Monday, 23 November 2015

एक बतकही / विजय शंकर सिंह


एक मित्र ने आज एक ज्ञान देते हुये कहा.
" जानते हैं , सर, टमाटर खाने से पथरी होती है . "
मैंने कहा,
" मेडिकल साइंस में अधिक दखल नहीं है मेरी. पर लोग तो कहते हैं कि टमाटर से खून साफ़ होता है और रक्त बढ़ाता है. "
उन्होंने कहा, 
"यह एक शोध के आधार पर आप को मैं यह बता रहा हूँ. मैं वह जर्नल आप के पास भिजवा दूंगा. "
मैंने उन्हें उत्तर दिया,
" मुझे साइंस के जर्नल और लेख बोरिंग लगते हैं. मुझे कौन सी टमाटर की दूकान खोलनी है.जाने दीजिये, मुझे सलाद वैसे भी पसंद नहीं है. घर में सूप वगैरह का भी बहुत चलन नहीं है। सूप उसका मुझे पसंद भी नहीं है. मुझे चिकन सूप पसंद है. आज कल चिकेन दाल से भी सस्ता हो गया है. आप तो शायद खाते नहीं है ? "
थोडा गर्व से उन्होंने कहा,
" मैं तो शुद्ध शाकाहारी हूँ. मांस , मदिरा का सेवन नहीं करता. आप भी अब धीरे धीरे मीट मुर्गा खाना कम कर दीजिये. "
उनका शाकाहारी अहंकार उनकी आँखों में झाँकने लगा था. मुझे भी उर्दू के शेर का एक मतला , ' हाय कमबख्त, तूने पी ही नहीं है ! ' याद आ गयी. मन ही मन उस महान शायर से माफी मांगते हुए इसे ' हाय कमबख्त तू ने खाया ही नहीं है ' से संशोधित कर दिया. वैसे आज कल कट पेस्ट एडिट अन डू का युग है. फिर मैंने कहा ,
" मदिरा तो मैं वैसे भी नहीं लेता, हालांकि मदिरा तो शाकाहार का शुद्धतम रूप है. आसुत है. पर बढ़िया और लज़ीज़ खाने का शौक़ है. और मेडिकली भी कोई परहेज वाली बात नहीं है. इस लिए नॉन वेज भोजन पसंद है. बरात आदि में मैं नॉन वेज ढूंढ कर ही खाने या न खाने का निर्णय करता हूँ. "
फिर भी उन्होंने टमाटर कम खाने की सलाह दुबारा दे डाली.
यही मित्र दो महीने पहले यह सुझाव दे गए थे, कि अरहर की दाल खाने से बादी होती है, और जोड़ों में दर्द भी होने लगता है !!
उनके जाने के बाद मैं देर तक सोचता रहा कि दाल भात तो हम होश संभालते ही खाते आ रहे हैं. पर बादी की शिकायत तो हुयी नहीं. सारे लज़ीज़ व्यंजनों के बावज़ूद आज भी अरहर की दाल, चावल और घी , सब्ज़ी न हो तो अचार ही सही, सबसे पसंदीदा भोजन है.
- vss.

मुलायम सिंह यादव का जन्म दिवस समारोह - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह




मुलायम सिंह जी, आप को जन्मदिन की कोटिशः शुभकामनाएं !! आप दीर्घजीवी हों. स्वस्थ और सानंद रहें, यह मेरी मंगल कामना है.

आप के जन्म दिन का जश्न टीवी पर और अखबारों में देखा. आप के गाँव के उन बुज़ुर्गों को जिन्होंने आप का बचपन और किशोरावस्था देखा होगा, यह जश्न देख कर कैसा लगा होगा, इसका कुछ अनुमान लगाने की मैं कोशिश कर सकता हूँ. धरती से जुड़े व्यक्तित्व जिसे जिस किसी ने भी धरती पुत्र का नाम दिया है, वह इस आकाशीय और दिव्य जन्म दिन समारोह के अवसर पर उपस्थित है या नहीं मुझे नहीं पता. पर उसके चिंतन में आप के इस राजसी वैभव युक्त समारोह को लेकर कोई परिवर्तन तो ज़रूर ही आया होगा. आप एक धुर समाजवादी थे. दावा आज भी आप यही करते हैं. नाम से तो है हीं. आप ने किशोरावस्था में नहर रेट बढ़ने को लेकर आंदोलन किया था और जेल गए. लोहिया ने आप को प्रभावित किया। आंदोलन और जुझारूपन आप के विशिष्ट गुण है. राम जन्म भूमि आंदोलन के दौरान जो आप ने मुख्य मंत्री रहते झेला इसे सभी जानते हैं. आप के समर्थक भी और आप के अधिकारी भी और आप के विरोधी भी . आप मौलाना, मुल्ला, आदि उपाधियों से नवाज़े गए. निजी संबंधों को आप निभाते भी है और निभाना जानते भी हैं. इन सब गुणों और विशेषताओं के बावज़ूद , आज आप के जन्म दिन का उत्सव और इसका ठाठ मुझे अखर रहा है. यह आप की मौलिक विचारधारा, समाजवाद , जो आप को घुट्टी में मिली थी के बिलकुल प्रतिकूल है. बेमेल है.

गोरख पाण्डेय की कविता , समाजवाद , बबुआ धीरे धीरे आई. बहुत याद आ रही है. पर वह हांथी , घोड़े से आने के बजाय हवाई जहाज से भी समाजवाद के तीर्थ सैफई में उतर रही है , यह मुझे अब पता चला है. 50 ज़िले जिस प्रदेश में सूखा ग्रस्त घोषित हों, सालों से गन्ना किसानों का बकाया देना बाकी हो, विकास का अर्थ ही जब केवल बिल्डर लॉबी का विकास बन गया हो, समाजवाद का अर्थ ही जब अपने जाति समाज का विकास हो गया है, विकास का केंद्र विन्दु ही जब सिर्फ अपना गाँव, अर्जुन के चिड़िया के आँख के कथा के अनुसार ही दिख रहा हो, तब समाजवाद पर लिखी गयी बड़ी बड़ी पुस्तकें और 9 खण्डों का लोहिया समग्र तथा बहु खंडी लोकसभा में लोहिया , जैसी पुस्तकों के दिल पर क्या बीतती है , इसका अनुमान मैं आसानी से कर सकता हूँ. जब तक एक भी परिवार प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे है, तब तक इस तरह के चमक दमक भरे आयोजन , वह भी तब जब आप के दल की सरकार हो, चाहे सरकारी धन से आयोजित हों या किसी व्यक्ति के निजी अंशदान से, एक अपराध है. आप मुझ से असहमत हो सकते हैं पर मेरा यही मानना है.

