Thursday, 8 June 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा - यादों की बारात का अंश (5) एम.ए.ओ कॉलेज, अलीगढ़ मे दाखिला और फिर वहां से बर्खास्तगी / विजय शंकर सिंह

जोश मलीहाबादी की प्रारंभिक शिक्षा, पहले उनके घर पर, फिर, सीतापुर के एक अंग्रेजी स्कूल में, फिर लखनऊ के एक अंग्रेजी स्कूल में, और वहां से फिर उनका नाम लिखवा दिया गया, अलीगढ़ के एंग्लो मुस्लिम एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज में। पर उनकी शिक्षा यहां भी पूरी नहीं हुई और कुछ ऐसा हो गया कि, उन्हें अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कॉलेज से उन्हें निकाल दिया गया। मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना सर सैयद अहमद खान द्वारा 1877 में की गई थी, जो बाद में 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के रूप में विकसित हो गया। सर सैयद अहमद खान 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के विफल होने के परिणाम स्वरूप हिन्दुस्तानियों विशेष रूप से मुसलमानों के शैक्षिक सशक्तिकरण के प्रति चिन्तित रहते थे। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला था कि केवल आधुनिक अंग्रेजी एवं विज्ञान की शिक्षा के द्वारा की मुसलमान प्रगति पथ पर आगे बढ़ सकते हैं। मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज) की स्थापना से पूर्व सर सैयद ने इग्लैण्ड भ्रमण किया तथा वहाँ कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्ययों के संचालन को करीब से देखा। उन्होंने भारत में भी मुसलमानों को शिक्षित करने के लिए कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड के तर्ज पर एक विश्वविद्यालय का सपना देखा। उसी सपने को साकार करने के लिए सर सैयद ने 8 जनवरी, 1877 में एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना की।

सर सैयद ने एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थपना मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा मिले, इस उद्देश्य के लिए अवश्य की थी परन्तु उन्होंने इसके द्वार प्रत्येक धर्म और जाति के लोगों के लिए भी खुले रखे थे। 03 फरवरी 1884 को लाहौर में दिए गए एक भाषण में सर सैयद ने कहा ‘‘मुझे अफसोस होगा यदि कोई यह समझता है कि मैंने एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना केवल मुसलमानों के लिए की है, जो कि मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच भेदभाव होगा। इस शैक्षिक संस्थान की स्थापना का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों को उनकी दयनीय दशा से निकालना है और मुझे विश्वास है कि आप सब सहमत होंगे कि मुसलमानों की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। उनकी धार्मिक अन्धता ने उन्हें विज्ञान की शिक्षा से दूर रखा और वे सरकार द्वारा स्थापित स्कूलों और कॉलेजों का लाभ उठाने से वंचित रहे और इसलिए यह आवश्यक हो गया कि उनके लिए शिक्षा के विशेष प्रबन्ध किए जाए। उन्होंने कहा कि कॉलेज में हिन्दू और मुसलमानों दोनों को बराबर की तथा बिना भेदभाव की शिक्षा प्रदान की जाए। दोनों में कोई भी भेदभाव नहीं होगा।’’ सर सैयद का उक्त भाषण एम॰ए॰ओ॰ काॅलेज के पूरे दर्शन को उजागर करता है और आज भी अमुवि के दरवाजें प्रत्येक धर्म जाति और क्षेत्र के छात्र-छात्राओं के लिए खुले हैं।
 
लेकिन, एम.ए.ओ. कॉलेज अलीगढ़ और उसके संस्थापक सर सैयद अहमद खान के बारे में जोश साहब की राय बहुत दिलचस्प और बेबाक है। यह रोचक विवरण उन्हीं के शब्दों में पढ़िए।

"एम.ए.ओ. कॉलेज, यानी मुहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज यह मुसलमानों को गैर इस्लामी खिताब देने वाला गुलामान अंग्रेजी नाम उस कॉलेज की बानी उन सैयद अहमद खाँ (जिनके भेजे में सर' का हिन्दुस्तान दुश्मन खिताब अपना आशियाँ बना चुका था) ने अपनी जहनियत के उसे तोशाए-ज़बू से तराशा था जिससे हुल्ये वतन के पहाड़ काटे जाते हैं और इशरतादा-परवेज की तरफ जूए-शीर (दूध की नदी) लाई जाती है। दरअस्ल अलीगढ़ तहरीक उठाई ही गई थी। इस गरज से कि मुसलमानों को 1857 की जंगे आज़ादी से बेताल्लुक करक यह साबित कर दिया जाए कि मुसलमान का दिल मुख्ये बतनी की सी जलील चीज से कतई आलूदा नहीं है। मुसलमान को पेट पालने की खातिर सिर्फ इस कदर तालीम दी जाए कि वह बाबू या डेप्यूटी कलक्टर बनकर बड़ा बाबू बन सके. अपनी जबान भूलकर अंग्रेजी में इतना डूब जाए कि अंग्रेजी ही में सोचे और अंग्रेजी ही में या देखे यह पश्चिमी रंग अख्तियार करके अपनी जवान, अदब रवायत (परम्परा) और सांस्कृतिक विरासत को जलील और यहाँ तक कि अपने बाप-दादा को अहमक समझने लगे और इसका नतीजा यह कि ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें जम गई। इसमें शक नहीं कि इससे थोड़ा-सा लाभ पर हानि ज्यादा हुई।" 

जोश स्वभाव से अक्खड़ और जिद्दी लगते है। अलीगढ़ में भी उनका पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगता था। वहां भी उनके नए और हममिजाज़ दोस्त, जो रामपुर के थे, मिल गए जिनके साथ, खूब गुजरेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो, जैसे सखाभाव से खूब निभी। जोश का मानसिक रुझान उस समय देश मे चल रहे आज़ादी के आंदोलन की तरफ था। वे बाद में आज़ादी के आंदोलन से जुड़े भी। पर उनका यह जुड़ाव, बहुत सक्रिय भी नहीं था, पर आजादी आंदोलन के शीर्षस्थ नेताओं, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद, सरोजनी नायडू आदि से उनकी निकटता रही। फिलहाल तो यह किस्सा पढ़े, जो उनके अलीगढ़ कॉलेज में उनके दाखिले और फिर वहां से रुखसती का है।
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एक बार जब हम पाँचों लड़के यानी अब्बास अली, मुहसनउल्लाह, अब्दुल जलील और में सालाना इम्तहान में पास हो गए तो हम लोगों में यह मिस्कीट हुई कि पास होने की ख़ुशी में आगर जाकर दिवाली देखें।

लेकिन इस अय्याशी के वास्ते रुपया कहाँ से आए? और छुट्टी कैसे मिले? यह बड़ा टेढा सवाल था। अब्यास अली ने मशविरा दिया कि हम सब अपने-अपने बापों को खत लिखकर पास हो जाने की खुशखबरी सुनाएँ और नये कोर्स की किताबों की गलत सलत और लम्बी-चौड़ी फेहरिस्त भेजकर पाँच-पाँच सौ  रुपये मंगवाएं। यह तजवीज पंचों ने बहुत पसंद की। 

मुझे खत लिखे जब छह-सात रोज हो गए तो एक दिन देखा कि दारोगा उम्मीदअली चले आ रहे हैं। उन्हें देखते ही मेरा माथा ठनका हो न हो दाल में कुछ काला जरूर है। मैंने सलाम किया, सबकी ख़ैरियत पूछी और उनके आने का सबब दरियाफ़्त किया। उन्होंने कहा "खाँ साहब (जोश के पिता) मनीऑर्डर कर रहे थे, मगर बड़े भैया ने कहा कि रकम किसी के हाथ सीधा हेड मास्टर के पास भेज दिया जाए। मैं सन्न होकर रह गया, लेकिन चेहरे से परेशानी जाहिर नहीं होने दी और मुहसनउल्लाह के पास जाकर जो इस वक्त जलील के कमरे में गए हुए थे, सारा माजरा बयान कर दिया। मुहसन थोड़ी देर गौर करने के बाद आईना देखने लगे। मैंने कहा "माशा अल्लाह में मुसीबत में घिरा हुआ हूँ और तुम आईना देख रहे हो।" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "तुम्हारी मुश्किल हल करने के लिए ही आईना देख रहा है।" मैने कहा, "यह क्या बकवास कर रहे हो?" उन्होंने कहा, "तुम तो चुपद हो । मेरी बात समझ ही नहीं रहे है। मैं आइने में यह देख रहा हूँ कि में अंग्रेज़ों की तरह गोरा चिट्टा हूँ और तुम्हारी खुशकिस्मती से मेरी आँखें भी अंग्रेजों की तरह करंजी है।" उन्होंने कहा, “तुम भी कितनी मोटी अक्ल के आदमी हो जाओ कमरे से मेरा काला सूट, मेरा बूट, टाई और हैट ले आओ; मगर इस तरह कि कोई देख न पाए। मैन पूछा- क्यों?" उन्होंने होंठ पर अंगुली रखकर कहा, "खामोश, वक्त जाया न करो। जो चीजें मैने कही हैं जल्दी से ला दो। में उनका सब सामान ले आया। उन्होंने जल्दी जल्दी सूट पहना और सर पर हैट लगाकर कहा, आओ मेरे साथ में सिटपिटा सा गया और उनके साथ हो लिया। यह सीधे हेड मास्टर के कमरे के बरामदे में दाखिल हो गए और हेड मास्टर के चपरासी से कहा, "हम इस वक़्त एक मज़ाक करने आए हैं। अभी हैड मास्टर के आने में आध घंटा बाकी है। तुम मुझको इजाजत दो कि मैं हेड मास्टर की कुर्सी पर बैठ जाऊ और जब शब्बीर एक आदमी को अपने साथ लेकर यहाँ आए तो उसे दरवाजे पर रोककर मेरे पास आजो फिर कमरे से बाहर निकलकर उस जादमी से कहो, चलिए साहब बहादुर के पास"। मुहसन ने चपरासी के हाथ पर पांच रुपये रख दिए और वह हेड मास्टर की कुर्सी पर जा बैठे। मैं दौड़ता हुआ मुमताज़ हाउस गया और दारोगा साहब को लेकर आ गया। चपरासी ने हिदायत के मुताबिक अन्दर जाकर सूचना दी और बाहर निकलकर दारोगा साहब से कहा, "चलो साहब बहादुर के पास। "

दारोगा साहब ने हैड मास्टर को सलाम किया और जेब से किताबों की फेहरिस्त और पाँच सौ के नोट निकालकर है, मास्टर की मेज पर रख दिए और पूछा, "हुजूर! इस रकम में कोई कमी बेशी तो नहीं होगी?" हेड मास्टर ने कहा, "वेल, यह क्रम एकदम बराबर है। अच्छा, खान साहब से हमारा सलाम बोलना -अब आप जाइए।"

दारोगा उम्मीद अली सलाम करके मेरे साथ बाहर निकल आए।

अलीगढ़ में बड़ी धूमधाम से हर साल नुमाइश हुआ करती थी। एक रात को जब हम पेशावरी पराठे, कबाब और खोरजे की चटनी खाकर निकले तो हमारी चंडाल चौकड़ी एक चाकू छुरी बेचनेवाले की दुकान के सामने जा खड़ी हुई। नुमाइश की तेज रोशनी में छुट्टियाँ और चाकू ऐसे जगमग हो रहे थे कि मेरा जी चाहा, मैं उन्हें बढ़कर सीने से लगा लूँ। मैंने पठान दुकानदार से पूछा तो उसने कहा, "एक रुपया चार आना मुहसन ने कहा, नहीं, दस आना पठान बोला, "नाई, एक रुपया चार आना। खुशी चाहे टेक (Take), खुशी चाहे तो न टेक।"

इन आवाजों को सुनकर कॉलेज के दूसरे लड़के भी उसी तरफ आ गए और थट के थट लग गए दुकान के सामने। मुहसन ने कहा, "दस आना, दस आना" पठान ने फिर वही जवाब दिया, "एक रुपया चार आना। खुशी चाहे टेक, खुशी चाहे न टेक।" यह सुनकर मुहसन चिढ़ गए और तमाम लड़कों से इशारा करके कहा, "गाज़ियो, बढ़ो, टूट पड़ो और लूट लो माले गनीमत को।" यह दावते आम सुनकर टूट पड़े लड़के छुरियों-चाकुओं पर पठान झपटा। लड़कों ने उसे दबोच लिया और लुटने लगी दुकान धड़ाधड़ पठान ने पुलिस पुलिस पुलिस, चिल्लाना शुरू कर दिया। पुलिसवाले झपट पड़े। हमने छुरियाँ तान लीं। वे ठिठक गए। इतने में एक शामत का मारा अंग्रेज पुलिस अफसर मोटरसाइकिल पर बैठा इधर आ गया। जब उसने मोटर साइकिल से एक पैर नीचे उतारकर हमें डाटना शुरू किया तो टूट पड़े हम सब उस पर और इतना पीटा कि वह बेहोश होकर गिर पड़ा। हम सब के सब माले गनीमत लिए और खुशी चाहे टेक, खुशी चाहे न टेक' के नारे लगाते यहाँ से भागकर कॉलेज में आ गए।

