Wednesday, 30 November 2022

किशन पटनायक / प्रोफेसर से तमाशगीर

प्रणय रॉय पर किशन पटनायक ने यह लेख 1994 में लिखा था। प्रणय रॉय के नियंत्रण से एनडीटीवी के बाहर होने के बाद, किशन जी के इस लेख को पढ़ना रोचक होगा। इस लेख की पृष्ठभूमि उस दौर की है, जब प्रणय रॉय देश के नए मीडिया के प्रारंभिक सूत्रधार के रूप में उभर रहे थे।
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प्रोफेसर से तमाशगीर
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काश के अंग्रेजी न जानने वाले लोग प्रणय राय को नहीं जानते होंगे। लेकिन प्रणय राय को जानना जरूरी है क्योंकि वह एक नयी सामाजिक घटना का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रणय राय की प्रसिद्धि शुक्रवार को दूरदर्शन पर चलने वाले साप्ताहिक विश्वदर्शन कार्यक्रम से बनी है। जिस अंदाज से कोई जादूगर तमाशा (शो) दिखाता है, उसी अंदाज से टीवी दर्शकों का ध्यान केंद्रित करके दूरदर्शन द्वारा चुने हुए समाचारों या वक्तव्यों के प्रति श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करके रखना दूरदर्शन की एक खास विधा बन गयी है। प्रीतीश नंदी का शो, प्रणय राय का साप्ताहिक विश्वदर्शन (द वर्ल्ड दिस वीक) आदि इस विधा के श्रेष्ठ प्रदर्शन हैं।

देश के बुद्धिजीवियों में ऐसे लोग शायद बिरले ही होंगे, जो अत्यंत बुद्धिशाली होने के साथ-साथ बीच बाजार में तमाशा भी कर सकें। ऐसे बिरले प्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों की तलाश टेलीविजन व्यवसायियों को रहती है। उनके माध्यम से टेलीविजन के प्रदर्शन-व्यवसाय को कुछ बौद्धिक प्रतिष्ठा मिल जाती है, जिससे बहुत-से भद्दे और अश्लील कार्यक्रमों को चलाना सम्मानजनक भी हो जाता है।

जब शुक्रवार के विश्वदर्शन कार्यक्रम के चलते प्रणय राय टीवी के दर्शकों के प्रिय हो गये, तब उनको सरकार की आर्थिक नीतियों के बारे में सूचना देने का कार्यक्रम दिया गया। पिछले साल के बजट से नयी अर्थनीति का यह दूरदर्शन-प्रयोग शुरू हुआ, और इस साल उसकी अवधि और उस पर पैसा काफी बढ़ा दिया गया है (संभवतः एक विदेशी कंपनी इसके लिए पैसा दे रही है)। फरवरी, 1994 की 28 तारीख की शाम को वित्तमंत्री ने जो बजट भाषण संसद में दिया, उसका सीधा प्रसारण किया गया। भाषा की जटिलता के कारण बहुत कम लोग बजट की बातों को समझ पाते हैं, ज्यादातर लोग इंतजार करते हैं कि कोई उस बजट की व्याख्या करके उन्हें सुनाये। जो लोग अंग्रेजी जानते हैं और बजट को समझकर दूसरों को भी समझाना चाहते हैं, ऐसे मत-निर्माता समूह (ओपीनियन मेकर्स) – व्यापारी, प्राध्यापक, लेखक, पत्रकार, राजनैतिक नेता आदि बजट की व्याख्या तत्काल सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। ये लोग लगभग दो लाख होंगे जो करीब 50 लाख या शायद एक करोड़ पढ़े-लिखे लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं। ये सारे लोग 28 फरवरी की शाम सात बजे से रात दस बजे तक अपने-अपने घरों में टेलीविजन देख रहे थे। इस बार की बजट व्याख्या दो किस्तों में करीब डेढ़ घंटे चली और एक घंटा तो खुद वित्तमंत्री मनमोहन सिंह प्रणय राय के पास बैठे रहे और सवालों के जवाब देते रहे। सवाल सचित्र आ रहे थे – लंदन, हांगकांग और न्यूयॉर्क से; मुंबई, कलकत्ता और बेंगलूर से। अनुमान है कि प्रणय राय को इस ‘शो’ के लिए करीब दस लाख रुपये मिले होंगे।

प्रणय राय दूरदर्शन की सेवा शुरू करने से पहले दिल्ली में अर्थशास्त्र की एक प्रसिद्ध अध्ययन और अनुसंधानशाला में प्रोफेसर थे (दिल्ली में प्रोफेसरों को बहुत अच्छी तनख्वाह मिलती है)। वे न सिर्फ एक अच्छे विद्वान थे, बल्कि प्रगतिशील धारा से भी उनका घनिष्ठ संबंध था तथा उनके निबंधों में प्रगतिशीलता का रुझान स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता था। अध्ययन, अनुशीलन और अनुसंधान के कार्यक्षेत्र को छोड़कर प्रणय राय दूरदर्शन के कार्यक्रम के निर्माता बन गये। एक सामाजिक घटना के तौर पर इसका महत्व इस बात में है कि तीक्ष्ण बुद्धि के एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी को अपना मध्यवर्गीय जीवन-स्तर काफी ऊंचा होते हुए भी अध्ययन और अनुसंधान के कार्यकलाप को छोड़ देने में कोई झिझक नहीं हुई और काफी नाम तथा धन कमाने के लिए (यानी एक प्रचलित जायज उद्देश्य के लिए) वह खुशी-खुशी दूरदर्शन का एक तमाशगीर (यह एक मराठी शब्द है, जिसे ‘शो मैन’ के लिए हम व्यवहार कर रहे हैं) बन गया।

28 फरवरी को यह बजट-दर्शन बहुत ही कुशलतापूर्वक दिखाया गया। एक मशहूर व्यापार-पत्रिका के संपादक को पास बैठाकर उसे बजट पर बातचीत के द्वारा प्रणय राय ने बजट की मुख्य बातें बता दीं। जाहिर था कि इस शुरुआती बातचीत का उद्देश्य बजट संबंधी चर्चा के मुख्य बिंदुओं को तय करना था और ये बिंदु उदारीकरण के मानदंड से चिन्हित किये गये थे। जिन चार-पांच मुख्य बातों को प्रणय राय ने रेखांकित किया, बाद के पूरे बजट-कार्यक्रम में सिर्फ उनकी पुष्टि की जा रही थी। बजट में अत्यधिक घाटे, सीमा-शुल्क में भारी रियायत, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण की समय से पहले अदायगी आदि इसकी मुख्य बातें थीं। सारी बातचीत इन्हीं तीन-चार मुद्दों पर केंद्रित रही। जब देश के महानगरीय व्यवसायियों की बारी आयी तो उन्होंने भी इन्हीं बातों को कुछ नम्रता पूर्वक रखा। मुंबई के शेयर बाजार से खबर आयी कि भाव गिर रहा है। मगर क्यों? इसलिए कि व्यापारियों ने ‘इससे भी बढ़िया’ बजट की उम्मीद कर रखी थी। लेकिन कोई खास परेशानी की बात नहीं। कुल मिलाकर बजट ‘सही दिशा’ में चल रहा है। शेयर बाजार कुछ दिनों में फिर अपनी रफ्तार में आ जाएगा। वित्तमंत्री ने एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा भी कि ‘रातोंरात सब कुछ’ नहीं हो जाएगा।

जब बजट-कार्यक्रम का सारा समय अंतर्राष्ट्रीय और महानगरीय व्यापारियों से बातचीत में चला गया, तब प्रणय राय को (या दूरदर्शन को) याद आया कि कुछ साधारण आदमियों से यानी किसान, महिला, युवा और उपभोक्ता नागरिक से भी बजट संबंधी बातचीत दिखायी जाए, नहीं तो बजट-कार्यक्रम शायद अधूरा रह जाएगा।

