Friday, 20 January 2023

दिल्ली में पहलवानों का धरना और कुश्ती संघ का विवाद / विजय शंकर सिंह

राष्ट्रीय कुश्ती संघ के प्रमुख और सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन शौषण के कुछ आरोपों को लेकर, कुछ बड़े और अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भाग ले चुके पहलवान और महिला पहलवान दिल्ली के जंतर मंतर पर धरने पर बैठे हैं। 

बृजभूषण, गोंडा से 6 बार सांसद रह चुके हैं और उनका और उनके परिवार का इलाके में प्रभाव है। यह बात सही है कि, वे बाहुबली हैं और उन पर आपराधिक धाराओं में मुकदमे भी दर्ज है। पर बाहुबली और आपराधिक इतिहास का होना, सांसद या जनप्रतिनिधि बनने की कोई अयोग्यता तो है नही। कैबिनेट में तो आपराधिक इतिहास वाले एमपी भी मंत्रीपद पर सुशोभित हैं। 

अब रहा सवाल, यौन शौषण का। बृजभूषण शरण को मै, जितना निजी तौर पर जानता हूं, उसके अनुसार, मुझे इस तरह के आरोप पर संशय है। मार पीट देना, हड़का देना, आदि के बारे में मुझे कोई संशय नहीं है। यह उनके स्वभाव का अंग हो सकता है। उनके इस अमर्यादित आक्रामक आचरण की निंदा होती है और,  किसी भी, किसी के भी, अमर्यादित आचरण की निंदा की भी जानी चाहिए। 

लेकिन, उनके ऊपर, यौन शौषण का आरोप यदि किसी महिला खिलाड़ी ने लगाया है तो उसे, इस आरोप की जांच के लिए आगे आना चाहिए। सरकार को, इस गंभीर आरोप की जांच करानी चाहिए। जांच कैसे और किसके द्वारा हो, यह भी सरकार को ही तय करना है। 

बृजभूषण इधर बाबा रामदेव को लेकर भी चर्चा में रहे हैं। उन्होंने रामदेव की दवाइयों और उत्पादों की गुणवत्ता पर, भी कुछ बयान दिए थे। रामदेव आज से विवादित नहीं हैं। जमीन के कब्जे से लेकर, वैद्य बालकिशन के फर्जी वैद्यक की डिग्री से होते हुए अपने अनेक उत्पादों के लैब टेस्टिंग के विफल पाए जाने तक, उन पर बराबर विवाद उठता रहा है, और अब भी वे इन विवादों और आरोपों से मुक्त नहीं हैं। क्या हालिया विवादों की पृष्ठभूमि में, कही रामदेव के बारे में दिए गए, बृजभूषण शरण के बयान तो नहीं हैं। इसे भी देखा जाना चाहिए। 

उनसे कुश्ती संघ से इस्तीफा देने की मांग की जा रही है। यौन शौषण के आरोप और कुश्ती संघ से इस्तीफा दोनो अलग अलग मामले हैं। यदि उनके कार्यकाल में कुश्ती संघ में कोई अनियमितता, पक्षपात या भ्रष्टाचार हुआ है तो सरकार इस मामले की जांच कराकर उन्हें हटने के लिए कह सकती है। पर किसी महिला खिलाड़ी का यौन शौषण एक अलग और गंभीर आपराधिक मामला है।  

अखबारों के अनुसार, बृजभूषण ने अपने ऊपर लगाए आरोपौ की जांच की मांग की है। जब इतने दिनों से, यह पहलवान जंतर मंतर में अपनी व्यथा लिए बैठे हैं तो, उनकी बात सुनी जानी चाहिए। खिलाड़ी किसी भी जाति, प्रदेश या धर्म का हो, वह किसी भी अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजन में देश का प्रतिनिधित्व करता है, न कि, अपनी जाति बिरादरी, धर्म या प्रदेश का। सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। हर धरना प्रदर्शन प्रतिरोध पर शतुरमुर्गी चुप्पी अनुचित है। 

(विजय शंकर सिंह)

Thursday, 19 January 2023

क्या प्रधानमंत्री पर लिखे लेख को साझा और खुदकुशी के मामले पर नाराजगी जाहिर करना, हाईकोर्ट के जज लिए, कोई अनुपयुक्तता है? / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एडवोकेट आर जॉन सत्यन को मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने के अपने प्रस्ताव को दुबारा, केंद्र सरकार को भेजा है। उनका नाम पहले भी भेजा गया था, पर केंद्र सरकार ने इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, उनका नाम खारिज कर दिया था।

जिस आईबी रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने, उनका नाम खारिज कर दिया था, में अंकित है कि, "आर जॉन सत्यन ने, क्विंट वेबसाइट में प्रकाशित एक लेख साझा किया था जो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में लिखा गया था। उन्होंने ने द क्विंट में प्रकाशित इस तरह के एक लेख के साथ-साथ, 2017 में एक मेडिकल आकांक्षी की आत्महत्या को 'राजनीतिक विश्वासघात' और 'भारत की शर्म' के रूप में चित्रित करने वाली एक अन्य पोस्ट भी साझा की थी।"

इस पर, कॉलेजियम ने अपने ताजा बयान में कहा,
 "आईबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि उनका कोई राजनीतिक झुकाव नहीं है। इस पृष्ठभूमि में, आईबी की प्रतिकूल टिप्पणियां उनके द्वारा किए गए पोस्ट के संबंध में निकाली गई हैं। यानी 'द क्विंट' में प्रकाशित एक लेख को साझा करना और एक अन्य पोस्ट से उनकी  प्रतिबद्ध समझ लेना उचित नहीं है। 2017 में एक मेडिकल आकांक्षी उम्मीदवार द्वारा आत्महत्या करने से श्री सत्यन की उपयुक्तता, चरित्र या अखंडता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।"

16 फरवरी, 2022 को, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने छह वकीलों - निदुमोलू माला, सुंदर मोहन, कबाली कुमारेश बाबू, एस सौंथर, अब्दुल गनी अब्दुल हमीद, और आर जॉन सत्यन के नामों की सिफारिश की थी। यह, मद्रास हाईकोर्ट कॉलेजियम द्वारा 2021 में शीर्ष अदालत से सिफारिश करने के बाद किया गया। जबकि अन्य नामों को मंजूरी दे दी गई थी और उन्हें उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त भी किया जा चुका था, सत्यन और हमीद के नाम वापस भेज दिए गए थे।

कॉलेजियम ने खुलासा किया कि, "उस समय के परामर्शदाता जजों - जस्टिस संजय किशन कौल, इंदिरा बनर्जी, वी रामासुब्रमण्यम और एमएम सुंदरेश - ने सत्यन को पदोन्नति के लिए उपयुक्त पाया था।"
इसने आगे कहा कि "उनकी एक अच्छी व्यक्तिगत और पेशेवर छवि है, और उनकी ईमानदारी के खिलाफ कुछ भी प्रतिकूल नहीं है।"

कोलेजियम ने सत्यन के हाईकोर्ट नियुक्ति प्रस्ताव को दुबारा भेजा है,
 "कॉलेजियम आगे अनुशंसा करता है कि उन्हें मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए इस कॉलेजियम द्वारा आज अलग से अनुशंसित कुछ नामों पर न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के मामले में वरीयता दी जाए।"

क्या एक लेख जो पीएम के बारे में किसी वेबसाइट पर छपा हो को, यदि कोई एडवोकेट साझा कर देता है और एक लेख जो एक मेडिकल आकांक्षी छात्रा की खुदकुशी पर, उसे राजनीतिक विश्वासघात और भारत के लिए शर्म की बात कह कर अपनी भावना जाहिर करता हो तो क्या उसका यह आचरण, हाईकोर्ट के न्यायाधीश के लिए अनुपयुक्त माना जाएगा ?

सरकार ने आईबी रिपोर्ट के साफ साफ यह लिखने के बावजूद कि सत्यम का कोई राजनैतिक झुकाव नहीं है, केवल दो लेख साझा करने पर, (यह लेख किसी अन्य लेखक ने लिखे हैं) कॉलेजियम की सिफारिश को, 2017 से ही, रोक रखा है। अब यह सिफारिश दूसरी बार की गई है, और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, यह अनुशंसा सरकार के लिए बाध्यकारी होगी। 

(विजय शंकर सिंह)

Sunday, 15 January 2023

जोशीमठ त्रासदी (4) चारधाम यात्रा मार्ग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी, इस संकट को बढ़ा सकता है / विजय शंकर सिंह

मिश्र कमेटी रिपोर्ट 1976, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, करेंट साइंस के विशेषज्ञ लेखकों, आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक राजीव सिन्हा सहित अनेक विशेषज्ञों की जोशीमठ के बारे में यह स्पष्ट राय थी कि, निर्माण कम से कम हो, बहुमंजिला निर्माण तो बिल्कुल ही न हो, और आबादी का घनत्व न बढ़ने दिया जाय। पर इन सभी विशेषज्ञ सलाहों के बाद, सरकार एक नई योजना लेकर आई चारधाम यात्रा मार्ग जिसमे बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को एक साथ चार लेन सड़क से जोड़ना है और इससे उत्तराखंड में पर्यटन भी बढ़ेगा और तीर्थाटन भी। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी  सड़क विस्तार परियोजना से, हिमालय की पारिस्थितिकी, पड़ने वाले, संभावित खतरनाक परिणाम को देखते हुए पर्यावरण के सजग कार्यकर्ताओ ने साल 2018 में एक याचिका दायर की।

देहरादून स्थित सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून सहित, अनेक पर्यावरणविद समूहों ने, इस राजमार्ग के चौड़ीकरण का विरोध करते हुए अपनी याचिका में, बड़े पैमाने पर भूस्खलन और अन्य पर्यावरणीय आपदाओं का हवाला दिया, और पहले के किये गए वैज्ञानिक अध्ययनों और निष्कर्षों को अदालत के समक्ष रखा और यह कहा कि, इससे न केवल धरती पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा, बल्कि, इस इंफ्रास्ट्रक्चर ढांचा परियोजना के लिए, बहुत से पेड़ों की कटाई होने से, हिमालय की इन उपत्यकाओं के पारिस्थितिक तंत्र का विनाश भी होने लगेगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने, याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद, हिमालय की घाटियों पर चारधाम परियोजना के संचयी और स्वतंत्र प्रभाव पर विचार करने के लिए, एक उच्चाधिकार समिति (एचपीसी) का गठन किया। शीर्ष अदालत ने कहा, “हम एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) का गठन करते हैं जिसमें सभी संबंधित विशेषज्ञ शामिल किये जायेंगे। इस हाई पॉवर कमेटी की अध्यक्षता प्रो. रवि करेंगे। इसके सदस्यों में, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार, अहमदाबाद, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून, रक्षा मंत्रालय के एक एक प्रतिनिधि होंगे। साथ ही, निदेशक सीमा सड़क संगठन, सहित कुल 21 सदस्यों की यह कमेटी जिसे एचपीसी (हाई पॉवर कमेटी) नाम दिया गया, गठित की गई। इस उच्चाधिकार प्राप्त, एचआईसी को, हिमालय की भूगर्भीय, भौगोलिक, पारिस्थितिकी, वनस्पति और जीव जंतु के इको सिस्टम पर, इस सड़क परियोजना का क्या असर पड़ सकता है और उनके निदान क्या है, इस पर अध्ययन कर, एक विस्तृत विशेषज्ञ रिपोर्ट देने के लिये, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने निर्देश दिया। इस याचिका की सुनवाई, जस्टिस चंद्रचूड़ ही कर रहे थे, तब सीजेआई नहीं बने थे। 

इस कमेटी ने जुलाई 2020 में अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी। पहाड़ी सड़कों के लिए आदर्श चौड़ाई के मुद्दे पर इस हाई पॉवर कमेटी के सदस्यों के बीच, मतभेद भी उभरा। इस मतभेद के बाद एचपीसी ने, अदालत में, दो रिपोर्ट प्रस्तुत कीं। एचपीसी के 4 सदस्यों द्वारा की गई, अल्पमत की सिफारिश में यह तर्क दिया गया है कि "एक आपदा प्रतिरोधी सड़क, एक व्यापक सड़क की तुलना में, बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।" क्योंकि, इस पूरे इलाके में, लगातार रुकावट, भूस्खलन और आवर्ती ढलान के कारण, सड़कों के बाधित हो जाने की बहुत अधिक संभावनाएं हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने, इस मुकदमे को कवर करते हुए, हाई पॉवर कमेटी के इस अंतर्द्वंद को, बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट किया था। 

दूसरी ओर, एचपीसी के 21 सदस्यों, जिनमें से 14 सरकारी अधिकारी थे, में सरकारी अधिकारियों के बहुमत ने, सड़क की चौड़ाई, 12 मीटर तक रखने का सुझाव दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए, सितंबर 2020 में, हाई पॉवर कमेटी के अल्पमत गुट की सिफारिश को, तर्कसम्मत मानते हुये, यह फैसला सुनाया कि अनिश्चित (अंप्रेडिक्टेबल) और संवेदनशील इलाके में कैरिजवे (सड़क) की चौड़ाई 5.5 मीटर तक ही सीमित होनी चाहिए। यानी सुप्रीम कोर्ट ने 12.5 मीटर से सड़क की चौड़ाई आधी कर दी, जो, चार लेन के बजाय, दो लेन की हो जा रही थी। 

भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को नहीं माना और सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के लिये दुबारा सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा। अब, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं का हवाला देते हुए, इस फैसले को चुनौती दी। भारत सरकार का कहना था कि, दोनो तरफ पक्की दीवार और 10 मीटर की चौड़ाई वाली सड़क को, दो-लेन में विकसित करने के लिए, अनुमति दी जाय। यानी सड़क एक मजबूत दीवार वाली डिवाइडर से सुरक्षित रखा जाय। इस रिटेनिंग दीवार के लिये भी तो ज़मीन चाहिये, और पर्वतीय क्षेत्र में जो भी, ज़मीन निकाली जाएगी, वह पहाड़ को तोड़ या खुरच कर ही निकाली जायेगी। पहाड़ पर इस तरह के अनावश्यक दबाव को बचाने के लिए ही तो यह मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। सरकार की तरफ से सरकार का पक्ष रखते हुए, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने नवंबर 2021 में शीर्ष अदालत को बताया, "चीन दूसरी (सीमा के उस पार) तरफ हेलीपैड और इमारतों का निर्माण कर रहा है ... इसलिए तोपखाने, रॉकेट लॉन्चर और टैंक आदि ले जाने वाले ट्रकों को इन सड़कों से गुजरना पड़ सकता है।" इसलिये इन सड़कों का पर्याप्त चौड़ा होना ज़रूरी है। यहां यह तथ्य नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि, चीन या तिब्बत की तरफ, हिमालय की भूगर्भीय, भौगोलिक, और इकोलॉजिकल स्थितियां, हमारी ही तरह के अस्थिर और भुरभुरे पहाड़ी भाग हैं, या तिब्बत के ऊंचे पठार के कारण, दृढ़ चट्टानी श्रृंखला हैं । 