एक रोज़ मेरे एक लखनवी दोस्त और मेरे दोस्त प्रिंस मिज़ों आलमगीर क़दर का भाई जहाँगीर क़दर हमारे पास आया फरियादी बनकर कहने लगा, “शब्बीर साहब, एक फर्स्ट ईयर फूल लड़का फ़ज़ले इलाही है। वह साला अपने हुस्न पर इस कदर मगरूर है कि सीधे मुँह बात ही नहीं करता। पुट्ठे पर हाथ ही नहीं रखने देता। तुम्हारी पार्टी माशाअल्लाह बड़ी तगड़ी है। उसे नीचा दिखाओ तो मैं तुम्हारा गुलाम हो जाऊँ।' 

हमारी पार्टी लंगर लंगोटे कसकर जहाँगीर क़दर की मदद के वास्ते आमादा हो गई। इतवार के दिन जहाँगीर क़दर को दूल्हा बनाकर और हार-फूल, दुपट्टा, नकली दादी और ढोलक लेकर हम दस-पन्द्रह लड़के बरातियों की तरह कच्ची पार्क पहुंचकर फ़ज़ल इलाही के कमरे में 'मुबारकबाद, मुबारकबाद मुबारकबाद' के नारों के साथ दरांना घुस पड़े। फज़ले इलाही ने नारा लगाया, जिसके मुतअल्लिक सारी दुनिया एक तरफ, 'फज़ले इलाही एक तरफ' का गलाला हर तरफ बुलन्द था, तेवरियों पर बल डालकर कहा, "मैंने तो आप लोगों को नहीं बुलाया था?" जलील ने कहा, दुल्हनें भी किसी को बुलाया करती हैं, जानिया? हम जहाँगीर क़दर दूल्हा से तुम्हारा निकाह पढ़ाने आए हैं।"

उस लड़के ने कोशिश की भाग निकलने की हमारे साथियों ने उसे पकड़ लिया, दुपट्टा उसके सर पर डाल दिया। जहाँगीर कदर को हार-फूल पहनाए, जलील ने जेब से नकली दादी निकालकर मुँह पर लगा ली और काजी बनकर उस लौंडे का जहाँगीर क़दर से निकाह पढ़ा दिया। साथियों ने ढोलक बजा बजाकर ऊँचे स्वरों में शादियाने गाने शुरू कर दिए। बरामदे में मेला सा लग गया और हर तरफ कहेकहे गूंजने लगे। 

इतने में किसी ने यह देखकर कि, हैड मास्टर राउंड लगाता चला आ रहा है, हमें आगाह कर दिया। हम सब डरे हुए हिरनों की मानिंद भाग खड़े हुए और दूल्हा मियाँ अभी उठ ही रहे थे कि हैड मास्टर सर पर आ पहुंचा। फजले इलाही ने उससे फरियाद की। उसने जहांगीर क़दर से पूछा, "तुम कौन हो?" जहांगीर क़दर की जबान से घबराहट में निकल गया, Sir, I am bridegroom (जनाब, मैं दूल्हा है।) हेड मास्टर ने 'वेल मिस्टर ब्राइटग्रूम, बेल मिस्टर ब्राइटग्रूम' कह कहकर उसे बैतों पर घर लिया। 

बराती तो साफ बचकर निकल गए और बेचारे ब्राइटग्रूम साहब पिट गए। इस वाकये के एक हफ्ते के अंदर हम तीनों लड़कों यानी मुहसनुल्लाह खां, अब्दुल जलील खाँ और आगे चलकर हज़रत जोश मलीहाबादी बनने वाले शब्बीर हसन खा को भी स्कूल से निकाल दिया गया, 
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
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(क्रमशः) 

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh

'जोश मलीहाबादी की आत्मकथा - यादों की बारात का अंश (4) जोश का पहला मुशायरा और मुशायरे का इतिहास. 

http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/06/4.html

Wednesday, 7 June 2023

रेलवे को आधुनिकीकरण अभियान जारी रखते हुए, यात्री सुरक्षा से गाफिल नहीं रहना चाहिए / विजय शंकर सिंह

2 जून को ओडिशा के बालासोर में एक भीषण रेल दुर्घटना हुई, जिसमें तीन ट्रेनों की, जबरदस्त टक्कर हुई। रेलवे के आधुनिकीकरण और विस्तार कार्यक्रम के संदर्भ में यह हादसा, एक बड़ी चुनौती की तरह, सामने आया है। यह रेल हादसा, पिछले दो दशकों में हुई, देश की सबसे भीषण रेल दुर्घटना है, जिसमे, शालीमार-चेन्नई कोरोमंडल एक्सप्रेस, यशवंतपुर-हावड़ा एक्सप्रेस और एक मालगाड़ी की टक्कर में कम से कम 275 लोग मारे गए और 900 से अधिक घायल हो गए। 

लेकिन इसी तरह की एक और दुर्घटना भी, इस साल फरवरी में रेलवे के मैसूर मंडल के बिरूर-चिकजाजुर खंड में होसदुर्गा रोड स्टेशन पर दो ट्रेनों के बीच, होते होते बच गई थी क्योंकि, एक सतर्क लोको पायलट ने उक्त हादसे को भांप लिया था, और ट्रेन रुक गई तथा हादसा टल गया था। हादसा टलने का एक और कारण,  ट्रेन की अपेक्षाकृत धीमी गति,थी, जिससे ट्रेन, हादसे के ठीक पहले रोकी जा सकी थी। उक्त घटना में भी, ट्रेन अपने गंतव्य ट्रैक से भटक गई थी, जिसका कारण,  दोषपूर्ण सिग्नलिंग प्रणाली और खतरनाक तकनीकी दोष, बताया गया था। उस घटना के बाद, रेलवे अधिकारियों ने, एक पत्र में, "तत्काल सुधारात्मक कार्रवाइयां करनें,  सिस्टम की खामियों को दूर करने और कर्मचारियों को शॉर्टकट न अपनाने के लिए संवेदनशील बनाने" की मांग सहित रेलवे बोर्ड को, एक पत्र भेजा था। यह पत्र आधिकारिक रिकॉर्ड पर है। 

यहीं यह सवाल उठता है कि, क्या रेलवे बोर्ड या मंत्रालय ने इस पत्र पर कोई कार्यवाही की ? इस पत्र से यह स्पष्ट होता है कि, सिगनलिंग प्रणाली में खामियां हैं, और उसे शॉर्टकट जिसे जुगाड तकनीक कह सकते हैं, अपना कर निभाया जा रहा है। क्या इस पत्र पर, रेलवे बोर्ड या रेल मंत्रालय की तरफ से कोई कार्यवाही की गई ? यह सवाल जनता को सरकार से पूछना चाहिए। बालासोर दुर्घटना के बारे में फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि, यह हादसा, यांत्रिक विफलताओं और मानवीय त्रुटियों के उसी विनाशकारी क्रम के अनुसरण के रूप में है, जो कुछ महीने पहले, मैसूर मंडल में, इसी तरह की दुर्घटना होते होते रह गई थी।

कोविड-19 महामारी से एक साल पहले तक, एक दिन में, रेलवे से 2 करोड़ 30 लाख लोग यात्रा करते थे। लेकिन अब यह संख्या घट कर,  हर दिन लगभग डेढ़ करोड़ रह गई है। रेलवे एक महत्वपूर्ण विभाग है और मोदी सरकार के पहले रेलवे बजट अलग से पेश किया जाता था। बजट प्रस्तुत करने के क्रम में पहले रेलवे बजट लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता था, और दूसरे दिन आम बजट लोकसभा में लाया जाता था। अब रेलवे बजट की परंपरा खत्म कर के उसे आम बजट में ही शामिल कर दिया गया है। रेल बजट में ही, आमान परिवर्तन, रेलवे का विद्युतीकरण, नई रेलवे लाइनों का निर्माण, नई रेलगाड़ियां, यात्री सुविधाएं, रेल किराया, नए स्टॉपेज आदि का उल्लेख होता था। इससे रेलवे के बारे में सांसद अपनी बात रखते थे और अच्छा विमर्श होता था। अब तो आम बजट भी बिना चर्चा के, एक बार, जब अरुण जेटली वित्त मंत्री थे तो सदन में पारित कराया जा चुका है, तो रेलवे बजट की क्या बात की जाय। रेल बजट की परंपरा खत्म हो जाने से रेलवे, सार्वजनिक विमर्श से धीरे धीरे बाहर हो गया। 

भारत सरकार, रेलवे के, बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना की बात करती है, और इसी क्रम में, वर्ष 2023-24 में पूंजीगत व्यय के लिए 2.4 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक मे, ट्रेन दुर्घटनाओं में कमी आई है, लेकिन, 2020 के बाद ट्रेनों और यात्रियों की संख्या में भी तो भारी कमी आई है। पटरियों के खराब रखरखाव, रोलिंग स्टॉक और  कर्मचारियों की समस्या से भी रेलवे जूझ रही है।  रेलवे अब चकाचौंध करने वाली ट्रेनों की घोषणाओं के साथ जनता को भरमा रही है, पर यह भ्रम लंबे समय  तक नहीं रह सकता है। सरकार की घोषणाओं पर यकीन करें तो,  टक्कर रोधी प्रणालियों सहित सुरक्षा उपायों का विस्तार हो रहा है, लेकिन, यहीं यह भी सत्य है कि, स्पष्ट रूप से, इस सुधार की गति, पर्याप्त नहीं है। 

यहीं यह सवाल उठता है कि, क्या आधुनिकीकरण का मतलब, तेज गति से चलने वाली ट्रेनें, आरामदायक कोच, और कम स्टॉपेज वाली ट्रेन, विश्वस्तरीय सुविधा संपन्न रेलवे स्टेशन ही नहीं होते हैं, रेल के डिब्बों में ठूंस ठूंस कर भरे गए इंसान और उनकी जान भी होती है। एक तरफ वंदे भारत जैसी ट्रेन है तो दूसरी तरफ, जनरल डब्बा है। जिसमें यात्री, एक हठयोगी की तरह, एक ही मुद्रा में, न जाने कब तक बैठा रहता है। यह मजबूरी का हठयोग है और जिसने जनरल डिब्बे में लंबी दूरी का सफर किया है, वही इस हठयोग की महत्ता को समझ सकता है। क्या इन डिब्बों में सफर करने वाले यात्री, देश के नागरिक नहीं हैं या वे वोट नहीं देते? क्या उन्हें रेलवे के चकाचौंध भरे विज्ञापन के अनुसार, आराम और सुकून के साथ, सुरक्षित और सुविधाजनक रूप से, यात्रा करने का अधिकार नहीं है? 

2021 में, प्रधान मंत्री ने घोषणा की थी कि 'वंदे भारत लेबल वाली 75 नई सेमी-हाई स्पीड ट्रेनों को 75 सप्ताह में शुरू किया जाएगा, और इस श्रेणी में, कई ट्रेने  शुरू भी की जा चुकी हैं।' हर वंदे भारत ट्रेन को प्रधानमंत्री खुद ही हरी झंडी दिखा रहे है। उन्होंने यह भी कहा, "यात्री सुविधाओं पर भी ध्यान दिया गया है।" लेकिन किन यात्रियों की सुख सुविधा पर सरकार की नज़रे इनायत है, सरकार को इसका भी ऑडिट करना चाहिए। लेकिन, इन सारी घोषणाओं के बाद भी यह कहा जा सकता है कि, यात्रियों के जान की सुरक्षा से बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता। बालासोर रेल हादसे में यदि किसी साजिश या  तोड़फोड़ के संकेत मिल रहे हैं तो उसकी जांच निश्चित ही की जानी चाहिए। रेल दुर्घटना के साजिश की जांच CBI कर रही है। साजिश एक आपराधिक कृत्य है और उसकी जांच सीबीआई करे, कोई आपत्ति नहीं है। पर पिछले नौ साल से, निजीकरण और आधुनिकीकरण के नाम पर, रेलवे के सिस्टम को खोखला करने की जो साजिश, सरकार खुद कर रही है, उसकी जांच कौन करेगा? 

सीबीआई आपराधिक कृत्य यानी तोड़फोड़, साजिश आदि की जांच कर सकती है, पर क्या सीबीआई, निम्न सवालों की भी पड़ताल करने में सक्षम है या वह इन सवालों की भी तह में जायेगी ? 