धूमिल बनारस के एक अत्यंत प्रतिभावान कवि रहे है. उनके साथ थोडा बहुत मेरा भी उठना बैठना रहा है. युवावस्था में ही वह चले गए. पर उनकी कवितायें आज भी बहुत याद आती हैं. दो कविताओं के अंश नीचे दे रहा हूँ, शायद आप को पसंद आये. यह समाजवाद पर तंज़ है.

" प्रजातंत्र और समाजवाद , का
यह कौन सा नुस्खा है कि,
जिस उम्र में मेरी माँ का चेहरा,
झुर्रियों की झोली बन गया था ,
उसी उम्र में,
देश के प्रधान मंत्री के चेहरे पर,
मेरी प्रेमिका का लोच है ! "
- यह कविता इमरजेंसी के दौरान , इंदिरा गांधी के ऊपर लिखी गयी थी. मित्रगण झोंक में इसे मोदी जी से न जोड़ लीजियेगा और फिर नून सतुआ ले कर मेरे पीछे पड़ जाइयेगा !!

" समाज वाद,
माल गोदाम में लटकी हुयी,
बाल्टियों की तरह है ,
जिन पर लिखा तो आग है,
पर भीतर, बालू और पानी भरा है "

एक और पढ़ें , यह इस आयोजन पर थोडा सटीक लगेगा..
" जनता, अपने देश की जनता,
उस भेड़ की तरह है ,
जो दूसरों की ठण्ड के लिए,
अपनी पीठ पर
उन की फसल ढोती है. "

हम सब अपनी अपनी पीठ पर ऊन की फसल ढो रहे है. आप और आप के क़बीले के लोगों द्वारा दिखाए गए बाज़ीगरी वादों में खिंचे चले जा रहे हैं. साहिर की बेहद लोकप्रिय नज़्म, वह सुबह कभी तो आयेगी, की उम्मीद में वाबस्ता हम आप को जन्म दिन की शुभकामनाएं दे रहे है. आज रात जब सारे मेहमान विदा हो जाएँ, तो ऐश्वर्य से युक्त अपने ख्वाबगाह में जब आप अकेले हों तो सोचियेगा 75 साल के इस बहुरंगी सफ़र के बारे में . लोहिया के चित्र को भी देखिएगा. चश्मे के भीतर से झांकती उनकी संघर्षशील आँखों में क्षोभ है, रोष है, घृणा है या आशीर्वाद है. या है सिर्फ एक पथराया समाजवाद ?
( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 14 November 2015

पेरिस हमला 13 / 11 / 15 - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह


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फांस के खूबसूरत शहर पेरिस में जो आतंकी हमला इस्लामी स्टेट के आतंकियों द्वारा किया गया है, वह उसी मानसिकता , और पागलपन का दुष्परिणाम है , जो अपने ही धर्म को न केवल सबसे बेहतर मानता है,  बल्कि यह अपेक्षा भी करता है कि सभी उसके धर्म या  मजहब को मानें . जो उसे नहीं स्वीकार करते हैं , उसके पैगम्बर को नहीं मानते हैं , वे या तो त्याज्य हैं या हन्य हैं . यह मानसिकता एक ऐसे पड़ाव पर ला कर खड़ा कर देती है, जहां धर्म जो मूलतः नैतिक मूल्यों  के सरंक्षण और संवर्धन के लिये परिकल्पित हुआ था, अंततः उन्ही मूल्यों  के लिए ख़तरा बन जाता है .

पेरिस हमला, पहला आतंकी हमला नहीं है, और न ही यह आखिरी हमला होगा. यह दुखद, निंदनीय . और मानवता पर हमला है. आदि आदि. थोड़ा गुस्सा, थोड़ी शिकायत , ढेर सारा आक्रोश जैसे सागर  में  ज्वार आता है, आएगा और फिर  शांत हो जाएगा. मुम्बई हमले के साथ भी ऐसा हुआ था ,  और ऐसे हमले  अब आगे नहीं होंगे , इसकी कोई गारंटी भी नहीं है . आतंकवाद का भले ही कोई धर्म न हो , पर अधिकतम आतंकी घटनाएं इस्लाम धर्म से जुडी हैं. चाहे वह इजरायल फिलिस्तीन संघर्ष से उपजा संकट हो, या अफगानिस्तान में नाटो और रूसी कूटनीतिक प्रतिद्वंद्विता जिसका बीजारोपण , द्वीतीय विश्व युद्ध के बाद हुए , शीत युद्ध के दौरान हुआ था, या पाकिस्तान की कश्मीर को हड़पने और , भारत को अस्थिर करने की साज़िश, या मध्य पूर्व के तेल के कुओं का आकर्षण या उनके धनादोहन की लालसा हो , सब की रणनीति में आतंकवाद जन्मता और पलता , पनपता रहा है और इस्लाम चाहे या अनचाहे इसे पोसता भी रहा है. कुछ इस का कारण सेमेटिक धर्मों की आपसी प्रतिद्वंद्विता भी हो सकती है. इसके साथ क्रुसेड्स का इतिहास भी नत्थी कर के देखा जा सकता हैं. पर चाहे जिस भी कोण से देखें इसमें इस्लाम या मुस्लिम आतंकवाद ज़रूर दिखेगा.

