Friday, 29 July 2022

सनेही लाल / गांधी अंबेडकर के बीच जो पूनापैक्ट हुआ था , अगर पं. नेहरू नही होते तो लागू हो पाता ? कदापि नही.

आज पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी एससी-एसटी ओबीसी और सामान्य वर्ग चारों के लिए उपेक्षा के पात्र हैं। ऐसा काम ही किया है। जिस तरह भाजपा ने पूंजीवादी पैटर्न पर चलकर शिक्षा को महंगा किया, सरकारी नौकरियों के क्षेत्र को समाप्त किया,पेंशन समाप्त किया, सरकारी विभागों को प्राइवेट किया,उस तरह नेहरू,इंदिरा ने पूंजीवादी पैटर्न पर चलकर शिक्षा को महंगा नहीं किया। सरकारी नौकरियों के स्रोत को समाप्त नहीं किया। पेंशन खत्म नहीं किया। जिससे ढेर सारे शिक्षित और अशिक्षित लोग सरकारी नौकरियों में आये और पेंशन पा रहे हैं। क़ृषि के क्षेत्र में बड़ी क्रांति की। आज ये ही लोग नेहरू इंदिरा से नाराज हैं कि इन्होंने हमारे लिए कुछ नहीं किया। 

1950 में चंपकम दोराइराजन बनाम मद्रास राज्य के केस में उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण सिस्टम को ही रद्द कर दिया था। उसने कहा,जब मूल अधिकार और निति निर्देशक तत्वों में टकराव होगा तो मूल अधिकार को वरीयता दी जाएगी। वैसे भी निति निर्देशक तत्वों को लागू न करें तो भी ठीक है। लेकिन मूल अधिकार को बचाना सुप्रीम कोर्ट का एक आवश्यक दायित्व है। आगे यह भी कहा कि मूल अधिकारों का संशोधन संसद द्वारा संशोधन प्रक्रिया के माध्यम से किया जा सकता है। अब देखिए उच्चतम न्यायालय कह रहा है कि निति निर्देशक तत्वों को लागू नहीं भी किया जायेगा तो ठीक है। यानी कमजोर हमेशा कमजोर ही रहें? तो ठीक है? यानी कमजोर का कोई मौलिक अधिकार नहीं। सारा मौलिक अधिकार साधन संपन्न लोगों का है। तब नेहरू ही थे जिसने सोचा,अगर समाज के बंचित तबके को मुख्य धारा में लाना है तो संविधान में संशोधन करके उसके कुछ प्रावधानों को हटाना ही पड़ेगा। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो सु्प्रीम कोर्ट हर बार टांग अड़ायेगा। और समाज के बंचित हमेशा बंचित ही रह जायेंगे। इसलिए नेहरू ने 1951 में पहला संविधान संशोधन लाया। संविधान का पहला संशोधन किसके लिये किया गया ? दलितों के लिये , आज जो नेहरू को गाली दे रहे है कि क्या किया ? संशोधन प्रस्ताव पर बहस का जबाब देते हुए बाबासाहेब डॉ आंबेडकर ने कहा था उच्चतम न्यायालय ने मद्रास सरकार का जातीय हुक्म रद्द किया। जो बड़ी असंतोषजनक घटना है। और वह संविधान के अनुच्छेद के अनुसार कार्यान्वित नहीं हुई है। उसे मूल अधिकारों के साथ अनुच्छेद 46 का भी ध्यान रखना चाहिए था। मद्रास सरकार ने अनुच्छेद 46 के अनुपालन में ही सामुदायिक आरक्षण का आदेश जारी किया है। अनुच्छेद 46 ने कमजोर वर्ग का कल्याण करने का आदेश सरकार को दिया है। मगर उच्चतम न्यायालय ने यह कहा है कि मौलिक अधिकारों और निति निर्देशक तत्वों में टकराव होगा तो मूल अधिकार ही प्रभावी माना जायेगा। ऐसी स्थिति में अगर अनुच्छेद 46 को सफल बनाना है तो अनुच्छेद 15 ,29 में संशोधन करना होगा। इस तरह अनु 15 में उप क्लाज (4) जोड़ा। 31 में उप क्लाज (क) जोड़ा और 31(ख) जोड़ा। 31(ख) में नवीं अनुसूची बनाईं गई। उसमें लिखवा दिया गया कि अगर नवीं अनुसूची में डाला गया कोई प्रावधान मूल अधिकारों का हनन भी करता है तो उसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। संपत्ति के मूल अधिकार वाले अनुच्छेद 31 को हटा न सके क्योंकि पटेल, गोविंद बल्लभ पंत और राजेंद्र प्रसाद के दबाव में उसे मूल अधिकार में डाला गया था। आज संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार नहीं है। वह एक कानूनी अधिकार बनाकर जनता पार्टी की सरकार द्वारा 1978 में 44वें संशोधन के माध्यम से 300 (क) में डाल दिया गया है। इस तरह से नेहरू ने संविधान में संशोधन कर भूमि सुधार ऐक्ट 1951 पारित कराया जिसके द्वारा जमींदारी उन्मूलन कर बहुत से भूमिहीनों को भूमि का मालिक बनाया। पहले ये भूमिहीन जमींदारों की जमीन में बसे थे। आज वे अपनी जमीन में बसे हैं। इससे जमींदार नाराज हुए। बड़े बड़े किसान जो 100 बीघा से लेकर 500 सौ बीघा,1000 बीघा के काश्तकार थे,वे नाराज हुए। बहुत से प्रांतों ने इनकी नाराजगी के भय से अपने प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन नहीं किया। जैसे बिहार। राजा जी राजगोपालाचारी ने तो नेहरू की नीतियों से नाराज होकर 1959 में राजाओं नवाबों और जमींदारों की एक अलग राजनीतिक पार्टी ही बना ली थी। जिसका नाम स्वतंत्र पार्टी था। 1962 में चुनाव भी लड़ा था। जिसमें इनको 18 सीटों पर जीत हासिल हुई। इंदिरा जी ने कोयला खादानों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उनके कर्मचारियों को सरकारी नौकर बनाया। इससे खादानों के मालिक और बैंकों के मालिक नाराज हुए। राजाओं और नवाबों का प्रिवी पर्स कानून बनाकर समाप्त किया तो इससे राजा और नवाब नाराज हुए। 1967 में जब गोलकनाथ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने सरकार द्वारा अनुच्छेद 46 के अनुपालन में जनता के कल्याण के लिए किए जाने वाले संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर पाबंदी लगाया तो इंदिरा जी ने 1971 में 24वां संविधान संशोधन कर न्यायालय के निर्णय को ही शून्य कर दिया। 1971 में 25वां संविधान संशोधन कर बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटा। इस संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद 31ग में जोड़ा कि इसके तहत बनाये गये नीति को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। 26वां संविधान संशोधन 1971 कर प्रिवी पर्स जजमेंट को पलटा। संघी दलाल नाना पालकीवाला ने इन संशोधनों को संविधान को विकृत एवं अपवित्र करने वाला कहा था। बताइये, जनता के कल्याण के लिए किये गये इन संशोधनों से संविधान विकृत और अपवित्र हो जा रहा है? ऐसी ऐसी मानसिकता के लोग हमारे लिए आदरणीय हैं। 24वें एवं 25वें संशोधन को केशवानंद के वाद में चुनौती दी गयी। इस वाद में 24 अप्रैल 1973 को न्यायालय ने संविधान की उद्देशिका को संविधान का भाग मानते हुए कुछ संविधान के आधारभूत लक्षण तय कर संसद की संविधान संशोधन की शक्तियों पर ही प्रतिबंध लगा दिया। जबकि संविधान में आधारभूत लक्षणों का कोई जिक्र नहीं है। ये आधारभूत लक्षण उच्चतम न्यायालय ने अपने तरफ से जोड़ा। 25वें संविधान संशोधन में 31ग में जोड़े गये संशोधन को असंवैधानिक घोषित किया। 

1951 में बाबासाहेब आंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल पर सवालों के जबाब में कहा था,संसद सार्वभौम सत्ता है। वह कानून बना सकती है। और रद्द कर सकती है। इसकेे उलट माननीय सुप्रीम कोर्ट कह रहे हैं कि संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो संविधान के आधारभूत ढांचे को रद्द करे।‌ ऐसा लगता है कि इंदिरा जी के संशोधनों से न्यायपालिका भी नाराज थी। 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला,जिसमें इंदिरा जी के संसदीय निर्वाचन को अवैध घोषित किया,उसमें कहीं न कहीं इंदिरा जी के इन संशोधनों की खीझ दिखाई देती है। संसद सर्वोच्च या न्यायपालिका सर्वोच्च। इस निर्णय से न्यायपालिका ने संसद पर अपनी सर्वोच्चता की मुहर लगा दी। केशवानंद के निर्णय को शून्य करने के लिए इंदिरा जी ने 1976 में 42वां संविधान संशोधन किया। 42वें संविधान संशोधन में संविधान के अनुच्छेद 368 में उप क्लाज (4) एवं (5) जोड़ा। 1980 में उच्चतम न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ के वाद में 7-6 के बहुमत से इन दोनों संशोधनों को अवैध घोषित कर दिया। 1981 में बावन राव बनाम भारत संघ के वाद में एक और महत्वपूर्ण निर्णय दिया। उसने कहा कि केशवानंद के वाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय दिनांक 24 अप्रैल 1973 के बाद नवीं अनुसूची में डाले गये संविधान संशोधनों की भी समीक्षा सुप्रीम कोर्ट कर सकता है। जबकि संविधान की नवीं सूची में डाले गये अनुच्छेदों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।‌ अब 24 अप्रैल 1973 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद से चुनौती दी जा सकती। श्रीमती इंदिरा गांधी मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ के निर्णय को और बावन राव बनाम भारत संघ के वाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को शून्य करना चाहती थीं। पर न कर सकीं और 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या हो गई। तब से आज तक किसी कि हिम्मत नहीं हुई कि वह उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय को संविधान संशोधन कर पलट सके। आज सुप्रीम कोर्ट संसद से भी ऊपर तब तक है जबतक संसद मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संविधान संशोधन कर शून्य घोषित नहीं करती या उच्चतम न्यायालय की 13 न्याधीधीशों से बड़ी बेंच इसे खारिज नहीं करती। इस तरह लोगों की नाराजगी से बेपरवाह रहकर दोनों ने गरीब जनता के हित में ढेर सारे काम किये। आज देश की पूरी जनता नेहरू,इंदिरा से नाराज है। उनका नाम लेना भी पसंद नहीं करती। हालांकि दोनों ने बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान नहीं दिया। जिसका खामियाजा आज उनको भुगतना पड़ रहा है। जबकि ऐसे ऐसे लोगों को उनके सामाजिक काम के लिए भारत रत्न का सम्मान दिया जो बाबासाहेब डा अम्बेडकर के सामाजिक कार्य के सामने कहीं नहीं ठहरते।

