Tuesday, 18 April 2023

पुलवामा हमले में सुरक्षा चूक और खुफिया विफलता पर प्रधानमंत्री की चुप्पी निंदनीय / विजय शंकर सिंह

करन थापर और फिर रवीश कुमार को दिए अपने इंटरव्यू में, जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल, सत्यपाल मलिक ने पुलवामा हमले में यह खुलासा कर के कि, "सीआरपीएफ द्वारा जवानों को सड़क मार्ग के बजाय, एयर लिफ्ट करके ले जाने के प्रस्ताव को गृह मंत्रालय ने, मंजूरी नहीं दी और सीआरपीएफ के कनवाय को तब मजबूरी में सड़क मार्ग से ले जाना पड़ा, जिससे पुलवामा हादसा हुआ जिसमे 40 जवानों की जान चली गई।" जब यह बात, सत्यपाल मलिक के अनुसार, उन्होंने प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एनएसए को बताया तो, उनसे प्रधानमंत्री और एनएसए, दोनों ने चुप रहने के लिए कहा। इस इंटरव्यू और खुलासे पर विवाद उठना ही था और विवाद उठा भी और अब सवालों के घेरे में, प्रधानमंत्री खुद हैं। हालांकि पीएम अभी खामोश हैं, और सरकार की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया अभी नहीं आई है, पर सुरक्षा विशेषज्ञ और विपक्ष के नेताओं की प्रतिक्रिया बराबर आ रही है। विपक्ष के आरोप और प्रतिक्रिया को, उनका राजनीतिक कदम कहा जा सकता है, पर अब तक की सबसे महत्वपूर्ण और एक्सपर्ट  प्रतिक्रिया पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल शंकर रॉयचौधरी की आई है और उनकी बात को,  राजनीतिक बयानबाजी कह कर दरकिनार नहीं किया जा सकता है। 

देश के 18वें थल सेनाध्यक्ष जनरल शंकर रॉयचौधरी ने रविवार को द टेलीग्राफ से बात करते हुए कहा कि "पुलवामा नरसंहार को टाला जा सकता था, अगर सीआरपीएफ के जवानों ने हमेशा "कमजोर" विकल्प वाली सड़क मार्ग से मूवमेंट के बजाय हवाई मार्ग से, श्रीनगर की यात्रा की होती तो।" 
पूर्व सेना प्रमुख आगे कहते हैं कि इतने बड़े काफिले, (78 वाहनों में 2,500 से अधिक जवानों को ले जाने वाले) को पाकिस्तान की सीमा के इतने करीब स्थित राजमार्ग से नहीं ले जाया जाना चाहिए था।"
जनरल रॉयचौधरी का बयान न तो किसी राजनेता का बयान है और न ही यह किसी सामान्य व्यक्ति का बयान है, यह बयान पूर्व सेनाध्यक्ष का बयान है जो, सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं और ऐसे जोखिम भरे अनेक मामलों से अपने सेवाकाल में निपट चुके होंगे। 

पुलवामा हमला, फरवरी 2019 में हुआ था। तब, पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले में विस्फोटकों से भरी एक कार ने, एक बस, जिसमे सीआरपीएफ के जवान बैठे थे को, टक्कर मार दी और उस विस्फोट में, 40 जवान मौके पर ही शहीद हो गए थे। विस्फोटक से भरी इस कार के बारे में भी सत्यपाल मलिक ने खुलासा किया कि, "वह कार उस इलाके में पहले भी देखी गई थी।" उनके अनुसार, "मुख्य मार्ग से मिलने वाली लिंक सड़कों पर, कोई भी बैरियर या पुलिस जिप्सी की तैनाती नहीं थी।" यह एक हैरान कर देने वाला खुलासा है कि, इतने संवेदनशील क्षेत्र से सीआरपीएफ का कारवां गुज़र रहा है और जगह जगह न तो बैरिकेड लगाए गए और न ही सड़कों और मुख्य मार्ग और उससे मिलने वाली लिंक रोड के जंक्शन पर कोई ड्यूटी ही लगाई गई। एयर लिफ्ट की तो बात ही छोड़ दीजिए, सड़क मार्ग से भी फोर्स के कनवॉय गुजरने के पहले, गुजरने के दौरान और गुजरने के बाद जो एहतियातन सुरक्षा व्यवस्था की जानी चाहिए थी, वह भी नहीं थी। जबकि यह काफिला, जम्मू कश्मीर के भी एक बेहद संवेदनशील क्षेत्र से गुजर रहा था। 

जनरल शंकर रॉयचौधरी ने, इसी अखबार से बात करतें हुए आगे कहा, “पुलवामा में जानमाल के नुकसान की प्राथमिक जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार पर है, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, सलाह देते हैं।  यह एक गंभीर हादसा था। इस घात के पीछे खुफिया विफलता भी थी, जिसके लिए एनएसए को भी, इस चूक की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।" 
यह एक घातक आतंकी हमला था, जिसे नरसंहार या जवानों की सामूहिक हत्या कहना अधिक उचित होगा। पर यही हमला 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए संजीवनी बन गई। पुलवामा हमले के बाद बालकोट सर्जिकल स्ट्राइक हुई। इस पर भी सवाल उठे। पुलवामा हमले में हुई सुरक्षा चूक और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की उपलब्धियों पर भी सवाल उठे। अब पता चल रहा है कि, वायुसेना का एक हेलीकॉप्टर तो वायुसेना की गलती से ही उड़ा दिया गया था। यह संदेह तब भी उठा था, पर उन्मादित राष्ट्रवाद की आड़ में न तो सुरक्षा चूक पर कोई जांच हुई और न ही सर्जिकल स्ट्राइक के इस चूक पर। 

देश मे, पहली बार, मतदाताओं से अपना वोट बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा सैनिकों को समर्पित करने की अपील के साथ मांगे गए। यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना। चुनाव और उग्र राष्ट्रवाद में पुलवामा हमले में हुई सुरक्षा चूक का मुद्दा जानबूझकर दबा दिया गया। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल, सत्यपाल मलिक के इस खुलासे के बाद अब उन दोनों घटनाओं की असलियत सामने आ रही है। पर आज इन्ही मुद्दों पर, 2019 में वोट मांगने वाली भाजपा का एक भी प्रवक्ता, मुंह नहीं खोल रहा है। मैं प्रधानमंत्री जी की बात इसलिये नहीं करूंगा क्योंकि, वे ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर, पहले भी चुप्पी लगा जाते रहे हैं और अब भी वे खामोश बने हुए हैं। लेकिन, सत्यपाल मलिक के द वायर के पत्रकार करण थापर को दिए गए इंटरव्यू में इस खुलासे पर कि, "केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जवानों को ले जाने के लिए विमान के सीआरपीएफ के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था. मैंने इसे उसी शाम पीएम को बताया।  यह हमारी गलती है।  अगर हमने विमान सीआरपीएफ को दे दिया होता तो ऐसा नहीं होता। तब प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने मुझसे चुप रहने को कहा" प्रधानमंत्री की चुप्पी, पुलवामा हमले में एक गंभीर सुरक्षा चूक की ही नहीं, बल्कि एक बड़ी साजिश का भी संकेत भी देती है। 

जनरल रॉयचौधरी, जो नवंबर 1994 से सितंबर 1997 तक सेना प्रमुख थे, ने यह भी कहा कि, “जम्मू और श्रीनगर के बीच अंतरराज्यीय राजमार्ग पर चल रहे सीआरपीएफ के एक काफिले पर पुलवामा में मुजाहिदीन के एक समूह द्वारा घात लगाकर हमला किया गया था।  अगर सैनिकों ने हवाई यात्रा की होती, तो जानमाल के नुकसान को टाला जा सकता था। राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलने वाले सभी बड़े वाहन और काफिले हमेशा हमले की चपेट में रहते हैं। सैनिकों को हवाई जहाज से ले जाना, स्पष्ट रूप से, अधिक सुविधाजनक और कम थका देने वाला होता।"
40 से अधिक वर्षों के एक विशिष्ट सैन्य करियर में, जनरल रॉयचौधरी ने 1991 और 1992 के बीच जम्मू और कश्मीर में 16वीं कोर की कमान संभाली थी। जनरल ने कहा कि "जिस क्षेत्र में पुलवामा हमला हुआ वह हमेशा, सुरक्षा के दृष्टिकोण से, एक बेहद "कमजोर क्षेत्र" रहा है।" यहां कमज़ोर से उनका आशय आतंकवाद की दृष्टि से अतिसंवेदनशील क्षेत्र रहा है। 

उन्होंने कहा, "जम्मू में सांबा (सतवारी हवाईअड्डे से 31 किमी) तक जाने वाली सड़क घुसपैठ के कारण हमेशा असुरक्षित रहती है। जितना अधिक ट्रैफ़िक आप अंतरराज्यीय राजमार्ग पर जाने देते हैं, आप उतना ही, उन्हें जोखिम में डाल देते हैं क्योंकि यह इलाका पूरी तरह से पाकिस्तान की सीमा से बहुत दूर नहीं है।"
जनरल रॉयचौधरी ने खुफिया विफलता पर भी, अपनी बात कही, “सीआरपीएफ के 40 जवानों की मौत एक बड़ा नुकसान है। वे जवान, जम्मू-कश्मीर में तैनात हैं। इतने बड़े हमले की कोई अग्रिम सूचना तक खुफिया एजेंसियां एकत्र न कर पाएं, यह एक घोर खुफिया विफलता थी।"

14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में वास्तव में क्या हुआ था, और अब सत्यपाल मलिक के बयानों से जुड़ी खबरें, मुख्यधारा की मीडिया में लगभग ब्लैकआउट है। इस पर सरकार की तरफ से गंभीर चुप्पी है। सत्यपाल मलिक के साक्षात्कार ने, पुलवामा नरसंहार पर कई सवाल तो उठाए हैं। इसके बाद पाकिस्तान के बालाकोट क्षेत्र में एक आतंकवादी शिविर पर, सर्जिकल स्ट्राइक किया गया था। इस सर्जिकल स्ट्राइक ने 2019 के चुनावों से पहले, इस पूरी कहानी को ही बदल दिया और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक, भाजपा के अभियान की धुरी बन गया, जिसने अन्य सभी मुद्दों - जैसे बेरोजगारी और कृषि संकट - को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दिया। पुलवामा हमला कैसे हुआ, इसकी विस्तृत जांच की विपक्ष की मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। भाजपा ने इस प्रकार के किसी भी सवाल को "राष्ट्र-विरोधी" करार दिया। परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित जनरल रॉयचौधरी ने पुलवामा पर सरकार की चुप्पी के बारे में पूछे जाने पर साफ और बेलाग शब्दों में कहा,  "यह एक गलती है कि, इससे सरकार अपना हाथ धोने की कोशिश कर रही है।  मेरा दृढ़ विश्वास है कि सैनिकों को विमान द्वारा, ले जाया जाना चाहिए था, जो कि नागरिक उड्डयन विभाग, वायु सेना या बीएसएफ के पास उपलब्ध हैं।"