शुरू में देश के महानगरों के व्यवसायी-संगठनों आदि की प्रतिक्रिया बतायी गयी। लेकिन बाद में जब वित्तमंत्री आ गये, तो उनसे बातचीत करने और सवाल पूछने के लिए हमारे दूरदर्शन का द्वार विश्व के लिए खुल गया और बजट का ग्लोबीकरण हो गया। लंदन, वाशिंगटन और हांगकांग में बैठे हुए विदेशी व्यापारियों ने सीमा-शुल्क घटाने के वायदे को पूरा करने के लिए धन्यवाद देते हुए मनमोहन सिंह के मुंह पर यह पूछा कि इतना घाटा क्यों रखा गया है? बरकरार राजकीय अनुदानों को खत्म क्यों नहीं किया गया? घाटे के परिणामस्वरूप मूल्य आदि की अस्थिरता के कारण क्या विदेशी व्यापारियों का उत्साह कम नहीं हो जाएगा? सारी दुनिया के सामने उन विदेशी व्यापारियों द्वारा भारत सरकार के बजट पर भारत सरकार के वित्तमंत्री से इस तरह के सवाल पूछने का इसके सिवा क्या अर्थ क्या है कि हमारे बजट को धनी देशों के व्यापारियों के प्रति पूर्ण रूप से जवाबदेह होना चाहिए। यह उदारीकरण के मानदंड से बजट की समीक्षा थी। एक किसान को दिखाया गया, जो बुजुर्ग था और विलायती ढंग से सूत पहने हुए था। उसके अंग्रेजी बोलने में व्याकरण की कोई गलती नहीं थी और उसका अंग्रेजी उच्चारण भी बढ़िया था। यह दूरदर्शन पर नयी आर्थिक नीति के किसान की छवि थी। उसने सिर्फ एक सवाल पूछा और मनमोहन सिंह के जवाब के बाद वह शांत हो गया।

जब कार्यक्रम समाप्त होने में बस एक-दो मिनट बाकी रह गया था, तब जल्दी में बेंगलूर महानगर के किसी दफ्तर में कुछ लोगों को दिखाया गया (कुछ साधारण आदमियों और उपभोक्ताओं को दिखाना था)। एक बेरोजगार युवक की हैसियत से जिससे बेरोजगारी के संबंध में सवाल पूछना था, उसने बेरोजगारी का नाम तो लिया मगर सवाल यह पूछा कि घाटे के बजट को देखकर पूंजी-निवेश करने वाले हतोत्साहित होंगे तो रोजगार कैसे बढ़ेगा। बिलकुल अंत में एक-दो सेकंडों में एक महिला ने उपभोक्ताओं से संबंधित एक सवाल रखा और वित्तमंत्री का जवाब पाकर संतुष्ट हो गयी। उसे महिला और उपभोक्ता दोनों की भूमिकाओं में दिखाकर प्रणय राय ने सोचा होगा कि पूरे समाज को उन्होंने बजट से जोड़ दिया और देश के सभी वर्गों की प्रतिक्रिया भी आ गयी।

जिस तरह इंडिया टुडे का संपादक कुछ महानगरों के विद्यार्थियों से बातचीत का हवाला देकर देश की युवा पीढ़ी के बारे में एक खास तरह का निष्कर्ष और एक खास तरह की छवि प्रचारित करने की कोशिश करता है, ठीक उसी तरह की कोशिश दूरदर्शन पर प्रणय राय कर रहे हैं। सर्वप्रथम हांगकांग और अमरीका के व्यापारी, दूसरे क्रम में मुंबई और कलकत्ता के व्यापारिक संघ और शेयर बाजार, तीसरे क्रम में सूट-बूट पहने हुए भूस्वामी और चौथे क्रम में कुछ हद तक महानगरीय खाते-पीते मध्यम वर्ग के लोग। बाकी सभी लोग और समूह बजट के लिए बिलकुल अप्रासंगिक क्यों हो गये हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें मिल सकता है, यदि हम प्रणय राय को एक नये किस्म के बुद्धिजीवी वर्ग के उभार के प्रतिनिधि के रूप में देखें, जिसका जनता से लगाव खत्म हो चुका है।

यहां हम प्रणय राय को एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक घटना के रूप में देखने की कोशिश करें, क्योंकि प्रणय राय की वर्तमान भूमिका कोई अकेली दुर्घटना नहीं है। इसकी व्याप्ति काफी बढ़ गयी है। एक मध्यवर्गीय प्रतिभा-संपन्न बुद्धिजीवी, जिसका अपनी युवावस्था में प्रगतिशीलता की तरफ झुकाव हो जाता है, दिल्ली के एक प्रतिष्ठित शिक्षा-केंद्र में प्राध्यापक था। उसे तनख्वाह के रूप में अच्छी रकम मिलती थी, जिससे वह आर्थिक रूप से सुरक्षित था। अपने प्रगतिशील रुझान के कारण वह जनसाधारण से जुड़ाव महसूस करता था। चार-पांच साल पहले टेलीविजन के माध्यम से एक नयी विज्ञापनी संस्कृति का अनुप्रवेश होता है। देश की अर्थनीति में ऐसे परिवर्तन तेजी से होने लगते हैं कि वह मध्यवर्गीय उच्च-शिक्षित, मेधावी, प्रगतिशील रुझान वाला युवा बुद्धिजीवी अब मध्यवर्गीय न रहकर साल में पच्चीस-तीस लाख की कमाई कर सकता है। टेलीविजन और नयी अर्थनीति का संयोग उसके लिए अपने को विज्ञापित करने और साथ ही प्रचुर धन हासिल करने का आकर्षण पैदा कर देता है। वह इसकी गिरफ्त में आ जाता है और उस पर धन की हविस तथा आधुनिक मीडिया की चकाचौंध हावी हो जाती है। उसका सामाजिक लगाव छूट जाता है। भारत के करोड़ों साधारण जन उसके लिए अप्रासंगिक हो जाते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां उसको काफी धन देकर उसकी मेधा का इस्तेमाल करने के लिए होड़ लगाती हैं। इस बात की होशियारी बरती जाती है कि उसे पता न चले कि वह एक बिकाऊ माल है। इसलिए उसे ऐसे ही काम में लगाया जाता है, जिसमें उसे यही आभास हो कि चमत्कारी ढंग से एक बौद्धिक कार्य में लगा हुआ है। वह स्वयं को खुशी-खुशी बेच सके, इसके लिए यह जरूरी है कि उसके काम की एक बौद्धिक छवि हो तथा वह स्वयं के बारे में यह धारणा बना सके कि देश आगे बढ़ रहा है। प्रणय राय के इस तरीके देश को आगे बढाने के लिए यह जरूरी है कि करोड़ों साधारण जनों को अप्रासंगिक मानकर देश के बारे में सोचा जाए।

नयी आर्थिक नीति तथा आधुनिक संचार माध्यमों के संयोग से एक नये बुद्धिजीवी वर्ग का उदय हो रहा है। इस वर्ग के पहले उभार में वे महानगरीय बुद्धिजीवी हैं, जो अपने को विज्ञापन का हिस्सा बनाने के लिए और करोड़ों साधारण जनों को अप्रासंगिक मानने के लिए तैयार हो गये हैं।

(किशन पटनायक)

किशन पटनायक, प्रखर समाजवादी चिन्तक, लेखक एवं राजनेता थे। उन्होंने समाजवादी जन-परिषद की नींव रखी और सामयिक वार्ता नाम की एक पत्रिका शुरू की। उनकी तीन किताबें छपी हैं : किसान आंदोलन–दशा और दिशा, भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि और विकल्पहीन नहीं है दुनिया। इन तीनों किताबों का कॉपीराइट फ्री है और गूगल लाइब्रेरी में ये उपलब्‍ध हैं।

(विजय शंकर सिंह) 