दूसरी तरफ लाख विरोध के बावजूद देशहित समाजहित में नेहरू, गांधी ने बाबासाहेब के आरक्षण प्रस्ताव को माना। उनको भारत के संविधान का शिल्पी बनाया। यह भारत के इतिहास की एक बड़ी घटना है। बाबासाहेब को भारत रत्न का सम्मान क्यों नहीं दिया? यह एक बड़ा प्रश्न है। पर इसको ऐसे समझा जा सकता है। वीपी सिंह ने 52.5% ओबीसी को 27% आरक्षण दिया और बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान दिया तो पूरा देश नाराज हो गया। वीपी सिंह देश का कलंक बन गये। इससे पहले जनता की दृष्टि में देश की तकदीर थे। उनकी राजनीति मर गई। यही काम नेहरू और इंदिरा भी करते तो देश का कलंक ही होते। जो हाल वीपी सिंह का हुआ वही हाल इनका भी होता। करने वाले भी एससी-एसटी ओबीसी के ही लोग होते। जैसा वीपी सिंह के साथ किये। आज नेहरू और इंदिरा का राजनीतिक जीवन भी उसी कागार पर है। आखिर इसकी वजह क्या हो सकती है? मेरे समझ में तो बस इतना ही आ रहा है कि देश खुशहाल रहता,जैसा आज मोदी राज में खुशहाल है। यदि नेहरू और इंदिरा जी भी वही करते जो आज मोदी जी कर रहे हैं। लेकिन तब देश कहां रहता? वहीं रहता जहां 75 वर्ष पहले था। देश में जमींदारी प्रथा थी। सब जमींदारों की जमीन में बसे थे। कई गांव ढुंढ़ने पर भी कोई चिट्ठी बांचने वाला नहीं मिलता था। अशिक्षा का आलम ये था। नेहरू ने शिक्षा को आगे बढ़ाया । हाई स्कूल किसी तरह से पास किया नहीं की नौकरी मिल गई। बीए एमए पास करते ही नौकरी मिल जाती थी। आज पीएचडी और एमटेक करने के बाद भी नौकरी नहीं मिल रही है। शिक्षा भी महंगी कर दी गई है। आज उनको नेहरू, इंदिरा का काम दिख नहीं रहा है। देश हर क्षेत्र में कितना प्रगति किया है। मेरी समझ से इसका श्रेय गांधी, नेहरू, अंबेडकर और इंदिरा को ही जाता है। संविधान तो तब भी था। आज भी है। क्या आज संविधान का मतलब कुछ दिख रहा है? इतनी समाज में जागरूकता है। फिर भी कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। उस समय तो और भी कुछ नहीं कर पाते। इतनी अशिक्षा थी। बाबासाहेब तो सन् 1956 में दुनिया छोड़कर चले गये। कल्पना करिये जैसे आज मोदी जी संविधान लागू कर रहे हैं वैसे ही नेहरू,इंदिरा भी लागू करते तो क्या होता? कोई एससी-एसटी ओबीसी का नौकरियों में शिक्षा में कहीं दिखाई देता ? नहीं दिखाई देता। मेरा मानना है,अगर किसी ने कुछ उपकार किया है तो उसे मानना चाहिए। किन परिस्थितियों में किया है? कैसे किया? इसका भी संज्ञान लेना चाहिए। हमने कितनी आवाज उठाया। यह भी देखना चाहिए। नेहरू, इंदिरा दोनों ने इस देश के बंचित समाज को आगे बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया। नेहरू, इंदिरा को न मानने वाले और अपने को अंबेडकरवादी कहने वाले बामन मेश्राम जैसे लोग कभी समाजवादी अर्थव्यवस्था का नाम नहीं लेते। बाबासाहेब स्टेट सोसलिज्म चाहते थे ताकि देश में सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में एक व्यक्ति एक मूल्य स्थापित किया जा सके। नेहरू इंदिरा दोनों ने कुछ हद तक समाजवादी अर्थव्यवस्था पर चलने का काम किया। पूरी तरह समाजवादी अर्थव्यवस्था पर क्यों नहीं चले? यह सबके लिए जानने का विषय है। पर यदि वो नहीं चले तो वे चल के दिखाएं जो नेहरू इंदिरा का विरोध कर रहे हैं? ओबीसी और दलित नेता सत्ता का जूठन चाटने के लिये जिस तरह मोदी का तलुआ चाटकर विधायक , सांसद बनने के लिये जय श्रीराम का गायन वादन कर रहे हैं , आज बाबा साहब होते तो सुसाईड कर लेते।. ओबीसी आरक्षण को मुद्दा बनाकर कांशीराम साहब की पार्टी यूपी में सत्ता में आई। पांच साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई। अपने को समाजवादी कहने वाले मुलायम ने भी पांच साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई। पर दोनों ने ओबीसी को उनकी आबादी के बराबर 52.5% आरक्षण नहीं दिया। चलो, जवाहरलाल, इंदिरा ने नहीं दिया। आप तो दे देते। यूपी में ही दे देते , कौन रोका था ? कोई सवाल करने वाला नहीं है कि क्यों नहीं दिया? तमिलनाडु सरकार ने अपने राज्य में 69% आरक्षण दे दिया। आपके लिए तो उदाहरण भी था। आज एस सी और ओबीसी दोनों के प्रबुद्ध वर्ग में भगवान परशुराम का भव्य मंदिर बनाने की होड़ मची हुई है। लगता है, इसी से गरीब जनता को भोजन वस्त्र नौकरी जमीन सब मिल जायेगी। दोनों ने सामान्य वर्ग के गरीब लोगों के लिए 10% आरक्षण संविधान में कोई प्रावधान न रहते हुए भी, रातों-रात प्रावधान बनवाकर दिलवा दिया। पर अपना नहीं ले पाये। 52.5% ओबीसी को वीपी सिंह ने सिर्फ 27.5% आरक्षण दिया तो देश में हंगामा हो गया। 10%,के विरोध में कोई हंगामा नहीं हुआ। यही इनकी जागरूकता का पैमाना है। एकाद बार ब्राह्मणों ने इन दोनों की सरकार बनवा दी तो ये समझ रहे हैं कि हर बार बनवा देंगे। ये नहीं समझ रहे हैं कि इनकी वह रणनीति बहुजन मूवमेंट को धराशाई करने के लिए बनाई गई थी। और ये उसमें सफल भी हुए। इनके हर कार्य अपने सामाजिक सम्मान और धन के विशाल भंडार को कायम रखने के लिए ही होते हैं। यह कितनी बड़ी बुद्धिमत्ता का काम है कि उसी का मूवमेंट उसी के अगुआ से चकनाचूर करा दिया। और उसके प्रबुद्ध वर्ग को पता भी नहीं चला। ऐसी मिसालें कम देखने को मिलती हैं। 
भाजपा ने ओबीसी के अंतर्गत आने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की 600 फीट ऊंची प्रतिमा 3643.78 करोड़ की लागत से लगायी। लगाने वाले भी ओबीसी के हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी। भाजपा की दृष्टि में सरदार पटेल में ऐसी क्या खास खूबी थी कि उनकी प्रतिमा के पीछे भारत सरकार का इतना राजस्व खर्च किया? और जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को कोई तवज्जो नहीं दिया? जबकि दोनों ही उच्च वर्ग से थे और उच्च वर्ग को खुश रखने के लिए ही ओबीसी को आरक्षण नहीं दिया और डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान नहीं दिया। सब यही जानते हैं कि सरदार पटेल जैसी शख्सियत ने पूरे भारत की 527 से भी अधिक रियासतों को भारत में मिलाया।‌ वह भारत की एकता अखंडता के लिए राष्ट्र पुरुष हैं। इसलिए उनकी प्रतिमा लगाई गई है। मैंने बहुत से पिछड़े वर्ग का संगठन चलाने वाले लोगों के भाषणों में सुना है कि जब देश आजाद हुआ तो आजाद भारत का प्रधानमंत्री बनने की होड़ में बहुत से नेता थे। उनमें सरदार बल्लभभाई पटेल,अब्दुल कलाम आजाद, पट्टाभि सीतारमैया, जेबी कृपलानी और जवाहरलाल नेहरू थे। संघियो द्वारा जोर शोर से प्रचारित करते हुये यह भी सुना है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का एक भी सदस्य पं.जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए सहमत नहीं था। पटेल के नाम पर सब सहमत थे। उनको पीएम के रूप में देखना चाहते थे। क्योंकि जो कांग्रेस का अध्यक्ष होता वही भारत का भावी प्रधानमंत्री भी होता। मेरे मन में एक सवाल पैदा हुआ कि आखिर क्यों पं.जवाहर लाल नेहरू के पक्ष में एक भी कार्यसमिति का सदस्य नहीं था? जबकि वह ब्राह्मण कुल से थे। देखिये, यहां ब्राह्मणों के लिए जातीय नेता महत्त्वपूर्ण नहीं। सामाजिक हित महत्वपूर्ण है। कांग्रेस कार्यसमिति के 15 में से 12 सदस्य सरदार बल्लभभाई पटेल के पक्ष में थे? जबकि वह कुर्मी ओबीसी समुदाय से थे। क्या पटेल भारत में पूंजीवाद स्थापित करना चाहते थे? इसीलिए कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्य पटेल के पक्ष में थे। ताकि उनकी रियासतें उनकी जमींदारी कायम रहे? जवाहरलाल नेहरू समाजवादी व्यवस्था चाहते थे। इससे सबको अपनी जमीन और रियासत जाने का भय था? इसीलिए नेहरू के पक्ष में कार्यसमिति का एक भी सदस्य नहीं था? क्या इसीलिए बीजेपी सरदार पटेल की इतनी ऊंची प्रतिमा खड़ी की है ताकि बीजेपी को उसकी पूंजीवादी व्यवस्था को बल मिले? गांधीजी क्यों पं.जवाहरलाल नेहरू को ही आजाद भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे? क्या पं. नेहरू गांधी के रिश्तेदार थे, जाति के थे , क्या थे? जिनके पक्ष में कार्य समिति का एक भी सदस्य नहीं था। वे पटेल को क्यों नहीं प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे जबकि उनके पक्ष में कार्यसमिति के सारे सदस्य थे? क्या उनको इस बात का अंदेशा था कि उनके पीएम होने से पहली बात देश पूंजीवादी ढर्रे पर चल देगा और दूसरी बात डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाना मुश्किल होगा क्योंकि पटेल नहीं चाहते थे कि अंबेडकर संविधान सभा में आयें। गांधीजी देशहित में बाबा साहेब अंबेडकर को संविधान सभा में लाना आवश्यक समझते थे। अगर पटेल प्रधानमंत्री होते तो क्या डाक्टर अंबेडकर संविधान सभा में जा पाते? संविधान में एससी-एसटी ओबीसी के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करा पाते? पिछड़े वर्ग के कुछ लोग कहते हैं कि गांधीजी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री न बनाकर उनके साथ अन्याय किया। पिछड़े वर्ग के इन लोगों को जान लेना चाहिए कि अगर पटेल प्रधानमंत्री हो गये होते तो जो पूंजीवाद 1991 से और 2014 से प्रारंभ हुआ वह 1950 से ही प्रारंभ हो गया होता और संविधान में न तो पिछड़ा वर्ग होता न आरक्षण होता। मान लिजिए गांधी जी उनको प्रधानमंत्री बना देते तो क्या जवाहरलाल नेहरू उनको प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लेते? नहीं करते तो क्या होता? इस झगड़े में आजादी की बात कुछ और दिन नहीं टल जाती? मान लिजिए कि नेहरू जी मान जाते और सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के प्रधानमंत्री बन जाते तो क्या डा.अंबेडकर को संविधान सभा में आने देते? क्योंकि राष्ट्रीय कार्यसमिति के सारे सदस्य तो उनके साथ थे। यदि नहीं आने देते तो आजाद भारत का स्वरूप कैसा होता? डाक्टर अंबेडकर ने पहले ही कह दिया था कि देश को यह जान लेना चाहिए कि जब देश और अस्पृश्यों के हित आपस में टकरायेंगे तो मैं देश हित के साथ खड़ा न होकर अस्पृश्यों के हित के साथ खड़ा होऊंगा। (धनंजय कीर की किताब पृ.313) ऐसी स्थिति में यदि डाक्टर अंबेडकर की बात न मानी जाती तो देश का एक और विभाजन तय नहीं था? फिर देश की अखंडता के लिए पटेल द्वारा 527 रियासतों के एकीकरण का क्या मतलब होता यदि पटेल की ही वजह से देश का एक और विभाजन हो जाता? एससी के कुछ लोग कहते हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीय नेताओं को चेतावनी दिया था और कहा था कि जिस संविधान को डा अम्बेडकर नहीं मानेंगे उस संविधान को हम स्वीकार नहीं करेंगे। पर ऐसा कुछ तो कहीं नहीं मिलता। ब्रिटिश हुकूमत ने तो अप्रैल 1946 में ही कह दिया था कि हम अछूतों को भारत की आज़ादी में रोड़ा नहीं बनने देंगे। (धनंजय कीर की किताब,"डाक्टर बाबासाहेब अंबेडकर जीवन चरित" पृ.358) । फिर यह बात कहां से आ गई कि एटली ने कहा था कि हम उसी संविधान को मान्यता देंगे जो अंबेडकर की सहमति से बनकर आयेगा? यह भी देखने वाली बात है कि जो ब्रिटिश हुकूमत 1944 में कह रही थी कि जब हम भारत छोड़कर जायेंगे तो तीन पक्ष होंगे हिन्दू, मुस्लिम और अस्पृश्य। वही सरकार दो वर्ष बाद 1946 में बदल कैसे गई और कह रही है कि हम अछूतों को भारत की आजादी में रोड़ा नहीं बनने देंगे? जब बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर बंगाल से संविधान सभा के लिए चुन लिए गये तो वे अक्टूबर 1946 में ब्रिटेन जाकर एटली और भारत मंत्री दोनों से मिलकर अपनी बात रखी। फिर सैमुअल होर से विचार-विमर्श किया। हुजुर दल की भारत समिति की एक बैठक आयोजित की। उसमें अपना भाषण दिया और अपनी मांग रखा पर सबने उनकी बात को अनसुनी कर दिया। सिर्फ इतनी सलाह दिया कि परिवर्तित परिस्थिति के साथ मिलजुल कर संविधान समिति में कुछ करना हो तो किया जाय। ये बाबासाहेब अंबेडकर के लिए निराशाजनक उत्तर थे। इस तरह निरूत्साहित मन से बाबासाहेब डा अंबेडकर को भारत लौटना पड़ा। (धनंजय कीर की पुस्तक पृ 365)। भारत पाक बंटवारे में वह सदस्यता भी चली गई। कैसे गई? फिर क्या हुआ कि जून 1947 में गांधी जी और जवाहरलाल ने ही आपसी विचार-विमर्श के बाद कांग्रेस के सभी श्रेष्ठ नेताओं जैसे पटेल, डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, आदि को विश्वास में लेकर बाबासाहेब डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाने का प्रबंध किया और लाया,उनके आरक्षण संबंधी प्रस्ताव को माना। उन्हें संविधान की प्रारूप कमेटी का चेयरमैन बनाया। और भारत का प्रथम कानून मंत्री बनाया। यह एक प्रश्न तो है ही कि आखिर कांग्रेस के इन नेताओं के सामने कौन सी ऐसी मजबूरी आ गयी कि उनके न चाहते हुए भी और ब्रिटिश हुकूमत का दबाव न होते हुए भी बाबा साहब डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाना पड़ा। उन्हें संविधान का शिल्पी बनाना पड़ा। आज भी उच्च वर्ग द्वारा आरक्षण का विरोध हो रहा है और डाक्टर अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं। लेकिन क्यों गांधी जी ने अपने धुर विरोधी डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में लाने के लिए नेहरू को अपनी स्वीकृति दिया? क्यों उनकी शर्तों को मानने के लिए कहा? जबकि वे खुद भी आरक्षण के विरोधी थे। ब्रिटिश हुकूमत ने भी डाक्टर अंबेडकर की मांग पर निराशाजनक ही रूख अख्तियार किया था। उनका भी दबाव नहीं था। क्या यह जानने समझने का विषय नहीं है कि गांधी जी और जवाहरलाल कैसे इतनी जल्दी बदल गये और पूरी कांग्रेस कार्यसमिति डाक्टर बाबासाहेब आंबेडकर को संविधान सभा में लाने के लिए सहमत हो गयी? संविधान को सर्वसम्मति से पारित किया। संविधान सभा का डिबेट पढ़ने से भी पता चलता है कि कांग्रेस के अधिकांश सदस्य आरक्षण को संविधान में नहीं रखना चाहते थे। उदाहरण के लिए श्री पी सीतारमैया का कथन कोट किया जा सकता है। यह भी प्रधानमंत्री की पंक्ति में खड़े थे। उनका कथन था अंत में हमें एकाएक इस संविधान सभा को अनेक वर्गों और समूहों के साथ अपनाना पड़ा। बहुत मूल्य चुका कर हमने इन वर्गों और समूहों से पीछा छुड़ाया था। (संविधान सभा का डिबेट पृ..4171)। 
इस लेख में मैंने ढेर सारे सवाल किये हैं जिनके उत्तर अगली पोस्ट में जानने का प्रयास करेंगे। पर मेरे इस तरह की पोस्ट लिखने की वजह क्या है? वजह यह है कि जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने अपने शासनकाल में उच्च वर्ग के साथ समायोजन करते हुए एससी-एसटी ओबीसी का बहुत कुछ विकास किया। इसमें कोई दो राय नहीं। पर पिछड़े समाज को पता नहीं हो पा रहा है कि कैसे तमाम विरोधों का सामना करते हुए नेहरू और इंदिरा गांधी ने कमजोर वर्ग का इतना विकास किया। किनके दबाव में नेहरू और इंदिरा गांधी ने ओबीसी को आरक्षण नहीं दिया। डाक्टर अंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान नहीं दिया। यह कब तक पता चलेगा और कब तक उनके दबाव में सरकारें चलती रहेंगी? कब तक कट्टरपंथी उच्च वर्ग की विचारधारा में परिवर्तन आयेगा और कैसे आयेगा? क्या सभी राजनीतिक पार्टियां इसी कट्टरपंथी उच्च वर्ग के दबाव में काम करती रहेंगी या कभी पिछड़े वर्ग के दबाव में भी काम करेंगी? वह समय कब आयेगा? पिछड़े वर्ग के प्रबुद्ध वर्ग से यह मेरा सवाल है। भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि कट्टरपंथी उच्च वर्ग कभी किसी नेता या राजा का पिछलग्गू नहीं रहा। सबको अपने पीछे चलाता रहा। कट्टरपंथी उच्च वर्ग को विश्वास में लेकर ही कोई शासक शासन कर सका। नेहरू इंदिरा ने भी यही किया। मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है कि कब तक पिछड़ा वर्ग का प्रबुद्ध अपने जातीय नेताओं के पीछे चलता रहेगा। उनकी चमचागिरी करता रहेगा। एक लाइन में कहें तो पिछड़े वर्ग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश का शासक कोई भी हो उसे अब पिछड़े वर्ग के दबाव में काम करना होगा। अन्यथा वह शासक नहीं रह पायेगा। तभी उच्च वर्ग की भी विचारधारा बदलेगी और देश तरक्की पर जायेगा। मैं क्यों बार बार पिछड़ा वर्ग इस्तेमाल कर रहा हूं। गरीब शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं। क्योंकि गरीब शब्द का इस्तेमाल करने में भी जाति दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। एक होने नहीं देती। गरीब कहने से लोगों को सारे गरीब उच्च वर्ग में ही दिखाई देंगे। पिछड़े वर्ग में एक भी गरीब नहीं दिखेगा। पूंजीपति चाहे उच्च वर्ग का हो या पिछड़े वर्ग का, सबकी सोच एक है पूंजीवाद। उनमें जाति बीच में दीवार नहीं बनती। इससे स्पष्ट दिखाई देता है कि उच्च वर्ग का प्रबुद्ध अपने सामाजिक हित के प्रति कितना सचेत है और पिछड़े वर्ग का प्रबुद्ध अपने समाज के हित के प्रति कितना अचेत है। 

