Tuesday, 23 January 2018

आचार्य रामचंद्र शुक्ल - जायसी के पद्मावत का कथा सार / विजय शंकर सिंह

कवि सिंहलद्वीप, उसके राजा गंधर्वसेन, राजसभा, नगर, बगीचे इत्यादि का वर्णन कर के पद्मावती के जन्म का उल्लेख करता है। राजभवन में हीरामन नाम का एक अद्भुत सुआ था जिसे पद्मावती बहुत चाहती थी और सदा उसी के पास रह कर अनेक प्रकार की बातें कहा करती थी। पद्मावती क्रमश: सयानी हुई और उसके रूप की ज्योति भूमंडल में सबसे ऊपर हुई। जब उसका कहीं विवाह न हुआ तब वह रात दिन हीरामन से इसी बात की चर्चा किया करती थी। सूए ने एक दिन कहा कि यदि कहो तो देश देशांतर में फिर कर मैं तुम्हारे योग्य वर ढूँढ़ूँ। राजा को जब इस बातचीत का पता लगा तब उसने क्रुद्ध हो कर सूए को मार डालने की आज्ञा दी। पद्मावती ने विनती कर किसी प्रकार सूए के प्राण बचाए। सूए ने पद्मावती से विदा माँगी, पर पद्मावती ने प्रेम के मारे सूए को रोक लिया। सूआ उस समय तो रुक गया, पर उसके मन में खटका बना रहा।

एक दिन पद्मावती सखियों को लिए हुए मानसरोवर में स्नान और जलक्रीड़ा करने गई। सूए ने सोचा कि अब यहाँ से चटपट चल देना चाहिए। वह वन की ओर उड़ा, जहाँ पक्षियों ने उसका बड़ा सत्कार किया। दस दिन पीछे एक बहेलिया हरी पत्तियों की टट्टी लिए उस वन में चला आ रहा था। और पक्षी तो उस चलते पेड़ को देख कर उड़ गए पर हीरामन चारे के लोभ में वहीं रहा। अंत में बहेलिए ने उसे पकड़ लिया और बाजार में उसे बेचने के लिए ले गया। चित्तौर के एक व्यापारी के साथ एक दीन ब्राह्मण भी कहीं से रुपए ले कर लोभ की आशा से सिंहल की हाट में आया था। उसने सूए को पंडित देख मोल ले लिया और ले कर चित्तौर आया। चित्तौर में उस समय राजा चित्रसेन मर चुका था और उसका बेटा रत्नसेन गद्दी पर बैठा था। प्रशंसा सुन कर रत्नसेन ने लाख रुपए दे कर हीरामन सूए को मोल ले लिया।

एक दिन रत्नसेन कहीं शिकार को गया था। उसकी रानी नागमती सूए के पास आई और बोली – ‘मेरे समान सुंदरी और भी कोई संसार में है?’ इस पर सूआ हँसा और उसने सिंहल की पद्मिनी स्त्रियों का वर्णन कर के कहा कि उनमें और तुममें दिन और अँधेरी रात का अंतर है। रानी ने सोचा कि यदि यह तोता रहेगा तो किसी दिन राजा से भी ऐसा ही कहेगा और वह मुझसे प्रेम करना छोड़कर पद्मावती के लिए जोगी हो कर निकल पड़ेगा। उसने अपनी धाय से उसे ले जा कर मार डालने को कहा। धाय ने परिणाम सोचकर उसे मारा नहीं, छिपा रखा। जब राजा ने लौटकर सूए को न देखा तब उसने बड़ा कोप किया। अंत में हीरामन उसके सामने लाया गया और उसने सब वृत्तांत कह सुनाया। राजा को पद्मावती का रूपवर्णन सुनने की बड़ी उत्कंठा हुई और हीरामन ने उसके रूप का लंबा-चौड़ा वर्णन किया। उस वर्णन को सुन राजा बेसुध हो गया। उसके हृदय में ऐसा प्रबल अभिलाष जगा कि वह रास्ता बताने के लिए हीरामन को साथ ले जोगी हो कर घर से निकल पड़ा।