पुलवामा हमला भले ही पाक से आए आतंकवादियों ने किया हो, बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक में, हमने उनका बदला भी ले लिया हो, पर जिस सुरक्षा चूक के कारण 48 जवानों की मौत हुई, उनके घर उजड़े, उस सुरक्षा चूक की कोई जांच हुई या नहीं? और हुई तो  सरकार के कौन कौन अफसर दंडित हुये?
क्या सरकार के पास विमान नही थे, या वे सड़क से ही जोखिम उठाकर इतने जवानों को भेजना चाहते थे, या उन्होंने जोखिम का मूल्यांकन किया ही नहीं या किया तो लापरवाही से किया, इन सब मुद्दों की जांच पड़ताल की गई थी या नहीं। यह सारे सवाल सत्यपाल मलिक के इस इंटरव्यू के बाद उठ खड़े होंगे।

बिगुल की लास्ट पोस्ट, धीमी गति का मार्चपास्ट, पुष्प चक्रिका रीथ, और जूते के नोक पर टिकी हुयी संगीनों भरी, गर्दन झुकी हुयी शोक परेड अंदर से रुलाती रहती है। मौत एक अनिवार्य सत्य है । पर इस तरह टुकड़े टुकड़े बिखर कर हुयी मौत पर भले ही हम सब राष्ट्र को समर्पित कर के औपचारिक शोक संवेदना प्रकट कर, फिर रोजमर्रा के काम में लग जाँय, पर यह मौत, उस सुरक्षा बल, उस यूनिट और उसके परिवार और मित्रो के मन मे जो घाव दे जाती है वह कभी नहीं भरता है। युद्धों में जितने जवान, सुरक्षा बलों के शहीद नहीं होते हैं उससे कहीं अधिक जवान शांति काल मे हो रहे प्रच्छन्न युद्ध मे मारे जाते हैं और मारे जा रहे हैं। सरकार और राजनीतिक दलों को अपने क्षुद्र राजनीतिक हित को दरकिनार कर के कश्मीर की इस त्रासद समस्या का हल ढूंढना होगा। नए और बहादुर जवानों के क्षत विक्षत शव को टीवी पर देखना दुःखद है, बेहद दुःखद है।

उम्मीद है सत्यपाल मलिक के इस बयान पर बीजेपी आरएसएस के प्रवक्ताओं के बजाय, सरकार की प्रतिक्रिया आयेगी और उसमे यह बात स्पष्ट होगी कि, यदि सीआरपीएफ ने एयर लिफ्ट की सुविधा मांगी थी तो, उसे क्यों नही दी गई और, इस घातक सुरक्षा चूक के लिए जिम्मेदार कौन है? सरकार को पुलवामा हमले में हुई सुरक्षा चूक पर जवाब देना ही होगा। जांच कर जिम्मेदार अफसर की जिम्मेदारी निर्धारित करनी होगी। एक्शन में, किसी जवान का शहीद हो जाना, अलग बात है, पर लापरवाही से एक भी जवान की मृत्यु हो जाय, यह एक गंभीर मामला है। इसका असर, संवेदनशील इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों के मनोबल पर पड़ सकता है। सरकार इसे गंभीरता से ले। 

(विजय शंकर सिंह)

Wednesday, 12 April 2023

अमृतसर, 13 अप्रैल 1919, बैसाखी, जलियांवाला बाग / विजय शंकर सिंह

13 अप्रैल 1919, बैसाखी के दिन लगभग 4:00 बजे जनरल डायर लगभग डेढ़ सौ के सिपाहियों को लेकर जलियांवाला बाग में पहुंचा। वहां रौलेट एक्ट के खिलाफ एक जनसभा हो रही थी। बैसाखी पर दूर दूर से आये लोग, दरबार साहिब में मत्था टेक कर वहां एकत्र थे। दरबार साहिब बगल में ही है। पंजाब की स्थिति पहले से ही उद्वेलित थी। कमान, जनरल डायर के   हांथ में थी। उसे यह पता चल गया था कि यह सभा रौलेट एक्ट के विरोध में हो रही है। रौलेट एक्ट के विरोध में सैफ़ुद्दीन किचलू और सतपाल जैसे पंजाब के बड़े नेताओं को पंजाब सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था। सभा शांतिपूर्ण थी। डायर ने आव देखा ना ताव बिना किसी चेतावनी के, जलियांवाला बाग में उपस्थित सभी लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग का आदेश दे दिया। जिसके चलते बच्चे, महिलाओं और पुरुषों समेत सैकड़ो की संख्या में लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हो गए। लगभग 10 मिनट तक गोलियां बरसती रहीं। अंधाधुंध बरसती गोलियों से बचने के लिए लोग बदहवास होकर, इधर-उधर भागने लगे किंतु, बाग के, ऊंची चहारदीवारी से घिरे होने के कारण, लोग 10 फीट ऊंची दीवार फांद न सके। कुछ दीवार पर लटक गए तो कुछ गोलियां लगने से नीचे गिर गए। उसी परिसर में एक कुंआ था। जान बचाने के लिये लोग उसमे भी कूदे और जान तो न बच सकी, लोग उसी में गिर कर मर गए।देखते ही देखते जलियांवाला बाग की जमीन रक्त से लाल हो गयी। 

इस घटना की व्यापक प्रतिक्रिया हुआ। पंजाब में जबरदस्त उत्तेजना फैल गयी थी। गांधी जी, पंजाब जाना चाहते थे, उन्हें दिल्ली स्टेशन पर ही रोक दिया गया। उन्होंने, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्राप्त कैसर ए हिन्द सम्मान वापस कर दिया। रबिन्द्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड सम्मान लौटा दिया। इसके साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सर शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। रविंद्र नाथ टैगोर ने सर की उपाधि लौटाते हुए कहा था कि, 
"समय आ गया है, जब सम्मान के तमगे अपमान के बेतुके संदर्भ में, हमारे कलंक को सुस्पष्ट कर देते हैं। जहां तक मेरा प्रश्न है मैं सभी विशेष उपाधियों से रहित होकर अपने देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूं।"
इस कांड के बारे में इतिहासकार, थॉमसन और गैरेट ने लिखा है कि, 
"अमृतसर दुर्घटना भारत ब्रिटेन संबंध में युगांतरकारी घटना थी जैसा कि 1857 का विद्रोह था। गोलीबारी में हजारों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था और 3000 लोग घायल हो गए थे।"
वैसे सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 व्यक्ति मारे गए और 1200 लोग घायल हुए थे।

इस नरसंहार ने, ब्रिटिश सरकार के पक्ष में खड़े कांग्रेस के एक समूह के मन मे भी ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति रही सही सदाशयता को भी खत्म कर दिया। यह स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का एक टर्निंग प्वाइंट था। इसके बाद असहयोग आंदोलन की रूपरेखा बनती है और स्वाधीनता संग्राम एक नए और अलग तरह के स्वरूप में आगे बढ़ता है। आज उसी जलियांवाला बाग नरसंहार के शहीदों को याद करने का दिन है। बाग आज भी है। दीवारें, जिनपर गोलियों के निशान हैं, आज भी साम्राज्यवादी बर्बरता की याद दिलाती हैं। वह कुआ, जिनमे न जाने कितने कूदे थे, आज भी है।

जलियांवाला बाग नरसंहार पर जांच के लिये, साल 1919 में सरकार ने एक कमेटी का गठन किया, जिसका अध्यक्ष विलियम हंटर को बनाया गया। हंटर कमेटी को, जलियांवाला बाग सहित अन्य घटनाओं की जांच के लिए कहा गया था। विलियम हंटर के अलावा इस कमेटी में अन्य सात लोग और भी थे जिनमें से कुछ भारतीय भी थे। हंटर कमेटी के सभी सदस्यो ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के सभी पहलुओं को जांचा और यह पता लगाने की कोशिश की कि जनरल डायर ने जो जलियांवाला बाग फायरिंग की थी, वह कानूनन सही थी या गलत। 19 नवंबर सन 1919 में हंटर कमेटी द्वारा जनरल डायर की सभी अपीलो व दलीलों को ध्यान में रखकर उसके अपराधों की जांच पड़ताल शुरू हुई। 8 मार्च 1920 को कमेटी ने अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक किया। 23 मार्च 1920 को जनरल डायर को दोषी करार देते हुए उसको सेवानिवृत्त कर दिया गया। यह जांच एक छलावा थी। जनरल डायर पर निर्दोषों की हत्या करने के जुर्म में मुकदमा दायर किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया।

इस आयोग में 8 सदस्य थे जिसमें पांच अंग्रेज और तीन भारतीय सदस्य थे। पांच अंग्रेज सदस्य थे, लॉर्ड हंटर, जस्टिस रैस्किन, डब्लू०एफ० राइस, मेजर जनरल सर जार्ज बैरो, सर टॉमस स्मिथ और जो तीन भारतीय सदस्य थे, वे थे, सर चिमनलाल सीतलवाड़,  साहबजादा सुल्तान अहमद औऱ जगत नारायण। हंटर कमेटी ने मार्च 1920 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी पर इसके पहले ही सरकार ने दोषी लोगों को बचाने के लिए इण्डेम्निटी बिल पास कर लिया था। कमेटी ने संपूर्ण प्रकरण पर लीपापोती करने का प्रयास किया और पंजाब के गवर्नर को निर्दोष घोषित कर दिया। समिति ने डायर पर दोषों का हल्का बोझ डालते हुए कहा कि,
"डायर ने कर्तव्य को गलत समझते हुए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया, लेकिन जो कुछ उसने किया, निष्ठा से किया।" 
तत्कालीन भारतीय सचिव मांटेग्यू ने कहा
"जनरल आर०डायर ने जैसा उचित समझा उसके अनुसार बिल्कुल नेक नियती से कार्य किया था, लेकिन उसे परिस्थिति को ठीक-ठीक समझने में गलती हो गई। डायर को उसके इस त्रुटि के लिए नौकरी से हटा देने का दंड दिया गया।"
ब्रितानी अखबारों ने जनरल डायर को, ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक और ब्रितानी लॉर्ड सभा ने उसे ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा था। इंग्लैंड के एक अखबार मॉर्निंग पोस्ट ने आर डायर के लिए 30000 पाउंड धनराशि इकट्ठा किया था।

जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी एक समिति की नियुक्ति की थी। इस समिति को तहकीकात समिति कहा गया गया। इसके अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय थे औऱ सदस्यों में महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरु, अब्बास तैयबजी, सी०आर० दास एंव पुपुल जयकर थे। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में अधिकारियों के इस बर्बर कार्य के लिए उन्हें निंदा का पात्र बनाया। सरकार से दोषी लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने और मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। फलस्वरुप गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाने का निर्णय लिया और इस प्रकार स्वतंत्रता संघर्ष के तृतीय चरण की शुरुआत हुई और स्वतंत्रता के आंदोलन में गांधी नेतृत्व का प्रारंभ हुआ। 

पंजाब को दमन के अकल्पनीय दौर से गुजरना पड़ा था प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ ताराचंद के शब्दों में, 
"पंजाब को कमोवेश शत्रु देश मान लिया गया था जिसे अभी विजित किया गया हो वहां के निवासियों को उपयुक्त सजाएं देकर ऐसा सबक सिखाया गया कि वह सरकार को चुनौती देने और उसकी आलोचना करने के सभी इरादो से बाज आये।"
सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने लिखा है कि 
"जलियांवाला बाग नें देश में आग लगा दी थी।"
4 सितंबर 1920 को कोलकाता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन का आयोजन किया गया था जिंसमे,  पंजाब के प्रश्न पर सरकार की कटु आलोचना की गई। महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव में कहा गया कि,
"इस कांग्रेस का यह भी मत है कि जब तक अन्याय का प्रतिकार और स्वराज्य की स्थापना नहीं हो जाती है तब तक भारतीय जनता के लिए इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है कि वह क्रमिक अहिंसक असहयोग की नीति का अनुमोदन करें और उसे अंगीकार करें।"

स्वाधीनता संग्राम के हर ज्ञात अज्ञात सेनानियों, शहीदों को याद किया जाना चाहिए। उनकी समृति में कुछ क्षणों का मौन न सिर्फ, उनके प्रति हमारा कृतज्ञता का ज्ञापन होगा, बल्कि हमे उनकी स्मृति, जिजीविषा, और बलिदान की कहानियां सदैव अनुप्राणित करती रहेंगी। यही बाकी निशाँ होगा। अमर शहीदों को वीरोचित श्रद्धांजलि।

विजय शंकर सिंह
० Vijay Shanker Singh 


भुवनेश्वर की एक कहानी - भेड़िये

‘भेड़िया क्या है’, खारू बंजारे ने कहा, ‘मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूं।’ मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालांकि 70 के आस-पास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा सा दिखाई पड़ता था; पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था।

उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था; पर उसका लघुकरण ‘खारू’ बिलकुल चस्पा होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आंखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूंछों के नीचे उसका मुंह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था, जितना एक चूहेदान।

जीवन से वह निपटारा कर चुका था, मौत उसे नहीं चाहती थी; पर तब भी वह समय के मुंह पर थूककर जीवित था। तुम्हारी भली या बुरी राय की परवा किए बिना भी, वह कभी झूठ नहीं बोलता था और अपने निर्दय कटु सत्य से मानो यह दिखला देता था कि सत्य भी कितना ऊसर और भयानक हो सकता है।

खारू ने मुझसे यह कहानी कही। उसका वह ठोस तरीका और गहरी बेसरोकारी, जिससे उसने यह कहानी कही, मैं शब्दों में नहीं लिख सकता, पर तब भी मैं यह कहानी सच मानता हूं, इसका एक-एक लफ्ज।

‘मैं किसी चीज से नहीं डरता। हां, सिवा भेड़िये के मैं किस चीज से नहीं डरता।’ खारू ने कहा। एक भेड़िया नहीं, दो-चार नहीं। भेड़ियों का झुंड - 200-300 जो जाड़े की रातों में निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका - उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता।

लोग कहते हैं, अकेला भेड़िया कायर होता है। यह झूठ है। भेड़िया कायर नहीं होता, अकेला भी वह सिर्फ चौकन्ना होता है। तुम कहते हो लोमड़ी चालाक होती है, तो तुम भेड़ियों को जानते ही नहीं। तुमने कभी भेड़िये को शिकार करते देखा है किसी का - बारहसिंगे का? वह शेर की तरह नाटक नहीं करता, भालू की तरह शेखी नहीं दिखाता।

एक मर्तबा, सिर्फ एक मर्तबा गेंद सा कूदकर उसकी जांघ में गहरा जख्म कर देता है - बस। फिर पीछे, बहुत पीछे रहकर टपकते हुए खून की लकीर पर चलकर वहां पहुंच जाता है। जहां वह बारहसिंगा कमजोर होकर गिर पड़ा है। या, उचककर एक क्षण में अपने से तिगुने जानवर का पेट चाक कर देता है - और वहीं चिपक जाता है।

भेड़िया बला का चालाक और बहादुर जानवर है। वह थकना तो जानता ही नहीं। अच्छे पछैयां बैल हमारे बंजारी गड्डों को घोड़ों से तेज ले जाते हैं और जब उन्हें भेड़िया की बू आती है, तो भागते नहीं, उड़ते हैं। लेकिन भेड़िये से तेज कोई चार पैर का जानवर नहीं दौड़ सकता...

‘सुनो, मैं ग्वालियर के राज से आईन में आ रहा था। अजीब सर्दी थी और भेड़िये गोलों में निकल पड़े थे। हमारा गड्डा काफी भरा था। मैं, मेरा बाप, गिरस्ती और तीन नटनियां - 15-15 साल की। हम लोग उन्हें पछांह लिये जा रहे थे।’ ‘किसलिए?’ - मैंने पूछा।

‘तुम्हारा क्या खयाल है, मुजरा करने? अरे बेचने के लिए। और वह किस मसरफ की हैं? ग्वालियर की नटनियां छोटी-छोटी गदबदी होती हैं और पंजाब में खूब बिक जाती हैं। यह लड़कियां होती तो बड़ी चोखी हैं, पर भारी भी खूब होती हैं। हमारे पास एक तेज बंजारी गड्डा था और तीन घोड़ों से तेज भागनेवाले बैल।

हम लोग तड़के ही चल दिये थे, दिन-ही-दिन में हम आगे जाने वाले साथियों से मिल जाना चाहते थे। वैसे डर के लिए हमारे पास दो कमान और एक टोपीदार बंदूक थी। बैल हौसले से भाग रहे थे और हम लोग 20 मील निकल आए थे कि बड़े मियां ने घूमकर कहा - 'खारे, भेड़िये हैं?’ मैंने तेजी से कहा - 'क्या कहा? भेड़िये हैं? होते तो बैल न चौंकते?’

बूढ़े ने सर हिलाकर कहा - 'नहीं, भेड़िये जरूर हैं। खैर, वह हमसे दस मील पीछे हैं और हमारे बैल थक चुके हैं; लेकिन हमें पचास मील और जाना है।’ बूढ़े ने कहा - 'और मैं इन भेड़ियों को जानता हूं, पार साल इन्होंने कुछ कैदियों को खा लिया था और बेड़ियों और सिपाहियों की बंदूकों के सिवा कुछ न बचा। बंदूक भर लो!’

मैंने कमानों को तान के देखा, बंदूक तोड़ी, सब ठीक था।
‘बारूद की नई पोंगली भी निकाल के देख ले।’ मेरे बाप ने कहा।
‘बारूद की पोंगली,’ मैंने कहा, ‘मेरे पास तो पुरानी ही वाली है।’
तब बूढ़े ने मुझे गालियां देनी शुरू कीं, 'तू यह है, तू वह है।’
मैंने पूरा गड्डा उलट डाला; पर नई पोंगली कहीं नहीं थी।

मेरे बाप ने भी सब टटोला - ’तू झूठ बोलता है, तू भेड़ियों की औलाद, मैंने तुझे नई पोंगली दी थी!’ पर वह बारूद यहां कहीं नहीं थी। मेरे बाप ने मेरी पीठ पर कुहनी मारते हुए कहा, ‘शहर पहुंचकर मैं तेरी खाल उधेड़ दूंगा, शहर पहुंचकर...’ और इसी वक्त अचानक बैल एकदम रुककर पूंछ हिलाकर जोर से भागे। मैंने सुना मीलों दूर एक आवाज आ रही थी, बहुत धीमी, जैसे खंडहरों में भी आंधी गुजरने से आती है -

ह्वा आ आ आ आ आ आ आ आ!
‘हवा,’ मैंने सहम के कहा। ‘भेड़िये!’ मेरे बाप ने नफरत से कहा और बैलों को एक साथ किया। पर उन्हें मार की जरूरत नहीं थी। उन्हें भेड़ियों की बू आ गई थी और वे जी तोड़कर भाग रहे थे। दूर मैं एक छाटे-से काले धब्बे को हरकत करते देख रहा था। उस सैकड़ों मील के चपटे रेगिस्तानी बंजर में तुम मीलों की चीज देख सकते हो। और दूर पर उस काले धब्बे को बादल की तरह आते मैं देख रहा था।

बूढ़े ने कहा, जैसे ही वह नजदीक आ जाएं, मारो। एक भी तीर बेकार खोया तो मैं कलेजा निकाल लूंगा।’ और तब उन तीन लड़कियों ने एक दूसरे से चिपटकर टिसुए (आंसू) बहाना शुरू किया। ‘चुप रहो।’ मैंने उनसे कहा, ‘तुमने आवाज निकाली और मैंने तुम्हें नीचे ढकेला।’

भेड़िये बढ़ते हुए चले आते थे, हम लोग भूरी पथरीली धरती पर उड़ रहे थे, पर भेड़िये! बूढ़े ने लगामें छोड़ दीं और बंदूक संभालकर बैठा। मैंने कमान संभाली - मैं अंधेरे में उड़ती हुई मुर्गाबियों का शिकार कर सकता था और मेरा बाप - वह तो जिस चीज पर निशाना ताकता था, अल्लाह उसे भूल जाता था। कोई 400 गज पर मेरे बाप ने आगे वाले भेड़िये को गिरा दिया।

