Saturday, 4 February 2023

दिल्ली की एक अदालत ने, 2019 की जामिया हिंसा के अभियुक्तों को, अपराध में लिप्त न पाए जाने पर, बरी कर दिया / विजय शंकर सिंह

2019 के दिल्ली के जामिया यूनिवर्सिटीहिंसा मामले में शरजील इमाम, सफूरा जरगर, आसिफ इकबाल तन्हा और आठ अन्य को बरी करते हुए, दिल्ली की एक अदालत ने आज 04/02/23 को कहा कि ,"पुलिस "वास्तविक अपराधियों" को पकड़ने में असमर्थ थी और "निश्चित रूप से उन्हें (इन व्यक्तियों को) बलि का बकरा बनाने में कामयाब रही।"  .
"गलत तरीके से चार्जशीट" दायर करने के लिए अभियोजन पक्ष की खिंचाई करते हुए, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अरुल वर्मा ने कहा कि "पुलिस ने विरोध करने वाली भीड़ में से कुछ लोगों को, आरोपी और अन्य कुछ को पुलिस गवाह के रूप में पेश करने के लिए "मनमाने ढंग से उनको चुना" है।"

अदालत ने टिप्पणी की, "मनमाने ढंग से, इस तरह का चयन यह "चेरी पिक" है, जो निष्पक्षता के सिद्धांत के लिए हानिकारक है। यह देखते हुए कि बिना, किसी प्रत्यक्ष प्रतिभाग और कृत्यों के,  विरोध स्थल पर मात्र उपस्थिति से, किसी को, अभियुक्तों के रूप में, नहीं चुना जा सकता है। अभियोजन पक्ष द्वारा की गई कार्यवाही, अभियुक्तों के खिलाफ "लापरवाही और गुस्ताख फैशन" के रूप में शुरू किया गया है।"

जज ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि, "ऐसे व्यक्तियों को, इस तरह के लंबे समय तक चलने वाले, कठोर मुकदमे से गुजरने देना देश की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए अच्छा नहीं है।"
"विरोध और बगावत के बीच के अंतर को समझने के लिए जांच एजेंसियों को और अधिक संवेदनशील होकर साक्ष्य और उनका अध्ययन करना होगा। बगावत बिलकुल भी नहीं मान्य है पर विरोध का लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक मान्य स्थान है। विरोध, असहमति के लिए, उन नागरिकों के  एक मंच के  रूप  में है, किसी नागरिक की अंतरात्मा को चुभता है, और वह विरोध के लिए तत्पर हो जाता है।"
इस प्रकार अदालत ने शरजील इमाम, आसिफ इकबाल तन्हा, सफूरा जरगर, मो.  अबुजर, उमैर अहमद, मो.  शोएब, महमूद अनवर, मो.  कासिम, मो.  बिलाल नदीम, शहजर रजा खान और चंदा यादव को बरी कर दिया।  

यह मामला दिसंबर, 2019 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हुई हिंसा की घटनाओं से जुड़ा है। प्राथमिकी (FIR) में कथित रूप से दंगा करने और गैरकानूनी रूप से एकत्र होने का अपराध वर्णित किया गया था। एफआईआर, धारा 143, 147, 148, 149, 186, 353, 332, 333, 308, 427,  मामले में आईपीसी की धारा 435, 323, 341, 120बी और 34 के अंतर्गत दर्ज की गई थीं। हालांकि, शरजिल इमाम अभी भी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के संबंध में दर्ज अन्य एफआईआर में हिरासत में है। इमाम, तनहा और सफूरा जरगर को स्पेशल सेल के मामले में आरोपित किया गया है, जिसमें 2020 के पूर्वोत्तर दिल्ली दंगों के पीछे बड़ी साजिश का आरोप लगाया गया है।

पुलिस ने 21 अप्रैल, 2020 को मोहम्मद इलियास के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। इसके बाद 11 अन्य आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ दूसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की गई थी, जिन्हें इस मामले में आरोपमुक्त कर दिया गया है। आरोप पर दलीलें जारी रखने के दौरान हाल ही में 1 फरवरी, 2023 को तीसरा पूरक आरोप पत्र भी दायर किया गया था।  अभियोजन पक्ष ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि गवाहों ने कुछ तस्वीरों के आधार पर आरोपी व्यक्तियों की पहचान की थी।

सत्र न्यायाधीश ने पाया कि दिल्ली पुलिस, नए सबूत पेश करने में विफल रही और इसके बजाय एक और पूरक चार्जशीट दायर करके "आगे की जांच" की आड़ में पुराने तथ्य पेश करने की कोशिश की। "वर्तमान मामले में, पुलिस के लिए एक चार्जशीट और एक नहीं बल्कि तीन सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करना सबसे असामान्य रहा है, जिसमें वास्तव में कुछ भी नया नहीं है।  यह चार्जशीट दाखिल करने का सिलसिला  बंद होना चाहिए, अन्यथा यह जुगाड़ महज अभियोजन से परे कुछ और दर्शाता है, तथा आरोप पत्रों को संदिग्ध बना देता है। यह प्रवृत्ति, आरोपी व्यक्तियों के नागरिक अधिकारों को रौंदने जैसा है।” 

फैसले में आगे कहा गया है कि, "ऐसा कोई चश्मदीद गवाह, पुलिस नहीं पेश कर पाई, जो पुलिस के इस आरोप की पुष्टि कर पाता कि, आरोपी व्यक्ति किसी भी तरह से, एफआईआर में वर्णित अपराध करने में शामिल थे।" 
"तीसरी पूरक चार्जशीट दाखिल होने तक जांच के दौरान कोई शिनाख्त परेड  नहीं की गई थी और तस्वीरें और वीडियो जो प्रस्तुत किए गए हैं से, केवल यह प्रदर्शित होता है कि, आरोपी बैरिकेड्स के पीछे खड़े थे, न कि वे किसी हिंसा में शामिल थे। 

अदालत ने आगे कहा, “रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे प्रथम दृष्टया यह कहा जा सके कि आरोपी किसी दंगाई भीड़ का हिस्सा थे।  इसमें किसी भी आरोपी के पास से कोई हथियार नहीं था या कोई पत्थर आदि भी नहीं फेंक रहा था। इस प्रकार, प्रथम दृष्टया अभियुक्तों के विरुद्ध कोई सबूत नहीं है कि, उन्होंने किसी भी कानून का उल्लंघन किया था।  निश्चित रूप से अनुमानों के आधार पर अभियोग शुरू नहीं किया जा सकता है, और चार्जशीट निश्चित रूप से संभावनाओं के आधार पर दायर नहीं की जा सकती है।"
अदालत ने आगे कहा कि "विरोध करने वाले नागरिकों की स्वतंत्रता में, इस तरह निराधार हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए था और यह असहमति और कुछ नहीं बल्कि "अनुच्छेद 19 में निहित भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अमूल्य मौलिक अधिकार का विस्तार" है, जो उसमें निहित प्रतिबंधों के अधीन है। इसलिए यह एक अधिकार है जिसे बरकरार रखने की हमने शपथ ली है।" 

अदालत ने यह भी कहा कि "वर्तमान मामले में, जांच एजेंसियों को विवेचना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीक का प्रयोग करना चाहिए था, या विश्वसनीय खुफिया जानकारी एकत्र करनी चाहिए थी, और तभी उसे "आरोपी व्यक्तियों के आधार पर, अदालत में ट्रायल के लिए चार्जशीट दायर करना चाहिए था।न्यायिक प्रणाली को प्रेरित करना। अन्यथा, ऐसे लोगों के खिलाफ, इस प्रकार, गलत तरीके से चार्जशीट दायर करने से बचना चाहिए जिनकी भूमिका केवल एक विरोध का हिस्सा बनने तक ही सीमित थी।”

(विजय शंकर सिंह)

Friday, 3 February 2023

कमलकांत त्रिपाठी / तुलसी का योगदान (1)

“यद्‌ रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोSपि”: तुलसी में वाल्मीकि के सीता-राम सम्बंध की वैकल्पिक उद्भावना (संशोधित)  

भिन्न-भिन्न काल में, भिन्न-भिन्न वैचारिक समूहों का प्रतिनिधित्व करनेवाली कई रामायणें लिखी गईं किंतु देश की मुख्य धारा में वाल्मीकीय रामायण को इतनी प्रतिष्ठा मिली कि ‘रामायण’ कहने से (विशाल हिंदी क्षेत्र में तुलसीकृत रामचरितमानस को छोड़कर) सामान्यत: वाल्मीकीय रामायण का ही बोध होता है. फिर इसके लौकिक संस्कृत (आध्यात्म-प्रधान वैदिक संस्कृत के बरअक्स, लोक में प्रचलित भाषाओं के शब्द भंडार को संसृष्ट कर पाणिनि द्वारा व्याकरण के औज़ार से गढ़ी गई एक समन्वयात्मक, मानक, संपर्क भाषा) का आदिकाव्य होने तथा अंत:साक्ष्य के अनुसार वाल्मीकि के राम के समकालीन होने की मान्यताओं के चलते अन्य रामायणें इसके समकक्ष कैसे आ सकती थीं? फिर भी तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखते समय अपनी रचना के बारे में ‘नानापुराणनिगमागमसम्मतं’ और ‘यद्‌ रामायणे निगदितं’ के साथ ‘क्वचिदन्यतोSपि’ कहना ज़रूरी समझा. सीता का चरित्र-निर्माण शायद इस क्वचिदन्यतोSपि के विस्तार का सीमांत है.

मध्यकाल की एक नारी-केंद्रित विशेषता संभवत: अलक्षित रह गई है. इसी काल में जयदेव ने अपने गीतगोविंदम्‌ में कृष्ण को राधाकृष्ण में अंतरित कर दिया--भागवत पुराण  में राधा का नामोल्लेख तक नहीं, बस रासपंचाध्यायी (भागवत,10:29-33) के एक प्रसंग में उस (अनाम) गोपी का ज़िक्र भर है, जिससे ‘आराधित’ कृष्ण प्रसन्न होकर, रासलीला के दौरान, कुछ समय के लिए, उसे साथ लेकर अन्य गोपियों से अलग, एकांत में चले गए थे: 10:30:28. इसी काल में तुलसी ने राम को सीता-निर्वासन के कलंक से मुक्तकर सीताराम में अंतरित कर दिया जिसे लोक-परंपरा ने अपूर्व स्वीकृति और प्रतिष्ठा प्रदान की. क्या यह महज़ ‘क्वचिद्‌’ था ?

रामचरितमानस लिखने के प्रारंभ में ही नहीं, तो अरण्य काण्ड तक आते आते तुलसी ने सीता को वाल्मीकीय सीता की त्रासदी से मुक्त करने का इरादा बना लिया होगा। इसीलिए अरण्यकांड में बिना किसी प्रकट संदर्भ के उन्होंने  एक दोहे और उसके बाद पांच चौपाइयों का समावेश किया: 

लछिमन गए बनहि जब लेन मूल फल कंद।
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥23॥
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥
निज प्रतिबिम्ब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥
लछिमनहुँ यह मरमु न जाना। जो कछु रचित रचा भगवाना॥

सीता की ओर से प्रतिरोध तो दूर, किसी जिज्ञासा, किसी आशंका तक का उल्लेख नहीं. बस ‘जबहिं राम सब कहा बखानी’ के अवगुंठन में तुलसी एक दोहे व पाँच चौपाइयों से परंपरा की पूरी ज़मीन बदलकर रख देते हैं.

वाल्मीकीय रामायण के युद्धकांड में सीता-प्रसंग

वाल्मीकि ने सीता के पक्ष से अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए इस प्रसंग को सात सर्गों (112-118) में विस्तार दिया है. प्रारम्भ ही संदेह का बीज बो देता है. राम हनुमान से कहते हैं--आप महाराज विभीषण की आज्ञा लेकर लंकानगरी जाएँ और सीता से मिलकर, उनका कुशल समाचार पूछकर लौट आएँ; साथ ही उन्हें सुग्रीव व लक्ष्मण सहित मेरा कुशल समाचार भी दे दें और सूचित कर दें कि रावण युद्ध में मारा गया....बस ?.... सीता अशोकवाटिका में राक्षसियों से घिरी, स्नान-रहित, मलिन और सशंक बैठी हैं. राम आदि का कुशल समाचार देकर हनुमान सीता से कहते हैं--राम अपने शत्रु का वध करके सफलमनोरथ हो गए हैं और उन्होंने आपका कुशल समाचार पूछा है. फिर अपनी ओर से जोड़ देते हैं कि उन्होंने आपके उद्धार के लिए जो प्रतिज्ञा की थी उसके लिए निद्रा त्यागकर अथक परिश्रम किया और समुद्र में पुल बाँधकर, रावण का वध करके उसे पूरी किया. सीता जी इस ‘प्रिय’ समाचार को सुनकर हनुमान को कुछ पुरस्कार देना चाहती हैं किंतु उन्हें कोई उपयुक्त वस्तु नहीं दिखती (पास में कुछ है कहाँ?).  हनुमान उन्हें आश्वस्त करते हैं कि उनके (हनुमान के) सारे प्रयोजन सिद्ध हो चुके हैं और सब कुछ मिल गया है. तब सीता हनुमान से सीधे-सीधे मन की बात कहती हैं—मैं अपने भक्तवत्सल स्वामी का दर्शन करना चाहती हूँ. हनुमान उनकी इच्छा पूरी होने का भरोसा देकर लौट आते हैं.

राम से सीता को दर्शन देने की पैरवी करते हुए हनुमान बताते हैं कि सीता जी शोक-संतप्त हैं और उनकी आँखों में आँसू भरे हैं.

