Monday, 10 October 2022

दिल्ली दंगों के बारे में, पूर्व जजों और केंद्रीय गृह सचिव की जांच कमेटी की रिपोर्ट / विजय शंकर सिंह

चार पूर्व जजों और भारत के एक पूर्व गृह सचिव ने साल 2020 में दिल्ली के उत्तरपूर्वी इलाक़े में हुए सांप्रदायिक दंगों पर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें, दिल्ली पुलिस की जाँच पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस के अलावा, केंद्रीय गृहमंत्रालय, दिल्ली सरकार और मीडिया की भूमिका पर भी कई सख़्त टिप्पणी की गईं हैं। ज्ञातव्य है कि, फ़रवरी 2020 में दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाक़े में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे जिनमें 53 लोग, जिसमें, 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे, मारे गए थे। 

इस रिपोर्ट को लेकर जो प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं में, यह कहा गया है कि इस रिपोर्ट को, वर्तमान सरकार द्वारा, कोई महत्व मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन ये रिपोर्ट, यह बताती है कि, झूठ और अन्याय के जिन उदाहरणों को दस्तावेज़ों में दर्ज किया गया है, उसे भुलाया नहीं जा सकता है। लोगों को, इन सुबूतों और जांच के बारे में, जानना चाहिए, जो जांच कमेटी ने अपनी जांच में पाया है। 

केंद्र और राज्य सरकारों में, विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर, काम कर चुके पूर्व नौकरशाहों के एक समूह 'कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (सीसीजी)' ने अक्टूबर 2020 में इन दंगों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच के लिए पूर्व जजों और नौकरशाहों की एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सीसीजी को कब सौंपी थी, इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं है लेकिन सीसीजी ने यह रिपोर्ट शुक्रवार (सात अक्टूबर, 2022) को सार्वजनिक की है।

इस जांच कमेटी के अध्यक्ष, जस्टिस मदन लोकुर (रिटायर्ड) सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज, और सदस्य के रूप में, जस्टिस एपी शाह (रिटायर्ड)- दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस आरएस सोढ़ी (रिटायर्ड) दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस अंजना प्रकाश (रिटायर्ड) पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज, और
जीके पिल्लई, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव, भारत सरकार थे। पूर्व जजों की इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट का नाम 'अनसर्टेन जस्टिस: ए सिटिज़ेन्स कमेटी रिपोर्ट ऑन द नॉर्थ ईस्ट डेल्ही वॉयलेंस 2020' (Uncertain Justice: A Citizens Committee Report on the North East Delhi Violence 2020) रखा है।

171 पन्नों की इस रिपोर्ट को तीन हिस्सों में बांटा गया है। 
० पहले हिस्से में इस बात की जाँच की गई है कि, दंगों से पहले किस तरह से सांप्रदायिक माहौल बनाया गया, दंगों के दौरान क्या हुआ, पुलिस और सरकार की भूमिका, दंगा नियंत्रण के समय क्या थी।
० दूसरे हिस्से में मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका की जाँच की गई है कि कैसे उन्होंने दंगों से ठीक पहले और उसके बाद, जांच रिपोर्ट के अनुसार 'पूरे माहौल को दूषित किया।'
० तीसरे हिस्से में दिल्ली पुलिस की जाँच को क़ानूनी नज़रिए से परखा गया है और ख़ासकर यूएपीए क़ानून लगाने को लेकर गहन अध्ययन किया गया है.
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कुछ सिफ़ारिशें भी की हैं.

सुप्रीम कोर्ट के, वरिष्ठ वकील और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष,  संजय हेगड़े ने इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 
"चार पूर्व जजों और एक पूर्व केंद्रीय गृह सचिव की इस रिपोर्ट को मौजूदा सरकार की ओर से कोई तवज्जो मिलने की कोई उम्मीद नहीं है. लेकिन भविष्य में इतिहासकार और शोधकर्ता इस रिपोर्ट को दिल्ली में 2020 में सचमुच में क्या हुआ था, इसके एक ईमानदार दस्तावेज़ के तौर पर रेफ़ेरेंस की तरह इस्तेमाल करेंगे।"
संजय हेगड़े आगे कहते हैं, 
"सत्ता के ख़िलाफ़, व्यक्ति का संघर्ष भूल जाने के ख़िलाफ़, याद रखने का संघर्ष जैसा होता है और यह रिपोर्ट इस बात को सुनिश्चित करती है कि नाइंसाफ़ी को दस्तावेज़ों में दर्ज किया गया है, उसे भुलाया नही जा सकता है।"

इस जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि, दंगों से ठीक पहले दिसंबर 2019 और जनवरी 2020 में माहौल को ख़राब करने और ख़ासकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की पूरी कोशिश की गई थी।
दिसंबर 2019 में पारित हुए नागरिक संशोधन क़ानून (सीएए) के कारण मुसलमानों को इस बात का ख़ौफ़ हो गया था कि, नागरिकता संशोधन विधेयक, सीएए और एनआरसी के ज़रिए उनकी नागरिकता को ख़तरा हो सकता है। दिसंबर, 2019 में देश के कई इलाक़ों में सीएए के विरोध में प्रदर्शन होने लगे थे, जिसमें दिल्ली शहर (शाहीन बाग़ और उत्तर पूर्वी दिल्ली) विरोध का एक प्रमुख केंद्र बन गया था.