(सनेही लाल) 


मंजर जैदी / भारत के वह ऐतिहासिक स्थल जो अब पाकिस्तान में हैं. (17)

ऐतिहासिक मासूम शाह मीनार, सक्खर ~

सक्खर में अभी भी हमारी उन मौसी की एक पुत्री रहती हैं जिनके घर 1970 में सक्खर आया था। अतः बैराज से लौटने के पश्चात हम उनके घर पहुंच गए। वहां  अन्य संबंधियों से भी मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। अभी शाम नहीं हुई थी अतः उन्होंने सुझाव दिया कि सक्खर शहर में मासूम शाह ऐतिहासिक मीनार है, अतः आज के दिन का पूर्ण उपयोग किया जाए। हम सब तीन कारों में भरकर लगभग आधे घंटे में मारवाड़ी मोहल्ले में स्थित मीनार पर पहुंच गए।  मीनार के बारे में वहां बताया गया कि इसका निर्माण 1607 ईस्वी में सैयद निजामुद्दीन, जो मासूम शाह के नाम से प्रसिद्ध हैं, ने कराया था। इसके निर्माण में लगभग 20 वर्ष लगे। मासूम शाह डॉक्टर के साथ-साथ इतिहासकार भी थे। उन्होंने 'तारीखे सिंध' के शीर्षक से सिंध के इतिहास पर किताब लिखी जो 1620 में में प्रकाशित हुई। वह बादशाह अकबर के विश्वास पात्र अफसर थे तथा उनके द्वारा 1595 ईस्वी में पन्नी अफ़ग़ान  से युद्ध के समय बादशाह की फौज का नेतृत्व किया गया था। जिसमें वह विजयी हुए थे और अफगानिस्तान, अकबर के शासन के नियंत्रण में आ गया था। इसके फलस्वरूप उन्हें 1598 में सिंध का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया था। उसी के पश्चात उनके द्वारा यह मीनार बनवाई गई थी। 

मीनार लाल ईटों की गोलाकार में है जिसके ऊपर गुंबज बनाया गया है। मीनार की ऊंचाई और गोलाई 84 फुट है और इसमें ऊपर जाने के लिए गोलाई में 84 सीढ़ियां बनाई गई है अतः इसमें 84 अंक का विशेष महत्व है, परन्तु इसका कारण झात नहीं हो सका। वहां उपस्थित एक व्यक्ति ने बताया कि मीनार के ऊपर से समस्त शहर को देखा जा सकता है। उसने बताया कि सरकार द्वारा उचित ध्यान न दिए जाने के कारण मीनार क्षतिग्रस्त हो रही है। इसके अतिरिक्त इसके आस पास बहुत सी बिल्डिंग्स बन जाने के कारण इसकी सुंदरता कम हो गई है। उसने यह भी बताया कि मीनार के परिसर में मासूम शाह और उनके परिवार के सदस्यों की कबरें हैं।  हमने वहां के कुछ फोटोग्राफ लिए। 

मीनार देखने के बाद जब हम वापस चले तो हमारे संबंधियों ने हमसे पूछा कि यह मीनार आपको कैसी लगी। हमने कहा कि अच्छी है परंतु दिल्ली में बनी कुतुब मीनार की तुलना में कुछ नहीं है बल्कि यह समझें कि यह उसका एक बच्चा है। हमारे यह बताने पर उन्हें कुतुब मीनार के विषय में जानने की उत्सुकता उत्पन्न हुई। क्योंकि वे सब विभाजन के पश्चात पाकिस्तान में पैदा हुए थे तथा उन्होंने  कुतुब मीनार नहीं देखी थी। हमने उन्हें बताया कि कुतुब मीनार की ऊंचाई मासूम शाह मीनार की ऊंचाई 84 फुट की तुलना में 238 फुट है अर्थात लगभग 3 गुना  ऊंची है। इसी प्रकार कुतुब मीनार की धरातल पर गोलाई 146 फुट है जबकि मासूम शाह मीनार की गोलाई मात्र 84 फुट है। कुतुब मीनार का निर्माण मासूम शाह मीनार से लगभग 300 वर्ष पूर्व हुवा है। इसके अतिरिक्त कुतुब मीनार  ईंटों से बनी विश्व की सबसे ऊंची मीनार है तथा तीन विश्व धरोहर में से एक है। 

हमारे तुलनात्मक विवरण को सुनने के पश्चात उनके दिल में कुतुब मीनार के बारे में और अधिक जानने की इच्छा पैदा हुई। हमने उन्हें आगे बताया कि कुतुब मीनार का निर्माण 1193 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के संस्थापक और गुलाम वंश के पहले सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने आरंभ कराया था। इस पर हमारे एक भाई कहने लगे, क्या इसीलिए इसका नाम कुतुब मीनार है? हमने कहा नहीं कुतुब मीनार एक बुजुर्ग सुफी कुतुबुद्दीन बख्तियार काफी की याद में बनाने के कारण इसका नाम कुतुब मीनार पड़ा। परंतु केवल भूतल तथा प्रथम तल बनवाने के पश्चात कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई थी तथा उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी इल्तुतमिश के द्वारा इसके द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ तलो का निर्माण कराया गया। 

अंत में अंतिम और पांचवें तल का निर्माण 1368 ईस्वी में फिरोज शाह तुगलक के द्वारा कराया गया। इसके हर तल पर झरोखे बने हैं। तीसरी मंजिल के झरोखे से आसपास का सुंदर नज़ारा दिखाई देता है। हम से प्राप्त जानकारी से वे सभी प्रभावित हुए। वापसी में कुछ देर एक बाज़ार में रुके। वहां बहुत भीड़ थी और काफी रौनक थी। यहां चौराहे पर अति सुंदर घंटाघर बना था जिसके कारण इसे घंटाघर बाज़ार कहते हैं। यहां सक्खर की मशहूर खजूरें भी मिल रही थीं। उन्होंने ने बताया कि सक्खर के आसपास खजूरों के बहुत बड़े बड़े बाग़ हैं। सक्खर पाकिस्तान के एतिहासिक एवं बड़े शहरों में गिना जाता है। यहां पर बेगम नुसरत भुट्टो के नाम से हवाई अड्डा भी है। समय अधिक हो गया था अतः हम सब मौसी की पुत्री के घर वापस आ गए। 

रात को खाना खाने के पश्चात सब एक जगह एकत्रित हो गए। अब तक पाकिस्तान में जो एतिहासिक और पर्यटक स्थल हमने देखे थे उनके विषय में चर्चा होने लगी। कुछ ही देर में बहस इस पर आरंभ हो गई कि पाकिस्तान अच्छा है अथवा हिंदुस्तान। वह पाकिस्तान की अच्छाइयां गिनवाते रहे और हम अपने देश भारत की अच्छाइयां गिनवाते रहे। बहस का अंत ना होते देखकर हमने कहा कि तुलना बराबर वाले से की जाती है। भारत के सामने पाकिस्तान का कोई अस्तित्व नहीं है। हमारे एक राज्य उत्तर प्रदेश के बराबर भी नहीं है। दूसरे हमारा देश आत्मनिर्भर है जबकि पाकिस्तान में बहुत-सी वस्तुएं दूसरे देशों से आयात की जाती हैं। अगले दिन सुबह क्योंकि मोहनजोदाड़ो के लिए प्रस्थान करना था अतः बहस को समाप्त करके सब सोने की तैयारी करने लगे।
(जारी) 

