Friday, 8 September 2023

संसदीय अधिवेशन और विशेष सत्र / विजय शंकर सिंह

संसद का सत्र बुलाने की शक्ति सरकार के पास है। यह निर्णय संसदीय मामलों की कैबिनेट समिति द्वारा लिया जाता है, और राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक रूप दिया जाता है, जिनके नाम पर सांसदों को एक सत्र के लिए बुलाया जाता है।

भारत में कोई निश्चित संसदीय कैलेंडर नहीं है।  परंपरा के अनुसार, संसद की बैठक एक वर्ष में तीन सत्रों के लिए होती है।  
० सबसे लंबा, बजट सत्र, जनवरी के अंत में शुरू होता है, और अप्रैल के अंत या मई के पहले सप्ताह तक समाप्त होता है।  सत्र में अवकाश का प्राविधान इसलिए किया गया है, ताकि संसदीय समितियां बजटीय प्रस्तावों पर चर्चा कर सकें।
० दूसरा सत्र तीन सप्ताह का मानसून सत्र है, जो आमतौर पर जुलाई में शुरू होता है और अगस्त में समाप्त होता है।  
० संसदीय वर्ष का समापन तीन सप्ताह लंबे शीतकालीन सत्र के साथ होता है, जो नवंबर से दिसंबर तक आयोजित होता है।

1955 में, लोकसभा की सामान्य प्रयोजन समिति द्वारा, संसदीय अधिवेशनों के आयोजित करने की, एक सामान्य योजना की सिफारिश की गई थी। इस सिफारिश को, जवाहरलाल नेहरू सरकार ने स्वीकार भी कर लिया था, लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका। 

संसद के अनुसार, संसद का अधिवेशन आहूत करने संबंधी प्राविधान, संविधान के अनुच्छेद 85 में दिए गए है। यह अनुच्छेद, संविधान के अनेक अनुच्छेदों  की ही तरह, भारत सरकार अधिनियम, 1935 (Government of India Act 1935) के एक प्रावधान पर आधारित है, जो यह कहता है कि, "केंद्रीय विधायिका (तब की सेंट्रल असेंबली, जो अब संसद है) को वर्ष में कम से कम एक बार बुलाया जाना चाहिए, और दो सत्रों के बीच 12 महीने से अधिक का समय नहीं होना चाहिए।"

तब सेंट्रल असेंबली की भूमिका सीमित थी और लोकतंत्र बराए नाम था, और वायसरॉय तथा उनकी काउंसिल ही, भारत की भाग्य विधाता थी। वायसरॉय और उसकी काउंसिल, ब्रिटिश संसद को, रिपोर्ट करती थी। सेंट्रल असेंबली के सदस्यों की भूमिका सीमित थी और अधिकतर वे राजभक्त थे। 

सेंट्रल असेंबली के इस प्राविधान पर, संविधान सभा में, हालाँकि, डॉ. बीआर अम्बेडकर ने कहा था कि, "उस प्रावधान का उद्देश्य केवल राजस्व इकट्ठा करने के लिए विधायिका को बुलाना था, और साल में एक बार बैठक विधायिका द्वारा सरकार की आलोचना से बचने के लिए डिज़ाइन की गई थी।" 
इसके बाद, संविधान सभा ने, हमारे संविधान के संसदीय अधिवेशन से संबंधित प्रावधान, के उसके आहूत सत्रों के बीच के, अंतर को छह महीने तक कम कर दिया, और निर्दिष्ट किया कि, "संसद को वर्ष में कम से कम दो बार अपनी बैठक करनी चाहिए।"

डॉ आंबेडकर ने यह भी कहा कि, “जैसा कि यह खंड (प्राविधान) मौजूद है, विधायिका को खंड में दिए गए प्रावधान (साल में दो बार) से अधिक बार बुलाए जाने से रोकता नही है। वास्तव में, मुझे डर यह है, अगर मैं ऐसा कह सकूं, कि, संसद के सत्र इतने बार-बार और इतने लंबे होंगे कि, विधायिका के सदस्य शायद सत्रों से थक जाएंगे।” 
इसीलिए आंबेडकर, लंबे सत्रों की परंपरा बनने देने के लिए सहमत नहीं थे। 

संविधान सभा के डिबेट्स के अनुसार, इस विंदु पर भी बहस हुई और बिहार के,  प्रोफेसर के टी शाह ने अपनी बात रखी और सलाह दी कि, "संसद की बैठक पूरे साल, बीच-बीच में अंतराल के साथ, चलनी चाहिए।"
प्रोफेसर केटी शाह यह भी चाहते थे कि, "दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों को कुछ परिस्थितियों में संसद बुलाने का अधिकार भी दिया जाए।"
लेकिन सभा ने इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया गया और डॉ आंबेडकर का ही सुझाव माना गया, जो, अनुच्छेद 85 का अंग बना।

यदि संसदीय बैठकों के दिनवार संख्या का, आकलन करें तो, यह स्पष्ट होता है कि, पिछले कुछ वर्षों में संसद की बैठकों में गिरावट आई है। बैठकों के दिन भी, दिन पर दिन कम होते गए हैं, और प्रतिभागी भी उनमें पर्याप्त संख्या में नहीं आ रहे हैं। एकाध बार तो, कोरम की भी दिक्कत हुई है। लेकिन, संसद के पहले दो दशकों के दौरान, लोकसभा की बैठकें वर्ष में औसतन 120 दिन से कुछ अधिक होती थीं। जबकि, हाल के दशक में यह घटकर लगभग 70 दिन की रह गई है।  

नियमित सत्रों के अतिरिक्त, कुछ विशेष सत्र भी आहूत किए गए हैं। एक विशेष सत्र तो, अभी इसी 18 सितंबर को, पांच दिन के लिए बुलाया गया है, जिसका उद्देश्य और एजेंडा अभी तक स्पष्ट नहीं है। बस लोगों द्वारा कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ का अनुमान है कि, यह, लोकसभा के शीघ्र चुनाव के लिए आहूत है तो, कुछ का अनुमान है, ओबीसी के लिए गठित रोहिणी बिल पर चर्चा के लिए तो कुछ का यह भी कहना है कि, कोई मनी बिल भी आ सकता है। फिलहाल अभी कोई अधिकृत एजेंडा, सामने नहीं आया है। 

आगामी विशेष सत्र, जो 18 सितंबर को बुलाया गया है, वह, नियमित रूप से निर्धारित बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र के अलावा, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा आयोजित दूसरा विशेष सत्र होगा। पिछली बार संसद ने इसी तरह का एक विशेष सत्र, साल, 2017 में आयोजित किया था। लोकसभा और राज्यसभा दोनों की आधी रात की उस बैठक में, सरकार ने वस्तु और सेवा कर (GST) जीएसटी लागू किया था। तब जीएसटी को, आजादी के बाद का, सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष कर सुधार बताया गया था, और उम्मीद की गई थी, यह पूरे कर ढांचे को, बदल कर रख देगा। कर ढांचा तो बदला, पर, जीएसटी से, अनेक बड़ी जटिलताएं भी उत्पन्न हुई, जिसका असर, अर्थ और व्यापार पर अनुकूल नहीं पड़ा और कर प्रशासन में, तरह तरह के कनफ्यूजन भी सामने आए और भी आ रहे हैं।

यह भी पहली बार ही था कि, कोई विधायी अधिनियम (जीएसटी) एक विशेष मध्यरात्रि सत्र में पारित करने के लिए बुलाया गया। विशेष सत्र पहले भी बुलाए गए थे, पर, उनका उद्देश्य और विषय, ऐतिहासिक महत्व की घटनाओं को स्मरण करना था, न कि कोई नियमित विधाई कार्य संपन्न कराना था।

उपरोक्त के अतिरिक्त, संसद के विशेष सत्रों की क्रोनोलॉजी देखें...
० पहली बार, 14-15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर।
० दूसरी बार, 15 अगस्त 1972 को स्वतंत्रता की रजत जयंती मनाने के लिए। 
० तीसरी बार, 9 अगस्त 1992 को भारत छोड़ो आंदोलन की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर।
० चौथा विशेष सत्र, 15 अगस्त 1997 को मध्यरात्रि, स्वाधीनता दिवस की पचासवीं वर्षगांठ पर, आयोजित किया  गया था। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Thursday, 7 September 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (15.2) / विजय शंकर सिंह

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई, सूर्यकांत की संविधान पीठ के समक्ष धारा 370 की सुनवाई के पंद्रहवें दिन (दिनांक 4 सितंबर 2023) धारा 370 मामले में केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों की दलीलें समाप्त हो गईं। फिर से समापन टिप्पणी (concluding remarks) के लिए  याचिकाकर्ताओं को अवसर दिया गया। इस तरह एक प्रतिउत्तर तर्क (Rejoinder arguments) की शुरुआत हुई। 
० जम्मू-कश्मीर विलय को ऐतिहासिक संदर्भ में अवश्य देखें

प्रतिवादी पक्ष की बहस का उत्तर देते हुए, शुरुआत में, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि, "उत्तरदाताओं द्वारा उठाए गए अधिकांश तर्क "अनचाहे" (unwanted) और याचिकाकर्ताओं द्वारा दिए गए तर्कों के "संदर्भ के बिना" (out of context) थे।" 
उन्होंने स्पष्ट किया कि, "याचिकाकर्ताओं की ओर से किसी ने भी भारत की संप्रभुता को चुनौती नहीं दी है।"  
अपना निवेदन जारी रखते हुए उन्होंने कहा, 
"मुझे कुछ दुख हुआ, जब एक वकील ने तर्क दिया कि, हम जम्मू-कश्मीर के लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हैं लेकिन आपको भी हमारी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। हम इस मामले को भारत के संविधान की भावनात्मक, बहुसंख्यकवादी व्याख्या तक सीमित नहीं कर सकते। जम्मू-कश्मीर के सभी निवासी  भारत के नागरिक हैं। यदि ऐतिहासिक रूप से कोई अनुच्छेद है जो उन्हें कुछ अधिकार देता है, तो वे कानून के रूप में इसका बचाव करने के हकदार हैं। यह कहना कि आपको हमारी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए जैसे कि वे कोई और ही हों, एक तरह का निर्माण करना है  इससे कोई खाई पैदा नहीं होनी चाहिए।"

इसके बाद कपिल सिब्बल ने अनुच्छेद 370 की ऐतिहासिक संदर्भ में व्याख्या करने के लिए पीठ को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के इतिहास की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि, "अन्य रियासतों के विपरीत, जम्मू और कश्मीर का भौगोलिक रूप से भारत के साथ कोई संबंध नहीं था और जिन दो सिद्धांतों के आधार पर विलय होना था, वे निकटता और जनसंख्या थे और उक्त निर्णय शासक द्वारा लिया जाना था। इस प्रकार, ऐतिहासिक संदर्भ में, किसी को यह ध्यान रखना चाहिए कि जम्मू और कश्मीर में जो कुछ हुआ वह केवल यह सुनिश्चित करने के लिए था कि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन जाए।"

० क्या अनुच्छेद 370 को बुनियादी ढांचे से ऊपर रखा जा सकता है?

