Wednesday, 21 December 2016

नोटबन्दी बतर्ज़ कालिदास ! / विजय शंकर सिंह

यह शीर्षक आप को थोडा अटपटा लगेगा, पर मित्रों नाम में क्या रखा  है । नाम तो केवल एक पहचान है । तो इस शीर्षक का भी कोई मतलब नहीं है । न कालिदास के समय में नोटबन्दी होने का कोई प्रमाण मिलता है और न ही नोटबन्दी के समय कालिदास कभी लाइन में खड़े हुए होंगे । पर कालिदसवा ज़रूर लाइन में ठण्ड में कुड़कुड़ाते   या तो खुद का कुछ मरे हुए 1000 या 500 का नोट ले कर या अपने किसी आक़ा का धन ले कर खड़ा मिल जाएगा । नवम्बर महीने की 8 तारीख को रात 8 बजे जब दिल्ली से बुद्धू बक्सा ने 1000 और 500 के नोटों के मर जाने की सूचना दी तो दूसरे दिन बैंकों में भीड़ उमड़ पडी । जो क़तारों में थे वे जन गण और जो घर बैठे बिना क़तारों में खड़े नोट बदल रहे थे वे भाग्य विधाता थे । फिर क्या था , अधिनायक की जय जय होने लगी । जब भीड़ बढ़ी और कुछ लोग देश के लिए बलिदान होने लगे तो , फिर डुगडुगी पिटी और फरमान आयद हुआ, कि धीरे धीरे , शोर नहीं , 30 दिसंबर तक अपना पैसा आप बैंकों में और 31 मार्च तक आरबीआई में जमा कर सकते हैं । लोग फिर थोडा निश्चिन्त हो गए । वैसे भी अंतिम तिथि के नज़दीक आने पर ही सक्रियता बढ़ती है । फिर तो नियम भी बदलने लगे । 8 नवम्बर से अब तक 61 बार नियम बदले गए । अभी 7 दिन है । देखिये तब तक कितने कानून बनते बिगड़ते हैं । पल पल परिवर्तित नियम - वेश से नोटबन्दी का सौंदर्य ही निखर रहा है । बिलकुल सर्दियों के कपड़े की तरह, जब सुबह धूप देखी तो स्वेटर ही पर्याप्त लगा और जब बादल - कुहरा घिरा तो जैकेट धारण कर ली। क्षण क्षण नूतन जो दिखे वही सौंदर्य है । यह मेरा कथन नहीं है कालिदास का कहना है । संस्कृत सूक्ति याद नहीं आ रही है । राम का रूप जब अब याद नहीं तो कालिदास की अनेक अलंकारों से सुसज्जित सूक्तियाँ कैसे याद आ रहेंगी ।  किसी मित्र को याद आ जाय तो कमेंट बॉक्स में बिना अपशब्दों से सम्पुटित किये इसे लिख दें । मेरा ज्ञान वर्धन ही होगा ।

क्या कोई संस्थान इतना दिग्भ्रमित हो सकता है जितना आरबीआई हुआ है ? कभी 30 दिसम्बर तक पुराने नोट जमा कराने की सुविधा, कभी 4000 रूपये निकालने की सुविधा, कभी 2000 तो कभी 24000 तो कभी कोई कागज़ कभी दस्तावेज़ । जब लेने जाओ बैंक तो वह भी नहीं । कभी तीन दिन तक पुराने नोट चलेंगे तो कभी दो दिन और चलेंगे, तो कभी 10 दिसंबर तक ही चलेंगे । कभी 3 दिन में स्थिति सुधरने का आश्वासन , तो कभी 50 दिन की मोहलत , फिर दो तीन क्वार्टर की बात । कभी कहना यह काले धन के विरुद्ध है, कभी कैशलेस , कभी पेटीएम का विज्ञापन तो कभी जहां जाना कुबेर को भी साथ साथ ले जाना । कभी ढाई लाख तक पूछ ताछ नहीं होगी, तो कभी 5000 के ऊपर ही बैंक यह पूछ लेगा कि गुरु कहाँ से पाये ! और अब आज यह फरमान कि, जा जमा करा, अब केहू न पूछी । यह तो घपड़चौंथ दिख रही है क्या वह किसी परिपक्व संस्थान का परिचय दे रही रही है ? या लगता है सभी नशेड़ी इकट्ठे हो गए हैं । अगर नीतियां बनाते समय नीति नियन्ता यह आकलन न कर सकें कि उन नीतियों का क्या परिणाम और दुष्परिणाम होगा और फिर वह उन दुष्परिणामों से कैसे निपटेगा तो यह उस संस्थान की प्रशासनिक विफलता है । आरबीआई नोटबन्दी से जुड़े सभी आवश्यक प्रबन्ध करने में विफल रहा है । केवल और केवल आरबीआई के इन पल पल परिवर्तित निर्देशों से सरकार की बहुत किरकिरी हुयी है । पर उर्जित सर आप निश्चिन्त रहिये, आप का सरकार कुछ बिगाड़ भी नहीं पाएगी ।

