Monday, 9 January 2023

जोशीमठ त्रासदी (1) अनियंत्रित विकास का परिणाम है / विजय शंकर सिंह

जोशीमठ के बारे में जो खबरें आ रही हैं, वह न केवल एक पहाड़ी शहर के जमीदोज होते जाने की, चिंतित करने वाली खबर हैं, बल्कि चीन की सीमा के नजदीक होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा मामला है। जोशीमठ में मकानों और सड़कों में दरार आने की खबर आज से नहीं बल्कि पिछले दो साल से लगातार आ रही है, पर यह अलग बात है कि, सरकार अब जागी है और प्रधानमंत्री के स्तर पर एक उच्चस्तरीय बैठक हो रही है। समस्या है जोशीमठ की जमीन के निरंतर धंसते जाने की और यह गति इतनी तेजी से इधर होने लगी है कि, सड़कों, मकानों और अन्य भूभाग पर भी जगह जगह बड़ी बड़ी दरारें पड़ने लगी हैं। चमोली के जिला प्रशासन ने जिसके अंतर्गत जोशीमठ आता है, ने इस समस्या का निदान, फिलहाल तो, केवल, बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन ही बताया है, क्योंकि जिस तरह से जमीन दरक रही है उसका कोई तकनीकी निदान फिलहाल संभव नहीं दिख रहा है। मीडिया की खबरों के अनुसार, वहां स्थित सेना और आईटीबीपी की इकाई के कर्मचारियों और अधिकारियों ने अपने परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर भेजना शुरू कर दिया है। 

जोशीमठ का भू-धंसाव हाल की सबसे बड़ी अनदेखी पर्यावरणीय घटनाओं में से एक है, क्योंकि स्थानीय क्षेत्र के भू विशेषज्ञों, जिसमे भूगर्भ वैज्ञानिक और पर्यावरण के विशेषज्ञ दोनो की वैज्ञानिक राय को दरकिनार कर के, पिछले कई सालों से, बिना यह सोचे कि, यह धरती कितना भार वहन कर पाएगी, जोशीमठ को, एक आधुनिक शहर बनाने की होड़ लगी हुई है। जोशीमठ में जिस तेजी से मानवीय गतिविधियां बढ़ी है, होटल, चौड़ी चौड़ी सड़कें, और अब चार लेन ऑल वेदर रोड का विकास हो रहा है, और यह सब भी, भूगर्भ वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को कूड़ेदान में फेंक कर, केवल एक जिद और सनक को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, जिसने इस त्रासदी को एक तरह से आमंत्रित ही किया है। पगलाए विकास की पिनक में, यह मूल सवाल भी नजरंदाज कर दिया गया कि, यह क्षेत्र, न केवल एक भूकंपीय क्षेत्र है बल्कि जोशीमठ खुद भी एक ग्लेशियर की जमीन पर बना है जो हिमालय के कच्चे पहाड़ का एक हिस्सा है। हाल ही के दिनों में लगातार बारिश और बाढ़ के कारण, मकानों की नींव और कमजोर हुई, और धीरे धीरे उनमें, दरारें और बढ़ने लगीं। जब धरती का आधार ही कमज़ोर होने लगेगा तो उस पर टिकी इमारतें और निर्माण तो धंसेगे ही। 
हालाँकि, इस प्रकार के भू धंसाव की स्थिति में इस अचानक ट्रिगर के पीछे मुख्य कारण, भूगर्भ वैज्ञानिक, मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT-2) का पुनः सक्रिय हो जाना बताते हैं। यह एक भूवैज्ञानिक फॉल्ट है, जहां भारतीय प्लेट ने हिमालयी प्लेट को, यूरेशियन प्लेट के नीचे धकेल दिया है। यह एक बेहद धीमी प्रक्रिया होती है और रुक रुक कर चलती रहती है। जमीन के अंदर ऐसी गतिविधियां बेहद खामोशी से चलती रहती हैं और उनका कोई प्रत्यक्ष असर ऊपर नही दिखता है। पर जब कोई गंभीर गतिविधि होती हैं, और जब उसका प्रत्यक्ष असर, जैसा कि, आजकल दिख रहा है, सामने आता है तो सरकार तमाम पुरानी शोध रिपोर्ट पर पड़ी धूल झाड़ना शुरू कर देती है। अब जब यह, MCT-2 ज़ोन फिर से सक्रिय हो गया है, और जोशीमठ में जमीन के धंसने का कारण बन रहा है तो, इस पर बातें होने लगी हैं। पर कोई भी भूवैज्ञानिक यह अनुमान नहीं लगा पा रहा है कि यह थमेगा कब और फिर से सक्रिय होगा कि नही। कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूविज्ञान के प्रोफेसर, डॉ बहादुर सिंह कोटलिया कहते हैं, "हम दो दशकों से सरकारों को चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन सरकार इसे अब तक नज़रअंदाज़ करती आ रही है। आप प्रकृति से लड़ नहीं सकते और जीत भी नहीं सकते। जोशीमठ में, जिस तरह की भूगर्भीय घटनाएं हो रही हैं, वह केवल जोशीमठ तक ही सीमित नहीं रहेंगी और हो सकता है और भी पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं घटने लगें।"

आज अचानक आज से पचास साल पहले जोशीमठ पर एक रिपोर्ट की चर्चा होने लगी जिसमे साफ साफ लिखा है कि कि जोशीमठ एक पुराने भूस्खलन क्षेत्र पर स्थित है और अगर इसी तरह का अनियंत्रित विकास जारी रहा, तो, यह शहर डूब भी सकता है, और सिफारिश की कि जोशीमठ में निर्माण निषिद्ध किया जाय। उत्तराखंड का जोशीमठ जब यूपी का हिस्सा था, तब से, धीरे धीरे धंस रहा है। पर तब यह गति बेहद धीमी थी। जब जगह जगह भू धंसाव के संकेत मिलने लगे तब, वर्ष 1976 में, गढ़वाल के तत्कालीन कमिश्नर एमसी मिश्र की अध्यक्षता में, एक 18 सदस्यीय समिति का गठन किया गया, जिसे मिश्र कमेटी का नाम दिया गया, और समिति ने, जांच पड़ताल कर, भूस्खलन और भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए, वहां पौधे लगाने और वन क्षेत्र विकसित करने की सलाह दी थी। 1976 की इस कमेटी में सेना, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और अन्य विशेषज्ञ एजेंसियों सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल थे।  3 मई 1976 को, कमेटी की रिपोर्ट के संबंध में एक बैठक हुई थी, जिसमें, भू धंसाव रोकने के लिए, दीर्घकालीन उपाय करने की बात कही गई थी। जाहिर है यह समस्या तब भी थी, हालांकि स्थिति तब इतनी भयावह नहीं थी। 18 सदस्यीय मिश्र कमेटी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट, आज एक भविष्यवाणी की तरह लग रही है।  

अब तो जैसी खबरें मीडिया में आ रही हैं, उसके अनुसार, उत्तराखंड के पवित्र शहर जोशीमठ के निवासी शहर की इमारतों और गलियों में दरारें देखकर चिंतित हो गए हैं, इसे वे "धीरे-धीरे डूबता हुआ शहर" बताने लगे है।  जोशीमठ में 561 घरों में दरारें, मिट्टी के धंसने के कारण आ गई है। जब बात बहुत बढ़ गई तो, उत्तराखंड सरकार ने जन विरोध के कारण, 5 जनवरी को क्षेत्र में, समस्त  विकास कार्यों पर रोक लगा दी है। भूगर्भ वैज्ञानिकों और निर्माण विशेषज्ञों ने दस साल पहले ही इस पूरे क्षेत्र में भू-धंसाव की संभावना जता दी थी। इसका कारण भू परत का तेजी से और व्यापक निर्जलीकरण होना भी है। आज कटु  तथ्य यह है कि, शहर डूब रहा है, और कोई सुधारात्मक कार्रवाई की भी नहीं जा रही है और अब यह संभव भी नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में जोशीमठ शहर और उसके आसपास कई नई नई, बहु-मंजिले निर्माण विकसित हुए हैं। भू  धंसाव के कारण हाल ही में इनमें से एक बहुमंजिली इमारत झुक भी गई। यह जानते हुए भी कि, यह पूरा क्षेत्र, भूगर्भीय रूप से जोखिम भरा और संवेदनशील है, जोशीमठ और तपोवन के पास विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना सहित अनेक जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई है।

अगस्त 2022 से उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, अनियोजित निर्माण के परिणामस्वरूप जोशीमठ की समस्याएं और भी बदतर हो गई हैं, जिसमें भूमि पर पड़ने वाले दबाव और प्रभाव की क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया है। कई अतिरिक्त भवनों का विकास किया गया। नए नए होटल खुले और बहुमंजिले निर्माण भी किए गए। रिटेनिंग वॉल यानी पहाड़ को थामने के लिए बनाई जाने वाली दीवार, बनाकर भूस्खलन संभावित क्षेत्र को किसी भी प्रकार से रोकने का काम किया तो गया पर जब भूगर्भीय गतिविधियां बढ़ने लगीं तो वह उपाय भी बेअसर होने लगे। परिणामस्वरूप, शहर के कमजोर ढलान पर अब दबाव बढ़ने लगा और उसका असर भू धंसाव के रूप में आज दिख रहा है।

सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) हेलंग बाईपास के निर्माण के लिए बड़ी मशीनरी लगा रहा है, जिससे बद्रीनाथ मंदिर की यात्रा लगभग 30 किलोमीटर कम हो जाएगी।  विशेषज्ञों के अनुसार, टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण यह, अनियंत्रित विकास आगे चलकर, और अधिक भूस्खलन का कारण बन सकता है।  मिश्र कमेटी ने अपनी 1976 की रिपोर्ट में जोशीमठ के आसपास के क्षेत्र में बड़ी इमारत के खिलाफ चेतावनी दी थी। 1976 के मिश्र कमेटी की रिपोर्ट ने जोशीमठ में डूबने का पहला मामला दर्ज किया गया था, जो भूस्खलन की चपेट में आने वाले क्षेत्र में स्थित है।  यह शहर एक पहाड़ी के मध्य ढलान पर स्थित है जो पश्चिम और पूर्व में कर्मनासा और ढकनाला धाराओं से और दक्षिण और उत्तर में धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों से घिरा है। ढकनाला, कर्मनासा, पातालगंगा, बेलाकुची और गरुण गंगा ऐसी कुछ धाराएँ हैं, जिनकी शुरुआत मध्य हिमालय क्षेत्र में कुंवरी दर्रे के पास से होती है। जबकि अन्य अलकनंदा में जाकर मिल जाती हैं। धौलीगंगा की एक सहायक नदी भी है। भूस्खलन द्वारा उनके अवरोध के बाद, इन छोटी छोटी नदियों में, अचानक आई बाढ़ के कारण, ये धाराएँ पहले से ही,  विनाश फैलाने के लिए जानी जाती हैं। ताजे हालिया उपग्रह डेटा से पता चलता है कि, पर्वतीय धाराओं ने अपने मार्ग को बदल दिया है और अन्य छोटी छोटी शाखाओं में बढ़ने लगी है, जो पहले से ही कमजोर बेल्ट की ढलान अस्थिरता के कारण, भू धंसाव को और बढ़ा देती हैं। नदियों के प्रवाह मार्ग का यह महत्वपूर्ण परिवर्तन, वर्षा के प्रभाव का प्रमाण है। 

जोशीमठ टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह एक फॉल्ट लाइन पर है। वैकृत थ्रस्ट (वीटी) नामक एक भूगर्भीय फॉल्ट लाइन, जोशीमठ को लगभग छूती हुई गुजरती है।  इसके अतिरिक्त, मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) और पांडुकेश्वर थ्रस्ट (PT), दो प्रमुख भूवैज्ञानिक फॉल्ट लाइन, भी अपेक्षाकृत रूप से, शहर के पास से गुजरती हैं। जोशीमठ गांव को एमसीटी पर किसी भी टेक्टोनिक  गतिविधियों के प्रभाव क्षेत्र के भीतर, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा रखा गया है और इन भूगर्भीय गतिविधियों पर निरंतर भूगर्भ वैज्ञानिक शोध और सर्वे करते रहते हैं। क्योंकि यह सभी फॉल्ट लाइन, जोशीमठ शहर के दक्षिण में एक छोटे से शहर हेलंग के नीचे से गुजरती है, जो, गढ़वाल समूह की चट्टानों के साथ जुड़ा हुआ है।

शहर के डूबने का एक संभावित कारण, सतह से पानी का बढ़ता जमीनी रिसाव भी है। ऐसा विशेषज्ञों और यूएसडीएमए द्वारा पहले ही उजागर किया जा चुका था। लेकिन मानवजनित,  सतह-स्तर की गतिविधियों ने प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों को बाधित कर दिया, जिससे पानी के प्रवाह ने, वैकल्पिक जल निकासी मार्गों की तलाश कर नए रास्ते बना लिये। इसका भी असर भू क्षरण पर पड़ा और अब भी पड़ रहा है। इसके अलावा, जोशीमठ शहर में सीवेज या अपशिष्ट जल निपटान प्रणाली नहीं है। अनियंत्रित जल रिसाव, बेलगाम निर्माण के अत्यधिक बोझ से दबी, मिट्टी की भार वहन शक्ति को कमजोर कर देता है। जोशीमठ के सुनील गांव के आसपास के क्षेत्र में यह देखा गया है कि, जमीन धंसने के कारण पानी की रेखाएं और चौड़ी होकर एक या कई विवर बना रही हैं। 

मुख्य रूप से जोशीमठ के बारे में कमेटी का मंतव्य यह था कि,  एक प्राचीन भूस्खलन से बने पहाड़ पर स्थित है, जिसका आधार, रेत और पत्थर का जमाव है, न कि किसी ठोस चट्टानी भूभाग पर। अलकनंदा नदी के किनारे और उससे लगे उठते हुए, पहाड़ी को पर शहर स्थित है। अलकनंदा और धौली गंगा नदियों के किनारे पर अक्सर भूस्खलन होता रहता है।"
वर्ष 1976 की मिश्रा समिति की रिपोर्ट ने साफ साफ  बताया था कि, “जोशीमठ रेत और पत्थर का एक जमाव है - यह शहर किसी बड़ी ठोस पहाड़ की चट्टानों पर नहीं टिका है, इसलिए यह, इलाका, एक टाउनशिप के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है। ब्लास्टिंग, सड़कों पर, भारी ट्रैफिक आदि द्वारा उत्पादित कंपन के कारण, भूमि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और भूगर्भीय तरंगों से, धरती के खिसकने या धंसने का खतरा बढ़ जाता है। उचित जल निकासी सुविधाओं का अभाव भी भूस्खलन की गति को बढ़ाता है। 

पानी को सोख लेने के लिए बने प्राकृतिक गड्ढे, जो पानी को धीरे-धीरे जमीन में उतरने का मार्ग देते हैं, वे,  मिट्टी और बोल्डर के बीच, बन जाने वाले भूगर्भीय गुहाओं का निर्माण करके खोखलापन बढ़ा देते हैं। इससे पानी का रिसाव और मिट्टी का क्षरण होने लगता है।"
कमेटी ने तब यह सुझाव भी दिया था कि, 
० भारी निर्माण पर प्रतिबंध लगाया जाय। 
० मिट्टी की भार-वहन क्षमता और साइट की स्थिरता की जांच करने के बाद ही निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए, और 
० ढलानों की खुदाई पर प्रतिबंध भी लगाया जाना चाहिए।

 (विजय शंकर सिंह)

Friday, 6 January 2023

जगदीश्वर चतुर्वेदी / कमलेश्वर के जन्मदिन पर उनके विचारों पर एक चर्चा.