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, भारत सरकार के, सड़क चौड़ीकरण के राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर, पर्यावरणविदों का तर्क था कि, सेना मौजूदा सड़कों से संतुष्ट थी लेकिन, वह, केवल सरकार के निर्देशों का पालन कर रही थी। एनजीओ ने आगे तर्क दिया कि, सड़क चौड़ीकरण की यह कवायद, सुरक्षा की आड़ में, चार धाम यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए, की की जा रही है। जिसका बेहद विपरीत असर हिमालय की इन उपत्यकाओं की पारिस्थतिकी और इकोलॉजी पर पड़ेगा।

आखिरकार, चारधाम मामले में, फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 14 दिसंबर 2021 को चारधाम सड़क परियोजना के लिए, सरकार के अनुसार, चौड़ी सड़क बनाने की अनुमति दे दी। अदालत का आदेश, भारत-चीन सीमा पर हाल की सुरक्षा चुनौतियों और सशस्त्र बलों के तेजी से आवागमन के लिए डबल-लेन सड़कों के सामरिक महत्व को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया था। 14 दिसंबर, 2021 को हिमालय एक महत्वपूर्ण लड़ाई हार गया, जब, सुप्रीम कोर्ट ने चार धाम परियोजना (सीडीपी) के लिए व्यापक रूप से चौड़ी, 10 मीटर कोलतार वाली सतह, डबल-लेन पेव्ड शोल्डर (डीएल-पीएस), सड़क की चौड़ाई के पक्ष में फैसला सुनाया। प्रस्तावित मार्ग, चार प्राचीन हिमालयी तीर्थों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री को आपस मे जोड़ता है। यह प्राचीन भागीरथी की नाजुक और संवेदनशील घाटियों से होकर गुजरता हुआ, गंगा, अलकनंदा, मंदाकिनी और यमुना नदियों की उपत्यकाओं को पार करता है। 12,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना में सुधार के साथ-साथ 889 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास की भी परिकल्पना की गई है। इन राष्ट्रीय राजमार्गों में कुल परियोजना का 700 किमी की लंबाई शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट का, 83 पन्नों का यह फैसला 'सतत विकास' की अवधारणा पर आधारित है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गए पिछले कई, फैसलों के कुछ प्रशंसनीय उद्धरण उद्धृत करते और उनका उल्लेख करते हुए,  पर्यावरणीय चिंताओं के साथ साथ सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताओं को भी संतुलित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। लेकिन विकास की ज़रूरतों को, जीने के मानव अधिकारों और पर्यावरणीय चिंताओं से अलग कर के नहीं देखा जा सकता है। विकास का अर्थ है, किसी एक संकाय की अनदेखी या उसका विनाश नहीं, बल्कि, अपनी पूरी क्षमता से, विकास को साकार करना है। अदालत ने, इस फैसले में, वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षण को लागू करने के रूप में, स्थिरता को भी रेखांकित किया है। फैसला, इस बात पर भी जोर देता है कि, सतत विकास, केवल निवारण के लिए नहीं है, बल्कि पर्यावरण की रक्षा में विफलताओं को रोकने के लिए भी है।

अदालत फिर, अपने तर्क के मूल को स्पष्ट करती है। फैसले में कहा गया है, "न्यायिक समीक्षा के अपने अधिकार के दौरान, अदालत, सशस्त्र बलों की ढांचागत जरूरतों का अनुमान नहीं लगा सकती है।" सुरक्षा के लिये सशस्त्र बलों को किस तरह की ढांचागत सुविधाएं चाहिये, इसे अदालत तय नहीं कर सकती है। अदालत के इस तर्क से असहमति नहीं हो सकती है। सुरक्षा के आक्रमण और बचाव के तौर, तरीके, रणनीति, संसाधन आदि सेना को ही तय करना है। इसीलिये, जब अदालत ने हाई पॉवर कमेटी के बहुमत द्वारा डबल लेन - पेव्ड शोल्डर्स (डीएल पीएस) सड़क की बात रखी तो अदालत का विकल्प सीमित हो गया। पर्यावरणीय चिंताओं के विरुद्ध, रक्षा हितों को संतुलित करना एचपीसी के दायरे से बाहर था। हालांकि, केंद्रीय रक्षा मंत्रालय का एक निदेशक स्तर का अधिकारी हमेशा एचपीसी का सदस्य रहा है। 

हाई पॉवर कमेटी के अध्यक्ष के नेतृत्व वाले अल्पसंख्यक विशेषज्ञों और याचिकाकर्ताओं ने बार-बार, अदालत से कहा है कि "सेना की आवश्यकता विवाद का मुद्दा नहीं थी। सेना को डीएल-पीएस या छह-लेन राजमार्ग की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन जमीन पर। हिमालय, जहां जगह जगह भू स्खलन, और ढलान जैसी समस्याएं हैं, क्या वहां, इतनी चौड़ाई की सड़क बनाई और उसे लंबे समय तक बिना धंसे या भूस्खलित हुए, सुरक्षित और बरकरार रखा जा सकता है? निश्चित रूप से क्षेत्र के विशेषज्ञ ही इसका मूल्यांकन कर सकते हैं। पिछले दो वर्षों में इस तरह के भूस्खलन के कारण सड़कों की गतिशीलता में गंभीर बाधा देखी गई है। केवल भूस्खलन, ही नहीं हुए, इन आपदाओं के कारण, अनेक बाधाएं और कई दुखद मौतें भी हुई हैं।

प्रियदर्शिनी पटेल, जो 'गंगा आह्वान' नामक संस्था की एक प्रमुख सदस्य हैं, ने भू धंसाव की गतिविधियों पर एक अध्ययन किया है और उनके हवाले से, इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, हिमालय की संवेदनशीलता का अंदाज़ा इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि "भारत सरकार के, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने, वर्ष  2021 में 200 से अधिक भूस्खलन की घटनाओं की सूचना दी। यह सब आंकड़े सरकार के अभिलेखों में दर्ज है। इन भूसख्लनों से राष्ट्रीय राजमार्ग-58 और राष्ट्रीय राजमार्ग-94, दोनों ही, जो रक्षा मंत्रालय के लिए रणनीतिक महत्व के हैं, जगह जगह प्रभावित हुए हैं। इन दुर्घटनाओं के कारण, मरम्मत के लिये, संबंधित जिला मजिस्ट्रेटों द्वारा अनिश्चित काल के लिए, यह दोनों राजमार्ग, समय समय पर, जगह जगह, बंद भी किये गए थे। बंद करने का कारण, यात्रियों के लिये ये राजमार्ग, भू स्खलन की जगहों पर, असुरक्षित हो गए थे। उनपर,  मलबे, बोल्डर लगातार गिर रहे थे और घाटी की तरफ की 'संरक्षण दीवार' यानी रिटेनिंग दीवारें भी के ढहने लगी थी। हालांकि यह प्रतिबंध, नागरिकों के लिये था, न कि सैन्य गतिविधियों के लिये। सेना का आवागमन जारी रहा और जहां भू स्खलन की घटनाएं होती रहीं,, वहां बॉर्डर रोड संगठन उसे साफ भी करता रहा।

सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार, "एनएच-58 पर, एक ही दिन में 18 स्लोप फेलियर/मलबा गिरने की सूचना मिली थी। तोताघाटी में एक भूस्खलन हुआ, जो कि सीडीपी के पहाड़ी-कटाव शुरू होने से पहले पूरी तरह से स्थिर था। लेकिन पिछले डेढ़ साल से यह बार-बार होने वाला भूस्खलन क्षेत्र बन गया है।  इस मानसून में ढलान की विफलताएं निरंतर और असहनीय तरह से हो रही थी।" एनएच-58, पहाड़ों पर बद्रीनाथ और माणा तक तथा एनएच 94, ऋषिकेश - आमपता - टेहरी - धरासू - कुठनौर - यमुनोत्री तक जाती है। एक बार तो, एनएच-94 पर, भारी बारिश के कारण पक्की सड़क का 25-30 मीटर का हिस्सा ढह गया और डूब गया। दोनों हिस्सों को तारकोल और सुरक्षा दीवारों के साथ डीएल-पीएस की चौड़ाई तक पूरा किया गया था।

केंद्रीय सड़क और राजमार्ग मंत्रालय ने अक्टूबर 2020 को बताया था कि NH-125 जो, सितारगंज को, खटीमा - टनकपुर - पिथौरागढ़ से जोड़ती है, पर भूस्खलन की 72 घटनाएं हुई। इस प्रकार, कागजी जुमलों और टालू आश्वासनों के बावजूद, न केवल हमारी सभी एजेंसियां, हो रहे, भू ​​ढलान का हल नहीं ढूंढ पाई। धरती गिरती रही, साफ सफाई कर रास्ता खुलवाया जाता रहा, पर ऐसी कोशिश कम हुई कि, कम से कम भू स्खलन हो, और इसके लिए विशेषज्ञों की बात मानी जाय। रक्षा गतिशीलता जरूरी है पर जब सड़कों पर अधिक बोझ पड़ेगा, सड़कें, अधिक पहाड़ खुरच कर और चौड़ी की जायेंगी तो कभी ऐसा भी हादसा हो सकता है कि, रक्षा गतिशीलता ही बाधित हो जाय। तीर्थयात्रा रोकी जा सकती है। लंबे समय तक रोकी जा सकती है, पर सेना/आईटीबीपी/बीआरओ/मेडिकल/पुलिस/सरकारी महकमे  आदि का आवागमन नही रोका जा सकता है। 

राजमार्ग चौड़ीकरण के संदर्भ में, डीएल-पीएस मानक को सही ठहराने के लिए सरकारी परिपत्रों, संशोधित दस्तावेजों पर भी कुछ टिप्पणी इंडियन एक्सप्रेस के उक्त लेख में मिलती है। सड़क और राजमार्ग मंत्रालय का 2020 का सर्कुलर 2018 के सर्कुलर का संशोधित रूप है। यह संशोधन, 15 दिसंबर, 2020 को किया गया था, जिस दिन एचपीसी ने रक्षा मंत्रालय द्वारा अदालत में दाखिल किए जाने वाले हलफनामे पर विचार करने के लिए बैठक की थी। इस संशोधन में,  डीएल-पीएस की सिफारिश की गई, जो हाई पॉवर कमेटी की बैठक के ही दौरान, प्रस्तुत किया गया, जहां एचपीसी ने, बहुमत से, सडक़ के डीएल-पीएस मानक के अनुसार अपनी राय दे दी। यही नहीं, आईआरसी यानी इंडियन रोड कांग्रेस 2019 दिशानिर्देश को भी अगस्त 2020 में जल्दबाजी में संशोधित किया गया।  आईआरसी के निर्देश, वास्तव में राजमार्ग से लेकर छोटे जिले और गाँव की सड़कों तक सभी सड़कों के लिए डीएल-पीएस का मानक निर्धारित करते हैं। आखिर इन सड़को को चौड़ा करने की जिद किसकी थी कि, उसे पूरा करने के लिए, एचपीसी की मीटिंग के दौरान, इच्छानुसार संशोधन पर संशोधन किए जा रहे थे?

अदालत ने, इस तथ्य को कि, बीईएसजेड, यानी भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन के भीतर डीएल- पीएस प्रतिबंधित है, भी नहीं देखा। अदालत ने, बीईएसजेड अधिसूचना में संशोधन के संबंध में अटॉर्नी जनरल के बयान पर भरोसा किया, जिसे उन्होंने "राष्ट्रीय सुरक्षा हित के लिए जरूरी है कह कर, अनुमति देने की बात कही थी।  पर्यावरणीय चिंताओं और उनके प्रभावों के उचित अध्ययन के बिना सुरक्षा का बुनियादी ढांचा भी तो, स्थिर और कारगर नहीं रखा जा सकता है। सच तो यह है कि, पुनर्निर्माण, आपदा न्यूनीकरण, लिफ्ट सिंचाई, अस्पतालों, स्कूलों, खाद्य गोदामों और अन्य सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा बुनियादी ढांचे से संबंधित कार्य, बिना पर्यावरणीय प्रभावों के उचित अध्ययन और उनके शमन के नही किए जाने चाहिए। 

दस बारह साल पहले, हमारा देश प्राचीन गंगा के अंतिम खंड को, उसके उद्गम (उत्तरकाशी-गंगोत्री) की घाटी में संरक्षित करने के लिए एकजुट हुआ था। तब, कम से कम तीन पनबिजली परियोजनाओं को, पर्यावरणीय चिंताओं को देखते हुए, रद्द कर दिया गया था।  गंगा के जलग्रहण क्षेत्र की स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए घाटी को एक पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र बीईएसजेड घोषित किया गया था। वर्षों की सुरक्षा को नष्ट करने के लिए केवल एक भारी भूल की आवश्यकता थी, जो इस सरकार के सनक भरे चारधाम यात्रा राजमार्ग की मंजूरी ने पूरी कर दी। अभी इस पर काम शुरू ही हुआ था कि, जोशीमठ से बेहद चिंतित करने वाली खबरें आने लगीं। 