वह स्थिति बहुत असहज कर देती है, जब हम अचानक अपने सहधर्मियों के किये उन पापों और अपराधों के कारण स्वयं को केवल समानधर्मी होने की वजह से निशाने पर पाते  हैं. धर्म का प्रेत इतना भीतर पैठ गया है  कि हम अपने धर्म की निंदा भी नहीं कर पाते हैं और उसे डिफेंड भी करना चाहें तो मुश्किल ही होती है. फिर हम एक वाया मिडिया निकालते हैं. और यह कह कर इस धर्म संकट से मुक्त होने की कोशिश करते हैं कि हत्यारे या कुकर्मी किसी धर्म के नहीं होते है. मैंने अपने सेवाकाल में, सिख आतंकवाद के दौर में कुछ सिख मित्रों के चेहरे पर ऐसा अयाचित अपराध बोध देखा था..  धर्म और ईश्वर की बेबसी भी साफ़ झलक उठती है. मैं जिस सेवा में रहा हूँ उसमे अपराध करने वालों से बहुत सामना होता है. अपराध एक मनोवृत्ति है. और यह मनोवृत्ति कभी भी किसी को भी संक्रमित कर सकती है. लेकिन शौकिया अपराध कब प्रोफेशनल और हार्ड कोर हो जाता है , पता भी नहीं चलता. जैसे आज कहा जाता है आतंक का कोई धर्म नहीं होता है वैसे ही यह भी कहा जाता है कि अपराध का भी कोई धर्म या जाति नहीं होती है. दरअसल आतंक और अपराध कोई व्यक्ति नहीं है, वह प्रवित्तियां हैं. प्रवित्तियां धर्म और जाति में बँटी नहीं होती हैं. व्यक्ति , धर्म और जाति के कठघरे में सिमटते हैं. इसी लिए आतंक का कोई धर्म न होते हुए भी आतंकवादी व्यक्ति और समुदाय का एक धर्म विशेष तो होता ही है। आतंकवादी व्यक्ति और समुदाय अपने धर्म के प्रति श्रद्धा रखे या न रखे, पर वह धर्म के प्रति श्रद्धा भाव का प्रदर्शन बहुत करता  है. बल्कि आम धार्मिक श्रद्धा रखने वाले मासूम जन की तुलना में वह खुद को ईश्वर का सबसे प्रिय और धर्म पर अतिरिक्त आस्था रखने वाला प्रदर्शित करता है. हत्याओं के बीच लगने वाले ईश्वर के समर्थन में नारे, या हत्या के बाद या अपराध के बाद, की जा रही प्रार्थना या नमाज़ें , ईश्वर द्वारा सौंपे गए वह कृत्य जो अभी अभी उन्होंने संपन्न किया है, के प्रति आभार प्रदर्शन है या उस अपराध बोध का भाव , यह अनुमान ही लगाया जा सकता है. पर ऐसे तत्व उस धर्म का सबसे अधिक अहित करते है, जिनके नाम पर वे निर्दोष व्यक्तियों का खून बहाते रहते हैं. 

असल समस्या धर्म या ईश्वर नहीं है. असल समस्या इसके साथ जुड़ा पाखण्ड है. असल समस्या इसके साथ जुड़ा अर्थ तंत्र है। धर्म के साथ जुड़ा अर्थशास्त्र , वैसे तो शुरू हुआ कुछ लोगों के पालन पोषण के लिए पर कालान्तर में यह यह सुनियोजित अर्थतंत्र हो गया। इस्लाम में धर्म और राज्य एक ही है. इस लिए जहां धर्म के विस्तार के लिए नैतिक प्रवचनों या दर्शन की आवश्यकता होती है, वहाँ राज्य के विस्तार के लिए, हिंसा और युद्ध अनिवार्य है. अतः धर्म और राज्य का विस्तार एक साथ ही हुआ। खलीफा के संस्था का गठन इसी लिए हुआ था. खलीफा राज्य के प्रमुख के साथ साथ धर्म का भी प्रमुख भी होता था. यह इस्लाम की मौलिक ताक़त भी है और उसकी कमज़ोरी भी. इस तरह यह धर्म का रेजीमेंटेशन भी है.

जो धर्म , समाज और परिवार रेजिमेंटल परम्परा से प्रभावित होता है वहाँ सहिष्णुता का स्वागत नहीं बल्कि उसे हतोत्साहित किया जाता है . जैसे सेना या पुलिस बल हैं , इनका आधार ही आदेश और अनुशासन है . जैसे जैसे आदेश पर प्रश्न चिह्न उठने लगते हैं , वैसे वैसे ही अनुशासन मसकने लगता है . फिर वही सैन्य बल एक मध्ययुगीन गिरोह में बदल जाता है . और उसका पतन प्रारम्भ हो जाता है . लेकिन सैन्य  बल और पुलिस समाज के विकृत हो रहे रूप को नियंत्रित करने के लिए अवधारित किये गए हैं . कल्पना कीजिए जिस दिन , राज्य प्रसार , अधिकार मद , और सब कुछ का नियंता मैं हूँ , का भाव समाप्त हो जाएगा उसी दिन सेना की आवश्यकता भी समाप्त हो जाएगी . इसी प्रकार जब समाज में अपराध का जन्म हुआ तो पुलिस की अवधारणा हुयी . जिस दिन समाज से ये दोनों प्रवृत्तियाँ समाप्त हो जाएंगी , उस दिन न सेना होगी न पुलिस . लेकिन यह असंभव है . यह एक युटोपिया है .

इसी प्रकार समाज में जब बौद्धिक प्रगति होने लगी होगी, और नैतिक तथा अनैतिक मूल्यों के अंतर का अभिज्ञान होने लगा होगा तो पाप और पुण्य की अवधारणा ने भी जन्म लिया होगा . तभी संभवतः नैतिक मूल्यों के सरक्षण और संवर्धन के लिए किसी न किसी न आचार सहिता का जन्म हुआ होगा ,  तब कालान्तर में जा कर धर्म का जन्म हुआ होगा . धर्म का अर्थ ही है धारण करना , पतित हो रहे समाज को थाम लेना या उसे आधार देना . समाज के नैतिक मूल्यों को स्थिर रखते हुए समाज का उदात्त विकास हो , संभवतः धर्म का यही उद्देश्य है .
हम सब पेरिस हमले पर दुखी हैं और अपने अपने आराध्य से प्रार्थनारत हैं।  हम प्रार्थना अवश्य करें . अंत में प्रार्थना ही बचती है जो शान्ति के कुछ पल और दिलासा देती है. मोमबत्तियां, शान्ति मार्च, मौन जुलूस, या उत्तेजक नारों से भरे प्रदर्शन केवल हमारे उस आक्रोश को अभिव्यक्त करते हैं , जिनका कोई विकल्प नहीं होता है. विकल्पहीनता की यह स्थिति न केवल हमें खीज और झुंझलाहट से भर देती है, बल्कि आवेश और आक्रोश की सारी अभिव्यक्ति रस्मी बना देता है. हर सामूहिक हत्या निन्दित होती है, हर आतंकवादी घटना की मीन मेख निकाल कर हम या तो उस आतंकी घटना को भुला देते हैं या भूल जाते हैं, या उसके प्रतिशोध हेतु अपने घर में लुकारी ले कर घूमने लगते हैं. पर असल समस्या की और या तो बढ़ते नहीं है या बढ़ना नहीं चाहते है. धर्म को ईश आराधना का माध्यम और नैतिक मूल्यों के सरक्षण और संवर्धन तक ही सीमित रखना होगा अन्यता यह धर्मान्धता , जो स्वर्ग की आकांक्षा में अनियंत्रित हो गयी है , धरती को ही नर्क बना देगी। 
- vss.

