Friday, 18 November 2016

दुष्यन्त कुमार की एक ग़ज़ल - पुराने पड़ गए हैं डर , फेंक दो तुम भी / विजय शंकर सिंह

पुराने पड़ गये डर, फेंक दो तुम भी
ये कचरा आज बाहर फेंक दो तुम भी

लपट आने लगी है अब हवाओं में
ओसारे और छप्पर फेंक दो तुम भी

यहाँ मासूम सपने जी नहीं पाते
इन्हें कुंकुम लगा कर फेंक दो तुम भी

तुम्हें भी इस बहाने याद कर लेंगे
इधर दो—चार पत्थर फेंक दो तुम भी

ये मूरत बोल सकती है अगर चाहो
अगर कुछ बोल कुछ स्वर फेंक दो तुम भी

किसी संवेदना के काम आएँगे
यहाँ टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी. !!

O
दुष्यन्त हिंदी के विद्रोही ग़ज़लकार है । ग़ज़ल मूलतः उर्दू से हिंदी में आयी । हिंदी के काव्य शास्त्र में छंद , जिनसे कविता बनती है में ग़ज़ल नहीं है । पर उर्दू के दो पंक्ति के शेरों ने जिनकी कमाल की संप्रेषणीयता होती है से ग़ज़ल की धारा बह निकली । दुष्यन्त ने इस विधा में महारत हासिल किया और बहुत सी ग़ज़लें लिखी । उनकी अधिकतर रचनाएं सत्ता के खिलाफ है । सत्ता में व्याप्त जड़ता, अहमन्यता, और ऐंठापन के विरुद्ध उन्होंने आवाज़ उठायी और जिन प्रतीकों को चुना उस से उनके एक एक शेर की धार बहुत ही पैनी है । 1974 / 75 /76 के दौरान जो आपातकाल लगा था, तब दुष्यन्त की गज़लें बहुत ही लोकप्रिय हुयी थी। सत्ता का विरोध देश का विरोध कभी भी नहीं है । बल्कि सत्ता के अहंकार , व्याप्त भेदभाव , और उसकी जड़ता का विरोध न कर उसके सामने दुम हिलाना देशद्रोह है ।

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 15 November 2016

एक कविता, निर्मम इतिहास याद किसे रहता है / विजय शंकर सिंह

वाटरलू , 
वह एक निर्णायक युद्ध था ।
याद आती रही, अक्सर
यह पराजय ।

निराश और त्रासद भरे दिन
ज़ुल्मत भरी रातें
उदास और
खोखली चमक लिए सूरज,
जिनमे वह अपनी प्रेयसी के लिए
दिल को छू लेने वाली
प्रतीकों और विम्बों से सजी
कविताओं को लिखता रहता,
मिटाता रहता ।

सोचता रहता था, वह
उन युद्धों को
जिसमें वह  शौर्य के साथ
एक, एक कर  राज्यों को
भूलुंठित करते हुए
ईश्वर का अवतार बन गया था ।

रूस की कड़कड़ाती सर्दी ,
सैनिकों के क्षत विक्षत शव,
जले हुए गाँव के गाँव ,
सब कुछ जीत कर भी
पराजय के एहसास के साथ
लौटता हुआ वह,
सब कुछ फ़्लैश बैक की तरह,
जेहन में उतरता रहा , डूबता रहा !

द्वीप का एकांत कारागार
संसार से अलग करती हुयी
पत्थर की हृदयहीन दीवारें,
लहराता और डराते हुए सागर की ध्वनि
उदासी की कितनी कहानियों के
अक़्स उसे अपने ही,
खोल में समेटते जा रहे थे ।

जनप्रियता, त्राता, अवतार के,
भारी भरकम शब्द,
अपना अर्थ खोते हुए,
इतिहास के पन्नों में
शनैः शनैः
जैसे थक कर, डूबता है सूरज,
उसकी आँखों से,
ओझल होते रहे ।

अहंकार और जनप्रियता
कभी कभी,
दृष्टिदोष भी लाती है .
खुद की आँखें खुद के
प्रकाश से चुंधियाती
मिचमिची सी
खुद को संसार से अलग कर देती हैं .
लोकप्रियता और
अहम्  और आत्मश्लाघा का
यह माया लोक
पतन की ओर उठते  हुये  क़दम का
प्रथम चरण होता है ।
पर निर्मम इतिहास , याद किसे रहता है !!

© विजय शंकर सिंह

Friday, 11 November 2016

मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध कहानी - नमक का दारोगा / विजय शंकर सिंह