हनुमान की बात सुनकर राम उन्हें कुछ उत्तर देने के बजाए ध्यानस्थ हो जाते हैं. फिर नीची निगाह किए हुए विभीषण से कहते हैं--सीता को सिर से (बाल धोकर) स्नान कराने के बाद दिव्य अंगराग व दिव्य आभूषणों से सुसज्जित कर शीघ्र मेरे पास ले आइए. मर्यादानुसार निवेदित किए जाने पर सीता ने विभीषण से कहा—मैं बिना स्नान किए, अभी ही पतिदेव का दर्शन करना चाहती हूँ. विभीषण ने आग्रह किया कि आपको रामचंद्र जी की आज्ञानुसार ही करना चाहिए. आख़िर सीता ने बाल धोकर स्नान किया, सारे शृंगार किए और बहुमूल्य वस्त्राभूषण धारणकर विभीषण के संरक्षण में पालकी में बैठकर श्रीराम के शिविर में आईं. पालकी दूर रख दी गई. विभीषण ने ध्यानस्थ राम के पास जाकर सीता के उपस्थित होने की सूचना दी. किंतु राम यह सोचकर कि सीता बहुत दिनों तक राक्षस के घर में रहीं, एक साथ रोष, हर्ष और विषाद में डूब जाते हैं. उन्हें सीता के पालकी से आने पर आपत्ति-सी है. जैसे-तैसे उन्होंने सीता को पास लाने की अनुमति दी. विभीषण अपने सुरक्षाकर्मियों से वानर योद्धाओं को वहाँ से दूर हटाने लगते हैं तो राम रोषपूर्वक इस काम को रुकवाते हैं और आदेश देते हैं कि सीता पालकी छोड़कर पैदल ही मेरे पास आएँ जिससे सभी वानर बेरोकटोक उनका दर्शन कर सकें. राम के इस आदेश से विभीषण, लक्ष्मण, सुग्रीव व हनुमान बहुत व्यथित होते हैं, उन्हें लगता है, सीता के प्रति राम न केवल निरपेक्ष हो गए हैं, उनसे अप्रसन्न भी हैं. ख़ैर, लज्जा से सिकुड़ी-सहमी सीता किसी तरह विभीषण के पीछे-पीछे चलती, राम के सामने उपस्थित होती हैं और इतने दिनों बाद राम का मुख देखकर निर्मल चंद्रमा की तरह खिल उठती हैं.

राम ने सीता से कहा—युद्ध में शत्रु को पराजित कर मैंने तुम्हें उसके चंगुल से छुड़ा लिया. मेरे अमर्ष का अंत हो गया, मुझ पर लगा कलंक धुल गया, मैंने शत्रु और शत्रु-जनित अपमान दोनों को नष्ट कर दिया. सबने मेरा पराक्रम देख लिया और मैं अपनी प्रतिज्ञा के बोझ से मुक्त हो गया. चंचल-चित्त रावण द्वारा तुम्हें हर लिए जाने से दुर्भाग्यवश जो दोष मुझे लग गया था, मैंने मानवोचित पुरुषार्थ से उसका परिमार्जन कर दिया.

राम इस कार्य में हनुमान, सुग्रीव और विभीषण के बहुमूल्य सहयोग का कृतज्ञतापूर्वक विस्तार से उल्लेख करते हैं किंतु सीता को समीप देखकर उनका हृदय लोकापवाद के भय से विदीर्ण हो रहा है.

राम सीता से आगे कहते हैं—तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैंने जो युद्ध का उद्योग किया, जिसमें मित्रों की वीरता से मुझे विजय मिली, वह तुम्हें पाने के लिए नहीं, सदाचार की रक्षा, चारों ओर फैले अपवाद के निवारण और अपने प्रसिद्ध वंश पर लगे कलंक को धोने के लिए था.....तुम्हारे चरित्र पर संदेह का अवसर उपस्थित है और तुम मेरे सामने खड़ी हो. जिस तरह रुग्ण आँखवाले को दीपक प्रतिकूल लगता है, उसी तरह तुम मुझे अत्यन्त प्रतिकूल लग रही हो. अत: हे जनकपुत्री, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ. दसों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली हैं, अब मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं.....रावण तुम्हें अपनी गोद में उठाकर ले गया, दुष्ट ने तुम पर कुदृष्टि डाली. ऐसी स्थिति में अपने कुल को उच्च बतानेवाला मैं तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूँ? तुम चाहो तो भरत या लक्ष्मण के संरक्षण में सुखपूर्वक रहने पर विचार कर सकती हो. इच्छा हो तो शत्रुघ्न, सुग्रीव या विभीषण के पास भी रह सकती हो. तुम-जैसी दिव्यरूप सुंदरी को घर में मौजूद देखकर रावण बहुत दिनों तक धैर्य नहीं रख पाया होगा.

इतने सारे लोगों के सामने राम के मुख से ऐसी भयंकर बातें सुनकर सीता हाथी की सूँड़ से आहत लता की तरह आँसू बहाने लगीं. लज्जा से गड़ गईं. अपने में ही सिमटकर रह गईं.

सीता का प्रतिकार:

सीता का प्रतिकार जैसे वाल्मीकि का अपना ही उद्गार हो. आँसुओं से भीगे अपने मुख को आँचल से पोंछते हुए सीता ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—हे वीर, आप ऐसी कठोर, अनुचित, कर्णकटु, रूक्ष और अकथनीय बातें क्यों कर रहे हैं जो एक निम्न स्तर का पुरुष निम्नस्तर की स्त्री से ही कर सकता है ?  मैं अपने सदाचार की शपथ लेकर कहती हूँ, मैं संदेह से परे हूँ. निम्न श्रेणी की स्त्रियों का आचरण देखकर समूची स्त्री-जाति पर आपका संदेह करना उचित नही. रावण के शरीर से जो मेरे शरीर का स्पर्श हुआ, मेरी अवशता में हुआ. मेरा दुर्भाग्य, मेरे अंग पराधीन थे. जो मेरे अधीन है—मेरा हृदय—वह सदा आपमें ही अनुरक्त रहा. हम दोनों इतने दिनों साथ रहे, इस दौरान हमारा परस्पर अनुराग बढ़ता ही गया. इतने पर भी आप मुझे नहीं समझ पाए तो इसमें मेरा क्या दोष ! जब आपने मुझे देखने के लिए हनुमान जी को भेजा था, तभी मेरा परित्याग कर दिया होता तो उसी समय मैं अपने प्राणों को त्याग देती. तब आपको अपने प्राणों को संकट में डालकर युद्ध आदि का उद्योग न करना पड़ता और आपके मित्रों को भी अकारण कष्ट न उठाना पड़ता. आपने एक ओछे मनुष्य की भाँति केवल रोष का अनुसरण किया और मेरे शील-स्वभाव का विचार न कर निम्न कोटि की स्त्री मान लिया......और अंत में, हे लक्ष्मण, मेरे लिए चिता तैयार करो, मेरे दु:ख का अब यही इलाज है, मिथ्या कलंक से कलंकित होकर अब मैं जीना नहीं चाहती.

लक्ष्मण ने रोष के साथ राम की ओर देखा किंतु राम ने इशारे से अपना अभिप्राय इंगित कर दिया और उनकी सम्मति से ही उन्होंने चिता तैयार की. उस समय राम ऐसे प्रलयकालीन संहारकारी यमराज-तुल्य दिख रहे थे कि कोई मित्र उन्हें समझाने, कुछ कहने, यहाँ तक कि उनकी ओर देखने तक का साहस नहीं कर सका. जब सीता ने राम की परिक्रमा की, वे सिर झुकाए खड़े रहे. फिर सीता ने अग्निदेव के समीप जाकर कहा—यदि मेरा हृदय कभी एक क्षण के लिए भी श्री रघुनाथ से दूर न हुआ हो तो संपूर्ण जगत के स्वामी अग्निदेव मेरी सब ओर से रक्षा करें....सीता के अग्नि- प्रवेश करते समय राक्षस और वानर ज़ोर-ज़ोर से हाहाकार कर उठे और उनका आर्तनाद चारों ओर गूँज उठा.

अंतत: मूर्तिमान अग्निदेव सीता को गोद में लिए हुए चिता से ऊपर उठे और यह कहते हुए उन्हें श्रीराम को समर्पित कर दिया कि इनमें कोई पाप या दोष नहीं है.

विस्तार में सीता के सतीत्व की साक्षी में कहे गए अग्निदेव के वचन सुनकर श्रीराम प्रसन्न हो गए. उन्होंने कहा—लोगों में सीता की पवित्रता का विश्वास दिलाने के लिए यह अग्नि-परीक्षा आवश्यक थी. यदि मैं यह न करता तो लोग यही कहते कि दशरथपुत्र राम बड़ा मूर्ख और कामी है. मुझे तो पहले ही विश्वास था कि अपने ही तेज से सुरक्षित सीता पर रावण कोई अत्याचार नहीं कर सकता था, जैसे महासागर अपनी तट-भूमि को नहीं लाँघ सकता.

यह है वाल्मीकि द्वारा उकेरा गया सीता का और सीता के संदर्भ में राम का चरित्र. किंतु अभी उत्तरकांड में सीता-निर्वासन का क्रूर कर्म शेष है जो अयोध्या में फैले जनापवाद के सम्मुख अंतत: राम के नतमस्तक हो जाने का प्रतिफल है.

लंकाकांड के उक्त प्रसंग में तुलसी की सीता

तुलसी में भी लंकाकांड में यह प्रसंग आता है. उस पर ‘यद्‌ रामायणे निगदितम्‌’ की  छाया भी है। किंतु भक्त तुलसी अरण्य काण्ड के उपरोद्धृत  एक दोहे और पांच चौपाइयों की क़िलेबंदी से अपने आराध्य राम के  चारित्रिक विचलन के समाहार का मार्ग निकाल लेते हैं। 

यहाँ भी श्रीराम रावण पर विजय का समाचार देने और सीता का समाचार लाने हेतु हनुमान को उनके पास भेजते हैं. यहाँ भी इस समाचार को सुनकर प्रसन्न हुई सीता हनुमान को कुछ पुरस्कार देने की इच्छा व्यक्त करती हैं और हनुमान को यह कहकर समझाना पड़ता है कि रण में शत्रु-सेना को जीतकर निर्विकार खड़े राम को देखकर मैंने जगत् का राज्य पा लिया. यहाँ भी सीता ने हनुमान से ऐसा उपाय करने का आग्रह किया कि वे श्रीराम के कोमल श्याम शरीर का दर्शन कर सकें. लेकिन इसके आगे की कथा कुछ अलग राह पर चलती है.

हनुमान से सीता की राम को देखने की इच्छा की सूचना पाकर राम ने विभीषण और युवराज अंगद को बुलाया और उन्हें हनुमान के साथ अशोक वाटिका जाकर आदर के साथ सीता को ले आने को कहा. जब तीनों सीता के पास पहुँचे, राक्षसियाँ विनीत भाव से उनकी सेवा में लगी थीं. विभीषण के आदेश पर इन राक्षसियों ने विधिवत् सीता का स्नान कराया. अनेक प्रकार के आभूषण पहनकर सीता हर्ष के साथ एक सुंदर पालकी में सवार हुईं. पालकी के चारों ओर हस्तदंड लेकर रक्षक चले. जब रीछ-वानर सीता के दर्शन के लिए उमड़ने लगे, रक्षक क्रुद्ध होकर उन्हें हटाने दौड़े. तब श्रीराम ने हँसकर कहा, बेहतर होगा, सीता पैदल ही आएँ जिससे वानर उन्हें माता की तरह देख सकें. राम की बात सुनकर रीछ-वानर प्रसन्न हो गए. आकाश से देवताओं ने पुष्प-वर्षा की.

और तब अरण्यकांड में जोड़े गए उपरोक्त अंश से तुलसी ने तार जोड़ दिया: 

सीता प्रथम अनल महुँ राखी. प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी.

{सीता को (राम ने) पहले अग्नि में रख दिया था. अंतर्यामी राम अब उन्हें प्रकट करना चाहते हैं.} 

और आगे-

तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद। सुनत जातुधानीं सब लागीं करै विषाद॥

{इसी कारण करुणानिधि राम ने कुछ कटु वचन कहे जिन्हें सुनकर राक्षसियों को विषाद हुआ.} 

राम ने कुछ कटु वचन कहे--किसके लिए और क्यों? निश्चय ही वे सीता के लिए थे. किंतु तुलसी सीता का नाम तक नहीं लेते. सीता पर उनका क्या प्रभाव पड़ा और उनकी क्या प्रतिक्रिया रही, तुलसी मौन. कटु वचन का एक ही असर हुआ कि उसे सुनकर राक्षसियों को विषाद हुआ. स्वाभाविक है, राक्षसियों को सीता के प्रति सहानुभूति थी. लेकिन स्वयं सीता को क्या हुआ? तुलसी इसे स्पष्ट करने की ज़रूरत नहीं समझते क्योंकि प्रस्तुत सीता छाया सीता हैं. राम व सीता दोनों इस तथ्य को जानते हैं।

इसके ठीक बाद की चौपाइयों में सीता राम के वचन को शिरोधार्य कर लक्ष्मण से शीघ्रता से चिता लगाने की बात करने लगती हैं:

प्रभु के वचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम वचन पुनीता॥
लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम बेगी॥

यहाँ वाल्मीकि के लक्ष्मण के अनुरूप तुलसी के लक्ष्मण ने भी राम से कुछ अपेक्षा की. किंतु उनकी ओर रोषपूर्वक देखकर नहीं. बस सजल नेत्रों से दोनों हाथ जोड़कर खड़े रह गए. और राम की चुप्पी से लक्ष्मण को उनका रुख़ समझ में आ गया तो दौड़कर चिता लगाने में व्यस्त हो गए.

चूंकि रामचरितमानस में जिस सीता का हरण हुआ था, वे असली नहीं, छाया सीता थीं,  रावण के संपर्क में आने से सीता के प्रति राम के मन में किसी तरह के संदेह या क्रोध के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी. उनके कटु वचन बनावटी थे. सिर्फ़ इसलिए कहे गए ताकि छाया सीता अग्नि में समा जायँ और अग्निदेव असली सीता को (जो अरण्यकांड में अग्नि की सुरक्षा मे रख दी गई थीं) प्रकट कर दें.