वरिष्ठ अधिवक्ता ने, तब जोर देकर कहा कि, "उत्तरदाताओं (Respondents) द्वारा दिया गया यह तर्क कि, संसद के पास जम्मू और कश्मीर को लागू करने के लिए संविधान के तहत पूर्ण शक्तियां थीं, गलत था। क्योंकि जम्मू और कश्मीर के संबंध में कानून बनाने की संसद की शक्ति अनुच्छेद 370 द्वारा सीमित थी।  इस प्रकार, संसद के पास ऐसी कोई पूर्ण शक्ति नहीं थी और यह तय करना मंत्रिपरिषद का काम था कि जम्मू और कश्मीर पर कौन से कानून लागू होंगे, न कि संसद को। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना था कि, एक ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से जम्मू-कश्मीर का भारत में धीमी गति से एकीकरण हो जो आसान हो और दोनों अधिकारियों को एक-दूसरे के साथ संवाद करने की अनुमति दे।"
सिब्बल ने कहा कि, "अनुच्छेद 370(3) के अनुसार, पहला कदम संविधान सभा से सिफारिश करना था और उसके बाद ही राष्ट्रपति कोई आदेश पारित कर सकते थे।" 
उन्होंने कहा, "आप आदेश को उलट नहीं सकते।"

इस मौके पर सीजेआई ने टिप्पणी की कि, भारतीय संविधान में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि, "जम्मू-कश्मीर संविधान लागू होने के बाद क्या किया जाना है और इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।"
इस प्रकार, उन्होंने कहा कि, "एकीकरण समाप्त होने के बाद अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के संदर्भ में, अनुच्छेद 370 में कुछ 'चुप्पी' बाकी थीं।" 
इस पर सिब्बल ने टिप्पणी की, "संविधान की व्याख्या की जानी है...हमें यह नहीं देखना है कि संविधान में क्या चुप्पी है।"

 सीजेआई ने तब कहा, "आपके तर्क को स्वीकार करने के लिए, हमें प्रावधान में एक और शर्त पढ़नी होगी कि, संविधान सभा की सिफारिश राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तावित कार्रवाई के समान शर्तों पर होनी चाहिए। लेकिन यह प्रावधान में नहीं है।"
सिब्बल ने जवाब दिया कि, "अब तक, परंतुक की कभी भी उस तरह से व्याख्या नहीं की गई थी जैसी कि भारत संघ व्याख्या करना चाह रहा था।"
न्यायमूर्ति खन्ना ने तुरंत जवाब देते हुए कहा कि, "ऐसा अवसर पहले कभी नहीं आया।" 
तब सीजेआई ने की टिप्पणी, "खंड (3) के परंतुक पर आपके प्रस्तुतीकरण का अनुक्रम यह है कि, एक बार जब संविधान सभा ने जम्मू-कश्मीर का संविधान तैयार कर लिया, तो प्रावधान का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इस स्थिति में, 370 एक स्थायी चरित्र मान लिया जाता है...तो इसमें हमारे संविधान में एक प्रावधान है, जो मूल संरचना से ऊपर है?"

सीजेआई ने टिप्पणी कि, "जम्मू-कश्मीर पर लागू अनुच्छेद 368 के अनुसार, संसद की संशोधन शक्ति अनुच्छेद 370 के संबंध में लागू नहीं की जा सकती है। ऐसा इसलिए था क्योंकि 1954 के संविधान (जम्मू-कश्मीर पर लागू) आदेश में अनुच्छेद में एक प्रावधान जोड़ा गया था। अनुच्छेद 368 में कहा गया है, "बशर्ते कि ऐसा कोई भी संशोधन जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कि अनुच्छेद 370 के खंड (1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश द्वारा लागू नहीं किया जाता है"। परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 370 संसद की संशोधन शक्ति से परे था। इसलिए, यदि 370(3) का उपयोग जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सिफारिश के बिना अनुच्छेद को निरस्त करने के लिए नहीं किया जा सकता है, जिसका अस्तित्व 1957 के बाद समाप्त हो गया, तो इसका मतलब यह होगा कि 370 को बिल्कुल भी नहीं छुआ जा सकता है।"
आगे विस्तार से बताते हुए सीजेआई ने कहा, "तो आप कह रहे हैं कि अनुच्छेद में संशोधन करने की शक्ति अनुच्छेद में ही निहित है और इसलिए हम एक ऐसे प्रावधान से निपट रहे हैं जो शायद मूल संरचना सिद्धांत से भी ऊंचा है।"

सिब्बल ने नकारात्मक जवाब दिया और कहा कि "यह याचिकाकर्ता का तर्क बिल्कुल नहीं था। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता कोई समाधान देने के लिए नहीं थे और पूरा अधिनियम एक राजनीतिक कृत्य और एक राजनीतिक प्रक्रिया है जिसका राजनीतिक समाधान भी होना चाहिए।"
सीजेआई ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा, "तो आपके अनुसार, संविधान के भीतर कश्मीर का कोई समाधान नहीं है? अंततः यही तर्क है - कि समाधान राजनीतिक होना चाहिए। लेकिन सभी समाधान संविधान के ढांचे के भीतर होने चाहिए।"
इस पर सिब्बल ने दोहराया कि संघ के लिए उचित समाधान ढूंढना न तो अदालत का कर्तव्य है और न ही याचिकाकर्ताओं का।  उन्होंने कहा कि न्यायालय अनुच्छेद 370 को कैसे निरस्त किया जाए, इस बारे में सलाहकारी अधिकार क्षेत्र में नहीं बैठा है। वर्तमान कार्यवाही केवल संघ द्वारा पहले से ही की गई कार्रवाइयों की वैधता तय करने के लिए है, न कि संघ को सलाह देने के लिए।"

० अनुच्छेद 356 का गलत उपयोग

वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल की दलीलों का अगला चरण इस बात पर केंद्रित था कि, अनुच्छेद 356 का प्रयोग कैसे अवैध था।  उन्होंने कहा कि, "संघ ने पहले संविधान सभा को विधान सभा से प्रतिस्थापित किया और फिर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया, जिसके द्वारा उसने संसद को अपनी सहमति देने के लिए विधान सभा बना दिया।"
उसी को अस्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, "अनुच्छेद 356 के तहत प्रक्रिया यह है कि, आप विधानसभा को निलंबित अवस्था में रखते हैं, यदि आपको लगता है कि कोई संभावना नहीं है, तो 356 लगाने के बाद, आप भंग कर देते हैं और चुनाव कराते हैं।"

सिब्बल ने तब तर्क दिया कि सही प्रक्रिया निम्नलिखित होती, "उन्हें (राज्यपाल को) यह सिफ़ारिश करनी पड़ी होगी कि वे संविधान के प्रावधानों के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं - क्योंकि राज्यपाल 6 महीने से शासन कर रहे थे। आप कभी भी विधानसभा को तुरंत भंग नहीं करते क्योंकि तब आपको चुनाव कराने होंगे। डेमोक्रेटिक  प्रक्रिया को ख़राब नहीं किया जा सकता।"
सुनवाई अभी जारी है। 

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (15.1) / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/09/370-151.html

Wednesday, 6 September 2023

दिल्ली में शिवलिंग के सजावटी फव्वारे / विजय शंकर सिंह



जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बन रहा था, तब असी नदी में और जहां तहां, काफी अधिक संख्या में, शिवलिंग उपेक्षित रूप से इधर उधर बिखरे पाए गए थे। लोग अक्रोशित थे और उन्हे शिव की ही नगरी में, शिव का यह अनादर और अपमान आहत कर रहा था। तब आज के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी भी वहां गए थे और उन्होंने रोष जताया था। तब तो बाबा का मॉल बन रहा था। लोग इसी पिनक में थे,  बाबा का 'उद्धार' हो रहा है। यह भी वे भूल गए कि, सबका उद्धार करने वाले बाबा का उद्धार करने वाला कौन पैदा हो गया ! बात आई गई हो गई। 

काशी विश्वनाथ मंदिर में, शिव की कचहरी तोड़ दी गई, पंच विनायकों के लंबे समय से पूजित विग्रह हटा दिए गए, पंचकोशी यात्रा मार्ग कहां खो गया, यह पता नहीं, उसी परिसर में प्रतिष्ठित मां अन्नपूर्णा कहां चली गई, यह आज तक नहीं पता चला और अब वहां होटल या गेस्ट हाउस खुल गया है। तीर्थ, अब पर्यटन में बदल गया और काशी भी वही है, बाबा भी वहीं हैं, बस बदला तो आस्था और अध्यात्म, जो एक बाजार के रूप में तब्दील हो गया। 

इसी तरह से दिल्ली में G 20 की महत्वपूर्ण बैठक हो रही है, दिल्ली सजाई बजाई जा रही है, दिल्ली के कुछ हिस्सों में, सुरक्षा के कारण आवागमन पर प्रतिबंध है, पर कोई बात नहीं, हमारा समाज, अतिथि देवो भव है तो, यह सब कष्ट कुछ ही दिनों का है, बीत ही जायेगा। वैसे भी कष्ट सहने की एक सनातन मनोवृत्ति भी हममें है। 

दिल्ली सजाने के क्रम में, शहर में, जगह जगह फव्वारे बनाए गए और फव्वारे की शक्ल में, और कोई स्थापत्य या मूर्ति या कलाकृति, दिल्ली सरकार यानी एलजी, (अब तो वही हाकिम ए आला है) को, नहीं मिली तो, उन्होंने शिव को शिवलिंग के ही रूप में, फव्वारों में लगवा दिया। शिवलिंग के कतारों में लगे फव्वारों की फोटो, अखबारो और सोशल मीडिया में घूम रही है। इस पर आस्था के  कारोबारी चुप हैं। अभी किसी सनातनी संत महात्मा के आहत होने की खबर, नहीं दिखी है। 

