Monday, 26 August 2019

क्या हम गंभीर आर्थिक संकट को ओर बढ़ रहे हैं / विजय शंकर सिंह

अंततः आरबीआई ने सरकार को अपने रिज़र्व फंड में से धन दे ही दिया। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के इतिहास में यह एक बड़ी घटना है जो इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि सरकार के खजाने में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। इस समय प्रत्यक्ष कर संग्रह लगभग आधा हो गया है, जीएसटी के अगर रिफंड निकाल दिए जांय तो, उसका भी संग्रह आशा के विपरीत ही होगा। राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है, व्यापार घाटा भी चिंताजनक स्थिति में है। मैन्युफैक्चरिंग सूचकांक भी कम है और अर्थव्यवस्था के जितने भी इंडिकेटर हैं वे गिरती हुयी आर्थिक स्थिति की ही कहानी कह रहे हैं।

सरकार को नोटबंदी के समय यह अंदाजा रहा हो या न रहा हो कि नोटबंदी का असर अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा पर अब यह लगभग पक्का हो गया है कि आज जिस भँवर में देश की आर्थिक नाव फंस कर चक्कर खा रही है और उसे कोई करार नहीं मिल रहा है का एक प्रमुख कारण नोटबंदी का मूर्खता पूर्ण फैसला था, जिसका लेश मात्र भी लाभ देश की अर्थव्यवस्था और जनता को नहीं मिला। राजनीतिक लाभ और चुनिंदा पूंजीपतियों को कुछ लाभ मिला हो तो वह अलग बात है। नोटबंदी का निर्णय एक देशघाती निर्णय था। उससे वे सब लक्ष्य भी पूरे नहीं हुए जिनका वादा तब प्रधानमंत्री ने किया था।

उसी के बाद आयी जीएसटी। एक देश एक कर, यह खूबसूरत नारा तो था पर इसने उद्योग व्यापार को छला भी खूब। न तो तब नियम स्पष्ट थे, और कुछ हद तक न आज सबको स्पष्ट हैं,, न तो तब अफसरो को पता था कि यह कर संग्रह कैसे किया जाय और न आज सब समझ पाए है, न  इसके जमा करने की प्रक्रिया तब सरल थी, न आज सरल है और ऊपर से हर महीने में तीन रिटर्न भरने का मूर्खतापूर्ण आदेश तो है ही। कर संग्रह जब तक सरल और स्पष्ट नहीं होगा, तब तक कर सुगमता से न तो दिए जा सकेंगे और न ही सरकार कर संग्रह कर पायेगी। जीएसटी के साथ भी यही हुआ। यह अब तक का सबसे भ्रमपूर्ण और मूर्खतापूर्ण तरीके से लागू किया जाने वाला  कर सुधार है ।

सरकार को अपनी गलतियों और आर्थिक दुरवस्था का अंदाज़ हो गया था। जब यह समस्याएं थीं तभी एक एक कर के बैंकों के घोटाले और एनपीए की खबरें आने लगी। आईसीआईसीआई बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यस बैंक, के एनपीए चिंताजनक हो गए। निश्चय ही यह बैड लोन की बीमारी यूपीए के समय की भी थी, पर पूंजीपतियों को लोन देने में वर्तमान सरकार ने भी कोई कम उदारता नहीं दिखाई। आईएलएफएस पर भी मंदी के बादल गहराए और सरकार के जो इस मुश्किल समय मे खेवनहार थे उन्होंने भी सरकार का साथ छोड़ना शुरू कर दिया। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद पनगढ़िया जो योजना आयोग के विघटन के बाद नवगठित नीति आयोग के पहले मुख्य कार्यपालक अधिकारी सीईओ बने थे, ने भी 1 अगस्त 2017 को अपना, त्यागपत्र, निजी कारण बता कर सरकार को सौंप दिया।

अब सरकार के पास धन के स्रोत के लिये आरबीआई की समृद्ध और अनछुई तिजोरी ही एक सहारा थी। आरबीआई का यह रिज़र्व अत्यंत गंभीर परिस्थितियों के लिये ही रखा रहता है। विशेषकर जब आर्थिक आपातकाल जैसी परिस्थितियां सामने आ जाँय तो यह गड़ेधन के रूप में काम आता है। सरकार ने आरबीआई से यह धन लेना चाहा, पर आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल इस धनदान हेतु तैयार नहीं हुए और उन्होंने सरकार के दबाव में आकर कोई निर्णय लेने के बजाय, अपने पद से ही, 10 दिसम्बर 2018 को इस्तीफा दे दिया। उनके जाने के बाद वित्त विभाग के पूर्व सचिव भारत सरकार शशिकांत दास ने आरबीआई गवर्नर का कार्यभार संभाला। फिलहाल वही इस पद पर हैं। वे कोई पेशेवर अर्थशास्त्री नहीं हैं बल्कि वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं।

