Thursday, 19 April 2018

Ghalib - Isharat e qatl gahe ahle tamannaa mat poochh / इशरत ए क़त्ल गाहे अहले तमन्ना मत पूछ - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 60
इशरत ए क़त्ल गाहे अहले तमन्ना मत पूछ,
ईद ए नज़्ज़ारा है, शमशीर का उरियाँ होना !!

Isharat e qatl gahe ahle tamannaa mat poochh,
Eid e nazzaaraa hai, shamasheer kaa uriyaan honaa !!
- Ghalib

इशरत - आनन्द
ईद ए नज़्ज़ारा - प्रसन्नता का प्रदर्शन
उरियाँ - प्रगट. ज़ाहिर
शमशीर - तलवार, खड्ग

प्राणों का उत्सर्ग करने के उत्सुक लोगों के लिये बधस्थल पर पहुंच कर भी आनन्द की अनुभूति होती है। उनके लिये बधिक की तलवार का म्यान से निकलना किसी उत्सव के दृश्य से कम नहीं होता है।

यहां तो क़त्ल होने में ही ग़ालिब को आंनद प्राप्त हो रहा है। क़ातिल हो या कत्लगाह या उरियाँ शमशीर यानी खुली हुयी तलवार,  जान लेने और जान देने के ये सब सामान भी आंनद की अनुभूति दे सकते हैं यह कल्पना तो गालिब ही कर सकते हैं ! जब मौत को ही लक्ष्य मान लिया जाय तो लक्ष्य की प्राप्ति का आनंद तो अपरिमित होता है। पर क़ातिल, कत्लगाह और उरियाँ शमशीर किस बात के प्रतीक है ?

इस शेर को आलोचकों ने आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी देखा है और इश्क़ ओ मुहब्बत के प्रचलित नुक़्ता ए नज़र से भी। क़त्ल कत्लगाह और उरियाँ शमशीर यहां प्रेयसी, मिलन स्थल और प्रेयसी की भ्रू भंगिमा है। जब इन तीनों का ही एक जगह मेल हो जाय तो ग़ालिब क्या किसी का भी बचना मुश्किल हो जाय। ऐसे क़ातिल, ऐसे कत्लगाह और ऐसी शमशीर का साम्म्ना करने के लिये वे खुशी खुशी निकल पड़ते है ।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें से तो, जब ईश्वर के दर पर जाना हो तो और उसका दर्शन सुलभ हो तो मुक्ति तो होनी ही है। ऐसी मुक्ति जो सभी बंधनो से मुक्त कर दे स्वतः आनन्द का कारण है । गालिब के शेर भी बहुधा कई अर्थ समेटे रहते हैं। हमारे अमर शहीदों को ही देखिये, जिनका वज़न फांसी की तिथि को बढ़ जाता था और वह बधिक स्थल भी उन्हें आह्लादित कर देता था।

© विजय शंकर सिंह

Wednesday, 18 April 2018

प्रसून जोशी की प्रधानमंत्री जी से लंदन में बातचीत - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

प्रसून जोशी जो फ़िल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड के चेयरमैन हैं ने 18 अप्रैल 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लिया। प्रधानमंत्री विदेश यात्रा के सिलसिले में लंदन में थे। उनके इस इंटरव्यू की आलोचना हो रही है। यह एक पेशेवराना इंटरव्यू नहीं लगा बल्कि लोगों को यह एक तयशुदा दोस्ताना इंटरव्यू लगा। इस धार विहीन इंटरव्यू के लिये प्रसून जोशी की सोशल मीडिया पर आलोचना भी हो रही है। लेकिन, प्रसून जोशी से यह उम्मीद ही क्यों थी कि वे एक पेशेवर पत्रकार की तरह जो असहज सवालों से ही अपने इंटरव्यू की शुरुआत करता है, सवाल पूँछेंगे ?

