Thursday, 26 October 2017

मायावती द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने की धमकी - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

धर्म उनके लिये सुविधा का चयन है । हिन्दू तो वे जन्मना हैं। हिन्दू तो जन्मना ही होता है । यह धर्म एक संकीर्ण कर्मकांड युक्त धर्म के साथ साथ बेहद उदार और विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं को समेटे हुए एक जीवन पद्धति है । उनका मोह अगर इस धर्म से हो गया है तो वे कोई भी धर्म अपनाने के लिये स्वतंत्र हैं। उनके प्रेरणास्रोत बाबा साहब अंबेडकर ने 1956 में हिन्दू धर्म को त्याग कर, नागपुर में बौद्ध धर्म मे दीक्षित हुए थे । अगर मायावती ऐसा करती भी हैं तो वे अकेली और पहली व्यक्ति नहीँ होंगी जिन्होंने धर्म को छोड़ा है । सनातन धर्म मे इसे छोड़ कर ' जिन ' परम्परा ग्रहण करने वालों का विवरण ऋग्वेद में ही मिलता है। जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव अयोध्या के राजा थे । यह परंपरा मूलतः नास्तिक या निरीश्वरवादी परंपरा थी जो बाद की प्रतिवाद थी ।   महावीर और बुद्ध के समय मे तो व्यापक धर्म परिवर्तन हुआ ही । चन्द्रगुप्त मौर्य के जैन और अशोक के बौद्ध हो जाने के आख्यान जगत प्रसिद्ध है। इस्लाम और ईसाई धर्म को भी भारी संख्या में हिंदुओं ने ग्रहण किया । सबके अपने अपने कारण है । अधिकतर धर्म परिवर्तन भय और लोभ के कारण ही हुये हैं । मायावती द्वारा दी गयी धर्म परिवर्तन की धमकी का प्रेरक भाव भी लोभ है । उन्हें न मुक्ति की कामना है और न निर्वाण की, न वे ' चत्वारि आर्य सत्यानि ' में विश्वास करती हैं और न इस लिये ' त्रिरत्न ' की शरण मे आना चाहती हैं कि वे बौद्ध दर्शन से प्रभावित है, बल्कि उनका उद्देश्य ही राजनीति में अप्रासांगिक होने की गति को रोकना और पुनः खुद को प्रासंगिक बनाये रखना है । धर्म, ईश्वर, अस्ति नआस्ति , स्वर्ग , नर्क, आत्मा, ब्रह्म आदि भारी भरकम  गूढ़ शब्दों से उन्हें कोई सरोकार नहीं है ।
अल्लामा इक़बाल का यह शेर पढ़ें,
तेरा दिल तो है सनम आशना,
तुझे नमाज़ में मिलेगा क्या !!

मैं यहां Jagadishwar Chaturvedi का बौद्ध धर्म पर एक लेख साझा कर रहा हूँ। यह लेखक की एक अलग दृष्टि है ।
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बौद्ध धर्म को यहां से देखो ।

बौद्ध धर्म के बारे में अनेक मिथ हैं  इनमें एक मिथ है कि यह शांति का धर्म है।गरीबों का धर्म है। इसमें समानता है। सच इन बातों की पुष्टि नहीं करता। आधुनिककाल में श्रीलंका में जातीय हिसा का जिस तरह बर्बर रूप हमें तमिल और सिंहलियों के बीच में देखने को मिला है। चीन, बर्मा,कम्बोडिया आदि देशों में जो हिंसाचार देखने में आया है उससे यह बात पुष्ट नहीं होती कि बौद्ध धर्म शांति का धर्म है। बौद्ध धर्म के प्रति आज (अन्य धर्मों के प्रति भी) सारी दुनिया में इजारेदार पूंजीपतियों और अमीरों में जबरदस्त अपील है। इसका प्रधान कारण है बौद्ध धर्म में आरंभ से ही अमीरों की प्रभावशाली उपस्थिति। एच.ओल्डेनबर्ग ने "बुद्धः हिज लाइफ ,हिज टीचिंग्स,हिज आर्डर" ( 1927) में लिखा है कि बुद्ध को घेरे रखने वाले वास्तविक लोगों और प्रारंभिक धर्माचार्यों में जो लोग थे उन्हें देखने से प्रतीत होता है कि समानता के सिद्धान्त का पालन नहीं होता था।प्राचीन बुद्ध धर्म में कुलीन व्यक्तियों के प्रति विशेष झुकाव बना हुआ प्रतीत होता है जो अतीत की देन था।

