Friday, 23 September 2016

न्यूज़ चैनलों से जिम्मेदारी भरा आचरण अपेक्षित है / विजय शंकर सिंह

मुझे कभी कभी लगता है कि जब भी कोई संकट सामने आएगा तो सबसे अधिक गैर जिम्मेदार भूमिका इलेक्ट्रानिक मिडिया की होगी । सनसनी फैलाना इनका उद्देश्य , उन्माद पैदा करना इनकी आदत और घृणा का वातावरण बना देना इनकी फितरत बन हो गयी है । यह यही मना रहे हैं कि युद्ध का गोला कब दगे और ये उसी गोले पर बैठे बैठे  रिपोर्टिंग करने का दावा यह कर दें । फिर चाहे सेना की योजना गोपनीय रहे या न रहे, गोपनीयता भंग होने से योजना भले ही विफल हो जाय और सरकार की भले किरकिरी हो जाय पर इनका दावा पुख्ता रहना चाहिए कि, सबसे पहले इन्होंने ही यह देखा और दिखाया । यह रोग प्रिंट मिडिया में कम है अभी । इसका कारण अख़बार का एक बार छपना और उसका दस्तावेज़ी रूप होना है । मिडिया की जिम्मेदारी सच से रू ब रू कराना है न कि सच को गढ़ना है । कल पाक मिडिया ने ऍफ़ 16 हवाई जहाज को इस्लामाबाद के ऊपर उड़ते देख लिया । जियो टीवी के हामिद मीर का यह ट्वीट जैसे ही छपा  लोग यह कयास लगाने लगे कि युद्ध की शुरुआत हो गयी है । और बिना कान छुए कौवे के पीछे भाग चले । यह पत्रकारिता का परिहास काल है ।

पुलिस की सेवा के दौरान मेरी पत्रकारों से स्वाभाविक मित्रता रही है । एक तो इसका एक कारण यह है कि, पढ़ने और लिखने का शौक़ मुझे है और एक साल तक डीजीपी यूपी का जन संपर्क अधिकारी भी 1995 - 96 में रहा हूँ । वह पद मूलतः प्रेस वार्ता और पत्रकारों को समाचार देने आदि के लिए गठित है । मैं तीन डीजीपी साहबान का पीआरओ था । इस कारण लखनऊ के प्रेस से मेरे सम्बन्ध बहुत अच्छे हो गए थे , जो आज तक बने हुए हैं । इनमे से कई मित्र फेसबुक पर भी हैं और आत्मीय भी हैं । उस समय का जो अनुभव है उस से जब मैं आज मिडिया को तौलता हूँ तो आज का मिडिया सच से रू ब रु कराने और सरकार को सतर्क और सजग करने के बजाय अपुष्ट और भ्रम उत्पन्न करने वाली खबरें परोस रहा है । सभी टीवी चैनलों के ऐंकर्स की भाषा और उनका लहजा आक्रामक ही रहता है । कभी कभी तो लगता है कि लोगों की राय किसी मसले पर न ले कर खुद अपनी राय थोप रहे हैं । यह स्थिति उनके बिरादरी में व्याप्त प्रतिद्वंद्विता के कारण भी हो सकती है और खुद को देशभक्त दिखाने की होड़ भी और मीडिया का मिशन से लाभ के धंधे में परिवर्तित होना भी एक कारण हो सकता है ।