वे एक कवि हैं और फिल्मों के लिये भी गीत लिखते हैं। फिल्मों के लिये गीत तो स्क्रिप्ट और सिचुएशन के अनुसार लिखे जाते है। कहते हैं वहां तो धुन पर शब्द गढ़े जाते हैं, शब्द पर धुन बहुत ही कम। बहुत से साहित्यिक पुराधाओं ने अपनी लेखकीय और बौद्धिक स्वाधीनता के साथ कोई समझौता नहीं किया और फिल्मों से किनारा कर लिया। प्रेमचंद, अमृतलाल नागर आदि शासियतें इसका उदाहरण हैं। प्रसून जोशी  एक सरकारी पद पर है। सरकार के कृपा पात्र हैं। व्यवस्था के अंदर रह कर व्यवस्था का विरोध सब के बस की बात नहीं होती है। उन्होंने एक तयशुदा स्क्रिप्ट और संगीत के धुनों के आधार पर अपनी प्रश्नोत्तरी बनायी और त्वदीयं वस्तु गोविन्दम कह कर इंटरव्यू ले लिया। प्रधानमंत्री जी भी लीक हुये प्रश्न पत्र के समक्ष बैठे हुये छात्र की तरह दिखे। इस इंटरव्यू में न तो उनका गला सूखा और न ही उन्होंने पानी मांगा। यह भी अच्छा हुआ क्यों कि यह इंटरव्यू लंदन में था। वहां सब ठीक ठीक होना भी चाहिये। दूसरे गांव में मलिकार असहज हों तो घर भर की साख घटती है। प्रसून जोशी ने अपनी भूमिका का निर्वाह अपने पद के अनुरूप किया। दास भाव जब नौकरशाही में बहुतायत का स्थायी भाव बन गया हो तो, प्रसून जोशी की निंदा और प्रशंसा क्या की जाय ।

प्रधानमंत्री की भी अपनी मज़बूरी है। मेज़  के जिस तरफ आप बैठते हैं वैसी ही भूमिका में आप आ जाते हैं। अभी वे दाहिने बैठे हैं तो दाहिने वाली बात करेंगे । कल जब वे बायें बैठते थे तो बामपंथी बातें करते थे। उन्हें भी अपनी सरकार का बचाव करने का हक़ उतना ही है जितना हमें उस सरकार की खामियां गिनाने का । जब चार साल तक प्रधानमंत्री ने देश के अंदर कोई खुला और पेशेवर पत्रकार वार्ता का सामना नहीं किया तो उनके इस तयशुदा इंटरव्यू पर क्या टीका टिप्पणी की जाय । यह एक लीक हुए प्रश्नपत्र का जवाब था और कुछ नही।

© विजय शंकर सिंह

Ghalib - Isharat e qatraa hai / इशरत ए कतरा है - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 59.
इशरत ए क़तरा है
दरिया में फना हो जाना !!

Isharat e qatraa hai,
Dariyaa mein fanaa ho jaanaa !!
- Ghalib.

इशरत - आनन्द

बूंद का सागर में विलीन हो जाना ही आंनद की प्राप्ति है।

ग़ालिब का यह शेर सनातन दर्शन की अभिव्यक्ति है। बूंद यहां जीव और दरिया सागर या सरिता जो भी समझ लें ब्रह्म का प्रतीक है। जीव ब्रह्म में विलीन होने के लिये सदैव इच्छुक रहता है। जीव का लक्ष्य ही ब्रह्म में विलीन हो जाना है। लक्ष्य के प्राप्त हो जाने से परम आंनद क्या हो सकता है ?

