Thursday, 13 October 2016

एक कविता ...... साथ / विजय शंकर सिंह

साथ ,
साथ साथ होने में नहीं है ,
साथ ,
साथ साथ एक साथ बैठने में नहीं है
साथ ,
बस साथ साथ रहना भी नहीं है
साथ , 
मन का मन को समझना
और
न आये कोई खबर तो
मन का मचलना भी है !

साथ साथ रह कर भी
मन घूमता रहता है ।
गढ़ता रहता है घरौंदे सपनों के,
और ढूंढ़ता रहता है उन्हें
जिन्हे मन ने मन में ही
छिपा रखा है कहीं !

अजीब कश म कश है ,
हम तलाश में भी , रहते हैं ,
मुब्तिला भी उसी के,
जो महफूज़ है , मन में ही कहीं !!

( विजय शंकर सिंह )

Monday, 10 October 2016

पूर्व डीजी बीके बंसल की आत्महत्या और सीबीआई की साख पर सवाल / विजय शंकर सिंह

आतंकी हमलों और भारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक के खबरों के बीच एक खबर दबी रह गयी जो देश के सर्वाधिक ' प्रतिष्ठित ' और प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई से सम्बंधित है । सारे खबरनवीस इस समय लाम पर हैं और लम्बे समय तक उनके कमरबंदी में बने रहने की आशा है अतः यह प्रकरण उठा रहा हूँ । पुलिस अभिरक्षा में मौत पुलिस विभाग के लिए अत्यंत ही गंभीर आरोप है । कॉर्पोरेट मामलों के डीजी, बीके बंसल 8 लाख रूपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाँथ पकडे जाने के एक मामले में, अभियुक्त थे और उनसे नियमानुसार पूछ ताछ चल रही थी । बीके बंसल ने 27 सितम्बर को अपने बेटे के साथ कथित तौर पर सुसाइड कर लिया था। बंसल ने अपने सुसाइड नोट में कुछ सीबीआई अधिकारियों पर परेशान करने और प्रताड़ित तथा यातना देने के आरोप लगाए हैं। बंसल को रिश्वत मामले में 16 जुलाई को सीबीआई ने गिरफ्तार दिया था। अपने सात पेज के सुसाइड नोट में बंसल ने बताया कि किसी तरह से सीबीआई की महिला अधिकारियों ने उनकी पत्नी के साथ बदसलूकी की और उनकी पिटाई की।

ये है बीके बंसल का पूरा सात पेज का सुसाइड नोट-



मैं यह सुसाइड सीबीआई की प्रताड़ना की वजह से कर रहा हूं। 18-7-2016 की रात व 19-07-2016 की सुबह (पूरी रात) सीबीआई की लेड़ी ऑफिसर्स रेखा सांगवान, और अमृता कौर ने बहुत ही बुरी तरह से प्रताड़ित किया जो कि मेरी पत्नी ने अपनी दोस्तों और पड़ोसियों को सुसाइड से पहले बताया। मेरी पत्नी को बहुत थप्पड़ मारे, नाखून चुभोए और बहुत ही गंदी-गंदी गालिया दीं। फोन पर डीआईजी संजीव ने भी बहुत ज्यादा प्रताड़ित करने को बोला।



मेरे सामने ही 18-7-2016 दोपहर में डीआईजी संजीव गौतम ने एक लेडी ऑफिसर को कहा था कि इतना प्रताड़ित करना मां और बेटी को कि मरने लायक हो जाएं। मैंने डीआईजी से बहुत प्रार्थना की लेकिन उसने कहा कि तेरी पत्नी और बेटी को अगर जिंदा लाश नहीं बना दिया तो मैं सीबीआई का डीआईजी संजीव गौतम नहीं। तुम्हारी आने वाली पुश्तें भी संजीव गौतम के नाम से कांपेंगी सीबीआई को याद रखेगी। सीबीआई का डीआईजी महादुष्ट और महानीच है। इसने ही मेरे सामने दोनों लेडी ऑफिसर को मरणतुल्य प्रताड़ना के आदेश दिए थे। यह भी उतना ही जिम्मेदार है, जितना दोनों लेडी ऑफिसर रेखा सांगवान और अमृता कौर हैं।



इसके अलावा एक बहुत मोटे हवलदार ने भी मेरी पत्नी के साथ बहुत गंदा व्यवहार और प्रताड़ित किया था। बहुत ही गंदी गंदी गालियां मेरी पत्नी और मेरी बेटी को दीं। अगर मेरी गलती थी भी तो मेरी पत्नी और बेटी को प्रताड़ित करके सुसाइड क्यों करवाया गया। यह दो महिलाओं का मर्डर था, इसे सुसाइड नहीं कहा जा सकता। डीआईजी संजीव गौतम, दोनों लेडी ऑफिसर और मोटे हवलदार का लाय डिटेक्टर टेस्ट करवाया जाए। सब सच सामने आ जाएगा। डीआईजी ने कहा था कि मैं अमित शाह का आदमी हूं। मेरा कोई क्या बिगाड़ेगा। तेरी पत्नी और बेटी का वो हाल करेंगे कि सुनने वाले भी कांप जाएंगे।



लेडी ऑफिसर्स ने मेरी पत्नी को कहा था कि तेरे बेटे और तेरे पति के टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को डालेंगे। उनका प्रताड़ित किया गया कि वो सुसाइड करने को मजूबत हो गईं। सीबीआई के डायरेक्टर को यह सब जांच करवानी चाहिए। इसलिए दोनों सुसाइड हुए। सुसाइड का पता चलने से पहले मुझे भी डीआईजी संजीव गौतम ने बहुत ही ज्यादा प्रताड़ित किया था और कहा था कि तेरी पत्नी और बेटी का वह हाल बना देंगे कि पूरा परिवार मौत मांगेगा लेकिन मौत भी नहीं मिलेगी।