मंजर जैदी
© Manjar Zaidi

भारत के वह ऐतिहासिक स्थल जो अब पाकिस्तान में हैं. (16)
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Thursday, 28 July 2022

बढ़ता फ्रॉड और ऋण डिफॉल्ट, बैंकिंग सेक्टर के लिए घातक है / विजय शंकर सिंह

एक हैरान करने वाली खबर आई है कि, पिछले सात वर्षों में बैंकिंग धोखाधड़ी या घोटालों में भारत को हर दिन, कम से कम 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। हालांकि आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, इसमें शामिल कुल राशि में साल-दर-साल कमी भी आती गई है। लेकिन हर दिन औसतन, ₹100 करोड़ का फ्रॉड बैंको का होता रहा है। यह तब है, जब बैंको का यह दावा है कि, उन्होंने फ्रॉड न हो, इसके लिए सारे जरूरी उपाय कर रखे है। यह साइबर ठगी उन लोगों के लिए, बेहद बुरी खबर है जो कंप्यूटर, सिस्टम, डिजिटल बैंकिंग, नेट बैंकिंग आदि शब्दों और तकनीक से उतने परिचित नहीं हैं, जितने की उन्हे होने चाहिए। फ्रॉड की यह संख्या, एक सामान्य बैंकिंग उपभोक्ता को अक्सर भय और आशंका से ग्रस्त रखती है। 
 
फ्रॉड के सबसे अधिक मामले, देश की वित्तीय राजधानी, कहे जाने वाले शहर मुंबई, महाराष्ट्र से हैं, जहां कुल फ्रॉड का 50 फीसदी धन, इन घपलों में बैंको का गया है। इसके बाद दिल्ली, तेलंगाना, गुजरात और तमिलनाडु राज्य आते है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि, इन पांच राज्यों ने कुल मिलाकर 2 लाख करोड़ रुपये यानी, 83 फीसदी से अधिक की वित्तीय धोखाधड़ी, से नुकसान पहुंचा है। साल 1 अप्रैल 2015 से लेकर गत वर्ष, 31 दिसंबर 2021 के बीच, राज्यों में ₹2. 5 लाख करोड़ रुपये की बैंकिंग धोखाधड़ी का पता चला है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी कहा है कि, त्वरित रिपोर्टिंग और रोकथाम के लिए किए गए उपायों से, साल दर साल क्रमशः, धोखाधड़ी की घटनाओं में कमी भी आई है। 

आरबीआई, बैंकिंग धोखाधड़ी को आठ श्रेणियों में वर्गीकृत करता है। वे हैं, 
1. दुर्विनियोजन और आपराधिक विश्वासघात;
2. जाली चेक/दस्तावेजों के माध्यम से धोखाधड़ी से नकदीकरण, 
3. खाते की पुस्तकों में हेरफेर या काल्पनिक खातों के माध्यम से और संपत्ति का रूपांतरण करके,
4. इनाम या अवैध परितोषण के लिए प्रदान की गई अनधिकृत ऋण सुविधाएं;
5. लापरवाही और नकदी की कमी;
6. धोखाधड़ी और जालसाजी; 
7.  विदेशी मुद्रा लेनदेन में अनियमितताएं और 
8. किसी अन्य प्रकार की धोखाधड़ी जो ऊपर दिए गए विशिष्ट शीर्षों के अंतर्गत नहीं आती हैं।
अब इन श्रेणियों में अलग अलग कितना फ्रॉड हुआ है, इसका कोई ब्रेकअप आरबीआई ने उपलब्ध नहीं कराया है।

जितने घपले होते हैं, उनमें भी अधिकाश वे ही घपले हैं, जो बैंकों के आपसी और अंदरूनी प्रशासन से संबंधित हैं। नेत्रिका कंसल्टिंग, जो बैंकिंग मामलो में एक कंसलटेंसी एजेंसी है, के प्रबंध निदेशक संजय कौशिक, जिनके ग्राहकों में, बैंक भी शामिल हैं, ने बैंकिंग फ्रॉड के स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए कहा है, 'बैंक धोखाधड़ी रोकने के लिए जितना उपभोक्ताओं और खाताधारकों को सचेत करते हैं, उतनी सतर्कता वे अपने अंदरूनी प्रशासनिक तंत्र पर नजर रखने में नहीं ध्यान देते हैं। जबकि बड़े घपले, कर्ज, देने के की गई औपचारिकताओं, और लापरवाही के कारण होते हैं। खासकर बड़े अग्रिम और ऋण से निपटने के दौरान बैंक, अक्सर उतने सतर्क नहीं रहते हैं, जितने वे छोटे और वेतनभोगी लोगों को कर्ज देने में रहते हैं। आंकड़े बताते हैं कि, बड़े कर्ज, डूबते भी हैं और उनके द्वारा हुए घपलों की राशि भी बड़ी होती है।  

संजय कौशिक यह भी कहते हैं, "बैंको में, एक ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जो जिम्मेदारी तय करे और ऐसे ऋणों को मंजूरी देने वालों को जवाबदेह बनाने की जरूरत है, क्योंकि इनमें धोखाधड़ी की बहुत संभावनाएं रहती है क्योंकि बड़े अग्रिम या ऋण, बिना जमानत के भी केवल नाम और ब्रांड पर भी प्रदान किए गए हैं।" बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक बहुराष्ट्रीय बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक, विकास गंगाधरन ने कहा है कि, "जिन मामलों में बैंकों के पास कोलैटरल रखे गए थे, वहां भी उनका कोई उचित जोखिम मूल्यांकन नहीं किया गया था।" कोलैटरल वह संपत्ति होती है, जिसे कर्ज देते समय बैंक, गारंटी के रूप में रखता है और कर्ज की अदायगी न होने पर वह उस संपत्ति को बेच कर अपना कर्ज पूरा करता है। विकास गंगाधरन, इसी विंदु को स्पष्ट कर रहे हैं कि 'अक्सर बैंक, ऐसे कोलैटरल का उचित जोखिम मूल्यांकन नहीं करते हैं और जब उस कोलैटरल का जोखिम मूल्य, दिए गए कर्ज से कम होता है तो, कर्ज डूबने या डिफॉल्ट होने पर, सारा नुकसान बैंक को झेलना पड़ता है।' इस घपले का कारण बैंक का अंदरूनी प्रशासन है न कि कोई साइबर ठग। आरबीआई के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है कि वह यह बता सके कि कोलेटरल घपले में कितने बैंको ने अपने अधिकारियों के खिलाफ ऐसे मामलों में दंडात्मक कार्यवाही की, जिन्होंने ऋण देने में कोलेटरल संपत्तियों के जोखिम मूल्यांकन में जानबूझकर घपला किया है।

बिजनेस इनसाइडर के अनुसार, विकास गंगाधरन, ने अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम में कर्ज देने वाली प्रक्रिया के बारे में बताया कि, 'अमेरिकी बैंकों में, उदाहरण के लिए, ऋण या अग्रिम का जोखिम मूल्यांकन नियमित रूप से, कुछ मामलों में हर दिन किया जाता है। भारतीय बैंकों में ऐसा नहीं होता है और मुझे लगता है कि इसके लिए, नियमित रूप से, एक सेल गठित कर के,  कुछ महत्वपूर्ण कर्ज या कर्जदारों को चिह्नित करके, ऐसे तंत्र विकसित किए जाने चाहिए।' यदि अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम की तर्ज पर, नियमित जोखिम मूल्यांकन का कोई तंत्र भारतीय बैंकों में विकसित हो जाय तो  इससे, यदि जो कुछ भी, गारंटी के रूप में कोलेटरल रख कर कर्ज लिया गया है और फिर जानबूझकर उसे चुकाने में आनाकानी यदि की गई है, तो बैंक के एनपीए भी कम होंगे और फिर उस कोलेटरल को बेच कर बैंक अपना ऋण वसूल भी सकता है। 

ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष वाई सुदर्शन ने, बढ़ते फ्रॉड पर यह भी कहा है कि, 'हालांकि, धोखाधड़ी की दर में गिरावट आ रही है, क्योंकि वित्तीय कदाचार में लिप्त लोगों को दंडित तो किया ही जा रहा है, साथ ही, इसे रोकने के लिए भी बहुत सारे उपाय किए जा रहे हैं।' वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, "एनपीए के पुराने स्टॉक सहित बेहतर पहचान और रिपोर्टिंग, धोखाधड़ी की जांच के लिए उठाए गए व्यापक कदमों के परिणामस्वरूप घटनाओं में तेज गिरावट आई है।" साल, 2015-16 में 67,760 करोड़ रुपये से, धोखाधड़ी में खोए गए धन की मात्रा 2016-17 में घटकर 59,966.4 करोड़ रुपये हो गई। इसके बाद के दो साल 45,000 करोड़ रुपये से कम रहे।  2019-20 में, यह संख्या और गिरकर 27,698.4 करोड़ रुपये और फिर 2020-21 में 10,699.9 करोड़ रुपये हो गई।  चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में यह राशि 647.9 करोड़ रुपये है।

भारतीय स्टेट बैंक, (एसबीआई) ने एक बार फिर उन कर्जदारों के नाम, सार्वजनिक, करने से इनकार कर दिया, जिन पर 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक का कर्ज है, यहां तक ​​कि अपने शेयरधारक के साथ भी, उसने यह सूचना साझा करने से मना कर दिया।  पिछले नौ वर्षों, वित्तीय वर्ष, 2013-14 से 2021-22 तक, SBI ने बड़े डिफॉल्टरों के ₹145,248 करोड़ रुपये से अधिक के खराब ऋणों को बट्टे खाते में डाल दिया है, जबकि उनसे केवल 13% से अधिक की वसूली ही हो पाई  है। एसबीआई, इस गोपनीयता पर, एक  सामाजिक कार्यकर्ता और शेयरधारक विवेक वेलंकर से, डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने पर कहा कि, 
"ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बैंक वैधानिक और नियामक दायित्वों के अधीन है, इसलिए मांगी गई जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता है।"

एसबीआई और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) द्वारा जानकारी साझा करने से इनकार करना आश्चर्यजनक है क्योंकि जब छोटे उधारकर्ताओं की बात आती है तो उन्हें गोपनीयता की कोई समस्या नहीं होती है।  सभी ऋणदाता नियमित रूप से समाचार पत्रों में व्यक्तिगत विवरण और चूक करने वाले छोटे उधारकर्ताओं की तस्वीरों के साथ वसूली विज्ञापन प्रकाशित करते हैं।  बड़े कर्जदारों या बड़े डिफॉल्टरों को तरह-तरह के बहाने से सुरक्षा दिया जाना चौंकाने वाला है।

विवेक वेलंकर सहित अन्य कई लोगों ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत कई आवेदन दायर किए हैं।  लेकिन, अब तक बैंकों ने 'ग्राहक डेटा की गोपनीयता' का हवाला देते हुए बड़े डिफॉल्टरों के नाम साझा करने से इनकार कर दिया है।  हो सकता है कि गोपनीयता का प्राविधान, केवल बड़े डिफॉल्टरों के लिए लागू हो, न कि छोटे उधारकर्ताओं के लिए, जिनके विवरण और तस्वीरें वसूली नोटिस के साथ समाचार पत्रों में दिखाई देती रहती हैं।

2020 में बड़े डिफॉल्टरों के नामों की सूची प्राप्त करने में विफल रहने के बाद, श्री वेलंकर ने एसबीआई की वार्षिक आम बैठक, से ठीक पहले इसकी जानकारी मांगी। उस समय, एसबीआई ने कुछ बड़े डिफॉल्टरों, आलोक इंडस्ट्रीज लिमिटेड, भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड, आईआरवीसीएल लिमिटेड और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड के नाम साझा किए थे। हालाँकि, 2021 में, भी एसबीआई, ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम अपने स्वयं के शेयरधारक के साथ साझा करने से इनकार कर दिया।  एक जवाब में, सहायक महाप्रबंधक और एसबीआई के कंपनी सचिव, शाम के ने, वेलंकर को बताया,
"चूंकि बैंक ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए वैधानिक और नियामक दायित्वों के तहत है, बैंक खाते को साझा करने की स्थिति में नहीं है या  ग्राहक-विशिष्ट जानकारी।"  
यह, एसबीआई के वही अधिकारी हैं जिन्होंने इस साल भी बड़े डिफॉल्टरों की सूची साझा करने से इनकार कर दिया है।  इसके अलावा, श्री शाम के ने 2013 से बैंक द्वारा 1 करोड़ रुपये और उससे कम के ऋण और वसूली के बारे में जानकारी देने से भी इनकार कर दिया। उन्होंने एक लिखित उत्तर में श्री वेलंकर को बताया, "बैंक द्वारा जानकारी को केंद्रीय रूप से एकत्रित और रखरखाव नहीं किया जाता है।"

