Saturday, 28 January 2017

संजय लीला भंसाली, इतिहास बेचा नहीं जाता है / विजय शंकर सिंह

संजय लीला भंसाली, मुझे आप से सहानुभूति है । सहानुभूति इस लिए कि फ़िल्म पद्मिनी के शूटिंग के समय आप से अभद्रता हुयी और आप के लोगों के साथ मारपीट हुयी । कानून का शासन इस बात की इजाज़त नहीं देता कि उसे हर कोई हाँथ में ले कर  उसका दुरुपयोग करे । उन गुंडों और असामाजिक तत्वों के विरुद्ध सरकार और पुलिस को कानूनी कार्यवाही ज़रूर करनी चाहिये ।  पर इस आक्रोश के कारणों की पड़ताल करना भी ज़रूरी है । आप चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी पर फ़िल्म बना रहे हैं ।  यह चरित्र भारतीय मानस में बहुत गहरे पैठा हुआ है । चित्तौड़ का विशाल दुर्ग आप ने ज़रूर देखा होगा । दूर से ही उसका विजय स्तम्भ अतीत के स्वर्ण काल में पहुंचा कर गर्वोंनत कर देता है । एक कहावत भी प्रचलित है कि, चित्तौड़ गढ़ गढ़ा और और गढ़ गढ़ैया ! पद्मिनी ने सैकड़ों महिलाओं के साथ उस किले में जौहर किया था, ताकि बहादुर राजपूत सैनिक उनसे चिंता मुक्त हो कर रण क्षेत्र में दुश्मन से जूझ सकें । जौहर सामूहिक रूप से जलती आग में कूद कर अपने अस्तित्व को समाप्त कर देना होता था । यह एक आपात परम्परा थी । चित्तौड़ में उस समय युद्ध का ही माहौल था ।  अलाउद्दीन ख़िलजी को रानी पद्मिनी के सौंदर्य के बारे में पता था । कहा जाता है,  उसने इस अद्भुत रानी को दर्पण से देखा भी था । यह भी चित्तौड़ पर उसके हमले का कारण था । पर चित्तौड़ और सिसौदिया राजपूत अलग ही मिट्टी के बने थे । पूरा रनिवास जौहर कर के राख हो गया । सिर्फ कीर्ति और गौरव गाथा ही शेष रही । यह कीर्तिगाथा सदियों से आत्मसम्मानी राजपूत समाज को अनुप्राणित करती रही है और करती रहेगी । अगर इस महान घटना पर इतिहास को इतिहासकार की दृष्टि से आप फ़िल्म बना रहे हैं तो बहुत अच्छी बात है । पर अगर इतिहास में मार्केटिंग प्रेरित कल्पना का मिश्रण है तो यह आपत्तिजनक ही होगा । सुना है , प्रस्तावित फिल्म में अलाउद्दीन ख़िलजी का रानी पद्मिनी के साथ प्रेम प्रसंग की बात दिखायी गयी है । जो ऐतिहासिक तथ्यों के सर्वथा विपरीत है । फ़िल्म में  चित्तौड़ पर हुए हमले को इस प्रेम से ही प्रेरित बताया गया है । पर इतिहास की कोई पुस्तक जो समकालीन इतिहास पर उपलब्ध है में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा या कहा गया है । कोई ऐसा लेशमात्र भी नहीं मिलता है कि रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन के बीच कभी कोई प्रेम प्रसंग हुआ हो।  लेकिन सूखा इतिहास फिल्मों में नहीं चलता है । यह आप की अपनी समस्या होगी पर सिर्फ फ़िल्म चले और बॉक्स ऑफिस पर हिट हो, इस लिए अगर आप ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर उसे बना रहे हैं तो आप का यह प्रयास निंदनीय ही कहूँगा ।