यहां कथा की अन्विति में दोष देखा जा सकता है। पाठक तो यह रहस्य जानते हैं, इसलिए उन्हें राम के द्वारा यूं ही कुछ कटु वचन कहे जाने और सीता के तत्काल अग्निपरीक्षा के लिए तत्पर हो जाने से कोई अचंभा नहीं होगा. किंतु सुधी पाठक वहां उपस्थित लक्ष्मण, विभीषण, वानरसेना और राक्षसियों पर भी सुसंगत प्रतिक्रिया की अपेक्षा कर सकता है. यहां थोड़ी समस्या है। राम द्वारा वनवास काल में  असली सीता को अग्नि को समर्पित कर, आगे की लीला के लिए छाया सीता का निर्माण अतिशय गोपन होने से लक्ष्मण तक को इसकी भनक नहीं. इसलिए सभी उपस्थितों की निगाह में सीता की पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्नि-परीक्षा का प्रसंग लाना आवश्यक था. किंतु  तुलसी ने उसे असली सीता की छाया सीता से अदलाबदली के रूप में प्रस्तुत किया। सवाल है, उपस्थित लोगों की दृष्टि में अग्नि परीक्षा का अवसर क्यों और कैसे उपस्थित हुआ ? राम ने कटु वचन क्यों कहे और सीता उन्हें सुनकर चुपचाप अग्निपरीक्षा के लिए राज़ी कैसे हो गईं ? भक्त तुलसी इस किंचित् अन्विति-दोष की परवाह नहीं करते.   वाल्मीकि ने राम और सीता के बीच जो कटु संवाद कराया था, वह भक्त तुलसी के लिए असंभव था. अपने आराध्य राम और माता सीता के मध्य वैसा कटु और अप्रिय दृश्य  उपस्थित करना तुलसी के लिए अकल्पनीय था, राम और सीता दोनों की मर्यादा का हनन था। तो उन्होंने पूरे अप्रिय प्रसंग को एक चौपाई में समेट लिया—‘तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद। सुनत जातुधानीं सब लागीं करै विषाद॥‘ इसमें सिर्फ़ एक शब्द है दुर्बाद और उसका असर है राक्षसियों का विषाद, छाया सीता ने उसे कैसे लिया, इस पर तुलसी मौन हैं. इसके बाद छाया सीता लक्ष्मण से शीघ्रता के साथ अग्नि प्रकट करने का निवेदन करने लगती हैं और किसी को कोई आश्चर्य नहीं होता. 

इसी अग्नि-परीक्षा की बुनियाद पर तुलसी उत्तरकांड में सीतानिर्वासन प्रसंग को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं. बचकर निकलते नहीं,  बिल्कुल नकार देते हैं। उन्होंने लव और कुश का जन्म दिखाया किंतु वन में नहीं, अयोध्या में. वाल्मीकि को अस्वीकार करने के लिए तुलसी कोई प्रत्याख्यान नहीं रचते। बस छाया सीता की उद्भावना से उसका समाहार निकालते हैं। राम और उनके भ्राताओं के पुत्र-जन्म का प्रसंग तुलसी महज़ तीन चौपाइयों में समेटकर निकल जाते हैं--

दुइ सुत सुंदर सीता जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥
दोउ विजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील कनेरे॥
(दोहा-24 के बाद पाँचवीं, छठी और सातवीं चौपाइयाँ)

कहा जा सकता है कि अयोध्या में लव और कुश का जन्म महज़ ‘क्वचिदन्यतोsपि’ (कुछ जोड़ना भर) नहीं है।  इस बिंदु पर आदिकावि का पूर्ण  अस्वीकार और वैकल्पिक संरचना है। लव और कुश का ज़िक्र ही न आता तो  वह शम्बूक प्रसंग की तरह बचकर निकल जाना कहा जा सकता था. किंतु यहां लव कुश का जन्म वन के बजाय अयोध्या में दिखाकर तुलसी आदि कवि की परंपरा के विरुद्ध मौन विद्रोह करते हैं। अपने लोकमंगलकारी भक्त व्यक्तित्व के सर्वथा अनुरूप।

वाल्मीकीय रामायण और तुलसीकृत रामचरितमानस का विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन दोनों महाकवियों की दृष्टि और युगबोध की भिन्नता समझने में तो सहायक होगा ही, तुलसी के ‘यद्‌ रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोSपि’ की कठिन कसौटी और इसकी सीमाओं का भी ख़ुलासा करेगा. 
(क्रमशः) 

कमलाकांत त्रिपाठी
© Kamlakant Tripathi 


अडानी के ऊपर लग रहे घोटालों के आरोपों पर सरकार की चुप्पी निंदनीय है / विजय शंकर सिंह

हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट ने अडानी के आर्थिक घोटालों का पिटारा खोल दिया है। सरकार या यूं कहें प्रधानमंत्री के सबसे करीबी देश ही नहीं दुनिया के दूसरे सबसे अमीर शख्स से, यह सोचा भी नहीं होगा कि, वह एक हफ्ते में ही, दुनिया के दस शीर्ष उद्योगपतियों के क्लब से, आर्थिक घोटालों की वजह से, बाहर ही नहीं हो जायेगा, बल्कि पंद्रहवें स्थान पर आ जाएगा। पर ऐसा हो चुका है और अभी स्टॉक मार्केट के दो कारोबारी दिन शेष है। जिस एफपीओ के दम पर, अडानी समूह ने सफलता की एक नई इबारत लिखने की सोची थी, वह ओवरसब्सक्राइब  हुआ तो जरूर, पर रातों रात उसे अडानी समूह ने नैतिकता का तकाजा बताते हुए वापस ले लिया। नैतिकता और पूंजीवाद पर बालजाक का एक कथन याद आता है, हर आर्थिक संपन्नता के पीछे कोई न कोई अपराध जरूर होता है। अडानी भी इस कथन के अपवाद नहीं रहे। 

अडानी के एफपीओ के सफल होने और उसे फिर वापस लेने के बारे में, फोर्ब्स मैगजीन में छपे एक लेख की चर्चा करते हैं। 
"इस बात के प्रमाण हैं कि अडानी समूह ने संभवतः अपनी $2.5 बिलियन की शेयर बिक्री में खरीदारी खुद ही की है।"
यह निष्कर्ष है, फोर्ब्स मैगजीन में छपे एक लेख का, जिसे लिखा है,  जॉन हयात, ने जो फोर्ब्स के स्टाफ से है। लेख के अनुसार, 
"अडानी से कथित संबंधों वाली दो कंपनियों ने इस सप्ताह अडानी एंटरप्राइजेज के शेयर की पेशकश (ऑफर) को अंडरराइट किया है।"
हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा अडानी समूह की एकाउंटिंग में धोखाधड़ी और शेयर बाजार में हेरफेर की कथित साजिश में सहायता करने की आरोपी दो कंपनियों ने, सोमवार को अडानी एंटरप्राइजेज के 2.5 बिलियन डॉलर के शेयर की पेशकश की अंडरराइटर थीं, जिस एफपीओ को बुधवार 1 फरवरी को अचानक रद्द कर दिया गया है।

अचानक एफपीओ को रद्द करने के बारे में, अडानी समूह ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जो कहा है, पहले उसे पढ़ लें, 
"अदानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड, (एईएल) के बोर्ड ने अभूतपूर्व स्थिति और मौजूदा बाजार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए एफपीओ की आय लौटाकर और पूर्ण किए गए लेनदेन को वापस कर अपने निवेशक समुदाय के हितों की रक्षा करने का निर्णय किया है। बोर्ड इस अवसर पर हमारे एफपीओ के लिए आपके समर्थन और प्रतिबद्धता के लिए सभी निवेशकों को धन्यवाद देता है। एफपीओ के लिए सब्सक्रिप्शन कल सफलतापूर्वक बंद हो गया। पिछले सप्ताह स्टॉक में उतार-चढ़ाव के बावजूद,  कंपनी, के व्यवसाय और प्रबंधन में, आपका विश्वास बेहद आश्वस्तकारी और विनम्र रहा है। धन्यवाद।"

"हालाँकि, आज बाजार अभूतपूर्व रहा है, और आज हमारे शेयर की कीमत में उतार-चढ़ाव आया है। इन असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए, कंपनी के बोर्ड को लगा कि इस मसले पर आगे बढ़ना नैतिक रूप से सही नहीं होगा।  निवेशकों का हित सर्वोपरि है और इसलिए उन्हें किसी भी संभावित वित्तीय नुकसान से बचाने के लिए, बोर्ड ने एफपीओ के साथ आगे नहीं बढ़ने का फैसला किया है। हम अपने बुक रनिंग लीड मैनेजर्स (बीआरएलएम) के साथ काम कर रहे हैं ताकि आप का निवेशित धन, आप को वापस  लौटाया जा सके।"

"हमारी बैलेंस शीट सुदृढ़, और कैशफ्लो सुरक्षित संपत्ति के साथ बहुत मजबूत स्थिति में है, और हमारे पास अपने ऋण को चुकाने का एक त्रुटिहीन ट्रैक रिकॉर्ड है। इस निर्णय का हमारे मौजूदा परिचालनों और भविष्य की योजनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।  हम दीर्घकालिक मूल्य निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखेंगे और वृद्धि आंतरिक संसाधनों द्वारा प्रबंधित की जाएगी। बाजार में स्थिरता आने के बाद हम अपनी पूंजी बाजार रणनीति की समीक्षा करेंगे। हमें पूरा विश्वास है कि हमें आपका सहयोग मिलता रहेगा। हम पर आप ने जो विश्वास जताया है, उसके लिए धन्यवाद।" 

फोर्ब्स ने अब इस बात की पड़ताल की कि, हिंडनबर्ग खुलासे के बाद अडानी समूह के एफपीओ में किसने पैसा लगाया जिससे यह एफपीपी सफल हो गया। फोर्ब्स के अनुसार, 
"लंदन स्थित निवेश फर्म, एलारा कैपिटल की सहायक कंपनी एलारा कैपिटल (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड और एक भारतीय ब्रोकरेज फर्म मोनार्क नेटवर्थ कैपिटल, अडानी एंटरप्राइजेज द्वारा बिक्री के लिए अपने प्रस्ताव समझौते में प्रकट किए गए 10 अंडरराइटर्स में से दो थे।" 
हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों के अनुसार, "एलारा कैपिटल का इंडिया ऑपर्च्युनिटीज फंड, एक ऑफशोर माध्यम है, जिसके पास अडानी कंपनियों (अडानी एंटरप्राइजेज सहित) में 3 बिलियन डॉलर का सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाला स्टॉक है, जो भारतीय नियम और कायदो से बचने और उसे दरकिनार करने के लिए अडानी की "स्टॉक पार्किंग संस्थाओं" में से एक के रूप में,  कार्य करता है।

हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, "मोनार्क नेटवर्थ कैपिटल, एक भारतीय ब्रोकरेज फर्म, 2016 से, आंशिक रूप से, निजी तौर पर आयोजित अडानी प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व में है।" 
हिंडनबर्ग द्वारा अडानी के प्रॉक्सी के रूप में पहचाने जाने वाले एक ऑफशोर फंड अल्बुला के पास, 2009 में मोनार्क में 10% स्वामित्व की हिस्सेदारी थी। फोर्ब्स के इस लेख के अनुसार, हिडनबर्ग द्वारा जो अध्ययन किए गए हैं, के रिकॉर्ड में उद्धृत है। अडानी एंटरप्राइजेज द्वारा प्रकाशित ऑफरिंग स्टेटमेंट के अनुसार, शेयर की पेशकश में, एलारा कैपिटल की जिम्मेदारियों में "सभी प्रचार की सामग्री का प्रारूपण और अनुमोदन" शामिल था, जबकि मोनार्क को निवेशकों के लिए "गैर संस्थागत विपणन" का काम सौंपा गया था।

अडानी एंटरप्राइजेज ने पहली बार नवंबर में धन उगाहने के प्रयास की घोषणा की थी, लेकिन 24 जनवरी को हिंडनबर्ग रिसर्च ने अपनी 100 पन्नों की रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें अडानी समूह द्वारा लेखा धोखाधड़ी करने और स्टॉक के माध्यम से अपने मूल पूंजी को समृद्ध करने के लिए लंबी साजिश का आरोप लगाया गया है। हालांकि अडानी समूह ने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का खंडन किया और अमेरिकी निवेश फर्म के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की धमकी दी है, लेकिन इस रिसर्च रिपोर्ट के, पहली बार प्रकाशित होने के बाद, अदानी एंटरप्राइजेज ने एफपीओ को रद्द करने का फैसला किया और कहा कि, वह निवेशकों को, उनका धन वापस कर देंगे।

एफपीओ में 400 मिलियन डॉलर का निवेश अंतिम समय में कर के, अबू धाबी की कंपनी IHC निवेश फर्म ने, एफपीओ को पूरी तरह से सफल बना कर उसे उबार लिया। जॉन हयात, अपने लेख में लिखते हैं कि, "ऐसा "कथित तौर पर खुद गौतम अडानी द्वारा फोन पर आईएचसी को निजी अनुरोध करने के बाद किया गया।" 
उसी लेख के अनुसार, "दो अन्य भारतीय उद्योगपति, जेएसडब्ल्यू के सज्जन जिंदल और भारती टेलीकॉम के सुनील मित्तल ने भी इस मामले में, "सूत्रों के अनुसार," जैसा कि इकोनॉमिक टाइम्स और फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है, "एफपीओ को सफल बनाने के लिए, "आखिरी मिनट में हांथ लगाने" (द लास्ट मिनट पुश) की पेशकश की।  