इस प्रकार उपरोक्त आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि, असल समस्या बैंकिंग नीति और अंदरूनी प्रशासन में है और घपले भी, कर्ज स्वीकृति, कोलेटरल मूल्यांकन,  एनपीए या फिर डिफॉल्ट कर्जों में अधिक हुए है, और यह सब भी बड़े क्रजीदारो के साथ अधिक हुआ है न कि, अपनी निजी जरूरतों, आवास, कार, शिक्षा आदि के लिए कर्ज लेने वाले, सामान्य नागरिक द्वारा लिए जाने वाले कर्जों में। 

अब एक नजर इस विंदु पर डालते हैं कि बैंक कैसे अपने बड़े डिफल्टरों का बचाव करते हैं। मीडिया की एक खबर के अनुसार, भारतीय स्टेट बैंक, एसबीआई ने एक बार फिर से, उन कर्जदारों के नाम, सार्वजनिक, करने से इनकार कर दिया, जिन पर 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक का कर्ज है, यहां तक ​​कि अपने शेयरधारक के साथ भी, उसने यह सूचना साझा करने से मना कर दिया।  
पिछले नौ वर्षों, वित्तीय वर्ष, 2013-14 से 2021-22 तक, SBI ने बड़े डिफॉल्टरों के ₹145,248 करोड़ रुपये से अधिक के खराब ऋणों को बट्टे खाते में डाल दिया है, जबकि उनसे केवल 13% से अधिक की वसूली ही हो पाई  है। एक  सामाजिक कार्यकर्ता और शेयरधारक विवेक वेलंकर ने जब एसबीआई से, बड़े डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने के लिए कहा तो, एसबीआई ने इस अजीबोगरीब गोपनीयता पर यह उत्तर दिया कि, "ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बैंक वैधानिक और नियामक दायित्वों के अधीन है, इसलिए मांगी गई जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता है।" यानी बैंक ग्राहकों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए संकल्पित है और उसे इस संकल्प से कोई डिगा नहीं सकता है। कमाल है। 

एसबीआई और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा, ऐसी जानकारी साझा करने से इनकार करना आश्चर्यजनक है, क्योंकि जब छोटे उधारकर्ताओं या डिफाल्टर्स की बात आती है तो, यही बैंक गोपनीयता का संकल्प भूल जाते हैं, यही गोपनीयता, उनके लिए, कोई समस्या नहीं होती है।  सभी बैंक छोटे धनराशि के डिफाल्टर्स की, नियमित रूप से समाचार पत्रों में व्यक्तिगत विवरण और तस्वीरों के साथ वसूली विज्ञापन प्रकाशित करते हैं जबकि, बड़े कर्जदारों या बड़े डिफॉल्टरों को तरह-तरह के बहाने से सुरक्षा दी जाती है। 

विवेक वेलंकर सहित अन्य कई लोगों ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत कई आवेदन दायर किए हैं।  लेकिन, अब तक बैंकों ने 'ग्राहक डेटा की गोपनीयता' का हवाला देते हुए बड़े डिफॉल्टरों के नाम साझा करने से इनकार कर दिया है।  हो सकता है कि गोपनीयता का प्राविधान, केवल बड़े डिफॉल्टरों के लिए लागू हो, न कि छोटे उधारकर्ताओं के लिए, जिनके विवरण और तस्वीरें वसूली नोटिस के साथ समाचार पत्रों में दिखाई देती रहती हैं।

2020 में बड़े डिफॉल्टरों के नामों की सूची प्राप्त करने में विफल रहने के बाद, श्री वेलंकर ने एसबीआई की वार्षिक आम बैठक, से ठीक पहले इसकी जानकारी मांगी। उस समय, एसबीआई ने कुछ बड़े डिफॉल्टरों, आलोक इंडस्ट्रीज लिमिटेड, भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड, आईआरवीसीएल लिमिटेड और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड के नाम साझा किए थे। हालाँकि, 2021 में, भी एसबीआई, ने बड़े डिफॉल्टरों के नाम अपने स्वयं के शेयरधारक के साथ साझा करने से इनकार कर दिया।  एक जवाब में, सहायक महाप्रबंधक और एसबीआई के कंपनी सचिव, शाम के ने, वेलंकर को बताया,
"चूंकि बैंक ग्राहक डेटा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए वैधानिक और नियामक दायित्वों के तहत है, बैंक खाते को साझा करने की स्थिति में नहीं है या  ग्राहक-विशिष्ट जानकारी।"  
यह, एसबीआई के वही अधिकारी हैं जिन्होंने इस साल भी बड़े डिफॉल्टरों की सूची साझा करने से इनकार कर दिया है।  इसके अलावा, श्री शाम के ने 2013 से बैंक द्वारा 1 करोड़ रुपये और उससे कम के ऋण और वसूली के बारे में जानकारी देने से भी इनकार कर दिया। उन्होंने एक लिखित उत्तर में श्री वेलंकर को बताया, "बैंक द्वारा जानकारी को केंद्रीय रूप से एकत्रित और रखरखाव नहीं किया जाता है।"

बैंकिंग सेक्टर के सामने यह दो बड़ी चुनौतियां हैं, जिनसे पार नहीं पाया गया तो, बैंकिंग सेक्टर को तबाह होने से रोकना मुश्किल है। केंद्रीय बैंक और समस्त बैंको का नियामक होने के नाते रिजर्व बैंक की यह जिम्मेदारी है कि वह बैंकिंग सेक्टर में व्याप्त इन दो बड़ी समस्याओं का समाधान करे। बैंको को यदि लाभ भी बड़े कर्जदार और खाताधारक पहुंचाते हैं तो, उनका सबसे अधिक नुकसान भी यही उनके कर्ज डकार कर वे कर देते हैं। वित्तीय प्रबंधन किसी भी सरकार का मूल है, पर जिस तरह से वित्त के लगभग सभी क्षेत्रों में सरकार दिन प्रतिदिन विफल हो रही है, उससे तो अशनि संकेत ही दिख रहा है।

(विजय शंकर सिंह)


Wednesday, 27 July 2022

साख के संकट और विवादों के घेरे में, इन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट, ईडी / विजय शंकर सिंह

पिछले आठ सालों में, जिस तरह से सरकार ने, कुछ विशेषज्ञ जांच एजेंसियों को एक खास उद्देश्य से अनुकूलित किया है, उसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि, वे जांच एजेंसियां सरकार के बजाय, सत्तारूढ़ दल या बेहतर होगा यह कहें कि, एक विशेष कॉकस की कठपुतली बन कर रह गई है। राजनीतिक लाभ हानि के उद्देश्य से, जांच एजेंसियों का दुरुपयोग पहले भी होता रहा है, पर यह प्रवृत्ति पिछले आठ सालों में जिस तरह से एक एजेंडे के रूप में बढ़ी है, वह चिंतित करने वाली तो है ही, साथ ही जांच एजेंसियों की साख गिराने वाला भी एक कदम है। सरकार, और सत्तारूढ़ दल में अंतर होता है। सत्तारूढ़ दल और एक विशेष कॉकस यानी शिखर पर कुछ लोग जो यह तय करते हैं कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाइए, इसमें अंतर होता है। पर यह अंतर मिटता जा रहा है। आज जिस तरह से महत्वपूर्ण जांच एजेंसियों का दुरुपयोग केवल सरकार बनाने और गिराने के लिए किया जा रहा है, यह न तो लोकतंत्र के लिए शुभ है और न ही सरकार और एजेंसियों के लिए भी। 

जिन जांच एजेंसियों का सबसे अधिक, राजनीतिक कारणों से दुरुपयोग किये जाने की चर्चा है, उनमें एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट, यानी ईडी, यानी प्रवर्तन निदेशालय, सबसे पहले नंबर पर आता है, जिसके पास आर्थिक अपराधों की विवेचना करने की शक्ति होती है। दूसरे नंबर पर सीबीआई, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन है जिसके पास आपराधिक मामलों की जांच करने की शक्ति है, फिर एनआईए है जो आतंकी मामलों की जांच करने के गठित की गई है। सीबीआई के साथ, समस्या यह है कि, केंद्र सरकार, राज्यों के मामले, बिना राज्यों की अनुमति के, उसे सौंप नहीं सकतीं है, तो यहां उसके हांथ बंधे होते हैं। लेकिन ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय, जो मनी लांड्रिंग और धन के अवैध लेनदेन पर नजर रखने के लिए गठित है का प्रभाव त्वरित पड़ता है तो इसका राजनीतिक रूप से दुरुपयोग किए जानें की संभावना अधिक रहती है और, इसी को सरकार में बैठे कॉकस की धुन पर थिरकने के लिए बाध्य किया जा रहा है। 

प्रवर्तन निदेशालय या ईडी एक बहुअनुशासनिक संगठन है जो आर्थिक अपराधों और विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन की जांच के लिये गठित है। इसकी स्थापना 01 मई, 1956 को हुई थी, जब विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 (फेरा,1947) के अंतर्गत विनिमय नियंत्रण विधियों के उल्लंघन को रोकने के लिए एक प्रवर्तन इकाई, इन्फोर्समेंट यूनिट, का गठन का गया था। वर्ष 1960 में इस निदेशालय का प्रशासनिक नियंत्रण, आर्थिक कार्य मंत्रालय से राजस्व विभाग में हस्तांतरित कर दिया गया था। वर्तमान में, निदेशालय राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में है।

आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया के चलते फेरा,1973, जो कि, एक नियामक कानून था, उसे खत्म करके, उसके स्थान पर, 01जून, 2000 से, विदेशी मुद्रा अधिनियम,1999 फेमा लागू किया गया। बाद मे, एक नया कानून धन शोधन निवारण अधिनियम,2002 (पीएमएलए) बना और प्रवर्तन निदेशालय को दिनांक 01.07.2005 से पीएमएलए को इंफोर्स प्रवर्तित करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी। हाल ही में,विदेशों में शरण लेने वाले आर्थिक अपराधियों से संबंधित मामलों की संख्या में वृद्धि के कारण, सरकार ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 (एफइओए) पारित किया है और प्रवर्तन निदेशालय को 21 अप्रैल, 2018 से इसे लागू करने का दायित्व सौंपा गया है

ईडी ने पिछले आठ वर्षों में प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग ऐक्ट, पीएमएलए के अंतर्गत, 3,010 छापे मारे और ₹299,356 करोड़ के अपराध की आय को कुर्क किया. जबकि 2004 से 2014 तक, 112 छापे और ₹25,346 करोड़ अपराध की आय को कुर्क किया गया था। मनी लॉन्ड्रिंग मामलों की जांच के दौरान सबूतों के संग्रह के दृष्टिकोण से तलाशी एक महत्वपूर्ण कदम होता है। इस उल्लेखनीय तुलनात्मक वृद्धि का औचित्य बताते हुए, सरकार ने कहा, 
"खोजों की संख्या में वृद्धि, मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता और उपयोग के माध्यम से वित्तीय खुफिया जानकारी एकत्र करने के लिए बेहतर प्रणाली को दर्शाती है।  प्रौद्योगिकी, बेहतर अंतर-एजेंसी सहयोग और घरेलू और अंतरराष्ट्रीय सहयोगी दोनों तरह की सूचनाओं का आदान-प्रदान, पुराने मामलों में लंबित जांच को पूरा करने के लिए ठोस प्रयास और जटिल मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में जांच जिसमें कई आरोपी हैं जिन्हें कई खोजों की आवश्यकता होती है, की संख्या में वृद्धि के कुछ कारण हैं।"

इसी तरह, 2004-05 और 2013-14 के बीच संघीय एजेंसी द्वारा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के उल्लंघन के लिए केवल 8,586 जांच की गई, यह संख्या पिछले आठ वर्षों में बढ़कर 22,320 फेमा हो गई। 2004-05 और 2013-14 के बीच, 571 तलाशी की गई और फेमा के प्रावधानों के तहत 8,586 मामलों की जांच की गई जिसके परिणामस्वरूप 2,780 मामलों में एससीएनएस (कारण बताओ नोटिस) जारी किया गया और 1.312 एससीएनएस का अधिनिर्णय हुआ, जिससे 21.754 का जुर्माना लगाया गया। उस अवधि के दौरान केवल ₹14 करोड़ (लगभग) की संपत्ति फेमा के तहत जब्त की गई थी। सरकार ने यह भी कहा कि, "इस अवधि के दौरान देश भर की किसी भी अदालत ने एक भी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया।

