Wednesday, 12 November 2014

A Sufi Poem... In the market, in the cloister--only God I saw By Baba Kuhi of Shiraz (980? - 1050)

English version by Reynold A. Nicholson



In the market, in the cloister--only God I saw.
In the valley and on the mountain--only God I saw.
Him I have seen beside me oft in tribulation;
In favour and in fortune--only God I saw.
In prayer and fasting, in praise and contemplation,
In the religion of the Prophet--only God I saw.
Neither soul nor body, accident nor substance,
Qualities nor causes--only God I saw.
I oped mine eyes and by the light of His face around me
In all the eye discovered--only God I saw.
Like a candle I was melting in His fire:
Amidst the flames outflashing--only God I saw.
Myself with mine own eyes I saw most clearly,
But when I looked with God's eyes--only God I saw.
I passed away into nothingness, I vanished,

And lo, I was the All-living--only God I saw.

 ( बाबा कुही , एक सूफी संत थे। इनका पूरा नाम शेख अबू अब्दुल्ला मोहम्मद बिन अब्दुल्ला बिन ओबैदुल्लाह बखुआ शिराज़ी था। समय के बारे में मतभेद है। कुछ इनका काल 
चौथी सदी , तो कुछ दसवीं सदी बताते हैं। सूफी साहित्य में इनकी कुछ रचनाएँ मिलती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ उल्लेखनीय विवरण इनके बारे में नहीं मिलता है। 

संभवतः वह शीराज़ में पैदा हुए थे। अपनी युवावस्था में वह प्रसिद्ध सूफी और रहस्यवादी कवि अबु अब्दुल्ला मुहब्बड़ और अरब कवि मुतनब्बी के संपर्क में आये। यायावरी उनके स्वभाव का अंग थी। सूफी संत साहित्य का संकलन और अध्ययन उनका स्वभाव बन गया था वह भ्रमण के दौरान ही अपने समय के प्रख्यात सूफी संत शेख अबु सईद अबी उल कायर और अबु उल क़ासिम तथा अब्द उल करीम कुसायरी के संपर्क में आये । निसापुर जो उस समय सूफी मत का गढ़ था में कुछ दिन रुक कर फिर वह शीराज़ वापस आ गए। वहीं उनका निधन  संभवतः 428 या 1035 ईस्वी में हो गया। 

शिराज़ वापस आने पर वह एक पर्वत की गुफा में  रहने लगे थे। उनका नाम कुही क्यों पड़ा इसके बारे में भी एक किवदन्ति प्रचलित है। यह नाम अरबी शब्द इब्न बाकुया , जिसका अर्थ पहाड़ों के बीच दरार है का अप्रभंश है। इस नाम का उल्लेख सबसे पहले शेख सादी की कविताओं में मिलता है। एक कथा के अनुसार युवा कवि हाफ़िज़ , जो बाबा कुही की कविताओं को स्तरीय नहीं मानते थे , तीन दिन तक वह उसी गुफा में रुके जहां बाबा रहा  करते थे। तीसरी रात उन्हें हजरत इमाम अली  के दर्शन हुए। जिन्होंने उन्हें साहित्य समझने की दैवी प्रेरणा दी। कहते हैं हाफ़िज़ उन्ही के आशीर्वाद से प्रसिद्ध हुए। यह कथा एक किम्वदन्ती के रूप में आज भी प्रचलित है। 

उनकी रचनाओं में फारसी में दीवान उपलब्ध है। कुछ फुटकर रचनाएं हल्लाज की एक पत्रिका बिदायत हाल अल हल्लाज व नेहायतोहु में उपलब्ध है. )
-vss

Tuesday, 11 November 2014

Dr Lohia on Krishna / कृष्ण / डॉ राममनोहर लोहिया

डॉ लोहिया न केवल एक अद्भुत राजनीतिक व्यक्ति थे बल्कि वे एक विचारक और प्रखर चिंतक भी थे। जाति व्यवस्था , वर्ण भेद , नर नारी समता , राम शिव और कृष्ण आदि भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर उन्होंने विस्तार से लिखा है। दुर्भाग्य से समाजवादी आंदोलन के बिखराव और इस आंदोलन से जुड़े लोगों के वैचारिक और सैद्धांतिक भटकाव के कारण डॉ लोहिया अक्सर भुला दिए गए और उनका दार्शनिक पक्ष सामने नहीं आ पाया।

आज मैं उनका एक बेहद चर्चित लेख जो कृष्ण पर आधारित है साझा कर रहा हूँ। लेख लंबा है लेकिन कृष्ण को नयी दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है। कृष्ण पूर्णावतार थे। एक शरीर बालक , रसिक प्रेमी , सुरीले बांसुरी वादक , नर्तक , योद्धा , कुशल कूटनीतिक , और अंत में जब कुछ न सूझे तो अद्भुत मार्ग दर्शक। सारे भ्रमों का नाश कर वे जिजीविषा का संचार करते हैं।

यह लेख सनातन धर्म के इस अद्भुत और समस्त रंगों से भरपूर , पूर्णावतार के बारे में डॉ लोहिया की नयी और अनुपम दृष्टि से परिचित करायेगा। )
-vss.



कृष्‍ण की सभी चीजें दो हैं : दो मां
दो बापदो नगरदो प्रेमिकाएं या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्‍वीकृत या सामाजिक हैवह असली से भी श्रेष्‍ठ और अधिक प्रिय हो गई है। यों कृष्‍ण देवकीनंदन भी हैंलेकिन यशोदानंदन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्‍ण की असली मांपेट-मां का नाम न जानते होंलेकिन बाद वाली दूध वालीयशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा। उसी तरहवसुदेव कुछ हारे हुए से हैंऔर नंद को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारिका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहींक्‍योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है। किंतु यदि कृष्‍ण की चलेतो द्वारिका और द्वारिकाधीशमथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे। मथुरा से तो बाललीला और यौवन-क्रीड़ा की दृष्टि सेवृंदावन और वरसाना वगैरह अधिक महत्‍वपूर्ण हैं। प्रेमिकाओं का प्रश्‍न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाएरुक्मिणी और सत्‍यभामा कीराधा और रुक्मिणी की या राधा और द्रौपदी की। प्रेमिका शब्‍द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो होअभी तो राधा ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्‍वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह तक पहुंचाएलेकिन इतना संभव नहीं लगता। हर हालत मेंरुक्मिणी राधा से टक्‍कर कभी नहीं ले सकेगी।

मनुष्‍य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख हैं। यह शारीरिक सीमाउसे अपना एक दोस्‍तएक मांएक बापएक दर्शन वगैरह देती रहती है। किंतु समय हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता हैमन ही के द्वारा उछल सकता है। कृष्‍ण उसी तत्‍व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्‍त सीमाओं से उलांघता-उलांघता सबमें मिला देता हैकिसी से भी अलग नहीं रखता। क्‍योंकि कृष्‍ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्‍य-लीला हैकेवल सिद्धांतों और तत्‍वों का विवेचन नहींइसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रहकर दो और निरापनी हो गई हैं। यों दोनों में ही कृष्‍ण का तो निरापना हैकिंतु लीला के तौर पर अपनी मांबीवी और नगरी से पराई बढ़ गई है। पराई को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खत्‍म करना है। मथुरा का एकाधिपत्‍य खत्‍म करती है द्वारिकालेकिन उस क्रम में द्वारिका अपना श्रेष्‍ठतत्‍व जैसा कायम कर लेती है।

भारतीय साहित्‍य में मां है यशोदा और लला है कृष्‍ण। मां-लला का इनसे बढ़कर मुझे तो कोई संबंध मालूम नहींकिंतु श्रेष्‍ठत्‍व भर ही तो कायम होता है। मथुरा हटती नहीं और न रुक्मिणीजो मगध के जरांसध से लेकर शिशुपाल होती हुई हस्तिनापुर की द्रौपदी और पांच पांडवों तक एक-रूपता बनाए रखती है। परकीया स्‍वकीया से बढ़कर उसे खत्‍म तो करता नहींकेवल अपने और पराए की दीवारों को ढहा देता है। लोभमोहईर्ष्‍याभय इत्‍यादि की चहारदीवारी से अपना या स्‍वकीय छुटकरा पा जाता है। सब अपना औरअपना सब हो जाता है। बड़ी रसीली लीला है कृष्‍ण कीइस राधा-कृष्‍ण या द्रौपदी-सखा ओर रुक्मिणी-रमण की कहीं चर्म सीमित शरीर मेंप्रेमांनंद और खून की गर्मी और तेजी मेंकमी नहीं। लेकिन यह सब रहते हुए भी कैसा निरापना।