आईओ प्रमोद त्यागी बहुत ही जिम्मेदार इंसान है। उन्होंने हर बार हौंसला दिया कि अब गलत नहीं होगा। जो हो गया उसे भूल जाओ। भगवान उसके और उसके परिवार को सलामत रखे। लंबी आयु दे व तरक्की दें। भगवान सबका भला करे। मैंने सुना था कि सीबीआई टफ है लेकिन इतना मालमू नहीं था कि डीआईजी संजीव गौतम, दो लेडी ऑफिसर व मोटे हवलदवार जैसा मारने वाला, मर्डर जैसा, प्रताड़ित भी सीबीआई करती है। ये मेरी पत्नी और बेटी ने सुसाइड नहीं किया था, बल्कि यह सीबीआई द्वारा हत्या है।
मैं मेरी पत्नी और बेटी का सीबीआई द्वारा (सुसाइड करवाना) मर्डर करने से बहुत दुखी हूं। और जीने की इच्छा समाप्त करके जा रहा हूं।
अलविदा
भारत माता की जय हो।

यह सुसाइड नोट सीबीआई की कार्य प्रणाली की गंभीर कमियों को भी उजागर करता है . अदालत को इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए . यह किसी सामान्य थाने या सब इंस्पेक्टर का मामला नहीं है . यह उस जांच एजेंसी का मामला है जिसके पास जांचें तब जाती हैं जब कोई और विकल्प नहीं सूझता है . यह सीबीआई की साख का मामला है . पर यह अलग बात है कि सीबीआई की साख की धज्जियां बुरी तरह से अदालत में उड़ चुकी है . इसे सार्वजनिक रूप से तोता कहा गया , और उसके निष्कर्ष बहुधा बाहरी दबाओं से प्रभावित माने गए .
बंसल ट्रैप किये गए . इसके लिए कानून में सज़ा का प्राविधान है . वह अपने किये को भोग भी रहे थे . पर जो सुसाइड नोट सोशल मिडिया पर छा रहा है उसमे एक डीआईजी खुद को अमित शाह का आदमी बता रहा है । धन्य हैं वह सज्जन । इतनी बड़ी और पावरफुल नौकरी  और अभिमान एक अभियुक्त के आदमी होने पर ! यह भी नौकरशाही की ही गिरावट है । सरकार इतनी सुख सुविधाएं , वेतन भत्ते, देती है, अधिकार कानून ने दिए हैं और आह्लाद इस बात का है कि अमित शाह के आदमी है । यह बयान अमित शाह की प्रशंसा में है या उन्हें निपटाने के लिए जुमला यह तो वही जाने । पर एक संस्था के रूप में सीबीआई को अपनी क्षवि साफ़ रखनी होगी ।
( विजय शंकर सिंह )

Monday, 3 October 2016

सआदत हसन मंटो की एक कहानी - टोबा टेक सिंह / विजय शंकर सिंह


टोबा टेक सिंह सादत हसन मंटो द्वारा लिखी गई और १९५५ में प्रकाशित हुई एक प्रसिद्ध लघु कथा है। यह भारत के विभाजन के समय लाहौर के एक पागलख़ाने के पागलों पर आधारित है और समीक्षकों ने इस कथा को पिछले ५० सालों से सराहते हुए भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों पर एक "शक्तिशाली तंज़" बताया है।
कहानी के अंत में बिशन सिंह दोनों देशों के बीच की सरहद में कंटीली तारों के बीच लेटा, मरा या मरता हुआ दर्शाया गया। कहानी में जब भी मुख्य पात्र बिशन सिंह उत्तेजित या ग़ुस्सा होता है तो पंजाबी, हिन्दी-उर्दू और अंग्रेज़ी को मिलाजुलाकर बड़बड़ाने या चिल्लाने लगता है। उसकी बातें वैसे तो बेमतलब होती हैं लेकिन उनमें भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए दबी हुई सी गालियाँ भी दिखती हैं।
पूरी कहानी पढ़ें ...