सड़क पर लगे हुए, शिवलिंग की कतार से जुड़े यह फव्वारे, किसी की आस्था आहत करते हैं या नहीं, यह तो लोगों की, अपनी अपनी आस्था के गुणांक पर निर्भर है, पर इस तरह से, शिवलिंग का एक सजावटी फव्वारे के रूप में, जगह जगह उपयोग करना, क्या सनातन धर्म का अपमान नहीं है? यह सवाल पूछते समय मुझे Purushottam Agrawal सर का उपन्यास नाकोहस याद आ रहा है। 

अभी कुछ दिन पहले, एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें, एक मंत्री, शिव के अरघा में हांथ धोते देखे गए। यह भी पहली ही बार है, कि, शिव का पवित्र अरघा, जिसके जल से आचमन किया जाता है, उसमें वे वाश बेसिन की तरह हांथ धो रहे हैं। पर इस पर किसी की भी भावना आहत नहीं हुई और यह खबर भी आई गई हो गई। 

आज के अखबारो में एक खबर दिखी की, आम आदमी पार्टी ने लेफ्टिनेंट गवर्नर के खिलाफ, शिवलिंग के फव्वारे के रूप में, उपयोग करने को लेकर,  शिकायत दर्ज कराई है। इस शिकायत पर जब पत्रकारों ने, एलजी से पूछा तो, एलजी ने कहा, कि, "वह एक आकार है, शिवलिंग नहीं, फिर भी किसी को उसमे शिव दिखते हैं तो, कोई बात नहीं, भगवान तो कण कण में है।"

बात तो लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब बहादुर की भी सही है कि, कण कण में भगवान हैं, पर क्या एक ऐसे देश में, जहां, सौंदर्य बोध की एक समृद्ध परंपरा रही है, शहर को सजाने के लिए किसी ऐसे प्रतीक या कलाकृति का उपयोग नहीं किया जा सकता था, जो विविध रूपों और आकारों में हो, उससे किसी देव प्रतिमा का साम्य भी न हो रहा हो, और सब कुछ आकर्षक और सुंदर भी दिखे ?

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

Tuesday, 5 September 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (15.1) / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष अनुच्छेद 370 को संशोधित करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के पंद्रहवें दिन (दिनांक 4 सितंबर 2023) केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों (Respondents) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई और सूर्यकांत की पीठ के समक्ष अपनी दलीलें समाप्त कीं। 

० अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान की सामान्य संघीय विशेषताओं के अनुरूप नहीं था।

पिछले दिन की सुनवाई से अपनी दलीलें जारी रखते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता, वी गिरी ने तर्क दिया कि, "अनुच्छेद 370 ने जम्मू और कश्मीर के लिए एक ऐसा राज्य या क्षेत्र बनाया, जो देश के बाकी हिस्सों (अन्य राज्यों) के लिए संविधान की सामान्य संघीय विशेषताओं के साथ, 'समान' नहीं था।"
उन्होंने कहा कि, "यह अनुच्छेद केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच संबंधों को एक अलग स्तर पर स्थापित करता है जो, केंद्र और अन्य राज्यों के बीच के संबंधों से अलग है।"
उन्होंने कहा कि, "जब संवैधानिक आदेश 272 द्वारा अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया और भारतीय संविधान के सभी प्रावधान जम्मू और कश्मीर पर लागू हो गए, तो जम्मू और कश्मीर राज्य 'पूरी तरह से अन्य सभी राज्यों के बराबर' राज्य बन गया।"

एडवोकेट वी गिरि ने, आगे कहा कि, "अगर अनुच्छेद 370 को पुनर्जीवित किया गया तो, यह भारतीय संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन होगा।"
लेकिन, संविधान पीठ की तरफ से, सीजेआई ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए इसे असमर्थनीय दलील  (Untenable argument) बताते हुए, अपनी आपत्ति व्यक्त की, "यह थोड़ा दूर की कौड़ी लगती है क्योंकि तब यह मान लिया जाएगा कि मूल अनुच्छेद 370 बुनियादी ढांचे का उल्लंघन था।"
जब गिरि ने जोर देकर कहा कि, "अनुच्छेद 370, जिस समय अस्तित्व में था, उसे पहले ही जमीन पर चुनौती दी जा चुकी थी।"
सीजेआई ने कहा, "आप हमें एक असमर्थनीय प्रस्ताव पर अपना पक्ष रखने के लिए आमंत्रित नहीं कर सकते।"

० 370(3) के तहत राष्ट्रपति की असाधारण शक्ति को बिना किसी प्रतिबंध के पढ़ा जाना चाहिए। 

भारत संघ की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने जोर देकर कहा कि, "अनुच्छेद 370 संविधान में एकमात्र प्रावधान था जिसमें 'आत्म-विनाश तंत्र' था।"
उन्होंने आगे तर्क दिया कि, "अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को किसी भी प्रकार का अधिकार प्रदान नहीं करता है और वास्तव में, अनुच्छेद 370 के निरंतर जारी रहने से, जम्मू-कश्मीर के नागरिकों और देश के अन्य नागरिकों के बीच भेदभाव हुआ है और इस प्रकार, भारतीय संविधान ने, इसकी मूल संरचना का विरोध किया था।"

अनुच्छेद 370 को अनुच्छेद 368 के साथ जोड़ते हुए, एएसजी ने प्रस्तुत किया कि, "जहां तक ​​अनुच्छेद 370 के तहत प्रक्रिया का संबंध है, संघवाद के सिद्धांत का कोई अनुप्रयोग नहीं है।"  
उन्होंने कहा कि, "अनुच्छेद 368 संविधान में संशोधन के संदर्भ में संघवाद को मान्यता देता है और सामूहिक सहमति सिद्धांत भी पेश करता है। हालाँकि, अनुच्छेद 370 में 'सिफारिश' शब्द का इस्तेमाल किया गया था और इस प्रकार, उन्होंने कहा कि "इन दोनों लेखों को एक अलग भाषा में एक साथ पढ़ने से उनमें से कोई भी निरर्थक हो जाएगा।"

न्यायमूर्ति खन्ना ने एएसजी की दलीलों को स्पष्ट करते हुए टिप्पणी की, "मिस्टर नटराज, शायद, आप जो उजागर करने की कोशिश कर रहे हैं, वह यह है कि, यह तर्क कि, 370 को निरस्त करने के कारण संघीय ढांचा प्रभावित होता है, इस कारण से, स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि, संघीय ढांचा 368 द्वारा संरक्षित है।"
एएसजी नटराज ने सकारात्मक जवाब दिया और रेखांकित किया कि, "अनुच्छेद 370(3) के अंतर्गत राष्ट्रपति को प्रदान की गई शक्ति, एक "अद्वितीय, असाधारण शक्ति" थी और इसमें घटक शक्ति, कार्यकारी शक्ति और विधायी शक्ति के तत्व, सभी एक में संयुक्त रूप से शामिल थे।"
इस प्रकार, उन्होंने तर्क दिया कि, "ऐसी असाधारण शक्ति को किसी भी सीमा के साथ नहीं पढ़ा जाना चाहिए और इसे पूर्ण अर्थ दिया जाना चाहिए।"

० सीओ 272 में कोई ठोस बदलाव नहीं किया गया, बस एक अंतर्निहित प्रावधान को मान्यता दी गई। 

वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी उन हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से पेश हो रहे थे जो जम्मू-कश्मीर में गुज्जर बकरवाल समुदाय के सदस्य थे। जेठमलानी ने पीठ को बताया कि, "गुज्जर बकरवाल एक अनुसूचित जनजाति है और जम्मू-कश्मीर की कुल अनुसूचित जनजाति आबादी का 73.25% से अधिक है।  उन्होंने कहा कि समुदाय ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का समर्थन इसलिए किया क्योंकि संशोधन से पहले, अनुसूचित जनजातियों से संबंधित, भारतीय संविधान के प्रावधान कभी भी जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं किए गए थे।"
अपने तर्कों में, जेठमलानी ने जोर देकर कहा कि, "जहां तक ​​राजनीतिक संप्रभुता का सवाल है, यह केंद्र सरकार के पास है और इसे भारतीय और जम्मू-कश्मीर दोनों संविधानों की 'प्रस्तावना पर एक साधारण नज़र' से साबित किया जा सकता है।" 
उन्होंने रेखांकित किया कि, "जबकि 'संप्रभु' शब्द भारतीय संविधान में एक प्रमुख विशेषता थी, इसके विपरीत, जम्मू और कश्मीर संविधान की प्रस्तावना में संप्रभुता का कोई उल्लेख नहीं था। और यहां तक ​​कि संघ और राज्य के मौजूदा संबंधों को भी परिभाषित किया गया था।" 

सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी के अनुसार, "यह 'राज्य पर संघ की संप्रभुता की स्वीकृति' थी।"
उन्होंने कहा कि, "अनुच्छेद 370(3) इस तथ्य का सूचक था कि अंतिम 'कानूनी संप्रभुता' भारत संघ के पास है।"
एडवोकेट महेश जेठमलानी ने, सीओ 10, सीओ 39 और सीओ 48 जैसे विभिन्न संविधान आदेशों के माध्यम से यह साबित करने के लिए पीठ का सहारा लिया कि, "संविधान सभा और विधान सभा जहां तक ​​​​भारत के संविधान पर लागू होते हैं, एक दूसरे के, पर्यायवाची हैं।" 
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि, "सीओ 48 को पारित करते समय, पहली बार अनुच्छेद 367 मार्ग का उपयोग जम्मू और कश्मीर में भारतीय संविधान के आवेदन में संशोधन करने के लिए किया गया था।"