इलारा कैपिटल और मोनार्क नेटवर्थ कैपिटल की भागीदारी, से यह सवाल और संशय उठता है कि, "क्या अडानी के किसी निजी फंड को 2.5 अरब डॉलर के लक्ष्य को पूरा करने में मदद देने के लिए लगाया गया था।"
फोर्ब्स के लेख के अनुसार, सिटीग्रुप के एक पूर्व निवेश बैंकर और ऑस्ट्रेलिया स्थित क्लाइमेट एनर्जी फाइनेंस के निदेशक टिम बकले कहते हैं, "वास्तव में इस मुद्दे को हल करने का एकमात्र तरीका यह है कि, अडानी ही यह बात स्पष्ट कर दें कि सभी शेयर खरीदे किसने है।" अडानी समूह की आर्थिक गतिविधियों पर दस साल से अधिक समय से, अध्ययन करने वाले, टिम बर्कले ने यह भी कहा कि, "यह मेरी अटकलें हैं, पर यह अटकल हवा में नही, कुछ अंदरूनी सूत्रों पर आधारित हैं, जिसका खुलासा मैं नहीं कर सकता।"

फोर्ब्स के ही अनुसार, जिस तरह से एफपीओ के शेयर खरीदने की पेशकश की गई, उस पर टिप्पणी करते हुए, अमेरिकी हेज फंड अरबपति बिल एकमैन ने भी बुधवार को संदेह व्यक्त करते हुए ट्वीट किया: "अगर @AdaniOnline की पेशकश में, संबद्ध खरीदारों के साथ धांधली की गई हो तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।"
फोर्ब्स ने अडानी समूह, एलारा कैपिटल और मोनार्क नेटवर्थ कैपिटल से उनका पक्ष जानने के लिए, इस लेख के लिखते समय, संपर्क करने की कोशिश की, पर इन तीनों कंपनियों के अफसरों ने, फोर्ब्स के अनुरोध का जवाब नहीं दिया।

इन तीनों कंपनियों का पक्ष फोर्ब्स को नहीं मिल पाया। जॉन हयात आगे अपने लेख में लिखते है, "लंदन मुख्यालय वाली इलारा कैपिटल, पीएलसी में निवेश बैंकिंग के अध्यक्ष रमनीश कोचगवे (उनके लिंक्डइन प्रोफाइल और इलारा की वेबसाइट के अनुसार) ने अडानी एंटरप्राइजेज के पेशकश दस्तावेज़ में इलारा कैपिटल (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड की ओर से हस्ताक्षर किए गए हैं।  उस इकाई को 2006 में भारतीय राज्य महाराष्ट्र में रजिस्टर्ड किया गया था। लंदन स्थित मूल कंपनी, अपनी वेबसाइट के अनुसार, एक दूसरी, इसी तरह नामित इकाई, एलारा फाइनेंस (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड को भी नियंत्रित करती है, जिसे 2011 में महाराष्ट्र में में रजिस्टर्ड किया गया था।"

हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट में एलारा के दो पूर्व व्यापारियों का उल्लेख है,  जिसमें बताया गया है कि, कैसे इसके फंड "जानबूझकर अपने लाभकारी स्वामित्व को छिपाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं," और रिपोर्ट के अनुसार, यह "यह स्पष्ट है" कि अडानी प्रिंसिपल्स (मुख्य पूंजी) के पास इंडिया ऑपर्च्युनिटीज फंड द्वारा रखे गए $3 बिलियन के स्टॉक हैं। रिपोर्ट के अनुसार, "एक व्यापारी ने हिंडनबर्ग को बताया, "मुझे लगता है कि यह राशि, निश्चित रूप से अडानी समूह के पास है... क्योंकि कोई और खरीदना नहीं चाहेगा।"
व्यापारी का नाम फोर्ब्स ने अपने लेख में नहीं खोला है। अडानी समूह ने, हिंडनबर्ग की प्रतिक्रिया के खंडन में भेजे गए अपने चार सौ पन्नो के जवाब में,  इलारा कैपिटल के धन से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया है। अडानी समूह ने लिखा, "यह कहना गलत है कि वे किसी भी तरह से प्रवर्तकों से संबंधित पक्ष हैं।"

हिंडनबर्ग के अनुसार, मोनार्क नेटवर्थ कैपिटल, का आंशिक रूप से अडानी समूह की इकाई के स्वामित्व में होने के अतिरिक्त, समूह की कंपनी के साथ व्यापारिक लेन-देन का दस्तावेजी इतिहास है। 2018 में, एक उद्योगपति राकेश शाह, जिसे फोर्ब्स के लेख में ब्रदर इन लॉ लिखा है (वह गौतम अडानी के बहनोई है या साले यह मुझे नहीं पता) ने मोनार्क के साथ भागीदारी की और इस भागीदारी से, एक एयरलाइन की खरीद भी की।  एक साल बाद, मोनार्क कंपनी ने, अडानी ग्रीन एनर्जी की $110 मिलियन की बांड ऑफर को, अंडरराइट किया।  हिंडनबर्ग रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, "सेबी के प्राविधानों का अनुपालन सुनिश्चित करने के  महत्व को देखते हुए, यह उम्मीद की थी कि, अडानी समूह, अपने सौदे का कुशलता पूर्वक प्रबंधन करने के लिए अनुभवी, और विश्वसनीय बुक रनर का चयन करेगा। लेकिन, अडानी ग्रीन एनर्जी ने, बुक रनर के रूप में, एक ऐसी इकाई को चुना जो इसे, अगर सीधे तौर पर नियंत्रित नहीं कर सकती थी तो, बाजार को, प्रभावित, जरूर कर सकती थी। मोनार्क का ट्रैक रिकॉर्ड पहले से ही खराब रहा है। मोनार्क को साल 2011 में, शेयर बाजार में हेराफेरी का दोषी ठहराया गया था।

हिंडनबर्ग को भेजी गई, अडानी समूह के जवाब में, मोनार्क नेटवर्थ पूंजी के आंशिक स्वामित्व से इनकार नहीं किया गया, लेकिन यह भी कहा कि उसने "मोनार्क की साख और खुदरा बाजार में काम करने की क्षमता का लाभ उठाने के लिए मोनार्क के साथ भागीदारी की थी।"  मोनार्क के साल 2011 में, हेराफेरी का दोषी पाए जाने के आरोप पर, अडानी समूह ने कहा कि, यह बात दस साल पुरानी है इसके लिए, मोनार्क को, एक महीने के लिए शेयर बाजार की ट्रेडिंग से निलंबित कर दिया गया था। अडानी के अनुसार, "एक दशक से अधिक पहले, किए गए, एक माह के निलंबन की अब कोई और प्रासंगिकता नहीं है।"
अडानी समूह के 2.5 बिलियन डॉलर के शेयर के अन्य अंडरराइटरों में एसबीआई कैपिटल मार्केट्स, जो, भारतीय स्टेट बैंक की निवेश बैंकिंग सहायक कंपनी है;  जेफरीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जो अमेरिकी निवेश बैंक जेफरीज की सहायक कंपनी है;  और विभिन्न भारतीय वित्तीय संस्थान जैसे वॉल स्ट्रीट बैंक जिन्होंने हाल के वर्षों में अडानी समूह के डॉलर-मूल्यवर्गीय ऋण प्रस्तावों की दलाली की थी, ने अडानी समूह के अंडरराइटर्स के रूप में भाग नहीं लिया था। 

लेकिन, अडानी समूह का एफपीओ तो सफल रहा। फिर अचानक क्या बात हो गई कि, अडानी समूह को उस सफल एफपीओ को वापस लेना पड़ा और वापस लेते समय, यह कहा गया कि यह एक नैतिक जिम्मेदारी के कारण एक सफल एफपीओ को वापस लेना पड़ा है। हुआ यह कि हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट जारी होने के बाद, बाजार में गिरावट का दौर शुरू हो गया, लेकिन गिरावट के इस दौर में भी, अडानी समूह के शेयरों की खरीद हुई। चूंकि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अधिकांश विशेषज्ञों और अडानी समूह के प्रतिद्वंद्वियों की नजर इस एफपीओ पर लगी थी और जब, एफपीओ सफल हुआ तो इसकी पड़ताल शुरू हुई कि आखिर किसने किसने इसे खरीदा है।

बेशर्म स्टॉक हेरफेर और लेखा धोखाधड़ी का आरोप तब लगना शुरू हुआ, जब एईएल (अडानी इंटरप्राइजेस लिमिटेड) के शेयर का बाजार मूल्य, निर्गम मूल्य से नीचे रहने के बावजूद, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) और गैर-संस्थागत निवेशकों सहित योग्य संस्थागत खरीदारों (क्यूआईबी) ने इसे जम कर खरीदा और एफपीओ, अंतिम दिन 1.12 गुना सब्सक्राइब हो गया। हालांकि, खुदरा निवेशकों के हिस्से को केवल 0.12 गुना (12 प्रतिशत) सब्सक्राइब किया गया था, जिसमें निवेशकों ने 2.29 करोड़ शेयरों के कोटा के मुकाबले केवल 27.45 लाख शेयरों के लिए बोली लगाई थी।  कर्मचारियों का कोटा भी केवल 55 प्रतिशत कोटे की बोलियों के साथ अंडरसब्सक्राइब रहा।

अडानी समूह के शेयरों और बांडों में मंदी बुधवार, 1 जनवरी को फिर से शुरू हो गई। अडानी एंटरप्राइजेज के शेयरों में 28% और अडानी पोर्ट्स और विशेष आर्थिक क्षेत्र में 19% की गिरावट आई। इस प्रकार, दोनों के लिए यह खराब दिन रहा। 1 जनवरी को, अडानी एंटरप्राइजेज के शेयर की कीमत 34 प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ 2,975 रुपये के पिछले बंद के मुकाबले 1,942 रुपये के एक दिन के निचले स्तर पर पहुंच गई, जो कि 1,933.75 रुपये के निचले सर्किट के आसपास थी। स्टॉक अंततः 28.45 प्रतिशत गिरकर 2,128.70 रुपये पर बंद हुआ। बुधवार को दोपहर के समय, ब्लूमबर्ग ने बताया कि "क्रेडिट सुइस ग्रुप एजी ने अपने निजी बैंकिंग ग्राहकों को मार्जिन ऋण के लिए कोलेटरल बांड के रूप में, अडानी समूह की कंपनियों के बांड को, स्वीकार करना बंद कर दिया है।"

अज्ञात स्रोतों के हवाले से ब्लूमबर्ग ने बताया कि स्विस ऋणदाता की निजी बैंकिंग शाखा ने, अडानी पोर्ट्स और स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन, अदानी ग्रीन एनर्जी और अदानी इलेक्ट्रिसिटी मुंबई लिमिटेड द्वारा बेचे गए बांड्स के लिए शून्य ऋण मूल्य निर्धारित कर दिया है। ब्लूमबर्ग ने कहा कि क्रेडिट सुइस की कार्रवाई ने संकेत दिया कि अडानी समूह गंभीर वित्तीय अनियमितता की गिरफ्त में है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में बताया गया है कि "जब एक निजी बैंक , ऋण मूल्य को शून्य कर देता है, तो ग्राहकों को आम तौर पर, नकद या अन्य प्रकार से, टॉप अप करना पड़ता है और यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो उनकी प्रतिभूतियों का परिसमापन किया जा सकता है।

इसी बीच सरकार समर्थक अडानी समूह के बचाव में आए और, हिंडनबर्ग रिपोर्ट, जिसने अडानी की पतनगाथा की भूमिका लिखी है को एक साजिश कहना शुरू किया है। जो हिंडनबर्ग रिपोर्ट को साजिश मानते है, उनसे, मेरे कुछ सवाल है, 
० क्या टैक्स हेवेन कहे जाने वाले देशो से, विनोद अडानी ने अडानी समूह में फंड नहीं भेजे?
० क्या SBI LIC ने अडानी को मुंहमांगा लोन नहीं दिया और NPA नहीं किया?
० फ्रॉड और काले धन से पलते पूंजीपतियों को क्या भारत का पर्याय कहा जायेगा?
सिर्फ़ अडानी ही नहीं बल्कि उन बैंकों की भी आज खाट खड़ी हो गई है, जिनके क़र्ज़ से अडानी साहब शक्तिमान बने घूम रहे थे। यहीं यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि, 
० अडानी पोर्ट से 3000 kg ड्रग पकड़ी गई, उनकी जांच हुई या नही, कोई खबर नहीं। 
० हिंडनबर्ग ने स्टॉक मार्केट में हेराफेरी से लेकर काले धन के लिए कुख्यात देशों से अडानी समूह द्वारा फंड उठाने के आरोप सप्रमाण दिए, इनकी जांच अब तक शुरू नहीं हुई
क्या अडानी को जांच से इम्यूनिटी प्राप्त है?
 जब आम जनता की मेहनत से कमाई रकम एक पूंजीपति को लुटाई जा रही है तो वे उसी पूंजीपति के निर्लज्ज बचाव में हैं। शर्मनाक।

ऐसे उद्योगपति, देश के दुश्मन की तरह हैं, जब वे फ्रॉड कर, टैक्स चुरा कर, अफसरों और राजनेताओं को, रिश्वत, चुनाव के लिए अनाप शनाप धन, तरह तरह के आर्थिक अपराध करके, मीडिया खरीद कर, दंगाई प्रोग्राम चलवाते हैं तब। ये देश के ही नहीं समाज और मानवता के भी दुश्मन हैं। इनके धन का क्षय हो। अपराध, अपराध है चाहे उसे अरबपति करें या हम आप जैसे लोग। अब तक हिंडन बर्ग रिपोर्ट पर सरकार को कार्यवाही शुरू कर देनी चाहिए थी कि, धन मिलने का जो आरोप कि, tax haven कहे जाने वाले देशों और शेल कंपनियों के माध्यम से अडानी समूह को अनुचित धन लाभ हुआ है, उसमे कितनी सचाई है। पर सरकार, वैसे ही चुप है, जैसे वह, नोटबंदी के बाद लाइनों में, लोगों के और कोरोना के समय ऑक्सीजन की कमी से मरीजों के मरते समय थी। सरकार की प्राथमिकता में जनता कही है भी? सरकार तो एसबीआई, एलआईसी से अडानी का शेयर खरीदवा रही है। प्राथमिकता में उद्योग भी नहीं हैं, है तो बस, अडानी है।