उसके साथ सोलह हजार कुँवर भी जोगी हो कर चले। मध्यप्रदेश के नाना दुर्गम स्थानों के बीच होते हुए सब लोग कलिंग देश में पहुँचे। वहाँ के राजा गजपति से जहाज ले कर रत्नसेन ने और सब जोगियों के सहित सिंहलद्वीप की ओर प्रस्थान किया। क्षार समुद्र, क्षीर समुद्र, दधि समुद्र, उदधि समुद्र, सुरा समुद्र और किलकिला समुद्र को पार कर के वे सातवें मानसरोवर समुद्र में पहुँचे जो सिंहलद्वीप के चारों ओर है। सिंहलद्वीप में उतर कर जोगी रत्नसेन तो अपने सब जोगियों के साथ महादेव के मंदिर में बैठ कर तप और पद्मावती का ध्यान करने लगा और हीरामन पद्मावती से भेंट करने गया। जाते समय वह रत्नसेन से कहता गया कि वसंत पंचमी के दिन पद्मावती इसी महादेव के मंडप में वसंतपूजा करने आएगी; उस समय तुम्हें उसका दर्शन होगा और तुम्हारी आशा पूर्ण होगी।

बहुत दिन पर हीरामन को देख पद्मावती बहुत रोई। हीरामन ने अपने निकल भागने और बेचे जाने का वृत्तांत कह सुनाया। इसके उपरांत उसने रत्नसेन के रूप, कुल, ऐश्वर्य, तेज आदि की बड़ी प्रशंसा कर के कहा कि वह सब प्रकार से तुम्हारे योग्य वर है और तुम्हारे प्रेम में जोगी हो कर यहाँ तक आ पहुँचा है। पद्मावती ने उसकी प्रेमव्यथा सुन कर जयमाल देने की प्रतिज्ञा की और कहा कि वसंत पंचमी के दिन पूजा के बहाने मैं उसे देखने जाऊँगी। सूआ यह समाचार ले कर राजा के पास मंडप में लौट आया।

वसंत पंचमी के दिन पद्मावती सखियों के सहित मंडप में गई और उधर भी पहुँची जिधर रत्नसेन और उसके साथी जोगी थे। पर ज्योंही रत्नसेन की ऑंखें उस पर पड़ीं, वह मूर्च्छित हो कर गिर पड़ा। पद्मावती ने रत्नसेन को सब प्रकार से वैसा ही पाया जैसा सूए ने कहा था। वह मूर्च्छित जोगी के पास पहुँची और उसे होश में लाने के लिए उस पर चंदन छिड़का। जब वह न जागा तब चंदन से उसके हृदय पर यह बात लिख कर वह चली गई कि ‘जोगी, तूने भिक्षा प्राप्त करने योग्य योग नहीं सीखा, जब फलप्राप्ति का समय आया तब तू सो गया।’

राजा को जब होश आया तब वह बहुत पछताने लगा और जल मरने को तैयार हुआ। सब देवताओं को भय हुआ कि यदि कहीं यह जला तो इसकी घोर विरहाग्नि से सारे लोक भस्म हो जाएँगे। उन्होंने जा कर महादेव पार्वती के यहाँ पुकार की। महादेव कोढ़ी के वेश में बैल पर चढ़े राजा के पास आए और जलने का कारण पूछने लगे। इधर पार्वती की, जो महादेव के साथ आईं थीं, यह इच्छा हुई कि राजा के प्रेम की परीक्षा लें। ये अत्यंत सुंदरी अप्सरा का रूप धर कर आईं और बोली – ‘मुझे इंद्र ने भेजा है। पद्मावती को जाने दे, तुझे अप्सरा प्राप्त हुई।’ रत्नसेन ने कहा – ‘मुझे पद्मावती को छोड़ और किसी से कुछ प्रयोजन नहीं।’ पार्वती ने महादेव से कहा कि रत्नसेन का प्रेम सच्चा है। रत्नसेन ने देखा कि इस कोढ़ी की छाया नहीं पड़ती है, इसके शरीर पर मक्खियाँ नहीं बैठती हैं और इसकी पलकें नहीं गिरती हैं अत: यह निश्चय ही कोई सिद्ध पुरुष है। फिर महादेव को पहचान कर वह उनके पैरों पर गिर पड़ा। महादेव ने उसे सिद्धि गुटिका दी और सिंहलगढ़ में घुसने का मार्ग बताया। सिद्धि गुटिका पा कर रत्नसेन सब जोगियों को लिए सिंहलगढ़ पर चढ़ने लगा।