धर्म का प्रचार करने वाले विश्व के प्रथम प्रचारक तापस और भल्लिक व्यापारी वर्ग से थे। बनारस में उपदेश देने के बाद बुद्ध में आस्था रखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ। बाद में संघ में आने वाला दूसरा व्यक्ति यसं था। जो बनारस के सम्पन्न परिवार का सदस्य था। उसके माता-पिता, बहिन आदि भी बौद्ध धर्म में आ गए। इसी यस के बहुत से मित्र व्यवसायी और परिचित,पड़ोसी आदि भी शामिल हुए।ओल्डनहर्ग ने विस्तार के साथ उन तमाम लोगों की जानकारी दी है जो सम्पन्न परिवारों से आते थे या राजा थे। इनमें मगध नरेश बिंबसार का नाम प्रमुख है।

महात्मा बुद्ध ने धर्म और धार्मिकपंथों में व्याप्त जातिभेद को चुनौती देते हुए अपने पंथ का मार्ग निचली या अन्त्यज जातियों के लिए खोला था। इससे इन जातियों में जबर्दस्त आकर्षण पैदा हुआ। बुद्ध के संघ के महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक था उपालि जो संघ के नियमों के अनुसार गौतम के पश्चात प्रमुख पद पर आसीन हुए था। वह पहले नाई था। उसके व्यवसाय को घृणित व्यवसायों में गिना जाता था। इसी प्रकार सुनीत भी एक नीची जनजाति 'पुक्कुस' से आया था ,जबकि वह उन बंधुओं की श्रेणी में था ,जिनकी रचना,थेरगाथा में सम्मिलित करने के लिए चुनी गई थीं। जबरदस्त नास्तिकता का प्रचारक सती नामक व्यक्ति धीवर जाति का था। नंद ग्वाला था। दो पंथक, एक कुलीन परिवार की अविवाहित कन्या के किसी दास के साथ यौन संबंधों की देन था। चापा नामक लड़की एक शिकारी की पुत्री थी। पुन्ना और पुन्निका दास पुत्रियां थीं। सुमंगलमाता सनीठे के वनों में काम करने वाले लोगों की पुत्री और पत्नी थी। सुभा एक लौहार की बेटी थी। इस तरह के असंख्य उदाहरण भरे पड़े हैं। यही कारण है महात्मा बुद्ध ने बड़े पैमाने पर अंत्यजों-वंचितों और अछूतों को अपनी ओर खींचा और उन्हें सामाजिक अलगाव और वंचना से मुक्ति दी। हिन्दू धर्म ऐसा करने में असफल रहा।

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने ''बुद्ध और उसके धर्म की भवितव्यता" शीर्षक से एक लेख लिखा है । यह लेख महाबोधि संस्था के मासिक में 1950 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने संक्षेप में अपने नजरिए से बौद्ध धर्म के विचारों को व्यक्त किया है। उन्होंने लिखा-
(1) समाज की स्थिरता के लिए कानून या नीति का आधार अवश्यंभावी है। इनमें किसी भी एक के अभाव में समाज निश्चय ही तितर-बितर हो जाएगा। अगर धर्म का अस्तित्व चलते रहना है तो उसका बुद्धि प्रामाण्यवादी होना आवश्यक है।
(2) विज्ञान बुद्धि प्रामाण्यवाद का दूसरा नाम है।
(3) धर्म के लिए यह काफी नहीं है कि वह केवल नैतिक संहिता बने। धर्म की नैतिक संहिता को स्वतंत्रता ,समता,बंधुता -इन मबलभूत तत्वों को स्वीकृति देनी चाहिए।
(4) धर्म के कारण दरिद्रता को पवित्र न मानें और उसे उदात्त रूप भी न दें।
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© विजय शंकर सिंह

Wednesday, 25 October 2017

25 अक्टूबर - साहिर लुधियानवी की पुण्यतिथि पर उनकी एक ग़ज़ल - लब पर पाबंदी तो है / विजय शंकर सिंह

लब पर पाबन्दी तो है ,एहसास पर पहरा तो है
फ़िर भी अहल-ए-दिल को अहवाल बशर करना तो है !!

ख़ून-ए-आदाँ से न हो , ख़ून-ए-शहीदां से ही हो
कुछ-न-कुछ इस दौर में रन्ग-ए-चमन निखरा तो है !!

अपनी ग़ैरत बेच डालें ,अपना मसलक़ छोड़ दें
रहनुमाओं में भी कुछ लोगों को ये मन्शा तो है !!

है जिन्हें सबसे ज़ियादा दावा-ए-हुब्बुल-वतन
आज उनकी वजह से हुब्ब-ए-वतन रुस्वा तो है !!