कृष्‍ण है कौनगिरधरगिरधर गोपाल! वैसे तो मुरलीधर और चक्रधर भी हैलेकिन कृष्‍ण का गुह्यतम रूप तो गिरधर गोपाल में ही निखरता है। कान्‍हा को गोवर्धन पर्वत अपनी कानी उंगली पर क्‍यों उठाना पड़ा थाइसलिए न कि उसने इंद्र की पूजा बंद करवा दी और इंद्र का भोग खुद खा गयाऔर भी खाता रहा। इंद्र ने नाराज होकर पानीओलापत्‍थर बरसाना शुरू कियातभी तो कृष्‍ण को गोवर्धन उठाकर अपने गो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी। कृष्‍ण ने इंद्र का भोग खुद क्‍यों खाना चाहायशोदा और कृष्‍ण का इस संबंध में गु्हय विवाद है। मां इंद्र को भोग लगाना चाहती हैक्‍योंकि वह बड़ा देवता हैसिर्फ वास से ही तृत्‍प हो जाता हैऔर उसकी बड़ी शक्ति हैप्रसन्‍न होने पर बहुत वर देता है और नाराज होने पर तकलीफ। बेटा कहता है कि वह इंद्र से भी बड़ा देवता हैक्‍योंकि वह तो वास से तृप्‍त नहीं होता और बहुत खा सकता हैऔर उसके खाने की कोई सीमा नहीं। यही है कृष्‍ण-लीला का गुह्य रहस्‍य। वास लेने वाले देवताओं से खाने वाले देवताओं तक की भारत-यात्रा ही कृष्‍ण-लीला है।

कृष्‍ण के पहलेभारतीय देवआसमान के देवता हैं। निस्‍संदेह अवतार कृष्‍ण के पहले से शुरू हो गए। किंतु त्रेता का राम ऐसा मनुष्‍य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसीलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्‍ण ऐसा देव है जो निरंतर मनुष्‍य बनने की कोशिश करता रहा। उसमें उसे संपूर्ण सफलता मिली। कृष्‍ण संपूर्ण अबोध मनुष्‍य हैखूब खाया-खिलायाखूब प्‍यार किया और प्‍यार सिखायाजनगण की रक्षा की और उसे रास्‍ता बतायानिर्लिप्‍त भोग का महान त्‍यागी और योगी बना।

इस प्रसंग में यह प्रश्‍न बेमतलब है कि मनुष्‍य के लिएविशेषकर राजकीय मनुष्‍य के लिएराम का रास्‍ता सुकर और उचित है या कृष्‍ण का। मतलब की बात तो यह है कि कृष्‍ण देव होता हुआ निरंतर मनुष्‍य बनता रहा। देव और निःस्‍व और असीमित होने के नाते कृष्‍ण में जो असंभव मनुष्‍यताएं हैंजैसे झूठधोखा और हत्‍याउनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैंउसमें कृष्‍ण का क्‍या दोष। कृष्‍ण की संभव और पूर्ण मनुष्‍यताओं पर ध्‍यान देना ही उचित हैऔर एकाग्र ध्‍यान। कृष्‍ण ने इंद्र को हरायावास लेने वाले देवों को भगायाखाने वाले देवों को प्रतिष्ठित कियाहाड़खूनमांस वाले मनुष्‍य को देव बनायाजन-गण में भावना जाग्रत की कि देव को आसमान में मत खोजोखोजो यहीं अपने बीचपृथ्‍वी पर। पृथ्‍वी वाला देव खाता हैप्‍यार करता हैमिलकर रक्षा करता है।

कृष्‍ण जो कुछ करता थाजमकर करता थाखाता था जमकरप्‍यार करता था जमकररक्षा भी जमकर करता था : पूर्ण भोगपूर्ण प्‍यारपूर्ण रक्षा। कृष्‍ण की सभी क्रियाएं उसकी शक्ति के पूर इस्‍तेमाल से ओत-प्रोत रहती थींशक्ति का कोई अंश बचाकर नहीं रखता थाकंजूस बिल्‍कूल नहीं थाऐसा दिलफेंकऐसा शरीरफेंक चाहे मनुष्‍यों से संभव न होलेकिन मनुष्‍य ही हो सकता हैमनुष्‍य का आदर्शचाहे जिसके पहुंचने तक हमेशा एक सीढ़ी पहले रुक जाना पड़ता हो। कृष्‍ण नेखुद गीत गया है स्थितप्रज्ञ काऐसे मनुष्‍य का जो अपनी शक्ति का पूरा और जमकर इस्‍तेमाल करता हो। 'कूर्मोगानीवबताया है ऐसे मनुष्‍य को। कछुए की तरह यह मनुष्‍य अपने अंगों को बटोरता हैअपनी इंद्रियों पर इतना संपूर्ण प्रभुत्‍व है इसका कि इंद्रियार्थों से उन्‍हें पूरी तरह हटा लेता हैकुछ लोग कहेंगे कि यह तो भोग का उल्‍टा हुआ। ऐसी बात नहीं। जो करनाजमकर - भोग भीत्‍याग भी। जमा हुआ भोगी कृष्‍णजमा हुआ योगी तो था ही। शायद दोनों में विशेष अंतर नहीं। फिर भीकृष्‍ण ने एकांगी परिभाषा दीअचल स्थितप्रज्ञ कीचल स्थितप्रज्ञ की नहीं। उसकी परिभाषा तो दी तो इंद्रियार्थों में लपेटकरघोलकर। कृष्‍ण खुद तो दोनों थापरिभाषा में एकांगी रह गया। जो काम जिस समय कृष्‍ण करता थाउसमें अपने समग्र अंगों का एकाग्र प्रयोग करता थाअपने लिए कुछ भी नहीं बचता था। अपना तो था ही नहीं कुछ उसमें। 'कूर्मोगानीवके साथ-साथ 'समग्र-अंग-एकाग्रीभी परिभाषा में शामिल होना चाहिए था। जो काम करोजमकर करोअपना पूरा मन और शरीर उसमें फेंककर। देवता बनने की कोशिश में मनुष्‍य कुछ कृपण हो गया हैपूर्ण आत्‍मसमर्पण वह कुछ भूल-सा गया है। जरूरी नहीं है कि वह अपने-आपको किसी दूसरे के समर्पण करे। अपने ही कामों में पूरा आत्‍मसमर्पण करे। झाड़ू लगाए तो जमकरया अपनी इंद्रियों का पूरा प्रयोग कर युद्ध में रथ चलाए तो जमकरश्‍यामा मालिन बनकर राधा को फूल बेचने जाए तो जमकरअपनी शक्ति का दर्शन ढूंढ़े और गाए तो जमकर। कृष्‍ण ललकारता है मनुष्‍य को अकृपण बनने के लिएअपनी शक्ति को पूरी तरह ओर एकाग्र उछालने के लिए। मनुष्‍य करता कुछ हैध्‍यान कुछ दूसरी तरफ रहता है। झाड़ू देता है फिर भी कूड़ा कोनों में पड़ा रहता है। एकाग्र ध्‍यान न हो तो सब इंद्रियों का अकृपण प्रयोग कैसे हो। 'कूर्मोगानीवऔर 'समग्र-अंग-एकाग्रीमनुष्‍य को बनना है। यही तो देवता की मनुष्‍य बनने की कोशिश है। देखोमांइंद्र खाली वास लेता हैमैं तो खाता हूं।

आसमान के देवताओं को जो भगाए उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ के लिए तैयार रहना चाहिएतभी कृष्‍ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उंगली पर उठाना पड़ा। इंद्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करतातो ऐसा कृष्‍ण किस काम का। फिर कृष्‍ण के रक्षा-युग का आरंभ होने वाला था। एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर लीला है। कालिया-दहन और कंस वध उसके आसपास के हैं। गोवर्धन उठाने में कृष्‍ण की उंगली दु:खी होगीअपने गोपों और सखाओं को कुछ झुंझला कर सहारा देने को कहा होगा। मां को कुछ इतरा कर उंगली दुखने की शिकायत की होगी। गोपियों से आंख लड़ाते हुए अपनी मुस्‍कान द्वारा कहा होगा। उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्‍ण की तो आपस में गंभीर और प्रफल्लित मुद्रा रही होगी। कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्‍ण ने अधिक निहारा होगामां की ओर इतरा करया राधा की ओर प्रफुल्‍ल होकर। उंगली बेचारे की दुख रही थी। अब तक दुख रही हैगोवर्धन में तो यही लगता है। वहीं पर मानस गंगा है। जब कृष्‍ण ने गऊ वंश रूपी दानव को मारा थाराधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्‍थल पर कृष्‍ण से गंगा मांगी। बेचारे कृष्‍ण को कौन-कौन-से असंभव काम करने पड़े हैं। हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है दूसरों को सुखी बनाने के लिए। उसकी उंगली दुख रही है। चलोउसको सहारा दें।

गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों नेजिनमें पंडे होते ही हैंप्रश्‍न किया कि मैं कहां का हूंमैंने छेड़ते हुए उत्‍तर दियाराम की अयोध्‍या का। पंडों ने जवाब दियासब माया एक है। जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्‍तू वाले राम से गोवर्धन वासियों का नेह कैसे चल सकता है। उनका दिल तो माखन-मिसरी वाले कृष्‍ण से लगा है।