इसी बीच दिल्ली में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई। बीजेपी ने सीएए के विरोध में प्रदर्शनों को अपने चुनाव प्रचार का मुख्य मुद्दा बनाया और इन प्रदर्शनों को राष्ट्र विरोधी और हिंसक क़रार दिया। केंद्रीय मंत्री, अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा जैसे बीजेपी नेताओं ने सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों को खुलेआम देश का 'ग़द्दार' कहा और उन्हें 'गोली मारने' का नारा लगाया। मुसलमानों के ख़िलाफ़ बनाए जा रहे इस माहौल को टीवी चैनलों और सोशल मीडिया ने और हवा दी। 

जांच कमेटी ने दिसंबर 2019 से लेकर फ़रवरी 2020 तक भारत के छह प्रमुख न्यूज़ चैनलों के प्राइमटाइम शो के 500 से भी ज़्यादा घंटे के फ़ुटेज का अध्ययन किया है। इन छह चैनलों में अंग्रेज़ी के दो (रिपब्लिक और टाइम्स नाउ) और हिंदी के चार (आज तक, ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी, रिपब्लिक भारत) चैनल शामिल हैं। जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, 
"न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया के विश्लेषण से पता चलता है कि, सीएए संबंधित रिपोर्टों को, न्यूज़ चैनलों ने, मुसलमान और हिंदू के साम्प्रदायिक मुद्दे की तरह पेश किया। मुसलमानों को हमेशा, शक की नज़र से टीवी चैनलों में दिखाया गया। चैनलों ने सीएए विरोध प्रदर्शनों को हमेशा बदनाम किया तथा इस आंदोलन में काल्पनिक आधारहीन साज़िश ढूंढ कर, उसे हवा दी और उन विरोध प्रदर्शनों को जबरन ख़त्म करवाने की माँग की."
जांच कमेटी का दावा है कि, टीवी चैनलों ने, नफ़रत के, इस माहौल को, बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें समाज के एक बड़े हिस्से को मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा के लिए उकसाया जा सका। 

इस रिपोर्ट में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदार दिल्ली पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। जांच रिपोर्ट के अनुसार, 
"23 फ़रवरी के दिन और उससे पहले भी राजनेताओं के ज़रिए हेट-स्पीच दिए जाने के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के मामले में दिल्ली पुलिस बुरी तरह नाकाम रही है।"
जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, 
"इस तरह के कई दस्तावेज़, उसके  मौजूद हैं जिससे पता चलता है कि दिल्ली पुलिस के लोगों ने भीड़ की मदद की और कई जगह मुसलमानों के ख़िलाफ़ हमलों में ख़ुद शामिल हुए।"
जांच कमेटी ने इन दंगों में, दिल्ली पुलिस की भूमिका की जाँच के लिए कोर्ट की निगरानी में, एक स्वतंत्र कमेटी बनाए जाने की भी, सिफ़ारिश की है। 

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में केंद्रीय गृहमंत्रालय पर भी उंगली उठाई है। जांच रिपोर्ट में लिखा गया है कि, 
"दिल्ली पुलिस और केंद्रीय पैरामिलिट्री बल पर नियंत्रण होने के बावजूद केंद्रीय गृहमंत्रालय सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए प्रभावी क़दम उठाने में नाकाम रहा। पुलिस और सरकार के उच्च अधिकारियों ने 24 और 25 फ़रवरी को बार-बार यह विश्वास दिलाया था कि स्थिति नियंत्रण में है लेकिन इसके बावजूद ज़मीन पर हिंसा होती रही।"

रिपोर्ट में दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस दौरान दोनों समुदायों के बीच मध्यस्थता की कोई कोशिश नहीं की। हालांकि 23 फ़रवरी से पहले ही हालात के ख़तरनाक होने के साफ़ संकेत मिलने लगे थे। जांच रिपोर्ट के अनुसार, 
"हिंसा के कुछ ही दिन पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भारी बहुमत के साथ जीतकर आए थे लेकिन दंगों के दौरान वो अप्रभावी और असहाय से दिखे।"
जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में दंगा प्रभावित लोगों को राहत पहुँचाने के मामले में भी केजरीवाल सरकार पर गंभीर टिप्पणी की है। 

इस जांच रिपोर्ट में दंगों के बाद, दर्ज हुए केस की जाँच को लेकर दिल्ली पुलिस पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। दिल्ली के अलग-अलग थानों में, इन दंगों से जुड़े क़रीब साढ़े सात सौ केस दर्ज किए गए थे। पुलिस ने 1700 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार भी किया था। जांच कमेटी का कहना है कि पुलिस ने उन लोगों की कोई जाँच नहीं की, जिन्होंने दंगों से पहले हेट-स्पीच दी थी और लोगों को हिंसा के लिए उकसाया था। 

कमेटी ने यूएपीए के तहत दर्ज किए मामलों और आईपीसी की धाराओं के अंतर्गत दर्ज किए गए मामलों का अलग-अलग अध्ययन किया है। दिल्ली पुलिस ने अदालत में जो चार्जशीट दाख़िल की है, उसमें दंगों के लिए एक सुनियोजित साज़िश का ज़िक्र किया गया है। लेकिन कमेटी का कहना है कि पुलिस ने जो आरोप लगाए हैं, वे सब बाद में दिए गए, बयानों पर आधारित हैं और उनमें, कई विरोधाभास और अनियमतिताएं हैं। कमेटी के अनुसार क़ानून के नज़रिए से देखा जाए तो उनपर भरोसा करना मुश्किल है।

जांच कमेटी का कहना है कि, 
"दिल्ली पुलिस का यह आरोप बहुत ही हास्यास्पद है कि, सीएए का विरोध करने वालों ने दंगों के लिए साज़िश रची जिसमें, सबसे ज़्यादा नुक़सान मुसलमानों और सीएए का विरोध करने वालों का ही हुआ है।"
जांच कमेटी मानती है कि, 
"पुलिस ने जानबूझकर कुछ लोगों को निशाना बनाते हुए उनपर, यूएपीए की धारा लगाई, जबकि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि, यह कोई आतंकवादी गतिविधि थी जिससे देश की अखंडता और सार्वभौमिकता को कोई ख़तरा हो।"
कमेटी का कहना है कि, 
"यूएपीए मामले में ज़्यादातर लोग आख़िरकार अदालत से बरी हो जाते हैं, लेकिन इस बीच उन्हें जमानत नहीं मिल पाती और कई साल जेल में गुज़ारने पड़ते हैं। कमेटी के अनुसार इन मामलों में, जटिल क़ानूनी प्रक्रिया ही, अपने आप में एक प्रकार की सज़ा है।"
कमेटी ने यूएपीए क़ानून की समग्र समीक्षा की सिफ़ारिश भी की है।

जांच कमेटी ने दिल्ली दंगों की निष्पक्ष जाँच के लिए, एक स्वतंत्र जाँच आयोग के गठन की सिफ़ारिश की है और, यह भी कहा है कि, जाँच आयोग का अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को बनाया जाना चाहिए जिनकी निष्पक्षता और योग्यता पर दंगा पीड़ितों को पूर्ण विश्वास हो।