बुझ रहें है एक-एक करके अक़ीदों के दीए
इस अन्धेरे का भी लेकिन सामना करना तो है !!

झूठ क्यूँ बोलें फ़रोग़-ए-मस्लेहत के नाम पर
ज़िन्दगी प्यारी सही , लेकिन हमें मरना तो है !!
( साहिर लुधियानवी )

Tuesday, 24 October 2017

24 अक्टूबर - कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के जन्मदिन पर उनका स्मरण और ' कॉमन मैन ' / विजय शंकर सिंह

                                                                             

टाइम्स ऑफ इंडिया के नियमित पाठक रोज़ सुबह अखबार के फलक पहले पन्ने पर, एक अधेड़ व्यक्ति की ढीली ढाली चारखाने की कोट और धोती पहने हुये कार्टून को कभी नहीं भूल पाएंगे । यह अल्प केश वाला व्यक्ति हमारे आप के जीवन मे दैनंदिन आने वाली समस्याओं से रूबरू हो कर सुबह की चाय के साथ गुदगुदा जाता है । यह व्यक्ति महान कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण द्वारा गढ़ा गया चरित्र द कॉमन मैन था । यह लक्ष्मण का हमसफ़र था, उनका हमसाया था,  और जब वे नहीं रहे तो यह भी अतीत के पन्नों में जा कर सो गया । आधी सदी तक इस किरदार ने जनता की भावनाओं, अपेक्षाओं, उपेक्षाओं, दुख और ज़िन्दगी की विसंगतियों को अभिव्यक्त किया है । यह कॉमन मैन का जन्म 1951 में हुआ था । और वह अपनी बात नहीं, you said it , तुमने कहा था, कहता था । गौर से कार्टून देखें तो, यह आदमी मौन भाव से सब कुछ देखता है और उसे महसूस करता है । नृतत्वशास्त्री ( anthropologist ) ऋतु गैरोला खंडूरी ने इस किरदार पर टिप्पणी करते हुये कहा है कि, 

" Claid in a dhoti and a plaid jacket the puzzled common man is no dupe , his sharp observations miss no detail of the political circus. "
( Ritu Gairola Khanduri,  Picturing India : Nation , Development and the common man - Visual anthropology . Page. 303 - 323 )

                                                                             

लक्ष्मण ने जब टाइम्स ऑफ इंडिया में कार्टून बनाना शुरू किया तो उन्होंने अन्य चरित्रों को भी गढ़ा । पर टाइम्स ऑफ इंडिया का यह कॉमन मैन सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ । भारत सरकार के डाक तार विभाग ने 1988 में जब टाइम्स ऑफ इंडिया की डेढ़ सौवीं जयंती मनायी गयी तो इस कॉमन मैन के ऊपर एक डाक टिकट जारी किया । जब एयर डेक्कन की कम बजट की हवाई सेवा शुरू हुयी तो यह उसका एक प्रतीक लोगो भी बना । कॉमन मैन की लोकप्रियता का यह आलम है कि पुणे के सिम्बायोसिस संस्थान के भवन विश्वभवन के सामने 8 फ़ीट ऊंची कांसे की एक प्रतिमा बनायी गयी है । यह प्रतिमा प्रसिद्ध मूर्तिकार सुरेश संकल्प ने बनायी है ।
इसी कॉमन मैन को जन जन तक अपने कार्टून के माध्यम से पहुंचाने वाले आरके लक्ष्मण का जन्म मैसूर में सन् 1921 में 24 में हुआ था । उनके पिता प्रधानाचार्य थे और लक्ष्मण उनकी छः सन्तानों में सबसे छोटे थे। उनके एक बड़े भाई आरके नारायणन अंग्रेज़ी के प्रसिध्द उपन्यासकार थे । लक्ष्मण का प्रारम्भिक कार्य स्वराज्य और ब्लिट्ज़ नामक पत्रिकाओं सहित समाचार पत्रों में रहा। उन्होंने मैसूर महाराजा महाविद्यालय में पढ़ाई के दौरान अपने बड़े भाई आर॰के॰ नारायण कि कहानियों को द हिन्दू में चित्रित करना आरम्भ कर दिया तथा स्थानीय तथा स्वतंत्र के लिए राजनीतिक कार्टून बनाना आरम्भ कर दिया। लक्ष्मण कन्नड़ हास्य पत्रिका कोरवंजी में भी कार्टून बनाने का कार्य किया। यह पत्रिका १९४२ में डॉ॰ एम॰ शिवरम स्थापित की थी, इस पत्रिका के संस्थापक एलोपैथिक चिकित्सक थे तथा बैंगलोर के राजसी क्षेत्र में रहते थे। उन्होंने यह मासिक पत्रिका विनोदी, व्यंग्य लेख और कार्टून के लिए यह समर्पित की। शिवरम अपने आप में प्रख्यात कन्नड हास्य रस लेखक थे। उन्होंने लक्ष्मण को भी प्रोत्साहित किया।

