Saturday, 18 October 2014

शंकराचार्य के बयान को गंभीरता से न लें. / विजय शंकर सिंह.




शंकराचार्य का बयान आया है कि मंदिरों में दलितों का प्रवेश उचित नहीं है. इस बयान को गंभीरता से लेने की ज़रुरत नहीं है. ईश्वर हो या धर्म वह किसी एक व्यक्ति या संस्था के अधीन नहीं है. वैसे भी शंकराचार्य माने तो सनातन धर्म के आचार्य हैं पर न तो इनका पद विवाद से परे रहा है और न ही ये खुद विवाद से मुक्त रहे हैं. 

शंकराचार्यों के चार पीठ है. बद्री केदार, द्वष्रिका, पुरी और श्रृंगेरी. काशी का भी एक पीठ था. वह सुमेरु पीठ कहलाता है. पर वह अभिशप्त है. शंकराचार्य सन्यासियों की परंपरा से आते है. आदि शंकराचार्य ने इन पीठों की स्थापना की थी. उन्ही के समय नागा साधुओं की परम्परा भी शुरू हुयी और मठ बने. मठ का कांसेप्ट बौद्ध संघारामों की परंपरा से आया है. क्योंकि बौद्ध संघारामों के पहले मठों का ज़िक्र नहीं मिलता है. गुरुकुलों और आश्र्स्मों की परंपरा थी जो एक प्रकार से पठन पाठन, और शिक्षा के केंद्र थे. वहाँ शास्त्रार्थ , धर्म दर्शन आदि पर गंभीर चर्चा होती थी.

जो मठ बने वे नागा साधुओं के अखाड़े थे. मठों के सन्यासियों की भी एक रैंकिंग है. महंत, श्री महंत, मंडलेश्वर, महा मंडलेश्वर, आचार्य मंडलेश्वर और शंकराचार्य इसके रैंक्स होते हैं. यह गठन सैन्य परम्परा से प्रभावित था. यह शैव साधुओं की परंपरा है. वैष्णव परंपरा अलग है. शैव , शिव के भक्त होते हैं. कभी पहले शिव और विष्णु के भक्तों में आपसी संघर्ष होता रहता था. वह भी एक प्रकार की साम्प्रदायिक समस्या थी. लेकिन वह बाद में सुलझ गया. हालांकि अब भी कुम्भ के स्नान को ले कर अखाड़ों में आपसी प्रतिद्वंद्विता बहुत रहती है. और अक्सर झगडा हो जाता है. तब यह सोचने के लिए हम बाध्य हो जाते हैं कि संसार छोड़ने वाला, मोह माया त्यागने वाला, सन्यासी आखिर अहंकार क्यों नहीं छोड़ पाता. पर मुझे इसका उत्तर नहीं मिलता.

मंदिरों में दलितों का प्रवेश एक आन्दोलन के रूप में आज़ादी के लड़ाई के दौरान किया गया था. मंदिरों की परंपरा में कब दलितों का प्रवेश बाधित किया गया, यह मैंने ढूँढने की कोशिश की तो मुझे कोई सन्दर्भ नहीं मिला. लेकिन मंदिरों में प्रवेश शास्त्रतः वर्जित था या नहीं था, यह तो शोध करने पर ही जाना जा सकेगा, पर प्रवेश को सामाजिक रूप से मान्यता नहीं थी. गाँधी जी ने जब अछूतोद्धार का आन्दोलन चलाया तो मंदिरों में प्रवेश को ले कर भी आन्दोलन चला. बनारस में भी यह आन्दोलन काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए चला था. अब किसी मंदिर में प्रवेश वर्जित नहीं है और न ही किसी मंदिर में किसी को जाति प्रमाणपत्र पूछ कर ही प्रवेश दिया जाता है.

मंदिरों का जो स्वरुप आज मिलता है वह वैदिक काल में नहीं था. वैदिक काल में  मूर्तिपूजा का भी स्वरुप भी विक्सित नहीं हो पाया था. यग्य की विधियां थी. जो विभिन्न प्रकार की थीं. मंदिरों और मूर्तियों की अवधारणा बाद में विक्सित हुयी. अधिकतर मंदिर और उनका वास्तु और स्थापत्य गुप्त काल में विक्सित हुआ. मूर्तिकला का विकास भी उसी समय हुआ. हालांकि मूर्तिकला के विभिन्न स्कूल गांधार कला, मथुरा कला आदि का विकास कुषाणों के समय में ही हो चूका था, बुद्ध की मूर्तियाँ बननी और संघारामों में राखी जाने लगीं थी. उनका कर्म काण्ड और पूजा पद्धति भी विक्सित होने लगी थी. स्तूप निर्माण तो और पहले अशोक के समय से ही शुरू हो गया था. लेकिन मंदिरों में शूद्रों का प्रवेश वर्जित था या नहीं, यह पता नहीं चलता है.

मुस्लिम आक्रमण के बाद देश धर्म और समाज में जो परिस्थितियाँ बदलीं उसमें जकड़न प्रारम्भ हो गया. मंदिरों में अनार्य प्रवेश वर्जित हो गया. विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी के द्वार पर आज भी एक पट्टिका है, जिस पर लिखा है  अनार्याम प्रवेश वर्जित: . इसका मुख्य कारण सुरक्षा था. इस्लाम मूर्तिपूजा विरोधी धर्म है और मूर्तिभंजन को पुण्य के रूप में देखता है, इसके विपरीत सनातन धर्म में मूर्तिपूजा सर्वाधिक प्रचलित और मान्य पूजा पद्धति थी. तर्क यह था कि जिसे मूर्तिपूजा में आस्था नहीं है वह वहाँ क्यों जाए. लेकिन शूद्र अनार्य नहीं थे. हो सकता है यही जकड़न और वर्जना कालांतर में शूद्रों के लिए भी हो गयी हो. लेकिन किसी भी स्मृति और शास्त्र में यह वर्जित नहीं है. जितना मुझे मालूम है.

पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद के इस बयान को न तो मानने की ज़रुरत है और न ही गंभीरता से लेने की. यदि कोई ऐसा साक्ष्य प्राचीन शास्त्रों में मिलता भी है तो उसे मत मानिए. धर्म समाज के लिए है. समाज एकजुट रहे, प्रगति करे, और समरसता बनी रहे यह सबसे ज़रूरी है. शास्त्र अगर वैमनस्य फैलाये, समाज को बांटे तो ऐसे शास्त्रों की न सिर्फ अवहेलना करें बल्कि निंदा भी करें. एस सी एस टी आयोग ने शंकराचार्य को नोटिस भेजी है और गिरफ्तारी का आदेश भी दिया है. यह देश के क़ानून के अनुसार ही है. और कोई भी क़ानून के ऊपर नहीं है. शंकराचार्य आते जाते रहेंगे. उनकी धारणाएं बदलती रहेंगी. शास्त्रों की व्याख्याएं समय, काल, परिस्थितियों तथा मेधा के अनुसार होती रहेंगी पर समाज एक जुट रहे और मानवीय भेद जाति, वर्ण आधारित न हो यह सबसे अधिक ज़रूरी है. धर्मगुरु जब समाज को बांटने की बात करें तो वह कितने भी बड़े और पूज्य हों उनकी निंदा कीजिये. शंकराचार्य की बात को गंभीरता से लेने की ज़रुरत नहीं है.

विजय शंकर सिंह


Friday, 17 October 2014

Remembering Sir Syed Ahmad Khan / विनम्र स्मरण : सर सैयद अहमद खान - विजय शंकर सिंह.


आज सर सैयद अहमद खान का जन्म दिन है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वे संस्थापक रहे हैं. ए एम यू में इस दिन को सर सैयद डे के नाम से मनाते हैं. 17 अक्टूबर 1817 को उनका जन्म दिल्ली में हुआ था. और निधन 27 मार्च 1898 में अलीगढ़ में. 

जिस दौर में सर सैयद का जन्म हुआ था वह देश का एक संक्रमण काल था  मुग़ल साम्राज्य का अंत हो गया था, और ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज पसर रहा था. ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध जनता में प्रतिकूलता भी फ़ैल रही थी. देसी रियासतों का जिस छल से अधिग्रहण अँगरेज़ कर रहे थे इस से उनमें असंतोष भी फ़ैल रहा था. जो वातावरण बन रहा था उसी के बीच एक चिनगारी चमकी और 1857 का विप्लव भड़क उठा. पूरा उत्तर भारत, सिंधिया, सिखों और गुरखों को छोड़ कर इस अभिनव क्रान्ति में शामिल था. आख़िरी सम्राट बहादुर शाह ज़फर को इस बगावत का नेता चुना गया. लेकिन जो परिणाम किसी युद्ध का वैचारिक पीठिका और रणनीति के अभाव में होता है वैसा ही इस विप्लव का भी हुआ. यह विद्रोह जिसे सावरकर देश का प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं, अंग्रेजों द्वारा दबा दिया गया. इसी के साथ व्यापार करने आयी ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका समाप्त हो गयी और देश सीधे ब्रिटेन का गुलाम बन गया. बहादुर शाह ज़फर गिरफ्तार कर लिए गए. उनके बेटों को क़त्ल कर दिया गया और उन्हें रंगून जेल भेज दिया गया. वहीं 1862 में उनकी मृत्यु हो गयी. उन्हें कू ए यार में दो गज ज़मीन भी मयस्सर नहीं हुयी. नियति कब किसे कौन सा रंग दिखा दे, इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है.

इस विप्लव ने देश में हलचल पैदा कर दी थी. पहली बार हिन्दू और मुसलमान एक साथ एकजुट हो कर अंग्रेजों के खिलाफ खड़े थे. ऐसी ही परिस्थितियों में हिन्दुओं में सुधारवादी आन्दोलन का सूत्रपात हुआ. राजा राम मोहन रॉय सहित अनेक समाज सुधारक पश्चिमी दर्शन, शिक्षा और राज प्रणाली से प्रभावित हो रहे थे. सामंतवाद टूट रहा था. एक नयी रोशनी आ रही थी. लेकिन यह सूरज पस्चिम से उग रहा था.
मुस्लिम समाज दुविधा में था. सात सौ साल तक मुस्लिम शासन के बाद इस समाज को लग रहा था कि उनकी विरासत ख़त्म हो रही है. खान पान, वेश भूषा, भाषा बोली सभी बदल रही थी. फारसी जो राजभाषा थी का स्थान अंग्रेज़ी ने ले लिया था. व्रज, अवधी, आदि हिन्दी की समृद्ध  बोलियों पर मुजफ्फरपुर से निकली हुयी खडी बोली हावी हो रही थी. उसका रूप बदल रहा था. दक्षिण में सभी प्रचलित बोलियों को मिला कर एक बेहद आकर्षक भाषा का विकास हो गया था, जिसे रेख्ता कहा गया जो सैन्य शिविरों का नाम ग्रहण कर उर्दू कहलायी .

सर सैयद ने इस परिवर्तन को न केवल समझा बल्कि इसके अनुसार उन्होंने अपनी रणनीति भी तय की. अंग्रेज़ी ने दुनिया में जो आयाम खोला था, उस में सर सैयद ने झांका और शिक्षा पर उन्होंने अपना पूरा ध्यान लगाया. वह एक बहुमुखी प्रयिभा के व्यक्ति थे. मूलतः वह न्याय विभाग से जुड़े थे. उन्होंने इस्लाम में जड़ बना रही परम्पराओं पर भी चोट की. 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली पुस्तक लिखी, अथर अस्नादीद. यह किताब दिल्ली के इतिहास पर थी. वह दिल्ली के सामंतों के परिवार से आते थे. 1857 को उन्होंने बहुत करीब से देखा. उन्होंने इस विप्लव में भाग नहीं लिया बल्कि वह उस समय कंपनी के मुलाजिम थे. इस महान विप्लव पर उन्होंने अंग्रेज़ी में एक परचा लिखाद काज़ेज़ ऑफ़ इंडियन रिवोल्ट. इस पर्चे पर अँगरेज़ हुक्मरानों की निगाह पडी. यह विप्लव क्यों और कैसे हुआ और फिर असफल कैसे हुआ, इस पर बहुत बेबाकी से सर सैयद ने लिखा. इस पर्चे की बेबाकी ने उन्हें अंग्रेजों के करीब ला दिया. साथ ही बदले निजाम और ज़माने के अनुसार खुद और कौम को बदलने की इच्छा भी उनकी जगी. उन्होंने सोच लिया कि मुस्लिमों का पिछडापन दूर करने का एक ही उपाय है शिक्षा।