दंगों के बाद जब मामला अदालत में पहुँचा, उस दौरान ऐसे कई मौक़े आए जब अदालतों ने दिल्ली पुलिस पर सख़्त टिप्पणी की और उनकी जाँच के स्तर को त्रुटिपूर्ण बताया। दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस एस मुरलीधर, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव, और दिल्ली के चीफ़ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अरुण कुमार गर्ग कई बार सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस को चेतावनी दे चुके हैं। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने तो एक मामले की सुनवाई के बाद दिल्ली पुलिस पर 25 हज़ार रूपए का जुर्माना भी लगाया था।

दिल्ली पुलिस की प्रवक्ता सुमन नालवा ने कहा ने दिल्ली पुलिस की भूमिका के बारे में, जांच कमेटी के निष्कर्षों की प्रतिकूल टिप्पणियों पर कहा है कि, 
"यह मामला अदालत के समक्ष है इसलिए वो इस पर कोई भी टिप्पणी नहीं करना चाहेंगी। लेकिन इससे पहले जब कभी भी दिल्ली दंगों में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे हैं, दिल्ली पुलिस ने तमाम आरोपों को ख़ारिज किया है।"
दिल्ली पुलिस का कहना है कि,
"उसने वीडियो एनालिटिक्स से लेकर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों की मदद से इन मामलों की जाँच की है।"

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 11 मार्च 2020 को संसद में दिल्ली के दंगों को "एक बड़ी सुनियोजित साज़िश का हिस्सा" बताते हुए दिल्ली पुलिस के बारे में कहा था कि "उन्होंने सराहनीय काम करते हुए दंगों को 36 घंटे के भीतर क़ाबू में कर लिया।"

दिल्ली दंगों पर इससे पहले भी कई रिपोर्ट आ चुकी हैं। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की ओर से गठित एक कमेटी ने जुलाई 2020 में एक रिपोर्ट जारी की थी। सुप्रीम कोर्ट के वकील एमआर शमशाद कमेटी के चेयरमैन थे जबकि गुरमिंदर सिंह मथारू, तहमीना अरोड़ा, तनवीर क़ाज़ी, प्रोफ़ेसर हसीना हाशिया, अबु बकर सब्बाक़, सलीम बेग, देविका प्रसाद और अदिति दत्ता कमेटी के सदस्य थे। इस कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि,दिल्ली पुलिस की भूमिका, प्रोफेशनल नहीं बल्कि पक्षपातपूर्ण रही है। उन्होंने भी हाईकोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक जाँच आयोग के गठन की सिफ़ारिश की थी.

'देल्ही रॉयट्स 2020: अ रिपोर्ट फ़्रॉम ग्राउंड ज़ीरो - द शाहीन बाग़ मॉडल इन नॉर्थ-ईस्ट देल्ही: फ़्रॉम धरना टू दंगा' के नाम से, मार्च, 2020 में बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों के एक समूह (जीआईए) ने 48 पन्नों की एक रिपोर्ट जारी की थी. इस समूह में सुप्रीम कोर्ट की वकील मोनिका अरोड़ा भी थीं। इस रिपोर्ट में दिल्ली दंगों के लिए 'अर्बन-नक्सल-जिहादी नेटवर्क' को ज़िम्मेदार ठहराया गया था। 

कॉल फ़ॉर जस्टिस (सीएफ़जे) नामक एक समूह ने मई 2020 में दिल्ली दंगों पर एक रिपोर्टी जारी की थी। इस रिपोर्ट का नाम था, 'दिल्ली दंगे: साज़िश का पर्दाफ़ाश'। 70 पन्नों की इस रिपोर्ट को बॉम्बे हाइकोर्ट के एक रिटायर्ड जज, जस्टिस अम्बादास के नेतृत्व वाली एक छह सदस्यीय कमेटी ने तैयार किया था. कमेटी ने इस रिपोर्ट को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को भी सौंपी थी। जीआईए और सीएफ़जे दोनों रिपोर्टों में कहा गया है कि 'राष्ट्रविरोधी, चरमपंथी इस्लामिक समूहों और अन्य अतिवादी समूहों' ने मिलकर एक साज़िश रची और एक पूर्व नियोजित और संगठित तरीक़े से हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर हमला किया। 

विभिन्न जांच रिपोर्ट्स, विभिन्न निष्कर्षों पर पहुंची हैं और कहीं कहीं इनके रिपोर्ट, परस्पर विरोधाभासी भी हैं। सरकार को एक उच्चस्तरीय न्यायिक जांच आयोग का गठन करके, दंगों के भड़कने के कारण, दंगों के दौरान, पुलिस की भूमिका, पीड़ितों के जान माल के नुकसान का आकलन, सरकार द्वारा ज़रूरी राहत कार्य न पहुंचाने के आरोपों और दंगों के भड़काने और लोगों को उकसाने के बारे में, नेताओं के भाषण तथा उनकी भूमिका की जांच करा लेनी चाहिए। दिल्ली दंगा, संभवतः देश का अकेला ऐसा दंगा रहा है, जिसे नियंत्रण में लाने के लिये, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अजित डोभाल को सड़कों पर उतरना पड़ा था। 

(विजय शंकर सिंह)

Saturday, 8 October 2022

गांधी की दांडी यात्रा (9) देशव्यापी आंदोलन के लिये कांग्रेस की तैयारी / विजय शंकर सिंह


ऐसा नहीं था कि, गांधी की दांडी यात्रा का असर, जनता पर, पहली बार पड़ रहा था। भारत का आम जनमानस, गांधी के चंपारण सत्याग्रह से ही, उनके साथ जुड़ने लगा था और फिर तो जनता और गांधी जी के बीच जो तारतम्य बना वह एक अद्भुत केमेस्ट्री थी। दांडी यात्रा ने उसे, और मांज दिया और गांधी का उद्देश्य ही था, जनता के मन से ब्रिटिश दमन, और साम्राज्यवाद तथा तद्जन्य भेदभाव से लोगों को निर्भीक बना कर उसके प्रतिरोध में, खड़ा कर देना। और गांधी ने यह डर निकाल भी दिया था। असहयोग आंदोलन में, निर्भीक जनता के आंदोलन का असर, देश और दुनिया देख चुकी थी। गांधी जानते थे, डर और संकोच से कोई भी युद्ध नहीं जीता जा सकता है और गांधी के अनुसार, स्वराज्य पाना, एक युद्ध है और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए सबसे जरूरी है, अंदर के भय को समाप्त कर देना। जनता को निर्भीक बना कर दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य के सामने खड़ा कर देना, और वह भी अहिंसा और असहयोग के साथ, यह गांधी का स्वाधीनता आंदोलन में सबसे अनूठा योगदान था।