                                                                              
लक्ष्मण ने मद्रास के जैमिनी स्टूडियोज में ग्रीष्मकालीन रोजगार आरम्भ कर दिया। उनका प्रथम पूर्णकालिक व्यवसाय मुम्बई की द फ्री प्रेस जर्नल के राजनीतिक कार्टूनकार के रूप में की थी। इस पत्रिका में बाल ठाकरे उनके साथी काटूनकार थे। लक्ष्मण ने द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, बॉम्बे से जुड़ गये तथा उसमें लगभग पचास वर्षों तक कार्य किया। उनका "कॉमन मैन" चरित्र प्रजातंत्र के साक्षी के रूप में चित्रित हुआ ।

लक्ष्मन का पहला विवाह भारतनाट्यम नर्तकी और फ़िल्म अभिनेत्री कुमारी कमला लक्ष्मण के साथ हुआ। कुमारी कमला ने अपना फ़िल्मी कैरियर बाल-कलाकार के रूप में आरम्भ किया था। उनके तलाक के समय तक उनकी कोई सन्तान नहीं थी तथा लक्ष्मण ने दूसरा विवाह कर लिया। उनकी दुसरी पत्नी का नाम भी कमला लक्ष्मण ही था। वो एक लेखिका तथा बाल-पुस्तक लेखिका थीं। लक्ष्मण ने "द स्टार आई नेवर मेट" नामक कार्टून शृंखला और फ़िल्म पत्रिका फिल्मफेयर में अपनी दूसरी पत्नी कमला लक्ष्मण का "द स्टार आई ऑनली मेट" शीर्षक से कार्टून चित्रित किया। दम्पति के एक पुत्र हुआ। सितम्बर 2003 में, उनके बायें भाग को लकवा मार गय। उन्होंने आंशिक रूप से इसके प्रभावों से मुक्ति प्राप्त कर लिया। २० जून २०१० की शाम को लक्ष्मण को मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ति करवाया गया और बाद में पुणे स्थानान्तरित किया गया। अक्टूबर 2013 में लक्ष्मण ने पुणे में अपना 91वाँ जन्मदिन मनाया।

                                                                           

उन्हें बी डी गोयनका पुरस्कार - दि इन्डियन एक्सप्रेस द्वारा, दुर्गा रतन स्वर्ण पदक - हिन्दुस्तान टाइम्स द्वारा, पद्म विभूषण ,  पद्म भूषण ,रमन मैग्सेसे पुरस्कार 1984, पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया है ।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं,
दि एलोक्वोयेन्ट ब्रश, द बेस्ट ऑफ लक्षमण सीरीज, होटल रिवीयेरा, द मेसेंजर, सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया, द टनल ऑफ टाईम (आत्मकथा), मल्टी-मीडिया ।
आज 24 अक्टूबर को उनके जन्मदिन पर उनका विनम्र स्मरण ।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 22 October 2017

22 अक्टूबर , अदम गोंडवी के जन्मदिन पर उनका विनम्र स्मरण और उनकी एक ग़ज़ल / विजय शंकर सिंह

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये ।
( अदम गोंडवी )

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये ।

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये ।

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये ।

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये ।

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये ।

अदम गोंडवी ( 1947 से 2011 ) का वास्तविक नाम रामनाथ सिंह था। आपका जन्म 22 अक्तूबर 1947 को आटा ग्राम, परसपुर, गोंडा, उत्तर प्रदेश में हुआ था।  उनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ है,  धरती की सतह पर, समय से मठभेड ।

अदम गोंडवी को हिंदी ग़ज़ल में दुष्यन्त कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला शायर माना जाता है। राजनीति, लोकतंत्र और व्‍यवस्‍था पर करारा प्रहार करती अदम गोंडवी की ग़ज़लें जनमानस की आवाज हैं। 18 दिसंबर 2011 को अदम गोंडवी का संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ में निधन हो गया था। आज उनके जन्मदिन पर उनका विनम्र स्मरण ।

© विजय शंकर सिंह

Saturday, 21 October 2017

दीपावली पर नज़ीर अकबराबादी की एक नज़्म - दिवाली का सामान / विजय शंकर सिंह

हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का
हर इक तरफ को उजाला हुआ दिवाली का
सभी के दिन में समां भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मजा खुश लगा दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का।