इस पर सीजेआई ने टिप्पणी की, "तथ्य अभी भी कायम है कि 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर का संविधान बनने के बाद, अनुच्छेद 367(4)(डी) को खंड (डी) को हटाने के लिए फिर से संशोधित किया गया था। इसलिए घटक और विधान सभा के बीच समानता उसी क्षण समाप्त हो जाती है  जब जम्मू-कश्मीर का संविधान बन गया है।”
हालाँकि, जेठमलानी ने दावा किया कि, "यह खंड हटा दिया गया था क्योंकि संविधान सभा के विघटन के बाद, जम्मू और कश्मीर की घटक शक्ति अब विधान सभा के पास थी।"
 उन्होंने एसजी की दलील को भी दोहराया कि, "वैकल्पिक निष्कर्ष यह होगा कि कोई भी अनुच्छेद 370 को कभी भी निरस्त नहीं कर सकता।" 
उन्होंने कहा, "367 में संशोधन ने जो कुछ किया वह एक अंतर्निहित प्रावधान को मान्यता देना था। यह न केवल पर्यायवाची था बल्कि उसका उत्तराधिकारी भी था। सीओ 272 ने कोई ठोस परिवर्तन नहीं किया। इसने एक स्पष्ट परिवर्तन किया जो पहले से ही अंतर्निहित था।"

० अधिकारों का परिप्रेक्ष्य प्रक्रियात्मक कमज़ोरियों के सभी आरोपों को झुठलाता है। 

जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से, जिसे अब पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) कहा जाता है, से विस्थापित लोगों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गुरुकृष्ण कुमार ने कहा कि, "याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई चुनौती की वैधता निर्धारित करने के मामले में 'अधिकार परिप्रेक्ष्य' निर्णायक कारक था।"
यह कहते हुए कि, "अधिकारों का परिप्रेक्ष्य, प्रक्रियात्मक कमज़ोरियों के सभी आरोपों को मात देगा", उन्होंने उन आवेदकों द्वारा भोगे गए भेदभाव और अधिकारों के हनन को रेखांकित किया जिनका वे प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन्होंने मुख्य रूप से विभाजन के दौरान विस्थापित हुए लोगों के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया, जिन्हें, जम्मू और कश्मीर संविधान की धारा 6 और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35 ए के तहत जम्मू और कश्मीर के 'स्थायी निवासियों' के रूप में मान्यता देने से बाहर रखा गया था। उन्होंने आगे जोड़ा, "मैंने यह स्पष्ट किया है कि, कैसे विभाजन के दौरान लगभग 8700 लोगों ने वह जगह छोड़ दी थी। आज, विवादित सीओ की घोषणा के बाद, कम से कम 23,000 लोगों को अधिवास प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ है।"

यह तर्क देते हुए कि, "विवादित सीओ परिवर्तनकारी संवैधानिकता को दर्शाते हैं, उन्होंने कहा कि सीओ ने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत का संविधान अपने सभी पूर्ण दायरे के साथ जम्मू और कश्मीर राज्य पर लागू हो।  उन्होंने कहा, "याचिकाकर्ताओं की चुनौती विरोधाभासी है क्योंकि यह एक ऐसा मामला है जहां भारत के संविधान के आवेदन को चुनौती दी गई है। सीओ (स्वैधानिक आदेश) अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रावधान करते हैं।"

इसके बाद हस्तक्षेपकर्ताओं (आईए दाखिल करने वाले) द्वारा तर्क दिये गये। भारत संघ की ओर से अधिवक्ता कनु अग्रवाल ने तर्क दिया कि, "भारतीय संविधान में संघीय विविधता दो आयामी धरातल पर मौजूद है।"
उन्होंने कहा, "केंद्र में एक राज्य की विशिष्ट  समझ (Classical  Understanding) होगी। इसके दाई तरफ, गुजरात या महाराष्ट्र जैसे विशेष सुविधाओं वाले कुछ ही राज्य होंगे। इसके बाद पांचवीं या छठी अनुसूची के तहत राज्य होंगे। इसके एक ओर पूर्ववर्ती अनुच्छेद 370 होगा।  370 के याचिकाकर्ता यह भूल जाते हैं कि, इसके बायीं ओर भी एक पैमाना है। बायीं ओर का पैमाना विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश, दिल्ली जीएनसीटी का केंद्र शासित प्रदेश और शायद शुद्ध केंद्र शासित प्रदेश है। इसलिए, संघीय विविधता निस्संदेह है।" 

यह कहते हुए कि विविधता एक संवैधानिक तथ्य है, उन्होंने जोर देकर कहा कि, "सभी संवैधानिक तथ्यों को बुनियादी संरचना (मूल ढांचे) के स्तर तक नहीं उठाया जा सकता है।" फिर उन्होंने कहा कि, "घटक शक्तियाँ दो प्रकार की होती हैं- मूल और व्युत्पन्न शक्ति। यह मानते हुए कि इस मामले में संसद जैसी अन्य विधायिकाओं को हमेशा व्युत्पन्न शक्ति प्रदान की जाती थी, उन्होंने जोर देकर कहा कि जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा के पास कोई मूल घटक शक्तियाँ नहीं थीं, क्योंकि वह एक महाराजा की उद्घोषणा के अंतर्गत स्थापित की गई थीं जिन्होंने पहले ही विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे।" 
उन्होंने कहा कि, "महाराजा ने पहले ही भारतीय संविधान की सर्वोच्चता को मान्यता दे दी थी और अनुच्छेद 1 को स्पष्ट रूप से लागू किया गया था। ऐसी स्थिति में, एक महाराजा जो संप्रभु नहीं था, उसके पास जो उपाधि थी, उससे बेहतर कोई उपाधि नहीं हो सकती थी। "यदि वह एक संप्रभु नहीं था, तो संविधान सभा (जम्मू कश्मीर की संविधान सभा) कभी भी एक संप्रभु संविधान सभा नहीं हो सकती थी, कभी भी एक संप्रभु संविधान स्थापित नहीं कर सकती थी। यह स्वचालित रूप से व्युत्पन्न घटक शक्तियों का प्रयोग करती है। यदि यह व्युत्पन्न घटक शक्तियों का प्रयोग कर रही है, तो यह एक विधान सभा के ही समान है।" 

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) विक्रमजीत बनर्जी की ओर से भी अनुच्छेद 370 को 'अस्थायी' प्रावधान मानने की दलीलें दी गईं। अधिवक्ता अर्चना पाठक दवे ने उन महिलाओं के अधिकारों की बात की, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर राज्य के बाहर शादी की और उन्हें स्थायी निवास के साथ-साथ रोजगार, छात्रवृत्ति और अचल संपत्ति रखने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। अन्य वकीलों ने जम्मू-कश्मीर के नागरिक की राष्ट्रीयता से जुड़े सम्मान के अधिकार पर सवाल उठाए जाने की बात कही।  2019 से पहले सताए गए लोगों के अधिकारों के उल्लंघन पर भी प्रकाश डाला गया। 

इन सब बहसों के साथ ही उत्तरदाताओं ने, इस मामले में अपनी दलीलें समाप्त कर दीं। 

इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 मामले के एक याचिकाकर्ता से भारत की संप्रभुता को स्वीकार करने और भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की पुष्टि करते हुए हलफनामा दाखिल करने को कहा। इसे आप भाग 15.2 में पढ़िएगा। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (14) / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/09/370-14.html

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (14) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370 को शुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ कर रही है, जिसमें, सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़,और  जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत, कुल पांच जज हैं। इस संविधान पीठ के समक्ष, अनुच्छेद 370 के संदर्भ में दायर याचिका की सुनवाई के चौदहवें दिन (1 सितंबर2023) प्रतिवादीगण (respondent) द्वारा अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की राष्ट्रपति की शक्तियों और जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिशी शक्ति से संबंधित, दलीलें पेश की गईं।  

० राजशाही ख़त्म हो गई, याचिकाकर्ता 'डूबते ताज' पर भरोसा कर रहे हैं। 

वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने, पिछले  दिन भी अपनी दलीलें दी थीं और चौदहवें दिन भी अपनी दलीलें जारी रखते हुए कहा कि, "अनुच्छेद 370(3) के मूल भाग के अंतर्गत, प्रदान की गई शक्ति का, यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता है कि, यदि प्राविधान (provosio) समाप्त हो जाता है, तो राष्ट्रपति को प्रदान की गई घटक शक्ति भी समाप्त हो जाती है।" 
आगे उन्होंने इसमें जोड़ा, "हां, जब तक जेकेसीए (जम्मू-कश्मीर संविधान सभा) जीवित है तब तक प्रावधान की एक सीमा है। लेकिन इसकी मृत्यु (समाप्ति)  का अर्थ, मुख्य शक्ति की मृत्यु (समाप्ति) नहीं है।"
यहां मुख्य शक्ति का अर्थ भारत के राष्ट्रपति से है। 

संघवाद के संबंध में, याचिकाकर्ताओं द्वारा दिए गए तर्कों का प्रतिवाद करते हुए, द्विवेदी ने जोर देकर कहा कि, संविधान निर्माता सभी राज्यों के लिए 'समान संघवाद' चाहते थे और वह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) थी, न कि, राज्यों के बीच कोई विषमता, अंतर या विविधता नहीं, जो विशेष परिस्थितियों के कारण तब हुई थी।  
एडवोकेट राकेश द्विवेदी का तर्क था कि, "विशेष परिस्थितियों पर आधारित शक्ति का कोई भी अंतर, कभी भी स्थायी नहीं हो सकता क्योंकि, जैसे ही परिस्थितियाँ बदलती हैं, उन प्रावधानों को भी बदलना पड़ता है।"

एडवोकेट राकेश द्विवेदी आशय यह है कि, अनुच्छेद 370 एक असामान्य या विशेष परिस्थितियों में, भारतीय संविधान के अंतर्गत लाया गया प्राविधान था। और जब स्थितियां, सामान्य हो गईं तो, वह अनुच्छेद, जो असामान्य परिस्थितियों के कारण इंट्रोड्यूस किया गया था, अब सामान्य स्थितियों में, उसे हटा दिया गया। 

इसे और विस्तार से समझते हुए सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा, "सवार  (जम्मू कश्मीर की विधान सभा) जाता (यानी भंग हो जाती) है, मुख्य भाग (अनुच्छेद 370 के अधीन संघ की शक्तियों) का विस्तार (विधान सभा की विधाई शक्तियां, संसद में समाहित) हो जाती है। प्राविधान जाता है, मुख्य भाग का विस्तार होता है और अनुमोदन की कोई आवश्यकता नहीं होगी। राष्ट्रपति का अर्थ है, मंत्रिपरिषद और मंत्रिपरिषद का अर्थ है, संसद के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदारी। इसलिए अनुच्छेद 53 के साथ पढ़ें  73 और 75(3) के साथ पढ़ें, मंत्रिपरिषद, अपने विचार प्राप्त करने के लिए किसी भी समय संसद में जा सकती है।"

एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा कि, "राष्ट्रपति ने इसे रद्द करने का निर्णय अकेले नहीं लिया था, बल्कि, पूरी संसद को विश्वास में लेकर किया था।"  
इस संदर्भ में, उन्होंने कहा कि "पूरे देश की आवाज़ सुनी जाती है, जिसमें कश्मीर की संसद के सदस्य भी शामिल हैं, जिनका प्रतिनिधित्व मंत्रिपरिषद के अंतर्गत भी होता है।"

अपनी दलीलों में, द्विवेदी ने यह भी तर्क दिया कि, "जम्मू-कश्मीर के पास कोई अवशिष्ट (residuary) संप्रभुता नहीं बची है, जैसा कि याचिकाकर्ताओं ने, अपनी दलीलों में, आरोप लगाया है।" 
उन्होंने कहा कि, "यदि याचिकाकर्ताओं का यह तर्क कि जम्मू-कश्मीर में 'अवशिष्ट संप्रभुता, अवशेष संप्रभुता और आंतरिक संप्रभुता' बनी हुई है, स्वीकार कर लिया जाता है तो यह बेहद शक्तिशाली होगा।  उन्होंने कहा कि ऐसी 'अवशेष संप्रभुता' यदि अस्तित्व में है तो उसे भारत के संविधान के भीतर पाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह सच नहीं था।"  
उन्होंने कहा, "तो राजशाही मर चुकी है। याचिकाकर्ताओं की दलीलें डूबते ताज पर भरोसा कर रही हैं।"

० जम्मू-कश्मीर संविधान सभा को वह स्वतंत्रता नहीं मिली जो भारतीय संविधान सभा को प्राप्त थी। 

एडवोकेट राकेश द्विवेदी के अनुसार, "जम्मू-कश्मीर संविधान बनाते समय, जम्मू-कश्मीर संविधान सभा को वह स्वतंत्रता नहीं प्राप्त थी जो भारत की संविधान सभा को प्राप्त थी, क्योंकि वह (जम्मू कश्मीर की संविधान सभा) विभिन्न चीजों से बंधी हुई थी।"
उन्होंने निम्नलिखित को जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सीमाओं के रूप में सूचीबद्ध किया,

1. जम्मू-कश्मीर संविधान सभा इस तरह से बाध्य थी कि, भारत के संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

2. जम्मू-कश्मीर संविधान सभा को न्याय, स्वतंत्रता, भाईचारा सुनिश्चित करना था।

3. यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 से भी बंधी हुई थी और इस प्रकार, खुद (राज्य) को भारत की संघीय इकाई का हिस्सा नहीं घोषित नहीं करती थी।

4. जम्मू-कश्मीर संविधान सभा यह नहीं कह सकती थी कि, जम्मू-कश्मीर क्षेत्र का कोई भी हिस्सा भारत का केंद्र शासित प्रदेश नहीं बन सकता।

5. यह भी नहीं कह सकती थी कि, जो लोग जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी हैं, वे भारत के नागरिक नहीं होंगे।

सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा, "जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की यह पद्धति शक्तियों के हस्तांतरण की न्यायिक अवधारणा के समान है। संदर्भ के लिए, सत्ता का हस्तांतरण एक संप्रभु राज्य की केंद्र सरकार से क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर पर शासन करने के लिए शक्तियों का वैधानिक प्रतिनिधिमंडल है। यह प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का एक रूप है।" 
एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा कि, "यह अवधारणा ब्रिटेन में अक्सर लागू की जाती थी, जहां ब्रिटेन की संसद को सर्वोच्च माना जाता था लेकिन स्कॉटलैंड, उत्तरी द्वीप और वेल्स जैसे अन्य राज्यों की अपनी संसदें थीं।" 

उन्होंने इसे विस्तार से स्पष्ट किया, "तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप इसे सदर-ए-रियासत, सीएम, गवर्नर कहते हैं - इन अभिव्यक्तियों से कद नहीं बढ़ता है। कद प्रयोग की गई शक्ति की प्रकृति पर निर्भर करता है। यह भारत के प्रधान मंत्री की, शक्ति की प्रकृति के बराबर नहीं है भले ही आप इसे प्रधान मंत्री कहें।"
इसके बाद उन्होंने कहा कि, "जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा बनाने का विचार भारत सरकार से ही आया था।"

अपने तर्कों को समाप्त करते हुए, राकेश द्विवेदी ने टिप्पणी की,  "यह आश्चर्य की बात है कि मेरे दाहिनी ओर के मित्र,(याचिकाकर्ताओं के वकील) लोकतंत्र से समर्पित, उस ताज के आधार पर स्थायित्व की मांग कर रहे हैं जो लंबे समय से चला आ रहा है। राजा मर चुका है, राजा लंबे समय तक जीवित रहें (The King is dead, Longlive the King)। आपको इसके लिए किसी दस्तावेज़ को स्वीकार करने या निष्पादित करने की आवश्यकता नहीं है  इकाइयाँ बनने का उद्देश्य। प्रस्तावना, अनुच्छेद 1, 5, मौलिक अधिकार- ये सभी गणतंत्र बनाते हैं। इसके बिना, कोई गणतंत्र नहीं है।"

० जम्मू-कश्मीर के पास कोई अवशिष्ट शक्ति नहीं बची। 

एक अन्य वरिष्ठ वकील, गिरि ने तर्क देते हुए कहा कि, "भारत के साथ जम्मू-कश्मीर का एकीकरण अब पूरा हो गया है और अब जम्मू-कश्मीर के पास कोई अवशिष्ट शक्ति नहीं बची है।" 
उन्होंने कहा कि, "आदर्श रूप से अनुच्छेद 370 को 1957 में जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के विघटन के बाद हटा दिया गया होता, लेकिन अब भी यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि अनुच्छेद 370 (3) के तहत राष्ट्रपति को शक्तियां उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि प्रावधान  अनुच्छेद 370(3) अब क्रियान्वित होने के लिए उपलब्ध नहीं था क्योंकि संविधान सभा अस्तित्व में नहीं थी।"  

एडवोकेट गिरी ने कहा, "(जम्मू कश्मीर) संविधान सभा की अनुशंसा शक्ति का उद्देश्य संविधान सभा के जीवन को समाप्त करना था, जिसे राज्य का संविधान बनने के बाद भंग कर दिया गया था।"
सुनवाई अभी जारी है। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (13) / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/09/370-13.html

Sunday, 3 September 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (13) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के संबंध में संविधान पीठ की कार्यवाही के तेरहवें दिन, सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत की पीठ ने उत्तरदाताओं द्वारा उठाए गए तर्कों को सुना। तेरहवें दिन की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की दलीलों का जवाब, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, वरिष्ठ एडवोकेट हरीश साल्वे और राकेश द्विवेदी ने दिया।

आज अटॉर्नी जनरल का तर्क, राष्ट्रपति की शक्ति पर केंद्रित था, जिसे याचिकाकर्ताओं ने, बिना जम्मू कश्मीर की विधानसभा की सिफारिश के, और अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राज्य के गवर्नर/राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत होते हुए, राज्य का स्वरूप बदलने को लेकर, इसे असंवैधानिक बताया था। इस पर एजी का कहना था कि, यह स्थिति राष्ट्रपति की शक्तियों को कम नहीं कर देती है। अब अदालत में दी गई दलीलें पढ़िए। 

० असंभवता राष्ट्रपति की शक्तियों को पंगु नहीं बना सकती। 

अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी द्वारा उठाए गए तर्कों का पहला पहलू यह था कि, "कानून किसी को, वह काम करने के लिए मजबूर नहीं करता है जो, वह नहीं कर सकता।"  
इस संदर्भ में, उन्होंने कहा कि, "चूंकि संविधान सभा पहले ही भंग हो चुकी है, इसलिए राष्ट्रपति को, अब अनुच्छेद 370(3) के तहत अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए, उसकी सिफारिश लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।" 
उन्होंने जोर देकर कहा कि, "संविधान सभा की सिफारिश को स्वीकार करना अब असंभव है लेकिन, इसका (इरादा और उद्देश्य) राष्ट्रपति की शक्ति को पंगु बनाने और अनुच्छेद 370(3) के मूल भाग को निष्क्रिय करने का कारण नहीं बन सकता है।" 
अपने तर्क के लिए, एजी ने इन रे: प्रेसिडेंशियल पोल बनाम अननोन (1974) के फैसले का सहारा लिया, जिसमें दो कानूनी कहावतों का उल्लेख किया गया है, - इम्पोटेंशिया एक्सक्यूसैट लेजेम (where there is a necessary or invincible disability to perform the mandatory part of the law the impotentia excuses. कानून में असंभवता को बाहर रखा गया है) और लेक्स नॉन कॉगिट एड इम्पॉसिबिलिया (the law does not compel a man to do anything which is impossible कानून किसी को वह करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है, जो असंभव हो). किसी व्यक्ति को वह सब कुछ करने के लिए बाध्य न करें जो असंभव है।

इस परिदृश्य में, अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि, "राष्ट्रपति के पास दो विकल्प बचे थे- एक, कि वह अनुच्छेद 370(3) के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग बिना किसी परामर्श के कर सकते हैं और;  दूसरा, वह पहले के राष्ट्रपतियों द्वारा अपनाई गई मिसालों का पालन कर सकते हैं और अनुच्छेद 367 और अनुच्छेद 370(1)(डी) का सहारा ले सकते हैं।"
आगे उन्होंने जोड़ा,  "वहां एक शून्यता है, खंड (3) के परंतुक (जम्मू कश्मीर की संविधान सभा की सहमति) का अनुपालन करना असंभव है (क्योंकि जम्मू कश्मीर की संविधान सभा 1957 में ही भंग हो चुकी है) और उस शून्यता से कैसे निपटा जाए? राष्ट्रपति कह सकते थे कि, बिना किसी अन्य कार्रवाई का सहारा लिए, मैं स्वयं 370 को निष्क्रिय कर सकता हूं। लेकिन राष्ट्रपति उस रास्ते को नहीं अपनाते हैं। वह एक ऐसी प्रक्रिया द्वारा निर्देशित होना चाहते हैं, जो विधान सभा के गैर-विधायी कार्यों के समान हो। यदि असंभवता का सिद्धांत, आपके रास्ते में खड़ा है, तो आप पंगु नहीं हैं।" यानी यदि आप कोई असंभव कृत्य नहीं कर सकते, तो इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि, आप पंगु हैं। 