जैसे जैसे, जन चेतना पर गांधी की दांडी यात्रा का असर पड़ता जा रहा था, सरकारी अफसर और बंबई प्रेसीडेंसी से लेकर, दिल्ली में बैठे वाइसरॉय तक धीरे धीरे असहज होते जा रहे थे। नई दिल्ली के अपने भव्य प्रासाद में, बैठे हुए लॉर्ड इरविन भी कम चिंतित नहीं थे। पर वे यह तय नहीं कर पा रहे थे कि, गांधी के सत्याग्रह को रोका कैसे जाय। साल 1930 के मार्च महीने के तीसरे सप्ताह में, उन्होंने अपने आध्यात्मिक उपदेशक, कैंटरबरी के आर्कबिशप, कॉस्मो गॉर्डन लैंग को एक पत्र लिखा:  "गांधी सागर तट पर जाने की अपनी नाटकीय यात्रा, जारी रख रहे हैं, लेकिन अभी तक मेरे अनुमान से, जनता में उत्साह कम है, यह एक अच्छी बात है। मुझे पूरा यकीन है कि हमारा, अब तक उन्हे (गांधी को) गिरफ्तार नहीं करना, एक सही कदम रहा है।" उल्लेखनीय है कि, बंबई के गवर्नर, फ्रेडरिक साइक्स के, बार बार अनुरोध करने के बाद भी, वायसरॉय, अभी तक गांधी की गिरफ्तारी पर कोई निर्णय नहीं ले सके थे। 

जनवरी 1930 के पहले सप्ताह में, विंस्टन चर्चिल ने वायसराय लॉर्ड इरविन को पत्र लिखकर गांधी और कांग्रेस के खिलाफ मजबूती से खड़े होने का आग्रह किया। तब चर्चिल वित्तमंत्री का अपना कार्यकाल पूरा करके, सरकार से बाहर आ गए थे। विंस्टन चर्चिल के भारत और गांधी के बारे में क्या दृष्टिकोण था, इसके लिये, आर्थर हरमैन की पुस्तक, चर्चिल एंड गांधी का यह उद्धरण पढ़ा जाना चाहिए, 
"साल, 1885 में, पिता (यहां विंस्टन चर्चिल के राडाल्फ़ का उल्लेख है) ने चेतावनी देते हुए कहा था, "भारत के बिना, इंग्लैंड एक राष्ट्र ही नहीं रह पाएगा।" और साल 1931में, विंस्टन चर्चिल ने भी चेतावनी भरे लहजे में कहा था, "बिना भारत के, ब्रिटिश साम्राज्य, एक झटके से, जीवनविहीन होकर, इतिहास से समा जाएगा।"
साल 1931 वह काल खंड था, जब आयरलैंड का अधिकांश हिस्सा, साम्राज्य से निकल चुका था, मिस्र में ब्रिटिश साम्राज्य 'समाप्त' हो रहा था। अब विंस्टन चर्चिल को यह उम्मीद थी कि, कम से कम 'भारत में,  ब्रिटिश साम्राज्य अपनी पुरानी ताकत में उठ खड़ा होगा'। लेकिन, तब तक बहुत कुछ बदल चुका था। विंस्टन चर्चिल, भारत की आज़ादी के धुर विरोधी थे और गांधी से भी उनकी खुन्नस बहुत थी। वह लॉर्ड इरविन के नमक सत्याग्रह के संदर्भ में उठाये जा रहे, नरम दृष्टिकोण के विरुद्ध थे। 

चर्चिल, जहां इरविन को, गांधी के प्रति सख्त रुख अपनाने का मशविरा दे रहे थे, वही इरविन को एक और दोस्ताना सलाह मिली, गांधी जी के सहयोगी, सीएफ एंड्रयूज़ की। लॉर्ड इरविन को सीएफ एंड्रयूज़ से बहुत अलग प्रकार की सलाह मिली। एंड्रयूज, ने लॉर्ड इरविन को, गांधी, तक पहुंचने के लिए, उन्हें समझने की बात की। उन्होंने गांधी के खादी को, बढ़ावा देने की उनकी नीतियों को प्रोत्साहित करने की बात की, ताकि विदेशी वस्त्रों और वस्तुओं को छोड़ कर, भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सके।  एंड्रयूज ने, इरविन को लिखा कि, "भारत, की स्थिति 'नस्लीय समानता की स्वीकृति के असीम रूप से बड़े प्रश्न का एक हिस्सा थी।'  जब तक ऐसा नहीं होता, हम स्वयं केवल वर्तमान संघर्ष के जारी रहने की उम्मीद कर सकते हैं।" एंड्रयूज़ की यह सलाह, चर्चिल के मशविरे से बिल्कुल अलग थी, बल्कि एक दूसरे की विरोधाभासी भी थी। चर्चिल, गांधी के खिलाफ, वाइसरॉय को, सख्त होने की हिदायत दे रहे थे और एंड्रयूज़, उनसे गांधी को समझने, और उनकी नीतियों को मानने की बात कर रहे थे। 

लॉर्ड इरविन का गांधी की दांडी यात्रा को लेकर जो विचार था, वह न तो, विंस्टन चर्चिल की तरह 'ब्रिटिश साम्राज्यवादी सर्वोच्चता के रक्षक' के प्रति किसी प्रतिबद्धता से प्रेरित था, और न ही, वे सीएफ एंड्रयूज की तरह, पूर्णरूप से, नस्लीय समानता के प्रबल समर्थक की तरह थे। द टाइम्स ऑफ लंदन के संपादक जेफ्री डावसन जो, लॉर्ड इरविन के ही समान, ऑक्सफोर्ड में ऑल सोल्स कॉलेज के फेलो थे को, इरविन द्वारा भेजे गए, एक पत्र से, इरविन की मनःस्थिति का पता चलता है। यहाँ, इरविन ने लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन, जिसमे पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया गया था, का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि, "लाहौर [कांग्रेस] की कार्यवाही का स्पष्ट परिणाम, (कांग्रेस के भीतर की) उदारवादी राय को अधिक प्रोत्साहन देने के लिए रहा है, जैसा कि मैंने भारत में रहने के बाद देखा है। वे (नरमपंथी) वास्तव में अपना चोला बदल रहे हैं और प्रचार के लिए काम करना, संगठित होना, और धन इकट्ठा करना, और हर बिंदु पर कांग्रेस से लड़ना।" 