जीव, ब्रह्म, माया आदि इन जटिल दार्शनिक सवालों का जबाब ढूंढते-ढूंढते वेदांत दर्शन के अनेक सम्रदाय बन गए है । अद्वैतवाद कहता है ,जीव और ब्रम्ह एक है । विशिष्टाद्वैत कहता है, एक ही ब्रम्ह में जीव तथा अचेतन प्रकृति विशेषण रूप में विद्यमान है । द्वैतवाद जीव और ब्रम्ह को दो अलग- अलग मानता है और द्वैताद्वैत किसी दृष्टि से दो और किसी दृष्टि से नहीं मानते है ,लेकिन वास्तव में ईश्वर और जीव दो तात्विक रूप में ब्रह्म ही है लेकिन उपाधि भेद के कारन दोनों में अंतर है । ईश्वर की उपाधियाँ शाश्वत ,अपरिमेय ज्ञान और शक्तिशाली है और जीव की उपाधियाँ अविद्या , काम और मन का शारीरिक तंत्र है ,जीव उपासक है और ईश्वर उपास्य है तथा जीव प्राप्तकर्ता है और ईश्वर जिसे काल ब्रम्ह भी कहते है वह प्राप्य है ।

अब इसी से जुलते मिलते कबीर के एक दोहे पर नज़र डालें। कबीर का भी दार्शनिक पक्ष कम जटिल नहीं रहा है। वे थे भी काशी के ही। जहां का हर व्यक्ति गंगा के किनारे जीव, ब्रह्म, माया आदि की ही बातें करता है। फिर कबीर तो कबीर ही है। कबीर का यह दोहा पढ़ें ।

उदक समुंद सलिल की सास्य, नदी तरंग समावाहिगे,
सुन्न हि सुन्न मिल्या, समदर्शी , पवम रूप होंहि जाबहिगे !!
( कबीर  )

जल, सागर, सरिता, इन सबके समान हम नदी में समाहित हो जाएंगे । जैसे शून्य में शून्य समा कर विलीन हो जाता है, वैसे ही हम समदर्शी हो परमपद को प्राप्त हो जाएंगे।

ग़ालिब का ' कतरे का दरिया में फना ' हो जाना भी एक प्रकार की परमपद की प्राप्ति है। कबीर और ग़ालिब के काल खंड में ढाई सौ साल का अंतर है। स्थान का भी अंतर है। ग़ालिब दिल्ली में थे और कबीर काशी में। ग़ालिब एक सामंती पृष्ठभूमि के पढ़े लिखे आभिजात्य थे, पर कबीर मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्यो नहीं हांथ , पर यह अद्भुत दार्शनिक समता दोनों ही महान कवियों में है ।

© विजय शंकर सिंह

शौचालय या सफाई अभियान के पीछे भी गांधी जी ही है / विजय शंकर सिंह

2014 में सरकार बनने के बाद 2 अक्टूबर को जब गांधी जयंती आयी तो वे सारे लोग जो सरकार में थे और संघ की विचारधारा से भाजपा में आये थे एक अजीब धर्म संकट में पड़ गए कि गांधी जयंती को किया क्या जाय। गांधी और उनके विचार के खिलाफ तो वे पिछले 90 सालों से है। जयंती न मने ऐसा हो भी नहीं सकता था। फिर, गांधी के अनेक प्रयोग और विचारों में से सफाई वाला मामला ढूंढा गया। यह थोड़ा सहज था और वैचारिक समझौते से दूर भी था।  इसमे वैचारिक विरोध और द्वंद्व की भी संभावना नहीं थी। इस लिये बड़े जोर से स्वच्छता की बात की गयी। प्रधानमंत्री जी ने खुद ही दिल्ली के एक थाने में झाड़ू लगायी। लोग भी साफ सफाई के दिखावे पर उतर आए। कुछ साफ सड़कों पर भी झाड़ू लगाई गई। ये सब झाडूबाज़ी एक प्रतीकात्मक संदेश था। संदेश भी उत्तम था। गांधी जी खुद अपना शौचालय साफ करते थे। इसको ले कर उनका बा से विवाद भी हुआ। गांधी की जीवनी में रुचि रखने वालों को यह प्रसंग अनेक पुस्तकों में मिला होगा। तभी स्वच्छ भारत मिशन का गठन हुआ। गांधी जी के पतली कमानी और गोल शीशे वाले चश्मे को इसका प्रतीक चिह्न बनाया गया। एक पर स्वच्छ और दूसरे पर भारत लिखा गया। सरकार को कोई अभियान चलाने के लिये धन की ज़रूरत होती है। इसके लिये स्वछता सेस या उपकर लगाया गया। यह एक नया कर था।