अक्सर फ़िल्म समीक्षक यह कहते हैं कि, हिंदी फिल्में इतिहास को इतिहास की तरह परदे पर नहीं उतार पाती है जितनी खूबसूरती से अंग्रेजी फिल्में इतिहास को दिखाती हैं । क्या कारण है कि रिचार्ड एटनबरो गांधी जैसी फ़िल्म बना लेते हैं और हमारे फिल्मकार कालजयी ऐतिहासिक पात्रों को सेल्युलाइड पर उतार नहीं पाते हैं । वे मसालाबाज़ी से मुक्त हो ही नहीं पाते । एक प्रसिद्ध फ़िल्म है मुग़ल ए आज़म । के आसिफ की यह फ़िल्म भारतीय फिल्मों के इतिहास में कालजयी फ़िल्म मानी जाती है । पर इस फ़िल्म में भी कल्पना इतिहास पर हावी हो गयी है । फ़िल्म की मूल कथा वस्तु ही काल्पनिक है । अनारकली के इर्द गिर्द घूमती हुयी इस फ़िल्म में अनारकली का पात्र ही कल्पना से सृजित है । पूरे मुगल इतिहास में अनारकली का कहीं कोई उल्लेख नहीं है । जहांगीर पर आधिकारिक विद्वान माने जाने वाले और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉ राम प्रकाश त्रिपाठी ने अपनी पुस्तक जहांगीर में अनारकली का कोई उल्लेख ही नहीं किया हैं। यह कल्पना थी । जो बाद में गल्प के रूप में जुड़ गयी और इस तरह से इतिहास के साथ गड्डमड्ड हो गयी कि अब यह पात्र भी ऐतिहासिक ही लगने लगी है ।  इस नाम की कोई महिला उस काल खंड और सलीम के जीवन में थी ही नहीं । सलीम या जहांगीर ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह ज़रूर किया था, पर उसका कारण अनारकली नहीं थी । अबुल फज़ल की हत्या, वीर सिंह बुंदेला से जहांगीर की मित्रता आदि के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं पर अनारकली का कोई भी उल्लेख नहीं मिलता है । मैं गम्भीर और अकादमिक इतिहास की बात कर रहा हूँ । ऐतिहासिक उपन्यासों की काल्पनिकता पर नहीं । इसी तरह बहुत से ऐतिहासिक फिल्मों में कल्पना के समावेश से उसे रोचक बनाया गया है और लोगों ने पसंद भी किया है । हो सकता है भंसाली साहब आप भी रानी पद्मिनी के प्रेम प्रसंग को कल्पना से उकेर कर इसे रोचक बनाना चाहते हों । पर इतिहास को इस प्रकार से तोड़ने मरोड़ने के खतरे भी बहुत हैं ।

अभिव्यक्ति की आज़ादी का भी सवाल उठेगा कि आप को यह आज़ादी क्यों न दी जाय कि आप अपनी अभिव्यक्ति खुल कर कह सकें ? लेकिन क्या इस आज़ादी की आड़ में आप को ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करने की भी अनुमति दी जानी चाहिए ? मेरा मत है आप को स्वतः यह बात सोचनी होगी कि पद्मिनी , चित्तौड़, दिल्ली और अलाउद्दीन के समय क्या क्या ऐतिहासिक तथ्य थे । अलाउद्दीन और चित्तौड़ का युद्ध एक मध्ययुगीन साम्राज्य विस्तार का ही हिस्सा था । आधुनिक काल के आगमन के पूर्व तक साम्राज्य विस्तार राजाओं का शौक़ ही नहीं उनका मुख्य दायित्व भी था । यह युद्ध उसी का परिणाम था । पर जिस प्रेम प्रसंग की बात की जा रही है उसका तो कहीं उल्लेख ही नहीं है और वह आधारहीन है । रानी पद्मिनी के प्रति इतिहास के तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करना महान ऐतिहासिक विरासत के प्रति अवज्ञा और अन्याय है । जो इतिहास में है और जो तथ्य है उसका फिल्मांकन किया जाना चाहिए । इतिहास की मार्केटिंग न तो की जानी चाहिए और न ही उचित है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह वाक्य बहुत ही सारगर्भित है ,
" आप को सड़क पर खड़े हो कर छड़ी घुमाने का अधिकार है, पर वहीँ तक जब तक कि वह किसी की नाक में लगे । "
जो सच और प्रमाणित हो वही फिल्माएं । हो सकता है थोडा गंभीर शोध करना पड़े । पर इतिहास को विकृत न करें ।

( विजय शंकर सिंह )

Thursday, 26 January 2017

हरिशंकर परसाई की एक व्यंग्य रचना - ठिठुरता हुआ गणतंत्र / विजय शंकर सिंह

( आज 26 जनवरी है । आज के दिन प्रति वर्ष हम गणतंत्र दिवस मनाते हैं । 1950 ई में आज ही के दिन भारतीय संविधान जो हम भारत के लोगों के लिए आत्मार्पित किया गया था , लागू किया गया । हर साल हम यह जश्न मनाते हैं । इस साल भी वही औपचारिकता निभायी जा रही है । आप सब को गणतंत्र दिवस की अनंत शुभकामनाएं ।
इस अवसर पर मैं हिंदी के अत्यंत प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी की एक लोकप्रिय व्यंग्य रचना साझा कर रहा हूँ । मौसम, आज़ादी के समय, ठंड और ठिठुरन के माध्यम से उन्होंने देश की तत्कालीन स्थिति पर बहुत कुछ कह दिया है । विशेषकर जब वे सूरज के निकलने के प्रतीक के आधार पर तत्कालीन राजनैतिक दलों के वैचारिक प्रतिबद्धताजन्य पूर्वाग्रहों को दिखाते हैं तो वे एक सामान्य वार्तालाप में बहुत गम्भीरता से सच कह जाते हैं । व्यंग्य लिखना कठिन होता है , ऐसा मुझे लगता है । व्यंग्य मज़ाक नहीं है । व्यंग्य , गंभीर बात को भी परिहास बोध से व्यक्त करते हुए सीधे चोट करता है ।
हमारा संविधान , अपने मूल्यों को बनाये रखे और सभी चुनौतियों का सामना करते हुए, निरंतर प्रासंगिक बना रहे , इस अवसर पर,  यही कामना है । )
- vss.