ईडी के बारे में, सुप्रीम कोर्ट ने भी, कुछ जानकारी तलब की थी। उसी सिलसिले में, फरवरी 2022 में, एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने, सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि, 
"हालांकि प्रवर्तन निदेशालय ने 2011 में 1,569 जांच शुरू की थी और 1,700 छापे मारे थे पर  इसके द्वारा जांच किए गए केवल, नौ मामलों में ही सजा हो पाई है।" 
मेनका गुरुस्वामी ने जो दावा किया था, लगभग,  उसी की पुष्टि, 25 जुलाई 2022 को वित्त मंत्रालय ने भी की है। जेडीयू (यू) के सदस्य राजीव रंजन सिंह के एक प्रश्न के उत्तर में, सरकार ने बताया कि, 
"ईडी ने पिछले 17 वर्षों में, पीएमएलए,  (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट), 2002 के तहत 5,422 मामले दर्ज किया है। इसने 992 मामलों में अदालत में चार्ज शीट दायर की गई, लेकिन केवल 23 मामलों में ही, अभियुक्तों को दोषी ठहराया गया।"

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि, ईडी द्वारा छापे और पीएमएलए के मामले 1984 के बैच के आईआरएस अधिकारी संजय कुमार मिश्रा को आयकर विभाग से निदेशक के रूप में नियुक्त किए जाने के बाद अधिक बढे हैं। 2018 में निदेशक के रूप में, उन्हे नियुक्त किया गया था। उन्हें 18 नवंबर, 2022 तक, एक वर्ष के लिए सेवा विस्तार दिया गया था। इस अवधि के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने सत्तारूढ़ बीजेपी से जुड़े किसी भी नेता की शायद ही कभी जांच की, या राजनेताओं पर छापा मारा। ईडी द्वारा जिन राजनीतिक नेताओं की जांच की जा रही है, उनमें से, 95% राजनेता विपक्ष से हैं। 

इन आंकड़ों से यह भी स्पष्ट है कि, पिछले आठ सालों में ईडी की उपलब्धियां बढ़ी है और इसका कारण है आर्थिक अपराध के क्षेत्र के इसकी शक्तियां और अधिकारों का बढ़ना। पर साथ ही ईडी पर राजनैतिक रूप से काम करने, चुन चुन कर वर्तमान सरकार के विरोधियों के खिलाफ कार्यवाही करने, और विपक्षी सरकार गिराने और बीजेपी की सरकार बनाने के लिए घोषित बीजेपी के ऑपरेशन लोटस अभियान के एक महत्वपूर्ण अंग में, परिवर्तित हो जाने के आरोप भी, लगातार लग रहे हैं। जिस भी विपक्ष शासित प्रदेश में, ईडी की जांच शुरू होती है तो, यह बात हवा में तैरने लगती है कि, अब यहां सत्ता परिवर्तन का खेल शुरू हो गया है। इस तरह ईडी के अधिकारी लाख सफाई दें कि, यह उनकी रूटीन जांच है, पर उनकी इस सफाई पर बीजेपी के लोगों के अतिरिक्त शायद ही किसी को भरोसा होता हो। 

इनमें से कई जांच, छापे और गिरफ्तारियां, चुनाव से पहले ही की गई थीं, जिससे संदेह पैदा हुआ कि क्या 'स्वतंत्र' केंद्रीय एजेंसी, एक राजनीतिक एजेंडा के अंतर्गत काम कर रही है, या प्रोफेशनल रूप से अपने दायित्व और कर्तव्यों का निर्वहन कर रही है। कम सजायाबी के उल्लेख पर, ईडी का कहना है कि, वित्तीय अनियमितताओं को साबित करने में शामिल जटिलताओं के कारण सजा की दर कम है। कम सजायाबी का यह तर्क कि जटिलताओं के कारण सजा कम हो रही है, को स्वीकार कर पाना, थोड़ा कठिन लगता है क्योंकि, ईडी का गठन ही जटिल आर्थिक अपराधों की जांच के लिए किया गया है, न कि, सरकार के इशारे पर, विपक्षी दलों के नेताओं का शिकार करने के लिए हांका करने के लिए। फिर जटिलता भरे मामलो की जांच करने और सजा दिलाने के लिए ही तो ईडी का गठन हुआ है और उसे, ऐसे मामलों में विशेषज्ञता हासिल भी है। ईडी को बिना किसी राजनीतिक डिक्टेशन के अपना काम करना चाहिए। पर ऐसा होता दिख नहीं रहा है। 

यह तर्क दिया जा सकता है कि ईडी ने जिन विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ  कार्यवाही की है, वे सभी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं और उनके यहां से आर्थिक अपराध के प्रमाणिक सुबूत मिले हैं। ईडी का यह कहना सही भी है तो, यहीं यह सवाल उठता है कि, क्या ईडी, आर्थिक अपराध, मनी लांड्रिंग आदि से जुड़ी, जो इंटेलिजेंस जुटाती है, तो वे सारी सूचनाएं विपक्षी नेताओं की ही होती हैं या बीजेपी के नेताओं की भी कोई जानकारी उसके पास है ? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि, पिछले आठ सालों में, क्या ईडी को एक भी ऐसा बीजेपी से जुड़ा नेता नहीं मिला, जो विधायक सांसद हो, और उसने कोई आर्थिक अपराध न किया हो या ईडी ने जानबूझकर बीजेपी से जुड़ी, ऐसी सूचनाओं से परहेज किया या उसने वही किया जो उसके राजनीतिक आकाओं ने करने को कहा और निर्देश दिया ? इन सब से न तो किसी दल की क्षवि पर कोई असर पड़ता है और न ही, किसी अन्य का। पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है ईडी जैसी विशेषज्ञ संस्था की साख पर और उसके प्रोफेशनल स्वरूप पर। अपने प्रोफेशनल स्वरूप और साख को बचाए और बनाए रखने की जिम्मेदारी ईडी के प्रमुख और उसके महत्वपूर्ण अफसरों की है। राजनीतिक दल इस्तेमाल करो और भूल जाओ के सिद्धांत पर काम करने के लिए सिद्धहस्त हैं और वे इस सिद्धांत को कभी नहीं भूलते हैं। 

(विजय शंकर सिंह)

मंजर जैदी / भारत के वह ऐतिहासिक स्थल जो अब पाकिस्तान में हैं (16)

ऐतिहासिक साधु बेला मंदिर ~

सिंध नदी के किनारे पर कुछ कश्तियां खड़ी हुई थी जो पुराने स्टाइल की थी जिन्हें दो व्यक्तियों के द्वारा चप्पू से चलाया जा रहा था। हमें देख कर कुछ नाव वाले हमारी ओर बड़े और अपनी नाव की विशेषताएं बताते हुए हमें उस में बैठने को कहा। एक सुंदर सी नाव देखकर हम उस में बैठ गए। नाव के ऊपर लकड़ी की छत भी थी। नाव के अंदर दोनों किनारों पर और बीच में बैठने के लिए लकड़ी की बेंचें लगी हुई थी जिन पर विभिन्न रंगों के पेंट सुंदर लग रहे थे। नाव से नदी के बीच में मंदिर का भवन बहुत सुन्दर लग रहा था जैसे मंदिर पानी में तैर रहा हो। बहुत कम समय में हम उस नाव के द्वारा मंदिर तक पहुंच गए। 

कुछ सीढ़ियां चढ़कर हम मुख्य द्वार पर पहुंचे। मंदिर के द्वार पर बाएं और बने पिलर पर सिंधी भाषा में 'साधु बेला तीरथ' लिखा हुआ था। पाकिस्तान में सिंधी और पंजाबी उर्दू लिपि में लिखी जाती है इसी कारण हम द्वार पर लिखा मंदिर का नाम पढ़ सके। अंदर प्रवेश करने पर हमें कुछ व्यक्ति दिखाई दिए जिनसे हमने मंदिर के विषय में बताने का अनुरोध किया। निर्मल नाम के एक व्यक्ति  हमें मंदिर और वहां के बारे में विवरण सहित  बताने लगे । वह सिंधी भाषा बोल रहे थे हमने उनसे कहा कि हम सिंधी नहीं जानते हैं अतः हमें हिंदी या उर्दू में बताएं। 

उसके पश्चात वो हमसे मिली जुली हिंदी और उर्दू भाषा में बात करने लगे। आंगन में एक ओर छोटे कमरे में शिवलिंग स्थापित था जहां शिव जी की फोटो भी लगी थी। उन्होंने बताया कि जब जून के महीने में यहां मेला लगता है तो पांच अमृत से पूजा की जाती है अर्थात दूध, दही, मक्खन, शहद और मिठाई, पांच चीजें मिलाकर शिवलिंग की पूजा की जाती है। उन्होंने बताया कि मेले के अवसर पर भारत से बहुत से श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं उस समय यहां बहुत अधिक भीड़ होती है। वह हमें एक बड़ी सी खुली जगह पर ले गए जिस पर लकड़ी की छत पड़ी हुई थी। उन्होंने बताया कि यह हवन कुंड है जहां हवन यज्ञ पूजा की जाती है। 

वह हमें एक और बड़ी सी जगह पर ले गए जहां जाने के लिए जूते उतारना थे। उन्होंने बताया कि यह लंगर खाना है अर्थात यहां भंडारा होता है और मेले में आए व्यक्तियों को खाना खिलाया जाता है। इसके बाद वह हमें एक ऐसे स्थान पर ले गए जहां फर्श पर एक गद्दी रखी हुई थी तथा उसके तीन ओर बड़े-बड़े गोल तकिए रखे थे। वहां एक फोटो और पैर में पहनने वाली खड़ाऊं रखी थी। उन्होंने बताया कि यह गौरी शंकर महाराज की फोटो है जो मेले के दिनों में भारत से यहां आते हैं और इसी गद्दी पर बैठते हैं। शेष समय उनका फोटो और उनके पांव की खड़ाऊं यहां गद्दी पर रखे रहते हैं।

एक कमरे की दीवार पर बड़े आकार की श्री कृष्ण जी की पेंटिंग बनी हुई थी। एक अन्य स्थान पर कुछ मूर्तियां रखी हुई थी। फिर वह हमें एक खुले स्थान पर ले गए। जहाँ एक छोटा सा बगीचा था। उन्होंने बताया कि यह बगीचा साधु बेला बाबा के हाथों का लगाया हुआ है जिसका रखरखाव अब मंदिर प्रशासन द्वारा किया जाता है। हमने उनसे पूछा कि सरकार द्वारा आप को क्या सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। उन्होंने बताया कि मेले के अवसर पर सरकार की ओर से कड़े सुरक्षा प्रबंध किए जाते हैं तथा बाहर से आए व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से भारत से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए उचित प्रबंध किए जाते हैं यहां तक कि मेले के अवसर पर मुसलमानों का मेले में आना भी प्रतिबंधित होता है। 

उन्होंने यह भी बताया कि रोहड़ी जो सक्खर जनपद का शहर है वहां पर बाबा कुशी राम मंदिर और साईं वासन शाह दरबार हैं। इसके अतिरिक्त सक्खर में भी माता मंदिर और साईं बाबा हनुमान दरबार हैं। हमने उनका धन्यवाद किया और फिर नाव के द्वारा नदी के किनारे पर वापस आ गए। नाव वाला कहने लगा कि जब आप यहां आए हैं तो सक्खर बैराज जरूर देखें जो यहां से बहुत ही निकट है। यद्यपि समय अधिक हो गया था परंतु 1970 की यादों को ताजा करने के लिए हम सक्खर बैराज पहुंच गए। 

यह बैराज पहले लाॅइड बैराज के नाम से जानी जाती थी क्योंकि इसका निर्माण ब्रिटिश सरकार द्वारा 1923 से 1932 की अवधि में कराया गया था। इसका पुनर्निर्माण 2004 में पाकिस्तान सरकार द्वारा कराया गया। बैराज की लंबाई 2 किलोमीटर है जिसमें 66 गेट बनाए गए हैं। बताया गया कि सक्खर बैराज अपने प्रकार का एकल सिंचाई का विश्व में सबसे बड़ा नेटवर्क है। इस से निकली हुई नहरों के द्वारा समस्त सिंध प्रांत  को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाता है। बैराज देखने में सुंदर था जिसका फोटो खींचा गया । बैराज से लगभग 15 मिनट में हम सक्खर शहर में वापस आ गए।
(जारी) 