Friday, 13 November 2015

नेहरू और उनका इतिहास बोध / विजय शंकर सिंह


जवाहर लाल नेहरू, न केवल आज़ादी के लिए किये गए संघर्ष के शीर्षस्थ नेताओं में से एक रहे हैं , बल्कि वे देश के प्रथम प्रधान मंत्री भी रहे हैं. राजनीति में उनका एक अलग व्यक्तित्व रहा है. आधुनिक भारत के निर्माताओं में उनका स्थान प्रथम पंक्ति में है. पर आज इस लेख में जिस क्षेत्र में उनके योगदान की चर्चा की जा रही है, वह राजनीति से बिलकुल अलग अकादमिक क्षेत्र है. यह क्षेत्र है, इतिहास लेखन का. नेहरू के इतिहास बोध का. अहमदनगर जेल में लिखी गयी उनकी कालजयी इतिहास पुस्तक, " द ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री," जिसका अनुवाद, विश्व इतिहास की एक झलक " मोटे तौर पर विश्व इतिहास की घटनाओं का एक सिलसिलेवार विवरण देती है. उसे इतिहास की टेक्स्ट बुक या अकादमिक इतिहास पुस्तक तो नहीं कहा जा सकता, पर वह दुनिया भर में घटने वाली ऐतिहासिक घटनाओं का रोचक विवरण अवश्य प्रस्तुत करती है. यह पुस्तक पत्र लेखन शैली में है. पिता नेहरू ने पुत्री इंदिरा को विश्व इतिहास की एक झलक दिखायी है. पत्र लेखन के माध्यम से इतिहास लिखने का यह एक अनुपम प्रयोग था. इसके अतिरिक्त उनकी एक और प्रसिद्ध पुस्तक है, ' द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया', ( भारत एक खोज ) . प्राचीन भारत के वेदों से ले कर अब तक भारत की यह काल यात्रा है. यह पुस्तक देश के अतीत के साथ साथ, प्राचीन वांग्मय और भारतीय मनीषा के साथ, नेहरू के जुड़ाव को दिखाती है. यह दोनों पुस्तकें यह प्रमाणित करने में सफल रहीं है कि, वह एक स्वाधीनता संग्राम के संघर्षशील नायक और द्रष्टा प्रधानमंत्री ही नहीं थे, बल्कि एक सिद्धहस्त लेखक भी थे. वकालत, नेहरू के परिवार का पुश्तैनी पेशा था. नेहरू बचपन में ही पढ़ने के लिये इंग्लैंड भेज दिए गए . प्रारंभिक शिक्षा, हैरो स्कूल , और उच्च शिक्षा कैंब्रिज में हुयी. वहीं से इन्होंने बार ऐट लॉ की डिग्री ली. फिर स्वदेश आगमन और इलाहाबाद में रह कर वक़ालत का कार्य प्रारम्भ किया। इन्होने आठ साल वकालत की. पिता मोती लाल नेहरू का रुझान तब तक देश सेवा की ओर हो चुका था. वह सर सी आर दास, जैसे बड़े वकीलों के साथ मिल कर स्वराज पार्टी बना चुके थे. गांधी का देश में आगमन हो चुका था. उनका असहयोग आंदोलन शुरू तो हुआ पर चौरी चौरा की हिंसक घटना के कारण आंदोलन की अकाल मृत्य हो गयी. गांधी को सजा हो गयी थी. वे जेल में थे. राजनीतिक परिवेश में ठंडापन था. जवाहर लाल नेहरू जो 1919 में हुए जलियांवाला बाग़ नर संहार के बाद से ही राजनीति में क़दम रख चुके थे, अब और सक्रिय हो गए. 1930 के ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन , जो लाहौर में रावी नदी के तट पर हुआ, में वे राष्ट्रपति चुने गए. कांग्रेस अध्यक्ष को उन दिनों राष्ट्रपति कहा जाता था. यह अधिवेशन ऐतिहासिक कहा जाता है क्यों कि इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने भारत के पूर्ण स्वराज की मांग का प्रस्ताव पास कर अपना लक्ष्य और संघर्ष स्पष्ट कर दिया था. स्वाधीनता संग्राम में नेहरू ने कुल 9 साल कारागार में बिताये. वह लाहौर, अहमदनगर, लखनऊ और नैनी जेलों में रहे. वहीं इनका अध्ययन और लेखन परिपक्व हुआ. कारागार के समय का इन्होंने सकारात्मक सदुपयोग किया. वह सुबह 9 बजे से लिखना पढ़ना शुरू करते थे, और देर रात तक उनका यह क्रम चलता रहता था. जेल के एकांत और अवकाश ने उन्हें देश के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओं के अध्ययन और पुनर्मूल्यांकन का अवसर दिया. उनका लेखन आत्म मुग्धता के लिए नहीं बल्कि देश की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करने के लिए था, जिस से देश का स्वाभिमान जागृत किया जा सके. उन्होंने कुल चार पुस्तकें लिखीं. 1929 में पहली पुस्तक लिखी गयी, ‘ लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू ए डॉटर ‘, जिसमें उन्होंने प्रागैतिहासिक काल का विवरण दिया है. 1934,-1935 में उनकी क्लासिक कही जाने वाली पुस्तक, ' The glimpses of world history ',( विश्व इतिहास की एक झलक ), आयी. 1936 में उनकी आत्म कथा, ‘ माय ऑटोबायोग्राफी,’( मेरी कहानी ) और 1946 में दर्शन, इतिहास और संस्कृति को ले कर लिखी गयी पुस्तक " The Discovery of india" ( भारत एक खोज ) प्रकाशित हुयी. उनके इतिहास बोध को समझने के पूर्व उनकी पुस्तकों के बारे में जानना आवश्यक है. पिता के पत्र पुत्री के नाम, जो 1929 में प्रकाशित पुस्तक थी, में इनके वे पत्र संकलित हैं, जो इन्होंने इलाहाबाद प्रवास के दौरान लिखा था इंदिरा उस समय मसूरी में पढ़ रहीं थीं. इतिहास के साथ, वन्य जीव जंतुओं और अन्य विषयों पर इन्होंने अपनी पुत्री की बाल सुलभ जिज्ञासाओं के समाधान की कोशिश की है. यह प्रयास यह भी बताता है कि सार्वजनिक जीवन की तमाम व्यस्तताओं के बीच ,उनमे एक आदर्श पिता जीवित रहा जिस ने संतान को संवारने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी. अंग्रेज़ी में लिखे इन पत्रों पुस्तक के रूप में अनुवाद महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने किया था. उनका एक पत्र जिसका उल्लेख यहां करना उचित होगा , जो वन्य जीव के विकास पर आधारित है. डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत तब तक अस्तित्व में आ चुका था. उन्होंने लन्दन स्थित केनिग्स्टन म्युजियम में रखे जानवरों के चित्रों पर इस पत्र को