हम एक और बीमारी से गुज़र रहे हैं । वह बीमारी है हर दम सीना चीर कर देशभक्ति दिखाने की बीमारी । जब से यह सरकार आयी है, तब से यह बीमारी अधिक बढ़ गयी है । देशभक्ति , कोई मर्ज़ नहीं है यह एक उदात्त भाव है और कर्तव्य तथा दायित्व है । पर देशभक्ति की मुनादी बार बार पीट कर खुद को देशभक्त जताना भी एक प्रकार की ग्रंथि है । एक बीमार मानसिकता है । यह एक प्रकार के अपराध बोध की अभिव्यक्ति और हीन ग्रंथि का प्रदर्शन भी है । आप की देशभक्ति पर संदेह कौन कर रहा है जो आप उसका प्रमाण पत्र ले कर घूम रहे हैं ? लेकिन कहीं न कहीं ऐसे लोगों के अवचेतन में देश के प्रति कभी समय पर देश के साथ खड़े न होने का अपराध बोध छलछला जाता है, जिस से वे खुद को देशभक्त बताने और दिखाने की होड़ में लग जाते हैं । ऐसे दर्शकों को , भोंपू और प्रोपेगंडा टाइप खबरें और चैनेल अधिक पसंद आते हैं । स्थिति यह हो गयी है कि इस लिहो लिहो के साथ जो नहीं है और जो थोडा रुक कर कुछ पुष्टि करने की बात कर रहा है , या जो अपने विचार स्वातंत्र्य से इनसे विपरीत विचार रख कर बोल रहा है वह देशद्रोही है । क्यों कि वह देश , सत्ताधारी दल और मोदी सरकार के साथ नहीं खड़ा है । देश जब एक व्यक्ति में सिमटता है तो वह अमर्त्य नहीं रह पाता है ।

यह गैर जिम्मेदारी भरा रवैय्या टीवी चैनेल्स पर तो है ही सोशल मीडिया पर भी छा रहा है । अक्सर आप जब किसी महत्वपूर्ण पुल, बाँध या सुरक्षा के दृष्टिकोण से संवेदनशील स्थान पर भ्रमण के लिए जाते हैं तो वहाँ एक बोर्ड लगा होता है, जिस पर लिखा होता है कि यहां फोटोग्राफी करना मना है । पहले रील वाली फ़िल्म चलती थी । डर रहता था किसी ने चेक किया तो उसकी रील निकाल कर फेंक देगा । लोग इस डर से फ़ोटो नहीं खींचते थे । पर अब जब से स्मार्ट फोन और अत्यंत आधुनिक किस्म के कैमरे आ गए हैं तो इन सब बोर्ड्स और चेतावनी का बहुत मतलब नहीं रह गया है । फिर भी सैनिक प्रतिष्ठान, आयुध भांडार आदि स्थानों पर जाना और वहाँ फ़ोटो खींचना भी मना है । न्यूज़ चैनलों की जल्दी से जल्दी ब्रेकिंग न्यूज़ खबरों की तह तक  पहुंचाने की प्रतिद्वन्द्विता ने गोपन और अगोपन का भेद मिटा दिया है । गूगल अर्थ जब आया था तो आप अपने कमरे में बैठ कर दुनिया भर के किसी भी शहर की गलियाँ देख सकते थे । आप उस से संसद भवन और राष्ट्रपति भवन के परिसर में ऊपर से झाँक सकते थे । बाद में इसे सुरक्षा का खतरा मान कर संवेदनशील इमारतों को कैमोफ्लाज कर दिया गया । इसी प्रकार कुछ चैनेल सैन्य इमारतें , उनके ठिकाने आदि इस विस्तार से दिखाते हैं कि उनके दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है । एक चैनेल ने सेना के कैंप का अत्यंत से विस्तार से फ़ोटो दिखा कर उसका वर्णन किया । सरकार को ऐसे फ़ोटो निषेध स्थानों की फोटोग्राफी पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए । यहां तक कि गूगल से भी बात कर के ऐसे चित्रों को ब्लर या धुंधला कर दिया जाना चाहिए ।

आखिर इन सब दिखाने से देश का भला क्या हो रहा है ? एक तर्क यह दिया जा सकता है कि जनता में सरकार और सेना के प्रति भरोसा बढ़ेगा । भरोसा आवश्यक है पर भरोसा बढ़ेगा या नहीं, यह तो नहीं मालुम पर उस प्रतिष्ठान की गोपनीयता भंग होने का खतरा ज़रूर बढ़ जाता है । मिडिया को ऐसे समय में संयम, धैर्य और आपसी प्रतिद्वंद्विता का भाव छोड़ कर उन्माद और हास्यास्पद नाटकीयता से बचना चाहिए ।

© विजय शंकर सिंह

एक कविता... क्या सोच रहे हो, बैठे आज / विजय शंकर सिंह

क्या सोच रहे हो बैठे आज, 
जीवन तो निर्झर जैसा है, 
तेज कभी, जो बहने लगता, 
और कभी , शुष्क हो कर
हिम जैसा जम जाता है.