अदालत के फैसले में कहा गया है कि, इस मामले में रक्षा मंत्रालय का "सुसंगत रुख" रहा है। लेकिन, एक तथ्य यह भी है कि, रक्षा मंत्रालय ने नवंबर 2020 में, जो अपना पहला हलफनामा दायर किया था और रक्षा गतिशीलता के लिए डबल लेन कॉन्फ़िगरेशन मांगा था वह सात मीटर की चौड़ाई का मांगा था। फैसले में, अनुमति, डीएल-पीएस को दी गई है, लेकिन रक्षा मंत्रालय ने केवल डीएल यानी डबल लेन के लिए कहा था, क्योंकि तब तक कि सभी सरकारी परिपत्रों को डीएल-पीएस में संशोधित नहीं किया गया। हालांकि, इस संशोधन के बाद, जनवरी 2021 में, रक्षा मंत्रालय ने भी, तदनुसार, अदालत में अपना रुख बदल दिया और उसने, 10 मीटर की सड़क मांगी, जो पहले 7 मीटर की मांगी गई थी। एचपीसी की सर्वसम्मत सिफारिशों के अनुसार तीर्थयात्रियों के लिए पैदल मार्ग बनाने जैसी बातें भी कही गई थी। लेकिन विशेषज्ञों ने बताया है कि, डीएल-पीएस की चौड़ाई वाली सड़क, पैदल चलने के लिए कोई जगह नहीं छोड़ती है। 

इस प्रकार इस याचिका में पहले एचपीसी के अल्पमत गुट ने, सड़क की चौड़ाई, 5.5 मीटर तक रखने की राय दी। पर इसी कमेटी की एक बड़े समूह ने, उसे बढ़ा कर 12.5 मीटर रखने की राय दी। फिर जब बहस हुई तो, अदालत ने, सेना की रिपोर्ट पर सुरक्षा हित को देखते हुए 10 मीटर रखने की बात मान ली। लेकिन अदालत में सेना पहले 7 मीटर की सड़क के लिए हलफनामा दे चुकी थी। अब अदालत ने 10 मीटर की डीएल-पीएस मानक की सड़क को एचपीसी की सिफारिश पर मान लिया है। सड़कें चौड़ी होनी चाहिए और अच्छी भी, पर यह भी तो हमें देखना है कि, जहां सड़कें बन या चौड़ी की जा रही हैं, वहां की जमीन, भौगोलिक स्थिति, भूगर्भीय स्थिति क्या है। अदालत के सामने जो प्रश्न था वह केवल सड़क को चौड़ा करने का नहीं था, बल्कि मूल प्रश्न था कि, हिमालयी परिस्थितियों में, सड़कों को, बिना स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाए, कितना चौड़ा किया जा सकता है। लेकिन सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को, आगे रखते हुए, चारधाम यात्रा राजमार्ग की अनुमति की बात रखी और, शीर्ष अदालत ने भी, पर्यावरणीय चिंताओं को लगभग नज़रअंदाज़ करते हुए, रक्षा हित के मुद्दे पर मुहर लगा दी। 

(विजय शंकर सिंह)

Thursday, 12 January 2023

स्वामी विवेकानंद और खेतड़ी नरेश अजीत सिंह की अनोखी मित्रता / विजय शंकर सिंह


स्वामी विवेकानंद का, विविदिशानंद से विवेकानंद का नामकरण, राजस्थान की एक रियासत, खेतड़ी के राजा अजीत सिंह ने ही किया था। आज विविदिशानंद नाम अल्प ज्ञात है और विवेकानंद, जगतख्यात। खेतडी नरेश महाराजा अजित सिंह, स्वामी विवेकानंद के निकट मित्र और शिष्य भी थे। विवेकानंद की अजित सिंह से कुल तीन मुलाक़ातें हुयी हैं। यह मुलाकातें, 1891. 1893 और 1897 में हुयी थीं। अजित सिंह से स्वामी जी की पहली मुलाकात, जब राजस्थान के आबू में हुई, तो दोनों ने एक दूसरे को प्रभावित किया। अजित सिंह अंग्रेज़ी पढ़े लिखे और विद्वान् व्यक्ति थे। वे स्वामी जी के अंग्रेजी भाषा के ज्ञान और उनके तार्किक  विमर्श से प्रभावित हुए। उधर, विवेकानंद जी , महाराजा अजीत सिंह के अंग्रेजी परिवेश में पढ़े लिखे होने के बावज़ूद,  भारतीय दर्शन में उनकी रूचि और अध्ययन से प्रभावित हुए। यह वह समय था जब प्राच्य साहित्य, दर्शन, वांग्मय आदि को पाश्चात्य समाज और ईसाई मिशनरियाँ एक योजनाबद्ध तरीके से हेय और निम्न स्तरीय साबित करने के काम में जुटी थीं। हालांकि प्राच्य वांग्मय से प्रभावित अंग्रेजों की संख्या भी कम नहीं थी। वे भी इस वांग्मय के अद्भुत रहस्य से चमत्कृत थे। अंग्रेज और अन्य यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय दर्शन, इतिहास और परंपरा पर अध्ययन भी खूब किया था। हालांकि, ईसाई मिशनरियाँ, भारतीय दर्शन और आध्यात्म परंपरा की विरोधी तो थीं, पर उनके  विरोध का आधार बहुत मजबूत नहीं था। विवेकानन्द से ईसाई मिशनरियों की भिड़ंत, उनके किशोर वय से ही शुरू हो गयी थी। आगे चल कर जब वे, अमेरिका और इंग्लॅण्ड गए तो, उनका वहां भी कुछ ईसाई मिशनरियों ने विरोध किया, पर विवेकानंद का भारतीय वांग्मय की समझ, ज्ञान, तर्क,  ओज और तेज, बहस और विरोध करने वाली मिशनरियों पर भारी पड़ा।

1891 में जब अजित सिंह के संपर्क में विवेकानंद आये तो, महाराजा को स्वामी जी के पारिवारिक स्थिति की जानकारी हुयी। विवेकानंद के पिता का निधन हो गया था पर उनकी माँ जीवित थीं। उनके अन्य छोटे भाई भी थे। आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। 1891 से ही खेतडी नरेश ने 100 रूपये मासिक धन राशि, विवेकानंद की माँ भुवनेश्वरी देवी के लिए नियत कर दी थी। 1 दिसंबर 1898 को बेलूर से स्वामी विवेकानंद ने महाराज को एक पत्र लिख कर इस धनराशि को आजीवन जारी रखने का अनुरोध किया था। यह पत्र खेतड़ी के राजकीय अभिलेखागार में आज भी सुरक्षित है। विवेकानंद का निधन तो 1902 में ही हो गया था पर उनकी माता, उनकी मृत्यु के बाद भी 1911 तक जीवित रहीं। जब तक वह जीवित रहीं, खेतड़ी राज से निर्धारित धन राशि उनके उपयोग के लिये भेजी जाती रही।  महाराज स्वयं भुवनेश्वरी देवी ( 1841 - 1911 ) के नियमित संपर्क में रहे। खेतडी के अभिलेखागार में जो पत्राचार सुरक्षित है उस से यह प्रमाणित होता है। 22 नवम्बर 1898 के लिखे एक पत्र में विवेकानंद ने अजित सिंह को अपना एक मात्र मित्र कह कर उनके सहयोग और मित्रता को स्वतः स्वीकार किया है।

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 खेतड़ी नरेश अजित सिंह से स्वामी जी की पहली भेंट..

1891 में स्वामी जी और अजित सिंह के बीच पहली भेंट हुयी थी। रामकृष्ण परमहंस का निधन 1887 में हो गया था। नरेंद्र नाथ दत्त और इनके आठ साथी जो परम हंस के शिष्य थे ने, संन्यास ग्रहण कर गुरु की गद्दी संभालने का निश्चय किया। यह काम 1888 में बारानागर मठ में हुआ। लेकिन उसी साल, विवेकानंद ने घुमक्कडी सन्यासी का जीवन जीने का निश्चय किया और वे भ्रमण पर निकल पड़े। घुमक्कडी के दौरान वे, राजस्थान के माउंट आबू पहुंचे और वहीं, शाम के समय भ्रमण करते हुए, अजित सिंह से उनकी पहली और संक्षिप्त मुलाक़ात हुयी। विवेकानंद थक कर पार्क में बैठे थे और अजीत सिंह वहीं टहल रहे थे। दोनो एक दूसरे को नहीं जानते थे। बस एक परिचय हुआ, और मुलाकात की भूमिका बनी। इसके बाद, विवेकानंद, खेतड़ी नरेश से मिलने उनके उनकी रियासत खेतड़ी गए। संक्षिप्त मुलाक़ात तो संक्षिप्त और परिचयात्मक ही होती है। लेकिन, राजा और संन्यासी के बीच, लंबी मुलाकात  खेतडी, राजमहल में ही हुयी। विवेकानंद के जीवनीकार मणि शंकर मुख़र्जी ने अपनी पुस्तक 'द मोंक ऐज़ ए मैन द अननोन लाइफ ऑफ़ स्वामी विवेकानंद' में 4 जून 1891 में दोनों महापुरुषों के बीच हुयी भेंट का रोचक और प्रमाणिक वर्णन किया है. पुस्तक के अनुसार,
"अजित सिंह सुबह साढ़े छः बजे, सो कर उठ गए थे। दिन भर अपना काम करने के बाद वे उसी शाम जोधपुर नरेश प्रताप सिंह से मिले। उनसे आधे घंटे की बातचीत के बाद जब वे थोड़ा फुरसत में हुए तो उन्हें बताया गया कि, एक सन्यासी उन से मिलने के लिए आया हुआ है। उन्होंने सन्यासी को बुलाया और पहचान लिया कि, यह तो वही साधु हैं, जिनसे वे, थोड़े समय के लिए आबू में मिल चुके हैं। जब दोनों में बात हुयी तो, महाराजा, सन्यासी के अंग्रेज़ी ज्ञान और वार्तालाप से बहुत प्रभावित हुए। अजित सिंह को महसूस हुआ कि, सन्यासी अंग्रेज़ी ही नहीं, बल्कि संस्कृत और बांग्ला भी धाराप्रवाह बोल सकता है।  तब तक अजित सिंह को, विवेकानंद के बंगाली होने का कोई संज्ञान नहीं था। अजित सिंह और सन्यासी में सभी विषयों पर गंभीरता से बातचीत हुयी। फिर दोनों ने साथ साथ भोजन ग्रहण किया और वार्तालाप का सिलसिला रात के 11 बजे तक चलता रहा। रात 11 बजे वह सन्यासी, खेतड़ी के राज प्रासाद से विदा होता है। वह सन्यासी कोई और नहीं बल्कि विवेकानंद थे।"
इस लंबी और आत्मीय भेंट में, दोनों ने एक दूसरे को प्रभावित किया और एक ऐतिहासिक मित्रता का प्रारंभ हुआ।

विवेकानंद एक घुमक्कड़ सन्यासी थे। सन्यासी तीन रातों से अधिक एक स्थान पार कभी और कहीं नहीं रुकते हैं। ऐसा विधान संभवतः किसी स्थान, वस्तु या मित्र से, मोह न उपज जाय, इस लिए रखा गया होगा। पर स्वामी जी का खेतड़ी प्रवास इस नियम का अपवाद सिद्ध हुआ। वह खेतड़ी में 4 जून 1891 से 27 अक्टूबर 1891 तक रहे। किसी एक स्थान पर यह उनका, तब तक का सबसे लंबा प्रवास रहा। जून का महीना तो वैसे भी गर्मी का होता है, ऊपर से राजस्थान की गर्मी तो विकट ही होती है।  धूल भरी गरम हवाएँ और दोपहर की लू उन्हें बेचैन कर देती थी। स्वामी जी ठहरे बंगाल के, जहॉ गर्मी बहुत नहीं पड़ती थी और पड़ती भी थी तो बारिश हो जाती थी। खेतड़ी नरेश ने विवेकानंद को धूप , धूल और ताप से बचने के लिए राजस्थानी पगड़ी या साफा बाँधने की सलाह दी। विवेकानंद ने वहीं साफा बांधना सीखा और वही साफा, आगे चलकर, उनकी पहचान बन गया। राजपूती शान और ढंग से बंधा साफा विवेकानंद के सुन्दर और ओजस्वी व्यक्तित्व पर फबता भी बहुत था। उन्होंने राजस्थानी रीति रिवाजों का अध्ययन भी किया और अपने भाषणों और लेखों तथा पत्रों में इसका स्थान स्थान पर उल्लेख भी किया है।


० स्वामी विवेकानंद की खेतडी नरेश अजित सिंह से दूसरी मुलाकात.

1893 में दोनों महानुभावों के बीच दूसरी बार मुलाकात हुयी थी। अमेरिका के शहर शिकागो में, प्रथम विश्व धर्म संसद ( Parliament of world religion ) का अधिवेशन होने वाला था। यह अपनी तरह का अनोखा आयोजन था। औद्योगिक क्रान्ति के बाद दुनिया में एक नए तरह का साम्राज्यवाद पनप रहा था। पहले साम्राज्य विस्तार का एक मुख्य साधन, युद्ध ही हुआ करता था। बाद में साम्राज्यवाद का चेहरा बदला और वह व्यापार हो गया। इन सब के बीच धर्म की अपनी भूमिका थी ही। जब सभी धर्मों में, आपसी संपर्क   बढ़ने लगा तो, दार्शनिक वैचारिक आदान प्रदान की पीठिका भी तैयार हुयी। इसी क्रम में धर्म संसद के आयोजन की भूमिका तैयार हुयी। अमेरिका के शहर शिकागो में विश्व कोलंबियन एक्सपोज़िशन का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर वहाँ अनेक सभाएं और सम्मलेन जो विविध विषयों पर आयोजित थे संपन्न किये गए। उन्ही सम्मेलनों में एक आयोजन विश्व धर्म संसद का भी था। शिकागो में जो वृहद् मेला लगा उसमे सबसे अधिक आकर्षण और भीड़, धर्म ससद में ही हुयी थी। इस संसद की जनरल कमेटी के अध्यक्ष एक ईसाई पादरी जॉन हेनरी बारोस चुने गए थे। 11 सितम्बर 1893 को इस धर्म संसद के अधिवेशन का शुभारम्भ वर्ल्ड कांग्रेस आक्ज़िलरी बिल्डिंग जिसमे अब शिकागो का आर्ट इंस्टिट्यूट है में संपन्न हुआ था।