टोबा टेकसिंह --
बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय।
मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और िदन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी ) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये।
उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चीमेगोइयां होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी के साथ जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा-
-- मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?
तो उसने बड़े गौरो फिक्र के बाद जवाब दिया-
-- हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।
ये जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया।
इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा--
-- सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है - हमें तो वहां की बोली नहीं आती।
दूसरा मुस्कराया-
-- मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है - हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ -आकड़ फिरते हैं।
एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया।
बाज पागल ऐसे थे जो पागल नहीं थे। उनमें अकसरियत ऐसे कातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे- दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्या तकसीम हुआ और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाकेआत से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उनकी गुफ्तगू (बातचीत) से भी वो कोई नतीजा बरआमद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे आजम कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलाहेदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है ?इसका महल-ए-वकू (स्थल) क्या है इसके मुतअल्लिक वह कुछ नहीं जानते थे। यही वजह है कि पागल खाने में वो सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह माउफ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ्तार थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है। अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ्तार हुआ कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे मुस्तकिल तकरीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मसअले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया, धमकाया गया तो उसने कहा-
-- मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में। मैं इस दरख्त पर ही रहूंगा।
एक एम. एससी. पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास रविश (क्यारी) पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नमूदार हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफादार के हवाले कर दिये और नंगधंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।
यन्यूट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सरगर्म कारकुन था और दिन में पन्द्रह-सोलह मरतबा नहाता था, यकलख्त (एकदम) यह आदत तर्क (छोड़)कर दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उसने एक दिन अपने जिंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखादेखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जिंगले में खून-खराबा हो जाय, मगर दोनों को खतरनाग पागल करार देकर अलहदा-अलहदा बन्द कर दिया गया।
लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था जो मुहब्बत में मुब्तिला होकर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। इसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे मुहब्बत हो गयी थी। गो उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको नहीं भूला था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये-- उसकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे,उसको हिन्दुस्तान वापस भेज दिया जायेगा। उस हिन्दुस्तान में जहां उसकी महबूबा रहती है। मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था-- इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।
यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बहुत रंज हुआ। वह छुप-छुप कर इस मसअले पर गुफ्तगू करते रहते कि पागलखने में उनकी हैसियत क्या होगी। यूरापियन वार्ड रहेगा या उड़ जायगा। ब्रेकफास्ट मिलेगा या नहीं। क्या उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो जहरमार नहीं करनी पड़ेगी ?
एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज सुनने में आते थे, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।' वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से में एक एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। अलबना किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।
हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुतअिल्लक जब कभी पागलखाने में गुफ्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी संजीदगी से जवाब देता, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।'
लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो यह बताने की कोशिश करते थे वो खुद इस उलझाव में गिरफ्तार हो जाते थे कि स्याल कोटा पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है कल हिन्दुस्तान में चला जायगा या सारा हिन्दुस्तान हीं पाकिस्तान बन जायेगा। और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब नहीं हो जायेंगे।
उस सिख पागल के केस छिदरे होके बहुत मुख्तसर रह गये थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे जिनके बाइस (कारण) उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। मगर आदमी बेजरर (अहानिकारक) था। पन्द्रह बरसों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने मुलाजिम थे वो उसके मुतअलिक इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।
महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी खैर-खैरियत दरयाफ्त करके चले जाते थे। एक मुप्त तक ये सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।
उसका नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने दिन बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके अजीज व अकारिब (सम्बन्धी) उससे मिलने के लिए आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वो दफादार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवा के पहनता और यूं सज-बन कर मिलने वालों के पास आता। वो उससे कुछ पूछते तो वह खामोश रहता या कभी-कभार 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी वेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी लालटेन ' कह देता। उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी आपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे।पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब इत्मीनान बख्श (सन्तोषजनक) जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब- दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनकी आमद की खबर दे दिया करती थी।
उसकी बड़ी ख्वाहिश थी कि वो लोग आयें जो उससे हमदर्दी का इजहार करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वो उनसे अगर पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो यकीनन वो उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका ख्याल था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं जहां उसकी जमीनें हैं।
पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में तो उसने हस्बेआदत (आदत के अनुसार) कहकहा लगाया और कहा--
-- वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं लगाया।
बिशन सिंह ने इस खुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत मसरूफ था, इसलिए कि उसे ओर बेशुमार हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ वाहे गुरूजी दा खलसा एन्ड वाहे गुरूजी की फतह। जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल।' उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमान के खुदा हो, सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते। तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान दोस्त मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हट गया और वापस आने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका-- -- ये तुमसे मिलने आया है - तुम्हारा दोस्त फजलदीन है।
बिशन सिंह ने फजलदीन को देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।
-- मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी खैरियत से चले गये थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर...। वह कुछ कहते कहते रूक गया । बिशन सिंह कुछ याद करने लगा --
-- बेटी रूप कौर ।
फजलदीन ने रूक कर कहा-
-- हां वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।
बिशन सिंह खामोश रहा। फजलदीन ने कहना शुरू किया-
-- उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी खैर-खैरियत पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से सलाम कहना-- और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना फजलदीन राजी-खुशी है। वो भूरी भैंसे जो वो छोड़ गये थे उनमें से एक ने कट्टा दिया है दूसरी के कट्टी हुई थी पर वो छ: दिन की हो के मर गयी और और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना, मै। हर वक्त तैयार हूं और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरून्डे लाया हूं।
बिशन सिंह ने मरून्डे की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलदीन से पूछा- -- टोबा टेकसिंह कहां है?
--टोबा टेकसिंह... उसने कद्रे हैरत से कहा-- कहां है! वहीं है, जहां था।
बिशन सिंह ने पूछा-- पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में?
--हिन्दुस्तान में...। नहीं-नहीं पाकिस्तान में...।
फजलदीन बौखला-सा गया। बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया-- ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हए फिटे मुंह।
तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फेहरिस्तें (सूचियां) पहुंच गयी थीं, तबादले का दिन भी मुकरर्र हो गया था। सख्त सर्दियां थीं। जब लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफिज दस्ते के साथ् रवाना हुई तो मुतअल्लिका (संबंधित ) अफसर भी हमराह थे। वाहगा के बार्डर पर तरफैन के (दोनों तरफ से) सुपरिटेंडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तेदाई कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रजामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते क़ोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी-- पागल औरतों का शेरोगोगा अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत बज रहे थे।
पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। चन्द जो कुछ सोच रहे थे-- 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन मरतबा फसाद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमान और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया।
जब बिशन सिंह की बारी आयी ओर वाहगा के उस पार मुतअल्लका अफसर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा-- टोबा टेकसिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में? -मुतअल्लका अफसर हंसा--पाकिस्तान में।
यह सुनकर विशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी मांदा साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा--टोबा टेकसिंह कहां है ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एन्ड पाकिस्तान।
उसे बहुत समझाया गया कि देखों अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जायगा। मगर वो न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गयी तो वह दरम्यान में एक जगह इस अन्दाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी।
आदमी चूंकि बेजरर था इसलिए उससे मजीद जबरदस्ती न की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले साकित व साकिन (शान्त) बिशनसिंह हलक से एक फलक शगाफ (आसमान को फाड़ देने वाली ) चीख निकली -- इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये और देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर खारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था-- इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरमियान में जमीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।

Sunday, 2 October 2016

एक कविता ..... हम खयाली / विजय शंकर सिंह

हम भी चुरा लेते हैं
तेरी ग़ज़लों से कुछ शोखियाँ
कुछ नर्म एहसास
कुछ नमी भरे अब्र
कुछ नसीम ए सुबह
कुछ शाम के धुंधलके का इश्क़
कुछ रात की बेचैनियां और
कुछ भोर के इश्क़ ए हक़ीक़ी के रेशे ।

चुरा लेता हूँ,
कुछ अलफ़ाज़  
कुछ ख़यालात
और
गढ़ने लगता हूँ
शब्दों का एक संसार ।

भरता हूँ रंग उनमे,
सजाता हूँ, ख्वाब की तरह ,
लिखता हूँ , मिटाता हूँ,
कभी निरखता हूँ दूर से उसे,
तो कभी, आत्म मुग्ध हो,
रू ब रू हो जाता हूँ आईने से ।

मिला कर कुछ अपनी , और
जगबीती कहानियां कहानियां कुछ,
कुछ मुस्कान,
तो कुछ अश्क़ों के रेखाचित्र ,
कुछ संजादगी तो , थोड़ी  शरारतें भी
इस तरह बनाता हूँ,
ज़िंदगी का कॉकटेल मैं !