Monday, 28 November 2022

कश्मीर फाइल्स एक प्रोपेगेंडा और वल्गर (अश्लील) फिल्म है ~ ज्यूरी, IFFI / विजय शंकर सिंह

इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष, नादव लापिड ने सोमवार को पणजी, के समापन समारोह में कहा कि, विवेक अग्निहोत्री की फिल्म, "द कश्मीर फाइल्स" एक 'प्रोपेगेंडा और वल्गर फिल्म' है और IFFI में भारत के अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता खंड में, शामिल होने के योग्य नहीं है। दर्शकों को संबोधित करते हुए ज्यूरी प्रमुख ने यह बात कही। उस समय, केंद्रीय आईबी मंत्री अनुराग ठाकुर, गोवा के सीएम प्रमोद सावंत, बैठे थे। इजरायली निदेशक ने कहा कि अग्निहोत्री के बयान से "सभी ज्यूरी सदस्य" "परेशान और हैरान" थे।  फिल्म, 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के, घाटी से हुए दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद पलायन पर है। 

यह एक गंभीर टिप्पणी है और भारतीय फिल्म निर्माताओं को, आईएफएफआई में, की गई ज्यूरी की इस टिप्पणी को गंभीरता से लेना चाहिए। दुनिया में, हम सबसे अधिक फिल्में बनाने वाले देश के रूप में जाने जाते हैं। ज्यूरी प्रमुख, लैपिड ने कहा, "यह हमें पूरी तरह से एक प्रचार, अश्लील फिल्म की तरह लगी, जो इस तरह के एक प्रतिष्ठित फिल्म समारोह के कलात्मक प्रतिस्पर्धी खंड के लिए अनुपयुक्त है। मैं यहां मंच पर आपके साथ इन भावनाओं को खुले तौर पर साझा करने में पूरी तरह से सहज महसूस करता हूं।"

आगे वे कहते हैं, "क्योंकि उत्सव में हमने जो भावना महसूस की वह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण चर्चा को भी स्वीकार कर सकती है, जो कला और जीवन के लिए आवश्यक है।" इजरायली फिल्म निर्देशक, लापिड के अलावा, इस निर्णायक मंडल में, अमेरिकी निर्माता जिंको गोटोह, फ्रांसीसी फिल्म संपादक पास्कल चावांस, फ्रांसीसी वृत्तचित्र फिल्म निर्माता जेवियर अंगुलो बार्टुरेन और एक भारतीय निर्देशक, सुदीप्तो सेन  थे। लापिड इज़राइल के एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त निर्देशक हैं और उनकी फिल्में कई अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में पुरस्कृत और सराही जा चुकी हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में आईएफएफआई के ज्यूरी प्रमुख की यह टिप्पणी, फिल्म, रंगमंच और अन्य ललित कलाओं को, किसी खास उद्देश्य के लिए, घृणित और वैमनस्यता फैलाने वाली मानसिकता से दूर रखने का एक संदेश और आग्रह भी है। फिल्म, कश्मीर फाइल्स जब पर्दे पर आई थी, तभी उस पर कश्मीर से जुड़ी कुछ मिथ्या घटनाओं के चित्रण के आरोप भी लगे थे। पर जब उन घटनाओं पर बात शुरू हुई तो, आलोचकों को ही फिल्म के समर्थकों ने ट्रोल करना शुरू कर दिया था। फिल्म के, प्रदर्शन के लिए जिस तरह से, बीजेपी शासित सरकारों ने, दीवानगी दिखाई, उससे तभी लग रहा था, यह फिल्म, एक विशेष मानसिकता के प्रोपेगेंडा के उद्देश्य से ही बनाई गई है। 

फिल्म ने आशा के विपरीत धन कमाया, पर उसका कारण, फिल्म का कथ्य, शिल्प, अभिनय आदि में श्रेष्ठ होना नहीं था, बल्कि फिल्म देखने के लिए एक मिशन की तरह से, सांप्रदायिक आधार पर लोगों को प्रेरित या ध्रुवीकृत किया जाना था। लगभग सभी बीजेपी राज्यों में फिल्म को कर मुक्त किया गया था। फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग की गई। और तो और, फिल्म की आलोचना, भले ही वह फिल्म के तकनीकी पक्ष की, की गई हो, या अभिनय की, या निर्देशन की, उसे देश की अस्मिता से जोड़ कर देखा जाने लगा था। फिल्म के पक्ष और विरोध में जैसा वातावरण बनाया गया था, वैसा, अब तक, शायद ही किसी फिल्म को लेकर, बनाया गया होगा। 

हालांकि, फिल्म समीक्षक, तब भी इस फिल्म को एक प्रोपेगेंडा फिल्म के ही रूप में देखते थे, और इसे एक औसत फिल्म ही मानते थे। फिल्म के, सांप्रदायिक आधार पर विभाजनकारी, होने की बात भी कही गई है। आईएफएफआइ की जूरी में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के काबिल और प्रोफेशनल फिल्म निर्देशक होते हैं, जो कला, अभिव्यक्ति, संवेदनशीलता की आड़ में, फैलाए जाने वाले प्रोपेगेंडा को आसानी से भांप जाते हैं। जूरी ने फिल्म के उद्देश्य, प्रोपेगेंडा, और कथ्य तथा शिल्प को, वल्गर कह कर, इसे एक शॉक देने वाली फिल्म बताया है। ज्यूरी का यह बयान, किसी समय, 'कश्मीर का सच दिखाने वाली फिल्म' के रूप में प्रचारित इस फिल्म पर एक गंभीर और प्रोफेशनल टिप्पणी है। 

लेकिन, :द कश्मीर फाइल्स' फिल्म पर IFFI जूरी हेड और इजराइल के फिल्म मेकर नदव लैपिड के बयान पर विवाद मच गया है. इस मामले में भारत में इजराइल के राजदूत नाओर गिलोन ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होने जूरी हेड लैपिड के बयान को निजी बताया. उन्होंने कहा कि नदव लैपिड के बयान पर हमें शर्म आती है। दरअसल, गोवा में आयोजित 53वें फिल्म फेस्टिवल समारोह के समापन पर IFFI जूरी प्रमुख नदव लैपिड ने 'द कश्मीर फाइल्स' को वल्गर और प्रोपेगेंडा फिल्म करार दिया था. उन्होंने कहा, 'मैं इस तरह के फिल्म समारोह में ऐसी फिल्म को देखकर हैरान हूं। आईएफडीआई IFFI ज्यूरी के बयान पर फिल्म स्टार अनुपम खेर ने सख्त प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने ट्वीट कर जूरी के प्रमुख इजरायली फिल्म मेकर लैपिड पर निशाना साधा. वहीं, फिल्म मेकर अशोक पंडित ने कश्मीरियों का अपमान बताया। 

(विजय शंकर सिंह)

सुप्रीम कोर्ट में, नोटबंदी पर दायर, 1978 और 2016 की दो याचिकाएं और उनमें मौलिक अंतर / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ, जिसमे पांच जेजे शामिल हैं, नोटबंदी के बारे में, नियमित सुनवाई कर रही है। भारत  सरकार का 8 नवंबर 2016 को जारी किया गया, यह विवादास्पद आर्थिक कदम, न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गया है। संविधान पीठ ने 12 अक्टूबर को, नोटबंदी को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं की सुनवाई शुरू की, जिसमें प्रभावी रूप से 86% मुद्रा को रातोंरात प्रचलन से बाहर कर दिया गया था।