राजा गंधर्वसेन के यहाँ जब यह खबर पहुँची तब उसने दूत भेजे। दूतों से जोगी रत्नसेन ने पद्मिनी के पाने का अभिप्राय कहा। दूत क्रुद्ध हो कर लौट गए। इस बीच हीरामन रत्नसेन का प्रेमसंदेश ले कर पद्मावती के पास गया और पद्मावती का प्रेम भरा सँदेसा आ कर उसने रत्नसेन से कहा। इस संदेश से रत्नसेन के शरीर में और भी बल आ गया। गढ़ के भीतर जो अगाध कुंड था वह रात को उसमें धँसा और भीतरी द्वार को, जिसमें वज्र के किवाड़ लगे थे, उसने जा खोला। पर इस बीच सबेरा हो गया और वह अपने साथी जोगियों के सहित घेर लिया गया। राजा गंधर्वसेन के यहाँ विचार हुआ कि जोगियों को पकड़ कर सूली दे दी जाय। दल बल के सहित सब सरदारों ने जोगियों पर चढ़ाई की। रत्नसेन के साथी युद्ध के लिए उत्सुक हुए पर रत्नसेन ने उन्हें यह उपदेश दे कर शांत किया कि प्रेममार्ग में क्रोध करना उचित नहीं। अंत में सब जोगियों सहित रत्नसेन पकड़ा गया। इधर यह सब समाचार सुन पद्मावती की बुरी दशा हो रही थी। हीरामन सूए ने जा कर उसे धीरज बँधाया कि रत्नसेन पूर्ण सिद्ध हो गया है, वह मर नहीं सकता।

जब रत्नसेन को बाँध कर सूली देने के लिए लाए तब जिसने जिसने उसे देखा सबने कहा कि यह कोई राजपुत्र जान पड़ता है। इधर सूली की तैयारी हो रही थी, उधर रत्नसेन पद्मावती का नाम रट रहा था। महादेव ने जब जोगी पर ऐसा संकट देखा तब वे और पार्वती भाँट भाँटिनी का रूप धर कर वहाँ पहुँचे। इस बीच हीरामन सूआ भी रत्नसेन के पास पद्मावती का यह संदेसा ले कर आया कि ‘मैं भी हथेली पर प्राण लिए बैठी हूँ, मेरा जीना मरना तुम्हारे साथ है।’ भाँट (जो वास्तव में महादेव थे) ने राजा गंधर्वसेन को बहुत समझाया कि यह जोगी नहीं राजा और तुम्हारी कन्या के योग्य वर है, पर राजा इस पर और भी क्रुद्ध हुआ। इस बीच जोगियों का दल चारों ओर से लड़ाई के लिए चढ़ा। महादेव के साथ हनुमान आदि सब देवता जोगियों की सहायता के लिए आ खड़े हुए। गंधर्वसेन की सेना के हाथियों का समूह जब आगे बढ़ा तब हनुमान जी ने अपनी लंबी पूँछ में सबको लपेट कर आकाश में फेंक दिया। राजा गंधर्वसेन को फिर महादेव का घंटा और विष्णु का शंख जोगियों की ओर सुनाई पड़ा और साक्षात् शिव युद्धस्थल में दिखाई पड़े। यह देखते ही गंधर्वसेन महादेव के चरणों पर जा गिरा और बोला – ‘कन्या आपकी है, जिसे चाहिए उसे दीजिए’। इसके उपरांत हीरामन सूए ने आ कर राजा रत्नसेन के चित्तौर से आने का सब वृत्तांत कह सुनाया और गंधर्वसेन ने बड़ी धूमधाम से रत्नसेन के साथ पद्मावती का विवाह कर दिया। रत्नसेन के साथी जो सोलह हजार कुँवर थे उन सबका विवाह भी पद्मिनी स्त्रियों के साथ हो गया और सब लोग बड़े आनंद के साथ कुछ दिनों तक सिंहल में रहे।

