Friday, 15 December 2017

उदयपुर, राजस्थान की अदालत पर तिरंगा नहीं भगवा ध्वज, एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

उदयपुर राजस्थान की एक कचहरी में राजसमंद में हुयी एक बर्बर हिंसक घटना में एक हत्यारे के समर्थन में लोग एकत्र हुये प्रदर्शन किया और अदालत के भवन पर भगवा ध्वज फहरा दिया। अब तक टीवी , अखबारों सोशल मीडिया पर कुरआन की आयतों से सजे हुए झंडे लिये आईएस और तालिबान के आतंकी दिखते थे अब भगवा को घोषित रूप से भीड़ ने अपने आतंक का ध्वजा घोषित कर दिया। झंडे का यह विस्थापन प्रतीकात्मक हो सकता है। पर क्या अब इस आतंक, गुंडई और अराजकता को देखते हुए इस भगवा ध्वज को भगवा आतंक नहीं कहा जाना चाहिये। जिन्हें यह बात चुभे वे इस ध्वज के दुरुपयोग के खिलाफ खुल कर खड़े हों। जैसे इस्लामी कट्टरपंथी कुरआन की आयत लिखी हुई झंडा ले कर चलते हैं वैसे हिन्दू कट्टरपंथी भगवा ध्वज ले कर अराजकता फैलाते है। जैसे उन्होंने पूरा मध्य पूर्व को मध्यगुग में धकेल दिया है वैसे ये भी देश को पीछे ले जा रहे हैं। सभी कट्टरपंथी एक ही फ्रीक्वेंसी पर सोचते हैं ।

यह राष्ट्रवादी खुद को कहने वाले लोग जिस कुनबे से आते हैं उनका भारतीय संविधान से विरोध बहुत पुराना है। जब संविधान बना था तब भी वे उसके खिलाफ थे और अब भी उनका विरोध छुपता नहीं है। यह द्विराष्ट्रवाद वाला राष्ट्रवाद जिन्ना वाला राष्ट्रवाद है जो ' धर्म ही राष्ट्र है ' का सिद्धांत मानता था। जिन्ना तो अपना मक़सद हल कर गये। उनका उनके समाज ने विरोध भी बहुत नही किया। विरोध किया भी तो उस समय केवल खान अब्दुल गफार खान और मौलाना आज़ाद, मौलाना हसरत मोहानी जैसे कम लोगों ने ।  लेकिन जिन्ना की प्रतिभा और अंग्रेज़ों का मुस्लिम लीग के प्रति अनुराग ने सीमांत गांधी और इन नेताओं को को अप्रासांगिक कर दिया। सबसे लहीम शहीम यह पठान नेता जो भौगोलिक रूप से पाकिस्तान जाने को अभिशप्त था , उस समय न सिर्फ अलग थलग पड़ गया बल्कि उन्होंने पठानों वाली साफबयानी से गांधी जी सख्त शब्दों में उलाहना देते हुये यह भी कह दिया कि, " आप ने तो हमे भेडियो के आगे डाल दिया । " भेड़िया से मतलब जिन्ना और पाकिस्तान चाहने वाले मुस्लिम नेता ।

इसके विपरीत भारत के हिन्दू, सावरकर या हिन्दू महासभा या आरएसएस के झांसे में नहीं आये । वे खुल कर गांधी के राष्ट्रवाद और आज़ादी के लड़ाई में उनके साथ खड़े रहे। सावरकर चाह कर भी जिन्ना की तर्ज़ पर हिन्दू राष्ट्र नहीं पा सके। जो भारत पाकिस्तान के कट जाने के बाद बचा, वह सर्वधर्म समभाव के साथ गया और जो संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया वह एक धर्मनिरपेक्ष संविधान था। यह भी एक अजीब विडम्बना है कि गांधी जो मूलतः एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे ने धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के पक्ष में खड़े हुये और एमए जिन्ना जो बिलकुल भी धार्मिक मनोवृत्ति के नहीं थे और पाश्चात्य धर्म निरपेक्ष की विचारधारा से प्रभावित थे उन्होंने एक धर्म आधारित राज्य के लिये ज़िद की और इस्लामी राज्य की स्थापना की । संविधान के अनुसार  तिरंगा भारत का राष्ट्रीय ध्वज बना । पर यह कुनबा उस तिरंगे और संविधान के बराबर विरोध में रहा है।  लेकिन यह कुछ कर नहीं पाया । क्यों कि लंबे समय तक यह सत्ता में आ भी नहीं पाया। अब जब यह सत्ता में आया तो इसे जहां भी मौका मिलता है तिरंगे को अपने अग्निज्वाल ध्वज से विस्थापित करने का प्रयास करता है। यह घटना उसी दमित इच्छा का प्रस्फुटन है।

