Friday, 10 February 2023

सुप्रीम कोर्ट ने हिंडनबर्ग मामले की पड़ताल के लिए, विशेषज्ञों की समिति गठन के बारे में संकेत दिया है / विजय शंकर सिंह

अडानी-हिंडनबर्ग मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार को भारतीय निवेशकों की सुरक्षा के बारे में चिंता व्यक्त की और नियामक तंत्र में सुधार के सुझावों पर केंद्र सरकार और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के विचार मांगे। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने नियामक ढांचे को मजबूत करने पर सुझाव देने के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन का भी प्रस्ताव दिया।  

पीठ दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अमेरिका स्थित शॉर्टसेलिंग फर्म हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बारे में जांच की मांग की गई थी, जिसने अडानी समूह की कंपनियों के शेयर की कीमतों को प्रभावित करके शेयर बाजार में हलचल मचा दी थी।  पीठ ने मामले को सोमवार (13 फरवरी) के लिए स्थगित कर दिया है और भारत के सॉलिसिटर जनरल को मंत्रालय के निर्देश के बाद वापस आने के लिए कहा है।

मामला संज्ञान में आते ही सीजेआई चंद्रचूड़ बेंच में अपने साथियों जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जेबी पारदीवाला के साथ करीब पांच मिनट तक चर्चा में रहे.  चर्चा के बाद, सीजेआई ने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, जो सेबी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे:

"यह सिर्फ एक खुला संवाद है। वे अदालत के सामने एक मुद्दा लाए हैं। चिंता का विषय यह है कि हम भारतीय निवेशकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करते हैं? यहां जो हुआ वह शॉर्ट-सेलिंग था। संभवत: सेबी भी इसकी जांच कर रहा है। कृपया बताएं  आपके अधिकारी भी यह कोई जादू-टोना नहीं है जो हम करने की योजना बना रहे हैं। मान लीजिए कि शॉर्ट-सेल के परिणामस्वरूप, शेयरों का मूल्य गिर सकता है। खरीदार को अंतर का लाभ मिलता है। यदि यह छोटे पैमाने पर हो रहा है, कोई परवाह नहीं करता। लेकिन अगर यह बड़े पैमाने पर होता है, तो कुछ रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय निवेशकों को होने वाला कुल नुकसान कई लाख करोड़ रुपये का होता है। हम कैसे सुनिश्चित करें कि भविष्य में हमारे पास मजबूत तंत्र हैं?  क्‍योंकि आज पूंजी भारत से बाहर आ-जा रही है। हम भविष्‍य में कैसे सुनिश्चित करें कि भारतीय निवेशक सुरक्षित रहें? बाजार में अभी हर कोई है। कहा जाता है कि नुकसान दस लाख करोड़ से अधिक का है। हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि  वे सुरक्षित हैं? हम यह कैसे सुनिश्चित करें  भविष्य में नहीं होता है?  हम सेबी के लिए किस भूमिका की परिकल्पना करते हैं?  उदाहरण के लिए, एक अलग संदर्भ में, आपके पास सर्किट ब्रेकर हैं।"

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, 
"मेरे लिए तुरंत जवाब देना थोड़ी जल्दबाजी होगी। ट्रिगर बिंदु (हिंडनबर्ग) रिपोर्ट थी, जो हमारे क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर थी। ऐसे नियम हैं जो, इन सब चिंताओं से निपटते हैं। हम भी चिंतित हैं। सेबी भी स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रहा है।"

इसके बाद CJI ने एक समिति गठित करने का सुझाव दिया। सुझावों में से एक, कुछ समिति बनाने का है ... 
"हम सेबी या नियामक एजेंसियों पर कोई संदेह नहीं डालना चाहते हैं। लेकिन सुझाव व्यापक विचार प्रक्रिया है ताकि कुछ इनपुट प्राप्त किए जा सकें। और फिर  सरकार इस बात पर विचार कर सकती है कि क्या क़ानून में कुछ संशोधन की आवश्यकता है, क्या नियामक ढांचे के लिए संशोधन की आवश्यकता है। एक निश्चित चरण के बाद हम नीति के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करेंगे, लेकिन एक तंत्र होना चाहिए जो ऐसा नहीं करता है।  यह भविष्य में नहीं होगा। यह वह चुनौती है, जिसका सामना सरकार को करना है। हमें एक तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है जो यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा।"

 CJI ने जारी रखा, 
"मेरे साथी जस्टिस नरसिम्हा का एक सुझाव है, मौजूदा शासन की मंशा के बारे में सोमवार को वापस आकर बताए कि सरकार क्या चाहती है।  मौजूदा व्यवस्था को कैसे मजबूत किया जाए और क्या इससे प्रक्रिया में मदद मिलेगी?  क्या हम एक विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार कर सकते हैं, जिसे प्रतिभूति बाजार, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों और बुद्धिमान मार्गदर्शक व्यक्ति के रूप में एक पूर्व न्यायाधीश को लिया जा सकता है। अंतत: इनपुट तो डोमेन विशेषज्ञों से ही लेना होगा।  हमें भी ऐसी स्थिति पर  यकीन नहीं हो रहा है।  हम सिर्फ गौर से इस पर विचार कर रहे हैं।  हम सेबी को भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका दे सकते हैं।  हमें सेबी को मजबूत करने के बारे में भी सोचने की जरूरत है ताकि भविष्य में इससे निपटने के लिए बेहतर प्रावधान हों।  यह एक नई दुनिया है।  भारत वह नहीं है जो 1990 के दशक में था।  साथ ही शेयर बाजार एक ऐसी जगह है जहां केवल उच्च मूल्य के निवेशक ही निवेश करते हैं।  यह एक ऐसी जगह भी है जहां, बदलती कर व्यवस्था के साथ, मध्यम वर्ग का एक व्यापक वर्ग निवेश करता है।"

सॉलिसिटर जनरल (एसजी) ने कहा, 
"सेबी जो भी वैधानिक तंत्र है, इस मसले को देख रहा है। हम आप को संतुष्ट करने में सक्षम होंगे।"

इस पर सीजेआई ने कहा, 
"आप वित्त मंत्रालय के विशेषज्ञों के साथ भी परामर्श कर सकते हैं। हमें एक सार्थक उपाय और कार्ययोजना दें। यह एक महत्वपूर्ण मामला है। हम इस बात से भी सचेत हैं कि हम जो कुछ भी कह रहे हैं, वह शेयर बाजार को भी प्रभावित कर सकता है, जो काफी हद तक भावनाओं पर चलता है। इसलिए हम सतर्क हैं।"  
सीजेआई ने आगे कहा, 
"हालाँकि, याचिकाओं पर बहुत अच्छी तरह से विचार नहीं किया गया। कभी-कभी हमें इससे आगे जाने की आवश्यकता होती है।"

अदालत में इस विचार विमर्श के बाद, पीठ ने आदेश दिया:

"हमने सॉलिसिटर जनरल को यह सुनिश्चित करने के संबंध में अपनी चिंताओं का संकेत दिया है कि, देश के भीतर नियामक तंत्र को विधिवत रूप से मजबूत किया जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारतीय निवेशकों को अस्थिरता से बचाया जा सके, जैसा कि हाल के दो हफ्तों में देखा गया है बाजार बेहद अस्थिर है। बदले में मौजूदा नियामक ढांचे के उचित मूल्यांकन और निवेशकों के हित में नियामक ढांचे को मजबूत करने और प्रतिभूति बाजार के स्थिर संचालन की आवश्यकता होगी। हमने एसजी को यह भी सुझाव दिया है कि क्या वे समिति के सुझाव को स्वीकार करने के इच्छुक हैं। यदि भारत संघ सुझाव को स्वीकार करने के लिए इच्छुक है, तो समिति के गठन पर आवश्यक प्रस्तुतियाँ मांगी जा सकती हैं।"

एसजी ने आश्वासन दिया कि,
"सेबी स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रहा है।  हम स्पष्ट करते हैं कि उपरोक्त का उद्देश्य सेबी या किसी वैधानिक प्राधिकरण द्वारा अपने वैधानिक कार्यों के निर्वहन पर कोई प्रतिबिंब नहीं है।"

इस दो याचिकाएं दायर की गई है। एक विशाल तिवारी द्वारा और दूसरी एमएल शर्मा द्वारा। 

० विशाल तिवारी द्वारा, दायर जनहित याचिका में हिंडबर्ग रिसर्च रिपोर्ट की सामग्री की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में एक समिति के गठन की मांग की गई है।

० दूसरी याचिका एडवोकेट एमएल शर्मा द्वारा दायर की गई है और 'शॉर्ट-सेलिंग' को धोखाधड़ी का अपराध घोषित करने की मांग करती है। उक्त याचिका हिंडनबर्ग के संस्थापक नाथन एंडरसन के खिलाफ जांच की मांग करती है, "कृत्रिम क्रैशिंग की आड़ में शॉर्ट सेलिंग के माध्यम से निर्दोष निवेशकों का शोषण करने के लिए"।

24 जनवरी 2022 को अमेरिका स्थित हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें अडानी समूह पर अपने स्टॉक की कीमतों को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर हेराफेरी और अनाचार करने का आरोप लगाया गया था।  अडानी ग्रुप ने 413 पन्नों का जवाब प्रकाशित करके आरोपों का खंडन किया और यहां तक ​​कि इसे भारत के खिलाफ हमला करार दिया।  हिंडबर्ग ने एक प्रत्युत्तर के साथ यह कहते हुए पलटवार किया कि 'धोखाधड़ी को राष्ट्रवाद द्वारा अस्पष्ट नहीं किया जा सकता' और अपनी रिपोर्ट पर कायम रहे। हिंडबर्ग रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद से, अडानी के शेयरों में शेयर बाजार में गिरावट आई है।  स्टॉक की कीमतों में गिरावट के साथ, उलझे हुए समूह को अपने एफपीओ को वापस बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अब अगली तारीख, 13 फरवरी को निर्धारित की गई है। अब सरकार को यह बताना है कि क्या वह एक ऐसी समिति जिसमें, सुप्रीम कोर्ट के जज सहित वित्तीय और कॉरपोरेट मामलों के विशेषज्ञ होंगे के गठन और इस मामले की जांच पड़ताल के लिए सहमत है या नही। समिति का गठन, सुप्रीम कौन करेगा और सदस्यों का चयन भी वही करेगा। यह भी हो सकता है कि, सरकार  कोई दूसरा विकल्प सुझाए। लेख लाइव लॉ और बार एंड बेंच की खबर पर आधारित है। 

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

Thursday, 9 February 2023

कमलकांत त्रिपाठी / तुलसी का योगदान (5) तुलसी का रामचरितमानस और वाल्मीकीय रामायण का मूल स्वरूप - ख. पिछली पोस्ट—भाग 4, उपखंड क से आगे

इस विषय की पिछली पोस्ट (भाग-चार) में वाल्मीकीय रामायण के युद्धकाण्ड के अंतिम सर्ग (128) में फलश्रुति (ग्रंथ के माहात्म्य) का ज़िक्र आया था। इस सर्ग के अंत के कुल 19 (107-125) श्लोक रामायण की फलश्रुति का उल्लेख करते हैं। इस संदर्भ में स्पष्ट कर दिया जाये कि वाल्मीकीय रामायण में केवल दो काण्ड ही प्रक्षिप्त नहीं है, शेष काण्डों में भी बीच-बीच में प्रक्षिप्त जोड़े गये हैं। (देखें आगे)। उपरोक्त फलश्रुति तो पूरी की पूरी प्रक्षिप्त है। फलश्रुति के पहले ही श्लोक से स्पष्ट हो जाता है—

धर्म्यं यशस्यमायुष्यं राज्ञां च विजयावहम्‌। आदिकाव्यमिदं चार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम्‌॥107॥ 

[यह (महाकाव्य) धर्म, यश और आयु की वृद्धि करनेवाला तथा राजाओं के लिये विजयदायी है। यह आदिकाव्य है जिसे पूर्वकाल में ऋषि वाल्मीकि ने रचा था।] 

यह शायद वाल्मीकीय रामायण का एकमात्र श्लोक हो जिसमें किसी अन्य ने अपनी ओर से वाल्मीकि का नाम लेकर उनके बारे में कुछ लिखा है।   

इसके आगे के 18 श्लोक इस ग्रंथ को पढ़ने-सुनने से होनेवाले लाभों का पारंपरिक शैली में बढ़ा-चढाकर वर्णन करते हैं, जो यहाँ प्रासंगिक नहीं है। 

इन श्लोकों का प्रक्षेपक एक सरल, मासूम व्यक्ति लगता है। यह कार्य वह वाल्मीकि का स्थापन्न बनकर नहीं करता, स्वयं से पृथक्‌ उनका उल्लेख करता है, उन्हें पूर्वकाल का ऋषि बताता है. इस फलश्रुति से स्पष्ट हो जाता है कि इसके सन्निवेश के समय तक रामायण में कम से कम उत्तरकाण्ड नहीं था, अन्यथा, परम्परानुसार, फलश्रुति उत्तरकाण्ड के अंत में आती। तात्पर्य यह कि फलश्रुति उस आदिकाव्य की है जिसमें उत्तरकाण्ड शामिल नहीं है। स्पष्ट है कि यह ‘प्रक्षेपक’ शुरूआती दौर के प्रक्षेपकों में था, बल्कि असली अर्थ में प्रक्षेपक था ही नहीं। किंतु उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त मानने का एक ठोस आधार अवश्य दे गया। बाद में आनेवाले उत्तरकाण्ड के घाघ प्रक्षेपकों ने उस काण्ड के अंतिम सर्ग (111) में फलश्रुति का समावेश तो किया किंतु युद्धकाण्ड में पहले ही आ चुकी फलश्रुति को हटाना भूल गये (अकृत्य करनेवाले कोई न कोई निशान छोड़ ही जाते हैं)। परिणाम यह हुआ कि आज उपलब्ध
वाल्मीकीय रामायण  में दो-दो जगह फलश्रुति मिलती है जो परंपरा के सर्वथा विपरीत है। छोटी-मोटी फलश्रुतियाँ बीच में भी मिल जायेंगी लेकिन वे सही अर्थ में फलश्रुति नहीं हैं। यह भी हो सकता है कि लौकिक संस्कृत के आदिकवि वाल्मीकि के समय तक किसी भी कृति में झूठी-सही फलश्रुति का पुछल्ला जोड़ने की परंपरा ही न रही हो।  

क्या वाल्मीकि राम के समकालीन थे (अंत:साक्ष्य के परिप्रेक्ष्य में)?  

वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड के सर्ग-1 से सर्ग-4 तक वाल्मीकि-केंद्रित हैं। सर्ग-1 में नारद वाल्मीकि को संक्षेप में रामकथा सुनाते हैं। तब तक सीता के साथ लंका से लौटने पर राम को अयोध्या का राज्य प्राप्त हो चुका था। किंतु राम भविष्य में क्या करेंगे, नारद इसका भी एक ख़ाक़ा खींच देते हैं। भविष्य के संदर्भ में वे रामराज्य की अलौकिक सुव्यवस्था का वर्णन करते हैं, (भविष्य में) राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ किये जाने, ग्यारह हज़ार वर्षों तक राज्य किये जाने, और उसके बाद उनके परमधाम पधारने का उल्लेख करते हैं। रामायण (तब तक थी कहाँ?) की संक्षिप्त फलश्रुति भी बता देते हैं। सर्ग-2 में तमसा के तट पर निषाद द्वारा क्रौञ्च-युगल में नर क्रौञ्च का वध किये जाने पर मादा के चीत्कार से द्रवित वाल्मीकि में श्लोक छंद में (लौकिक संस्कृत की प्रथम कविता?) का स्फोट होता है—मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:। यत्‌ क्रौञचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्‌॥15॥ 

वाल्मीकि इस अनायास स्फुटित श्लोक से विस्मित-संभ्रमित, अपने शिष्य भरद्वाज के साथ इस पर वार्ता करते हुए आश्रम पहुँचते हैं। तभी आश्रम में ब्रह्मा का आगमन होता है। वाल्मीकि यह श्लोक ब्रह्मा को सुनाते हैं। ब्रह्मा उसे अपने संकल्प और प्रेरणा का परिणाम बताकर वाल्मीकि को नारद द्वारा बतायी गई रामकथा के आधार पर रामकाव्य का सृजन करने का आदेश देते हैं। तदुपरांत वाल्मीकि राम के ‘उदार चरित’ का प्रतिपादन करनेवाले, ‘मनोहर पदोंवाले’ महाकाव्य की रचना कर डालते हैं (कितना समय लगा, किसी  को जानने की जिज्ञासा ही नहीं हुई)। सर्ग-3 में इस  महाकाव्य की विषय-वस्तु का वर्णन है। सर्ग-4 में वाल्मीकि 24 हज़ार श्लोकों का रामकाव्य लव-कुश को ‘पढ़ाते’ हैं। लव-कुश मुनिमंडली में उसका गायन करते हैं और प्रशंसित होते हैं। फिर एक दिन जब वे अयोध्या के मार्गों पर रामायण का गायन करते हुए विचर रहे होते हैं, उन पर राम की नज़र पड़ जाती है। राम उन्हें बुलाकर सम्मानित करते हैं और अयोध्या के राज-दरबार में वीणा-वादन के साथ उनका गायन सुनते हैं। यह उत्तरकाण्ड में राम के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर लव-कुश द्वारा किये गये रामायण-गान से भिन्न है लेकिन बालकाण्ड में रामायण-गायन के इस प्रसंग का कोई संदर्भ उत्तरकाण्ड के गायन के प्रसंग में नहीं आता, जैसे राम उत्तरकाण्ड में पहली बार लव-कुश का रामायण-गान सुन रहे हों। प्रक्षेपण करनेवाले अन्विति का इतना ध्यान कहाँ रख पाते हैं!  