केंद्रित किया. उन्होंने यह लिखा कि ठन्डे और शीत ग्रस्त क्षेत्रों के जंतु अपने वातावरण के अनुसार ही शुभ्र होते हैं जब कि गर्म क्षेत्रों के जंतु और वनस्पतियाँ विभिन्न रंगों की होती हैं. उनकी इस धारणा के पीछे कोई वैज्ञानिक शोध हो या न हो लेकिन, बाल सुलभ जिज्ञासा को शांत करने की उनकी यह शैली अद्भुत थी. दूसरा पत्र, मनुष्य की उत्पत्ति पर है. मनुष्य के विकास का विवरण देता यह पत्र नृतत्वशास्त्र में उनकी रूचि को भी बताता है. मूलतः यह पुस्तक बच्चों के लिए है. इसमें उनका कोई गंभीर इतिहास बोध नहीं झलकता है. इतिहास की उनकी अवधारणा, तिथिक्रम का विवरण और घटनाओं का वर्णन ही नहीं है. विश्व इतिहास की एक झलक, जो 1934-35 में प्रकाशित हुयी, में उन्होंने एशिया के साम्राज्यों के उत्थान और पतन पर विहंगम दृष्टि डाली है. अर्नाल्ड टॉयनाबी के इतिहास एक अध्ययन के तर्ज़ पर उन्होंने सभ्यताओं के उत्थान और पतन को समझने और समझाने का प्रयास किया है. जिस से उनके अध्येता होने का प्रमाण मिलता है. कोई भी व्यक्ति जो विश्व इतिहास की रूपरेखा समझना और जानना चाहता है और संदर्भों की शुष्क वीथिका से बचना चाहता है वह इसका अध्ययन कर सकता है. 1934 में ही उनकी आत्म कथा, मेरी कहानी प्रकाशित हुयी. आत्मकथा लेखन एक आधुनिक साहित्य विधा है. पहले खुद के बारे में कुछ कहना और उसे प्रचारित करना आत्म मुग्धता समझा जाता था. इसी लिए पूर्ववर्ती अनेक महान साहित्यकारों के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कोई प्रामाणिक विवरण उपलब्ध नहीं होता . जो मिलता है वह या तो किंवदंती के रूप में या समकालीनों द्वारा दिए विवरण के रूप में है. स्वयं को पारदर्शिता के साथ देखना बहुत कठिन होता है वह भी तब, जब कि मनुष्य सार्वजनिक जीवन में हो. पर अपनी आत्म कथा में उन्होंने जो भी लिखा है वह उनकी खुद की ईमानदार विवेचना है. आप यूँ भी कह सकते हैं कि उनकी आत्मकथा का काल 1932 में ही ख़त्म हो जाता है . जब कि उनके जीवन के अनेक विवाद इस काल के बाद हुए. सुभाष बाबू के साथ विवाद, भारत विभाजन और प्रधान मंत्री काल के अनेक निर्णय, जिनको ले कर उनकी आलोचना होती है, के समय की कोई आत्म कथा लिखी ही नहीं गयी. संकट काल और आलोचना से घिरे होने पर , स्वयं को कैसे बिना लाग लपेट के प्रस्तुत किया जाय इस में आत्मकथा लेखक की कुशलता और ईमानदारी दोनों ही निहित होती है. लन्दन टाइम्स ने उनकी पुस्तक मेरी कहानी को उस समय की पठनीय पुस्तकों के वर्ग में रखा था. इस पुस्तक में उनके परिवार, उनकी पढ़ाई और 1933 तक के आज़ादी के लिए किये गए संघर्षों का विवरण मिलता है. उस काल के शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक एक सन्दर्भ और स्रोत का भी काम करती है. उनकी सबसे परिपक्व कृति , भारत एक खोज. है. 1944 में यह पुस्तक प्रकाशित हुयी. भारतीय मनीषा, सभ्यता और संस्कृति का अद्भुत सर्वेक्षण इस पुस्तक में है. पूर्णतः अंग्रेज़ी परिवेश में पले और पढ़े लिखे नेहरू द्वारा वेदों से लेकर पुराणों का अध्ययन उनके अंदर छिपे प्राच्य दर्शन को दिखाता है. इस पुस्तक में भारत की एक यात्रा है. इतिहास है, परम्पराएँ हैं और संस्कृति की जीवंतता है. नेहरू के जीवनीकार एम जे अकबर इस पुस्तक की लेखन शैली की भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं. वह बताते हैं कि उनकी दोनों पुस्तकें विश्व इतिहास की एक झलक और भारत एक खोज उन की लेखकीय प्रतिभा को ही नहीं बल्कि उनके पांडित्य को भी प्रदर्शित करती है. इतिहासकार विपिन चंद्र ने उनकी आत्मकथा को आंशिक इतिहास और इतिहास को आंशिक आत्म कथा माना है. उन्होंने भूत की त्रुटियों को वर्तमान के सन्दर्भ से जोड़ते हुए वर्तमान को आगाह किया है. तो, वर्तमान में ही भूत ढूँढने की कोशिश की गयी है. उन्होंने इतिहास को एक जीवंत अंतहीन यात्रा की तरह प्रस्तुत किया है, . नेहरू इतिहास के विद्यार्थी नहीं थे और न ही वह कोई इतिहासकार थे. अतीत को उन्होंने अपनी नज़र से देखा और उसे प्रस्तुत कर दिया. वह स्वयं अपनी पुस्तक में कहते हैं .. “The past is always with us and all that we are and what we have comes from the past. We are its products and we live immersed in it. Not to understand it and feel it as something living within us is not to understand the present. To combat it with the present and to extend to the future, to break from it when it cannot be united, to make of all these the pulsating and vibrating material for thought and action-that is life.” वह लिखते है, अतीत मुझे अपनी गर्माहट से स्पर्श करता है और जब वह अपनी धारणा से वर्तमान को प्रभावित करता है तो मुझे हैरान भी कर देता है. इतिहासकार ई एच कार ठीक ही कहते हैं, सच में इतिहास वही लिख सकते हैं जिन्होंने इसकी दिशा को बदलते हुए महसूस किया हो. नेहरू खुद इतिहास के दिशा प्रवर्तक रहे है. इतिहास में अतीत से हम कहाँ से आये हैं. कि तलाश करते हुए यह जिज्ञासा भी उठती है कि हम जाएंगे कहाँ. इतिहास लिखना अतीत के दाय का निर्वहन भी है. उन देशों का इतिहास लेखन कठिन होता है जहां संस्कृति और सभ्यता की एक विशाल और अनवरत परंपरा रही हो. एशिया के दो महान देशों चीन और भारत के साथ यह समस्या अक्सर इनके इतिहास लेखन के समय हो जाती है. ऐसा इस लिए कि न केवल स्रोत और सामग्री की प्रचुरता है बल्कि अनवरतता भी है. अपने इतिहास लेखन को नेहरू अतीत के प्रति अपना कर्तव्य भी