राजस्थान की एक अदालत पर जब यह ध्वज फहरा कर संविधान और अदालत की बेइज्जती की गयी तो मुझे कोई हैरानी नहीं हुयी। जिस तरफ ये जा रहे हैं वह रास्ता बिल्कुल साफ है । अल कायदा , तालिबान और आईएसआईएस के साथ सैद्धांतिक भाईचारा निभाते हुये यह एक ऐसा समाज बनाने की ओर जा रहे है जहां रोज़ झगड़े होंगे , अपराध होंगे, धर्म अपने अपने खाने में सिमट जाएंगे और अविश्वास का एक ऐसा वातावरण बन जायेगा कि सारी प्रगति और विकास की बातें धरी की धरी रह जाएंगी।

लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है।  सनातन धर्म के अंदर का मेकेनिज़्म और दर्शन, धर्म के रेजीमेंटेशन को न केवल हतोत्साहित करता है बल्कि ऐसा करने वालों को अलग थलग भी कर देता। राजस्थान की अदालत पर जो गुंडागर्दी हुयी है उसे और वैसी ही घटनाओं को  जिस दिन आप हल्के से लेने लगेंगे उसी दिन जिन्ना का मरा हुआ द्विराष्ट्रवाद फिर कब्र से निकल उठेगा और गाँव गाँव शहर शहर एक राष्ट्र नहीं , जहां जहां जो धर्म है वहा वहां वही राष्ट्र उभर कर आ जायेगा। यह बात कुछ मित्रों को एक्सट्रीम लग सकती है और यह एक्सट्रीम है भी। लेकिन एक्सट्रीम तक पहुंचने के लिये अगर कदम उधर उठे हैं तो उसे नज़रअंदाज़ करना घातक होगा । और यह जो हो रहा है यही तो पाकिस्तान शुरू से ही चाहता रहा है कि भारत धर्म के नाम पर मानसिक रूप से इतना बंट जाय कि उसे यहां दखल देने का आधार मिल जाय । धार्मिक उन्माद फैलाने वाले तत्व पाकिस्तान का ही एजेंडा पूरा कर रहे हैं । पाकिस्तान की कट्टरपंथी निज़ाम ने  जिस उग्रवाद को संरक्षण दिया वही उग्रवाद उनके देश के लिये तबाही और बर्बादी और अराजकता का कारण बना। क्या हम भी उसी राह पर चल पड़े हैं ?

इस सम्बन्ध में विशाखा शर्मा की फेसबुक पर पोस्ट की यह पंक्तियां पढ़ें । ये हैं तो व्यंग्य के रूप में पर बात उन्होंने बहुत सटीक कही है ।

" Take a large bowl of stupid Indians, put it on the slow flame of religion.Mix a spoonful of Syria, mash a bit of Pakistan,for added flavour sprinkle Taliban.Let the bigotry simmer.Serve Hot and humiliating when cracks appear and the aroma of bloodshed reaches your nostrils. "

© विजय शंकर सिंह

अख्तर शीरानी की ग़ज़ल - ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर / विजय शंकर सिंह

ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें हम भूले हुओं को याद न कर
पहले ही बहुत नाशाद हैं हम तू और हमें नाशाद न कर

क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ ये ताज़ा सितम ईजाद न कर
यूँ ज़ुल्म न कर बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया

हाथों से ख़ुशी का जाम छुटा होंटों से हँसी का नाम गया
ग़मगीं न बना नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

हम रातों को उठ कर रोते हैं रो रो के दुआएँ करते हैं
आँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश सर धुनते हैं आहें भरते हैं

ऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं
ये ज़ुल्म तू ऐ जल्लाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

ये रोग लगा है जब से हमें रंजीदा हूँ मैं बीमार है वो
हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश बे-ख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो

जीने पे इधर बेज़ार हूँ मैं मरने पे उधर तयार है वो
और ज़ब्त कहे फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

जिस दिन से बँधा है ध्यान तिरा घबराए हुए से रहते हैं
हर वक़्त तसव्वुर कर कर के शरमाए हुए से रहते हैं

कुम्हलाए हुए फूलों की तरह कुम्हलाए हुए से रहते हैं
पामाल न कर बर्बाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

बेदर्द! ज़रा इंसाफ़ तो कर इस उम्र में और मग़्मूम है वो
फूलों की तरह नाज़ुक है अभी तारों की तरह मासूम है वो

ये हुस्न सितम! ये रंज ग़ज़ब! मजबूर हूँ मैं मज़लूम है वो
मज़लूम पे यूँ बे-दाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं वो शोख़-ए-हज़ीं बद-नाम न हो
वो माह-लक़ा बद-नाम न हो वो ज़ोहरा-जबीं बद-नाम न हो

नामूस का उस के पास रहे वो पर्दा-नशीं बद-नाम न हो
उस पर्दा-नशीं को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

उम्मीद की झूटी जन्नत के रह रह के न दिखला ख़्वाब हमें
आइंदा की फ़र्ज़ी इशरत के वादों से न कर बेताब हमें

कहता है ज़माना जिस को ख़ुशी आती है नज़र कमयाब हमें
छोड़ ऐसी ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

क्या समझे थे और तू क्या निकला ये सोच के ही हैरान हैं हम
है पहले-पहल का तजरबा और कम-उम्र हैं हम अंजान हैं हम

ऐ इश्क़! ख़ुदारा! रहम-ओ-करम मासूम हैं हम नादान हैं हम
नादान हैं हम नाशाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

वो राज़ है ये ग़म आह जिसे पा जाए कोई तो ख़ैर नहीं
आँखों से जब आँसू बहते हैं आ जाए कोई तो ख़ैर नहीं

ज़ालिम है ये दुनिया दिल को यहाँ भा जाए कोई तो ख़ैर नहीं
है ज़ुल्म मगर फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

दो दिन ही में अहद-ए-तिफ़्ली के मासूम ज़माने भूल गए
आँखों से वो ख़ुशियाँ मिट सी गईं लब को वो तराने भूल गए

उन पाक बहिश्ती ख़्वाबों के दिलचस्प फ़साने भूल गए
इन ख़्वाबों सी यूँ आज़ाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

उस जान-ए-हया का बस नहीं कुछ बे-बस है पराए बस में है
बे-दर्द दिलों को क्या है ख़बर जो प्यार यहाँ आपस में है

है बेबसी ज़हर और प्यार है रस ये ज़हर छुपा इस रस में है
कहती है हया फ़रियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

आँखों को ये क्या आज़ार हुआ हर जज़्ब-ए-निहाँ पर रो देना
आहंग-ए-तरब पर झुक जाना आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ पर रो देना

बरबत की सदा पर रो देना मुतरिब के बयाँ पर रो देना
एहसास को ग़म बुनियाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

हर दम अबदी राहत का समाँ दिखला के हमें दिल-गीर न कर
लिल्लाह हबाब-ए-आब-ए-रवाँ पर नक़्श-ए-बक़ा तहरीर न कर

मायूसी के रमते बादल पर उम्मीद के घर तामीर न कर
तामीर न कर आबाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

जी चाहता है इक दूसरे को यूँ आठ पहर हम याद करें
आँखों में बसाएँ ख़्वाबों को और दिल में ख़याल आबाद करें

ख़ल्वत में भी हो जल्वत का समाँ वहदत को दुई से शाद करें
ये आरज़ुएँ ईजाद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर

दुनिया का तमाशा देख लिया ग़मगीन सी है बेताब सी है
उम्मीद यहाँ इक वहम सी है तस्कीन यहाँ इक ख़्वाब सी है