   नमक से भले ही उच्च रक्त चाप बढ़ता हो, पर यह एक अत्यंत आवश्यक तत्व है । सरकार ने भ्रष्टाचार को ले कर एक अभियान छेड़ा है । कुछ न कुछ तो सार्थक असर तो पड़ेगा ही । रिश्वत और भ्रष्टाचार एक बहुत पुरानी समस्या है । लालच एक मानवीय प्रवित्ति है  और इसी का प्रतिफल भ्रष्टाचार हैं। कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में एक श्लोक है, जिसका अर्थ है, 
" जिस प्रकार जल में विचरण करती हुयी मछलियाँ , जल पी लेती है, और जानी नहीं जा सकती हैं, उसी प्रकार , कर संग्रह के कार्य में नियुक्त कर्मचारी कर का गबन कर लेते हैं तो उन्हें भी नहीं जाना जा सकता है । " 
उत्कोच, रिश्वत के लिए संस्कृत शब्द है जिसका प्रयोग प्राचीन भारत में होता था । आज भी यह शब्द रिश्वत के लिए प्रमाणिक हिंदी शब्द है । इसी पर आधारित मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध कहानी पढ़िए, नमक का दारोगा . 
- vss.                                                                      
जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था।
यह वह समय था जब ऍंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकर फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे।
मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले।
उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ॠण के बोझ से दबे हुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस की तरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो।
'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।
'इस विषय में विवेक की बडी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरज को दाँव पर पाना जरा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध लो यह मेरी जन्म भर की कमाई है।
इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खडे हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृध्द मुंशीजी को सुख-संवाद मिला तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पडे, कलवार की आशालता लहलहाई। पडोसियों के हृदय में शूल उठने लगे।
जाडे के दिन थे और रात का समय। नमक के सिपाही, चौकीदार नशे में मस्त थे। मुंशी वंशीधर को यहाँ आए अभी छह महीनों से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोडे समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचार से अफसरों को मोहित कर लिया था। अफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे।
नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। दारोगाजी किवाड बंद किए मीठी नींद सो रहे थे। अचानक ऑंख खुली तो नदी के प्रवाह की जगह गाडियों की गडगडाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया। उठ बैठे।
इतनी रात गए गाडियाँ क्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य कुछ न कुछ गोलमाल है। तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब में रखा और बात की बात में घोडा बढाए हुए पुल पर आ पहुँचे। गाडियों की एक लम्बी कतार पुल के पार जाती देखी। डाँटकर पूछा, 'किसकी गाडियाँ हैं।
थोडी देर तक सन्नाटा रहा। आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई तब आगे वाले ने कहा-'पंडित अलोपीदीन की।
'कौन पंडित अलोपीदीन?
'दातागंज के।
मुंशी वंशीधर चौंके। पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित जमींदार थे। लाखों रुपए का लेन-देन करते थे, इधर छोटे से बडे कौन ऐसे थे जो उनके ॠणी न हों। व्यापार भी बडा लम्बा-चौडा था। बडे चलते-पुरजे आदमी थे। ऍंगरेज अफसर उनके इलाके में शिकार खेलने आते और उनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था।
मुंशी ने पूछा, 'गाडियाँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिला, 'कानपुर । लेकिन इस प्रश्न पर कि इनमें क्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब का संदेह और भी बढा। कुछ देर तक उत्तर की बाट देखकर वह जोर से बोले, 'क्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछते हैं इनमें क्या लदा है?
जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोडे को एक गाडी से मिलाकर बोरे को टटोला। भ्रम दूर हो गया। यह नमक के डेले थे।

पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार, कुछ सोते, कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाडीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले-'महाराज! दारोगा ने गाडियाँ रोक दी हैं और घाट पर खडे आपको बुलाते हैं।

पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं नचाती हैं। लेटे ही लेटे गर्व से बोले, चलो हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी ने बडी निश्ंचितता से पान के बीडे लगाकर खाए। फिर लिहाफ ओढे हुए दारोगा के पास आकर बोले, 'बाबूजी आशीर्वाद! कहिए, हमसे ऐसा कौन सा अपराध हुआ कि गाडियाँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए।
वंशीधर रुखाई से बोले, 'सरकारी हुक्म।
पं. अलोपीदीन ने हँसकर कहा, 'हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को। हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पडा। ईमानदारी की नई उमंग थी। कडककर बोले, 'हम उन नमकहरामों में नहीं है जो कौडियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। आपको कायदे के अनुसार चालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है। जमादार बदलूसिंह! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ।
पं. अलोपीदीन स्तम्भित हो गए। गाडीवानों में हलचल मच गई। पंडितजी के जीवन में कदाचित यह पहला ही अवसर था कि पंडितजी को ऐसी कठोर बातें सुननी पडीं। बदलूसिंह आगे बढा, किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड सके। पंडितजी ने धर्म को धन का ऐसा निरादर करते कभी न देखा था। विचार किया कि यह अभी उद्दंड लडका है। माया-मोह के जाल में अभी नहीं पडा। अल्हड है, झिझकता है। बहुत दीनभाव से बोले, 'बाबू साहब, ऐसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इज्जत धूल में मिल जाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहर थोडे ही हैं।
वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा, 'हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते।
अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे खिसकता हुआ मालूम हुआ। स्वाभिमान और धन-ऐश्वर्य की कडी चोट लगी। किन्तु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोले, 'लालाजी, एक हजार के नोट बाबू साहब की भेंट करो, आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं।
वंशीधर ने गरम होकर कहा, 'एक हजार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते।
धर्म की इस बुध्दिहीन दृढता और देव-दुर्लभ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछलकर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुँची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल, अविचलित खडा था।
अलोपीदीन निराश होकर बोले, 'अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है।
वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा। बदलूसिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढा। पंडितजी घबडाकर दो-तीन कदम पीछे हट गए। अत्यंत दीनता से बोले, 'बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने का तैयार हूँ।
'असम्भव बात है।
'तीस हजार पर?
'किसी तरह भी सम्भव नहीं।
'क्या चालीस हजार पर भी नहीं।
'चालीस हजार नहीं, चालीस लाख पर भी असम्भव है।
'बदलूसिंह, इस आदमी को हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।
धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट-पुष्ट मनुष्य को हथकडियाँ लिए हुए अपनी तरफ आते देखा। चारों ओर निराश और कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद मूर्छित होकर गिर पडे।
दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देखिए तो बालक-वृध्द सबके मुहँ से यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिए वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया।
पानी को दूध के नाम से बेचने वाला ग्वाला, कल्पित रोजनामचे भरने वाले अधिकारी वर्ग, रेल में बिना टिकट सफर करने वाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साकार यह सब के सब देवताओं की भाँति गर्दनें चला रहे थे।
जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकडियाँ, हृदय में ग्लानि और क्षोभ भरे, लज्जा से गर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले तो सारे शहर में हलचल मच गई। मेलों में कदाचित ऑंखें इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा।
किंतु अदालत में पहुँचने की देर थी। पं. अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञा पालक और अरदली, चपरासी तथा चौकीदार तो उनके बिना मोल के गुलाम थे।
उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौडे। सभी लोग विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने यह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए? ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करने वाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था।
बडी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्याय के मैदान में धर्म और धन में यध्द ठन गया। वंशीधर चुपचाप खडे थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र। गवाह थे, किंतु लोभ से डाँवाडोल।
यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर कुछ खिंचा हुआ दीख पडता था। वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था। किंतु पक्षपात और न्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपात हो, वहाँ न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती। मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया।
डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुध्द दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बडे भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोडे लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दरोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है, लेकिन यह बडे खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पडा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक के मुकदमे की बढी हुई नमक से हलाली ने उसके विवेक और बुध्दि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए।
वकीलों ने यह फैसला सुना और उछल पडे। पं. अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहर निकले। स्वजन बाँधवों ने रुपए की लूट की। उदारता का सागर उमड पडा। उसकी लहरों ने अदालत की नींव तक हिला दी।
जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर उनके ऊपर व्यंग्यबाणों की वर्षा होने लगी। चपरासियों ने झुक-झुककर सलाम किए। किंतु इस समय एक कटु वाक्य, एक-एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था।
कदाचित इस मुकदमे में सफल होकर वह इस तरह अकडते हुए न चलते। आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ। न्याय और विद्वत्ता, लंबी-चौडी उपाधियाँ, बडी-बडी दाढियाँ, ढीले चोगे एक भी सच्चे आदर का पात्र नहीं है।
वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था। कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथित घर को चले। बूढे मुंशीजी तो पहले ही से कुडबुडा रहे थे कि चलते-चलते इस लडके को समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है और कोई ओहदेदार नहीं थे। लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घर में चाहे ऍंधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दिया जलाएँगे। खेद ऐसी समझ पर! पढना-लिखना सब अकारथ गया।
इसके थोडे ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढे पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले- 'जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड लूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाता तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारण करता। वृध्द माता को भी दु:ख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने कई दिनों तक सीधे मुँह बात तक नहीं की।
इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। सांध्य का समय था। बूढे मुंशीजी बैठे-बैठे राम नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिए बैलों की जोडी, उनकी गर्दन में नीले धागे, सींग पीतल से जडे हुए। कई नौकर लाठियाँ कंधों पर रखे साथ थे।
मुंशीजी अगवानी को दौडे देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत् की और लल्लो-चप्पो की बातें करने लगे- 'हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है। किंतु क्या करें, लडका अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्या मुँह छिपाना पडता? ईश्वर निस्संतान चाहे रक्खे पर ऐसी संतान न दे।
अलोपीदीन ने कहा- 'नहीं भाई साहब, ऐसा न कहिए।
मुंशीजी ने चकित होकर कहा- 'ऐसी संतान को और क्या कँ?
अलोपीदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा- 'कुलतिलक और पुरुखों की कीर्ति उज्ज्वल करने वाले संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें!
पं. अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा- 'दरोगाजी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी। उस रात को आपने अपने अधिकार-बल से अपनी हिरासत में लिया था, किंतु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ। मैंने हजारों रईस और अमीर देखे, हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पडा किंतु परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड दिया। मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूँ।
वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया, किंतु स्वाभिमान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं। क्षमा-प्रार्थना की चेष्टा नहीं की, वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असह्य सी प्रतीत हुई। पर पंडितजी की बातें सुनी तो मन की मैल मिट गई।
पंडितजी की ओर उडती हुई दृष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले- 'यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिए। मैं धर्म की बेडी में जकडा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी वह मेरे सिर-माथे पर।
अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा- 'नदी तट पर आपने मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार की थी, किंतु आज स्वीकार करनी पडेगी।
वंशीधर बोले- 'मैं किस योग्य हूँ, किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्रुटि न होगी।
अलोपीदीन ने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले- 'इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ, जब तक यह सवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा।
मुंशी वंशीधर ने उस कागज को पढा तो कृतज्ञता से ऑंखों में ऑंसू भर आए। पं. अलोपीदीन ने उनको अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियत किया था। छह हजार वाषक वेतन के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग, सवारी के लिए घोडा, रहने को बँगला, नौकर-चाकर मुफ्त। कम्पित स्वर में बोले- 'पंडितजी मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी उदारता की प्रशंसा कर सकूँ! किंतु ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ।
अलोपीदीन हँसकर बोले- 'मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है।
वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा- 'यों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। किंतु मुझमें न विद्या है, न बुध्दि, न वह स्वभाव जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है। ऐसे महान कार्य के लिए एक बडे मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्य की जरूरत है।
अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- 'न मुझे विद्वत्ता की चाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, न कार्यकुशलता की। इन गुणों के महत्व को खूब पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड जाती है। यह कलम लीजिए, अधिक सोच-विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला, बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे।
वंशीधर की ऑंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रध्दा की दृष्टि से देखा और काँपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।
अलोपीदीन ने प्रफुल्लित होकर उन्हें गले लगा लिया