माखन-मिसरी वाला कृष्‍णसत्‍तू वाला राम कुछ सही हैपर उसकी अपनी उंगली अब तक दुख रही है।
एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुई। पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोई नतीजा न निकलान निकलने वाला था। लेकिन क्‍या मीठी मुस्‍कान से उस पंडे ने कहा कि जीवन में दो मीठी बात ही तो सब कुछ है। कृष्‍ण मीठी बात करना सिखा गया है। आसमान वाले देवताओं को भगा गया हैमाखन-मिसरी वाले देवों की प्रतिष्‍ठा कर गया है। लेकिन उसका अपना कौन-कौन-सा अंग अब तक दुख रहा है।

कृष्‍ण की तरह एक और देवता हो गया है जिसने मनुष्‍य बनने की कोशिश की। उसका राज्‍य संसार में अधिक फैला। शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़ई का बेटा था और उसकी अपनी जिंदगी में वैभव और ऐश न था। शायद इसलिए कि जन-रक्षा का उसका अंतिम काम ऐसा था कि उसकी उंगली सिर्फ न दुखीउसके शरीर का रोम-रोम सिहरा और अंग-अंग टूटकर वह मरा। अब तक लोग उसका ध्‍यान करके अपने सीमा बांधने वाले चमड़े से बाहर उछलते हैं। हो सकता है कि ईसू मसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया है कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज की मालिक सभ्‍यता के पुरखे हैं। ईसू रोमियों पर चढ़ा। रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े। शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्‍ण-लीला का मजा ब्रज और भारतभूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्‍ण की नियति कठिन है। जो भी होकृष्‍ण और क्रिस्‍टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया। दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं-कहीं सादृश्‍य है। कभी दो महाजनों की तुलना नहीं करनी चाहिए। दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्‍ठ हैं। फिर भीक्रिस्‍टोस प्रेम के आत्‍मोसर्गी अंग के लिए बेजोड़ और कृष्‍ण संपूर्ण मनुष्‍य-लीला के लिए। कभी कृष्‍ण के वंशज भारतीय शक्तिशाली बनेंगेतो संभव है उसकी लीला दुनिया-भर में रस फैलाए।

कृष्‍ण बहुत अधिक हिंदुस्‍तान ने साथ जुड़ा हुआ है। हिंदुस्‍तान के ज्‍यादातर देव और अवतार अपनी मिट्टी के साथ सने हुए हैं। मिट्टी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्‍प्राण हो जाते हैं। त्रेता का राम हिंदुस्‍तान की उत्‍तर-दक्षिण एकता का देव है। द्वापर का कृष्‍ण देश की पूर्व-पश्चिम एकता का देव है। राम उत्‍तर-दक्षिण और कृष्‍ण पूर्व-पश्चिम धुरी पर घूमे। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि देश को उत्‍तर-दक्षिण और पूर्व-‍पश्चिम एक करना ही राम और कृष्‍ण का धर्म था। यों सभी धर्मों की उत्‍पत्ति राजनीति से हैबिखरे हुए स्‍वजनों को इकठ्ठा करनाकलह मिटानासुलह कराना और हो सके तो अपनी और सबकी सीमा को ढहाना। साथ-साथ जीवन को कुछ ऊंचा उठानासदाचार की दृष्टि से और आत्‍म-चिंतन की भी।

देश की एकता और समाज के शुद्धि संबंधी कारणों और आवश्‍यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्‍पत्ति हुई है। अलबत्‍ताधर्म इन आवश्‍यकताओं से ऊपर उठकरमनुष्‍य को पूर्ण करने की भी चेष्‍टा करता है। किंतु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत हैउतना और कोई धर्म नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्‍ण के किस्‍से तो मनगढ़ंत गाथाएं हैंजिनमें एक अद्वितीय उद्देश्‍य हासिल करना थाइतने बड़े देश के उत्‍तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम को एक रूप में बांधना था। इस विलक्षण उद्देश्‍य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्‍से बने। मेरा मतलब यह नहीं कि सब के सब किस्‍से झूठे हैं। गोवर्धन पर्वत का किस्‍सा जिस रूप में प्रचलित है उस रूप में झूठा तो है हीसाथ-साथ न जाने कितने और किस्‍सेजो कितने और आदमियों के रहे होंएक कृष्‍ण अथवा राम के साथ जुड़ गए हैं। जोड़ने वालों को कमाल हासिल हुआ। यह भी हो सकता है कि कोई न कोई चमत्‍कारिक पुरुष राम और कृष्‍ण के नाम हुए हों। चमत्‍कार भी उनका संसार के इतिहास में अनहोना रहा हो। लेकिन उन गाथाकारों का यह कम अनहोना चमत्‍कार नहीं हैजिन्‍होंने राम और कृष्‍ण के जीवन की घटनाओं को इस सिलसिले और तफसील में बांधा है कि इतिहास भी उसके सामने लजा गया है। आज के हिंदुस्‍तानी राम और कृष्‍ण की गाथाओं की एक-एक तफसील को चाव से और सप्रमाण जानते हैंजबकि ऐतिहासिक बुद्ध और अशोक उनके लिए धुंधली स्‍मृति-मात्र रह गए हैं।

महाभारत हिंदुस्‍तान की पूर्व-पश्चिम यात्रा हैजिस तरह रामायण उत्‍तर-दक्षिण यात्रा है। पूर्व-पश्चिम यात्रा का नायक कृष्‍ण हैजिस तरह उत्‍तर-दक्षिण यात्रा का नायक राम है। मणिपुर से द्वारिका तक कृष्‍ण या उसके सहचरों का पराक्रम हुआ हैजैसे जनकपुर में श्रीलंका तक राम या उसके सहचरों का। राम का काम अपेक्षाकृत सहज था। कम से कम उस काम में एकरसता अधिक थी। राम का मुकाबला या दोस्‍ती हुई भीलकिरातकिन्‍नरराक्षस इत्‍यादि सेजो उसकी अपनी सभ्‍यता से अलग थे। राम का काम था इनको अपने में शामिल करना और उनको अपनी सभ्‍यता में ढाल देनाचाहे हराए बिना या हराने के बाद।

कृष्‍ण को वास्‍ता पड़ा अपने ही लोगों से। एक ही सभ्‍यता के दो अंगों में से एक को लेकर भारत की पूर्व-पश्चिम एकता कृष्‍ण को स्‍थापित करनी पड़ी। इस काम में पेंच ज्‍यादा थे। तरह-तरह की संधि और विग्रह का क्रम चला। न जाने कितनी चालकियां और धूर्तताएं भी हुईं। राजनीति का निचोड़ भी सामने आया - ऐसा छनकर जैसा फिर और न हुआ। अनेकों ऊंचाइयां भी छुई गईं। दिलचस्‍प किस्‍से भी खूब हुए। जैसी पूर्व-पश्चिम राजनीति जटिल थीवैसे ही मनुष्‍यों के आपसी संबंध भीखासकर मर्द-औरत के। अर्जुन की मणिपुर वाली चित्रागंदाभीम की हिडंबाऔर पांचाली को तो कहना ही क्‍या। कृष्‍ण की बुआ कुंती का एक बेटा था अर्जुनदूसरा कर्णदोनों अलग-अलग बापों सेऔर कृष्‍ण ने अर्जुन को कर्ण का छल-वध करने के लिए उकसाया। फिर भीक्‍यों जीवन का निचोड़ छनकर आयाक्‍योंकि कृष्‍ण जैसा निस्‍व मनुष्‍य न कभी हुआ और उससे बढ़कर तो कभी होना भी असंभव है। राम उत्‍तर-दक्षिण एकता का न सिर्फ नायक बनाराजा भी हुआ। कृष्‍ण तो अपनी मुरली बजाता रहा। महाभारत की नायिका द्रौपदी से महाभारत के नायक कृष्‍ण ने कभी कुछ लिया नहींदिया ही।

पूर्व-‍पश्चिम एकता की दो धुरियां स्‍पष्‍ट ही कृष्‍ण-काल में थीं। एक पटना-गया की मगध-धुरी और दूसरी हस्तिनापुर-इंद्रप्रस्‍थ की कुरु-धुरी। मगध-धुरी का भी फैलाव स्‍वयं कृष्‍ण की मथुरा तक था जहां मगध-नरेश जरासंध का दामाद कंस राज्‍य करता था। बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित-मित्र थे। मगध-धुरी के खिलाफ कुरु-धुरी का सशक्‍त निर्माता कृष्‍ण था। कितना बड़ा फैलाव किया कृष्‍ण ने इस धुरी का। पूर्व में मणिपुर से लेकर पश्चिम में द्वारिका तक इस कुरु-धुरी में समावेश किया। देश की दोनों सीमाओंपूर्व की पहाड़ी सीमा और पश्चिम की समुद्री सीमा को फांसा और बांधा। इस धुरी को कायम ओर शक्तिशाली करने के लिए कृष्‍ण को कितनी मेहनत और कितने पराक्रम करने पड़ेऔर कितनी लंबी सूझ सोचनी पड़ी। उसने पहला वार अपने ही घर मथुरा में मगधराज के दामाद पर किया। उस समय सारे हिंदुस्‍तान में यह वार गूंजा होगा। कृष्‍ण की यह पहली ललकार थी। वाणी द्वारा नहींउसने कर्म द्वारा रण-भेरी बजाई। कौन अनसुनी कर सकता था। सबको निमंत्रण हो गया यह सोचने के लिए कि मगध राजा को अथवा जिसे कृष्ण कहे उसे सम्राट के रूप में चुनो। अंतिम चुनाव भी कृष्‍ण ने बड़े छली रूप में रखा। कुरु-वंश में ही न्‍याय-अन्‍याय के आधार पर दो टुकड़े हुए और उनमें अन्‍यायी टुकड़ी के साथ मगध-धुरी को जुड़वा दिया। कृष्‍ण संसार ने सोचा होगा कि वह तो कुरुवंश का अंदरूनी और आपसी झगड़ा है। कृष्‍ण जानता था कि वह तो इंद्रप्रस्‍थ-हस्तिनापुर की कुरु-धुरी और राजगिरि की मगध-धुरी का झगड़ा है।