जहाँ में यारो अजब तरह का है यह त्योहार
किसी ने नकद लिया और कोई करे उधार
खिलौने खीलों बतासी का गर्म है बाजार
हरइक दुकां में चिरागों की हो रही है बहार
सभों को फिक्र है अब जा यना दिवाली का।

मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई
पुकारते है कि लाला दिवाली है आई
बतासे ले कोई बर्फी किसी ने तुलवाई
खिलौने वालों की उनसे ज़ियादा बन आई
गोया उन्हो के बां' राज आ गया दिवाली का।

सराफ़ हराम की कौड़ी का जिनका है व्योपार
उन्हींने खाया है इस दिन के वास्ते ही उधार
कहे है हँसके कर्जख्वाह' से हरइक इक बार
दिवाली आई है सब दे चुकायेंगे अय यार
खुदा के फ़ज्ल से है आसरा दिवाली का।

मकान लीप के ठिलिया जो कोरी रखवाई
जला च्रिराग को कौड़ी के जल्द झनकाई
असल जुआरी थे उनमें तो जान सी आई
खुशी से कूद उछलकर पुकारे ओ भाई
शगून पहले, करो तुम जरा दिवाली का ।

किसी ने घर की हवेली गिरी रखा हारी
जो कुछ थी जिन्स मुयस्सर जरा जरा हारी
किसी ने चीज किसी की चुरा छुपा हारी
किसी ने गठरी पड़ोसन की अपनी ला हारी
यह हार जीत का चर्चा पड़ा दिवाली का।

ये बातें सच है न झूठ इनको जानियो यारो
नसीहतें है इन्हें मन में ठानियो यारो
जहां को जाओ यह किस्सा बखानियो यारो
जो जुआरी हो न बुरा, उसका मानियो यारो
'नज़ीर' आप भी है ज्वारिया दिवाली का।
( नज़ीर' अकबराबादी )
नज़ीर अकबराबादी ( 1735 – 1830 ) १८वीं शदी के भारतीय शायर थे जिन्हें "नज़्म का पिता" कहा जाता है। इनका असल नाम वली मुहम्मद था और यह आगरा के रहने वाले थे , जिसका एक नाम अकबराबाद था ।  उन्होंने कई ग़ज़लें लिखी, उनकी सबसे प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक ग़ज़ल बंजारानामा है। दीवाली के अतिरिक्त, होली, जन्माष्टमी आदि पर्वों पर भी इन्होंने सुंदर और लम्बी नज़्में लिखी हैं ।

अमरेश दत्ता (2006) ने ' The Encyclopaedia Of Indian Literature (Volume Two) (Devraj To Jyoti), Volume 2. साहित्य अकादमी में उनके बारे में लिखा है कि,
" नज़ीर आम लोगों के कवि थे। उन्होंने आम जीवन, ऋतुओं, त्योहारों, फलों, सब्जियों आदि विषयों पर लिखा। वह धर्म-निरपेक्षता के ज्वलंत उदाहरण हैं। कहा जाता है कि उन्होंने लगभग दो लाख रचनायें लिखीं। परन्तु उनकी छह हज़ार के करीब रचनायें मिलती हैं और इन में से 600 के करीब ग़ज़लें हैं। "

उनकी मुख्य रचनाएँ है, बंजारानामा, दूर से आये थे साक़ी, फ़क़ीरों की सदा, है दुनिया जिसका नाम, शहरे आशोब । उन्होंने अरबी, फ़ारसी, उर्दू, पंजाबी, ब्रजभाषा, मारवाड़ी, पूरबी और हिन्दी भाषा में अपनी रचनाये की है ।

© विजय शंकर सिंह

Friday, 20 October 2017

त्रेता का हैंगओवर - अयोध्या में दीपावली के बाद / विजय शंकर सिंह

आज की सुबह कलि काल मे हुयी। दीवारों पर बुझे दिये, शांत पड़ी हुयी झालरें बीत गए त्योहार के किस्से बता रहे हैं । इस बार की दीपावली सरकार के लिये अलग तरह से रही। अयोध्या में 2 लाख दीयों का प्रकाश फैला । सारे मग जगमगा उठे । रामलीला हुयी । ट्रूप इंडोनेशिया का था । यह दीप दान, अखबार बता रहे हैं कि एक विश्व रिकॉर्ड था । अयोध्या को बहुत कुछ मिला । अयोध्या को पर्यटन मानचित्र पर लाने का सरकार की योजना है । यह एक अच्छी योजना है। यहां तुलसी शोध संस्थान पहले से है । पर अयोध्या के नगर और घाटों को और सुविधा सम्पन्न बनाया जा सकता है । राम के पैड़ी की योजना तो पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के समय बनी थी। सुंदर घाटों की शृंखला भी उन्ही के समय मे बनी है । पर हरिद्वार के समान न यहां प्रवाह है और न सरयू , गंगा हैं तो यह घाट पर्यटन की दृष्टि से इतने लोकप्रिय नहीं हुये जितने होने चाहिये । इन योजनाओं से अयोध्या की उदासी दूर होती है या नहीं यह तो बाद में ही पता चलेगा । फिलहाल तो यह दीये स्वच्छ भारत मिशन को ही चुनौती दे रहे हैं ।
अयोध्या नगर पालिका का यह दायित्व और कर्तव्य था कि वह इस कूड़े को साफ कर के घाटों को दर्शनीय और स्नान किये जाने योग्य बना देती ।