गांधी जी के अनेक प्रयोग और विचारों जो सत्य बोलने, सामाजिक समरसता की बात करने, अछूतोद्धार से सम्बंधित, सम्पत्ति को ट्रस्टीशिप समझने, बुनियादी तालीम की बात करने, सामाजिक उन्नति करने के अन्य विचारों को हांथ नहीं लगाया गया। इनको छूना राजनीतिक दलों के लिये खतरे से खाली नहीं है। इस लिये वैष्णव जन जो तेने कहिये की एक रामधुन, राजघाट पर सफेद चांदनी बिछी फर्श पर सफेद गावतकिये के सहारे शुभ्र परिधान में थोड़ा मुंह लटका कर बैठ लेने और फिर हे राम से उत्कीर्ण समाधि पर सर टिका कुछ पुष्प अर्पित कर लेने से इस राष्ट्रीय पर्व की इति श्री हो जाती है। कौन पचड़े में पड़े गांधी के अन्य विचारों के।

वर्तमान सरकार जिस विचारधारा से दीक्षित दल की है , वह गांधी विरोधी विचारधारा है। इस विचारधारा का गांधीवाद से तो विरोध है ही अपितु गांधी के नाम से ही है। इनका विरोध नफरत की हद तक है। बल्कि कभी कभी तो यह नफरत भी बेहद है। पर गांधी भी विचित्र हैं। उनकी तमाम बातों से असहमति के बाद भी गांधी को नकारा नहीं जा सकता है। चाहते तो वे गांधी को नकारना ही , पर जब भी वे ऐसा उपक्रम करते हैं गांधी राजघाट से उठ कर जनपथ पर आ जाते हैं। गांधी का साफ सफाई एजेंडा ही सबसे निरापद लगा सो उन्होंने ग्रहण कर लिया। बाकी तो वे छूना भी नहीं चाहते हैं क्यों कि उस से उनकी मूल विचारधारा आहत होती है। यहां गांधी उनकी मजबूरी हैं।

क्या कभी सरकार ने यह बताया कि नियमित कराधान के बाद भी जो स्वच्छता सेस सहित अन्य सेस वसूले जा रहे हैं उनका व्यय कहाँ किया जा रहा है ? नैतिक और वित्तीय अनुशासन के अनुसार यह आवश्यक है कि जिस बात के लिये सेस वसूला जाय उसी में उसे व्यय किया जाय। सेस की ज़रूरत ही इस लिये पड़ती है कि सरकार के पास नियमित बजट में उस कार्य के लिये धन नहीं है जो उसे करना है तो वह अस्थायी रूप से सेस लगाती है। पर नैतिक अनुशासन को तो भूल ही जाइये, वित्तीय अनुशासन की भी जम कर अवहेलना हो रही है। यह हम सबको पता भी नहीं कि स्वछता सेस शिक्षा सेस का व्यय इन्हीं मंदों पर हो रहा है या अन्य कहीं और। जिस प्रकार का वित्तीय प्रबंधन चल रहा है वह कु प्रबंधन ही है। मुझे लगता है हम कहीं वित्तीय अराजकता और वित्तीय आपातकाल की ओर तो नहीं बढ रहे हैं ?

© विजय शंकर सिंह

Tuesday, 17 April 2018

खलील जिब्रान की लघुकथा - अंर्तदृष्टि / विजय शंकर सिंह

मैंने और मेरे दोस्त ने देखा कि मंदिर के साये में एक अंधा अकेला बैठा था. मेरा दोस्त बोला, 
“देश के सबसे बुद्दिमान आदमी से मिलो.”
मैंने दोस्त को छोड़ा अर अंधे के पास जाकर उसका अभिवादन किया. फिर बातचीत शुरू हुई.
कुछ देर बाद मैंने कहा, 
“मेरे पूछने का बुरा न मानना, आप अंधे कब हुए?”
“जन्म से अंधा हूं.” उसने कहा.
“और आप विशेषज्ञ किस विषय के हैं?” मैंने पूछा.
“खगोलविद हूं.” उसने कहा.
फिर अपना हाथ अपनी छाती पर रखकर वह बोला, “ये सारे सूर्य, चन्द्र और तारे मुझे दिखाई देते हैं.”
खलील जिब्रान
***
© विजय शंकर सिंह