राजगिरि राज्‍य कंस-वध पर तिलमिला उठा होगा। कृष्‍ण ने पहले ही वार में मगध की पश्चिमी शक्ति को खत्‍म-सा कर दिया। लेकिन अभी तो ताकत बहुत ज्‍यादा बटोरनी और बढ़ानी थी। यह तो सिर्फ आरंभ था। आरंभ अच्‍छा हुआ। सारे संसार को मालूम हो गया। लेकिन कृष्‍ण कोई बुद्धू थोड़े ही था जो आरंभ की लड़ाई को अंत की बना देता। उसके पास अभी इतनी ताकत तो थी नहीं जो कंस के ससुर और उसकी पूरे हिंदुस्‍तान की शक्ति से जूझ बैठता। वार करकेसंसार को डंका सुना के कृष्‍ण भाग गया। भागा भी बड़ी दूरद्वारिका में। तभी से उसका नाम रणछोड़दास पड़ा। गुजरात में आज भी हजारों लोगशायद एक लाख से भी अधिक लोग होंगेजिनका नाम रणछोड़दास है। पहले मैं इस नाम पर हंसा करता थामुस्‍काना तो कभी न छोडूंगा। योंहिंदुस्‍तान में और भी देवता हैं जिन्‍होंने अपना पराक्रम भागकर दिखाया जैसे ज्ञानवापी के शिव ने। यह पुराना देश है। लड़ते-लड़ते थकी हड्डियों को भगाने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन कृष्‍ण थकी पिंडलियों के कारण नहीं भागा। वह भागा जवानी की बढ़ती हुई हड्डियों के कारण। अभी हड्डियों को बढ़ाने और फैलाने का मौका चाहिए था। कृष्‍ण की पहली लड़ाई तो आज तक की छापामार लड़ाई की तरह थीवार करो और भागो। अफसोस यही है कि कुछ भक्‍त लोग भागने ही में मजा लेते हैं।

द्वारिका मथुरा से सीधे फासले पर करीब 700 मील है। वर्तमान सड़कों की यदि दूरी नापी जाए तो करीब 1,050 मील होती है। बिचली दूरी इस तरह करीब 850 मील होती है। कृष्‍ण अपने शत्रु से बड़ी दूर तो निकल ही गयासाथ ही साथ देश की पूर्व-पश्चिम एकता हासिल करने के लिए उसने पश्चिम के आखिरी नाके को बांध लिया। बाद मेंपांचों पांडवों के बनवास युग में अर्जुन की चित्रांगदा और भीम की हिडंबा के जरिए उसने पूर्व के आखिरी नाके को भी बांधा। इन फासलों को नापने के लिए मथुरा से अयोध्‍याअयोध्‍या से राजमहल और राजमहल से इम्‍फाल की दूरी जानना जरूरी है। यही रहे होंगे उस समय के महान राजमार्ग। मथुरा से अयोध्‍या की बिचली दूरी करीब 300 मील है। अयोध्‍या से राजमहल करीब 470 मील है। राजमहल से इम्‍फाल की बिचली दूरी करीब सवा पांच सौ मील होयों वर्तमान सड़कों से फासला करीब 850 मील और सीधा फासला करीब 380 मील है। इस तरह मथुरा से इम्‍फाल का फासला उस समय के राजमार्ग द्वारा करीब 1,600 मील रहा होगा। कुरु-धुरी के केंद्र पर कब्‍जा करने और उसे सशक्‍त बनाने के पहले कृष्‍ण केंद्र से 800 मील दूर भागा और अपने सहचरों और चेलों को उसने 1,600 मील दूर तक घुमाया। पूर्व-पश्चिम की पूरी भारत यात्रा हो गई। उस समय की भारतीय राजनीति को समझने के लिए कुछ दूरियां और जानना जरूरी है। मथुरा से बनारस का फासला करीब 370 मील और मथुरा से पटना करीब 500 मील है। दिल्‍ली सेजो तब इंद्रप्रस्‍थ थीमथुरा का फासला करीब 90 मील है। पटने से कलकत्‍ते का फासला करीब सवा तीन सौ मील है। कलकत्‍ते के फासले का कोई विशेष तात्‍पर्य नहींसिर्फ इतना ही कि कलकत्‍ता भी कुछ समय तक हिंदुस्‍तान की राजधानी रहा हैचाहे गुलाम हिंदुस्‍तान की। मगध-धुरी का पुनर्जन्‍म एक अर्थ में कलकत्‍ते में हुआ। जिस तरह कृष्‍ण-कालीन मगध-धुरी के लिए राजगिरि केंद्र हैउसी तरह ऐतिहासिक मगध-धुरी के लिए पटना या पाटलिपुत्र केंद्र हैऔर इन दोनों का फासला करीब 40 मील है। पटना-राजगिरि केंद्र का पुनर्जन्‍म कलकत्‍ते में होता हैइसका इतिहास के विद्यार्थी अध्‍ययन करेंचाहे अध्‍ययन करते समय संतापपूर्ण विवेचन करें कि यह काम विदेशी तत्‍वावधान में क्‍यों हुआ।

कृष्‍ण ने मगध-धुरी का नाश करके कुरु-धुरी की क्‍यों प्रतिष्‍ठा करनी चाहीइसका एक उत्‍तर तो साफ हैभारतीय जागरण का बाहुल्‍य उस समय उत्‍तर और पश्चिम में था जो राजगिरि और पटना से बहुत दूर पड़ जाता था। उसके अलावा मगध-धुरी कुछ पुरानी बन चुकी थीशक्तिशाली थीकिंतु उसका फैलाव संकुचित था। कुरु-धुरी नई थी और कृष्‍ण इसकी शक्ति और इसके फैलाव दोनों का ही सर्वशक्तिसंपन्‍न निर्माता थामगध-धुरी को जिस तरह चाहता शायद न मोड़ सकताकुरु-धुरी को अपनी इच्‍छा के अनुसार मोड़ और फैला सकता था। सारे देश को बांधना जो था उसे। कृष्‍ण त्रिकालदर्शी था। उसने देख लिया होगा कि उत्‍तर-पश्चिम में आगे चलकर यूनानियोंहूणोंपठानोंमुगलों आदि के आक्रमण होंगे इ‍सलिए भारतीय एकता की धुरी का केंद्र कहीं वहीं रचना चाहिएजो इन आक्रमणों का सशक्‍त मुकाबला कर सके। लेकिन त्रिकालदर्शी क्‍यों न देख पाया कि इन विदेशी आक्रमणों के पहले ही देशी मगध-धुरी बदला चुकाएगी और सैकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्‍व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक कृष्‍ण की भूमि के नजदीक यानी कन्नौज और उज्‍जैन तक खिसक चुकी होगीकिंतु अशक्‍त अवस्‍था में। त्रिकालदर्शी ने देखा शायद यह सब कुछ होलेकिन कुछ न कर सका हो। वह हमेशा के लिए अपने देशवासियों को कैसे ज्ञानी और साधु दोनों बनाता। वह तो केवल रास्‍ता दिखा सकता था। रास्‍ते में भी शायद त्रुटि थी। त्रिकालदर्शी को यह भी देखना चाहिए था कि उसके रास्‍ते पर ज्ञानी ही नहींअनाड़ी भी चलेंगे और वे कितना भारी नुकसान उठाएंगे। राम के रास्‍ते चलकर अनाड़ी का भी अधिक नहीं बिगड़ताचाहे बनना भी कम होता है। अनाड़ी ने कुरु-पांचाल संधि का क्‍या किया?

कुरु-धुरी की आधार-शिला थी कुरु-पांचाल संधि। आसपास के इन दोनों इलाकों का वज्र समान एका कायम करना था जो कृष्‍ण ने उन लीलाओं के द्वारा कियाजिनसे पांचाली का विवाह पांचों पांडवों से हो गया। यह पांचाली भी अद्भुत नारी थी। द्रौपदी से बढ़करभारत की कोई प्रखर-मुखी और ज्ञानी नारी नहीं। कैसे कुरु सभा को उत्‍तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्‍या दूसरे को दांव पर रखने की उसमें स्‍वतंत्र सत्‍ता है?