सारे वीआईपी कहे जाने वाले प्राणी जहां से आये थे वहीं चले गए । सरयू राम को समेटे शांत गति से अयोध्या को निस्पृह भाव से देखती हुयी बहती रहीं। यह भी एक तथ्य है कि केवल अयोध्या में ही घाघरा को सरयू कहा जाता है । घाघरा , नदी नहीं नद है । घरघर की ध्वनि के साथ प्रवाहित होने के कारण इसे घर्घर और इसके विशाल पाट और अनियंत्रित तथा अप्रत्याशित बहाव के कारण नद कहा गया । पुरुष को अनियंत्रित बने रहने की छूट जो मिली है ! इन्ही गुणों के कारण , ब्रह्मा के कमंडल से निकले ब्रह्मपुत्र को भी नद ही कहते हैं । सात पवित्र नदियों में ब्रह्मपुत्र अकेला नद है शेष छह नदियां हैं, लेकिन सरयू उसमे नहीं हैं क्यों कि सरयू में राम ने डूब कर अपना प्राण त्यागा था । सरयू , अहिल्या की तरह अनायास पाप की भागी बनी। सरयू में राम के स्वेच्छा से डूब कर मर जाने के कारण वहां दीप जलाने की परंपरा नहीं है । राम ने अपने सभी भाइयों सहित सरयू में डूब कर स्वतः समाधि ली थी। सभी भाइयों के पुत्रों ने अपने अपने परिवार के साथ अयोध्या का त्याग कर दिया था । अयोध्या तब से उजाड़ हो गयी । यह सब भी त्रेता में ही हुआ था ।

सुबह किनारे पड़े बुझे दियों में बचे खाद्य तेलों को बटोरते हुए ये बच्चे त्रेता और कलि का अर्थ स्पष्ट कर रहे हैं । यह फोटो दीपावली के गर्व, हर्ष और उल्लास को ठेंगा दिखाती है । यह हमें विश्व क्षुधा सूचकांक के 100 वें नम्बर पर फिर ले जा कर खड़ा कर देती है । यह चित्र हमे भात के अभाव में मरती हुयी झारखंड के आधार हीन उस बच्ची की याद दिला देती है । फिर अचानक राम राज्य याद आने लगता है । राम राज्य तो एक आदर्श राज्य व्यवस्था थी। तुलसी जब राम राज्य की बात उत्तरकाण्ड में कहते हैं तो वे कुछ इस प्रकार कहते हैं,

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।

त्रेता में ऐसा शासन या वातावरण था या नहीं यह तो नहीं मालूम । पर जब एक सुखकर राज्य के राजा की पत्नी जो राज महिषी थी को, गर्भावस्था में वन में रहने के लिये बाध्य कर दिया गया हो, और राजा को खुद ही प्राण त्यागने पड़े हों ,तो राम राज्य की आदर्श व्यवस्था पर अनायास ही प्रश्न चिह्न खड़ा हो जाता है ।

एक समाचार के अनुसार,
" वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के लिए दीपोत्सव का आयोजन कर रही समिति के सदस्य आशीष मिश्र ने कार्यक्रम के पूर्व इस बात का दावा किया था कि जिन वॉलंटियर की ड्यूटी दीप जलाने के लिए लगाई गई है। वही वालंटियर कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सभी दीपक हटाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका जिसके कारण कार्यक्रम के बाद राम की पैड़ी की बेहद गंदी तस्वीर सामने आ गई। जाहिर तौर पर इस तरह के प्रयासों से राम की पैड़ी और अयोध्या कभी भी विश्व पर्यटन के मानचित्र पर नहीं आ पाएगी। इसके लिए सतत प्रयास की जरूरत है और इस बात को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पत्रिका टीम से बातचीत करते हुए अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर में भी कहा था। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा की अयोध्या को साफ-सुथरा रखने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है लेकिन एक तरफ मुख्यमंत्री यह बयान दे रहे थे तो दूसरी तरफ राम की पौड़ी परिसर गंदगी से बज बजा रहा था। कार्यक्रम आयोजन से जुड़े अधिकारियों और समिति ने ना प्रदेश के मुख्यमंत्री का मान रखा और ना ही देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन की प्रवाह की और राम की पैड़ी को इस हाल में पहुंचा दिया जैसी वह कभी न थी। "