Ghalib - Ishq o mazduuree e isharatgahe Khusro / इश्क़ ओ मज़दूरी ए इशरतगहे खुसरो - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह


ग़ालिब - 58.
इश्क ओ मज़दूरी ए इशरतगहे खुसरो क्या खूब,
हमको तसलीम निकोनामी ए फरहाद नहीं !!

Ishq o mazduuree e isharat'gahe Khusro kyaa khoob,
Ham ko tasaleem nikonaamii e farhaad nhin !!
- Ghalib

इशरतगहे - भोग विलास का स्थान, स्वर्ग.
खुसरो - फारस का एक बादशाह जो शीरीं का पिता था.
तस्लीम - स्वीकार
निकोनामी - प्रसिद्धि, नेकनामी.

प्रेम और वह भी खुसरो बादशाह के महल की मज़दूरी के बदले । वाह यह भी क्या खूब मेल है । हमे फरहाद जैसी नेकनामी नहीं चाहिये। प्रेम के अभीष्ट की प्राप्ति के लिये हम मजदूर नहीं बन सकते है।
ग़ालिब के जीवन की कठिनाइयों के लिये उनका आत्मसम्मान भाव भी कम जिम्मेदार नहीं रहा है। उनके इस आत्मसम्मान भाव को उनके समकालीन उनका अहंकार , दंभ या घमंड भी मानते है। यही आत्मसम्मान भाव उनके अनेक शत्रु भी पैदा करता रहा है और उन्हें समाज से काट कर एकाकी भी बनाता रहा है। यह अकेलापन जो कभी कभी उनमें  अवसाद के मानिंद दिखता है  वह उनके अनेक शेरों और गज़लों में बड़ी खूबसूरती से नुमाया है।

इसी शेर में देखें। वे प्रेम तो करना चाहते हैं। प्रेम का अभीष्ट पाना भी चाहते हैं। पर प्रेम में वह फरहाद जैसी दीवानगी नहीं चाहते जो उन्हें मज़दूर बना दे। वह फरहाद जैसी प्रसिद्धि पाने के लिये मज़दूर नहीं बन सकते हैं। ऐसी नेकनामी, प्रसिद्धि फरहाद को ही मुबारक हो। फरहाद, शीरीं फरहाद की अमर प्रेमकथा का नायक है।
यह कहानी इस प्रकार है।
फारस की पृष्ठभूमि में जन्मी इस कहानी का पात्र फरहाद एक शिल्पकार था, जो राजकुमारी शीरीं से बेइंतहा मुहब्बत करता था, लेकिन राजकुमारी इस प्रेम से अनभिज्ञ थी। निराश फरहाद पहाडों में जाकर रहने लगा और बांसुरी पर राजकुमारी की प्रशंसा में धुनें बजाने लगा। जब यह बात शीरीं को मालूम हुई तो वह फरहाद से मिली और उसके प्रेम में गिरफ्त हो गई। शीरीं के पिता और राजा नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी एक आम आदमी से शादी करे। आखिर उन्होंने अपनी बेटी के सामने शर्त रखी कि यदि फरहाद पहाडों के बीच चट्टानों में नहर खोद दे तो वह शीरीं का विवाह उससे कर देंगे। यह बेहद मुश्किल कार्य था, लेकिन फरहाद ने नहर खोदनी शुरू की। उसकी अथक मेहनत देखकर राजा को लगा कि कहीं फरहाद अपना लक्ष्य प्राप्त न कर ले। नहर पूरी होने को थी, घबराए हुए राजा ने अपने दरबारियों से बेटी के विवाह की खातिर मशविरा करना चाहा। उनके वजीर ने सलाह दी कि किसी बूढी स्त्री को फरहाद के पास भेजें और यह संदेश दें कि राजकुमारी की मौत हो चुकी है। तब एक बूढी स्त्री फरहाद के पास पहुंची और जोर-जोर से रोने लगी। फरहाद ने उससे रोने का कारण पूछा तो बुढिया ने कहा, तुम जिसके लिए अपने शरीर को खटा रहे हो-वह तो मर चुकी है। यह सुनकर फरहाद को सदमा पहुंचा और उसने अपने औजारों से खुद को मार लिया, नहर बन चुकी थी, मगर पानी की जगह उसमें फरहाद का लहू बह रहा था। फरहाद की मौत की खबर सुनकर शीरीं ने भी खुद को खत्म कर लिया। इस तरह एक और प्रेम कहानी असमय मौत की गोद में सो गई।