इसी धर्म संसद में भाग लेने के लिए अजित सिंह ने विवेकानंद को प्रोत्साहित  किया। विवेकानंद की खेतड़ी नरेश से दूसरी भेंट के समय एक रोचक घटना का भी विवरण मिलता है। जब विवेकानंद खेतडी में रह रहे थे तो उन्हें, एक दिन, खेतड़ी राज दरबार में, नृत्य देखने का निमंत्रण मिला। नृत्य का आयोजन दरबार में अक्सर होता रहता था। राज दरबार में, विभिन्न नर्तकियों के नृत्य और अन्य संगीत का आयोजन किया गया था।  विवेकानंद ने यह कह कर कि, वे एक सन्यासी हैं, और इस प्रकार के नृत्य के आयोजनों में नहीं भाग ले सकते, दरबार में जाने से मना कर दिया। अजित सिंह तो मान गए. पर वह राज नर्तकी नहीं मानी। उसने स्वयं विवेकानंद से अनुरोध किया कि, वह उसका गाया और नर्तन पर आधारित एक भजन सुनने की कृपा करें।  स्वामी जी समारोह में गए। नर्तकी ने उनसे कहा कि, "जब सब कुछ ईश्वर की कृति है तो, वह भी तो उसी की रचना है. उसमें भी तो ईश्वर का ही अंश है।" वेदांत की यह चुनौती पूर्ण व्याख्या विवेकानंद को निरुत्तर कर गयी। वे मुस्कुरा कर रह गए। नर्तकी ने सूरदास का अत्यंत प्रदिद्ध भजन, " प्रभु मेरे अवगुन , चित न धरो " गाया। अद्भुत स्वर से गाया हुआ यह भजन विवेकानंद को स्तब्ध कर गया। विवेकानंद खुद एक भजन गायक थे। उन्होंने कहा कि संसार में जो है वह सब उसी ईश्वर का ही प्रतिरूप है। उन्होंने नर्तकी को माँ कह कर संबोधित किया और सबको आशीर्वाद दे कर दरबार से विदा हुए। उस रात उस नर्तकी ने केवल भजन ही गाया।

विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद में जाने का निश्चय किया और अजित सिंह को अपने निश्चय से, अवगत भी करा दिया। अजित सिंह ने कहा कि, "अगर आप उस धर्म संसद में जा रहे हैं तो आप हिन्दू धर्मं और भारत का प्रतिनिधित्व कीजिए और संसार के सामने इस महान धर्म की देन और विरासत को प्रस्तुत कीजिए।" खेतड़ी नरेश ने, विवेकानंद के शिकागो, आने जाने और रहने का सारा व्यय सहर्ष  वहन करने का वचन भी दिया। धर्मसंसद में विवेकानंद के जाने की योजना उनके मद्रास यात्रा के दौरान ही बनी थी। पर वे थोड़े ऊहापोह में भी थे।  विवेकानंद ने अपने मित्र हरिदास विहारीदास देसाई को मई 1893 में जो पत्र लिखा है उस से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वामी जी की दूसरी खेतडी यात्रा और प्रवास, धर्म संसद की भूमिका ही थी. पत्र में वे लिखते हैं ,
"आप को तो पता ही है कि शिकागों की धर्म संसद में जाने का मेरा मन था। जब मैं मद्रास में था तभी मैंने इस आयोजन की बात सुनी और जाने का मन बनाया। यह बात जब महाराजा मैसूर को ज्ञात हुयी तो उन्होंने भी मुझे जाने के लिए उत्साहित किया और व्यवस्था करने का आश्वासन दिया। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं, खेतडी के महाराजा से मेरा स्नेह, मित्रता तथा अत्यंत आत्मीय सम्बन्ध है। मैंने, उन्हें भी, शिकागो जाने की अपनी इच्छा से अवगत कराया। उन्होंने, मुझसे अमेरिका जाने के पूर्व एक बार खेतडी आने और रहने का आग्रह भी किया। ईश्वर की कृपा से अजित सिंह को पुत्र रत्न की भी प्राप्ति भी हुयी है। उन्होंने राजकुमार को आशीर्वाद देने का भी अनुरोध किया। यही नहीं उन्होंने अपने निजी सचिव को स्वयं मुझे लेने के लिए मद्रास भेजा।"
इसके बाद विवेकानंद खेतड़ी जाते हैं यह उनकी दूसरी भेंट की भूमिका थी। इसके बाद दिसंबर 1897 में स्वामी जी तीसरी और अंतिम बार खेतडी आते हैं। अपने अमेरिका प्रस्थान हेतु बम्बई से एक दिन पूर्व 9 मई को वे राज महल के रनिवास में अजित सिंह के नवजात पुत्र जय सिंह को आशीर्वाद देने के लिए भी गए।

10 मई 1893 को , विवेकानंद ने बम्बई के लिए खेतडी से प्रस्थान किया। अजित सिंह ने अपने एक अत्यंत विश्वासपात्र कर्मचारी मुंशी जगमोहन लाल को, विवेकानंद के बम्बई में प्रवास करने और अमेरिका के लिए प्रस्थान करने तक, सारी व्यवस्था करने के लिए खेतडी से साथ साथ भेजा। अजित सिंह स्वयं, स्वामी जी को छोड़ने के लिए उनके साथ जयपुर तक आये। जब स्वामी जी बोस्टन पहुँच गए तो, अजित सिंह ने उनके अमेरिका में होने वाले व्यय के लिए अमेरिकन डॉलर भेजे। अमेरिका में जाते ही विवेकानंद के साथ एक दुर्घटना घट गयी। उनका कुछ सामान और डॉलर चोरी हो गए। कहा जाता है यह, ईसाई मिशनरियों के कुछ दुष्ट पादरियों के इशारे पर की गयी चोरी थी। उन्हें अचानक धन की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने यह बात मुंशी जगमोहन लाल को बतायी और तब अजित सिंह ने उन्हें तार से तत्काल 150 डॉलर भेजा। अजित सिंह स्वामी जी के अमेरिका प्रवास के दौरान लगातार उनके संपर्क में बने रहे।


इसी सन्दर्भ में एक अन्य रोचक विवरण मिलता है। विवेकानंद , सन्यासी थे और स्वभावतः मितव्ययी भी थे। उन्हें खेतड़ी नरेश ने अमेरिका के टिकट के लिए जो धन दिया था, उस से उन्होंने सामान्य दर्ज़े का टिकट लिया। सामान्य दर्ज़ा में डॉरमेट्री होती थी। सब को एक साथ ही रहना होता था। खान पान की व्यवस्था भी बहुत अच्छी नहीं होती थी। जब जगमोहन लाल को यह बात पता चली तो, उन्होंने स्वामी जी से तो कुछ नहीं कहा. पर उन्होंने यह बात महाराज को बता दी। खेतडी नरेश ने तत्काल सामान्य टिकट वापस करा कर पहले दर्ज़ा का टिकट उनको दिलवाया। स्वामी जी के आपत्तिं करने पर अजित सिंह ने तार से अनुरोध किया कि, "केबिन में आप को स्वाध्याय और ध्यान आदि करने की सुविधा रहेगी।" तब जा कर स्वामी जी पहले दर्ज़े में यात्रा करने के लिए सहमत हुए।

स्वामी विवेकानंद , अमेरिका से अजित सिंह को नियमित पत्र लिखते रहते थे। अजित सिंह भी उन्हें नियमित उत्तर देते हुए उनका उत्साह वर्धन करते रहे।
अपनी तीसरी और अंतिम खेतड़ी यात्रा में , स्वामी जी ने 17 दिसंबर 1897 को खेतडी में अपने अभिनन्दन में आयोजित एक समारोह में अजित सिंह से अपनी मित्रता और सदाशयता का आभार व्यक्त करते हुए कहा,
"मैंने भारत और हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए जो कुछ भी  थोडा बहुत किया है, वह संभव भी नहीं हो पाता अगर मेरी मित्रता खेतडी नरेश से न हुुई होती तो। "
पुनः वह 11 अक्टूबर 1897 को मुंशी जगमोहन लाल को लिखे एक पत्र में अपने और अजित सिंह के संबंधों के बारे में उल्लेख करते हैं,
"Certain men are born in certain periods to perform certain actions in combination. Ajit Singh and myself are two such souls—born to help each other in a big work for the good of mankind.… We are as supplement and complement."

(कुछ लोग निश्चित अवधि में कुछ कार्यों को एक साथ करने के लिए पैदा होते हैं। अजीत सिंह और मैं दो ऐसी आत्माएं हैं - मानव जाति की भलाई के लिए एक बड़े काम में एक दूसरे की मदद करने के लिए पैदा हुए हैं। ... हम पूरक एक दूसरे के पूरक हैं।)


० विवेकानंद की खेतडी के महाराजा अजित सिंह से तीसरी भेंट.

1897 तक स्वामी जी की प्रसिद्धि बहुत बढ़ गयी थी। अमेरिका में उन्होंने वेदांत की विधिवत शिक्षा देना शुरू कर दिया था और विविध विषयों पर व्याख्यान देने का क्रम भी बढ़ा दिया था। भारतीय इतिहास और संस्कृति के बारे में लार्ड मैकाले के चश्मे से देखने वाले ईसाई पादरियों की जमात भारतीय दर्शन की मेधा, तर्क शक्ति और विराट फलक को देख कर अचंभित भी थी पर ईर्ष्या का अतिरेक जो उनमें  शासक होने के नाते भरा पड़ा था, से वे मुक्त भी नहीं हो पा रहे थे। शास्त्रार्थ और आ नो भद्रा कृतवो यन्तु विश्वतः की परम्परा और दर्शन जो भारतीय दर्शन की मूल आत्मा में विद्यमान था, ने तर्क और विचार विमर्श में, स्वामी विवेकानंद को कभी पराजित नहीं होने दिया। उन्हें व्याख्यानों के लिए धन भी मिलने लगा। उनकी आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी। उनके व्याख्यान पूरे अमेरिका में स्थान स्थान पर आयोजित होने लगे थे। अजित सिंह जी भी उन्हें अमेरिका भेज कर उनसे दूर नहीं हों पाये थे। वे पत्रों और तार द्वारा स्वामी जी के निरंतर संपर्क में रहते थे. उन्होंने 1897 में विवेकानंद को अनेक पत्र भेजे और भारत आने पर खेतडी आने और कुछ दिन साथ रहने का निमन्त्रण भी दिया। 1897 में स्वामी जी भारत में आ भी गए थे। वे जब देहरादून थे तभी उन्हें खेतड़ी नरेश का सन्देश मिला कि "वे खेतड़ी का कार्यक्रम बना लें। महाराज उनका खेतड़ी में सार्वजनिक अभिनन्दन करना चाहते हैं।" देहरादून से वे, दिल्ली, अलवर, और जयपुर होते हुए खेतडी पहुंचे। अजित सिंह ने अपने महल से 12 मील यानी 19 किलोमीटर दूर जा कर विवेकानंद का स्वागत किया। खेतडी तक जुलूस के रूप में विवेकानंद आये। महल के सभी कर्मचारियों और दरबारियों ने चाँदी के दो दो रूपये के सिक्के स्वामी जी का चरण स्पर्श कर उन्हें प्रदान किये। इस प्रकार कुल 3000 सिक्के विवेकानंद को खेतडी के कर्मचारियों की ओर से भेंट में दिए गए थे।

17 दिसंबर 1897 को, विवेकानंद ने सार्वजनिक रूप से एक समारोह में , खेतडी रियासत और महाराजा अजित सिंह का आभार प्रगट किया. उन्होंने इस अवसर पर कहा, 
"it would not have been possible for me to do what little I have done for India but my friendship with Khetri's Maharaja."

(मैने, भारत के लिये, थोड़ा बहुत जो कुछ भी किया है, खेतड़ी के महाराजा के साथ, मेरी दोस्ती के बिना वह करना मेरे लिए संभव ही नहीं था।)

20 दिसंबर 1897 को खेतडी में विवेकानंद का वेदांत दर्शन और राज योग पर एक लंबा व्याख्यान हुआ. इस में अगल बगल की रियासतों के विद्वानों के अतिरिक्त कुछ यूरोपीय विद्वान् भी सम्मिलित हुए। जो कुछ भी अजित सिंह ने अपने मित्र विवेकानंद के लिए किया था, विवेकानंद ने भी उस मित्रता और आत्मीयता का मान जीवन पर्यन्त रखा।

खेतड़ी रियासत द्वारा विवेकानंद के परिवार को 1891 से नियमित सहायता दी जाती रही। 100 रूपये की एक निश्चित धन राशि, विवेकानंद के परिवार के लिए निश्चित की गयी थी। 1 दिसंबर 1898 को विवेकानंद ने बेलूर से अजित सिंह को पत्र लिख कर यह धनराशि नियमित रूप से भेजने का अनुरोध किया था। विवेकानंद को संभवतः यह आभास था कि वे अपनी माता से पहले संसार छोड़ेंगे अतः वे चाहते थे कि यह धन राशि नियमित रूप से उनकी माता भुवनेश्वरी देवी के व्यय के लिए भेजी जाय , ताकि विवेकानंद के निधन के बाद भी भुवनेश्वरी देवी को कभी अर्थाभाव न हो सके. अपने पत्र में विवेकानंद ने लिखा था,
"One thing more will I beg of you — if possible, the 100 Rs. a month for my mother be made permanent, so that even after my death it may regularly reach her. Or even if your Highness ever gets reasons to stop your love and kindness for me, my poor old mother may be provided  remembering the love you once had for a poor Sâdhu."