लफ़्ज़ों और ख्यालों की चोरी भी
कोई चोरी है भला !
यह तो हमजुबानी हुयी
हम खयाली है यह  !!

© विजय शंकर सिंह.

महात्मा गांधी और शास्त्री जी - महानता के दो आयाम / विजय शंकर सिंह


आज 2 अक्टूबर है और आज ही देश के दो महान सपूतों की जयन्ती भी है । गांधी जी के बारे में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा गया है , आगे भी लिखा और पढ़ा जाता रहेगा । गांधी से जो सहमत हैं वह तो उन्हें याद करेंगे ही और जो असहमत हैं वह भी उन्हें भुला नहीं पाएंगे । भारत सरकार ने गांधी जयन्ती को स्वच्छता के संकल्प के रूप में मनाने का निर्णय किया है पर स्वच्छ रहना या सफाई रखना गांधी दर्शन का एक वाह्य भाग है । यह खोल का ऊपरी ढक्कन है । असल चीज़ जो अंदर है उसकी तरफ जाने और उसकी चर्चा करने से कुछ लोग कतराते हैं । कुछ को वह असहज लगती है । कुछ इसे इस लिये ढंके रहने देना चाहते है , कही न कहीं उनके दर्शन और सोच से गांधी के वे विचार मेल नहीं खाते हैं । पर सब के सब से विचार मिलें यह न तो संभव है और न ही उचित । एक वाक्य में अगर कहा जाय कि गांधी का मूल मन्त्र क्या था तो उसका उत्तर मैं यह दूंगा कि, अन्याय का सतत विरोध । अन्याय का सतत विरोध ही उद्देश्य है । अहिंसा और सत्याग्रह आदि तो उसके साधन है ।

गांधी जी का कोई भी आंदोलन उनके सिद्धांतों के आधार पर नहीं चल सका । पहला असहयोग आंदोलन उन्होंने अहिंसा के आधार पर चलाने का आह्वान किया था जिसे चौरीचौरा में भयानक हिंसा के कारण उन्होंने वापस ले लिया । 1942 का भारत छोडो आंदोलन तो आक्रोश की अराजक और हिंसक अभिव्यक्ति ही थी । भारत के बंटवारे के थोड़ा पहले और बाद जो व्यापक हिंसा हुयी उस से इनके सिद्धांत केवल सुभाषित बन कर रह गए । फिर भी 1914 से 1948 तक गांधी की ही चली । वह देश के सभी नेताओं में सबसे ऊंचे थे । जो उनके विरोधी थे वे भी उन्हें नकार नहीं पाये । सुभाष बाबू गांधी के ही कारण कांग्रेस छोड़ कर अलग हुए और उन्होंने फॉरवर्ड ब्लाक की स्थापना की, फिर वे विदेश निकल गए, आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का गठन किया और जो पहली सैनिक ब्रिगेड उन्होंने बनायी उसका नाम भी उन्होंने गांधी ब्रिगेड रखा । आज़ाद हिन्द रेडियो ने भी गांधी को ही देश की आज़ादी का अग्रणी नेता माना । पर अपने समय के इस महानतम शख्सियत की हत्या भी हुयी । हत्या का मोटिफ भी इनकी लोकप्रियता, जादुई व्यक्तित्व और जनता की नब्ज़ पर ज़बरदस्त पकड़ बना । महानता , लोकप्रियता और हत्या क्या विडम्बना पूर्ण समीकरण है ।

शास्त्री जी के लिए केवल एक ही वाक्य कहना हो तो वह यह होगा कि, नेतृत्व की पहचान संकट काल में होती है, इसके वे स्पष्ट उदाहरण हैं । बनारस के उस पार राम नगर एक छोटा सा क़स्बा है । वही जब आप नगवा के सामने घाट से रामनगर के किले के उत्तर की और रेतीले तट पर कदम रखियेगा तो थोडा करार पर चढ़ने पर कुछ लोग बताएँगे कि, बायीं तरफ की गली में शास्त्री जी का पुश्तैनी घर है । वही से वे गंगा पार कर के बनारस पढ़ने आते थे । 1929 में वे इलाहाबाद आ गए और भारत सेवक संघ से जुड़ गए । वही उनकी निकटता जवाहरलाल नेहरू से हुयी । वह निकटता जीवन भर बनी रही । आज़ादी के बाद में नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल हुए । रेल मंत्री रहते हुए एक रेल दुर्घटना होने पर उन्होंने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था । फिर भी नेहरू ने उन्हें निर्विभागीय मंत्री बना कर अपने साथ ही रखा । वह नेहरू के स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन कर उभर चुके थे । 27 मई 1964 को नेहरू के निधन पर वह वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे।

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया। पुलिस मन्त्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया। 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उनके कार्यकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में उन्होंने उस संकट काल मैं देश को सक्षम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 
कद में छोटे पर विराट व्यक्तित्व वाले इस महापुरुष को उनकी जन्म तिथि पर सादर और विनम्र स्मरण ।

( विजय शंकर सिंह )