उन्होंने हिंदी के माहौल पर लिखा है - "हिंदी में रिश्तों और दोस्तियों से रचना का महत्व तय नहीं होता था,बल्कि 'रचना' से दोस्तियों का निर्माण होता था।" 
इन दिनों दिल्ली में मामला उलट गया है। अब दोस्ती से रचना मूल्य तय होता है। नकली प्रशंसाएं छपती हैं। फेसबुक और बाजार ऐसी रचनाओं और उनकी प्रशंसाओं से भरा पड़ा है। हिंदी लेखकों में फ़िल्म जगत को हेय दृष्टि से देखने वालों की संख्या बहुत है। इस पर कमलेश्वर ने लिखा - " फिल्मों और फिल्मी लेखन को मैंने कभी हेय दृष्टि से नहीं देखा। मैं मानता था और मानता हूँ कि अपनी 70 प्रतिशत निरक्षर आबादी तक पहुँचने का माध्यम टेलीविजन, रेडियो और फिल्में ही हैं। मेरे साहित्यकार साथी अपनी जिद के कारण इन माध्यमों की उपेक्षा बड़ी लालची मानसिकता से करते रहे हैं। वे इन संचार माध्यमों से सघन अवैध रिश्ता तो चाहते रहे हैं ,परन्तु वैध रिश्ता बनाने से दूर भागते रहे हैं। उनमें इतना साहस ही नहीं कि वे इस रिश्ते को मंजूर कर सकें।" 
हिन्दीलेखकों का अभी यह रवैय्या बरकरार है।

कमलेश्वर ने अपने जीवन के सबसे कठिन क्षणों का वर्णन करते हुए कैसर साहब का एक शेर उद्धृत किया है। शेर है- 
हम अपनी जिंदगी को कहाँ तक सँभालते,
इस कीमती किताब का कागज़ खराब था।।
कमलेश्वर के औरतों के बारे में लिखे विचार बहुत महत्वपूर्ण हैं, लिखा, "यह एक अत्यन्त क्रूर सत्य है कि आदमी कभी भी औरत को उसके आहत अतीत से बाहर नहीं आने देता।आदमी उदार और आधुनिक होने का मुखौटा ज़रूर लगाये रहता है परंतु जब उसकी कुण्ठा ग्रँथियाँ जाग्रत होती हैं तो वह हमेशा औरत को उसके अतीत में अपमानित करता है।"

कमलेश्वर ने यह भी लिखा है- " किसी औरत के व्यक्तिगत और जीवनगत रहस्यों को जानना बहुत खतरनाक साबित होता है। वह दुनिया को माफ कर देती है पर उसे नहीं जो उसके रहस्य जानता है। रहस्य जानने वाला मित्र उस औरत का सतत अमित्र बन जाता है।"

कमलेश्वर ने साहित्य और लेखक पर भारत विभाजन के असर के बारे में लिखा है - "विभाजन मात्र एक मानवीय कत्ले-आम का भयावह दौर नहीं था, इसने मनुष्य की आंतरिक दुनिया को भी बदल दिया था। निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों से आने वाले लेखकों-कवियों के भीतर की दैहिक जड़ता टूट रही थी। उनके सौंदर्य के प्रतिमान बदल रहे थे ।जिंदगी कुछ ज्यादा ही मांसल हो रही थी और दैहिक नैतिकता और संबंधों के शाश्वत आवेग परिवर्तित हो रहे थे। इस दौर के लोग घर-परिवार की अदृश्य बेड़ियों से अभी भी बंधे थे,पर उनके मन की सर्प-गाँठ खुल चुकी थी।"

० कितने पाकिस्तान / कमलेश्वर के कुछ अंश ~

कितना लम्बा सफर है! और यह भी समझ नहीं आता कि यह पाकिस्तान बार-बार आड़े क्यों आता रहा है। सलीमा! मैंने कुछ बिगाड़ा तो नहीं तेरा...तब तूने क्यों अपने को बिगाड़ लिया? तू हंसती है...पर मैं जानता हूं, तेरी इस हंसी में जहर बुझे तीर हैं। यह मेहंदी के फूल नहीं हैं सलीमा, जो सिर्फ हवा के साथ महकते हैं।

हवा ! हंसी आती है इस हवा को सोचकर। तूने ही तो कहा था कि मुझे हवा लग गयी है। याद है उन दिनों की?
तुम्हें सब याद है। औरतें कुछ नहीं भूलतीं, सिर्फ जाहिर करती हैं कि भूल गयी हैं। वे ऐसा न करें तो जीना मुश्किल हो जाए। तुम्हें औरत या सलीमा कहते भी मुझे अटपटा लगता है। बन्नो कहने को दिल करता है। वही बन्नो जो मेहंदी के फूलों की खुशबू मिली रहती थी। जब मेरी नाक के पास मेहंदी के फूल लाकर तुम मुंह से उन्हें फूंका करती थीं कि महक उड़ने लगे और कहा करती थीं''इनकी महक तभी उड़ती है जब हवा चलती है...''

सच पूछो तो मुझे वही हवा लग गयी। वही हवा, बन्नो! पर अब तुम्हें बन्नो कहते मन झिझकता है। पता नहीं खुद तुम्हें यह नाम बर्दाश्त होगा या नहीं। और अब इस नाम में रखा भी क्या है।

मेरा मन हुआ था कि उस रात मैं सीढ़ियों से फिर ऊपर चढ़ जाऊं और तुमसे कुछ पूछूं ,कुछ याद दिलाऊं। पर ऐसा क्या था जो तुम्हें याद नहीं होगा!

ओफ! मालूम नहीं कितने पाकिस्तान बन गये एक पाकिस्तान बनने के साथ-साथ। कहां-कहां, कैसे-कैसे, सब बातें उलझकर रह गयी। सुलझा तो कुछ भी नहीं।

वह रात भी वैसी ही थी। पता नहीं पिछवाड़े का पीपल बोला था या बदरू मियां''कादिर मिया/!...बन गया साला पाकिस्तान...भैयन, अब बन गया पूरा पाकिस्तान...''

कितनी डरावनी थी वह चांदनी रात नीचे आंगन में तुम्हीं पड़ी थीं बन्नो...चांदनी में दूध-नहायी और पिछवाड़े पीपल खड़खड़ा रहा था और बदरू मियां की आवांज जैसे पाताल से आ रही थी''कादिर मियां!...बन गया साला पाकिस्तान...''

दोस्त! इस लम्बे सफर के तीन पड़ाव हैंपहला, जब मुझे बन्नो के मेहंदी के फूलों की हवा लग गयी थी, दूसराजब इस चांदनी रात में मैंने पहली बार बन्नो को नंगा देखा था और तीसरा तब, जब उस कमरे की चौखट पर बन्नो हाथ रखे खड़ी थी और पूछ रही थी''और है कोई?''
हां था। कोई और भी था।...कोई।
बन्नो, एक थरथराते अन्धे क्षण के बाद हंसी क्यों थीं? मैंने क्या बिगाड़ा था तेरा ! तू किससे बदला ले रही थी? मुझसे? मुनीर से? या पाकिस्तान से? या किसे जलील कर रही थी मुझे, अपने को, मुनीर को या...

पाकिस्तान हमारे बीच बार-बार आ जाता है। यह हमारे या तुम्हारे लिए कोई मुल्क नहीं है, एक दुखद सचाई का नाम है। वह चीज या वजह जो हमें ज्यादा दूर करती है, जो हमारी बातों के बीच एक सन्नाटे की तरह आ जाती है। जो तुम्हारे घरवालों, रिश्तेदारों या धर्मवालों के प्रति दूसरों के एहसास की गहराई को उथला कर देती है। तब उन दूसरों को उनके इस कोई के दुख उतने बड़े नहीं लगते जितने वे होते हैं, उनकी खुशी उतनी खुशी नहीं लगती जितनी वह होती है। कहीं कुछ कम हो जाता है। एहसास की कुछ ऐसी ही आ गयी कमी का नाम शायद पाकिस्तान हैयानी मेहंदी के फूल हों, पर हवा न चले, या कोई फूँक मारकर उनमें गन्ध न पैदा करे। जैसे कि फूल हों, रंग न हो। रंग हो गन्ध न हो। गन्ध हो, हवा न हो। यानी एहसास की रुकी हुई हवा ही पाकिस्तान हो।

सुनो, अगर ऐसा न होता तो मुझे चुनार छोड़कर दरवेश क्यों बनना पड़ता? वही चुनार जहां मेहंदी फूलती थी। मिशन स्कूल के अहाते के पास जहां से हम गंगा घाट के पीपल तले आते थे और राजा भरथरी के किले की टूटी दीवार पर बैठकर इमलियां खाया करते थे।
वह शाम मुझे अच्छी तरह याद है जब कम्पाउंडर जामिन अली ने आकर दादा से कहा था''और तो कुछ नहीं है, पर लोग मानेंगे नहीं। मंगल को कुछ दिनों के लिए कहीं बांजार भेज दीजिए। यहां रहेगा तो बन्नो वाली बात बार-बार उखड़ेगी। शादी तो नहीं हो पाएगी, दंगा हो जाएगा।''

तुम नहीं सोच सकते कि सुनकर मुझपर क्या बीती थी! चुनार छोड़ दूं ,फिर छूट ही गया...कैसी होती थीं चुनार की रातें...गंगा का पानी। काशी जाती नावें। भरथरी के किले की सूनी दीवारें और गंगा के किनारे चुंगी की वह कोठरी जिसमें छप्पर में बैठकर मैं बन्नो के आने-जाने का अन्दांज लगाया करता था। नालियों की धार से फटी जमीन वाली वे गलियां जिनसे बन्नो बार-बार गंगा-किनारे आने की कोशिश करती थी और आ नहीं पाती थी। 

इन्तंजार...इन्तंजार...
हमें तो यह भी पता नहीं चला था कि कब हम बड़े मान लिये गये थे। कब हमारा सहज मिलना-जुलना एकाएक बड़ी-बड़ी बातों को बायस बन गया था।
बस्ती में तनाव पैदा हो जाएगा, इसका तो अन्दाज तक नहीं था। यह कैसे और क्यों हुआ, बन्नो? पर तुम्हें भी क्या मालूम होगा। फिर हमने बात ही कहां की?

तीनों पड़ाव ऐसे ही गुजर गयेकहीं रुककर हम बात भी नहीं कर पाए। न तब, जब मेहंदी के फूलों की हवा लगी थी; न तब, जब उस चांदनी रात में तुम्हें पहली बार नंगा देखा था; और न तब, जब चौखट पर हाथ रखे तुम पूछ रही थींऔर है कोई!

मेहंदी के फूल
चुनार! मेरा घर, तुम्हारा घर! मेरे घर से गुजरती थी ईंटोंवाली गलीजो शहर-बांजार को जाती थी। जो गंगा के किनारे-किनारे चलकर भरथरी महाराज के किले के बड़े फाटक तक पहुँचती थी।
जहां से सड़क किले की ओर मुड़ती थी, वहीं थी चुंगी। गंगा-घाट पर लगने वाली नावों से उतरे सामान पर महसूल लगता था। मछली, केंकड़े, कछुए आते थे, मौसम में उस पार से आम भी आते थे। चुंगी वाले मुंशीजी दिन-भर रामनाम जपते और महसूल के बदले में जिंस लेते रहते थे। वे दिन में दस बार पीपल तले के महादेव को गंगाजल चढ़ाते थे और छप्पर में बैठकर तीन-चार लड़कों को पढ़ाया करते थे।

चुंगी के पास कोहनी जैसा मोड़ था, बाई तरफ खरंजों की सड़क किले को जाती थी, दाई तरफ से आकर जो सड़क मिलती थी, वह कच्ची थी। उस कच्ची सड़क पर नालियों ने रास्ते बना लिए थे, जिनका पानी गंगाघाट की रेत में सूखता रहता। इसी कच्ची सड़क पर कई गलियां नालियों के साथ-साथ उतरती थींबहते पानी से कटी-फटी गलियां! यही गलियां बन्नो की गलियां थीं।

जहां बन्नो की गलियां खत्म होती थीं, वहां से पथरीली सड़क मिशन स्कूल तक जाती थी जो अंग्रेजों की पुरानी कोठी थी। यहीं पर थी मेहंदी की बाड़ और 

धतूरों का मैदान।
इस धतूरे के मैदान ने मुझे बड़ा दुख दिया था। जब बस्ती में मुझे और बन्नो को लेकर तनाव पैदा हो गया था तो एक बार बन्नो जैसे-तैसे चुंगी तक आयी और बोली थी''मौलवी साहब के साथ वाले अगर ज्यादा बदमाशी देंगे मंगल, तो मैं धतूरे खाकर सो जाऊंगी। तुम शहर छोड़कर मत जाना .तुमने शहर छोड़ा तो गंगाजी यहां हैं, सोच लेना...।''

ज्यादा बात नहीं हो पाई थी। वह चली गयी थी। मैं कुछ बता भी नहीं पाया था कि मेरे घर में क्या कोहराम मचा हुआ है, कि कैसे रोज बांजार में दादा जी को वे लोग धमकियां दे रहे थे जिन्हें वे पहचानते तक नहीं थे। सभी को डर था कि कहीं किसी दिन मेरी हत्या न कर दी जाए या रात-बिरात कहीं मुसलमान घर में न घुस पड़ें।

पाकिस्तान तो बन चुका था बन्नो, उसके बाद भी तुम्हारे अब्बा भरथरीनामा लिख रहे थे
माता जी पिछले तप से नृप बना, अब नृप से बनूं फकीर।
आंखिर वंक्त वंफात के, हर होंगे दिलगीर॥
तेरे अपनी खल्क सुपुर्द करी उनके सिर पर सर गरदान किया।
बर्बाद सब सल्तनत करी बन जोगी मुल्क वीरान किया।

लोग कहते थे ड्रिल मास्टर का दिमांग बिगड़ गया है जो भरथरी-नामा लिख रहे हैं। यह तुरक नहीं है, यहीं का कोई काछी-कहार है। तभी हमें पता चला था कि मुसलमान वही है जो ईरानी-तूरानी है, यहां का मुसलमान भी मुसलमान नहीं है...ड्रिल मास्टर साहब को सबने अलग-सा कर दिया था, पर उन्हीं की बन्नो की बात लेकर सब खड़े हो गये थे। जैसे वे ज्यादा बड़े सरपरस्त थे।

तुम्हें नहीं मालूम, पर मुझे मालूम है बन्नो, ड्रिल मास्टर साहब ने कुछ भी नहीं कहा था, इसके सिवा कि जो मौलवी साहब और बाकी लोग ठीक समझें, वही ठीक होगा। वे खुद कुछ सोच ही नहीं पा रहे थे। एक दिन छिपकर आये थे और दादाजी के पास रो पडे थे। उस दिन के बाद वे भरथरीनामा तो लिखते रहे थे पर किसी को सुनाने की हिम्मत नहीं करते थे। वे लिखते रहे, इसका पता मुझे वक्त मिला था जब घरवालों की घबराहट और खुद कुछ न समझे पाने, तय न कर पाने के कारण मैं शहर छोड़ रहा था और चुंगी वाले मुंशीजी ने मुझे चुपचाप विदाई देते-देते एक पुरजा मेरे पसीने से तर हाथ में थमा दिया था।

वह रात बहुत डरावनी थी। बस्ती पर काल मंडरा रहा था। सब दहशत के मारे हुए थे। पता नहीं कब क्या हो जाए। कब 'या अली, या अली' की आवांजें उठने लगें और खूनंखराबा हो जाए। गंगा भी उस दिन घहरा रही थी। तट का पीपल भी अशान्त था। बहुत तेज हवा थी। किला सायं-सायं कर रहा था और पांच-सात हिन्दुओं के साथ हां, कहना पड़ता है बन्नो, हिन्दुओं के साथ दादा मुझे स्टेशन छोड़ने आ रहे थे ताकि मैं जिऊं-जागूं...कहीं भी परदेस में रहकर। पहले सोचा गया कि मामा के यहां जौनपुर चला जाऊं और वहां रेलवे वर्कशाप, कुर्ला, में काम कर रहे मौसा के पास रहूं वहीं नौकरी ढूंढ़ लूं।

कैसी थी वह रात, बन्नो ! और कितना बेइंज्जत होकर मैं निकल रहा था। दिमांग में हजारों हथौड़े बज रहे थे। एक मन करता था कि लौट पडूं, घर से गंडासा उठाऊं और तुम्हारे 'उन मुसलमानों' पर टूट पडूं। खून की होली खेलकर तुम्हें जीतूं और न जीत पाऊं तो तुम्हें भी मारकर गंगा में जल-समाधि ले लूं।

पर कहीं दहशत भी होता था और यह खयाल भी आता था कि ड्रिल मास्टर साहब ने तो कुछ भी नहीं कहा है। मुंखालंफत भी नहीं कि है...सिवा इसके कि वे चुप रह गये हैं, उन्हें भरथरीनामा लिखना है। अब लगता है कि वे भरथरीनामा न लिख रहे होते तो शायद इतना विरोध न होता...

शहर को साँप सूंघ गया था। दादा को बता दिया था कि अगली सुबह मेरी शक्ल न दिखाई दे। आधी रात तक सोचना-विचारना चलता रहा, फिर आखिरी गाड़ी रह गयी थी पार्सल, जो मुगलराय जाती थी।

हां, पांच-सात हिन्दुओं के साथ मुझे स्टेशन तक पहुंचाया गया। हम बाजार वाली सड़क से भी नहीं आये। किले वाले सुनसान रास्ते से स्टेशन की सड़क पकड़ी थी। मुंशी जी लालटेन लिए पक्की सड़क तक आये थे। और तभी वह पुरजा उन्होंने पसीजी हथेली में थमा दिया था। वहां तो रोशनी थी नहीं। स्टेशन पर सब साथ थे। पार्सल ढाई बजे रात को छूटी थी। दादा जी कितने परेशान-बेहाल थे। सब बहुत डरे हुए, अपमानित, और शायद इसीलिए बहुत खूंख्वार भी हो रहे थे। लग रहा था कि मुझे शहर से हटा देने के बाद दंगा जरूर होगा। अब ये लौटकर जाने वाले हिन्दू दंगा करेंगे। ढलती रात में ये सोते हुए मुसलमानों को चीर-फाड़ डालेंगे। हिन्दू का हिन्दू होना भी कितना तकलींफदेह हैं बन्नो...यह होते ही कुछ कीमती घट जाता है।

बहुत तकलींफदेह थी वह विदाई। उतरती रात की हवा में खुनकी थी और स्टेशन पर पत्थर का फर्श काफी ठंडा था। सामने विंध्या की पहाड़ियां और ताड़ के पेड़ चुपचाप खड़े थे।

अब तुम्हें क्या बताऊं...क्या कभी सोचा था कि इस तरह मेरा घर छूट जाएगा? अपने शहर से बेइज्जत होकर कोई कहीं भी चैन नहीं पाता। मुझे वे गलियां याद आ रही थीं जिनमें बन्नो आने की कोशिश करती थी। मैं चुंगी पर बैठकर कितनी प्रतीक्षा करता था और जहां मेहंदी के फूल पड़े दिखाई देते थे, समझ लेता था कि बन्नो यहां तक आ पायी है। आगे नहीं बढ़ पायी। किसीने देख लिया होगा, टोका होगा या रोका होगा।

सच कहता हूं तुमसे, उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में शमशीर की तरह उतर गया था। लोगों के नाम बदल या अधूरे रह गये थे। बस्ती में हवा का बहना बन्द हो गया था। और लगा था कि बन्नो घिर गयी है। शर्म, डर, गुस्सा, आंसू, खून, बदहवासी, पागलपन, प्यार क्या-क्या उबल-धधक रहा था मेरे भीतर। सच कहूं तो यह सब होने के बाद अगर बन्नो मिल भी जाती तो कुछ नहीं होता। जो होना था, हो चुका था।
पार्सल गाड़ी में बैठकर वह पुरजा पढ़ा था। तुम्हारे पास वही कहने को था जो मास्टर साहब के पास था। उसी पुरजे से पता चला कि मास्टर साहब भरथरीनामा लिखते जा रहे हैं।

क्यों बनता दरवेश छोड़ दल लश्कर फौज रिसाले को।
क्यों बनखंड में रहता है तज गुल नरगिस गुललाले को॥
क्यों भगवा वेष बनाता है तज अतलस शाल दुशाले को।
क्यों दर-दर अलख जगाता है तज कामरु ढाके बंगाले को॥
क्यों हुआ सैदाई! छोड़ सब बादशाही॥
हां...सैदाई ही कह लो...अतलस 

शाल-दुशाले और नरगिस गुलेलालासब कुछ तो था सचमुच। नीम, आक, मेहंदी और धतूरे के फूल किस नरगिस से कम थे, बन्नो? पर उस पाकिस्तान का हम क्या करते?