मानते हैं. हम कहाँ से आये हैं. और हम कौन है कि आदिम दार्शनिक जिज्ञासा ही नेहरू के इतिहास लेखन का प्रेरणा स्रोत रहा है और इसी का प्रतिफल है ' द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ', या 'भारत एक खोज'. अपनी इतिहास की अवधारणा को वह इन शब्दों में व्यक्त करते है... “A study of history should teach us how the world has slowly but surely progressed..... man’s growth from barbarism to civilisation is supposed to be the theme of history. " नेहरू एक लोकतांत्रिक समाजवादी विचारधारा में विश्वास करते थे. उनके समाजवाद की अवधारणा मार्क्सवादी समाजवाद से अलग थी, हालांकि मार्क्स ने उन्हें प्रभावित भी किया था और रूस की सोवियत क्रान्ति के महानायक वी आई लेनिन के वे प्रशंसक थे. पर इस पाश्चात्य राजनीतिक अवधारणा के बावज़ूद प्राचीन वांग्मय के प्रति उनका रुझान उनकी पुस्तकों विशेषकर भारत एक खोज में खूब दिखा है. वह सभ्यताओं का उद्भव एक सजग अनुसंधित्सु की तरह खोजते है फिर उसे आधुनिक काल से जोड़ते हैं. वह किसी वाद विशेष के कठघरे में नहीं रुकते हैं पर भारतीय दर्शन के मूल समष्टिवाद को ले कर बढ़ते रहते हैं. भारतीय संस्कृति के वह परम प्रशंसक ही नहीं बल्कि वे इसे दुनिया की सबसे जीवंत संस्कृति के रूप में इस पर गर्व भी करते हैं. यह उनकी विशाल हृदयता, और दृष्टि का परिचायक है. भारत एक खोज में वे लिखते हैं पांच हज़ार साल से प्रवाहित हो रही अविच्छिन्न संस्कृति के काल में डेढ़ सौ साल का ब्रिटिश काल एक दुखद काल खंड है. पर उस से संस्कृति की ऊर्जस्विता और ओजस्विता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. ( सुगता बोस और आयशा जलाल, की पुस्तक, मॉडर्न साउथ एशिया पृ. 8.) इतिहास में घटनाओं से अधिक व्यक्तित्वों ने उन्हें प्रभावित किया है. घटनाएं व्यक्तित्व गढतीं हैं या व्यक्तित्व घटनाओं की उपज है, इस पर भी बौद्धिक विमर्श हो सकता है पर दोनों ही एक दुसरे से जुड़े है. उन्नीसवी सदी के इतिहास लेखन में वे व्यक्तित्व की प्रतिभाओं से चमत्कृत होते है. वह मुस्तफा कमाल पाशा से बहुत प्रभावित दिखते हैं उन्होंने इतिहास को वैश्विक समग्रता से देखा है. इस लिए वह एक वैश्विक गाँव का इतिहास प्रस्तुत करते है. एक देश की घटनाएं दुसरे को अप्रभावित किये बिना नहीं रह सकती है. पूरी दुनिया के एक गांव में बदल जाने की प्रक्रिया उन्नीसवीं सदी से ही शुरू हो गयी थी. वह लिखते हैं... " In history, we read of great periods in the life of nations, of great men and women and great deeds performed and sometimes in our dreams and reveries we imagine ourselves back in those times and doing brave deeds like the heroes and heroines of old.” ( The glimpses of world history..pg.2 ) नेहरू का एक इतिहास के विद्यार्थी या इतिहासकार के रूप में मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है. उन्होंने इतिहास के छात्रों और शोधार्थियों के लिए इतिहास नहीं लिखा है. 'पिता के पत्र पुत्री के नाम ' उन्होंने अपनी प्रिय पुत्री इंदिरा को देश विदेश का ज्ञान कराने के लिए लिखा था. यह एक व्यक्तिगत पत्रों का संकलन है. पर लेखक ने उसे सबके लिए उपयोगी बना दिया. ' विश्व इतिहास की एक झलक ' , विश्व इतिहास की कोई टेक्स्ट बुक नहीं है. पर यह विश्व के महान संस्कृतियों के प्रवाह को दिखाते हुए, विभिन्न संस्कृतियों के आदान प्रदान को रेखांकित करते हुए, नेहरू के द्रष्टा और उनके सार्वभौमवाद को भी दिखाती है. ' मेरी कहानी ' उनकी आत्म कथा तो है, पर वह आज़ादी के संघर्ष के एक काल खंड का इतिहास भी समेटे है. ' भारत एक खोज ' भारत की एक दार्शनिक यात्रा है. हज़ारों साल से अस्मिता पर जो हमला हुआ था , धर्म और समाज में जो विकृतियां आ गयीं थीं, उन सब के बावज़ूद भी, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की अकलुषित आत्मा की खोज है यह पुस्तक. इसमें, धर्म है, दर्शन है, और इतिहास है. नेहरू के सारी कृतियों में यह सबसे गंभीर और परिपक्व पुस्तक है. मूलतः विज्ञान और फिर विधि के विद्यार्थी रहते हुये भी उनकी इन सभी पुस्तकों में इतिहास के प्रति रुचि और इतिहास की समझ साफ़ दिखती है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक सेमीनार हो रहा था. विषय था, इतिहास लेखन. उस सेमिनार में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक और उर्दू के महान शायर, रघुपति सहाय फ़िराक भी शामिल थे. फ़िराक, नेहरू के मित्र भी थे. उसी गोष्ठी में नेहरू के इतिहास लेखन पर भी चर्चा हुयी. एक विद्वान वक्ता ने नेहरू के इतिहास लेखन को इतिहास लेखन के दृष्टिकोण से गंभीर और अकादमिक नहीं माना. प्रख्यात इतिहासकार, डॉ ईश्वरी प्रसाद उस गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे. उन्होंने कहा नेहरू इतिहास के विद्यार्थी नहीं रहे हैं पर अतीत में झाँकने और उसका मूल्यांकन करने का सभी को अधिकार है. उनकी रचनाओं के मूल्यांकन के पूर्व उनकी पृष्ठिभूमि पर भी विचार कर लिया जाय. ईस्वरी प्रसाद भारत एक खोज के प्रशंसक थे. बहस गंभीर हुयी. तभी फ़िराक उठे और उन्होंने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा, " तुम इतिहास लिखते हो, उस ने इतिहास बनाया है " फ़िराक कभी कभी बदज़ुबां भी हो जाते थे.नेहरू का इतिहास बोध, भारतीय संस्कृति की तरह विराट और विशाल तो था ही, गंगा की तरह अचल प्रवाह्युक्त और सार्वभौम रहा है. े