Wednesday, 9 November 2016

प्रधानमंत्री की मौद्रिक नीति - एक समीक्षा / विजय शंकर सिंह

प्रधानमंत्री जी की नई मौद्रिक नीति से कालाधन और भ्रष्टाचार पर कितना असर पड़ेगा यह तो भविष्य ही बताएगा पर यह निश्चित है कि, यह एक साहसिक कदम है और बेहतरी की उम्मीद में उठाया गया है । आर्थिक समाचार पत्रों में भी अभी बहुत कुछ नहीं आ रहा है । हो सकता है एक्सपर्ट्स अभी अध्ययन कर रहे हों और मामले को परख रहे हों । पर जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं उनसे यह आभास मिल रहा है कि, मध्यम वर्ग और ट्रेडर्स कम्युनिटी, तथा रोज़मर्रा के काम करने वाले और वह लोग जो अभी तक डेबिट कार्ड की संस्कृति नहीं अपना पाये हैं , अधिक प्रभावित होंगे । यह प्रभाव दीर्घकालिक नहीं होगा, यह उम्मीद भी की जानी चाहिए । यह कोई नयी बात नहीं है । आर्थिक कदमों के कारण थोड़ी बहुत दिक्कतें आती हैं । हम इन्हें टीथिंग ट्रबल कह सकते हैं । नोट बन्द का यह फैसला भी भारत के आर्थिक इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है । भारत में 1938 में पहली बार 1000 और 10000 के नोट चलन में आये थे । पर आज़ादी के एक साल पहले इसे बन्द कर दिया गया । उस समय ज्वाहर लाल नेहरू भारत के अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री थे । तब प्राइम मिनिस्टर नहीं उन्हें प्रीमियर कहा जाता था । 1954 में सरकार ने 1000, 5000, 10,000 रूपये के नोट फिर से जारी किये । इन नोटों को जब 1978 में जब मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री थे तो बन्द कर दिया गया था । 1000 रुपये का जो नोट बंद हुआ है वह 2001 में यूपीए सरकार ने जारी किये थे । अब योजना 2000 के नए नोट लाने की है । सुना है इस पर कुछ नैनो चिप जैसी तकनिकी होगी । पर आरबीआई ने इस चिप के बारे में अभी कुछ नहीं कहा है । जो भी है वह सोशल मिडिया पर ही है ।यह फैसला जो अचानक हुआ दिखता है वह अचानक नहीं है । घोषणा ज़रूर अचानक हुयी है । यह एक ऐसा फैसला है जिसका असर देश के हर नागरिक पर पड़ेगा । सरकारें ऐसे फैसले बहुत सोच समझ कर लेती है ।

इकोनॉमिक्स टाइम्स के दिनांक 19 मई के अंक में नरेंद्र नाथन की एक स्टोरी छपी थी । उस खबर के अनुसार, 29 अप्रैल को देश में कुल 16 लाख पचास हज़ार करोड़ की मुद्रा प्रचलन में थी । यह राशि पिछले वर्षों की तुलना में अधिक थी । यह वृद्धि 15.32 प्रतिशत की थी । जुलाई 2011 के बाद की यह सबसे अधिक वृद्धि थी। पहले यह समझा गया कि इस वृद्धि का कारण राज्य विधानसभाओं के चुनाव होंगे । पर बाद में यह तर्क उचित नहीं प्रतीत हुआ । फिर इसका कारण बैंको में नकदी जमा की सीमा 50 हज़ार से अधिक पर पैन नंबर की अनिवार्यता को माना गया । पर यह कारण भी सबल नहीं लगा । फिर शक नक़ली नोटों पर गया । आईएसआई अक्सर नेपाल और बांग्ला देश के माध्यम से देश में नक़ली नोटों को भेजती रहती है । ऐसा कोई मुश्किल से ही होगा जिसे कभी हज़ार या पांच सौ के नक़ली नोट मिले न हों । इस से न केवल मुद्रा स्फीति बढ़ रही थी बल्कि ऐसा धन देश विरोधी कृत्यों में भी खप रहा था । यह भी एक प्रकार की युद्ध कला है । 1805 - 12 में फ्रांस के नैपोलियन ने जब रूस पर हमला किया था तो उसने भारी संख्या में नकली रूबल छाप कर रूस में फैला दिए थे । इस से रूस की तत्कालीन अर्थ व्यवस्था पर बहुत ही बुरा असर पड़ा था । टॉलस्टॉय ने अपने एपिक उपन्यास " युद्ध और शांति " में तत्कालीन रूसी समाज पर इस युद्ध का क्या प्रभाव पड़ा था, को बहुत ही अच्छी तरह से प्रस्तुत किया है । पर इस उदाहरण को आज के भारत की अर्थ व्यवस्था से उसे जोड़ कर न देखें । यहां की विराट अर्थ व्यवस्था पर कोई गम्भीर प्रभाव नक़ली नोटों के प्रसार ने नहीं डाला है पर अगर इसे अभी नहीं रोका जाता तो  आगे स्थिति और बिगड़ती ही । इन सब से अघोषित और काला धन बढ़ रहा था वह या तो रीयल स्टेट में खप रहा था या सोने में । सोने में काले धन का प्रवाह रोकने के लिए, सोने के आयात पर अंकुश लगाए गए और साथ ही सोना खरीदने के लिए नकद राशि की सीमा को कम किया गया । इन सब के कारण बैंकों की जमा दर पर असर पड़ रहा था और उनकी जमा दर स्थिर हो गयी थी । रिजर्व बैंक ने तब अध्ययन किया और पाया कि 80 प्रतिशत मुद्रा जो चलन में है वह 500 और 1000 रूपये के नोटों के रूप में है । तब सरकार के लिए इन नोटों का अमुद्रीकरण करना आवश्यक हो गया । पहले 1000 रूपये के नोटों के ही बदलने की बात चली थी । पर 500 की भी संख्या भी कम नहीं थी इसलिये दोनों ही प्रकार के नोटों को बदलने का फैसला किया गया ।