संविधान पीठ की, पांच जजों की बेंच, में जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर, बीआर गवई, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमण्यन, और बीवी नागरत्ना सम्मिलित है। सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम ने विमुद्रीकरण की नीति की तीखी आलोचना की और अन्य बातों के साथ-साथ, इस बात पर, जोर दिया कि, "आधिकारिक राजपत्र (गजट) में एक अधिसूचना ,(नोटिफिकेशन) जारी करके किसी भी मूल्यवर्ग के बैंक नोटों की सभी श्रृंखलाओं को विमुद्रीकृत करने की शक्ति भारतीय रिज़र्व बैंक आरबीआई की धारा 26 (2) के तहत उपलब्ध नहीं थी।  भारत अधिनियम, 1934 और तदनुसार, उसके नीचे दिए गए, प्राविधानों को, पढ़ा जाना चाहिए।" चिदंबरम, अपनी दलील में कहते हैं, "इस खंड के तहत प्रदत्त शक्ति "अनिर्देशित और असंबद्ध" होगी, और संविधान के भाग III के अनुशासन के अधीन होगी।" 
यानी संविधान के भाग III के निर्देशों से नियंत्रित होगी। अब आरबीआई की उक्त  प्राविधान को यहां पढ़ें। 

आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 26: "नोटों की कानूनी निविदा प्रकृति" `
(1) उप-धारा (2) के प्रावधानों के अधीन, प्रत्येक बैंक नोट भारत में किसी भी स्थान पर भुगतान के रूप में या उसमें व्यक्त राशि के लिए कानूनी निविदा होगी, और केंद्र सरकार द्वारा गारंटी दी जाएगी।
(2) केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर, केंद्र सरकार, भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषणा कर सकती है कि अधिसूचना में निर्दिष्ट तिथि से, किसी भी मूल्यवर्ग के बैंक नोटों की कोई भी श्रृंखला समाप्त हो जाएगी। कानूनी निविदा बैंक के ऐसे कार्यालय या एजेंसी में और उस सीमा तक जिसे अधिसूचना में निर्दिष्ट किया जा सकता है।
इसी प्राविधान को लागू करने के लिए पी चिदंबरम, संविधान के भाग III के अनुशासन की बात कर रहे हैं। इस संबंध में, वरिष्ठ वकील ने नोटबंदी के साथ भारत के पहले प्रयासों का भी उल्लेख किया।

साल 2016 की नोटबंदी के पहले, भारत में, विमुद्रीकरण के पहले दो और प्रकरण हो चुके हैं। पहली बार, 1946 में ब्रिटिश सरकार ने, 1000 रुपये और 10000 रुपये के नोटों को प्रचलन से हटा दिया था। उसके तीन दशक बाद, जनता पार्टी की सरकार में, मोरारजी देसाई जब प्रधानमंत्री थे तो, सरकार ने 1978 में भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर, आईजी पटेल की सहमति के बिना ही, 1000 और 10000 रुपए के नोटों को चलन से बाहर कर दिया। लेकिन उस नोटबंदी का भारत की अर्थव्यवस्था पर, कोई प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि, जितनी मुद्रा तब चलन में थी, उसकी तुलना में, चलन से बाहर की गई मुद्रा एक प्रतिशत से भी कम थी। जबकि, मोदी सरकार के समय की गई, 8 नवंबर, 2016 की नोटबंदी में, चलन से बाहर की गई मुद्रा का प्रतिशत, कुल मुद्रा का 86% था। 

1978 की नोटबंदी के बारे में,  घोष, चंद्रशेखर और पटनायक द्वारा लिखी गई किताब, "डिमोनेटाइजेशन डिकोडेड: ए क्रिटिक ऑफ इंडियाज करेंसी एक्सपेरिमेंट" में उल्लेख किया गया है कि, "दोनों ही मामलों (1946 और 1978 में की गई नोटबंदी) में रद्द लिए गए नोट, अत्यधिक उच्च मूल्य के नोट थे, जो प्रचलन में नोटों के मूल्य के एक प्रतिशत से भी कम का प्रतिनिधित्व करते थे।" 1946 और 1978 में की गई नोटबंदी की प्रक्रिया भी अलग अलग अपनाई गई थी। 1946 में, वायसराय और भारत के गवर्नर जनरल, सर आर्चीबाल्ड वावेल ने उच्च मूल्यवर्ग के बैंक नोट (विमुद्रीकरण) अध्यादेश को, जारी कर के नोटबंदी की थी, जबकि 1978 में, संसद द्वारा उच्च मूल्यवर्ग के बैंक नोट (विमुद्रीकरण) अधिनियम को एक अध्यादेश के स्थान पर लागू किया गया था। यानी संसद ने नोटबंदी अधिनियम पारित किया था। 

1946 और 1978 की नोटबंदियों के संदर्भ में, अपनाए गए अलग अलग प्राविधानों का उल्लेख करते हुए, पी चिदंबरम ने 2016 की नोटबंदी के खिलाफ चुनौती पर सुनवाई कर रही संविधान पीठ से पूछा, "यदि धारा 26 ने सरकार को यह शक्ति दी है, तो 1946 और 1978 में पहले की नोटबंदी के दौरान अलग-अलग अधिनियम क्यों बनाए गए थे? यदि शक्ति थी, तो 1946 और 1978 के अधिनियम 'धारा 26 में निहित कुछ भी होने के बावजूद' शब्दों से क्यों शुरू हुए?" 
फिर वे खुद ही इस सवाल का उत्तर देते हुए दलील देते हैं कि, "संसद ने महसूस किया कि इस तरह की शक्ति नहीं थी। क्या सरकार संसदीय कानून या बहस के बिना इस शक्ति का प्रयोग कर सकती है?"

एक रोचक तथ्य यह भी है कि, 1978 की नोटबंदी कवायद को एक संवैधानिक चुनौती दी गई थी।  1978 के अधिनियम की वैधता को, अन्य बातों के साथ-साथ, अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत व्यापार के मौलिक अधिकारों और अनुच्छेद 19(1)(एफ) के तहत संपत्ति के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में, अदालत में याचिका दायर कर के, चुनौती दी गई थी।  जस्टिस कुलदीप सिंह, एमएम पुंछी, एनपी सिंह, एमके मुखर्जी, और सैय्यद सगीर अहमद, द्वारा सुने गए, जयंतीलाल रतनचंद शाह बनाम भारतीय रिज़र्व बैंक (1996) के मामले में,  याचिकाकर्ताओं की दलील, का मुख्य जोर यह था कि, विवादित अधिनियम को "सार्वजनिक उद्देश्य" के लिए लागू नहीं किया गया था, जो कि, एकमात्र आधार होना चाहिए था। अनुच्छेद 31(2) के तहत ही, संपत्ति अनिवार्य रूप से अधिग्रहित की जा सकती थी।

न्यायालय ने इस दलील को इस प्रकार से, संक्षेपित किया, "याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उच्च मूल्यवर्ग के बैंक नोटों के धारकों के लिए बैंक से देय और देय ऋणों को विवादित अधिनियम ने समाप्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि ऋणों की इस तरह की समाप्ति अनुच्छेद 31 (2) के अनुसार,  संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण की राशि है।) चूंकि अधिग्रहण (नोटबंदी) एक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए नहीं की गवी थी और न ही, संबंधित अधिनियम में उसके संबंध में मुआवजे के भुगतान के लिए पर्याप्त और उचित प्रावधानों को शामिल किया गया था, इसलिए विवादित अधिनियम उपरोक्त अनुच्छेद का उल्लंघन था।"

इस दलील अदालत ने निरस्त करते हुए, जस्टिस मुखर्जी द्वारा लिखे गए फैसले के माध्यम से कहा, "प्रस्तावना से, यह प्रकट होता है कि इस अधिनियम को, बेहिसाब (अन अकाउंटेड मनी) धन के गंभीर खतरे से बचने के लिए, पारित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप न केवल, देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी, बल्कि राजकोष को प्राप्त होने वाले, राजस्व की बड़ी मात्रा से वंचित भी कर दिया था। इस बुराई को दूर करने के लिए उपरोक्त अधिनियम की मांग की गई है, यह नहीं कहा जा सकता है कि, यह एक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिनियमित नहीं किया गया था।"