प्रधानमंत्री जी को रोना पड़ा इन बदइन्तेज़ामियों के कारण। उनके त्याग को भी आरबीआई नहीं समझ सका । महान परम्पराओं वाले देश के प्रधानमंत्री को रोना पड़े, आंसू आ जाय, यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही है । याद कीजिये सिकंदर और पंचनद नरेश पोरस का वह संवाद । पराजित पोरस सिकन्दर से हार कर भी टूटा नहीं था । उसने खुद के लिए राज्योचित सुविधाएं ही मांगी । उसने सिकंदर से उसी व्यवहार की अपेक्षा और मांग कि जो एक राजा दूसरे राजा से करता है । पराजित हुआ पर झुक नहीं । यह स्वाभिमान था अहंकार नहीं । पर हम इन शब्दों के निहितार्थों को ही भूलते जा रहे हैं । जब भी कोई नीति सरकार बनाती है तो उसके प्रभाव का गहन मूल्यांकन होता है । उसके परिणामों की पड़ताल होती है । यह काम मंत्री और पीएम का नहीं है । यह काम विशेषज्ञों का है । वे आगा पीछा , हानि लाभ, यश अपयश सब बताते हैं , अब यह सरकार के ऊपर है कि वह कितना इसे ग्रहण करती है और कितना उसके ऊपर से निकल जाता है । कभी कहा जाता है , नोटबंदी के होने की बात का किसी को पता नहीं था, कभी यह कह दिया जाता है सब सोच समझ कर , ठोंक बजा कर इसे लागू किया गया है । पर सब कुछ ठोंक बजा कर लागू करने पर भी एटीएम तब कैलिब्रेट होने शुरू हुए, जब 2000 के नोट आ गए और उन्होंने वर्तमान एटीएम को बिलो स्टैण्डर्ड समझ उसमे रहने से मना कर दिया ! रोज़ रोज़ बदलते नियमों से भ्रम फैला । 100 के ऊपर लोग मर गए । उनके लिए संवेदना का कोई स्वर नहीं। देश प्रेम का ताना ऊपर से !

प्रधानमंत्री जी ने 50 दिन माँगा है । संविधान ने तो पांच साल पहले ही दिए हैं । फिर भी उनकी सदाशयता है कि वे 50 दिन की बात कर रहे हैं । न भी मांगते तो क्या हो जाता। आंकड़ों के अनुसार अब काफी कुछ पुरानी मुद्रा जमा हो गयी है । जो बची है वह भी अब जमा ही हो जायेगी । अब देखना है 30 दिसम्बर के बाद जिन उद्देश्यों के लिए यह साहसिक कदम उठाया गया है उन उद्देश्यों की पूर्ति होती है या नहीं । नया साल कम से कम इस साल के आखिरी दो महीनों की तरह भटकाव भरा, और मरकहवा न हो । नए साल का प्रारंभ नयी उम्मीदों से हो । एवमस्तु !

© विजय शंकर सिंह .

Tuesday, 20 December 2016

तुर्की में रूसी राजदूत की हत्या - कहीं इतिहास खुद को ही न दुहरा दे / विजय शंकर सिंह

1914 का प्रथम विश्वयुद्ध भले ही अचानक न भड़का हो, पर उसे भड़कने का एक तात्कालिक कारण भी था।  यह कारण था, आर्कड्यूक फ्रांसिस फर्डिनेंड की एक सर्बियाई अलगाववादी गुट के सदस्य ने हत्या कर दी । तब का यूरोप आज के यूरोप जैसा नहीं था, थोडा अलग था । जो राष्ट्र तब थे वे अब नहीं हैं और उनकी सीमाएं भी दो दो महायुद्धों के कारण मचे भारी उथल पुथल की वजह से बदल गयीं । आस्ट्रिया - हंगरी सर्बियन स्लाव अलगाववादी गुटों से संघर्षरत था, और वह उनका खात्मा करना चाहता था । लेकिन रूस जो उस समय जार के अधीन था और तब तक वहाँ बोल्शेविक क्रांति सफल नहीं हो पायी थी, लेकिन क्रान्ति की प्रतिध्वनि मुखरता से सुनायी दे रही थी, उस समय सर्बिया के साथ हो गया था । रूस भी स्लाव राज्य था और वह सर्बिया के लिए स्वायत्त शासन चाहता था । आस्ट्रिया - हंगरी , इस स्वायत्तता के विरुद्ध थे । वह अलगाववादी गुटों से इसी हेतु संघर्षरत था। 