धाय! उसने नटों की तरह एक कलाबाजी खाई; और फिर दूसरी बिलकुल नटों की तरह। बैल पागल होकर भाग रहे थे, हवा में उनके मुंह का फेन उड़कर हमारे मुंहों पर मेह की तरह गिरता था; और वे रंभा रहे थे जैसे बंजारिनें ब्यानेवाली भैंसों की नकलें करती हैं। पर भेड़िये नजदीक ही आते जा रहे थे।

गिरे हुए भेड़ियों को वे बिना रुके खा लेते थे; वे उनके ऊपर तैर जाते थे। मेरे बाप ने मेरे कन्धे पर बंदूक की नली रख ली थी। धांय-धांय! (मेरी गरदन पर अब तक जले का दाग है।) मैंने भी 16 तीरों से 16 ही भेड़िये गिराये, बूढ़े ने 10 मारे थे, पर तब भी वह गोल बढ़ता ही आता था।

‘ले बंदूक ले!’ उसने कहा, ‘मैं बैलों को देखूंगा।’
उसका खयाल था कि बैल उससे भी तेज भाग सकते थे, पर यह खयाल गलत था। दुनिया के कोई बैल उससे तेज नहीं भाग सकते थे।
मैं बंदूक का भी निशाना खूब लगाता था, पर वह देशी जंग लगी बंदूक। खैर, वह लड़की उसे 5 मिनट में भर देती थी। बांदी अच्छी लड़की थी, वह बंदूक भरती थी, मैं निशाना मारता था - अचूक। मैंने दस और गिराए - धांय-धांय-धांय! जब सब बारूद खत्म हो गई तो भेड़िये भी कुछ हारे-से मालूम होते थे।

मैंने कहा, ‘अब वे पिछड़ गए।’
बूढ़ा हंसा - ’वह इतनी-सी बात से नहीं पिछड़ सकते। पर मैं मरते-मरते कह चलूंगा कि सात मुल्क के बंजारों में खारे सा खरा निशानेबाज नहीं है।’
मेरा बाप बुढ़ापे में बड़ा हंसोड़ हो गया था।

हां, तो भड़िये कुछ पीछे रह गए थे। उन्हें कुछ खाने को मिल गया था। ‘सप-सप-चट’ बैलों पर कोड़ा बोल रहा था कि पांच मिनट बाद ही उन्होंने फिर हमारा पीछा शुरू किया। वे हमसे 200 गज पर रह गए होंगे और बढ़ते ही आते थे। मेरे बाप ने कहा, ‘सामान निकालकर फेंको, गड्डा हल्का करो।’

‘एकबारगी ठोकर खाकर गड्डा चरकराकर चला। पूरे बंजारों में यह गड्डा अफसर था और सब सामान फेंककर हमने उसे फूल सा हल्का कर दिया था और कुछ देर तो हम भेड़िये से दूर निकलते मालूम हुए, पर तुरन्त ही वे फिर वापस आ गए।

बड़े मियां ने कहा, ‘अब तो, एक बैल खोल दो।’
‘क्या?’ मैंने कहा, ‘दो बैल गड्डा खींच ले जाएंगे?’
उसने कहा, ‘अच्छा, तब एक नटनिया फेंक दो।’ मैंने उन तीन में से मोटी को ही उठाया और गड्डे के बाहर झुलाकर फेंक दिया।

हा! ग्वालियर की नटनिया, उसे दांत लगा दो तो वह भी भेड़ियों का मुकाबला कर ले! पहले तो वह भागी, पर यह जानकर कि भागना बेकार है, घूमकर खड़ी हो गयी और सामनेवाले भेड़िये की टांगें पकड़ लीं। पर इससे भी क्या फायदा था। एकदम वह नजर से ओझल हो गयी। जैसे किसी कुएं में गिर पड़ी हो। गड्डा हल्का होकर और आगे बढ़ा, पर भेड़िये फिर लौट आए।

‘दूसरी फेंको’, बड़े मियां ने कहा। पर अब की मैंने कहा, ‘आखिर क्या हम लोग सैर करने के लिए मारे-मारे फिरते हैं, एक बैल न खोल दो।’
मैंने एक बैल खोल दिया। वह पीठ पर पूंछ रखकर चिंघाड़ता हुआ भागा और गोल उसके पीछे मुड़ गया। मेरे बाप की आंखों में आंसू भर आए। ‘बड़ा असील बैल था, बड़ा असील बैल था...’ वह बुदबुदा रहा था।

‘हम बच तो गए’, मैंने कहा। पर तभी, ह्वा आ आ आ आ आ आ! गोल वापस आ गया था। ‘आज कयामत का दिन है’, मैंने कहा और बैलों को इतना भगाया कि मेरी हथेली में खून छलछला आया।

पर भेड़िये पानी की तरह बढ़ते चले आ रहे थे और हमारे बैल मरके गिरना ही चाहते थे। ‘दूसरी लड़की भी फेंको!’ मेरे बाप ने चीखकर कहा।
इन दोनों में बांदी भारी थी और कुछ सोचकर कांपते हाथों वह अपनी चांदी की नथनी उतारने लगी थी और मैंने शायद बताया नहीं, मुझे वह कुछ अच्छी भी लगती थी।

इसलिए मैंने दूसरी से कहा, ‘तू निकल!’ पर उसको तो जैसे फालिज मार गया था। मैंने उसे गिरा दिया और वह जैसे गिरी थी, वैसे ही पड़ी रही। गड्डा और हल्का हो गया और तेज दौड़ने लगा। पर पांच ही मील में भेड़िये फिर वापस आ गए। बड़े मियां ने गहरी सांस ली, माथा पीट लिया - हम क्या करें, भीख मांग के खाना बंजारों का दीन है, हम रईस बनने चले थे...

मैंने बांदी की तरफ देखा, उसने मेरी तरफ। मैंने कहा, ‘तुम खुद कूद पड़ोगी कि मैं तुम्हें धकेल दूं?’ उसने चांदी की नथ उतारकर मुझे दे दी और बांहों से आंखें बंद किए कूद पड़ी। गड्डा बिलकुल हवा सा उड़ने लगा। वह पूरे बंजारों में गड्डों का अफसर था।

पर हमारे बैल बेहद थक गए और बस्ती तक पहुंचने के लिए अब भी 30 मील बाकी थे। मैं बंदूक के कुंदे से उन्हें मार रहा था; पर भेड़िये फिर लौट आए थे।

मेरे बाप के मुंह से पसीना टपकने लगा - ’लाओ, दूसरा भी बैल खोल दें।’
मैंने कहा, ‘यह मौत के मुंह में जाना है। हम लोग दोनों मारे जाएंगे, हमें या तुम्हें किसी को तो बचना चाहिए।’

‘तुम ठीक कहते हो।’ उसने कहा, ‘मैं बूढ़ा आदमी हूं। मेरी जिंदगी खत्म हो गई। मैं कूद पड़ूंगा।’
मैंने कहा, ‘हिरास मत होना। मैं जिंदा रहा तो एक-एक भेड़िये को काट डालूंगा।’

‘तू मेरा असील बेटा है! मेरे बाप ने कहा और मेरे दोनों गाल चूम लिये। उसने अपने दोनों हाथों में बड़ी-बड़ी छूरियां ले लीं और गले में मजबूती से कपड़ा लपेट लिया।
‘रुको,’ उसने कहा - ’मैं नए जूते पहने हूं, मैं इन्हें दस साल पहनता; पर देखो, तुम इन्हें मत पहनना, मरे हुए आदमियों के जूते नहीं पहने जाते, तुम इन्हें बेच देना।’

उसने जूते खींचकर गड्डे पर फेंक दिए और भेड़ियों के बीचोबीच कूद पड़ा। मैंने पीछे घूमकर नहीं देखा, लेकिन थोड़ी देर मैं उसे चिल्लाते सुनता रहा - यह ले! यह ले! भेड़िये की औलाद! भेड़िये की औलाद! और फिर चट-चट! चट-चट! मैं ही किसी तरह भेड़ियों से बच गया।

खारू ने मेरे डरे हुए चेहरे की तरफ देखा, जोर से हंसा और फिर खखारकर बहुत सा जमीन पर थूक दिया।

‘मैंने दूसरे ही साल उनमें से साठ भेड़िये और मारे।’ खारू ने फिर हंसकर कहा। पर उसके साथ ही उसकी आंखों में एक अनहोनी कठिनता आ गयी, और वह भूखा, नंगा उठकर सीधा खड़ा हो गया।
००० 
(हंस, अप्रैल 1938)

मीडिया, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और सांप्रदायिक राजनीति / विजय शंकर सिंह

बिहार के पत्रकार, मनीष कश्यप पर तमिलनाडु सरकार ने रासुका, एनएसए के अंतर्गत कार्यवाही की है। मनीष पर आरोप है कि, उसने एक फर्जी वीडियो शूट किया जिसमें उसने तमिलनाडु में बिहारी श्रमिकों और अन्य उत्तर भारतीय कामगारों को मारते पीटते हुए दिखाया गया। जैसे ही इसकी जांच हुई, सचाई सामने आने लगी, और यह पूरा फर्जीवाड़ा खुल गया। तमिलनाडु पुलिस ने मनीष कश्यप के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया और उसकी गिरफ्तारी हुई और उसे रिमांड प्राप्त कर के, तमिलनाडु लाया गाया। अभी भी वह जेल में है। पुलिस की तफ्तीश चल रही है। इसी बीच यह खबर आई कि तमिलनाडु सरकार ने, मनीष कश्यप को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, NSA के अंतर्गत निरुद्ध कर दिया। इसका विरोध पत्रकार बिरादरी ने भी किया और अन्य लोगों ने भी। तमिलनाडु सरकार के, एनएसए में निरुद्ध करने के पीछे अपने तर्क और प्रमाण होंगे, जो वह न्यायालय में जरूरत पड़ने पर प्रस्तुत करेंगे। मुझे अब तक की अप टू डेट स्थिति का पता नहीं है इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूं। 