कभी हम भी तुम भी थें आशना ! / विजय शंकर सिंह

जब इन चित्रों पर निगाह गयी तो मोमिन की यह पंक्ति याद आ गयी । राज ठाकरे का फतवा आया और सारे पाकिस्तानी कलाकार देश छोड़ कर चल दिये । गाँव गिराँव में भी जब पट्टीदारी या पड़ोसी में झगड़ा गहरा जाता है तो दोनों घरों के लोग अपने अपने बच्चों के आपस में मिलने और खेलने पर रोक लगा देते हैं । अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की व्यथा कथा भी ऐसी ही है । अच्छा ही है न कोई सम्बन्ध बढ़ेगा और न ही कोई बात होगी । डंडवारी ऊंची कर दी जायेगी और रात विरात लोग सजग रह कर पहरा देंगे । कुछ लठैत पाल लिये जाएंगे । बंदूकें साफ़ करा ली जाएंगी। कारतूस आदि खरीद लिए जाएंगे । मतलब साफ़ है कि अब कोई बात नहीं । तुम गुंडई और मार पीट से बाज़ नहीं आओगे और हम कब तक इसे सहन करें । आखिर सहने की भी हद होती है । आखिर सब्र टूटा और जो कुछ हुआ पूरे गांव घर को मालुम है । कुछ लोग जो मज़ा लेने वाले हैं वे तो मज़ा ही लेंगे । दरोगा जी से रब्त ज़ब्त भी ठीक है । और फिर हम तो ऊबे थे । पूरा गांव इसे जानता है । अब सब अपना अपना देखो । हमारे पास और भी काम है । यही नहीं कि बस तुम्हे ही अगोरते रहें । भारत पाक रिश्तों का एक यह एक नैनो रूप है ।

अब आइये इन चित्रों पर । 



1. पहला चित्र है जिसमे भारतीय पत्रकार वेद प्रताप वैदिक , जमात उद  दावा के सदर और कुख्यात आतंकी सरगना हाफिज सईद से मिलते हुए । 

वैदिक जी देश के हिंदी पत्रकारिता जगत में अत्यंत जाना पहचाना नाम है । वह विदेश मामलों के विशेषज्ञ और हिंदी में पीएचडी की थीसिस लिखने और डॉक्टरेट लेने वाले यह पहले व्यक्ति हैं । इंदिरा गांधी से ले कर नरेंद्र मोदी तक सभी प्रधानमंत्रियों से इनके निजी और आत्मीय सम्बन्ध रहे हैं । यह जब हाफ़िज़ सईद से मिले और यह खबर और चित्र जब बहुप्रचारित हुआ तो किसी ने भी इनकी देश भक्ति पर सवाल नहीं उठाया । किसी ने भी पाकिस्तान का टिकट नहीं भेजा । निंदा ज़रूर हुयी । कैफियत भी पूछी गयी । इन्होंने कहा भी कि एक पत्रकार होने के नाते वह हाफ़िज़ सईद से मिले थे । यह पत्रकारिता के प्रोफेशन का अंग है । चम्बल के बड़े बड़े डकैतों , जिनको पुलिस ढूंढ नहीं पाती थी, से भी पत्रकार मिलते रहे हैं और इन पर स्टोरी भी करते रहे  है । पर कभी उनको यह नहीं कहा गया कि वे दस्युओं से मिले हुए हैं । यह उनकी व्यावप्रतिबद्धता है। 


2. दूसरा चित्र है, जावेद मियांदाद का बाल ठाकरे से मिलते हुए । 

प्रथम दृष्टया यह आग और पेट्रोल को अगल बगल रखने जैसा दिखेगा । शिव सेना पाक क्रिकेट खिलाड़ियों का पहले भी विरोध करती रही है । मुम्बई में इन्होंने एक बार मैच के एक दिन पहले पिच ही खोद दी थी । मैच टल गया था । विरोध इनका स्थायी भाव हैं। कभी ठाकरे मद्रासियों का विरोध करते थे, कभी गुजरातियों का, कभी उत्तर भारतीयों का और मुसलमानों का तो करते ही रहते  हैं।  यहाँ तक कि हिन्दू पद पादशाही की ज्वाल ध्वजा फहराने वाले शिव सैनिक सूर्योपासना के महान पर्व छठ का भी विरोध करते रहते हैं । और जब कोई विरोध का मुद्दा नहीं मिलता है तो, आपस में पटका पटकी करने लगते हैं । तो यह जनाब मियांदाद, जिनकी क्रिकेट टीम शिवसेना के संविधान के अनुसार अवांछित घोषित है, वह क्यों बाला साहब के साथ मुस्कुरा के मिल रहे हैं । वह कौन सा ग़म छुपा रहे हैं। मियांदाद , जो दाऊद इब्राहिम के समधी भी बाद में बने । वह एक क्रिकेटर थे और इसी हैसियत से वह यहां दिख भी रहे हैं। जिनकी टीम को भारत में खेलने पर शिव सेना को बराबर आपत्ति रही हैं । वही दाऊद इब्राहिम जो मोस्ट वांटेड अपराधी है । डॉन है । और जिसे पकड़ना अभी तो फिलहाल नामुमकिन ही है । बाला साहब तो देश द्रोही नहीं हुए । वह देशद्रोही हैं भी नहीं।  उन्हें देश द्रोही कहेगा कौन । देशभक्त होने का प्रमाण पत्र जारी करने की फ्रेंचाइजी तो उनके भी पास है । यही बाला साहब हैं जिन्होंने देश की किसी अदालत का सम्मान तक नहीं किया, कानून तक नहीं माना, पर वे परम देश भक्त ही कहे जाएंगे ।


3. तीसरा चित्र है नवाज़ साहब और zee ज़ी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा और सुधीर चौधरी का । 

सुभाष चोपड़ा व्यवसायी हैं । zee उनकी कंपनी है । सुधीर चौधरी ज़रूर एक पत्रकार हैं । राष्ट्र के प्रति समर्पित व्यक्तित्व है इनका । यह और बात है कि सुप्रीम कोर्ट इनकी आवाज़ सुनने के लिए कभी इतना बेताब था कि उसने आवाज़ न सुनाने पर इन्हें  जेल भेजने का फरमान जारी करने की धमकी दे दी । एक 100 करोड़ की उगाही की धमकी का मामला था । कोई ख़ास बात नहीं थी। उस मामले में कोई उल्लेखनीय प्रगति अभी नहीं हुयी है, पर उस मामले की विवेचना जारी है । बाद समाप्त तफ्तीश , तो सामने आएगा उस से अवगत कराया जाएगा । फिलहाल तो इनको सुनते रहिये और कदम कदम बढ़ाते रहिये । ना जाने किस मोड़ पर देशभक्त मिल जाए !