पूँजीपतियों में भी हम जिन पर शक करते है कि वे काले धन की खान है, दरअसल उनसे अधिक काला धन उन के पास है जिन्होंने  धन  भ्रष्टाचार और अन्य साधनों से कमाए हैं । बड़े उद्योगपतियों का अधिकतर काम धाम चेक, ड्राफ्ट , कार्ड या ऑनलाइन होता है और उनके अधिकतर खर्चे उनकी कंपनियाँ उठाती हैं । उनके यहां अर्जित होने काला धन भी किसी न किसी सिस्टम से अर्जित होता है और उसी सिस्टम से रंग बदलता रहता है । उनका निवेश भी भूमि , सोना ,  शेयर, तथा कंपनियों में होता रहता है । कंपनिया भी तमाम हथकंडे अपना कर इस धन को काला सफ़ेद करती रहती है । सभी बड़े उद्योगपतियों के अपने ट्रस्ट और धर्मादा संस्थाएं  , स्कूल कॉलेज तथा अन्य ऐसी संस्थाएं होती हैं जो उनके काले धन को विनियमित करती रहती हैं । इन संस्थाओं को राजनीतिक हस्तियों का आशीर्वाद भी प्राप्त है और उन्हें टैक्स एक्सपर्ट्स की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं । अतः वे इस मुद्दे पर संस्थागत रूप से भी सबल रहते हैं ।  यह माया का विकट जाल है । और यही उच्च स्तर पर राजनीतिक भ्रष्टाचार की जननी भी । यह मायाजाल अंग्रेज़ी में कॉर्पोरेट का अंध पक्ष जिसे मैं कहूँगा, देश के अंदर एक प्रकार की समानांतर अर्थ व्यवस्था है। देखना यह है कि प्रधानमंत्री के इस कदम से यह तबका कितना प्रभावित होता है ।

दूसरा वर्ग ट्रेडर्स या मझोले व्यापारियों का है । इन व्यापारियों का सारा लेनदेन नकदी में ही होता है । चाहे आभूषण हो या अनाज या डॉक्टर को देना हो , या अन्य खर्चे हों सारा लेनदेन नकदी में होता है । अब ऑनलाइन और नेट बैंकिंग का चलन बढ़ा है , पर अभी भी यह नयी पीढी में ही है । हम जैसे लोग एटीएम ज़रूर रखते हैं पर डेबिट कार्ड और नेटबैंकिंग की संस्कृति से अभी उतने सहज नहीं हो पाये हैं । यह तबक़ा अधिक परेशान भी है । किसी के पैसे फंसे हैं तो कोई 1000  500 के नोट नहीं ले रहा है , तो कोई इनके भुगतान रोके हुए है । इस प्रकार 80 प्रतिशत व्यापार की शृंखला जो बनी हुयी है वह इस समय दुविधा में है । ज़ाहिर है इस नकदी लेनदेन में अधिकतर धन बिना कर चुकाए होगा । ऐसे में यह बिना कर चुकाया धन डूब भी सकता है । कुल मिला कर जो बात सामने आ रही है अभी स्थिति तो यही है ।

तीसरा तबक़ा, राजनेताओं और अफसरों और उन लोगों का है जो भ्रष्टाचार से अर्जित धन पर कुकुरमुत्ते की तरह बैठे हैं । सबसे अधिक यही नुकसान में रहेंगे । रखे हुए धन का क्या जुगाड़ यह करते हैं यह भी बाद में ही पता चलेगा । पर जो धन इन्होंने 500 और 1000 रूपये के नोटों में रख रखे हैं वे सच में कागज़ के टुकड़े ही साबित होंगे ।
राजनेताओं का धन भी , विशेष कर बड़े नेताओं का कहीं न कहीं निवेशित रहता है । आप पाइएगा कि हर बड़े नेता का कोई न कोई ट्रस्ट या फाउंडेशन या एनजीओ है । यह सब उनको प्राप्त काले धन को खपाने का ही उपक्रम है । पार्टी फण्ड में भी जो धन रहता है वह भी उन्ही नेताओं के काम आता है, जिनकी हैसियत पार्टी में बहुत मज़बूत होती है । पर इस कदम से उन चमचे टाइप और मध्यम परजीवी नेताओं और छुथभइयों पर बहुत पड़ेगा जिनका सारा साम्राज्य ही वसूली, रंगदारी, माफिया गिरी से अर्जित धन पर निर्भर है । उम्मीद है राजनीति में कुछ शुचिता आएगी ।