अब आइए एनएसए के प्राविधान पर। एनएसए कोई आपराधिक धारा नहीं है, बल्कि यह एक निरोधात्मक प्राविधान है। इसे प्रिवेंटिव एक्शन preventuve action कहा जाता है। यह किसी बड़े अपराध या ऐसा अपराध को सार्वजनिक जीवन को अस्त व्यस्त ध्वस्त करके लोकव्यवस्था के लिए, खतरा बन जाय, को रोकने के लिए पुलिस की संस्तुति पर, जिला मजिस्ट्रेट द्वारा लगाया जाता है और जिस पर एनएसए तामील किया जाता है, उसे, क्यों वह निरुद्ध किया जा रहा है, यह सब विंदुवार बताया भी जाता है। जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी एनएसए के आदेश की पुष्टि राज्य सरकार पंद्रह दिन में करती है। राज्य सरकार की पुष्टि के बाद, उक्त एनएसए निरुद्ध आदेश को संबंधित हाईकोर्ट में चुनौती दी जाती है। हाईकोर्ट, एनएसए के अंतर्गत निरुद्ध व्यक्ति को भी तलब करती है और साथ ही संबंधित जिले के जिला मजिस्ट्रेट और एसएसपी को भी। अदालत डीएम/एसएसपी से निरुद्धि का आधार पूछती है और जब संतुष्ट हो जाती है तो एनएसए के निरुद्धि आदेश को, अनुमोदित कर देती है, अन्यथा उसे रद्द कर निरुद्ध व्यक्ति को रिहा कर देती है। यह एक कानूनी प्रक्रिया है। 

अब सवाल उठता है एनएसए किस आधार पर लगाया जाय। इसके लिए एक शब्द आता है पब्लिक ऑर्डर यानी लोक व्यवस्था। एक और बहुचर्चित शब्द है, लॉ एंड ऑर्डर यानी कानून व्यवस्था। दोनो में मूल फर्क यह है कि लोक व्यवस्था का भंग होना एक बड़ी कानून व्यवस्था टूटने का मामला है जबकि कानून व्यवस्था का दायरा सीमित है। एनएसए के लिए पुलिस को यह साबित करना पड़ता है कि, जिस व्यक्ति के खिलाफ एनएसए लगाया जा रहा है, उसके कृत्यों से शहर या जिले की लोक व्यवस्था भंग हो रही है या हो सकती है। इस संभावना की पुष्टि के लिए उस व्यक्ति के भाषण, ट्वीट, उससे जुड़ी घटनाएं, आदि के रिकॉर्ड रखे जाते हैं और उसे शासन तथा अदालत में प्रस्तुत भी किया जाता है। यह भी बताया जाता है कि, इन कृत्यों से जगह जगह कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो रही है। इसलिए लोक हित में इस व्यक्ति की निरुद्धि आवश्यक है जिससे बिगड़ रही लोक व्यवस्था को संभाला जा सके। यह भी एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया है।  

यहां यह देखा जाता है कि, किस घटना, साजिश या कृत्य से, लोक व्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, यदि एक ही समय, एक ही थाने पर, एक व्यक्ति की हत्या और गौकशी की अलग अलग सूचनाएं पहुंचेंगी तो पुलिस की प्राथमिकता क्या रहेगी? हत्या सबसे संगीन अपराध है जाहिर है वही प्राथमिकता में होगा। लेकिन गौकशी, भले ही संगीन अपराध न हो, लेकिन सांप्रदायिक कारणों से, यह घटना,  हत्या की घटना से भी तेजी से, सांप्रदायिक तनाव पैदा कर दंगा फैला सकती है और उसका असर व्यापक रूप से, लोक व्यवस्था पर पड़ सकता है, इसलिए व्यावहारिक रूप से यह घटना, प्राथमिकता में पहले आयेगी। यदि हत्या के घटनास्थल पर एक थाने की पुलिस पहुंचेंगी तो, गौकशी के घटना स्थल पर पूरा जिला और गंभीर मामला हुआ तो डीएम एसएसपी भी पहुंचेंगे। क्योंकि गौकशी की त्वरित प्रतिक्रिया तेज और व्यापक होगी। 

हत्या का मुल्जिम पकड़ा जाय या तात्कालिक रूप से न भी पकड़ा जाय तो भी उसका असर उतना नहीं होगा जो गौकशी के मुल्जिमों की देर से गिरफ्तारी पर होगा। क्योंकि गौकशी का उद्देश्य ही है, समाज में सांप्रदायिक तनाव और दंगा फैलाना, जबकि हत्या का उद्देश्य निजी रंजिश से लेकर अन्य कुछ भी हो सकता है। यदि वह हत्या किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति या  घटना का प्रतिफल नही है तो, उसका बहुत असर पड़ता भी नहीं है। पर इसके विपरीत गौकशी की घटना का व्यापक असर पड़ता है। हाल ही में आगरा में हिंदू महासभा के एक कार्यकर्ता द्वारा गौकशी की घटना का संदर्भ लिया जा सकता है। जैकशी का मुल्जिम, प्राथमिकता के आधार पर गिरफ्तार भी होगा, और उसके खिलाफ एनएसए में भी कार्यवाही होगी क्योंकि उसके जमानत पर छूटने के बाद भी, समाज में तनाव फैलने की संभावना बनी रहती है। क्योंकि उसका उद्देश्य ही समाज में तनाव फैलाना है। जबकि हत्या के मामले में, अमूमन ऐसा कम होता है। 

लोक व्यवस्था के भंग होने का मुख्य आधार ही व्यापक सांप्रदायिक और जातिगत भेदभाव और इस आधार पर होने वाले दंगे हैं। समाज में अमन चैन बना रहे और साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रहे, यह हर सरकार की प्राथमिकता होती है और यही प्राथमिकता राजनीतिक दलों और जागरूक नागरिकों की भी होनी चाहिए। लेकिन यहां भी बीजेपी की सरकारें एक ऐसी अपवाद स्वरूप सरकार है जो जानबूझकर ऐसे तत्वों को सरक्षण देती है जो दंगाई मानसिकता के हैं और दंगे फैलाते हैं। पिछले कुछ समय से देश में सांप्रदायिक तनाव फैलाने में, राजनीतिक लोग तो लिप्त हैं ही, साथ ही मीडिया भी है। कुछ न्यूज चैनल, जैसे, न्यूज 18, आजतक ज़ी न्यूज़, सुदर्शन सहित कुछ चैनल और इनके एंकर जैसे, अमीश देवगन, अमन चोपड़ा, सुधीर चौधरी, सुरेश चाहवानके आदि हैं जिनके पिछले दस साल के प्रोग्राम का अध्ययन किया जाय तो उनका घृणित उद्देश्य साफ तौर पर सामने आ जायेगा। साफ तौर पर यह दिख रहा है कि, यह देश का सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने और समाज में नफरत फ़ैलाने की एक सोची समझी साजिश है। यह न्यूज चैनल इस अपराध में शरीके जुर्म है। 

इस नफरत की साजिश का लाभ किसे मिल रहा है या इस आधार पर कौन अपना जनाधार बढ़ा है, यह किसी से छिपा नही है। मेरा सीधा मानना है कि इसका लाभ आरएसएस बीजेपी की सोच और विचारधारा को मिल रहा है। सत्ता को मिल रहा है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार बार हेट स्पीच पर नाराजगी दिखाने के बावजूद भी इन दंगाई मानसिकता के चैनल और एंकर के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई। चैनल के मालिकों को भी इस आरोप से अलग नहीं किया जा सकता है कि उन्हें यह पता नही कि उनके मिडिया चैनल समाज में क्या जहर फैला रहे हैं। आप संदर्भ के लिए सुदर्शन न्यूज़ की क्लिपिंग और यति नरसिंहानंद जैसे लोगों के बयानों का अध्ययन कर सकते हैं। 

देश की खुफिया एजेंसियों चाहें वह, आईबी हो या स्थानीय स्तर पर एलआईयू, इन सबका दायित्व है कि वे ऐसे वक्तव्यों, हरकतों और गतिविधियों पर नजर रखें और वे न सिर्फ, ऐसी गतिविधियों पर नजर रखते हैं बल्कि, इसकी सूचना भी अपने उच्चाधिकारियों और सरकार को देते रहते हैं। सांप्रदायिकता के जहर और विभाजनकारी राजनीति की हम बहुत बड़ी कीमत भारत विभाजन के रूप में चुका चुके हैं, और आजादी के बाद होने वाले कई बड़े दंगों में भी यह दुख समाज ने भोगा है। 

हाल ही में राम नवमी के जुलूस में जो शर्मनाक घटनाएं देश भर में हुई, उनकी परतें खुलने लगी है। चाहे वह दंगा बिहार शरीफ का हो, या जमशेदपुर का, या हावड़ा का, या वह आगरा की गौकशी का मामला हो, हर जगह हिंदू महासभा और बजरंग दल के लोगों के नाम सामने आ रहे हैं। वे पुलिस द्वारा गिरफ्तार भी किए जा रहे हैं और उनके खिलाफ कार्यवाही भी की जा रही है। आखिर इन दंगाइयों को शह कहां से मिल रही है और यह किस संगठन के साथ नाभिनाल से जुड़े हैं, इसे हम सब समझ रहे है। और इन दंगाइयों का एक और उद्देश्य है, देश में जो वर्तमान आर्थिक हालात, जैसे, बेरोजगारी, महंगाई, बैंको की पूंजीपतियों द्वारा संगठित लूट, विदेशी निवेश के नाम पर मनी लांड्रिंग कर के लाए जा रहे काले धन का निवेश, सार्वजनिक संपत्ति की को पूंजीपतियों द्वारा हड़पना, आदि आदि, उससे लोगों का ध्यान भटकाना और आप के घर परिवार के युवाओं के दिमाग में विभाजनकारी विचारधारा और सांप्रदायिकता से पगा हुआ जहर भर देना ताकि वे हवाओं में भी सामाजिक सद्भाव के बजाय, सांप्रदायिक और जातिगत विद्वेष ही ढूंढे। यह एक बड़ा खतरा है जो आप के घर में पैठ रहा है। इससे बचें।

(विजय शंकर सिंह)


Monday, 10 April 2023

बीसीआई में फर्जी डिग्री के सत्यापन के लिए सुप्रीम कौन ने कमेटी गठित की / विजय शंकर सिंह

फर्जी डिग्री के मामले में पीएम नरेंद्र मोदी पर तरह तरह के आक्षेप लग ही रहे हैं, और दिन प्रतिदिन, उनकी डिग्री पर संशय उठ भी रहा है, पर आज फर्जी डिग्री से जुड़ा एक और मामला सामने आया, जिस पर देश के सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया और डिग्री के वेरिफिकेशन के लिए, एक कमेटी का गठन कर दिया। फर्जी डिग्री रखना, उस आधार पर कोई भी घोषणा करना और शपथपत्र दाखिल करना, न केवल नैतिक रूप से गलत है बल्कि यह धोखाधड़ी, फ्रॉड, कूट दस्तावेज का निर्माण, और जानबूझकर झूठा शपथपत्र देने का भी एक संज्ञेय और दंडनीय अपराध है। यह अपराध, आईपीसी की धाराओं 420/467/468/471 के अंतर्गत एक दंडनीय अपराध है और यह गंभीर अपराधों की श्रेणी में आता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने, कानूनी पेशे से संबंधित एक महत्वपूर्ण दिशा में कदम उठाते हुए,  10 अप्रैल 2023, सोमवार को अधिवक्ताओं के डिग्री प्रमाणपत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया की देखरेख के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया है। लम्बे समय से यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अंतर्गत पंजीकृत वकीलों में से कुछ की कानून की डिग्रियां फर्जी हैं, और उन्ही फर्जी डिग्रियों के आधार पर कुछ वकील, धड़ल्ले से, वकालत भी कर रहे हैं, और उसी आधार पर हलफनामा आदि भी दे रहे हैं। 