1978 की नोटबंदी के खिलाफ दायर, याचिका में, यह भी दावा किया गया था कि, "याचिकाकर्ताओं को इस तरह के अनिवार्य अधिग्रहण का मुआवजा पाने के लिए अनुच्छेद 31 के तहत, प्राप्त अधिकार से वंचित किया गया था, और वैकल्पिक रूप से, भले ही यह मान लिया गया हो कि अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं किया गया था, उच्च मूल्यवर्ग के विनिमय के लिए निर्धारित समय  1978 के अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत बैंक नोट "अनुचित और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन" था।"

अदालत ने, हालांकि, तर्क की इस पंक्ति को प्रेरक नहीं पाया, "विमुद्रीकरण अधिनियम की धारा 7 और 8 उच्च मूल्यवर्ग के बैंक नोटों के लिए आवेदन करने और उसके तहत निर्धारित तरीके से समान मूल्य प्राप्त करने के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित करती है ... जब अधिनियम के उपरोक्त प्रावधानों को उद्देश्य के संदर्भ में माना जाता है  विमुद्रीकरण अधिनियम, यथाशीघ्र उच्च मूल्यवर्ग के बैंक नोटों के प्रचलन को रोकने के लिए, याचिकाकर्ताओं के उपरोक्त तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही, ऐसे नोटों के धारकों को समान विनिमय करने के लिए एक उचित अवसर प्रदान करना आवश्यक था। जाहिर है, इन प्रतिस्पर्धी और असमान विचारों के बीच संतुलन बनाने के लिए धारा 7(2) विमुद्रीकरण अधिनियम ने नोटों के आदान-प्रदान के लिए समय को सीमित कर दिया।"
इसलिए, अंतिम विश्लेषण में, न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने फैसला किया कि 1978 का अधिनियम "कानून का एक वैध टुकड़ा" था, जिसमें भूमि के उच्चतम न्यायालय द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया था।

साल, 2016 के विमुद्रीकरण को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने निम्नलिखित पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए, 1978 की याचिका पर दिए गए फैसलों को, अलग करने की मांग की है। उनका तर्क यह है कि,
(1) 1978 में, विमुद्रीकृत नोट, प्रचलन में मुद्रा के एक नगण्य हिस्से का प्रतिनिधित्व करते थे, जो 1% से कम था, जबकि, 2016 के निर्णय के कारण लगभग 86% मुद्रा चलन से बाहर हो गई और उसका प्रभाव बहुत व्यापक तौर से पड़ा। 
(2) 2016 के फैसले का प्रभाव, आम जनता द्वारा झेला गया था, जबकि 1978 के फैसले ने अत्यंत समृद्ध अभिजात वर्ग के भी, केवल एक छोटे से अंश को प्रभावित किया था। 
(3) 2016 का निर्णय एक कार्यकारी परिपत्र के आधार पर था  जबकि 1978 का निर्णय एक संसदीय विधान के माध्यम से था।

इस प्रकार अदालत में, 1946, 1978 और अब 2016 में की गई नोटबंदियों को अलग अलग तरह से दिखाया गया। 1946 की नोटबंदी, वायसरॉय द्वारा जारी अध्यादेश के द्वारा, 1978 की नोटबंदी, संसद से पारित एक अधिनियम के द्वारा और 2016 की नोटबंदी, एक सर्कुलर द्वारा लागू की गई। 1978 के नोटबंदी अधिनियम को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई जिसने, अदालत ने, याचिकाकर्ता की दलील नहीं मानी। 2016 की नोटबंदी के बारे में दायर 58 याचिकाओं पर, अभी सुनवाई जारी है। 

(विजय शंकर सिंह)

कॉलेजियम प्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कानून मंत्री के बयान पर आपत्ति जताई / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने कानून मंत्री के टेलीविजन साक्षात्कार के बारे में चिंता व्यक्त की, जिसने, कानून मंत्री ने, न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना की है। जजों की नियुक्ति से जुड़ी, एक याचिका की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने पीठ का ध्यान कानून मंत्री द्वारा, की गई तीखी टिप्पणी की ओर आकर्षित किया कि "यह मत कभी मत कहिये कि, सरकार फाइलों, (जजों के नियुक्ति की सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की संस्तुति) पर बैठी है। यदि ऐसा है तो मत संस्तुति भेजिए।"

कानून मंत्री की टिप्पणी पर असहमति व्यक्त करते हुए, जस्टिस कौल ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी से कहा, "कई लोगों को कानून के बारे में संदेह हो सकता है। लेकिन जब तक यह कानून (कोलेजियम सिस्टम) है, यह देश का कानून है ... मैंने सभी प्रेस रिपोर्टों को नजरअंदाज कर दिया है, लेकिन  यह किसी बड़े पद पर आसीन, व्यक्ति की तरफ से आया है ... ऐसा नहीं होना चाहिए था।"

जस्टिस कौल, टाइम्स नाउ समिट में कानून मंत्री किरन रिजिजू के बयानों का जिक्र कर रहे थे।  रिजिजू ने कहा कि, कॉलेजियम सिस्टम को सुप्रीम कोर्ट ने ही मंजूरी दी थी और सवाल किया था कि "जो कुछ भी संविधान से अलग है, केवल अदालतों या कुछ न्यायाधीशों द्वारा लिए गए फैसले के कारण, उसे देश का समर्थन कैसे मिल सकता है?"
न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि सरकार एनजेएसी प्रणाली को लागू नहीं करने से नाराज नजर आ रही है।  न्यायाधीश ने पूछा कि क्या कॉलेजियम की सिफारिशों को लंबित रखने का यह एक कारण हो सकता है ?

यह पीठ, जिसमें जस्टिस एएस ओका भी शामिल हैं, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा भेजे गए 11 नामों को केंद्र द्वारा अनुमोदित नहीं करने के खिलाफ, 2021 में एडवोकेट्स एसोसिएशन बेंगलुरु द्वारा दायर, एक अवमानना ​​​​याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

जस्टिस कौल ने कहा, "आम तौर पर, हम प्रेस में दिए गए बयानों पर ध्यान नहीं देते हैं। लेकिन मुद्दा यह है कि नामों को मंजूरी नहीं दी जा रही है। सिस्टम कैसे काम करता है? हमने अपनी पीड़ा व्यक्त की है।"
न्यायाधीश ने कहा कि "जब तक कॉलेजियम प्रणाली देश का कानून है, तब तक इसका पालन किया जाना चाहिए।"  
इस प्रकार उन्होंने एजी को सरकार को "पीठ की भावनाओं" को व्यक्त करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि केंद्र सिफारिशों पर न बैठे।

"ये वे नाम हैं जो डेढ़ साल से लंबित हैं। आप नामों को क्यों नहीं अनुमोदित करते हैं। नामों को इस तरह लंबित रखकर आप क्या कहना चाह रहे हैं। आप प्रभावी रूप से मिस्टर अटॉर्नी की नियुक्ति के तरीके को विफल कर रहे हैं।  का पालन किया जाना चाहिए। कई सिफारिशें 4 महीने की सीमा पार कर चुकी हैं। हमें कोई जानकारी नहीं है। हमने अवमानना ​​​​नोटिस जारी नहीं करके संयम बरता है।"

पीठ ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि देश के कानून का पालन किया जाए।  अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पीठ को आश्वासन दिया कि वह इस मामले को सुलझाने का प्रयास करेंगे।  मामले की अगली सुनवाई 8 दिसंबर को होगी। 
लाइव लॉ की रिपोर्टिंग पर आधारित। 

(विजय शंकर सिंह)

प्रवीण झा / 1857 की कहानी - तीन (7)

“आपने हिंदुस्तान के सभी अपराधों और हत्याओं को माफ़ कर दिया…मैंने तो किसी की हत्या भी नहीं की…मैंने विवशता के कारण विद्रोहियों का साथ दिया, फिर भी मुझे माफ़ी नहीं दी जा रही…उन महिलाओं और बच्चों को मारना सिपाहियों और बदमाशों की करतूत थी। मेरे भाई के घायल होने के बाद मेरे सैनिक तो कानपुर छोड़ चुके थे।”