क्या सोच रहे हो बैठे आज. 
पवन, हिलोर हैं विचार के
मन में आते जाते रहते, 
कुछ ही आह्लादित कर पाते हैं 
शेष तो बस चिंतित कर जाते ।

क्या सोच रहे हो बैठे आज, 
जीवन तो जीना ही है, 
अमृत हो या हो हलाहल, 
साँसों तक तो पीना ही है, 
फिर क्यों न जियें हम हँसते हँसते,

क्या सोच रहे हो बैठे आज, 
आओ अब कुछ बात करो, 
अवसाद जो फैला, दूर करो, 
देखो अब्र, भरा जीवन से, 
हर क्षण मोहित कर जाता है.

क्या सोच रहे हो बैठे आज, 
जीवन कोई संघर्ष नहीं है, 
नहीं है यह कोई युद्ध प्रिये,
यह तो केवल इक मग है,
कभी कठिन और कभी सरल ।

पर चलना तो इस पर ही है, 
तो क्यों न चलें हम हंस हंस कर, 
जीवन एक सरिता है, 
जो बहती ही रहेगी सागर तक. 
अब कुछ मत सोचो, यूं बैठे, 
चलते ही रहो, हँसते ही रहो !!

© विजय शंकर सिंह.

Tuesday, 20 September 2016

एक कविता .... सुनो , तुम्हे याद है न / विजय शंकर सिंह

वो कुछ वादे थे, 
कुछ तुम्हारे इरादे थे, 
बेहद आत्मविश्वास के साथ, 
पूरे मुल्क में घूम घूम कर, 
कहा था तुमने ।

हम भी थोडा ऊबे हुए थे, 
तुम भी उघाड़ उघाड़ कर, 
उनकी असलियत बयाँ कर रहे थे, 
निज़ात हम भी उनसे पाना चाहते थे ।

तुम थोडा साफ़ दिखे, 
तुम्हारे इरादे भी नेक लगे, 
वादों ने भी मन मोहा, 
मशविरा भी लोगों ने दिया ।

वर्तमान वैसे भी सदैव, 
छली ही दीखता है, 
दूर क्षितिज पर, 
कुछ उजास भी झाँक रहा था, 
बयार भी सुखद थी ।

वक़्त के करवट बदलने की आहट, 
कहीं कहीं सुनाई दे रही थी, 
और उस बज़्म में, 
तुम्ही सुन्दर और अवतारी लगे 
बस तुम्हे ही कन्धे पर बिठा लिया हमने !

भीड़ और मुसीबत में , 
जब नहीं सूझती हैं राहें, 
हज़ार बातें आती हैं दिमाग में, 
छल भी तो मूर्तिमान हो जाता है ?
छली भी तो भरोसा जीत जाते हैं ।

अब एक बात सुनों , 
उन वादों को टटोलो ज़रा, 
जो उम्मीदें जगा दी थी तुमने, 
उन उम्मीदों की फेहरिस्त भी देखना 
जब बैठना अपने ख्वाबगाह में, 
और जब सारे दर, दरीचे बन्द हों 
खो कर खुद में , पूछना खुद से ।

उन अक्षरों का क्या हुआ, 
उन शब्दों का क्या हुआ, 
उन वाक्यों का क्या हुआ, 
उन वादों का क्या हुआ, 
और सुनो, 
उन इरादों का क्या हुआ, 
जिन पर तैरते हुए, 
उस बढ़ियाई गंगा को पार कर, 
यहां तक पहुंचे हो तुम !!

© विजय शंकर सिंह
21 / 09 / 2016

Saturday, 17 September 2016

एक कविता, ज़रा पूछना वक़्त से / विजय शंकर सिंह

कभी उन पर भी करम हो ,
कभी उन पर भी तरस खाइये
कभी वे भी तो मुस्कुराएं
कभी उन्हें भी तो बुलाइये !

वक़्त ने कितने सितम ,
उनको भी तो दिखाएँ हैं .
ज़ख्म धूप ने दिए हैं कितने
फिर भी वे टूटे न झुके
और न भुलाया तुमको !