(विजय शंकर सिंह)

Thursday, 2 February 2023

कमलकांत त्रिपाठी / धार्मिक आतंकवाद का वैश्विक उभार और वहाबी पुनुरुत्थान (3)

यूरोप का अंधकार युग, अरब सभ्यता का स्वर्णकाल एवं वर्तमान धर्मांधता और विचारांधता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य किसी मज़हब या विचारधारा को समझने के लिए पुस्तकों में लिखे उसके सिद्धांतों की अपेक्षा  उसके व्यवहार के इतिहास को जानना ज़्यादा कारगर होता है। देखा यह गया है कि किसी मज़हब या विचार को व्यवहार में उतारने के लिए जैसे लोग मिले हैं वह वैसे ही हो गया है। व्यवहार्यता ही सभी मज़हबों एवं विचारों की अंतिम कसौटी है। और व्यवहार में उन्हें लाता है मनुष्य। मनुष्य की एक सिफ़त यह है कि वह उदात्त से उदात्त मज़हब या विचार को व्यवहार में अपने स्वभाव के अनुरूप ढाल लेता है। यही कारण है कि किसी भी मज़हब या विचारधारा में कोई भी दो मनुष्य हूबहू एक से नहीं मिलते। किसी मज़हब या विचारधारा की व्यवस्था में जब,  जिस स्वभाव के मनुष्यों का वर्चस्व होता है, तब वह उन्हीं के अनुरूप ढल जाता है।    

दुनिया के सांगठनिक धर्मों और विचारधाराओं का इतिहास पढ़ने पर एक नैराश्यपूर्ण आशंका होती है—कहीं अंध-आस्था और अंध-भक्ति मनुष्य के स्थायी और प्रकृत गुण तो नहीं? और वर्तमान विश्व-परिदृश्य की ओर नज़र डालने पर यह आशंका दृढ़ होने लगती है। इतिहास तो यही बताता है कि सभी धर्मों और विचारधाराओं का प्रणयन स्थान विशेष और काल विशेष की परिस्थितियों में, उन्हीं के मद्देनज़र हुआ लेकिन उनके गर्वोन्नत और अदूरदर्शी प्रणेताओं या  उनके अंध-अनुयायियों ने उन्हें सार्वभौम और सार्वकालिक बताकर बहुत वितंडावाद खड़ा किया। इससे मानव-ज्ञान और मानव-संस्कृति के स्वत:स्फूर्त विकास के मार्ग में विकट बाधा उत्पन्न हुई। विडंबना यह है कि इस तरह का अंधानुकरण उन प्रणेताओं के काम की बुनियादी तासीर के सर्वथा प्रतिकूल है, जिन्होंने अपने समय में सड़-गलकर असंगत हो चुकी मान्यताओं को चुनौती दी और भीषण विरोध के बावजूद अपने-अपने समय के विशेष संदर्भ में नए, अग्रगामी और इसलिए मानवता के लिए उपयोगी विचार दिए।

इस संबंध में ईसाइयत का इतिहास आँख खोलनेवाला है। रोमन साम्राज्य के मूर्तिपूजक दौर में ईसाइयों के उत्पीड़न और ईसाई संतों की शहादत का भयानक दौर चला, जो ईसाई धर्म की लोकप्रियता और उसके प्रचार-प्रसार का सबसे अहम कारण बना। लेकिन जैसे ही सम्राट कॉन्स्टेन्टाइन ने ख़ुद ईसाई धर्म स्वीकार कर (313 A D) इसे साम्राज्य का आधिकारिक धर्म घोषित कर दिया, चक्र उल्टी दिशा में चल पड़ा और साम्राज्य की ग़ैर-ईसाई प्रजा का ठीक उसी तरह उत्पीड़न शुरू हो गया, जैसे पहले ईसाइयों का हो रहा था। बाद में पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन और पोप द्वारा रोमन साम्राज्य के भूत-तुल्य ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ की स्थापना (800 ई.) के साथ चर्च के खोखले आडंबरों और ईसाई जगत (Christendom) पर उसके निरंकुश नियंत्रण ने पूरे यूरोप को मध्ययुगीन अंधकार में डुबो दिया, जिसमें पुराने यूनान का मुक्त, विवेकपूर्ण चिंतन पूरी तरह लुप्त हो गया, और सारा चिंतन-मनन-लेखन सम्राट और पोप--लौकिक और पारलौकिक सत्ता--के अधिकार-क्षेत्र को लेकर चल रहे विवाद के इर्दगिर्द घूमने लगा। थोड़े-से धर्माधिकारियों को छोड़कर (कई राजाओं सहित) अधिकांश जनता अशिक्षित ही नहीं, निरक्षर थी। ईसाई चर्च विशाल भू-संपत्तियों पर क़ाबिज़ थे और उनके पदाधिकारी निरंकुश। यूरोप के सामंतवाद के मूल में यह विचार निहित था कि समस्त भूसंपदा का स्वामी अंतत: मुकुट (सम्राट या राजा) था। लिहाज़ा, ऊपर से नीचे (सम्राट से लेकर क़ाबिज़ भूस्वामी) तक प्रभु और अधीनस्थ (Lord and Vassal) की सोपान शृंखला में बंधे सामंत और चर्च के पदाधिकारी मिलकर ईसाई जगत का वह क्रूर परजीवी वर्ग बनाते थे जिसका सारा ताम-झाम निरीह, विवश भू-दासों (serfs) के श्रम पर निर्भर था।

मध्ययुग के इस अंधकार, धर्मोन्माद और विशेषाधिकार-केन्द्रित विषम सामाजिक व्यवस्था पर प्रभावी आघात किया पुनर्जागरण (Renaissance) ने।  यह इटली के उन तटीय शहरों-- वेनिस, जेनोआ, नेपल्स--से शुरू हुआ जो विश्व-व्यापार की नई मंडियों के रूप में उदित हो रहे थे, जहाँ दुनिया भर के व्यापारी आकर मिलते थे। वेनिस के एक स्वतंत्र गणराज्य होने से वह (पवित्र) रोमन सम्राट और पोप दोनों के शिकंजों से मुक्त था। वहाँ से जो हवा चली उसने इटली की अन्य तटीय मंडियों को भी अपने आगोश में ले लिया। उसके बाद मध्य इटली के शहर फ़्लोरेंस की बारी आई जो उस समय महाजनों (money-lenders) के जमावड़े के चलते यूरोप की वित्तीय राजधानी-जैसा बन गया था और नई सोच व नई खोजों के लिए आवश्यक माहौल और संसाधन मुहैया कराने की स्थिति में था। और वह भी उस समय एक नगर-गणराज्य होने से नए विचारों के लिए बेहद मुफ़ीद था। फ़्लोरेंस ने पुराने यूनान से प्रेरणा लेकर पहले दांते और पेट्रार्क (Petrarch) जैसे प्रसिद्ध कवियों को जन्म दिया (तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी), फिर लेवोनार्डो द विंसी (1452-1519), माइकेलेंजेलो (1475-1564) और राफेल (1483-1520)-जैसी बहुमुखी कला-प्रतिभाओं को, जिन्होंने धार्मिक मान्यताओं की जड़ता को तोड़ने और मानव-चेतना को मुक्त आकाश देने की पूर्व-पीठिका तैयार की। सोलहवीं शताब्दी बीतते-बीतते इटली मेँ कला की यह नई उठान धीमी पड़ने लगी , लेकिन इसका सिलसिला वहाँ से हॉलैंड (Rembrandt) और स्पेन (Velasquez) होता हुआ पूरे योरोप मेँ छा गया।

पहले आ चुका है कि, पुराने यूनान के लुप्त हुए ज्ञान को खोजकर पुन: सामने लाने और इस तरह पुनर्जागरण की पूर्वपीठिका तैयार करने में उन जिज्ञासु, उदार और सत्वग्राही अरब चिंतकों और विद्वानों का विशेष हाथ रहा जिन्होंने अरब सभ्यता के स्वर्णकाल को स्वर्णकाल बनाया। जब ईसाई जगत जड़ता के अंधकार में डूबा था, अरब से दर्शन, विज्ञान, कला और साहित्य की एक बहुमुखी रोशनी फूटी। अरबों ने दुनिया को तीन ख़ूबसूरत शहर दिए—दमिश्क, बग़दाद और कुर्तुबा (Cordoba--स्पेन), जिन्हें उन्होंने शिक्षा, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान का केंद्र बना दिया। काहिरा, बसरा और कूफ़ा उनके अन्य शहर थे जहां से बौद्धिक जीवन का प्रकाश यूरोप तक  पहुँचा। अरब अच्छे इतिहासकर तो थे ही, काइनात की विविधता को समेटकर उसमें जीवंत रंग भरनेवाले अच्छे गल्पकार भी थे। ‘एक हज़ार एक रातें’ बग़दाद की प्रतिभा की उपज थी, जो आज भी लोगों को चमत्कृत करती है। अरबों ने वास्तुकला की सारसेनिक शैली ईजाद की, जिसमें अरब और सीरिया के ख़ूबसूरत खजूर-वृक्षों और उनके झुरमुटों की अनुकृति में सरल पर सुंदर और प्रभावोत्पादक खंभों, मीनारों, गुंबदों और मेहराबों का कल्पनाशील संयोजन था। इस्लाम में किसी आकार के चित्रण की मनाही के कारण उन्होंने ख़ूबसूरत, बारीक जालियों और मेहराबों पर सुंदर अरबी लिखावट में क़ुरान की आयतों द्वारा सजावट की एक अनोखी शैली विकसित की। 

अरब सभ्यता के इस स्वर्णकाल मेँ ज्ञान की अपार भूख के चलते पुरानी सभ्यताओं-- यूनान-रोम, ईरान और भारत—की विभिन्न विषयों की पुस्तकों का अध्ययन अपने उरूज़ पर था और गणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति (trigonometry), खगोलशास्त्र (astronomy) और औषधिशास्त्र के ज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन और संवर्धन हो रहा था। उस समय के अरबों की एक विशेषता यह थी कि वे ज्ञानार्जन को अपने-आप में एक जीवन-मूल्य मानते थे और इस पर इतना ज़ोर देते थे कि उन्हें जहां से जो भी मिला, उसे ग्रहण किया; यही नहीं, उसे और आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हो उठे। हारून-अल-रशीद की ख़िलाफत (786-809) के समय बग़दाद में विद्वानों और कलाकारों की इतनी क़द्र थी कि उन दिनों दुनिया भर के विद्यार्थी, विद्वान और कलाकार बग़दाद विश्वविद्यालय का रुख़ करते थे। विज्ञान के क्षेत्र में अरबों की समझ ग़ज़ब की थी। उन्होंने दुनिया का पहला दूरबीन बनाया और नाविकों के लिए कुतुबनुमा विकसित किया। चीनियों के संपर्क से उन्होंने काग़ज़ बनाना सीखा और यह तकनीक यूरोप ले गए। सिंध में अपने शासन (आठवीं से दसवीं शताब्दी) के दौरान उन्होंने भारतीयों से चिकित्साशास्त्र, दर्शन, नक्षत्र-विज्ञान, गणित और शासन-संबंधी ज्ञान बटोरने में कोई संकोच नहीं किया। कई अरब विद्यार्थी औषधिशास्त्र में विशेषज्ञता हासिल करने तक्षशिला विश्वविद्यालय आए। अमीर ख़ुसरो ने लिखा है कि अरब ज्योतिषी अबू माशर बनारस आकर वहाँ दस वर्षों तक गणित ज्योतिष का अध्ययन करता रहा। अरब विद्वान भारत से ब्रह्मगुप्त की दो पुस्तकें—ब्रह्मसिद्धान्त और खंडरखाद्य—बग़दाद ले गए और वहाँ मौजूद भारतीयों की मदद से अल फ़ज़ारी ने अरबी में उनका अनुवाद किया। भारत से शून्य और दशमलव लेकर उन्होंने अरब संख्याएँ और अरब गणना-प्रणाली विकसित की जो आज विश्व की धरोहर है, वरना इस कंप्यूटर-युग में बड़ी संख्या की गणना के लिए सर्वथा अक्षम और अटपटी रोमन प्रणाली से कैसे काम चलता! भारतीय वेदान्त और बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को लेकर अरबों ने एक उदार और समावेशी दर्शन विकसित किया, जिसमें स्वयं के भीतर ही ख़ुदा को ढूँढ़ने और आत्म-चिंतन द्वारा सत्य को पाने पर ज़ोर है, वही सर्वग्राह्य सूफ़ी संप्रदाय के रूप में प्रचलित हुआ। कुर्तुबा और बग़दाद के विश्वविद्यालयों में जो समावेशी अरब दर्शन विकसित हुआ, उसका प्रभाव पेरिस और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों पर भी पड़ा और पूरा यूरोप उससे अनुप्राणित हुआ। कहा जाता है कि कुर्तुबा के मुख्य पुस्तकालय में चार लाख पुस्तकें थीं, जिनमें दुनिया भर का मानव-ज्ञान सुरक्षित था। अलग से आ चुका है कि अरब सभ्यता के स्वर्णकाल के दो सितारों—इब्न सीना और इब्न रुश्द— ने किस तरह पुराने यूनान के लुप्त हुए ज्ञान को खोजकर योरोप को संप्रेषित किया, जिसने यूरोपीय नव-जागरण के लिए प्रकाश-स्तंभ का काम किया।