दुनिया में ख़ुशी का नाम नहीं दुनिया में ख़ुशी नायाब सी है
दुनिया में ख़ुशी को याद न कर ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर।

***
अख्तर शीरानी का असल नाम : मुहम्मद दाऊद खान था। वे मूलरूप से टोंक राजस्थान के रहने वाले थे और उनका जन्म 4 मई 1905 को हुआ था । उन्होंने उर्दू साहित्य की कविता, निबन्ध और आलोचनाओं की विधा में अपना योगदान दिया है । इनके कुल 9 कविता संग्रह प्रकाशित हुये हैं । इनका निधन 9 सितम्बर 1948 में लाहौर में हुआ था ।

यह ग़ज़ल, ऐ इश्क़ हमे बरबाद न कर, इनकी एक बेहद लोकप्रिय ग़ज़ल है । इसे मशहूर ग़ज़ल गायिका #नय्यारा_नूर ने गाया है। इसे आप यहां सुन सकते हैं ।

https://youtu.be/WCRvHmqoVZk
#vss

Thursday, 14 December 2017

निर्वाचन आयोग और गुजरात का चुनाव / विजय शंकर सिंह

डर है, एके जोति देश के अब तक के सबसे कमजोर और विवादास्पद मुख्य निर्वाचन आयुक्त न ठहराये जाँय। कल से उनके कुछ फैसलों को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगने लगे है। यदि ऐसा होता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा । रेफरी या अंपायर की निष्पक्षता तो होनी ही चाहिये, पर वह निष्पक्षता दिखनी भी चाहिये । कम से कम उस समय तो ज़रूर ही, जब दर्शक दीर्घा ठसाठस भरी हो और लोग पल पल पर सोशल मीडिया पर अपडेट ले रहे हों। 

कभी कभी लग रहा है, टीएन शेषन और जेएम लिंगदोह ही नहीं , उनके द्वारा स्थापित परम्पराएं अब अतीत बन रही हैं। कमज़ोर और आत्मसमर्पित चुनाव प्रशासन सत्ताधारी दल को सदैव भाता है। सत्ताधारी दल कोई भी हो। शेषन ने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति और दिलेरी से निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुये निर्वाचन आयोग को एक अलग पहचान दिलायी थी, और उम्मीद की एक ज्योति जलाई थी उसे एके जोत सर के समय मे मद्धिम होने दिया जा रहा है। हम में से जो मित्र गण शेषन और लिंगदोह या उसके बाद भी कुछ समय तक चुनाव के प्रशासनिक प्रबंधन से जुड़े रह चुके हैं उन्हें एक शब्द अब भी याद होगा शेषनादेश । यह शब्द चुनाव प्रकिया के प्रारंभ होते ही शासनादेश से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता था। किसी भी संस्था का क्षय जब दिखायी देने लगता है तो उस संस्था के प्रति जनता में अविश्वास उत्पन्न होने लगता है। वह अविश्वास या साख का संकट न बने संस्था के प्रमुख की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होती है ।

मतदान के दिन वोट देने के बाद रोड शो करना प्रधानमंत्री जी का गैर जिम्मेदारी भरा कदम है। पीएम खुद जब आदर्श आचार संहिता को धता बताते हुये सड़क पर निकल जाए तो चुनाव आयोग लगभग असहाय हो जाता है। जिला मैजिस्ट्रेट, एसएसपी या पुलिस आयुक्त या आयोग के पर्यवेक्षक अगर सामने दिखें भी तो वे कुछ नहीं कर पाएंगे। यह मैं एक व्यावहारिक बात कर रहा हूँ। बहुत होगा आयोग एक नोटिस जारी कर देगा। यहां आयोग उतना दोषी नहीं है जितना कि पीएम । उन्हें स्वयं आचार संहिता का पालन करना चाहिये। न कि आचार संहिता का उल्लंघन ।

हम एक ऐसे पारदर्शी दौर में आ गए हैं कि आप अगर यह जानना चाहें कि मैं कहाँ पर बैठ कर यह पंक्तियां लिख रहा हूँ तो आप जान सकते हैं। विज्ञान और संचार की तकनीकी ने अपनी आंख हर जगह फैला रखी है । निवाचन आयोग को अपनी साख और विशेषकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त की निष्पक्षता बनी रहे यह आवश्यक है। जब भी उनका मूल्यांकन होगा तो शेषन और उनके द्वारा स्थापित मानदंड अवश्य याद आएंगे।

मैं भारत सरकार के पूर्व सचिव एईएस सरमा का एक पत्र यहाँ उद्धरित कर रहा हूँ जो उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर आयोग की चुप्पी को दृष्टिगत रखते हुये लिखा है ।

EAS Sarma, former Secretary to GoI, writes to the Election Commission of India on the Gujarat Election. MUST BE READ.