उन्होंने 1869 - 1870 में इंग्लॅण्ड का भ्रमण किया और वहीं से एक शिक्षा संस्थान खोलने की उनकी धारणा प्रारम्भ हुयी. इंग्लैंड से लौट के आने के बाद उन्होंने एक अखबार निकाला, तहदीब अल अखलाक. यह उनका समाज सुधार का मुख पत्र था. ब्रिटेन की यात्रा के दौरान उन्हें कैम्ब्रिज की तर्ज़ पर एक शिक्षा संस्थान स्थापित करने का विचार आया. हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने काम करना शुरू कर दिया था. 1858 में ग़ाज़ीपुर, 1863 में मुरादाबाद में उन्होंने शिक्षा संस्थाओं की शुरुआत कर दी थी. ऐसा नहीं  था कि यह संस्थाएं केवल मुस्लिमों के लिए ही थीं. बल्कि हिन्दू मुस्लिम दोनों के लिए ही थीं. मई 1875 में अलीगढ़ में एक एंग्लो मोहमडन स्कूल की स्थापना हुयी जो आगे चल कर अलोगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना. 1876 में वह सरकारी सेवा से रिटायर हो गए और 1877 में इसी स्कूल को कॉलेज में बदल दिया गया. इस कॉलेज की नीवं तत्कालीन वायसरॉय द्वारा रखी गयी. 1886 में उन्होंने आल इंडिया मोहमडन एजुकेशनल कांफ्रेंस की स्थापना की जो हर साल अपने अधिवेशन में मुस्लिमों की शिक्षा की बेहतरी के लिए विचार विमर्श करती थी.

आधुनिकता वस्त्रों से नहीं अभिव्यक्त होती वह विचारों से ही अभिव्यक्त होती है. समाज जब असुरक्षित महसूस करने लगता है तो जकडन शुरू हो जाती है. हम अपने मस्तिष्क के सारे कपाट और गवाक्ष बंद कर देते हैं. बाहर की हर हवा हमें शैतानी लगने लगती हैं. हम कमरे की ही दमघोंटू हवा को प्राणवायु समझ बैठते हैं. धर्म गुरु ऐसी दशा में धर्म के कर्मकांड पक्ष से और चिपक जाते हैं. धर्म जो हमें धारण करता है और जो हमारी उन्नति के लिए आविष्कृत है उसे ही हम बचाने में लग जाते हैं. ऐसा हिन्दू और इस्लाम दोनों ही धर्मों के साथ हुआ. कुरीतियाँ दोनों ही धर्मों में थी. समाज ऐसी बुराइयों में खुद ही अपना एंटीबाडी उत्पन्न करता है. और समाज सुधारकों का प्रादुर्भाव होता है. राजा राम मोहन रॉय, केशब चन्द्र सेन, विवेकानंद इसी की कड़ी थे. ऐसी ही एक कड़ी सर सैयद अहमद की थी. इस्लाम अक्सर सुधार के प्रयासो पर सवाल उठाता है. शास्त्रार्थ और विभिन्न मत मतान्तर के दर्शन के अभाव में इस्लाम हर सुधार को कुरान की रोशनी और हदीस की परम्पराओं में देखता है. इस लिए समाज सुधार का काम यहाँ कठिन था. सर सैयद ने कुरान और हदीस से उद्धरण दे कर तालीम की और समाज को मोड़ने का काम किया. वे पर्दा प्रथा सहित अन्य कुरीतियों के भी खिलाफ थे. उन्हें लगा कि शिक्षा, न सिर्फ जीवन स्तर भी सुधारेगी बल्कि दुनिया की रोशनी से जब मस्तिष्क रोशन होगा तो हज़ार रास्ते भी खुलेंगे. सर सैयद का यही योगदान है. इसी लिए उन्हें इस क्षेत्र में अग्रदूत कहा जाता है. 


अल्लामा इकबाल , सर सैयद का योगदान रेखांकित करते हुए बहुत साफ़ शब्दों में कहते हैं, कि, इस्लाम की नए आलोक में व्याख्या करना ही सर सैयद की सबसे बड़ी उपलब्धि रही है. ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय मुस्लिम थे.

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सर सैयद डे बहुत ही गरिमा पूर्ण ढंग से मनाया जाता है. 1857 ने हिन्दू मुस्लिम एकता का जो प्रदर्शन हुआ उसने अंग्रेजों को तो अपनी रणनीति बदलने पर मज़बूर किया ही, देश के बुद्धिजीवियों को भी सोचने के लिए बाध्य कर दिया। हिन्दू मुस्लिम को भारत माता की दो आँखे बताने वाले सर सैयद ने इस एकता की अनिवार्य आवश्यकता को पहचान लिया था. यह अलग बात है कि इतिहास और समय कब कब कौन सी करवट बदलता है यह नहीं कहा जा सकता.
सर सैयद का निधन, 27 मार्च, 1898 को अलीगढ़ में हुआ. विश्वविद्यालय की भव्य मस्जिद के पास ही वह चिर निद्रा में लीन हैं. उनकी जन्म तिथि पर उन्हें विनम्र स्मरण !!