एजी ने जोर देकर कहा कि, "आंतरिक अशांति या बाहरी आक्रामकता से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए कोई 'गणितीय सूत्र' (यानी कोई तायशुदा फॉर्मूला नहीं है।"
उन्होंने तर्क दिया कि, "ऐसी स्थितियों में, कुछ 'व्यापक मानकों' का पालन किया जाना चाहिए जहां मौलिक मूल्यों का उल्लंघन नहीं किया जाता है।"  
इसके अलावा, उन्होंने कहा कि, "यह राष्ट्रपति के लिए खुला विकल्प है कि, वह अनुच्छेद 370 के तहत किए गए सभी अभ्यासों और उन विचारों को ध्यान में रखें, जो 'राष्ट्र के सामने बड़े हैं', खासकर जम्मू-कश्मीर के सामने, और इस तरह के विचार के अनुसार गलतियों को सुधारें।"

एजी की दलीलें खत्म होने पर सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने अपनी बात रखनी शुरू की और उन्होंने अनुच्छेद 370 को, एक राजनीतिक समझौते के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, जम्मू कश्मीर की रियासत और भारत संघ के बीच हुआ विलय पत्र (आईओए) एक राजनीतिक समझौता था और यह अनुच्छेद, उसी का परिणाम था। 

० अनुच्छेद 370 एक राजनीतिक समझौता था। 

एक अन्य पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने अपनी दलीलों में अनुच्छेद 370 को संवैधानिक ढांचे के भीतर 'कुछ राजनीतिक समझौतों को समायोजित करने वाला तत्व' बताया।  इस प्रकार, उन्होंने कहा कि, "अनुच्छेद में शब्दों को उनका स्पष्ट अर्थ दिया जाना चाहिए।" 
उन्होंने रेखांकित किया कि, "अनुच्छेद के शब्दों के अनुसार, विचार यह नहीं था कि राष्ट्रपति केवल संविधान सभा की सिफारिश को ही प्रभावी कर (मान) सकते थे, क्योंकि यदि ऐसा होता, तो उसे (राष्ट्रपति के उक्त कृत्य को) शक्ति के प्रयोग के लिए पूर्व शर्त बना दिया जाता।

"संभवतः, प्राविधान में कहा गया होगा- "यदि विधानसभा से सिफारिश प्राप्त हुई होगी, तो राष्ट्रपति को मिल सकेगी"। लेकिन, यह वह ढांचा नहीं है, जिसमें इसे तैयार किया गया था। उस तरह के प्राविधानों में से एक अनुच्छेद 249 है, - यह शुरू होता है  यह कहकर कि "यदि राज्यों की परिषद ने संकल्प द्वारा घोषणा की है, तो कानून बनाना वैध होगा "
उन्होंने इस दलील जोर दिया। अपने तर्क को जारी रखते हुए, वरिष्ठ एडवोकेट, हरीश साल्वे ने कहा कि, 'सहमति' शब्द के बजाय 'सिफारिश' शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर किया गया था।" 

अनुच्छेद 370 के प्राविधान के संदर्भ पर बहस करते हुए, हरीश साल्वे ने कहा कि, "यह  अनुच्छेद एक राजनीतिक समझौते के अलावा और कुछ नहीं था, जिसका उद्देश्य ऐसी स्थिति पैदा करना नहीं था, जो एकीकरण को रोकती हो।"  
उन्होंने तर्क दिया कि, "अनुच्छेद का उद्देश्य संविधान को विभाजित करना नहीं, बल्कि 'चरणबद्ध एकीकरण' करना था। तदनुसार, संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद (3) के संदर्भ में अनुच्छेद 370 में एक 'सुरक्षा वाल्व' डाला था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यदि अनुच्छेद 370(1) के तहत राजनीतिक समझौता अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में विफल रहता है, तो हम, अनुच्छेद 370(3) के माध्यम से.'प्लग खींच सकते हैं।"  

हरीश साल्वे ने इस विंदु को और स्पष्ट किया, "तो सीमावर्ती राज्य ने, अपनी सभी संवेदनशीलताओं के साथ, संविधान सभा को, विशेष व्यवस्था पर सहमत होने के लिए मजबूर किया, लेकिन, अपनी बुद्धिमत्ता से उन्होंने कहा कि, आपके पास प्लग खींचने की शक्ति है। इनमें से प्रत्येक में तर्क ढूंढना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि  यह एक राजनीतिक समझौता था। संविधान सभा की स्थापना क्यों की गई? यह एक समझौता था - समझाने के लिए किया गया। कोई भी (इस मामले में) बहुत अधिक तर्क की खोज नहीं कर सकता।"
इस संदर्भ में, उन्होंने तर्क दिया कि, "ऐसे प्रावधानों के लिए, संवैधानिक व्याख्या को हमें,  यथासंभव व्यापक अर्थ देना चाहिए।

० संवैधानिक प्रावधान लागू नहीं करने से व्यक्तिगत नागरिकों को कोई अधिकार नहीं मिलता। 

हरीश साल्वे ने आगे तर्क दिया कि, "विलय (रियासत के भारत संघ में) विलय की सहमति,  दस्तावेज और उनकी व्याख्या हमेशा, संप्रभु के लिए एक मसला रही है। चूंकि वर्तमान मामले में, (जम्मू कश्मीर रियासत) का विलय, अनुच्छेद 1 और 3 के अनुसार पूर्ण, अपरिवर्तनीय और अटल (Complete, irrevocable and irreversible) था, इसलिए परिग्रहण (accession) से संबंधित किसी भी मामले पर अंतिम निर्णय राष्ट्रपति का होगा।"

उन्होंने आगे कहा कि, "याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत दिल्ली (भारत सरकार का जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन कानून) के निर्णयों का वर्तमान संदर्भ में कोई महत्व नहीं है क्योंकि वे संदर्भ, अत्यधिक डेलीगेशन से संबंधित थे। लेकिन चूंकि अनुच्छेद 370 और इसके तहत राष्ट्रपति को प्रदान की गई शक्ति संविधान का ही एक हिस्सा थी, इसलिए, इस अत्यधिक डेलीगेशन का कोई सवाल ही नहीं था।"

हरीश साल्वे ने अनुच्छेद 370 के तहत शक्ति की व्याख्या करते हुए कहते हैं, "370 के तहत शक्ति अपने आप में पूरी है और यह संविधान द्वारा प्रदत्त शक्ति है। पूर्ण शक्ति, अत्यधिक डेलीगेशन (किसी के सिफारिश) की चुनौती के अधीन नहीं है क्योंकि यह संविधान द्वारा ही प्रदान की गई है। दूसरा बिंदु यह है कि, प्रयोग की गई, यह शक्ति, अपने चरित्र में विधायी है। (किसी भी) प्रावधानों को लागू करना और प्रावधानों को खत्म करना, किसी कानून के प्रावधानों को संशोधित करना विधायी कार्य है।" 
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि, "संवैधानिक प्रावधान को लागू करने या लागू न करने का अधिकार,  किसी नागरिक का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है।"  
यह कहते हुए कि, "जम्मू-कश्मीर के नागरिक सिर्फ "विलय के लिए समायोजन" कर रहे थे।" 
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून का संदर्भ दिया और कहा कि "एक नागरिक कभी भी यह दावा नहीं कर सकता कि, मेरे पास पहले के शासन में कुछ अधिकार थे। आपके पास केवल कुछ अधिकार हैं जो आपके लिए उपलब्ध हैं।"

० कानून बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं कर सकता। 

यह कहते हुए कि "उन्हें (संविधान के) मूल ढांचे के सिद्धांत का बार-बार संदर्भ आश्चर्यजनक लगा," 
साल्वे ने प्रस्तुत किया कि, "मूल ढांचा सिद्धांत (Basic structure theory) एक स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार के रूप में एक सिद्धांत नहीं था, बल्कि अनुच्छेद 368 के तहत निहित एक सीमा थी, जिस पर संवैधानिक संशोधनों का परीक्षण किया गया था।"
साल्वे ने सुझाव देते हुए कहा, "सख्ती से कहें तो, कानून बुनियादी (मूल) ढांचे का उल्लंघन नहीं कर सकते। कानून भाग III का उल्लंघन करते हैं या भाग III का उल्लंघन नहीं करते हैं।" 
उन्होंने सुझाव दिया कि, "केवल संवैधानिक संशोधनों का परीक्षण मूल ढांचा सिद्धांत के आधार पर किया जा सकता है।"

इस मौके पर, सीजेआई ने रेखांकित किया कि, "कुछ फैसलों में, अदालत ने माना था कि एक विशेष कानून, मूल ढांचे की रक्षा करता है।"
यहां, साल्वे ने प्रस्तुत किया कि, "जब नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक कानून बनाया गया था जो मूल ढांचे का एक हिस्सा बनता है, तो उसे मूल ढांचे के साथ संरेखित (align) करने के लिए कहा जा सकता है।"
आगे विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा, "आज अगर गिरफ्तारी, आपराधिक मुकदमे आदि की सुरक्षा के लिए जाँच और अन्य प्राविधान होते हैं - तो आप कह सकते हैं कि, यह सब, बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए है, लेकिन बुनियादी ढांचा, विभिन्न अधिकारों की त्रयी है। इसका मतलब यह नहीं है कि कानून का परीक्षण बुनियादी संरचना (ढांचा) पर किया गया था।"

इसके बाद वह याचिकाकर्ताओं के तर्क कि, "राष्ट्रपति शासन के तहत 'अपरिवर्तनीय' परिवर्तन नहीं किए जा सकते थे।" का जवाब देते हुए, हरीश साल्वे ने, तर्क दिया कि "एक अर्थ में सब कुछ अपरिवर्तनीय है।"  
इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, "संसद राज्यों के बजट को पारित करती है - खर्च किया गया धन अपरिवर्तनीय है। राष्ट्रपति लोगों को बर्खास्त कर सकता है, लोगों को नियुक्त कर सकता है, संस्थाएँ बना सकता है, संस्थाओं को हटा सकता है - राज्यपाल ऐसा कर सकता है, राष्ट्रपति 356 के तहत कर सकता है - ये उन लोगों के लिए अपरिवर्तनीय हैं। इसीलिए योर लॉर्डशिप ने कहा है कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग बहुत ही कम मात्रा में किया जाना चाहिए, यह कठोर (प्राविधान) है।"
यह कहते हुए अपनी दलीलें खत्म की कि, "यदि ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं कि, एक निश्चित समय के लिए शासन प्रणाली, राष्ट्रपति शासन में बदल जाती है, तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत लिए गए निर्णय के परिणाम को स्वीकार करना होगा।"