बिस्मार्क ने जर्मनी का एकीकरण कर यूरोप में  उसे एक बड़ा और मज़बूत राष्ट्र बना दिया था । जर्मनी के सम्बन्ध ऑस्ट्रिया से बहुत मज़बूत थे । लेकिन वह एक तरफ से रूस से घिरा हुआ था । रूस और आस्ट्रिया का विवाद जब सर्बिया की स्वायत्तता को लेकर हुआ तो जर्मनी के सम्बन्ध रूस से बिगड़ गए थे । जर्मनी , पूर्व में रूस से, पश्चिम में फ्रांस और उत्तर में सागर पार ब्रिटेन से घिरा हुआ था । जर्मनी से फ़्रांस के सम्बन्ध भी ठीक नहीं थे । वह भी जर्मनी की ओर से सशंकित रहता था । फ़्रांस की संधि रूस के साथ थी और उस संधि का कारण जर्मनी का विरोध था। जब आर्कड्युक् की हत्या सर्बिया अलगाववादी गुट के सदस्य ने कर दी , और रूस सर्बिया के साथ था ही, तो जर्मनी ने तत्काल रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । अब रूस के साथ फ़्रांस हो गया क्यों कि दोनों ही जर्मनी के विरुद्ध थे, जर्मनी की आक्रामकता से आतंकित भी थे । फ़्रांस की रूस से संधि भी थी । ब्रिटेन का कोई भी हित न रूस से था और न ही फ्रांस से । बल्कि फ्रांस से ब्रिटेन की मनोवैज्ञानिक दूरी ही थी जो बहुत पहले से थीं । लेकिन ब्रिटेन जिसके पास दुनिया भर में उपनिवेश फैले हुए थे , ( भारत भी उसका एक उपनिवेश ही था ) जर्मनी की बढ़ती ताक़त से सशंकित हो गया और उसे यह आशंका हो गयी कि, अगर जर्मनी रूस और फ्रांस को पराजित कर देता है तो उसकी ताक़त बहुत बढ़ जायेगी, और फिर उसका निशाना सीधे ब्रिटेन ही होगा । जर्मनी को तोड़ने के लिए ब्रिटेन ने रूस और फ्रांस का साथ दिया और इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के मंच पर एक तरफ रूस, फ्रांस और ब्रिटेन हो गये और दुसरी तरफ जर्मनी और आस्ट्रिया - हंगरी हो गए ।

तुर्की में खिलाफत थी । खलीफा इस्लाम में धर्म और राज्य दोनों का प्रमुख होता है । इस्लाम में धर्म और राज्य की अवधारणा अलग अलग नहीं है । ओटोमन साम्राज्य जो तुर्की के खलीफा के साम्राज्य को कहते हैं अब कमज़ोर हो गया था । ओटोमन साम्राज्य उस्मान ने 1299 ई में स्थापित किया था । उस्मान जिसे अंग्रेजी में Osman लिखते है के नाम पर यह साम्राज्य ओटोमन साम्राज्य बोला जाने लगा । वैसे ऑटोमन का शाब्दिक अर्थ एक तख़्त या सेटी नुमा फर्नीचर होता है । ऑटोमन साम्राज्य तब तक कमज़ोर होने लगा था । बाद में तो मुस्तफा कमाल पाशा ने इस खिलाफत को ही समाप्त कर इसका आधुनिकीकरण कर दिया । जब जर्मनी ने रूस पर हमला कर दिया तो तुर्की उस युध्द में जर्मनी के साथ और रूस के खिलाफ हो गया । तुर्की और रूस की सीमाएं मिलती है । रूस ने ओटोमन साम्राज्य की कुछ क्षेत्र हथिया लिए थे , जिन्हें दुबारा वापस पाने के लिए उसने रूस के विरुद्ध जर्मनी का साथ दिया और युद्ध का और विस्तार हो गया । उधर अरब भी ऑटोमन साम्राज्य से अलग होने का इच्छुक था । वह तुर्की के खिलाफ और ब्रिटेन के साथ रूस और जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो गया । अरब , यह चाहता था कि अगर तुर्की कमज़ोर पड़ेगा तो दक्षिण के अरब के इलाके जिसे ऑटोमन साम्राज्य में है , को वह मुक्त करा लेगा । आप अंग्रेज़ी फ़िल्म लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया का स्मरण करें । यह फ़िल्म उस समय के उथलनपुथल पर ही बनी है ।

इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध का प्रारम्भ हुआ जो 1919 तक चला । ओरिजिन्स ऑफ़ वर्ल्ड वार नामक पुस्तक के लेखक फे , 1919 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति को ही द्वीतीय विश्व युद्ध के कारणों की शुरुआत मानते हैं । अब एक तरफ , ब्रिटेन, फ्रांस और रूस और दुसरी तरफ जर्मनी, आस्ट्रिया , और साथ में तुर्की हो गए । मूलतः यह एक यूरोपीय युद्ध था । सारे देश यूरोप के ही थे और उनके आपसी हित भी यूरोप से ही जुड़े थे । लेकिन, पूरी दुनिया में इनके उपनिवेश बिखरे थे । अतः जब मालिक लड़ रहे हों तो गुलाम भला कैसे इस लड़ाई से बच सकते हैं । सभी उपनिवेशों में इस महायुद्ध के लिए सैनिक भर्ती किये गए । भारत में भी गाँव गाँव सैनिक भर्तियां हुयी थी । इस युद्ध के दस्तावेज़, भारतीय सैनिको की अनेक गौरव गाथाओं को समेटे हुए है ।