E.A.S.Sarma
14-40-4/1 Gokhale Road
Maharanipeta
Visakhapatnam 530002
Mobile: 919866021646
Email: eassarma@gmail.com

To

Shri A K Joti
Chief Election Commissioner
Election Commission of India

Shri P K Sinha
Cabinet Secretary

Shri Rajiv Gauba
Union Home Secretary

Dear S/Shri Joti/ Sinha/ Gauba,

Subject:- Violation of Representation of the People Act and Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) in Gujarat elections

I enclose a Business Standard report dated 14-12-2017 (“Gujarat: Did Modi's seaplane fly from Karachi to escort him to Dharoi?”) which suggests that

i. During his travel in Gujarat in connection with BJP's election campaign, Shri Narendra Modi accepted an air ride from Ahmedabad to Dharoyi and back on a sea-plane on 12-12-2017. The sea-plane was an aircraft (Kodiak 100) owned by a foreign company, namely, Utah-based Quest Aircraft Company, operated by a Japanese plane-maker. Apparently, the aircraft is also owned by the Bank of Utah with registration in the US.

ii. The contents of the news report suggest that the Prime minister's aerial ride was intended to bypass the lack of police permission for a road show in Gujarat. It appears that the journey undertaken on the sea-plane became a part and parcel of the election campaign for BJP as it did have a visible impact on the people. The news report states that "BJP went a little overboard in highlighting Modi's last rally for Gujarat polls. BJP's twitter handle posted 'Modi becomes first passenger of India’s first ever seaplane!'” This leads to the inescapable inference that the sea-plane ride was intended to be a part of the election campaign.

iii. In other words, the expenditure incurred on the sea-plane ride, whether paid for or not, will have to be deemed to be a part of the election expenses for BJP's Gujarat election campaign, as envisaged in the Representation of the People Act and it therefore needs to be reckoned as such by the Election Commission of India (ECI)

iv. The news report estimates the cost of the sea-plane ride to be Rs 40 lakhs. Since an aircraft owned by a foreign company was involved, this amounts to a outright violation of the FCRA. FCRA prohibits political parties from accepting donations, direct or indirect, from a foreign source.

v. If either the Central govt agencies or the State govt agencies have paid for the expenditure incurred on the sea-plane ride, the ECI should take cognizance of the same and take such action that is appropriate against all those responsible for diverting public funds for private electioneering.

I request the ECI to treat the implicit cost of the sea-plane ride as a part of the election expense of BJP in the ongoing Gujarat election campaign and take necessary action under the Representation of the People Act. This is necessary in order to send a strong message that the ECI would not encourage expensive election campaigning in whatever manner it manifests itself.

Further, I request the Union Home Ministry to proceed against those who have violated the FCRA. Acceptance of donations from foreign sources, in whatever manner they flow in, is unacceptable from the point of view of long-term national security.

If you fail to take the necessary action, I will be constrained to seek judicial intervention under the Representation of the People Act as well as under FCRA.

Regards,

Yours sincerely,

E A S Sarma
Former Secretary to GOI
Visakhapatnam
14-12-2017
***

14 दिसम्बर, जन्मदिन पर उर्दू के महान शायर जॉन एलिया का स्मरण / विजय शंकर सिंह

जॉन एलिया उर्दू के एक महान शायर थे। इनका जन्म 14 दिसंबर 1931 को अमरोहा में हुआ था।  हाल के शायरों में यह सबसे ज्यादा पढ़े और उद्धृत किये जाने वाले शायरों में माने जाते हैं। 'शायद ' 'यानी 'गुमान इनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं । इनकी मृत्यु 8 नवंबर 2004 को हुयी थी। जॉन सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान व पूरे उर्दू जगत में बेहद रुचि के साथ पढ़े और जाने जाते हैं।