O
ठिठुरता हुआ गणतंत्र
( हरिशंकर परसाई )

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ़ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।
इतना बेवकूफ़ भी नहीं कि मान लूँ , जिस साल मैं समारोह देखता हूँ, उसी साल ऐसा मौसम रहता है। हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र-दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है।
आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है?
जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस मंत्री से पूछा था कि यह क्या बात है कि हर गणतंत्र-दिवस को सूर्य छिपा रहता है? सूर्य की किरणों के तले हम उत्सव क्यों नहीं मना सकते? उन्होंने कहा-जरा धीरज रखिए। हम कोशिश में हैं कि सूर्य बाहर आ जाए। पर इतने बड़े सूर्य को बाहर निकालना आसान नहीं हैं। वक्त लगेगा। हमें सत्ता के कम से कम सौ वर्ष तो दीजिए।
दिए। सूर्य को बाहर निकालने के लिए सौ वर्ष दिए, मगर हर साल उसका छोटा-मोटा कोना तो निकलता दिखना चाहिए। सूर्य कोई बच्चा तो है नहीं जो अन्तरिक्ष की कोख में अटका है, जिसे आप आपरेशन करके एक दिन में निकाल देंगे।
इधर जब कांग्रेस के दो हिस्से हो गए तब मैंने एक इंडिकेटी कांग्रेस से पूछा। उसने कहा-’हम हर बार सूर्य को बादलों से बाहर निकालने की कोशिश करते थे, पर हर बार सिंडीकेट वाले अड़ंगा डाल देते थे। अब हम वादा करते हैं कि अगले गणतंत्र दिवस पर सूर्य को निकालकर बताएँगे।
एक सिण्डीकेटी पास खड़ा सुन रहा था। वह बोल पड़ा- ‘यह लेडी (प्रधानमंत्री) कम्युनिस्टों के चक्कर में आ गई है। वही उसे उकसा रहे हैं कि सूर्य को निकालो। उन्हें उम्मीद है कि बादलों के पीछे से उनका प्यारा ‘लाल सूरज’ निकलेगा। हम कहते हैं कि सूर्य को निकालने की क्या जरूरत है? क्या बादलों को हटाने से काम नहीं चल सकता?

मैं संसोपाई भाई से पूछ्ता हूँ। वह कहता है-’सूर्य गैर-कांग्रेसवाद पर अमल कर रहा है। उसने डाक्टर लोहिया के कहने पर हमारा पार्टी-फार्म दिया था। काँग्रेसी प्रधानमंत्री को सलामी लेते वह कैसे देख सकता है? किसी गैर-काँग्रेसी को प्रधानमंत्री बना दो, तो सूर्य क्या ,उसके अच्छे भी निकल पड़ेंगे।
जनसंघी भाई से भी पूछा। उसने कहा-’ सूर्य सेक्युलर होता तो इस सरकार की परेड में निकल आता। इस सरकार से आशा मत करो कि भगवान अंशुमाली को निकाल सकेगी। हमारे राज्य में ही सूर्य निकलेगा।
साम्यवादी ने मुझसे साफ़ कहा-’ यह सब सी.आई.ए. का षडयंत्र है। सातवें बेड़े से बादल दिल्ली भेजे जाते हैं।’
स्वतंत्र पार्टी के नेता ने कहा-’ रूस का पिछलग्गू बनने का और क्या नतीजा होगा?
प्रसोपा भाई ने अनमने ढंग से कहा-’ सवाल पेचीदा है। नेशनल कौंसिल की अगली बैठक में इसका फ़ैसला होगा। तब बताऊँगा।’
राजाजी से मैं मिल न सका। मिलता, तो वह इसके सिवा क्या कहते कि इस राज में तारे निकलते हैं, यही गनीमत है।’
मैं इंतजार करूँगा, जब भी सूर्य निकले।

स्वतंत्रता-दिवस भी तो भरी बरसात में होता है। अंग्रेज बहुत चालाक हैं। भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए। उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए। वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है।
स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है।
मैं ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूँ। प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं। रेडियो टिप्पणीकार कहता है-’घोर करतल-ध्वनि हो रही है।’ मैं देख रहा हूँ, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं। बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है। हाथ अकड़ जाएँगे।

लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियाँ बज रहीं हैं। मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिए कोट नहीं है। लगता है, गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है। गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिए गर्म कपड़ा नहीं है। पर कुछ लोग कहते हैं-’गरीबी मिटनी चाहिए।’ तभी दूसरे कहते हैं-’ऐसा कहने वाले प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।’

गणतंत्र-समारोह में हर राज्य की झाँकी निकलती है। ये अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ‘सत्यमेव जयते’ हमारा मोटो है मगर झाँकियाँ झूठ बोलती हैं। इनमें विकास-कार्य, जनजीवन इतिहास आदि रहते हैं। असल में हर राज्य को उस विशिष्ट बात को यहाँ प्रदर्शित करना चाहिए
जिसके कारण पिछले साल वह राज्य मशहूर हुआ। गुजरात की झाँकी में इस साल दंगे का दृश्य होना चाहिए, जलता हुआ घर और आग में झोंके जाते बच्चे। पिछले साल मैंने उम्मीद की थी कि आन्ध्र की झाँकी में हरिजन जलते हुए दिखाए जाएँगे। मगर ऐसा नहीं दिखा। यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाए, लेकिन झाँकी सजाए लघु उद्योगों की। दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं। मेरे मध्यप्रदेश ने दो साल पहले सत्य के नजदीक पहुंचने की कोशिश की थी। झाँकी में अकाल-राहत कार्य बतलाए गए थे। पर सत्य अधूरा रह गया था। मध्यप्रदेश उस साल राहत कार्यों के कारण नहीं, राहत-कार्यों में घपले के कारण मशहूर हुआ था। मेरा सुझाव माना जाता तो मैं झाँकी में झूठे मास्टर रोल भरते दिखाता, चुकारा करनेवाले का अँगूठा हज़ारों मूर्खों के नाम के आगे लगवाता। नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच लेन-देन का दृश्य दिखाता। उस झाँकी में वह बात नहीं आई। पिछले साल स्कूलों के ‘टाट-पट्टी कांड’ से हमारा राज्य मशहूर हुआ। मैं पिछले साल की झाँकी में यह दृश्य दिखाता- ‘मंत्री, अफसर वगैरह खड़े हैं और टाट-पट्टी खा रहे हैं।

जो हाल झाँकियों का, वही घोषणाओं का। हर साल घोषणा की जाती है कि समाजवाद आ रहा है। पर अभी तक नहीं आया। कहां अटक गया? लगभग सभी दल समाजवाद लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वह नहीं आ रहा। मैं एक सपना देखता हूँ। समाजवाद आ गया है और वह बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है। बस्ती के लोग आरती सजाकर उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हैं। पर टीले को घेरे खड़े हैं कई समाजवादी। उनमें से हरेक लोगों से कहकर आया है कि समाजवाद को हाथ पकड़कर मैं ही लाऊँगा।
समाजवाद टीले से चिल्लाता है-’मुझे बस्ती में ले चलो।’
मगर टीले को घेरे समाजवादी कहते हैं -’पहले यह तय होगा कि कौन तेरा हाथ पकड़कर ले जाएगा।’

समाजवाद की घेराबंदी है। संसोपा-प्रसोपावाले जनतान्त्रिक समाजवादी हैं, पीपुल्स डेमोक्रेसी और नेशनल डेमोक्रेसीवाले समाजवादी हैं। क्रान्तिकारी समाजवादी हैं। हरेक समाजवाद का हाथ पकड़कर उसे बस्ती में ले जाकर लोगों से कहना चाहता है-’ लो, मैं समाजवाद ले आया।’
समाजवाद परेशान है। उधर जनता भी परेशान है। समाजवाद आने को तैयार खड़ा है, मगर समाजवादियों में आपस में धौल-धप्पा हो रहा है। समाजवाद एक तरफ उतरना चाहता है कि उस पर पत्थर पड़ने लगते हैं।’खबरदार, उधर से मत जाना!’ एक समाजवादी उसका एक हाथ पकड़ता है, तो दूसरा हाथ पकड़कर खींचता है। तब बाकी समाजवादी छीना-झपटी करके हाथ छुड़ा देते हैं। लहू-लुहान समाजवाद टीले पर खड़ा है।

इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है। लेखकीय स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं। सहकारिता के लिए प्रतिबद्ध इस आंदोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं। सहकारिता तो एक स्पिरिट है। सब मिलकर सहकारितापूर्वक खाने लगते हैं और आंदोलन को नष्ट कर देते हैं। समाजवाद को समाजवादी ही रोके हुए हैं। यों प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि अब समाजवाद आ ही रहा है।