गर्दिश ए दौराँ ने,
मुश्किल वक़्त के फलसफे ने,
जो रंग दिखाए हैं उन्हें,
कितने जज़्बात,
और लम्हात कितने,
हो गए हैं दफ़न , उनके
दिल के तहखाने में ।

सोचा है कभी , तुमने
गुना है कभी उनको।
रात जब वीरान हो,
हवा जब तुम्हे छू छू कर
सरसराहट सी कहे कुछ,
पूछना, एकांत के इन पलों में
अतीत के सारे सवालों को !

वक़्त बताएगा, तुम्हे सब !
सारे सवालों के जवाब ,
तह कर रखे हैं उसने ।
वह लाजवाब कर देता है,
लाजवाब होता नहीं दोस्त !

( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 14 September 2016

राजा बलि, वामन अवतार और केरल का महापर्व ओणम - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह

आज ओणम हैं। हम उत्तर भारतीयों के लिये यह एक अनजाना पर्व हो सकता है पर केरल के लिए यह वैसा ही पर्व है जैसा पंजाब के लिए बैसाखी या बिहार के लिए छठ । यह किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष का पर्व नहीं है । यह सांझी विरासत और पूरे समाज का पर्व हैं। भारतीय संस्कृति एक पर्व प्रधान संस्कृति रही है । हर्ष और उल्लास इसका मूल भाव रहा है । इहलोक में आनंद और परलोक में परमानन्द की सतत खोज इस संस्कृति की परम्परा रही है । हर समाज , चाहे वह आटविक समाज हो, या नागर सभ्यता या ग्रामीण समाज सबके अपने अपने पर्व है । उल्लास, उमंग , हास और परिहास की अभिव्यक्ति के अपने अपने तरीके हैं । ओणम भी इसी प्रकार का पर्व हैं। नवधान्य घर में आता है । अन्नम् ब्रह्म । अन्न ब्रह्म होता है । किसान का कोठिला भरा रहे , इस से बड़ा सुख उसके जीवन में नहीं होता है । यह पर्व फसल के आगमन का भी है । पर इसके साथ एक कथा भी जुडी हुयी है । कथा , वेदों के काल को स्पर्श करती हुयी भारतीय सनातन धर्म की अवतारवाद की परम्परा को प्रमाणित करती हुयी , इस पर्व से जुडी हुयी है । साथ ही हाल ही में इस पर्व के साथ एक विवाद भी जुड़ गया है  उस अनावश्यक विवाद की चर्चा भी होगी पर पहले उन कथाओं को पढ़ें जो इस पर्व के साथ जुडी हुयी है ।

देव और असुर, या सुर या असुर के आपसी संघर्षों पर वेदों की अनेक ऋचाएं है । ऋग्वेद के सप्तम मंडल में देवासुर संग्राम का विवरण है । इंद्र देवराज हैं और उनकी स्तुति से वैदिक ऋचाएं भरी पडी हैं । देव आर्य थे और असुर अनार्य इस पर अलग अलग दृष्टिकोण है । कुछ का कहना है कि सुर आर्य थे और असुर अनार्य सभ्यता के थे । यह दो सभ्यताओं का संघर्ष रहा है । इस संघर्ष में बल छल सब का यथा स्थान और यथासंभव प्रयोग हुआ । आर्य इस संघर्ष में विजयी हुए और अनार्यों ने आर्य संस्कृति को अपना लिया फिर भी असुर या अनार्य संस्कृति की जड़ें गहरी थीं  जो आज भी बची हुयी हैं । सब कुछ अपनाने के बाद भी वे कहीं न कहीं शेष रह गयीं । उन्ही असुरों में एक राजा थे राजा बलि । उन्हें महाबली भी कहा जाता है । महा बलि हिरण्यकश्यप के प्रपौत्र और प्रह्लाद के पौत्र थे । यह वही प्रह्लाद हैं जिनको इनके पिता हिरण्यकश्यप ने , विष्णु की पूजा करने के कारण , अपनी बहन होलिका के गोद में बैठा कर, जला कर मारने का प्रयास किया था, पर अप्रज्वलित होने के आशीर्वाद से कीलित होने के बाद भी , होलिका तो जल गयी पर प्रह्लाद जीवित बच गए । फिर प्रहलाद को हिरण्यकश्यप ने एक खम्भे से बाँध दिया और चुनौती दी कि विष्णु को बुलाओ कि वह आ कर तुम्हे बचाये , तभी विष्णु का नृसिंहावतार हुआ और जिसने हिरण्यकश्यप का बध कर दिया । यह कथा भी सुर असुर संघर्ष की ही एक गाथा है ।