आरबीआई एक स्वायत्त संस्थान है और देश की मौद्रिक नीति को संचालित करता है। वह सभी बैंकों और अन्य बैंकिंग गतिविधियों का नियामक और नियंत्रक भी है। वह सरकार के वित्त मंत्रालय का प्रमुख अंग होते हुए भी वित्त मंत्री के नियमित क्रियाकलाप से बाहर है। आरबीआई ने सरकार के धन लेने की इस योजना को अपनी स्वायत्तता पर अतिक्रमण माना। इस पर आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी अपना पद त्याग कर दिया। हालांकि विरल आचार्य ने भी अपने पद त्याग का कारण, निजी ही बताया पर इस्तीफा देने के कुछ समय पहले उन्होंने रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता के संदर्भ में खुलकर अपनी बात कही थी। सरकार द्वारा  पैसे लेने के लिये आरबीआई एक्ट की धारा 7 के उपयोग में लाने के सरकार के निर्णय को आरबीआई की स्वायत्तता पर अतिक्रमण भी अपने एक भाषण में बताया था। इससे यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि वे भी सरकार के इस कदम से खिन्न थे।  सरकार को पैसे की ज़रूरत थी और वह उसे इस आपात स्थिति में आरबीआई से ही मिल सकते थे ।

तब सरकार ने आरबीआई के पूर्व गवर्नर विमल जालान की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की, जिसे यह दायित्व दिया गया कि वह इस बात का परीक्षण करे कि क्या सरकार आरबीआई का रिज़र्व फंड अपने वित्तीय कार्य के लिये प्रयोग कर सकती है।  बिमल जालान की अध्यक्षता वाली समिति ने 23 अगस्त, को अपनी रिपोर्ट आरबीआई को सौंपी थी। इस समिति का गठन यह सुझाने के लिए किया गया था कि आरबीआई के पास कितना रिजर्व होना चाहिए और उसे केंद्र सरकार को कितना लाभांश देना चाहिए।  विमल जालान कमेटी ने यह अनुशंसा की कि, सरकार आरबीआई से एक मुश्त तो नहीं पर टुकड़ों टुकड़ों में धन ले सकती है। विमल जालान खुद भी रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके हैं। आज जो पैसा आरबीआई ने सरकार को देने का निर्णय किया है यह अभूतपूर्व निर्णय है। यह बेहद आपात परिस्थितियों के लिये रखा हुआ धन है। हम आर्थिक आपात काल की ओर बढ़ रहे हैं क्या ?

आज 26 अगस्त को आरबीआई बोर्ड की बैठक में विमल जालान समिति की सिफारिश मान ली गयी। लंबी कवायद और जद्दोजहद के बाद आज आरबीआई के बोर्ड ने यह निर्णय किया कि 2018 - 19 का पूरा सरप्लस धन जो ₹ 1,23,414 करोड़ है और ₹ 52,637 करोड़ जो पुनरीक्षित इकनॉमिक कैपिटल फ्रेम वर्क का है उसे मिला कर कुल ₹ 1,76,051 करोड़ सरकार के खाते में ट्रांसफर करने का फैसला किया है।

आज 26 अगस्त को डॉलर का विनिमय मूल्य 72 रुपये से अधिक हो गया है। अर्थव्यवस्था के इस बुरे दौर का असर, अपराधों पर भी पड़ेगा। यह एक तयशुदा सिद्धांत है जब अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती है, लोगों को नयी नौकरियां मिलना तो दूर, लगी लगाई नौकरियां जब जाने लगती हैं, और पात्रता के अनुसार नौकरियां सृजित नहीं होती हैं तो जो फ्रस्ट्रेशन उपजता है वह मन को अपराध की ओर ठेल देता है। समाज के लिये यह बेहद संकटों का काल होता है।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 25 August 2019