जांच पड़ताल के लिए, बनी इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के दो पूर्व न्यायाधीश शामिल होंगे। शीर्ष अदालत ने, वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह को भी समिति के सदस्य के रूप में नामित किया गया है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया बीसीआई, को भी इस समिति में तीन सदस्यों को नामित करने के लिए कहा गया है। इस प्रकार इस समिति में, सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज, हाइकोर्ट के दो रिटायर्ड जज, और सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ एडवोकेट होंगे तथा बार काउंसिल ऑफ इंडिया की तरफ से तीन अन्य वकील होंगे। यह कमेटी कुल, आठ सदस्यों की होगी। बीसीआई द्वारा नामित सदस्यों के बारे में अभी जानकारी नहीं मिल पाई है। 

भारत के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने अधिवक्ताओं के सत्यापन की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को ध्यान में रखते हुए यह आदेश पारित किया है।  समिति को सुविधाजनक तिथि पर काम शुरू करने और 31 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा गया है। पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि, "न्याय के प्रशासन की अखंडता की रक्षा के लिए, स्टेट बार काउंसिल में पंजीकृत अधिवक्ताओं का उचित सत्यापन, अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। यह सुनिश्चित करना, देश के प्रत्येक वास्तविक अधिवक्ताओं का कर्तव्य है कि, वे यह सुनिश्चित करने की मांग में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ सहयोग करें कि, वकालत, लीगल प्रैक्टिस, के प्रमाण पत्र का आधार, लॉ की डिग्री का, प्रमाण पत्र के साथ विधिवत सत्यापन किया जाय। जब तक कि, यह सत्यापन, समय-समय पर नहीं किया जाता है, तो इस बात का बड़ा खतरा हो सकता है कि न्याय का प्रशासन, स्वयं एक गंभीर संकट में पड़ जाएगा।"  

निश्चित रूप से फर्जी डिग्री के बढ़ते चलन और उस पर की जा रही प्रशासनिक अकर्मण्यता से, यह व्याधि एक संक्रामक रूप ले रही है। बात सिर्फ बीसीआई और वकालत के पेशे की नहीं है, बात शिक्षा और अन्य विभागों में भी अक्सर फर्जी डिग्री की बात सामने आने की है। कुकुरमुत्ते की तरह से उग गए शिक्षा संस्थान, ऐसी डिग्रियों के ही बल पर जी खा रहे हैं। उनकी शिकायत पर कार्यवाही भी होती है, पर यह व्याधि कम भी नहीं हो रही है। सुप्रीम कोर्ट का बीसीआई के लाइसेंस शुदा वकीलों की डिग्री के सत्यापन का फैसला एक बड़ा और जरूरी फैसला है। यह काम आसान भी नहीं है, पर पुरानों के सत्यापन के साथ साथ, नए रजिस्ट्रेशन की अर्जियों पर, बिना उनका संबंधित विश्वविद्यालय से सत्यापन कराए, पंजीकरण किया ही नहीं जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बीसीआई के बयान पर चिंता व्यक्त की कि "बिना सत्यापन के वकील कुछ राज्य बार काउंसिल के सदस्य तक बन गए हैं और ऐसे व्यक्तियों ने न्यायिक अधिकारियों के पदों पर भी काम किया हो सकता है।" 
पीठ ने अपने फैसले में, जोर देकर कहा कि "न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंच उन व्यक्तियों को नहीं दी जा सकती है जो वकील होने का दावा करते हैं लेकिन उनके पास वास्तविक शैक्षणिक योग्यता या डिग्री प्रमाण पत्र नहीं है।"

बीसीआई ने यह भी कहा है कि, "डिग्री प्रमाणपत्रों के सत्यापन में विश्वविद्यालयों द्वारा मांगे गए शुल्कों के कारण सत्यापन प्रक्रिया में  कठिनाई आती हैं।" बीसीआई की इस कठिनाई को, ध्यान में रखते हुए, अदालत ने निर्देश दिया कि, "सभी विश्वविद्यालयों और परीक्षा बोर्डों को बिना शुल्क लिए डिग्री की सत्यता की पुष्टि करनी चाहिए। सभी विश्वविद्यालय और परीक्षा बोर्ड शुल्क लिए बिना डिग्रियों की सत्यता की पुष्टि करेंगे और राज्य बार काउंसिल द्वारा मांग पर बिना किसी देरी के कार्रवाई की जाएगी।"
 
इस मामले की शुरुआत साल 2015 में हुई थी जब, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने वास्तविक वकीलों की पहचान करने के लिए बीसीआई सर्टिफिकेट और प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (सत्यापन) नियम 2015 को अधिसूचित किया था, जो अदालतों और न्यायाधिकरणों के समक्ष सक्रिय रूप से मुकदमेबाजी कर वकीलों के संबंध में हैं। विभिन्न उच्च न्यायालयों के समक्ष, बीसीआई ने, नियमों को चुनौती दी और बाद में सभी मामलों को अंततः सर्वोच्च न्यायालय में, एक साथ सुनवाई के लिए, स्थानांतरित कर दिया गया। न्यायालय ने नवंबर 2022 में राज्य बार काउंसिलों को जारी किए गए बीसीआई, के निर्देश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एक वकील द्वारा दायर एक आवेदन में वर्तमान आदेश पारित किया, जिसमें याचिकाकर्ता ने दावा किया कि राज्य द्वारा की जा रही सत्यापन प्रक्रिया को बाधित करने से सत्यापन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बीसीआई के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने पीठ को बताया कि, "मंशा सत्यापन को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि डिग्री प्रमाणपत्रों की वैधता और वास्तविकता की पुष्टि किए बिना सत्यापन नहीं किया गया है।  कठिनाइयों का सामना तब करना पड़ा जब विश्वविद्यालयों ने डिग्री प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए फीस की मांग की।  इस पृष्ठभूमि में, बीसीआई ने डिग्रियों के सत्यापन की देखरेख के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति के गठन का सुझाव दिया।"
बीसीआई प्रमुख का यह तर्क उचित है कि, सत्यापन शुल्क की मांग के कारण इतना व्यापक सत्यापन करना एक कठिन कार्य है। अब सुप्रीम कोर्ट ने, सत्यापन के लिए राज्य को निर्देश दिया है। 

वकीलों की बढ़ती संख्या पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि "अधिवक्ताओं की संख्या, जो उस समय, साल 2015 में 16 लाख थी, वर्तमान में लगभग 25.70 लाख होने का अनुमान है। बीसीआई के बयान के अनुसार, 25.70 लाख अधिवक्ताओं में से, लगभग 7.55 लाख फॉर्म सत्यापन के उद्देश्य से प्राप्त हुए थे और 1.99 लाख घोषणा वरिष्ठ अधिवक्ताओं और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड से प्राप्त हुए थे।  इस प्रकार प्राप्त प्रपत्रों की कुल संख्या लगभग 9.22 लाख है।  इन आंकड़ों से, पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य बार काउंसिल में नामांकित अधिकांश अधिवक्ताओं ने अपने सत्यापन प्रपत्र जमा नहीं किए हैं।"
अधिकांश वकीलों ने सत्यापन के लिए फॉर्म ही नही भरे। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि, या तो वे फर्जी डिग्री वाले हैं या उन्होंने अभी तक सत्यापन फॉर्म भरे ही नही। इस प्रकार अभी अधिकांश वकीलों से सत्यापन फॉर्म प्राप्त ही नही हुए। बीसीआई ने यह आशंका जताई कि जिन वकीलों ने सत्यापन फॉर्म नहीं दिए हैं, वे वकालत करने के लिए योग्य नहीं हैं और ऐसे व्यक्तियों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें बाहर किया जाना चाहिए।

इसी संदर्भ में पीएम डिग्री से जुड़े एक मामले का उल्लेख करना भी समीचीन होगा जिसका फैसला अभी हाल ही में, गुजरात विश्वविद्यालय बनाम मुख्य सूचना आयुक्त सीआईसी के मुकदमे में दिया गया है। गुजरात हाईकोर्ट ने शैक्षणिक डिग्री के मामले को व्यक्तिगत मामला माना है, और उसे सार्वजनिक करने के खिलाफ अपना फैसला दिया है। यहीं यह सवाल उठता है कि यदि डिग्री बीसीआई या किसी संस्थान या चुनाव आयोग में हलफनामा देकर यदि सार्वजनिक पटल पर रख दी गई हो, और उस पर संशय हो तो क्या उस संशय का सार्थक समाधान नहीं किया जाना चाहिए? या उसी संशययुक्त डिग्री को ही, बिना उक्त आपराधिक कृत्य की संभावना को समाप्त किए, मान लिया जाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट का बीसीआई में पंजीकृत वकीलों की कानून की डिग्री के सत्यापन का आदेश और उसके क्रियान्वयन के लिए गठित कमेटी का निर्णय एक महत्वपूर्ण फैसला है। हालांकि यह काम इतना आसान नहीं है फिर भी बीसीआई को, नए पंजीकृत के लिए प्राप्त आवेदनों के डिग्री सत्यापन के कार्य को अनिवार्य कर देना चाहिए। जिससे नए पंजीकरण के आवदकों का सत्यापन, पंजीकरण के पहले हो जाय और इनका कोई बैकलॉग इकट्ठा न हो सके। 

(विजय शंकर सिंह)

Thursday, 6 April 2023

मो यान / भूख के वर्ष

(चीन के नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक हैं। उनके द्वारा 2012-में पुरस्कार प्राप्ति के अवसर पर दिये गये वक्तव्य का एक अंश):