यह तीनों चित्र में तीन विधा के लोग हैं । एक में एक आतंकी सरगना , देश के प्रसिद्ध पत्रकार से गुफ्तगू कर रहा है , दूसरे में एक हिंदुत्व का पुरोधा, और शिवसेना प्रमुख एक क्रिकेटर से मिल रहा है । तीसरे में एक प्रधानमंत्री , एक न्यूज़ चैनेल के मालिक और टीवी एंकर के साथ फ़ोटो सेशन में है । इनमे जो भारतीय सज्जन हैं वे सभी भाजपा के समर्थक या सहयोगी है । पर किसी ने भी इन्हें देश द्रोही नहीं कहा और न ही कहने का साहस किया । ये देशद्रोह कर भी नहीं रहे हैं । तब वह मानसिकता भी संभवतः नहीं जनमी थी कि लोग बात बात पर किसी न किसी को देशद्रोही कहने लगें । कल्पना कीजिए अगर इन सज्जनों के स्थान पर कोई ऐसा व्यक्ति होता जो भाजपा या आरएसएस की विचारधारा के विपरीत सोच वाला होता तो, उसे किन किन विशेषणों और अपशब्दों से नवाज़ा जाता , यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है । आप आसानी से अनुमान लगा सकते हैं ।

यह फ़ोटो इस लिए है कि टेररारिस्ट और अन्य में फ़र्क़ है । वैदिक जी एक आतंकी से मिल कर , ठाकरे एक पाकिस्तानी क्रिकेटर से मिल कर, और सुभाष चंद्रा और सुधीर चौधरी एक दुश्मन देश के प्रधानमंत्री के साथ फ़ोटो खिंचा कर देशद्रोही नहीं कहलाये और सलमान खान सिर्फ यह कहने पर कि फवाद खान एक आर्टिस्ट है टेररिस्ट नहीं , उन्हें कुछ लोग देशद्रोही कहने लगे ? इस पोस्ट का उद्देश्य केवल यह है कि देशभक्ति केवल एक व्यक्ति, दल, और विचारधारा के प्रति समर्पण ही नहीं है । देशभक्ति सरकार की दासता भी नही है । देशभक्ति फ़र्ज़ी फोटोशॉप कर के अफवाह फैलाना भी नहीं है । देश भक्ति देश के नागरिक के जो कर्तव्य और दायित्व हैं उसका पालन करना है । संविधान ने जो अधिकार हमे दिए हैं उनके लिए सजग रहना है । देश को जोड़े रखना देश भक्ति है, उसे तोड़ने का उपक्रम करना देशभक्ति नहीं है ।

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 1 October 2016

झूठ और फरेब से भरा हुआ पाकिस्तान के इतिहास का पाठ्यक्रम - एक दृष्टि / विजय शंकर सिंह

अभी जो सर्जिकल स्ट्राइक हुयी है ,उस से पाकिस्तान ने नकार दिया है । पर अब जब सैटेलाइट फ़ोटो आ गयी है तो, पूरी दुनिया को सच पता चल गया है । पठानकोट और उरी की घटना के बाद यह कार्यवाही आवश्यक थी । जहां तक वार्ता का प्रश्न है, पाक में सरकार किसकी है और चलती किसकी है यह ही तय नहीं है । शरीफ नवाज़ वहाँ के असल सदर हैं या शरीफ राहील या वहाँ के आतंकी समूहों के प्रमुख , जिन्हें नॉन स्टेट एक्टर्स कूटनीतिक भाषा में कहा जाता है, मसलन हाफ़िज़ सईद और मौलाना मसूद अज़हर, या ये तीनों ही  आपस में मिल जुल कर सरकार चला रहे है, जब तक यह आधिकारिक रूप से तय न हो जाय तब तक किसी भी वार्ता का कोई  मतलब नहीं हैं। यह एक बँटा हुआ निज़ाम है । पाकिस्तान ने जब कारगिल युद्ध में शहीद हुये अपने जवानों को ही अपना मानने से इनकार कर दिया तो वह कभी भी किसी प्रकार के सर्जिकल स्ट्राइक को कैसे मान लेगा । उसने इस बार भी इस घटना से ही इंकार कर दिया और माना भी है तो बहुत ही दुष्प्रचार करते हुए । युद्ध में या युद्ध के माहौल में सच ढूंढना बहुत मुश्किल होता है और उन्माद के शोर में तो सच कहना भी किसी जोखिम से कम नहीं होता है । पाक के आधिकारिक बयान की जांच पड़ताल ज़रूर की जाय पर उसे प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाय यह भी उचित नहीं है ।

पाकिस्तान के एक लेखक हैं एएच नैय्यर । उन्होंने पाकिस्तान में जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसमे कई भयंकर भूलों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है । ये भूलें , जान बूझ कर की गयीं है । जान बूझ कर पाकिस्तान के बच्चों के दिमाग में भरी जा रही है । इतिहास के दो अंग प्रत्यक्षतः होते हैं । एक तो तथ्य और दूसरे उन तथ्यों की समीक्षा । तथ्य अगर कई ऐतिहासिक अभिलेखों में एक समान होते हैं तो, उस से घटना का स्वरूप बनता है । घटना क्रम बनता है । घटनाएं नहीं बदलती है । जो घट चुका है, घट चुका है । अतीत के अभिलेखों में सम्पादन और कट पेस्ट सम्भव नहीं है । पर उन घटनाओं की व्याख्या सदैव अलग अलग तरह से हो सकती है । सबका दृष्टिकोण अलग अलग हो सकता है । पर पाक में जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है , वह तथ्यात्मक रूप से ही गलत और भ्रामक है । नैय्यर साहब ने ऐसे ही कुछ विन्दुओं को अपने लेख का विषय बनाया है । इसे देखें और पढ़ें । यह रोचक भी है और इस से यह पता चलता है कि, घृणा की शुरुआत वहाँ अनायास ही नहीं बल्कि सायास और सोच समझ कर की जा रही हैं।