बुलंदशहर हत्याकांड - हत्यारो का महिमामंडन अब एक नयी संस्कृति है / विजय शंकर सिंह

2 दिसंबर 2018 को बुलंदशहर जिले के स्याना गांव में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की निर्मम हत्या भीड़ ने कर दी थी। यह भीड़ जिनकी थी उनमे बजरंग दल के जिला संयोजक भी था जिसका नाम योगेश था। हत्या का कारण गौहत्या से उपजा आक्रोश था। मैंने इस घटना पर लगातार लिखा था। इसका कारण, एक तो पुलिस से मेरा जुड़ाव और दूसरे सुबोध के साथ मेरी निकटता।

काफी हंगामा हुआ। जांच के लिये एसआईटी गठित हुयी। मुल्ज़िम गिरफ्तार हुए। सुबोध को सरकार ने मदद दी। अफसर कुछ बदले गये। अखबारों में छपा। फिर धीरे धीरे सब भूलता गया। यह घटना बस याद रही तो सुबोध के घर परिवार को। मृत्यु का एक रूप यह भी है।

उसी घटना का एक मुल्ज़िम आज जब जमानत पर बाहर आया तो उसका स्वागत जब मैंने टीवी चैनलों पर प्रसारित होते देखा तो मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। और अगर सारे मुल्ज़िम अदालत से बरी हो भी जाँय तो भी मुझे हैरानी नहीं होगी। क्योंकि मैं यह बात अंदर तक जानता हूँ कि भीड़ हिंसा के अभियुक्त के खिलाफ अदालत में जुर्म साबित कर पाना, मुश्किल होता है। कारण इसके अनेक हैं । इस पर फिर कभी।

आज जब हत्यारोपी शिखर अग्रवाल,  जमानत पर जेल से छूटा तो उसे न केवल उसके समर्थकों ने माला पहना कर उसका स्वागत किया बल्कि उसके स्वागत में वंदे मातरम औऱ भारत माता की जय के नारे लगाए गए। वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे क्या अब भीड़ हिंसा के आरोपियों के लिये भी लगाने की कोई नयी परंपरा और संस्कृति विकसित हो गयी है ? क्या किसी हत्यारोपी के स्वागत में इन नारों के उद्घोष से वंदे मातरम और भारत माता की जय की गरिमा नहीं गिर रही है ? धर्मांध अराजकता और अपराधियों का इस प्रकार का खुल कर महिमामंडन केवल बुलंदशहर, रांची, और दादरी में ही नहीं है बल्कि राजस्थान के जोधपुर में शम्भू रैगर नामक एक बलात्कार के अपराधी के पक्ष में तो पूरा जुलूस ही निकला था।

अभियुक्त के स्वागत और माल्यार्पण की यह घटना आज पहली बार नहीं हो रही है। इसकी नजीर भाजपा सरकार के दो केंद्रीय मंत्रियों ने पहले भी ऐसे माल्यार्पण और सम्मान करके दे दिए हैं। एक तो दादरी के अखलाक हत्याकांड के मुल्ज़िम को जो जेल में मरा था को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने तिरंगे में लपेट कर अंतिम यात्रा के लिये रवाना किया। दूसरे झारखंड में जमानत पर छूटे भीड़ हिंसा के मुल्जिमों को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा द्वारा माल्यार्पण करके सम्मानित करने की घटना। जब यह दो बड़ी नजीरें उपलब्ध हों तो आज की यह घटना उनकी तुलना में सामान्य ही कही जाएगी।

© विजय शंकर सिंह

जन्मदिन 25 अगस्त - तसलीमा नसरीन को जन्मदिन की शुभकामनाएं / विजय शंकर सिंह

आज बांग्ला की प्रसिद्ध लेखिका और अपने देश से कभी यहां तो कभी वहां, निर्वासित जीवन जी रही तसलीमा का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं !

उनके पहले उपन्यास लज्जा से उन्हें पढ़ने का सिलसिला जो शुरू हुआ वह आज तक जारी है। उनकी आत्मकथा के सभी भाग, निर्वासित जीवन के कष्ट सब पढ़ने पर लगता है कि क्या धर्मान्धता इतना अधिक प्रदूषित कर देती है कि सच मे लगने लगता है कि धर्म एक नशा है, अफीम है।

तसलीमा फिलहाल भारत मे हैं। कुछ दिन पहले दिल्ली में थी। अब आज कहा हैं पता नहीं। पर वे कहीं भी हों सुखी, स्वस्थ और सानन्द बनी रहें। कोलकाता उनका प्रिय शहर है। कितनी कविताएं उन्होंने कोलकाता पर लिखी हैं। पर प्रिय का साथ भी सबको कब मयस्सर होता है।