- नाना साहेब पेशवा की ब्रिटिश सरकार को लिखी चिट्ठी जिसमें उन्होंने बीबीघर नरसंहार से स्वयं को अलग किया (20 अप्रिल, 1859/ आर सी मजूमदार की 1857 पर पुस्तक में उद्धृत) 

मैं यह मान कर चल रहा हूँ कि 1857 के डेढ़ सौ वर्ष से अधिक के बाद, अब एक परिपक्वता से लोग पढ़ेंगे। इसमें नायक ढूँढने के बजाय सार्वजनिक पत्रों को पलटेंगे, और एक सम्यक सोच बनाएँगे। नाना साहेब का स्वयं को सिपाही विद्रोह से अलग करना एक ऐसा दस्तावेज बना कि, आर सी मजूमदार को अपनी किताब संशोधित करनी पड़ी, और उनके ही शब्दों में ‘so called heroes’ के खाँचे में रख दिया। इसका अर्थ यह नहीं कि वही अंतिम सत्य है, किंतु वह एक लिखित तथ्य है। 

बीबीघर के विषय में जॉन फिचेट ने गवाही दी, जिसके अनुसार भारतीय सिपाही महिलाओं की हत्या के विरोध में थे। वह सिर्फ़ पुरुषों को मारने के लिए तैयार थे। उस मध्य तात्या टोपे का आदेश आया कि सभी को मारना आवश्यक है। सावरकर ने अपनी पुस्तक में इसको उचित बताया है क्योंकि अंग्रेज़ इलाहाबाद से कानपुर तक भारतीयों की हत्या करते आ रहे थे, जिसका बदला लेना आवश्यक था। उन्होंने यह भी लिखा कि इन कुटिल गोरी महिलाओं ने जासूसी पत्र इलाहाबाद भेजे थे।

पहले सिपाहियों ने महिलाओं और बच्चों को खींच कर आंगन में लाने का प्रयास किया, लेकिन चीख-पुकार में यह मुश्किल हो रहा था। आखिर बीबीघर की खिड़कियों में बंदूकें तान कर अंधा-धुंध गोलियाँ चलायी गयी। मगर सिपाहियों ने खुद ही खीज कर यह प्रक्रिया बंद कर दी।

गवाही के अनुसार उसके बाद बेगम हुसैनी ख़ानुम के आशिक सरवर ख़ान दो मुसलमान कसाइयों और दो अन्य हिंदुओं (सौराचंद और एक अनामित) को लेकर आये, जिन्होंने तलवार लेकर काटना शुरू किया। आधे घंटे से अधिक तक नरसंहार चलता रहा, जिसमें एक बार सरवर ख़ान की तलवार भी टूट गयी। कुल 73 महिलाओं और अलग-अलग उम्र के 125 बच्चों की कथित हत्या का विवरण है (जिसमें कुछ अधमरे रह गए थे, और बाद में मारे गए)। लाशों के ढेर को वहीं कुएँ में फेंका जाने लगा। 

सावरकर ने अपनी पुस्तक में इसका वर्णन करते हुए लिखा है, “आज तक आदमी कुएँ का पानी पीता था, अब कुआँ आदमी का रक्त पी रहा था। फ़तेहगढ़ में जलते हुए लोगों का आर्तनाद जब अंग्रेज़ आकाश में फेंक रहे थे, तब बीबीगढ़ में रक्त से सने गोरी चीखें पांडे पाताल में फेंक रहे थे। मनुष्य की इन दो भिन्न जातियों में सौ वर्षों से जमा रकम का हिसाब इस तरह चुकता होने लगा।”

यह मुमकिन है और ब्रिटिश काग़जों से भी यही दिखता है कि, उस वक्त नाना साहेब अहीरवा में लड़ रहे थे। इसलिए नाना साहेब की चिट्ठी सच हो सकती है, कि उनके परोक्ष में तात्या टोपे और अज़ीमुल्ला ख़ान ने यह निर्णय लिया हो। वहीं, इतनी बड़ी घटना नाना साहेब के सहमति के बिना ही हो गयी, इस पर प्रश्नचिह्न है।

जब अहीरवा से हार की खबर आने लगी, कानपुर से सिपाही और आम नागरिक भागने लगे। कुछ दिल्ली की ओर निकले, और कुछ बिठूर घाट से नदी पार कर लखनऊ की तरफ़। नाना साहेब कानपुर का बारूदखाना उड़ाने का आदेश देकर बिठूर की ओर निकल गए। यह भीषण विस्फोट भी ब्रिटिश संस्मरणों में वर्णित है।

हैवलॉक की सेना जब कानपुर पहुँची, यह एक वीरान मरघट सा दिख रहा था। मेजर बिंघैम ने बीबीघर के विषय में लिखा,

“फर्श पर टखनों तक खून जमा था, और लाशें बिखरी पड़ी थी…बच्चों के जूते बिखरे थे…कुआँ लाशों से भरा पड़ा था”

17 जुलाई को हैवलॉक ने एक टुकड़ी नाना साहेब के पीछे बिठूर भेजी, मगर वहाँ भी वीराना था। उन्होंने कयास लगाया कि नाना साहेब गंगा पार कर कहीं आगे निकल गए। अंग्रेज़ों ने उनका महल लूट कर उसे जला दिया। नाना साहेब के एक सहयोगी (पेशवा कलक्टर वर्णित) को पकड़ लिया गया, और मेजर बिंघैम ने लिखा,

“हमने उसके हाथ-पाँव बाँध दिए, और उसके मुँह में जबरन गोमाँस और सूअर का माँस ठूँस कर उसका धर्म भ्रष्ट कर दिया…मुझे याद नहीं कि उसके बाद वह जिंदा बचा या नहीं, अन्यथा उसे फांसी पर लटकाने में बहुत आनंद आता।”

हैवलॉक, जॉन नील को ज़िम्मेदारी सौंप कर लखनऊ निकल रहे थे। जॉन नील ने अपनी क्रूरता का वर्णन स्वयं किया है कि, वह ब्राह्मणों को पकड़ कर उन्हें पहले फर्श पर गिरा खून साफ़ करवाते, और फिर उन्हें वहीं फाँसी पर लटका देते।

किसी भी मंजे हुए इतिहासकार के लिए इनमें से एक पक्ष को नायक बनाना बायें हाथ का खेल है। भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकार बीबीघर और सतीचौरा अंश को छोटा कर अंग्रेज़ों की हिंसा पर पन्ने भर सकते हैं, वहीं ब्रिटिश इतिहासकार ‘Never forget Cawnpore!’ के नारे पर भारतीयों का वीभत्स पक्ष दिखा सकते हैं। भारतीयों के अंदर जाति और धर्म के नायकों पर रस्सा-कशी हो सकती है। लेकिन, यह स्याह-सफ़ेद क़िस्सा नहीं, यह इतिहास है जिसके कई पन्ने अभी खुलने बाकी है और कुछ शायद कभी न खुलें। 

खैर, कानपुर से अब लखनऊ का रुख किया जाए। 
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

1857 की कहानी - तीन (6) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/11/1857-6_27.html 


Sunday, 27 November 2022

मनीष आज़ाद / Mephisto: एक कलाकार जिसने अपनी आत्मा फासीवादियों को बेच दी….