(एक बात और। मैं आप से, भिक्षा माँगता हूँ - यदि संभव हो तो, मेरी माँ के लिए 100 रुपये प्रति माह स्थायी रूप से भेजे जाएँ, ताकि मेरी मृत्यु के बाद भी, यह नियमित रूप से उनके पास पहुँचे। और मेरे लिए आप की यह कृपा, मेरी गरीब बूढ़ी माँ और, एक अकिंचन साधु के लिए आप के स्नेह को याद करते हुए प्रदान किया जा सकता है।)

अजित सिंह ने विवेकानंद के अनुरोध और अपने प्रदत्त वचन का सम्मान जीवनपर्यंत किया तथा जीवन पर्यन्त वे 100 रुपये की धनराशि विवेकानंद की माँ भुवनेश्वरी देवी को भेजते रहे। इतिहास के शोधार्थियों ने इस धन राशि की कीमत के आज के अनुसार 20,000 रुपये आंकी है. मणि शंकर मुख़र्जी जो विवेकानंद के जीवनी कार थे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक , द मोंक ऐज़ ए मैन में इस आर्थिक सहायता पर टिपण्णी करते हुए लिखते हैं कि,
"यह एक आर्थिक सहयोग ही नहीं था , न ही यह किसी राजा का किसी ज़रुरत मंद प्रजा के लिए दी गयी राज्याश्रित सहायता थी। यह एक मित्र का मित्र और उसके परिवार के लिए दी गयी सहायता थी। एक शिष्य ( अजित सिंह ) की अपने शिक्षक और गुरु ( विवेकानंद ) के लिए दी गयी गुरुदक्षिणा थी।"

अजित सिंह जब तक जीवित रहे यह सहायता गोपनीय ही रही। केवल राज्य के कुछ ही अधिकारियों को इसकी जानकारी थी। धनराशि बेलूर मठ के नाम भेजी जाती थी। जहां से विवेकानंद के गुरु भाई शरत महाराज, योगेन महाराज , उस धनराशि को उनकी माता भुवनेश्वरी देवी को भेज दिया करते थे। इस बात का उल्लेख स्वयं विवेकानंद के भाई महेँद्रनाथ दत्त ने अपनी पुस्तक में किया है। विवेकानंद के परिवार के साथ महाराजा अजित सिंह का जो पत्र व्यवहार हुआ है, वह सब खेतडी रियासत के अभिलेखागार में सुरक्षित है। उसके अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अजित सिंह ने न केवल स्वामी जी के परिवार  की आर्थिक सहायता ही की बल्कि एक योग्य अभिभावक की तरह उनके भाइयों के शिक्षा आदि की भी व्यवस्था की. विवेकानंद के अनुज महेँद्रनाथ दत्त से वे अक्सर परिवार का कुशल क्षेम लेते रहते थे।

1958 में खेतडी में अजित सिंह के पौत्र बहादुर सरदार सिंह के द्वारा दान में दिए गए एक महल जिसमें स्वामी जी अपने खेतडी प्रवास के दौरान निवास करते थे, में राम कृष्ण मिशन की स्थापना हुयी। इस महल को विवेकानंद मंदिर नाम दिया गया. इस में विवेकानंद और अजित सिंह की संगमरमर की दो प्रतिमाएं लगी हैं. एक राजा और एक साधु की यह अद्भुत और ऐतिहासिक मित्रता थी।

(विजय शंकर सिंह)

Wednesday, 11 January 2023

जोशीमठ त्रासदी (3) यह दैवी नहीं, पगलाए विकास द्वारा आमंत्रित आपदा है / विजय शंकर सिंह

साल, 2010 की 25 मई के करेंट साइंस के वॉल्यूम 98 अंक 10 में जोशीमठ की भौगोलिक और भूगर्भीय स्थित और आज जो आपदा दिख रही है उसके बारे में एक लेख छपा था। जोशीमठ पर विशेषज्ञों की रिपोर्टों को खंगालते खंगालते इस लेख पर नजर पड़ी तो पता चला कि, जिस तरह के पगलाए विकास का तानाबाना जोशीमठ के इर्दगिर्द बुना जा रहा था, उससे तो यह आपदा आनी ही थी। बस समय का इंतजार था। और दुर्भाग्य से वह समय आज इस भीषण सर्दी में आया है। आपदा प्रबंधन का काम जारी है। एनडीआरएफ, सेना तथा और भी राहत पहुंचाने वाली एजेंसियां अपना काम निष्ठा से कर रही है। कितने परिवार, धंसती दीवारों और क्रैक होती छतों के घरों से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए गए, कितनों की जान बचाई गई और कितना धन इनके पुनर्वास पर खर्च हुआ, यह सब आंकड़े सरकार, खुद ही प्रधानमंत्री जी के नयनाभिराम फोटो के साथ विज्ञापन देकर बताएगी, पर यह कभी नहीं बताएगी कि, विशेषज्ञों की सलाह को क्यों और किस आधार पर नजरअंदाज किया गया और क्यों सुप्रीम कौन में सड़क चौड़ी करने की जिद सुरक्षा की आड़ में की गई। दुर्भाग्य से, आज यदि जोशीमठ जमींदोज हो जाता है तो, चार लेन सड़क की तो बात ही छोड़ दीजिए, वर्तमान सड़क जो चीन सीमा तक लाव लश्कर पहुंचाती है, वह भी कहीं कहीं गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। 

'करेंट साइंस' के उक्त अंक के, इस लेख के लेखक है, एमपीएस बिष्ट और पीयूष रौतेला जो हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के डिजास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट सेंटर से जुड़े हुए हैं। लेख में, जोशीमठ की भौगौलिक, भूगर्भीय और पर्यावरणीय परिस्थितियों की चर्चा करते हुए लिखा गया है कि, "मध्य हिमालय में कुंवारी दर्रे के आसपास का क्षेत्र कई धाराओं का स्रोत है, जिनमें ढकनाला, कर्मनासा, पातालगंगा, बेलाकुची और गरूणगंगा शामिल हैं। पहली (ढकनाला) धौलीगंगा की सहायक नदी है, जबकि बाकी नदियां, अलकनंदा में मिल जाती है। ये जलधाराएँ अतीत में हुई कुछ तबाही की घटनाओं के लिए भी जानी जाती हैं। भूस्खलन के कारण इन धाराओं में अवरोध के बाद, अक्सर इनमे बाढ़ आई है और जिसके कारण तबाही हुई है।" 
वैज्ञानिकों के अनुसार पूरा हिमालय क्षेत्र ही भूस्खलन के दृष्टिकोण से, बेहद संवेदनशील है। जैसे ही हरिद्वार बद्रीनाथ राजमार्ग पर देवाप्रयाग के आगे बढ़ेंगे तो, कई जगह भूस्खलन होता दिखेगा। इसी राजमार्ग पर एक स्थान है कालियासौंड, जहां पहाड़ बराबर खिसकता रहता है और यातायात बाधित न हो, इसलिए बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) की एक इकाई वहां बराबर तैनात रहती है। 

ऊपर उल्लिखित, जल धाराओं का विन्यास विशिष्ट संरचनात्मक नियंत्रण को प्रदर्शित करता है। जैसे, कर्मनासा और ढकनाला क्रमशः मुनस्यारी और वैकृता के साथ जुड़े हुए हैं। लेख के अनुसार, "मुनस्यारी थ्रस्ट, मुनस्यारी फॉर्मेशन की निम्न से मध्यम श्रेणी की चट्टानों को लघु हिमालयी मेटासेडिमेंट्री के साथ मिलाता है। भूगर्भ विज्ञान में मेटासेडिमेंट्री चट्टान वे चट्टान होती हैं जो किसी अन्य चट्टान पर आकर टिक जाती है। उनके कठोर होने की प्रक्रिया चलती रहती है। यह सिलसिला, हेलोंग के लगभग 900 मीटर दक्षिण में देखा जा सकता है। मुनस्यारी थ्रस्ट के आसपास के क्षेत्रों में क्वार्टजाइट्स और ऑगेन गनीस के काफी मोटे सारणीबद्ध निकायों के साथ गार्नेटिफेरस माइका शिस्ट एक दूसरे से गुंथे दिखाई देते है।  झारकुल के पास इस खंड में आगे, सफेद क्वार्टजाइट की एक मोटी निरंतर पट्टी नीस और शिस्ट के भीतर होती है।  यह लघु हिमालय के बेरीनाग क्वार्टजाइट जैसा दिखता है। क्वार्टजाइट्स, ऑगेन गनीस, गार्नेटिफेरस, क्वार्टजाइट, आदि विभिन्न प्रकार के पत्थरों के नाम और प्रकार हैं। मुनस्यारी संरचना के भीतर इस क्वार्टजाइटिक संकुल की उपस्थिति, एक तरह के समीकरण, यानी इम्ब्रिकेशन के कारण है।  क्वार्टजाइट अत्यधिक विकृत नीस से ढका हुआ है।  मुनस्यारी संरचना अनिवार्य रूप से गार्नेट युक्त अभ्रक के इक्ट्ठे हो जाने से बनी है।  विकृत एम्फीबोलाइट्स, कैल्क-सिलिकेट लेंस, क्वार्टजाइट्स, माइलोनाइटिक बायोटाइट समृद्ध महीन दानेदार गनीस, ऑगेन गनीस और फाइलोनाइट्स आदि की वहां बहुतायत है।"  धीरे धीरे, यह स्तर, वैकृता थ्रस्ट (MCT) की ओर बढ़ता रहता है। मुख्य रूप से गनीस और शिस्ट्स से बना जोशीमठ फॉर्मेशन वैकृत थ्रस्ट के साथ मुनस्यारी फॉर्मेशन की चट्टानों पर अपना दबाव देता है। जबकि,  धौलीगंगा, धौलीघाटी में स्थित तपोवन के गर्म झरने से उद्गमित होती हैं।

जोशीमठ धौलीगंगा और धौलीगंगा के साथ, क्रमशः पश्चिम और पूर्व में कर्मनासा और ढकनाला से बंधी पहाड़ी के मध्य ढलानों में स्थित है एक छोटा सा कस्बा था, जो अपने सामरिक महत्व और बद्रीनाथ धाम, हेमकुंड साहिब जैसे तीर्थों और औली जैसे हिम स्पोर्ट्स का केंद्र बन जाने के कारण, एक अच्छे खासे शहर में बदल गया है। इसके दूसरी ओर अलकनंदा है जो, नीचे जाकर मंदाकिनी, भागीरथी अन्य नदियों के साथ मिल कर गंगा के रूप में प्रवाहित होती रहती है। जोशीमठ शहर के अतिरिक्त, अन्य कई छोटी छोटी बस्तियाँ, जोशीमठ पहाड़ के, निचले और मध्य ढलानों में स्थित हैं, जिनमें चमी, शेलोंग, खनोती चट्टी, अनिमठ, विष्णुप्रयाग, खान, परसारी, गणेशपुर, सुनील, गौका, दादन, रेगांव, औचा, औली, खरोरी, कुनी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, पैइयां, खांचा, बरगांव, पैनी, विष्णुपुरम, मारवाड़ी, बिलागढ़, मिराग, करछीगांव, तुगासी, चमटोली और झारकुला चट्टी भी है। करेंट साइंस के उक्त लेख के अनुसार, 'इन बस्तियों की कुल आबादी लगभग 18,000 (साल 2009 में) है।  ऊंचाई समुद्र तल से 1440 और 3797 मीटर के बीच जगह जगह है, और पहाड़ी के ऊपर, एक कोमल ढाल और पुरानी भूस्खलित सामग्री का एक मोटा आवरण है। सर्दियों के दौरान, ऊपरी इलाकों में काफी हिमपात होने लगता है और, उसी हिमपात के कारण, आसपास के झरनों, और जलधाराओं का प्रवाह, बारहमासी बना रहता है।
 
जोशीमठ का की यह हालिया त्रासदी, प्रमुख टेक्टोनिक प्लेट्स के जुड़ाव विंदु के निकट स्थित होने के कारण, जोशीमठ, पर बढ़ते मानवजनित दबाव का परिणाम है। लंबे समय से, इस क्षेत्र में लगातार भू-धंसाव की घटनाएं होती रही हैं। इन्ही घटनाओं के कारण 1976 में गठित एमसी मिश्रा कमेटी ने सिफारिश की थी, कि जोशीमठ के आसपास के क्षेत्र में भारी निर्माण पर रोक लगा दी जाए। लेकिन ऐसा किया नहीं गया। 'करेंट साइंस' जर्नल के लेख में लिखा गया है, "क्षेत्र की भौगोलिक/पर्यावरणीय भेद्यता से पूरी तरह अवगत होने के बावजूद, जोशीमठ और तपोवन के आसपास कई जलविद्युत योजनाओं को मंजूरी दे दी गई है।  विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना ऐसी ही एक योजना है। परियोजना की प्रमुख सुरंग जोशी मठ के नीचे भूगर्भीय रूप से नाजुक क्षेत्र से होकर गुजरती है।"  

लेख एक और रोचक तथ्य को उजागर करता है। एनटीपीसी की इस  परियोजना से संबंधित भूवैज्ञानिक जांच करने के लिए, पहले, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) की टीम को, लगाया गया था। बाद में एनटीपीसी ने, जीएसआई, के बजाय, यह दायित्व एक निजी कंपनी को सौंप दिया। ज़ाहिर है जीएसआई भी एनटीपीसी की ही तरह, भारत सरकार का एक विभाग है, और वह एनपीटीसी के लिये, मनमाफिक रिपोर्ट नहीं बना सकता था, और यह काम किसी निजी कंपनी से आसानी से कराया जा सकता था, इसलिए, निजी कंपनी को, प्राथमिकता दी गई। निजी कंपनी ने, अपनी क्लियरेंस देते समय पहले की गई भूवैज्ञानिक जांचों का संज्ञान लिया था या उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया था, इसके बारे में इस लेख में कोई उल्लेख नहीं है।

हेड रेस टनल की खुदाई के लिए, टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) का प्रयोग किया गया था। 24 दिसंबर 2009 को, इस टीबीएम ने शेलोंग गांव के पास, अलकनंदा के बाएं किनारे से लगभग 3 किमी अंदर स्थित एक जल-वाहक स्तर को पंचर कर दिया। परियोजना अधिकारियों के अनुसार, यह साइट औली के नीचे, सतह से लगभग एक किलोमीटर से अधिक नीचे थी। बताया गया कि, पानी का डिस्चार्ज, 700 और 800 लीटर प्रति सेकंड के बीच था। जलभृत या एक्विफ़ायर का लगातार, होने वाला पूरा डिस्चार्ज, लगभग 60-70 मिलियन लीटर प्रतिदिन था, जो बीस तीस लाख की आबादी के लिये पर्याप्त था। एक्विफ़ायर या जलभृत वह क्षेत्र होता है जहां पर विभिन्न भूतलीय जल धाराओं से आकर पानी एकत्र होता रहता है। यह एक समृद्ध जलभृत क्षेत्र था, जो एक माह बीत जाने के बाद भी, सूख नहीं पाया था। यह एक जल स्रोत की बर्बादी थी, जो टनल बोरिंग मशीन के लापरवाही पूर्ण प्रयोग के कारण हो गई।   