इन सर्गों में कहीं वाल्मीकि के अतिरिक्त किसी अन्य द्वारा इनके रचित होने का संकेत नहीं मिलता। जैसे वाल्मीकि ख़ुद अपनी कथा अपने लिए अन्यपुरुष का प्रयोग करते हुए लिख रहे हों।  

इस तरह वाल्मीकीय रामायण का प्रणयन कथा के आरम्भ में ही हो चुका होता है। किंतु आगे की कथा किसी स्थान विशेष पर विराजमान किसी के द्वारा वाचन का संकेत नहीं करती। सामान्य शैली में लिखी गई है जिससे आभास तो यही होता है कि वाल्मीकि क्रमवार उसकी रचना कर रहे हैं। 

किंतु सबसे बड़ी विसंगति यह है कि नारद के आगमन और रामकथा के संक्षिप्त वर्णन के समय तक राम बस अयोध्या लौटकर राज्य सँभाल पाये थे। आगे की कथा नारद ने भविष्यवाचन के रूप में बताई थी। उनके बताने के तत्काल बाद क्रौञ्च वध होता है, ब्रह्मा जी पधारते हैं, वाल्मीकीय रामायण की रचना होती है और लव-कुश द्वारा उसका गायन भी होने लगता है। उत्तरकाण्ड में सीता-निर्वासन तो राम द्वारा राज्य सँभाले जाने के काफ़ी समय बाद दिखाया गया है किंतु लवकुश रामायण लिखे जाने के तुरंत बाद कथा में कैसे प्रकट हो जाते हैं? अकारण नहीं कि विद्वानों ने उत्तरकाण्ड के साथ-साथ बालकाण्ड को भी प्रक्षिप्त माना है (आगे देखें), जो इस काण्ड के बिखरे हुए परस्पर असम्बद्ध प्रसंगों के अतिरिक्त इस अयुक्ति से भी सिद्ध होता है। वाल्मीकि को राम का समकालीन सिद्ध करने की गढंत का हिस्सा है यह।

राम और वाल्मीकि की समकालीनता (प्रक्षिप्त) उत्तरकाण्ड में पुन: प्रतिष्ठित होती है। इस संदर्भ में उत्तरकाण्ड के सर्ग-45, 49, 65, 66, 71, 72, 93, 94, 96, 97 और 98 द्रष्टव्य हैं।

सर्ग-45--सीता-केन्द्रित लोकनिन्दा से अवगत होने पर, तीनों भाइयों के साथ परामर्श करने और उनकी एकराय का कठोर राजधर्म के आधार पर खण्डन करने के बाद, राम लक्ष्मण से सीता को वन में छोड़ने के लिये कहते हैं। उन्हें हिदायत भी दे देते हैं—गंगा के उस पार, तमसा के तट पर वाल्मीकि का आश्रम है, उसी के निकट निर्जन वन में सीता को छोड़ देना (श्लोक-17,18)। 

सर्ग-49—निर्जन वन में सीता को अकेली विलाप करती देखकर कुछ ऋषिकुमारों ने वाल्मीकि को इसकी सूचना दी। तदुपरांत ऋषिकुमारों के साथ वाल्मीकि गंगातटवर्ती उस स्थान पर गये, दिव्यदृष्टि से सीता को पहचान लिया और उन्हें निर्दोष भी जान लिया। तब वे सीता को आश्रम के पास रहनेवाली कुछ तापसी स्त्रियों के पास ले आये, उन्हें सीता का परिचय दिया, उनके निष्पाप होने की बात बताई और देखभाल के लिए उन्हीं को सौंपकर आश्रम लौट आये (श्लोक--1-23)। 

सर्ग-65—राम की आज्ञा से लवणासुर का वध करने निकले शत्रुघ्न ने वाल्मीकि आश्रम में एक रात बिताई (श्लोक--2-7)। 

सर्ग-66—उसी रात सीता के जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए, मुनिकुमारों से समाचार पाकर वाल्मीकि तापसी स्त्रियों के आवास-खण्ड में स्थित सीता की पर्णकुटी तक गये, आवश्यक व्यवस्थाओं का निर्देश दिया और पुत्रों का नामकरण किया। ख़बर पाकर शत्रुघ्न भी रात में ही वहाँ  पहुँच गये (किंतु वल्मीकि के साथ नहीं) और सीता का दर्शन किया। 

सर्ग-71—लवणासुर के वध के बाद अयोध्या लौटते समय शत्रुघ्न पुन: वाल्मीकि-आश्रम पधारे, वहाँ भोजन किया, लव-कुश को बिना देखे रामायण का गायन सुना, सुनकर विस्मित भी हुये, किंतु गायकों के बारे में बिना कुछ पूछे, अपने शिविर लौट गये। 

सर्ग-72—प्रात:काल शिविर में नित्यकर्म से निवृत्त होकर शत्रुघ्न पुन: वाल्मीकि आश्रम आये किंतु इस बार भी सीता के पुत्रों—रामायण-गायकों--के बारे में कोई जिज्ञासा व्यक्त नहीं की। वाल्मीकि की आज्ञा लेकर वे अयोध्या के लिये प्रस्थान कर गये। 

लवणासुर अभियान में 12 साल लग गये थे। वाल्मीकि-आश्रम में शत्रुघ्न के दोनों पड़ावों के बीच के अंतराल में लव-कुश 12 वर्ष के हो गये थे, रामायण यादकर उसका गायन करने लगे थे। किंतु शत्रुघ्न ने दूसरे पड़ाव में न तो उनके बारे में कुछ पता लगाया, न ही वहाँ से अयोध्या लौटकर सीता और लव-कुश के बारे में राम को कुछ बताया। सात दिन अयोध्या में रहने के बाद, राम के आदेश पर, शत्रुघ्न यमुनातटवर्ती मधु प्रदेश की राजधानी मधुपुरी चले गये; राम ने उन्हें लवणासुर के वध के बाद उसके अत्याचारों से पीड़ित मधु प्रदेश के राजा के रूप में अभिषिक्त कर दिया था (सर्ग-63)। 

सर्ग-93—राम ने जब नैमिषारण्य में गोमती के तट पर अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया, वाल्मीकि अपने शिष्यों के साथ (अनाहूत, उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया?) उसमें पधार गये और ऋषियों के लिए बने कुटीरों के पास अपने और अपने शिष्यों के रहने के लिए पर्णकुटीर बनवाकर उन्हीं में रहने लगे। उन्होंने अपने दो हृष्ट-पुष्ट शिष्यों (लव-कुश) को आदेश दिया कि वे चारों ओर घूम-घूम कर रामायण काव्य का गायन करें। विशेषकर राम के निवास और यज्ञ के ऋत्विजों के सामने। उन्हें यह भी सिखा दिया कि यदि राम उनसे पूछें कि वे किसके पुत्र हैं तो उत्तर में अपने को केवल ‘महर्षि’ वाल्मीकि का शिष्य बताएँ। लव-कुश द्वारा तदनुरूप घूम-घूम कर वीणावादन के साथ संगीत की उत्कृष्ट और त्रुटिहीन पद्धति से किये जा रहे गायन को राम ने सुन लिया। भरत को उन्हें अठारह-अठारह हज़ार स्वर्णमुद्रायें पुरस्कार में देने को कहा। भरत उन्हें स्वर्णमुद्राएँ देने लगे तो दोनों ने अस्वीकार करते हुए कहा—हम वनवासी हैं, जंगली फल-मूल से निर्वाह करते हैं, सोना लेकर क्या करेंगे? तब राम ने दोनों से पूछा--जो महाकाव्य आप गा रहे हैं उसकी श्लोक-संख्या कितनी है, उसके रचयिता कौन हैं और वे कहाँ रहते हैं? दोनों ने बताया—इस महाकाव्य में 24 हज़ार श्लोक हैं, इसके रचयिता भगवान्‌ वाल्मीकि हैं और वे इस यज्ञ में पधारे हुए हैं। तब यज्ञ के आयोजन में आये राजाओं और ऋषियों के साथ बैठकर राम ने रामायण {जो राम की अपनी ही कथा थी, किंतु उसमें सीता की (प्रक्षिप्त) त्रासदी शामिल नहीं की गई थी} का विधिवत्‌ गायन सुना। 

सर्ग-95—इस तरह कई दिनों तक राम ऋषियों, राजाओं और वानरों  के साथ रामायण का गायन सुनते रहे। तब उन्होंने वाल्मीकि के पास शुद्ध आचार-विचारवाले दूतों के माध्यम से संदेश भेजा—यदि सीता का चरित्र शुद्ध है, उनमें किसी तरह का पाप नहीं है तो आपकी अनुमति लेकर वे कल सुबह यहाँ भरी सभा में आयें और जनसमुदाय के सामने “अपनी शुद्धता प्रमाणित कर मेरा कलंक दूर करें।” [कैसी दुराग्रही क्रूरता, प्रजा की नहीं, स्वयं राम की, जिन्होंने युद्धकाण्ड में बेहद अप्रिय दृश्य उपस्थित कर सीता को अग्निपरीक्षा के लिये बाध्य किया था--आ चुका है।]  वाल्मीकि ने संदेश सुनकर कहा—ऐसा ही होगा [वहाँ सीता कहाँ थीं? वाल्मीकि आश्रम से नैमिषारण्य के यज्ञस्थल तक वाल्मीकि और उनके शिष्यों के साथ सीता के भी आने का उपरोक्त सर्ग-93 में कोई उल्लेख नहीं है।] 

सर्ग-96—दूसरे दिन सुबह-सुबह राम यज्ञशाला पहुँचे और सभी ऋषियों को वहाँ बुलाया। कुछ बिना बुलाये, कौतूहलवश भी आ गये। महापराक्रमी राक्षस और महाबली वानर भी कौतूहलवश वहाँ इकट्ठे हो गये। नाना देशों से पधारे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हज़ारों की संख्या में आ जुटे। इस जमावड़े के बारे में सुनकर वाल्मीकि जी सीता को साथ लेकर शीघ्र वहाँ पहुँच गये। सीता तपस्विनी का गेरुआ वस्त्र पहने हुए थीं। वे वाल्मीकि के पीछे-पीछे, सिर झुकाये, दोनों हाथ जोड़े हुए चल रही थीं, उनकी आँखों से झर-झर आँसू गिर रहे थे, वे लगातार अपने हृदय में राम का ध्यान कर रही थीं। जनसमुदाय के बीच पहुँचकर वाल्मीकि राम से बोले—सीता उत्तम व्रत का पालन करनेवाली, धर्मपरायणा हैं। आपने लोकापवाद से डरकर उन्हें मेरे आश्रम के निकट छोड़ दिया था। लोकापवाद से भयभीत आपको सीता अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाना चाहती हैं। आप आज्ञा दें। ये दोनों कुमार कुश और लव सीता के गर्भ से जुड़वाँ उत्पन्न हुए हैं। ये आपके ही पुत्र हैं और आपके ही समान दुर्धर्ष वीर हैं। हे राम, मैं प्रचेता (वरुण) का दशम पुत्र हूँ। मेरे मुँह से कभी असत्य नहीं निकला है। मैं सत्य कहता हूँ, ये दोनों आपके ही पुत्र हैं। मैंने कई हज़ार वर्षों तक तपस्या की है। यदि सीता में कोई दोष हो तो मेरी तपस्या का फल नष्ट हो जाये.... (श्लोक 16-20)। अपनी सत्यनिष्ठा पर वाल्मीकि का वक्तव्य सर्ग के अंतिम श्लोक 24 तक जारी रहता है।

सर्ग-97—अपनी ज़िद पर अड़े राम ने वाल्मीकि को उत्तर दिया‌‌--आपके निर्दोष वचनों से मुझे सीता की शुद्धता पर पूरा विश्वास हो गया है। एक बार पहले भी (युद्धकाण्ड में अग्निपरीक्षा से) सीता की शुद्धता का प्रमाण मुझे प्राप्त हो चुका है जिसके कारण मैंने इन्हें अपने घर में स्थान दिया था। किंतु आगे चलकर घोर लोकापवाद उठा, जिससे विवश होकर मुझे इनका त्याग करना पड़ा। यह जानते हुये भी कि सीता सर्वथा निष्पाप हैं, मैंने केवल समाज के भय से इनका परित्याग किया। मैं यह भी जानता हूँ कि ये जुड़वाँ पुत्र  मेरे ही हैं। किंतु अब तो जनसमुदाय के बीच सीता के शुद्ध प्रमाणित होने पर ही मेरा इनसे (पुत्रों से) प्रेम हो सकता है...तब सीता ने कहा—राम के सिवा किसी अन्य पुरुष की ओर मेरा कभी चित्त तक नहीं गया (स्पर्श तो दूर की बात है)। यदि मैं मन, वाणी और कर्म से केवल राम की ही आराधना करती हूँ, उनके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष को नहीं जानती तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें (श्लोक-15-16)।  सीता के इस प्रकार पृथ्वी की शपथ लेते ही भूतल से एक दिव्य, सुंदर सिंहासन प्रकट हुआ। दिव्य रत्नों से विभूषित, महापराक्रमी नागों ने उसे सिर पर धारण कर रखा था। सिंहासन के साथ ही पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी अपने दिव्य रूप में प्रकट हो गईं। दोनों भुजाओं से उन्होंने सीता को अपनी गोद में उठाया और सिंहासन पर आसीन करा दिया। सिंहासन पर विराजमान सीता जब रसातल में प्रवेश कर रही थीं, देवगण आकाश से पुष्पवर्षा कर रहे थे। सीता का भूतल में प्रवेश देखकर वहाँ उपस्थित कुछ लोग हर्ष (?) में तो कुछ विषाद में डूब गये। दो घड़ी तक सभी मोहाच्छन्न-से जड़वत्‌ बने रहे (श्लोक-17-26)। अगले सर्ग में राम के शोक का विस्तार से वर्णन है। 

[उत्तरकाण्ड का उपरोक्त विवरण इतना ढीला-ढाला, असम्बद्ध और अयुक्तियों तथा अत्युक्तियों से भरा हुआ है कि संक्षेप में गम्य बनाने के लिये काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी है।]

ध्यान देने की बात यह है कि प्रक्षेपकों ने प्रबंध की अपनी अधकचरी क्षमता और असंतुलित दृष्टि के चलते राम को कहीं तो ईश्वरत्व से महिमामंडित कर अतिमानव बना दिया है तो कहीं औसत मनुष्यता से भी नीचे गिरा दिया है। युद्धकाण्ड में राम के कटु, कठोर किंतु प्रिय जीवनसाथी के प्रति मानवोचित असुरक्षा-भाव से उपजे संदेह, ईर्षा और अविश्वास के भावों ने सीता को अग्निपरिक्षा की ओर ठेला। इसके बावजूद उत्तरकाण्ड के प्रक्षेपकों ने पहले तो राम की आत्यंतिक रूप से    लोकापवाद-भीरु, एक कमज़ोर राजा की छवि गढ़ते हुए उनसे गर्भवती सीता का परित्याग कराया। फिर तथ्य को भलीभाँति जानते हुए भी राम को अपने असंवेदनशील दुराग्रह पर अड़ा हुआ दिखाकर उन्हें निरपराध सीता की मृत्यु का भी कारण बना दिया। उत्तरकाण्ड के शम्बूक प्रसंग में भी यही असंवेदनशीलता अपने अधिक क्रूर, अधिक अमानवीय संस्करण में दिखती है। यह वाल्मीकि की प्रबंध-शैली नहीं है। वाल्मीकि ने अतिप्राचीन काल से लोक में प्रचलित रामकथा के महत्वपूर्ण अंश राम की यात्रा को एक सुव्यवस्थित महाकाव्य का रूप प्रदान किया था। उनके लिये राम एक आदर्श पुरुष, आदर्श राजा हैं, लोकनायक हैं, जीवनमूल्यों की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं। किंतु हैं मनुष्य ही, मनुष्य की संवेदना, उसके राग-विराग, उसकी मानवीय कमज़ोरियों से शासित होते हैं, उनसे त्रुटियाँ भी होती हैं, उनका परिमार्जन भी करते हैं। अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक उनका यह चरित्र सुसंगत एकरूपता में प्रतिबिम्बित होता है। किंतु प्रक्षेपकों ने जहाँ बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड जोड़कर कथा के अभिप्रेत और उसकी अन्विति को नष्ट कर दिया, वहीं अन्य काण्डों में भी यत्र-तत्र छिटपुट श्लोक घुसाकर राम की वाल्मीकि-निर्मित आदर्श मनुष्य, उदात्त लोकनायक की छवि को भी ऊपर उठाकर या नीचे गिराकर खंडित कर दिया।

बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के उपरोक्त प्रसंग ही वाल्मीकि और राम को समकालीन बनाते हैं। ये प्रसंग ख़ुद वाल्मीकि द्वारा लिखे हुए होने का आभास देते हैं। किंतु सवाल है, वाल्मीकि अपने बारे में लिखते समय अन्य चरित्रों की तरह अन्य पुरुष में क्यों लिखेंगे? रचनाकार का, किसी भी कलाकर का, अपनी कलाकृति में अपने नाम का उल्लेख तक भारतीय परंपरा के प्रतिकूल है।  ऐसे में वाल्मीकि अपना ही गुणगान कैसे करेंगे? उत्तरकाण्ड के उपरोक्त प्रसंग में एक पात्र के रूप में वाल्मीकि की सत्यनिष्ठा पर लम्बा व्याख्यान चलता है जिसका केवल एक अंश ऊपर उद्धृत है।

मूल मुद्दा है क्या बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के उपरिवर्णित प्रसंगों के अनुरूप वाल्मीकि को राम का समकालीन माना जा सकता है? यह इतिहास और भाषाविज्ञान दोनों का विषय है। कट्टर परंपरावादियों को छोड़ दें तो मेरी जानकारी में इतिहास या भाषाविज्ञान का कोई विद्वान वाल्मीकि को राम का समकालीन नहीं मानता। यह ज़रूर सर्वमान्य है कि वाल्मीकि लौकिक संस्कृत के आदिकवि हैं। सवाल है लौकिक संस्कृत साहित्य की भाषा कब बनी?   