उदाहरण के लिए,
० क्या सीबीआई यह पता करेगी कि ट्रैक की मरम्मत और नए ट्रैक बिछाने का बजट जो 2018-19 में 9607 करोड़ था वो 2019-20 में घटकर 7417 करोड़ क्यों हुआ? 
० क्या सीबीआई, यह तथ्य ढूंढेगी कि रेल चिंतन शिविर में जब हर ज़ोन को सुरक्षा पर बोलना था, वहां सिर्फ़ एक ही ज़ोन को क्यों बोलने दिया गया और इस शिविर में सारा ध्यान 'वंदे भारत' पर केंद्रित क्यों था? 
० क्या सीबीआई, रेलवे की ऑडिट से जुड़ी सीएजी रिपोर्ट में अंकित, यह तथ्य,  कि 2017-21 के बीच 10 में से करीब 7 हादसे ट्रेन के पटरी से उतरने की वजह से हुए, या फिर ईस्ट कोस्ट रेलवे में सुरक्षा के लिए ट्रैक मेंटिनेंस का परीक्षण क्यों नहीं हुआ, पर अपनी जांच करेगी ?
० क्या सीबीआई यह पता लगाने का प्रयास करेगी कि राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष की फंडिंग, सरकार ने घटा कर, 79% कम क्यों कर दी है। 
० क्या सीबीआई, यह पड़ताल करेगी कि राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष को सालाना 20,000 करोड़ का बजट क्यों आवंटित नहीं हुआ, जबकि, इतनी धनराशि का बजट आवंटन का वादा किया गया था।
० क्या सीबीआई, इन कारणों की तह में जाने की सोच भी पाएगी कि, 3 लाख से ज़्यादा पद रेल विभाग में खाली क्यों हैं और उन्हे भरने में क्या दिक्कत है। 
० क्या सीबीआई, यह, पता करेगी कि लोको चालक से 12 घंटे से ज़्यादा की ड्यूटी क्यों कराई जा रही है? 

सरकार ने सीबीआई को जांच के क्या विंदु दिए हैं और सीबीआई, रेलवे के गवर्नेंस पर किस तरह की पड़ताल करेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। 

अब कुछ इन तथ्यों पर भी एक नजर डालें। रेल मंत्रालय का कहना है कि,  भारतीय रेलवे में 3.12 लाख से अधिक पद, खाली पड़े हैं। सबसे अधिक, खाली पद उत्तरी क्षेत्र में हैं। सेंट्रल जोन में खाली, 50 फीसदी पद सुरक्षा श्रेणी में हैं। यह भी कहा गया है कि, 35,281 रिक्तियों को भरने के लिए भर्ती प्रक्रिया पूरी हो गई है। "भारतीय रेलवे 1 दिसंबर, 2022 तक देश के 18 क्षेत्रों में 3.12 लाख गैर-राजपत्रित पदों के साथ कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है।" यह बयान रेल, संचार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा में एक तारांकित प्रश्न के उत्तर में दिया था। उत्तरी क्षेत्र (38,754) में सबसे अधिक पद खाली हैं, उसके बाद पश्चिमी (30,476), पूर्वी (30,141) और मध्य (28,650) क्षेत्र में रिक्तियां हैं।

सेंट्रल रेलवे में 28,650 रिक्त पदों में से लगभग 50% रिक्तियां (14,203) संरक्षा में हैं। जिसमें मुख्य रूप से संचालन और रखरखाव कर्मचारी शामिल हैं। जैसे विभिन्न प्रकार के निरीक्षक, ड्राइवर, ट्रेन परीक्षक, शंटर और कई अन्य पद हैं। अराजपत्रित पदों में इंजीनियरों और तकनीशियनों से लेकर क्लर्कों, स्टेशन मास्टरों, टिकट संग्राहकों और अन्य रोजगार श्रेणियों की एक श्रृंखला शामिल है। पदों को भरने की असमर्थता के कारण कर्मचारियों को ओवरटाइम काम करना पड़ रहा है। एक अखबार के अनुसार, मुंबई में सेंट्रल रेलवे के टिकट बुकिंग कार्यालय में काम करने वाले एक 29 वर्षीय कर्मचारी ने कहा, "मैं लगातार 16 घंटे तक डबल शिफ्ट में काम कर रहा हूं। क्योंकि हमें राहत देने के लिए, कोई स्टाफ नहीं है।" रिक्तियों के बारे में, संसद में रेल मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, "रिक्तियों का होते रहना और भरते रहना एक सतत प्रक्रिया है और रिक्तियों को पदोन्नति के माध्यम से और भर्ती एजेंसियों के साथ इंडेंट के प्लेसमेंट के माध्यम से परिचालन आवश्यकताओं के अनुसार भरा जाता है। लेकिन, जिस अनुपात में, रेलवे में रिक्तियां होती जा रही है, उसी अनुपात में, रिक्तियां भरी नहीं जा रही है। इसका दुष्प्रभाव, बढ़ती बेरोजगारी के रूप में सामने आ रहा है। रिक्तियों का, न भरा जाना, रेलवे की, 'कर्मचारी कम करो और सेवाओं का निजीकरण या संविदाकरण करो' जैसी नीति का हिस्सा है या विभाग का निकम्मापन, यह तो सरकार ही बेहतर रूप से बात सकती है। सरकार का यह भी कहना है कि, "गैर-तकनीकी लोकप्रिय श्रेणियों के लिए 35,281 सीधी भर्ती रिक्तियों को भरने के लिए भर्ती प्रक्रिया पूरी कर ली गई है।"

कुछ तथ्‍य ऐसे हैं जो साफ संकेत देते हैं क‍ि रेलवे की दशा और द‍िशा क्‍या है। इन तथ्‍यों में आप क‍िसी भी रेल हादसे का मूल कारण तलाश सकते हैं। भारत के महान‍ियंत्रक और लेखा परीक्षक (CAG) ने साल 2020-21 में Derailment in Indian Railways नाम से अपनी ऑड‍िट र‍िपोर्ट तैयार की। उक्त रिपोर्ट के अनुसार, "2017-18 और 2020-21 की अवधि में रेलवे के बड़े अफसरों ने पटर‍ियों के न‍िरीक्षण के ल‍िए, फील्ड में, जाना भी कम कर द‍िया है। 2017-18 में जहां 607 फ़ील्ड इंस्‍पेक्‍शन हुए, वहीं 2020-21 में महज इन निरीक्षणों की संख्या घट कर, 286 हो गई। यह हाल तब है जब 10,000 किलोमीटर लंबे ट्रंक रूट पर क्षमता से दोगुने से भी ज्‍यादा (125%) भार है।" 

2017-18 में व‍ित्‍त मंत्री ने बजट भाषण में कहा था क‍ि "एक लाख करोड़ रुपए के साथ राष्‍ट्रीय रेल संरक्षा कोष बनाएंगे।" इसके ल‍िए, इस मद में, पांच साल तक 20-20 हजार करोड़ रुपए देना था। ₹15000 करोड़ सरकार को देना था, और ₹5000 करोड़, रेलवे को अपने संसाधनों से जुटाना था। लेकिन, रेलवे यह रकम जुटा ही नहीं पाई। रेल सेफ्टी के ल‍िहाज से भारत का ग्राफ म‍िस्र, मेक्‍स‍िको, तंजान‍िया, कांगो, नाइजीर‍िया और पाक‍िस्‍तान जैसे मुल्‍कों से थोड़ा ही बेहतर होगा। ट्रेनों के बेपटरी होने की 1129 हादसों की जांच र‍िपोर्ट का व‍िश्‍लेषण क‍िया गया तो पाया क‍ि 167 दुर्घटनाओं की वजह ट्रैक के रखरखाव से जुड़ी थी। इसके बावजूद ट्रैक का इंस्‍पेक्‍शन कम हो गया और ट्रैक र‍िन्‍यूअल पर खर्च भी घटा द‍िया गया।

रेलवे का तकनीक उन्नयन के साथ साथ आधुनिकीकरण भी ज़रूरी है और साथ ही तेज गति, हाई स्पीड ट्रेन को भी चलाया जाए, यह भी ज़रूरी है। पर ऐसा भी नहीं कि, इस आधुनिकीकरण की मोह में यात्री सुरक्षा और सुविधाओं को ही, प्राथमिकता से बाहर कर दिया जाय। पिछले नौ सालों में, जनहित में लागू की गई, सुविधाओ जैसे, रेलवे के विभिन्न श्रेणी के रियायती टिकटो, मुफ्त प्रतीक्षा गृह में मिलने वाली सुविधाओं आदि रियायतों को रद्द कर दिया गया है। साथ ही, रेलवे टिकट के रद्द करने के शुल्कों, प्लेटफार्म टिकटों और रेलवे के किराए में, जब मर्जी तब, वृद्धि करने जैसी अनेक, कदम उठाए गए हैं, फिर भी रेलवे यदि धनाभाव का रोना रोती है तो, यह समझ से परे है कि, यह सब धन, आखिर जा कहा रहा है। वित्तीय प्रबंधन पर सीएजी की रिपोर्ट, सरकार की पोल खोल ही रही है। 

बालासोर रेल हादसा, न तो, देश का पहला हादसा है और न ही, यह आखिरी हादसा होगा। लेकिन, तीन सौ, क्षत विक्षत शव दुर्घटनास्थल पर पड़े हों, और रेल मंत्री अपनी प्रशासनिक और प्रबन्धन की ग़लतियों, खामियों को नज़रंदाज़ करते हुए, इसे सीधे तोड़फोड़ की साज़िश की ही जांच कराने लगें, यह उन खामियों और मुद्दों से मुंह चुराना हुआ, जिसकी ओर, सीएजी सहित, तमाम जानकार लोग, आज सरकार और रेल मंत्री का ध्यानाकर्षण कर रहे हैं। सीबीआई जांच होती रहे, इसमें कोई आपत्ति नहीं, पर रेलवे के आंतरिक प्रबंधन और प्रशासनिक मामलों की जांच किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में तकनीकी पैनल, जिसमें इंजीनियरिंग और वित्त से जुड़े विशेषज्ञ हों, द्वारा की जानी चाहिए। 

विजय शंकर सिंह 

Monday, 5 June 2023

डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान / आजमगढ़ का इतिहास

मेंहनगर के गौतम राजपूत मुस्लिम काल में अर्गल स्टेट फ़तेहपुर से वर्तमान आज़मगढ़ के मेंहनगर के इलाक़े में आकर बसे।स्थानीय जनजातियों को परास्त किया। हिंदोस्तान की मुस्लिम शासकों की हुक़ूमत ने गौतम राजपूतों को इलाक़ा सौंपा था और गौतम राजपूत अपनी कोट बनाकर वहाँ रहते थे,उनको बड़ी ज़मींदारी मिली थी,प्रजा से कर वसूल कर मुस्लिम शासकों को देते थे। मुग़ल काल में मुग़ल सरकार के वफ़ादार थे,लिहाज़ा ज़मींदारी और बढ़ी हुई थी। उन्हीं अरगल से आए गौतम राजपूतों के एक वंशज अभिमन्यु सिंह उर्फ़ अभिमान सिंह गौतम हुए। उनका एक दिन अपने भाईयों के साथ मछली के शिकार के बाद उसका बँटवारा करने को लेकर विवाद हुआ। वो भाइयों से नाराज़ हो घर से चले गए।उन्होंने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपना लिया और मुसलमान हो गए।मुसलमान हुए तो नाम पड़ा दौलत इब्राहीम ख़ान।

वो बादशाह जहाँगीर का काल था।दौलत इब्राहीम ख़ान जहाँगीर के दरबार में गए। उनकी योग्यता से प्रभावित हो जहाँगीर ने उन्हें अपने क़िले में अधिकारी नियुक्त कर लिया। फिर कुछ समय बाद दौलत इब्राहीम ख़ान को जहाँगीर द्वारा बाइस परगनों की जागीर मिली। मेंहनगर इसका मुख्यालय था। मेंहनगर बड़ा राज्य था जो आज़मगढ़ के माहुल की सीमा से लेकर बिहार के बक्सर की सीमा तक फैला था।दौलत इब्राहिम खाँ की कोई संतान नहीं थी। लिहाज़ा उनकी मृत्यु के बाद उनके भतीजे हरिवंश सिंह मेंहनगर के राज्य के उत्तराधिकारी हुए।ये भी मुसलमान हो गए।इनका नाम पड़ा अय्यूब।

दौलत इब्राहिम ख़ान की मौत के बाद उनके भतीजे हरिवंश सिंह जो धर्मपरिवर्तन कर अय्यूब ख़ान हो गए थे, उन्होंने मेंहनगर में राजा दौलत इब्राहिम ख़ान का मकबरा बनवाया।मकबरा शानदार है और इसमें छत्तीस दरवाज़े हैं।मकबरे के किनारे एक तालाब है जो कहीं न कहीं मकबरे की वास्तुकला को नज़र में रखते हुए खुदवाया गया होगा। सासाराम में जो शेरशाह सूरी का भी मकबरा है, कुछ कुछ उसी तर्ज़ पर दौलत इब्राहिम ख़ान का मकबरा है।राजा दौलत इब्राहिम ख़ान के पास एक वफ़ादार कुत्ता था और एक वफ़ादार घोड़ा था जिसे राजा बहुत प्रेम करते।राजा की मौत के बाद उनका कुत्ता और घोड़ा दोनों मर गए।राजा के इनसे लगाव को देखते हुए मकबरे में राजा के वफ़ादार घोड़े और कुत्ते को भी दफ़ना दिया गया और मज़ार बनवा दी गई। मकबरे में राजा के परिवार के अन्य लोगों की भी मज़ार है। कुत्ते और घोड़े की मज़ार मकबरे में होना इस मकबरे को ख़ास बनाता है और मकबरे की वास्तुकला भी दर्शनीय है। आज़मगढ़ की यह एकमात्र ऐसी इमारत है जो संरक्षित और देखने योग्य है।इब्राहीम दौलत ख़ान का यह मकबरा आज़मगढ़ के मेंहनगर कस्बे में है और भारत सरकार का पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इसकी देखरेख करता है।