त्रेता से जब कलि में हम लौटने हैं और त्रेता के अतीतमोह से जब बाहर आते हैं, तो फ़िराक़ साहब का यह कलाम याद आता है ।

"इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए
इन्ही से काम चलाओ बड़ी उदास है रात
सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गये हैं चिराग़
दिलों की ख़ैर मनाओ बड़ी उदास है रात"

© विजय शंकर सिंह

Wednesday, 18 October 2017

राम लौट आये हैं - अयोध्या में दीपावली / विजय शंकर सिंह

राम लौट आये हैं । 14 साल के बनवास के बाद जंगल की खट्टी मीठी स्मृतियों के साथ । रावण का वध कर । सीता और लक्ष्मण के साथ । साथ मे परम सेवक हनुमान भी है । कहते हैं राजा राम के लौटने की प्रसन्नता से अभिभूत हो अयोध्या वासियों ने असंख्य दीप जला कर उनका स्वागत किया था । राम ने गद्दी संभाली । उनकी पादुका हटा दी गयी । वे सीता के साथ उसी राज सिंहासन पर विराजमान हो गए । एक युग का अंत हुआ । वह पादुका का युग था । प्रॉक्सी काल था । सत्ता किसी और की थी, आदेश किसी और का चलता था । लेकिन यह व्यवस्था भी सहमति से थी। पादुका प्रतीक्षारत थी। आज उस पादुका को चरण मिल गए ।  रघुकुल के सबसे प्रतापी राजा का शासन प्रारम्भ हुआ । असँख्य दीप जल उठे । अंधकार सरयू पार चला गया । राजधानी से दूर उन गाँव गिरांव मे जहां वह प्रजा भी बसती थी, जो कोउ नृप होहि, की मानसिकता में जी रही थी। कम ओ बेश वह मानसिकता आज भी है । पर राजधानी उत्सव मग्न थी। यह उत्सवधर्मिता थी । उत्सवधर्मिता हमारे समाज का एक स्थायी भाव है । वसन्त के आगमन से ले कर शरद के प्रस्थान तक पर्व और उत्सवों की एक समृद्ध परंपरा है । आनन्द , भारतीय मानसिकता का स्थायी भाव है । दीया बाती, धूम धड़ाका, आदि यह सब,  तिमिर को दूर करने का यह एक प्रतीकात्मक उपक्रम ही तो है । अंधकार से एक अहर्निश युद्ध होता रहता है हम सबका । यह अंदर बाहर दोनों जगह चलता रहता है । अंतर यह है कि अंदर का संघर्ष कोई देख नहीं पाता है । कुछ देख भी पाते हैं तो अनदेखी कर जाते हैं ।  राजा , तिमिर का नाश करता है । वह एक व्यवस्था देता है । शासन की रीति -नीति, विधि - विधान बनाता है । उसी विधि -विधान पर राज्य चलता है । वह प्रजा का हित देखता है । प्रजा का सुख देखता है । प्रजा को प्रसन्न रखता है । प्रजा का रंजन करता है,  इसीलिए तो, उसे प्रजा का रंजक कहा गया है । प्रजा उसके लिये पाल्य है । अतः वह प्रजा पालक भी कहा गया है । पालन आप भेदभाव की भावना से ऊपर उठ कर ही कर सकते हैं । वह यह सुनिश्चित करता है कि उसके राज्य में दैहिक दैविक और भौतिक ताप न व्यापे। किसी को कोई कष्ट न हो । उसका शासन, उस की इच्छा पर निर्भर नही  करता था, वह स्वेच्छाचारी नहीं होता था । यह राजा का दायित्व है कि वह समभाव से शासन करे । उसके राजदण्ड पर धर्म का अंकुश रहता है । धर्मोअस्मि धर्मोअस्मि । धर्म से यहां तात्पर्य कर्मकांड से संक्रमित धर्म नही  है बल्कि उस विधान से है जो राज करने के लिये बनाये गए है । जो अनुभव और परम्पराओं की अग्नि में तप कर कुंदन बने हो। राजा जिस दिन इस राजधर्म से च्युत हो जाता है वह नर्क का भागी होता है । अत्याचारी राजा को राज्यच्युत करना भी शास्त्र सम्मत है ।