वैदिक युग की मानक भाषा केवल आर्ष ग्रंथों (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्‌) तक सीमित है। वैदिक युग की समाप्ति पर भिन्न-भिन्न क्षेत्र की प्राकृतों (पालि उनमें से एक क्षेत्र विशेष की प्राकृत थी) के साथ व्यवहार यानी बोलचाल में वैदिक भाषा से उद्भूत उसका एक परिवर्तित रूप प्रचलित हो गया था,  जो अलग-अलग इलाक़ों और अलग-अलग समुदायों में भिन्नता लिए हुए था। ऐसे में इस वैदिकेतर भाषा के विभिन्न रूपों को परिष्कृत और संस्कारित कर एक ऐसी समावेशी और सर्वमान्य मानक भाषा की निर्मिति का दुस्तर कार्य पाणिनि द्वारा सम्पन्न हुआ, जो पूरे देश के लिए हर तरह के साहित्य-सृजन, पठन-पाठन की भाषा बन सके। इसके अतिरिक्त देश भर के विद्वज्जनों के बीच ज्ञान-विज्ञान के आदान-प्रदान के लिये संपर्क भाषा का काम भी कर सके। वही भाषा संस्कृत है जो युगों-युगों के उत्कृष्ट सृजन को अपने भीतर सँजोये,  देश भर के संस्कृत विद्वानों के लिए आज भी गम्य, भारतीय प्रतिभा का कालातीत दर्पण बन गई। 

उपरोक्त भाषाई संक्रमण काल में वैदिक भाषा से उद्भूत जो भाषा व्यवहार में प्रचलित हो गई थी, उसमें एकरूपता लाने और उसके मानकीकरण के लिए उसे व्याकरण के अनुशासन में बाँधने का प्रयास पाणिनि के पहले भी हुआ था, किंतु संबंधित आचार्यों में मतैक्य नहीं था और किसी का मत सर्वमान्य नहीं हो सका था। पाणिनि ने उस संक्रमण काल की इस कठिन चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने विभिन्न शाखाओं की वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों का गहन अध्ययन कर उनकी शब्द-संपदा को सँजोया। फिर अपने समय में देश के भिन्न-भिन्न भागों में प्रचलित लोक-भाषा के भिन्न-भिन्न रूपों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। दूर-दूर तक यात्राएँ कर विभिन्न समुदायों के विभिन्न पेशों में लगे लोगों द्वारा व्यवहृत शब्दों का संकलन और उनकी व्युत्पत्ति का विश्लेषण किया। ब्राह्मण, क्षत्रिय, सैनिक, व्यापारी, किसान, रँगरेज, बढ़ई, रसोइए, मोची, ग्वाले, चरवाहे, गड़रिए, बुनकर, कुम्हार आदि अनगिनत पेशेवर लोगों के पेशों में विशेष रूप से प्रयुक्त होनेवाले शब्दों का एक विशाल भंडार एकत्रकर उन्होंने अपनी समावेशी दृष्टि से उन्हें सर्व-स्वीकार्यता और नियमबद्धता की कसौटी पर कसा। फिर वैदिक भाषा के यास्क-प्रभृत वैयाकरणों तथा प्रचलित भाषा के अपने से पहले के आचार्यों के मतों का सम्यक्‌ समाहार किया। वैदेकितर भाषा के एक पूर्व आचार्य शाकटायन का मत था कि सभी संज्ञा शब्द धातुओं में प्रत्यय लगाकर बने हैं। पाणिनि ने मोटे तौर पर इस प्रमेय को स्वीकार कर लिया किंतु इसमें इतना जोड़ दिया कि बहुत-से ऐसे शब्द लोकजीवन के व्यवहार में आ गए हैं जिनकी धातु और जिनमें लगे प्रत्यय पकड़ में नहीं आते। इस तरह विपुल सामग्री एकत्रकर उसके सूक्ष्म मनन-विश्लेषण के उपरांत उन्होंने आठ अध्यायों के अपने अद्भुत्‌ ग्रंथ अष्टाध्यायी की रचना की, जिसमें उपरोक्त सामग्री का ऐसा सांगोपांग और युक्तिसंगत विवेचन है कि प्रचलित भाषा के पाणिनि के पहले के व्याकरण-ग्रंथ अप्रासंगिक होकर लुप्त हो गए। उनके बारे में आज उतना ही ज्ञात है जितना अष्टाध्यायी में आए उनके संदर्भों में उपलब्ध है। 

पाणिनि के सूत्रों पर कात्यायन ने वार्तिक लिखे और पतंजलि ने अपना प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ महाभाष्य लिखा जिससे संस्कृत का सर्वमान्य रूप निखरकर सामने आया।

वाल्मीकि का रामायण इसी संस्कृत भाषा का आदि काव्य है।

दुर्भाग्य से पाणिनि का काल निर्विवाद रूप से तय नहीं है। विद्वानों ने उन्हें सातवीं ई.पू. से पाँचवीं ई. पू. के बीच रखा है। इससे इतना तो निश्चित है कि वाल्मीकीय रामायण की रचना पाँचवी शताब्दी ई. पू. के पहले नहीं हो सकती थी। यदि वाल्मीकि को पतंजलि (दूसरी शताब्दी ई. पू.) का भी परवर्ती माना जाये तब तो उनका काल पहली शताब्दी ई. पू. के पहले नहीं जा सकता। इन सीमाओं के भीतर वाल्मीकि का काल मोटे तौर पर पाँचवीं शताब्दी ई. पू. से पहली शताब्दी ई. पू. के बीच माना जा सकता है।

अधिकांश इतिहासकार रामकथा को आधुनिक अर्थ में इतिहास मानते ही नहीं। इधर कुछ इतिहासकारों ने इस दिशा में जो काम किया है उसके आधार पर रामायण काल को 2500 ई. पू. के बाद नहीं रखा जा सकता।

अस्तु, किसी भी व्याख्या या प्रमेय के अनुरूप, वाल्मीकि को राम का समकालीन सिद्ध करने का कोई तात्विक आधार नहीं बनता। यह प्रश्न रामायण के बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के ऊपर वर्णित वाल्मीकि और राम दोनों से एक साथ जुड़े हुए प्रसंगों के कारण उठा है। यह विसंगति इसी प्रमेय को पुष्ट करती है कि वाल्मीकि को राम का समकालीन चित्रित करनेवाले बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के ये प्रसंग बाद के प्रक्षिप्त है। वस्तुत: बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड पूरे के पूरे प्रक्षिप्त हैं। आगे इस पर और विचार होगा। 
(क्रमश:)

कमलकांत त्रिपाठी
© Kamlakant Tripathi

'कमलाकांत त्रिपाठी / तुलसी का योगदान (4) तुलसी का रामचरितमानस और वाल्मीकीय रामायण का मूल स्वरूप - क'.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/02/4.html


हिंडन बर्ग के पहले भी अडानी समूह में घोटालों के संकेत मिले थे, पर तब भी चुप्पी थी, आज भी है / विजय शंकर सिंह

हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट में, जो अडानी समूह पर, शेल कंपनियों द्वारा समूह में निवेश, मनी लांड्रिंग और स्टॉक मार्केट में ओवरप्राइसिंग सहित कुछ अन्य आरोप लगाए गए हैं, उनकी ओर भारत के भी कुछ पत्रकारों ने, जो आर्थिक मामलों में अध्ययन और रिपोर्टिंग करते रहते हैं, हिंडनबर्ग रिपोर्ट जारी होने के पहले भी लिखा है। इनमे, प्रमुख पत्रकार हैं, परंजय गुहा ठाकुरता, रवि नायर और सुचेता दलाल। परंजय गुहा ठाकुरता और रवि नायर ने, राफेल घोटाले पर भी एक बेहद शोधपूर्ण किताब लिखी है, जो उस सौदे की परत दर परत खोल कर रख देती है। परंजय गुहा ठाकुरता को तो, अडानी समूह के बारे में अपनी धोधपूर्ण रिपोर्ट के लिए, अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ी और उनका एक लेख, जो अडानी के घपलों और उस समूह द्वारा किए गए वित्तीय अनियमितताओं को उजागर करता है, इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकली वीकली जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से हटवा भी दिया गया। अब लेख हटवाने में कौन शामिल था, इस पर सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है और अनुमान लगाना मुश्किल भी नहीं है। 

वही पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता, ने ढाई साल बाद अपनी चुप्पी तोड़ी है और कलकत्ता के अंग्रेजी दैनिक अखबार द टेलीग्राफ को अपना एक इंटरव्यू दिया है। उनके खिलाफ मानहानि के एक मामले में, अहमदाबाद की एक अदालत ने एक जुबाबंदी आदेश जारी कर, उनसे कहा था कि, वे ऐसा कुछ भी न बोलें या न लिखें जो अडानी समूह के हितों के विरुद्ध हो। जुबानबंदी का यह आदेश अपने आप में ही, अडानी की सत्ता पर मजबूत पकड़ का संकेत दे देता है। अडानी के बारे में, न कुछ बोलें, न कुछ लिखें, और न कुछ पढ़ें, यह मंशा अदालत की थी या नहीं, यह तो नहीं बता पाऊंगा, पर यह मंशा सरकार की तो है ही, जो अब वह देश की सर्वोच्च पंचायत की हो गई। लोकसभा के स्पीकर ने, जो मुस्कुराते हुए, राहुल गांधी को सदन में, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर, बोलने दे रहे थे, ने राहुल के उन प्रश्नों और अंशो को सदन की कार्यवाही से उड़ा दिया, जो प्रधानमंत्री और अडानी के बीच के संबंधों पर थे। बिल्कुल एक आपराधिक गिरोह की मानसिकता से, जो अपराध का कोई सुबूत छोड़ना नहीं चाहता है। पर राहुल ने जो कहा है वह अब अधिकांश के स्मार्टफोन में पड़ा हुआ है। 

अंग्रेजी अखबार दे टेलीग्राफ से बात करते हुए, परंजय गुहा ठाकुरता ने कहा, "वे अदालत की अवमानना नहीं करना चाहते हैं, पर वे कुछ तथ्य रखेंगे।" परंजय गुहा ठाकुरता का अध्ययन अर्थशास्त्र में रहा है और वे आर्थिकी और कॉरपोरेट बैंकिंग आदि पर अध्ययन करते रहते हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने अडानी के तेजी से बढ़ते आर्थिक साम्राज्य और कारोबार का भी अध्ययन करना शुरू किया। गुहा ठाकुरता ने कहा कि "वह अडानी समूह के भविष्य के बारे में अनुमान लगाने के लिए तैयार नहीं हैं।" और टेलीग्राफ द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में उन्होंने केवल तथ्य बताए हैं। वे आगे कहते हैं, "एक पत्रकार के रूप में मेरी रुचि का क्षेत्र राजनीतिक अर्थव्यवस्था है...।  मैं 45 साल से पत्रकार हूं और अब मैं 67 साल का हूं।" 
जाहिर है, किसी भी क्षेत्र में जब कोई असामान्य हलचल होती है तो, सजग और सतर्क पत्रकारों की निगाह उसकी ओर स्वाभाविक रूप से पड़ती है। अडानी का भी उदय और विस्तार 2014 के बाद बहुत तेजी से हुआ और इस असामान्य तरक्की ने, एक राजनीतिक अर्थव्यवस्था का पत्रकार होने के नाते, परंजय का भी ध्यान उधर गया। 

अगर देश के कॉर्पोरेट के इतिहास पर कभी कुछ लिखा जाता है तो, अडानी समूह के हैरतअंगेज विकास पर जरूर लिखा जायेगा। आर्थिक इतिहासकार, उन कारणों और उन बाहरी प्रभावों के बारे में भी जरूर लिखेंगे, जिन्होंने इस समूह के अप्रत्याशित विस्तार में उत्प्रेरक और सहायक की भूमिका निभाई है, और उनमें भी, विशेषकर कॉर्पोरेट और सत्ता के गठजोड़ के बारे में। अडानी समूह का उदय, निःसंदेह शानदार रहा है। अडानी ग्रुप के बारे में 20 साल पहले बहुत कम ही लोगों ने सुना था। लेकिन, हिंडनबर्ग की रिसर्च रिपोर्ट आने तक, वे दुनिया के तीसरे सबसे अमीर आदमी और एशिया के सबसे अमीर आदमी बन चुके थे। अब, अपनी सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर गिरने के बाद वह उस स्थिति से नीचे गिर कर, बाइसवे स्थान तक खिसक गए पर, अब फिर थोड़ा ऊपर उठे है। इस प्रकार यदि उन्होंने, शानदार तरीके से विकास किया तो, उनकी गिरावट भी उतनी ही हैरान करने वाली रही है। परंजय अपने इंटरव्यू में बताते हैं, "24 जनवरी को हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट आने से पहले, हममें से बहुत कम लोगों ने, जिनमें मैं भी शामिल हूं, का सोचना था कि, अडानी समूह अब आगे नहीं बढ़ेगा।"

इस सवाल पर कि, "अडानी समूह, कई अन्य भारतीय कॉरपोरेट्स से अलग क्या करता है?" 
परंजय कहते हैं, "भारतीय अर्थव्यवस्था के इतने सारे क्षेत्रों और खंडों पर अडानी समूह के प्रभुत्व का तरीका और होना, वास्तव में असामान्य है। यह भारत का सबसे बड़ा वाणिज्यिक बंदरगाह ऑपरेटर है। यह भारत के पश्चिमी और पूर्वी तट, दोनों ही तरफ, एक दर्जन बंदरगाहों का संचालन करता है।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, इसके पास इज़राइल में हाइफ़ा पोर्ट और ऑस्ट्रेलिया में एबॉट पॉइंट है। अडानी निजी क्षेत्र के सबसे बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटरों में से एक है, CIL (कोल इंडिया लिमिटेड) के बाद कोयला खदानों के दूसरे सबसे बड़े ऑपरेटर है;  इसकी इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में खानें हैं।  यह भारत में कोयले के सबसे बड़े आयातक है, एनटीपीसी के बाद, कोयले से बिजली उत्पादन में, दूसरे, सबसे बड़े उत्पादक है.... अदानी समूह 15 साल पहले तराशे और पॉलिश किए गए हीरों का सबसे बड़ा एग्रीगेटर हुआ करता था - लेकिन बाद में यह समूह, इससे अलग हो गया,  जतिन मेहता के विनसम डायमंड्स सहित अन्य, जो विनोद अदानी की बेटी (विनोद, गौतम अदानी के भाई हैं) के ससुर हैं, द्वारा घोटाले में लिप्त होने के बाद। जतिन मेहता इस समय देश से बाहर है।  विनसम डायमंड्स कभी इनकी सबसे बड़ी गैर-निष्पादित संपत्तियों में से एक है।"
और यह सारी तरक्की और व्यापारिक साम्राज्य विस्तार, 2014 से अब तक के काल खंड का है, यानी वही काल खंड है जिसमे नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। 

अडानी समूह के बारे में, परंजय गुहा ठाकुरता ने सबसे पहले कब लिखा था, के सवाल पर, परंजय ने जो कहा, उसे पढ़िए, 
"2015 में मेरा लेख कुल मिलाकर उन सामग्रियों का संकलन था जो पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में थे।  
पहला लेख जिसे कोई एक्सक्लूसिव कह सकता है, अप्रैल 2016 में प्रकाशित हुआ था, जब मैं इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) का संपादक था। 
मैंने ईपीडब्ल्यू में कई लेख लिखे, जिसमें बिजली के मूल्य निर्धारण के बारे में चर्चा और, अडानी समूह द्वारा तराशे और पॉलिश किए गए हीरा व्यवसाय द्वारा लाभ के दुरुपयोग के आरोप भी शामिल हैं।  
जून 2017 में ईपीडब्ल्यू के लिए मैंने जो आखिरी लेख लिखा था, वह एसईजेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) में बिजली परियोजनाओं से संबंधित नियमों में बदलाव से संबंधित था।"
आगे वह कहते हैं, "इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे सरकार - वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय - 500 करोड़ रुपये से अधिक के सीमा शुल्क की वापसी के लिए एक शिकायत पर कार्रवाई कर रहे थे, कि, बिना पड़ताल के, शुल्क का भुगतान किया गया था या नहीं। यह मामला संसद तक भी पहुंच गया था।"

ईपीडब्ल्यू, एक प्रतिष्ठित मैगजीन है और जब उसमे परंजय गुहा ठाकुरता का लेख छपा तो अडानी समूह असहज हुआ और परंजय को, ईपीडब्ल्यू से इस्तीफा देना पड़ा। इस मामले में परंजय कहते हैं, 
"जैसा कि आप जानते हैं, मैंने जुलाई 2017 में इस्तीफा दे दिया था, जब ईपीडब्ल्यू के न्यासी बोर्ड ने कहा कि मुझे अपने नाम से लेख नहीं लिखना चाहिए, हालांकि, मेरे पूर्ववर्तियों ने यह कार्य किया था। मुझे बताया गया कि, वे एक सह-संपादक नियुक्त करने के बारे में सोच रहे थे;  कि मैंने एक संस्था की तरह प्रतिष्ठित प्रकाशन की परंपरा को नष्ट कर दिया है। मुझ से कहा गया कि, मैंने प्रकाशक, मुद्रक, लेखक और लेख के संपादक को कानूनी नोटिस का जवाब देने के लिए, एक वकील की निःशुल्क सेवा स्वीकार कर गंभीर अनुचित कार्य किया है और, अंत में, मुझे उस लेख को हटाने के लिए कहा गया और कहा गया कि,  जब तक वह लेख, हटा नहीं लिया जाता, तब तक कमरे से बाहर न जाने के लिए भी कहा गया।  मैंने अपने एक सहयोगी को बुलाया, लेख को हटा दिया। फिर, कागज का एक टुकड़ा लिया और अपना इस्तीफा लिख ​​दिया।"
आखिर क्या था उस लेख में कि ईपीडब्ल्यू जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका, जो खुद को एक संस्था के रूप में मानती है, एक कॉर्पोरेट पर लिखे गए एक शोधपूर्ण आलोचनात्मक लेख को छापने से डर गई थी। कॉर्पोरेट की जड़ें किस मजबूत सत्ता तक पहुंच रही थी, यह तब भी, किसी से नहीं छुपा था, और अब भी नहीं छुपा है। रस्सी खूंटे के बल पर तनती है!