एक कविता - आशीष / विजय शंकर सिंह




सारी बुरी और
दहशत भरी यादें ,
लपेट कर एक झांपी में
रख दिया है मैंने ,
बांस के बनी ये झाम्पियां,
संपेरे लिए घूमते रहते हैं जिसे !

ऐसी ही एक झांपी में ,
सारी अज़ाब भरी यादें ,
दबाये हुए मैं ,
गाँव के बाहर ,
संपेरे के इंतज़ार में
बैठा हूँ !!

शायद कोई संपेरा ,
नमूदार हो जाए कहीं से ,
और समेट ले जाए ,
इन दहशत भरी यादों को ,
और दे जाए आशीष ,
इस काली रात के अवसान के साथ ,
एक नए विहान का !!!
-vss

Monday, 9 November 2015

धन्वन्तरि जयंती - एक ऐतिहासिक विवेचन / विजय शंकर सिंह




आज धनतेरस है. सामान्यतया हम लोग आज कुछ कुछ धातु अपनी सामर्थ्यानुसार खरीदते हैं. अर्थ , पुरुषार्थ चतुष्टय में से एक है  तथा अत्यंत महत्वपूर्ण भी. पर धनतेरस की व्युत्पत्ति धन से नहीं हुयी है, पर , इसका सम्बन्धधन से भी अधिक महत्वपूर्ण धन  आरोग्य से है. यह पर्व आरोग्यावतार और आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि का जन्म दिवस भी है. धन्वंतरि काशी के राजा थेया यों कह लें कि काशी ने ही उन्हें धन्वन्तरि बनाया है.

आर्यों का प्रवास सरस्वती नदी के उपकंठ यानी कछार में  सहस्रों वर्ष पहले था. सरस्वती, एक सदा नीरा नदी थी. और हिमालय से निकल कर पंजाब , हरियाणा , राजस्थान होते हुए, कच्छ के पास अरब सागर में गिरती थी. कच्छ क्षेत्र में हुए भूगर्भीय परिवर्तन से इसका मुहाना जो अरब सागर में था बाधित हो गया. जिस से इस महान नदी जिसके किनारे आयों की महान सभ्यता पल्लवित हुयी थी थम गयी. यही नहीं, बल्कि, एक हिमालयी भूकम्प के कारण सरस्वती का पथ हरियाणा के उत्तर में एक स्थान जहां यह और यमुना नदी पर्वतों से उतर कर धरा पर आती हैपर , परिवर्तित हो गया और वह दो भागों में बँट गयी. एक भाग यमुना  से मिल कर पूर्वाभिमुख हो गया, और इलाहाबाद , जो पहले प्रतिष्ठान पुर था में कर गंगा में मिल गयी. यह प्रयाग, जिसका शाब्दिक अर्थ ही संगम होता है , दो बड़ी नदियों , गंगा और यमुना के मिलने के कारण प्रयाग राज कहलाया. इसी लिए गंगा और यमुना तो प्रत्यक्ष दिखती हैं, पर सरस्वती लुप्त हैं. यह कथा त्रिवेणी की है.

इसी सरस्वती उपकंठ से आर्यों का एक दल, सरस्वती के क्षीण होने पर पूर्व की और बढ़ा और जहां गंगा यमुना का संगम है, वहाँ रुका. गंगा पार, जहां आज झूंसी है, वहाँ प्रथम राज्य की नीव पडी, जिसका नाम पड़ा प्रतिष्ठान पुर था. यह चंद्रवंशी क्षत्रियों की शाखा थी. पूरी कथा इस प्रकार है. मनु के आठ पुत्र थे. इनके सबसे बड़े पुत्र इक्ष्वाकु थे. जिनको मध्य देश का राज्य मिला, जिसकी राजधानी अयोध्या थी. दुसरे पुत्र नाभानेदिष्ठ थे, जिन्होंने कोसल राज्य के पूर्व में सदानीरा यानी गंडक के पूर्व में राज्य की स्थापना की. इसी वंश में विशाल नामक राजा हुए जिन्होंने विशाला नामक नगर की स्थापना की जो आज की वैशाली हैमनु के तीसरे पुत्र शर्याति ने काठियावाड़ के पास राज्य की स्थापना की. उनके पुत्र अनर्त के नाम पर आनर्त राज्य बना. इसकी राजधानी कुशस्थली अर्थात द्वारिका बनी.चौथे पुत्र का नाम करुष था जिसके वंशज कारूष कहलाये. इसका राज्य बघेल खंड के पूवोत्तर में शोण नदी के पास स्थापित हुआ. मनु के छठें, सातवें और आठवें पुत्र क्रमशः नाभाग, पृषघ्नु, और प्रांशु थे. जिसमें से एक शूद्र हो गया, एक भारत के बाहर चला गया और एक के बारे में इतिहास मौन है.

मनु की पुत्री का नाम इला था. इला का विवाह हिमालय निवासी किसी चंद्र नामक राजा से हुआ था. इला को मध्यदेश यानी अयोध्या का ही एक भाग मनु ने दिया था, जो प्रतिष्ठानपुर कहलाया. इला का पुत्र पुरुरुआ या येल के नाम से यह वंश येल वंश भी कहलाया. यह इस वंश का प्रथम नृपति हुआ. उर्वशी और पुरुरुआ की कथा जगत प्रसिद्ध है. प्रतिष्ठान से ही यह वंश, कान्यकुब्ज, काशी, और पश्चिमोत्तर भारत तथा दक्षिण की और फैला. एक कथा के अनुसार इला बाद में सौद्युम्न नामक पुरुष बना और उसे तीन पुत्र हुए. इनके नाम गय, उत्कल और हरिताश्व थे. गय को बिहार का दक्षिणी भाग ,मिला. गया इसी गय के नाम पर ही है. उत्कल को वर्तनाम ओडिशा, और हरिताश्व या विनताश्व को गया का पूर्वी भाग मिला.