कल दिनांक 19 दिसम्बर को फिर एक रूसी राजदूत की हत्या आंद्रेई कारलोव की हत्या तुर्की के अंकारा शहर में कर दी गयी है । रूस की तरफ से क्या प्रतिक्रिया होती है यह देखने की बात है । रूस कोई कूटनीतिक मार्ग का अनुसरण करता है या वह युद्ध का विकल्प लेता है, यह कहना जल्दीबाज़ी होगी । लेकिन विश्व कूटनीति में रूचि रखने वालो के दिमाग में निम्न सवाल ज़रूर कौंध रहे होंगे ।
क्या रूस तुर्की पर हमला करेगा ?
क्या अमेरिका और यूरोप, इस हमले के समय तुर्की के बचाव में आएंगे ?
क्या शिया ईरान इस युद्ध में रूस के साथ और सुन्नी अरब तुर्की के पक्ष में और पश्चिमी ताक़तों के साथ खड़े होंगे ?
क्या सुन्नी आतंकी संगठन , आईएसआईएस , जो रूस विरोधी है, अरब के साथ और अरब अमेरिका के साथ होने पर , स्वाभाविक रुप से अमेरिका के साथ खड़ा होगा ?
क्या चीन , रूस के साथ खड़ा होगा ?
चीन के रूस के साथ खड़े होने पर क्या जापान और ताइवान स्वाभाविक रूप से अमेरिका के पक्ष में नहीं जाएगा ?
भारत इस गुत्थी में किधर रहेगा ?
पाकिस्तान धर्म के आधार पर तुर्की का साथ देगा या चीन के साथ खड़ा होगा ?

ये सारे काल्पनिक प्रश्न हैं । पर रसायन शास्त्र में ही क्रियायें और  प्रतिक्रियायें नहीं होती है । बल्कि कूटनीति और राजनीति में भी होती है । यह सारे सवाल तब उठेंगे जब रूस युद्ध का विकल्प चुनेगा । पुतिन की जैसी आक्रामक क्षवि है , उस से युद्ध की सम्भावनाओं से इनकार भी नहीं किया जा सकता है । अगर ऐसा होता है तो यह इतिहास का खुद को सौ साल बाद दुहराना ही कहा जाएगा । अलबर्ट आइंस्टीन का एक साक्षात्कार याद आता है । जब द्वीतीय युद्ध , महाविनाश के बाद समाप्त हो गया तो, एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि
" तीसरा युद्ध अगर हुआ तो वह कितना विनाशकारी होगा ।"
आइंस्टीन गंभीर हो गए, और उन्होंने उत्तर दिया,
" तीसरा युद्ध कितना विनाशकारी होगा, यह तो अभी नहीं बताया जा सकता और चौथा विश्व युद्ग ईंट और पत्थरों से लड़ा जाएगा । "
पत्रकार को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था ।

© विजय शंकर सिंह

Saturday, 17 December 2016

विमुद्रीकरण या नोटबंदी पर विशेषज्ञों की राय - एक सर्वेक्षण / विजय शंकर सिंह

नोटबन्दी या विमुद्रीकरण  का फैसला कैबिनेट का था या किचेन कैबिनेट का यह आज न तो पता लगेगा और न ही कोई बताएगा । जब कभी कोई किताब लिखी जायेगी या कोई मुखर होगा तो सारी बातें सामने आएँगी । पर इस विनाशकारी निर्णय की जिम्मेदारी कौन लेगा ? पूरी पार्टी, या सरकार या सरकार के प्रमुख ? जब इस नोटबंदी की बात 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे प्रधानमंत्री जी ने की थी तो अधिसंख्य देशवासियों की तरह मैं भी टीवी के सामने बैठा हुआ था । सेना प्रमुखों से मिलते हुए पीएम की फ़ोटो स्क्रीन पर उभरी और एक घोषणा सुनायी दी कि प्रधानमंत्री देश को एक आवश्यक सन्देश देंगे । सेना प्रमुखों से भेंट के बाद ऐसी घोषणा से लगा कि, शायद सीमा पर कुछ सोचा गया हो युद्ध या बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कोई बात होने वाली हो । पर एलान हुआ 1000 और 500 रूपये के नोट उसी रात 12 बजे के बाद कुछ चुनिंदा जगहों को छोड़ कर, वैध नहीं रहेंगे । यह भी एक प्रकार की आपात घोषणा थीं। 8 नवम्बर को रात 12 बजे बाद से 500 और 1000 के नोट रद्द कर दिए गए । उनकी वैधता समाप्त कर दी गयी । ऐसा करने के तब तीन कारण पीएम ने बताये थे ।
1. काले धन की समाप्ति -
यह नहीं हो पाया क्यों कि जितने राशि के बड़े नोट चलन में थे, उनमें से 85 % नोट बैंकों में वापस आ चुके हैं ।
2. आतंकियों को धन की आपूर्ति बाधित करना -
इस पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा ।
3. नक़ली नोटों की पहचान और उनसे मुक्ति -
लेकिन जिस प्रकार से नोट जमा हो रहे हैं उनसे तो यही स्पष्ट है कि, नक़ली नोटें या तो इसी भीड़ भड़क्के में जमा कर दी गयीं या उनकी संख्या अनुमान से कम थी।
इस प्रकार नोटबन्दी से जिन उद्देश्यों के लिए यह मास्टरस्ट्रोक और साहसिक कदम उठाया गया था, जिसकी विरूदावली गायी जा रही थी, वह अपने किसी भी लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाया । बल्कि इसके विपरीत , इस निर्णय से, लाखो लोगों की रोज़ी रोटी छिनने और उनके बरबाद होने की आशंका और बढ़ गयी ।