सवाल पूछा गया, "क्या आपने अडानी समूह पर लिखना जारी रखा ?"
इस पर परंजय गुहा ठाकुरता ने कहा, "ईपीडब्ल्यू द्वारा हटाया गया लेख द वायर (समाचार पोर्टल) द्वारा प्रकाशित किया गया था।  मेरे समर्थन में कई लोग सामने आए, जिनमें प्रोफेसर अमर्त्य सेन और प्रसिद्ध विद्वान नोम चॉम्स्की शामिल हैं।  बाद में, अडानी समूह पर मेरे लेख, कुल मिलाकर अन्य प्रकाशनों, विशेष रूप से न्यूज़क्लिक में छपे।  मैं मई 2018 में न्यूज़क्लिक का सलाहकार बना।"
ईपीडब्ल्यू ने तो फिर उनका लेख नहीं छापा पर अन्य समाचार पोर्टल पर परंजय का लेख छपता रहा। 

इन लेखों के कारण, इन पर, अदालतों में मानहानि के मुकदमे दर्ज हुए। इन मुकदमों के बारे में, वे कहते हैं, 
"मैं भारत का एकमात्र नागरिक हूं, जिसके खिलाफ गौतम अडानी के नेतृत्व वाली कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने मानहानि के छह मामले दायर किए हैं, जो वर्तमान में कानून की अदालतों में लंबित हैं। इनमें से दो मामले गुजरात के मुंद्रा में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष हैं, दो अहमदाबाद, गुजरात की अदालतों में, एक राजस्थान के बारां जिले में और एक दिल्ली में है। सितंबर 2020 में, अहमदाबाद की अदालत ने मुझ पर, मेरे सह-लेखक अबीर दासगुप्ता और प्रबीर पुरकायस्थ के नेतृत्व वाले न्यूज़क्लिक पर एक जुबानबंदी आदेश जारी किया कि हम गौतम अडानी और उनके समूह के हितों के खिलाफ कुछ भी बोल, कह या लिख ​​नहीं सकते।"

वे आगे कहते हैं, "एक लेख था, जिसे मानहानिकारक माना गया था - लेख की सामग्री को चुनौती नहीं दी गई थी।  शीर्षक मानहानिकारक माना गया... यह तीन लेखों की श्रृंखला का अंतिम भाग था।"
मुझ पर, मेरे सहयोगियों और न्यूज़क्लिक पर यह आरोप था कि, हमने जनता की नज़र में न्यायपालिका के सम्मान को कम किया है।  मामला फिलहाल लंबित है और मैं इस पर और कुछ नहीं कह सकता।
हाल ही में राजस्थान के मामले में, हम में से कई बारां जिले के ग्रामीण न्यायालय में मजिस्ट्रेट के सामने जमानत बांड और जमानत बांड के लिए जमानत देने के लिए उपस्थित हुए।
ईपीडब्ल्यू द्वारा हटाए गए लेख को अडानी समूह द्वारा यह कहते हुए चुनौती दी गई थी कि यह मानहानिकारक है।  द वायर को चलाने वाली संस्थाओं, मेरे सह-लेखकों और मेरे खिलाफ मामले दायर किए गए थे।  यह भुज में एक सिविल कोर्ट और मुंद्रा में एक आपराधिक अदालत में गया।  लेकिन अब दोनों मुंद्रा में हैं।"

जब उनसे पूछा गया कि, "जैसा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, क्या आपको गिरफ्तार करने का कोई प्रयास किया गया था?   क्या आप जेल गए थे ?"
इस पर परंजय गुहा ठाकुरता ने कहा, 
"जनवरी 2021 में, जब महामारी चल रही थी, मुंद्रा में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा मेरे खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था। मेरे वकील ने तर्क दिया कि यह गैर-जमानती वारंट कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है।  उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का जिक्र किया जिनमें कहा गया है कि, अगर कोई शख्स कोर्ट में पेश नहीं होता है तो, आप जमानती वारंट जारी कर सकते हैं। अगर वह व्यक्ति फिर भी हाजिर नहीं होता है तो, कोर्ट गैर जमानती वारंट जारी कर सकता है।  यह मामला ईपीडब्ल्यू से निकाले गए लेख और बाद में द वायर द्वारा प्रकाशित लेख से संबंधित है। मई 2019 में, लोकसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने से पहले, अडानी समूह ने सभी के खिलाफ मामले वापस ले लिए - द वायर, मेरे तीन सह-लेखक लेकिन मैं अकेला व्यक्ति हूं जिसके खिलाफ मामला जारी है। मुझे कभी गिरफ्तार नहीं किया गया।"

हिंडनबर्ग रिसर्च के साथ सहयोग करने के सवाल पर उनका कहना है, 
"रिपोर्ट आने से पहले, मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना था। हालाँकि, रिपोर्ट, जिसमें 32,000 शब्द हैं, यदि पुस्तक के रूप में मुद्रित की जाती है, तो 150 पृष्ठों में आ सकती है। इस रिपोर्ट में, मेरे और अबीर दासगुप्ता जैसे स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा किए गए कार्यों के कई संदर्भ उल्लिखित हैं, जिनके साथ मैंने सहयोग किया। लेकिन यह सब वे मैटीरियल और दस्तावेज हैं, जो सार्वजनिक डोमेन में है और उन्हे कोई भी देख और पढ़ सकता है।"

परंजय गुहा ठाकुरता की मुलाकात भी गौतम अडानी से हुई। इसके बारे में वे कहते हैं, कि, "मैं गौतम अडानी से दो बार मिला - मई 2017 में मुंबई में, और फिर फरवरी 2021 में। हाल ही में मेरी उनसे टेलीफोन पर लंबी बातचीत हुई। लेकिन इनमें से हर मौके पर मैं उनसे इस शर्त पर मिला कि यह ऑफ द रिकॉर्ड होगा।  मैंने उन वार्तालापों को रिकॉर्ड नहीं किया।  प्रत्येक बातचीत के दौरान, टेलीफोन कॉल को छोड़कर मेरे साथ और लोग भी थे। एक पूर्व सहयोगी 2017 में मेरे साथ था और 2021 में, कमरे में हम पांच थे, जिनमें गौतम अडानी और मेरी पत्नी शामिल है। पहली बैठक लगभग एक घंटे तक चली, जबकि दूसरी, एक घंटे और 55 मिनट तक चली। फोन कॉल करीब 15 मिनट तक चली।"
"मुलाकात मेरे कहने पर हुई थी.  दूसरा मेरे वकील आनंद याग्निक के द्वारा इस उम्मीद के साथ तय की गई थी कि, अदालत के बाहर समझौता हो सकता है। लेकिन वैसा नहीं हुआ। आखिरी फोन कॉल मेरी ओर से मामलों को वापस लेने का अनुरोध था। पर वह प्रतिबद्ध नहीं थे। मामले अभी भी लंबित हैं।"

शीर्ष कंपनियों और बड़े समूहों के खिलाफ लेख लिखने पर परंजय को अन्य अदालती मामलों का सामना भी सामना करना पड़ा है। इनके बारे में वे बताते हैं, 
"कई कॉरपोरेट्स ने लीगल नोटिस भेजे हैं लेकिन असल में कोई मुझे कोर्ट तक नहीं ले गया। कानूनी नोटिस दोनों अंबानी भाइयों के नेतृत्व वाली कॉर्पोरेट संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों द्वारा भेजे गए थे।  सहारा के सुब्रत राय ने भी मुझे नोटिस भेजा पर वे कभी कोर्ट नहीं ले गए। पर इन मामलों का मुझ पर और मेरी जिंदगी पर असर पड़ता है। अनावश्यक समय बरबाद होता है और खर्चे भी होते हैं। लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि क्या मैं, इनसे (इन लेखों के माध्यम से कॉर्पोरेट की अनियमितता उजागर करने से) कुछ अलग करता तो मेरा उत्तर 'नहीं' में होता।

आज जब हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद, देश के स्टॉक मार्केट में भूचाल आया है, अडानी के शेयर आधे से भी कम कीमत पर रह गए हैं, एसबीआई, एलआईसी जैसी कई वित्तीय संस्थान जिन्होंने अडानी के शेयर खरीदे हैं, नुकसान उठाने की ओर है, दुनिया भर की क्रेडिट एजेंसियां और वित्तीय संस्थान अडानी के इस अचानक हुए पराभव से सशंकित है, ऑस्ट्रेलिया से लेकर बांग्लादेश तक, यह समूह संदेह के घेरे में है तो आरएसएस और बीजेपी इसे देश पर हमला बता रहे हैं। कमाल की सरकार है और कमाल की गवर्नेंस। अडानी के शेयर उठे या गिरे, इससे अडानी पर लगे आरोप खत्म नही हो जाते हैं। शेयरों का उठना गिरना तो उस आरोपों का परिणाम है। आरोप है, शेल कंपनियों से पैसा लेना। इसे मनी लांड्रिंग भी कहा जाता है। ED प्रवर्तन निदेशालय, जिसने, बेहद कम धनराशि की मनीलांड्रिंग के आरोप में, केरल के पत्रकार, सिद्दीक कप्पन को जेल भेजा था, अब कॉमा में है। सरकार संसद में काका हाथरसी और दुष्यंत कुमार की कविताएं सुना रही है, पर अडानी का नाम तक नहीं ले रही है, जांच पड़ताल की कौन कहे। 

विजय शंकर सिंह
© Vijay Shanker Singh 


Tuesday, 7 February 2023

अडानी समूह पर साल 2014 के बाद से हो रही अतिशय राजकृपा की जांच की जानी चाहिए / विजय शंकर सिंह

2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार में आए तो सबसे पहला बिल, भूमि अधिग्रहण बिल लाया गया। विकास के नाम पर लाया गया बिल, पूरी तरह से पूंजीपतियों के हित में था। स्वर्ग नर्क पाप पुण्य आदि के नाम पर जैसे जटिल कर्मकांड से लोग ठगे जाते वैसे ही विकास के नाम पर चहेते पूंजीपतियों की संपत्ति वृद्धि का एक अघोषित और पोशीदा अभियान 2014 में  सरकार बदलते शुरू हो गया था। हालांकि भूमि अधिग्रहण कानून पास नहीं हो पाया, पर सरकार के इरादों का संकेत, उस बिल ने दे दिया था। उक्त बिल के बाद, दो साल पहले लाया गया तीन कृषि कानून भी, कृषि विकास के नाम पर लाए गए थे, पर किसानों के प्रबल विरोध के बाद, उस कानून को, जिसे तमाम संसदीय मर्यादाओं और परंपरा को ताक पर रख कर, पास कराया गया था, सरकार को, मजबूरी में रद्द करना पड़ा। चाहे 2014 का भूमि अधिग्रहण कानून हो, अथवा 2021 के तीन किसान कानून, दोनो में सरकार की प्राथमिकता में, पूंजीपति थे, न कि आम जनता। 
यह एक दुर्भग्यपूर्ण स्थिति है कि, काले धन, भ्रष्टाचार, पारदर्शिता, और छद्म विकास के गुजरात मॉडल के नाम पर आई सरकार ने, न तो काले धन को रोकने या विदेशों से वापस लाने, सिस्टम में भ्रष्टाचार को कम करने, पारदर्शिता को बनाए रखने,  जिसका वादा नरेंद्र मोदी, 2014 के चुनाव के पहले अपनी हर मीटिंग में किया करते थे, उन मुद्दों पर कोई ठोस कार्यवाही करनी तो दूर की बात रही, इन बिंदुओं से संबंधित जो प्रचलित कानून थे, उन्हे भी भोथरा बनाया दिया गया, और भ्रष्टाचार रोकने का एक आसान सा रास्ता यह निकाल लिया गया कि, भ्रष्टाचार के आरोपों की कोई जांच ही न की जाय। सीएजी संस्था की ऑडिट रिपोर्ट भी अब कम ही देखने को मिलती हैं।  

देश के सारे हवाई अड्डों को पीपीपी मॉडल के अंतर्गत निजी क्षेत्रों को सौंप दिए जाने की एक योजना सरकार द्वारा 2018 में लाई जाती हैं। इस योजना के क्रियान्वयन में, देश के 6 हवाई अड्डों को निजी क्षेत्रों में सौंपने के लिए, 2019 में निविदा आमंत्रित की गई। अडानी समूह को यह हवाई अड्डे मिले, हालांकि अडानी समूह की बोली को लेकर, वित्त मंत्रालय और नीति आयोग ने अपनी आपत्तियां भी जताई थी। पर अडानी समूह द्वारा सभी 6 हवाई अड्डों के लिए, बोली लगाने से पहले ही, वित्त मंत्रालय, और नीति आयोग की वे आपत्तियां खारिज कर दी गई थीं। केवल दो साल से भी कम समय में, अडानी समूह, हैंडल किए गए हवाई अड्डों की संख्या के मामले में, भारत का सबसे बड़ा निजी डेवलपर बन गया है; और यात्री यातायात के मामले में यह दूसरा सबसे बड़ा हवाई अड्डा नियंत्रक हो गया। विकास का यह अनोखा उदाहरण है। क्या भला किसी उच्च राजनीतिक संपर्क की कृपा के, ऐसा चमत्कार संभव हो सकता था। 

इंडियन एक्सप्रेस ने तब एक विस्तृत रिपोर्ट अडानी को हवाई अड्डा सौंपने के बारे में, छापी थी। उक्त रिपोर्ट जो इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट पर अब भी है में, अंकित है कि, "2019 में हवाईअड्डे की बोली प्रक्रिया के संबंध में वित्त मंत्रालय और नीति आयोग द्वारा उठाई गई आपत्तियों को अहमदाबाद स्थित अडानी समूह को छह प्रमुख हवाईअड्डों को क्लीन स्वीप करने की अनुमति देने के लिए खारिज कर दिया गया था।"
वित्त मंत्रालय और नीति आयोग दोनो ही सरकार के अंग हैं, और उनकी आपत्तियां एक झटके में ही खारिज कर देना और कुछ संकेत दे या न दे, पर यह साबित करता है कि, अडानी समूह की पकड़ सरकार में शीर्ष तक बहुत गहरी है। 

देश के कुल छः हवाई अड्डों, अहमदाबाद, लखनऊ, मैंगलोर, जयपुर, गुवाहाटी और तिरुवनंतपुरम में हवाई अड्डों के निजीकरण के लिए बोलियां आमंत्रित करने से पहले, सरकार द्वारा आयोजित, विभागिय और विशेषज्ञ चर्चाओं के दौरान, वित्त मंत्रालय ने, अपने एक अध्ययन टिप्पणी में कहा था कि "एक ही समूह को, दो से अधिक हवाईअड्डों को आवंटित नहीं किया जाना चाहिए।" 
इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार के एकाधिकार पर नियंत्रण रखना था,। सारे हवाई अड्डे, किसी एक व्यक्ति की कंपनी को नही सौंपे जाने चाहिए। 
साथ ही, नीति आयोग ने, इस विंदु पर, एक अलग प्रकार की चिंता जताई थी कि "पर्याप्त तकनीकी क्षमता की कमी वाले बोलीदाता परियोजना को अपनी अनुभवहीनता के कारण, खतरे में डाल सकते हैं और वे लाभ के लालच में, हवाई अड्डों पर, उपलब्ध कराई जाने वाली यात्री व अन्य सेवाओं की गुणवत्ता से समझौता भी कर सकते हैं।"
नीति आयोग की आपत्ति भी उचित थी कि उक्त समूह को हवाई अड्डा परिचालन का कोई अनुभव नहीं था और एक साथ ही सभी हवाई अड्डों को उक्त समूह को सौंप देना, प्रशासनिक और आर्थिक रणनीतिक दृष्टिकोण से उचित भी नहीं था। पर सरकार द्वारा गठित की गई सचिवों की समिति की राय के आधार पर, सरकार ने, वित्त मंत्रालय और नीति आयोग, दोनो की इन महत्वपूर्ण आपत्तियों को दरकिनार करते हुए, सारे हवाई अड्डे, अडानी समूह को सौंप दिए। 

इस प्रकार, गौतम अडानी के इन्फ्रा समूह अडानी एंटरप्राइजेज ने फरवरी 2019 में भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) द्वारा, सभी छह हवाईअड्डों को संचालित करने के लिए खोली गई वित्तीय निविदाओं को, जीत लिया था, जिसे सरकार अगले साल के लिए दिल्ली और मुंबई में मेगा हब की तरह सार्वजनिक-निजी तरीके (पीपीपी मॉडल) से चलाने की योजना बना रही थी। हवाई अड्डे के संचालन का यह दायित्व अडानी समूह को, 50 साल के लिए सौंपा गया है। अडानी समूह द्वारा, छह बोलियों में से प्रत्येक में, अपने प्रतिद्वंद्वियों, जीएमआर ग्रुप, ज्यूरिख एयरपोर्ट और कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड जैसे अनुभवी कम्पनियों को किनारे कर के यह निविदा प्राप्त की गई। 

अडानी समूह ने साल 2018 की अगस्त में मुंबई में स्थित, देश के दूसरे सबसे बड़े, हवाई अड्डे को नियंत्रण में लेने के लिए एक और सौदे पर हस्ताक्षर किया था, जिसे भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) ने 12 जनवरी 2019 को अधिग्रहण की मंजूरी दे दी। इस समय अडानी समूह द्वारा, संयुक्त रूप से, कुल सात हवाईअड्डे संचालित किए जा रहे हैं, और, हवाईअड्डों की संख्या के मामले में यह समूह, भारत का, उसे सबसे बड़ा निजी हवाई अड्डा संचालक बन गया है और यात्री यातायात के मामले में, अडानी समूह देश का दूसरा सबसे बड़ा संचालक है। हवाई अड्डों के निजी एकाधिकारवादी नियंत्रण का यह प्रभुत्व दो साल से भी कम समय में, अडानी समूह ने स्थापित कर लिया। 

एएआई द्वारा, 2019 में, छह हवाई अड्डों के पीपीपी मॉडल के अनुसार, निजी क्षेत्र द्वारा संचालित करने हेतु, बोलियों को, आमंत्रित करने से पहले, वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा, 10 दिसंबर, 2018 को भेजे गए एक नोट में कहा गया था कि, "छह हवाई अड्डा परियोजनाएं अत्यधिक पूंजी-गहन परियोजनाएं हैं, और इसलिए इस विंदु को शामिल करने का सुझाव दिया जाता है कि, "उच्च वित्तीय जोखिम और प्रदर्शन के मुद्दों को ध्यान में रखते हुए एक ही बोली दाता को दो से अधिक हवाई अड्डे नहीं दिए जाने चाहिए।" 
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, "केंद्र की पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी (पीपीपीएसी) को भेजे गए नोट में कहा गया है, "अलग-अलग कंपनियों को यह संचालन सौंपने से, प्रतियोगिता का वातावरण भी बनेगा और इससे संचलन प्रबंधन और गुणवत्ता भी सुधरेगी।"

इंडियन एक्सप्रेस अखबार, पूरी प्रक्रिया पर अपनी रपट में लिखता है कि, "प्रक्रिया पर चर्चा के लिए 11 दिसंबर, 2018 को पीपीएसी द्वारा आयोजित एक बैठक में डीईए द्वारा इस, चेतावनी भरी राय को उठाया गया था। डीईए ने दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डों का उदाहरण भी दिया था कि, "मूल रूप से एकमात्र योग्य बोलीदाता होने के बावजूद दोनों हवाईअड्डों का संचालन जीएमआर को नहीं दिया गया था।"
ज्ञातव्य है कि, जीएमआर ग्रुप के पास हवाई अड्डों के संचालन का अनुभव था, पर उसे भी, उस ग्रुप की निविदा उपयुक्त पाए जाने के बाद भी, दिल्ली और मुंबई के हवाई अड्डे, सिर्फ एकाधिकार और गुणवत्ता के कारण नहीं सौंपे गए। 