पांचों पांडव और अर्जुन भी उसके सामने फीके थे। यह कृष्‍णा तो कृष्‍ण के ही लायक थी। महाभारत का नायक कृष्‍णनायिका कृष्‍णा। कृष्‍णा और कृष्‍ण का संबंध भी विश्‍व-साहित्‍य में बेमिसाल है। दोनों सखा-सखी का संबंध पूर्ण रूप से मन की देन थी या उसमें कुरु-धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश थाजो होकृष्‍णा और कृष्‍ण का यह संबंध राधा और कृष्‍ण के संबंध से कम नहींलेकिन साहित्यिकों और भक्‍तों की नजर इस ओर कम पड़ी है। हो सकता है कि भारत की पूर्व-पश्चिम एकता के इस निर्माता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्मन कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ाशायद इसलिए कि यदि वह व्‍यस्‍क कर्मफल-हेतु बन जातातो इतना अनहोना निर्माता हो ही नहीं सकता था। उसने कभी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी-केंद्र बनाएउसके लिए दूसरों का इंद्रप्रस्‍थ और हस्तिनापुर ही अच्‍छा रहा। उसी तरह कृष्‍णा को भी सखी रूप में रखाजिसे संसारी अपनी कहता हैवैसी न बनाया। कौन जाने कृष्‍ण के लिए यह सहज था या इसमें भी उसका दिल दुखा था।

कृष्‍णा अपने नाम के अनुरूप सांवली थीमहान सुंदरी रही होगी। उसकी बुद्धि का तेजउसकी चकित-हरिणी आंखों में चमकता रहा होगा। गोरी की अपेक्षा सुंदर सांवलीनखशिख और अंग में अधिक सुडौल होती है। राधा गोरी रही होगी। बालक और युवक कृष्‍ण राधा में एकरस रहा। प्रौढ़ कृष्‍ण के मन पर कृष्‍णा छाई रही होगीराधा और कृष्‍ण तो एक थे ही। कृष्‍ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी। बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्‍था में श्‍यामा को निहारना। कृष्‍ण-कृष्‍णा संबंध में और कुछ हो न होभारतीय मर्दों को श्‍यामा की तुलना में गोरी के प्रति अपने पक्षपात पर ममन करना चाहिए।

रामायण की नायिका गोरी है। महाभारत की नायिका कृष्‍णा है। गोरी की अपेक्षा सांवली अधिक सजीव है। जो भी होइसी कृष्‍ण-कृष्‍णा संबंध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्‍म हुआ। न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्‍याग। कृष्‍णा पांचाल यानी कन्नौज के इलाके की थीसंयुक्‍ता भी। धुरी-केंद्र इंद्रप्रस्‍थ का अनाड़ी राजा पृथ्‍वीराज अपने पुरखे कृष्‍ण के रास्‍ते न चल सका। जिस पांचाली द्रौपदी के जरिए कुरु-धुरी की आधार-शिला रखी गईउसी पांचाली संयुक्‍ता के जरिए दिल्‍ली-कन्नौज की होड़ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बना। कभी-कभी लगता है कि व्‍यक्ति का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्‍म होता हैकभी फीका कभी रंगीला। कहां द्रौपदी और कहां संयुक्‍ताकहां कृष्‍ण और कहां पृथ्‍वीराजयह सही है। फीका और मारात्‍मक पुनर्जन्‍म लेकिन पुनर्जन्‍म तो है ही।

कृष्‍ण की कुरु-धुरी के और भी रहस्‍य रहे होंगे। साफ है कि राम आदर्शवादी एकरूप एकत्‍व का निर्माता और प्रतीक था। उसी तरह जरासंध भौतिकवादी एकत्‍व का निर्माता था। आजकल कुछ लोग कृष्‍ण और जरासंध युद्ध को आदर्शवाद-भौतिकवाद का युद्ध मानने लगे हैं। वह सही जंचता हैकिंतु अधूरा विवेचन। जरासंध भौतिकवादी एकरूप एकत्‍व का इच्‍छुक था। बाद के मगधीय मौर्य और गुप्‍त राज्यों में कुछ हद तक इसी भौतिकवादी एकरूप एकत्‍व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी के अनुरूप बौद्ध धर्म का। कृष्‍ण आदर्शवादी बहुरूप एकत्‍व का निर्माता था। जहां तक मुझे मालूम हैअभी तक भारत का निर्माण भौतिकवादी एकत्व के आधार पर कभी नहीं हुआ। चिर चमत्‍कार तो तब होगा जब आदर्शवाद और भौतिकवाद के मिले-जुले बहुरूप एकत्‍व के आधार पर भारत का निर्माण होगा। अभी तक तो कृष्‍ण का प्रयास ही सर्वाधिक मानवीय मालूम होता हैचाहे अनुकरणीय राम का एकरूप एकत्‍व ही हो। कृष्‍ण की बहुरूपता में वह त्रिकाल-जीवन है जो औरों में नहीं।

कृष्‍ण यादव-शिरोमणि थाकेवल क्षत्रिय राजा ही नहींशायद क्षत्री उतना नहीं थाजितना अहीर। तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग हैक्षत्राणी द्रौपदी उसे हटा न पाई। विराट् विश्‍व और त्रिकाल के उपयुक्‍त कृष्‍ण बहुरूप था। राम और जरासंध एकरूप थेचाहे आदर्शवादी एकरूपता में केंद्रीयकरण और क्रूरता कम होलेकिन कुछ न कुछ केंद्रीयकरण तो दोनों में होता है। मौर्य और गुप्‍त राज्‍यों में कितना केंद्रीयकरण थाशायद क्रूरता भी।

बेचारे कृष्‍ण ने इतनी नि:स्‍वार्थ मेहनत कीलेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा है। सिर्फ बंगाल में ही मुर्दे - 'बोल हरिहरि बोलके उच्‍चारण से - अपनी आखरी यात्रा पर निकाले जाते हैंनहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़कर सारे भारत में हिंदू मुर्दे 'राम नाम सत्‍य हैके साथ ही ले जाए जाते हैं। बंगाल के इतना तो नहींफिर भी उड़ीसा और असम में कृष्‍ण का स्‍थान अच्‍छा है। कहना मुश्किल है कि राम और कृष्‍ण में कौन उन्‍नीसकौन बीस है। सबसे आश्‍चर्य की बात है कि स्‍वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहां एक-दूसरे को 'जैरामजीसे नमस्‍ते करते हैं। सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह 'जैरामजीबड़ा मीठा लगता हैशायद एक कारण यह भी हो।

राम त्रेता के मीठेशांत और सुसंस्‍कृत युग का देव है। कृष्‍ण पकेजटिलतीखे और प्रखर बुद्धि युग का देव है। राम गम्‍य हैकृष्‍ण अगम्‍य है। कृष्‍ण ने इतनी अधिक मेहनत की कि उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैंयदि बनाते भी हैं तो उसके मित्रभेद ओर कूटनीति की नकल करते हैंउसका अथक निस्‍व उनके लिए असाध्‍य रहता है। इसीलिए कृष्‍ण हिंदुस्‍तान में कर्म का देव न बन सका। कृष्‍ण ने कर्म राम से ज्‍यादा किए हैं। कितने संधि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी संबंधों के धागे उसे पलटने पड़ते थे। यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं कि प्रदेशों के आपसी संबंधों में कृष्‍णनीति अब भी चलाई जाए। कृष्‍ण जो पूर्व-पश्चिम की एकता दे गयाउसी के साथ-साथ उस नीति का औचित्‍य भी खत्‍म हो गया। बच गया कृष्‍ण का मन और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक हिंदुस्‍तानी इन दोनों का समन्‍वय नहीं कर पाए हैं। करें तो राम के कर्म में भी परिवर्तन आए। राम रोऊ हैइतना कि मर्यादा भंग होती है। कृष्‍ण कभी रोता नहीं। आंखें जरूर डबडबाती हैं उसकीकुछ मौकों परजैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्‍ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं।

कैसे मन और वाणी थे उस कृष्‍ण के। अब भी तब की गोपियां और जो चाहें वेउसकी वाणी और मुरली की तान सुनकर रस विभोर हो सकते हैं और अपने चमड़े के बाहर उछल सकते हैं। साथ ही कर्म-संग के त्‍यागसुख-दु:खशीत-उष्‍णजय-अजय के समत्‍व के योग और सब भूतों में एक अव्‍यय भाव का सुरीला दर्शनउसकी वाणी से सुन सकते हैं। संसार में एक कृष्‍ण ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया।