इधर चित्तौर में वियोगिनी नागमती को राजा की बाट जोहते एक वर्ष हो गया। उसके विलाप से पशु पक्षी विकल हो गए। अंत में आधी रात को एक पक्षी ने नागमती के दु:ख का कारण पूछा। नागमती ने उससे रत्नसेन के पास पहुँचाने के लिए अपना सँदेसा कहा। वह पक्षी नागमती का सँदेसा ले कर सिंहलद्वीप गया और समुद्र के किनारे एक पेड़ पर बैठा। संयोग से रत्नसेन शिकार खेलते-खेलते उसी पेड़ के नीचे जा खड़ा हुआ। पक्षी ने पेड़ पर से नागमती की दु:ख-कथा और चित्तौर की हीन दशा का वर्णन किया। रत्नसेन का जी सिंहल से उचटा और उसने स्वदेश की ओर प्रस्थान किया। चलते समय उसे सिंहल के राजा के यहाँ से विदाई में बहुत सा सामान और धन मिला। इतनी अधिक संपत्ति देख राजा के मन में गर्व और लोभ हुआ। वह सोचने लगा कि इतना अधिक धन ले कर यदि मैं स्वदेश पहुँचा तो फिर मेरे समान संसार में कौन है। इस प्रकार लोभ ने राजा को आ घेरा।
समुद्रतट पर जब रत्नसेन आया तब समुद्र याचक का रूप धर कर राजा से दान माँगने आया, पर राजा ने लोभवश उसका तिरस्कार कर दिया। राजा आधे समुद्र में भी नहीं पहुँचा था कि बड़े जोर का तूफान आया जिससे जहाज दक्खिन लंका की ओर बह गए। वहाँ विभीषण का एक राक्षस माँझी मछली मार रहा था। वह अच्छा आहार देख राजा से आ कर बोला कि चलो हम तुम्हें रास्ते पर लगा दें। राजा उसकी बातों में आ गया। वह राक्षस सब जहाजों को एक भयंकर समुद्र में ले गया जहाँ से निकलना कठिन था। जहाज चक्कर खाने लगे और हाथी, घोड़े, मनुष्य आदि डूबने लगे। वह राक्षस आनंद से नाचने लगा। इस बीच समुद्र का राजपक्षी वहाँ आ पहुँचा जिसके डैनों का ऐसा घोर शब्द हुआ मानो पहाड़ के शिखर टूट रहे हों। वह पक्षी उस दुष्ट राक्षस को चंगुल में दबा कर उड़ गया। जहाज के एक तख्ते पर एक ओर राजा बहा और दूसरे तख्ते पर दूसरी ओर रानी।

पद्मावती बहते-बहते वहाँ जा लगी जहाँ समुद्र की कन्या लक्ष्मी अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी। लक्ष्मी मूर्च्छित पद्मावती को अपने घर ले गई। पद्मावती को जब चेत हुआ तब वह रत्नसेन के लिए विलाप करने लगी। लक्ष्मी ने उसे धीरज बँधाया और अपने पिता समुद्र से राजा की खोज कराने का वचन दिया। इधर राजा बहते बहते एक ऐसे निर्जन स्थान में पहुँचा जहाँ मूँगों के टीलों के सिवा और कुछ न था। राजा पद्मिनी के लिए बहुत विलाप करने लगा और कटार ले कर अपने गले में मारना ही चाहता था कि ब्राह्मण का रूप धरकर समुद्र उसके सामने आ खड़ा हुआ और उसे मरने से रोका। अंत में समुद्र ने राजा से कहा कि तुम मेरी लाठी पकड़कर आँख मूँद लो; मैं तुम्हें जहाँ पद्मावती है उसी तट पर पहुँचा दूँगा।

जब राजा उस तट पर पहुँच गया तब लक्ष्मी उसकी परीक्षा लेने के लिए पद्मावती का रूप धारण कर रास्ते में जा बैठीं। रत्नसेन उन्हें पद्मावती समझ उनकी ओर लपका। पास जाने पर वे कहने लगीं – ”मैं पद्मावती हूँ।” पर रत्नसेन ने देखा कि यह पद्मावती नहीं है, तब चट मुँह फेर लिया। अंत में लक्ष्मी रत्नसेन को पद्मावती के पास ले गई। रत्नसेन और पद्मावती कई दिनों तक समुद्र और लक्ष्मी के मेहमान रहे। पद्मावती की प्रार्थना पर लक्ष्मी ने उन सब साथियों को भी ला खड़ा किया जो इधर-उधर बह गए थे। जो मर गए थे वे भी अमृत से जिला दिए गए। इस प्रकार बड़े आनंद से दोनों वहाँ से विदा हुए। विदा होते समय समुद्र ने बहुत से अमूल्य रत्न दिए। सबसे बढ़कर पाँच पदार्थ दिए – अमृत, हंस, राजपक्षी, शार्दूल और पारस पत्थर। इन सब अनमोल पदार्थों को लिए अंत में रत्नसेन और पद्मावती चित्तौर पहुँच गए। नागमती और पद्मावती दोनों रानियों के साथ रत्नसेन सुखपूर्वक रहने लगे। नागमती से नागसेन और पद्मावती से कमलसेन ये दो पुत्र राजा को हुए।