गाड़ी चली आयी और मैं सचमुच दरवेश हो गया। फिर कभी घर लौटने का मोह नहीं हुआ।

मैं जानता था कि मास्टर साहब की सांस भी चुनार में घुट रही होगी। बन्नो की सांसों का कुछ पता नहीं था। बस, इतना-भर लगता था कि उसने गंगा में डूबकर जान नहीं दी होगी। वह होगी। रातों में किसी का बिस्तरा गर्म करती होगी। प्यार करती होगी। मार खाती होगी। जिनह को बर्दाश्त करती होगी। बीबी की तरह पूरी ईमानदारी से मन्नतें मानती होगी, मेहंदी रचाती होगी। बच्चों का गू-मूत करती होगी। सुखी होगी, पछताती होगी। सब भूल गयी होगी। जो नहीं भूल पायी होगीवह रुका हुआ वक्त उसका पाकिस्तान बन गया होगा। उसे सताने के लिए...

खैर बन्नो...जो हुआ सो हो गया। मैं मुगलसराय से इलाहाबाद आया और इलाहाबाद से बम्बई। कुर्ला की रेलवे वर्कशाप में मौसा ने कुछ काम दिला दिया। कुछ दिन वहीं गुजारे...फिर मै पूना चला गया। अस्पताल की लिंब फैक्टरी में, जहां लकड़ी के हाथ-पैर बनते हैं। मुझे मालूम था कि अब कोई भी चुनार नाम की जगह में जी नहीं पाएगा न मेरा घर, न तुम्हारा घर। पर यह पता नहीं था कि दादा इतनी दूर चले आएंगे और साथ में कई घरों को लेते आएंगे।

सच पूछो तो चुनार में रह ही क्या गया था? जब पाकिस्तान बन जाता है तो आदमी आधा रह जाता है। फसलें तबाह हो जाती हैं। गलियां सिकुड़ जाती हैं और आसमान कट-फट जाता है। बादल रीत जाते हैं और हवाएं नहीं चलतीं, वे कैद हो जाती हैं।

दादा के खत से मालूम हुआ था, कई वर्ष बाद, कि कुछ घर जुलाहों-बढ़ई के साथ लेकर वे फसलों, गलियों, आसमान, बादल और हवा की तलाश में निकल पड़े थे और भिवंडी आ गये थे। यह नहीं मालूम था कि बन्नो का घर भी साथ आया था। ड्रिल मास्टर क्या करते आकर? यह मैंने भी सोचा था। दादा का आना तो ठीक था। वे सूती कपड़े का व्यापार करते थे। आठ घर मुसलमान जुलाहों, दो घर हिन्दू बढ़इयों को लेकर वे भिवंडी आ गये थे। पता नहीं शुरू-शुरू में उन्हें क्या परेशानी हुई।

बन्नो, तुम्हारे बारे में मुझे तब पता चला जब दादा एक बार मुझसे पूना मिलने आये। तब बहुत मामूली तरह से उन्होंने बताया था कि ड्रिल मास्टर साहब का घर भी आया है। उन्हें भिवंडी स्कूल में जगह मिल गयी है और यह भी कि उन्होंने बन्नो की शादी कर दी है। दामाद वहीं उनके साथ वाले मुहल्ले में रहता है, करधे चलाता है। रेशम का बढ़िया कारीगर है।
जिस तरह दादा ने यह खबर दी थी, उससे लग रहा था कि वे जान-बूझकर इसे मामूली बना देने की कोशिश कर रहे थे।

लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था बन्नो, कि बाजे मुहल्ले में दादा और तुम्हारा घर एक ही है कि ऊपर वे रहते हैं और तुम लोग नीचे। बाकी लोग बंगालपुरा और नई बस्ती में हैं। शायद मास्टर साहब पिछले पछतावे को भूल सकने के लिए ही ऐसा कर बैठे हों। मन तो बहुत हुआ कि जल्दी से जल्दी चलकर तुम्हें देख आऊं पर सच पूछो तो मन उखड़ा हुआ था। यह सब सुनकर और भी उखड़ गया था कि तुम भी वहीं हो और शादीशुदा हो। और फिर बातों-बातों में दादाजी ने घुमा-फिराकर यह भी कह दिया था कि मैं भिवंडी न आऊं तो बेहतर हैक्योंकि उन्हें मास्टर साहब का खयाल था। वे जानते थे कि मास्टर साहब ने कुछ नहीं किया था, और दादा जी उन्हें मेरी उपस्थिति से दु:खी या जलील नहीं करना चाहते थे। कितनी अजीब स्थिति थी यह...क्या यह नहीं हो सकता था कि घर ऐसा ही रहता और इसमें रहने को मुझे भी जगह मिलती?

मन में तरह-तरह के खयाल आते थे , दबा हुआ गुस्सा कहीं फूट पड़ा तो?
अगर मेरे भीतर का धधकता हुआ पाकिस्तान फट पड़ा तो? अगर मैंने तुम्हारे आदमी को तुम्हारे साथ न सोने दिया तो? अगर भिवंडी से उसे भी मैं उसी तरह निकाल सका, जैसे, कि कभी मैं निकाला गया था, तो? किसी रात मैं बर्दाश्त न कर पाया और तुम्हारे कमरे में घुस पड़ा तो?

मुझे मालूम है, दादा और मास्टर साहबदोनों एक-दूसरे को अपने मासूम होने का भरोसा दे रहे थे। पर मेरे पास क्या भरोसा था? उनका क्या बिगड़ा था ! बिगड़ा तो मेरा था। मैं तभी से एक नकाब लगाये घूम रहा था। हाथों में दस्ताने पहने और कमर में खंजर दबाये।
लेकिन बन्नो, भिवंडी में भी दंगा हो गया। मेरी-तुम्हारी वजह से नहीं उसी एहसास की कमी की वजह से। सुना तो मैं सन्न रह गया। पता नहीं अब क्या हुआ होगा? पांच बरस पहले तो मैं वजह हो सकता था, पर अब तो मैं वहां नहीं था। गया तक नहीं था। इसी वजह से कि तुम दिखाई दोगी और मैं दंगा शुरू कर दूंगा।
पर तुम मुझे दिखाई दीं तो इस हालत में।
रात चांदनी थी और बन्नो नंगी थी
मैं जब भिवंडी पहुंचा तो दंगा खत्म हुए दस-बारह दिन हो चुके थे। घुसते ही बस्ती में जगह-जगह काले चकते दिखाई पड़ते थे। कुछ घर, फिर एक काला मैदान, फिर मकानों-घरों का एक सहमा हुआ झुंड और उसके बाद फिर एक काला मैदान। उड़ती हुई राख। आग और अंगारों की महक अब नहीं थी। पर राख की एक अलग महक होती है, बुझे हुए शोरे जैसी। कुछ तेंज खरैंदीजो नथुनों से होकर भीतर तक काट करती है।

सुनो, तुमने भी इस महक को जरूर महसूस किया होगा। ऐसा कौन है इस देश में जो राख की महक को न पहचानता हो। जब मैं एस. टी. स्टैंड (बस-अड्डे) पर उतरा, शाम हो रही थी। गश्ल से जो दहशत होता है वैसा कुछ नहीं था। वहां, जहां पर सिनेमा के पोस्टर लगे हुए हैं, दो-तीन पुलिसवाले बतियाते खड़े थे। बसें ंज्यादातर खाली थीं। वे चुपचाप खड़ी थीं। संगमनेर, अलीबाग, भीरवाड़ा या सिन्नर जानेवाली बसों की तो बात ही क्या, शिर्डी जाने वाला भी कोई नहीं था।

बस-अड्डे की टीन तले चार-पांच पुलिसवाले और दिखाई दिए, खानाबदोशों की तरह छोटी-सी गृहस्थी जमाये हुए। अगर उनकी बन्दूकें गन्नों के ढेर की तरह जमा न होतीं तो शायद यह भी नहीं मालूम पड़ता कि वे पुलिसवाले हैं।

दोनों सड़कें खाली थीं। डाकबंगले में जहां कलक्टर डेरा डाले पडे थे, कुछेक लोग चल-फिर रहे थे। थाना कल्याण जाने वाली टैक्सियां भी नहीं थीं।

दंगाग्रस्त इलाकों से गुजरना कैसा लगता है, शायद इसका भी अन्दांज तुम्हें हो, मुझे बहुत नहीं था। एक खास किस्म का सन्नाटा...या टपकन। वीरान रास्ते और साफ-साफ दिखाई देनेवाले खालीपन। कोई देखकर भी नहीं देखता। देखता है तो गौर से देखता है पर बिना किसी इनसानी रिश्ते के। यह क्यों हो जाता है? एहसास इतना क्यों मर जाता है? या कि भरोसा इतना ज्यादा टूट जाता है।
इतने छोटे-से कस्बे में बाजे मोहल्ले का पता पूछना भी दुश्वार हो गया। खैर, जैसे-तैसे मोहल्ला मिला। घर भी मिला पर उसमें सन्नाटा छाया हुआ था। हिन्दुओं ने यह क्या कर डाला थाक्या इतने सन्नाटे में कोई इनसान रह सकता है।

मुझे मालूम था बन्नो, ड्रिल मास्टर साहब, तुम्हारा शौहर मुनीर सब यहीं होंगे। मेरे घरवाले भी होंगे। पर ऊपर के खंड में अंधेरा था। चांदनी रात न होती तो मैं घबरा ही जाता।

सचमुच, एक क्षण के लिए लगा कि अगर मैंने चुनार न छोड़ दिया होता, तो उसकी भी यही दशा होती। फिर बन्नो, तुम्हारा खयाल आया। कैसे तुम्हारे सामने पडूंगा। सारा खौलता हुआ खून ठंडा पड़ गया था। मैं जैसे चुनार की उन्हीं गलियों में आ गया था उसी उम्र के साथ।

घर का दरवाजा खुला था। मैंने आहिस्ता से भीतर कदम रखा। एक आंगन-सा। आंगन के एक कोने में दो-एक घड़े रखे थे। उन्हीं के पास दो सुरमई छायाएं थीं। दोनों औरतें थी। एक औरत कमर तक नंगी थी। दूसरी उसी के पास बैठी बार-बार उसके गले तक हाथ ले जाती थी और नंगी छातियों से कमर तक लाती थी। पता नहीं क्या कर रही थी। पर एक औरत की नंगी पीठ दिखाई दे रही थी। वे दोनों औरतें वहां बैठी क्या कर रही थीं, मैं समझ नहीं पाया। सहमकर बाहर आ गया।

बाहर खड़ा था कि ड्रिल मास्टर साहब दिखाई दिये। उन्होंने एक मिनट बाद ही पहचान लिया। लेकिन उन्होंने आवभगत नहीं की। वे सोच ही नहीं पाये कि मुझे किस तरह लें! किस बरस के किस दिन से बात शुरू करें, किस रिश्ते से करें, कहां से करें। वे कुछ कहें इसके पहले ही मैंने उबार लिया, जैसे किसी अजनबी से मैंने पूछा हो, वैसे ही दादा जी के बारे में पूछ दिया।
''वो तो चुनार चले गये परसों!'' मास्टर साहब ने कहा।
''परसों...'' मैं और क्या कहता।
''हां, रुके नहीं। बहुत-से लोग वापस चले गये है।'' वे बोले।
और मैं उसी क्षण समझ गया कि सब बातों के बावजूद दादाजी शायद फिर भी चुनार लौट सकते थे पर मास्टर साहब नहीं। मास्टर साहब के चुनार छोड़ने का सबब वह नहीं था, जो दादाजी का या मेरा रहा होगा। उनका यहां चले आना वक्त का दिया हुआ वनवास था। और वक्त के दिए हुए वनवास से लौट सकना आसान नहीं होता। मुझे तो सिर्फ कुछ लोगों ने वनवास दिया था।

घरवाले वहां नहीं थे, इसलिए कुछ कह भी नहीं पा रहा था। दंगा-ग्रस्त शहरकहां पनाह मिल सकती थी? मास्टर साहब अपने घर टिका लें, यह हो नहीं सकता था।
''सब सामान वगैरह भी ले गये है...''
''नहीं, ज्यादा सामान तो यहीं है...'' वे बोले।
''ताला बन्द कर गये है?''
''हां, पर एक चाबी मेरे पास है।'' उन्होंने मुझे सकुचाते हुए सहारा दिया।
''मैं एक दिन रुक/गा, वैसे भी कल शाम चला जाना है।'' मैंने खामख्वाह कहा, क्योंकि कोई और चारा नहीं था। अजनबी बस्ती में रात पड़े मैं कहां जा सकताथा!
मुझे छोड़कर वे घर में घुस गये। एक मिनट बाद वे एक मोमबत्ती और चाबी लेकर आये और बगल के जीने से ऊपर चढ़ा ले गये। ताला खोलकर मुझे पकाड़ाते हुए बोले''खाना-वाना खाया है?''
''हां'' मैंने कहा और भीतर चला गया।
''कुछ ंजरूरत हो तो बता देना...'' वे बोले और नीचे चले गये। भरथरीनामा का शायर काफी समझदार था। 'बता देना'! यह नहीं कि मांग लेना।

बन्नो, कितनी विचित्र थी वह रात! तुम्हें मालूम भी नहीं था कि ऊपर मैं ही हूं। मास्टर साहब ने बताया या नहीं बताया, क्या मालूम। कुछ भी कह दिया होगा। सुबह-सुबह पुलिस न आती तो तुम्हें जिन्दगी-भर पता न चलता कि रात छत पर मंडराने वाली छाया कौन थी।

चारों तरफ सन्नाटा...सन्नाटा...
रात चांदनी थी। हवा बन्द थी। मैं सांस लेने या शायद बन्नो को देख सकने के लिए खुली छत पर खाट डालकर लेट गया था। कुछ देर आहट लेता रहा। शायद कोई आहट तुम्हारी हो बन्नो...पर फिर मन डूब गया। चाहे कितनी गर्मी हो पर औरत को तो आदमी के साथ ही लेटना पड़ता है।

पिछवाड़े वाला पीपल चांदनी में नहाया हुआ था। मैंने खाट ऐसी जगह डाल ली थी, जहां से आंगन में देख सकूं...पर जो कुछ देखा वह बहुत भयावना था।
दो खाटें आंगन में पड़ी थीं। एक पर अम्मी थी, दूसरी पर बन्नो! कितना अजीब लगा था बन्नो को लेटा हुआ देखकर...

चांदनी भर रही थी और बन्नो अपना ब्लाउज खोले, धोती कमर तक सरकाए नंगी पड़ी थी। उसकी नंगी छातियां पानी भरे गुब्बारे की तरह मचल रही थीं और वह अधमरी मछली की तरह आहिस्ता-आहिस्ता बिछल रही थी।
''आये अल्ला...'' यह बन्नो की आवांज थी।
''सो जा, सो जा !'' अम्मी बोली थी।
''ये फटे जा रहे हैं...'' बन्नो ने कहा और उसने अपनी दोनों छातियां कसकर दबा ली थीं जैसे उन्हें निचोड़ रही हो।
अम्मी उठकर बैठ गयीं''ला, मैं सूंत दूं!'' कहते हुए उन्होंने बन्नो की भरी छातियों को सूतना शुरू कर दिया था। दूध की छोटी-छोटी फुहारें बन्नो की छातियों से झर रही थी और वह हल्के-हल्के कराहती और सिसकारती थी। दूध की टूटी-टूटी फुहार, जैसे इत्र के फव्वारे में कुछ अटक गया हो। फिर दस-बीस बूंदें एकाएक भलभलाकर टपक पड़ती थीं। दो-चार बूंदें उसके पेट की सलवटों में समाकर पारे की तरह चमकती थीं। उसकी नाभि में भरा दूध बड़े मोती की तरह जगमगा रहा था।

अम्मी उसकी छातियों का दूध अपनी ओढ़नी के कोने से सुखाती और चार-छ: बार के बाद वहीं किनारे की पाली में कोना निचोड़ देती थी। मटमैली नाली में पनीले का दूध का पतला सांप कुछ दूर सरककर कहीं घुस जाता था।

ओह बन्नो! यह मैंने क्या देखा था? मैं दहशत के मारे सन्न रह गया था। सारा बदन पसीने से तर था। सिसकारियां और कराहटें और आसमान में लटकते दो डबडबाये स्तन! कुछ दहशत, कुछ उलझन, कुछ बेहद गलत देख लेने को गहरा पछतावा...।

बहुत रात गये मैं छत पर टहलता रहा। जब नीचे शान्ति हो गयी और मैंने देख लिया कि बन्नो धोती का पल्ला छाती पर डालकर लेट गयी है, तब मैं भी लेट गया। यह कैसा दृश्य था? आसमान में जगह-जगह दूध-भरी छातियां लटकी हुई थीं...इधर-उधर...।

आंख लगी ही थी कि एकाएक पिछवाडे ख़ड़खड़ाहट हुई। कोई रो रहा था और नाक पोंछते हुए कह रहा था''कादिर मियां! बन गया साला पाकिस्तान ! भैयन, अब बन गया पूरा पाकिस्तान...।''
फिर रोना रुक गया था। कुछ देर बाद वही आवांज फिर आयी थी''कादिर मियां, अब यहीं इहराम बांधेंगे और तलबिया कहेंगे! अपना हज्ज तो हो गया, समझे कादिर मियां!''