लॉर्ड इरविन, कांग्रेस के भीतर, उदारवादी तत्वों और और नई पीढ़ी के बीच जो वैचारिक संघर्ष था, उसे रेखांकित करते हुए अपनी बात कह रहे थे। कांग्रेस के अंदर जब पूर्ण स्वराज्य और एक नए सविनय अवज्ञा आंदोलन के रूप में नमक सत्याग्रह की बात चली तो, कांग्रेस का उदारवादी तबका, जो मूलतः संविधानवादी थे, वे किसी भी प्रकार के जबआंदोलन के पक्ष में नहीं थे। इन उदारवादियों को लगता था कि, गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने, कांग्रेस पर कब्ज़ा कर लिया है और अब कांग्रेस का स्वरूप बदल गया है। इरविन को लगता था कि, गांधी की दांडी यात्रा को, अपेक्षित समर्थन नहीं मिलेगा और उसका प्रभाव स्थानीय क्षेत्र तक ही सीमित रहेगा। लॉर्ड इरविन की मुलाक़ात,  हाल ही में उदारवादी नेता, वीएस  श्रीनिवास शास्त्री से हुई थी, जिनके अनुसार,  'गांधी एक शहीद की तरह अमर होना चाहते हैं।' इरविन को कुछ अन्य लोगों से भी, गांधी जी के बारे में, यह जानकारी मिली थी कि, गांधी ने 'अपने जीवन को आदर्श बनाने की कोशिश की है और लोग उन्हें, भगवान के रूप में देखते हैं। इसी यात्रा में, उनके पीछे पीछे एक टट्टू भी चलाया जाता है, जिस पर, वे जब थक जांय तो बैठ सकते हैं। यह बाइबिल की उस कथा की तरह है, जिसमें, यह वर्णित है कि, यीशु, अपने दूसरे आगमन में, स्वर्ग के स्वर्गदूतों के साथ, एक सफेद घोड़े पर सवार होकर आते हैं।' लेकिन यह बात इरविन को गप्प की तरह लगी थी। 

गांधी से जुड़ी अनेक कहानियां जनमानस में घूम रही थी। दांडी यात्रा के दौरान एक बार जरूर, गांधी जी से, उनके घुटनों में हो रही तकलीफ के कारण, एक टट्टू पर कुछ देर, पांव को आराम देने के लिये बैठने का आग्रह, उनके सहयात्रियों ने किया था, पर गांधी जी ने टट्टू की सवारी करने से मना कर दिया था। इरविन इसी बात का उल्लेख करते हुए, इस प्रसंग को, ईसा और बाइबिल से जोड़ कर, प्रचारित किये जा रहे, इस प्रसंग का उल्लेख कर रहे थे। वायसराय के लिए, तब, गांधी जिज्ञासा की वस्तु थे, अध्ययन के लिए एक विषय थे, लेकिन कम से कम अभी तक, लॉर्ड इरविन, उन्हें, साम्राज्य के लिये, एक बड़े राजनीतिक खतरे के रूप में नहीं देख पा रहे थे। हालांकि, लॉर्ड इरविन ने, भारत के राज्य सचिव को, एक पत्र में यह स्वीकार करते हुए लिखा भी था कि, सरकार द्वारा गांधी को अब तक गिरफ्तार करने से इनकार करना 'उनकी योजनाओं के लिए शर्मिंदगी' की तरह है।" गांधी की गिरफ्तारी को लेकर, लॉर्ड इरविन की यह दुविधा लंबे समय तक बनी रही। 

गांधी की दांडी यात्रा को लेकर भले ही, वाइसरॉय किसी दुविधा में रहे हों, पर कांग्रेस, इस सविनय अवज्ञा आंदोलन को लेकर, किसी भी प्रकार की दुविधा में नहीं थी। यात्रा के ही दौरान, 20 मार्च 1930 को, गांधी जी के साबरमती आश्रम में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की, एक ज़रूरी बैठक बुलाई गई। जिसकी अध्यक्षता, कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने की। इस बैठक में, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू, पीडी टंडन, अब्बास तैयबजी, दरबार गोपालदास, जेबी कृपलानी, एनसी.(काका) कालेलकर, कस्तूरबा गांधी, अनुसूयाबेन और श्रीमती अम्बालाल,ने भाग लिया। सबने इस यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण, तेजी से बदल रही परिस्थितियों का अध्ययन किया। एआईसीसी ने, सर्वसम्मति से एक प्रमुख संकल्प पारित किया और सविनय अवज्ञा आंदोलन के संबंध में, किसी भी कदम को उठाने के लिये महात्मा गांधी को, अधिकृत किया। उन्होंने, आंदोलन के बारे में, फैसले लेने का अधिकार, गांधी जी को सौंप दिया और पूरे देश मे गांधी के इस आंदोलन को सफल बनाने के लिये व्यापक जनजागरण करने का निश्चय किया। 