इस नोटबन्दी से देश को आर्थिक हानि भी कम नहीं होगी । क्या मिलेगा और अब तक क्या मिला है , यह सरकार आज बताने की स्थिति में नहीं है । नोटबंदी से होने वाले आर्थिक नुकसान का आंकड़ा , 1,28,000 करोड़ रुपये का होगा। यह आंकड़ा सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी द्वारा दिया गया है । आप 30 नवम्बर के फाइनेंसियल एक्सप्रेस में यह खबर पढ़ सकते हैं । यह अनुमान आगे बढ़ भी सकता है । क्यों की देश की 86 प्रतिशत मुद्रा मर चुकी है । जब तक नयी मुद्रा बाजार में नहीं आ जाती और उस अभाव से जो समस्या उतपन्न हो रही है या होगी, उसका आकलन अभी नहीं किया जा सका है । अर्थतंत्र के अध्येता उसका भी अध्ययन कर ही रहे होंगे । जब आर्थिक स्थितियां गड़बड़ होतीं हैं तो उसका परोक्ष प्रभाव अपराध और समाज पर भी पड़ता है । अगर इस नोटबंदी जन्य आर्थिक गतिरोध से रोज़गार के अवसर कम होते हैं , उद्योगों पर असर कम होता है, बेरोजगारी बढ़ती है तो इसका सीधा प्रभाव अपराध वृद्धि पर पड़ेगा । संभवतः यह ' साहसिक निर्णय ' लेते समय , इतनी दूर तक नहीं सोचा गया । CMIE के एमडी और मुख्य अर्थशास्त्री डॉ महेश व्यास क्या कहते हैं यह उन्ही के शब्दों में पढ़ें ,
" The exercise can only be considered worth if the government is able to unearth unaccounted cash worth at least the transaction cost. If the government succeed "
आगे इसी लेख में पढ़े
12% share of households, that stand in queues to exchange theor old currency notes with new ones, in the total demonetisation transaction cost. They stand to lose Rs 15,000 crore.
The government and the RBI are estimated to bear a cost of Rs 16,800 crore. This is largely because of printing of new currency and transportation of new currency to bank branches, ATMs and post offices.
इस अर्थ हानि में वे आंकड़े भी छुपे हुए हैं जो ,बाज़ार में मंदी आने पर स्वतः होने लगते हैं -
According to estimates, companies will witness a direct impact on business in terms of the drop in discretionary spending by households. This alone adds up to more than half of trillion rupees during the 50-day period till the end of December. Enterprise stands to lose Rs 61,500 crore or 48% of the total transaction cost of this exercise of demonetisation.

नोटबंदी पर दुनिया भर के अखबारों में आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ स्तंभकारों ने अपनी - अपनी राय प्रस्तुत की है । लगभग सभी की राय इस संबंध में नकारात्मक है । सबने इस कदम से होने वाले लाभ के संबंध में अपनी आशंकाएं ज़ाहिर की है । भारत एक अत्यंत तेज़ी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था है । वैश्विक मंदी के दौर में भी देश के आर्थिक प्रगति के सूचकांक निराशाजनक नहीं रहे । कुछ अखबारों के लिंक यहां प्रस्तुत है । यह लिंक्स मेरे एक प्रिय मित्र ने उपलब्ध करायी है । इनके अवलोकन से विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाया जा सकता है ।

1. The New York Times:
Chaos as Millions in India Crowd Banks to Exchange Currency
http://www.nytimes.com/aponline/2016/11/12/world/asia/ap-as-india-currency-chaos.html?_r=0

2. BBC:
How India's currency ban is hurting the poor
http://www.bbc.com/news/world-asia-india-37947029

India rupees: Chaos at banks after 'black money' ban
http://www.bbc.com/news/world-asia-india-37933233

India rupee ban: Currency move is 'bad economics'
http://www.bbc.com/news/world-asia-india-37970965

3. The Guardian:
Why the corrupt rich will welcome Modi’s ‘surgical strike on corruption’
https://www.theguardian.com/commentisfree/2016/nov/15/corrupt-rich-india-modi-500-1000-rupee-note

4. Huffington Post:
Demonetisation Death Toll Rises To 25 And It's Only Been 6 Days
http://www.huffingtonpost.in/2016/11/15/demonetisation-death-toll-rises-to-25-and-its-only-been-6-days/