अगर पिछवाड़े पीपल न होता तो शायद पाताल से आती यह आवांज सुनकर मैं भाग जाता। पर अब तो खुली आंखों को तरह-तरह के दृश्य दिखाई दे रहे थेआसमान से गिरता खून, अंधेरे में भागती हुई लाशें, बीच बांजार खड़े हुए धड़ और कटी गर्दनों से फूटते हुए फव्वारे। लपटों में नंगे नाचते हुए लोग...।
पीपल न खड़खड़ाता तो मैं बहुत डर जाता। उसके पत्तों की आवांज ऐसे आ रही थी जैसे अस्पताल के दफ्तर में बैठे हुए टाइप बाबू अपनी मशीन पर कुछ छाप रहे हों...बस यही आवांज जानी-पहचानी थी। बाकी सब बहुत भयानक था।

सुबह माथा बेतरह भारी था। आंखों में जलन थी। हाथ-पैर सुन्न थे। उठना पड़ा, क्योंकि पुलिस आयी थी। मास्टर साहब ने आकर जगाया था। वे डरे हुए थे। बोले''पुलिस तुम्हें पूछ रही है...।''
''क्यों?''
''बाहरवाले की तहकीकात करती है। हमसे पूछ रहे थे रात कौन आया है, कहां से आया है, क्यों आया है?''
सुनते ही मेरे आग लग गयी थी। तुम्हीं बताओ, जब मैं घर से उस अंधेरी रात में निकला या निकाला गया था तो कोई पूछने आया था कि इस रात में कौन जा रहा है, कहां जा रहा है, क्यों जा रहा है?''
पूरे आदमी को न समझना, सिर्फ उसके एक वक्ती हिस्से को समझना ही तो पाकिस्तान है बन्नो! जब पुलिस मुझे सुबह-सुबह जगाकर थाने ले गयी तो मैं समझ गया कि अब हम और तुम दोनों पाकिस्तान में घिर गये है...पर यह घिर जाना कितना दु:खद था!

थाने पर मेरी तहकीकात हुई। मैं यहां क्यों आया हूं? क्या बताता मैं उन्हें? आदमी कहीं क्यों आता-जाता है? पुलिस वाले मुझे बहुत परेशान करते अगर मास्टर साहब वहां खुद न पहुंच गये होते। उन्होंने ही सारी तंफसील दी थी। उस वक्त उनका मुसलमान होना कारगर साबित हुआ था। पर मुझे लग रहा था कि उस मौजूदा माहौल में मास्टर साहब फिर तो वही गलती नहीं कर रहे थे जो उन्होंने भरथरीनामा शुरू करके की थी।

थाने में सवालों के जवाब देना आसान भी था और टेढ़ा भी। आखिर वहां से निकलकर हम सामने पड़े कटी लकड़ियों के ढ़ेर पर बैठ गये थे। मास्टर साहब चाहते थे कि मैं होश-हवास में आ जाऊं, क्योंकि मेरा रंग फक हो गया था।
वहीं तीन बत्ती के पास दो-तीन लोग और बैठे थे। शायद किसीकी जमानत या तफतीश के लिए आये थे। उनके चेहरे लटके हुए और ंगमंजदा थे। मौलाना की आंखों में खौंफ था। वे साथ बैठे लोगों को बता रहे थे''रसूल ने कहा है कि सूर तीन बार फूंका जाएगा। पहली बार फूंकेंगे तो लोग घबरा जाएंगे, सब पर खौंफ बरपा हो जाएगा। दूसरी बार जब सूर में फूंक मारी जाएंगी तो सब मर जाएंगे। तीसरी आवांज पर लोग जी उठेंगे और अपने रब के सामने पेश होने के लिए निकल आएंगे...यही होना है...सूर में अभी पहली बार फू/क मारी गयी।''
''भरथरीनामा लिख रहे है?'' मैंने पूछा।
''हां...भरमता मन मेरा, आज यहां रैन बसेरा!
कहो बात जल्द कटे रात, जल्द हो फंजर सबेरा!!...

कहते-कहते मास्टर साहब उधर देखने लगे जहां छत की सूनी मुंडेरों पर घास के पीले फूल खिले थे। घनी घास में से अबाबीलें छोटी मछलियों की तरह उछलती थीं। घास की टहनी से पीले फूल चोंच से तोड़कर उड़ती थीं। चोंच से फूल गिर जाते थे तो उड़ते-उड़ते फिर तोड़ती थीं...अबाबीलों का उड़ते-उड़ते या घनी घास में से उछलकर फूलों तक आना, पीले फूलों का तोड़ना, चकराते हुए फूलों का गिरना और अबाबीलों का दूर आसमान से फिर लौटकर आना...।
मास्टर साहब खामोशी से यही देख रहे थे। आखिर मैंने उन्हें टोका''कल रात...।''
''हां, वह बदरू है...पगला गया है। उसके चालीस करधे थे, जलकर राख हो गये। पिछवाड़े पीपल के नीचे ही तब से बैठा है। रात-भर रोता है। गालियां बकता है...'' मास्टर साहब बोले।

''घर में कुछ...'' मैंने बहुत हिम्मत करके कहा तो जोगी की तरह मास्टर साहब सब बता गये, ''हां...बन्नो को तकलीफ हैं। दंगे से तीन दिन पहले बच्चा हुआ था। डॉ. सारंग के जच्चा-बच्चा घर में थी। दंगाइयों ने वहां भी आग लगा दी। रास्ता रुंध गया तो जान बचाने के लिए दूसरी मंजिल से जच्चाओं को फेंका गया। बच्चों को फेंका गया। नौ जच्चा थीं। दो मर गयी। पांच बच्चे मर गये। बन्नो का बच्चा भी गली में गिरकर मर गया। उस वक्त मारकाट मची हुई थी। सवेरे हम बन्नो को जैसे-तैसे ले आये। अब उसके दूध उतरता है तो तकलीफ होती है...।''

कुछ देर खामोशी रही। अबाबीलें घास के फूल तोड़ रही थीं। उठने का बहाना खोजते हुए मैंने कहा, ''सोचता हूं, दोपहर ही पूना चला जाऊं...।''
''जा सको तो चुनार चले जाओ। अपने दादा को देख आओ...'' मास्टर साहब बोले।
''क्यों, उन्हें कुछ हो गया है क्या?''
''हां...उनकी एक बांह कट गयी है। घर के सामने ही मारकाट हुई।
वे न होते तो शायद हम लोग जिन्दा भी न बचते। हमला तो हम पर हुआ था। वे गली में उतर गये। तभी बांह पर वार हुआ। बायीं बांह कटकर अलग गिर पड़ी। लेकिन उनकी हिम्मत...अपनी ही कटी बा/ह को जमीन से उठाकर वे लड़ते रहे...खून की पिचकारी छूट रही थी। कटी बांह ही उनका हथियार थी...दंगाई तब आग के गोले फेंककर भाग गये। गली में उनकी बांह के चिथड़े पड़े थे। जब उठाया तो बेहोश थे। दाहिने हाथ में कटी बांह की कलाई तब भी जकड़ी हुई थी...पर उस खुदा का लाख-लाख शुक्र। थाना अस्पताल में मरहम-पट्टी हुई। आठ दिन बाद लौटे। दूसरे ही दिन चुनार चले गये...।''
''तो उनकी बांह का क्या हाल था?...'' मैं सुनकर सन्न रह गया था।
''ठीक था। चल-फिर सकते थे। कहते थे वहीं चुनार अस्पताल में यही करवाते रहेंगे। या खुदा...रहमकर...बेहतर हो देख आओ...'' मास्टर साहब ने कहा और अपने आंखें हथेलियों से ढांप लीं।
मेरी चेतना बुझ-सी रही थी। मैं किस जहान में था? ये लोग कौन थे, जिनके बीच मैं था? क्या ये जो कुछ लोग आदमियों की तरह दिखाई पड़ते थेसच थे या कोई खौफनाक सपना? अब तो कटा-फटा आदमी ही सच लगता था। पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होती थी।

..मैं फिर आकर कमरे में लेट गया था। मास्टर साहब भीतर चले गये थे। तभी नीचे से कुछ आवांजें आयी थीं। अम्मी...मास्टर साहब, बन्नो का आदमी मुनीर और बन्नो सभी थे। मुनीर कह रहा था, ''यहां रहने की जिद समझ में नहीं आती...''
''तुम्हारी समझ में नहीं आएगी।'' यह आवांज बन्नो की थी, ''हम तो पहले इसी धरती से अपना बच्चा लेंगे, जिसने खोया है। फिर जब जगह चले जाएंगे। जहां कहोगे...''
मैंने झांककर देखा। दुबला-पतला मुनीर गुस्से से कांप रहा था। चीखकर बोला, ''तो ले अपना बच्चा यहीं से...जिसने मन आए, ले।''
मैं सकते में आ गयाकहीं कुछ...कहीं इसमें मेरा जिक्र तो नहीं था...पर शायद में गलत समझा था। बन्नो भी बिफरकर बोली थी, ''तू अब क्या देगा बच्चा मुझे...। अपना खून बेच-बेचकर शराब पीने से फुर्सत है?...''
तड़ाक!...शायद मुनीर ने बन्नो को मारा था। छोटा-सा कोहराम मच गया था।
बाद में बन्नो मुनीर को कोसती रही थी, ''मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है। फिर रात-भर पड़ा कांपता रहता है...''
यह सब मैं क्या सुन रहा था, बन्नो! तेरे भीतर भी एक और पाकिस्तान रो रहा था। सभी तो अपने-अपने पाकिस्तान लिये हुए तड़प रहे हैं। आधे और अधूरे, कटे-फटे, अंग-भंग।

ओफ्फ ! कितना अंधेरा था उस चांदनी रात में...जब मैं भिवंडी से उसी तरह चला जैसे एक दिन चुनार से चला था। अड्डे से एक टैक्सी थाना जा रही थी। उसी में बैठ लिया था। जब तक बस्ती रही, काले मैदान भी बीच-बीच में नंजर आते रहे। राख की तेंज महक भीतर तक उतरती रही। आसमान में डबडबाए स्तन लटकते रहे। चौराहों पर खड़े मुंडहीन धड़ों से खून के फव्वारे छूटते रहे!
थाना! थाना से बस पकड़कर बम्बई। बम्बई से गाड़ी पकड़कर पूना और पूना में फिर कई दिन बुखार से तपता पड़ा रहा।

मैं सब कुछ भूल जाना चाहता था बन्नो...सिर्फ अपने में सिमट आना चाहता था। उम्र का यह संफर कितना बेहूदा है कि आदमी कटता-फटता जाता है। लहू-लुहान होकर चलता जाता है।
और ऐसे अकेलेपन में अगर कोई यह आवांज सुने कि 'और है कोई?' तो क्या बीत सकती है, इसका अन्दांज किसी को नहीं हो सकता। तुम्हें भी नहीं बन्नो!...
और है कोई?

चार या पांच महीने हो गये थे। दादाजी का ंखत मिल गया था कि वे फिर भिवण्डी लौट आए हैं। सिंधियों और मारवाड़ियों के कारण माल ंज्यादा नहीं मिल पाता इसलिए बांजार मन्दा है। सब करघे चल भी नहीं रहे हैं। एक बांह न रहने के कारण बदन का पासंग बिगड़ गया है। मजाक में उन्होंने यह भी लिखा था कि उनका नाम 'टोंटा' पड़ गया है।
बाकी कोई खबर उन्होंने नहीं दी थी सिवा इसके कि मुनीर बन्नो को लेकर बम्बई चला गया है। पता नहीं वे लोग बम्बई में है या पाकिस्तान चले गये। ड्रिल मास्टर नीम-पागल हो गये हैं। घर में ड्रिल करते हैं, स्कूल में कोई पोथी लिखतेरहतेहैं।

...उस दिन मैं बम्बई न आता तो तुमसे मुलाकात भी न होती, बन्नो ! और कितनी तकलींफदेह थी वह मुलाकात। बाद में मैं पछताता रहा कि काश, मैं ही होता उसकी जगह। तुमने भी क्या सोच होगा कि मैं यही सब करता हूं? पर सच कहूं बन्नो, करता तो मैं भी रहा हूं पर तुम्हारे साथ नहीं। शायद तुम्हारे कारण करता रहा हूं।

पूना का दोस्त नहीं था वह। वहीं बम्बई का था। उसका नाम केदार है। कुछ दिन पूना में साथ रहा था, तभी दोस्ती हुई। मैं भिवंडी जाने के लिए बम्बई आया था। बम्बई उतरकर मन उखड़ भी गया था कि क्या करूंगा वहां जाकर।

उस शाम से तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है बन्नो! वह शाम मैं और केदार साथ गुजारना चाहते थे। कुलावा के एक शराब घर में हमने थोड़ी-सी पी थी। फिर वहां से टहलते हुए हैंडलूम हाउस तक आये थे।

उसी के पास कोई गली थी। अब जाऊं तो पहचान तो लूंगा पर यों याद नहीं है। केदार और मैं दोनों उसी में चले गये। शायद आगे चलकर दाहिने को मुड़े थे। वहीं पर एक सिगरेटवाले की दुकान थी। नीचे कारें खड़ी थीं। लगता था वोहरा मुसलमानों की बस्ती है। बहुत शान्त, साफ-सुथरी।

उस बिल्डिग में लिफ्ट था। यों सीढ़ियां भी बहुत साफ-सुथरी थीं। केदार के साथ मैं सीढ़ियों से ही ऊपर गया था। पांच मंजिल तक चढ़ते-चढ़ते मेरी सांस फूल आयी थी। उस वक्त घरों की खिड़कियों से खाना बनाने की गन्ध आ रही थी। छठी मंजिल एकदम वीरान थी। जिस फ्लैट की घण्टी केदार ने बजायी थी वह उतना साफ-सुथरा नहीं लगा रहा था।

दरवांजा खुला और हम हिप्पो की तरह हांफते हुए एक सिंधी के सामने खड़े थे। वह हमें उस कमरे में ले गया जिसमें मामूली तरह के सोफे लगे हुए थे। वह सिंधी अब भी हांफ रहा था। लगता था ज्यादा बात करेगा तो अभी उसकी सांस उखड़ जाएगी और फिर कभी लौटकर नहीं आयेगी।

मुझे उलझन हो रही थी। मैं खुली हवा में सांस लेने के लिए खिड़की के पास खड़ा हो गया था। दूर-दूर तक गन्दी छतें नंजर आ रही थीं। तरह-तरह के आकारों की। मेरे बारे में केदार ने बता दिया था कि मैं वहीं सोफे पर बैठूंगा और इन्तंजार करूंगा। उस हांफते सिंधी ने कोकाकोला की एक बोतल मंगवाकर मेरे लिए रख दी और केदार को लेकर अपनी मेज के पास चला गया। वहां वह केदार को एक गुंजला हुआ काला बुर्का दिखा रहा था। कह क्या रहा था, यह वहां से सुनाई नहींपड़ा।

उसके बाद वे दोनों कहां गुम हो गये, कुछ पता नहीं चला। दो-एक मिनट बाद केदार के हंसने की आवांज बगल से आयी थी।

फिर केदार तो नहीं आया, वह सिंधी उसी तरह हांफता हुआ आया और जोर-जोर से सांस छोड़ता हुआ बोला, ''बिअर...'' बाकी शब्द उसके हांफने से ही साफ हो रहे थे''पिएंगे, मंगवाऊं?''
''पी लूंगा...'' मैंने कहा तो उसने लड़की को हांफकर दिखाया और वह बीयर ले आया। सिंधी ने नहीं पी। मैं ही बैठा पीता रहा।
''आप...'' वह उसी तरह हांफ रहा था, ''बम्बई...'' मतलब था''नहीं रहते...''
''नहीं, पूना रहता हूं।'' मैंने कहा।
''घूमने...'' वह फिर हांफा।
''काम से आया था...'' मैंने उसे बता दिया।
''बिजनेस...'' हांफना बदस्तूर था।
''नहीं पर्सनल काम था। भिवंडी जाऊंगा।''

फिर वह बैठा-बैठा तब तक हांफता रहा जब तक केदार सामने आकर नहीं खड़ा हुआ। उसे देखते ही सिंधी हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ। मुझे भी उलझन हो रही थी। मैं गिलास खत्म करके फौरन केदार के पास आ गया। हम तीनों बीच वाले बड़े कमरे में आ गये थे। केदार मेरी बीयर के पैसे दे ही रहा था कि बगल का दरवांजा खुला। मैंने इतना ही देखा कि एक औरत के हाथ ने केदार को उसका कन्घा और चाबियों का गुच्छा दिया और उस हाँफते हुए सिंधी के साथ मुझे खड़ा देखकर पूछा''और है कोई?''

मैंने पलटकर देखा दरवाजे की चौखट पर हाथ रखे पेटीकोट और ब्लाउज पहने तुम खड़ी थीं बन्नो! और पूछ रही थीं'और है कोई?'
हां! कोई...कोई और भी था।
एक थरथराते अन्धे क्षण के बाद तुमने भी पहचान लिया था और तब कैसी टेढ़ी मुस्काराहट आयी थी, तुम्हारे होठों पर...जहर बुझी मुस्कारहट। या वही घोर तिरस्कार की मुस्कराहट थी? या सहज...कुछ भी नहीं मालूम।
पता नहीं यह बदला तुम मुझसे ले रही थीं, अपने से, मुनीर से या पाकिस्तानसे? मैं सीढ़ियां उतर आया था। आगे-आगे मैं था, पीछे-पीछे केदार। मन हुआ था सीढ़ियां? चढ़ जाऊं और तुमसे पूछूं''बन्नो! क्या यही होना था? मेरा हश्र यही होना था?''