मेरी सबसे दर्दनाक स्मृति उस समय की है ,जब मैं और मां सहकारी खेत की बालियों से गेहूं निकाल रहे थे। तभी चौकीदार आ गया।इसे देखकर गेहूं चुराने वाले तितर-बितर हो गए थे लेकिन मां के पैर बंधे हुए थे, वह भाग नहीं सकती थी। लंबे -तड़ंगे चौकीदार ने उन्हें पकड़कर इतनी जोर का तमाचा जड़ा था कि वह जमीन पर गिर गई थीं और फिर उनका सारा गेहूं छीनकर वह सीटी बजाता हुआ आगे निकल गया था।कटे होंठ के साथ जमीन पर बैठी असहाय मां का यह दृश्य जैसे मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा। बरसों बाद बूढ़ा हो चुका वह चौकीदार जब  बाजार में दिखा था तो मां ने मुझे उस पर हाथ उठाने से रोका था।' जाने दो' उन्होंने कहा था '।' उस दिन जिस ने इसने मुझे मारा था और यह, एक ही आदमी नहीं है। '

----- तब (बचपन.में) हमारे जेहन में सिर्फ एक ही सादा सहज ख्याल चक्कर लगाया करता था कि कहां से और किस तरह किसी खाने की चीज का जुगाड़ किया जाए। भूख से बेहाल कुत्तों के गिरोह की तरह पेट में डालने लायक किसी भी पदार्थ की टोह में हवा को सूँघते, सड़कों और गलियों पर आवारा भटकते। बहुत सी ऐसी चीज़ें, जिन्हें मुंह में डालने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, हमारे प्रिय व्यंजनों में से थीं । पेड़ों से पत्तियां तोड़कर खाना हमारा शगल था और जब पत्तियाँ नहीं बचती थीं तो  हम पेड़ की छाल और आखिरकार तने को दाँत मारना शुरू कर देते थे।दुनिया के किसी इलाके के पेड़ों ने हमारे गाँव के पेड़ों जितनी यातना नहीं झेली होगी। लेकिन इस विचित्र आहार से हमारे दाँत ढीले होने की जगह और मजबूत और छुरियों की तरह पैने होते चले गए ।कोई चीज उनके सामने टिक नहीं सकती थी।

मेरे बचपन के दोस्तों में से एक बड़ा होकर बिजली मिस्त्री बन गया। उसके औजारों के थैले में प्लास और कैंची नहीं होते थे। वो पेंसिल जितने मोटे तार को भी अपने दांँतों से ही काट डालता था। मेरे दाँत भी काफी मजबूत हैं लेकिन अपने दोस्त जितने नहीं वरना मैं भी शायद लेखक की जगह एक आला दर्जे का इलेक्ट्रीशियन बन चुका होता।

1961 की गर्मियों में हमारे प्राइमरी स्कूल के अहाते में चमकते हुए कोयलों का एक ढेर पहुंचाया गया था। हम चीजों से इतने नावाकिफ थे कि हमें पता ही नहीं चला कि यह क्या है! हममें से एक शरारती लड़के ने एक कोयला उठाया और उसका एक टुकड़ा तोड़ कर मुंह से डालना शुरु कर दिया। उसके चेहरे के चटखारे भरे भावों से लगता था कि कोई लज़ीज़ चीज़ उसके हाथ लग गई है। हम सब भी दौड़े और अपने -अपने टुकड़ों को झपट कर उन्हें चबाने लगे। हम जितना चबाते, उतना ही उसका स्वाद बेहतर लगता। यहां तक कि आखिरकार उस कोयले के स्वाद की कोई सीमा ही नहीं रही।गांव के कुछ लोगों ने जब देखा कि हम किसी चीज को काफी शिद्दत के साथ खा रहे हैं तो वे दौड़े चले आए।उन्होंने भी वही शुरू किया, जो हम सब कर रहे थे।

 इस अप्रत्याशित दावत पर रोक लगाने के लिए जब इस स्कूल के मुख्याध्यापक वहां पहुंचे तो उन्हें अच्छी खासी धक्का-मुक्की और भगदड़ का सामना करना पड़ा। पेट में पहुंचने के बाद उन कोयलों का क्या हश्र हुआ, यह मुझे अब याद नहीं है लेकिन उसका स्वाद मैं कभी भूल नहीं सकता। इस सारे किस्से से आप कहीं यह न समझ बैठें कि उन दिनों हमारी जिंदगी में कोई आनंद नहीं था बल्कि बहुत सी चीजों से हमें भरपूर मजा मिलता था। इस सूची में सबसे ऊंचा स्थान उन चीजों को चखने का था, जिन्हें इससे पहले हमने भोजन की परिभाषा में शामिल नहीं किया था।

- - - - जाहिर है कि भूखे पेट रहने मात्र से कोई लेखक नहीं बन सकता लेकिन भूख और साधनहीनता ने मुझे दूसरे लोगों के मुकाबले जीवन की एक गहरी समझ विकसित करने का मौका दिया। खाली पेट व्यक्ति के लिए सामाजिक सरोकार, कारोबार और प्रेम कोई मायने नहीं रखते। मुझे स्वयं भूख के कारण ही अपना आत्मसम्मान. खोना पड़ा।भूख की ही वजह से मैं गली के किसी कुत्ते की तरह अपमानित हुआ और आखिरकार  भूख ने ही  भयानक प्रतिशोध की भावना के साथ रचनात्मक लेखन का रास्ता दिखाया।

(अनुवाद जितेन्द्र भाटिया।'सोचो क्या साथ जाएगा'शीर्षक विश्व साहित्य संकलन के चौथे खंड से)।

गुआन मोये (जन्म 17 फरवरी 1955) एक चीनी उपन्यासकार और लघु कथा लेखक हैं। वे अपने साहित्यिक उपनाम मो यान से जाने जाते है और 2012 के साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित है। इस श्रेणी मे पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे पहले चीनी नागरिक बने; हालांकि 2000 के विजेता गौ चिंजयान का जन्म चीन में हुआ पर वे फ्रांसीसी नागरिक है। 

(विजय शंकर सिंह) 

Wednesday, 5 April 2023

एक लोकतांत्रिक गणराज्य की मजबूती के लिए स्वतंत्र प्रेस का होना, महत्वपूर्ण है ~ सुप्रीम कोर्ट / विजय शंकर सिंह

चाहे मामला राफेल में अनिल अंबानी को, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, एचएएल से तयशुदा ठेका रद्द कर, सौंप देने का मामला हो, या पेगासस जासूसी उपकरण की खरीद का, या सत्ता विरोधी मीडिया चैनेल का की जुबां बंदी क, अदालतों में, सरकार ने अपने बचाव में, दो तर्क ज़रूर रखे, एक राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा और दूसरा, अदालत में, अपने तर्क, सीलबंद लिफाफे में रखने की रणनीति। राफेल घोटाला बिना जांच पड़ताल के ही पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई, सदस्य राज्यसभा, द्वारा, सीलबंद लिफाफे के आधार पर ही, यह निर्णीत कर दिया गया कि, राफेल की खरीद में कोई प्रक्रियागत त्रुटि नहीं है। पर राफेल मामले में असल सवाल, कि किन परिस्थितियों में एचएएल से ठेका वापस  लेकर, ब्रिटेन की अदालत में स्वतः दिवालिया घोषित, अनिल अंबानी को यह ठेका दे दिया गया, जिनके पास खिलौने वाले हवाई जहाज बनाने का भी अनुभव नहीं था। यह सवाल अब भी अनुत्तरित है। यह एक बड़ा घोटाला भी है।

इसी प्रकार आज तक सरकार यह नहीं बता पाई कि, पेगासस मालवेयर क्यों और किस उद्देश्य से खरीदा गया, और उस मालवेयर से उस महिला कर्मचारी की भी जासूसी क्यों की गई, जिसके यौन शोषण का आरोप तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई पर लगा था। जैसे ही यह मुकदमे निर्णीत हुए, रंजन गोगोई, इस पाश से मुक्त भी हो गए। पेगासस मामले में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जांच कमेटी से, सरकार ने कोई सहयोग नहीं किया और एक सीलबंद लिफाफा इस मुकदमे में भी दिया गया था। पेगासस का रहस्य अब भी अनसुलझा है। इधर, एक खबर यह भी आ रही है कि, पेगासस से भी अधिक आधुनिक और तकनीकी रूप से उन्नत जासूसी उपकरण खरीदने की बात, सरकार कहीं चला रही है।

इसी तरह, मलयालम के एक मीडिया चैनेल का, सुरक्षा कारणों से हवाला देते हुए, सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने, लाइसेंस रद्द कर दिया। वह मीडिया चैनेल, सरकार की इस कार्यवाही के खिलाफ, केरल हाईकोर्ट गया लेकिन वहां भी सरकार ने सुरक्षा का हवाला देते हुये, बंद लिफाफा में अपनी बात रखी और सरकार, केरल हाईकोर्ट में अपना मुकदमा जीत गई। इसकी अपील उक्त मीडिया चैनेल ने, सुप्रीम कोर्ट में की और सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया चैनेल की अपील स्वीकार कर के, सूचना और प्रसारण मंत्रालय को, चार सप्ताह में लाइसेंस जारी करने का निर्देश दिया।

स्वतंत्र पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े इस महत्वपूर्ण  मुकदमे के फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने, 5 अप्रैल को मलयालम समाचार चैनल मीडिया वन (MediaOne) पर केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए टेलीकास्ट प्रतिबंध के खिलाफ फैसला सुनाया है। प्रेस पर सरकारी दखलंदाजी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला, न्यायिक इतिहास में, एक अहम स्थान रखता है। शीर्ष अदालत ने चैनल चलाने वाली कंपनी माध्यमम ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड (एमबीएल) द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका के निस्तारण में यह फैसला सुनाया है, जिसमें सूचना और प्रसारण मंत्रालय (IB minisrtry) द्वारा, एमबीएल के प्रसारण लाइसेंस को नवीनीकृत नहीं करने के फैसले को बरकरार रखने के, केरल उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी। गृह मंत्रालय द्वारा, सुरक्षा मंजूरी के अभाव में चैनल का लाइसेंस नवीनीकृत नहीं किया जा रहा था।  चैनल के संपादक प्रमोद रमन और,  पत्रकारों के संगठन, केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने भी, केरल हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए, दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं।सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे और अधिवक्ता हरीस बीरन ने, चैनल का पक्ष अदालत में रखा।