हरिवंश सिंह की प्रेम कहानी बहुत रोचक है। जब दौलत इब्राहीम ख़ान की मौत हो गई तो उनके भतीजे हरिवंश सिह को मेंहनगर के बाइसों परगने मिले थे क्योंकि अभिमन्यु सिंह के कोई औलाद नहीं थी।हरिवंश सिंह ने आज़मगढ़ शहर में हरिवंशपुर बसाया जिसे आजकल हरबंशपुर कहा जाता है। हरिवंशपुर में एक किला बनवाया जो वर्तमान में कलेक्टर के बंगले के पीछे था। हरिवंश सिंह यहीं किले में रहने लगे। हरिवंश सिंह को मोहब्बत हो गई कमरून्निसां नाम की युवती से,जो उन्हीं के किसी दरबारी की पुत्री थीं। इन दोनों की मोहब्बत के चर्चे आम हो गए। मोहब्बत परवान चढ़ी,मोहब्बतें छिपा नहीं करतीं। अब हरिवंश सिंह ने उससे शादी कर ली और मुसलमान हो गए।नाम रखा अय्यूब ख़ान। जबकि हरिवंश सिंह पहले से शादीशुदा थे और उनकी रानी का नाम था रानी रतनज्योति। रानी रतनज्योति परगना बेलहाबांस के खड़गपुर की रहने वाली थीं। जब हरिवंश सिंह मुसलमान हो गए और कमरून्निसां से शादी कर ली तो रानी रतनज्योति बहुत नाराज़ हो गईं और हरिवंश सिंह से अलग होकर सेठवल के भूमिहार ज़मींदारों से ज़मीन ख़रीदकर एक जगह रानी की सराय बसाई और वहीं कोट बनाकर हरिवंश सिंह उर्फ़ अय्यूब से दूर रहने लगीं। वो हिंदू बनी रहीं और कमरून्निसां से हरिवंश की शादी के बाद कभी वापस हरिवंश के पास नहीं लौटी।

इधर राजा अय्यूब ने कमरून्निसां के लिए एक शानदार हवेली आज़मगढ़ शहर में बनवाई और किला छोड़कर वहीं रहने लगे।कमरून्निसां के कोई संतान तो नहीं हुई और न ही उसे रानी का दर्जा अवाम ने दिया लेकिन अय्यूब के दिल की मलिका कमरू ही थी। कुछ बरस बाद कमरून्निसां चल बसीं। राजा अय्यूब बदहवास हो गए,दीवाने हो गए। उन्होंने कमरून्निसां की कब्र पर ठीक वैसी ही डिज़ाइन का मकबरा बनवाया जैसी कमरून्निसां की कोठी बनवाई थी। कमरून्निसां की मज़ार पर अय्यूब जाते और बैठे रहते। उनको कमरून्निसां से शिद्दत की मोहब्बत थी इसलिए उसके ग़म में हरिवंश सिंह उर्फ़ अय्यूब भी चल बसे।बात जहांगीर के ज़माने की है।  हरिवंश को कमरून्निसां के बगल में दफ़न कर दिया गया जैसे बाद में मुमताज़ महल के बगल में शाहजहाँ दफ़न हुए। अय्यूब और कमरून्निसाँ का मक़बरा शहर आज़मगढ़ के ग़ाज़ी दलेल ख़ाँ क़ब्रिस्तान में है।इसमें एक कब्र कमरून्निसां की है और दूसरी हरिवंश उर्फ़ अय्यूब की है। उनकी दरगाह पर इबारत लिखी है हज़रत अय्यूब बादशाह।जहाँ तक बात अय्यूब के नाम में बादशाह लगे होने की है तो इस इलाके के वो बादशाह तो थे ही और हज़रत सिर्फ़ पीर-फ़क़ीर के लिए ही नहीं बल्कि किसी के नाम के आगे सम्मानपूर्वक लगाया जा सकता है। तो इसीलिए अय्यूब को हज़रत अय्यूब बादशाह कहा गया।समय-समय पर वहाँ दिया-बाती होती है। शबेबारात को सजता है। जिस दिन हम डॉ.शारिक़ अहमद ख़ान वहाँ गए उस दिन शबेबारात थी,मक़बरा सजा हुआ था।बरसों बरस पहले जब मक़बरा जर्जर हुआ था तो स्थानीय मुस्लिम समाज ने मरम्मत भी करा दी थी और हिंदी में नाम की इबारत लिखवायी थी। वहीं मक़बरे में चिरनिद्रा में लीन हैं राजा अय्यूब और उनकी प्रिय पत्नी कमरून्निसाँ। कुछ लोग वहाँ मन्नत मानने भी आते हैं। ये मक़बरा समझिए कि, आज़मगढ़ का ताजमहल है।

राजा अय्यूब की हिंदू रानी रतनज्योति से पैदा पुत्रों में से एक अय्यूब के पुत्र विक्रमजीत उर्फ़ विक्रमादित्य थे जो अपनी माँ के साथ रानी की सराय में रहते थे। क्योंकि विक्रमजीत के पिता मुसलमान हो गए थे तो युवा होने पर विक्रमजीत ने भी इस्लाम अपना लिया और मुसलमान हो गए। मुसलमान होने पर इनकी शादी भी मुसलमान कन्या से हुई और उनके दो पुत्र हुए एक का नाम आज़म ख़ान था और दूसरे का अज़मत ख़ान। यही वो राजा आज़म ख़ान उर्फ़ आज़मशाह थे जिन्होंने आज़मगढ़ बसाया। आज़मगढ़ शहर के क़रीब मौजूद गाँव बाग़ लखराँव में आज़मगढ़ बसाने वाले राजा आज़मशाह का मक़बरा मौजूद है। राजा आज़मशाह उर्फ़ आज़म ख़ान ने सन् 1665 में अपने राज्य के फुलवरिया और एलवल के घने जंगल कटवाकर तमसा नदी के किनारे आज़मगढ़ शहर बसाया। उन्हींं आज़मशाह के नाम पर तमसा किनारे के जंगल काटकर बसाए गए इस शहर का नाम पड़ा आज़मगढ़।आज़म शाह ने आज़मगढ़ में अपना क़िला बनवाया। आज़मगढ़ शहर आज़मशाह ने इसलिए भी बसाया ताकि उनके राज्य के मध्य में हो।क़िला ऐसी जगह बनवाया जो टौंस मतलब तमसा नदी के किनारे था और सामरिक रूप से मज़बूत था।

शहर को छूकर बहने वाली तमसा नदी के उस पार है बाग़ लखराँव। जो बाईपास रोजवेज़ से भँवरनाथ जाता है वहीं राजघाट के पास बाग़ लखराँव में मक़बरा है। यहाँ आज़मगढ़ बसाने वाले राजा आज़मशाह और उनके परिवार की कब्रें मौजूद हैं।मेरे देखने में ही मक़बरे की पुरानी इमारत मौजूद थी,लेकिन बीते बरसों की एक बाढ़ में राजा आज़म शाह का मक़बरा पुराना होने के कारण ढह रहा था तो चंद बरस पूर्व यहाँ आकर मन्नत मांगने वालों ने नए सिरे से बनवाया।इसकी बुनियाद लाखौरी ईंटों की है और आज़म साहब की कब्र भी तभी की बनी है।बीच में राजा आज़मशाह की कब्र है और उसके आसपास उनके परिवार के लोगों की क़रीब तीस की संख्या में कब्रें हैं। अभी कुछ बरस पहले पुल बन गया है तो यहाँ पहुंचने में आसानी हो गई है। क़रीब चौदह-पंद्रह बरस पहले जब हम पहली बार यहाँ गए थे तो पुल नहीं था और दस किलोमीटर का चक्कर लगा यहाँ पहुंचे थे।तब इस मकबरे की पुरानी इमारत मौजूद थी जो जर्जर होकर ढह रही थी।अब पुल तो बन गया है लेकिन यहाँ पहुंचने के लिए खेतों के बीच से निकली पगडंडी पर काफ़ी दूर तक पैदल चलकर मकबरे तक जाना पड़ता है। मकबरे को छूकर तमसा नदी बहती है और यहाँ का मंज़र सुहाना लगता है।अथाह शांति चारों ओर फैली रहती है। आज़मशाह की मौत कन्नौज में हुई थी। वहाँ से उनकी मिट्टी आज़मगढ़ आयी थी।उनकी मौत जेल में हुई।

दरअसल हुआ ये कि एक समय ऐसा आया जब, औरंगज़ेब ने आज़मगढ़ बसाने वाले आज़म शाह उर्फ़ आज़म ख़ान से औरंगज़ेब ने का राजा का ख़िताब वापस ले लिया।नाराज़ हो आज़म ख़ाँ ने औरंगज़ेब को लगान देना बंद कर दिया। औरंगज़ेब ने आज़म ख़ाँ को दिल्ली बुलाया और मिर्ज़ा राजा जयसिंह के साथ शिवाजी से लड़ने के लिए दक्षिण भेज दिया।लड़ाई के दौरान शिवाजी जब एक सुलह के लिए तैयार हुए तो आज़म ख़ान को सुलह करने के लिए प्रतिनिधि के तौर पर भेजा गया।जहाँ आज़म ख़ान ने सुलहनामे में शिवाजी को काफ़ी सहूलियतें दे दीं।औरंगज़ेब आज़म ख़ान की इस हरकत से नाराज़ हो गया,उसे लगा कि आज़म शाह क्योंकि मुस्लिम राजपूत हैं इसलिए उन्होंने शिवाजी को सहूलियत दिलवा दी। अब औरंगज़ेब ने आज़म शाह को कन्नौज में गिरफ़्तार करवा जेल में डलवा दिया।जेल की यातना से आज़म शाह की मृत्यु हो गई और उनकी मिट्टी को मुग़ल सरकार ने आज़मगढ़ भेज दिया।यहाँ उनकी मिट्टी आने पर प्रजा क्रुद्ध हो गई,क्योंकि आज़मशाह हिंदू मुस्लिम दोनों के प्रिय थे।अब आज़म के भाई अज़मत ख़ाँ उर्फ़ अज़मतशाह राजा बने।

अज़मतशाह ने अपने नाम से आज़मगढ़ की अज़मतगढ़ क़स्बा बसाया जो इस समय काफ़ी बड़ा हो चुका है। जब अज़मत राजा बने तो उन्होंने भी क्रोध में आकर लगान नहीं दिया। अब औरंगज़ेब ने अज़मत को सज़ा देने के लिए सूबेदार हिम्मत ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़लिया सेना आज़मगढ़ भेज दी। प्रजा ने अज़मत और उनकी सेना का साथ दिया।लेकिन मुग़ल सेना विशाल थी।अज़मतशाह पहले आज़मगढ़ में हारे, फिर वहाँ से भागकर अज़मतगढ़ में मोर्चा बांधा।वहाँ भी हार गए।भगाकर दोहरीघाट में मोर्चा बांधा और वहाँ भी हार हुई।अब अज़मतशाह दोहरीघाट से बहने वाली घाघरा नदी की तरफ़ घोड़े से भागे।हिम्मत ख़ाँ ने उनको दौड़ा लिया। अपने घोड़े पर अज़मतशाह ने अपने बेटों महावत खाँ और इकराम ख़ाँ को बैठा रखा था।दूसरे घोड़े पर अज़मत के दरबारी कवि बलदेव मिश्र भी अज़मत के साथ भाग रहे थे। 

अज़मतशाह घोड़े समेत घाघरा में कूद गए। बलदेव मिश्र भी कूद पड़े। अज़मत तो डूबकर मर गए लेकिन महावत खाँ, इकराम ख़ाँ और बलदेव मिश्र बच गए।तीनों पकड़ लिए गए। लेकिन औरंगज़ेब ने माफ़ी दे दी और उसने अज़मत के पुत्र इकराम को आज़मगढ़ का इलाका सौंप दिया। अज़मत के साथ घाघरा में कूदे उनके दरबारी कवि बलदेव मिश्र ने लिखा है कि "सावन की सित सातमी, सन सन बहत समीर, साठ हाथ जल भीतर, अजमत तजै शरीर"।