ग़ालिब इस प्रेम कथा के अमर प्रेमी फरहाद की तरह नहीं बनना चाहते हैं। वे कहते हैं कि वे प्रेम पाने के लिये खुसरो बादशाह, जो शीरीं का पिता और राजा था, की मज़दूरी नहीं कर सकते । यहां उनका आत्मसम्मान भाव आड़े आ जाता है।
इसी से मिलता जुलता बर्क़ का यह शेर पढ़ें।

बे इबादत खुदा न बख्शेगा, सुभान अल्लाह,
ऐसे फिरदौस से हम गुज़रे, कि मज़दूर नहीं हैं !!
( बर्क़ )

बिना इबादत , प्रार्थना के खुदा, हमे पाप मुक्त नहीं करेगा।  इस बात को मैं नहीं मानता। यदि वह जन्नत न दे तो न दे। हम कोई मज़दूर नहीं है।

बर्क़ तो एक हाथ और आगे निकल गए है। वह ईश्वर को खुदा को ही चुनौती देते हुये कह रहे हैं, बिना इबादत ही जन्नत दे खुदा तो दे, मैं मज़दूर नहीं हूं कि इबादत के लिये मेहनत करूँ।

कबीर ने भी ऐसा ही कुछ कहा है। जब वे काशी से मगहर निष्काषित हो कर भेजे गए तो उन्होंने भी कहा,
जो कबीरा काशी मरैं, रामहि कौन निहोरा !!

यदि कबीर को काशी में ही मर कर स्वर्ग जाना है तो, राम का कौन सा एहसान है। काशी में तो जो मरता है वह सभी स्वर्ग ही जाता है। मगहर में मरने पर स्वर्ग मिले तो राम का एहसान मानूँ।

© विजय शंकर सिंह

कठुआ कांड पर श्वेताम्बरी शर्मा डीएसपी का कथन -मेरी वर्दी ही मेरा धर्म है - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह


श्वेताम्बरी जम्मू कश्मीर पुलिस सेवा के 2012 बैच की डीएसपी हैं। पुलिस सेवा में आने के पूर्व वे माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय में अध्यापन भी कर चुकी हैं और वे डॉक्टरेट भी है। कठुआ बलात्कार कांड की विवेचना के लिये जो एसआईटी गठित हुयी थी, की वे अकेली महिला अधिकारी सदस्य थीं। The Quint को दिए गए अपने एक साक्षात्कार में वे इस मामले की विवेचना में मिली चुनौती के सम्बंध में कहती हैं,

“The people we believed were involved in the gruesome rape and murder of that 8-year-old angel, their relatives and sympathisers, including a multitude of the lawyers, left no stone unturned to disrupt our investigation. They went to the extreme of our humiliation and harassment. But we stood our ground firmly till the end,”

इन चुनौतियों ने उन्हें हतोत्साहित तो नहीं किया पर कठिन परिश्रम कर के तथ्यान्वेषण करने के लिये और उत्सुक किया। मुल्ज़िम पक्ष के लोग धन, बल आदि सभी तरकीबें आज़मा रहे थे। पर एसआईटी टीम अपने काम पर जुटी रही।