विजय शंकर सिंह

Wednesday, 15 October 2014

सिंघम पुलिसिंग नहीं है / विजय शंकर सिंह

पुलिस पर अक्सर फिल्मे बनती रहती हैं । और आगे भी बनती रहेंगी। पुलिस सरकार की आर्थिक भाषा में नॉन प्लान एक्सपेंडीचर की श्रेणी में आती है। " सरकार का ताज आप के सिर पर है " यह वाक्य अक्सर हमारे उस्ताद पुलिस ट्रेनिंग एकेडेमी में दोहराते रहते थे । जब थोड़ी बहुत लापरवाही हम लोग कर देते थे तो । सरकार का सबसे महत्वपूर्ण, मीडिया का पसंदीदा सॉफ्ट टार्गेट, आम जनता से ईश्वरीय अपेक्षा लिए हुए यह विभाग सरकार, सत्ता, अधिकार, का प्रतीक हैं । फिल्मों में कभी पांडू हवलदार की क्षवि, तो कभी सुपरमैन और कभी एंग्री यंग मैन, की क्षवि लिये हुए यह विभाग चित्रित होता रहता है. पुलिस एक बिरादरी है. पुलिस एक मानसिकता भी है और पुलिस को एक दुर्गुण के रूप में भी कभी कभी लिया जाता है. कुल मिला जुला कर यह सरकार का अकेला विभाग है जो जब सारी मशीनरी थम जाती है तो और भी गतिमान हो जाता है। यह नीलकंठ की तरह विषपायी है ।
कुछ दिनों पहले सलमान खान और अजय देवगन की चार फ़िल्में आयीं. दो दबंग. और दो सिंघम. दबंग में सलमान खान जिस तरह के पुलिस कर्मी के रूप में चित्रित किये गए वैसा सिघम में अजय देवगन नहीं किये गए हैं. चारों फिल्मों की कथावस्तु, थीम, लगभग एक जैसा ही सन्देश देती है पर ये फ़िल्में अलग अलग हैं. इन फिल्मों से जो सन्देश निकलता है वह यह बताता है कि पुलिस अपने विधि विधान से अगर कार्य करेगी तो न तो समाज का भला होगा और न ही जनता का. क़ानून किसी भी प्रकार की बुराई के लिए अप्रासंगिक हो चुका है. पुलिस को क़ानून का राज कायम करने के लिए क़ानून की अवहेलना करनी चाहिए. अक्सर जनता के लोग अपराधियों को सार्वजनिक रूप से पीटते हुए, गधे पर बिठा कर जुलूस निकालते हुए देख कर प्रसन्न होते हैं और ऐसे दरोगा की जम कर तारीफ़ और वाह वाही करते हैं. लेकिन जब यही खबर कहीं छपती है और दिखाई जाती है तो दरोगा जी कागजों का पुलिंदा लिए अपनी शिकायतों के खिलाफ की जा रही जांचों में बयान देते हुए हलफनामा भरते हुए नज़र आते है। नायक से खलनायक के बीच की जो सीमारेखा है, वह कब समाप्त हो जाती है पता भी नहीं चलता है.
पुलिस का मुख्य काम अपराधों की रोकथाम, अन्वेषण और क़ानून व्यवस्था बनाए रखना है. क़ानून का पालन हो यह उसकी सबसे पहली प्राथमिकता है. कौन क़ानून कैसे लागू किया जाएगा, कौन लागू करने के लिए अधिकृत है और कब लागू किया जाएगा यह सब क़ानून की किताबों में स्पष्ट रूप से लिखा है और हम सब को पढ़ाया भी जाता है. लेकिन जब इन कानूनों के बावजूद भी समाज और जनता को अपेक्षित लाभ नहीं पहुँच पाता तो जो कुंठा समाज और समाज से होते हुए सरकार तक पहुँचती है तो निशाने पर पुलिस ही आती है. तभी यह मानसिकता भी जन्म लेती है कि अब कानूनन कुछ नहीं हो पायेगा, कुछ न कुछ क़ानून से हट कर कदम उठाने पड़ेंगे. जनता जो अक्सर पुलिस पर कानूनन काम न करने का आक्षेप लगाती रहती है, खुले आम क़ानून के उल्लंघन पर पुलिस को हांथों हाँथ ले लेती है. कुछ मित्र इसे असामान्य कदम , असामान्य परिस्थितियों के लिए कह कर इसका बचाव करेंगे. लेकिन डीके बसु कोड और अदालतें इसे विधि विरुद्ध और पुलिस अराजकता और न जाने क्या क्या कहती हुयी पुलिस को कठघरे में ही खड़े कर देंगी. तब वह सारा असामान्य कदम जो असामान्य परिस्थितियों के लिए एक औषधि के रूप में लाया गया था, अचानक पुलिस के लिए हलाहल बन जाता है. जी मैं बात पुलिस मुठभेड़ की ही कर रहा हूँ ।आज गुजरात में 30 पुलिस कर्मी जिस में 7 आई पी एस अधिकारी और उनमें भी एक जो डी जी स्तर के हैं इसी असामान्य कदम के लिए जेल में है ।
अक्सर लोग तर्क देते हैं कि जब तक सख्ती नहीं होगी अपराध नहीं रुकेंगे. सख्ती का आशय क़ानून की सख्ती नहीं बल्कि बिना कानूनी पचड़े में पड़े सख्ती है. मैं उनके इस तर्क से सहमत हूँ कि क़ानून कभी कभी अपनी धार खो बैठता है. लेकिन जो पुलिस जन समाज के हित में क़ानून विरोधी तरीके से व्यवस्था बनाने और अपराध रोकने का काम करते हैं क्या उनके हित और हक में समाज और लोग लम्बे समय तक खड़े नज़र आते हैं. तात्कालिक समर्थन की बात मैं नहीं कह रहा हूँ. तत्काल तो हम सुपर काप हो ही जाते हैं. मेरा अनुभव है यह। वक़्त अपने साथ सारे आवेग भी लेता चला जाता है. रह जाता है सिर्फ एक था राजा !
पंजाब में जब केपीएस गिल सर डीजीपी थे तो पंजाब आतंकवाद के बेहद बुरे दिन देख रहा था। क़ानून व्यवस्था का यह हाल था कि कोई क़ानून रह ही नहीं गया था। असामान्य, परिस्थितयों में असामान्य कदम उठाये गए, स्थिति सुधरी और पंजाब में अमन चैन वापस आया । गिल साहब बेहद सराहे गए. लेकिन तभी उन्ही असामान्य कदमों पर सवाल भी उठने लगे । कुछ मानवाधिकार संगठन जो आतंकी दिनों में बिल में घुस गए थे निकल आये और इतनी याचिकाएं अदालतों में दायर हुईं कि कल के नायक और त्राता रातों रात हत्यारे, भ्रष्ट , सुपारी पर ह्त्या कराने वाले खलनायक हो गए।. हद तब हो गयी जब इन्ही याचिकाओं से पीड़ित अमृतसर के एक पूर्व एसएसपी ने रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली। आखिर किस ने झेला यह सब ? ऐसे कई उदाहरण पूरे देश में आप को मिलेंगे ।
ऐसे क़ानून के उल्लंघन को आप राज्य के पक्ष में कह कर उचित ठहरा सकते हैं । पर राज्य का हित निजी हित न बने ऐसा करने से आप कदापि किसी को रोक नहीं सकते हैं । अपने साथियों से यही कहना चाहूँगा कि हम सब को क़ानून का पालन करने की ट्रेनिंग दी गयी है।क़ानून का दुरुपयोग करने की नहीं. समाज में और आपराधिक न्याय प्रशासन के और भी अंग हैं। न्याय पालिका है, अभियोजन है. कभी किसी न्यायालय ने यह जानते हुए भी कि अभियुक्त ने सच में अपराध किया है पर साक्ष्य नहीं है दण्डित किया है ? शायद नहीं. जज चाहते हुए भी नहीं करते। लेकिन हम अक्सर ऐसे रास्ते एडवेंचर के रूप में अपना लेते हैं। न्यायालय की अपनी मज़बूरियाँ और कमियाँ होंगी और हैं पर उसके लिए हम क़ानून तोड़ें, और फिर कोई बात हो जाय तो अकेले भुगतें यह बिलकुल उचित नहीं है।
क़ानून का रास्ता भी हमारे साथी तभी अपनाते हैं जब उन्हें क़ानून के गहराई की जानकारी कम होती है. विवेचना में मेहनत करना, सुबूत जुटाना और उसे साबित करना कठिन काम है. लेकिन यह तो हमारा दायित्व है। सिंघम और दबंग वास्तविक पुलिसिंग नहीं है। यह एडवेंचर है। इस प्रवित्ति से लोगों को तात्कालिक लाभ भले मिल जाए, पर इसके दूरगामी परिणाम सुखद नहीं होते हैं। और यह उचित भी नहीं है. क़ानून का राज क़ानून के प्राविधानों से ही लागू किया जाना चाहिए. गैर कानूनी तरीके से नहीं.
(विजय शंकर सिंह)