मैं एक कल्पना कर रहा हूँ।
दिल्ली में फरमान जारी हो जाएगा-’समाजवाद सारे देश के दौरे पर निकल रहा है।उसे सब जगह पहुँचाया जाए। उसके स्वागत और सुरक्षा का पूरा बन्दोबस्त किया जाए।
एक सचिव दूसरे सचिव से कहेगा-’लो, ये एक और वी.आई.पी. आ रहे हैं। अब इनका इंतज़ाम करो। नाक में दम है।’
कलेक्टरों को हुक्म चला जाएगा। कलेक्टर एस.डी.ओ. को लिखेगा, एस.डी.ओ. तहसीलदार को।
पुलिस-दफ़्तरों में फरमान पहुँचेंगे, समाजवाद की सुरक्षा की तैयारी करो।
दफ़्तरों में बड़े बाबू छोटे बाबू से कहेंगे-’काहे हो तिवारी बाबू, एक कोई समाजवाद वाला कागज आया था न! जरा निकालो!’
तिवारी बाबू कागज निकालकर देंगे। बड़े बाबू फिर से कहेंगे-’अरे वह समाजवाद तो परसों ही निकल गया। कोई लेने नहीं गया स्टेशन। तिवारी बाबू, तुम कागज दबाकर रख लेते हो। बड़ी खराब आदत है तुम्हारी।’
तमाम अफसर लोग चीफ़-सेक्रेटरी से कहेंगे-’सर, समाजवाद बाद में नहीं आ सकता? बात यह है कि हम उसकी सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकेंगे। पूरा फोर्स दंगे से निपटने में लगा है।’
मुख्य सचिव दिल्ली लिख देगा-’हम समाजवाद की सुरक्षा का इंतजाम करने में असमर्थ हैं। उसका आना अभी मुल्तवी किया जाए।’

जिस शासन-व्यवस्था में समाजवाद के आगमन के कागज दब जायें और जो उसकी सुरक्षा की व्यवस्था न करे, उसके भरोसे समाजवाद लाना है तो ले आओ। मुझे खास ऐतराज भी नहीं है। जनता के द्वारा न आकर अगर समाजवाद दफ़्तरों के द्वारा आ गया तो एक ऐतिहासिक घटना हो जाएगी।
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Wednesday, 25 January 2017

एक कविता - तुमने तो कहा था / विजय शंकर सिंह

तुम ने तो कहा था ,
भेजोगे ,
वे लम्हे , घड़ियाँ , साल, सभी
होगा नहीं , जिन का ,
अंत कभी .

सावन की ,
काली घटायें भी ,
फूलों की ,
शोख अदाएं भी ,
अधरों से छू कर ,
पुष्प कोई ,
मीठी सी गुड की
डली कोई !

सभी किस्से , गीत
और बातें भी ,
वे प्रेम भरी ,
सौगातें भी .
तुम ने तो कहा था ,
भेजोगे !

पा कर इन को हम ,
झूमेंगे ,
दुनिया , इन में हम ,
ढूंढेंगे !
एक दीप आस का ,
कब से जला कर ,
चुप चाप प्रिये , हम
बैठें हैं !

कुछ याद करो ,
वे बीते पल ,
तुम को है , क़सम ,
अब भेजो भी !
लुछ मोल , प्यार का
रखो भी !

इक बात सुनो ,
खुद आ जाओ !
बन के घटा , तुम
छा जाओ !!
जीवन के इस मरू में ,
कुछ पुष्प बिखेरो आज प्रिये !!

© विजय शंकर सिंह

Saturday, 21 January 2017

अहमद फ़राज़ की एक चर्चित नज़्म - चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते हैं ! / विजय शंकर सिंह

अहमद फ़राज़ आधुनिक उर्दू के शायरों में बहुत ही प्रसिद्ध और लोकप्रिय शायर रहे हैं । उर्दू शायरी में उनकी लिखी ग़ज़लें और नज़्में ग़ज़ल गायकों की पहली पसंद आज भी हैं। फ़राज़ इनका तखल्लुस और सैयद अहमद शाह अली इनका असल नाम है,  और कोहाट पख़्तूनख्वां में 12 जनवरी 1931 को उनका जन्म और 25 अगस्त 2008 को इस्लामाबाद में उनका निधन हुआ था। वे प्रोग्रेसिव राइटर्स संघ से भी जुड़े रहे । यह उनकी एक चर्चित और लम्बी नज़्म है ।

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चलो फ़राज़ को ऐ यार, चल के देखते हैं !