वाणी की देवी द्रौपदी से कृष्‍ण का संबंध कैसा था। क्‍या सखा-सखी का संबंध स्‍वयं एक अंतिम सीढ़ी और असीम मैदान हैजिसके बाद और किसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहींकृष्‍ण छलिया जरूर थालेकिन कृष्‍णा से उसने कभी छल न किया। शायद वचनबद्ध थाइसलिए। जब कभी कृष्‍णा ने उसे याद कियावह आया। स्त्री-पुरुष की किसलय-मित्रता कोआजकल के वैज्ञानिकअवरुद्ध रसिकता के नाम से पुकारते हैं। यह अवरोध सामाजिक या मन के आंतरिक कारणों से हो सकता है। पांचों पांडव कृष्‍ण के भाई थे और द्रौपदी कुरु-पांचाल संधि की आधार-शिला थी। अवरोध के सभी कारण मौजूद थे। फिर भीहो सकता है कि कृष्‍ण को अपनी चित्‍तप्रवृत्तियों का कभी निरोध न करना पड़ा हो। यह उसके लिए सहज और अंतिम संबंध थाठीक उतना ही सहज और रसमयजैसा राधा से प्रेम का संबंध था। अगर यह सही हैतो कृष्‍ण-कृष्‍णा के सखा-सखी संबंध का ब्‍योरा दुनिया में विश्‍वास का होना चाहिए और तफसीली सेजिससे स्त्री-पुरुष संबंध का एक नया कमरा खुल सके। अगर राधा की छटा कृष्‍ण पर हमेशा छाई रहती हैतो कृष्‍ण की घटा भी उस पर छाई रहती है। अगर राधा की छटा निराली हैतो कृष्‍ण की घटा भी। छटा में तुष्टिप्रदान रस हैघटा में उत्‍कंठा-प्रधान कर्तव्‍य।

राधा-रस तो निराला है ही। राधा-कृष्‍ण हैंराधा कृष्‍ण का स्‍त्री रूप और कृष्‍ण राधा का पुरुष रूप। भारतीय साहित्‍य में राधा का जिक्र बहुत पुराना नहीं हैक्‍योंकि सबसे पहली बार पुराण में आता है 'अनुराधाके नाम से। नाम ही बताता है प्रेम और भक्ति का वह स्‍वरूपजो आत्‍मविभोर हैजिससे सीमा बांधने वाली चमड़ी रह नहीं जाती। आधुनिक समय में मीरा ने भी उस आत्‍मविभोरता को पाने की कोशिश की। बहुत दूर तक गई मीराशायद उतनी दूर गई जितना किसी सजीव देह को किसी याद के लिए जाना संभव हो। फिर भीमीरा की आत्‍मविभोरता में कुछ गर्मी थी। कृष्‍ण को तो कौन जला सकता हैसुलगा भी नहीं सकतालेकिन मीरा के पास बैठने में उसे जरूर कुछ पसीना आएकम से कम गर्मी तो लगे। राधा न गरम है न ठंडीराधा पूर्ण है। मीरा की कहानी एक और अर्थ में बेजोड़ है। पद्मिनी मीरा की पुरखिन थी। दोनों चित्‍तौड़ की नायिकाएं हैं। करीब ढाई सौ वर्ष का अंतर है। कौन बड़ी हैवह पद्मिनी जो जौहर करती है या वह मीरा जिसे कृष्‍ण के लिए नाचने से कोई मना न कर सका। पुराने देश की यही प्रतिभा है। बड़ा जमाना देखा है इस हिंदुस्‍तान ने। क्‍या पद्मिनी थकती-थकती सैकड़ों वर्ष में मीरा बन जाती हैया मीरा ही पद्मिनी का श्रेष्‍ठ स्‍वरूप हैअथवा जब प्रताप आता हैतब मीरा फिर पद्मिनी बनती है। हे त्रिकालदर्शी कृष्‍ण! क्‍या तुम एक ही में मीरा और पद्मिनी नहीं बना सकते?

राधा-रस का पूरा मजा तो ब्रज-रज में मिलता है। मैं सरयू और अयोध्‍या का बेटा हूं। ब्रज-रस में शायद कभी न लोट सकूंगा। लेकिन मन से तो लोट चुका हूं। श्री राधा की नगरी बरसाने के पास एक रात रहकर मैंने राधानारी के गीत सुने हैं।

कृष्‍ण बड़ा छलिया था। कभी श्‍यामा मालिन बनकरराधा को फूल बेचने आता था। कभी वैद्य बनकर आता थाप्रमाण देने कि राधा अभी ससुराल जाने लायक नहीं है। कभी राधा प्‍यारी को गोदाने का न्‍योता देने के लिए गोदनहारिन बनकर आता था। कभी वृंदा की साड़ी पहन कर आता था और जब राधा उससे एक बार चिपटकर अलग होती थीशायद झुंझलाकरशायद इतराकरतब भी कृष्‍ण मुरारी को ही छट्ठी का दूध याद आता थाबैठकर समझाओ राधारानी को कि वृंदा से आंखें नहीं लड़ाईं।

मैं समझता हूं कि नारी अगर कहीं नर के बराबर हुई हैतो सिर्फ ब्रज में और कान्‍हा के पास। शायद इसीलिए आज भी हिंदुस्‍तान की औरतें वृंदावन में जमुना के किनारे एक पेड़ में रूमाल जितनी चुनड़ी बांधने का अभिनय करती हैं। कौन औरत नहीं चाहेगी कन्‍हैया से अपनी चुनड़ी हरवानाक्‍योंकि कौन औरत नहीं जानती कि दुष्‍टजनों द्वारा चीरहरण के समय कृष्‍ण ही उनकी चुनड़ी अनंत करेगा। शायद जो औरतें पेड़ में चीर बांधती हैंउन्‍हें यह सब बताने पर वह लजाएंगीलेकिन उनके पुत्र पुण्‍य आदि की कामना के पीछे भी कौन-सी सुषुप्‍त याद है।

ब्रज की मुरली लोगों को इतना विह्रल कैसे बना देती है कि वे कुरुक्षेत्र के कृष्‍ण को भूल जाएं और फिर मुझे तो लगता है कि अयोध्‍या का राम मणिपुर से द्वारिका के कृष्‍ण को कभी भुलाने न देगा। जहां मैंने चीर बांधने का अभिनय देखा उसी के नीचे वृंदावन के गंदे पानी का नाला बहते देखाजो जमुना से मिलता है और राधारानी के बरसाने की रंगीली गली में पैर बचा-बचाकर रखना पड़ता है कि कहीं किसी गंदगी में न सन जाए। यह वही रंगीली गली हैजहां से बरसाने की औरतें हर होली पर लाठी लेकर निकलती हैं और जिनके नुक्‍कड़ पर नंद गांव में मर्द मोटे साफे बांध और बड़ी ढालों से अपनी रक्षा करते हैं। राधारानी अगर कहीं आ जाएतो वह इन नालों और गंदगियों को खत्‍म करे हीबरसाने की औरतों के हाथ में इत्रगुलाल और हल्‍केभीनी महक वालेरंग की पिचकारी थमाए और नंद गांव के मर्दों को होली खेलने के लिए न्‍योता दे। ब्रज में महक और नहीं हैकुंज नहीं हैकेवल करील रह गए हैं। शीतलता खत्‍म है। बरसाने में मैंने राधारानी की अहीरिनों को बहुत ढूंढा। पांच-दस घर होंगे। वहां बनियाइनों और ब्राह्मणियों का जमाव हो गया है। जब किसी जात में कोई बड़ा आदमी या बड़ी औरत हुईतीर्थ-स्‍थान बना और मंदिर और दुकानें देखते-देखते आईंतब इन द्विज नारियों के चेहरे भी म्‍लान थेगरीबकृश और रोगी। कुछ लोग मुझे मूर्खतावश द्विज-शत्रु समझने लगे हैं। मैं तो द्विज-मित्र हूंइसलिए देख रहा हूं कि राधारानी की गोपियोंमल्‍लाहिनों और चमाइनों को हटाकर द्विजनारियों ने भी अपनी कांति खो दी है। मिलाओ ब्रज की रज में पुष्‍पों की महकदो हिंदुस्‍तान को कृष्‍ण की बहुरूपी एकताहटाओ राम का एकरूपी द्विज-शूद्र धर्मलेकिन चलो राम के मर्यादा वाले रास्‍ते परसच और नियम पालन कर।

   सरयू और गंगा कर्तव्‍य की नदियां हैं। कर्तव्‍य कभी-कभी कठोर होकर अन्‍यायी हो जाता है और     नुकसान कर बैठता है। जमुना और चंबलकेन तथा दूसरी जमुना-मुखी नदियां रस की             नदियां हैं। रस में मिलन हैकलह मिटाता है। लेकिन आलस्‍य भी हैजो गिरावट में मनुष्‍य को     निकम्‍मा बना देता है। इसी रसभरी इतराती जमुना के किनारे कृष्‍ण ने अपनी लीला कीलेकिन     कुरु-धुरी का केंद्र उसने गंगा के किनारे ही बसाया। बाद मेंहिंदुस्‍तान के कुछ राज्‍य जमुना के     किनारे बने और एक अब भी चल रहा है। जमुनाक्‍या तुम कभी बदलोगीआखिर गंगा में ही तो   गिरती हो। क्‍या कभी इस भूमि पर रसमय कर्तव्‍य का उदय होगा। कृष्‍ण! कौन जाने तुम थे या     नहीं। कैसे तुमने राधा-लीला को कुरु-लीला से निभाया। लोग कहते हैं कि युवा कृष्‍ण का प्रौढ़ कृष्‍ण   से कोई संबंध नहीं। बताते हैं कि महाभारत में राधा का नाम तक नहीं। बात इतनी सच           नहींक्‍योंकि शिशुपाल ने क्रोध में कृष्‍ण की पुरानी बातें साधारण तौर पर बिना नामकरण के       बताई हैं। सभ्‍य लोग ऐसे जिक्र असमय नहीं किया करतेजो समझते हैं वेऔर जो नहीं समझते   वे भी। महाभारत में राधा का जिक्र हो कैसे सकता है। राधा का वर्णन तो वहीं होगा जहां तीन     लोक का स्‍वामी उसका दास है। रास का कृष्‍ण और गीता का कृष्‍ण एक है। न जाने हजारों वर्ष से   अभी तक पलड़ा इधर या उधर क्‍यों भारी हो जाता हैबताओ कृष्‍ण!