कांग्रेस ने, उन शर्तों को तय किया जिनके तहत, जरूरत पड़ने पर, विभिन्न प्रांतों में, बड़े पैमाने पर सत्याग्रह शुरू करना था। प्रांतीय कांग्रेस समितियों को सविनय अवज्ञा के तरीके, स्वरूप और स्थान के बारे में व्यापक, दिशा निर्देश दिये गये। उनके लिए, खुला विकल्प भी दिया गया, कि, वे अपने प्रांतों को, किसी, प्रकार से, सत्याग्रह के लिए तैयार कर सकते हैं, और वही करें, जो उनके लिए, उन परिस्थितियों में, सबसे उपयुक्त हो। लेकिन, यह स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि, नमक सत्याग्रह हर प्रांत में, संभव होने पर, किया जाना चाहिए। सत्याग्रह के अन्य तरीकों के लिए भी, उन्हे तैयार रहने को कहा गया। लेकिन यह, अभियान के दूसरे चरण के लिए बनाई गई कार्ययोजना थी। यदि गांधी जी को गिरफ्तार किया जाता है तो, प्रांतीय कांग्रेस समितियों को तुरंत सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का निर्णय लेना होगा। और यदि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता है, तो उन्हें, एआईसीसी के निर्देशों का इंतजार करना चाहिए जो कि, एआईसीसी द्वारा, तत्समय की परिस्थितियों पर, विचार करके, सब को बताया जाएगा। यदि गांधी जी कोई आवश्यक निर्देश देते हैं तो, प्रांतीय कांग्रेस समितियों को तुरंत एआईसीसी के माध्यम से, सूचित किया जाएगा। 
 
एआईसीसी की साबरमती आश्रम में हुई बैठक में, पारित प्रस्ताव और कांग्रेस की सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलन करने के निर्णय पर, भारत सरकार की चिंता बढ़ने लगी। वायसरॉय के, गृह सदस्य ने सुझाव दिया, 'यह आवश्यक है कि, हम स्थानीय सरकारों को, समय रहते, इस प्रस्ताव के बारे में, चेतावनी दे दें। उनका यह भी कहना था कि,  कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों के पत्राचार;  कांग्रेस के प्रधान कार्यालय और सभी प्रांतीय कांग्रेस कार्यालयों और प्रांतीय कांग्रेस अध्यक्षों और किसी व्यक्ति विशेष के पत्राचार को, जिसका संबंधित स्थानीय सरकार में पत्राचार 'विशेष रूप से महत्वपूर्ण' जानकारी प्राप्त करने की संभावना के रूप में हो, की निंदा की जानी चाहिए। 

अभी मुश्किल से दस दिन ही, दांडी यात्रा के हुए थे, लेकिन अभी से ही कांग्रेस ने, अपना भावी प्रतिरोध कार्यक्रम घोषित कर दिया, जबकि, यात्रा का, असल प्रभाव तो, अब सामने आने की उम्मीद, सरकार को थी। पूरा देश पहले से ही यात्रा की प्रगति के समानांतर, उत्साह से ओत प्रोत था। यह बिल्कुल उसी तरह का जोश से भरा हुआ माहौल था, जो, 1920-22 के असहयोग आंदोलन के दिनों की याद दिला रहा था। प्रांतों में लोग, आंदोलन शुरू करने की योजना बना रहे थे, और कुछ मामलों में, जगह जगह, आंदोलन की भूमिका बननी शुरू भी हो गई थी। बंगाल कांग्रेस ने, सविनय अवज्ञा के लिए, एक 'युद्ध परिषद' का गठन किया। संयुक्त प्रांत में, प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने एक सत्याग्रह समिति की शुरूआत की थी, जिसमें प्रमुख नेता शामिल थे, जिसमें स्वयं कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। देश भर से जो संकेत मिल रहे थे, उनसे, साफ दिखाई दे रहा था कि, सत्याग्रह यात्रा भले ही अहमदाबाद से शुरू होकर दांडी तक, हो रही हो, पर, पूरा देश एक अभूतपूर्व आंदोलन की आहट महसूस कर रहा था।

वाइसरॉय, की गांधी की दांडी यात्रा को लेकर जो दुविधा थी, उसका एक कारण, ब्रिटिश परस्त अखबारों की दांडी यात्रा को लेकर, उनकी वे टिप्पणियां थी, जिनमे गांधी की दांडी यात्रा को एक कम प्रभाव डालने वाला अभियान बताया जा रहा था। मुख्य रूप से ये, ब्रिटिश स्वामित्व वाले अखबार थे, कलकत्ता से छपने वाला, स्टेट्समैन और बम्बई का टाइम्स ऑफ इंडिया। स्टेट्समैन अखबार ने, यात्रा को, एक बचकानी और निरर्थक अभियान कहा, और टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी, इस अभियान को, 'मिस्टर गांधी के अभियान की निरर्थकता' शीर्षक से, एक संपादकीय लिख कर इस अभियान को, जनता को प्रभावित न कर सकने की, बात कही। टाइम्स ऑफ इंडिया ने, दावा किया कि, नमक कर, गरीबों को लालची बिचौलियों के हस्तक्षेप से बचाता है, और यही वजह है कि जापान जैसे स्वतंत्र देशों में भी नमक के उत्पादन और बिक्री पर राज्य का एकाधिकार है। गांधी की इस यात्रा के साथ, कुछ विदेशी पत्रकार भी चल रहे थे। इसमें, डेली टेलीग्राफ के एक संवाददाता ने दावा किया कि, "यदि दांडी यात्रा की एक चौथाई दूरी पार करने के बाद भी, मिस्टर गांधी की गिरफ्तारी नहीं की जाती है तो, उनसे (गांधी जी) अधिक कोई भी, अधिक निराश नहीं होगा। गांधी निश्चित रूप से भारत के एक हिस्से में ही यात्रा कर रहे थे 'जो यूरोपीय लोगों के लिए असुरक्षित है, लेकिन, यह संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि, गांधी की गिरफ्तारी के बाद, वास्तव में, कुछ घंटों में ही, उत्साह और क्षणिक उथल-पुथल का कारण बन सकता है।"