1965 का भारत पाक युद्ध, भारत ने जीता था । इसी युद्ध में जनरल अयूब खान ने डींग हाँकी थी कि,
' वह लाहोर से सुबह चल कर अमृतसर में नाश्ता करेंगे और शाम तक दिल्ली पहुँच कर लाल किले में भोजन करेंगे । '
युद्ध के बाद भारत के प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी वाक्य पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि,
' जनरल अयूब साहब के अमृतसर में नाश्ते और दिल्ली में भोजन के इरादे को देखते हुए हमने सोचा कि क्यों न उन्हें लाहौर में ही पहुँच कर जगा दिया जाय । '
हुआ भी ऐसा ही । यह अलग बात है कि अंतराष्ट्रीय दबावों के चलते भारत को जीता हुआ इलाक़ा छोड़ना पड़ा और इसी के बाद 1966 में शास्त्री जी का दुःखद निधन ताशकंद में हो गया ।

पर इस घटना को पाकिस्तान में कैसे पढ़ाते हैं, यह एएच नैय्यर के ही शब्दों में पढ़ लें ।

“ The Pakistan Army conquered several areas of India, and when India was at the verge of being defeated she ran to the United Nations to beg for a cease-fire. Magnanimously, thereafter, Pakistan returned all the conquered territories to India.”

( पाकिस्तान की सेना ने भारत के कई इलाके जीत लिए और जब भारत हारने के कगार पर पहुँच गया तो , वह संयुक्त राष्ट्र संघ चला गया जहां उसने युद्ध विराम की याचना की तब जा कर पाकिस्तान ने सारे जीते हुए इलाके वापस कर दिए । )
यह वह इतिहास है जो अभी बहुत पुराना नहीं है । यह इतिहास नार्थ वेस्ट प्राविंसियल प्रॉविंस के दर्ज़ा 6 के बच्चों के लिए पढ़ाया जाता है ।

1993 में पाकिस्तान ने इतिहास की एक टेक्स्ट बुक प्रकाशित की । इस पुस्तक में पूर्व पाकिस्तान यानी बांग्लादेश के अलग होने की यह कथा प्रस्तुत की हैं।

“There were a large number of Hindus in East Pakistan. They had never truly accepted Pakistan. A large number of them were teachers in schools and colleges. They continued creating a negative impression among students. No importance was attached to explaining the ideology of Pakistan to the younger generation.The Hindus sent a substantial part of their earnings to Bharat, thus adversely affecting the economy of the province. Some political leaders encouraged provincialism for selfish gains. They went around depicting the central Government and (the then) West Pakistan as enemy and exploiter. Political aims were thus achieved at the cost of national unity.”
( पूर्व पाकिस्तान में हिन्दू जन संख्या बहुलता से थी । उन्होंने कभी भी मन से पाकिस्तान को स्वीकार नहीं किया । उनमे से अधिकतर संख्या शिक्षकों की थी जो वहाँ स्कूलो में पढ़ाते थे । उन्होंने छात्रों के मस्तिष्क में पाकिस्तान के विरुद्ध विपरीत बातें फैलानी शुरू कर दीं । उन्होंने छात्रों को पाकिस्तान की अवधारणा के बारे में कुछ भी नहीं बताया । वहाँ के हिन्दू , अपनी आय का एक भाग भारत में भेजते थे । जिस से पाकिस्तान की आय पर प्रतिकूल असर पड़ा । कुछ राजनीतिक नेताओं ने प्रांतवाद से प्रभावित और स्वार्थ से वशीभूत हो , राष्ट्रीय एकता को दरकिनार कर के केंद्रीय सरकार और उस समय के पश्चिमी पाकिस्तान को दुश्मन और ज़ालिम करार दिया । )

इसमें बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी, बंग भाषा आंदोलन, शेख मुजीबुर्रहमान का ज़िक्र, भारत पाक युद्ध, पाक की शर्मनाक पराजय, एक लाख सैनिकों का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का निर्माण आदि आदि घटनाओं को जान बूझ कर छुपा दिया गया ।

" हिन्दू और मुस्लिम दो क़ौमे हैं। ये दो अलग अलग राष्ट्र हैं । ये एक देश में नहीं रह सकते । मुस्लिमों को एक अलग और नया देश चाहिए, । "
यह महान वाक्य जिन्ना साहब का है । अलग देश भी बना । फिर हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही आबादी का हस्तांतरण शुरू हुआ । यह विश्व इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन था । बीस लाख लोग विस्थापित हुए और इस धार्मिक उन्माद में दस लाख लोग मारे गए । हिन्दू और मुसलमानों ने दोनों ने दोनों तरफ खुल कर हिंसा की । वह दौर ही कुछ अलग लगता है । अज़ीब पागलपन और वहशत भरा समय था वह । पर इस घटना को पाकिस्तान में कुछ इस तरह पढ़ाया जाता है ,

“While the Muslims provided all sorts of help to those non-Muslims desiring to leave Pakistan [during partition], people of India committed atrocities against Muslims trying to migrate to Pakistan. They would attack the buses, trucks and trains carrying the Muslim refugees and murder and loot them.”
( विभाजन के समय जितने भी गैर मुस्लिम थे और जो पाकिस्तान छोड़ कर जाना चाहते थे , उनको पाकिस्तान के मुसलमानों ने हर प्रकार की सहायता दी । जब कि भारत के लोगों ने वहाँ से पाकिस्तान आने वाले मुसलमानों पर हर तरह का ज़ुल्म किया। उन्होंने उनकी बसों, ट्रक , और उन्हें ले जा रही ट्रेनों पर हमले किये, तथा उनको लूटा और उनकी हत्याएं की । )
यह उद्धरण पाकिस्तान के इंटरमीडिएट बोर्ड के पाठ्यक्रम की नागरिक शास्त्र की पुस्तक से लिया गया है ।