कुछ मित्र इसे मास्टर स्ट्रोक कह रहे हैं । राजनीति में मास्टर स्ट्रोक एक्शन के बाद परिणामों पर भी निर्भर करता है । आर्थिक सुधार और निर्णयों का असर देर में दीखता है । हमें आशा करनी चाहिए कि यह मास्टर स्ट्रोक साबित हो । पर कभी कभी मास्टर स्ट्रोक बॉउंड्री पर कैच भी हो जाता है । पर मैं आशान्वित हूँ कि यह कदम अपने उद्देश्य में सफल होगा ।

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 1 November 2016

पुलिस मुठभेड़ों की जांच के लिए मा सर्वोच्च न्यायालय का दिशा निर्देश / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट में पीयूसीएल Peoples Union for Civil Liberties, ने महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ पुलिस मुठभेड़ों के बारे में एक मुकदमा कायम किया था। उसमे पुलिस मुठभेड़ों के सम्बन्ध में जांच किये जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 16 विन्दुओं पर एक दिशा निर्देश जारी किया था । यह दिशा निर्देश बहुत स्पष्ट है । मैं उन्हें जस का तस यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

(1) Whenever the police is in receipt of any intelligence or tip-off regarding criminal movements or activities pertaining to the commission of grave criminal offence, it shall be reduced into writing in some form (preferably into case diary) or in some electronic form. Such recording need not reveal details of the suspect or the location to which the party is headed. If such intelligence or tip-off is received by a higher authority, the same may be noted in some form without revealing details of the suspect or the location.

(2) If pursuant to the tip-off or receipt of any intelligence, as above, encounter takes place and firearm is used by the police party and as a result of that, death occurs, an FIR to that effect shall be registered and the same shall be forwarded to the court under Section 157 of the Code without any delay. While forwarding the report under Section 157 of the Code, the procedure prescribed under Section 158 of the Code shall be followed.

(3) An independent investigation into the incident/encounter shall be conducted by the CID or police team of another police station under the supervision of a senior officer (at least a level above the head of the police party engaged in the encounter). The team conducting inquiry/investigation shall, at a minimum, seek:

(a) To identify the victim; colour photographs of the victim should be taken;

(b) To recover and preserve evidentiary material, including blood-stained earth, hair, fibers and threads, etc., related to the death;

(c) To identify scene witnesses with complete names, addresses and telephone numbers and obtain their statements (including the statements of police personnel involved) concerning the death; (d) To determine the cause, manner, location (including preparation of rough sketch of topography of the scene and, if possible, photo/video of the scene and any physical evidence) and time of death as well as any pattern or practice that may have brought about the death;

(e) It must be ensured that intact fingerprints of deceased are sent for chemical analysis. Any other fingerprints should be located, developed, lifted and sent for chemical analysis;

(f) Post-mortem must be conducted by two doctors in the District Hospital, one of them, as far as possible, should be In- charge/Head of the District Hospital. Post-mortem shall be video- graphed and preserved;

(g) Any evidence of weapons, such as guns, projectiles, bullets and cartridge cases, should be taken and preserved. Wherever applicable, tests for gunshot residue and trace metal detection should be performed.

(h) The cause of death should be found out, whether it was natural death, accidental death, suicide or homicide.

(4) A Magisterial inquiry under Section 176 of the Code must invariably be held in all cases of death which occur in the course of police firing and a report thereof must be sent to Judicial Magistrate having jurisdiction under Section 190 of the Code.

(5) The involvement of NHRC is not necessary unless there is serious doubt about independent and impartial investigation. However, the information of the incident without any delay must be sent to NHRC or the State Human Rights Commission, as the case may be.

(6) The injured criminal/victim should be provided medical aid and his/her statement recorded by the Magistrate or Medical Officer with certificate of fitness.

(7) It should be ensured that there is no delay in sending FIR, diary entries, panchnamas, sketch, etc., to the concerned Court.

(8) After full investigation into the incident, the report should be sent to the competent court under Section 173 of the Code. The trial, pursuant to the chargesheet submitted by the Investigating Officer, must be concluded expeditiously.

(9) In the event of death, the next of kin of the alleged criminal/victim must be informed at the earliest.

(10) Six monthly statements of all cases where deaths have occurred in police firing must be sent to NHRC by DGPs. It must be ensured that the six monthly statements reach to NHRC by 15th day of January and July, respectively. The statements may be sent in the following format along with post mortem, inquest and, wherever available, the inquiry reports:

(i) Date and place of occurrence.

(ii) Police Station, District.

(iii) Circumstances leading to deaths:

(a) Self defence in encounter.

(b) In the course of dispersal of unlawful assembly.

(c) In the course of affecting arrest.

(iv) Brief facts of the incident.

(v) Criminal Case No.

(vi) Investigating Agency.

(vii) Findings of the Magisterial Inquiry/Inquiry by Senior Officers:

(a) disclosing, in particular, names and designation of police officials, if found responsible for the death; and

(b) whether use of force was justified and action taken was lawful.

(11) If on the conclusion of investigation the materials/evidence having come on record show that death had occurred by use of firearm amounting to offence under the IPC, disciplinary action against such officer must be promptly initiated and he be placed under suspension.

(12) As regards compensation to be granted to the dependants of the victim who suffered death in a police encounter, the scheme provided under Section 357-A of the Code must be applied.

(13) The police officer(s) concerned must surrender his/her weapons for forensic and ballistic analysis, including any other material, as required by the investigating team, subject to the rights under Article 20 of the Constitution.

(14) An intimation about the incident must also be sent to the police officer’s family and should the family need services of a lawyer / counselling, same must be offered.

(15) No out-of-turn promotion or instant gallantry rewards shall be bestowed on the concerned officers soon after the occurrence. It must be ensured at all costs that such rewards are given/recommended only when the gallantry of the concerned officers is established beyond doubt.