जर्मन फासीवाद पर वैसे तो कई बेहतरीन फिल्में हैं, लेकिन 1981 में आयी यह फिल्म एकदम अलग तरह की है।

‘हेन्डरिक’ एक स्टेज कलाकार है। वह आम तौर से वाम की ओर झुका हुआ हैै। और उसी तरह के नाटक करता है। उसके ग्रुप में ज्यादातर कलाकार वाम की ओर झुके हुए हैं। यह वह समय है जब जर्मनी में नाजीवाद तेजी से अपने पैर पसार रहा है। फिर एक दिन अचानक से खबर आती है कि हिटलर ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है।

परिस्थिति पूरी तरह बदल जाती है। हेन्डरिक के बहुत से दोस्त ‘प्रतिरोध दस्तों’ में शामिल हो जाते है और बहुत से देश छोड़ के चले जाते हैं। हेन्डरिक की पत्नी भी देश छोड़ कर फ्रान्स चली जाती है। जाने से पहले वह हेन्डरिक को भी देश छोड़ने के लिए मनाती है। लेकिन वह नहीं मानता और तर्क देता है कि ये नाजी लोकतान्त्रिक तरीके से ही तो सत्ता में आये है, और मेरा काम थियेटर करना है और मुझे कुछ नहीं पता। जब उसके दोस्त उसे प्रतिरोध दस्ते में शामिल होने के लिए कहते हैं तो वह कहता है कि मुझे रिजर्व में रख लो। अभी तत्काल मैं शामिल नहीं हो सकता। 

यहीं से उसका व्यक्तित्व बदलने लगता है। और वह अपने आपको नयी परिस्थिति में ढालने में लग जाता है और उसके अनुसार ही तर्क भी गढ़ने लगता है।

आगे बढ़ने से पहले यह जान लेते हैं कि फिल्म का नाम ‘मेफिस्टो’ का मतलब क्या है। जर्मन लोक कथा में ‘फास्ट’ और ‘मेफिस्टो’ को लेकर अनेक कहानियां हैं। फास्ट एक कलाकार-बुद्धिजीवी है। मेफिस्टों एक 'दानव' है। मेफिस्टों हमेशा लोगो की आत्मा का सौदा करने के लिए घूमता रहता है। जो उसे अपनी आत्मा बेच देता है उसे वह खूब सारा धन व शोहरत देता है। एक दिन फास्ट भी मेफिस्टो को अपनी आत्मा बेच देता है और इस ऐवज में उसे बहुत सा धन व शोहरत मिलती है।

इसी दौरान एक बार स्टेज पर ‘मेफिस्टो’ का रोल करते हुए वीआइपी दर्शक दीर्घा में बैठा हुआ नाजी जनरल हेन्डरिक के अभिनय से प्रभावित हो जाता है और उसे अपने पास बुलाता है। दोनो के मिलन को दर्शक सांस बांधे देख रहे हैं। यह पूरी फिल्म का बहुत ही पावरफुल दृश्य है और बेहद प्रतीकात्मक है। मानो यहीं पर फास्ट यानी हेन्डरिक अपनी आत्मा का सौदा मेफिस्टो यानी नाजी जनरल के साथ करता है। और उसके बाद शुरु होती है आत्मा विहीन खोखले हेन्डरिक की शोहरत की यात्रा और जल्द ही उसे संस्कृति का पूरा जिम्मा दे दिया जाता है।

इसी समय सांस्कृतिक मंत्रालय की तरफ से उसे फ्रांस जाना होता है वहां वह अपनी पूर्व पत्नी से मिलता है। वह आश्चर्य करती है कि वह ऐसे माहौल में बर्लिन में कैसे रह पा रहा है। वह कहता है कि मैं थियेटर में रहता हूं। तो उसकी पूर्व पत्नी बोलती है कि आखिर थियेटर बर्लिन में ही तो है। यह बहस इस सर्वकालिक बहस की ओर संकेत करती है कि कला निरपेक्ष होती है या समाज सापेक्ष। इससे पहले भी जब उसकी पत्नी उससे स्टैण्ड लेने को कहती है तो वह बोलता है कि मेरा स्टैण्ड शेक्सपियर है (उस समय वह शेक्सपियर का नाटक ‘हैमलेट’ करने जाने वाला था)। उसकी पत्नी गुस्से से बोलती है कि तुम शेक्सपियर के पीछे छिप नहीं सकते। नाजी लोग अपनी गन्दगी पर पर्दा डालने के लिए शेक्सपियर जैसा क्लासिक नाटक करते हैं। तुम्हे इसे समझना चाहिए।

आज भारत की परिस्थिति में भी हम इसे देख सकते हैं। जब नाटककार या कलाकार आज के तीखे सवालों से आंख चुराते हुए अपनी कायरता पर पर्दा डालने के लिए पुराने ‘क्लासिक’ नाटक के पीछे अपने को छुपा लेते हैं।
फ्रांस में जब हेन्डरिक की अपनी पूर्व पत्नी से बहस हो रही होती है तो वही पास में बैठा उसका एक पुराना दोस्त इसे सुन रहा होता है। कुछ समय बाद वह आता है और हेन्डरिक को एक थप्पड़ जड़ देता है। यह दृश्य बहुत ही पावरफुल है। हेन्डरिक इस थप्पड़ का जरा भी विरोध नहीं करता। ‘क्लोज अप’ में चेहरे का भाव यह बताता है कि उसे पता है कि वह इसी लायक है।

जब उसकी दूसरी काली पार्टनर (जिसके साथ वह कभी पब्लिक में नहीं होता क्योकि उस दौरान जर्मनी में प्रचलित नस्लीय शुद्धता के सिद्वान्त से यह मेल नहीं खाता, इसलिए वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी काली पार्टनर को देश से निकल जाने के लिए बाध्य करता है और उस पर यह अहसान भी जताता है कि उसने उसे सम्भावित नाजी हमले से बचा लिया) अकेले में उसे उसके समझौते या कहे कि उसकी मक्कारी के लिए धिक्कारती है तो वह कोई प्रतिरोध नहीं करता बल्कि तुरन्त आइने में देखता है कि क्या वह सचमुच कमीना है।

नाजी जनरल की चापलूसी करते हुए वह यहां तक चला जाता है कि एक प्रोग्राम में वह कहता है-‘‘बिना संरक्षण के कला टूटे पंखों वाली चिड़िया की तरह होती है।’’

दरअसल जब जब कैमरा हेन्डरिक का क्लोज अप लेता है तो उसके व्यक्तित्व का खोखलापन बहुत पावरफुल तरीके से सामने आ जाता है। और यही लगता है कि जब वो आरम्भ में वाम की ओर झुका था तब भी उसे वाम से कुछ लेना देना नहीं था बस उस समय वाम ही उसके आगे बढ़ने के लिए एक सीढ़ी की तरह था जैसे इस समय नाजी हंै।
फिल्म में एक और दृश्य बहुत ही प्रतीकात्मक और शक्तिशाली है। एक बार जब वह अपने आफिस आता है तो देखता है कि किसी ने आफिस के अन्दर नाजी-विरोधी पर्चे फेंके हुए है। वह जल्दी से जल्दी दूसरे लोगों के आने से पहले सभी पर्चे इकट्ठा करता है, बाथरुम में जाकर उन्हें जलाता है और फिर करीने से राख को इकट्ठा करके उसे अपनी जेब में रख लेता है। दरअसल ऐसे कलाकारो का यही मुख्य काम होता है- प्रतिरोध की आंच से व्यवस्था को बचाना। भारत में भी ऐसे कितने कलाकार हैं जो इस काम में जी जान से लगे हुए हैं।

फिल्म का अन्त बहुत शक्तिशाली है। नाजी जनरल हेन्डरिक को विशाल नवनिर्मित नाटक हाल में ले जाता है और कहता है कि यहां तुम्हारे प्रदर्शन पर तुम्हें बहुत शोहरत मिलेगी। उसे जबर्दस्ती हाल के बीच में जाने को कहा जाता है और उस पर चारों तरफ से लाइट डाली जाती है। इस तेज लाइट से बचने के लिए वह अपना चेहरा छुपाने का असफल प्रयास करता है और अपने से कहता है कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं, आखिर मैं एक कलाकार ही तो हूं। यहीं पर ‘फ्रीज फ्रेम’ के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है।