महा बलि इन्ही प्रह्लाद के पौत्र थे । पुरा कथाओं के अनुसार माह बलि ने तीनों लोकों को जीत लिया था । असुर साम्राज्य का यह शिखर काल था । सुर , इनसे युद्ध में जीत नहीं पा रहे थे । असुरों के गुरु शुक्राचार्य के सक्षम गुरुत्व में बलि की कीर्ति बढ़ती जा रही थी । उन्हें युद्ध में पराजित नहीं किया जा सकता है, यह देवगण जान गए थे । उन्होंने विष्णु से इस असुर प्रभुत्व से निपटने के लिए प्रार्थना की । यहॉँ एक अन्य कथा आती है । ऋषि कश्यप के दो पत्नियां थीं, दिति और अदिति । दिति से जो वंश चला वह असुर कहलाया और अदिति की संतति सुर कहलायी । कश्यप ऋषि ने ही अदिति को सुझाव दिया कि, वह विष्णु की आराधना करे और उनसे यह वर मांगे कि वह सुरों को असुर राजा बलि से मुक्ति दिलाएं । विष्णु ने इस आराधना पर प्रसन्न हो कर, अदिति को वचन दिया कि वह देव संतति की सहायता करेंगे । एक और कथा जुड़ती है इस से । इस क्षेपक के अनुसार, राजा बलि को अपने ऐश्वर्य और समृद्धि का अहंकार हो गया था और वे समस्त पृथ्वी पर स्वयं को अजेय समझने लगे थे । वे दान देने लगे और कोई भी याचक उनके दरबार से रिक्त हस्त नहीं जाता था । उधर विष्णु ने अदिति के गर्भ से जन्म लिया और वे वामन अवतार के रूप में जाने गए । शुक्राचार्य के परामर्श के अनुसार राजा बलि ने, नर्मदा के तट पर भृगुचम नामक स्थान पर अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया और उन्होंने यह यज्ञ देवलोक के राजा इंद्र को पराजित करने के उद्देश्य से किया । उसी यज्ञ के बाद बलि ने घोषणा और प्रतिज्ञा की कि, अब वे जो भी कोई याचक मांगेगा, देंगे और कोई भी याचक उनके द्वार से रिक्त हस्त वापस नहीं जाएगा । विष्णु ने वामन रूप धरा और याचक के रूप में उनके दरबार में पहुंचे । वामन का रहस्य बलि को ज्ञात नहीं था । वामन ने कहा ,
" मुझे कुछ भी नहीं चाहिए । बस मैं अपने कदम से तीन कदम नाप  कर भूमि लेना चाहूँगा महा बलि । '"
शुक्राचार्य यह रहस्य समझ गये थे । उन्होंने बलि से कहा कि
" यह सामान्य याचक नहीं हैं बल्कि विष्णु ही हैं । यह छल से तुम्हे जीतने आये हैं । उन्हें दान में याचित भूमि देने की आवश्यकता नहीं है । "
बलि ने कहा,
" जो मैंने दान में देने का संकल्प किया है वह अटल है । यह ब्राह्मण वामन जो भी मांगेगे वह उन्हें प्रसन्नता से दूंगा । मैं बचन भंग का दोषी नहीं बनूँगा । "
शुक्राचार्य के बहुत समझाने पर भी बलि नहीं माने और उन्होंने आगे कहा,
" हर व्यक्ति की जैसे दो आँखें होती हैं वैसे ही प्राण और मान भी ,जीवन के दो आधार होते हैं । अगर इनमें से प्राण चला भी जाय तो मान को तो बचाना ही चाहिए । प्राण को तो जाना ही है । इस संसार में अमर कोई भी नहीं है । पर मान तो शाश्वत है । मैं तो सौभाग्यशाली हूँ कि स्वयं विष्णु मेरे समक्ष याचक भाव से आये हैं । उनकी याचना पूरी कर के मुझे परम आनंद की प्राप्ति होगी । "
इतना कह कर उन्होंने अपने गुरु की सलाह न माने जाने पर असमर्थता व्यक्त करते हुए अपने गुरु शुक्राचार्य से क्षमा मांगी । फिर उन्होंने वामन से तीन कदम चलने और भूमि लेने का आग्रह किया । विष्णु ने एक कदम से स्वर्ग और दूसरे कदम से भूतल को नाप लिया और बलि के कहने पर तीसरा कदम उनके सिर पर रख दिया । विष्णु ने बलि का सारा साम्राज्य ले लिया । यह दानवीरता के संकल्प की पराकाष्ठा थी या विष्णु का छल या उनकी कृपा, इस पर हम सब अलग अलग तरह से ही विमर्श कर सकते हैं । विष्णु ने बलि को सुतल नामक पाताल में भेज दिया । सुर एक साम्राज्य और जीत गए । विष्णु का कदम जहां पड़ा, कहते हैं वहाँ जो गाँव है, उसका नाम है, थ्रिक्कक्करा है । जिसका शाब्दिक अर्थ पवित्र चरण है । वहाँ आज भी मंदिर है और वहाँ इस अवसर पर ओणम का मुख्य उत्सव भी मनाया जाता है । निर्वासित राजा बलि ओणम के अवसर पर अपनी पूर्व प्रजा जिनमे वे बहुत ही लोकप्रिय भी थे , का कुशल क्षेम लेने इसी अवसर पर आते हैं । ओणम इसी लिए केरल में मनाया जाता है और यह केरल का महापर्व है ।