आज़मगढ़ बसाने वाले आज़मशाह संगीत के प्रेमी थे, उन्होंने आज़मगढ़ के पास मिश्र लोगों का गांव हरिहरपुर बसाया। शहर में तमाम जातियों के लिए मोहल्ले बसाए। पूरे शहर को करीने से बसाकर बाज़ार बनवाए। अनाज का गोला बनवाया। आज़मगढ़ शहर को बाढ़ से बचाने के लिए बांध बनवाया जिसे आज़म बंधा कहा जाता है। जहाँ पुरानी जेल है वहाँ आज़मशाह का हाथी ख़ाना था।जहाँ सिविल लाइन है वहाँ आज़मशाह की फ़ौज रहती। सभाचंद्र मिश्र आज़म ख़ान के दरबारी कवि थे जिन्होंने 'काली चरित्र 'नाम का ग्रंथ लिखा है। बलदेव मिश्र अज़मत के दरबारी कवि थे। हरजू मिश्र, नीलकंठ मिश्र भी आज़मगढ़ के दरबारी कवि थे।

मेंहनगर समेत बाइस परगने मुग़ल बादशाह से पाने वाले अभिमन्यु सिंह से इब्राहीम दौलत ख़ान बने आज़मशाह के पूर्वज को बादशाह जहाँगीर से मिली 'राजा' सनद की जाँच एक बार ब्रिटिश दौर में आज़मगढ़ के ब्रिटिश मजिस्ट्रेट डब्ल्यू टी रोटेन्सन ने की थी और और अपनी रिपोर्ट फ़ोर्ट विलियम कलकत्ता भेजी थी,फिर आज़मगढ़ के कलेक्टर मिस्टर थॉमसन ने भी राजा की सनद की जाँच की।वजह कि आज़म शाह के वंशज चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार भी उनको पूर्व राजा माने और राजा को मिलने वाली सुविधा दे। ब्रिटिश सरकार में राजा की पदवी विवादित ही रही, सरकार ने बड़ा मुस्लिम राजपूत ज़मींदार ही माना, लेकिन प्रजा सदियों तक आज़मशाह के ख़ानदान को राजा ही मानती रही।

आज़मशाह के परिवार के आख़िरी मशहूर सदस्य नैय्यरे आज़म थे, जो मेरे देखने में भी थे। आज़ादी बाद उन्होंने आज़मगढ़ से चुनाव भी लड़ा था। आज़म शाह का ख़ानदान आज़मगढ़ शहर के कोट मोहल्ले में रहता था, उनके निवास स्थान को क़िला कहा जाता था।नैय्यरे आज़म की पत्नी रानी साहिबा से मेरी डॉ.शारिक़ अहमद ख़ान की मुलाक़ात थी, एक बार सदी के शुरू के किसी बरस हम एक वरिष्ठ इतिहासकार संग राजा आज़मशाह के क़िले में इतिहास संबंधी शोध करने गए थे। इतिहासकार राजपूतों का इतिहास लिख रहे थे, क्योंकि आज़म शाह का ख़ानदान भी मुस्लिम राजपूत था जो हिंदू राजपूत से धर्मपरिवर्तित था, इसलिए राजपूत इतिहास के सिलसिले में इतिहासकार सिंह साहब वहाँ भी गए थे। बीते दशकों में रानी साहिबा के निधन के बाद अब आज़मशाह के वंशजों से क़िला ख़ाली हो चुका है। क़िले की काफ़ी ज़मीनें बिक गईं,वंशज देश के बड़े शहरों में जा बसे।ब्रिटिश दौर में ब्रिटिश हुक़ूमत ने आज़मगढ़ ज़िले का गज़ेटियर बनाया तो राजा आज़मशाह और उनके पुरखों समेत उनके वंशजों का इतिहास भी उसमें लिखा।हमने अपने आज़मगढ़ के शोध के दौरान गज़ेटियर से ही बहुत से तथ्य लिए।

इस तरह से एक प्रकार से देखा जाए तो राजा आज़मशाह ने औरंगज़ेब से बग़ावत की,औरंगज़ेब को कर नहीं दिया। औरंगज़ेब ने जब आज़म शाह को शिवाजी से संधि करने भेजा तो आज़म शाह ने शिवाजी को सहूलियतें दिलवा दीं।औरंगज़ेब ने इसी से नाराज़ हो आज़म शाह को क़ैद में डाल दिया,जहाँ यातना से उनकी मृत्यु हो गई।आज़म शाह के बाद आज़म शाह के भाई अज़मत राजा हुए और औरंगज़ेब की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस तरह से आज़मगढ़ बसाने वाले आज़म शाह और उनके भाई अज़मत ने औरंगज़ेब से बग़ावत की थी और फिर औरंगज़ेब के कोप का शिकार हुए।

पुराने संयुक्त आज़मगढ़ ज़िले में बहुत से कवि लेखक ऐसे भी हुए हैं जिनके बारे में आज गिनती के लोग ही जानते हैं। इनमें से कुछ के नाम जो मुझे मतलब डॉ.शारिक़ अहमद को याद आ रहे हैं वो ये हैं। सूफ़ी कवि नूर मुहम्मद जिन्होंने अनुराग बांसुरी, इंद्रावती, मृगावती की रचना की। सूफ़ी कवि जान साहब जिन्होंने अनवार-ए-सूफ़िया, नग़मात -ए-सूफ़िया की रचना की। आज़मगढ़ के ही पंडित बदरी नरायन चौधरी ' प्रेमधन और 'बाबा सुमेर सिंह 'शहज़ादे ' थे। पंडित शिव संपत, अयोध्या नरेश के दरबारी कवि भी आज़मगढ़ के थे। रामचरित तिवारी डुमरांव नरेश के दरबारी कवि, द्विज छोटकुन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ' हरिऔध' पंडित राम चरित उपाध्याय राहुल सांकृत्यायन आचार्य चंद्रबली पाण्डेय शांति प्रिय द्विवेदी लक्ष्मी नारायण मिश्र, श्याम नरायण पाण्डेय, विश्वनाथ लाल शैदा,अल्लामा शिब्ली नोमानी, इकबाल अहमद ख़ान ' सुहैल ',कैफ़ी आज़मी,बिसराम,ईशदत्त पाण्डेय ' श्रीश ',सुलेमान नदवी जामी चिरैयाकोटी  डॉ. एहतेराम हुसैन ख़लील-उर -रहमान आज़मी,मौलाना वहीदुद्दीन ख़ाँ,शम्स-उर-रहमान फ़ारूक़ी  समेत और भी कई नाम हैं।

तो आज़मगढ़ आज़म शाह के समय से ही अन्याय के विरूद्ध तेवर रखने वाली ज़मीन रहा है।आज़म ख़ान और अज़मत ख़ान ने औरंगज़ेब को चुनौती दी।यहाँ की मिट्टी की दूसरी सिफ़त ये रही है कि ये सरज़मींं इल्म -ओ-अदब के मामले में हमेशा धनी रही है। आज़मगढ़ के बारे में आज़मगढ़ के शायर और ज़िले से कई बार विधायक रहे और राजनेता रहे इक़बाल सुहैल ने कहा है कि
   'यहाँ का ज़र्रा ज़र्रा जोशक़ौमी का अफ़साना है
   यहाँ सबके लबों पर मोहब्बत का तराना है
  ये ख़ित्ता सबसे आगे मुल्क पर क़ुर्बान होता है
  यहाँ का नौजवाँ ब्रिगेडियर उस्मान होता है
      इस ख़ित्ता-ए-आज़मगढ़ में मगर 
     फ़ैज़ाने तजल्ली है यकसर
जो ज़र्रा यहाँ से उठता है वो नैयरे आज़म होता है'
 
मेरे कैमरे से ली गई पहली तस्वीर में मेंहनगर का राजा इब्राहीम दौलत ख़ान का मक़बरा। दूसरी तस्वीर में मेरे कैमरे से राजा अय्यूब और कमरून्नियाँ की मोहब्बत की यादगार मक़बरा। मेरे कैमरे की तीसरी और अन्य तस्वीरों में आज़मगढ़ बसाने वाले राजा आज़म शाह का मक़बरा और उनके परिवार की क़ब्रों समेत मक़बरे के आसपास का मंज़र।

डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान

Sunday, 4 June 2023

जोश मलीहाबादी की आत्मकथा - यादों की बारात का अंश (4) जोश का पहला मुशायरा और मुशायरे का इतिहास / विजय शंकर सिंह

        चित्र लखनऊ के पुराने मुशायरे का है। 

जोश साहब के पहले मुशायरे का किस्सा पढ़ने के पहले, उर्दू काव्य गोष्ठी के रूप में प्रचलित मुशायरे के इतिहास की कुछ चर्चा ज़रूरी है। शब्द 
मुशायरा, एक काव्य संगोष्ठी है, जिसे महफ़िल या मुशायरी कहा जाता है। यानी एक ऐसी महफ़िल, जहां शायर, इकट्ठे होकर, अपनी रचनाएं सुनाते है। यह केवल शायरों की भी महफ़िल हो सकती है, या फिर वे श्रोता भी होते हैं, जो कोई कवि या शायर नहीं होते, बस काव्य रसिक होते हैं। मुशायरा उत्तर भारत , पाकिस्तान और दक्कन की, काव्य गोष्ठी की परंपरा का  हिस्सा है। लेकिन, विशेष रूप से हैदराबाद यानी दकन, जहां से उर्दू का जन्म होना माना जाता है, इसे स्वतंत्र आत्म-अभिव्यक्ति के लिए एक मंच के रूप में जाना जाता है। 

यह भी एक मान्यता है कि, पहला मुशायरा, हजरत अमीर खुसरो (1253-1325) द्वारा आयोजित किया गया था, जबकि कुछ विद्वानों ने इस धारणा को खारिज कर दिया है और यह दावा किया कि अमीर खुसरो ने कव्वाली की परंपरा शुरू की थी, न कि मुशायरे की। अमीर खुसरो, अपनी कव्वालियों के लिए जाने जाते हैं, न कि ग़ज़लों और नज़्मों के लिये।  

एक अन्य धारणा के अनुसार, मुशायरा का प्रारंभ 14 वीं शताब्दी में बहमनी सल्तनत के दौरान दक्कन में हुआ था, और 1700 ईस्वी में वली दक्खनी द्वारा दिल्ली में, पहला मुशायरा आयोजित किया गया था। वली दक्कनी ने, स्थानीय दक्कनी भाषा, जो उर्दू का ही एक प्रारंभिक रूप था, में अपनी कविताओं का पाठ किया था। उस मुशायरे ने, एक बड़ी सार्वजनिक सभा का रूप ले लिया था। उस समय तक दिल्ली में स्थानीय लोगों के लिए कोई काव्य-सभा या मुशायरा जैसी कोई परंपरा नहीं थी। हालांकि, राज दरबारों में, काव्य-सम्मेलन होते थे जिनमें भाग लेने वाले शायर, केवल फ़ारसी भाषा में ही, अपनी कविताएँ सुनाते थे । 

17वीं शताब्दी में फारसी/उर्दू शायरी ने समाज के अभिजात्य वर्ग में अपना प्रभुत्व जमा लिया था। मुग़ल दरबार मे तो, शाही मुशायरे की परंपरा अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफर तक जारी रहे। शेख इब्राहिम ज़ौक़ और मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे प्रख्यात शायर, उन मुशायरों की जान और शान समझे जाते थे। ऐसी ही परंपरा रियासतों, रजवाडो, ताल्लुकदारों और ज़मींदारों से लेकर सम्पन्न समाज में एक शौक के साथ साथ परंपरा के रूप में विकसित हो गई। इससे फारसी/उर्दू शायरी का विकास हुआ और शायरी की अन्य विधाएं, जैसे, शेर, रुबाई, ग़ज़ल, नज़्म आदि की पहुंच जनमानस तक होने लगी।

काव्य पाठ का सबसे आम रूप मुशायरा या काव्य संगोष्ठी बना, जहां  शायर या कवि एक सख्त साहित्यिक अनुशासन यानी रदीफ़ काफिया या छंद आदि के अनुसार तैयार की गई अपनी रचनाओं को पढ़ने के लिए इकट्ठा होते थे। इसी मुशायरे या काव्य गोष्ठी में, शोरा को सराहना भी मिलती तो, उनकी हूटिंग भी हो जाती। इस परंपरा से काव्य लेखन के इर्द-गिर्द एक संस्कृति का निर्माण हुआ और फारसी के साथ साथ उर्दू का प्रचार प्रसार होने लगा। राजघरानों के लिए उर्दू शायरी सीखना भी फैशन बन गया और साथ ही साथ, फारसी का चलन कम और उर्दू का चलन बढ़ने लगा तथा उर्दू स्थानीय प्रशासन की भाषा के रूप में स्थापित हो गई। 