जब अडानी समूह को हवाई अड्डों का संचालन दायित्व देने की प्रक्रिया चल रही थी, तब नीति आयोग ने भी उसी दिन भेजे गए एक नोट में हवाईअड्डे की बोली को लेकर अलग से चिंता जताई थी। सरकार के थिंक टैंक नीति के मेमो में कहा गया है, "पर्याप्त तकनीकी क्षमता के अभाव वाले बोलीदाता, अपनी अनुभवहीनता के कारण, परियोजना को खतरे में डाल सकते हैं और सरकार द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं की गुणवत्ता से समझौता कर सकते हैं।"
लेकिन पीपीएसी ने इस आपत्ति को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि "सचिवों के अधिकार प्राप्त समूह ने पहले ही तय कर लिया था कि "पूर्व हवाईअड्डे के संचालन अनुभव के विंदु को, न तो बोली लगाने के लिए एक शर्त बनाया जा सकता है, न ही बोली के बाद इसकी आवश्यकता ही है।" 

यह एक अजीब निर्णय था, सचिवों के अधिकार प्राप्त समूह का, कि, अनुभव को कोई शर्त ही न, निविदा में रखी जाय। यदि अनुभव को निविदा की शर्तो में शामिल किया गया होता तो, अडानी समूह के लिए, धड़ाधड़ छह हवाई अड्डों का संचालन लेना संभव नहीं था, क्योंकि उनके पास हवाई अड्डा परिचालन का कोई अनुभव ही नहीं था। वे एक सामान्य हवाई अड्डा लेकर, अनुभव जुटा और अपनी संचालन क्षमता का प्रदर्शन कर सकते थे, पर इतनी उदार राजकृपा का ग्रह योग भविष्य में रहे या न रहे। फिलहाल तो जो रहमत बरस रही है, उसके लाभ से वंचित रहने का जोखिम क्यों उठाया जाए ! एक व्यापारी की मानसिकता के अनुसार अडानी का यह सोचना स्वाभाविक था, पर एक सरकार का इस तरह से एक ग्रुप को सभी हवाई अड्डों को सौंप देने की नीयत से, नीति में अडानीनुसार संशोधन करना, जानबूझकर किया गया पक्षपात था, जो अडानी और सत्ता शीर्ष के बीच की दुरभिसंधि को साबित करता है।

आखिर इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए, अनुभव के विंदु को, शर्तो में क्यों नही शामिल किया गया, जबकि हर निविदा में अनुभव, एक सामान्य और अनिवार्य शर्त होती है। सचिव मंडली का यह निर्णय खुद का था या, उनका यह निर्णय किसी दबाव का परिणाम था ? अगर यह निर्णय सचिव मंडली का खुद का था तो, अनुभव रहित निविदा से क्या उद्देश्य प्राप्त हो सकता था, यह सब सामान्य प्रश्न हैं जो इस हवाई अड्डा डील पर अनेक सवाल खड़े करते हैं। 

राजकृपा का यह अंत नहीं है। यदि गंभीरता से अध्ययन किया जाय तो साल दर साल ऐसी उदार राजकृपा अडानी समूह पर होती रही है और आज भी वह कम नही हुई है बल्कि अब तो वह और निर्लज्ज तरीके से हो रही है। सरकार ने अब तक 7 एयरपोर्ट तो, अडानी समूह को सौंप दिए गए है, पर अभी सरकार के इस मॉडल के अनुसार, लगभग 12/13 एयरपोर्ट और निजी क्षेत्र को सौंपे जाने हैं। यह नीलामी अगले 6 माह में होनी है। लेकिन इस समय अडानी समूह पर संकट के जो बादल छाए है, उन्हे देखते हुए इन हवाई अड्डों की नीलामी स्थगित कर के आगे बढ़ा दी जा सकती है। 

इस संबंध में एक वीडियो चर्चा में शामिल एक विशेषज्ञ ने सूत्रों के हवाले से यह बताया कि, सरकार, इन हवाई अड्डों को भी, अडानी समूह को ही सौंपना चाहती है, पर अडानी घोटाले पर  चल रहे कोहराम के कारण, सरकार, फिलहाल अडानी के पक्ष में खड़े नहीं दिखना चाहती है। अडानी समूह के बांड और शेयरों पर भी, अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसियों द्वारा विपरीत आकलन के कारण, अर्थसंकट आया है और सरकार इस अर्थसंकट के दूर होने की प्रतीक्षा भी कर सकती है। 

अडानी को अब भी एसबीआई सहित सरकारी बैंकों का समर्थन है। अखबारों के अनुसार एसबीआई और कुछ अन्य बैंको द्वारा  कुल स्वीकृत ऋण 9 बिलियन डॉलर (₹75 हजार करोड़) का है। इसमें से, 7.5% की राशि दी जा चुकी है, पर अभी भी अडानी समूह को, 1.5% राशि दी जा सकती है। अडानी को अब भी सरकार का पूरा सहयोग और राजकृपा है, पर हिंडनबर्ग खुलासे के कारण आए संकट और देश में हो रहे विरोध के चलते, फिलहाल सरकार, शेष एयरपोर्ट की नीलामी की योजना को टाल सकती है। 

आम तौर पर जनता में यह धारणा है सरकार ने नजदीक जो दो पूंजीपति घराने हैं, एक मुकेश अंबानी का रिलायंस, ओर अनिल अंबानी का तथा गौतम अडानी का, अडानी समूह। लेकिन वर्तमान सरकार के समय, गौतम अडानी की, प्रधानमंत्री से अतिशय निकटता के लिए जाना जाता है। क्या यह महज संयोग है कि, 
० प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, साल ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर जाते हैं और अडानी समूह को वहां कोयला खनन का ठेका मिलता और साथ ही एसबीआई से भारी कर्ज भी। 
० "भारत के पीएम की सिफारिश पर, अडानी को श्रीलंका में पॉवर प्लांट का काम मिला है," यह बयान श्रीलंका की संसद के रिकॉर्ड में है।
० पीएम बांग्लादेश जाते हैं, अडानी को गोड्डा बिजली ठेका मिलता है। यह अलग बात है कि अब बांग्लादेश इस समझौते पर अपनी आपत्ति जता रहा है। 

क्या यह महज संयोग है कि पीएम नरेंद्र मोदी के अधिकांश दौरे में, अडानी साथ रहते हैं और उन्हें कुछ कुछ व्यापारिक लाभ मय आसान कर्ज के मिलता रहता है। 
क्या नरेंद्र मोदी और अडानी के संबंधो की जांच नहीं होनी चाहिए ?
मुद्दा, अडानी के स्टॉक घपले तो हैं ही, साथ ही, उनपर 2014 से हो रही राजकृपा भी है। कैसे 2014 के बाद, अडानी का उदय तेजी से हुआ और जब 80 करोड़ लोग 5kg राशन पर आ गए तो, अडानी नंबर 2 पर पहुंच गए। पर करदाताओं  में, पहले 10 में भी नहीं हैं। इस अतिशय राजकृपा की जांच क्या नहीं होनी चाहिए?
'न खाऊंगा और न खाने दूंगा' जैसे मनमोहक सुभाषित गढ़ने वाले पीएम के शासनकाल में,
० न तो पनामा पेपर्स की जांच हुई
० न राफेल में अनिल अंबानी के आमद की,
० और अब वे हिंडनबर्ग खुलासे की जांच कराने को तैयार नहीं है। 
कम से कम पीएम संसद में यही बता दें कि, जांच क्यों नहीं की जानी चाहिए।

विजय शंकर सिंह 
© Vijay Shanker Singh)


Monday, 6 February 2023

कमलाकांत त्रिपाठी / तुलसी का योगदान (4) तुलसी का रामचरितमानस और वाल्मीकीय रामायण का मूल स्वरूप - क

वाल्मीकीय रामायण के मूल स्वरूप के निर्धारण में प्रक्षिप्त की पहचान के लिए सामान्यत: संस्कृत के ऐसे प्रकाण्ड विद्वान की ज़रूरत होनी चाहिए जो भाषाविज्ञान का भी विशेषज्ञ हो।   लेकिन, आप देखेंगे, वाल्मीकीय रामायण के विशेष संदर्भ में प्रक्षिप्त की जो प्रकृति है, उसके मद्देनज़र प्रकाण्ड संस्कृतज्ञ-कम-भाषाविज्ञान-विशेषज्ञ की तलाश में सत्तू-पिसान बाँधकर  निकलने की ज़रूरत नहीं। रामायण की अन्तर्वस्तु, यहाँ तक कि मात्र विषय-सूची, के एक सरसरी पाठ से जो चीज़ स्पष्ट हो जाये उसके लिये विशेषज्ञ को कष्ट क्यों देना? रहीम जी कह ही गये हैं--जहाँ काम आवे सुई कहा करै तरवारि। 

रामायण का शब्दिक अर्थ है राम की यात्रा। अयन का आद्य अर्थ है चलना, जाना (अय्‌ +ल्युट्‌)। वामन शिवराम आप्टे ने अपने (सर्वसुलभ) ‘संस्कृत-हिंदी कोश’ में इस आद्य अर्थ के उदाहरण में ही रामायणम्‌ का उल्लेख कर दिया है। आप्टे ने अयन का दूसरा अर्थ दिया है मार्ग या पथ, वह भी उपरोक्त आद्य अर्थ से सम्बद्ध है। अयन के शेष अर्थ प्रसंगानुरूप इतने भिन्न-भिन्न हैं कि प्रस्तुत संदर्भ के लिए सर्वथा अप्रासंगिक हैं। 

जब ‘राम की यात्रा’ की बात होगी तो स्पष्ट है, एक ही यात्रा अभीष्ट होगी। राम-लक्ष्मण द्वारा विश्वामित्र की यज्ञ-रक्षा के लिए की गई एक और यात्रा का विवरण उपलब्ध है, जिसमें इन दोनों के ही नहीं, चारों भाइयों के एक साथ विवाह का भी संयोग बैठ जाता है। किंतु जब एक ही यात्रा अभीष्ट हो तो निश्चय ही राम वनगमन, जिसमें सीता-हरण प्रसंग के कारण लंका-यात्रा भी जुड़ गई, एकमात्र उद्दिष्ट यात्रा होनी चाहिये। और राम की यह यात्रा अयोध्याकाण्ड से शुरू होकर युद्धकाण्ड में राम के अयोध्या लौटने और उनका राज्याभिषेक होने पर समाप्त हो जाती है। एक राज्याभिषेक की (निष्फल) तैयारी (अयोध्याकाण्ड) से दूसरे राज्याभिषेक (युद्धकाण्ड) के सम्पन्न होने में 14 वर्षों का लंबा अंतराल है। और वही है राम की कठिन यात्रा जो वाल्मीकीय रामायण का प्रतिपाद्य है। तो वाल्मीकीय रामायण में बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड कहाँ से आ गये? ऐसा तो नहीं हो सकता कि लौकिक संस्कृत के आदिकवि को रामायण शब्द का अर्थ न ज्ञात रहा हो। तो सवाल है, वाल्मीकि ने आदिकाव्य लिखते समय उसका नामकरण रामचरितम्‌ के बजाय रामायण क्यों किया होगा?                                         

संस्कृत में चरितम्‌ (चरित्रम्‌ से थोड़ा भिन्न) शब्द का भी एक अर्थ गमन करना, हिलना-डुलना है। किंतु संस्कृत की रचनाओं के नामकरण के संदर्भ में यह शब्द जीवनी या जीवनचरित के एकमात्र अर्थ में रूढ़ हो गया है। नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष का महाकाव्य), उत्तररामचरितम्‌ (भवभूति का नाटक), दशकुमारचरितम्‌ (दण्डी का गद्यकाव्य), हर्षचरितम्‌ (बाणभट्ट का गद्यकाव्य), बुद्धचरितम्‌ (अश्वघोष का महाकाव्य) इसके कुछ प्रसिद्ध उदाहरण हैं। चरितम्‌ में पूरे जीवन का आख्यान होता है। तुलसी ने रामकथा पर भाषा (अवधी) में लिखे गये अपने प्रबंध का नाम रखा रामचरितमानस। निहितार्थ, राम के सम्पूर्ण जीवन का आख्यान। अपने प्रबंध के शुरू में ही उन्होंने वाल्मीकीय रामायण का उल्लेख करते हुए लिख दिया था--‘यद्‌ रामायणे निगदितम्‌ क्वचिदन्यतोsपि‘ (जो वाल्मीकीय रामायण में वर्णित है वह तथा कुछ और)। तुलसीदास संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। यह तो सम्भव नहीं कि उन्हें रामायण शब्द के अपेक्षाकृत सीमित अर्थ का एहसास न रहा हो। ऐसे में क्वचिदन्यतोsपि तो अपरिहार्य था। इस तरह रामचरितमानस में बालकाण्ड और उतरकाण्ड का समावेश क्वचिदन्यतोsपि के अनुरूप ही है। किंतु द्रष्टव्य यह है कि तुलसी ने अपने प्रबंध के उत्तरकाण्ड में (संप्रति प्रचलित) वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड का कोई प्रसंग नहीं लिया और उसे ज्ञान-भक्ति विवेचन पर ख़र्च कर दिया। इस तरह तुलसी को विवादित शम्बूक-वध और सीता-निर्वासन प्रसंग से स्वत: छुटकारा मिल गया। किंतु 'यद्‌ रामायणे निगदितं...' में तो उन्होंने कुछ अतिरिक्त लेने की बात कही थी, कुछ छोड़ने की नहीं। एकमात्र निहितार्थ-- तुलसी को मूल वाल्मीकीय रामायण में उत्तरकाण्ड के न होने का आभास। या संदेह।  यह उनके इष्टदेव मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति अखण्ड सम्मान के अतिरिक्त अन्य कारण हो सकता है।   

आप पायेंगे कि वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक की कथा पूर्णत: सुसम्बद्ध  है, आद्यन्त एक सूत्र में पिरोई हुई, निरंतर आगे बढ़ती है, बायें-दायें या लौटकर पीछे नहीं जाती। पूरी कथा राम पर केंद्रित है। राम, उनके जीवन के घटित और उनसे जुड़े पात्रों पर लगातार फ़ोकस बनाये रखती है, एक भी असम्बद्ध, अवांतर प्रसंग नहीं आता। इसके ठीक विपरीत बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में अवांतर प्रसंग ही भरे हुये हैं। ख़ास पौराणिक शैली में परस्पर असम्बद्ध,  भाँति-भाँति के आख्यानों का बेतरतीब जमावड़ा, जिनका रामकथा से कोई लेना-देना नहीं। इन काण्डों के शेष अंश में रामायण के ही कुछ प्रसंगों की पुनरावृत्ति होती है किंतु उनमें कुछ जोड़कर, उनका रूप बदलकर। इन काण्डों की मात्र विषयसूची पर एक निगाह डाल लेने से स्पष्ट हो जायेगा कि ये दोनों काण्ड उस व्यक्ति द्वारा लिखे हुए कदापि नहीं हो सकते जिसने अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक राम की बहुचर्चित यात्रा को पूर्वापर सुसम्बद्ध, उतरोत्तर अग्रगामी, एकल सूत्र में बँधी, सुगम संस्कृत के सरल साहित्यिक सौदर्य की झलक देती, प्रवहमान भाषा में, प्रकृति, और मानवीय भावों के सूक्ष्म को कुशलता से उभारती, एक उत्कृष्ट कथा का रूप दिया है।

इन दो काण्डों में मूल रामायण (अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड) के किसी प्रसंग की पुनरावृत्ति में कथा की अन्विति, उसकी मर्यादा, उसके सौष्ठव को प्रसंग के इतर विवरणों ने किस तरह स्खलित किया है इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा—

युद्धकाण्ड का अंतिम (128वाँ) सर्ग। इस सर्ग के वर्ण्य विषय हैं--भरत द्वारा राम को राज्याधिकार का  हस्तान्तरण {भरत के अनुसार राज्य उनके पास महज़ न्यास (trust) में होने से उसका प्रत्यर्पण}, राम द्वारा नगर-भ्रमण, राम का राज्याभिषेक, उपहार देकर ससम्मान विभीषण एवं वानरों की विदाई तथा रामायण की फलश्रुति (जो हमेशा ग्रंथ के अंत में आती है)।  

विभीषण और वानरों की विदाई: 

".....तत्पश्चात्‌ राजा राम ने अपने मित्र सुग्रीव को एक दिव्य, मणिजटित, सूर्य की किरणों की तरह प्रकाशवान्‌ स्वर्णहार उपहार दिया। उसके बाद धैर्यशाली रघुवीर ने बालिपुत्र अङ्गद को कंगन भेंट किये जिनमें चित्र-विचित्र नीलम जड़े थे, जो चंद्रकिरणों से विभूषित लग रहे थे। वायुदेव द्वारा राम को उपहार में दिया गया, चंद्रकिरणों से प्रकाशित, मुक्ताहार राम ने सीता के गले में डाल दिया...सीता ने पति की ओर देखकर संकेत में वायुपुत्र हनुमान्‌ को कुछ उपहार देने की इच्छा व्यक्त की। राम की आज्ञा पाकर सीता ने वह मुक्ताहार हनुमान्‌ को भेंट कर दिया। इसी प्रकार जितने भी प्रधान वानरवीर थे, सबका वस्त्रों एवं आभूषणों से यथोचित सम्मान किया गया। और तब—

विभीषणोsथ सुग्रीवो हनूमाञ्जाम्बवांस्तथा। सर्वे वानरमुख्याश्च रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥85॥
यथार्हं पूजिता: सर्वे कामै रत्नैश्च पुष्कलै:। प्रहृष्टमनस: सर्वे जग्मुरेव यथागतम्‌।।86॥

[अतिशय क्लिष्ट कर्म से निवृत्त हुए राम ने विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्‌ तथा जाम्बवान्‌ आदि सभी श्रेष्ठ वानरवीरों का उनकी मनोवाञ्छित वस्तुओं एवं प्रचुर रत्नों से यथोचित सम्मान किया। वे सब प्रसन्न होकर, जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने निवासस्थान को लौट गये।]