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन सँवर के देखते हैं

सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं

सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
के फूल अपनी क़बायेँ कतर के देखते हैं

वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

बस एक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहर्वान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं

सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं

कहानियाँ हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं

अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायेँ
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं

जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-खुराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं

तू सामने है तो फिर क्यों यकीं नहीं आता
यह बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफिल में
जो लालचों से तुझे, मुझे जल के देखते हैं

यह कुर्ब क्या है कि यकजाँ हुए न दूर रहे
हज़ार इक ही कालिब में ढल के देखते हैं

न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई
सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं

यह कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समन्दरों की तहों से उछल के देखते हैं

अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उसकी ख़ैर ख़बर
चलो फ़राज़ को ऐ यार चल के देखते है
( अहमद फऱाज )

Friday, 20 January 2017

जल्लिकट्टू और उस पर उठा विवाद - एक समीक्षा / विजय शंकर सिंह

जल्लिकट्टू , तमिलनाडु का एक पर्व है जो सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के कारण त्योहार के समर्थकों और पशु क्रूरता का विरोध करने वालों के बीच विवाद और विरोध का कारण बन गया है ।  जल्ली का अर्थ स्वर्ण की मुद्रा , गिन्नी सिक्का और केट्टु का अर्थ उसे बांधना होता है । स्वर्ण की मुद्रा को बांधना इस शब्द का हिंदी में शाब्दिक अर्थ हैं। यह एक खेल है । शारीरिक क्षमता, सौष्ठव और पराक्रम दिखाने का यह एक अवसर होता है जिसे पहले से ही युवा और विशेषकर कुंवारे लोग अपनी प्रतिभा और बल का प्रदर्शन करते हैं । स्पेन के राष्ट्रीय खेल , बुल फाइटिंग से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है , क्यों कि उस खेल में सांड़ या बुल को भड़का कर खुद पर हमला करने के लिए उकसाया जाता है और तब उसे छका कर उसे घायल या मार दिया जाता हैं। जलिकट्टू में पशु को न तो मारा जाता है और न ही घायल किया जाता है, उसे साधा जाता है, उसे कब्ज़े में किया जाता हैं। इस खेल में सांड़ को एक स्थान से छोड़ा जाता है और वह जब भागता है तो उसे उत्साही युवक जो शारीरिक रूप से बहुत मज़बूत होते हैं उसे दौड़ा कर पकड़ते और उस पर सवारी गांठते हैं । सांड़ तेज़ी से सवार को गिराने की कोशिश करता हुआ पैंतरा बदल बदल कर भागता है, और सवार उसे तब तक दौड़ाता रहता है जब तक कि सांड़ थक कर खड़ा नहीं हो जाता है । इस खेल में सवार के धैर्य, कौशल, बलिष्ठता और प्रत्युत्पन्मति की परीक्षा होती है । सवार के लिए यह एक खतरनाक खेल तो पशु को भी शारीरिक पीड़ा तो होती ही है ।

भारतीय इतिहास की एक विडंबना यह भी है कि, देश का इतिहास अमूमन उत्तर भारत का ही इतिहास माना जाता रहा है । महाकाव्यों के काल से ले कर आधुनिक काल तक का जो भी इतिहास पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है, उनमे से अधिकतर इतिहास ही अयोध्या, हस्तिनापुर, षोडश जनपद, मगध पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, दिल्ली, तक ही सिमटा रहता है। सारे विदेशी आक्रमण सिकंदर से ले कर नादिर शाह तक पश्चिमी सीमा से हुए और वे दिल्ली से होते हुए या तो गुजरात या वर्तमान आंध्र तक या बंगाल तक फैलते रहे । दक्षिण में बहुत भीतर तक वे घुस नहीं पाये । इसके अनेक कारण है । दक्षिण के चोल, पांड्य चालुक्य , चेर आदि साम्राज्य उत्तर के महान और समृद्ध राजवंशों की तुलना में कमतर बिलकुल नहीं थे पर उनकी चर्चा कम ही होती है । विदेशी हमलों के  परिणाम स्वरूप उत्तर , पश्चिम और पूर्वी भूभाग अधिक प्रभावित हुआ । वहाँ सत्ता परिवर्तन भी बहुत हुए । धर्म पर आघात भी बहुत हुआ । धर्म परिवर्तन भी बहुत हुआ । एक युयुत्सु भाव सदैव बना रहा , जो आज भी एक खटास के रूप में समाज की मानसिकता में विद्यमान है । इसके विपरीत, सुदूर दक्षिण के तमिल क्षेत्र में उतनी तेज़ी से घटनाएं नहीं घटीं और वह अपनी ही रौ में समृद्धि के साथ विकसित होता रहा ।