पाकिस्तान के होते हुए भी अपने पैतृक (जन्म स्थान) भारत के अमरोहा को कभी भूल नहीं पाए वो लहजा हमेशा बरकरार रहा। उनकी यह नज़्म पढ़ें,

अब वो घर इक वीराना था बस वीराना ज़िंदा था
सब आँखें दम तोड़ चुकी थीं और मैं तन्हा ज़िंदा था ।

सारी गली सुनसान पड़ी थी बाद-ए-फ़ना के पहरे में
हिज्र के दालान और आँगन में बस इक साया ज़िंदा था ।

वो जो कबूतर उस मूखे में रहते थे किस देस उड़े
एक का नाम नवाज़िंदा था और इक का बाज़िंदा था ।

वो दोपहर अपनी रुख़्सत की ऐसा-वैसा धोका थी
अपने अंदर अपनी लाश उठाए मैं झूटा ज़िंदा था ।

थीं वो घर रातें भी कहानी वा'दे और फिर दिन
गिनना आना था जाने वाले को जाने वाला ज़िंदा था।

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की जमीन पर पैदा हुए बहुत से लेखकों, कवियों, फनकारों और कलाकारों ने दोनों ही देशों में लोकप्रियता पाई है । उनके लिये यह भौगोलिक सीमा का बंधन बहुत मायने नहीं रखता है। जॉन एलिया भी ऐसे ही एक शायर हैं, जो पैदा तो उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुए, लेकिन बाद में पाकिस्तान चले गए और वहीं के होकर रह गए । पाकिस्तान के इस शायर की रचनाओं का संकलन ‘मैं जो हूं, जॉन एलिया हूं’ कुमार विश्वास ने किया है । यह लेख उसी संकलन पर आधारित है ।.कुमार विश्वास उनके लिए लिखते हैं,

‘जॉन को मैं शायरी का चे ग्वेरा मानता हूं जो एक स्टेटमेंट देते हुए नज़र आते हैं कि मैं जो हूं, जैसा हूं, वैसा हूं. मुझे ऐसा ही स्वीकार कीजिए. उनको पता है कि मैं जॉन एलिया हूं और जॉन एलिया होने के माने क्या हैं. इस एटीट्यूड से जितना वो आनन्दित होते हैं, उतना ही उनके चाहने वाले भी होते हैं.’

इस संकलन में इश्क़ की बातें तो बहुत हैं पर प्रेम की सघनता और तीव्रता जो अक्सर उर्दू अदब में बहुत शिद्दत से नज़र आती है, उनकी शायरी में बहुत ज्यादा महसूस नहीं होती.। जॉन की विशेषता ही है बेहद छोटे छोटे वाक्यों में अपनी बात कहना। बहुत सामान्य सी बात जो हम सब के जेहन में एक मासूमियत के साथ उभरती है जॉन के लिये वही नज़्म बन जाती है। कोई सजावट नहीं और न ही कोई दिखावा। यह पंक्तियां पढ़ें,

नया इक रिश्ता पैदा करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूं करें हम,
ख़ामोशी से अदा हो रस्मे-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यूं करें हम,
ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं
वफ़ादारी का दावा क्यूं करें हम
हमारी ही तमन्ना क्यूं करो तुम
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूं करें हम. !!

प्रेम की यह सपाट बयानी है। साफगोई सा इजहार है । न कोई आह ओ फुगां, न ज़िद, न इसरार न जीने मरने कसमें । कोई कृत्रिमता नहीं।

जब वे इंसानियत के हक में कुछ लिखते है तो अपने पर भी बिना तंज किये नहीं रहते । खुद को भी बख्शते नहीं हैं ।

‘हैं बाशिंदे इसी बस्ती के हम भी
सो खु़द पर भी भरोसा क्यूं करें हम,
चबा लें क्यूं न ख़ुद ही अपना ढांचा
तुम्हें रातिब (प्रतिदिन का भोजन) क्यूं करें हम.
यही पूछा किया मैं आज दिन भर
हर इक इन्सान को रोटी मिली क्या.’