वे एक पेशेवर डॉक्टर हैं। बांग्लादेश के मयमन सिंह जिले की मूल रूप से रहने वाली तसलीमा ने ढाका से डॉक्टरी की परीक्षा पास की, कुछ दिन चिकित्सक की नौकरी भी की। फिर उनके मन का विद्रोह जागने लगा। फिर तो उनका पथ ही मुड़ गया। रुढ़ि के विरुद्ध विद्रोह तो बचपन से ही उनमें जगने लगा था।

तसलीमा ने एक मुलाक़ात में कहा भी था कि बंगाली तो चिर विद्रोही होते हैं ! यह विद्रोह धर्म के कर्मकांड के विरुद्ध  शुरू होकर समाज के पाखंड के खिलाफ मुखर हो गया। और एक चिकित्सक ने आला और सर्जरी के उपकरण उठाने के बजाय कलम उठा ली, और दवाईयों के प्रेस्क्रिप्शन लिखने के बजाय तसलीमा ने कविताये, कहानियां, उपन्यास और आपबीती लिखनी शुरू कर दी।
" आप को कुछ दवाइयों के नाम याद हैं ." यह पूछने पर कहा था कभी उन्होंने,
" डॉक्टर डॉक्टरी की पढ़ाई नहीं भूलता है, 6 साल पढ़ना पढता है "
फिर एक उन्मुक्त हंसी।

मैं इस परिवर्तन को नियति नहीं कहूंगा। यह शब्द तसलीमा को पसंद नहीं आएगा। और जो उन्हें पसंद नहीं उसका तो विरोध होना ही है। यही विद्रोही मन और तेवर ही तसलीमा की पहचान है। धर्म के प्रति आस्थावान उन्हें पसंद नहीं करते। वे जो सवाल उठाती हैं वे धर्म के विद्वानों को चुभते हैं। धर्म और ईश्वर के अधिकतर मानने वालों की एक तासीर यह भी होती है कि उसे जस का तस सिर्फ इसलिए मान लिया जाय कि यह धर्मग्रंथ में लिखा है और न मानने पर ईश्वर नाराज़ हो जाएगा। कभी कभी लगता है छोटी छोटी बातों पर भी एक सामान्य मनुष्य की तरह नाराज़ हो जाने और कहर बरपा देने की बात करने वाला ईश्वर हम इंसानों जैसा ही है क्या !

एक बांग्ला साहित्य के मर्मज्ञ मित्र का कहना है कि तसलीमा चाहे जो लिखें चाहे जितना लिखें पर वे बंगला के नामचीन लेखकों, विमल मित्र, शंकर, विभूति भूषण बंदोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय आदि की तुलना में नहीं टिकती हैं और उनका लेखन कहीं कहीं अश्लीलता को भी छू जाता है। वे धर्म के विषय मे आक्रामक आलोचना करती है, और फिर चाहे जो हो जाय उसे हर दशा में इसे औचित्यपूर्ण भी सिद्ध करती हैं। यही ज़िद उन्हें बांग्लादेश के धर्मांध और मुल्ला मौलवी समाज का घोषित दुश्मन बना देती है। बांग्लादेश में जो उन्हें पसंद करते हैं वे खुल कर नहीं आते हैं, और परोक्ष रूप से लोकप्रिय होने के बावजूद वह अकेली दिखती हैं।

हो सकता है साहित्य के आलोचक की दृष्टि यही कहती हो। मैंने बांग्ला साहित्य पढ़ा है पर सब अनुदित रूप में । थोड़ी बहुत बांग्ला जानने के बाद भी फर्राटे से पढ़ना मेरे लिये सम्भव नहीं है। वे भले आलोचकों की निगाह में बांग्ला के प्रथम पंक्ति के लेखकों में न शुमार हों, पर मुझे उनका लिखा, और लिखने का अंदाज़ पसंद है। मुझे उनकी साफगोई पसंद है। लिखने में जो सतत जिज्ञासा भाव उनकी किताबें जगाती रहती हैं वह मुझे पसंद है। जो पुस्तक पढ़ने के प्रेमी मित्र हैं वे इस विंदु को आसानी से समझ सकते हैं।  वे भोगा और देखा गया यथार्थ लिखती हैं। और वह यथार्थ, समाज के उस विद्रूप चेहरे को दिखाता है जिसे देखते तो बहुत लोग हैं पर अभिव्यक्त करने का साहस नहीं कर पाते।