चित्तौर की राजसभा में राघव चेतन नाम का एक पंडित था जिसे यक्षिणी सिद्ध थी। एक दिन राजा ने पंडितों से पूछा, ‘दूज कब है?’ राघव के मुँह से निकला, ‘आज’। और सब पंडितों ने एक स्वर से कहा कि ‘आज नहीं हो सकती, कल होगी।’ राघव ने कहा कि ‘यदि आज दूज न हो तो मैं पंडित नहीं।’ पंडितों ने कहा कि ‘राघव वाममार्गी है; यक्षिणी की पूजा करता है, जो चाहे सो कर दिखावे, पर आज दूज नहीं हो सकती।’ राघव ने यक्षिणी के प्रभाव से उसी दिन संध्या के समय द्वितीया का चंद्रमा दिखा दिया।’1 पर जब दूसरे दिन चंद्रमा देखा गया तब वह द्वितीया का ही चंद्रमा था। इस पर पंडितों ने राजा रत्नसेन से कहा – ”देखिए, यदि कल द्वितीया रही होती, तो आज चंद्रमा की कला कुछ अधिक होती; झूठ और सच की परख कर लीजिए।” राघव का भेद खुल गया और वह वेदविरुद्ध आचार करनेवाला प्रमाणित हुआ। राजा रत्नसेन ने उसे देशनिकाले का दंड दिया।

पद्मावती ने जब यह सुना तब उसने ऐसे गुणी पंडित का असन्तुष्ट हो कर जाना राज्य के लिए अच्छा नहीं समझा। उसने भारी दान दे कर राघव को प्रसन्न करना चाहा। सूर्यग्रहण का दान देने के लिए उसने उसे बुलाया। जब राघव महल के नीचे आया तब पद्मावती ने अपने हाथ का एक अमूल्य कंगन – जिसका जोड़ा और कहीं दुष्प्राप्य था – झरोखे पर से फेंका। झरोखे पर पद्मावती की झलक देख राघव बेसुध हो कर गिर पड़ा। जब उसे चेत हुआ तब उसने सोचा कि अब यह कंगन ले कर बादशाह के पास दिल्ली चलूँ और पद्मिनी के रूप का उसके सामने वर्णन करूँ। वह लंपट है, तुरंत चित्तौर पर चढ़ाई करेगा और इसके जोड़ का दूसरा कंगन भी मुझे इनाम देगा। यदि ऐसा हुआ तो राजा से मैं बदला भी ले लूँगा और सुख से जीवन भी बिताऊँगा।

यह सोच कर राघव दिल्ली पहुँचा और वहाँ बादशाह अलाउद्दीन को कंगन दिखा कर उसने पद्मिनी के रूप का वर्णन किया। अलाउद्दीन ने बड़े आदर से उसे अपने यहाँ रखा और सरजा नामक एक दूत के हाथ एक पत्र रत्नसेन के पास भेजा कि पद्मिनी को तुरंत भेज दो, बदले में और जितना राज्य चाहो ले लो। पत्र पाते ही राजा रत्नसेन क्रोध से लाल हो गया और बिगड़ कर दूत को वापस कर दिया। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ गढ़ पर चढ़ाई कर दी। आठ वर्ष तक  चित्तौड़ को घेरे रहा और घोर युद्ध होता रहा, पर गढ़ न टूट सका। इसी बीच दिल्ली से एक पत्र अलाउद्दीन को मिला जिसमें हरेव लोगों के फिर से चढ़ आने का समाचार लिखा था। बादशाह ने जब यह देखा कि गढ़ नहीं टूटता है तब उसने कपट की एक चाल सोची। उसने रत्नसेन के पास संधि का एक प्रस्ताव भेजा और यह कहलाया कि मुझे पद्मिनी नहीं चाहिए; समुद्र से जो पाँच अमूल्य वस्तुएँ तुम्हें मिली हैं उन्हें दे कर मेल कर लो।
(1. लोना चमारिन के संबंध में भी प्रसिद्ध है कि उसकी बात इसी प्रकार से सत्य करने के लिए देवी ने प्रतिपदा के दिन आकाश में जा कर अपने हाथ का कंगन दिखाया था जिसे देखनेवालों को द्वितीया के चंद्रमा का भ्रम हुआ था।)

राजा ने स्वीकार कर लिया और बादशाह को चित्तौरगढ़ के भीतर ले जा कर बड़ी धूमधाम से उसकी दावत की। गोरा बादल नामक विश्वासपात्र सरदारों ने राजा को बहुत समझाया कि मुसलमानों का विश्वास करना ठीक नहीं, पर राजा ने ध्यान न दिया। वे दोनों वीर नीतिज्ञ सरदार रूठ कर अपने घर चले गए। कई दिनों तक बादशाह की मेहमानदारी होती रही। एक दिन वह टहलते-टहलते पद्मिनी के महल की ओर भी जा निकला, जहाँ एक से एक रूपवती स्त्रियाँ स्वागत के लिए खड़ी थीं। बादशाह ने राघव से, जो बराबर उसके साथ-साथ था, पूछा कि ‘इनमें पद्मिनी कौन है?’ राघव ने कहा, ‘पद्मिनी इनमें कहाँ? ये तो उसकी दासियाँ हैं।’ बादशाह पद्मिनी के महल के सामने ही एक स्थान पर बैठ कर राजा के साथ शतरंज खेलने लगा। जहाँ वह बैठा था वहाँ उसने एक दर्पण भी रख दिया था कि पद्मिनी यदि झरोखे पर आवेगी तो उसका प्रतिबिंब दर्पण में देखूँगा। पद्मिनी कुतूहलवश झरोखे के पास आई और बादशाह ने उसका प्रतिबिंब दर्पण में देखा। देखते ही वह बेहोश हो कर गिर पड़ा।