जैसा कि पहले आ चुका है, प्लेटो और अरस्तू की पुन:प्रतिष्ठा के साथ-साथ समुद्री मार्गों की खोज ने भी यूरोप को मध्ययुगीन अंधकार से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो 1453 में कुस्तुंतुनिया पर उसमानी तुर्कों का क़ब्ज़ा हो जाने और उसके चलते रेशम और मसाले के पुराने व्यापार-मार्गों के बंद हो जाने के कारण अपरिहार्य हो गया था। समुद्री मार्गों ने एशिया के साथ व्यापार में यूरोपियों को आक्रामक वर्चस्व प्रदान किया और समुद्री शक्ति की अहमियत बढ़ जाने से ज़मीनी साम्राज्य के बजाए समुद्रपार उपनिवेश बनाने और उनके आर्थिक दोहन से गृहदेश के तेज़ी से सम्पन्न होने की स्थिति पैदा हुई । इससे मालामाल हुए यूरोपीय देशों में उपजी नई साहसिकता, ऊर्जा और आत्म-विश्वास ने वैज्ञानिक आविष्कारों और पूंजी-संचयन के योग से अंतत: औद्योगिक क्रांति को संभव बनाया, जिसने दुनिया का चेहरा बदल दिया।

इसी दौर (पंद्रहवीं से सत्रहवीं शताब्दी) मेँ विज्ञान की खोजों ने मानव-जीवन को एक नई गतिशीलता प्रदान की। स्वाभाविक है कि वैज्ञानिकों को शुरू मेँ चर्च के विकट विरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि सभी धार्मिक प्रतिष्ठानों की तरह चर्च भी यथास्थितिवाद का पोषक था और नहीं चाहता था कि लोग नई बातें सोचें या नया आविष्कार करें। स्वाभाविक है कि जिन मान्यताओं पर उसका शीराज़ा खड़ा था, उन पर प्रश्नचिन्ह लगने से उसे अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा दिखाई पड़ता था। बाइबिल की शाब्दिक व्याख्या के आधार पर चर्च की मान्यता थी कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र मेँ थी, सूरज तथा अन्य खगोलीय पिंड इसके चारों ओर चक्कर लगाते थे। [Psalm 104:5—‘The Lord set the earth on its foundations; it can never be moved.’] पोलिश गणितज्ञ और खगोलशास्त्री कॉपरनिकस (1473-1543) ने सिद्ध कर दिया कि, नहीं, पृथ्वी ही सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है। कॉपरनिकस तो चर्च के प्रकोप से बच गया क्योंकि जिस वर्ष उसकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘On the Revolution of Heavenly Bodies’ छपी (1543), उसी वर्ष उसका देहांत हो गया। उसकी मृत्यु के बाद ही चर्च वस्तुस्थिति से अवगत हो सका और तुरंत इस पुस्तक पर पाबंदी लगा दी। लेकिन जब इटली के ही एक दूसरे वैज्ञानिक जिऑर्डनो ब्रूनो (Giordano Bruno--1548-1600) ने कॉपरनिकस की बात दोहरा दी और यह भी कह दिया कि सभी तारे अपने-आप मेँ सूर्य थे, तो चर्च के बर्दाश्त से बाहर हो गया। धर्म-परीक्षण (Inquisition) की क्रूर प्रक्रिया से जिऑर्डनो को विधर्मी घोषितकर रोम मेँ ज़िंदा जला दिया गया (1600)। ब्रूनो का समकालीन दूसरा इटैलियन वैज्ञानिक गैलीलियो (1564-1642) ब्रूनो-जैसा साहसी नहीं निकला। अपने ही द्वारा बनाए गए दूरबीन के सहारे किए गए गहन निरीक्षण से उसने ब्रूनो की बात को सच पाया और कहा भी। फिर बाइबिल के प्रति पूरी निष्ठा दिखाते हुए उसने संत आगस्तीन का यह तर्क देने की कोशिश की कि बाइबिल की कविताओं, गीतों, निर्देशों और ऐतिहासिक वक्तव्यों को शब्दश: नहीं लिया जा सकता। उसके तर्क को अस्वीकारकर जब चर्च ने उस पर धर्म-परीक्षण की कार्रवाई शुरू की, अंतरात्मा को दबाकर उसे अपनी पहलेवाली बात से मुकरना पड़ा और घोषित करना पड़ा कि उससे ग़लती हो गई, पृथ्वी दरअसल ब्रह्मांड के केंद्र मेँ थी और सूर्य ही इसके चारों ओर चक्कर लगाता था। माना जाता है कि इस छद्म स्वीकारोक्ति के बाद वह धीरे-से बुदबुदाए बिना नहीं रह सका —--‘Eppersimuove.’ (‘फिर भी यह घूमती तो है’)। इसके बावजूद उसे कुछ समय तक क़ैद मेँ रहना पड़ा ताकि वह अपने ‘दूषित’ अंत:करण को प्रायश्चित्त की आग से शुद्ध कर सके। वहाँ से छूटने पर उसे जीवन भर अपने ही घर में नज़रबंद रखा गया, जहां तीन साल तक हर हफ़्ते पश्चात्ताप के सातों भजन उसे पढ़ने पड़ते थे। जिसे अक्षरस: ‘इलहाम’ माना जाता है, उसके प्रति अंध आस्था वैज्ञानिक सत्य के साथ किस क़दर निरंकुश ज़्यादती करती रही है, इसके प्रसंगों से इतिहास भरा पड़ा है...और विडंबना यह कि यह विवेकशून्य प्रक्रिया आज भी जारी है। अस्तित्व की शास्वत त्रासदी!

कैसी विडंबना है कि यूरोप को प्राचीन यूनान की रोशनी दिखानेवाले और यूरोपी पुनर्जागरण का उत्प्रेरक बननेवाले उसी अरब से ‘शुद्ध इस्लाम’ के नाम पर निकला वहाबी कट्टरवाद दुनिया भर में धार्मिक बुनियादपरस्ती और आतंकवाद का निर्यातक और प्रेरक बन गया--अंध आस्था का विध्वंसक चरण। 

क्रिया-प्रतिक्रिया की शृंखला से पूरे विश्व में धर्मांधता, धार्मिक जड़ता और तज्जनित अमानुषिक उन्माद का पुनरोदय हो रहा है. अमेरिका, फ़्रांस, इंग्लैंड, नार्वे, डेनमार्क में हुई असहिष्णु और हिंसक घटनाओं की प्रतिक्रिया में ईसाइयत की बुझ चुकी आग फिर से सुलगने लगी है। और उसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ रहा है निर्दोष मुसलमानों को। हवाई अड्डों पर अधिक सघन जाँच तो सामान्य बात है, दुनिया भर में हर अपरिचित मुसलमान को आतंकी होने के शक की नज़र से देखा जाने लगा है। दुनिया भर में धर्मों की समावेशिता (inclusiveness) और ग्रहणशीलता (eclecticism) का स्थान एकांतिकता (exclusiveness) और बुनियादपरस्ती (fundamentalism)  ले रही है.

भारत में भी ऐसा दौर चल रहा है जिसमें हर चीज़ के लिए आगे के बजाए पीछे देखने और विगत के सब कुछ का महिमामंडन करने की प्रवृत्ति जड़ें जमा रही हैं. नए माहौल में पुष्पित-पल्लवित भी हो रही है. उसी का दुष्परिणाम है राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण और भारत के दोनों समुदायों के बीच बढ़ती बदगुमानी, नफ़रत और विद्वेष। इतिहास और वर्तमान के एकल पाठ से खोज-खोज कर आत्मगौरव और पीड़ित मानसिकता के लिए खाद-पानी जुटाया जा रहा है। यह सब देश को कहाँ ले जाएगा?    

धर्म के नाम पर आज दुनिया में जो हो रहा है, उसे समझने के लिए यूरोप में धर्म-सुधार के अतिवादी दौर (प्रोटेस्टैंट-कैथलिक के बीच ख़ूनी संघर्ष) से मदद मिल सकती है। पहले की तरह आज भी सारी लड़ाई वर्चस्व की, दुनिया की सत्ता-संरचना और उसका केंद्र बदलने की है। जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे हम सैम्युएल हंटिंटन की स्थापनाओं (‘सभ्यताओं का संघर्ष’—1996) का ही अनुसरण करते दिखाई पड़ रहे हैं।

मार्क्स ने कल्पना तक न की होगी कि सर्वहारा-क्रांति के सात-आठ दशक बाद वैश्वीकरण और कार्पोरेट प्रभुत्वके अपने नए अवतार में पूँजीवाद फिर से हावी हो जाएगा। लेकिन उसी के साथ मानवता के दूसरे दुश्मन--सांगठनिक ‘धर्म’--की क्रूर, हिंसक, अतिवादी उछाल से दुनिया की व्यवस्था चरमरा उठेगी। पूंजीवाद-साम्यवाद का पुराना संघर्ष पीछे रह जाएगा और इतिहास आगे बढ़ने के बजाए लौटकर मध्ययुगीन धर्मांधता की अंध-गलियों में खो जाएगा।
 
ऐसे में प्रगतिशील वामपंथ का दिग्भ्रमित होना लाज़मी है। विडंबना यह है कि पूँजीवाद के प्रति अपनी पुरानी रंजिश के चलते, वर्चस्व की इस नई लड़ाई में, वामपंथ प्राय: कुछ धर्मांध शक्तियों का मुखर विरोध करता है तो चुप्पी साधकर कुछ के पाले में खड़ा दिखाई पड़ता है। कम से कम उनके दुष्कृत्यों की ओर से आँख-कान बंदकर वह पूँजीवाद और साम्राज्यवाद विरोधी वही पुराना राग अलापता जाता है। धुर दक्षिणपंथ और वामपंथ का यह गठजोड़ ऐसी समसामयिक गुत्थी है, जिसकी इतिहास में कोई नज़ीर नहीं.

आज का वामपंथ बदले हुए समय में धन और सत्ता के गठजोड़ से उपजे क्रोनी कैपिटलिज़्म,  श्रमिकों के मूल्य पर अधिकाधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए आउटसोर्सिंग के परदे में लगातार बढ़ती ठेकेदार-उपठेकेदार-उपउपठेकेदार...की लंबी शृंखला से असंगठित क्षेत्र का विस्तार और उससे श्रमिकों तथा अन्य वेतनभोगियों के आत्यंतिक शोषण, तकनीक के अप्रत्याशित विकास और जीवन के हर क्षेत्र में अपूर्व तेज़ी से बढ़ते उसके प्रभाव, उससे उद्भूत आक्रामक विज्ञापन और निरंकुश उपभोक्तावाद जैसी नई समस्याओं, जीवन की बदलती प्राथमिकताओं, नई शक्तियों और नई परिस्थितियों से रूबरू नहीं हो पा रहा है। वह उसी पुराने रास्ते पर वही पुराना ढोल पीटता आगे बढ़ता दिखाई पड़ रहा है. इस अर्थ में वह अब परिवर्तनवादी नहीं, प्रतिक्रियावादी हो गया है. हर समस्या का हल डेढ़ सौ साल पीछे मुड़कर मार्क्स में ढूँढ़ता है.

यह हमारे समय की वह विडम्बना है जिससे आँख मूँदकर बौद्धिक लोग शुतुरमुर्ग़ बन गए हैं. देखते हैं तो बस अपने समानधर्मा अन्य शुतुरमुर्ग़ों को. परस्पर अहो-अहो की ऐसी जकड़बंदी है कि बाहर से कोई नई हवा प्रवेश नहीं कर सकती. इतने असहिष्णु कि कोई कुछ विपरीत कह दे तो तुरंत संदर्भ से छिटककर पहले उसकी लानत मलामत पर उतर आते हैं, इतने रुष्ट कि वश चले तो उसका ‘लिक्वीडेशन’ ही कर डालें. 

ऐसे में क्या यह सवाल प्रासंगिक नहीं हो उठा है—धर्मों के इस विभाजनकारी, घृणा-मूलक और वर्चस्ववादी युग में समाजवाद का भविष्य और उसका भावी स्वरूप क्या होगा? और भारत तो ऐसा देश है जहाँ धर्मों के साथ-साथ जाति-व्यवस्था भी एक जबर्दस्त विभाजक तत्व है जो शिक्षा, राजनीति, प्रशासन आदि को दबोचकर प्रतिगामिता की ओर ढकेल रही है। कला और साहित्य तक जातीय अस्मितावाद के सामान्य रूप—विखंडन—और उग्र रूप--परस्पर विद्वेष एवं घृणा--की चपेट में हैं जब कि संकट वस्तुत: पूरी मानवता के लिए है।   
(समाप्त)

कमलकांत त्रिपाठी 
© Kamlakant Tripathi

भाग (2) का लिंक
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/02/2.html 

Wednesday, 1 February 2023

कामलकांत त्रिपाठी / धार्मिक आतंकवाद का वैश्विक उभार और वहाबी पुनरुत्थानवाद (2) वहाबी इस्लाम

इस्लाम के इतिहास का और प्रकारांतर से दुनिया के इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय. ‘शुद्ध इस्लाम’ की ओर लौटना है. वक़्त अप्रत्याशित तेज़ी से बदलता है, आगे बढ़ता है. परिवर्तन की, सुधार की, गुंजाइश हमेशा रहती है, लेकिन हूबहू पीछे नहीं लौटा जा सकता, क्योंकि तब तक पीछे की दुनिया आमूल बदल चुकी होती है. वह इतिहास बन चुकी होती है। इतिहास कुछ सीखने की सुविधा तो देता है किंतु लौटने की नहीं।  