इस घटना पर टिप्पणी करते हुए, उक्त लेख में लिखा है कि, "जलभृत से पानी के अचानक बह जाने के, कई तरह के प्रभाव, आगे चल कर होंगे, लेकिन इसके पूर्ण प्रभावों पर, फिलहाल कोई निष्कर्ष निकालना अभी  जल्दबाजी होगी। यह भी आशंका जाहिर की गई थी कि, "सुरंग के माध्यम से डिस्चार्ज होने वाले पानी के परिणामस्वरूप आसपास के, कई झरने, सूख जाएंगे। जोशीमठ के आसपास की बस्तियों को गर्मी के मौसम में पीने के पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा।" यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि, जल प्रवाह में निरंतर कमी होते रहने और कुछ झरनों के असामयिक रूप से, सूखते जाने की सूचना, सरकार को, पहले ही दी जा चुकी थी। इस अचानक और बड़े पैमाने पर जल डिस्चार्ज से, इस क्षेत्र में भू धंसाव शुरू होने का खतरा है, जिससे क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समस्याएं बढ़ सकती हैं। जमीन की नमी कम होने से,  बायोमास, छोटी वनस्पतियां, प्रभावित होंगी और इसका दुष्प्रभाव,  फसल उत्पादन में कमी के रूप में सामने आएगा, जो जनता के जीवन पर  प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।  साथ ही यह फ़्लोरा और फाउना यानी जैव और वनस्पति की विविधिता को भी प्रभावित करेगा।

"जोशीमठ में जितनी स्थिर आबादी है, उसकी तुलना में वहां अस्थायी यानी आने, रुकने और चले जाने वाली फ्लोटिंग आबादी कहीं अधिक है। ऐसी ही आबादी को, शरण देने के लिये विभिन्न आय वर्ग को ध्यान में रखकर, यहां, नए नए होटल खोले गए। बद्रीनाथ और हेमकुंट साहिब तीर्थों का प्रवेश द्वार होने के कारण, जोशीमठ की फ्लोटिंग आबादी, अपने स्थिर आबादी की तुलना में, सामान्यतया, कई गुना बढ़ जाती है। इस कारण, स्थानीय प्रशासन को आगंतुकों के साथ-साथ स्थानीय निवासियों को भी पानी उपलब्ध कराने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।" यह निष्कर्ष है करेंट साइंस के लेख के विशेषज्ञों का। 2009 में दिए गए ये विशेषज्ञ मशविरे हों या, 1976 की मिश्र कमेटी की रिपोर्ट, इसके अलावे, गढ़वाल विश्वविद्यालय, आईआईटी कानपुर, के विशेषज्ञ, भू-धंसाव को लेकर अलग-अलग, निष्कर्ष और मशविरे देते रहे है। आज भी, वैज्ञानिकों के कई, समूह, इस भूगर्भीय गतिविधियों के अध्ययन और शोध में लगे हुए हैं।

आईआईटी कानपुर के भू वैज्ञानिक प्रो. राजीव सिन्हा, पिछले दो सालों से इस क्षेत्र की भूगर्भीय उथल पुथल पर अध्ययन कर रहे है। उनका बयान आज कई अखबारों में छपा है। उन्होंने बताया कि, "उत्तराखंड का, जोशीमठ और कर्णप्रयाग वाला इलाका लैंड स्लाइडिंग, (भू स्खलन) जोन में है. यहां दशकों से, लगातार, भू स्खलन होते रहने से पत्थर कमजोर हो गए हैं। इन दोनों स्थानों स्थानों पर, अधिकतर घर व होटल इसी भूस्खलित मलबे पर खड़े हैं। पहाड़, ऊंचे हो रहे हैं, जिससे मलबा खिसक रहा है।" 
आगे उन्होंने इस इलाके की भूगर्भीय स्थिति को स्पष्ट करतें हुए कहा कि, "सबसे पहले तो आपको यह समझना होगा कि जोशीमठ और कर्णप्रयाग जैसे इलाकों की जो जियोलॉजिकल सेटिंग है वह क्या है? तीन बातें समझनी होगी।  पहली बात तो यह है कि, भूकंप की दृष्टि से, यह बहुत ही, संवेदनशील जोन है और यह पूरा हिमालयी इलाका जोन फाइव में आता है। इसलिए भूकंप यहां बहुत आता है। दूसरे, कच्चे पहाड़ होने के कारण, लैंडस्लाइड्स यहां, सामान्यतया होती रहती हैं। तीसरे, यहां की टोपोग्राफी, (भूतल संरचना) ऐसी है कि, पत्थरों के गिरने की संभावना हमेशा बनी रहती है। सबसे अहम बात यह है कि, यह पूरा इलाका ही, पुराने, स्खलित हुए, भूमि पर टिका हुआ है।" 

इस इलाके में विकास परियोजनाओं पर टिप्पणी करते हुए, प्रोफेसर सिन्हा ने कहा कि, "यहां जितने भी विकास कार्य हुए हैं वो सब, अनप्लान यानी अनियोजित तरीके से किए गए हैं और, बहुत ही कमज़ोर नीव पर खड़े हुए हैं। भू धंसाव की यह घटना अचानक नहीं हुई है। बल्कि, काफी पहले से, जोशीमठ के घरों में हल्की-हल्की दरारें आ रहीं थीं। पर आज की तारीख में, घरों में, बहुत ही ज्यादा दरारें आ गई हैं। यहां पर एनटीपीसी का बिजली प्रोजेक्ट चल रहा है। आशंका है कि इन टनल में बहुत सारे आंतरिक क्षेत्र हैं, जिनसे पानी का लगातार रिसाव हो रहा है।"
भविष्य की संभावनाओं पर उन्होंने कहा कि, "भू धंसाव की यह प्रक्रिया, अभी और बढ़ेगी क्योंकि, बहुत जगह से पानी का रिसाव शुरू हो गया है। अगर पानी का रिसाव शुरू हो गया है तो, पहाड़ों के अंदर पानी का जमाव होने लगेगा। इससे पानी का भूमिगत दबाव बढ़ने से भी घरों में दरारें और भूस्खलन जैसी स्थिति बन गई है। अंदर की जो जमीन है वो खिसकती जा रही है।"

उन्होंने बताया कि "ऊपरी और निचली इलाकों में वैज्ञानिकों ने टेस्टिंग की. अलकनंदा और धोलीगंगा नदी में एनटीपीसी प्रोजेक्ट चल रहा है. हमने वहां भी जाकर, कई घाटियों का परीक्षण किया। वहां पर स्लोप (ढलान) बहुत है और लैंडस्लाइड के बहुत ज्यादा चांसेस हैं।"
भू धंसाव की इस त्रासदी का क्या दीर्घकालिक परिणाम होगा, इस पर अभी कोई भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह तो निश्चित है कि, इसके परिणाम पूरी गढ़वाल घाटी के लिये चिंताजनक रूप से गंभीर होंगे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि, इस संवेदनशील क्षेत्र में, राजमार्ग, ऑल वेदर रोड, चार लेन की सड़क, तीर्थों का मूर्खतापूर्ण पर्यटन स्थलों में बदलने की सनक, इस सीमावर्ती और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र के लिये घातक बनेगी। 

(विजय शंकर सिंह)


Tuesday, 10 January 2023

जोशीमठ त्रासदी (2) सरकार ने वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की रिपोर्ट की लगातार अनदेखी की / विजय शंकर सिंह

सरकार और विशेषज्ञों की सलाह में अक्सर टकराव होता रहता है और इसका कारण, दोनो के उद्देश्य और क्रियाकलाप में है। सरकार एक प्रसासनिक निकाय भी है और उसके उद्देश्य, जनता से किए वायदे या लोकलुभावन एजेंडे से प्रभावित होते हैं, जबकि विशेषज्ञों की रिपोर्ट, शोध, अध्ययन और तथ्यों पर आधारित होती है। बात जोशीमठ की ही करें तो, जोशीमठ बद्रीनाथ धाम का मुख्य द्वार है और इसी के बाद बद्रीनाथ तक का रास्ता जो दुर्गम और अपेक्षाकृत संकरा है, आगे जाता है। बद्रीनाथ से वही मार्ग, देश के इस उत्तरी सीमा के आखिरी गांव माणा तक जाता है। वहां एक हेलीपैड बना है। हेलीपैड भी बड़ा है। गांव से फिर यही सड़क आगे चली जाती है जो माणा दर्रा से होते हुए तिब्बत को जाती है। तिब्बत से आने जाने का यह पुराना मार्ग है। मैं माणा या उससे कुछ किलोमीटर तक आगे तो, तीन बार गया हूं पर उसके आगे नहीं जा पाया हूं। उसके आगे आईटीबीपी, भारत तिब्बत सीमा पुलिस की चौकियां हैं। इनमे कुछ तो इतनी दुर्गम हैं कि, वहां जाने के लिए खच्चर या पैदल का ही प्रयोग होता है। 

जोशीमठ, न केवल बद्रीनाथ धाम का द्वार है बल्कि वह हेमकुंड साहिब जाने का भी मार्ग, वहां से निकलता है। हेमकुंड साहिब भी, मुझे जाने का एक बार सौभाग्य मिला है पर वह पुरानी बात है। जोशीमठ में बद्रीनाथ जी का विग्रह, जब मंदिर, हिमपात के कारण सर्दियों में बंद हो जाता है तो, जोशीमठ लाया जाता है और शंकराचार्य मठ में ही उसकी पूजा अर्चना आदि होती है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य का, जोशीमठ एक तरह से मुख्यालय भी है। जोशीमठ में सेना, आईटीबीपी, सीमा सड़क संगठन आदि की इकाइयां हैं और यहां हेलीपैड भी है। जोशीमठ से थोड़ा ऊपर औली नामक स्थान पर स्कीइंग और अन्य बर्फ पर होने वाले खेल होते हैं। उसे भी सरकार ने विकसित किया है। साथ ही बड़ी बड़ी जल विद्युत परियोजनायें भी वहां बन रही हैं। इस प्रकार देखें तो जोशीमठ जो, शंकराचार्य के मठ के रूप और बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब के द्वार के रूप में, एक छोटा सा अस्थाई कैंप शहर के रूप कभी था, वह अब एक बड़े शहर के रूप में विकसित किया जाने लगा। 

जोशीमठ में सेना और आईटीबीपी की इकाइयों का रखना और इनकी लॉजिस्टिक सुविधाओ को व्यवस्थित करना एक सुरक्षागत सामरिक मजबूरी है। क्योंकि चीन की सीमा नजदीक है। हालांकि चीन ने, उधर से कभी अतिक्रमण की कोशिश नहीं की है, पर चीन के फितरत भरे आचरण को देखते हुए, उसकी तरफ से कोई गफलत की भी नहीं जा सकती है। जब सड़कें बेहतर हो गई और, हरिद्वार से सुबह निकल कर शाम तक, जोशीमठ पहुंचना आसान हो गया तो निश्चित ही, बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब की तीर्थ यात्राएं बड़ी होने लगीं। यात्रियों की संख्या बढ़ने लगीं और बद्रीनाथ धाम तक गाड़ियों की पहुंच ने, इस यात्रा को और सुगम बना दिया। फिर इन यात्रियों के रात्रि विश्राम के लिए, जोशीमठ में छोटे बड़े होटल खुलने लगे तो जाहिर है एक शांत और छोटा सा धार्मिक शहर जो शंकराचार्य के मठ और फौज के कैंप के लिए जाना जाता था, वह विकसित होने लगा। अब वहां जमीन तो पहाड़ को काट कर ही निकाली जा सकती थी। पहले की जो खाली जमीन थी उन पर अधिकतर सेना, आईटीबीपी, बीआरओ और अन्य सरकारी दफ्तर डाक बंगले स्थापित हो चुके थे। इस प्रकार पहाड़ खुरच कर, निजी होटलों के लिए जो, जमीन तैयार की गई, उसका अनावश्यक बोझ जोशीमठ की धरती पर पड़ा। 

1976 की मिश्र कमेटी की रिपोर्ट में, इस खतरे को भांप लिया गया था, इसीलिए पचास साल पहले ही बहुमंजिली इमारतों के बनने पर रोक लगा दी गई थी। तब सड़के भी सिंगल लेन थीं और जगह जगह, जहां थोड़ी जगह मिल जाती थी, सड़कें चौड़ी कर दी गई थीं ताकि आने जाने वाले वाहन एक दूसरे को पास दे सकें। बद्रीनाथ धाम तक तो सड़क 1976 के पहले ही बन गई थी और बसें, कार, ट्रक आने जाने लगे थे। लेकिन तब यात्री भी कम थे और यातायात भी कम था तो, जोशीमठ में भी भीड़ कम होती थी और सड़को पर दबाव भी कम था। अब यातायात तो बढ़ा ही और यात्रियों की भीड़ के कारण शहर पर दबाव भी बढ़ा और इसी के साथ साथ निर्माण भी बढ़े और सबसे बड़ा सवाल कि, जब मिश्र कमेटी ने साफ साफ यह चेतावनी दी थी कि, बहुमंजिली इमारतें नहीं बननी चाहिए तो फिर वे इमारतें, किसकी अनुमति से बन गई और क्यों विशेषज्ञों की सलाह को नजर अंदाज किया गया। आज यही सवाल वहां के लोग भी पूछ रहे है। पर यह भी तब जब आधा जोशीमठ लगभग डूबने के कगार पर है। 

ऐसा नहीं है कि, सरकार ने केवल मिश्र कमेटी और गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ कोटलिया के अध्ययन और सलाह को नजर अंदाज किया बल्कि अन्य स्रोतों से भी जो विशेषज्ञ सलाह आई उनको भी डस्टबिन में फेंक दिया गया। देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के प्रमुख, प्रोफेसर डॉ कालाचंद सेन ने, जोशीमठ की भूगर्भ परिस्थितियों का अध्ययन किया और अपनी राय दी कि, "जोशीमठ जो समुद्र तल से 2,000 मीटर ऊपर बसा हुआ एक शहर है, भूवैज्ञानिक दृष्टि से, सदैव, संवेदनशील रहा है क्योंकि यह एक पुराने भूस्खलन के मलबे के ऊपर टिका हुआ है, जो हाल के वर्षों में बहुमंजिली इमारतो के निर्माण की होड़ को रोकने में विफल रहा है। गैर-योजनाबद्ध निर्माण के कारण, धरती लगातार अस्थिर हो रही है। जिससे अंदर ही अंदर भू क्षरण और आंतरिक भू स्खलन लगातार जारी है। इससे, भूमिगत जल चैनल, जो दिखते नहीं है पर आंतरिक जल प्रवाह प्रणाली के मुख्य प्रवाह मार्ग हैं, बाधित हो जा रहे हैं। रुका और बाधित जल प्रवाह, पुनः धरती में रिसने लगता है जिससे भूमि का दरकना जारी रहता है। इसके कारण, धरती में ऊपर जगह जगह दरार आने लगती है।" 
सरकार ने, इस शहर में अनियोजित निर्माण,  सड़कों के बड़े पैमाने पर चौड़ीकरण, और जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दी और ऐसा करते समय, कई विशेषज्ञ चेतावनियों को भी नजरअंदाज किया गया, और अब इसका परिणाम सामने है।