इसके अतिरिक्त एक और कथा ओणम के बारे में मिलती है । वह कथा परशुराम से सम्बंधित है । कहा जाता है परशुराम ने अपना परशु फेंक कर केरल की भूमि को सागर से मुक्त कराया था और जिस दिन यह भूमि मुक्त हुयी उसी दिन यह पर्व मनाया जाता है । पर परशुराम की यह कथा उतनी प्रचलित नहीं है जितनी बलि और वामन अवतार की कथा है ।

महा बलि न केवल एक प्रतापी राजा थे बल्कि वह द्रविड़ सभ्यता के पुरोधा भी थे । इनके काल में जनता बहुत समृद्ध और खुश हाल थी   वह लोकप्रिय भी थे । इसी कारण सुर उनसे चिढ़ते रहते थे । विष्णु के ब्राह्मण वामन अवतार द्वारा दान में भूमि लेने को आर्यों का छल भी द्रविड़ सभ्यता में माना जाता है । आज भी ओणम के अवसर पर तटीय मालाबार के इलाके में ओणम के चार दिवसीय उत्सव में बलि की प्रशंसा में ढेरों गीत और स्वांग किये जाते हैं । वामन अवतार की कथा में बलि का ही चरित्र उभर कर सामने आता है । युध्द में जो अपराजेय रहा उसे देवताओं ने छल और छद्म से जीत लिया । देवासुर संग्राम में छल बल के अनेक आख्यान पुरा वांग्मय में भरे पड़े हैं । यह भी उनमे से एक है ।

पेरियार ईवी स्वामी नायकर के समय द्रविड़ आंदोलन बहुत ज़ोरों से चला था । था तो यह दलितोत्थान के सम्बन्ध में पर इसकी जड़ में आर्य सभ्यता और ब्राह्मणवाद का विरोध ही था । एक समय तो यह आंदोलन इतना लोकप्रिय था कि अलग द्रविड़ राज्य की मांग भी उठने लगी थी । पर उस आंदोलन का असर केरल में उतना नहीं था जितना तमिलनाडु में हुआ था । उस समय 1940 में,  स्वामी धर्म तीर्थ ने एक पुस्तक लिखी थी The History of Hindu Imperialism . हिन्दू साम्राज्यवाद का इतिहास । इस पुस्तक मैं यह लिखा गया कि राजा बलि की दानवीरता के गुण की उपेक्षा कर के वामन अवतार को कैसे महत्वपूर्ण बताया गया और बलि की धरती पर ही बलि के आगमन के उत्सव को कैसे वामनावतार के आगमन से जोड़ा गया । अब यही विवाद केरल में आरएसएस ने पैदा किया है । आरएसएस के लोगों का कहना है कि ओणम विष्णु के अवतार वामन के आगमन के उपलक्ष्य में आयोजित होता है जब कि वहाँ के अब्राह्मण समुदाय का मानना है कि राजा बलि अपनी प्रजा का कुशल क्षेम लेने के लिए इस इस अवसर पर आते हैं , अतः बलि के आगमन के अवसर पर यह पर्व मनाया जाता है । वामन बन के विष्णु ने तो छल से बलि के राज्य का अधिग्रहण कर लिया था ।