तो सीखने के लिए इतिहास में पीछे लौटते हैं. सन्‌ 1258. ईरान में मंगोलों का राज क़ायम हो चुका था. वहाँ के सूबेदार हुलागू ने बग़दाद के ख़लीफ़ा की एक उद्धत हरकत के चलते नाराज़ होकर बग़दाद पर धावा बोल दिया और ख़लीफ़ा को सपरिवार मौत के घाट उतारकर बग़दाद को ध्वस्त कर दिया. कई दिनों तक क़त्लेआम चलता रहा. अगले साल इसी तरह अरब के दूसरे महान शहर दमिश्क का भी ध्वंस हुआ. नतीज़तन सुन्नी मुसलमानों के एक तबके में पराभव की ग्रंथि पनपने लगी. इब्न तयमिय्या दमिश्क से भागे एक सीरियायी शरणार्थीं के पुत्र थे. वे उस माहौल में पले-बढ़े थे जिसमें मंगोलों को इस्लाम के क्रूरतम शत्रु के रूप में देखा जा रहा था. वे सुन्नी इस्लाम की चारों क़ानूनी शाखाओं—अनासी, हनाफ़ी, शाफ़ी और हनबली (?)-- में से चौथी, हनबली, के अनुयायी थे जो सबसे बाद की, सबसे कट्टर और सबसे कम लोकप्रिय थी. सन्‌ 900 तक इन चारों शाखाओं के विद्वानों में तक़्लीद (आम सहमति) हो चुकी थी और यह मान लिया गया था कि अब इज्तिहाद (जिस मुद्दे पर क़ुरान और हदीस में कोई रोशनी नहीं मिलती, उस पर स्वतंत्र चिंतन) की ज़रूरत नहीं रही. इब्न तयमिय्या ने तक़्लीद के बंधन को तोड़ दिया,  अपने को स्वतंत्र चिंतन का अधिकारी घोषित किया और इस्लामी क़ानून को नई परिभाषा देने की कोशिश की. यहाँ तक तो ठीक था—बदलती स्थितियों के साथ स्वतंत्र चिंतन की ज़रूरत कब नहीं होती? लेकिन तयमिय्या ने इसके बाद क्या किया? क़ुरान की शाब्दिक व्याख्या शुरू की और मुस्लिम समुदाय में बदलते समय के साथ समंजन के लिए आई ज़रूरी बिदत (विकास) को कुफ़्र क़रार दे दिया. इस्लामी परंपरा (हदीस), जो पैग़म्बर के साथियों द्वारा उनके कथनों और कार्यों की स्मृति के आधार पर बनी थी, के अनुसार मक्कावालों से बद्र के युद्ध (रमज़ान, 624 ई.) से लौटने के बाद पैग़म्बर ने कहा था कि अब बाह्य या छोटे जिहाद (जिहादे असग़र) का ख़ात्मा हुआ और हम बड़े या आंतरिक जिहाद (जिहादे अकबर) की ओर बढ़ते हैं. जिहादे अकबर का तात्पर्य अंदरूनी, नैतिक और आध्यात्मिक संघर्ष से लिया गया था, जिसकी ज़रूरत पहुँचे से पहुँचे लोगों को भी रहती है, और हमेशा रहती है. तयमिय्या ने क़ुरान की दो आयतों (2:193 और 8:39) के आधार पर हदीस के जिहाद-संबंधी वर्गीकरण को ख़ारिज कर दिया और जिहाद को पूरी दुनिया में इस्लाम स्थापित होने तक चलनेवाला अनवरत अभियान बना दिया. और यह जिहाद केवल ग़ैर-मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं, उन मुसलमानों के ख़िलाफ़ भी चलना था जो विधर्मियों की आदतें अपना लिए थे और इस्लाम मानने का दावा करते हुए भी असल में नहीं मानते थे—यानी वह इस्लाम नहीं मानते थे जो तयमिय्या द्वारा की गई क़ुरान की शाब्दिक व्याख्या के अनुकूल था. यहीं से उस बीज का रोपण होता है जिसे आगे चलकर अल क़ाइदा और अल शबाब और बोको हरम और तालिबान और हमास और ब्रदरहुड और आइ एस आई एस और ऐसी ही अनेक जमातों के रूप में प्रस्फुटित होना था, जिन्होंने इस्लाम के साथ-साथ पूरी मानवता के लिए संकट खड़ा कर दिया। 

अरब में नेज़्द के उयैना क़स्बे में सन्‌ 1702 में पैदा हुए अब्दुल वहाब इन्हीं तयमिय्या के अनुयायी थे. इनसे पहले तयमिय्या के ही भारतीय अनुयायी शेख अहमद सरहिन्दी ने अकबर की मृत्यु और जहाँगीर के गद्दीनसीन होने पर मुस्लिम मूल्यों की पुनर्स्थापना के मक़सद से एक राजनीतिक आंदोलन चलाया था. तो वहाबियों की नाल भारत से अविच्छेद्य रूप से जुड़ी हुई है।  सरहिन्दी के अनुयायी भारतीय वहाबियों की कट्टरता का अलग, समानांतर इतिहास है. उस इतिहास का पटाक्षेप हो जाने से यहाँ उसकी प्रासंगिकता न के बराबर है.

जब उयैना में अब्दुल वहाब के तयमिय्यावादी कट्टर मत का घोर विरोध हुआ तो इन्हें दारिया भागना पड़ा जिसको वहाब ने पैग़म्बर के दारुल हर्ब मक्का से दारुल इस्लाम मदीना की हिज्रत से जोड़कर महिमामंडित किया. दारिया में इन्हें स्थानीय मुखिया मुहम्मद इब्न सऊद का समर्थन तो मिला ही, इन्होंने अपनी बेटी इब्न सऊद के बेटे से ब्याह कर एक मज़बूत गठबंधन बना लिया. इस तरह इब्न सऊद उस प्रांत के अमीर और अब्दुल वहाब शेख-उल-इस्लाम की पदवी धारणकर उसके इमाम बन गए. सन्‌ 1766 में इब्न सऊद की हत्या होने के बाद उनका बेटा और अब्दुल वहाब का दामाद अज़ीज़ इब्न सऊद अमीर बना और, जब सत्तर साल की उम्र में वहाब साहब ने इमाम का पद छोड़ा, तो यही दामाद इब्न सऊद, जो अब तक सिर्फ़ अमीर था, अमीर और इमाम दोनों बन गया.

सऊद से कुछ याद आता है?  जी हाँ, सऊदी अरब. सऊदी अरब में जो सऊदी राजवंश राज कर रहा है, इन्हीं इब्न सऊद का वंशज है—अमीर और इमाम का संयुक्त संस्करण, और कट्टर वहाबी सुन्नी इस्लामी धारा का संरक्षक. वहाबी इस्लाम सऊदी अरब का आधिकारिक धर्म है। लेकिन  धार्मिक आतंकवाद के ख़िलाफ चली लड़ाई में सऊदी अरब ने अमेरिका के साथ हरावल दस्ते की भूमिका भी निभाई. इधर भी, उधर भी. यह सत्ता-मोह आदमी से जो न कराए. धर्म तो इसका  बहुत पुराना और बार-बार आजमाया हुआ औज़ार रहा है.

इसी सऊद वंश के एक दूसरे इब्न सऊद (1880-1953) ने बीमार और कमज़ोर टर्की साम्राज्य की ढिलाई का फ़ायदा उठाकर और अंग्रेजों द्वारा अपने उपनिवेशवादी हितों के लिए मुहैया की गई सुविधा से अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया. टर्की के सूबेदार से रियाध शहर छीना और अपने द्वारा गठित अति-उत्प्रेरित सैनिक दस्ते ‘अल इख़्वान’ (बंधुत्व) की मदद से नेज़्द के उत्तरी इलाक़े को जीत लिया. प्रथम विश्व युद्ध में टर्की की पराजय के बाद इन्होंने अरब के नेज़्द और हेजाज प्रांतों को मिलाकर स्वतंत्र सऊदी अरब राज्य क़ायम कर लिया (1932). 

अब्दुल वहाब की एक छोटी-सी कृति है ‘किताब-अल-तवाहिद’ (एकत्व की किताब) जिसे उनके शागिर्दों ने खींच-खींचकर चार मोटे खंडों में फैला दिया है. पैग़म्बर व मुस्लिम संतों-पीरों से प्रार्थना करना, अपने और अल्लाह के बीच उन्हें मध्यस्थ मानना, उनसे कृपा की विनती करना,   उनकी मज़ार का दर्शन करना, पैग़म्बर का जन्म-दिन मनाना, मक़बरे बनवाना, उन्हें देखने जाना, नृत्य, संगीत, कविता या ग़ज़ल में शिरकत करना या उनका लुत्फ उठाना, तस्बीह पर जप करना, रेशमी वस्त्र पहनना-- यह सब कुफ़्र है. जैसे ही कोई मुसलमान इनमें से कुछ भी अपनाता है, वह काफ़िर हो जाता है और अपने जीवन और सम्पत्ति का अधिकार खो देता है, ग़ैर-मुसलमान तो काफ़िर है ही. मक्का में पैगम्बर की बेटी फातिमा और कई अन्य मुस्लिम संतों की मज़ारें वहाबी इख्वान तोड़ चुके हैं। चूँकि उनके प्रति श्रद्धा दिखाना कुफ़्र है, इसलिए उनकी शिनाख़्त नष्ट करना ज़रूरी है. सन्‌ 1975 में सऊदी शाह फ़ैसल के एक भतीजे ने उनका क़त्ल कर दिया  क्योंकि इस भतीजे का सगा भाई अरब में टेलीविजन-प्रवेश (जो निश्चित ही कुफ़्र है) के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शन के दौरान सरकारी कार्रवाई में मारा गया था.

इस तरह वहाबियों द्वारा की गई क़ुरान की एकांतिक व्याख्या ने उस संतुलन और सामंजस्य को तोड़ दिया जिसे, एक कठिन समय और कठिन परिस्थितियों में हुए और कहीं-कहीं परस्पर-विरोधी और इसलिए भ्रामक लगते ‘इलहाम’ को, एक सहज, व्यावहारिक और आस्थापूर्ण जीवन जीने के अनुरूप ढालने के लिए, इस्लामी धर्मशास्त्र और विधिशास्त्र ने सदियों के प्रयास से हासिल किया था. और यह प्रक्रिया पैग़म्बर के जीवन-काल में ही शुरू हो गई थी. उनके व्यवहार में जो उदारता और समावेशी दृष्टि दिखती है, विशेष संदर्भ में उतरी क़ुरान की कुछ आयतों से उनको पुष्ट नहीं किया जा सकता. यह सिद्धान्त और व्यवहार का वह अंतर्निहित द्वैध है जो लगभग अपरिहार्य है. वहाबियों का कट्टर एकेश्वरवाद उस एकेश्वरवाद और उसकी मूल भावना से कोसों दूर जा पड़ता है, जिसे पैग़म्बर ने अपने जीवन-काल के व्यवहार में बहुत संयम, समझदारी, उदारता और दूरदर्शिता से, फूंक-फूंककर कदम उठाते हुए, सफलता पूर्वक लागू किया था. वहाबियों का एकनिष्ठ एकेश्वरवाद तो ख़ुदा की बनाई इस बहुरंगी दुनिया को काट-छाँटकर एक-सी करने की क़वायद में अंतत: नष्ट ही कर देगा.

नतीजतन, क़ुरान की जो आयतें (शुरू की पाँच फ़रिश्ता जिब्रील की मारफ़त) पैग़म्बर मुहम्मद को अल्लाह से नाज़िल हुई मानी जाती हैं, वहाबी उनका तात्पर्य निकालने में पैग़म्बर के स्वयं के व्यवहार और कार्यों को एक किनारे कर देते हैं. एक बार आयतें नाज़िल हो जाने के बाद वे सीधे ईश्वर की वाणी होने से परम (absolute) सत्य हो गईं। उनके नाज़िल होने का माध्यम बने मुहम्मद साहब के दावे को, कि ये आयतें उन्हें ईश्वर से नाज़िल हुई हैं, तो मान लिया किंतु इन आयतों की व्याख्या के लिए मुहम्मद साहब और उनके मंतव्य अप्रासंगिक हो गए. मनुष्य में ईश्वरीय वाणी के प्रति अंधश्रद्धा के नतीजे कितने ज़ालिम हो सकते हैं, इसकी कोई इंतिहा नहीं.

फ़िलहाल दुनिया के भिन्न-भिन्न भागों में ग़ैर-मुसलमानों के साथ मिल-जुलकर रहते, ईमानदारी से, शांतिपूर्वक अपनी रोजी-रोटी कमाते और और पुरखों से प्राप्त अपने धर्म और उसके प्रचलित कृत्यों के अनुपालन से संतुष्ट मुसलमानों को यह चैन और सुकून से तो नहीं ही रहने देगा. और मेरी अल्प-मति में किसी भी धर्म का पहला और अंतिम हासिल और असली लक्ष्य यही शांति, भाईचारा, चैन और सुकून है.