तसलीमा हिंदी कम जानती हैं।  उनकी बांग्ला भी पश्चिम बंगाल की बंग्ला से थोड़ी भिन्न है। अंग्रेजी का उच्चारण भी बंगीय उच्चारण से प्रभावित है। पर हिंदी जब धीरे धीरे बोली जाय तो समझ भी लेती हैं। पर जिस समाज की वह बात करती हैं वह समाज गंगा, पद्मा से सरसब्ज एक बांग्ला समाज ही नहीं है, बल्कि थोड़े बहुत फेरबदल के साथ यह पूरे भारतीय मानस की एक कहानी है।

उनके जन्मदिन पर तसलीमा नसरीन को बधाई और शुभकामनाएं। उन्हे एक ठौर मिले, थोपी हुयी यायावरी उनकी कम हो, वे कुछ स्थिर रहें और फिर कुछ रच सकें, यह भी मेरी शुभकामना है।
और अंत मे उनकी एक छोटी कविता,

जिधर दोनों आँखें जाती हैं, जाती हूँ
कौन है सामने, आकर स्थिर खड़ा हो जाए,
और अपने दोनों हाथ बढ़ाए!
इतनी जो बीमारी है सीने में
कौन है, जो दूर करे?

© विजय शंकर सिंह

टैगोर की दृष्टि में, देशभक्ति और राष्ट्रवाद / विजय शंकर सिंह

गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर एक अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व के थे। बंगाल के कुछ बेहद सम्पन्न लोगों में उनका परिवार आता था। उनके बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर, देश के प्रथम हिंदुस्तानी आईसीएस थे। वे 1864 बैच के आईसीएस थे। अपने माता पिता की आठ संतानों में एक टैगोर बांग्ला साहित्य और संगीत के शिखर पुरुषों में से एक थे। हम उन्हें उनके कविता संग्रह गीतांजलि पर मिले नोबल पुरस्कार से अधिक जानते हैं पर टैगोर ने गोरा, नौका डूबी जैसे बेहद लोकप्रिय और खूबसूरत उपन्यास भी लिखे हैं। रवींद्र संगीत के नाम से बांग्ला का सबसे लोकप्रिय संगीत भी उन्ही की यश गाथा कहता है।

टैगोर भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सीधे तो नहीं शामिल हुए पर अपने विख्यात शिक्षा केन्द्र शांतिनिकेतन जो अब विश्वभारती विश्वविद्यालय के रूप में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, के माध्यम से देश के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे। महात्मा गांधी को, महात्मा नाम, टैगोर ने ही दिया था। और कहते हैं टैगोर को गुरुदेव नाम से सबसे पहले गांधी ने ही उन्हें पुकारा था।

देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर टैगोर के विचार देशभक्ति और राष्ट्रवाद की परंपरागत परिभाषा से कुछ हट कर हैं। 1908 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की राष्ट्रवाद पर अपनी आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने कहा था,
" देशभक्ति मेरे लिये मेरा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकता है। मैं हीरे की कीमत में, शीशा नहीं खरीद सकता हूँ। जब तक मेरा जीवन है मैं देशभक्ति को मनुष्यता के ऊपर देशभक्ति की जीत हावी नहीं होने दूंगा। "
यह पत्र 1997 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक टैगोर के चुने हुये पत्र में संग्रहीत है।

" जब तक मैं जिंदा हूं, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत हावी नहीं होने दूंगा.’
यह बयान अगर आज कोई  भी देता, या खुद टैगोर ही जीवित रहते और कह देते, तो उन्हें  तुरंत आज़ादी की लड़ाई में खामोश रहने वाले तबके के समर्थक नवदेशभक्त  पाकिस्तान भेजने का फरमान जारी कर देते। लेकिन टैगोर ने यह बात खुल कर कही थी। उन्होंने भारतीय समाज,संस्कृति और परंपरा में खुल कर कहने की प्रथा का ही अनुसरण किया था। सौ साल पहले कही गयी गयी उनकी बात पर बौद्धिक बहस तो हुयी, पर उन्हें कोसा नहीं गया, वे निंदित नहीं हुए और उनका मज़ाक़ नहीं उड़ाया गया। ग़ुलाम भारत और ब्रिटिश उपनिवेश की किसी भी संवैधानिक अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार जैसी किसी चीज के न होते हुये भी भारतीय परंपरा में अपनी बात कहने और तर्क वितर्क करने की जो स्वाभाविक परंपरा आदि काल से हमे प्राप्त, है और वर्तमान अभिव्यक्ति की अवधारणा जैसी पाश्चात्य अवधारणा के बहुत पहले से भारतीय जन मानस में व्याप्त है के अनुसार उन्होंने अपनी बात कही थी ।

नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने एक बेहद विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है ' द आरगुमेंटेटिव इंडियन ' । यह पुस्तक उनके द्वारा समय समय पर लिखे गए, लेखों का एक संकलन है । इसमे उन्होंने भारतीय तर्क पद्धति और तर्क परंपरा का इतिहास खंगालने की कोशिश की है। अमर्त्य सेन ने इस किताब में टैगोर से संबंधित एक अध्याय ‘टैगोर और उनका भारत’ में टैगोर के राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़ी बातें और उनके विचार  बताये हैं, जो उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता और पादरी सी एफ एंड्रूज के हवाले से समय समय पर कहे गए हैं। राष्ट्रवाद के बारे में टैगोर की अवधारणा आजकल की राष्ट्रवादी अवधारणा जो एक प्रकार की प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली और जर्मनी मॉडल से उपजी राष्ट्रवाद की अवधारणा है से बिलकुल उलट है। यही नहीं यह भारतीय वांग्मय में वर्णित राष्ट्रवाद की अवधारणा से  भी बिलकुल अलग है।

उक्त लेख में टैगोर, सीएफ एंड्रयूज़ और गांधी जी के बीच होने वाले अनेक रोचक वार्तालाप का उल्लेख है जिसमे टैगोर के राष्ट्रवाद का पूरा खाका मिलता है। एंड्रूज, महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे, लेकिन गांधी और टैगोर के विचार एक दूसरे से अलग थे। टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चारदिवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है, साथ ही दूसरे देशों की जनता के दुख दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है. वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक नजरिया रखते थे। यह भी एक संयोग है कि अमर्त्य सेन का जन्म शांतिनिकेतन में हुआ था, और उनका नामकरण, गुरुदेव टैगोर ने ही किया था।

टैगोर ने 1916-17 के कालखंड में, जापान और अमेरिका की यात्रा के दौरान राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए थे, जो उनकी राष्ट्रवाद पर लिखी पुस्तक  के रूप में सामने आये। इसमें 1917 में दिए गए एक भाषण में टैगोर ने कहा था,
" राष्ट्रवाद का राजनीतिक और आर्थिक संगठनात्मक आधार उत्पादन में बढ़ोतरी और मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता हासिल करने का प्रयास है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि और राजनैतिक शक्ति में बढ़ोतरी करने में इस्तेमाल की गई है। शक्ति की बढ़ोतरी की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा और भय का वातावरण बनाकर मानव जीवन को अस्थिर और असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे-सीधे जीवन से खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाहरी संबंधों के साथ ही राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी स्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है. ऐसे में समाज और व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने की कोशिश राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है.। "

भारत के संदर्भ में टैगोर ने लिखा है,
" भारत की समस्या राजनैतिक नहीं सामाजिक है। यहां राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। हकीकत तो ये है कि यहां पर पश्चिमी देशों जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक काम में अपनी रूढ़िवादिता का हवाला देने वाले लोग जब राष्ट्रवाद की बात करें तो वह कैसे प्रसारित होगा? भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। "

टैगोर ने हमेशा नेशन स्टेट (राष्ट्र-राज्य) संकल्पना की आलोचना की है. उन्होंने उसे ‘यह शुद्ध यूरोप की देन है’ ऐसा कहा है. अपने 1917 के 'नेशनलिज्म इन इंडिया’ नामक निबंध में उन्होंने साफ़ तौर पर लिखा है कि,
" राष्ट्रवाद का राजनीतिक एवं आर्थिक संगठनात्मक आधार सिर्फ उत्पादन में वृद्धि तथा मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता प्राप्त करने का यांत्रिक प्रयास इतना ही है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः विज्ञापन तथा अन्य माध्यमोंका लाभ उठाकर राष्ट्र की समृद्धि एवं राजनीतिक शक्ति में अभिवृद्धि करने में प्रयुक्त हुई हैं। शक्ति की वृद्धि की इस संकल्पना ने राष्ट्रों मे पारस्परिक द्वेष, घृणा तथा भय का वातावरण उत्पन्न कर मानव जीवन को अस्थिर एवं असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे सीधे जीवन के साथ खिलवाड है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाह्य संबंधों के साथ-साथ राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है. ऐसी परिस्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है. फलस्वरूप, समाज तथा व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप प्राप्त कर लेता है। "