जॉन एलिया स्वाभिमानी थे । यह स्वाभिमान उनकी रचनाओं में अक्सर मुखरित होता रहा है । इसे वे इस प्रकार अभिव्यक्त करते हैं, और काफी सजग भी दिखते हैं.

‘सहूलियत से गुज़र जाओ मिरी जां
कहीं जीने की ख़ातिर न मर न रहियो
बहुत दुश्वार हो जाएगा जीना
यहां तो ज़ात के अन्दर न रहियो.’

यह खुद्दारी और खुद को अलग महसूस करने की ठसक ही थी जो जॉन एलिया को अलग स्तर पर खड़ा करती है. उनका यह अंदाज ही उन्हें खुदरंग बनाता है-

‘हम किस को दें भला दरो-दीवार का हिसाब
ये हम जो हैं,
ज़मीं के न थे आस्मां के थे या फिर -
‘मैं जो हूं जॉन एलिया हूं जनाब
मेरा बेहद लिहाज़ कीजिएगा’...
माल बाज़ारे-ज़मीं (सार्वजनिक ज़मीन) का था मैं ‘जॉन’
आस्मानों में मिरा सौदा हुआ.’

धार्मिक कट्टरता पर जॉन काफी तटस्थता से अपनी बात कहते हैं. यह अंदाज उन्हें कबीर के करीब ले जाता है -

'धरम की बांसुरी से राग निकले
वो सुराखों के काले नाग निकले,
रखो दैरो-हरम (मन्दिर और मस्जिद) को अब मुक़फ़्फ़ल (तालाबन्द)
कई पागल यहां से भाग निकले,
वो गंगा जल हो या आबे-ज़मज़म (मक्के के पवित्र कुएं का पानी)
ये वो पानी हैं जिन से आग निकले...
है आखि़र आदमियत भी कोई शै
तिरे दरबान तो बुलडॉग निकले,....
पिलाया था हमें अमृत किसी ने
मगर मुंह से लहू के झाग निकले,...
दीने-दिल (दिल के धर्म में) में जिहाद है मम्नूअ (वर्जित)
तू यूं ही अपना सर कटाइयो मत.’

विभाजन के बाद 14 साल की उम्र में जॉन पाकिस्तान में जाकर बस तो गए, लेकिन उनकी यादों में हिंदुस्तान हमेशा बसा रहा. वे किस कदर अपने जन्म स्थान, अपनी गलियों और अपने शहर के करीब से बहती नदी को याद करते हैं, यह उनकी शायरी में सहज ही देखा जा सकता है-

‘वो शै (वस्तु) जो सिर्फ हिन्दुस्तान की थी
वो पाकिस्तान लाई जा रही है,....
अपने छोड़े हुए मुहल्लों पर
रहा दौराने-जांकनी (मरणासन्न अवस्था का दौर) कब तक, नहीं मालूम मेरे आने पर /
उस के कूचे में लू चली कब तक.’

इस किताब में कुछ एक शेर ऐसे हैं जो पढ़े जाने के बाद चंद लम्हों के लिए आपको वहीं ठहर जाने पर मजबूर कर देते हैं. मसलन,

‘मैं हूं मेमार (इमारत बनाने वाला) पर ये बतला दूं 
शहर के शहर ढा चुका हूं मैं’ या फिर-
‘हमें सैराब (सींचना) नयी नस्ल को करना है सो हम 
ख़ून में अपने नहाने के लिए निकले हैं.’ या
'कहां जा के दुनिया को डालूं भला
इधर तो कोई मज़्बला (कूड़ा डालने का स्थान) ही नहीं.’