अंत में बादशाह ने राजा से विदा माँगी। राजा उसे पहुँचाने के लिए साथ-साथ चला। एक एक फाटक पर बादशाह राजा को कुछ न कुछ देता चला। अंतिम फाटक पार होते ही राघव के इशारे से बादशाह ने रत्नसेन को पकड़ लिया और बाँध कर दिल्ली ले गया। वहाँ राजा को तंग कोठरी में बंद कर के वह अनेक प्रकार के भयंकर कष्ट देने लगा। इधर चित्तौर में हाहाकार मच गया। दोनों रानियाँ रो-रो कर प्राण देने लगीं। इस अवसर पर राजा रत्नसेन के शत्रु कुंभलनेर के राजा देवपाल को दुष्टता सूझी। उसने कुमुदनी नाम की दूती को पद्मावती के पास भेजा। पहले तो पद्मिनी अपने मायके की स्त्री सुन कर बड़े प्रेम से मिली और उससे अपना दु:ख कहने लगी, पर जब धीरे-धीरे उसका भेद खुला तब उसने उचित दंड दे कर उसे निकलवा दिया। इसके पीछे अलाउद्दीन ने भी जोगिन के वेश में एक दूती इस आशा से भेजी कि वह रत्नसेन से भेंट कराने के बहाने पद्मिनी को जोगिन बना कर अपने साथ दिल्ली लाएगी। पर उसकी दाल भी न गली।

अंत में पद्मिनी गोरा और बादल के घर गई और उन दोनों क्षत्रिय वीरों के सामने अपना दु:ख रोकर उसने उनसे राजा को छुड़ाने की प्रार्थना की। दोनों ने राजा को छुड़ाने की दृढ़ प्रतिज्ञा की और रानी को बहुत धीरज बँधाया। दोनों ने सोचा कि जिस प्रकार उन्हें धोखा दिया गया है उसी प्रकार उनके साथ भी चाल चलनी चाहिए। उन्होंने सोलह सौ ढकी पालकियों के भीतर सशस्त्र राजपूत सरदारों को बिठाया और जो सबसे उत्तम और बहुमूल्य पालकी थी उसके भीतर औजार के साथ एक लोहार को बिठाया। इस प्रकार वे यह प्रसिद्ध कर के चले कि सोलह सौ दासियों के सहित पद्मिनी दिल्ली जा रही है।

गोरा के पुत्र बादल की अवस्था बहुत थोड़ी थी। जिस दिन दिल्ली जाना था उसी दिन उसका गौना आया था। उसकी नवागता वधू ने उसे युद्ध में जाने से बहुत रोका पर उस वीर कुमार ने एक न सुनी। अंत में सोलह सौ सवारियों के सहित वे दिल्ली के किले में पहुँचे। वहाँ कर्मचारियों को घूस दे कर अपने अनुकूल किया जिससे किसी ने पालकियों की तलाशी न ली। बादशाह के यहाँ खबर गई कि पद्मिनी आई है और कहती है कि राजा से मिल लूँ और उन्हें चित्तौर के खजाने की कुंजी सुपुर्द कर दूँ तब महल में जाऊँ। बादशाह ने आज्ञा दे दी। वह सजी हुई पालकी वहाँ पहुँचाई गई जहाँ राजा रत्नसेन कैद था। पालकी में से निकल कर लोहार ने चट राजा की बेड़ी काट दी और वह शस्त्र ले कर एक घोड़े पर सवार हो गया जो पहले से तैयार था। देखते-देखते और हथियारबंद सरदार भी पालकियों में से निकल पड़े। इस प्रकार गोरा और बादल राजा को छुड़ा कर चित्तौर चले।