ऊपर अल क़ायदा सहित जितने भी सुन्नी धार्मिक आतंकी समूहों का ज़िक्र किया गया, सभी अपना सैद्धांतिक आधार वहाबी इस्लाम से ग्रहण करते हैं. सबका सैद्धांतिक और दूरगामी लक्ष्य दुनिया में इस्लाम का वर्चस्व और क़ुरान की शब्दस: व्याख्या के अनुसार शरीयत का शासन लागू करना है. इसे वे अपना सर्वोच्च धार्मिक कर्तव्य मानते हैं और उनमें से कुछ तो ऐसे होंगे ही जो पूरी सत्यनिष्ठा से ऐसा मानते हों. तो क़ुरान की आयतों के आधार पर ऐसे आतंकी समूहों का प्रत्याख्यान नहीं हो सकता. यही वह गुत्थी है जो सामान्य मुसलमानों को चुप रहने को मजबूर करती है और इन समूहों को अभूतपूर्व ताक़त देती है। किसी का इतना जबर्दस्त मानसिक अनुकूलन कर देना कि वह अधिकाधिक संभव संख्या में अनजान निरपराधों की हत्या के लिए अपनी जान न्योछावर करने को तैयार हो जाए, बिना अदम्य विश्वास और खाँटी प्रतीति के संभव नहीं हो सकता. एक मुस्लिम मित्र ने मुझे बताया कि नौजवानों को जिहादी बनाने के लिए जब उनका मानसिक अनुकूलन किया जाता है, उन्हें लगता है, सामनेवाला जो भी बोल रहा है, कोई इंसान नहीं, अल्लाह ख़ुद बोल रहे हैं, और यह उसका परम सौभाग्य और जीवन की सर्वोच्च सार्थकता है कि उसे अल्लाह का आदेश सुनने के लिए चुना गया। 
(क्रमश:)

कमलकांत त्रिपाठी
© Kamlakant Tripathi

भाग (1) का लिंक
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2023/01/1.html

सरकार की प्राथमिकता में जनता नहीं, बस एक उद्योगपति है / विजय शंकर सिंह

ऐसे उद्योगपति, देश के दुश्मन की तरह हैं, जब वे फ्रॉड कर, टैक्स चुरा कर, अफसरों और राजनेताओं को, रिश्वत, चुनाव के लिए अनाप शनाप धन, तरह तरह के आर्थिक अपराध करके, मीडिया खरीद कर, दंगाई प्रोग्राम चलवाते हैं तब। ये देश के ही नहीं समाज और मानवता के भी दुश्मन हैं। इनके धन का क्षय हो।

जब ऐसे फ्रॉड और आर्थिक अपराध करके, मोटे होते जाने वाले उद्योगपतियों का नाश होगा तो, ऐसे उद्योगपति आयेंगे जो कानून के अनुसार, अपना काम करेंगे। ऐसे उद्योगपति और व्यापारी कम नहीं हैं पर वे इन फ्रॉड और राजनीतिक लॉबी के दम पर तरक्की करने वाले उद्योगपतियों के कारण हाशिए पर हैं।

अपराध, अपराध है चाहे उसे अरबपति करें या हम आप जैसे लोग। अब तक हिंडन बर्ग रिपोर्ट पर सरकार को कार्यवाही शुरू कर देनी चाहिए थी कि, धन मिलने का जो आरोप कि, tax haven कहे जाने वाले देशों और शेल कंपनियों के माध्यम से अडानी समूह को अनुचित धन लाभ हुआ है, उसमे कितनी सचाई है।

पर सरकार, वैसे ही चुप है, जैसे वह, नोटबंदी के बाद लाइनों में, लोगों के और कोरोना के समय ऑक्सीजन की कमी से मरीजों के मरते समय थी।
सरकार की प्राथमिकता में जनता कही है भी? 
सरकार तो एसबीआई, एलआईसी से अडानी का शेयर खरीदवा रही है। प्राथमिकता में उद्योग भी नहीं हैं, है तो बस, अडानी है।

(विजय शंकर सिंह)

'पीएम केयर्स फंड एक धर्मार्थ ट्रस्ट है', दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार / विजय शंकर सिंह


पीएम केयर्स फंड की कानूनी स्थिति पर, दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक याचिका पर सुनवाई चल रही है। उस सुनवाई प्रधान मंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि पीएम केयर फंड भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" नहीं है और सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत "सार्वजनिक प्राधिकरण" के रूप में गठित नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 12 में राज्य की परिभाषा दी गई है। पीएमओ ने उसी परिभाषा का उल्लेख किया है।

यह हलफनामा, पीएमओ के अवर सचिव द्वारा दायर किया गया है। हलफनामे में कहा गया है कि, "पीएम केयर्स फंड को एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया गया है और यह भारत के संविधान या संसद या किसी राज्य विधानमंडल द्वारा या उसके तहत नहीं बनाया गया है। इस ट्रस्ट का, न तो, भविष्य में कोई सरकारी मदद लेने का इरादा है, और न ही यह किसी सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण से किसी संस्था द्वारा वित्तपोषित ही है।साथ ही, न ही यह सरकार का कोई संसाधन है।"
यानी इस फंड का सरकार से कोई संबंध नहीं है। हलफनामे में आगे कहा गया है कि "ट्रस्ट के कामकाज में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से केंद्र सरकार या किसी भी राज्य सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।"

हलफनामा में यह भी कहा है कि, "पीएम केयर्स फंड केवल व्यक्तियों और संस्थानों द्वारा स्वैच्छिक दान स्वीकार करता है और यह फंड, सरकार के बजटीय स्रोतों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की बैलेंस शीट से आने वाले योगदान को स्वीकार नहीं करता है। PMCARES फंड/ट्रस्ट में किए गए योगदान को आयकर अधिनियम, 1961 के तहत छूट दी गई है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकाला जाना उचित नहीं है कि, यह एक "सार्वजनिक प्राधिकरण" है।"

पीएमओ ने हलफनामे में इसे और स्पष्ट किया और आगे कहा है कि, "फंड को सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं कहा जा सकता है क्योंकि जिस कारण से इसे बनाया गया था वह "विशुद्ध रूप से धर्मार्थ" है और न तो इस फंड का उपयोग किसी सरकारी परियोजना के लिए किया जाता है और, न ही ट्रस्ट सरकार की किसी भी नीति से शासित होता है। इसलिए, पीएम केयर्स को 'पब्लिक अथॉरिटी' के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। इस फंड के योगदान के साथ, भारत के समेकित कोष का कोई दूर दूर तक, कोई संबंध भी नहीं है।”

यह कहते हुए कि, "फंड या ट्रस्ट सरकार के किसी निर्णय या कार्य के लिए अपनी गठन का श्रेय नहीं देता है।" हलफनामे में यह सप्ष्ट किया गया है कि, "पीएम केयर फंड का कोई सरकारी चरित्र नहीं है "क्योंकि फंड से राशि के वितरण के लिए, सरकार द्वारा कोई दिशानिर्देश निर्धारित नहीं किया जा सकता है। पीएम केयर्स ट्रस्ट में किए गए योगदान को अन्य निजी ट्रस्टों की तरह आयकर अधिनियम के तहत छूट प्राप्त है। यह एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है जिसमें व्यक्तियों और संस्थानों द्वारा किए गए स्वैच्छिक दान शामिल हैं और यह केंद्र सरकार का कोई व्यवसाय नहीं है।  इसके अलावा, पीएम केयर फंड को सरकार द्वारा धन या वित्त प्राप्त नहीं होता है।"

हलफनामा में यह भी कहा गया है कि "फंड से स्वीकृत अनुदान के साथ-साथ पीएम केयर फंड की वेबसाइट "pmcares.gov.in" पर सार्वजनिक डोमेन में, सभी जानकारियां उपलब्ध है और इसकी ऑडिटेड रिपोर्ट पहले से ही वेबसाइट पर उपलब्ध है। बाद में खातों के ऑडिट किए गए विवरण भी वेबसाइट पर उपलब्ध कराए जाएंगे, जब भी देय होगा।  इसलिए, मनमानी या गैर-पारदर्शिता के बारे में याचिकाकर्ता की धारणा उचित नहीं है।”

पीएमओ ने यह भी तर्क दिया है कि "पीएम केयर्स फंड को प्रधान मंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) की तर्ज पर प्रशासित किया जाता है क्योंकि दोनों की अध्यक्षता प्रधान मंत्री करते हैं। जैसे राष्ट्रीय प्रतीक और डोमेन नाम 'gov.in' का उपयोग PMNRF के लिए किया जा रहा है, उसी तरह PM CARES फंड के लिए भी उपयोग किया जा रहा है।"
अंत में, हलफनामे ने यह कहा कि, "न्यासी बोर्ड की संरचना जिसमें सार्वजनिक पद के धारक, (यानी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री आदि) पदेन रूप से शामिल हैं, तो, यह केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए और ट्रस्टीशिप के सुचारू उत्तराधिकार के लिए है और इसका, सरकार के नियंत्रण का न तो कोई इरादा है और न ही वास्तव में इसका कोई उद्देश्य।"

दिल्ली हाईकोर्ट में यह याचिका, सम्यक गंगवाल द्वारा दायर की गई है। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि, "पीएम केयर्स को, भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत PM  "राज्य" घोषित किया जाय।"
याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए, हलफनामे में कहा गया है कि "याचिका "आशंकाओं और अनुमानों" पर आधारित है और एक संवैधानिक प्रश्न को शून्य में तय नहीं किया जाना चाहिए।"
गंगवाल ने कहा, "समय-समय पर फंड की ऑडिट रिपोर्ट का खुलासा करने के लिए, स्पष्ट  दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए, फंड में प्राप्त दान, उसके उपयोग और दान के व्यय पर संकल्प के फंड के त्रैमासिक विवरण को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।"

याचिका में विकल्प में, यह भी तर्क दिया गया है कि "यदि पीएम केयर्स फंड अनुच्छेद 12 के तहत राज्य नहीं है, तो केंद्र को व्यापक रूप से प्रचार करना चाहिए कि यह सरकारी स्वामित्व वाली निधि नहीं है।" 
याचिका में यह भी मांग की गई है कि "पीएम केयर फंड को अपने नाम/वेबसाइट में "पीएम", राज्य के प्रतीक, अपनी वेबसाइट में डोमेन नाम "जीओवी" और पीएम के कार्यालय को अपने आधिकारिक पते के रूप में उपयोग करने से रोका जाना चाहिए।"

29 मार्च 2020 के जब कोरोना की लहर की वजह से देश में पाबंदियां लगनी शुरू हो गयीं थी और महामारी तेज़ी से फैल रही थी, तब प्रधानमंत्री ने 'पीएम केयर्स फंड' के स्थापना की घोषणा की थी जिसके माध्यम से कोरोना महामारी की अप्रत्याशित स्थिति का मुक़ाबला किया जा सके। 'पीएम केयर्स फंड' की वेबसाइट पर दो सालों का जो लेखा जोखा पेश किया गया है, उसके अनुसार इस फंड में कुल 10,990 करोड़ रुपये इकठ्ठा हुए हैं। यह जानकारी पिछले साल की है। फंड के ऑडिट की रिपोर्ट बताती है कि, मार्च 2021 तक इस राशि से 3,976 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए, जो कुल जमा राशि का एक तिहाई हिस्सा है।

ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार जो राशि ख़र्च की गई उसमें प्रवासी मज़दूरों के पलायन को देखते हुए राज्य सरकारों को 1,000 करोड़ रुपये दिए गए जबकि देश के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में पचास हज़ार के लगभग वेंटिलेटर मुहैया कराए गए जिसपर 1,131 करोड़ रुपये का ख़र्च हुआ है। साथ ही यह भी बताया गया है कि वैक्सीन की 6.6 करोड़ डोज़ के लिए मार्च 2021 तक 1392 करोड़ रुपये भी इसी मद से ख़र्च किए गए हैं।

हालांकि, कोरोन महामारी के दौरान, यह भी शिकायत मिली कि, जो वेंटिलेटर, इस फंड के पैसे से, दिए गए थे उनमें बहुत से, ख़राब भी  निकले। मीडिया की खबरों के अनुसार, जो वेंटिलेटर, दिए गए उनमें से बहुत सारे वैसे ही पड़े रह गए क्योंकि उनका संचालन करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को प्रशिक्षण ही नहीं मिल पाया था। रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में आरटी/पीसीआर जांच के लिए 16 लैब की स्थापना में 50 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए जबकि 20 करोड़ की राशि से कुछ राज्यों में पहले से मौजूद लैब का आधुनिकीकरण किया गया ताकि लोगों को कोविड की जांच कराने में आसानी हो सके। इसके अलावा देश भर में 160 ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने के लिए 200 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च किए गए. वहीं 50 करोड़ रुपये बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर और पटना में कोविड अस्पताल बनाने के लिए ख़र्च किए गए।

'पीएम केयर्स फंड' का ऑडिट, सार्क एसोसिएट्स नाम की ऑडिट फर्म ने किया है,  जो वेबसाइट पर मौजूद है। इसमें यह भी बताया गया है कि, कहाँ से कितनी राशि मिली है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जहाँ 7,183 करोड़ देश के अन्दर से ही स्वैच्छिक दान के माध्यम से जमा हुए, लगभग 494 करोड़ रुपये विदेश से मिले अनुदान के ज़रिए जमा किए गए। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फंड के स्थापना की घोषणा की थी तो विपक्ष ने इस फ़ैसले पर कई सवाल उठाए। कांग्रेस के सहित प्रमुख विपक्षी दलों ने सरकार से सवाल किया था कि जब प्रधानमंत्री राहत कोष मौजूद है तो, फिर इस नए फंड की क्या आवश्यकता थी। विपक्ष का कहना था कि राज्य स्तर पर भी मुख्यमंत्री राहत कोष स्थापित है और इसमें ही पैसे जमा होने चाहिए थे।

सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने पिछले दो सालों में इस फंड से जुड़ी सूचनाओं को लेकर अदालतों तक जाना पड़ा, और यह मांग करनी पड़ी कि, इसे 'सूचना के अधिकार' के अंतर्गत लाया जाना चाहिए और इससे संबंधित जानकारी जब मांगी जाए तो उसे उपलब्ध कराया जाए। मगर पिछले साल सितंबर माह में भी दिल्ली उच्च न्यायालय में सरकार ने अपनी याचिका में स्पष्ट किया कि 'पीएम केयर्स फंड' सरकार की कोई 'संस्था' नहीं है बल्कि एक दानशील या 'चैरिटेबल ट्रस्ट' है जिसकी वजह से ये सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं आ सकती. ये एक ट्रस्ट है जिसका संचालन सिर्फ़ ट्रस्टी ही करेंगे।"

यहीँ यह सवाल उठता है कि, अगर इस फंड पर किसी भी तरह की निगरानी नहीं रखी जा सकती है तो फिर इसमें पारदर्शिता कहाँ से आएगी? इस फंड में सरकरी कर्मचारियों, सरकारी विभागों और निजी कंपनियों ने दान किया है. इसलिए इसके कार्यकलापों में पारदर्शिता होनी ही चाहिए। फिलहाल यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में है, और अभी इसकी सुनवाई चल रही है।

(विजय शंकर सिंह)
Vijay Shanker Singh