(16) If the family of the victim finds that the above procedure has not been followed or there exists a pattern of abuse or lack of independent investigation or impartiality by any of the functionaries as above mentioned, it may make a complaint to the Sessions Judge having territorial jurisdiction over the place of incident. Upon such complaint being made, the concerned Sessions Judge shall look into the merits of the complaint and address the grievances raised therein.
( साभार लाइव लॉ )

जो भी मैजिस्ट्रेट या एजेंसी पुलिस मुठभेड़ों की जांच करती है , वह इन दिशा निर्देशों का पालन करती है ।

Monday, 31 October 2016

पुलिस एनकाउंटर - एक विचार / विजय शंकर सिंह

भोपाल में एनकाउंटर हुआ । 8 जेल से भागे हुए विचाराधीन कैदियों का पुलिस ने पीछा किया और एक मुठभेड़ में मार गिराया । सामान्य लोग एनकाउंटर का केवल एक अर्थ समझते हैं कि मुठभेड़ में मार दिया गया । पुलिस और सीमा पर होने वाली दुश्मन की मुठभेड़ों को एक ही चश्मे से देखेंगे तो चीज़ें कभी कभी धुंधली दिखेंगी । सेना दुश्मन के क्षेत्र में दुश्मन से भिड़ती है । वहाँ अगर हम नहीं मारेंगे तो शर्तिया मारे जाएंगे । पर पुलिस मारने के उद्देश्य से मुठभेड़ नहीं करती है। उसका काम है अभियुक्त को पकड़ना और पकड़ कर कानून की प्रक्रिया का पालन करना । अब काम अदालत का है । यह भी सही है कि अदालतों में देर होती है, गवाह टूट जाते हैं, लोग गवाही देने नहीं जाते हैं, और मुल्ज़िम बरी हो जाते हैं । पुलिस ने जिसने इतने मेहनत से पता लगा कर मुल्ज़िम पकड़ा वह जब छूट जाता है तो पुलिस के मनोबल पर असर पड़े या न पड़े पर अपराधियों के मनोबल पर असर ज़रूर पड़ता है । कुछ अपराधी इतने दुर्दांत होते हैं कि उनकी गिरफ्तारी संभव भी नहीं होती और गिरफ्तार हो भी गए तो उनके खिलाफ कोई गवाही देता भी नहीं है। तब इलाके के जो लोग ऐसे अभियुक्तों से आज़िज आ चुके हैं वे चाहते हैं कि उनका एनकाउंटर हो जाय । उनके लिए एनकाउंटर एक कानूनी प्राविधान जैसा लगता है । वे अपने तर्क देते हैं कि जो पकड़वायेगा उसे ही मुल्ज़िम, जेल से छूट कर मार देगा । कभी कभी तो मुखबिर पुलिस से यह आश्वासन भी चाहता है कि, वह पकड़वा तो देगा पर वही उसे ठोंक देना । यह एक बेहद सामान्य सी बात मैं जैसा होता था वैसा लिख रहा हूँ । था, इस लिए लिख रहा हूँ, अब जब से मानवाधिकार संगठन, और संचार के साधन , नेट आधरित कैमरे जिसमे आप लाइव सब कुछ दिखा सकते हैं और सैकड़ों की संख्या में खबरिया चैनेल आ गए है तब से यह प्रवित्ति कम या बहुत कम हो गयी है । पुलिस उन अभियुक्तों को गिरफ्तार करने का प्रयास करती है और गिरफ्तार करते समय अगर गोलियों का आदान प्रदान होता है तो उसमे या तो मुल्ज़िम मरता है या पुलिस के लोग या दोनों या हो सकता है कोई भी न मरे । इस प्रकार सैद्धांतिक रूप से यही मुठभेड़ का फलसफा है ।

भोपाल मुठभेड़ के बारे में, जो भी खबरे आ रही हैं वह सभी परस्पर विरोधाभासी है । अखबारों की खबरों के आधार पर इसकी मीमांसा करना उचित नहीं होगा । पर सोशल मिडिया में जिस प्रकार से धर्म के आधार पर इस एनकाउंटर को ले कर ध्रुवीकरण हो रहा है वह शुभ संकेत नहीं है । आज धर्म को ले कर यह ध्रुवीकरण हो रहा है कल यह जाति को ले कर हुआ था कभी उत्तर प्रदेश में । 1980 से 83 तक उत्तर प्रदेस में बहुत अधिक मुठभेड़ें हुयी । उस समय आगरा और कानपुर रेंज का इलाक़ा दुर्दांत दस्यु गिरोहों से पटा पड़ा था । मेरी नयी नयी नौकरी थी । मैं अलीगढ और मथुरा में डीएसपी नियुक्त था  । पुलिस बल पर खूब हमले होते थे । जाति के आधार पर दस्यु गिरोह बँट गए थे और इस जाति की मानसिकता की पैठ पुलिस बल में भी हो चुकी थी । उस समय सरकार भी आज़िज आ गयी थी और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे वीपी सिंह । सरकार ने एक अभियान चलाया था, दुष्ट दलन अभियान । और तब मुठभेड़ें बहुत हुयी थी । मुठभेड़ों के साथ एक बात तय होती है कि हर मुठभेड़ की शिकायत होती है । चाहे वह सच में मुठ भेड़ हो पर उस पर यही आरोप लगता है कि यह फ़र्ज़ी है और पकड़ कर मार दिया । यह मानसिकता आज भी बदली नहीं है । उस समय की मुठभेड़ों के बाद उत्तर प्रदेश के नेता विरोधी दल थे मुलायम सिंह । जिन्होंने सीधे आरोप लगाए कि यह मुठभेड़ें , जान बूझ कर पिछड़ी जाति के लोगों को बदमाश बता कर मारने के लिए की जा रहीं हैं । संयोग से उस समय के सभी बड़े और कुख्यात गिरोह यादवों के ही थे । बाद में जब मानवाधिकार संगठन सक्रिय हुए और लोगों ने शिकायतें की तो इनकी सीआईडी जाँचें शुरू हुयी तो कुछ मुठभेड़ें फ़र्ज़ी पायी गयीं और उनमे पुलिस के ही अधिकारी जिन्होंने मुठभेड़ों में भाग लिया था , जेल गए और हाल तक कइयों की इनमे सजा भी हुयी है ।