मुशायरे के कई रूप भी समय के साथ साथ विकसित हुए। परंपरागत रूप से, ग़ज़ल, एक विशिष्ट काव्यात्मक रूप है जिसे सुनाया तो नहीं जाता था, बल्कि तरन्नुम से गाया जाता था। लेकिन कविता, सस्वर पाठ और गीत के अन्य रूपों की भी अनुमति, मुशायरे में थी। यदि शायरी में हास्य की प्रकृति है, तो इसे मज़हिया मुशायरा कहा जाता है । मज़हिया मुशायरा इन दिनों बहुत लोकप्रिय है, लोग बड़े मजे से पाठ का आनंद लेते हैं। कुछ कवियों ने अब इसे आलोचना के रूप में विकसित किया है, इसलिए वर्तमान में इसे एक बहुत ही मामूली तरीके से एक गहरा अर्थ देकर टिप्पणी करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है जो संभावित टिप्पणियों की समझ के लिए एक लंबी अवधि का अहसास देता है।

तो यह रहा मुशायरे से जुड़ी कुछ बातें। जोश इसी तरह के एक मुशायरे में पहली बार शिरकत करने के लिए, अपने पिता के साथ लखनऊ तशरीफ़ ले जाते है। पहला मुशायरा है और जोश अभी किशोरावस्था में ही थे, तो जाहिर है वे थोड़ा नर्वस भी खुद को महसूस कर रहे थे। उनके पिता और अन्य शायर, उनका हौसला बढ़ा रहे थे और फिर जब जोश को कुछ पढ़ने के लिये कहा गया तो, उन्होंने अपने लिखे कुछ शेर पढ़े भी। अब जोश के ही शब्दों में, उनके पहले मुशायरे का किस्सा पढ़ें।
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पहला मुशायरा यह शायद 1910 या 1911 की बात है कि मैं अपने बाप के हमराह हज़रत मौलाना रज़ा फिरंगी महली के मुशायरे में पहली बार शरीक हुआ और दंग रह गया। 

आइए, मैं आपको मुशायरे में ले चलूँ ताकि आप ख़ुद देख लें कि शफ़्फ़ाफ़ चाँदनी बिछी हुई है, चाँदनी पर क़ालीन हैं। गावतकिये दीवारों से लगे हुए हैं। इधर-उधर साफ़-सुथरे उगालदान, नेचों में हार लिपटे हुक़्क़े, शालबाफ़ से मढ़ी हुई छोटी-छोटी कोरी हाँडियाँ, हाँडियों में चाँदी के वरक़ की सुगंधित गिलोरियाँ और इलायची दाने, तम्बाकू और क़िवाम की डिब्बियाँ रखी हुई हैं। शायर ज़्यादातर अंगरखे और कमतर शेरवानियाँ पहने अपने-अपने मर्तबे के लिहाज़ से दोज़ानू बैठे हुए हैं। सबके सरों पर टोपियाँ हैं। श्रोताओं में से कोई भी नंगे सर नहीं है। आपस में आहिस्ता-आहिस्ता बातें हो रही हैं, गिलोरियाँ खाई और हुक़्क़े पिए जा रहे हैं। और जो शायर मुशायरे के फ़र्श पर क़दम रखता है वह हाज़िरीन को झुक-झुककर सलाम कर रहा है। हाज़िरीन उसके मर्तबे के मुताबिक़ नीमक़द या सरूक़द जवाबी सलामों से उसका स्वागत कर रहे हैं। लीजिए अब मीरे-मुशायरा के सामने शम्‍अ आ गई है और मौलाना रज़ा की ग़ज़ल से मुशायरे का आग़ाज़ हो रहा है और दाद से छत गूँजने लगी है। किसकी मजाल है कि ग़ज़ल पढ़ने के दौरान कोई मिसरा न उठाए, हुक़्क़ा पी ले, पान खा ले, आपस में सरगोशी करने लगे या कोई इधर से उठकर उधर बैठ जाने की जसारत (धृष्टता) कर सके। 

मीरे-मुशायरा के बाद शम्‍अ घूम रही है। नौ-मश्क़ नौजवानों की सफ़ों में और कमी-बेशी के साथ सबको दाद मिल रही है और मामूली शे’रों के सरों पर भी ‘माशा अल्लाह’ के सेहरे बाँधे जा रहे हैं। लीजिए, नौ-मश्क़ों में अब मेरी बारी आ गई। अरे ग़ज़ब हो गया। शम्‍अ सामने रखी हुई है, रोबे-महफ़िल से मैं काँप रहा हूँ। शायरों की सफ़ों से आवाज़ें आ रही हैं—बिस्मिल्लाह, साहबज़ादे बिस्मिल्लाह! लेकिन साहबज़ादे का दम निकला हुआ है। क्या मजाल कि मुँह से एक हर्फ़ भी निकल सके। अब मेरे बाप मुझसे फ़रमा रहे हैं, “पढ़ते क्यों नहीं? पठान का बेटा तो बारह बरस की उम्र ही से रण में तलवार चलाने लगता है। और एक तुम हो कि तुमसे ग़ज़ल नहीं पढ़ी जा रही है।” अब मिर्ज़ा मुहम्मद हादी साहब रुसवा अपनी जगह से उठकर मेरे पहलू में आ गए हैं और मेरी पीठ ठोंककर फ़रमा रहे हैं—साहबज़ादे आप तो शायर, शायर के बेटे, शायर के पोते और शायर के परपोते हैं, पढ़िए और गरजकर पढ़िए। अब बड़ी हिम्मत करके मैं मतला (ग़ज़ल का पहला शे’र) पढ़ रहा हूँ। मतला पर दाद मिल रही है! और दाद के नशे में शे’र पढ़ रहा हूँ— 
ऐ नसीमे-सुबह के झोंको, यह तुमने क्या किया 
मेरे मस्ते-ख़्वाब की जुल्फ़ें परेशां हो गईं ⁠। 

इस शे’र पर मतला से ज़्यादा दाद पा रहा हूँ। और वलवले के साथ दूसरा शे’र सुना रहा हूँ— 
मेरी आँखें जानती हैं करबे इफ़राते ख़ुशी 
खंदाज़न देखा किसी को और गिरियां हो गई।
(कब्त इफरते खुशी -  अधिक उल्लास की पीड़ा, खंदाज़न - मुस्कुराते हुये, गिरियां - रोने लगीं)  

अब दाद का ग़लग़ला ज़्यादा बुलंद हो रहा है और ‘सुब्हान अल्लाह, माशा अल्लाह’ से मुशायरा गूँज रहा है। मिर्ज़ा मुहम्मद हादी रुसवा, हज़रते-सफ़ी से कह रहे हैं, “देखे आपने इस शे’र के तेवर, यह उम्र और इतनी गहरी बात!” और अब मैं आख़िरी शे’र पढ़ रहा हूँ— 
हाय मेरी मुश्किलो, तुमने भी क्या धोका दिया 
ऐन दिलचस्पी का आलम था कि आसां हो गईं ⁠। 

देखिए छतें उड़ रही हैं और धुएँ पार हो रहे हैं इस शे’र की दाद से, और उस्ताद फ़रमा रहे हैं—अल्लाह नज़रे-बद से बचाए। 

मुशायरे से दाद का बड़ा जाम पीकर झूमता-झामता घर आया। ख़ुशी के मारे देर तक नींद नहीं आई। और सो गया तो ख़्वाब में रात-भर यह देखता रहा कि परियाँ भींच-भींचकर मुझे गले लगा रही हैं।

सुबह उठते ही नहाया और नाश्ते से फारिग होकर जब अपने बाप की ख़्वाबगाह के बरामदे से होकर गुजरने लगा तो बाप की आवाज़ आई, "इधर आइए जनाब!" दम निकल गया इस आवाज़े-ग़ज़ब से जब मैं लरजता हुआ उनकी ख्वाबगाह में गया तो उन्होंने बड़ी भारी आवाज़ में इरशाद फ़रमाया, "देखिए साहब, यह मेरी दिली तमन्ना है कि आप इस दुनिया में फूलै फलें, आपकी दौलत मेरी दौलत से बढ़ जाए, आपका मर्तबा मुझसे हजार गुना ऊँचा हो जाए, आप जिन्दगी के हर शोबे (क्षेत्र) में मुझसे आगे बढ़ जाएं, मगर कान खोलकर सुन लीजिए कि मैं इसे बरदाश्त नहीं कर सकता कि खाँ साहब आप मुझसे शायरी में भी बढ़ जाएँ। रात के मुशायरे में आपको मुझसे ज्यादा दाद मिली। अब आपका मेरे साथ मुशायरे जाना बन्द। कतई बन्द। राजब ख़ुदा का बाप से ज्यादा बेटे को दाद मिले। मैं यह उल्टी गंगा बहने का मौका नहीं देने का। सुना खाँ साहब, आपने।"

मेरे बाप मीर को ग़ालिब पर तरजीह देते थे। हल्की-फुल्की जबान में शेर कहते और दाग के इस शेर पर अमल करते थे- 
कहते हैं उसे ज़बाने उर्दू, 
जिसमें न हो रंग फारसी का।

एक रोज़ मैंने उनकी खिदमत में अपनी एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए पेश की, जिसमें जा-बजा फारसी तरकीबे थीं और एक मिसरा था-
हमारी जिन्दगी यानी वफ़ाए-राजदाँ तक है।

उन्होंने त्योरियों पर बल डालकर फ़रमाया, सुब्हान अल्लाह, यानी वफाए राज़दां तक है। इस 'यानी' की दाद नहीं दी जा सकती। मुझे इस बात का शदीद ख़ौफ़ है कि तुम कुछ दिन में 'शुमारे सुब्हा-ए-मरगूब बुत मुश्किल पसंद आया' (गालिब) तक आ जाओगे ना साहब, मैं तुम्हें इस्लाह नहीं दूंगा और तुम्हें अज़ीज़ साहब के सुपुर्द कर दूंगा। वह भी यानी वफ़ाए सज़दा' और 'शुमारे सुबहा' के बरतने वालों में से हैं। दोनों में खूब निबाह हो जाएगा। उन्होंने अज़ीज़ साहब को बुलाकर मुझे उनका शागिर्द बना दिया और शागिर्दी उस्तादी का यह सिलसिला छह बरस के अंदर ही टूट गया।
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यह एक कामयाब मुशायरा था। जोश को श्रोता और शोरा से दाद मिली और उनके पिता ने उनकी सराहना की तथा उनके इस शौक़ को, आगे बढ़ाने में एक अहम भूमिका भी निभाई। इस तरह से एक शायर का जन्म हुआ, जो भारतीय उपमहाद्वीप में शायरे इंकलाब के नाम से जाना गया।
(क्रमशः)

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

भाग (3) का लिंक 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/05/3.html 

Saturday, 3 June 2023

मुकदमा बलात्कार के आरोप का, और अदालत की चिंता है, पीड़िता मांगलिक है या नहीं ! / विजय शंकर सिंह

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अजीब आदेश पारित किया है। एक पुरुष ने एक स्त्री से, विवाह के वादे पर यौन संबंध बनाए और फिर वह उस स्त्री से विवाह के वादे से मुकर गया। मुकरने का आधार, उक्त व्यक्ति ने यह बताया कि, "स्त्री, चूंकि मांगलिक है, इसलिए यह शादी नहीं हो सकती है।" हाईकोर्ट के जज साहब ने, इस विंदु पर लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग से यह राय मांगी कि, "वे उक्त महिला की कुंडली देख कर बताएं कि, वह मांगलिक है या नहीं।" 

अजीब फैसला है। फरियाद, शादी का झांसा देकर, यौन संबंध बनाने के बारे में है, और अदालत, इस बात की जांच करा रही है कि, लड़की मांगलिक है या नही। यदि लड़की मांगलिक है और इस आधार पर, वह पुरुष, उक्त महिला से विवाह नहीं करता है, तो, इससे, धोखा देकर यौन संबंध बनाने का अपराध क्या, अपराध नहीं रह जायेगा। अजीब दृष्टिकोण है, मांगलिक दोष के कारण,  विवाह तो नहीं हो सकता, पर इसी झांसे में, यौन संबंध बनाए जा सकते हैं! कमाल की न्यायिक सोच है।

सुप्रीम कोर्ट ने, आज शनिवार को ही, एक विशेष पीठ आयोजित कर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पारित इस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें लखनऊ विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के प्रमुख को यह निर्धारित करने का निर्देश दिया गया था कि "कथित बलात्कार पीड़िता उसकी कुंडली की जांच करके मंगली/मांगलिक है या नहीं।" 
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की अवकाश पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश का स्वत: संज्ञान लेते हुए यह आदेश पारित किया।

हाई कोर्ट के जस्टिस बृज राज सिंह की खंडपीठ ने शादी का झूठा वादा करके कथित बलात्कार के एक मामले में आरोपी द्वारा दायर जमानत अर्जी पर यह आदेश पारित किया।  आरोपी ने बचाव किया था कि महिला के साथ शादी नहीं की जा सकती क्योंकि वह 'मांगलिक' है।