स्टेट्समैन और टाइम्स ऑफ इंडिया के दांडी यात्रा से जुड़ी खबरों और यात्रा के प्रभाव का, विपरीत आकलन का असर, अमेरिकी समाचार पत्रिका टाइम पर भी पड़ा। टाइम मैगजीन ने भी, इस यात्रा के संबंध में अपना आकलन छापते हुए गांधी के चश्मे के 'धुंधले फ्रेम' और गांधी की, कद काठी और दुबली पतली काया का उल्लेख, तिरस्कारपूर्ण शब्दावली में किया और इसका मज़ाक़ उड़ाया। टाइम पत्रिका, गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा से भी कम प्रभावित दिखी और कस्तूरबा को, 'एक सिकुड़ी हुई, मध्यम आयु वर्ग की हिंदू' महिला लिख कर, उनका मज़ाक़ उड़ाया। टाइम के अनुसार, 'जिस भीड़ ने गांधी को आश्रम से विदा किया, उसे वह यूं ही उत्कण्ठा वश और यूं ही खड़ी हुई, दिख रही थी।' यात्रा के पहले ही दिन, टाइम मैगजीन ने दावा किया, 'मि. गांधी के सिर और पैरों में दर्द होने लगा, वे 'परेशान और झुके हुए', किसी तरह से,  उस रात, अपने, गंतव्य पर पहुंच सके थे। अगली सुबह, जैसे तैसे, उनकी यात्रा जारी रही। स्टेट्समैन और टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, 'जाहिरा तौर पर एक भी जयजयकार उन गांवों में नहीं हुई, जहां से वे गुजरे थे। फिर भी, संत गांधी ने अपने  रुकने के स्थान पर, शांत, खाली गली को ऊपर और नीचे देखा,  घरों की खाली खिड़कियों को संबोधित किया'।' टाईम मैगजीन ने लिखा, 'दूसरे दिन की पैदल यात्रा के अंत में, गांधी जमीन पर गिर गए थे।' इस समय, टाइम पत्रिका को यह उम्मीद थी कि, 'दुर्बल संत,  शारीरिक रूप से (यात्रा में) बहुत आगे जाने में सक्षम नहीं होंगे।' इस यात्रा और गांधी के सत्याग्रह के बारे में, वाइसराय की राय, इन्ही ब्रिटिश परस्त अखबारों में छप रही खबरों से बन रही थी। जो तथ्यों के विपरीत और भटकाने वाली थीं। लेकिन जो खबरें सरकारी इंटेलिजेंस सूत्र दे रहे थे, वे इन अखबारों से अलग थे और उनके अनुसार, यह एक बड़े आंदोलन की शुरुआत थी, जिससे तुरंत निपटा जाना चाहिए। 

अंग्रेजी और साम्राज्यपरस्त अखबार, गांधी, उनकी दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह का आकलन एक तमाशे के रूप में, भले ही कर रहे हों, पर देश के राष्ट्रवादी प्रेस का दृष्टिकोण, उनसे बहुत अलग था। कानपुर से छपने वाले अखबार, प्रताप, कलकत्ता की अमृत बाजार पत्रिका और बंबई से छपने वाला अंग्रेजी अखबार, बॉम्बे क्रॉनिकल जैसे राष्ट्रवादी प्रेस, इस यात्रा को, एक ऐतिहासिक, एपिक यानी महाकाव्यात्मक और पौराणिक, यात्रा के रूप में बता रहे थे। संयुक्त प्रांत में एक अखबार ने गांधी की तुलना भगवान कृष्ण से की, गायों के बजाय बकरियों का दूध पीना, मक्खन के बजाय नमक चुराना, बांसुरी बजाने के बजाय चरखा चलाना, जैसे रूपकों का प्रयोग किया। बंगाल के एक, उद्योगपति, प्रफुल्ल चंद्र रे ने, नमक सत्याग्रह यात्रा की तुलना, मूसा के अधीन इस्राएलियों के पलायन से की, जबकि मोतीलाल नेहरू ने इसकी तुलना, भगवान राम के लंका अभियान से की।

यात्रा जैसे जैसे अपने गंतव्य की ओर, बढ़ती गयी, सविनय अवज्ञा आंदोलन का जनमानस में प्रचार और ब्रिटिश नौकरियों, पदों के सामाजिक बहिष्कार का दबाव, लोगों पर बढ़ता गया और बड़ी संख्या में, लोग इस्तीफे देने लगे। 22 मार्च 1930 तक, अहमदाबाद जिले से, दिए गए, इस्तीफे की अनुमानित संख्या चार थी, कैरा से सत्ताईस (जिनमें से सोलह केवल बोरसाद तालुका से थे) सत्रह भड़ौच से, और दो सूरत से थे। लेकिन सूरत से आने वाले त्यागपत्रों की संख्या, जल्द ही 5 अप्रैल तक सबसे अधिक हो गई। एक सौ चालीस मुखियाओं ने अपना इस्तीफा, गांधी जी के कहने पर, दे दिया था और दस दिन बाद, यह आंकड़ा बढ़कर दो सौ सत्ताईस हो गया था। गांधी ने साफ साफ, यह भी, जनता को जता दिया था कि, "किसी के द्वारा, इस्तीफ़ा देना और फिर इसे वापस लेना कायरता मानी जाएगी। इस्तीफा देने की कोई बाध्यता नहीं है। जो, इस इस गुलामी को, गंदी और गंदी चीज के रूप में देखते हैं उन्हें, मुखिया के पद को छोड़ देने की सलाह दी जाती है।"
 
26 मार्च 1930 को, गांधी, भड़ौच की एक सभा मे, साम्प्रदायिक सवाल को पुनः उठाते हैं। उन्होंने, खुद का दृष्टिकोण, स्पष्ट करते हुए कहा कि, 'उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे केवल अपने खुद के प्रयास से या केवल हिंदुओं की सहायता से, स्वराज जीत सकते हैं।  उन्होंने मुसलमानों, पारसियों, ईसाइयों, सिखों, यहूदियों और अन्य सभी भारतीयों की सहायता मांगी। उन्हें अंग्रेजों की भी सहायता की आवश्यकता थी। अब वे आगे कहते हैं, "लेकिन मैं, यह भी जानता हूं कि यह सारी संयुक्त सहायतायें बेकार है, यदि मेरे पास एक और मदद नहीं है तो, और वह सहायता है, ईश्वर की। उसकी सहायता के बिना सब व्यर्थ है।  और अगर वह इस संघर्ष के साथ हैं, तो किसी और मदद की जरूरत नहीं है।" 
 