अब यही प्रसंग उत्तरकाण्ड में देखिए।
(प्रक्षिप्त?) उत्तरकाण्ड के सर्ग 37, 38, 39 और 40 में राज्याभिषेक, सभासदों के साथ बैठक और वानरों आदि की विदाई का प्रसंग पुन: आता है। पहला प्रश्न तो यही उठता है कि विदाई दुबारा क्यों? किंतु यह प्रश्न गौण है। महत्वपूर्ण यह है कि उत्तरकाण्ड में यह प्रकरण अनपेक्षित, अमर्यादित और कृत्रिम विवरणों के समावेश से अनावश्यक विस्तार पाता है; उसका एक विचित्र रूप सामने आता है। उत्तरकाण्ड में पुनर्वर्णित राज्याभिषेक समारोह में भरत द्वारा बुलाये जाने पर राजा जनक सहित दूर-पास के अनेक राजा भी उपस्थित होते हैं (इतना समय था?)। वे सब अपनी बड़ी-बड़ी (कई अक्षौहिणी) सेनाओं के साथ युद्ध के लिए उद्यत होकर (?) आते हैं (39-1)। उनकी विदाई होने पर वापस लौटते समय वे आपस में बे-सिर-पैर की गर्वीली बातें करते हैं--हमने तो राम और रावण को युद्ध में आमने-सामने खड़े देखा नहीं। भरत ने हमें पहले सूचना ही नहीं दी। बाद में (राम-रावण) युद्ध समाप्त हो जाने पर व्यर्थ ही हमें बुलाया। हम सभी युद्ध में भाग लेने गये होते तो नि:संदेह सभी राक्षसों का शीघ्रता से संहार हो जाता। हम लोग भी समुद्र के उस पार राम लक्ष्मण के नेतृत्व में भलीभाँति युद्ध कर सकते थे (39--3,4,5)। फिर इन राजाओं ने वापस अपनी-अपनी राजधानियों में पहुँचकर नाना प्रकार के रत्न और उपहार भेजे (साथ क्यों नहीं लाये थे?)। उपहारों में घोड़े, हाथी, उत्तम कोटि का चंदन, आभूषण, मणि, मोती, मूँगा, बहुत सारे रथ थे। और तो और, रूपवती दासियाँ, नाना प्रकार की बकरियाँ और भेड़ेँ भी थीं (39--7,10‌)। (हास्यास्पद)।   

भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न उन रत्नों को लेकर अयोध्या पुरी पहुँचते हैं (लिया किस जगह?) और राम को समर्पित कर देते हैं (39-11,12)। राम उन सब उपहारों को विभीषण, अन्य राक्षसों (युद्धकाण्ड के उपरोक्त प्रकरण में 'अन्य राक्षसों' का उल्लेख नहीं है, क्या वे भी राम के साथ आये थे?) और वानरों में वितरित कर देते हैं क्योंकि उन्ही के सहयोग से राम ने युद्ध में विजय प्राप्त की थी (39-13,14)। उन सभी ने तत्काल उन रत्नों और आभूषणों को अपने मस्तक और भुजाओं पर धारण भी कर लिया (39-15)। 

इसके बाद जो होता है, वह तो अजीबोग़रीब समाँ उपस्थित करता है। राम ने महाबाहु हनुमान और अङ्गद को गोद में बिठाकर सुग्रीव से कहा--सुग्रीव जी, अङ्गद आपके सुपुत्र हैं और हनुमान आपके मन्त्री। ये दोनों मेरे लिये भी मन्त्री का काम करते रहे और मेरे हित-साधन में लगे रहे। इसलिये और आपके सम्बंध के नाते, ये मेरी ओर से आदर-सत्कार और उपहार पाने के हक़दार हैं (अन्यथा न होते?)। ऐसा कहकर राम ने अपने शरीर से बहुमूल्य आभूषण उतारकर अङ्गद और हनुमान्‌ के अङ्गों में बाँध दिया (39--16-19)। फिर राम ने अन्य वानर यूथपतियों--नील, नल, जाम्बवान् तथा 17 अन्य के नामों का उल्लेख है (ये नाम कहाँ मिले?) को बुलाकर मधुर वाणी में कहा--वानरवीरो, आप लोग मेरे मित्र, मेरे शरीर और मेरे बंधु हैं। आपने ही मुझे संकट से उबारा। आप जैसे श्रेष्ठ मित्रों को पाकर राजा सुग्रीव धन्य हैं। (39--20-24)। ऐसा कहने के बाद राम ने उन्हें यथायोग्य आभूषण और बहुमूल्य हीरे (वज्र) देकर उनका आलिङ्गन किया (39--25)। 

लेकिन यह उनकी विदाई नहीं थी। इसके बाद पिङ्गलवर्णी वानर अयोध्या में सुगंधित मधु का पान करते, राजभोग की वस्तुओं का भोग करते, साथ ही स्वादिष्ट फल-मूल खाते, उपस्थित दिखाई पड़ते हैं। लिखा है, वे एक महीने से अधिक रह गये और इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की सुरम्य राजधानी में बड़े आनंद और प्रेम से समय बिताये। फिर लिखा है, इस तरह शिशिर ऋतु का दूसरा महीना बीत गया (शुरुआत किस ऋतु में हुई थी?) (39--26-30)। विभीषण और उनके साथ के राक्षस भी वानरों के साथ वहीं पड़े रहे किंतु वे क्या करते रहे, कोई उल्लेख नहीं। 

इसके उपरांत राम ने रीछों, वानरों और राक्षसों (?) के प्रतिनिधि के तौर पर सुग्रीव को संबोधित करते हुए स्वयं उनसे प्रस्थान करने के लिये कहा (कितना अमर्यादित!)--अब आप देवताओं और असुरों के लिये भी अजेय अपनी किष्किंधापुरी जाएँ और मन्त्रियों के साथ रहते हुए, निष्कंटक वहाँ का राज्य करें (40--2)। फिर राम ने एक 'भाषण' दिया जिसमें उन वानरों का नाम ले-लेकर, जिन्होंने युद्ध में विशेष पराक्रम दिखाया था, सुग्रीव को उनका विशेष ध्यान रखने के लिए हिदायत दी। अंत में बारंबार सुग्रीव का आलिङ्गन किया (40--3-9)। फिर राम मधुर वाणी में विभीषण से बोले (ये कहाँ से प्रकट हो गये?), दरअसल विभीषण को सावधान किया--मेरे विचार से तुम धर्मज्ञ हो। तुम्हारे भाई कुबेर भी तुम्हें धर्मज्ञ मानते हैं। तुम्हारे नगर के राक्षस भी तुम्हें धर्मज्ञ मानते हैं। इसलिये धर्मानुसार लङ्का का शासन करो। कभी अधर्म में मन मत लगाना। जो राजा बुद्धिमान होता है, वही दीर्घकाल तक पृथ्वी का राज्य भोगता है। सुग्रीव-सहित तुम भी मुझे हमेशा याद रखना। अब निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक यहाँ से जाओ (पुन: अमर्यादित व्यवहार) (40--10-12)। राम का भाषण सुनकर, रीछ, वानर, और राक्षस उन्हें धन्य-धन्य करने लगे। उन लोगों ने कहा (एक स्वर से?) महाबाहु श्रीराम, स्वयंभू ब्रह्मा की तरह आपके स्वभाव में सदा अतिशय मधुरता रहती है। आपकी बुद्धि और पराक्रम अद्भुत हैं (40-14)।

राक्षसों और वानरों के जाने का मुहूर्त अभी भी नहीं आया। बीच में हनुमान्‌ जी खड़े हो गये, राम  का गुणगान करने लगे, उनके प्रति अपनी भक्ति का वरदान माँगने लगे। बीच में (बाल-ब्रह्मचारी) हनुमान्‌ ने यह भी माँग रख दी--हे रघुकुलनंदन, नरश्रेष्ठ राम, यह जो आपका दिव्य चरित्र और दिव्य कथा है, अप्सराएँ इसे गाकर मुझे सुनाया करें (40-18)। अंत में राम सिंहासन से उठकर खड़े हो गये, हनुमान्‌ को हृदय से लगा लिया, उनके प्रति विशेष कृतज्ञता व्यक्त की और अपने गले का चंद्रमा के समान उज्ज्वल हार निकालकर हनुमान्‌ जी के गले में पहना दिया (40--20-25)।   

अब जाकर सम्पन्न होती है विदाई। सुग्रीव और विभीषण राम को हृदय से लगाकर उनका प्रगाढ़ आलिंगन करने के बाद विदा हुए। सभी अपने नेत्रों से आँसू बहाते हुए राम के भावी विरह से व्यथित हो उठे (40--28)। राम को छोड़कर जाते हुए सभी अतीव दु:ख के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ और अचेत-से हो रहे थे। गला रुँध जाने से कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था, बस सभी की आँखों से आँसू झर रहे थे। किंतु राम द्वारा कृपा और प्रसन्नतापूर्वक विदा दिये जाने पर सभी वानर विवश होकर उसी प्रकार अपने-अपने घर गये जैसे जीवात्मा विवशता में शरीर छोड़कर परलोक जाता है। वे राक्षस, रीछ और वानर रघुवंश की वृद्धि करनेवाले राम को प्रणाम करके, नेत्रों में वियोग के आँसू लिये अपने-अपने निवासस्थान को लौट गये (40--29-31)। (पुनरुक्ति और अतिकथन?)  

यदि अवांतर और असंबद्ध पौराणिक आख़्यानों के अतिरिक्त इस तरह की पुनरावृत्तियों के ऊटपटाँग, अमर्यादित और अराजक विस्तार को आप आदिकवि वाल्मीकि-कृत मान सकते हैं तो उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड को वाल्मीकीय रामायण का हिस्सा ज़रूर मानते रहें और सीता-निर्वासन तथा शम्बूक-वध जैसे अयुक्तिपूर्ण, प्रतिगामी प्रसंगों को लेकर उन पर आक्षेप भी लगाते रहें।

अभी और भी है, बहुत कुछ है। युद्धकाण्ड के अंत में फलश्रुति, उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड में अन्य पुरुष में स्वयं वाल्मीकि की कथा घुसाकर उन्हें राम का समकालीन सिद्ध करने की चेष्टा, उपलब्ध हस्तलिखित प्रतियों में इन दोनों काण्डों को लेकर अनेक विसंगतियाँ, प्राचीन दाक्षिणात्य प्रति में अयोध्याकाण्ड को आदिकाण्ड बताते हुए केवल पाँच काण्डों का समावेश..और भी बहुत कुछ।
(क्रमश:--उपशीर्षक का 'ख' खण्ड)

कमलाकांत त्रिपाठी
© Kamlakant Tripathi 

'कमलकांत त्रिपाठी / तुलसी का योगदान (3) तुलसी की लोकप्रियता और उनका काव्य-व्यक्तित्व'.
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कमलाकांत त्रिपाठी / तुलसी का योगदान (3) तुलसी की लोकप्रियता और उनका काव्य-व्यक्तित्व

तुलसी के रामचरितमानस की सामान्यजन और अभिजन दोनों में अपूर्व लोकप्रियता का रहस्य संभवत: लोक-जीवन, लोक-मन और लोक-संवेदना में तुलसी की गहरी पैठ है। उन्होंने लोकभाषा में अति सरल, गेय और आसानी से याद हो जाने योग्य दोहा, चौपाई और सोरठा छंदों में लोकाख्यान लिखा और उसमें शास्त्रीय परंपरा का अपना समस्त ज्ञान समाविष्ट कर उसे सर्वसुलभ बना दिया। उनके आख्यानों में निहित भावजगत्‌ और उनमें वर्णित मानव-स्वभाव तथा मानव-व्यवहार से सामान्यजन का तादात्म्य इस क़दर त्वरित और घनीभूत होता है कि उसमें डूबकर शास्त्रीय परंपरा के कील-काँटे सम-सोझ हो जाते हैं, उनकी धार गोठिल पड़ जाती है। कम पढ़ा-लिखा पाठक (व स्रोता) भी उनमें अपने जीवनानुभव का निचोड़, अपने मन का ऊहापोह और दिल की धड़कन महसूस करता है, अपने चारों ओर बिखरे सामान्य लोकजीवन के मासूम, निर्मल चित्र देखता है। वह इतना विभोर हो जाता है कि कई अंश अनजाने ही उसे याद हो जाते हैं और गाहे-बगाहे उन्हें सूक्ति की तरह उद्धृत करने लगता है। अकारण नहीं कि अवध में रामचरितमानस के दोहे-चौपाइयाँ और उनकी अर्द्धालियाँ लोकजीवन की ज़मीन से उपजी कहावतों, उक्तियों, मुहावरों और सुभाषितों की कोटि में दाख़िल होकर उस जीवन के अविभाज्य अंग बन चुकी हैं।

एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा—

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ संकोच सकुचति बरबरनी॥
सकुचि सप्रेम बाल मृगनयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥ 
सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखन लघु देवर मोरे॥
बहुरि बदन बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।
खंजन मंजु  तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सिय सैननि॥
(अयोध्याकाण्ड, 116: 3-7)

[वनगमन के समय राम, लक्ष्मण और सीता एक गाँव से गुज़र रहे हैं। ग्राम्य-वधुओं द्वारा सीता से राम और लक्ष्मण के बारे में पूछे जाने पर—
दोनों की ओर देखकर गौरांगी सीता अपनी निगाह धरती में गड़ा लेती हैं। दोहरे संकोच से संकुचित—न बताने पर ग्राम्य-वधुओं को बुरा लगेगा और बतायें तो राम के बारे में कैसे बतायें! आख़िर हिरणशावक-जैसे सुंदर नेत्रोंवाली और कोयल-जैसी मधुर वाणीवाली सीता ने संकोच और प्रेम से विगलित स्वर में कहा—जो सहज स्वभाव और सुंदर, गोरे शरीर के हैं, उनका नाम लक्ष्मण है, वे मेरे छोटे देवर हैं।  फिर उन्होंने अपने चंद्र-मुख को आँचल से ढक लिया और राम के शरीर पर एक नज़र डालकर भौंहों को टेढ़ी किया। खंजन पक्षी-जैसी अपनी आँखो को तिरछी किया और इशारे से उन्हें अपना पति बता दिया।]              

जन-ग्राह्यता के इस पहलू को तुलसी ने लगातार कितनी अहमियत दी और इस पर कितना श्रम और समय ख़र्च किया, सोचकर आश्चर्य होता है। रामचरितमानस के हर काण्ड के प्रारम्भ में आये संस्कृत श्लोकों से यह पक्ष दिन की रोशनी की तरह साफ़ हो जाता है। ये सारे श्लोक संस्कृत व्याकरण और छंदशास्त्र की दृष्टि से सर्वथा त्रुटिहीन हैं, किंतु संरचना और शब्दचयन का ऐसा जादू कि हिंदी के सामान्य जानकार के लिए भी ये सहज गम्य हैं, जैसे इन संस्कृत पदों की कोई पृथक्‌ भाषा ही न हो! संप्रेषण में यह सहजता, सरलता और गम्यता लाने के लिए कितनी दक्षता और कितना अध्यवसाय चाहिये, किसी भी रचनाकार को सहज एहसास होगा। उसे इस विडंबना का भी एहसास होगा कि सहज, सरल, सर्वगम्य लिखना कितना कठिन, कितना श्रमसाध्य होता है। भाषा और उसकी संप्रेषणीयता के प्रति तुलसी की अक्षुण्ण प्रतिबद्धता असाधारण कोटि की है जो उनकी निराडंबर और केन्द्रीभूत जनोन्मुखता की ही परिचायक हो सकती है।

विडंबना ही है कि भक्त तुलसी की निराडंबरता ही उन्हें अपने काव्य में निजी परिवेश और संस्कार तथा सामयिक भावबोध का अतिक्रमण करने और भक्तिमार्ग में अंतर्निहित समतावाद से इतर किसी वैचारिक-सामाजिक परिवर्तन की ज़मीन बनाने में अक्षम कर देती है। वे एक निष्ठावान भक्त कवि थे, समाज-सुधारक नहीं। कबीर के लिये जो सहज था, तुलसी के लिए उनके युग और उनके परिवेश के परिप्रेक्ष्य में एक आडंबरी मानवतावाद होता। वे आध्यात्मिक निष्ठा में भक्त थे किंतु सामाजिक निष्ठा में अपने युग के एक निरीह, निर्धन, निराश्रित ही सही, संयोग से ब्राह्मण थे और उसी के अनुरूप उन्हें शिक्षा-दीक्षा मिली थी। गंगा में इतना पानी बह जाने के बाद, मौजूदा दौर के शिक्षित ब्राहमणों की (राजपूतों की भी) सामान्य मानसिकता क्या है? मेरी समझ से स्वयं को साम्यवादी घोषित करने के बावजूद कुछ ब्राह्मण और राजपूत ओढ़े हुए साम्यवाद का लबादा उतरने पर कितने दंभी ब्राह्मण / राजपूत नज़र आते हैं, यह सामान्य अनुभव का विषय होना चाहिए। ब्राह्मण और राजपूत ही क्यों, अन्य जातियों में भी ऐसे लोग मिल जायेंगे जो जातीय अस्मिता के नये उभार से इस क़दर फूले रहते हैं कि छूटते ही नीयत का सवाल उठा देते हैं और उनके साथ सदाशय, सौहार्दपूर्ण संवाद असंभव हो जाता है। ऐसे में मध्यकाल की सीमाओं से सीमित तुलसी पर आधुनिक विवेकवाद और मानवतावाद की कसौटी थोपना और इस सम्बंध में उनके विचलन को अतिक्रामक महत्व देते हुए, कवि के रूप में उनके योगदान की पूर्ण अवहेलना करने से उनका समग्र और संतुलित आकलन कैसे हो सकता है?    