शुरुआत में, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या उन्होंने आदेश देखा है। इस पर, सॉलिसिटर जनरल ने कहा, 
 "मैंने आदेश देखा है और यह बहुत परेशान करने वाला है। इस पर रोक लगाई जा सकती है।" 

शिकायतकर्ता के वकील ने प्रस्तुत किया कि आदेश पक्षों की सहमति से पारित किया गया था और न्यायालय के पास विशेषज्ञ साक्ष्य मांगने की शक्ति है।  उन्होंने कहा कि ज्योतिष विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाने वाला विषय है।

इस पर जस्टिस धूलिया ने कहा कि, 
"लेकिन यह पूरी तरह से संदर्भ से बाहर है। निजता का अधिकार को बाधित करता है .."  जज ने आगे कहा, "हम तथ्यों को जोड़ना नहीं चाहते हैं कि ज्योतिष का इससे क्या लेना-देना है। हम उस पर आपकी भावनाओं का सम्मान करते हैं। हम केवल इससे जुड़े विषय को लेकर चिंतित हैं।"

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, "ज्योतिष एक विज्ञान है। हम उस पर नहीं हैं। हम कह रहे हैं कि एक न्यायिक मंच द्वारा एक आवेदन पर विचार करते हुए, क्या यह एक प्रश्न हो सकता है।"
इस पर जस्टिस मित्तल ने कहा, "हम समझ नहीं पाते हैं कि ज्योतिष के पहलू पर विचार क्यों किया गया ...", 

हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट जमानत अर्जी पर गुण-दोष के आधार पर विचार कर सकता है।

किस्सा इस प्रकार है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष, एक पीड़िता ने तर्क दिया कि "आरोपी ने उससे शादी करने का झूठा वादा करके उसके साथ यौन संबंध बनाए और उसका उससे शादी करने का कभी इरादा नहीं था।" 
इसके विपरीत, अभियुक्त ने अपना पक्ष प्रस्तुत किया कि, "अभियुक्त और पीड़िता के बीच, इस लिए विवाह संपन्न नहीं हो सका क्योंकि पीड़िता एक 'मांगलिक' है।" 
इस आरोप का खंडन करते हुए पीड़िता के वकील ने कहा कि वह 'मंगल दोष' से पीड़ित नहीं है।

पक्षकारों के परस्पर विरोधी दावों को देखते हुए न्यायालय ने लखनऊ विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष (ज्योतिष विभाग) को निर्देश दिया कि वह लड़की मंगली है या नहीं, इस मामले में निर्णय करें।  कोर्ट ने पक्षकारों को दस दिनों के भीतर अपनी कुंडली एचओडी के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

महिला पहलवानों द्वारा दर्ज प्राथमिकी पर सरकार शर्मनाक खामोशी / विजय शंकर सिंह

यदि यौन शौषण की ऐसी एक भी एफआईआर, किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ, दर्ज हुई होती, जो न तो दबंग होता, ओर न ही असरदार, और न धन और बाहुबल में मजबूत होता, और न ही वह सत्तारूढ़ दल का कोई सांसद, तो, अब तक यही दिल्ली पुलिस, न केवल, उक्त अभियुक्त को गिरफ्तार कर लेती, बल्कि रोजाना, प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के मुकदमे की प्रगति परोसती और खुद ही अपनी पीठ थपथपाती हुई, लोगों की तालियां बटोरती। बात मैं, बीजेपी के बाहुबली सांसद, और कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष, बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ दर्ज यौन शौषण के एफआईआर की कर रहा हूं। लेकिन यह एक अनोखा मामला है, जिसमें अभियुक्त, निर्लज्जता के साथ, कानून को ही चुनौती देते हुए, पॉक्सो एक्ट के कथित 'दुरुपयोग' के खिलाफ खुलकर अभियान चला रहा है, अयोध्या के साधुओं के साथ मिल कर, एक रैली करने की बात कर रहा था, और पुलिस तथा सरकार, चुपचाप इसे सुन भी रही है! और गोदी मीडिया, ऐसी खबरों को सकारात्मक रूप से प्रसारित कर रहा है। यह उस न्यू इंडिया की एक बानगी भी है, जो, अब तक सभी सिस्टम पर अकेले ही भारी पड़ रही है और यह संकेत दे रही है कि, समरथ को नहीं दोस गुसाईं !

यह अनोखा मामला है, महिला पहलवानों द्वारा, कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष के खिलाफ दर्ज एफआईआर का। याद कीजिए, पहलवानों ने, कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष, बृज भूषण शरण सिंह  द्वारा किए गए यौन शौषण के विरोध को लेकर, इस साल जनवरी में ही, धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया था। लेकिन,  खेल मंत्री अनुराग ठाकुर द्वारा जांच के आश्वासन के बाद, ओलंपिक पदक विजेता पहलवानों ने, अपना विरोध प्रदर्शन हटा लिया गया था। गठित जांच समिति ने, पूछताछ और जांच में किस तरह से, विडियो कैमरे को, समय समय पर ऑन ऑफ कर के, जांच को प्रभावित करने की कोशिश की, यह आप, एफआईआर के कंटेंट में, आगे पढ़ेंगे। अंततः, सुप्रीम कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप, यौन शौषण की प्राथमिकी दर्ज करने और अभियुक्तों की गिरफ्तारी करने की मांगों को लेकर, 23 अप्रैल से, पहलवानों द्वारा दूसरा विरोध और धरना प्रदर्शन, जंतर मंतर पर, शुरू हुआ। 

दिल्ली पुलिस ने, सुप्रीम कोर्ट में महिला पहलवानों द्वारा दायर याचिका पर, सीजेआई के सख्त रुख को देखते हुए, बृज भूषण शरण सिंह, बीजेपी सांसद, के खिलाफ, मुकदमा दर्ज करने की इच्छा न होते हुए भी, अंततः, 28 अप्रैल को, कनॉट प्लेस पुलिस स्टेशन में, दो एफआईआर दर्ज की । बृज भूषण शरण सिंह पर, आईपीसी की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल प्रयोग), 354ए (यौन उत्पीड़न), 354डी (पीछा करना) और 34 (समान इरादे) के अंतर्गत, मामला दर्ज किया गया। एक फरियादी के नाबालिग होने के कारण, मुकदमे में, यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण से जुड़ी, POCSO एक्ट की धारा भी जोड़ी गई। बृज भूषण शरण सिंह के साथ डब्ल्यूएफआई के सचिव, विनोद तोमर का भी नाम पुलिस प्राथमिकी में दर्ज है।

कुश्ती की विभिन्न प्रतियोगिताओं में, भाग ले चुकी, एक वादी, नाबालिग है और एफआईआर में उसकी आयु 17 साल अंकित है। उसके पिता ने पुलिस में दर्ज शिकायत में कहा है कि, "वह महिला पहलवान, साल 2016 से ही कुश्ती की विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग ले रही है।" उसके द्वारा दर्ज कराये गए एफआईआर में, पॉक्सो एक्ट की धारा लगाई गई है। यौन शौषण से जुड़ी यह एक गंभीर आपराधिक धारा है। 

अंग्रेजी अखबार द हिंदू ने, दर्ज एफआईआर के कुछ अंश, छापे हैं। उस अखबार के अनुसार, "उसके (नाबालिग वादी के) पिता ने कहा कि, जब उसने भारत में हुई एक चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता, तो आरोपी ने फोटो लेने के बहाने, "लड़की को जबरदस्ती अपनी ओर खींचा और उसे इतना कस कर पकड़ लिया कि वह हिल भी नहीं सकती थी और न ही खुद को मुक्त कर सकती थी।" 
आगे अखबार लिखता है, "श्री सिंह ने जानबूझकर अपना हाथ उसके कंधे के नीचे सरका दिया और अपना हाथ उसके स्तनों पर फेर दिया।” अविशासनीय लगने वाली यह हरकत अखबार के अनुसार, एफआईआर में दर्ज है। 

एफआईआर में अंकित, उक्त महिला पहलवान के पिता के अनुसार, श्री सिंह ने पीड़िता को अपने संपर्क में रहने के लिए कहा। "यदि आप मेरा समर्थन करते हैं, तो मैं आपका समर्थन करूँगा।  मेरे साथ संपर्क में रहें," श्री सिंह ने पीड़िता से कहा था, जिस पर, पीड़िता ने जवाब दिया, "सर, मैं अपने बलबूते पर इतनी दूर आई हूं और मैं आगे जाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगी।"
हालांकि, श्री सिंह ने कथित तौर पर उसे चेतावनी भी दी कि एशियाई चैंपियनशिप के ट्रायल जल्द ही होने वाले हैं, और चूंकि वह उसके साथ सहयोग नहीं कर रही थी, "उसे ट्रायल में नतीजे भुगतने होंगे।"

एफआईआर के अनुसार, "मेरी बेटी, एक युवा पहलवान है, जो अपने कैरियर के प्रति शुरुआत से ही सजग है। वह एक यौन शिकारी जैसे, स्वभाव वाले, अभियुक्त का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी और इस तरह की शिकायत कहीं और या फेडरेशन के समक्ष, नहीं उठा सकी क्योंकि फेडरेशन पूरी तरह से अभियुक्त के नियंत्रण में है और उसके इशारे पर काम करता है।" पीड़िता के पिता ने, यह तथ्य एफआईआर में बताए हैं।

प्राथमिकी में, एक अन्य पहलवान ने कहा है कि, श्री सिंह ने, पिछले साल अगस्त में पहली बार उसका यौन उत्पीड़न किया। "जब मैं प्रशिक्षण ले रही थी तो, आरोपी ने मुझे अलग से बुलाया, जिसे मैंने इनकार कर दिया क्योंकि अभियुक्त, अन्य लड़कियों को भी अनुचित तरीके से छू रहा था।  हालांकि, उसने मुझे फिर से बुलाया, मेरी टी-शर्ट खींची और मेरी सांस की जांच के बहाने मेरे पेट को छू लिया।” 
उसी पहलवान ने आगे कहा कि, "मैने देखा है कि कोई भी महिला पहलवान कभी भी अकेले, बाहर जाने की योजना नहीं बनाती है।" 
आगे उसने इसका कारण बताते हुए कहा, "असल में, सभी महिला पहलवान हमेशा एक साथ बाहर जाती थीं, और ऐसा केवल, अभियुक्तों से सामना न हो सके,  इसलिए।" 
एफआईआर का यह अंश, महिला पहलवानों का डर, और मनोदशा बताता है। 

एफआईआर में अंकित है, "वह जबरदस्ती और महिला एथलीटों की इच्छा के खिलाफ उन्हें उनके समूह से अलग करने की कोशिश करता था और फिर अनुचित रूप से, व्यक्तिगत सवाल पूछता था, जिसका जवाब देने में हम सहज नहीं होते थे।"
प्राथमिकी में महिला पहलवान ने कहा, "अभियुक्त, भविष्य में, फिर किसी अन्य महिला का, यौन उत्पीड़न और शोषण के न कर सके, और उसे रोकना आवश्यक है अतः मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि आप उसके खिलाफ, मुकदमा दर्ज करें और उसे गिरफ्तार कर, सलाखों के पीछे डालें।"

एफआईआर दर्ज कराने वाली महिला पहलवान ने, बृज भूषण शरण सिंह द्वारा किए गए यौन शौषण के बारे में, एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किया है कि, उसने इस यौन शौषण की शिकायत, प्रधानमंत्री जी से भी की थी। एफआईआर में अंकित है, "मैंने प्रधान मंत्री को बार-बार होने वाले यौन, भावनात्मक, शारीरिक आघात के बारे में सूचित किया, जब वे, अभियुक्तों सहित, अन्य महिला पहलवानों के साथ मिले थे।" 
यहां प्रधानमंत्री से, कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष, बृज भूषण शरण सिंह तथा अन्य पहलवानों के बीच हुई मुलाकात का उल्लेख है। शिकायत के अनुसार, "प्रधानमंत्री ने मुझे आश्वस्त किया था कि, ऐसी शिकायतों को देखा जाएगा।  खेल मंत्रालय द्वारा और मुझे जल्द ही से फोन आएगा।” 

 एक अन्य पहलवान ने पुलिस प्राथमिकी में आरोप लगाया, "अपने बयान की रिकॉर्डिंग के दौरान, मैंने देखा कि वे [निगरानी समिति] बार-बार कैमरे को चालू और बंद कर रहे थे।  इसके अलावा, मैं तब बेहद आश्चर्य और अत्यधिक सदमे में आ गई, जब समिति के सदस्य, अभियुक्तों के कार्यों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे, जैसे कि कुछ भी गलत नहीं किया गया हो। ऐसा प्रतीत होता है कि समिति पहले से ही अभियुक्तों का पक्ष लेने के लिए पूर्व निर्धारित दिमाग से बैठी थी।" 
यह उल्लेख पहलवानों द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच करने के लिए गठित समिति द्वारा बयानों के दर्ज करने के समय का है। यानी जांच समिति, तब भी शिकायतकर्ताओं के बयान को, निष्पक्षता से, दर्ज नहीं कर रही थी। 