अगर आप जॉन एलिया का परिचय पाना चाहते हैं तो इस किताब को पढ़ सकते हैं. शायरी के शौकीन भी इस किताब को पढ़ सकते हैं, लेकिन शेरों में बहुत ज्यादा गहराई, मार्मिकता, सघनता की चाह रखने वालों को यह किताब निराश कर सकती है ।

© विजय शंकर सिंह

लोकप्रियता और अपराजेयता का आत्ममुग्ध भाव / विजय शंकर सिंह

अपराजेयता का एक अलग माया लोक होता है । यह रचा जाता है और स्मोक स्क्रीन के समान इसे फैलाया जाता है । यह आज की ईज़ाद हुई कला नहीं है । यह पहले से ही लोगों को ज्ञात है । 1977 में आपातकाल के बाद जब चुनाव घोषित हुये थे तो, किसी ने यह उम्मीद भी नहीं की थी कि तब की अपराजेय समझी जाने वालीं इंदिरा गांधी अपनी सीट रायबरेली भी हार जाएंगी। इंदिरा विरोधी खेमे में जगजीवन राम, एचएन बहुगुणा और नन्दिनी सतपथी के कांग्रेस से टूट कर आ जाने के बाद कांग्रेस ज़रूर हतमनोबल होने लगी थी। पर किसी को भी 1977 के अप्रत्याशित हार की उम्मीद नहीं थी। खुद अखबारों और आईबी को भी नहीं। पर जब जनरोष फैला तो सब कुछ बहाते हुये ले गया और इंदिरा गांधी स्वयं और अपने पुत्र संजय गांधी सहित चुनाव हार गयीं । यही नहीं 1977 में पूरे बिहार और यूपी में एक भी कांग्रेस का प्रत्याशी चुनाव जीत नहीं सका । तब सोशल मीडिया नहीं था । अखबार थे और आकाशवाणी था ।

ऐसा ही अपराजेय भाव पश्चिम बंगाल के पिछले चुनाव में वाम मोर्चे को हो गया था । 1977 में जब वाम मोर्चा दो तिहाई से बहुमत में आया तो यह गति 32 साल तक रही। वाम मोर्चा एक ऐसी मानसिकता से संक्रमित हो गया था कि उनके नेता यह सोच ही नहीं पा रहे थे कि वे कभी सरकार से बाहर भी होंगे । पर जब वे पटके गए तो आज तक धूल झाड़ रहे हैं ।

अगर आप लोकप्रिय है तो आप खेल का हर नियम तोड़ सकते हैं। आप खेल का नियम रच सकते हैं। आप के पीछे चलती हुयी भीड़ जिसने अपना विवेक आप के लोकप्रियता के धुंध में कहीं गिरवी रख दिया है वह इसे सराहेगी और नारे लगाएगी। यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत नहीं है। लोकप्रिय नेता का यह परम दायित्व और कर्तव्य है कि वह अपनी लोकप्रियता को कानून का उल्लंघन कर के उसे सस्ती न बनाये । लोकप्रियता किसी भी दशा में देश के कानून के अवहेलना करने की अनुमति नहीं देती है। यह वैसे ही है जैसे कानून लागू करने वाली एजेंसी के पास कानून लागू करने की तमाप शक्तियों के बावजूद उसे कानून का पालन अनिवार्यतः करना है, यही बताया जाता है। आप कितने भी ताकतवर और ऊंचे हों पर देश का कानून आप से अधिक ताकतवर और ऊपर है।

आज भी भाजपा और प्रधानमंत्री उसी अपराजेयता के ग्रंथि से संक्रमित हैं । निश्चित रूप से मोदी जी का यह प्रांत है। 22 साल से वे यहां सत्ता में हैं । 12 साल वे खुद मुख्यमंत्री रहे हैं । गुजरात का निवासी पीएम है । यूपी बिहार एमपी राजस्थान के अतिरिक्त अन्य प्रांतों में क्षेत्रवाद की भावना भी थोड़ा अतिरिक्त होती है । पर इस चुनाव में मोदी जी की जो देहभाषा, और वक्तृता रही है उस से साफ स्पष्ट है कि वे खुद भी अपनी विजय को ले कर निर्द्वंद्व नहीं थे । अब एग्जिट पोल आ गया । वे जीत रहे हैं। अंतिम परिणाम क्या होगा यह तो 18 दिसंबर को ही जाना जा सकता है ।पर सोशल मीडिया और टीवी पर जो कुछ भी दिख रहा है उस से मुझे यह लगता है कि चुनाव परिणाम का आकलन करते समय एक प्रकार की वही ग्रन्थि अपराजेय भाव कहीं न कहीं है ।

© विजय शंकर सिंह