राजधर्म, इतिहास का पुनर्मचंन, पुनर्लेखन, और उत्सवधर्मिता ही नहीं है बल्कि प्रजा के कष्टों को दूर करते हुये एक व्यवस्थित शासन प्रणाली का मनसा वाचा कर्मणा पालन भी है । पर्व तो एक प्रतीक है । अंधेरा भी एक प्रतीक ही है । निशा है तो, अंधकार रहेगा ही। और फिर निशा भी अमावस की। उदास और काली रात ।  उसी अंधकार को दूर करने के लिये तो दीप जलाते हैं हम । हम सूरज की आभा में दीप कभी नहीं जलाते हैं। जलाते भी हैं तो उसका उद्देश्य अंधेरे को भगाना नहीं रहता है । क्यों कि अंधकार रहता ही नहीं है । दीप की आवश्यकता ही अंधकार में पड़ती है । उसका प्रकाश उस अंधेरे में सम्बल देता है, इसी लिये तो हम सबको आह्लादित करता है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि अंधकार कितना भी सघन हो वह प्रकाश की एक रेख से डर जाता है । डर भी एक प्रकार का अंधेरा ही है । अंधकार का एक प्रतीक भय, भूख और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं भी है । जब हम इन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के जद्दोजहद से मुक्त होते हैं तो शुभकामनाओं का आदान प्रदान भी मन से निकलता है नहीं तो वह केवल शुष्क औपचारिकता ही बन जाती है । राजा का सबसे बड़ा दायित्व और कर्तव्य प्रजा को सुखी , सुरक्षित और भयमुक्त रखना है । ऐसे राजधर्म से च्युत राजा को नरक में ही शरण मिलती है । तभी तो आध्यात्म रामायण के एक प्रसंग के अनुसार राम वशिष्ठ से कहते हैं, " गुरुवर, राज्य करना सबसे कठिन कार्य है । " प्रजा की अपेक्षाओं को पूरा करना आसान नहीं होता है । इसी लिये राम इसे कठिन कहते हैं । मानस में तुलसीदास की यह बात भी सुनें,
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप होहिं नरक अधिकारी ।।
राम राज्य क्या है, इस पर तुलसी की यह चौपाइयां पढ़ें ।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
तुलसी के बिना राम की और राम के बिना तुलसी की कल्पना नहीं की जा सकती है ।

राम राज्य अक्सर सर्वश्रेष्ठ राज माना जाता है । यह इतना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है कि इसे आप काल्पनिक आदर्शवाद यूटोपिया भी कह सकते हैं । यह आदर्श की चरम स्थिति है । हम एक सुंदर , व्यवस्थित और सुखी राज्य की जब कामना करते हैं तो राम राज्य का ही नाम मस्तिष्क में उभरता है । कभी कभी इसके विपरीत स्वच्छंद राज व्यवस्था को भी परिहास में राम राज्य कह देते हैं। पर राम राज्य से अर्थ एक सुंदर सुशासित राज्य ही है। जहां अपराध कम से कम हो, और हो तो अपराधी दंडित हो, सबकी उदर पूर्ति हो , शिक्षा चिकित्सा की सुविधा हो और प्रजा भयमुक्त हो । यह दीप जो उस दिन जले थे जन आशा के दीप थे । वह एक राजा का अपनी राजधानी में लौटने पर किया गया स्वागत तो था ही साथ ही आशा के भी दीप थे , कि अब अंधेरा छंटेगा और सुखकर शासन आएगा । शासन कितना भी सुखकर हो, वह अंतिम नहीं होता है । बेहतर की गुंजाइश और कामना सदैव जन्मती रहती है । यह कामना और इच्छा भाव ही संसार को चलाती रहती हैं । आज भी जो दीप वहां जले हैं, उसे इसी प्रतीक के रूप में देखें कि अब थोड़ा बेहतर शासन आएगा। आये या न आये पर एक आस रखने का अधिकार तो हम सबको है । कल क्या होगा यह राम ही बता पायें तो बताएं पर जब हम एक दीप उम्मीदों का जलाते हैं और उसे सरिता में प्रवाहित करते हैं और उसे समय के साथ ही बहते हुये देखते हैं तो जो प्रवाहभाव मन में उमगता है वही जीवन का सार होता है । नदी के प्रवाह में बहते हुये दीप उम्मीदों के दिये ही तो हैं ।  आशा के ये असंख्य दीप जो आज जगमग जगमग हुए हैं वे एक बेहतर कल की उम्मीदें पूरी करें । यही कामना है ।

© विजय शंकर सिंह