निंदक नियरे राखिये / विजय शंकर सिंह

आप की समस्या है कि आप अपने आराध्य की आलोचना सुन नहीं सकते. वह आप का रक्तचाप बढ़ा देता है. मेरा मानना है कि राजनीति में न कोई आराध्य है और न ही कोई आराधक. आप अग्रगामी दस्ते में मशाल लिए मेरे आगे चल रहे है. लेकिन जहां आप ले चल रहे हैं, और जिस मार्ग से आप ले चल रहे हैं उस स्थान और राह की दुश्वारियों को बताने का भी मेरा हक है. यह भी जानने का अधिकार है कि किस तरह से यह यात्रा हो रही है. यह लोकतंत्र है भेड़ तंत्र में इसे मत बदलिए. दुनिया में कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है और न ही ऐसा कोई है जिस पर आँख पर पट्टी बाँध कर विश्वास किया जाय. धूमिल की एक बेहद विचारोत्तेजक पंक्ति है. 

"आज की जनता,
एक भेड़ है, 
जो दूसरों की ठण्ड के लिए, 
पीठ पर ऊन की फसल ढोती है." 

यह कविता आज के ही सन्दर्भ में नहीं बल्कि जब जब हम अपना विवेक किसी के प्रभामंडल के सामने गिरवी रख देते हैं, साष्टांग हो जाते हैं तब तब प्रासंगिक रहेगी. यह पंक्तियाँ इमरजेंसी के दौरान लिखी गयीं थी. जब एक आराध्य की छाया पूरे देश को ढंकने पर आमादा दी. पर उस सर्वशक्तिशाली जिसे किसी ने कभी दुर्गा कहा था का क्या परिणाम हुआ, यह सभी को पता है.

बुद्ध भारतीय मनीषा के प्रखरतम चिंतकों में से रहे है. जब वह कुशीनारा जो आज का कुशीनगर है में निर्वाण प्राप्त कर रहे थे तो उनके प्रियतम शिष्य आनंद उनके साथ थे. अतिसार से पीड़ित बुद्ध की सुश्रुसा के लिए उस समय के महान वैद्य जीवक को बुलाया गया था. आनंद की आँखें भरी थीं. शास्ता की जीवन अपने समाप्ति की और थी. बुद्ध जिन्होंने जीवन भर दुख्वाद के दर्शन और इस से मुक्ति का उपाय ढूँढने में बिता दिया का साथ भी आनंद को उस स्तर पर नहीं ले जा सका जहां मृत्यु एक अकाट्य सत्य की तरह स्थापित है. बुद्ध ने कहा, '' मेरी बात सिर्फ इस लिए मत मानों कि उसे मैंने कहा है. उसे अपने विवेक से समझो और जब तुम्हे यह उपयुक्त लगे तो उसे स्वीकार करो." बुद्ध की यह बात गुरुडम के सुप्त अहंकार से कितनी अलग है ?

आज भी दुनिया में बहुत से दर्शन जीवित हैं. नए आविष्कृत भी होंगे . पर सवाल सब पर उठायें जायेंगे. ऋग्वेद की एक ऋचा में लिखा गया है कि जब आचार्य ने शिष्य को हवन के लिए कहा तो शिष्य ने या तो कौतूहल वश या बौद्धिक जिज्ञासा हेतु पूछा, कस्मै देवाय हविश्यामि. किस देवता को समिधा दूं. फिर एक लंबा चौड़ा वार्तालाप. यह वाद विवाद और संवाद की प्रक्रिया से ही उपनिषद निकलते हैं. कहने का आशय यह है प्रश्न उठाते रहिये. आराध्य को प्रशोत्तर और आलोचना से परे मत रखिये नहीं तो आराध्य में अहंकार आयेगा, अहंकार अधिनायकवाद लाता है और अधिनायकवाद विनाश.

सबसे उदात्त दर्शन प्रश्नोत्तरों से निकले हैं. प्रवचनों से नहीं. प्रवचन सिर्फ आप तक पहुँचते हैं. कुछ आदर जगा देते हैं कुछ जिज्ञासा. लेकिन जिज्ञासाएं अनुत्तरित रहती है. आदर जब हद से अधिक बढ़ जाता है तो जिज्ञासाएं मरने लगती हैं और एक ठहराव उत्पन्न हो जाता है. यह ठहराव ही प्रदूषण का कारण बन जाता है. जिन धर्मों में यह जिज्ञासु भाव को महत्व नहीं दिया गया है या हतोत्साहित किया जाता है उनकी गति या तो रुक जाती है या भटक जाती है. आलोचना का मतलब निंदा या गरियाना नहीं है. अपनी जिज्ञासा और आराध्य के स्वप्नों पर सवाल उठाना है. हमारे प्राचीन वांग्मय में शास्त्रार्थ की परम्परा का यही उद्देश्य है.
आलोचनाओं से न बिखरिये न बिफरिये, निखारना सीखिए !!