लम्बे समय से चली आ रही, सरकार द्वारा अपने पक्ष में, सीलबंद लिफाफे में दिए गए दस्तावेजों पर इस मुकदमे में भी, सुप्रीम कोर्ट ने  सवाल उठाए। यह सील बंद लिफाफा सिस्टम, पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के समय, राफेल मामले में सुनवाई के समय से शुरू हुई थी, और इसकी बराबर आलोचना भी होती रही है। इस मामले में भी सरकार ने सीलबंद लिफाफे में अपनी बात कह कर देने की परंपरा, जारी रखी तो, सुप्रीम कोर्ट ने सीलबंद कवर प्रक्रिया की सख्त आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत सीलबंद कवर दस्तावेजों के आधार पर केंद्र के फैसले को बरकरार रखने के उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण की भी भारी आलोचना की है।

अदालत ने कहा, "उच्च न्यायालय ने सुरक्षा मंजूरी से, इनकार करने के कारणों का खुलासा नहीं किया। इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि उच्च न्यायालय के दिमाग में क्या था, जिससे यह माना जा सके कि मंजूरी से इनकार उचित था या नहीं। यह देखने के बावजूद कि, मामले की प्रकृति और गंभीरता कितनी है, फाइलों से, सब कुछ स्पष्ट नहीं है। सील कवर प्रक्रिया, जिसके बाद एकल न्यायाधीश और डिवीजन बेंच ने, अपीलकर्ता के उपचार के अधिकार को आवश्यक रूप से प्रदान किया है, जिसे संविधान के दिल और आत्मा के रूप में वर्णित किया गया है और यह संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। सुरक्षा मंजूरी से इनकार (लाइसेंस नवीनीकरण से इंकार) करने के कारणों का, गैर-प्रकटीकरण, जो लाइसेंस को नवीनीकृत करने की अनुमति से इनकार करने का एकमात्र आधार बताया गया है, और केवल एक सील कवर में अदालत को प्रासंगिक सामग्री का खुलासा, प्रदान किया गया है। यह अपीलकर्ता की संविधान के तहत प्रक्रियात्मक गारंटी नहीं है। अपीलकर्ताओं को उपचार तक पहुंचने का अधिकार, उच्च न्यायालय द्वारा एक औपचारिक आदेश के माध्यम से, इस मामले में अस्वीकार कर दिया गया है।"
यह कहना है, भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ का।

एमबीएल का लाइसेंस नवीनीकरण, सिर्फ इस लिए रोका गया कि, उसका प्रसारण, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। लेकिन यह खतरा क्या है और किस प्रकार का है, इस पर गृह मंत्रालय ने कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं कहा है। अदालत ने कहा, "केवल राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील देने से ही, राज्य के अन्य कर्तव्य को निष्पक्ष रूप से कार्य करने से नहीं रोका जा सकता है।"
यानी सुरक्षा की आड़ में लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार कम नहीं किए जा सकते हैं। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा लिखे गए फैसले में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, "राज्य केवल राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील देकर नागरिकों के अधिकारों को प्रदान करने से इनकार नहीं कर सकता है।"

आगे वे कहते हैं, "यदि राज्य निष्पक्ष रूप से कार्य करने के अपने कर्तव्य का परित्याग करता है, तो इसे न्यायालय के समक्ष, तथ्यों और तर्कों सहित, उचित ठहराया जाना चाहिए। सबसे पहले, राज्य को, खुद ही संतुष्ट होना चाहिए।"
अदालत ने आगे कहा कि "राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएं वाजिब हैं। राज्य नागरिकों के अधिकार से वंचित करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील का उपयोग कर रहा है। सीबीआई और आईबी जैसी जांच एजेंसियों की रिपोर्ट को, गोपनीयता के नाम पर, खुलासे से पूरी छूट नहीं दी जा सकती।"

फैसले में विशेष रूप से "भारतीय संघ द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के दावे को उठाए जाने वाले जिद भरे तरीके" के बारे में भी टिप्पणी की गई है। अदालत आगे कहती है, "केवल यह दावा करने के अलावा कि उच्च न्यायालय के समक्ष दायर हलफनामे और हमारे समक्ष प्रस्तुतियाँ दोनों में राष्ट्रीय सुरक्षा का तत्व शामिल है, भारत संघ ने यह समझाने का कोई प्रयास नहीं किया कि गैर-प्रकटीकरण, राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में कैसे होगा? इस अदालत द्वारा दोहराए जाने के बावजूद भारत संघ ने इस दृष्टिकोण को अपनाया है। उस न्यायिक समीक्षा को केवल राष्ट्रीय सुरक्षा वाक्यांश के उल्लेख के कारण,  बाहर नहीं किया जा सकता है। राज्य, राष्ट्रीय सुरक्षा का उपयोग एक उपकरण के रूप में, नागरिकों को प्रदान किए जाने वाले, नागरिक अधिकारों और अन्य उपायों से इनकार करने के लिए कर रहा है।  कानून के तहत, यह कानून के शासन के अनुकूल नहीं है "

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी), न्यायपालिका, राज्य आदि की आलोचना पर चैनल की रिपोर्टों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि "यह पत्रकारिता प्रतिष्ठान विरोधी है।"
इस पर, शीर्ष अदालत ने कहा कि "प्रसारण लाइसेंस के नवीनीकरण को मना करने के लिए यह कोई उचित आधार नहीं हैं। एक लोकतांत्रिक गणराज्य की मजबूती के लिए स्वतंत्र प्रेस का होना, महत्वपूर्ण है। लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्र प्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्य के कामकाज पर प्रकाश डालता और नज़र रखता है। प्रेस का कर्तव्य है कि वह सच बोलें और नागरिकों के समक्ष, कठिन तथ्यों को रखे।"
अदालत की यह टिप्पणी, सुसंगत है कि, "लोकतंत्र को सही दिशा में तैयार करने वाले विकल्पों को चुनने में, एक स्वतंत्र प्रेस उन्हें सक्षम बनाता है। प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नागरिकों को उनके नागरिक और मौलिक अधिकारों से वंचित कर सकता है। प्रेस पर प्रतिबंध, सामाजिक आर्थिक राजनीति से लेकर राजनीतिक विचारधाराओं तक के मुद्दों पर एक समरूप दृष्टिकोण लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा करेगा।"

शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि, "चैनल को केवल इसलिए "सत्ता विरोधी" नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसने सरकार की नीतियों की आलोचना की थी। मीडिया चैनल के आलोचनात्मक विचारों, और सरकार की नीतियों पर उनके दृष्टिकोण को, स्थापना विरोधी नहीं कहा जा सकता है। इस तरह की शब्दावली का उपयोग अपने आप में ही, एक अपेक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, कि, सत्ता को पक्षपाती प्रेस चाहिए न कि सत्ता प्रतिष्ठान का आलोचक प्रेस। सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा की गई, लाइसेंस नवीनीकरण न करने की कार्रवाई, मीडिया चैनल के साथ साथ, अपने स्वतंत्र विचारों के आधार पर एक मीडिया चैनल के संवैधानिक रूप से बोलने का अधिकार का उल्लंघन  है और यह कृत्य, विशेष रूप से प्रेस की स्वतंत्रता पर विपरीत प्रभाव पैदा करता है।"
सुप्रीम कोर्ट की पीठ  ने कहा कि "किसी चैनल के लाइसेंस का नवीनीकरण न करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रतिबंध है और इसे केवल अनुच्छेद 19(2) के आधार पर ही लगाया जा सकता है।"

चैनल पर यह भी आरोप था कि, उसके जमात ए इस्लामी से संबंध रहे हैं। इस पर पीठ का कहना है कि, "चैनल के शेयरधारकों का जमात-ए-इस्लामी हिंद से कथित जुड़ाव चैनल के अधिकारों को प्रतिबंधित करने का कोई वैध आधार नहीं है।  किसी भी सूरत में इस तरह के लिंक को दिखाने के लिए कोई सामग्री अदालत के समक्ष सरकार द्वारा नहीं रखी गयी है।  साथ ही, जब जमात ए इस्लामी हिंद, एक प्रतिबंधित संगठन नहीं है, तो यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि संगठन के साथ संबंध राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करेगा।"

अदालत ने जमात ए इस्लामी हिन्द जेआइएच से संबंधों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, "एमबीएल को जेआईएच से जोड़ने के लिए फ़ाइल में सबूत का एकमात्र टुकड़ा एमबीएल के शेयरों में कथित निवेश का है। इसके समर्थन में, आईबी ने शेयरधारकों की एक सूची प्रस्तुत की है। हालांकि, उन्हें जेआईएच से जोड़ने वाले रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं मिला है।  इस प्रकार, यह आरोप कि, एमबीएल, जेआइएच से जुड़ा हुआ है, एक भ्रामक आरोप है। क्योंकि, जेआइएच, (JeIH) एक प्रतिबंधित संगठन नहीं है और यह निष्कर्ष निकालने के लिए, अदालत के समक्ष कोई ऐसी सामग्री नहीं है कि जेआइएच के हमदर्दों द्वारा, मीडिया चैनल में किया गया, निवेश भारत की सुरक्षा को प्रभावित करेगा। और दूसरी बात, भले ही यह स्वीकार कर लिया जाए कि  जेईआईएच के समर्थकों द्वारा निवेश राज्य की सुरक्षा को प्रभावित करेगा, यह साबित करने के लिए कोई सामग्री नहीं है कि शेयरधारक जेआईएच के हमदर्द हैं। ऊपर की चर्चा के मद्देनजर, सुरक्षा मंजूरी से इनकार करने के उद्देश्य का कोई वैध लक्ष्य या उचित उद्देश्य नहीं है।".

शीर्ष अदालत ने यह भी आगाह किया है कि "राष्ट्रीय सुरक्षा के दावे हवा में नहीं किए जा सकते हैं और इसके समर्थन में भौतिक तथ्य होने चाहिए।  इसमें कहा गया है कि, यदि कम प्रतिबंधात्मक साधन उपलब्ध हैं और अपनाए जा सकते हैं तो सीलबंद कवर प्रक्रिया नहीं अपनाई जानी चाहिए।"
इस प्रकार, कोर्ट ने मध्यमम ब्रॉडकास्टिंग और अन्य अपीलकर्ताओं की अपीलों को स्वीकार कर लिया और सूचना प्रसारण मंत्रालय को चार सप्ताह के भीतर लाइसेंस का नवीनीकरण करने का निर्देश दिया।  15 मार्च, 2022 को, न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया था, जिसमें चैनल को अपना संचालन जारी रखने की अनुमति दी गई थी, जब तक कि अंतिम निर्णय नहीं हो गया था, जिसे आज समाप्त कर दिया गया।

(विजय शंकर सिंह)