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसी आधार पर राष्ट्रवाद की आलोचना की है. उनके अनुसार,
" राष्ट्र के विचार को जनता के स्वार्थ का एैसा संगठित रूप माना है, जिसमें मानवीयता तथा आत्मत्व लेशमात्र भी नहीं रह पाता है। दुर्बल एवं असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार प्राप्त करने का प्रयास यह राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इस से उपजा साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है। राष्ट्र की शक्ति में वृद्धि पर कोई नियंत्रण स्वंभव नहीं, इसके विस्तार की कोई सीमा नहीं। उसकी इस अनियांत्रित शक्ति में ही मानवता के विनाश के बीज उपस्थित हैं। राष्ट्रों का पारस्परिक संघर्ष जब विश्वव्यापी युद्ध का रूप धारण कर लेता है, तब उसकी संहारकता के सामने सब कुछ नष्ट हो जाता है। यह निर्माण का मार्ग नहीं, बल्कि विनाश का मार्ग है। "
राष्ट्रवाद की यह अवधारणा किस तरह शक्ति के आधार पर विभिन्न मानवी समुदायों में वैमनस्य तथा स्वार्थ उत्पन्न करती है, इस बात को उजागर करता रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह मौलिक चिंतन समूचे विश्व के लिए एक अमूल्य योगदान है।

क्या भारतके लिए राष्ट्रवाद विकल्प बन सकता है ? इस विषय पर चर्चा करते हुये टैगोर कहते हैं,
" भारत में राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। वास्तव में भारत में यूरोप जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक कार्यों में रूढ़िवादिता का पालन करने वाले यदि राष्ट्रवाद की बात करें तो राष्ट्रवाद कहां से प्रसारित होगा? उस ज़माने के कुछ राष्ट्रवादी विचारक स्विटजरलैंड ( जो बहुभाषी एवं बहुजातीय होते हुए भी राष्ट्र के रूप में स्थापित है) को भारत के लिए एक अनुकरणीय प्रतिरूप मानते थे।"
लेकिन रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह विचार था कि
" स्विटजरलैंड तथा भारत में काफी अंतर एवं भिन्नताएं हैं। वहां व्यक्तियों में जातीय भेदभाव नहीं है और वे आपसी मेलजोल रखते हैं तथा सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध सामान्य रूप से हैं, क्योंकि वे अपने को एक ही रक्त के मानते हैं। लेकिन भारत में जन्माधिकार समान नहीं है। जातीय विभिन्नता तथा पारस्परिक भेद भाव के कारण भारत में उस प्रकार की राजनीतिक एकता की स्थापना करना कठिन दिखाई देती है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत आवश्यक है।  समाज द्वारा बहिष्कृत होने के भय से भारतीय डरपोक एवं कायर हो गए हैं। जहाँ पर खान-पान तक की स्वतंत्रता न हो, वहां राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ कुछ व्यक्तियों का सब पर नियंत्रण ऐसा ही होकर रहेगा। इस से निरंकुश राज्य ही जन्म लेगा और राजनैतिक जीवन में विरोध अथवा मतभेद रखने वाले का जीवन दूभर हो जाएगा. क्या ऐसी नाम मात्र स्वतंत्रता के लिए हम अपनी नैतिक स्वतंत्रता को तिलांजलि दे दें ? "