यह सारे अध्ययन, चाहे वह, मिश्र कमेटी द्वारा किए गए हो, या देहरादून के वाडिया संस्थान द्वारा या किसी अन्य विशेषज्ञ एजेंसी द्वारा, यह सभी सरकार द्वारा स्थापित या मान्यता प्राप्त शोध संस्थान द्वारा किए गए है। जोशीमठ के वर्तमान खतरे के बारे में, विशेषज्ञों की सलाह या चेतावनियों की कोई कमी नहीं रही है, पर,  जोशीमठ आपदा के संदर्भ में, इन चेतावनियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया और उन्हें बार बार नजर अंदाज किया गया। हिमालय में एक और तीर्थस्थल बद्रीनाथ तक सड़क को चौड़ा करने का काम, तमाम चेतावनियों के बावजूद, कई गुना तेज कर दिया गया है। यह सड़क चार धाम (चार तीर्थस्थल) सड़क चौड़ीकरण परियोजना का हिस्सा है। इसका भी विरोध हुआ और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया, तब सरकार ने सेना और सीमा सुरक्षा का तर्क दिया और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रोजेक्ट पर लगाई अपनी बंदिश खत्म कर दी और विशेषज्ञों की सारी की सारी चेतावनियां, शोध और अध्ययन, धरे के धरे रह गए। फिर ऐसी कई रिपोर्टें सामने आई, कि पेड़ काटे जा रहे हैं और प्राकृतिक जल चैनल बाधित हो गए हैं, क्योंकि इस परियोजना में, पहाड़ी क्षेत्र में सड़क बनाने के तरीके पर सरकार, अपने ही सिद्धांतों और दिशा निर्देशों का पालन करने में विफल रही है। यह विफलता नहीं है, यह जानबूझकर किया जा रहा कृत्य है। अब जब जोशीमठ की साठ प्रतिशत आबादी के विस्थापन और पुनर्वास की बात होने लगी तो, अब सड़क चौड़ीकरण के उसी प्रोजेक्ट पर चल रहा काम, रोक दिया गया है।

सड़क निर्माण तो सतह पर हो रहा है और सतह के पहाड़ तोड़ कर जमीन ढूंढी जा रही है। इसके लिए हल्के विस्फोटक या बड़ी मशीनों का उपयोग किया जाता है। इसका असर सतह पर पड़ता है पर उससे बड़ा खतरा, वहा चल रही जल विद्युत परियोजनाओं से हो रहा है। फिलहाल तो सबसे बड़ा खतरा  एनटीपीसी की तपोवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना के कारण होने लगा है। यह एक रन-ऑफ़-द-रिवर बिजली उत्पादन परियोजना है, जिसमें पहाड़ी के नीचे, 12 किलोमीटर लंबी एक सुरंग खोदी जाती है, और बिजली उत्पादन के लिए, उसी सुरंग के माध्यम से धौली गंगा नदी के पानी को प्रवाहित कर, उपयोग में लाया जाता है। जब यह परियोजना शुरू हुई तो कहा गया कि, सुरंग ड्रिल तकनीक से बनेंगी और विस्फोटक का प्रयोग नहीं किया जायेगा। पर अब यह पता लगा कि, विस्फोटक का भी प्रयोग किया गया।
एनटीपीसी ने 5 जनवरी को यह सफाई देने की कोशिश की कि, "उस परियोजना की सुरंग जोशीमठ के नीचे से नहीं गुजरती है, और इसे आपदा के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए।"  लेकिन यह सुरंग उसी जलभृत से होकर गुजरती है जो जोशीमठ के नीचे है। एनटीपीसी का कहना है कि, "सुरंग, जोशीमठ के नीचे से नहीं निकल रही है। उससे हट कर निकल रही है।" भूमिगत गतिविधियों का विस्तार सीमित नहीं होता है और सुरंग कहीं से भी निकले, उसे बनाने में जो भी आघात भूमि के अंदर किया जायेगा, उसकी तरंग या कम्पन का असर वृत्ताकार पड़ता है। अब जब जोशीमठ शहर जो खुद भी किसी ठोस धरातल के बजाय स्खलित भू के परतों पर टिका है तो, वह एक सामान्य कम्पन से भी प्रभावित हो जायेगा। और ऐसा हो भी रहा है। 

पीयूष रौतेला, जो अब उत्तराखंड राज्य सरकार के उत्तराखंड आपदा न्यूनीकरण और प्रबंधन केंद्र के कार्यकारी निदेशक हैं, ने 2010 में करंट साइंस जर्नल में एक पत्र लिखा था। 24 दिसंबर, 2009 को लिखे उक्त पत्र में उन्होंने चेतावनी दी थी कि, "एनटीपीसी द्वारा इस्तेमाल की जा रही टनल बोरिंग मशीन ने एक जलभृत को पंचर कर दिया, जिससे पानी जमीन के नीचे एक अलग दिशा में चला गया, जिससे झरने सूख गए, जिस पर जोशीमठ के कई निवासी अपने घरेलू पानी की आपूर्ति के लिए निर्भर हैं।" पीयूष रौतेला ने अब कहा है कि "जोशीमठ का डूबना "संभावित रूप से जलभृत के टूटने के कारण हुआ है क्योंकि हम गंदे पानी को बाहर निकलते हुए देखते हैं।" हालांकि, उन्होंने कहा, "इसे हाइडल सुरंग से जोड़ने या हटाने के लिए अभी तक कोई सबूत नहीं है।"

एक अन्य विशेषज्ञ, हेमंत ध्यानी ने कहा, "केवल एक जल परीक्षण ही बता सकता है कि क्या शहर में बहने वाली धाराएँ हाइडल सुरंग से निकल रही हैं।" उन्होंने महसूस किया कि "एनटीपीसी जोशीमठ आपदा के साथ किसी भी संबंध को अस्वीकार करने में जल्दबाजी कर रहा था।" यह वही जलविद्युत परियोजना है, जहां 7 फरवरी, 2021 को सुरंग के भीतर अचानक आई बाढ़ में फंसने के बाद लगभग 200 श्रमिकों की मौत हो गई थी। यह बाढ़ एक बर्फ की दीवार के गिरने के कारण हुई थी, जिसे विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए जिम्मेदार मानते हैं। ऋषि गंगा जो, धौली गंगा की एक सहायक नदी के ऊपर की ढलानों पर है, वहां यह दुर्घटना हुई थी। ये सभी नदियाँ भारत के सबसे बड़े नदी बेसिन गंगा बेसिन का हिस्सा हैं। उस दुर्घटना की जांच की गई या नहीं यह मुझे ज्ञात नहीं है। जांच से मेरा आशय, आपराधिक या प्रशासनिक विफलता की जांच से नहीं है, क्योंकि जब दो सौ मजदूरों की हादसे में हुई है तो यह जांच तो होनी ही चाहिए, पर भू वैज्ञानिक और अन्य दृष्टिकोण से इसकी जांच क्यों नहीं की गई और क्यों नहीं, विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर परियोजना को दुबारा नहीं परखा गया। आखिर आज परियोजना रोकनी पड़ गई है। जबकि इस जल विद्युत परियोजना को लेकर सभी विशेषज्ञों ने गहरी आशंका जताई थी। 

यह दुर्भाग्य है कि, जोशीमठ के प्राचीन तीर्थ नगर के निवासियों को जनवरी 2023 के ठंड के मौसम में अपने घरों से भागने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। शहर में लगभग 2,500 इमारतों में से एक चौथाई में नींव झुक रही है, जबकि दीवारें खुल रही है। मकान कभी भी गिर सकते हैं। भारत और उत्तराखंड राज्य सरकार ने, सड़क चौड़ीकरण और जलविद्युत परियोजना पर सभी तरह के काम को रोकते हुए, जोशीमठ के हजारों निवासियों को, सुरक्षित जगहों पर ले जाने की कार्यवाही कर रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं, कि "यह एक ऐसी आपदा है, जो घटित होने की प्रतीक्षा कर रही थी, क्योंकि सरकारी अधिकारियों ने सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के तरीकों के बारे में,  दशकों से, मिल रही कई चेतावनियों को, लगातार नज़रअंदाज़ किया है।"

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पुनर्वास की जांच करने के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात की, जबकि प्रधान मंत्री कार्यालय ने जोशीमठ को "भूस्खलन-अवतलन क्षेत्र" घोषित किया और विशेषज्ञों से कहा कि, अब उसका क्या करना है, इस पर छोटी और लंबी अवधि की योजना वे तैयार करें। विशेषज्ञ सोचेंगे भी और अपने अध्ययन तथा शोध के आधार पर, कुछ न कुछ हल सुझाने की कोशिश भी करेंगे, पर इस बात की क्या गारंटी है कि, नौकरशाही, जो अक्सर विशेषज्ञों को, दोयम दर्जे की नज़र से देखने की अभ्यस्त हो गई है, उस सलाह मशविरे पर गंभीरता से आगे कार्यवाही करेगी। कुछ ही दिन पहले, जोशीमठ के निवासियों का एक प्रतिनिधिमंडल, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में निर्माण कार्य के कारण अपने घरों में दरारें आने की शिकायत करने गया था। कहते हैं, उस प्रतिनिधिमंडल को, मुख्यमंत्री के साथ बात करने के लिए, केवल पांच मिनट का समय ही मिल पाया था। 'द थर्ड पोल' के अनुसार, "मुख्य्मंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि, उनके डर निराधार हैं और उन्हें बिना उनकी पूरी बात, सुने ही वापस लौटा दिया।" 

अखबारों के अनुसार, 4 जनवरी को, जोशीमठ के घरों और सड़कों में दरारें इतनी तेजी से चौड़ी होती गईं कि निवासियों ने स्थानीय तपोवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना के प्रबंधकों को सभी सुरंग बनाने के काम को रोकने के लिए मजबूर कर दिया।  उसी रात, जिला अधिकारियों ने प्रभावित इमारतों की गिनती की। 8 जनवरी की शाम तक गिनती बढ़ गई थी। जबकि अधिकारी उत्तराखंड के अचानक बेघर हुए लोगों को फिर से बसाने की कोशिश कर रहे हैं और इसके द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों का इंतजार कर रहे हैं, स्थानीय लोग परेशान हैं।  एक स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता, अतुल सत्ती ने द थर्ड पोल को बताया, “हम सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग करते हैं जिसमें 
० एनटीपीसी परियोजना को तत्काल रोकना, 
० चारधाम ऑल वेदर रोड (हालेंग-मारवाड़ी बाईपास) को बंद करना, 
० एनटीपीसी के समझौते को लागू करना शामिल है ।
जो सुनिश्चित करता है  जोशीमठ के पुनर्वास के लिए एक निर्धारित समय सीमा के भीतर एक समिति का गठन कर, सभी प्रभावित लोगों को तत्काल सहायता प्रदान की जाय। जिसमें मुआवजा, भोजन, आश्रय और अन्य बुनियादी सुविधाएं शामिल हों। साथ ही, विकास परियोजनाओं का निर्णय लेते समय, विशेषज्ञों के साथ साथ, स्थानीय प्रतिनिधियों की भागीदारी” भी शामिल हो।

(विजय शंकर सिंह)

मनीष आज़ाद / 'स्टीफन हाकिन्स' के बहाने विज्ञान में भाववाद पर एक टिप्पणी

‘स्टीफन हाकिन्स’ ने निस्सन्देह विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में बड़ा योगदान दिया है। उनके राजनीतिक विचार भी आमतौर से प्रगतिशील थे। ईश्वर के अस्तित्व के बारे में भी उन्होंने खुलकर अपने विचार रखे और साफ कहा कि वे नास्तिक हैं।

लेकिन जिस भौतिक विज्ञान का स्टीफन हाकिन्स प्रतिनिधित्व करते थे, वहां एक बड़ा संकट मौजूद है, जिसे ‘क्रिस्टोफर काडवेल’ ‘Crisis in Physics’ कहते थे और इसी नाम से अपनी मशहूर किताब भी लिखी थी। स्टीफन हाकिन्स तक आते आते यह संकट और गहरा गया है। विशेषकर आइन्स्टाइन के बाद ही भौतिक विज्ञान का (विशेषकर अन्तरिक्ष विज्ञान,Cosmology का) प्रयोगों और परीक्षण से रिश्ता बहुत कम हो गया और एक तरह से पूरा भौतिक विज्ञान विशेषकर अन्तरिक्ष विज्ञान गणित-आधारित हो गया, या यो कहे कि ‘गणित का कैदी’ हो गया। और इसी रास्ते से भौतिक विज्ञान में अध्यात्मवाद ने प्रवेश किया। स्टीफन हाकिन्स की पूरी थ्योरी (‘ब्लैक होल’ और ‘बिग बैंग’ से सम्बन्धित) गणित आधारित है, जिसका प्रयोगों-परीक्षणों से कोई रिश्ता नहीं रहा है।

मशहूर मार्क्सवादी विचारक ‘क्रिस्टोफर काडवेल’ ने 1939 में एक महत्वपूर्ण किताब लिखी थी- ‘दी क्राइसिस इन फिजिक्स’। इस किताब में काडवेल ने इस संकट को इस रुप में रखा था- ‘‘भौतिकी का यह संकट जो कुछ वक्त पहले तक महज भौतिकविदों तक सीमित था, अब जनता के बीच भी आ चुका है। आम आदमी भी अब यह जानता है कि भौतिक विज्ञान में सब कुछ ठीक नही चल रहा है। इसकी संरचना में जो तेजी से दरार पैदा हो रही है, उसे ऐसे रहस्यमयी विचारों से पाटा जा रहा है, जो विज्ञान के लिए नये हैं। ख्यातलब्ध भौतिकविद यह ऐलान कर रहे हैं कि ‘निश्चयता’ (determinism) और ‘कार्यकारण संबंध’ (causality) भौतिक विज्ञान से खारिज हो चुके हैं। और यह ब्रह्ंमाण्ड गणितज्ञों की रचना है, और इसकी असल प्रकृति अज्ञात है। इस तरह के विचारों के मूल प्रवक्ता हैं- Jeans, Schrodinger, Heisenberg, Dirac और Eddington. ये सभी मशहूर भौतिकविज्ञानी हैं। मैक्स प्लांक और अलबर्ट आइन्सटाइन इनके प्रबल विरोधी थे, जिनकी प्रतिष्ठा ही इनके परंपरागत विचारों की रक्षा का प्रमुख हथियार था। लेकिन ‘दुश्मन’ के ठिकानों पर प्रति आक्रमण करने में ये सक्षम नहीं थे। प्लांक के अनुसार कार्य-कारण संबध (causality) का औचित्य यह था कि यह वैज्ञानिकों का विश्वास, भरोसा व न सिद्ध किया जा सकने वाला विज्ञान का मूल गुण है। आइन्सटाइन की कार्यनीति कही अधिक सरल थी – ‘‘युवा लोग क्या कह रहे हैं यह उन्हें ‘समझ नही आता’।’’ 
(‘The Crisis In Physics’ page-1)