महिला पहलवान ने आगे कहा, “जैसा कि मुझे गंभीर रूप से संदेह था कि मेरा बयान पूरी तरह से दर्ज नहीं किया गया था, मैंने, अपने लिए वीडियो रिकॉर्डिंग की एक प्रति, प्राप्त करने के लिए समिति से अनुरोध किया लेकिन समिति ने मुझे, रिकॉर्डिंग की प्रति देने से इनकार कर दिया। समिति के इस कृत्य ने, समिति के पक्षपाती होने के बारे में, मेरे संदेह को और पुख्ता किया ... मुझे डर है कि अभियुक्त के खिलाफ, आरोपों की जांच के लिए समिति गठित होने के बावजूद, मुझे न्याय नहीं मिलेगा क्योंकि आरोपी एक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण लोगों से, जुड़ा हुआ व्यक्ति है और समिति  उनके निर्देश के अनुसार कार्य करती है, ऐसा प्रतीत होता है।” 

पहलवान ने आगे कहा कि जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन चल रहा था तो आरोपी ने अपने गुंडों की मदद से उसके पति के माध्यम से उससे संपर्क करने की कोशिश की और उसे धमकी दी गई कि अगर उसने समिति के सामने आरोपियों के खिलाफ कुछ भी कहा, तो उन्हें  "गंभीर परिणाम" भुगतना पड़ेगा। प्राथमिकी में एक अन्य पहलवान ने भी कुछ ऐसी ही कहानी सुनाई कि, टीम के, ग्रुप फोटो खिंचवाते समय, पीछे खड़ी पहलवान ने देखा कि कोई उसे गलत तरीके से छू रहा है। एफआईआर में अंकित है, “आरोपी आया और मेरे साथ खड़ा हो गया… मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही, जब मुझे, अचानक अपने नितंब पर कोई हाथ महसूस हुआ। मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा और मेरे होश उड़ गए। यह आरोपी ही था जिसने यह कृत्य किया था। मैं अभियुक्तों की हरकतों से स्तब्ध थी, जो बेहद अशोभनीय और आपत्तिजनक और मेरी सहमति के बिना मुझे स्पर्श कर रहे थे। आरोपी द्वारा अनुचित रूप से हो रहे स्पर्श से खुद को बचाने के लिए मैंने तुरंत, उस स्थान से हट जाने की कोशिश की।  हालांकि, जब मैंने वहां से जाने की कोशिश की तो आरोपी ने मुझे जबरन पकड़ लिया।  किसी तरह मैं छूटने में कामयाब रही।” 

एक अन्य पहलवान ने आरोप लगाया, "उन्होंने मुझे सप्लीमेंट्स खरीदने की भी पेशकश की, जो मुझे एक एथलीट के रूप में "यौन एहसान"  के बदले में चाहिए।"
एक अन्य पहलवान ने पुलिस प्राथमिकी में दावा किया है कि, "चैंपियनशिप के दौरान चोट लगने पर आरोपी ने उसका यौन उत्पीड़न किया था। पहलवान को महासंघ के कार्यालय में बुलाया गया था, जहां श्री सिंह ने कथित तौर पर उससे कहा था कि महासंघ इलाज से संबंधित सभी खर्चों को वहन करेगा, "बशर्ते वह अपनी "यौन इच्छाओं" को पूरा करे।"

POCSO यानी (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसेस एक्ट) अधिनियम, नाबालिगों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है।  यहां तक ​​कि नाबालिग के खिलाफ यौन हमले की सूचना न देना भी एक गंभीर अपराध है। कानून में कहा गया है कि विशेष अदालत द्वारा संज्ञान लेने के साथ ही मुकदमे को एक साल के भीतर पूरा किया जाना चाहिए। इसके अलावा, परीक्षण शुरू होने के बाद और अभियोजन पक्ष द्वारा आरोप की नींव स्थापित करने के बाद, सबूत का भार अभियुक्त के पास होता है। POCSO को यदि कुछ देर के लिए अलग रख दें तो, दूसरे आपराधिक मामले में भी कोई प्रगति अब तक नहीं दिख रही है। ऐसे अपराधों में, पहला नियम मजिस्ट्रेट के सामने जल्द से जल्द, धारा 164 सीआरपीसी के अंतर्गत, बयान दर्ज कराना होता है। यह भी बताया जा रहा है कि, पहलवानों के बयान तो दर्ज कर लिए गए हैं, लेकिन अभी तक तो, गिरफ्तारी की बात तो दूर, आरोपी को बयान और पूछताछ के लिए भी नहीं बुलाया गया है।

इस बीच, यह भी सत्तर साल में पहली बार हो रहा है कि, अभियुक्त, कानून (POCSO अधिनियम) के कथित दुरुपयोग के खिलाफ, खुलकर अपने विचारों को खुले तौर पर प्रसारित कर रहा है और दावा कर रहा है कि इसे पिछली सरकार द्वारा गलत तरीके से तैयार किया गया था। साथ ही, वह यह भी घोषणा कर रहा है कि, कानून में, परिवर्तन किए जाएंगे। किसके दम पर एक मुल्जिम, कानून बदलवा देने तक की बात कर रहा है और सब ख़ामोश भी हैं? एक जनसभा में, उसने, सिर्फ एक एक 'स्पर्श' (बैड टच या बुरी नीयत से छूना) होने का मजाक उड़ाया था। अभियुक्त ने, अपने और पहलवानों के पॉलीग्राफ टेस्ट का सुझाव भी दिया है।  

क्या सरकार को, अभियुक्त की इन सब गतिविधियों से, इस बात का एहसास नहीं हो रहा है कि, इस तरह विधिविरुद्ध टिप्पणी से, यह महत्वपूर्ण जांच प्रभावित होगी और इससे सरकार और पुलिस की छवि के बारे में, गलत संदेश जाएगा ? न तो बीजेपी ने अपने सांसद अभियुक्त के खिलाफ कोई कार्रवाई करना मुनासिब समझा और न ही केंद्र सरकार ने डब्ल्यूएफआई के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई ही की। सामान्य परिस्थितियों में पुलिस, एफआईआर दर्ज होने के बाद, विवेचना की धारा 41 सीआरपीसी के अंतर्गत, अभियुक्त की गिरफ्तारी की कार्यवाही में जुट जाती। लेकिन, पुलिस के निकम्मेपन के कारण, एफआईआर दर्ज कराने के पीछे, लालच और राजनीति के, हास्यास्पद तर्क दिए जा रहे हैं। इन तर्कों से क्या कानून, दर्ज  एफआईआर की जांच करने से पुलिस को रोक रहा है। यह भी सवाल उठता है कि, क्या कई बार के  कुश्ती चैंपियन, ओलंपिक और विश्व पदक धारक, इस तरह के क्षुद्र लाभ के शिकार हो सकते हैं?  क्या परिश्रम और धैर्य से कमाया गया जीवन का मिशन इस तरह के राजनीतिक प्रभाव में बर्बाद हो सकता है?

यौन शौषण के इस हाई प्रोफाइल मामले में, प्रधानमंत्री सहित पूरी सरकार और सत्तारूढ़ दल बीजेपी की लगातार बनी हुई चुप्पी से, देश के आपराधिक न्याय व्यवस्था और पुलिस के कामकाज को लेकर, देश के लगभग हर वर्ग से, आवाजें उठ रही हैं। देश में ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी, भारत की छवि दांव पर है।  कुश्ती की विश्व संस्था ने, एफआईआर पर कार्यवाही की मांग के साथ साथ, भारतीय कुश्ती महासंघ के खिलाफ भी कार्रवाई करने की बात कही है।
देश और अब विदेशों से भी, खिलाड़ियों के समर्थन के संदेश आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस की छवि, सवालों के घेरे में है। किसानों के संगठन ने सरकार को, कार्यवाही करने के लिए, 9 जून तक का समय दिया है। देश और विशेषकर, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों में, जैसा आक्रोश घनीभूत हो रहा है, उससे सरकार के समक्ष, देर सबेर इस मामले में, अभियुक्तों के विरुद्ध कार्यवाही करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रहेगा। 

सरकार या दिल्ली पुलिस के सामने, इस मामले में, विकल्प स्पष्ट हैं। वे विकल्प हैं, 
० बिना किसी डर या पक्षपात के, प्रोफेशनल दायित्व निभाते हुए, पूरी तत्परता से जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाएं, 
० आरोपियों को गिरफ्तार करें और चार्जशीट दाखिल करें,
० यदि जांच के दौरान,  सबूत न मिले तो, इसका उल्लेख करते हुए, मामले में फाइनल रिपोर्ट अदालत में दाखिल करें।  
० शिकायत झूठी मिलने पर, महिला पहलवानों के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराने के आरोप पर आईपीसी की धारा 182/212 के अंतर्गत कार्रवाई करें। 
लेकिन, इस मामले में दिल्ली पुलिस जिस प्रकार से आचरण कर रही है वह एक गैरपेशेवराना आचरण है। अब एक सामान्य नागरिक भी यह सवाल उठाने लगा है कि, क्या एक बाहुबली सांसद, पूरे तंत्र और सत्तारूढ़ दल पर, इतना भारी पड़ गया है कि, उसके खिलाफ जांच और कोई कार्यवाही तक न करने की हिम्मत, सरकार जुटा नहीं पा रही है ? यह स्थिति बेहद शर्मनाक और निंदनीय है। 

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh


Friday, 2 June 2023

आरएसएस के मुखपत्र के अनुसार, गुरु नानक देव थाईलैंड भी गए थे / विजय शंकर सिंह

राहुल गांधी ने अमेरिका में एक भाषण देते हुए, गुरु नानक देव जी की यात्राओं का उल्लेख किया और कहा कि,
"मैने कहीं पढ़ा है कि, गुरु नानक जी सऊदी अरब के मक्का और थाईलैंड गए थे।"
गुरु नानक की मक्का यात्रा तो सर्वविदित है, पर थाईलैंड की यात्रा उन्होंने कब की, यह पता नही। 

राहुल गांधी से यह पूछा जाने लगा कि, उन्होंने यह कहां पढ़ लिया कि, गुरु नानक देव ने थाईलैंड की यात्रा की। यही जिज्ञासा मुझे भी हुई। गूगल करते समय, गुरु नानक देव जी की यात्राओं पर, मुझे एक लेख मिला, जो आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के 26 नवंबर 2013 के अंक में छपा था। लेख का लिंक मैं कमेंट बॉक्स में दे दे रहा हूं। 

लेख में तीसरी उदासी का जिक्र है। तीसरी उदासी में कहा गया है कि, 

"तीसरी उदासी के दौरान, गुरु जी ने सुल्तानपुर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर खंड, सुमेर पर्वत, उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय क्षेत्र, उत्तर बिहार, नेपाल, सिक्किम, भूटान, अरुणाचल प्रदेश, असम, नागालैंड, उत्तर पश्चिमी बर्मा, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा को कवर किया।  , दक्षिण पूर्व बांग्लादेश, दक्षिणी बर्मा, मलाया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, लाहोस, चीन, तिब्बत, कश्मीर फिर वापस पंजाब आ गए।"

राहुल गांधी के भाषण के इस अंश पर, सवाल जरूर उठाया जाना चाहिए, साथ ही यह सवाल आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के संपादक मंडल और उक्त लेख के लेखक से भी पूछा जाना चाहिए कि, गुरु नानक देव जी की थाईलैंड यात्रा का क्या स्रोत है। नानक देव का भ्रमण बहुत व्यापक रहा है। हो सकता हो, वे थाईलैंड भी गए हों। 

अन्य उदासियों का भी उल्लेख है। 
० सबसे पहले उदासी गुरु नानक देव जी ने लाहौर, एमिनाबाद, पाकपट्टन, कुरुक्षेत्र, हरद्वार, नानकमता, प्रयाग इलाहाबाद, गया, असम, डक्का, जगन्नाथ पुरी, कांचीपुरम, रामेश्वरम, श्रीलंका पंजाब की यात्रा की।

० दूसरी उदासी में, गुरु नानक देव जी जी ने धनश्री घाटी, सांगलादीप (सीलोन) को कवर किया। 

० गुरु नानक देव जी ने, चौथी उदासी के दौरान, पाकपटन, मुल्तान, उच, साखर, लखपत, मियां, मक्का, मदीना, बगदाद, ईरान, तुर्किस्तान, काबुल, जलालाबाद, सुल्तानपुर, खैबर दर्रा, पेशावर, सैदपुर और फिर वापस पंजाब की यात्रा की।

विजय शंकर सिंह 
Vijay Shanker Singh 

आरएसएस के मुखपत्र Organiser का लिंक,
The Udasis of Guru Nanak
https://organiser.org/2013/11/26/53566/bharat/re6838e5c/