ऐसा प्रकरण की संवेदनशीलता को देखते हुए किया गया है।

यह पंच फैज़ाबाद में ही बैठेगा और वही इसकी सुनवायी करेगा। कुल 8 हफ्ते का समय इस पंच पीठ को मध्यस्थता करके हल ढूंढने के लिये दिया गया है। पर पहली स्टेटस रिपोर्ट कि अब तक इस मामले में क्या प्रगति हुई की तथ्यात्मक आख्या पंच पीठ सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चार सप्ताह में प्रस्तुत करेगा।

" अगर राम मंदिर प्रकरण हल नहीं होता है तो देश सीरिया बन जायेगा। रामजन्मभूमि हिंदुओं के लिये आस्था का विषय है , मुस्लिमों को अपना अधिकार छोड़ देना चाहिये। "
यह बयान श्री श्री रविशंकर का है, जो अयोध्या मामले में मध्यस्थता पीठ के एक सदस्य हैं।

श्री श्री के इस विचार के आधार पर उनके इस पीठ में सम्मिलित किये जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। यह उनकी निजी धारणा हो सकती है। उनकी इस धारणा का कोई विरोध भी नहीं है। हर व्यक्ति अपनी अपनी धारणा और विचार व्यक्त करने के लिये स्वतंत्र है । यह अधिकार रविशंकर जी को भी है। लेकिन पंचपीठ में उन्हें अपनी इस धारणा से मुक्त होकर बैठना पड़ेगा।

अब यह श्री श्री रविशंकर का दायित्व है कि वे पंच परमेश्वर की मर्यादा और परंपरा पर खरे उतरें। उन्हें एक आध्यात्मिक और धार्मिक संत  भी माना जाता है, अतः उम्मीद है कि वह अपने दायित्व का वहन पंच परमेश्वर की मर्यादा के अनुसार ही करेंगे।

© विजय शंकर सिंह

सरकार से सवाल पूछने पर भीड़ हिंसा एक प्रतिगामी मनोवृत्ति है / विजय शंकर सिंह

गाय के नाम पर तो भीड़ हिंसा होती ही थी औऱ अब भी जारी है, पर अब न्यू इंडिया में बेरोजगारी की बात कहने पर भी भाजपा के लोग मारपीट करने लगे हैं ! उद्देश्य, सरकार से सवाल मत पूछो।  विश्व गुरु के महापद की ओर बढ़ता हुआ यह नया भारत, मुबारक हो, किसे कहूँ, समझ नहीं पा रहा हूँ। मुजफ्फरनगर में एक व्यक्ति द्वारा यह कहने पर कि बढ़ती बेरोजगारी के लिये सरकार जिम्मेदार है, उस व्यक्ति से भीड़ ने मारपीट की ।

गाय के साथ भावनाओं के जुड़ाव का धार्मिक और आस्थागत आधार तो है पर किसी सरकार के साथ भी क्या वही भावनात्मक और आस्थागत जुड़ाव कुछ लोगों का होता जा रहा है ? सरकार अमूर्त होती है उसके साथ प्रोफेशनल जुड़ाव होना चाहिये न कि भावनात्मक और आस्थागत जुड़ाव। सरकार और सरकार के मुखिया के साथ भावनात्मक और आस्थागत जुड़ाव सरकार को जनपक्षधर नहीं बल्कि तानाशाह बना देती है।

आखिर सरकारें चुनी क्यों जाती है ? यह सवाल अकादमिक हो सकता है पर राजनीति शास्त्र की मोटी मोटी अकादमिक और टेक्स्ट बुक के जंजाल में पड़े बिना ही ज़रा सोचिएगा तो आप हैरान हो जाएंगे कि यह सरकार चुनी किस लिये गयी थी और इसने किया क्या है ?

सरकार के वायदों की फेहरिस्त जिसे संकल्पपत्र के नाम से जाना जाता है खूबसूरत ग्लेजी कागज़ का मोहक टुकड़ा ही नहीं है कि उसे रॉकिंग कुर्सी पर गरम एक्सप्रेसो कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ पढा जाय और पढ़ कर बस शीशे की किताबों भरी आलमारी में सज़ा कर रख दिया जाय। वह जनता से राजनीतिक दलों का किया गया वादा होता है कि अगर वे अब चुन कर आये तो यह यह वादे पूरा करेंगे। अतिरेक भरे वादे करना और फिर उन्हें भूल जाना भी एक मानवीय स्वभाव जन्य भूल है, यह तर्क भी अपनी जगह दुरुस्त है, तो ऐसे बेवफाई भरे आचरण की निंदा करना भी एक मानवीय स्वभाव है।

हम जो अक्सर सरकार की निंदा करते रहते हैं और कुछ मित्र इस निंदा के खिलाफ भी फतवे जारी कर के मेरी ही खिंचाई करते हैं के लिये मेरा यही कहना है कि वे पहले वायदों की फेहरिस्त पढें और फिर मेरी बात सुनें। राजनिन्दा या सरकार की आलोचना करना, जनता का दायित्व और कर्तव्य है और भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में सबसे प्रमुख मौलिक अधिकार है। यह सरकार का एहसान नहीं है । यह समाज के विकसित होते हुये वैचारिक खुलेपन का नतीजा है।