विशिष्टाद्वैत से उपजी सर्वजन-सुलभ सगुण विष्णु-भक्ति के श्री-संप्रदाय के संस्थापक रामानुज (1017-1137) को ब्राह्मणों के जातीय दर्प के कारण कितना कुछ झेलना पड़ा था, इतिहास में निर्विवाद रूप से दर्ज है। रामानंद की राम-केन्द्रित सगुण भक्तिधारा रामानुज के विशिष्टाद्वैत से ही निकली थी।  रामानंद रामानुज की शिष्य-परंपरा में, काशी-निवासी राघवानंद जी के शिष्य थे। वही उत्तर में इस धारा के सशक्त प्रचारक सिद्ध हुए। एक परंपरा के अनुसार कबीर ने रामानंद को अपना गुरु स्वीकार किया। कबीर का मानवतावाद रामानुज और रामानंद का मानवतावाद था जो संयोग से कबीर की सामाजिक स्थिति और उनके निजी परिवेश के लिये भी मुफ़ीद था। यह ज़रूर है कि कबीर रामानंदी सम्प्रदाय की सर्वसुलभ रामभक्ति तक सीमित नहीं रहे, शंकर के अद्वैत और तांत्रिकों के इंगला-पिंगलावाद की रहस्यमय वाणी में उलटवाँसियाँ भी रचते रहे। अंतत: उन्हें निर्गुण अद्वैतवाद का वह गूढ़ पद रचना पड़ा—‘एक कहूँ तो है नहीं, दो कहूँ तो गारी / है जैसा तैसा रहे कहे कबीर बिचारी।‘ साथ ही कबीर हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की तत्वहीन पूजा-पद्धति और सामाजिक संरचना पर क़रारी चोट करते रहे जो सिकंदर लोदी के शासन के उनके समय में संभव था, आज के धार्मिक पुनरुत्थानवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण के समय में शायद ही संभव होता। तुलसी मूलत: उसी रामानंदी सगुण धारा के भक्त थे और वही बने रहे। किंतु अपने भिन्न निजी परिवेश के चलते, तुलसी उस उन्मुक्त दार्शनिक बिंदु तक नहीं पहुँच सके, जिस बिंदु तक कबीर पहुँचे। दूसरी ओर, तुलसी ने राम को केंद्र में रखकर जनभाषा में जो सांगोपांग प्रबंधकाव्य लिखा, वह कबीर के लिए भी असम्भव था। दोनों का आकलन उनके अलग-अलग परिवेश और अलग-अलग कोटि की उपलब्धियों के परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्र रूप से होना चाहिये। एक के परिवेश-गत विचलन की दूसरे के आदर्श से तुलना करना समीचीन नहीं कहा जा सकता।     

तुलसी एक भक्त कवि थे, भक्ति कवि की मर्यादा के प्रति सतत सावधान। उस युग की कृष्ण भक्ति धारा में प्रचलित शृंगार रस का सहारा उन्होंने कभी नहीं लिया जैसा कि उनके समकालीन सूरदास ने किया। तुलसी मर्यादा पुरुषोत्तम का चरित्र रचने की संभावना से संगर्भित (वर्णाश्रमी)  सामाजिक मर्यादा के कवि थे। उनका शृंगार भी तदनुरूप सामाजिक मर्यादा का शृंगार था जो अपनी सात्विक सीमा से पाठकों और श्रोताओं को चमत्कृत करता है—

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन राम हृदय गुनि॥ 
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्हीं। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सियमुख ससि भए नयन चकोरा। 
भये बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥
(बा. कां. 229: 1-4)

[जनकपुर। पुष्पवाटिका में सीता और राम का प्रथम मिलन। अनुप्रास की अद्भुत्‌ ध्वनि से शुरू होती है चौपाई। (सीता के हाथों के) कंगन, (कमर की) करधनी, और (पैरों के) नूपुर की मिली-जुली ध्वनि सुनकर राम हृदय में विचार करने के बाद लक्ष्मण से कहते हैं—मानो कामदेव विश्वविजय के संकल्प से दुंदुभी बजा रहे हों। ऐसा कहकर राम ने पुन: सीता की ओर देखा। फिर तो सीता का मुख चंद्रमा बन गया और राम की दृष्टि उसे निहारने वाली चकोर। सीता को देखते हुए राम के सुंदर नेत्र स्थिर हो गये। मानो निमि (जनक के पूर्वज, जिनका निवास पलकों में माना जाता है) ने सकुचाकर राम की पलकों को त्याग दिया जिससे झपने-खुलने का उनका गुणधर्म जाता रहा।]           

तुलसी ने वाल्मीकि के ग्रंथ में प्रक्षिप्त (दे. अगला भाग) सीता-निर्वासन और शम्बूक-वध प्रसंग को निकाल फेंका जो वाल्मीकि के निकटतर परवर्ती कालिदास (पहली शताब्दी ई. पू.) और भवभूति (आठवीं शताब्दी) नहीं कर सके। दोनों ने सीता के व्यक्तित्व को अधिक सशक्त, अधिक मुखर ज़रूर बनाया। भवभूति ने तो सीता-निर्वासन की त्रासदी को राम की राजनीतिक विवशता के दंड स्वरूप उनकी व्यक्तिगत त्रासदी—आत्मनिर्वासन की पीड़ा--में अंतरित करने का प्रयास किया। किन्तु दोनों उत्कृष्ट कवि परंपरा को विदीर्ण करनेवाले प्रक्षिप्त को नहीं पहचान सके।

तुलसी अपने परिवेश और संस्कार में सहज रूप से व्याप्त वर्णाश्रम और उसमें निहित पूर्वाग्रहों से तो मुक्त नहीं हो पाये किंतु उन पर ब्राह्मणवादी होने का आरोप सर्वथा निराधार है। राम ने आततायी ब्राह्मण रावण का वधकर उपमहाद्वीप के निवासियों को उसके आतंक से मुक्त किया। पौराणिक परंपरा के अनुरूप, इसके बावजूद, राम को ब्रह्महत्या का पाप लगा और उन्हें उसका प्रायश्चित्त करना पड़ा। तुलसी ने ब्राह्मणों द्वारा रचित इस अयुक्तिपूर्ण मिथक का परित्याग कर दिया। दूसरे ब्राह्मण परशुराम (जिन्हें विष्णु पुराण में विष्णु के दस मुख्य अवतारों में शामिल किया गया है) को तो तुलसी ने एक हास्यास्पद खलनायक बना दिया। शिवधनुष टूटने से कुपित, अपना फरसा लिये, तड़कते-भड़कते वे रंग में भंग डालने पहुँच जाते हैं। अपने दम्भपूर्ण दुर्वचनों से पहले लक्ष्मण, फिर राम को खुलेआम अपमानित करते हैं, लक्ष्मण की तो हत्या तक करने को तत्पर हो जाते हैं। फिर जैसे तड़कते-भड़कते आये थे, राम का प्रभाव जान लेने पर वैसे ही शांत और विनत होकर तपस्या के लिये वन चले गये। तुलसी ने अपने समय के पाखंडी ब्राह्मणों की जमकर ख़बर ली है। पत्नी की मृत्यु और घर व सम्पत्ति के नष्ट होने पर गृहस्थी के उत्तरदायित्व से पलायन कर मात्र जीविका चलाने के लिये सन्यासी बननेवाले ब्राह्मणों की घोर आलोचना की है। रामचरितमानस भ्रष्ट और ढोंगी ब्राह्मणों के कुकृत्यों से भरा पड़ा है। तुलसी उन्हें निरक्षर, लोलुप, दंभी कहते हैं, समाज की पतनोन्मुखता के लिए उन्हें उत्तरदायी ठहराते हैं—जिसमें तपस्वी का बाना (बड़े नाखून और बड़ी-बड़ी जटायें) बनाये लोग (आज की ही तरह) धनवान हैं जब कि गृहस्थ दरिद्र हैं। 

खलनायक की भूमिका में समुद्र द्वारा शूद्र और स्त्री की अस्मिता के विरुद्ध कहे गये वचन, रावण के वचनों की तरह ही, तुलसी के वचन नहीं माने जा सकते। किंतु तत्कालीन समाज में शूद्रों के प्रति व्याप्त पूर्वाग्रह यत्र-तत्र रामचरितमानस में निश्चय ही व्यक्त हुआ है जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। किंतु रामचरितमानस का कोई शूद्र पात्र खलनायक या खल की भी भूमिका में नहीं मिलता।

इसके बरअक्स सम्पूर्ण रामचरितमानस का मूल स्वर द्वंद्वों और विरोधों में समन्वय और सामंजस्य का है। तुलसी-साहित्य के विशाल फलक पर शैव-वैष्णव, भक्ति-ज्ञान, निर्गुण-सगुण, क्षत्रिय-ब्राह्मण-निषाद-भील (शबरी), मानव-बंदर-रीछ, नागर संस्कृति-वन संस्कृति, उत्तर-दक्षिण, संस्कृत-अवधी-व्रज, दोहा-चौपाई-सोरठा-कवित्त--कई-कई आयामों में सामंजस्य और समन्वय का स्वर व्याप्त है जो किसी भी अन्य कवि की तुलना में तुलसी को विशिष्ट बनाता है। 

तुलसी के काव्य-व्यक्तित्व के आकलन में आनुषंगिक को उभारकर केंद्रीय अभिप्रेत की अवहेलना करना उतना ही दुर्भावनापूर्ण है जितना तत्कालीन समाज में व्याप्त स्त्रियों और शूद्रों के प्रति पूर्वाग्रह जिसे तुलसी ने अपनी स्वभावगत सरलता में यत्र-तत्र बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त कर दिया है। कहना नहीं होगा, तुलसी से पॅलिटिकल करेक्टनेस की अपेक्षा करना सर्वथा परिप्रेक्ष्य-विहीन होगा। तुलसी और कबीर दोनों हमारी परंपरा की उत्कृष्ट देन हैं। उनमें आज के आधुनिक भावबोध के लिए जो प्रासंगिक है उसे सँजोने और जो अप्रासंगिक है उसे त्यागने के अलावा मुझे और कोई वरेण्य और संतुलित मार्ग नहीं दिखता। परंपरा में यदि कुछ मूल्यवान है तो उसकी सार्थकता इसी में हो सकती है।     
(क्रमश:)

कमलकांत त्रिपाठी
© Kamlakant Tripathi

तुलसी का योगदान (2) 
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Saturday, 4 February 2023

कमलाकांत त्रिपाठी / तुलसी का योगदान (2)

क्या तुलसी ने वर्णाश्रम की पुन:प्रतिष्ठा के लिए षड्यंत्र किया ?

संदर्भ: मुक्तिबोध का आलेख—‘मध्ययुगीन भक्ति-आंदोलन का एक पहलू’ (जन विकल्प, सितंबर 2007) 

अंधभक्ति किसी के प्रति हो, त्याज्य है। मुक्तिबोध जैसों ने स्वयं अंधभक्ति का प्रत्याख्यान रचा; उनके प्रति अंधभक्ति उनकी आत्मा का तिरस्कार है। अपने अनुयायियों में अंधभक्ति की लहर देखकर ही अंतत: मार्क्स को कहना पड़ा था, वे मार्क्स हैं, मार्क्सिस्ट नहीं। मानव-मस्तिष्क की सीमाओं के आलोक में यह स्वत:सिद्ध है कि अतिशय पारदर्शी ईमानदारी के बावजूद आकलन में विचलन हो सकता है। तो असहमति और विमर्श की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी।

अपने आलेख ‘मध्ययुगीन भक्ति-आंदोलन का एक पहलू’ में मुक्तिबोध ने बिंदु-दर-बिंदु पाँच निष्कर्ष निकालने (आगे देखें) के बाद यह स्थापित किया है कि निर्गुण मतवाद के जनोन्मुख रूप और उसकी क्रांतिकारी, जाति-विरोधी भूमिका के विरुद्ध तुलसीदास ने पुराण-मतवादी स्वरूप प्रस्तुत किया जिससे आगे चलकर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा हुई। सवाल है, क्या तुलसी ने इसे सायास, किसी षड्यंत्र के तहत किया ?

अपने आलेख में मुक्तिबोध स्वीकार करते हैं कि तुलसी नि:संदेह एक सच्चे संत थे और उनका रामचरितमानस साधारण जनता में भी उतना ही प्रिय रहा जितना  उच्चवर्गीय लोगों में। यह भी कि कट्टरपंथियों ने अपने उद्देश्यों के अनुरूप तुलसी का उपयोग किया, जिस तरह आज (मुक्तिबोध के समय में) कट्टरपंथी हिन्दू शिवाजी और रामदास का कर रहे हैं। लेकिन मुक्तिबोध ने आश्चर्य भी व्यक्त किया है कि आजकल (मुक्तिबोध के समय में) प्रगतिवादी तबकों में तुलसीदास के संबंध में जो कुछ लिखा गया है, उसमें जिस सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के तुलसी अंग थे, उसको जान-बूझकर भुला दिया गया है।

अपने पहले निष्कर्ष में मुक्तिबोध भक्ति-आंदोलन की शुरुआत दक्षिण भारत से मानते हैं जो एक ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन आगे उन्होंने लिखा है कि दक्षिण से शुरू हुए इस आंदोलन को वेद-उपनिषदवादी शक्तियों ने प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि आलवार संतों और उनके प्रभाव में रहनेवाले जन-साधारण ने किया; इसके प्रारम्भिक चरण में निम्नवर्गीय तत्व सर्वाधिक सक्षम और प्रभावशाली रहे, जब कि हिंदू सामंती वर्गों के समर्थक कट्टरपंथी तत्व इस नवीन सांस्कृतिक चेतना के एकदम विरुद्ध थे। यहाँ मुक्तिबोध ने दक्षिण के कर्नाटक इलाक़े में वसवन्ना द्वारा सम्पन्न हुए एक सशक्त और काफ़ी हद तक सफल जाति-विरोधी, ब्राह्मणी व्यवस्था-विरोधी आंदोलन की अवहेलना कर दी। वसवन्ना वेद-उपनिषदवादी धारा में ही पले-बढ़े एक विद्वान ब्राह्मण थे। उनके जाति-विरोधी आंदोलन की परिणति लिंगायत समुदाय के प्रादुर्भाव में हुई जो आज तक न केवल जीवित है बल्कि फल-फूल रहा है। लेकिन मुख्य मुद्दा यह है कि दक्षिण में वे कौन-सी शक्तियाँ थीं जिन्होंने आलवार संतों और बसवन्ना के क्रांतिकारी प्रभाव को नष्ट कर दिया, जिस काम के लिए, मुक्तिबोध के अनुसार, उत्तर भारत में तुलसी के रामचरितमानस का उपयोग हुआ। बंगाल में क्या प्रक्रिया हुई, इसका तो मुक्तिबोध के लेख में कोई सुराग़ तक नहीं मिलता, जब कि वहाँ भी (तुलसी के बाद के समय में) ‘भद्र लोक’ और श्रमजीवी जातियों के बीच वैसी ही खाई मौजूद पाई गई।

मुक्तिबोध ने केवल उत्तर भारत और महाराष्ट्र के सांस्कृतिक इतिहास के हवाले से भक्ति-आंदोलन की धारा और उसकी परिणति का लेखा-जोखा लिया है। उनकी स्थापना है कि उत्तर भारत में कट्टरपंथी तत्वों में से कई निर्गुण संतों के भक्ति-आंदोलन के प्रभाव में आ गए थे, लेकिन आगे चलकर उन्होंने भक्ति-आंदोलन को अपने तरीक़े से प्रभावित भी किया। उनके पुराणवादी संस्कारों से प्रेरित भावावेशवादी कृष्णभक्ति निर्गुण मत के विरुद्ध संघर्ष करने लगी, जिसने एक क़दम आगे बढ़कर तुलसी की रामभक्ति का रूप धारण कर लिया और वर्णाश्रम धर्म की पुन:प्रतिष्ठा कर दी। महाराष्ट्र के बारे में उन्होंने लिखा है कि ज्ञानेश्वर, तुकाराम आदि संतों की व्यापक मानवतावादी वाणी ने हिन्दू-मुस्लिम दोनों प्रकार के सामंती उच्चवर्गों से पीड़ित, ग़रीब, किसान जनता का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके बाद सनातनी, ब्राह्मणवादी संत रामदास इन्हीं मानवतावादियों से आ मिले; उन्होंने शिवाजी के रूप में एक नायक खड़ा किया। शिवाजी के छापामार युद्धों के सैनिक और सेनाध्यक्ष समाज के ग़रीब और शोषित जातियों—कुनबियों, धनगरों, मराठों--से आए और एक नवीन सैन्य सामंतवाद को जन्म दिए। किन्तु शिवाजी के बाद राजसत्ता उच्च कुलोत्पन्न ब्राह्मण पेशवाओं के हाथ में पहुँच गई, जब कि सैन्य सत्ता उन्हीं शोषित जातियों से आए नए सामंतवादियों के हाथ में रही, और जातिवादी पुराणधर्म पुन: प्रतिष्ठित हो गया। तो, मुक्तिबोध के अनुसार, जो काम उत्तर भारत में निर्गुण धारा में घुसे सवर्णों की भावावेशवादी कृष्णभक्ति ने एक सोपान आगे बढ़कर तुलसी की रामभक्ति के रूप में किया, वही काम महाराष्ट्र में ब्राह्मण पेशवाओं और शोषित जातियों से आए सैन्य सामंतवादियों के गठजोड़ ने किया।

यहाँ यह ध्यातव्य है कि मुक्तिबोध ने दोनों में से किसी को किसी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं बताया है।

इतिहास पर एक तटस्थ दृष्टि डालने से स्पष्ट हो जाएगा कि मुक्तिबोध ने महाराष्ट्र की एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया का अतिसरलीकरण कर दिया है—सिर्फ़ दो उदाहरण। एक, शिवाजी की निर्मिति में माँ जीजाबाई के साथ शुद्ध सनातनी ब्राह्मण दादा कोण्डदेव की भूमिका को उन्होंने बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया है। दो, जीजाबाई की ओर से देवगिरि के प्रसिद्ध यादवों तथा पिता शाहजी की ओर से मेवाड़ के सिसोदियों का वंशज होने का दावा करने के बावजूद शिवाजी को छत्रपति के रूप में राज्यारोहण के समय काशी से सनातनी पंडित गंगभट को बुलाने की ज़रूरत क्यों पड़ी ? इसका कोई उत्तर मुक्तिबोध के आलेख में नहीं मिलता।

उत्तर भारत में मुक्तिबोध ने जो सवर्णों की कृष्णभक्ति शाखा के तुलसी की रामभक्ति के रूप में प्रस्फुटन को वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है, वह तो एकदम कल्पना-प्रसूत लगता है।