बादशाह ने जब सुना तब अपनी सेना सहित पीछा किया। गोरा बादल ने जब शाही फौज पीछे देखी तब एक हजार सैनिकों को लेकर गोरा तो शाही फौज को रोकने के लिए डट गया और बादल राजा रत्नसेन को लेकर चित्तौर की ओर बढ़ा। वृद्ध वीर गोरा बड़ी वीरता से लड़कर और हजारों को मार कर अंत में सरजा के हाथ से मारा गया। इस बीच में राजा रत्नसेन चित्तौर पहुँच गया। पहुँचते ही उसी दिन रात को पद्मिनी के मुँह से रत्नसेन ने जब देवपाल की दुष्टता का हाल सुना तब उसने उसे बाँध लाने की प्रतिज्ञा की।

सबेरा होते ही रत्नसेन ने कुम्भलनेर पर चढ़ाई कर दी। रत्नसेन और देवपाल के बीच द्वंद युद्ध हुआ। देवपाल की साँग रत्नसेन की नाभि में घुस कर उस पार निकल गई। देवपाल साँग मार कर लौटना ही चाहता था कि रत्नसेन ने उसे जा पकड़ा और उसका सिर काट कर उसके हाथ-पैर बाँधें। इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर और चित्तौरगढ़ की रक्षा का भार बादल को सौंप रत्नसेन ने शरीर छोड़ा।

राजा के शव को ले कर पद्मावती और नागमती दोनों रानियाँ सती हो गईं। इतने में शाही सेना चित्तौरगढ़ आ पहुँची। बादशाह ने पद्मिनी के सती होने का समाचार सुना। बादल ने प्राण रहते गढ़ की रक्षा की पर अंत में वह फाटक की लड़ाई में मारा गया और चित्तौरगढ़ पर खिलजी का अधिकार हो गया।
( आचार्य रामचंद्र शुक्ल )

© विजय शंकर सिंह

फ़िल्म पद्मावत पर विवाद - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

याद कीजिये सीबीएफसी ने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्युमेंट्री को । उस डॉक्युमेंट्री में कहे गए, एक शब्द के कारण उसे प्रमाणपत्र देने से रोक दिया था। बाद में जब बोर्ड बदला तभी वह फ़िल्म पास हुयी। तब सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष थे फिल्मकार पहलाज निहलानी। जिन्होंने खुद को सार्वजनिक रूप से पीएम मोदी जी का चमचा कहा था और इस पर उन्हें गर्व भी था। पर वही चमचा बाद में सेंसर बोर्ड से हटा दिया गया। सरकार बिना रीढ़ की हड्डी के नौकरशाह तो पसंद करती है पर वह यह भी चाहती है कि दिखावे के लिये ही सही रीढ़ की हड्डी की जगह कुछ न कुछ रीढ़ जैसी चीज दिखे। उसके बाद आये प्रसून जोशी। एक प्रतिभावान कवि और फिल्मों से जुड़ी शख्सियत हैं ये। इन्होंने फ़िल्म पदमावती देखी, कुछ कट सुझाये और फिर उसे पद्मावत के नए नाम से संस्कारित कर के प्रदर्शन हेतु प्रमाणपत्र दे दिया। 

क्या सरकार सेंसर बोर्ड के इस प्रमाण पत्र के बाद फ़िल्म के प्रदर्शन पर कोई रोक नहीं लगा सकती है ? यह कहा जा रहा है कि नहीं। 

मेरा कहना है कि अगर सरकार को यह समाधान हो जाय कि किसी भी दृश्य श्रव्य से व्यापक हिंसा होने की संभावना है तो वह कानून व्यवस्था के विंदु पर रोक लगा सकती है। कानून में इसका स्पष्ट प्राविधान है। लेकिन सरकार का इरादा और उसे ऐसा समाधान हो जाय तब ।

आज फ़िल्म का विरोध करने वाले सोशल मीडिया पर खुल कर हिंसा करने आत्महत्या करने और अराजकता फैलाने के लिये उकसा रहे हैं। सारा आक्रोश और गुस्सा, आगजनी आदि इस ठंड में रजाई में बैठे बैठे ही हो रही है। यह मैं अच्छी तरह अनुमान लगा सकता हूँ कि इन उकसाने वालों में से बहुत कम ही लोगों के बच्चे आग लगाने के लिये सड़क पर निकलेंगे। यह अलग बात है कि किसी के बरगलाने पर आसामाजिक तत्वों के साथ कुछ मासूम क्षत्रिय युवा निकल आये। और फिर हिंसा में शामिल होने का खामियाजा साल दर साल भुगतते रहें।