अब कौन-सा शहर है जिसे छोड़कर मैं भाग जाऊं? कहां-कहां भागता रहूं जहां पाकिस्तान न हो। जहां मैं पूरा होकर अपनी तमाम हसरतों और एहसासों को लेकर जी सकूं।
बन्नो! हर जगह पाकिस्तान है जो मुझे-तुम्हें आहत करता है, पीटता है। लगातार पीटता और जलील करता चला जा रहा है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी
(Jagadishwar Chaturvedi) 



सेठों के हुक्म पर, सरकार खाली करा रही है जमीन, अब तक अतिक्रमण से थी अनजान ? / विजय शंकर सिंह

हल्द्वानी में रेलवे जमीन पर अतिक्रमण हटाने के हाइकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है और यह कहा है कि पहले सरकार उनके पुनर्वास की व्यवस्था करे। रेलवे की हल्द्वानी ही नहीं देशभर में जहां जहां भी जमीनें हैं, वहां वहां उन पर अतिक्रमण है। यह अतिक्रमण, न केवल झुग्गी झोपड़ी वालों द्वारा, किया गया है बल्कि बेहद असरदार लोगों द्वारा भी रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण है। देश में सबसे अधिक जमीन रक्षा मंत्रालय के पास और उसके बाद रेलवे के पास है। अतिक्रमण चाहे किसी भी विभाग की जमीन पर हो, उसे वैध नहीं माना जा सकता और न ही उसे एक अच्छी प्रवृत्ति ही कहा जा सकता है। 

पर यहीं यह सवाल उठता है कि, ऐसी जमीनों को अतिक्रमण से बचाने के लिए रेलवे ने क्या कार्यवाही की है। जाहिर है यह अतिक्रमण एक दिन में नही हुआ है और न ही किसी एक अधिकारी के कार्यकाल में हुआ है। लेकिन जब भी ऐसे अतिक्रमण होने शुरू हुए होंगे तब निश्चय ही उसकी ओर रेलवे प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया और जमीनों पर अवैध कब्जे होते चले गए। रेलवे के पास अपना खुद का सुरक्षा बल आरपीएफ है,  राज्य सरकार की जीआरपी है जिसका आधा खर्च रेलवे उठाता है और राजस्व के भी अधिकारी कर्मचारी उनके पास होते हैं। रेलवे एक्ट में ऐसे प्राविधान भी हैं जो अतिक्रमण को रोक सकते हैं। जाहिर है ऐसे सरकारी तामझाम और कानून से, होने वाले अतिक्रमण को रोका जा सकता है। पर ऐसा क्यों नहीं किया गया। 

जब ब्रिटिश काल में रेलवे बन रही थी तो अंग्रेजों ने दूरदर्शिता से काम लिया और रेलवे के लिए जरूरत से अधिक जमीनें उन्होंने अधिग्रहित कर लीं। आज वह दूरदर्शिता काम आ रही है। रेलवे का विस्तार लगातार हो रहा है और नई नई रेलवे लाइनें, नए नए फ्रेट कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं, जिनके लिए जमीनें रेलवे, अधिग्रहित भी कर रही है। पर रेलवे की जो जमीने शहरों में हैं या शहरों के अंदर से गुजरती हुई और निष्प्रयोज्य हो रेलवे लाइनों के अगल बगल की जमीनें हैं, उन पर निश्चित रूप से अवैध कब्जे हैं और वे कब्जे कही कही तो पचास साल पुराने हैं। हल्द्वानी में रेलवे को अपने विस्तार के लिए जमीन चाहिए या कोई और उद्देश्य है यह तो रेलवे ही जानें पर जिस तरह से हाईकोर्ट ने, रातों रात, बिना पुनर्वास पर विचार किए, बेदखली का आदेश दे दिया था, वह एक अजीब आदेश था। यह एक अच्छी खबर है कि, सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी है। 

2014 के बाद, सरकारी संपदा और सरकारी कंपनियों के निजीकरण की जो नई नीति आई, उससे रेलवे भी नहीं बची। रेलवे के अन्य विभाग, धीरे धीरे निजी क्षेत्र को बेचे जा रहे है। यदि रेलवे में निजीकरण की गति धीमी है तो इसका कारण सरकार की निजीकरण के बारे में कोई पुनर्विचार नीति नहीं बल्कि पूंजीपतियों का उहापोह अधिक है। माल ढुलाई जो, रेलवे की आय का एक प्रमुख स्रोत है को भी निजी क्षेत्र को दिया जा रहा है। कुछ रेलवे लाइनों पर रेल गाडियां निजी क्षेत्रों की चलने भी लगी हैं। पर वे भी, किराया बढ़ाने और तमाम रियायतें खत्म करने के बाद भी या तो घाटे में हैं, या अपेक्षित लाभ सेठों को नहीं दे पा रही हैं। आगे आने वाले समय में जब रेलवे को केवल लाभ केंद्रित संस्था के रूप में देखा जायेगा तो इससे सबसे अधिक नुकसान गरीब जनता का होगा जिसके लिए रेलवे एक सुगम और सस्ती सवारी के रूप में बहुत पहले से रही है। हर साल पेश किए रेलवे बजट में होने वाली नई सवारी गाड़ियों की सूचना, उनके ठहराव के नए स्टेशन, यात्री सुविधाएं, आदि अब अतीत की बात रह गई है। रेलवे की सवारी गाडियां कभी भी लाभ के दृष्टिकोण से नहीं चलाई जाती रही है। उनका उद्देश्य ही जनकल्याण रहा है। यह जनता की मांग, उनकी आवश्यकता और हर इलाके को देश से जोड़ने के उद्देश्य से चलाई और बढाई जाती रही है। लेकिन माल ढुलाई की गाड़ियां लाभ देती रही हैं और अब भी दे रही हैं। रेलवे की कमाई का यही एक जरिया है। 

किसी भी पूंजीपति की निगाह सामान्य सवारी गाड़ी चलाने पर नही टिकती है क्योंकि उससे उन्हे कोई लाभ नहीं होगा और उसमें दिक्कतें अधिक होंगी। वे माल ढुलाई के काम में अधिक रुचि लेते हैं और इसमें, उनके निवेश का प्रतिफल उन्हे अच्छा मिलता है। आज सरकार के सबसे करीबी पूंजीपति अडानी समूह को, देश के बड़े बड़े एयरपोर्ट और बड़े बंदरगाह भी सरकार ने सौंप दिए हैं। लाभ कमाने वाली सरकारी कंपनी कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (कॉन्कोर) के भी निजीकरण की बात चल रही है। निश्चित ही जिस समूह के पास बंदरगाह होंगे उसके लिए कॉन्कॉर खरीदना, एक लाभ का सौदा होगा। अडानी समूह जिस गति से देश के बड़े बड़े एयरपोर्ट, बंदरगाह, कोयला खदानें आदि खरीद रहा है उसे इन सबको जोड़ने वाले रेलवे पर भी एकाधिकार चाहिए। यहीं यह सवाल उठता है कि, आखिर सरकार जिसके पास, एयरपोर्ट ऑथर्टी ऑफ इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, कॉन्कॉर, फ्रेट कॉरिडोर जैसे लाभ कमाने वाले बड़े बड़े इंफ्रा प्रतिष्ठान है उन्हे क्यों एक निजी समूह को बेचने जा रही है। आने वाले समय में यदि माल ढुलाई का सारा सरंजाम, किसी निजी समूह को सौंप दिया जाय तो हैरानी नही होगी। यह सरकार की निजीकरण या मुद्रीकरण की नीति नहीं है यह अपने चहेते पूंजीपतियों को सबकुछ बेच कर देश को उन खास पूंजीपतियो के रहमोकरम पर डाल देने का षडयंत्र है। 

पूंजीपतियों की निगाह, न केवल रेलवे की खाली जमीनों पर है, बल्कि उनकी नज़र, रक्षा संपदा, और अन्य सार्वजनिक कंपनियों की जमीनों पर भी है। सरकार उदारता से, उन्हे, उद्योगों के विकास के नाम पर, बेहद कम कीमत पर, कभी कभी तो, नाममात्र की दर पर, जमीने देती भी आई है। पर उन्हे तो जमीन बिलकुल खाली चाहिए, क्योंकि वे जानते हैं कि, अतिक्रमण खाली कराना उनके बस की बात नही है। रेलवे अपनी जमीन लीज पर पहले ही देती रही है, पर अब से तीन महीने पहले सितंबर के महीने में, सरकार ने, रेलवे की जमीन के लंबी अवधि के पट्टे पर, पूंजीपतियों को सौंपने के लिए कैबिनेट की मंजूरी से एक कानून पास किया था, जिसमें, शुल्क में 75% की कटौती का प्राविधान लाया गया। केंद्रीय कैबिनेट द्वारा, 7 सितंबर 2022 को 35 साल के लिए कार्गो से संबंधित परियोजनाओं की स्थापना के लिए रेलवे भूमि लाइसेंस शुल्क में तीन-चौथाई कटौती करने की मंजूरी दे दी गई। प्रति वर्ष, भूमि के बाजार मूल्य का 6% से 1.5% तक मूल्य रखा गया है जिसकी, अवधि रखी गई 35 साल। पांच साल से अचानक इसे 35 साल की अवधि के लिए बढ़ा दिया गया।

रेलवे भूमि नीति में इस बदलाव से अब राज्य के स्वामित्व वाली कंटेनर कॉर्पोरेशन इंडिया (कॉनकोर) में केंद्र की हिस्सेदारी की बिक्री में तेजी आएगी। उद्देश्य है सीसीआई को बेचना और इसे खरीदने की जुगत में है, अमीरी के शिखर पर तेजी से बढ़ते जा रहे सरकार के सबसे चहेते पूंजीपति, गौतम अडानी। उनके बेटे तो कॉन्कॉर को अपना मान ही बैठे हैं। इससे रणनीतिक खरीदारों को भूमि के किराये के रूप में बहुत कम राशि का भुगतान करने में मदद मिलेगी। यानी अरबों की रेलवे की जमीन, उन्हे कौड़ियों के भाव मिलेगी। कॉनकोर बेचने की सलाह देने वाले निवेश सलाहकारों के प्रमुख सुझावों में से यह एक सुझाव था। राजा को जैसा सुझाव पसंद आता है उसके सचिव ऐसे ही सुझाव पका सजा कर उसके सामने प्रस्तुत कर देते थे। उद्देश्य राजा का हित होता है न कि जनता का। 

इस कानून के पहले, ऐसे पट्टे केवल पांच साल के लिए ही मान्य होते थे। अब जमीन पांच साल के लिए कौन सेठ लेगा और 5 साल के लिए तो, उसने सरकार बनवाने में निवेश थोड़े ही कर रखा है। देश भर में, भारतीय रेलवे के पास लगभग 60,000 हेक्टेयर खाली भूमि है। मुख्य रूप से रेल पटरियों के साथ और कॉनकोर के पास लगभग 250 हेक्टेयर, देश भर में 26 स्थानों पर फैली हुई रेलवे की भूमि है। रेलवे की लीज नीति में बदलाव ऐसे समय में आया है, जब सरकार ने अगले पांच वर्षों में 300 नए कार्गो टर्मिनल विकसित करने का लक्ष्य रखा है। सरकार इन कार्गो टर्मिनल को विकसित तो करेगी पर क्या वह उनका संचालन भी करेगी या उसे भी सेठों को सौंप देगी। इसका उत्तर मंत्री महोदय के भी पास नहीं होगा। 

अधिकारियों ने कहा कि मौजूदा, जमीन लीज पर लेने वाले कॉर्पोरेट, सरकार को, 6% का भुगतान करना जारी रखेंगे, जब तक कि वे नई 1.5% आधार दर के लिए बोली प्रक्रिया में भाग लेने का निर्णय नहीं लेते।  "अगर वे बोली लगाने में भाग लेते हैं, तो उन्हें पहले इनकार करने का अधिकार होगा।  इसका अर्थ है कि यदि कोई अन्य बोलीदाता बेहतर शुल्क उद्धृत करता है, तो मौजूदा लाइसेंसधारी को उससे मिलान करने के लिए कहा जाएगा।  यदि वह इसका मिलान करने से इनकार करता है, तो अधिकतम बोली लगाने वाले को वह मिल जाएगा। ऐसा ”एक सूत्र ने कहा। मैं यहां इसे टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर से उद्धृत कर रहा हूं। 

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, "पीएम गतिशक्ति ढांचे" के लिए नई रेलवे भूमि नीति को मंजूरी मिलने से देश के लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर में कई गुना वृद्धि होगी।" 
सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि "300 कार्गो टर्मिनलों की स्थापना से लगभग 1.25 लाख रोजगार सृजित होंगे।" अनुराग ठाकुर ने कहा कि "कार्गो टर्मिनलों के लिए भूमि को पट्टे पर देने के अलावा, इन भूमि पार्सल का उपयोग सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मोड पर अस्पतालों और केंद्रीय विद्यालय संगठन के माध्यम से स्कूलों की स्थापना के लिए सामाजिक बुनियादी ढांचे की स्थापना के लिए भी किया जाएगा। इन मामलों में, भूमि लाइसेंस शुल्क मुश्किल से 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर प्रति वर्ष होगा।"
रेलवे की जमीन पर सोलर प्लांट लगाने के लिए शुल्क भी न्यूनतम होगा।  रेलवे पैनल को रेलवे ट्रैक के किनारे लगाया जा सकता है।

सरकार ने कहा कि नई नीति कम दर पर रेलवे भूमि प्रदान करके बिजली, गैस, पानी की आपूर्ति, सीवेज निपटान और शहरी परिवहन जैसी सार्वजनिक सेवा उपयोगिताओं के एकीकृत विकास के लिए रेलवे के भूमि उपयोग और राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) को सरल बनाती है।"
ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) और अन्य छोटे व्यास भूमिगत उपयोगिताओं के लिए, रेलवे ट्रैक को पार करने के लिए 1,000 रुपये का एक बार का शुल्क लिया जाएगा।"

यह निजीकरण या इसे बेहतर और खुलेपन से कहें तो, सब कुछ बेच देने का यह एक तयशुदा एजेंडा है। लोक द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार, भले ही एक लोककल्याणकारी संविधान की शपथ लेकर गद्दीनशीन हुई हो, पर उसका मूल उद्देश्य ही है, देश की सारी संपदा का निजीकरण, और उसे अपने चहेते पूंजीपतियों को बेच देना। उससे रोजगार मिलने की बातें जो, मंत्रीगण कहते रहते हैं यह उनकी पेशेवर मजबूरी है वर्ना, उन बेचारों को तो यह भी पता नहीं कि, कैबिनेट में रखा गया यह सारे प्रस्ताव बना कौन रहा है और किसके इशारे पर यह सब बन रहा है। और अगर उन्हें यह पता भी हो तो वे उसे कहीं कह भी नही पाएंगे।

जहां तक निजी क्षेत्रों में रोजगार की बात है, सरकार, पिछले आठ सालों का, यही आंकड़ा दे दे कि, किस निजी क्षेत्र ने देश के कितने नौजवानों को रोजगार दिया है तो कम से कम यह भ्रम भी दूर हो जाय कि निजीकरण की नीति से लोगों को नौकरियां अधिक मिली है। निजी क्षेत्र ने, जो नौकरियां दी भी हैं, उनमें भी अधिकतर संविदा या, ठेके पर, दिहाड़ी पर दी जाने वाली नौकरियां होंगी जिनमें कोई सोशल सिक्योरिटी या पेंशन या आवास या बच्चो की पढ़ाई लिखाई की सुविधा नहीं होगी। न काम के घंटे तय होंगे और न ही काम की जगह का अनुकूल वातावरण। मैं कॉर्पोरेट क्षेत्र के बड़े मैनेजरों की बात नही कर रहा हूं, बल्कि मैं सामान्य नौकरी पाने वाले नौजवानों की बात कर रहा हूं। 

अडानी समूह को जो एयरपोर्ट सौंपे गए है वे पचास साल की अवधि के लिए हैं। हो सकता है यही अवधि बंदरगाहों के लिए भी हो। यह अजीब आर्थिक नीति है कि, देश के सारे महत्वपूर्ण इंफ्रा प्रोजेक्ट, चाहे वह कोयला हो, या पेट्रोलियम, या एयरपोर्ट/एयरलाइन, या बंदरगाह या अब इन्हें जो रेलवे जोड़ती है वह सब धीरे धीरे इन्ही गोदी सेठों को सरकार सौंपती जा रही है। और कमाल यह भी है कि, अडानी समूह यह सब खरीदने के लिए सरकारी बैंकों से ही कर्ज भी ले रहा है और सरकार, उसका कर्ज एनपीए/राइट ऑफ/माफ भी करती जा रही है। 

(विजय शंकर सिंह)

Wednesday, 4 January 2023

रामसेतु, राम द्वारा निर्मित है, इसका कोई प्रमाण नहीं है ~ संसद में सरकार / विजय शंकर सिंह

रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किए जाने की मांग पुरानी है और अक्सर यह मांग उठती रही है कि, भगवान राम से जुड़े होने के कारण, इसे जस का तस रहने दिया जाय और इसके साथ कोई छेड़छाड़ न की जाय। शीर्ष अदालत में यह मामला, आठ साल से लंबित चल रहा है और एक बार फिर यह सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई सुब्रमण्यम स्वामी, बीजेपी के पूर्व सांसद की याचिका पर हो रही है। सुब्रमण्यम स्वामी ने, सुप्रीम कोर्ट में इस इस बात पर नाराजगी जाहिर की थी कि, इस याचिका के जवाब में केंद्र सरकार ने अभी तक अपनी तरफ से, अपना कोई पक्ष नहीं रखा है और न ही याचिका में दिए बिंदुओं पर कोई हलफनामा दायर किया है। 

सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर अपनी याचिका में कहा है कि, "आठ साल बीत चुके हैं पर उनकी याचिका पर कोर्ट की नोटिस के जवाब में केंद्र सरकार हलफनामा दाखिल नहीं कर रही है। इस बीच इस याचिका की सुनवाई के लिए 16 तारीखें लगी लेकिन अभी तक, केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग पर कोई भी जवाब दाखिल नही किया।"

तब सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केन्द्र सरकार को अपना जवाब, हलफनामा दायर कर, दाखिल करने का निर्देश दिया। सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा कई साल पहले रामसेतु को ऐतिहासिक स्मारक के रूप में मान्यता देने के लिए यह याचिका दायर की गई थी। पिछले महीनों याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी ने कई बार कई सीजेआई से इस मामले की जल्द सुनवाई करने की मांग की भी थी। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में इस मुद्दे पर कहा था कि इस मामले में तीन महीने बाद विचार किया जाएगा। तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक हलफनामा दाखिल करके अपना रुख भी स्पष्ट करने को कहा था।

हालांकि मोदी सरकार रामसेतु मामले पर पहले यह कह चुकी है कि, "समुद्र में जहाजों की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए प्रस्तावित सेतु समुद्रम परियोजना के लिए राम सेतु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।" परियोजना के लिए सरकार कोई दूसरा वैकल्पिक मार्ग तलाशेगी।"
स्वामी ने अपनी याचिका में कहा है कि राम सेतु लाखों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा है, लिहाजा इसे न तोड़ा जाए. साथ ही रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए। 

2007 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर हिंदू मान्यताओं के अनुसार रामसेतु की अवधारणा को पूरी तरह बेबुनियाद बता दिया था। केंद्र सरकार का कहना था कि "इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है कि, साढ़े छह हजार वर्ष पहले भगवान राम ने यह पुल बनवाया था।" जबकि हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह वहीं रामसेतु है, जिसका जिक रामायण में किया गया है। उल्लेखनीय है कि, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पाटी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने याचिका दायर कर रामसेतु पुल को तोड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। इस पर 31 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने सेतु समुद्रम परियोजना के लिए रामसेतु तोड़ने पर रोक लगा दी थी। जस्टिस बीएन अग्रवाल और जस्टिस पीपी माओलेकर की बेंच ने कहा था कि 14 सितंबर तक रामसेतु को किसी तरह की क्षति नहीं पहुंचाई जाए।

भारत सरकार द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया था कि, 
"यह पुल असल में एक भूगर्भीय संरचना है, जो दस लाख वर्ष पहले भूगर्भीय क्रियाओं के कारण अस्तित्व में आई। इनका निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है।"
अहमदाबाद के मरीन पेड वाटर रिसोर्स ग्रुप, स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के अध्ययन का हवाला देते हुए केंद्र ने कहा कि
"याचिकाकर्ता की यह धारणा गलत है कि इस पुल का धार्मिक और पुरातात्विक महत्व है। देश के पूर्वी तट को पश्चिमी तट से जोड़ने वाले सेतु समुद कैनाल प्रोजेक्ट जनहित और आर्थिक उन्नति के लिए तैयार किया जा रहा है इसलिए रामसेतु तोड़ने पर आपति नहीं होना चाहिए।"

हलफनामे में कहा गया है कि,
"याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यह तथ्य छिपाया है कि मार्ग बनाने के लिए 30 हजार मीटर लंबे पुल का केवल 300 मीटर चौड़ा और 12 मीटर गहरा हिस्सा ही तोड़ा जा रहा है, पूरा पुल नहीं।"
हलफनामे में याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी पर कड़ा जुर्माना लगाने और पुल तोड़ने पर लगे प्रतिबंध को समाप्त करने की मांग की गई है। वहीं यह भी कहा गया है कि
"याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी नहीं माना जा सकता कि इस पुल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए।"
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया और कहा, "आर्थिक उन्नति के लिए रामसेतु तोड़ना जरूरी है।"

यूपीए सरकार के ऐसे ही हलफनामें पर, तब आरएसएस और बीजेपी ने हंगामा खड़ा कर दिया और वामपंथी इतिहासकार, तब राम की ऐतिहासिकता कही छुपा दिए थे, जिसे संघी नहीं पढ़ पा रहे थे। अब सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर, मोदी सरकार ने भी लगभग यही बात कही है जो, पहले कही जा चुकी है। सरकार ने तो रामसेतु को तोड़ने की भी बात कह दी है। बताइए क्या समय आ गया है, जो राम को लाए हैं वही उनके द्वारा निर्मित एक प्राचीन सेतु को तोड़ने पर आमादा हैं! शिव शिव।

संघ और बीजेपी के लिए रामसेतु एक बड़ा सियासी मुद्दा रहा है, लेकिन अब मोदी सरकार के ही एक मंत्री ने संसद में रामसेतु का कोई वजूद होने से ही इनकार कर दिया है। यूपीए सरकार पर तो राम को ही काल्पनिक बताने का आरोप लगता रहा है, लिहाजा सरकार के इस जवाब के बाद हिंदूवादी संगठन नाराज हैं। लेकिन अगर वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो केंद्रीय मंत्री, जितेन्द्र सिंह ने संसद को गुमराह करने की बजाए बिल्कुल सही जवाब दिया है। जितेंद्र सिंह प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री होने के अलावा परमाणु ऊर्जा विभाग तथा अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री भी हैं. चूंकि सवाल विज्ञान के शोध और अध्ययन से जुड़ा हुआ था, इसलिये उन्होंने अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री के नाते उसका उचित जवाब देने से कोई परहेज नहीं किया. अब ये अलग बात है कि इससे हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं और उनके इस बयान का विरोध भी हो रहा है। 

हरियाणा से निर्दलीय सांसद कार्तिकेय शर्मा ने राज्यसभा में रामसेतु का मुद्दा उठाया था। उन्होंने सवाल पूछा था कि, "क्या सरकार हमारे गौरवशाली, प्राचीन इतिहास को लेकर कोई साइंटिफिक रिसर्च कर रही है? क्योंकि पिछली सरकारों ने लगातार इस मुद्दे को तवज्जो नहीं दी।" 
उनके इस सवाल का केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जवाब देते हुए कहा कि "रामसेतु को लेकर हमारी कुछ सीमाएं हैं क्योंकि ये करीब 18 हजार साल पहले का इतिहास है. जिस पुल की बात हो रही है वो, करीब 56 किमी लंबा था. स्पेस टेक्नोलॉजी के जरिए हमने पता लगाया कि समुद्र में पत्थरों के कुछ टुकड़े पाए गए हैं, इनमें कुछ ऐसी आकृति है जो निरंतरता को दिखाती हैं। समुद्र में कुछ आइलैंड और चूना पत्थर जैसी चीजें दिखीं हैं. अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो ये कहना मुश्किल है कि रामसेतु का वास्तविक स्वरूप वहां मौजूद है. हालांकि कुछ संकेत ऐसे भी हैं जिनसे ये पता चलता है कि स्ट्रक्चर वहां मौजूद हो सकता है. हम लगातार प्राचीन द्वारका शहर और ऐसे मामलों की जांच के लिए काम कर रहे हैं।"
साफ शब्दों में कहें, तो सरकार ने ये मान लिया है कि सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों से भी राम सेतु के होने के पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।
 
वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस की कथाओं के अनुसार श्रीराम ने श्रीलंका जाने के लिए समुद्र के ऊपर एक पुल बनाया था। यह सेतु, उसी पुल के अवशेष के रूप में बताया जाता है। रामसेतु एक ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर पिछले कई सालों से बीजेपी और कांग्रेस के बीच लंबी बहसे होती रही है। बीजेपी लगातार कांग्रेस पर यह आरोप लगाती रही है कि, वह रामसेतु के अस्तित्व को नहीं मानती, लेकिन अब सरकार ने संसद और अदालत में वही कहा जो यूपीए सरकार ने पहले कहा था। 

एबीपी वेबसाइट पर संजय सिंह के एक लेख के अनुसार, सेतुसमुद्रम परियोजना को वाजपेयी सरकार में मंजूरी दी गई थी। साल 2004 में वाजपेयी सरकार ने इसके लिए 3,500 करोड़ रुपये का बजट भी रखा था। हालांकि, 2004 में यूपीए सरकार के आने के बाद, मनमोहन सिंह सरकार ने जब इसे आगे बढ़ाने पर काम शुरू किया तो, बीजेपी ही इसके विरोध में खड़ी हो गई। सरकार के अनुसार, सेतुसमुद्रम शिपिंग नहर परियोजना परियोजना के तहत इस सेतु को तोड़कर एक मार्ग तैयार करना था जिससे बंगाल की खाड़ी से आने वाले जहाजों को श्रीलंका का चक्कर नहीं लगाना पड़े। इसका उद्देश्य, समय, दूरी और ईंधन आदि की बचत करना था। लेकिन बीजेपी समेत अन्य हिंदू संगठनों ने भी इसका विरोध किया और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया। 

साल 2008 में यूपीए सरकार ने भी यही हलफनामा दिया था कि, "यह स्ट्रक्चर किसी इंसान ने नहीं बनाया. यह किसी सुपर पावर से बना होगा और फिर खुद ही नष्ट हो गया. इसी वजह से सदियों तक इसके बारे में कोई बात नहीं हुई और न कोई सुबूत है।" इस हलफनामे का खूब विरोध हुआ और सरकार ने इसे  वापस ले लिया था। 

पर्यावरण और समुद्री जीव जंतुओं के कारण उस सेतु के तोड़ने का विरोध पर्यावरण के लिए काम करने वाले समूहों और वैज्ञानिकों ने भी किया है। पर यहां उनका तर्क राम सेतु के प्रति आस्था से नहीं बल्कि, समुद्री पर्यावरण के दृष्टिकोण से है। अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि राम सेतु को तोड़ने की योजना पर सरकार दुबारा काम करने लगी है? कहीं ऐसा तो नहीं, इसमें भी कोई चहेता पूंजीपति जिसका देश के बंदरगाहों पर कब्जा हो, को कोई मुश्किल दरपेश आ रही हो और वह एक आसान रास्ता पूर्व से पश्चिम या पश्चिम से पूर्व की ओर जाने के लिए चाहता हो। जो भी हो राम का सेतु है राम ही जानें।  

अब आस्थाएं भी सेलेक्टिव होने लगी हैं। बीजेपी की सरकार के समय कुछ और यूपीए सरकार के समय कुछ। जब काशी में विश्वनाथ मंदिर के आसपास के पंच विनायक के प्राचीन मंदिर और पंचकोशी मार्ग के कुछ मंदिर और विग्रह ध्वस्त कर कूड़े में फेंक दिए गए तब किसी भी संघी और बीजेपी के मित्रों की आस्था आहत नहीं हुई। जब एनडीए सरकार ने सेतु समुद्रम योजना का बजट रखा और उस योजना को पास किया तब सारे नए रामभक्त चुप रहे। पर जैसे ही सन 2004 में सरकार बदली और यूपीए सरकार ने एनडीए की ही योजना पर काम किया, भुरभुरी आस्थाएं बिखरने लगी। ऐसी भुरभुरी आस्था वाले भक्तगण अपने धर्म और ईश्वर का खुद ही उपहास कर देते हैं और इस मूर्खतापूर्ण आहत आस्था के कारण उनका पाखंड ही उजागर होता है। सेलेक्टिव आस्था, आस्था न भवति मित्रों !!

(विजय शंकर सिंह)

Monday, 2 January 2023

नोटबंदी से, देश ने क्या खोया क्या पाया - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह

8 नवबर, 2016. को ठीक 8 बजे, जब टीवी चैनलों ने यह घोषणा की कि प्रधानमंत्री जी एक ज़रूरी संदेश देंगे तो हम भी करोड़ो देशवासियों की तरह टीवी की तरफ खिसक कर बैठ गए और उसका वॉल्यूम  तेज़ कर दिया। 8 बजने के चंद सेकेंड्स पहले पीएम, टीवी स्क्रीन पर सेनाध्यक्षों से मिलते नज़र आये तो, हमें लगा कि, कुछ सीमा पर कुछ हो गया है। खैर सीमा पर तो कोई समस्या नहीं दिखी। समस्या बदस्तूर दिल्ली में ही थी। फिर प्रधानमंत्री जी ने अपना वक्तव्य शुरू किया और जब उनका यह वाक्य गूंजा कि "आज रात 12 बजे से 1000 और 500 रुपये के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे" तो, पहले तो मेरी समझ मे कुछ विशेष नहीं आया। फिर यह वाक्य जब कई बार दुहराया गया तो बात समझ में आ गयी। नोटबंदी की घोषणा हो चुकी थी।

लोगों को लगा कि सरकार का यह कदम मास्टरस्ट्रोक है। पर जब लोगों को नोट बदलने में और नए नोट मिलने में दिक्कत होने लगी और यह मास्टरस्ट्रोक उल्टा पड़ने लगा तो, वित्त मंत्री टीवी पर नमूदार हुये और नोटबंदी के तीन उद्देश्य उन्होंने गिना डाले। 
० एक तो काला धन का पता लगाना,
० दूसरे आतंकवाद का खात्मा
० तीसरे नक़ली नोटों का चलन रोकना । पर सरकार, इन तीनों ही लक्ष्यों को, प्राप्त करने में, असफल रही। प्रधानमंत्री जी को दिसंबर 2016 में ही यह आभास हो गया था कि यह दांव गलत पड़ गया है। अपनी जापान यात्रा में व्यंग्यात्मक लहजे और हांथ नचाते हुए उपहासास्पद मुद्रा में जो, उन्होंने कहा था कि, " घर मे शादी है पर पैसे नहीं है ", वह वीडियो क्लिपिंग और उसका भी यह अकेला वाक्य तथा उनकी देहभाषा सरकार की संवेदनहीनता को उघाड़ कर रख देता है। तंज के नशे का हैंगओवर भी जल्दी ही उतर गया जब उन्होंने कहा कि 'लोग मुझे मार डालेंगे, बस, बस 50 दिन मुझे दे दीजिए,' नहीं तो 'चौराहे पर मेरे साथ जो मन हो कीजिएगा।' ये वाक्य पूरे देश के भाइयों बहनों को याद होगा।

आर्थिक सुधार का मास्टरस्ट्रोक कह कर प्रचारित किया जाने वाला यह कदम, किसके दिमाग की उपज था, यह रहस्य लंबे समय तक बना रहा। पर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा की गयी थी, तो उसी दिन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने नोटबंदी को मंजूरी दी थी। अनुमति देने के दौरान ही आरबीआई ने यह भी साफ कर दिया था कि नोटबंदी से न तो कालाधन वापस आएगा और न ही नकली नोट खत्म किए जा सकेंगे। उक्त मीटिंग 8 नवंबर 2016 को हुई थी.जो उस दिन शाम के 5.30 बजे नई दिल्ली में जल्दबाजी में बुलाई गई थी। उस मीटिंग के दौरान दर्ज हुए दस्तावेज के मुताबिक बैंक के डायरेक्टर्स ने नोटबंदी को मंजूरी देते हुये, उसके नकारात्मक असर भी बता दिए थे।

अंदर से खोखला हो चुका चौथा खम्भा, तो, दुंदुभीवादन में डूबा हुआ था। खूब प्रचार हुआ कि, देश की अर्थ व्यवस्था अब सुधर जाएगी, पर धीरे धीरे नशा उतरने लगा। प्रधानमंत्री जी का यह अनुमान था कि, देश की अर्थव्यवस्था इस कदम से सरपट भागने लगेगी पर यह तो थउसने लगी । ठकुरसुहाती के इस स्वर्णिम काल मे भी, कुछ पत्रकार और गंभीर अर्थवेत्ता, जब इसकी तह में गये तो उन्हें लगा कि, यह तो आत्मघाती कदम उठा लिया गया है। रिज़र्व बैंक जो, मौद्रिक नीति और मौद्रिक अनुशासन का जिम्मेदार है वह भी तब, 'जी जहांपनाह' की मुद्रा में साष्ठांग था। हर आदमी सवाल पूछ रहा है कि, यह किसका फैसला था। और सरकार खामोश थी।

याद कीजिए, इस सरकार निर्मित त्रासदी में, 150 लोग नोटबंदी के कारण या तो लाइनों में लग कर मर गए या उन्होंने, आत्म हत्या कर ली। लोगों के परिवार में शादियां टल गयीं। समर्थ और संपर्क वाले लोग जो, पुराने नोट संजोए थे, आरबीआई और अन्य बैंकों से मिल कर, कुछ सुविधा शुल्क देकर, खुल कर बदलवा रहे थे। धीरे धीरे सतह पर तो सब सामान्य दिख रहा था पर अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हो गया था उसका असर बाद में दिखने लगा। सरकार भी भ्रम में थी। नोटबंदी के उद्देश्य और गोलपोस्ट रोज़ बदले जा रहे थे।  वित्त सचिव से लेकर आरबीआई के गवर्नर तक को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहा जाय। कभी वे कहते, यह कदम कैशलेस अर्थ व्यवस्था की ओर एक कदम है तो, कभी इसे लेसकैश कहा जाता था। कभी कहते, यह पूरी तरह से होमवर्क करने के बाद ही लागू किया गया है तो, कभी कहा जाता, इतने बड़े देश मे, इतने बड़े कदम से, कुछ तो टीथिंग ट्रबल सहना ही होगा। आदि आदि सूक्तियां, परम्परागत मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक मे, तैर रही थीं। तब सरकार ने यह सोचा भी नहीं था कि, देश की कुल मुद्रा का 86%, जो 500 और 1000 के नोटों में था, अगर चलन से बाहर हो जाएगा तो बिना तैयारी और पर्याप्त सोच विचार के उठाया गया यह कदम लागू हुआ तो, उसका विफल होना तय है। परिणामस्वरूप ग्रामीण और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था चरमरा गयी। सच तो यह है कि यह सरकार की बिना सोची समझी रणनीति का एक दुष्परिणाम था।