इस पूरी फिल्म को यदि हम आज के अपने देश के हालात में और उसमें कलाकारों की भूमिका के सन्दर्भ में अनुदित करें तो हमें गजब का साम्य नजर आयेगा। आपको भारत के फास्ट (हेन्डरिक जैसे कलाकार) और मेफिस्टो (फासीवादी यानी सरकारी तंत्र) के बीच की जुगलबन्दी को पहचानने में ज्यादा वर्जिश नहीं करनी पड़ेगी। लेकिन यह काम मैं आप पर ही छोड़ता हूं।

वे नहीं कहेंगे कि वह समय अंधकार का था
वे पूछेंगे कि
उस समय के कवि
चुप क्यो थे?
- ब्रेख्त

[इस फिल्म को 1981 में विदेशी भाषा की कैटेगरी में बेस्ट फिल्म का आस्कर अवार्ड भी मिला। इस फिल्म को हंगरी के डायरेक्टर ‘Istvan Szabo’ ने निर्देशित किया।]

© मनीषआज़ाद 

प्रवीण झा / 1857 की कहानी - तीन (6)

जिस कारतूस को लेकर विवाद हुआ, वही एनफ़िल्ड हार की वजह बन रही थी। इस राइफ़ल का निशाना 800 गज तक पक्का था, और भारतीय सिपाहियों के ‘ब्राउन बेस’ बंदूक से चौगुना प्रभावी था। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि अंग्रेज़ जान-बूझ कर यही राइफ़ल अधिक प्रयोग कर रहे थे, ताकि बाग़ी सिपाहियों के सीने में वही कारतूस उतरे। यह एक तरह का मानसिक खेल था, जिसका असर 1857 के बाद दिखा।

इलाहाबाद से मेजर रेनॉड की टुकड़ी जुलाई की शुरुआत में कानपुर के लिए निकली। 7 जुलाई को स्वयं जनरल हैवलॉक इलाहाबाद से निकले। दूसरी तरफ़ कानपुर से लगभग 3500 भारतीय सिपाही उनसे लड़ने के लिए निकले। भारतीयों का सेनापति ज्वाला प्रसाद को बनाया गया, जिनके साथ दो कमांडर थे। एक घोड़े पर बैठे टीका सिंह, और दूसरे हाथी पर सवार तात्या टोपे।

नानकचंद और शेरर की डायरी के अनुसार 9 जुलाई तक एक यूरोपीय टुकड़ी मूरतगंज पहुँच चुकी थी, और 12 जुलाई को फ़तेहपुर। फ़तेहपुर में ही रेनॉड और हैवलॉक की सेना एक हो गयी। अंग्रेज़ों की टुकड़ी में जो भारतीय सिपाही थे, वे मुख्यतः मद्रास फ्यूजिलियर्स के दक्षिण भारतीय और फ़िरोज़पुर से आए सिख थे। शेष यूरोपीय सैनिक थे। शेरर अपने संस्मरण में यह भी लिखते हैं कि जब वे मार्च कर रहे थे, तो कुछ स्थानों को छोड़ कर अधिकांश स्थान वीरान थे। गाँवों के लोग फाँसी के डर से कहीं छुप गये थे।

फ़तेहपुर के पुल पर रेनॉड की छोटी टुकड़ी का मुक़ाबला विशाल भारतीय सेना से हुआ। हैवलॉक ने अपनी बड़ी टुकड़ी ठीक पीछे छुपा कर रखी थी, जो भारतीयों को नज़र नहीं आ रही थी (सावरकर के वर्णन में लिखा है कि अंग्रेजों ने तोप की बत्ती बुझा रखी थी)।

युद्ध पूरे जोश में धार्मिक जयकारों के साथ शुरू हुआ, किंतु ब्रिटिश हमलों के सामने टिक नहीं सका। विवरणों के अनुसार अंग्रेजों ने अगली पंक्ति में आठ तोप और सौ राइफ़लधारी रखे थे। उन्होंने ही अधिकांश को मार गिराया, और एक समय जब गोली एक हाथी को लगी तो भगदड़ मच गया। कैप्टन मॉड ने लिखा है,

“मुझे लगता है कि हाथी पर बैठे व्यक्ति तात्या टोपे थे, जिनके गिरने के बाद बाग़ियों का मनोबल गिर गया, और वह पीछे लौटने लगे। बाद में इस व्यक्ति (तात्या) ने हमें कई परेशानियाँ दी…हम कुछ समय बाद जब उस हाथी को देखने आगे बढ़े, एक अधमरा बाग़ी घुड़सवार नीचे गिरा था। वह हाथ जोड़ कर कह रहा था- अमन, अमन! हमें सख़्त हिदायत थी कि अब ऐसी कोई अपील नहीं सुनी जाएगी। हमने उसके सर में गोली मार दी।”

15 जुलाई को पांडु नदी के निकट एक बार और भिड़ंत हुई। वहीं, औंग गाँव में कैप्टन रेनॉड को जाँघ में गोली लगी और मारे गए। 16 जुलाई को महाराजपुर पहुँच कर ब्रिटिश सेना कानपुर की सीमा पर दस्तक दे चुकी थी। मगर, उन्हें मालूम पड़ा कि भारतीय पुनः संगठित होकर अहिरवा (वर्तमान कानपुर हवाई अड्डे के निकट) में उनका रास्ता रोकने के लिए खड़े हैं। 

वहाँ बाक़ायदा खंदक खोद कर, उसमें तोप बिठा कर क़िलाबंदी की गयी थी। अगर ब्रिटिश जोश में आगे बढ़ते, तो बुरी तरह मारे जा सकते थे। लेकिन, एक बार फिर हैवलॉक ने यह सूझ-बूझ दिखायी कि आगे बढ़े ही नहीं। महाराजपुर में रुक कर योजना बनाने लगे।

अगली सुबह जब ब्रिटिश निकले, तो उन्होंने देखा कि भारतीय पूरे जोश से लड़ रहे हैं, लेकिन रणनीतिक ग़लतियों से मारे जा रहे हैं। उस दिन हाथी पर सवार एक व्यक्ति ‘उठो! लड़ो! आखिरी बार’ कहते हुए भारतीयों को जागृत कर रहे थे। ब्रिटिशों का अनुमान था कि वह स्वयं नाना साहेब पेशवा थे, जिन्होंने बमुश्किल दो हफ्ते राज किया था। जो भी रहे हों, इस युद्ध में अंग्रेजों के दर्जनों सिपाही मारे गए।

अंततः अंग्रेज़ कानपुर नगर में घुस गए। अब उनकी अगली कोशिश थी कि नाना साहेब के शरण में रह रहे अंग्रेजों को मुक्त कराया जाए। लेकिन, उन्हें देर हो चुकी थी। 

शरणार्थियों को सर जॉर्ज पार्कर की बीवी के बंगले ‘बीबीघर’ में रखा गया था। वह जनाना घरों की तरह बाहर से बंद घर था, जिसके मध्य एक खुला आँगन और बाहर एक कुआँ था। वहाँ नाना साहेब की प्रिय तवायफ़ अदला की एक सेविका हुसैनी ख़ानुम ने उनकी ज़िम्मेदारी ले रखी थी। वह उनसे किसी क़ैदखाने की तरह चक्की पिसवाती, और स्वयं मसनद पर पान खाते बैठी रहती।

कानपुर हार के बाद उनका भविष्य तय किया जा चुका था। 15 जुलाई के 4.30 बजे दो रसूखदार अंग्रेज़ और एक चौदह साल के किशोर बीबीघर से बाहर लाये गये, और उनको गोली मार दी गयी। आधे घंटे बाद हुसैनी ख़ानुम ने अंदर अंग्रेज़ औरतों को बताया, “तुम सबको मारने का फ़ैसला लिया गया है।”
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

1857 की कहानी - तीन (5) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/11/1857-5_27.html