मंजर ज़ैदी 
© Manjar Zaidi

भारत के वह ऐतिहासिक स्थल जो अब पाकिस्तान में हैं (15)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/07/15_25.html 
#vss 

Tuesday, 26 July 2022

सेना के पराक्रम और शौर्य के साथ साथ, खुफिया विफलता भी है करगिल / विजय शंकर सिंह


करगिल युद्ध पर कोई बात करने के पहले युद्ध की क्रोनोलॉजी यानी घटनाक्रम का जान लेना आवश्यक है। पहले यह घटनाक्रम देखें। 

● 3 मई 1999 : एक चरवाहे ने भारतीय सेना को कारगिल में पाकिस्तान सेना के घुसपैठ कर कब्जा जमा लेने की सूचनी दी। 
● 5 मई : भारतीय सेना की पेट्रोलिंग टीम जानकारी लेने कारगिल पहुंची तो पाकिस्तानी सेना ने उन्हें पकड़ लिया और उनमें से 5 की हत्या कर दी। 
● 9 मई : पाकिस्तानियों की गोलाबारी से भारतीय सेना का कारगिल में मौजूद गोला बारूद का स्टोर नष्ट हो गया। 
● 10 मई : पहली बार लदाख का प्रवेश द्वार यानी द्रास, काकसार और मुश्कोह सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया। 
● 26 मई : भारतीय वायुसेना को कार्यवाही के लिए आदेश दिया गया। 
● 27 मई : कार्यवाही में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 का भी इस्तेमाल किया और फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को बंदी बना लिया। 
● 28 मई  : एक मिग-17 हैलीकॉप्टर पाकिस्तान द्वारा मार गिराया गया और चार भारतीय फौजी मरे गए। 
● 1 जून  : एनएच- 1A पर पकिस्तान द्वारा भरी गोलाबारी की गई। 
● 5 जून  : पाकिस्तानी रेंजर्स से मिले कागजातों को भारतीय सेना ने अखबारों के लिए जारी किया, जिसमें पाकिस्तानी रेंजर्स के मौजूद होने का जिक्र था। 
● 6 जून : भारतीय सेना ने पूरी ताकत से जवाबी कार्यवाही शुरू कर दी। 
● 9 जून : बाल्टिक क्षेत्र की 2 अग्रिम चौकियों पर भारतीय सेना ने फिर से कब्जा जमा लिया। 
● 11 जून : भारत ने जनरल परवेज मुशर्रफ और आर्मी चीफ लेफ्टीनेंट जनरल अजीज खान से बातचीत का रिकॉर्डिंग जारी किया, जिससे जिक्र है कि इस घुसपैंठ में पाक आर्मी का हाथ है। 
● 13 जून : भारतीय सेना ने द्रास सेक्टर में तोलिंग पर कब्जा कर लिया। 
● 15 जून : अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने परवेज मुशर्रफ से फोन पर कहा कि वह अपनी फौजों को कारगिल सेक्टर से बहार बुला लें। 
● 29 जून : भारतीय सेना ने टाइगर हिल के नजदीक दो महत्त्वपूर्ण चौकियों, पोइंट 5060 और पोइंट 5100 को फिर से कब्जा लिया। 
● 2 नुलाई : भारतीय सेना ने कारगिल पर तीन तरफ से हमला बोल दिया।
● 4 जुलाई : भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर पुनः कब्जा पा लिया। 
● 5 जुलाई : भारतीय सेना ने द्रास सेक्टर पर पुनः कब्ज़ा किया। इसके तुरंत बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बिल किलिंटन को बताया कि वह कारगिल से अपनी सेना को हटा रहें है। 
● 7 जुलाई : भारतीय सेना ने बटालिक में स्तिथ जुबर हिल पर कब्जा पा लिया। 
● 11 जुलाई : पाकिस्तानी रेंजर्स ने बटालिक से भागना शुरू कर दिया। 
● 14 जुलाई : प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने ऑपरेशन विजय की जीत की घोषणा कर दी। 
● 26 जुलाई : पीएम ने इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाए जाने का किया। 

करीब दो महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और शौर्य का ऐसा उदाहरण है जिस पर हर देशवासी को गर्व है । लगभग, 18 हजार फीट की ऊंचाई पर कारगिल की ऊंची चोटियों और चुनौतीपूर्ण टाइगर हिल में लड़े गए  इस कठिन युद्ध में लगभग साढ़े पांच सौ से अधिक हमारे योद्धाओं ने शहादत दी, और 1300 से ज्यादा सैनिक घायल हुए । 

आज 26 जुलाई को, कारगिल विजय के 23 साल हम पूरे कर रहे हैं पर करगिल किस विफलता का परिणाम था, यह जानना बेहद ज़रूरी है। हमने उस विफलता से कुछ सीखा भी है या हम बस अपने हुतात्मा सैनिको को भावुकता भरी श्रद्धाजंलि देकर आगे बढ़ गए हैं। इन 23 सालों में, करगिल युद्ध ने  ऐसे बहुत से सबक  हमें दिए जिससे हम भविष्य की योजनाओं के लिये उनका आधार बना सकते हैं। लेकिन 23 साल पहले भारत के खुफिया तंत्र द्वारा की गई भूल 2020 में, गलवां घाटी और लद्दाख के लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर भारत द्वारा पुनः दोहराई गई जब, अक्टूबर 2019 से ही चीनी घुसपैठ हमारे क्षेत्र में होती रही और आज तक, चीन से 208 दौर की बातचीत और 20 सैनिकों की शहादत के बाद भी चीन हमारे क्षेत्र में अब भी घुसा बैठा है। 

करगिल युद्ध की शुरूआत 3 मई 1999 को ही पाकिस्तान की तरफ से हो गयी थी, जब उसने कारगिल की ऊंची पहाडि़यों पर 5,000 सैनिकों के साथ घुसपैठ कर, अपना कब्जा जमा लिया था।  इस बात की जानकारी जब हमारी सरकार को मिली तो हमारी सेना ने पाक सैनिकों को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय  चलाया। उस समय अखबारों में जो खबरे छपी उनके अनुसार, 
"भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 का भी इस्तेमाल किया। इसके बाद जहां भी पाकिस्तान ने कब्जा किया था वहां बम गिराए गए। इसके अलावा मिग-29 की सहायता से पाकिस्तान के कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलों से हमला किया गया। इस युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बम का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान करीब दो लाख पचास हजार गोले दागे गए। वहीं 5,000 बम फायर करने के लिए 300 से ज्यादा मोर्टार, तोपों और रॉकेट का इस्तेमाल किया गया। लड़ाई के 17 दिनों में हर रोज प्रति मिनट में एक राउंड फायर किया गया।"

अगर युद्ध की बात करें तो करगिल 1962, 65 और 71 की तरह का कोई घोषित युद्ध नहीं था। चूंकि युद्ध घोषित नहीं था, इसीलिए भारत ने एलओसी को पार नहीं किया और अपेक्षाकृत अधिक जनहानि झेलते हुए भी, अपनी ही सीमा के अंदर से, पाकिस्तान के घुसपैठियों को भगाया। यह एक बड़ी और सुनियोजित पाकिस्तानी घुसपैठ थी, जिसे पाक सेना ने अपने आतंकी सहयोगियों के साथ अंजाम दिया था। पर इस बड़ी घुसपैठ का जवाब भारतीय सेना ने अपनी परंपरागत  शौर्य और वीरता से दिया और न केवल घुसपैठ के पीछे छुपे पाक के मंसूबे को विफल कर दिया बल्कि दुनिया को पुनः एक बार यह आभास करा दिया कि, भारतीय सेना, दुनिया की श्रेष्ठतम प्रोफेशनल सेनाओं में अपना एक अहम स्थान रखती है। आज के दिन को हम करगिल विजय के रूप में याद करते हैं। आज उन सब शहीदों को वीरोचित श्रद्धाजंलि देते हैं, जिन्होंने अपनी भूमि, घुसपैठियों से आज़ाद कराने के लिये अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। 

भारतीय खुफिया तँत्र की विफलता तो करगिल घुसपैठ 1999 में भी हुयी थी और साल पिछले साल, लद्दाख में भी हुयी है। मतलब एक ही क्षेत्र में 23 साल पहले जो नाकामी खुफिया तंत्र की थी वह दुबारा फिर दुहरायी गयी। अब कुछ बातें कारगिल युद्ध के बारे में जान लेनी चाहिए। ऊपर मैंने घटनाक्रम दे दिया है। उसी के अनुसार, 3 मई 1999 को एक चरवाहे ने भारतीय सेना को कारगिल में पाक सेना के घुसपैठ कर कब्जा जमा लेने की सूचना दी थी। कारगिल में हुए हमले के 21 साल बाद भी ऐसा बहुत कुछ है जिसे हम अपनी सेना में आज भी लागू नहीं कर पाए हैं।

लगभग तीन महीने के 'ऑपरेशन विजय' में भारत के 527 जवान शहीद और 1363 जवान घायल हुए थे। जो घायल हुए हैं उनमें कोई बाद में शहीद हुआ या नहीं, यह आंकड़ा मुझे नहीं मिल पाया।। वहीं भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 3 हजार सैनिकों को मार गिराया था। उस समय भारतीय सेना प्रमुख वेद प्रकाश मालिक थे, जिन्होंने कारगिल पर एक किताब भी लिखी है। उस किताब में इस युद्ध के कारण, परिणाम, सफलता और विफलता के बारे में जनरल मलिक ने अपने विचार रखे हैं। 

कारगिल युद्ध के समाप्त होने के बाद, तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने कारगिल घुसपैठ के विभिन्न पहलुओं पर समीक्षा करने के लिए, के सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में, एक कमेटी,  जिसे कारगिल रिव्यू कमेटी कहा जाता है, का गठन किया था। इस समिति के तीन अन्य सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल केके हजारी, बीजी वर्गीज और सतीश चंद्र, सचिव, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय थे। कारगिल रिव्यू कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में मुख्य रूप से निम्न बातें कहीं।
● देश की सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली में गंभीर कमियों के कारण कारगिल संकट पैदा हुआ।
● रिपोर्ट ने खुफिया तंत्र और संसाधनों और समन्वय की कमी को जिम्मेदार ठहराया।
● इसने पाकिस्तानी सेना के गतिविधियों का पता लगाने में विफल रहने के लिए रॉ ( RAW ) को दोषी ठहराया।
● रिपोर्ट ने “एक युवा और फिट सेना” की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला था।

क्या आज, 23 साल बीत जाने के बाद भी, भारतीय सेना को कारगिल युद्ध से सीख मिली है ? जिन विफलताओं का उल्लेख उस कमेटी की रिपोर्ट में किया गया है उन विफलताओं के कारणों को दूर करने की कोई योजनाबद्ध कोशिश की गयी है ? इसका उत्तर होगा हां।कुछ सिफारिशों को सरकार ने माना है और कुछ पर अभी कार्यवाही होनी शेष है। रिपोर्ट की सिफारिशें, पेश किए जाने के कुछ महीनों बाद राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंत्रियों के एक समूह का गठन किया गया जिसने खुफिया तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता पर सहमति जतायी गयी थी। सेना के पूर्व अधिकारियों ने कहा कि कारगिल सेक्टर में 1999 तक बहुत कम सेना के जवान थे, लेकिन युद्ध के बाद, बहुत कुछ बदल गया। ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) कुशकल ठाकुर, जो 18 ग्रेनेडियर्स के कमांडिंग ऑफिसर थे. साथ ही जो टॉलोलिंग और टाइगर हिल पर कब्जा करने में शामिल थे, ने भी कहा कि, 'कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ के पीछे खुफिया विफलता मुख्य कारण थी। लेकिन पिछले वर्षों में, बहुत कुछ बदल गया है। हमारे पास अब बेहतर हथियार, टेक्नोलॉजी, खुफिया तंत्र हैं जिससे भविष्य में कारगिल-2 संभव नहीं है। लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) अमर औल, जो ब्रिगेड कमांडर के रूप में टॉलोलिंग और टाइगर हिल पर फिर से कब्जा करने के अभियानों में शामिल थे, ने कहा कि,  हमारे पास 1999 में कारगिल में एलओसी की रक्षा के लिए एक बटालियन थी। आज हमारे पास कारगिल एलओसी की रक्षा के लिए एक डिवीजन के कमांड के अंतर्गत तीन ब्रिगेड हैं। 