संकीर्ण राष्ट्रवाद के विरोध में वे आगे लिखते हैं कि
" राष्ट्रवाद जनित संकीर्णता यह मानव की प्राकृतिक स्वच्छंदता एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में बाधा है। ऐसा राष्ट्रवाद  युद्धोन्मादवर्धक एवं समाजविरोधी ही होगा। क्योंकि राष्ट्रवाद के नाम पर राज्य द्वारा सत्ता की शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग अनेक अपराधों को जन्म देता है। "
उनके इसी पुस्तक के अनुसार, व्यक्ति को राष्ट्र के प्रति समर्पित कर देना उन्हें कदापि स्वीकार नहीं था। राष्ट्र के नाम पर मानव संहार तथा मानवीय संगठनों का संचालन उन के लिए असहनीय था। उन के विचार में राष्ट्रवाद का सब से बड़ा खतरा यह है कि
" मानव की सहिष्णुता तथा उसमें स्थित नैतिकताजन्य परमार्थ की भावना राष्ट्र की स्वार्थपरायण नीति के चलते समाप्त हो जाएंगे। ऐसे अप्राकृतिक एवं अमानवीय विचार को राजनैतिक जीवन का आधार बनाने से सर्वनाश ही होगा। "
इसी लिए टैगोर ने राष्ट्र की धारणा को भारत के लिए ही नहीं, अपितु विश्वव्यापी स्तर पर अमान्य करने का आग्रह रखा था। वे मानते थे कि
"भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता को छोड़ अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। आर्थिक रूप से भारत भले ही पिछड़ा हो, मानवीय मूल्यों में पिछड़ापन उसमें नहीं होना चाहिए। निर्धन भारत भी विश्व का मार्ग दर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त कर सकता है। भारत का इतिहास यह सिद्ध करता है कि भौतिक संपन्नता की चिंता न कर भारत ने अध्यात्मिक चेतना का सफलतापूर्वक प्रचार किया है "

टैगोर के राष्ट्रवाद पर यह लेख, उनकी पुस्तक नेशनलिज़्म इन इंडिया और अमर्त्य सेन की पुस्तक द आरगुमेंटेटिव इंडियन में लिखे गए उनके विचारों पर आधारित है। 1916 - 17 का काल दुनिया मे युद्धों का काल था। उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी ताकतें अपने वर्चस्व के लिये लड़ रही थी। दुनिया मे अफरातफरी मची तो थी, पर उतनी नहीं जितनी 1939 से 45 के बीच हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मची थी। हो सकता है इसका एक कारण यह भी हो कि संहार के युद्धक उपकरण प्रथम विश्वयुद्ध तक उतने नहीं आविष्कृत हो सके हों। युद्ध मे सत्ता लड़ती है और जनता मरती है। यह एक कटु सत्य है। आप दुनियाभर के युद्धों के इतिहास का अध्ययन करेंगे तो मेरी बात से सहमत होंगे। ऐसा ही प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी हुआ आए अगर कोई तीसरा इस स्केल का युद्ध होगा तो उसमे क्या होगा, इसकी कल्पना ही भयावह है। क्या पता उसका इतिहास लिखने के लिये कोई व्यास बचेगा भी कि नहीं।

यह भी एक संयोग ही है कि जिस राष्ट्रवाद को 1917 में, टैगोर मानवता के लिये खतरा बता रहे थे, उसी खतरे के फलस्वरुप 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया। पर टैगोर, 6 अगस्त 1945 को हुयी हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी देखने और सुनने के लिये जीवित नहीँ रहे, उसके पहले ही उनका निधन हो गया था।

आज हम फिर उसी आक्रामक राष्ट्रवाद की चपेट में है। यह राष्ट्रवाद का वह चेहरा नहीं है जो हम अपने महान स्वाधीनता संग्राम के दौरान जनगणमन में देख चुके हैं। यह राष्ट्रवाद का वह चेहरा है जो यूरोपीय तानाशाही से भरी श्रेष्ठतावाद और मिथ्या तुच्छता के प्रति अपार और हिंसक घृणा से भरा पडा है। जो युयुत्सु है। जन विरोधी है। अनुदार है। और जिसका अंत महाविनाश के रूप में हो चुका है, उसी की पुनरावृत्ति है। ग्रह तो बहुत से है। पृथ्वी भी एक ग्रह ही है। पर इसका महत्व इसकी निर्झरता, शस्यश्यामला, हरीतिमा, इस धरती पर विचरने वाले जीव, जंतु, वनस्पतियों और मनुष्यों पर टिका है। राष्ट्र एक भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं है कि सब कुछ मिडास की तरह स्वर्ण की लालसा में जड़ बना दिया जाय। राष्ट्र उसके नागरिकों , नागरिकों के सुख और उनके जीवन स्तर, बौद्धिक विकास और सुख तथा प्रसन्नता के मापदंड पर आधारित है। टैगोर की यही अवधारणा है।

© विजय शंकर सिंह