दुर्भाग्य से पहली बार राजनितिक दखलंदाज़ी से केरल का यह महापर्व ओणम, विवाद से घिरता हुआ दिख रहा है । अब इस त्योहार के माध्यम से केरल में बलि बनाम वामन की पटकथा लिखी जा रही है । कुछ इसे वामन अवतार के उद्भव के रूप में वामन को महिमामंडित कर आर्य और ब्राह्मण संस्कृति के उदय के रूप में मना रहे हैं तो अधिकांश मलयाली समाज इसे राजा बलि की याद में मनाता है । राजा बलि ने वर्ग और वर्ण विहीन समाज की स्थापना की थी जो आर्य सभ्यता के आने के बाद समाप्त हो गयी ।  इस पर्व के साथ विवाद यूँ जुड़ा कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस पर्व को वामन जयंती के रुप में मनाये जाने की शुभकामनाएं केरलवासियों को दी । जब कि वामन का जन्म या अवतार इस अवसर पर नहीं हुआ था । अतः धार्मिक आख्यान के अनुसार भी शुभकामना में वामन जयंती का उल्लेख करना तथ्यपूर्ण नहीं है । मूलतः यह नयी फसल के आने का उत्सव और महान असुर राज महाबलि के प्रति केरल की जनता का प्यार और समर्पण है । अतः बलि और वामन का यह विवाद अनावश्यक है । समाज उत्सव के रूप में आनंद को अभिव्यक्त करता हैं । समाज जब उसे स्वार्थ और राजनीतिक कारणों से बंट कर मनाने लगता है तो, वह उत्सव,  उत्सव के आनन्द भाव से दूर हो जाता है । केरल में यह सामाजिक समरसता का पर्व अब राजनीतिक अखाड़े में बदल रहा है । यह उचित नहीं है और दुःखद है ।

( विजय शंकर सिंह )

Friday, 9 September 2016

A Poem The Patience / Vijay Shanker Singh


I spread my palms jointly
Extended it like a blooming lotus
I put the blooming palm under your chin
The tearful face of yours
Looking like a wet heavenly bloomed but sad flower
Aah dear.
How it is terrible to see drops of salty droplet
I close my palm and
Wipe the path of salty droplets.
I clean your eyes
Peep inside it.
The face illuminated like a moon
Who has just been freed from
The clutches of devil clouds.
Aah darling.
Life is a strange boat in a vast ocean
The tide and the waves of the hostile sea
Is roaring like a wild beast.
Hold my hand
Hold me tightly,
Sit in the boat .
Aah the wind is getting slow
The waves are becoming calm.
Smile , just smile my dear.
The shore is coming near and near.
' The tide and time wait for none.'
But they never remain forever.
' Tough people last but tough time never !!'
- vss.

Wednesday, 7 September 2016

एक कविता...... ख़्वाब / विजय शंकर सिंह

कुछ शब्द गीत बन रहे,
भाव स्वर में ढल रहे,
नयन कुछ कह रहे ,
मन में कुछ उमग रहा ।

कुछ फूट पडा अधरों से,
बिखर गयी केश राशि
नींद आँखों में आयी थी,
वह फिर कहीं खो गयी ।

दूर कहीं,  गजर बजा,
फूट पड़े  स्वर सारे,
खुल गए, वातायन सब,
एक एक कर यादों के ।

रात भर ख्वाब आते रहे !
रात भर ख्वाब जाते रहे !!

© विजय शंकर सिंह.