० संविधान सभा का दृष्टिकोण बाध्यकारी नहीं हो सकता। 

वरिष्ठ वकील साल्वे की दलीलों के बाद वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने अपनी दलीलें पेश की। राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि, "याचिकाकर्ताओं पर यह दिखाने का बोझ था कि, उनके द्वारा रखा गया दृष्टिकोण सही दृष्टिकोण था और, कोई अन्य दृष्टिकोण दिया नहीं जा सकता है।" 
उन्होंने कहा कि, "यदि दो विचार हैं तो उस दृष्टिकोण को अपनाया जाना चाहिए जो शक्ति के प्रयोग को कायम रखता है न कि, शक्ति के प्रयोग को पराजित करता है।" 
उन्होंने आगे तर्क दिया कि, "राष्ट्रपति की शक्ति का चरित्र, एक 'घटक शक्ति' था और सामान्य कार्यकारी शक्ति की तुलना में बहुत व्यापक था।"
उन्होंने यह भी कहा कि, "किसी निचले प्राधिकारी (authorty)  की सिफारिश जब किसी वरिष्ठ प्राधिकारी के समक्ष जाती है तो, वह कभी भी बाध्यकारी नहीं हो सकती, वह भी तब, जब वह निकाय (संस्था) एक अस्थायी निकाय हो।"
अपने तर्क को समाप्त करते हुए, द्विवेदी ने कहा कि, "निरस्तीकरण का निर्णय भावनाओं पर आधारित नहीं हो सकता है।"
सुनवाई अभी जारी है। 
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (12.2) / विजय शंकर सिंह '.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/09/370-122.html

Friday, 1 September 2023

सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (12.2) / विजय शंकर सिंह

अनुच्छेद 370 मामले की सुनवाई के बारहवें दिन की सुनवाई समाप्त करते हुए संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने को लेकर, एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने यूनियन ऑफ इंडिया के एडवोकेट से पूछा कि, "पिछले कुछ वर्षों में जारी किए गए विभिन्न संवैधानिक आदेशों ने भारतीय संविधान के प्रावधानों को जम्मू और कश्मीर में क्रमिक रूप से लागू किया है।  इसलिए, उनहत्तर वर्षों में "पर्याप्त एकीकरण" हुआ था। इस संदर्भ में, क्या अगस्त 2019 में केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदम एकीकरण हासिल करने के लिए "एक तार्किक कदम" थे?" 

जैसे ही, बारहवें दिन की सुनवाई समाप्त होने वाली थी, सीजेआई ने कहा, "एक आखिरी बात,  26 जनवरी 1950 को मौजूद, "पूर्ण स्वायत्तता" और 5 अगस्त 2019 को लाए गए "पूर्ण एकीकरण" के बीच की जो व्यापक खाई थी, इस कालखंड के बीच में, जो कुछ भी हुआ, उससे वह खाई (स्वायत्तता और एकीकरण के बीच की) काफी हद तक पाट दी गई थी। उस अर्थ में, यह कहना कि, पूर्ण स्वायत्तता से पूर्ण एकीकरण की ओर स्थानांतरण, पूरा नहीं हो पाया था, गलत है। यह स्पष्ट है कि 1950-2019 के बीच 69 वर्षों में काफी हद तक, जम्मू कश्मीर राज्य का भारत संघ में, एकीकरण पहले ही हो चुका था। और इसलिए 2019 में जो किया गया, क्या वह वास्तव में उस एकीकरण को प्राप्त करने के लिए, एक तार्किक कदम था?"

सीजेआई का सवाल, उस दावे के संदर्भ में है, जिसे सरकार यह कह कर प्रचारित करती है कि, अनुच्छेद 370 को साल 2019 में संशोधित कर के, सरकार ने जम्मू कश्मीर राज्य का भारत में पूर्ण एकीकरण किया है। निश्चित रूप से, यह एक चुनावी वादा था, भारतीय जनता पार्टी का, जिसे उसने सरकार में आने के बाद पूरा किया पर यह भी एक तथ्य है और जैसा कि, सीजेआई ने अदालत में कहा है कि, 1950 से 2019 के बीच जम्मू कश्मीर राज्य का भारत संघ से पर्याप्त एकीकरण हो चुका था। 2019 में की गई राज्य पुनर्गठन की कवायद एक अनावश्यक कवायद थी। जम्मू कश्मीर आज भी एक लोकतांत्रिक और चुनी हुई सरकार का मुंतजिर है। बारहवें दिन अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के मामले की सुनवाई करने वाली पीठ में जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत भी शामिल हैं।

० क्या अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए संविधान सभा की 'सिफारिश' एक अनिवार्य शर्त थी?

भारत संघ की दलीलों के दौरान विवाद का एक दिलचस्प मुद्दा यह भी था कि, "क्या अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक थी।" यहां यह उल्लेखनीय है कि, अनुच्छेद 370(3) के अनुसार, राष्ट्रपति, अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय घोषित कर सकते हैं, बशर्ते कि, यह "राज्य की संविधान सभा की अनुशंसा (सिफारिश) " से किया गया हो।"
यह मुद्दा, पहली बार एसजी, तुषार मेहता की दलीलों के दौरान उठा जब, उन्होंने कहा कि अगर संविधान सभा अस्तित्व में रहती, तो भी इसकी सीमित भूमिका होती, क्योंकि इसका निर्णय प्रकृति में केवल "अनुशंसाजनक" यानी सिफारिशी होता और राष्ट्रपति, यदि संविधान सभा इस पर सहमत नहीं होती तो भी, कोई भी निर्णय ले सकते थे। ।"
अब बहस के केंद्र में सिफारिश या अनुशंसा की कानूनी स्थिति क्या है, यह विंदु आ गया। सॉलिसिटर जनरल के उपरोक्त दलील पर, सीजेआई ने कहा: "यह सही नहीं हो सकता है, क्योंकि जिस तरह से अनुच्छेद बनाया गया है उसे देखें - "सिफारिश...आवश्यक होगी"।
सीजेआई का कहना था कि, जम्मू कश्मीर के बारे में किसी भी संवैधानिक आदेश या संशोधन के लिए जम्मू कश्मीर की सिफारिश जरूरी थी। 
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि, "यहां, अनिवार्य यह था कि राष्ट्रपति संविधान सभा से सिफारिश लें।  हालाँकि, ऐसी अनुशंसा बाध्यकारी नहीं थी।"  
उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा, "अन्यथा संविधान कहता, उसके (सिफारिश के) अनुसार कार्य करें। जम्मू-कश्मीर का संविधान हमेशा भारतीय संविधान के अधीन रहेगा क्योंकि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा का निर्माण ही अनुच्छेद 370 द्वारा हुआ था।"
इसी तरह का तर्क बाद में भारत के अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने भी दिया। जिन्होंने तर्क दिया कि, "जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के विघटन का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि, राष्ट्रपति के हाथ, हमेशा के लिए बंधे हुए हैं।" 

सीजेआई ने इस महत्वपूर्ण विंदु पर, सरकार के वकीलों से, स्पष्टीकरण मांगते हुए पूछा, "क्या सिफ़ारिश के लिए सकारात्मक सिफ़ारिश की आवश्यकता है या नहीं?"
एजी, आर वेंकटरमणी ने यह कहते हुए जवाब दिया कि, "सिफारिश केवल "एक सलाह" थी और अनुच्छेद 370 को लागू रखने की सिफारिश करने की शक्ति, विधानसभा के पास उपलब्ध नहीं थी।" 
एजी ने कहा, "इसे केवल 370 को निष्क्रिय करने की सिफारिश करनी है।"

इस पर सीजेआई ने, सिफारिश शब्द की कानूनी व्याख्या करते हुए कहा, "सिफारिश सिर्फ एक राय नहीं है। जब संविधान "सिफारिश" शब्द का उपयोग करता है, तो इसका मतलब एक सकारात्मक निर्णय होता है क्योंकि अनुच्छेद 370 विभिन्न वाक्यांशों का उपयोग करता है। यह परामर्श, सहमति, निर्णय और सिफारिश, शब्दों का उपयोग करता है।"
एजी ने जोर देकर कहा कि, "सिफारिश', राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है। इसलिए, यह सिफारिश है। यह सहमति नहीं है।"

सीजेआई ने तब स्पष्ट किया कि, "जब भी सिफारिश बाध्यकारी नहीं होती है, तो संविधान इसे स्पष्ट रूप से, (उचित जगह पर) निर्दिष्ट करता है।"  
उन्होंने विस्तार से बताया, "अनुच्छेद 109, वित्त विधेयक (मनी बिल) से संबंधित है। वित्त विधेयक राज्यसभा में पेश नहीं किया जाता है। इसे हमेशा लोकसभा में ही पेश किया जाता है। लोकसभा में विधेयक पारित होने के बाद, इसे सिफारिश के लिए राज्यसभा में भेजा जाता है। लेकिन, वे सिफारिशें, (लोकसभा के लिए) बाध्यकारी नहीं हैं। यह (लोकसभा) या तो उन्हें (वित्त विधेयक को) स्वीकार कर सकती है या उन्हें आंशिक रूप से स्वीकार कर सकती है, या उन्हें अस्वीकार कर सकती है। यह अनुच्छेद 109 (2) में स्पष्ट किया गया है। यह अनुच्छेद कहता है कि, राज्यसभा (में वित्त विधेयक को भेजे जाने) की सिफारिश लोकसभा को बाध्य नहीं करती है। अब अनुच्छेद 117 देखें। यह कहता है कि, एक धन विधेयक  राष्ट्रपति की सिफारिश के अलावा इसे पेश नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 117 में, एक ही शब्द 'सिफारिश' का उपयोग किया गया है, लेकिन यहां सिफारिश अनिवार्य है। आप राष्ट्रपति की सिफारिश के अलावा वित्त विधेयक को आगे नहीं बढ़ा सकते हैं।"