पाकिस्तान में इतिहास की एक पुस्तक पढ़ाई जाती है ' A Textbook of Pakistan Studies ' जिसके लेखक हैं एमडी ज़फर । यह पुस्तक अत्यंत हास्यास्पद और बेवकूफी भरे झूठों से भरी पडी है । उसके कुछ उद्धरण पढ़ें ,

“Pakistan came to be established for the first time when the Arabs led by Muhammad bin Qasim occupied Sindh and Multan. Pakistan under the Arabs comprised the Lower Indus Valley.”
( पाकिस्तान पहली बार तब अस्तित्व में आया, जब मुहम्मद बिन क़ासिम ने अरब की सेना ले कर, सिंध और मुल्तान पर अपना अधिकार जमाया । )

“During the 11th century the Ghaznavid Empire comprised what is now Pakistan and Afghanistan. During the 12th century the Ghaznavids lost Afghanistan and their rule came to be confined to Pakistan”.
( 11 वीं सदी के ग़ज़नवी साम्राज्य के क्षेत्र में आज का अफगानिस्तान और पाकिस्तान था । 12 वीं सदी में ग़ज़नवी ने अफगानिस्तान गँवा दिया, और उनका राज्य पाकिस्तान तक सिमटा रहा । )

“By the 13th century Pakistan had spread to include the whole of Northern India and Bengal. Under the Khiljis Pakistan moved further South to include a greater part of Central India and the Deccan”.
( 13 वीं सदी आते आते पाकिस्तान का राज्य सम्पूर्ण उत्तर भारत में फैलते हुए बंगाल तक फ़ैल गया । इसके बाद राज्य का विस्तार दक्षिण की तरफ हुआ । मध्य भारत और दक्षिण तक पाकिस्तान का प्रसार हुआ । )

" During the 16th century, ‘Hindustan’ disappeared and was completely absorbed in ‘Pakistan”.
( 15 वीं सदी आते आते हिंदुस्तान पूरी तरह समाप्त हो गया और पाकिस्तान का राज्य फ़ैल गया । )

“ Shah Waliullah appealed to Ahmad Shah Durrani of Afghanistan and ‘Pakistan’ to come to the rescue of the Muslims of Mughal India, and save them from the tyrannies of the Marhattas…”
( शाह वालीलुल्लाह अफगानिस्तान और पाकिस्तान के अहमदशाह दुर्रानी के सामने उपस्थित हो कर , मुगलों को मराठों के आतंक से बचाने का गुहार लगाता है । )

“In the Pakistan territories where a Sikh state had come to be established, the Muslims were denied freedom of religion.”
( पाकिस्तान के ही इलाके में ही सिखों का एक राज्य स्थापित हुआ जिसने मुसलमानों को उनके धर्म के पालन पर रोक लगा दिया । )

“Thus by the middle of the 19th century both Pakistan and Hindustan ceased to exist; instead British India came into being. Although Pakistan was created in August 1947, yet except for its name, the present-day Pakistan has existed, as a more or less single entity for centuries.”

(  इस प्रकार 19 वीं सदी के मध्य तक , पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों ही ब्रिटेन के आने तक अस्तित्व में थे । हालांकि पाकिस्तान अगस्त 1947 में बना है पर यह पाकिस्तान कई सदियों से ही ऐसे है । )

पाकिस्तान घृणा, विद्वेष और उन्माद के मंथन से निकला हुआ देश है । सप्त सैंधव और पंचनद की महान ऐतिहासिक विरासत जो भारतीय महाद्वीप की साझी विरासत रही है, वह भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश , तीनों की साझी है । पाकिस्तान के ही क्षेत्र में सैन्धव सभ्यता कभी समृद्धि के शिखर पर थी । यहीं संस्कृत को संस्कृत पाणिनि ने  बनाया । यही दुनिया का सबसे पहला विश्वविद्यालय तक्षशिला बना । यही कभी वेदों की ऋचाएं उच्चारित हुयी होंगी । और पाकिस्तान का निज़ाम अपने इतिहास का प्रारम्भ 712 ईस्वी के अरब लुटेरे मुहम्मद बिन कासिम के हमले से मानता है और यही पढ़ाता हैं। इसके पहले जो था वह था ही नहीं । दर असल यह एक प्रकार की हीन ग्रंथि है । जिस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर पाकिस्तान अस्तित्व में आया है वह झूठ और ऐतिहासिक फरेब था । अगर पाकिस्तान, भारत के अंग के रूप में अपना सत्य इतिहास पढ़ायेगा तो, उसे भारतीय दर्शन , परम्पराएँ, समाज और संस्कृति की बहुलतावादी धाराएं भी पढ़ानी पड़ेंगी । अगर यह सब उसने पढ़ाना शुरू कर दिया तो जिस मिथ्या सिद्धांत पर इसने जन्म लिया है उसी का आधार बिखर जाएगा । पाकिस्तान के सामने यही सबसे बड़ी दुविधा है । वह इस्लाम के सूफी मत या वहैत उल वज़ूद के दर्शन पर नहीं चल सकता है । उसके अंदर जो पृथकतावादी आंदोलन चल रहे हैं , उस सब को बाँध कर रखने का एक ही इलाज़ उसके पास है कि इस्लाम के कट्टरवादी स्वरूप को ही वह बनाये रखे । अगर यह कहा जाय कि धार्मिक कट्टरवाद पाकिस्तान की घुट्टी में है तो गलत नहीं होगा ।

( विजय शंकर सिंह )