अगर फ़िल्म में इतिहास से छेड़छाड़ हुयी है, और स्वाभिमान तथा बलिदानी प्रतीकों को भले ही उनकी ऐतिहासिकता पर कोई संदेह हो तो भी सरकार को यह सोचना चाहिये कि यदि यह समाज के एक वर्ग को आहत कर सकती है तो उसे सेंसर बोर्ड द्वारा पास किये जाने पर भी कानून व्यवस्था के व्यापक हित मे रिलीज करने पर पुनर्विचार कर सकती है। सिनेमाघरों के मालिकों, फ़िल्म के कलाकारों का विरोध और उनको मार डालने तथा आग लगा देने की धमकी आदि आदि बचकानी बातें है। 

सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सिर्टीफिकेशन, कोई संवैधानिक संस्था नहीं है बल्कि यह भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का ही एक हिस्सा है। सरकार व्यापक जनहित में इसे निर्देश दे सकती है, और देती भी है। सेंसर बोर्ड यह आकलन नहीं करता है कि फ़िल्म का जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उसके पास कोई भी ऐसा तंत्र नहीँ है और न ही उसके पास कोई खुफिया एजेंसी है जिस से वह जनता की नब्ज भांप सके। वह केवल यह देखता है कि फ़िल्म सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु उपयुक्त है या नहीँ। वह कोई इतिहास मर्मज्ञों का पैनल नही है। सरकार को अगर यह सूचनाएं मिल रही है कि देश मे व्यापक हिंसा हो सकती है तो वह अब इस प्रकरण में दखल दे सकती है। 

अब एक नज़र करणी सेना और उन संगठनों पर जो स्वाभिमान और आन बान शान पर इसे हमला मान कर आक्रोशित हैं । इन संगठनों ने कितने गरीब क्षत्रिय युवाओं के शिक्षा, रोज़गार, और गरीब क्षत्रिय कन्याओं के विवाह आदि के सवाल पर इतना हंगामा मचाया है करणी सेना तथा उसके समर्थकों ने जितना आज वे एक फ़िल्म के रिलीज होने पर मचा रहे हैं ? हिंसा के लिये खुलेआम उकसाना एक संज्ञेय अपराध है। और जब हिंसा होगी तो यह सारे आन बान शान वाले तथाकथित नेता पीछे हो जाएंगे और इन सब के चक्कर मे फंस जाएंगे वे क्षत्रिय लड़के जो भीड़ में या तो भावना के ज्वार में बह कर आ रहे हैं या बरगला कर लाये गये हैं। फिर वे और उनके घरवाले थाना पुलिस और अदालत का चक्कर काटते रह जाएंगे। इनमे से एक भी करणी सेना या अन्य संगठन के लोग उनके साथ खड़े नहीं दिखेंगे। रिश्तेदार या गांव घर के लोग भले रहें। फिर शुरू होगा सालों साल मुकदमेबाजी का दारुण सिलसिला। रहा सवाल हिंसा कर के झुकाने का तो मेरा यह कहना है कि हिंसा से कोई सरकार नही डरती है। उसके पास हिंसा से निपटने के लिये अधिक हिंसक सामान है। वह अपने आधार के दरकने से डरती है। जिस दिन उसे लगेगा कि उसके साथ के लोग उससे हट रहे, उनकी पार्टी छोड़ कर दूर जा रहे हैं वह तुरन्त इस मामले पर गम्भीर हो जाएगी और आक्रोशित पक्ष से बात करने लगेगी । सरकार ऐसी धमकियों को बंदर घुड़की ही समझती है।  यह मेरा अनुभव है। 

अगर सच मे करणी सेना इस फ़िल्म को क्षत्रिय अस्मिता और स्वाभिमान पर एक प्रहार मानती है और उसका विरोध करना चाहती है तो वह उन सभी क्षत्रिय जन प्रतिनिधिगण को, जो संसद और विधान सभाओं में हैं, यह निर्देश दे कि वे सरकार को यह अल्टीमेटम दें कि, या तो इस फ़िल्म के रिलीज की तारीख के फैसले पर पुनर्विचार किया जाय नहीं तो वे सरकार से खुद को अलग कर लेंगे। कानून व्यवस्था के विंदु पर सरकार चाहे तो इस पर पुनर्विचार कर सकती है। प्रोड्यूसर को रिलीज की तारीख स्थगित करने के लिये कहा जा सकता है। अभिसूचना और पुलिस से कानून व्यवस्था पर रपट भी मांगी जा सकती है। पर यदि इरादा सच मे फ़िल्म से उत्पन्न राजपूत समाज मे व्याप्त आक्रोश के प्रति सरकार की सहानुभूति हो तब । अगर केवल आग लगाऊ नीति और अनावश्यक मुद्दों में भटकाने की चाल हो तो और बात है। 

© विजय शंकर सिंह