बौद्धिकों से एक सामान्य, प्रकृतिगत भूल, जो अक्सर हो जाती है, वह यह है कि वे समाज और मानव-व्यवहार की धारा को बदलने में विचारों की भूमिका को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं। एक रैदास आते हैं और उनकी वाणी से समाज का सोया हुआ शोषित वर्ग करवट लेने लगता है। फिर उसी धारा में रुक-रुककर या एक ही समय में कबीर, नाभा सिंपी, सेना नाई अदि आते हैं और सामाजिक क्रांति उठ खड़ी होती है। लेकिन आगे चलकर उसी धारा में उच्चवर्गीय कृष्णभक्त कवि घुस जाते हैं तो क्रांति की धारा कुंद पड़ने लगती है। फिर रामभक्ति लेकर तुलसी आते हैं और वह धारा उलट जाती है तथा वर्णाश्रम धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा हो जाती है।

विचारणीय यह है कि शोषित वर्ग के इन निर्गुण संतों में से किसी के पास कोई मठ या आश्रम नहीं था, न ही आज की तरह के प्रचारकर्ता थे, न छापाखाना था, न मीडिया था, न द्रुत आवागमन के सर्वसुलभ साधन थे. इनकी कृतियों की हस्तलिखित प्रतियाँ इनके जीवनकाल में कुछ गिने-चुने लोगों तक ही पहुँची होंगी। तो इनकी वाणी इनके इर्द-गिर्द जुटी जनता और उसके सम्पर्क में आनेवालों तक ही सीमित रही होगी. क्या इनके काव्य-जगत के नए रुझानों ने सामाजिक संरचना के यथार्थ और मानव-व्यवहार में कोई बदलाव किया ? इतिहास में इसका कोई साक्ष्य नहीं मिलता। मान्यता है कि कबीर ने एक लंबी उम्र पाई थी लेकिन जीवन के अंत तक उनकी वाणी में सामाजिक आडंबरों और ऊँच-नीच के भेद को लेकर उतनी ही तल्ख़ी बनी रही, जो इसी बात की परिचायक हो सकती है कि उनके जीवनकाल में तो कोई अपेक्षित परिवर्तन आया नहीं।

आज के परिदृश्य पर भी एक नज़र डाल ली जाए। मैंने जब से होश सँभाला है, देश के बौद्धिक वर्ग को प्राय: वामपंथी रुझानवाला, प्रगतिशील, नारीवादी. साम्प्रदायिकता-विरोधी, जाति-विरोधी और दलित, पिछड़ा व स्त्री अस्मिता का समर्थक ही देखा है। हंस-जैसी कई पत्रिकाएँ इस दिशा में निरंतर कार्य करती रहीं। लेकिन अगर संवैधानिक और जनतान्त्रिक व्यवस्था में वयस्क मताधिकार के प्रतिफल के रूप में निचली और पिछड़ी जातियाँ सत्ता में भागीदारी न पातीं तो इन सबके सारे प्रयास शायद ही कुछ हासिल कर पाते। अब संप्रदायिकता की उठान को देखिए। आधा गाँव, टोपी शुक्ला, आख़िरी कलाम जैसे अनेक सांप्रदायिकता-विरोधी उपन्यास केवल हिन्दी में आए। कविता-कहानी की तो कोई गिनती ही नहीं। यह तब है जब प्रचार माध्यमों द्वारा साहित्य और उसके रुझानों का समाज में जिस तरह से प्रचार-प्रसार होता है, कबीर आदि के युग में उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। वामपंथी दलों ने भी संप्रदायवाद पर लगाम लगाने का निरंतर प्रयास किया और आज भी कर रहे हैं। लेकिन हासिल क्या है— कोई भी निष्पक्ष प्रेक्षक यही पाएगा कि देश भर में मोटे तौर पर दोनों ही फ़रीकों में सांप्रदायिकता की भावना कम होने के बजाय बढ़ी है।

इस संदर्भ में विश्व में वामपंथी विचार की व्यावहारिक परिणति के इतिहास से भी कोई आशाजनक दृश्य नहीं उभरता। मार्क्स ने न केवल साम्यवादी विचार दिया, अपने मित्र एंजेल्स के साथ मिलकर लगातार यूरोप के समाजवादी आंदोलन में सक्रिय भूमिका भी निभाई। सन्‌ 1848 में साम्यवादी घोषणापत्र के छपने से लेकर पूरे योरोप के तमाम बौद्धिक लोग इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में प्राण-प्रण से जुटे रहे। यूरोप के विभिन्न देशों के वामपंथी समूहों और मज़दूर संगठनों को 1864 में फ़र्स्ट इंटरनेशनल के झंडे तले एकत्र किया गया। लेकिन 1871 में पेरिस विद्रोह हुआ तो इस आंदोलन के चलते नहीं, बल्कि प्रशा के साथ हुए युद्ध में फ़्रांस की पराजय से उत्पन्न हताशा के चलते, जिसे तुरंत दबा भी दिया गया। जब विश्व युद्ध आया, लेनिन ने भविष्यवाणी की कि दुनिया भर के श्रमिक मिलकर पूँजीवादी सरकारों का तख़्ता पलटा देंगे। हुआ ठीक उल्टा। युवा श्रमिकों और किसानों ने अपने-अपने राष्ट्र की ओर से लड़ते हुए दूसरे राष्ट्रों के अपने श्रमिक-किसान भाइयों का ही ख़ून बहाया। क्रांति हुई तो मार्क्स के विचार के अनुरूप किसी उन्नत पूँजीवादी देश में नहीं, बल्कि रूस में, जो अभी तक सामंतवाद की जकड़ से ही मुक्त नहीं हुआ था। और क्रांति में मुख्य भूमिका निभाई जर्मनी से पराजय की ओर उन्मुख रूस के हताश सैनिकों ने। खंदकों में ठंड और भूख से पीड़ित, ज़ार के लिए लड़ रहे इन हताश सैनिकों में जूते, कंबल और डबल रोटी बाँटकर जर्मनों ने उन्हें मोरचा छोड़कर भागने के लिए प्रेरित किया। और सोवियतों (समितियों) में श्रमिकों के साथ मोरचा छोड़कर भागे इन्हीं सैनिकों की भूमिका क्रांन्ति में निर्णायक सिद्ध हुई। राष्ट्रीय युद्धों में पराजयोन्मुख राष्ट्र के सैनिकों की उस राष्ट्र में सर्वहारा क्रांति लाने में भूमिका मार्क्सवादी प्रमेय में सर्वथा अकल्पनीय है।

रूस में क्रांति के लिए जो विशेष अवसर प्रथम विश्व युद्ध और उसमें रूस की पराजयोन्मुख हताशा ने प्रदान किया था, वैसा ही अवसर विश्वयुद्ध के ठीक पहले चीन पर जापानियों का बर्बर आक्रमण और युद्ध के दौरान जापानी क़ब्ज़े से चीन के मुक्ति-संघर्ष ने उपस्थित किया।साम्यवादियों द्वारा मुक्त किए गए इलाक़ों में जनता का जापानियों के अत्याचार से छुटकारा पाना माओ के विपुल जन-समर्थन का कारण बना। इस जन-समर्थन के चलते ही अमेरिका से च्यांग काई शेक की मदद में आए हथियार साम्यवादियों के हाथ में पहुँचते गए, जिससे अक्टूबर, 1949 तक पूरे चीन पर माओ का कब्ज़ा संभव हो सका।

और पूर्वी जर्मनी सहित पूर्वी व केंद्रीय योरोप के देशों तथा उत्तरी कोरिया में तो साम्यवाद लाने में किसानों-मज़दूरों या जनता के किसी तबक़े की कोई भूमिका ही नहीं रही, वहाँ तो एक अनन्य परिघटना के तौर पर नाज़ियों / जापानियों को हराते हुए सोवियत सेना जहाँ तक पहुँच सकी, वहाँ तक साम्यवाद आ गया. मार्क्स ने इस तरह की क्रांति की क्या तो परिकल्पना की होगी !

फिर आख़िर क्या हुआ कि पूर्वी जर्मनी के लोग जान जोख़िम में डालकर बर्लिन की दीवार फाँदने लगे और अंतत: उसे तोड़ना पड़ा। और हंगरी (1956), चेकोस्लोवाकिया (1968) तथा पोलैंड (1982-83) में साम्यवादी रूस के वर्चस्व द्वारा जिस तरह दमन हुआ उसी का नतीज़ा है कि मिलान कुंडेरा जैसे तमाम लोगों को भागकर पश्चिमी योरोप के देशों में (कुंडेरा को फ़्रांस में) शरण लेनी पड़ी; कुंडेरा के लगभग सभी उपन्यासों में पहले नाज़ी जर्मनी और फिर साम्यवादी शिकंजे में कसे इन देशों का आतंकित जन-मानस कहीं न कहीं से परिलक्षित हो ही जाता है।

तो एक बात जो समझ में आती है वह यह कि मानव-व्यवहार और इसलिए समाज-व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन लाने में विचारों की भूमिका बहुत धीमी, बहुत क्षीण रही है। लोग प्राय: ग़लत-सही, न्याय-अन्याय की अवधारणा से नहीं, बल्कि अपनी अवैज्ञानिक और बहुत हद तक अपरिभाषेय प्रवृत्तियों और स्वभाव व चरित्र के विचलनों से परिचालित होते रहे हैं और किसी विचार के साथ जुड़े होने का बस नाट्य करते रहे हैं। असली मौक़ा आने पर स्वार्थ, सुरक्षा, शोषण और वर्चस्व जैसे तत्वों के घालमेल से बनी यही प्रवृत्तियाँ हावी हो जाती हैं और इनसे उपजे निहित स्वार्थ यथास्थिति की ऐसी क़िलाबंदी कर देते हैं कि वह विचारों और आदर्शों के तोड़े नहीं टूटती। और ये प्रवृत्तियाँ वर्गों और जातियों से परे होती हैं—सभी जगह अपवाद भी मिलते हैं, इसीलिए इन्हें अपरिभाषेय कहा। 

इन्हीं सहजात मानव-प्रवृत्तियों के चलते जाति-उन्मूलन की लड़ाई वर्चस्व की लड़ाई में बदल जाती है और पहले की दुर्व्यवस्था ही फिर से उलटकर खड़ी होने लगती है। जातीय श्रेष्ठता, यहाँ तक कि जातीय अस्मिता की भावना मिथ्या ही नहीं अमानवीय भी है, यह एक तरह का नस्लवाद है, मनुष्यता के लिए अभिशाप है और इसी रूप में इससे निपटा जाना चाहिए। यह कहकर कि जातियाँ तो रहेंगी और सबका अपना गौरवशाली इतिहास है, सबकी अपनी पहचान है, जिसे दबाया गया है, उनकी पुन:प्रतिष्ठा की जानी चाहिए, हम फिर उसी ख़तरे की पूर्व-पीठिका तैयार कर रहे हैं, जिसने इस देश में बढ़ते-बढ़ते सुरसा का रूप धारण कर लिया था, और आज तक पीछा नहीं छोड़ रहा है। एक सुलभ शोषण के औज़ार के रूप में इसका बहुत क्रूर इस्तेमाल हुआ था और किसी न किसी रूप में आज भी हो रहा है।

शोषण वह मानवीय प्रवृत्ति है जो व्यक्ति-केन्द्रित है। सभी जातियों, सभी वर्गों और सभी धर्मों में अच्छे, सदाशय लोग मौजूद हैं और खुला, पूर्वाग्रह-मुक्त दिमाग़ रखनेवाले किसी भी व्यक्ति को दिख भी जाएँगे. तो सारे दुर्गुण न तो जाति-प्रसूत हैं, न निजी सम्पत्ति की देन हैं. मार्क्स की निजी सम्पत्ति-केंद्रित वर्ग-चेतना और वर्ग-स्वभाव में फ़्रायड के अवचेतन और सत्ता-कामना का तड़का लगा होता तो वह शायद सत्य के ज़्यादा क़रीब होता। और यदि उन्हें आधुनिक जेनेटिक्स की वैसी जानकारी होती जैसी आज उपलब्ध है तो शायद उनका प्रमेय ही कुछ और होता. जेनेटिक्स ने इस जनतान्त्रिक प्रमेय को सप्रमाण सिद्ध कर दिया है कि जाति,रंग और नस्ल की श्रेष्ठता या हीनता की सारी धारणाएँ शुद्ध बकवास हैं. और आर्थिक वर्ग की सभी मानवीय इकाइयाँ भी किसी भट्ठे से निकली ख़ास नंबर की ईंटों जैसी एकरूप नहीं होतीं. धूर्त और मासूम, पाखंडी और जेन्युइन हर वर्ग में पाए जाते हैं। और विश्व में मार्क्सवाद के क्रियान्वयन का इतिहास मानव-स्वभाव के इसी विचलन का इतिहास बन जाता है.   

तुलसीदास के जीवन के जितने प्रसंग मिलते हैं, उनसे तो यही लगता है कि वे अपनी ही जाति से अपमानित, उसके आडंबरपूर्ण द्वेष के शिकार, भाषा-जैसे कई मुद्दों पर गर्हित-प्रतारित और भांति-भांति के लोगों द्वारा सताए हुए थे। भावुक, सहृदय व्यक्ति थे। ऐसे में उन्हें वाल्मीकि से चली आ रही उसी ब्राह्मणी परंपरा में राम-भक्ति का एक अवलंब मिला जो उन्हें परिवार, जाति और गुरु से प्राप्त हुई थी। उसे गले से लगाकर वे राममय हो गए। रामचरितमानस पढ़ते हुए लगता है, तुलसी के राम एक कल्पित किन्तु भाव-साकार इयत्ता के रूप में सदैव उनके सामने मौजूद हैं, जिसमें तुलसी वह सब कुछ भर देना चाहते है जो मनुष्य के बारे में उनकी आकांक्षा का चरम है। ‘नानापुराणनिगमागम’ से पुराणवादी परंपरा का संकेत भले मिलता हो, उत्तरकाण्ड में जो ज्ञान-भक्ति निरूपण है वह उपनिषदों के शुद्ध, निर्गुण एकात्मवाद से भक्तिवाद का सहमेल है। राम की सगुण भक्ति और औपनिषद निराकार तत्वज्ञान के साथ उसके संश्लेषण से इतर रामचरितमानस में जो कुछ है, उसका प्रतिपाद्य नहीं, मात्र आनुषंगिक है, और आज तक की सामान्य सवर्ण मानसिकता को देखते हुए काफ़ी उदार और समावेशी भी. ऐसे में रामचरितमानस को सायास वर्णाश्रम धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा का ‘श्रेय’ देना गले नहीं उतरता, वह चाहे बाबा नागार्जुन करें, चाहे मुक्तिबोध, चाहे कोई और।

वर्णाश्रम धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा तुलसी के वश का रोग ही नहीं था, किसी भी एक व्यक्ति या ग्रंथ के वश का नहीं था। और वश में होता भी तो, उसकी ज़रूरत ही नहीं थी। वर्णाश्रम धर्म कहीं गया ही नहीं था, बहुत मज़बूती से निहित स्वार्थों और शोषक मानव-प्रवृत्तियों से पोषित-संरक्षित अपनी जगह अटल था। जो काम महात्मा बुद्ध और काफ़ी समय तक राजाश्रय में रहे बौद्ध धर्म से नहीं हुआ, वह रैदास और कबीर आदि के करने से होनेवाला नहीं था।

कबीर का तत्वज्ञान निश्चय ही अधिक समतामूलक, आडंबर-विरोधी और मानवतावादी है और इस अर्थ में अधिक वैज्ञानिक और ‘आधुनिक’ भी. लेकिन हठयोग और तंत्र-विद्या के बीच झूलता उनका इंगला-पिंगलावाला रहस्यवाद तुलसी के उत्तरकाण्ड के औपनिषद रहस्यवाद से कहीं ज़्यादा अटपटा, मध्ययुगीन और प्रतिक्रियावादी है। मुक्तिबोध ने ठीक ही लिखा है कि हम कबीर से जनवादी संदेश तो लेना चाहते हैं लेकिन उनके रहस्यवाद से मुँह मोड़ना चाहते हैं, जो तत्कालीन विचारधारा की सीमाओं का द्योतक होने से केवल समाजशात्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है। उसी तर्ज़ पर तुलसी का वर्णाश्रमवाद भी उनके समय और उनके जातीय परिवेश के समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है, लेकिन कहीं से उनके द्वारा किए गए किसी षड्यंत्र का द्योतक नहीं। किसी तरह के षड्यंत्र का विचार उनके सरल, सहृदय, भक्तिमय व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता। ख़ासकर जब वे अपने ही वर्ग से भाषा आदि अनेक पहलुओं पर निंदित-प्रतारित रहे थे।

कबीर और उनके अनुयायी श्रमजीवी शोषित जातियों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान तो भर सकते थे लेकिन ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना में दरार पैदाकर उस आत्मसम्मान को स्वीकृति नहीं दिला सकते थे। वे ब्राह्मणवादियों के सामने बस रहस्य के थोड़ा और ऊंचे आसन पर बैठकर मुँह चिढ़ा सकते थे और, जैसा की संकेत है, तुलसी के समय में उनके अनुयायी यही कर रहे थे।  पर यह कोई नई बात नहीं थी। बहुत प्राचीन काल से लोकायतों और आजीविकों की कर्मकांडविरोधी, वर्णविरोधी, अनीश्वरवादी और इहलोकवादी परंपरा चली आई थी। ये लोकायत और आजीविक ब्राह्मणवादियों को ताल ठोंककर शास्त्रार्थ के लिए ललकारा करते थे। बाद में वेदान्त के उत्कर्ष ने उन्हें इस क़दर निगल लिया कि उनके केवल विद्रूपात्मक संदर्भ माधवाचार्य के सर्वदर्शनसंग्रह (तेरहवीं शताब्दी) में शेष रह गए।

तो तुलसी और कबीर दोनों में जो सार्थक और समीचीन है उसे लेकर, उनके समय-सीमित और आज के लिए अप्रासंगिक हो उठे को छोड़ना पड़ेगा। परंपरा में यदि कुछ सारतत्व है तो उसके साथ तभी न्याय होगा। जहाँ नहीं वहाँ षड्यंत्र सूँघनेवाला (इसके लिए कुछ लोगों द्वारा एक जगह जुटकर की गई दुरभिसंधि का साक्ष्य अनिवार्य है) और छूटते ही नीयत पर निराधार शक कर देनेवाला इस तरह का सरलीकृत विमर्श गँदले पानी को और गँदला करने के सिवा और कुछ नहीं करेगा।
(क्रमशः) 

कमलाकांत त्रिपाठी
© Kamlakant tripath

तुलसी का योगदान (1) 
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