तमिल इतिहास में 400 ईपू से 100 ईपू का काल अत्यंत समृद्ध काल था । उसी समय इस खेल का प्रारम्भ होना बताया जाता है । संगम काल , तमिल इतिहास का सबसे गौरव पूर्ण काल भी था । इस खेल का नाम तमिल में येरु थजुवल्थल है । यह सांड़ के साथ युद्ध नहीं, बल्कि उसे बाँधने और साधने की एक कला का खेल था । इसे इस खेल के समर्थक बुल टेमिंग कहते हैं , बुल फाइटिंग नहीं । बाद में साँड़ों के सींगों पर स्वर्ण मुद्राएं बाँधी जाने लगी तो, इस खेल का नाम जल्लीकट्टू के रूप में प्रचलित हो गया । यह खेल तमिलनाडु के अय्यर समुदाय में जो मुल्लाइ नामक स्थान से उद्भूत हुए हैं से शुरू हुआ है । इस खेल का इतिहास 2500 वर्षों से भी अधिक पुराना है । इस खेल के लिए जो बैल चुना जाता है वह भी किसी न किसी मंदिर को दान में प्राप्त हुआ होता है । उसे इस खेल के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित और फुर्तीला बनाया जाता है । भारतीय इतिहास और परम्परा में सैन्धव सभ्यता से ले कर आज तक बैलों का बहुत ही महत्व रहा है।  कृषि का यह मूल आधार ही था कभी । आज इसी खेल पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को ले कर विवाद उठ गया है । यह विवाद तमिल अस्मिता से जोड़ कर देखा जा रहा है ।

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से पशु आधारित सभी परम्परागत खेलों पर रोक लग गयी है । जिन खेलों पर रोक लगी है वे हैं तमिलनाडु की जल्लीकट्टू, मंजुविरात्तु, वदम, एरथुकट्टम , थिरुविज़हा, रेकला, और बैलगाड़ी की दौड़, केरल के खेल सेथालि, कालापुत्तु , महाराष्ट्र के बेलगाड़ा, हैं । कोर्ट का कहना है कि यह सब खेल पशुओं पर एक प्रकार से अत्याचार ही हैं अतः ये पशु क्रूरता निषेध अधिनियम के प्राविधानों का उल्लंघन हैं । सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से सदियो से चलते आ रहे इस खेल पर प्रतिबन्ध लग गया । इस खेल को समझने  के पहले खेलों के विकास को भी समझना पड़ेगा । पशुओं के साथ खेल आमोद प्रमोद के साथ साथ खुद की शारीरिक क्षमता दिखाने का भी एक माध्यम रहा है । विभिन्न पशुओं यानी भेड़ा की लड़ाई, मुर्गों की लड़ाई, बाज़ के करतब, हस्ति युद्ध, या पशुओं के साथ भिड़ंत, घोड़ों को साधना, बैलों और भैंसो को साधना यह सब खेल और साथ साथ इन पशुओं को पालतू बना कर उनका उपयोग करने का भी एक साधन था । इन पशुओं से लोगों को न केवल कृषि कार्य  में सुविधा होती थी बल्कि दोनों ही का जीवन अन्योन्याश्रित था । मशीनें अब आयीं है । पहले युद्ध हो या कृषि दोनों में पशुओं की प्रमुख भूमिका थी । बृषभ को नाथने और साधने का काम बल , और कौशल से ही हो सकता है । यह पशुपालन के साथ साथ ही विकसित हुआ है । महाभारत के एक क्षेपक के अनुसार कृष्ण ने सात बृषभों को एक साथ साध और नाथ कर लोगो को चमत्कृत कर दिया था ।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जल्लीकट्टू पर टिप्पणी करते हुए एक स्थान पर कहा है
" Jallikattu is an ‘entertainment sport’ and ‘why should you not play a video game of Jallikattu ? "
( जल्लीकट्टू एक मनोरंजक खेल है । क्यों नही मनोरंजन के लिए वीडियो गेम के द्वारा यह खेल खेला जाता । )
जल्लीकट्टू कोई मनोरंजक खेल नहीं है । तमिल मान्यता के अनुसार, तमिलनाडु के एक विशेष समाज में यह एक पर्व की तरह मनाया जाता है । इसकी कोई प्रतियोगिता नहीं होती है । न ही विजेता की कोई प्रथम द्वीतीय या तृतीय श्रेणी ही होती है । यह एक मंदिर के प्रांगण में एक विशेष अवसर पर और वह भी वर्ष में एक बार ही आयोजित होती है । यह आयोजन कोई स्पोर्ट्स क्लब या सरकार का खेल विभाग नहीं करता है, बल्कि इसे मंदिर की तरफ से आयोजित किया जाता है । यह मूलतः मनुष्य की शारीरिक क्षमता और साहस का प्रदर्शन है कि वह कैसे किसी सांड़ को अपनी ताक़त से साध लेता है । अगर वह साधने में सफल हो गया तो , वह पुरुष अन्यथा वह बैल जिसे साधा न जा सका , को विजयी घोषित किया जाता हैं। यह मनुष्य और बैल दोनों की ही एक प्रकार से परीक्षा है । भारत के ग्रामीण अंचलों में हाल तक बिगड़ैल बैल और घोड़ों को नाथने और साध देने की एक प्रतियोगिता भी चलती थी । ऐसे बहादुर युवकों को सम्मान के साथ देखा जाता था तथा उनका नामोल्लेख किया जाता था । तमिल समाज जो इस भारतीय समाज का ही एक भाग है, वह भी इस से अलग नहीं है । तमिल समाज जो इस खेल का समर्थक है और इसके पक्ष में दलीलें दे रहा है का यह भी कहना है कि, हज़ारों साल से चल रही इस प्रथा पर, अकाल आदि प्राकृतिक आपदा के समय को छोड़ कर , कभी भी रोक नहीं लगायी गयी और यह जारी रही । वह इस रोक को अपनी परम्परा , अस्मिता और सदियों से चले आ रहे पुरा - अधिकारों पर आघात समझता है ।