विजय शंकर सिंह

Sunday, 12 October 2014

Nobel Prize : Kailash Satyaarthee and Malala / नोबेल पुरस्कार : कैलाश सत्यार्थी और मलाला ... विजय शंकर सिंह

2014 के लिए नोबेल पुरस्कार एक भारतीय कैलाश सत्यार्थी को मिला. यह हम सब के लिए गौरव की बात है. साथ ही यह पुरस्कार पाकिस्तान की एक बालिका मलाला को भी मिला है. दोनों ही मुल्क शांति के लिए दिए गए इस पुरस्कार पर आह्लादित और गौरवान्वित हैं. हालाकि तालिबान जो एक धर्मांध और हिंसक संगठन है ने मलाला को पुरस्कार दिए जाने की निंदा की है. 
                                                                   

बात पुरानी है. लगभग पचीस साल पहले. मैं मिर्ज़ापुर में नियुक्त था. मिर्ज़ापुर और भदोही में कालीन का कारोबार चलता है. भदोही से कालीन का रिश्ता कब से बना और कैसे यह उद्योग वहाँ शुरू हुआ यह मैं नहीं बता पाउँगा.भदोही से इस कुटीर उद्योग का विस्तार मिर्ज़ापुर को पार करता हुआ घोरावल हालिया लालगंज आदि के ग्रामीण इलाकों में फ़ैल गया मिर्ज़ापुर के जिन इलाकों का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ वह वहाँ के पिछड़े इलाके हैं. पठारी और ग्रामीण इलाके जहां छोटे छोटे बच्चे कालीन जिसे वहाँ गलईचा जो गलीचा का देसी और भोजपुरी उच्चारण है कहा जाता हैबुनने के काम में लगे थे. उसी सिलसिले में श्री सत्यार्थी अपने एन जी ओ के साथ सक्रिय थे. एक बार उनसे मुलाक़ात का अवसर चील्ह जहां कालीन का काम होता है में मिला. मैं उन्हें नहीं जानता था. उनकी क्शवि कालीन उद्योग के मालिकों ने एक अराजक और उद्योग विरोधी बना रखी थी. थोड़ी बहुत बात हुयी. उन्होंने कुछ पुलिस सहायता माँगी जो उन्हें दे दी गयी.

बात आयी गयी हो गयी. पर उनका अभियान उन इलाकों में चलता रहा. अखबारों से उनके बारे में पता चलता रहा. कालीन उद्योग में जैस तरह से कालीन की बुनाई होती हैउसमें छोटी छोटी और बच्चों की उंगलिया अपनी कोमलता के कारण अधिक उपय्क्त होती है. कालीन का कारोबार मुख्यतः कुटीर उद्योग की तरह चलता है. उनधागा तथा अन्य सामग्री लोग अपने घरों में ले जाते हैं. साथ में उन्हें डिजाइन भी दे दिया जाता है और वे एक नियत समय में निर्धारित डिजाइन के अनुसार उन्हें बुन कर जिस कारखाने से लाते हैं वहाँ वापस दे आते हैं. गाँव में छोटे छोटे बुनाई सिखलाई या प्रशिक्षण केंद्र खुले हैं जहां छोटे छोटे बच्चे इस काम में लगे रहते हैं.मज़दूरी का कोई नियम नहीं. जो दे दे वह ले लेते हैं. दर असल कुछ लोग ठेके पर ही बुनाई का काम करते हैं और इसी काम को पूरा कराने के लिए बच्चो का उपयोग करते हैं. सत्यार्थी ने इसी बाल श्रम के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई और इस शोषण को उजागर किया. बाल श्रम और शोषण असंगठित क्षेत्रों की मूल समस्या है. यहाँ कोई भी श्रम क़ानून लागू नहीं है. न तो काम के घंटे तय है न उम्र न कोई बीमा न अन्य सुरक्षा. सरकार संगठित क्षेत्र के लिए तो बहुत कुछ करती हैपर उस से कहीं अधिक व्यापक असंगठित क्षेत्र के लिए कोई ठोस योजना नहीं है.

आज जब उन्हें इसी काम के लिए नोबेल पुरस्कार मिला तो अत्यंत प्रसन्नता हुयी. बाल श्रम न हो उनका शोषण न हो यह बहुत अच्छी बात है. लेकिन बाल श्रम कोई हॉबी नहीं हैएक मज़बूरी है. ढाबोंरेलवे स्टेशन के वेंडर्स अखबार बेचतेहुए बच्चों को देखिये कोई भी शौकिया इसे नहीं करता बल्कि उनकी मज़बूरी है. फिल्म बूट पोलिश कभी देखने को मिल जाए तो देखिएगा. ऐसा नहीं कि सत्यार्थी जी ने इस समस्या को खुद ही ढूंढा और उसका समाधान कियाबल्कि उन्होंने इसे संगठित रूप से एक आन्दोलन की तरह चलाया. आज जितना सत्यार्थी छप रहे हैं और दिख रहे हैं उतना ही वह शान्ति और प्रचार से दूर रह कर काम करते रहे हैं. मिर्ज़ापुर की घटना जिसका जिक्र मैंने किया है के समय एक प्रसिद्ध कालीन व्यवसायी से जब मैंने सत्यार्थी के प्रयास के बारे में पूछा तो उन्होंने खिन्न हो कर कहा कि वह देश विरोधी ताक़तों के कहने पर भदोही के कालीन उद्योग को चौपट करने का काम कर रहे हैं. बच्चों द्वारा काम कराने पर उन्होंने तर्क दिया कि यह हुनर है जो पीढी दर पीढी मिलता है. वह तो कालीन प्रशिक्षण केंद्र चलाते हैं और बुनना सिखाते हैं. पर सच यह नहीं था. सच वही था जो सत्यार्थी कह रहे थे पर वह उस समय कम सुने जा रहे थे. आज भी जब उनको नोबेल पुरस्कार मिला है तो यह जान कार आश्चर्य नहीं हुआ कि उनका नामांकन भारत से नहीं यूरोपियन देशों से हुआ

आज विकास का मापदंड चमचमाती सड़केंफ्लाई ओवेरमंहगी कारेंआधुनिक सुख सुविधा से युक्त जीवन शैली ही है. आज फेसबुक के मालिक कहते हैं कि कनेक्टिविटी एक मौलिक अधिकार है. तो हैरानी नहीं होती. उनका देश भूखबेकारी और गरीबी के अन्धकार से निकल चुका हैं. उनकी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं. उन्हें जीने की मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने की जद्दो जहद नहीं करनी है. पर हमें जहां हम गरीबी की सीमा बेशर्मी से तय करते हैं वहाँ यह हमारा मौलिक अधिकार नहीं हैं. जब तक जीने की मौलिक आवश्यकताएं पूरी नहीं होंगी तब तक बाल श्रम चलता रहेगा. समय खुद ही कैलाश सत्यार्थी जैसा संवेदनशील पर जुझारू व्यक्तित्व पैदा करता रहेगा. उन्हें इस विश्व प्रसिद्ध सम्मान पर कोटिशः बधाई !!