ऐसा नहीं ही कि उत्तर प्रदेस पुलिस ही इस मामले में सबसे अधिक निशाने पर रही हो । पर 80 से 84 के काल के बाद यही आरोप पंजाब पुलिस पर लगा कि उसने सिख आतंकवाद के नाम पर निर्दोष सिखों की हत्याएं की । पंजाब ने दस साल का समय आतंकवाद की आग में झुलस कर काटा है । वह एक असामान्य स्थिति थी । वह एक प्रकार का युद्ध काल था । पुलिस ने बहुत सख्त कदम उठाये । स्थिति सुधरी और धीरे धीरे पंजाब सामान्य होता चला गया । पर इसका खामियाजा भी पुलिस ने भुगता । जब पंजाब सामान्य हुआ और उसका उन्माद काल समाप्त हुआ तो फिर बहुत से मुठभेड़ों की शिकायतें हुयी और उनकी जाँचे भी हुयी । जो किसी समय उन मुठभेड़ों के नायक थे वे समाज के खलनायक साबित होने लगे । एक तेज़ तर्रार एसपी जिन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध जम कर लोहा लिया था, वे कई मामलों में हत्या के मुल्ज़िम बने और अंत में उन्हें आत्म हत्या करनी पडी । उस कठिन समय में उनके साथ कोई भी नहीं था । न तो विभाग न सरकार, और न ही किसी समय उनकी विरूदावली गाने वाले लोग । यह स्थिति गुजरात में, उत्तर प्रदेश में , जहाँ जहाँ भी मुठभेड़ें जाचों के घेरे में आयी हैं और फ़र्ज़ी साबित हुयी हैं वहाँ वहाँ ऐसी स्थिति आयी है ।

आज सोशल मिडिया बिलकुल बंटा हुआ है । यह विभाजन बहुत साफ दिख रहा है, बिलकुल ध्रुवीकरण के समान । यह ध्रुवीकरण राजनीतिक दलों को रास भी आता है । यह कोई छिपी बात नहीं रही अब । पर यह बेहद खतरनाक स्थिति है । पुलिस की पीठ थपथपाने वाले लोग, यह भूल जा रहे हैं कि यह चुनाव नहीं है । यह एक घटना है जिसकी जांच अनिवार्यतः होगी । मानवाधिकार आयोग का एक स्थायी निर्देश है, हर पुलिस मुठभेड़ की जांच मैजिस्ट्रेट द्वारा होगी । सीआईडी भी जांच कर सकती हैं । जांच उन समर्थकों के पीठ थपथपाने की संख्या पर नही बल्कि उन सुबूतों पर होगी जो जांच दल मांगेगा । तब केवल पुलिस ही निशाने पर रहेगी । एनकाउंटर अगर फ़र्ज़ी है तो यह न्यायिक हत्या भी है । राजनीतिक दलों के आक्षेप तो दलगत सोच और रणनीति से प्रभावित होते हैं । उन पर बहस करना समय की बरबादी होगी । पर जिन परिस्थितियों में यह घटना हुयी हैं उनमे कई सवाल उठते हैं और उन सवालों का उत्तर बिना गहन जांच के नहीं दिया जा सकता । भोपाल एनकाउंटर सही है या फ़र्ज़ी यह अभी केवल हम अपनी अपनी सोच से अनुमान लगा सकते हैं । सोच , वास्तविकता दिखाने में भी कभी कभी भरमाती है ।  

कुछ मित्र अज़ीब तर्क देते हैं । वे कहते हैं मरे तो आतंकवादी ही है चाहे जैसे उन्हें मारो । उनकी बुद्धि पर तरस खाते मैं सिर्फ यह कहूँगा कि अगर कोई मुल्ज़िम सजा पा भी चुका हो और दुर्दांत आतंकी हो तो भी उसकी हत्या एनकाउंटर के रूप में पुलिस नहीं कर सकती है । यह हत्या ही होगी । और इसकी सजा सिर्फ फांसी ही होगी । फिर ये सब तो अभी विचाराधीन कैदी थे । विचाराधीन कैदी और सज़ायाफ्ता में फ़र्क़ होता है । उनके पास भागते समय हथियार कहाँ से आये । भोपाल एनकाउंटर के अन्य तथ्य अभी सामने आने दीजिये । अभी इस जेल से फरारी और मुठभेड़ पर बहुत सवाल उठ रहे हैं । ऐसी हालत में इसकी निष्पक्ष जांच होना बहुत आवश्यक है । और जाँचें सुबूतों के आधार पर निष्कर्ष पर पहुँचती है  भावुकता और धर्म व जाति के उन्माद के आधार पर नहीं ।

( विजय शंकर सिंह )