10 Reasons Why BJP's Demonetization Move Is An Unmitigated — And Politically Motivated — Disaster
http://m.huffingtonpost.in/apoorva-pathak/10-reasons-why-bjps-demonetization-move-is-an-unmitigated-and/

5. Al-Jazeera:
Anger intensifies over India's demonetisation move
http://www.aljazeera.com/news/2016/11/anger-intensifies-india-demonetisation-move-161112161157110.html

India demonetisation: Chaos as ATMs run dry
http://www.aljazeera.com/news/2016/11/india-demonetisation-chaos-atms-run-dry-161109061403011.html

6. Washington Post:
Panic, anger and a scramble to stash cash amid India’s ‘black money’ squeeze
https://www.washingtonpost.com/world/panic-anger-and-scramble-to-stash-cash-amid-indias-black-money-squeeze/2016/11/10/32cb222a-565a-4c6f-8d40-59257c042109_story.html

India struggles as millions throng banks to swap currency
https://www.washingtonpost.com/business/india-struggles-as-millions-throng-banks-to-swap-currency/2016/11/15/4979c20c-ab08-11e6-8f19-21a1c65d2043_story.html

7. The Independent:
Indians scramble to deposit cash as government voids high-value bank notes in ‘black money’ crackdown
http://www.independent.co.uk/news/world/asia/india-cash-money-black-money-bank-notes-a7409811.html

8. Dailymail:
'Modi boasts of his 56-inch chest, but what kind of son lets his mother go through that?' PM's 96-year-old mother queues up to change notes
http://www.dailymail.co.uk/indiahome/indianews/article-3939414/Modi-boasts-56-inch-chest-kind-son-lets-mother-PM-s-96-year-old-mother-queues-change-notes.html

9. Financial Times:
India cash crunch update: Still chaotic
https://ftalphaville.ft.com/2016/11/15/2179657/india-cash-crunch-update-still-chaotic/

10. International Business Times:
India's economic growth to take a hit over demonetisation drive: India Ratings
http://www.ibtimes.co.in/indias-economic-growth-take-hit-due-de-monetisation-india-ratings-703576

11. NDTV:
PM Modi 'Masterstroke' On Notes Backfires, says foreign media
http://www.ndtv.com/opinion/pm-modi-masterstroke-on-notes-backfires-says-foreign-media-1626092

12. The Economic Times:
India's new strike against black money backfires
http://m.economictimes.com/news/economy/policy/view-indias-new-strike-against-black-money-backfires/articleshow/55452196.cms

उपरोक्त अखबारों की राय के बाद कुछ महत्वपूर्ण अर्थशास्त्रियों की भी राय जानना आवश्यक हैं।
अर्जुन जयदेव जो अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में एसोशिएट प्रोफेसर हैं, नें इसे वित्तीय अतिनाटकीय निर्णय की संज्ञा दी है । उन्होंने financial melodrama शब्द का प्रयोग किया है । उन्होंने कहा इस से जनता का विश्वास , काले धन की अर्थ व्यवस्था पर से उतना नहीं डिगा है जितना कि जनता का भरोसा मौद्रिक तंत्र की निष्ठा से उठ गया है । अरुण इसे झोलझाप निदान कहते हैं ।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे सर्जिकल स्ट्राइक के बजाय कारपेट बॉम्बिंग कहा है जो पूरे इलाके को तहस नहस करने के उद्देश्य से की जाती है । उसने यह भी कहा है कि इतने अधिक क्षमता की शॉक थेरेपी , हो सकता है हमारा बैंकिंग तंत्र सहन न कर सके । ऐसा हो भी रहा है । सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे फैसले को सुनवायी के लिए संविधान पीठ को सौंप दिया है ।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस डॉ प्रभात पटनायक ने सिटिज़न न्यूज़ पोर्टल में तीन भागों की एक लेख श्रृंखला लिखी है । उन्होंने कहा है कि 86 % मुद्रा का रातों रात विमुद्रीकरण कर देना और वह भी बिना उचित तैयारी के, आत्मघाती ही होगा ।
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के  प्रोफेसर डॉ मैत्रीश घटक के शब्द हैं , -
" India may go down in recent history as the biggest example of firing cannon balls to kill mosquitoes..... with huge collateral damage. "
लगभग सभी प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों की राय यही है कि, जिन उद्देश्यों के लिए यह मास्टरस्ट्रोक लगाया गया वह बहुत कुछ हद तक विफल हो गया हैं।

( विजय शंकर सिंह )

Friday, 16 December 2016

एक कविता - तफ़रीह और खेल का मैदान / विजय शंकर सिंह

उम्मीदें हीं कुछ ज्यादा पाल लीं थीं
लोगों ने ,
आसमान लुभाता भी तो, कम नहीं है ,
सात रंग , अलग अलग ,
और फिर सारे रंगों का जो संसार ,
रच दिया था उसने कभी,
था तो वह सम्मोहन ही ।

कुछ हम भी ऊब बैठे थे ,
उस दौर से
जो चल रहा था आस पास ,
हाल फिलहाल ,
रंगों ने कुछ दिलासे दिये  
अश्क़ों को उसने हाँथ से हटाया ,
उम्मीदों का नीला समंदर दिखा
प्रत्यूष की आभा झलकी
लगा , अब शायद सहर होगी ,
मिहिर उदय होंगे,
निशा , इतिहास बनेगी,
रात के गहरे दुःख कटेंगें !