कैलाश सत्यार्थी के साथ पाकिस्तान की एक बालिका मलाला को भी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मलाला को पढने की जिद के कारण तालिबान की गोली खानी पडीपर उच्च चिकित्सा सुविधा के कारण वह बच गयी. आज वह करोड़ों बालिकाओं के लिए प्रेणना श्रोत बन चुकी है. जब उसे गोली मारी गयी थी तो मैंने उस घटना के बाद जितना मलाला के बारे में पढ़ा तो एक कविता लिखी थी. वह कविता आज पुनः आप सब से साझा कर रहा हूँ...
                                         

वह हथेली पर जुगुनू लिए 
अँधेरे से लड़ रही है, और तुम दूर खड़े
तमाशा देख रहे हो.
तुम्हे अँधेरे पर यकीन है, पर उस जुगुनू पर नहीं.
जो चीरता हुआ अँधेरे को
एक आस की तरह टिमटिमा रहा है.
साहस को आने दो दोस्त
थोड़ी हिम्मत बटोरो
अन्धकार सदा अस्तित्वहीन होता है,केवल अभाव हैयह प्रकाश का.
कोई सूरज मार्ग दिखाने नहीं आता यहाँ, पहचानो इस चिंगारी को
शायद यह ले जाए हमें
इस सीलन और सडांध भरे अंधे गह्वर के पार.
चलो उस के साथथामों हाँथ उसका
उसकी हथेली में रोशनी बिखेरते जुगनू को देखो, कितने बीभत्स तिमिर के साथ, युद्धरत है वह !! 
-vss.

नोबेल पुरस्कारों के बारे में कुछ तथ्य और आंकड़े आप के ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है. 
अल्फ्रेड नोबेल जिनके नाम पर यह पुरस्कार दिया जाता है ने डायनामाइट का आविष्कार किया था. 
अल्फ्रेड नोबेल एक अत्यंत संपन्न व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी पूरी संपत्ति एक ट्रस्ट को दे कर इन पुरस्कारों की स्थापना की. 
प्रारम्भ में यह पुरस्कारभौतिकीरसायन शास्त्रसाहित्यशान्तिचिकित्सा शास्त्र में दिया गयापर बाद में इसमें अर्थ शास्त्र को भी जोड़ दिया गया. 
पहला पुरस्कार 1901 में दिया गया. अर्थ शास्त्र का पुरस्कार 1969 में से देना शुरू किया गया. 
अब तक 2014 के वर्ष को छोड़ कर कुल 876 लोगों को सम्मानित किया गया हैजिसमे से 25 संस्थाएं हैं और शेष व्यक्तिगत हैं .
अब तक 2014 के वर्ष को छोड़ कर भौतिकी के लिए 107, 204 बार चिकित्सा शास्त्र और 19 बार शान्ति के लिए पुरस्कार दिए गए हैं .
जितने महानुभाओं को यह पुरस्कार मिला हैं उनकी औसत आयु 59 वर्ष है. 
सम्मानित होने वाले लोगों में से 45 महिलायें हैं. जिसमे से एक मदर टेरेसा भारत की थी. 
सम्मानित होने वालों में 256 अमेरिका और भारत के हैं जिनमे से भारतीय मूल के हैं पर भारत के नागरिक नहीं हैं. भारत के योगदान का प्रतिशत .82 है. 
2014 
के आंकड़ों को शामिल न करते हुए विलियम लारेंस ब्रेग सबसे कम उम्र 25 वर्ष के और सबसे अधिक उम्र 90 वर्ष के लियोनिद हुर्विक्ज नोबेल पुरस्कार विजेता हैं विलियम लारेंस को 1915 में भौतिकी के लिए और लियोनिद हुर्विक्ज को 2007 में अर्थ शास्त्र के लिए पुरस्कृत किया गया था. अब इस साल सबसे कल उम्र की विजेता पकिस्तान की मलाला हैं जिन्हें शान्ति के लिए पुरस्कृत किया गया है. उनकी आयु मात्र 17 वर्ष है. 
दो व्यक्ति ऐसे भी हैं जिन्होंने नोबेल पुरस्कार लेने से इनकार भी किया है. ये हैं फ्रांस के प्रसिद्ध साहित्यकार और अस्तित्ववाद के प्रणेता ज्याँ पॉल सात्र और ले डोक थो. सात्र को 1964 में साहित्य के लिए और ले डोक थो को शान्ति के लिए 1973 में चुना गया था. दोनों ने ही पुरस्कार लेने से मना कर दिया. 
सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जितने लोगों को सम्मानित किया गया है उनमे से अधिकतर लोगों की जन्म तिथि या तो 28 फरवरी है या मईयह दोनों तिथियाँ सबसे अधिक लोकप्रिय तिथि है. 

(विजय शंकर सिंह )

Remembering Dr Lohia / विनम्र स्मरण डॉ लोहिया .....विजय शंकर सिंह


आज ही के दिन 1967 में नयी दिल्ली के वेलिंग्टन नर्सिंग होम में इस अत्यंत परतिभाशाली व्यक्ति, एक प्रखर और विचारोत्तेजक चिन्तक, और स्वन्तंरता संग्राम के जुझारू योद्धा का निधन हुआ था. डॉ लोहिया आज़ादी के बाद जितने भी नेता भारतीय संसद में पहुंचे हैं में सबसे अधिक प्रतिभाशाली सांसदों में थे. जिस अस्पताल में उन्होंने आख़िरी सांस ली थी वही अब डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल है.

डॉ लोहिया का संसदीय जीवन बहुत लंबा नहीं रहा. वह 1963 में फरुखाबाद से एक उप चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से चुनाव जीते और दुबारा फिर उसी सीट से 1967 में आम चुनाव में चुने गए. 1963 से 1967 कुल चार साल कुछ महीने और सत्रह खण्डों में प्रकाशित लोकसभा में लोहिया की ग्रंथमाला ! सच है लोहिया अपने युग के सबसे मुखर सांसद थे. जब वे लोकसभा में पहुंचे तो देश का नेतृत्व जवाहरलाल नेहरु के पास था. हालांकि नेहरु का भी प्रभा मंडल ढलने लगा था. भारत चीन के साथ पराजित हो चूका था. नेहरु अपना दबदबा खो रहे थे. लेकिन फिर भी वह थे तो नेहरू ही. पहली बार संसद में सरकार के खिलाफ अविश्वास का प्रस्ताव पेश हुआ. बहस हुयी. प्रस्ताव पास तो नहीं हुयी पर एक स्वस्थ संसदीय परंपरा की शुरुआत हुयी.