“We worked against heavy odds. At times we were disappointed, particularly when we learned that even the men of Hiranagar Police Station had been bribed to hush up the case and they had washed away the young victim’s clothes to destroy material evidences. Yet we cracked this rape and murder mystery during the holy navrataras. I believe there was a divine intervention to bring the culprits to justice. I believe Durga Mata had her hand on our head,”

23 जनवरी 2018 को इस अभियोग की विवेचना अपराध शाखा को सरकार ने सुपुर्द की। एसआईटी के प्रमुख थे, आलोक पुरी आईजी, अहफादुल मुज्तबा आईजी, रमेश कुमार जल्ला एसएसपी, नवेद पीरज़ादा अडिशनल एसपी, श्वेताम्बरी शर्मा डीएसपी, सब इंस्पेक्टर इरफान वानी, सब इंस्पेक्टर केके गुप्ता और सब इंस्पेक्टर तारिक़ अहमद। एसआईटी ने विवेचना के बाद 9 अप्रैल 2018 को दो आरोप पत्र अदालत में दाखिल किये। श्वेताम्बरी के अनुसार इस अभियोग की विवेचना में उन पर दबाव भी कम नहीं पड़े। उन्ही के शब्दों में,

“As most of the accused were Brahmins, they over-emphasised their surnames. They particularly tried to influence me and communicated through different means that we belonged to one religion and one caste and I must not hold them guilty of the rape and murder of a Muslim girl. I told them that as an officer of the J&K Police, I had no religion and my only religion was my police uniform”.

जब धर्म और जाति के जुगाड़ का यह दांव असफल हो गया तो, उन्होंने धरना प्रदर्शन और धमकी के मार्ग का रास्ता चुना।

“When all such tactics failed, their families and sympathisers resorted to blackmailing and intimidation through whatever means at hand. They carried lathis, shouted slogans, organised rallies under the tricolour and blocked our roads to different villages and finally the court. But with perseverance and patience we stood our ground to carry out our job with total determination, commitment and professionalism,”

श्वेताम्बरी के अनुसार सबसे बड़ी चुनौती थी अभियुक्तों का पता लगाना और उन्हें सुबूत के साथ गिरफ्तार करना। ऐसी सफलता एसआईटी को मिली भी। अदालत में जब जमानत पर सुनवाई हो रही थी जो वहां क्या हुआ, इस पर उनका कहना है,

“During the hearing of a bail petition, which was subsequently dismissed, we entered the court to make relevant arguments. But, instead of arguing as defence lawyers, a crowd of 10 to 20 lawyers held demonstrations. They insisted we name the accused, knowing well that we were barred. We repeatedly faced a hostile crowd outside the courts. We did nothing but to request the SHO to file an FIR. When he didn’t, we approached the district magistrate through the head of our SIT. There was anarchy and intimidation all around,”

पूछताछ के दौरान भी कई ऐसे अवसर आये जब श्वेताम्बरी असहज हुयीं, पर उन्होंने कहा, कि माँ दुर्गा ने उन्हें साहस दिया और वे अपने मिशन में सफल रहीं।
उन्हीं के शब्दों में,

“It was the most difficult .Sleep eluded me. I stayed awake for nights. I was not available as my husband’s partner, when he went for family and social commitments. I couldn’t take care of my child properly who had to be prepared for exams. But thank God we have been successful in our job and I am satisfied that I, along with other members of my team, have done something to bring those rapists and killers to justice.”

अब यह मामला अदालत में है। उन्हें अदालत पर पूरा विश्वास है।
“We have full faith in the judiciary. We are all hopeful that justice will be delivered as our investigation is fool-proof and supported not only by confessions but also by other necessary evidences including technical and scientific one. "

यूनिफॉर्म का न कोई धर्म होता है और न कोई जाति। बस कानून होता है और कानून का विधि सम्मत पालन करने की सदिच्छा।

© विजय शंकर सिंह