निजात मिली उनसे ,
जो बोझ लग रहे थे तब !
कदम दर कदम परोसते आ रहे थे,
चाशनी में पगे फरेब ।

इन्होंने भरोसा जगाया,
उम्मीदों के अंकुर फूटे,
एक नशा तारी हुआ,
हम डूबते लगे
आगत भविष्य के आह्लाद में,
धुंध के पार,
इक नए संसार की प्रतीक्षा थी वह !

बिखरने लगा अब सब,
मिटने लगी लकीरें,
जिनसे वह अलग दिखता था,
एक बार फिर ,
चाल चली वक़्त ने,
फिर वही मुस्कानों भरा,
शातिर चेहरा दिखा ।
नियति भी तो
छलती रहती है अक्सर ।

अब भी वक़्त है .
गनीमत है ,
वक़्त कभी चुकता नहीं
निर्विकार भाव से बीतता रहता है ,
उसे पहचानें  
उसके फरेब को पहचानें ,
और उस नशे को,
जो ज़माने पर तारी था, उन दिनों
हैंगओवर से बाहर आएं ,
और पहचानें इन बाजीगरों को भी ,
जिन्होंने हुकूमत और मुल्क़ को ,
तफ़रीह और
खेल का मैदान बना रखा है !!

© विजय शंकर सिंह

Thursday, 15 December 2016

रिजिजू का जूता / विजय शंकर सिंह

रिजुजु का जूता  /  विजय शंकर सिंह

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजु के,  450 करोड़ के एक घोटाले में संलिप्त होने के समाचार अखबारों में छपे हैं । न्यूज़ चैनेल्स का मुझे पता नहीं कि उन्होंने कुछ दिखाया या नहीं ।  मैं उन्हें कम देखता हूँ तो, हो सकता हो, उन्होंने भी इसे दिखाया हो मर मैं नहीं देख पाया होऊँ । इंडियन एक्सप्रेस में जब यह खबर छपी तो, रिजुजु की प्रतिक्रिया आयी कि वे उस पत्रकार की जूतों से पिटाई करेंगे । आप को हैरानी हो तो हो, मुझे उनकी प्रतिक्रिया पर कोई भी हैरानी नहीं हुयी है । यही रिजुजु साहब है जिन्होंने कभी यह बयान दिया था, बार बार ऑथॉर्टी पर सवाल उठाना उचित नहीं है । ऑथॉर्टी शब्द जब भी सुनता हूँ तो रवीश कुमार का एक बेहद तीक्ष्ण प्राइम टाइम याद आ जाता है । जिसमे उन्होंने मूकाभिनय करने वाले दो प्रतिभाशाली अभिनेताओं से ऑथॉर्टी और ट्रॉल के माध्यम से प्रतीकों द्वारा सब कुछ कह दिया था । लेकिन अब थोडा देश बदल रहा है तो ऑथॉर्टी और ट्रॉल की भूमिका भी एक में ही समाहित होने लगी है । ऑथॉर्टी कब ट्रॉल बन जाय और ट्रॉल कब ऑथॉर्टी यह अब मुश्किल से ही कहा जा सकता है । रिजुजु का यह बयान निंदनीय है ।

सतीश वर्मा गुजरात कैडर के एक आईपीएस अधिकारी हैं और वह नार्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पॉवर कॉरपोरेशन NEEEPCO मुख्य सतर्कता अधिकारी है।  पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग में सीवीओ आईपीएस अधिकारी होते हैं । यह डीआईजी से एडिशनल डीजी की रैंक तक के अफसर होते हैं , जो उस संस्थान के आकार पर निर्भर रहता है।  सतीश वर्मा आईजी हैं । देश के सभी संस्थानों के सीवीओ , केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के अधीन होते हैं । सतर्कता सबंधी सभी जाँचे वे सीधे सीवीसी को भेजते हैं । सीवीसी उनके अध्ययन के बाद उन्हें जांच हेतु सीबीआई को भेजता है । सीबीआई, उस पर मुक़दमे कायम कर तफ्तीश करती है और जो भी परिणाम होता है वह अदालत को भेजा जाता है । भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत कायम मुकदमों के सम्बन्ध में सीबीआई , सीवीसी के निर्देशन पर काम करती है । सतीश कुमार ने जो रिपोर्ट भेजी थी उसे जांच हेतु सीवीसी ने सीबीआई को दिया है । पर सीबीआई ने कभी स्टाफ न होने और कभी समयाभाव के कारण उसे लम्बित रखे रहा ।