देश की बदहाली, गरीबी पर बात उठी. आज़ादी के मुग्ध्गान के संवेग से मुक्त होकर लोगों ने हकीकत से रू ब रू होना शुरू किया.देश को आपने चाहे जितना भी दिया हो, पर सदैव उसी पूंजी के सहारे आप ज़िंदा और प्रासंगिक नहीं बने रह सकते है. लोग जब भी आकलन करेंगे वह वर्तमान से ही करेंगे. उज्जवल अतीत उस आकलन का मानदंड ही बनेगा. संसद में बहस हुयी कि देश की प्रति व्यक्ति गुज़र बसर तेरह आने में होती है या तीन आने में . सरकारी आंकड़े इसे तेरह आने पर ले जा रहे थे. डॉ लोहिया जो खुद अर्थशास्त्र के विद्यार्थी थे ने आंकड़ों का मायाजाल भेदा और यह साबित किया कि यह राशि तीन आना है. नेहरु को यह बात माननी पडी. यह सिर्फ उस संसदीय पुरोधा के कार्यकाल का एक उदाहरण है.

लोहिया और नेहरु में कभी नहीं पटी. नेहरु भी खुद को समाजवादी कहते थे. उस समय समाजवादी कहना एक फैशन था. जैसे आज राष्ट्रवादी कहना एक शगल हो गया है. लेकिन लोहिया का समाजवाद मनसा वाचा कर्मणा भी था. यह प्रतिद्वंद्विता इतनी बढी कि डॉ लोहिया ने नेहरु के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया. यह एक प्रतीकात्मक चुनावी युद्ध था. नेहरु इलाहाबाद के फूलपुर तहसील से चुनाव लड़ते थे. वहीं से वह बराबर लोक सभा में पहुंचे. लोहिया उनके खिलाफ 1957 में चुनाव के लिए खड़े हुए. बुद्धिजीवियों के शहर इलाहाबाद के लिए यह बहुत रोचक मुकाबला था. लोहिया के भी समर्थक कम नहीं थे, पर नेहरु का व्यक्तित्व सबको आत्मसात कर लेता था

डॉ लोहिया ने नेहरु को इस चुनाव में जो चिट्ठी लिखी, उसमें उन्होंने लिखा कि, 
"
मैं आप के खिलाफ चुनाव लड़ने जा रहा हूँ. मैं जानता हूँ कि मैं पहाड़ से सिर टकरा रहा हूँ. पहाड़ का कुछ नहीं बिगड़ेगा.सिर ही टूटेगा. फिर भी अगर मैं आप को सुधार कर सन सैंतालीस के पहले का नेहरु बना सका तो यह मेरी उपलब्धि होगी. "
नेहरु ने इसका उत्तर दिया, 
"
प्रिय राम मनोहर, तुम मेरे खिलाफ चुनाव लड़ रहे हो. मेरी शुभकामनाएं. तुम्हारी सुविधा के लिए मैं फूलपुर चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए नहीं जाउंगा."
इतना ही नहीं लोहिया ने चुनाव लड़ने के लिए नेहरु से धन भी माँगा और आनंद भवन का एक कमरा कार्यालय के लिए भी. नेहरु ने दिया भी. 
श्रोत, लोहिया -ओमकार शरद

लेकिन परिणाम अपेक्षित था. लोहिया हारे पर जमानत बच गयी. नेहरु की इसे मैं हार ही कहूंगा. अतीत के संघर्ष का संवेग और सूर्य का तेज अब ढलान पर था. लेकिन आज के पप्पू, फेंकू, मौत का सौदागर, इटली की बार डांसर वाली जुमले बाज़ी भरी राजनीति के बीच ये संस्मरण खुद को ही हैरान करते हैं. तभी तिब्बत की समस्या हुयी. नेहरु की चुप्पी इस मसले लोहिया के विरोध का कारण बनी. आज जो हम चीन सीमा पर रोज़ रोज़ चीनी सैनिकों द्वारा तम्बू कनात लगाए जाने की खबरे पढ़ते रहते हैं उसका एक कारण ड्रैगन द्वारा तिब्बत को निगल जाना भी है. आज हम मानसरोवर का एक वैकल्पिक मार्ग पा जाने पर आह्लादित हैं , लोहिया ने तभी सरकार से कहा था कि कैलास और मानसरोवर पर हम अपना दावा ठोंके. वह हमारी संस्कृति और विरासत की पवित्र झील और पर्वत है. तब इन धार्मिक प्रतीकों पर वोट भी मिल सकता है या नहीं, किसी ने सोचा नहीं था. किसी समय स्वार्थ, और घृणा फैलाने के लिए शुरू किया गया राम मंदिर आन्दोलन जो अब डीप फ्रीज़र में है और सत्ता की सीढी के रूप में यदा कदा प्रयुक्त होता है, वही राम लोहिया के भी आदर्श थे. उन्होंने अपने जीवनकाल में ही चित्रकूट में रामायण मेला की शुरुआत की थी. उसके नाम पर चन्दा और वोट नहीं माँगा था. साथ ही सीता की अग्नि परीक्षा, और परित्याग को लेकर राम की मर्यादा पर सवाल भी उठाये थे.

लोहिया एक प्रखर चिन्तक भी थे. मार्क्स गाँधी एंड सिशालिज्म, इतिहास चक्र, राम शिव और कृष्ण, भारत विभाजन के अपराधी आदि पुस्तकों सहित वह नियमित अपनी बातें अखबारों में लिखते रहते थे. वह महान थे. सफलता ही सदैव महत्ता का मापदंड नहीं होती. अपने जीवन काल में ही उनकी विचारधारा ने युवाओं को बहुत ही प्रभावित किया था. उस समय देश के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति में लोहिया हावी थे. जब उनका निधन हुआ तो उस समय की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पत्रिका दिनमान जिसके सम्पादक अज्ञेय थे जो सम्पादकीय लिखा था वह अद्भुत था. अज्ञेय ने उनकी मृत्यु को असामयिक और देश के लिए आघात बताते हुए लिखा था कि आज देश के युवाओं को अनुप्राणित कर सकने वाला लोहिया जैसा कोई व्यक्तित्व नहीं है. ऐसा कोई नहीं है जो एक व्यापक जन आन्दोलन खडा कर सके. इस दल के पास आधे दर्जन ऐसे मुखर सांसद हैं जो संसद के किसी भी मसले पर बहस को अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं.

आज लोहिया नहीं हैं पर उनके विचार, उनकी किताबें उनका योगदान सदैव अनुप्राणित करता रहेगा. हाँ एक बात और. समाजवादी पार्टी लोहिया का भले नाम ले पर उसे डॉ लोहिया के विचारधारा, सोच और चिंतन से जोड़ कर न देखें और न ही उसके आधार पर डॉ लोहिया का मूल्यांकन ही करें.
विजय शंकर सिंह