Sunday, 9 November 2014

Kiss for love, A reaction / किस फॉर लव , एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह



यह चित्र हमारी धरोहर का है. चंदेलों की अद्भुत विरासत खजुराहो का है जिसे खर्जुरवाह कभी कहा जाता था. जैजाक भुक्ति प्रदेशया बुंदेलखंड के चंदेलों की भूमि की यह विरासत विश्व दाय की सूची में आती है. काम सूत्र में वर्णित आसनों पर आधारित ये मूर्तियां अपने गर्भ गृह में काम का ही नाश कर देने वालेशिव जो महाहोगी थे को भी स्थान दिए हुए है. शिव ने क्रोध के वशीभूत हो कर काम का नाश किया. उन जैसा महायोगी भी जब साधना में लीन थे तो जो पुष्प बाण कामदेव ने छोड़ा थाउसे शिव की भी साधना भटक गयी.उन्हें क्रोध आया. वह उस प्रहार को नज़रअंदाज़ न कर सकेऔर उनके क्रोध ने कामदेव को दग्ध कर दिया. क्रोध थमा तोउन्हें लगा यह तो अनर्थ हो गया. काम को पुनः जीवित किया गया. अब काम स्थूल रूम मैं कहीं हैं या नहीं पर सूक्ष्म रूप में सर्वत्र विद्यमान हैं. इस कथा से यह भी प्रतीत होता हैकाम से शिव को क्रोध आयावह उसे इग्नोर नहीं कर सके. खजुराहो के मंदिरों और उनकी दीवारों पर कामरत युग्म मूर्तियों तथा शिव के मंदिर का क्या दर्शन हैयह फिर कभी पढियेगा या सोचियेगा इस पर. फिलहाल तो यही सच है कि जीवन और काम अलग नहीं है.

किस डेएक नया उत्सव मनाया जा रहा है. चुम्बन उनको तो पसंद है ही जोइसका प्रदर्शन करने के लिए बेताब हैंऔर उन्हें भी पसंद है जो इसका विरोध संस्कृति और सभ्यता के नाम पर कर रहे है. मैं अक्सर कहता हूँकि सारे कट्टरपंथी लोग एक ही फ्रीक्वेंसी पर सोचते है . तालिबान अक्सर महिलाओं को क्या पहनें या क्या न पहनें के समादेश जारी करता रहता है. वह लोगों की व्यक्तिगत जीवनशैली में भी दखल देता है. ऐसा करने के पीछे वह धर्म और संस्कृति की आड़ भी लेता है. यहां भी यही सोच धीरे धीरे हावी हो रही है. एक तरफ राजनैतिक प्रसार है तो दूसरी तरफ संस्कृति के तथाकथित शुचिता के वाहक. राम सेने ने जब पहली बार वैलेंटाइन डे पर तोड़ फोड़ के साथ विरोध की तोलगा कि तालिबान का एक हिन्दू संस्करण धीरे धीरे अस्तित्व में आ रहा है. पर न वैल्डन्टाइन् डे का उत्सव रुका और न ही तालिबानी मनोवृत्ति.

मुझे नहीं पता कि इस चुम्बन पर्व की शुरुआत कहाँ से हुयी है. परजितनी हैरानी चुम्बन के सारवज्ज़निक प्रदर्शन पर हैंउस से अधिक हैरानी इसे रोकने के उद्योग पर है. चुम्बन को अश्लील माना जाय या नहींयह बहस का विषय हो सकता है. पर जहां तक कानूनी दृष्टिकोण का प्रश्न हैआई पी सी की धारा 294 में यह प्रावधान है कि सार्वजनिक स्थान पर अश्लील हरकत करनाएक दंडनीय अपराध है. जिसे आपत्ति हो वह इस कानूनी प्राविधान का मार्ग क्यों नहीं लेता. लेकिन क़ानून पर भरोसा कम और बाहुबल और सत्ता पर भरोसा अधिक हो तो ऐसे ही तमाशे होते हैं. अब चुम्बन लेना देना अश्लील हरक़त माना जाएगा या नहीं यह तो पुलिस जाने या अदालत. इस पर हम सबके विचार अलग अलग हो सकते हैं.

पर इस अभियान को करने से रोकने के लिए कुछ लोगों का उद्योगइस अभियान को रोक तो नहीं सका,बल्कि इसे और प्रचारित कर गया.ऐसा इस लिएभी हुआ कि जो रोकना चाहते हैंवह भी और जो इस अभियान में शामिल हैं वह भी सिर्फ प्रचार चाहते हैं . दोनों ही अपने मक़सद में सफल हैं. काम को लेकरदुनिया भर में दृष्टिकोण बदल रहे हैं. सेक्स जो कभी वर्जित और गोपन क्षेत्र थाउस पर खुल कर बात हो रही है. न सिर्फ पुरुषबल्कि महिलायें भी खुल कर बात कर रही हैं. जो जड़ता थी वह पिघल रही है. कुछ इसे बेहयाई कहेंगेकुछ इसे संस्कृति का स्खलनलेकिन यह एक परिवर्तन है मात्र. जो समय के साथ साथ हो रहा है. इसका प्रतिविम्बसोशल साइट्स और फिल्मों में देखने को मिल रहा है. आप किस रूप में इस परिवर्तन को लेते हैंयह आप जानें.

फिल्मों में भी चुम्बन दृश्यों को ले कर परहेज होता रहा है। 1952 में सिनेमैटोग्राफ अधिनियम बनने के बाद सेंसर प्रथा लागू हुयी। 1973 में राज कपूर की बेहद लोकप्रिय फिल्म बॉबी में ऋषि कपूर और डिंपल पर एक लम्बा चुम्बन दृश्य फिल्माया गया। इसके पहले भी राज कपूर की ही फिल्म मेरा नाम जोकर में एक चुम्बन दृश्य था तो रूसी अभिनेत्री के साथ राज कपूर  ने ही दिया था।  वैसे हिन्दी सिनेमा में चुम्बन का इतिहास , 1929 से शुरू होता है। यह फिल्म मूक थी और इसका नाम था द थ्रो ऑफ़ डाइस।  इसमें चुम्बन दृश्य दिया था , अभिनेता चारु रे और अभिनेत्री सीता देवी ने। सबसे प्रसिद्ध चुम्बन दृश्य था , देविका रानी और हिमांशु रॉय का। फिल्म थी कर्म। यह अधरबन्धन जिसे अंग्रेज़ी में लिपलॉक कहते हैं चार मिनट का था। अब चुम्बन दृश्य आम हो गए हैं। 

जो जबरिया किस फॉर लव रोकने का प्रयास कर रहे हैं, वह सरकार को इसे कानूनन प्रतिबंधित करने की मांग क्यों नहीं करते ? क़ानून बनवाना और उसे लागू करना कठिन है, पर हंगामा करना सबसे आसान है. कभी जातिगत वैमनस्यता, घूसखोरी आदि के खिलाफ सक्रिय होइए मित्रों ! चुम्बन दो लोगों के बीच का निजी मामला है. सारव्ज़जनिक चुम्बन से देश का कोई नुकसान होता है या नहीं मुझे नहीं मालूम, पर भ्रष्टाचार से होता है, यह सब को मालूम है. जैसे साफ़ सड़कों पर सफाई अभियान प्रतीकात्मक है वैसे ही सार्वजनिक जगहों पर चुम्बन भी प्रतीकात्मक है. यह बिना अधिकार के की जा रही मोरल पुलिसिंग के विरुद्ध है।
-विजय शंकर सिंह 


Saturday, 8 November 2014

Misunderstanding Secularism: Teaching Gita doesn’t go against Indian secularism. Teaching Gita alone does.