सतीश कुमार ने NEEEPCO में 450 करोड़ का घोटाला पाये जाने पर अपनी रिपोर्ट दी थी । रिपोर्ट के अनुसार, अरुणांचल प्रदेश के केमेंग परियोजना जो नीपको द्वारा संचालित की जा रही है । सतीश वर्मा के अनुसार,
" Goboi Rijiju, one of the affected transporters and a ‘distant cousin’ of Mr. Rijiju, came to his office in Shillong on December 29, 2015, and offered to help him with his promotion if the officer cleared his payments that had been stuck for months."
सतीश कुमार ने इस मुलाक़ात का आडियो टेप भी अपने आरोपों के साथ CAT केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण , गौहाटी को दिया है ।
जब किरण रिजुजु से इस सम्बन्ध में हिन्दू अखबार के एक पत्रकार ने जानकारी करनी चाही तो मंत्री जी ने कहा,
“He (Goboi) is a distant cousin. Be it anyone, whether distant cousins or friends, will not tolerate if my name is used to get their works done. Anyway I will always ensure that my people don’t face hardship.”
सतीश वर्मा ने अपनी याचिका के साथ रिजुजु का वह सिफारिशी पत्र भी सलग्न किया है, जिसमे उन्होंने गोगोई को भुगतान करने के लिए लिखा था । यह पत्र 9 नवम्बर, 2015 को लिखा गया था । सतीश वर्मा ने 1100 पृष्ठों में दिए गए अपनी याचिका में सारी बातें विस्तार से कही है। यह याचिका अभी विचाराधीन है अतः इस सम्बन्ध में कुछ कहना उचित नहीं होगा ।

इस पूरे प्रकरण में तीन मुद्दे उभर कर सामने आते हैं ।
एक नीपको में 450 करोड़ के घपले में किरण रिजुजु की संलिप्तता,
दूसरे, सतीश वर्मा द्वारा यह अनियमितता उजागर करने पर उनकी प्रतारणा,
तीसरे, अखबारों में विशेष कर इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर छपने पर और पूछताछ करने पर उस पत्रकार को जूते से मारने की धमकी देना ।
पहली बात , जो संलिप्तता से सम्बंधित है, उस संबंध में 2015 के नवम्बर में रिपोर्ट दिए जाने और सीवीसी द्वारा इस मसले को सीबीआई को सौंपे जाने के बाद, भी कोई कार्यवाही अब तक न होने के बारे में केवल यह कहा जा सकता है कि, सीबीआई तोते की भूमिका से अभी उबर नहीं पा रही है । वह इस मसले को नज़र अंदाज़ कर रही हैं। घोटाले की जांच जब होगी तब होगी । फिलहाल तो वह ठन्डे बस्ते में है ।
दूसरी बात, सतीश कुमार के उत्पीड़न की है । सतीश कुमार पर आरोप है कि वह बिना सूचना दिए मुख्यालय से अनुपस्थित रहे । यह आरोप मुझे बचपन की पढ़ी हुयी , भेड़िये और मेमने की चिरंतन कथा को याद दिला देती है । सतीश कुमार ने अपने उत्पीड़न के खिलाफ CAT का दरवाज़ा खटखटाया है । CAT में क्या होता है CAT जाने । पर इतना सच है कि गोगोई ने सतीश कुमार के स्थानांतरण कराने और उनकी कुछ समस्याएं दूर करा देने का आश्वासन दिया था । यही गोगोई हैं जिनकी संलिप्तता 450 करोड़ के घोटाले में हैं । जहां स्कूटर और बाइक से पत्थर के बोल्डर ढोये गए थे । गोगोई , मंत्री जी के निकट भी हैं ।

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात , मंत्री का आचरण है । घपलों की यह पहली खबर नहीं है । आज़ाद भारत के इतिहास में 1949 में हुए जीप घोटाले से ले कर अब तक के घोटाले की खबरों को अखबारों की साइट्स पर पढ़ें तो बहुत कुछ लिखा गया है । लोगों ने उनका खंडन किया, लोगों ने अदालतों में मानहानि के मुक़दमे किये, पर किसी ने भी यह शब्द और यह तेवर इस्तेमाल नहीं किये, जो इन मंत्री महोदय ने किया है । उन्हें शालीनता के साथ इन सभी आरोपों की जांच करानी चाहिए थी, और तब अखबार को जवाब देना चाहिए था । यह आरोप कोई सुनी सुनाई बात नहीं है । यह आरोप नीपको के सीवीओ की छानबीन के बाद उनकी रिपोर्ट से उजागर हुआ है । सीवीओ भी आईपीएस का एक वरिष्ठ अधिकारी है और वह अपनी रिपोर्ट के संभावित परिणाम से अपरिचित नहीं रहे होंगे । फिर इस रिपोर्ट के बाद , सतीश कुमार का उत्पीड़न भी किसी न किसी संदेह की ओर ही इशारा करता है । सरकार जुबां से भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक लड़ाई लड़ रही है । पर, सच तो यह है कि वह अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप के संबंध में जांच कराने को तैयार भी नहीं है ।

( विजय शंकर सिंह )