पुरुरूवा के दो पुत्र थे , आयु और अमावसु. आयु , प्रतिष्ठानपुर के नरेश हुए और अमावसु कान्यकुब्ज के राजा हुए. आयु के दो पुत्र थे नहुष और क्षत्रवृद्ध. नहुष प्रतिष्ठान पुर के ही राजा बने रहे. क्षत्रवृद्ध काशी की और चले और वहाँ के राजा हुए. क्षत्रवृद्ध आर्यों के वंशजों का प्रचुर उल्लेख पुराणों में मिलता है. श्रीमद्भागवतपुराण के अनुसार क्षत्रवृद्ध के पुत्र का नाम सुहोत्र था. सुहोत्र के तीन पुत्र हुए. काश्य, कुश और गृत्समद, गृत्समद के पुत्र हुए शुनक, और उनके पुत्र हुए शौनक. शौनक ब्रह्मचवर मुनि हो गए थे. काश्य के पुत्र हुए दीर्घतमा, और  धन्वन्तरि.दीर्घतमा के पुत्र थे, और धन्वन्तरि के पुत्र हुए दिवोदास . जिनका प्रथम राज्याभिषेक हुआ और वह काशी के राजा हुए. इस प्रकार धन्वन्तरि काशी के राजवंश के पूर्व पुरुषों में थे. यह श्लोक देखें ..
काशस्थ काशिस्ते पुत्रो राष्ट्रों दीर्घातमाः पिता,
धन्वन्तरि दैर्घतम आयुर्वेद प्रवर्तक !!
(
श्री मद्भागवत 9 - 1 - 7 )
आज उन्ही धन्वन्तरि की जयंती है, जिनको आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है. यह जयंती त्रयोदशी के दिन पड़ती है अतः आज धनतेरस भी कहा जाता है. धन्वन्तरि को काशी राज विरासत में मिला था. पर उन्होंने लोक कल्याण के लिए  राज्य का त्याग कर दिया.

जब क्षत्रवृद्ध काशी आये तो काशी में किरातों और मुंडा आदिवासी समाज का राज था. किरात मूलतः हिमालय के मध्य भाग के पहाड़ी जाति थी. वह कब काशी आयी और इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है. किरातों के पूर्व यहां मुंडा नामक एक आटविक जाति थी. काशी तब आज के वरुणा और गंगा के संगम पर स्थित थी. आज जो बनारस शहर आप देख रहे हैं वह तब सघन वन था. शिव किरातों के देवता थे. किरात उनकी पूजा या उपासना के लिए उन्हें अपने साथ साथ ही काशी में लेते आये. शिव स्वयं को संस्कृत नाटक में किरातार्जुनीयम् में स्वयं को किरात कहते भी हैं. आर्यों के काशी पहुँचने पर किरातों और मुंडा जाति के साथ इनका विवाद हुआ. आर्य सबल पड़े. और उन्होंने मुंडा और किरात को वरुणा गंगा संगम के पार खदेड़ दिया. शिव स्थापित देवता थे अतः शिव को आर्यों की देव परम्परा में सम्मिलित कर लिया गया. दीर्घतमा के पुत्र धन्वन्तरि की रूचि आरोग्य विज्ञान में थी. उन्होंने राज कार्य से विरत रह कर अपना आरोग्य ज्ञान बढ़ाया. किरात , मुंडा और आर्यों के बीच अक्सर युद्ध चला करता था. किरातों की बस्तियां भी अलग थीं. अचानक एक बार किरातों की बस्ती में कोई रोग फैला. ज्वर से पीड़ित हो कर लोग मरने लगे. धन्वन्तरि को जब इस बात का संज्ञान हुआ तो , वह किरातों की बस्ती में गए और उन्होंने सेवा सुश्रुसा की. किरात इस से ठीक होने लगे. धीरे धीरे इस विचित्र ज्वर तथा और व्याधियों के निदान हेतु धन्वन्तरि ने शोध कार्य भी किया. धन्वन्तरि के इस प्रयास से किरातों और आर्यों के बीच का जो कटु सम्बन्ध था वह सुधरा और एक सद्भाव का वातावरण बना. दीर्घतमा के बाद काशी राज के पद पर प्रतिष्ठापित होने के लिए धन्वन्तरि ने मना कर दिया. तब जा कर धन्वन्तरि के पुत्र दिवोदास का काशी नरेश के रूप में राज्याभिषेक किया गया. धनवंतरि का यह श्लोक पढ़ें.
त्वहं कामये राज्यम्, स्वर्गम्  , पुनर्भवम्, 
कामये दुखतप्तानां , प्राणीनांमार्ताशनाम !!
"
तो मुझे राज्य की कामना है , स्वर्ग की, मैं पुनर्जन्म से मुक्ति चाहता हूँ. मेरी कामना है कि मैं , दुःख से तपते हुए प्राणी मात्र का दुःख  , कष्ट दूर करता रहा हूँ .

भारतीय मनीषा में त्याग का बहुत महत्व है. और आरोग्य के लिए यह धन्वन्तरि का महान त्याग था. जब धन्वन्तरि अशक्य हो गए और उनकी मृत्यु आसन्न हो गयी तो. उन्होंने अपने पौत्र प्रतर्दक से, जो अपने पिता दिवोदास से भी अधिक प्रतापी था और जिसने काशी राज की सीमा पूर्व में बक्सर जिसे तब व्याघ्रसर कहा जाता था तक बढ़ाया , यह इच्छा व्यक्त की मृत्य के बाद कुछ दुर्लभ और चमात्कारिक औषधियां और जड़ी बूटियाँ , मध्यमेश्वर के शिव मंदिर के पास स्थित एक अष्टकोणीय कूप में डाल दी जाय. जिसके जल का पान करने से लोगों का रोग दूर हो. ऐसा किया भी गया. आज भी मध्यमेश्वर मंदिर वाराणसी के प्रसिद्ध शिव मंदिरों में से एक है . वह कूप भी है . आज भी उस कुएं के जल में रोग दूर करने के चमत्कार की मान्यता है. यह काशी की अविरलता है. निरंतरता है.

आज धन्वन्तरि जयन्ती के अवसर पर आप सब रोग मुक्त रहें. धन्वन्तरि की कृपा बनी रही !!
( विजय शंकर सिंह )