सेकुलरिज़्म या धर्म निफ्पेक्षता, या बेहतर होगा इसे सरव धर्म समभाव कहें काफी समय से निशाने पर है. उनके निशाने पर भी, जो इसकी आड़ में धर्म की सत्ता को ही पोषित करते हैं और उनके निशाने पर भी जो इस विचार का खुला विरोध करते है. जो खुला विरोध करते हैं, उनसे कोई विशेष भय नहीं है, पर जो इसकी आड़ में धर्म की सत्ता का पोषण प्रोत्साहित करते हैं अधिक ख़तरा उसी तरफ से है. शब्द सेकुलर का हिंदी जनुवाद धर्म निरपेक्षता कहा जाता है. कभी कभी इसे पंथ निरपेक्षता भी कह देते हैं. पर इस भावना के सबसे नज़दीक पहुंचता हुआ शब्द सर्व धर्म समभाव ही है. भारत में सेकुलर शब्द भले ही पाश्चात्य सोच का परिणाम हो, पर यह भाव भारत की आत्मा में है. देश ही नहीं दुनिया के सबसे प्राचीन सनातन धर्म में यह भाव उसकी सनातन उदारता के कारण आया है. आज भी सनातनं धर्म, किसी को बांधता नहीं है मुक्त ही करता है. ईश्वर को मानें , या न मानें, एकेश्वर वाद को मानें या बहुदेववाद को, या बिलकुल भी न मानें, धर्म की तरफ से कोई बंदिश नहीं है.
भारत में सनातन धर्म के समानांतर, जैनियों की परंपरा भी चली है. भले ही महावीर, जैन धर्म के प्रवर्तक माने जाते हैं पर प्रथम तीर्थनकर, ऋषभदेव ऋग्वेदिक काल में थे, और वह अयोध्या के राजा थे. जैन एक नास्तिक धर्म है जो वेदों की परंपरा में विश्वास नहीं करता. बाद में बुद्ध आये और उन्होंने जीवन की अद्भुत तर्क सम्मत व्याख्या की. ये दोनों धर्म मूलतः नास्तिक धर्म हैं. इनका दर्शन नास्तिक दर्शन है. बहुत से राजा बौद्ध और जैन रहे हैं. राज धर्म भी घोषित रूप से बौद्ध और जैन रहा है. पर सनातन धर्म भी अपने दर्शन और सोच से ज़िंदा रहा. चन्द्रगुप्त मौर्य जैन हो गया था, और अशोक तो बौद्ध था ही. राज कार्य में धर्म का हस्तक्षेप या धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं था. धर्म का प्रचार था, वाद, विवाद और संवाद थे, शास्त्रार्थ थे पर धर्मगत झगडे नहीं थे.सनातन धर्म की सभी धर्मों को समान भाव से देखने की भावना के कारण उसने इन्हें समाहित कर लिया. स्पष्ट उदाहरण है, बुद्ध को अवतार घोषित कर देना.

यह लेख गीता पर आये दो बयानों के आधार पर लिखा गया है. एक तो प्रधान मंत्री का, जो उन्होंने जापान में कहा था, दूसरा हाई कोर्ट के एक जज साहब का जो इसे दर्ज़ा एक से पढ़ाये जाने के लिए अधिकार न होने की बेबसी दिखा रहे थे. प्रधान मंत्री जी का बयान उन पर तंज़ था जो सेकुलरिज़्म की आड़ में घुमा फिरा कर धर्म की ही बात करते हैं, और जज साहब का बयान बदले निज़ाम के अनुसार था. पर गीता कभी धर्म की अधिकृत पुस्तक नहीं मानी गयी है. मूलतः यह अत्यंत व्यावहारिक उपदेश है, जो भरम को दूर कर आत्म विश्वास लौटाता है, कर्म मार्ग की ऒर उन्मुख करते हैं. इसमें ईश्वर का सबसे उदात्त रूप और भक्ति का सबसे तार्किक भाव, सखा भाव उभर कर आता है. जो धर्म जोड़ता नहीं तोड़ता है, जो धर्म समेटता नहीं बिखेरता है, जो धर्म जिलाता नहीं मारता है, जो धर्म उठाता नहीं गिराता है, जो साथ लेकर नहीं चलता, भटका देता है और जो धर्म धारण नहीं करता, बल्कि भरम में रखता, वह और कुछ भले ही हो धर्म नहीं है. 
-vss.


Speaking as the chief guest at a conference at Gujarat University’s convention hall on August 2, Supreme Court judge Justice Anil R. Dave said, “Had I been the dictator of India, I would have introduced Gita and Mahabharata in Class I. That is the way you learn how to
live life. I am sorry if somebody says I am secular or I am not secular.But we have to get good things from everywhere.”

These words reflect some of the current misunderstandings about Indian secularism. It is in consonance with Indian secularism to borrow “good things from everywhere”, including the Gita and the Mahabharata. This “ism” does not imply the secularisation of society. On the contrary, whereas French laïcité involves a clear separation between public and religious spaces, far from excluding religion from the public sphere, Indian secularism officially recognises all faiths, as evident from the Constitution and its implementation in the first decades of the Indian republic.

Jawaharlal Nehru himself wrote in 1961: “We talk about a secular state in India. It is perhaps not very easy even to find a good word in Hindi for ‘secular’. Some people think it means something opposed to religion. That obviously is not correct. What it means is that it is a state which honours all faiths equally and gives them equal opportunities.” Sarvepalli Radhakrishnan, president of India when Nehru was prime minister, expressed a similar vision in these eloquent terms: “When India is said to be a secular state, it does not mean that we as a people reject the reality of an unseen spirit or the relevance of religions to life or that we exalt irreligion. It does not mean that secularism itself becomes a positive religion or that the state assumes divine prerogatives. Though faith in the supreme spirit is the basic principle of the Indian tradition, our state will not identify itself with or be controlled by any particular religion.”

The specificity of Indian secularism transpires clearly in these quoted passages. Far from being areligious, irreligious or anti-religious, this principle is, on the contrary, perfectly compatible with religiosity. But, recognising the importance of religion in the public space, the state intervenes in favour of all religious communities. It thus subsidises all kinds of religious activities, including pilgrimages for Sikhs (to Pakistan) and Hindus (like the one to Amarnath in Jammu and Kashmir). The state also subsidises major religious celebrations such as the Kumbh Melas. The one in 2001, for instance, cost Rs 120 crore. Since 1993, Indian pilgrims to Mecca have been largely state-funded, too.
This multicultural approach has been recently illustrated in the way President Pranab Mukherjee hosted an iftar party towards the end of Ramzan, soon after publicly offering prayers at the Padmanabhaswamy temple.

This rather unique configuration is the product of a long history. Its immediate antecedent can be found in the words and deeds of Mahatma Gandhi, who advocated the recognition of religious communities in the public space and their cohabitation as early as 1919, during the Khilafat Movement in which he joined forces with Muslim leaders. Subsequently, he tried to make the Congress party a “parliament” in which all denominations were represented. In Hind Swaraj (1909), he promoted a conception of the Indian nation that ruled out identifying the nation with any religion: “If the Hindus believe that India should be peopled only by Hindus, they are living in dreamland. The Hindus, the Mahomedans, the Parsis and the Christians who have made India their country are fellow countrymen, and they will have to live in unity, if only for their own interest. In no part of the world are one nationality and one religion synonymous terms; nor has it ever been so in India.”

Beyond Gandhi’s contribution, going further back in time, emperor Akbar practised religious tolerance. During his rule, Islam had
a limited place in the state apparatus, in which several communities other than the Muslims participated. This modus operandi was already in existence under the reign of Ashoka. While he worked for the glory of Buddhism with the fervour of a new convert, this emperor also advocated coexistence of religions and mutual respect.

Like Justice Dave, these architects of Indian secularism thought that they had “to get good things from everywhere”, including the Gita, the Quran, the Bible, etc. For them, the question of teaching one religion alone never arose. The fact that it does today is revealing of the way Hindu majoritarianism is gaining momentum. This view clearly contradicts the Constitution because it implies the non-recognition of all religions on an equal footing. Freedom of conscience, speech and worship was written into the Constitution through a number of articles having convergent effects. Article 15 forbids discrimination on religious grounds (among others); Article 16 applies this rule to recruitment in the civil service; Article 29 to admission to a public school or receiving state aid. Most especially, Article 25 states: “Subject to public order, morality and health… all persons are equally entitled to freedom of conscience and the right freely to profess, practise and propagate religion.”

In addition to these individual rights, there are collective rights — the Indian state not only recognises no official religion and protects citizens from having to pay religious taxes, but it also gives each religion equal consideration. Article 26 stipulates: “Subject to public order, morality and health, every religion, religious denomination or any section thereof shall have the right: (a) to establish and maintain institutions for religious and charitable purposes; (b) to manage its own affairs in matters of religion; (c) to own and acquire movable and immovable property; and (d) to administer such property in accordance with law”. Article 30 reads similarly: “All minorities, whether based on religion or language, shall have the right to establish and administer educational institutions of their choice.” In awarding aid to educational institutions, the state must in no way discriminate against those administered by a religious or linguistic minority. It is worth noting that the importance given to collective rights by Indian secularism is one of its trademarks, as is its correlative respect for the role of religions in the public space.

If India was to discontinue this tradition and replace it with Hindu majoritarianism, it would embark on the same trajectory as its neighbours — except Nepal, where secularism has recently become the order of the day. The past experience of the other countries of South Asia shows that minorities have been the first casualties of the erosion of secularism, regardless of the majority religion. Hindus, as a minority, have been at the receiving end in Sri Lanka, Pakistan and Bangladesh where religious conflicts have resulted in violence.
(Courtesy: Christophe Jaffrelot)