किताब के आखिरी चैप्टर में काडवेल ने इस संकट का सार बताते हुए लिखा-‘‘ भौतिकी में इस संकट की जड़े काफी गहरी हैं और यह सामान्य व अंतिम संकट का एक हिस्सा हैै।’’ (पेज-161)
पूरी किताब में भौतिकी के इस संकट को समझाते हुए काडवेल ने इसे उचित ही ‘बुर्जुआ संकट’ से जोड़ा है।

तब से लेकर आज तक न सिर्फ यह संकट बढ़ा है, वरन इस संकट की पहचान भी काफी धुंधली पड़ गयी है। ‘बिग बैंग’ से लेकर ‘गाड पार्टिकल’ थ्योरी के माध्यम से अवैज्ञानिक और प्रतिक्रियावादी दर्शन ने जिस तरह से आज विज्ञान विशेषकर भौतिक विज्ञान को एक कुंहासे से ढक रखा है वह अभूतपूर्व है। यह कोई आश्चर्य की बात नही कि बिग बैंग थ्योरी को आज पोप के साथ साथ साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था का वरद हस्त प्राप्त है। जबकि इसके बरक्स दूसरी अनेक वैज्ञानिक स्थापनाएं हैं जिन्हे सुनियोजित तरीके से दरकिनार कर दिया जाता है।

‘सिंगुलैरिटी’, ‘ब्लैकहोल', ‘डार्क एनर्जी’, ‘डार्क मैटर’, 4th, 5th, 6th.. डाइमेन्सन, ‘बिग क्रन्च’, ‘बिग बैंग’ ब्रह्माण्ड की ‘हीट डेथ’ आदि के माध्यम से जो परोसा जा रहा है, वह विज्ञान से दूर विज्ञान फंतासी के ज्यादा निकट लगता है। एंगेल्स (Dialectics of nature और Anti Duhring), लेनिन (Materialism and Empirio Criticism) और एक हद तक काडवेल ने अपने अपने समयों पर द्वन्दात्मक भौतिकवाद [Dialectical materialism] की जमीन पर खड़े होकर उस समय के कुंहासे को काफी हद तक साफ किया था।

काडवेल के बाद भले ही यह संघर्ष कमजोर पड़ा हो, लेकिन यह रुका कभी नहीं। David bohm, Shoichi Sakata जैसे अनेक वैज्ञानिकों ने अपने अपने समय के अधिभूतवाद (Metaphysics) से टक्कर ली और भौतिकवादी परम्परा को धूमिल नही होने दिया।

इसी परम्परा में 2007 में एक किताब आयी थी- ‘The New Scientific Worldview’ इसके लेखक हैं- ‘Glenn Borchardt’ जो स्वयं एक वैज्ञानिक है और इनके अब तक 300 से ज्यादा पेपर प्रकाशित हो चुके हैं।

हांलांकि यह किताब मुकम्मल रुप से द्वन्दात्मक भौतिकवाद की जमीन पर खड़ी नही है और समाज विज्ञान के विश्लेषण में तो काफी कमजोर है। लेकिन इसके बावजूद यह आज के भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में छाये कुंहासे को काफी हद तक दूर करने में मददगार है।

किसी भी क्षेत्र में बुनियादी अवधारणायें (Assumptions) ही वह प्रस्थान बिन्दू होती हैं जो हमारे चिन्तन व प्रयोगों की दिशा निर्धारित करती है। भौतिकी के क्षेत्र में आज जो संकट व्याप्त है उसका कारण वे बुनियादी गलत अवधारणायें हैं जिन पर पूरा मुख्य धारा का भौतिक विज्ञान खड़ा है। इसलिए लेखक उन बुनियादी अवधारणाओं पर चोट करते हुए विज्ञान की 10 बुनियादी अलग अवधारणायें पेश करते हुए ब्रह्मांड का एक वैकल्पिक माडल पेश करता है। ये अवधारणायें हैं-

1. Materialism- The external world exists after the observer does not.

2. Causality- All effects have an infinit number of material causes.

3. Uncertainty- It is impossible to know everything about anything, but it is possible to know more about anything.

4. Inseparability- Just as there is no motion without matter, so there is no matter without motion.

5. Conservation- Matter and the motion of matter neither can be created nor destroyed.
6. Complementarity- All things are subject to divergence and convergence from other things.

7. Irreversibility- All processes are irreversible.

8. Infinity- The universe is infinite, both in the microcosmic and macrocosmic directions.

9. Relativism- All things have characteristics that make them similar to all other things, as well as characteristics that make them dissimilar to all other things.

10. Interconnection- All things are interconnected, that is, between any two objects exist other objects that transmit matter and motion.

लेखक ने इन अवधारणाओं के आधार पर यह साफ किया है कि इस ब्रह्माण्ड कि कोई शुरुवात या अंत नहीं है. यह माइक्रो [micro] और मैक्रो [macro] दोनों तरफ अनंत है।

लेखक ने इन अवधारणाओं पर आइन्स्टाइन को भी कसा है और उन्हे भी एक हद तक इस संकट का जिम्मेदार माना है। आइन्स्टाइन पर इससे पहले भी ये आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने भौतिक विज्ञान को प्रयोगों से हटाकर गणित का कैदी बना दिया। आइन्स्टाइन की सबसे बड़ी दार्शनिक चूक ‘समय’ को ‘मैटर’ के रुप में देखने की है। जबकि समय किसी मैटर का ‘मोशन’ है। ‘time dilation’ के उनके सिद्धांत ने समय में आगे-पीछे जाने जैसी कल्पनाओं के साथ साथ अन्य फंतासियों को भी जन्म दिया। 

स्पेस को भी आइन्स्टाइन ’empty space’ के रुप में देखते थे। लेखक कहता है कि पूरे ब्रह्मांड में न ही ’empty space’ है और न ही ‘solid matter’ है। सभी मैटर इन्ही दोनों अवस्थाओं के बीच होते हैं। यही कारण है कि अभी तक कहीं भी 0 डिग्री k नही पाया गया है। जो ’empty space’ के लिए जरुरी है।

आइन्स्टाइन का ‘curved space’ का विचार इसी गलत अवधारणा से पैदा हुआ। जबकि स्पेस (और समय भी) मैटर का ‘mode of existence’ भर है।

किताब की दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना ईथर की स्वीकार्यता है। 1887 में ‘Michelson–Morley’ प्रयोग के बाद कई ऐसे प्रयोग हुए जो ईथर के अस्तित्व को साबित करते हैं। 2002 में उक्रेन के दो वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक ‘aether drift’ को सिद्ध किया। लेकिन इनके पेपर व प्रयोगों को सचेत तरीके से मुख्य धारा के भौतिक विज्ञानियों व संस्थाओं ने नजरअंदाज किया। दरअसल आइन्सटाइन का पूरा माडल ईथर की अस्वीकार्यता पर निर्भर है। ईथर को स्वीकारते ही आइन्स्टाइन का पूरा माडल और उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लग जायेगी।
लेखक ने ईथर को स्वीकारने के साथ ही प्रकाश की पुरानी अवधारण को फिर से स्थापित किया है। लेखक के अनुसार प्रकाश कण नही तरंग है जो ईथर माध्यम में विचरण करती है और इसलिए प्रकाश की गति भी कास्टैन्ट नही हैं। ‘फोटान’ ईथर माध्यम का कण हैं प्रकाश का नहीं।

दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना ‘गुरुत्वाकर्षण’ को लेकर है। दरअसल विज्ञान में कार्य-कारण संबंध मानने वाले भौतिकवादी वैज्ञानिकों के लिए भी गुरुत्वाकर्षण एक गुत्थी है। यहां तक कि काडवेल ने भी गुरुत्वाकर्षण को सिर्फ ‘प्रभाव’(effect) माना जिसका कोई कारण नही है। न्यूटन की खोज इस ‘प्रभाव’ के बारे में है। इसके कारण का पता वे भी नही लगा सके। हालांकि न्यूटन ने इस पर एक जगह अपना संदेह भी जाहिर किया है कि कैसे दो सूदूर की वस्तुएं बिना किसी भौतिक बन्धन के एक दूसरे को आकर्षित करती हैं। यानी कि यदि कार्य-कारण संबंध का कोई अपवाद नही है तो गुरुत्वाकर्षण का भी कोई कारण अवश्य होना चाहिए और वह कारण भौतिक होना चाहिए आध्यात्मिक नहीं। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव का कारण भगवान पर छोड़ दिया। आइन्स्टाइन ‘curved space’ की शरण में चले गये। लेकिन लेखक का कहना है कि पूरे ब्रह्मांण में जो ईथर है उसके ‘फ्री कण’ का ‘काम्प्लेक्स कण’ पर जो ‘push’ बल लगता है उसके कारण गुरुत्वाकर्षण बल पैदा होता है। (इस प्रक्रिया में ‘vortex’ की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है।) इस रुप में गुरुत्वाकर्षण ‘pull’ नहीं बल्कि ‘push’ बल है। और इसका प्रभाव स्थानीय है, हालांकि इसकी व्यापकता पूरे ब्रह्माण्ड में है। किताब का यह चैप्टर थोड़ा कठिन है। लेकिन इतना तो समझ में आ जाता है कि न्यूटन की ‘आकर्षण’ व आइन्स्टाइन की ‘curved space’ वाली गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या काफी अपूर्ण है और विज्ञान की दो बुनियादी अवधारणाओं ‘matter-motion’ व ‘causality’ पर खरी नही उतरती।

पुस्तक में लेखक ने ‘उर्जा’ के मिथक को भी साफ किया है। विज्ञान और दर्शन में उर्जा को लेकर अनेक भ्रमात्मक अवधारणायें हैं। आइन्स्टाइन के प्रसिद्ध सूत्र “E=MC2” ने भी इसमें अपना योगदान दिया है। इस सूत्र से ऐसा लगता है कि ‘मैटर’ और ‘उर्जा' [energy] अलग अलग चीज है जिसे एक दूसरे में बदला जा सकता है। इसी गलत अवधारणा से यह कल्पना की जाती है कि बिग बैंग से पहले ब्रह्मांड में ‘शुद्ध उर्जा’ थी और इसी से ‘मैटर’ का जन्म हुआ।

दरअसल इस पूरे ब्रह्मांड में दो ही मूल चीजे हैं- ‘मैटर’ और ‘मोशन’। बिना ‘मैटर’ के ‘मोशन’ नही हो सकता और बिना ‘मोशन’ के ‘मैटर’ नही हो सकता।
लेखक के अनुसार उर्जा ‘matter in motion’ के लिए एक अमूर्त टर्म है। उर्जा का विशिष्ट रुप कोई भी हो वह ‘motion of matter’ ही होगा। जैसे उर्जा का एक रुप प्रकाश है। यह ‘मोशन’ है जो ईथर नामक ‘मैटर’ के कारण संपन्न होता है। दूसरा उदाहरण ‘दौड़ना’ है जो ‘पैर’ नामक मैटर के कारण संभव होता है। क्या हम ‘दौड़ने’ (motion) को ‘पैर’ (matter) से अलग कर सकते हैं। इसी तरह ‘शुद्ध उर्जा’ जैसी कोई चीज नही होती।

“E=MC2” सूत्र एक प्रकार के ‘matter in motion’ का दूसरे प्रकार के ‘motion of matter’ में रुपान्तरण है, न कि ‘matter’ का ‘motion’ में रुपान्तरण।

यह स्थापना बेहद महत्वपूर्ण है कि क्योकि काडवेल भी इसे ठीक से नही समझ पाये थे और उन्होने भी प्रकाश को ‘motion of motion system’ जैसा अजीब नामकरण दिया था। दूसरी जगह इसकी व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं – ‘‘ प्रकाश जब परमाणु में जाकर अदृश्य हो जाता है तो मैटर बन जाता है और जब इलेक्ट्रान के रुप में प्रकट होता है तो प्रकाश बन जाता है। 
(पेज-126)

इस किताब से इस बात का भी तीखा अहसास होता है कि समाज विज्ञान की तरह प्राकृतिक विज्ञान विशेषकर भौतिक विज्ञान भी तीखे विचारधारात्मक दार्शनिक संघर्ष का क्षेत्र होता है क्योकि जैसा कि काडवेल ने बहुत सटीक तरीके से समझाया है कि एक वैज्ञानिक, वैज्ञानिक होने से पहले एक इंसान होता है और इंसान के रुप में उसकी इस वर्ग समाज में एक जगह होती है और उसके अनुरुप उसकी अपनी एक विचारधारा होती है।

शासन व्यवस्था इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। और अपने तात्कालिक व दूरगामी हितों के हिसाब से कुछ वैज्ञानिकों व अवधारणाओं को गोद लेती है तो कुछ का दमन करती है या उन्हे दरकिनार करती है। ब्रूनों को जलाने से लेकर किसी पेपर को मुख्य धारा की साइन्स मैगजीन में ना छपने देना तक यह कुछ भी हो सकता है।

आज व्यवस्था की मदद से जिस तरह से ‘बिग बैंग’, ‘गाड पार्टिकल’, ‘शुद्ध उर्जा’ (स्पिरिट?) जैसी चीजों को धर्म के स्तर तक उठा कर ‘कामन सेन्स’ बनाया जा रहा है, उससे टकराने के लिए हमें भी अपनी ‘scientific worldview’ की धार को तेज करना चाहिए और द्वन्दात्मक भौतिकवाद [Dialectical materialism] की अपनी जड़ो की ओर लौटना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि ‘शुद्ध उर्जा’ की तरह ‘शुद्ध विज्ञान’ जैसी कोई चीज नही होती।

मनीष आज़ाद 
© Manish Azad