परिणामस्वरूप जीडीपी गिरने लगी। सरकार को आंकड़ों में हेराफेरी करनी पड़ी। तमाशे के साथ खुलवाए गये जनधन योजना के अंतर्गत बैंकों के खाते कालेधन की अवैध पार्किंग बन गए। 12 दिसंबर 2016 तक बैंकों के आंकड़ों ने यह संकेत दे दिया था कि रद्द हुए नोटों में से 15 लाख बैंकिंग सिस्टम में आ जाएंगे। यह अनुमान सरकार की रणनीति विफल कर गया। अंत मे नोटबंदी के साढ़े आठ महीने के बाद जब आरबीआई ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2016 - 17 जारी की तो पता लगा 15.28 करोड़ की राशि जमा हो चुकी है। 2017 - 18 ,की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 99.2 % रद्द हुए नोट पुनः बैंकिंग तंत्र में वापस आ गए हैं। यह नोटबंदी की दारुण विफलता है। आरबीआई ने संसदीय समिति को जो अपनी रिपोर्ट दी थी, उसके अनुसार, ₹ 500 के 8,582 लाख करोड़ और ₹ 1000 के 6.858 लाख करोड़ यानी 15.44 लाख करोड़ के नोट चलन में थे। लगभग सभी वापस लौट आये। जो भी काला धन था वह सफेद हो गया। 

सरकार ने नोटबंदी के पहले सोचा था कि, कुल 11 या 12 लाख करोड़ के ही रद्द नोट, वापस आएंगे और 3.5 लाख करोड़ नोट, जो नहीं वापस नहीं आएंगे वे ही, उपलब्धि माने जाएंगे। सरकार का यह भी अनुमान था कि, जो भारी संख्या में नकली नोट बाज़ार में हैं, वे बैंक में नहीं आएंगे, जिससे वे समाप्त हो जाएंगे। पर सरकार ने भारतीय सांख्यिकी संस्थान कोलकाता की उस रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया था, जिसके अनुसार केवल 400 करोड़ रुपये के नकली नोट ही चलन में हैं। यह राशि विशाल मौद्रिक व्यवस्था को देखते हुये बहुत कम थी। सरकार ने अपने ही एक महत्वपूर्ण संस्थान की रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ करके नक़ली नोटों की संख्या का अतिश्योक्तिपूर्ण  अनुमान लगा लिया। 2017 - 18 की आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 - 17 में कुल 58.3 करोड़ की नकली मुद्रा थी, जो रद्द हुए नोटों का केवल 0.0034 % था। नकली नोटों के पकड़े जाने की बात जो सरकार ने की थी, वह भी एक मिथ्यावाचन सिद्ध हुआ। 

जहां तक नक़ली नोटों के पकड़ने का प्रश्न है बिना किसी विशेष अभियान चलाये ही हर साल 70 करोड़ की नकली मुद्रा रूटीन तरीके से पकड़ी जाती है। फिर इसके लिये पूरे देश की अच्छी खासी चलती हुई अर्थव्यवस्था में पलीता लगाने की क्या ज़रूरत थी ? नोटबंदी अपने उन सभी उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रही जो सरकार ने पहले बताए थे। वे उद्देश्य थे, आतंकवाद का खात्मा, नक़ली नोटों का चलन रोकना और काले धन का पता लगाना। जब कि हुआ इसका विपरीत। 99.2 % धन जिसमें काला धन भी था, पुनः सफेद होकर सिस्टम में आ गया।

जब ये सारे उद्देश्य आतंकवाद, नक़ली नोट और कालाधन, प्राप्त नहीं किये जा सके तो हड़बड़ाई और बदहवास सरकार ने तुरन्त कैशलेस , लेसकैश और डिजिटल अर्थव्यवस्था की बात छेड़ दी। लेकिन आरबीआई ने इस सम्बंध में जो डेटा जारी किया है वह भी बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा । शुरू में ज़रूर दुकानों पर स्वाइप मशीन और ई - वालेट बाज़ार में आये पर वे जनता का डेटा बटोर कर ले गये, पर अब वे इतने चलन में नहीं है जितने नोटबंदी के तत्काल बाद प्रचलन में थे और जिनका तब इतना प्रचार किया गया था।  जैसे ही नकदी की कमी दूर हुयी पुनः लोग नकदी लेनदेन करने लगे। 10 अक्टूबर 2018 की आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, 19.688 लाख करोड़ की मुद्रा चलन में थी जिसमें से नोटबंदी के तत्काल बाद विभिन्न एटीएम से 1.711 लाख करोड़ मुद्रा लोगों द्वारा निकाल ली गयी। नोटबंदी के बाद लगभग 6 महीने तक नकदी की समस्या थी। एक आंकड़े के अनुसार, अगस्त 2018 में विभिन्न एटीएम से 2.76 लाख करोड़ की राशि नक़द निकाली गयी थी, जब कि अगस्त 2016 में यह रकम 2.20 लाख करोड़ थी। 2017 - 18 में जीडीपी और मुद्रा का अनुपात जहां 10.9 % रहा वहीं पिछले साल यह अनुपात 8.8 % था। यह संकेत बताता है कि जनता डिजिटल लेनदेन के बजाय अब भी नकदी लेनदेन अधिक पसंद करती है।

नकदी का चलन फिर बढ़ गया है। हाल ही में द हिंदू ने एक खबर छापी है, उसके अनुसार,
"विमुद्रीकरण के छह साल बाद, जनता के पास ₹30.88 लाख करोड़ के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर नकदी मिली है। इस कदम का इरादा, जिसकी खराब योजना और त्रुटिपूर्ण क्रियान्वयन को लेकर, कई विशेषज्ञों द्वारा आलोचना की गई थी, भारत को "कम नकदी" (लेस कैश) वाली अर्थव्यवस्था बनाना था। जनता के पास, 21 अक्टूबर तक 30.88 लाख करोड़ रुपये के नए उच्च स्तर पर, नकदी मुद्रा पहुंच गई है, जो यह दर्शाता है कि, विमुद्रीकरण के छह साल बाद भी नकदी का उपयोग और क्रेज अभी भी मजबूत है।"
जनता के पास, मुद्रा से तात्पर्य, उन नोटों और सिक्कों से है, जिनका उपयोग, लोग लेन-देन करने, व्यापार निपटाने और सामान और सेवाओं को खरीदने के लिए करते हैं।  प्रचलन में मुद्रा से बैंकों के साथ नकदी की कटौती के बाद यह आंकड़ा निकाला जाता है।

अर्थव्यवस्था में नकदी का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, यहां तक ​​कि भुगतान के नए और सुविधाजनक डिजिटल विकल्पों के लोकप्रिय होने के बाद भी। डिजिटल भुगतान पर 2019 के, आरबीआई के एक अध्ययन के अनुसार, 
"हालांकि हाल के वर्षों में डिजिटल भुगतान धीरे-धीरे बढ़ रहा है। डेटा  यह भी बताता है कि, उसी समय के दौरान, सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में, प्रचलन में, नकद मुद्रा भी, समग्र आर्थिक विकास के अनुरूप बढ़ गई है। ... समय के साथ साथ, डिजिटल भुगतान में जीडीपी अनुपात में वृद्धि हो रही है, पर, मुद्रा में गिरावट का संकेत नहीं देती है। विमुद्रीकरण के बाद, भारत में डिजिटल लेनदेन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, हालांकि देश में जीडीपी अनुपात में डिजिटल भुगतान पारंपरिक रूप से कम हो रहा है।"
हाल के एक नोट में, एसबीआई के अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि 
"दिवाली सप्ताह में प्रचलन में मुद्रा, (सीआईसी) में ₹7,600 करोड़ की गिरावट आई है, जो कि लगभग दो दशकों में पहली ऐसी गिरावट थी।"

रिज़र्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट 2017 - 18 जिसमे रद्द हुयी मुद्रा के वापसी का उल्लेख है के आने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने फेसबुक पेज पर आयकरदाताओं की संख्या और कर दायरे के बढ़ने की बात कही और इसे भी नोटबंदी का एक परिणाम बताया। वित्तमंत्री के ब्लॉग के अनुसार,
* मार्च 2014 में कुल 3.8 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल हुए थे जो 2013 - 14 वित्तीय वर्ष के थे।
2017 - 18 में आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या 6.86 तक बढ़ गयी।
* 2013 -14 में आयकर से सरकार को ₹ 6.38 लाख करोड़ मिला जब कि 2017 - 18 में यह धन राशि ₹ 10.02 लाख करोड़ थी।
• नोटबंदी के पहले आयकर से प्राप्त होने वाली आयवृद्धि की दर जहां 6.6 % थी वहीं नोटबंदी के बाद यह दर 15 % और 18 % तक बढ़ गयी।

तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस ब्लॉग को नोटबंदी की एक महती सफलता के रूप में मीडिया में प्रचारित किया गया। यह भी कहा गया कि इस कदम से लोग कर चुकाने की मानसिकता की ओर बढ़े हैं और हम एक करदाता समाज बनने की ओर अग्रसर हैं। अब इस उपलब्धि की भी पड़ताल करने पर निम्न तथ्य सामने आए। सीबीडीटी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, 2013 - 14 में आयकरदाताओं की संख्या 3.8 करोड़ से बढ़ कर 2017 - 18 में 6.85 करोड़ हो गयी है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जिस गति से रिटर्न भरने वालों की संख्या बढ़ी है तो, उसी गति से आयकर संग्रह की राशि भी बढ़ी है ?

अब सीबीडीटी के आंकड़ों के परिप्रेक्ष्य में इस पर एक नज़र डालते हैं कि वास्तविक आयकरदाताओं और राशि की नोटबंदी के पहले और बाद में क्या स्थिति है। सीबीडीटी के आंकड़ों के अनुसार, नोटबंदी के पहले 2013 - 14 में 11.6 % की दर से आयकरदाताओं में वृद्धि हो रही थी। फिर यह दर, 2014 - 15 में 8.3 % और 2015 - 16 में 7.5 % दर से हुयी जो नोटबंदी पूर्व की स्थिति से कम है। लेकिन 2016 - 17 में यह दर 12.7 % की दर से बढ़ गयी। जबकि 2017 - 18 में यह दर फिर गिर कर 6.9 % हो गयी। जहां तक आयकर से प्राप्त धनराशि का प्रश्न है 2013 - 14 में कुल ₹ 6.38 लाख करोड़ और 2017 - 18 में ₹ 10.02 लाख करोड़ आयकर से प्राप्त हुआ है। यह राशि कर संग्रह के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति है। लेकिन यह प्रगति नोटबंदी के पहले भी होती रही है। सांख्यिकीय आंकड़ो का अध्ययन समग्रता में हीं किया जाना चाहिये अन्यथा प्रसिद्ध उक्ति ' झूठ, महाझूठ और सांख्यिकी ' ही चरितार्थ होने लगती है। अब यूपीए और एनडीए सरकार के कार्यकाल में कर संग्रह और जीडीपी के अनुपात के आंकड़ों पर एक नज़र डालें। यूपीए के शासनकाल ( 2004 - 14 ) में प्रत्यक्ष कर संग्रह की राशि दस सालों में औसतन 20.2 %  जब कि एनडीए के शासनकाल ( 2014 - 18 ) चार सालों में यह औसतन 12 % रही। यह अनुपात प्रत्यक्ष कर संग्रह और जीडीपी का है।

नोटबंदी के नकारात्मक असर क्या पड़े हैं, एक नज़र इस पर भी देखें। 
लोगों का भरोसा नकदी पर बढ़ा है। यह कितना बढ़ा है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि 2017-18 में घरों में रखा कैश का लेवल पिछले पांच साल के औसत से दोगुने से ज्यादा है. इसके ठीक उलट, लोग जितना पैसा बैंक में रखते थे अब उसकी आधी रकम ही सेविंग्स अकाउंट में रखने लगे हैं.इससे होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाने के लिए रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के कुछ शब्दों को पढ़िए. कहा गया है कि घरेलू सेविंग्स घटने से मंदी का खतरा बढ़ जाता है। रिजर्व बैंक की परिभाषा के हिसाब से घरेलू में पूरा इनफॉर्मल सेक्टर आता है।

रिजर्व बैंक से सलाना रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रॉस वैल्यू एडिशन ग्रोथ में इंडस्ट्री का हिस्सा 2015-16 में 33 परसेंट का था जो 2017-18 में घटकर 20 परसेंट रह गया. मतलब यह कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान नोटबंदी के बाद काफी कम हो गया है। इसमें बढ़ोतरी की रफ्तार पिछले दस साल के औसत से अब भी कम है. मैन्यूफैक्चरिंग की सुस्ती का सीधा असर नौकरियों के सृजन से है और इसमें सुस्ती का अर्थ, रोजगार के अवसरों में कमी का होना है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार,से उद्योगों को देने वाले ऋण वृद्धि की रफ्तार 2018 में 1 परसेंट से कम है. इसमें छोटे और मझोले इंडस्ट्री को मिलने वाला लोन भी शामिल है. उद्योगोँ को मिलने वाला लोन बिजनेस बढ़ाने के लिए होता है। अगर इस सेक्टर में लोन बढ़ने की रफ्तार ऐसी है तो फिर कारोबार कैसे बढ़ रहे होंगे और नौकरियों के मौके कैसे पैदा हो रहे होंगे ?

अब बेरोजगारी पर इस कदम का क्या असर पड़ा इसे भी देखिये। थिंक टैंक सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) के मुताबिक इस साल अक्टूबर में देश में बेरोजगारी की दर 6.9 फीसदी पर पहुंच गई है जो पिछले दो सालों में सबसे ज्यादा है। सीएमआईई के मुताबिक देश में बेरोजगारी को लेकर हालात बदतर हैं। श्रमिक भागीदारी भी घटकर 42.4 फीसदी पर पहुंच गया है जो जनवरी 2016 के आंकड़ों से बी नीचे है। श्रमिक भागीदारी का आंकड़ा नोटबंदी के बाद बहुत तेजी से गिरा है। उस वक्त यह आंकड़ा 47-48 फीसदी था जो दो सालों के बाद भी हासिल नहीं कर सका।  भारतीय अर्थव्यवस्था में अक्सरअक्टूबर से दिसंबर तक रोजगार सृजन का वक्त होता है लेकिन ताजा रिपोर्ट से स्थिति गंभीर लगती है। हर साल तकरीबन 1.3 करोड़ लोग देश के लेबर मार्केट में एंट्री करते हैं, बावजूद इसके बेरोजगारी का दर नहीं सुधर सका। अभी भी पावर, इन्फ्रास्ट्रक्चर और आईटी इंडस्ट्री पटरी पर नहीं आ सकी है। संभवत: बेरोजगारी बढ़ने का यह भी एक कारण हो सकता है।

यह समीक्षा आरबीआई और सरकार के ही संस्थानों द्वारा प्रदत्त आंकड़ों पर ही निर्भर है। इन आंकड़ों को अगर दरकिनार भी कर दे तो सरकार स्वयं नोटबंदी के निर्णय से अपराध बोध से ग्रस्त है। हर छोटी मोटी उपलब्धि पर अखबारों में इश्तहार देने, ट्वीट करने और सत्तारूढ़ दल तथा सरकार के मंत्रियों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करने वाले लोग आज इस मौके पर जिसे आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ा आर्थिक सुधार प्रचारित किया जा रहा था, चुप्पी ओढ़े हैं तो यह उनका वैराग्य बोध नहीं अपराध बोध ही है। नोटबंदी की इस घटना ने आरबीआई की स्वायत्तता को भी शरारतन नज़रअंदाज़ किया है। आरबीआई जिसके पास देश की मौद्रिक नीति और मौद्रिक अनुशासन बनाये रखने का संवैधानिक दायित्व है उसे भी इस निर्णय की सूचना दी गयी। यही कारण है कि 8 नवंबर 2016 से 31 दिसंबर 2016 तक आरबीआई ने दो सौ से अधिक दिशा निर्देश जारी किये। सुबह कुछ और शाम को कुछ जारी होने वाले आदेश प्रशासन की अपरिपक्वता और बदहवासी ही बताते हैं। 

छः साल बाद, सुप्रीम कोर्ट, नोटबन्दी के संबंध में दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर चुका है। फिलहाल 7 नवंबर तक सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा है। अदालत का निर्णय, चाहे जो हो, अधिकांश अर्थ विषेषज्ञों का कहना है कि, नोटबन्दी का निर्णय देश की अर्थव्यवस्था के लिये घातक ही रहा। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने, तभी संसद में कह दिया था कि, इससे, जीडीपी की विकास दर में, 2% की कमी आएगी। डॉ सिंह की बात सच साबित हुई। उन्होंने इसे एक संगठित लूट बताया था। मैंने इस लेख में, पुराने आंकड़े इसलिए दिए हैं कि, 31 मार्च 2020 तक ही जीडीपी की दर 2% गिर गई थी। असंगठित क्षेत्र बिखरने लगा था। और फिर तो उसके बाद आई महामारी ने देश को अत्यधिक आर्थिक संकट में डाल दिया। अदालत का फैसला चाहे जो हो, पर अर्थशास्त्रियों की राय यही है कि, यह फैसला बिना समझे बूझे और सोचे समझे लिया गया था।

बहुमत का दृष्टिकोण, उसकी आलोचना को बाधित नहीं करता है। नोटबंदी केस में जो कुछ जजों ने कहा है, उस पर सवाल तो उठेंगे। किसी की सनक से एक फैसला हो जाय, कागज का पेट भर कर उसे सही मान भी लिया जाय और उसका दुष्परिणाम सालों तक देश को भुगतना पड़े, और इस पर बात ही न की जाय, यह संभव नहीं है। आरबीआई ने नोटबंदी की सिफारिश की। पर, यह भी कहा कि, सरकार ऐसा चाहती है। फिर यह एक स्वायत्त सिफारिश कैसे हुई? जस्टिस नागरत्ना ने इसे ही बिना दिमाग का इस्तेमाल किए हुए की गई सिफारिश कहा है। फिर जब सिफारिश की गई तो उसके उद्देश्य भी तय किए गए होंगे। यह भी RBI ने तय किए थे या सरकार ने, यह सवाल आरबीआई से पूछा जाना चाहिए। 