भारतीय संदर्भ में यह कोई नयी चीज नहीं है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक संदेहों और उसके निवारण पर खुल कर बात हुयी है। जिस संस्कृति में ईश्वर के अस्तित्व पर प्रथम दिन से ही प्रश्न उठाए गए हों, जहां विष्णु को भृगु की लात मारने और ईश्वर द्वारा इस घटना पर भी मुस्करा कर सह लेने के उदाहरण मौजूद हैं, वही सरकार की आलोचना भीड़ हिंसा का कारण बन जाय तो यह सोचना पड़ता है कि हम आगे नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि पीछे लौट रहे हैं। यह भयानक है और इसे रोकना होगा।

© विजय शंकर सिंह

8 मार्च को सुप्रीम कोर्ट अयोध्या मामले में मध्यस्थता पर निर्णय देगा / विजय शंकर सिंह

अयोध्या मामला भले ही कानूनी रूप से एक भूमि के टाइटिल सूट का मामला हो, पर यह एक टाइटिल सूट का मामला होते हुए भी बहुत ही संवेदनशील मामला है । इसका एक और सर्वमान्य हल मध्यस्थता भी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समाधान को भी आजमाने के लिए सुनवायी की और 8 मार्च को इसी विंदु पर अपना निर्णय देने जा रही है। इसके साथ ही विवादित स्थल पर हिंदुओं को प्रार्थना पूजा के लिये अनुमति देने की डॉ सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट 8 मार्च को ही अपना फैसला सुनाएगी।


मध्यस्थता के विचार का सुझाव 26 फरवरी के सुनवायी के दिन, संविधान पीठ के एक जज जस्टिस एसए बोबडे ने दिया था। उसी आधार पर पीठ ने सभी पक्षकारों से पूछा था कि क्या वे मध्यस्थता के लिये राजी हैं। 6 मार्च को जब सुनवायी हुयी तो, मुस्लिम पक्ष जिसमे सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड भी है ने कहा कि वे मध्यस्थता के प्रयास के लिये सहमत हैं।

हालांकि हिन्दू पक्ष जिनमे रामलला विराजमान के याचिकाकर्ता भी हैं ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की और कहा कि यह एक सामान्य भूमि के टाइटिल सूट का मामला नहीं है, और जन मानस हो सकता है मध्यस्थता के विचार और निर्णय से सहमत न हो।

उभय पक्षों का यही दृष्टिभेद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मध्यस्थता का आदेश पारित करने के समय बाधा बन सकता है। मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा है कि मध्यस्थता पर विचार किया जा सकता है क्योंकि भूमि विवाद के न्यायिक समाधान के पूर्व आपसी बात चीत से एक समझौते का मार्ग ढूंढने में कोई हर्ज और वैधानिक बाधा नहीं है।

यूपी के एडवोकेट सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मध्यस्थता का निर्णय जजों को तभी लेना चाहिये जब वे आश्वस्त हों कि इस समस्या का समाधान निकल सकता है। हालांकि कि तुषार मेहता के इस बात का राजीव धवन ने विरोध किया कि उत्तरप्रदेश सरकार इस मामले में कोई पक्ष नहीं है और वह कह चुकी है कि वह इस मामले से दूर रहेगी।

हिन्दू पक्ष का कहना है कि मध्यस्थता में कौन कौन पक्ष सम्मिलित होगा और पंच कौन बनेगा को लेकर भी आमराय बनानी मुश्किल होगी। क्योंकि बहुत से धर्मिक संगठन अपनी अपनी बात कहना चाहेंगे। इस पक्ष का यह भी कहना है कि मध्यस्थता के बाद आने वाला फैसला बाध्यकारी नहीं होता है। अतः पुनः विवाद उठ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह सारा प्रयास निष्फल हो जाएगा। 
उन्होंने यह भी कहा एक आम नोटिस जारी कर के जनता के सभी वर्गों को इस मध्यस्थता की सूचना देनी होगी ताकि लोग अपनी अपनी बात कह सकें। हालांकि इससे मध्यस्थता का कार्य और भी जटिल हो जाएगा। फिर भी उभय पक्ष ने यह कहा कि एक मध्यस्थ या मध्यस्थों के कई पैनल गठित कर के समझौते का रास्ता ढूंढा जा सकता है।

जजों ने सभी पक्षो को मध्यस्थता के लिये पंचों के नाम सुझाने के लिये भी कहा और कुछ नाम पीठ ने भी सुझाये। पीठ ने जो नाम सुझाये, उसमें जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिन जीएस केहर, दोनों पूर्व सीजेआई रह चुके हैं और जस्टिस एके पटनायक हैं।

मध्यस्थता के निर्णय के साथ अदालत मध्यस्थता की कार्यवाही के मीडिया कवरेज के विंदु पर भी कुछ फैसला सुना सकती है। प्रकरण की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत मध्यस्थता कार्यवाही के मीडिया प्रसारण और प्रकाशन पर भी रोक लगाने का विचार कर सकती है। हालांकि यह अभी तय नहीं है कि मीडिया कवरेज को लेकर अदालत का क्या रुख रहता है। 

© विजय शंकर सिंह