रिपोर्ट ने एक युवा और फिट सेना रखे जाने का उल्लेख किया गया था। इस पर भी काम हुआ है । आज सेना में पहले की तुलना में कमांडिंग यूनिट जवान (30 वर्ष) के अधिकारी हैं। यह एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन है. 2002 में डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी और 2004 में राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) का निर्माण, कवर रिपोर्ट के कुछ प्रमुख परिणाम थे। अब तो चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) का पद भी बना दिया गया है । 

रिपोर्ट ने काउंटर-इंसर्जेन्सी में सेना की भूमिका को कम करने की भी सिफारिश की गयी थी, लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है। 1999-2001 में सरकार द्वारा संशोधित फास्ट-ट्रैक अधिग्रहण को कभी भी दोहराया नहीं गया और भारतीय सैनिकों ने अभी तक उन्हीं राइफलों से लड़ाई लड़ी जिसके साथ उन्होंने 1999 में लड़ी थी। इसलिए कारगिल युद्ध की 21 वीं सालगिरह का जश्न मनाने का सबसे अच्छा तरीका होगा की कारगिल रिव्यू कमेटी और मंत्रिमंडल समूह की रिपोर्ट की समीक्षा करके लंबे समय से लंबित राष्ट्रीय सुरक्षा सुधारों को पूरा किया जाए। विशेष रूप से फास्ट-ट्रैक रक्षा सुधार को समय पर कार्यान्वयन किया जाएं।. हमे ये नहीं भूलना चाहिए कि ,उत्तरी सीमा पर अकेले पाकिस्तान ही खतरा नहीं है बल्कि चीन एक बड़ा खतरा है। 

करगिल और लद्दाख में अनेक असमानताओं के बाद भी एक समानता है कि, दोनो ही मौकों पर हमारी खुफिया एजेंसियां दुश्मन की आक्रामक रणनीति को भांप पाने में विफल रही हैं। राजनीतिक रूप से सबसे बड़ी विफलता यह है कि पाकिस्तान से हुई घुसपैठ को हम जहां जोर शोर से स्वीकार करते हैं और उसका मुंहतोड़ जवाब देते हैं वहीं चीन से हुयी घुसपैठ और चीनी सेना की हमारी सीमा में घुस कर तंबू टीन शेड, बंकर आदि बनाने की घटना पर चुप्पी साध जाते हैं। क्यों। अगर यह एक कूटनीतिक रणनीति है तो अलग बात है, अन्यथा अगर यह एक सत्तारूढ़ दल का पोलिटिकल एजेंडा है तो इसका प्रभाव आगे चल कर आत्मघाती होगा। डोकलां से लेकर गलवां घाटी तक चीनी सैनिकों की घुसपैठ और उन्हें जवाब देने की शैली से यही संदेश गया कि चीन के प्रति हम नरम हैं। हद तो तब हो गयी जब प्रधानमंत्री ने कह दिया कि हमारी सीमा में न तो कोई घुसा था और न घुसा है। जबकि वास्तविकता यह है कि आज भी चीन हमारी सीमा में ऊंची पहाड़ियों पर जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं कब्ज़ा जमाये हुए है और जिस प्रकार की, उसकी गतिविधिया हैं, उससे नहीं लगता कि, चीन घुसपैठ पूर्व की स्थिति बहाल करेगा। 

गलवां घाटी में जब घुसपैठ हुयी थी तब,  उस समय एक टीवी चैनल में बहस चल रही थी। उस बहस में जो सवाल उठाये जा रहे थे को, इंगित करते हुए, मेजर जनरल पीसी पंजिकर ने एक पत्र उक्त चैनल के सम्पादक को लिखा। मेजर जनरल पंजिकर ने जो सवाल उठाये थे, वे बेहद सारगर्भित और प्रोफेशनल हैं। उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि, 
"इसमे कुछ भी अनुचित नहीं है कि, गलवां घाटी के मामले में, सरकार और सेना की भूमिका की समीक्षा हो। उनकी विफलताओं और कमियों पर भी बहस होनी चाहिए। लेकिन 2015 से 2020 तक की जो सैटेलाइट इमेजेस आ रही हैं, और जिनके अनुसार गलवां घाटी के उत्तर पूर्वी किनारे पर, चीन की सेना ने जो भारी निर्माण कर लिए हैं, उसके बारे में, आंतरिक और बाह्य खुफिया एजेंसियों के डायरेक्टर जनरल साहबान से क्यों नहीं पूछा जाता है ? क्या यह उनके एजेंसी की विफलता नहीं है कि उन्होंने समय रहते सरकार को इसकी सूचना क्यों नहीं दी ?'
आगे वे कहते हैं कि,
"उन्हें इस विफलता के लिये जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और उनके खिलाफ अगर उनका दोष प्रमाणित होता है तो कार्यवाही भी की जानी चाहिए।"
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया बिजनेस रूल्स 1961 का उल्लेख करते हुए जनरल पंजिकर कहते हैं कि, रक्षा सचिव और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ को भी इस विफलता का दोषी ठहराया जाना चाहिए और उनसे विस्तार से इस मामले में उनका स्पष्टीकरण लिया जाना चाहिए। 

रक्षा मामलो की एक और खुफिया एजेंसी है डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी जिसके अलग डीजी हैं। यह एजेंसी करगिल रिव्यू कमेटी की अनुसंशा पर 2004 में गठित की गयी है। यह एजेंसी भी अपने कर्तव्य में विफल रही है। इस एजेंसी और सेना के बड़े जनरलों का भी यह दायित्व है कि, जब चीन सीमा पर लम्बे समय से घुसपैठ कर रहा था और भारी सैन्य बंकर, बैरक बना रहा था तो सरकार को उन्हें यह बताना चाहिए था और हमारे विदेश मंत्रालय को भी 1993, 1996, 2003 के भारत चीन संधियों के आलोक में चीन से कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह भी सवाल उठता है कि एनटीआरओ ने इन सब गतिविधियों पर अपनी नज़र क्यों नहीं रखी ? एनटीआरओ जिसका पूरा नाम है नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन जो एक तकनीकी खुफिया एजेंसी है और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अंतर्गत कार्य करती है। इसके अधीन, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिप्टोलॉजी रिसर्च एंड डेवलपमेंट ( NICRD ) है, जो एशिया में अपने तरह की एक अनोखी रिसर्च इकाई है। एनटीआरओ भी आईबी, इंटेलिजेंस ब्यूरो और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग, रॉ की ही तरह गम्भीर और संवेदनशील अभिसूचनाओ का संकलन करती है। पर लद्दाख के 2019  20 के चीनी घुसपैठ की अग्रिम अभिसूचनाओ के संकलन में यह एजेंसी भी दुर्भाग्य से विफल रही है। 

ऐसा नहीं है भारत मे प्रशासनिक तंत्र का विकास नहीं हुआ है। बल्कि समय समय पर जैसी आवश्यकताए होती रहीं तत्समय की सरकारो ने, ब्रिटिश कालीन औपनिवेशिक सरकार ने भी, उसी तरह से आवश्यकतानुसार मैकेनिज़्म भी तैयार किये पर दुःखद और हैरान करने वाला पहलू यह है कि इतनी विशेषज्ञ और महत्वपूर्ण खुफिया एजेंसियों के होते हुए हम अपनी सीमा पर हो रही घुसपैठ पर समय से नज़र नहीं रख पाते है । यह अलग बात है कि चीन की घुसपैठ, जो लद्दाख के गलवां घाटी में हुई है और जैसा कि मीडिया में समय समय पर खबरें आ रही हैं कि, चीन की घुसपैठ अब भी जारी है, को छोड़ कर अन्य घुसपैठ के प्रयासों को, हम, बल एवं कुशल पूर्वक हटाने में सफल हुए है, पर इससे खुफिया एजेंसियों की विफलता तो छुप नहीं जाती है। 

( विजय शंकर सिंह )

Monday, 25 July 2022

मंजर जैदी / भारत के वे ऐतिहासिक स्थल जो अब पाकिस्तान में हैं (15)

सक्खर में हैंगिंग बृज ~
 

लगभग 200 किलोमीटर की यात्रा पूर्ण करके हमने 11:00 बजे सक्खर शहर में प्रवेश किया। सक्खर, सिंध प्रांत का जनपद है। इस क्षेत्र में पंजाब जैसी हरियाली देखने को नहीं मिली। राजस्थान की तरह कहीं कहीं रेत की छोटी पहाड़ियां दिखाई दीं। रास्ते में खजूर के बाग भी दिखाई दिए जिन पर खजूरों के गुच्छे लटक रहे थे। सक्खर में प्रवेश करते ही कुछ पुरानी यादें ताजा हो गयीं। वर्ष 1970 में जब मैं विद्यार्थी था उस समय पहली बार पाकिस्तान आया था और सक्खर में भी  रहने का अवसर मिला था। उस समय सक्खर में हमारी मौसी रहती थी जिनके पति शहर के प्रसिद्ध हकीम थे। दूर-दूर से रोगी उन्हें दिखाने के लिए सक्खर आते थे।  वो हकीम होने के साथ अच्छे शायर भी थे। उन्हें अपने बच्चों को डाक्टर बनाने का शौक था। बाद में उनके एक पुत्र और दो पुत्रियों ने एमबीबीएस के अतिरिक्त डॉक्टरी की अन्य डिग्रीयां भी प्राप्त कीं और पाकिस्तान में अच्छी सरकारी नौकरियों में रहे। 1970 में उनका बेटा शहाब जो मुझ से छोटा था कहने लगा कि आप सिविल में इंजनिरिंग कर रहे हैं इसलिए मैं आपको सक्खर में सिंधु नदी पर बना हैंगिंग बृज, जिसे अय्यूब पुल कहते हैं, और सक्खर बैराज दिखाऊंगा।  

सिविल इंजीनियरिंग का विद्यार्थी होने के कारण मेरी इन चीजों में  विशेष रूचि थी। 50 वर्ष बाद मुझे याद नहीं कि हम किस साधन से वहां गए थे परंतु शहर से बहुत निकट होने के कारण हम जल्द ही वहां पहुंच गए थे। वहां एक पुराना अंग्रेजों के समय का बना हुआ लोहे का पुल था जिस पर रेलगाड़ी चलती थी तथा उसी पुल पर पटरी के दोनों ओर पैदल और साइकिल वालों के चलने के लिए रास्ता बना हुआ था। इसमें कोई विशेषता नहीं थी। ऐसे बहुत से पुल हम अपने देश में देख चुके थे परंतु उस पुल से लगभग 100 फीट की दूरी पर एक दूसरा पुल 1962 ई0 में बनाया गया था। सक्खर से रोड़ी शहर जाने के लिए 806 फुट लंबा यह पुल सिंधु नदी पर बनाया गया था। उस समय तकनीकी दृष्टि से देखने पर  इसमें यह विशेषता दिखाई दी थी कि, इस पुल के लिए नदी के बीच में  पिलर नहीं बनाए गए थे, क्योंकि पिलर बनाना संभव नहीं थे, बल्कि नदी के दोनों किनारों पर दो-दो अबटमेंट बनाकर उन्हें नदी की चौड़ाई के बराबर लोहे के गर्डर से बनाई गई अर्ध गोलाकार आर्च से जोड़ा गया था, अर्थात नदी के ऊपर दोनों किनारों के मध्य एक बहुत बड़ी अर्ध गोलाकार आर्च लोहे के गार्डर से बनाई गई थी जिसमें लोहे के तारों के मोटे बटे हुए रस्सों से उस भाग को लटकाया गया था जिस पर रेल की पटरियां बिछाई गई थीं और उन पर रेलगाड़ी चलती थी। उस समय बताया गया था कि यह दुनिया का तीसरा बड़ा पुल है जिसमें आर्च का स्पेन बनाया गया है तथा दुनिया का प्रथम पुल है जिसे लोहे के तारों के बटे हुए मोटे रस्सों से आर्च में लटकाया गया है। इसके पश्चात हम दोनों सक्खर बैराज भी गए थे।
 

इसी अवधि में हम बंदर रोड से होते हुए सिंधु नदी के किनारे उस स्थान पर पहुंच गए जहां से एतिहासिक साधु बेला मंदिर जाने के लिए नाव का प्रयोग करना था। यह स्थान सक्खर से मात्र  8.5 किलोमीटर की दूरी पर है तथा 30 मिनट में हम यहां पहुंच गए। रास्ते में हमें वह दोनों पुल भी दिखाई दिए जिनका वर्णन ऊपर किया गया है। 1970 में फोटो खींचने के लिए हमारे पास कैमरा नहीं था। अतः अब  उनके कुछ फोटो खींचे,  जो यहां लगाए जा रहे हैं। 
(जारी) 

मंजर जैदी
© Manjar Zaidi

भारत के वे ऐतिहासिक स्थल जो अब पाकिस्तान में हैं (14)      
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/07/14_25.html 
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