जल्लिकट्टू के पक्ष में तर्क देने वाले इसे तमिल सभ्यता और अस्मिता से तो जोड़ते ही हैं साथ ही इसे एक धार्मिक आयोजन भी बताते हैं । उनका तर्क है बैल , बृषभ , भारतीय सनातन धर्म और समाज का अनिवार्य अंग रहा है । सैंधव सभ्यता के मुहरों में मिली बृषभ की आकृति से ले कर हाल तक बैल हमारी कृषि का आधार रहा है । यह पर्व पशुपालन का ही एक रूप है जो समाज को इस खेल के माध्यम से मज़बूत और स्वस्थ बृषभ उत्पन्न और विकसित करने के लिए प्रेरित करता है । आज भी सांड़ छोड़ने की परम्परा पूरे भारतीय समाज में है । तमिल समाज में भी मंदिरों को बृषभ दान देने की परम्परा है । ये बृषभ मुक्त हो कर विचरण करते हैं और उन्हें कोई रोकता , बांधता, नाथता और हांकता भी नहीं है । एक अंधविश्वास भी उस समाज मैं है कि ऐसा बृषभ जिसके खेत में चरेगा वहाँ फसल उस वर्ष बहुत अच्छी होगी । यह मान्यता हज़ारों साल की परम्परा में निहित है । जल्लिकट्टू के समर्थक इसे हिंसक या पशु उत्पीड़क खेल नहीं मानते हैं । वे इसे तमिल गौरव और परम्परा के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

एक स्थानीय और अल्पज्ञात खेल कैसे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सुर्खियां बन गया इसकी भी कहानी कम रोचक नहीं है । भारत सरकार के पशु कल्याण बोर्ड ( Animal Welfare Board ) और Peoples For Ethical Treatment of Animals ( PETA ) ने जल्लिकट्टू के बारे में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की । 2014 में उस याचिका पर सुनवायी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे पशु क्रूरता का खेल मानते हुए इसे प्रतिबंधित कर दिया । इस आदेश का तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों ने विरोध किया । तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु रेगुलेशन ऑफ़ जल्लिकट्टू एक्ट 2009 भी इस खेल को रेगुलेट करने के लिए बनाया था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के फैसले में उसे रद्द कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था है कि यह एक्ट संविधान के अनुच्छेद 254 (1) का उल्लंघन है अतः वह निरस्त कर दिया गया । 8 जनवरी 2015 को केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना के द्वारा जल्लिकट्टू पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाया गया प्रतिबंध समाप्त कर दिया । ऐसा करने का निर्णय राजनैतिक था । इस अधिसूचना को पुनः PETA तथा पशु प्रेमी संघों द्वारा चुनौती दी गयी।  26 जुलाई 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवायी करते हुए कहा , 
" Just because the bull-taming sport of Jallikattu was a centuries-old tradition, it could not be justified. " 
आगे सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी, 
" If the parties were able to convince the court that its earlier judgement was wrong, it might refer the matter to a larger bench." 
इस सुनवायी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन को निरस्त कर दिया और अपने प्रतिबंध के फैसले को कायम रखा । सुप्रीम कोर्ट ने बुल टेमर शब्द का प्रयोग करते हुए जिन परिस्थितियों में बृषभ को रखा जाता है और खेल के पहले उसे बर्बरता पूर्वक तैयार किया जाता है, वह पशु के प्रति कोई पाल्य भाव नहीं दिखाता है । अदालत की टिप्पणी पढ़ने योग्य है ,
“Forcing a bull and keeping it in the waiting area for hours and subjecting it to the scorching sun is not for the animal’s well-being. Forcing and pulling the bull by a nose rope into the narrow, closed enclosure or ‘vadi vassal’ (entry point), subjecting it to all forms of torture, fear, pain and suffering by forcing it to go the arena and also over-powering it in the arena by bull tamers, are not for the well-being of the animal.”

जल्लिकट्टू पर अभी भी रस्साकशी जारी है । अदालत इसे कानूनी प्राविधान की नज़र से देख रही है , जो उसे देखना भी चाहिए, और सरकारें जन भावना का जायज़ा ले रही हैं , जिन पर उनका अस्तित्व टिका है । परम्परायें बड़ी हैं या कानून यह बहस रोचक और लम्बी है । इस पर फिर कभी ।

( विजय शंकर सिंह )