( विजय शंकर सिंह )

Sunday, 1 January 2023

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा छह साल पहले रुपये के नोटों को बंद करने के फैसले को 4:1 के बहुमत से बरकरार रखा है / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4-1 के  बहुमत ने माना कि, केंद्र सरकार की 8 नवंबर, 2016 की नोटबंदी की अधिसूचना वैध है और आनुपातिकता की कसौटी पर खरी उतरती है।  न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने अपने असहमतिपूर्ण विचार में कहा कि 
"हालांकि विमुद्रीकरण सुविचारित था, इसे कानूनी आधार पर (न कि उद्देश्यों के आधार पर) गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए।"
जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर, बीआर गवई, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमण्यन और बीवी नागरत्ना वाले 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने, 7 दिसंबर, 2022 को, नोटबंदी की याचिकाओं पर, अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

बहुमत के फैसले को पढ़ते हुए, न्यायमूर्ति बीआर गवई ने कहा कि, "विमुद्रीकरण का उन उद्देश्यों (कालाबाजारी, आतंकवाद के वित्तपोषण को समाप्त करना आदि) के साथ एक उचित संबंध था जिसे उद्देश्य के रूप में प्राप्त करने की बात (सरकार द्वारा) की गई थी। लेकिन यह, प्रासंगिक नहीं है कि उद्देश्य हासिल किया गया या नहीं।"
पीठ ने आगे कहा कि "मुद्रा विनिमय के लिए 52 दिनों की निर्धारित अवधि को अनुचित नहीं कहा जा सकता है।"
इसमें कहा गया है कि "निर्णय लेने की प्रक्रिया को केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि प्रस्ताव केंद्र सरकार से आया था। आर्थिक नीति के मामलों में बहुत संयम बरतना होगा।  न्यायालय अपने विवेक से कार्यपालिका के की समझ को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है।"

पीठ ने आगे कहा कि "धारा 26 (2) आरबीआई अधिनियम, जो केंद्र को किसी भी मूल्यवर्ग के बैंक नोटों की किसी भी श्रृंखला को विमुद्रीकृत करने का अधिकार देता है, का उपयोग मुद्रा की पूरी श्रृंखला के विमुद्रीकरण के लिए किया जा सकता है। आरबीआई अधिनियम की धारा 26(2) में "कोई" शब्द को प्रतिबंधित अर्थ नहीं दिया जा सकता है।  आधुनिक प्रवृत्ति व्यावहारिक व्याख्या की है।  अर्थहीनता की ओर ले जाने वाली व्याख्या से बचना चाहिए।  व्याख्या करते समय अधिनियम के उद्देश्यों पर विचार किया जाना चाहिए।"

संविधान पीठ ने कहा कि "अत्यधिक प्रतिनिधित्व के आधार पर धारा आरबीआई एक्ट की धारा 26 (2) को असंवैधानिक, घोषित करते हुए, रद्द नहीं किया जा सकता है, ऐसा इसलिए कि,  इसमें स्वताः ही अंतर्निहित सुरक्षा उपाय हैं।"
आगे फैसले में कहा गया है, “केंद्र सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है, जो वास्तव में देश के नागरिक के प्रति जवाबदेह होता है। केंद्रीय सरकार को केंद्रीय बोर्ड के परामर्श के बाद कार्रवाई करने की आवश्यकता है और यह एक अंतर्निहित सुरक्षा की स्वतः व्यवस्था है।"

हालांकि, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने अपने असहमतिपूर्ण विचार में कहा कि "500 ​​रुपये और 1000 रुपये के नोटों की पूरी श्रृंखला का विमुद्रीकरण (नोटबंदी) एक गंभीर मामला है और यह केवल गजट अधिसूचना जारी करके केंद्र द्वारा नहीं किया जा सकता है। हालांकि यह उपाय सुविचारित था, इसे कानूनी आधार पर (न कि उद्देश्यों के आधार पर) गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार के इशारे पर नोटों की सभी श्रृंखलाओं का विमुद्रीकरण बैंक द्वारा विशेष श्रृंखलाओं के विमुद्रीकरण की तुलना में कहीं अधिक गंभीर मुद्दा है। इसलिए, इसे कानून के माध्यम से किया जाना चाहिए।"
 
न्यायाधीश नगरत्ना ने आगे कहा कि, "आरबीआई ने स्वतंत्र रूप से, अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल नहीं किया और केवल विमुद्रीकरण के लिए केंद्र की इच्छा को, अपनी मंजूरी दे दी। आरबीआई द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड को देखने पर, शब्द हैं "केंद्र सरकार द्वारा वांछित "... यह दर्शाता है कि आरबीआई द्वारा कोई स्वतंत्र विचार नहीं किया गया था। पूरी कवायद 24 घंटों में ही पूरी कर ली गई थी।"
जस्टिस नागरत्ना की यह टिप्पणी, आरबीआई अधिनियम की धारा 26(2) के तहत केंद्र सरकार की शक्तियों के बिंदु पर बहुमत के फैसले से भी अलग थी।

सबसे पहले, उन्होंने कहा कि, "भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की धारा 26(2) के तहत "कोई भी श्रृंखला" का अर्थ "सभी श्रृंखला" नहीं हो सकता है।  "धारा 26(2) केवल मुद्रा नोटों की एक विशेष श्रृंखला के लिए हो सकती है और किसी मूल्यवर्ग के मुद्रा नोटों की पूरी श्रृंखला के लिए नहीं।"
इसके बाद, न्यायाधीश ने कहा कि, "आरबीआई अधिनियम में केंद्र सरकार द्वारा विमुद्रीकरण की शुरुआत की परिकल्पना नहीं की गई है।"  
उन्होंने कहा कि "धारा 26(2) के अनुसार नोटबंदी का प्रस्ताव आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड से आएगा। यदि केंद्र सरकार द्वारा विमुद्रीकरण की पहल की जानी है, तो ऐसी शक्ति एक कानून या सूची की प्रविष्टि 36 से प्राप्त एक अध्यादेश के माध्यम से होनी चाहिए जो मुद्रा, सिक्का, कानूनी निविदा और विदेशी मुद्रा की बात करती है।"

न्यायाधीश नागरत्ना ने आगे बताया, "प्रस्ताव केंद्र सरकार से उत्पन्न (ओरिजिनेट), हुआ था और आरबीआई की राय मांगी गई थी।  आरबीआई द्वारा दी गई इस तरह की राय को आरबीआई अधिनियम की धारा 26 (2) के तहत "सिफारिश" के रूप में नहीं माना जा सकता है ... जब विमुद्रीकरण का प्रस्ताव केंद्र सरकार से उत्पन्न होता है, तो यह धारा 26 (2) आरबीआई अधिनियम के तहत नहीं होता है। यह एक कानून के रूप में है, और यदि गोपनीयता की आवश्यकता है, तो एक अध्यादेश के माध्यम से इसे लागू करना चाहिए था।"
हालांकि, इस तथ्य को देखते हुए कि अधिसूचना पर पहले ही कार्रवाई की जा चुकी थी और छह साल बीत चुके थे, न्यायाधीश ने कहा कि "इस मामले में कोई राहत नहीं दी जा सकती है।  "कानून की यह घोषणा केवल संभावित रूप से कार्य करेगी और पहले से की गई कार्रवाइयों को प्रभावित नहीं करेगी," उसने कहा।

नोटबंदी की याचिकाओं पर, फैसला सुरक्षित रखते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से संबंधित रिकॉर्ड पेश करने को कहा था। भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने कहा कि दस्तावेजों को सीलबंद लिफाफे में पेश किया जाएगा। सुनवाई के दौरान, बेंच ने कहा था कि वह सिर्फ इसलिए हाथ जोड़कर नहीं बैठेगी क्योंकि यह एक आर्थिक नीति का फैसला है और कहा कि वह उस तरीके की जांच कर सकती है जिसमें फैसला लिया गया था।

संविधान पीठ ने शुरू में यह विचार व्यक्त किया था कि, "यह मुद्दा "अकादमिक" था, इस तथ्य पर विचार करते हुए कि निर्णय के छह साल बीत चुके हैं और आश्चर्य हुआ कि क्या यह कार्रवाइयों को पूर्ववत कर सकता है।  हालांकि, 12 अक्टूबर को, वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम द्वारा दिए गए प्रेरक तर्कों के बाद, बेंच गुण-दोष के आधार पर मामले की सुनवाई के लिए सहमत हो गई।  पीठ ने केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को निर्णय से संबंधित संबंधित दस्तावेज और फाइलें पेश करने को कहा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से, वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम ने दलीलें शुरू कीं।  हालांकि निर्णय के प्रभावों को पूर्ववत नहीं किया जा सकता है, न्यायालय को भविष्य के लिए कानून बनाना चाहिए, ताकि "समान दुस्साहस" भविष्य की सरकारों द्वारा दोहराया न जाए, उन्होंने तर्क दिया।  कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान, अधिवक्ता प्रशांत भूषण आदि ने भी दलीलें रखीं.  बैच में कुछ लोगों द्वारा दायर की गई कुछ याचिकाएं थीं, जिनमें नोट बदलने की समय सीमा बढ़ाने की मांग की गई थी।

भारत के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी फैसले का बचाव करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए।  एजी ने प्रस्तुत किया कि नकली मुद्रा, काले धन और आतंक के वित्त पोषण की बुराइयों को रोकने के लिए निर्णय लिया गया था।  उन्होंने तर्क दिया कि आर्थिक नीतिगत फैसलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद संकीर्ण है।  यहां तक ​​कि अगर यह मान भी लिया जाए कि नोटबंदी इच्छित परिणाम देने में सफल नहीं हुई है, तो यह न्यायिक रूप से निर्णय को अमान्य करने का कारण नहीं हो सकता है, क्योंकि यह उचित प्रक्रिया का पालन करने के बाद अच्छे विश्वास में लिया गया है, उन्होंने तर्क दिया। भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने प्रस्तुत किया कि केंद्र सरकार ने केंद्रीय बैंक द्वारा दी गई सिफारिश के आधार पर निर्णय लिया। अदालती कार्यवाही का विवरण, बार एंड बेंच और लाइव लॉ की रिपर्टिंग पर आधारित।

नोटबंदी याचिका की संविधान पीठ की सदस्य, जस्टिस नगरत्ना द्वारा दिए गये असहमति के विंदु इस प्रकार हैं।

नोटबंदी को चुनौती देने वाली दलीलों में अपने असहमतिपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस बीवी नागरथना ने कहा कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने केंद्र द्वारा प्रस्तावित पूरे 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों को रद्द करने की सिफारिश करने में स्वतंत्र रूप से दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया था।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रस्तुत निर्णय से संबंधित रिकॉर्ड का हवाला देते हुए यह राय बनाई ~

"रिकॉर्ड्स (आरबीआई द्वारा प्रस्तुत) को देखने पर, मुझे वहां शब्दों और वाक्यांशों का उपयोग मिलता है" केंद्र सरकार द्वारा वांछित", "सरकार ने 500 और 1000 नोटों के कानूनी निविदा को वापस लेने की सिफारिश की है", "सिफारिश की है  प्राप्त किया गया" इत्यादि स्वतः व्याख्यात्मक हैं। यह दर्शाता है कि (रिज़र्व) बैंक द्वारा स्वतंत्र रूप से दिमाग लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया था। न ही बैंक के पास इतने गंभीर मुद्दे पर अपना दिमाग लगाने का समय था। यह अवलोकन किया जा रहा है।  इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि 500 ​​रुपये और 1000 रुपये के बैंक नोटों की सभी श्रृंखलाओं के विमुद्रीकरण की पूरी कवायद 24 घंटे में की गई।"

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि "प्रस्ताव बैंक को संबोधित 7 नवंबर 2016 के पत्र के माध्यम से केंद्र सरकार से भेजा गया।  सिफारिश भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 26(2) के तहत बैंक से उत्पन्न (originate) नहीं हुई थी, बल्कि, केंद्र सरकार द्वारा, आरबीआई को प्राप्त हुई थी।  केंद्र सरकार से (नोटबंदी की सिफारिश का प्रस्ताव, आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड से, की जाने वाली स्वतः सिफारिश के प्रस्ताव के समान नहीं है।"

न्यायमूर्ति नागरत्न ने कहा कि "आरबीआई द्वारा इस तरह के प्रस्ताव को दी गई सहमति को आरबीआई अधिनियम की धारा 26 (2) के तहत "सिफारिश" के रूप में नहीं माना जा सकता है।"

यहां तक ​​कि तर्क के लिए यह मानते हुए भी कि "आरबीआई के पास ऐसी शक्ति है, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि ऐसी सिफारिश शून्य है क्योंकि धारा 26(2) के तहत शक्ति केवल करेंसी नोटों की एक विशेष श्रृंखला के लिए हो सकती है और करेंसी नोटों की पूरी श्रृंखला के लिए नहीं।"
न्यायाधीश ने कहा कि आरबीआई अधिनियम की धारा 26 (2) में "कोई भी" शब्द की व्याख्या "सभी" के रूप में नहीं की जा सकती है, जैसा कि बहुमत के पास है। केंद्र सरकार के कहने पर नोटों की सभी श्रृंखलाओं का विमुद्रीकरण बैंक द्वारा किसी विशेष श्रृंखला के विमुद्रीकरण की तुलना में कहीं अधिक गंभीर मुद्दा है।  इसलिए, यह कार्यकारी अधिसूचना के बजाय कानून के माध्यम से किया जाना चाहिए।"

न्यायमूर्ति नागरत्न ने आगे कहा,
"विमुद्रीकरण के उपाय से जुड़ी समस्याओं से एक आश्चर्य होगा कि क्या बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने इसके परिणामों की कल्पना की थी? क्या बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने नोटबंदी के प्रतिकूल प्रभावों पर ध्यान देने का प्रयास किया था? संचलन में इतनी बड़ी मात्रा में बैंक नोटों का विमुद्रीकरण का क्या असर पड़ सकता है, क्या आरबीआई ने इस पर सोचा था? केंद्रीय बोर्ड के उद्देश्य ठोस, उचित और उचित हो सकते हैं। लेकिन जिस तरीके से उक्त उद्देश्यों को प्राप्त किया गया और प्रक्रिया का पालन किया गया वह कानून के अनुसार नहीं था।"

आगे जस्टिस नागरत्ना ने कहा, "यह भी रिकॉर्ड में लाया गया है कि, विमुद्रीकृत मुद्रा नोटों के मूल्य का लगभग 98% बैंक नोटों के लिए विनिमय किया गया है जो एक कानूनी निविदा बनी हुई है। साथ ही बैंक द्वारा 2000 रुपये के बैंक नोटों की एक नई श्रृंखला जारी की गई थी। यह उपाय स्वयं में, उतना प्रभावी साबित नहीं हो सकता था जितना कि, यह होने की उम्मीद थी। हालांकि, यह अदालत कानून की वैधता पर, अपने फैसले, निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने में प्रभावशीलता के आधार पर नहीं करती है। इसलिए, यह  स्पष्ट किया जाता है कि वर्तमान मामले में दी गई कोई भी राहत ऐसे उपायों की सफलता के विचार से अलग है। सेंट्रल बैंक (आरबीआई) की राय केंद्रीय बोर्ड के साथ एक सार्थक चर्चा के बाद स्पष्ट और स्वतंत्र रूप से दी गई राय होनी चाहिए, जिसे भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत के नागरिकों पर प्रभाव के संबंध में अपना सही महत्व दिया जाना चाहिए। भले ही आरबीआई इस तरह की कार्रवाई की सिफारिश करता है, केंद्र सरकार एक कार्यकारी अधिसूचना के माध्यम से करेंसी नोटों की पूरी श्रृंखला का विमुद्रीकरण नहीं कर सकती है।  यह एक विधायी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना है- या तो संसद द्वारा बनाए गए कानून या अध्यादेश के माध्यम से।"

उपरोक्त कारणों के आधार पर, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने 8 नवंबर, 2016 की अधिसूचना को "कानून के विपरीत" और "गैरकानूनी" घोषित किया।

आगे फैसले में है, "परिस्थितियों में, 500 रुपये और 1000 रुपये के सभी करेंसी नोटों के विमुद्रीकरण की कार्रवाई गलत है। इसके अलावा, 2016 के बाद के अध्यादेश और 2017 के अधिनियम, जिसमें विवादित अधिसूचना की शर्तें शामिल हैं, गैरकानूनी हैं। हालांकि, इसे ध्यान में रखते हुए  इस तथ्य के लिए कि आपत्तिजनक अधिसूचना और अधिनियम पर कार्रवाई की गई है, कानून की घोषणा संभावित रूप से लागू होगी और 8 नवंबर, 2016 की अधिसूचना के अनुसार केंद्र सरकार या आरबीआई द्वारा की गई किसी भी कार्रवाई को प्रभावित नहीं करेगी। इसलिए, कोई राहत व्यक्तिगत याचिकाओं में नहीं दी जा रही है"।

न्यायमूर्ति नागरत्न ने हालांकि कहा कि यह उपाय देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली बुराइयों जैसे कि काला धन, आतंकी फंडिंग और जाली मुद्रा को लक्षित करने के लिए सुविचारित था। उन्होंने निष्कर्ष में कहा, "संदेह से परे, विमुद्रीकरण सुविचारित था। सर्वोत्तम इरादे और नेक उद्देश्य सवालों के घेरे में नहीं हैं। इस उपाय को केवल विशुद्ध रूप से कानूनी विश्लेषण पर गैरकानूनी माना गया है, न कि विमुद्रीकरण की वस्तुओं पर।"  

(विजय शंकर सिंह)