सीजेआई के अनुसार, संविधान में जहां सिफारिश बाध्यकारी प्रकृति की है, वहां कोई अलग से निर्देश नहीं है। जहां वह बाध्यकारी प्रकृति की नहीं होनी चाहिए, वहां स्पष्ट इसका उल्लेख कर दिया गया है। इसे एक उदाहरण के रूप में उपयोग करते हुए, सीजेआई ने कहा कि,  "अनुच्छेद 370 के तहत प्रदान की जाने वाली 'सिफारिश,' निरस्तीकरण से पहले की एक शर्त थी और समय के संदर्भ में भी एक शर्त थी, जिसका अर्थ है कि, निरस्तीकरण से पहले सिफारिश की जानी चाहिए थी।"
अटॉर्नी जनरल, अपनी बात पर अड़े रहे और यह तर्क दिया कि, "(यहां) अभी भी केवल एक सिफारिश की आवश्यकता थी।" 
उन्होंने आगे इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि, "सिफारिश की आवश्यकता, सिफ़ारिश की भूमिका में कोई और सामग्री नहीं जोड़ती है। क्या जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा जैसी संस्था, अनुच्छेद 370 पर अंतिम निर्णय ले सकती है? यह भारत की संसद का एक घटक निकाय नहीं है। इसमें सभी गुण और शक्तियाँ नहीं हैं।"
एसजी तुषार मेहता ने, अटॉर्नी जनरल की दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा, "भारत के राष्ट्रपति का, भारत के संविधान से बाहर किसी संस्था से बंधा होना, शायद हमारे संविधान की सही व्याख्या नहीं हो सकती है। जम्मू-कश्मीर का संविधान हमारे संविधान से परे और बाहर है।"

हालाँकि, पीठ इस तर्क को स्वीकार करने में विफल रही कि, "जम्मू-कश्मीर संविधान सभा एक "बाहरी निकाय" थी।" न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा कि "जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा में अनुच्छेद 370 का उल्लेख स्वयं मिलता है।" 
सीजेआई ने यह भी बताया कि केंद्र ने "संविधान सभा" का अर्थ "विधान सभा" बदलने के लिए अनुच्छेद 367 का इस्तेमाल किया था।" 
पीठ ने तब पूछा, "तो क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि, केंद्र स्वयं 370 को निरस्त करने के लिए संविधान सभा की सिफारिश की आवश्यकता के प्रति सचेत था।"

इस मुद्दे पर चर्चा जारी रही और इसी बीच, सीजेआई ने पूछा,  "यदि अनुच्छेद 370(3) का प्रावधान लागू नहीं हो सकता है, तो क्या इसका मतलब यह है कि, अनुच्छेद 370 के अंतर्गत निहित मूल शक्ति समाप्त हो गई है या खो गई है? यदि वह शक्ति समाप्त नहीं हुई है, तो क्या यह एकतरफा शक्ति है जिसका प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा किया जा सकता है? अनुच्छेद 367 था, इसका पालन किया गया, क्योंकि संविधान सभा का अभाव था और कोई विधान सभा नहीं थी, लेकिन इस प्रक्रिया में, एक कमज़ोरी है - यह अनुच्छेद 370(3) द्वारा निर्धारित भूमिका है। आप कहते हैं कि, भूमिका केवल अनुशंसात्मक (सिफारिशी) है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि, (अनुशंसा / सिफारिश के प्राविधान को) ओवरराइड किया जा सकता है।"

इस सवाल का जवाब एसजी ने दूसरे सवाल के जरिए दिया। एसजी तुषार मेहता ने कहा, "मेरे पास एक प्रश्न है जिस पर आप छुट्टी के दिन विचार कर सकते हैं - जब संविधान सभा को भंग किया जा रहा था, मान लीजिए कि सदस्य कहेंगे कि अब जम्मू-कश्मीर का संविधान एक राजतंत्र की तरह है और अब अनुच्छेद 370 को हटाया जा सकता है - क्या राष्ट्रपति को इस पर कार्रवाई करनी होगी ? इसका कोई साधारण कारण नहीं हो सकता है कि, संविधान सभा की बहसों में, यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था।"

० क्या संसद किसी मौजूदा राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदल सकती है?

बहस के दौरान एक और बहस यह उठी कि, क्या संसद के पास मौजूदा भारतीय राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने की शक्ति है।  संदर्भ के लिए, अनुच्छेद 3(1) में प्रावधान है कि, संसद किसी राज्य से एक क्षेत्र को अलग करके या दो या दो से अधिक राज्यों को एकजुट करके या किसी राज्य के किसी हिस्से को किसी क्षेत्र को एकजुट करके एक नया राज्य बना सकती है।  बाद में एक संशोधन द्वारा 'राज्य' शब्द में 'केंद्र शासित प्रदेश' भी शामिल करने की घोषणा की गई।  इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूछा कि, "क्या अनुच्छेद 3(1) में ऐसी स्थिति पर विचार किया गया है जहां किसी राज्य के पूरे क्षेत्र को केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया जा सकता है?"
इस पर एसजी ने स्पष्ट किया कि, "राज्य से दो केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए हैं, अर्थात्, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख और (संविधान में) ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस पर रोक लगाता हो।"

जस्टिस कौल ने पूछा, "मान लीजिए कि आपने लद्दाख को अलग नहीं किया है? तो शक्ति (भारत संघ की) पूरे राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने की होगी। आप एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने पर, कैसे विचार कर रहे हैं? और यदि ऐसा नहीं किया जा सकता है तो, क्या आप एक केंद्रशासित प्रदेश बनाकर ऐसा कर सकते हैं?  और क्या अन्य (राज्यों) को भी यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) बना रहे हैं?”
एसजी तुषार मेहता ने कहा कि, "उनके पढ़ने के अनुसार ऐसी स्थिति में 'पृथक्करण' आवश्यक था।  इसका मतलब यह है कि पूरे राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में परिवर्तित नहीं किया जा सकता था, लेकिन एक राज्य को दो या दो से अधिक केंद्रशासित प्रदेशों में अलग करने की अनुमति थी।"
तर्क का परीक्षण करने के लिए, न्यायमूर्ति कौल ने पूछा, "आइए इसे थोड़ा जटिल बनाएं। मान लीजिए कि आप असम से एक केंद्रशासित प्रदेश बनाते हैं या आप असम को एक केंद्रशासित प्रदेश में बदल देते हैं। फिर?"
इस पर एसजी ने जवाब दिया, "यह एक चरम उदाहरण है लेकिन परीक्षण के उद्देश्य से, पृथक्करण आवश्यक होगा। एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश घोषित नहीं किया जा सकता है। लेकिन यहां, यह किसी के लिए भी मामला नहीं है कि, हमने इससे बाहर निकलने के लिए लद्दाख को अलग कर दिया। हमारे पास अन्य कारण थे।"

बहस के इस विंदु को जारी रखते हुए, सीजेआई ने कहा कि, "केंद्रशासित प्रदेशों के निर्माण में, दो प्रकार के उदाहरण है, पहला प्रकार, चंडीगढ़ जैसा केंद्रशासित प्रदेश, जिसे पंजाब से अलग कर के बनाया गया और वह एक केंद्रशासित प्रदेश बना रहा।  दूसरा प्रकार "एक प्रगति" था, जहां कुछ क्षेत्र राज्य बनने की प्रगति में केंद्रशासित प्रदेश बन गए।  इनमें से उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा इसके उदाहरण थे।" 
उन्होंने कहा, "वे केंद्रशासित प्रदेश बन गए थे लेकिन उन्हें राज्य बनाने के लिए एक स्थिर प्रशासन बनाने की प्रक्रिया चल रही थी। आप उन्हें तुरंत राज्य नहीं बना सकते।"  
इस प्रकार, उन्होंने पूछा कि क्या केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को फिर से एक राज्य में बदलने की योजना बना रही है और यदि हां, तो वह जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए समय-सीमा या रोडमैप कब प्रदान करेगी?"  
भारत सरकार ने, तब यह पुष्टि की कि, "वह जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करेगी।"

इसके बाद एसजी मेहता ने अपनी दलीलें जारी रखते हुए कहा कि, "यदि आप समग्र रूप से अनुच्छेद 3 और 4 को देखते हैं, और मैं इसे अकादमिक रूप से कह रहा हूं - अगर हम पुनर्गठन की एक सामान्य योजना के रूप में पढ़ते हैं तो, इसमें कुछ भी नहीं है, सिवाय इसके कि, एक अच्छे कारण के लिए, एक राज्य को, यूटी (केंद्र शासित प्रदेश) में परिवर्तित किया जा सकता है।"
उन्होंने राजा रामपाल के फैसले का हवाला देते हुए कहा, "भारत विनाशकारी इकाइयों वाला एक अविनाशी संघ है।"  
उन्होंने आगे कहा, "यह एक ऐसा प्रावधान है जहां सख्त अनुपालन पर जोर नहीं दिया जाता है, बशर्ते कि व्यापक अनुपालन हो, यानी पूरा देश यह मानते हुए कि यह पूरे देश को प्रभावित करता है। यह स्थिति सिर्फ, राज्यों या पड़ोसी राज्यों को प्रभावित नहीं करती है, यह प्रभावित करती है पूरे राष्ट्र को।"

उन्होंने अपने पहले के तर्कों को दोहराया कि जम्मू-कश्मीर में अभी भी विधानसभा क्षेत्र, चुनाव आयोग, विधान सभा, जनसंख्या अनुपात आदि सहित एक राज्य की सभी विशेषताएं मौजूद हैं। उन्होंने आगे कहा, "वे कहते हैं कि संसद में प्रतिनिधित्व कम हो गया है। नहीं, यह सही नहीं है। पहले, केवल स्थायी निवासी ही धारा, 16 के तहत चुनाव लड़ सकते थे। अब, किसी भी अन्य की तरह निर्वाचित होने के योग्य होने के लिए, आपको भारत  का नागरिक होना चाहिए, केवल, स्थायी निवासी नहीं।"
अभी सुनवाई जारी है।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

'सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 के संबंध में सुनवाई (12.1) / विजय शंकर सिंह '
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