यात्रा भी चल रही थी, गांधी का जनता को सत्याग्रह से जोड़ने का अभियान भी चल रहा था, अंग्रेजी और ब्रिटिश साम्राज्यपरस्त अखबारों द्वारा इस सत्याग्रह की खिल्ली भी उड़ाई जा रही थी, और इसी बीच, 30 मार्च 1931 को जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक पत्र में गांधी, अपने सत्याग्रह के प्रभाव को लेकर पूरी तरह आशान्वित थे। गांधी, लिखते हैं, "गुजरात में चीजें वास्तव में बहुत अच्छी तरह से आकार ले रही हैं ... मुझे लगता है कि आप अपना ध्यान फिलहाल नमक कर पर सीमित रखने के लिए सही हैं।  हम इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं। जब तक आप मुझसे इसके विपरीत नहीं सुनते, कृपया 6 अप्रैल को एक साथ शुरू होने की तारीख के रूप में लें।" 6 अप्रैल का दिन, नमक कानून तोड़ने का दिन था। गांधी तब तक के लिये उन्हें, यही सलाह दे रहे थे कि, अभी जो काम वह कर रहे हैं, करते रहे और 6 अप्रैल तक प्रतीक्षा करें। 
....क्रमशः

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

गांधी की दांडी यात्रा (8) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/10/8.html

Wednesday, 5 October 2022

गांधी की दांडी यात्रा (8) गांधी की गिरफ्तारी और ब्रिटिश सरकार का द्वंद्व / विजय शंकर सिंह

जैसे-जैसे दांडी यात्रा के प्रारंभ होने का दिन नजदीक आता गया, लॉर्ड इरविन नमक सत्याग्रह को लेकर, अभी भी इसी मत के थे कि, यह सत्याग्रह, देर सबेर विफल हो जाएगा और, नमक जैसी साधारण सी वस्तु पर, लगाया गया कर, पूरे देश की जनता को, आंदोलित नहीं कर पायेगा। यात्रा के एक हफ्ते पहले, 6 मार्च 1930 को उन्होंने  को उन्होंने, फेलो ऑफ ऑल सोल्स के, एक मित्र को पत्र में लिखा कि, "हमारे मामले, यदि केवल गांधी से जुड़े मामलों (सत्याग्रह से जुड़े) को छोड़ दें तो, बहुत बुरे नहीं चल रहे हैं। लेकिन वह (गांधी) उन्हें असंभव  बनाने की पूरी कोशिश कर रहा है। वह आदमी भी, क्या गजब पहेली है!" 
( इरविन का पत्र, लियोनेल करीज के नाम, 6 मार्च 1930, संदर्भ, गांधी द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड, राम चंद्र गुहा, पृष्ठ.340)

इस घटना के छः दिन बाद, गांधी ने अपना सत्याग्रह और दांडी यात्रा की शुरुआत, 12 मार्च 1930 को, कर दी। इस घटना का असर जैसा कि आप पिछले अंकों में पढ़ चुके हैं। उनकी नमक कानून तोड़ो यात्रा की खबरों से, पेशावर से लेकर ढाका तक और दिल्ली से लेकर मद्रास तक न केवल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं में, बल्कि आम जनता में भी, गजब का उत्साह था। ऐसा भी नहीं था कि, सरकार को, इन सब खबरों का पता नहीं था, बल्कि, उन्हे तो, सारी खुफिया जानकारी मिल ही रही थीं, पर वायसरॉय लॉर्ड इरविन, अब भी इस आंदोलन को लेकर, यही सोच रहे थे कि, इस आंदोलन का बहुत अधिक असर, देश और लोगों पर नहीं पड़ेगा। वायसरॉय को, मिलने वाली प्रांतीय सरकारों की पाक्षिक रिपोर्टों में, जो खुफिया सूचनायें दर्ज हो रही थीं, वे इस यात्रा को लेकर, एक व्यापक जनआंदोलन का संकेत दे रही थीं। मद्रास सरकार, ने दिल्ली सरकार को सूचना भेजी की, "गांधी के सविनय अवज्ञा अभियान की शुरुआत ने, अन्य सभी मुद्दों को, पूरी तरह से ढंक दिया है। लोगों में सिवाय गांधी की दांडी यात्रा के और कोई चर्चा हो ही नहीं रही है।" इसी तरह, बंबई के गवर्नर ने, दिल्ली को बताया कि, "इस यात्रा ने, 'गुजरात और अन्य जगहों पर बहुत उत्साह पैदा किया है। अहमदाबाद में विशेष रूप से, लोग बहुत उत्साहित हैं और इस यात्रा में, रुचि ले रहे हैं। अहमदाबाद शहर के लोग गांधी की यात्रा और उनसे जुड़ी बैठकों में, उत्साह स भाग ले रहे हैं।"
(गृह (राजनीतिक) विभाग को भेजे जाने वाली, पाक्षिक रिपोर्ट का अंश, संदर्भ, गांधी द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड, रामचन्द्र गुहा, पृष्ठ 340-41)

वायसराय, देश के राजनीतिक माहौल का अपने दृष्टिकोण और प्रशासनिक तंत्र से मिली सूचनाओं के आधार पर, गंभीरता से आकलन कर रहे थे। सचमुच यह एक ऐसी महत्वपूर्ण  राजनीतिक परिस्थिति बन रही थी, जिससे निपटना, उनकी प्राथमिकता बन गई थी। यात्रा के पांच दिन बाद, जब गांधी गुजरात के शहर, आनंद पहुंच गए थे तो, 17 मार्च, 1930 को लंदन स्थित सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को, एक तार भेजा, जिसमे उन्होंने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को, लिखा कि, "इसमें (खुफिया सूचनाओं में) रिपोर्ट की गई, राजनीतिक गतिविधियां, भारत के अधिकांश हिस्सों में कहीं खामोशी तो कहीं खुल कर जारी है .... उनका (गांधी का) आधिकारिक कार्यक्रम है, (सत्याग्रह) अभियान को क्रमिक चरणों में फैलाना। जिसका, गांधी की दांडी यात्रा, के साथ, पहला चरण शुरू हो गया है। दूसरा उनकी गिरफ्तारी के बाद, (इस) अभियान को और व्यापक बनाने के उद्देश्य से,  शुरू होना है, और तीसरा चरण, व्यापक पैमाने पर एक जनआन्दोलन का होना है।"

ब्रिटिश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों ने, गांधी जी के नमक सत्याग्रह को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के, सामने, इस सिविल नाफरमानी को कोई चुनौती नहीं समझी और इससे उन्हे, सरकार के खिलाफ, किसी हानिकारक परिणाम की उम्मीद भी नहीं थी।  सेंट्रल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के सदस्य जॉर्ज रिचर्ड फ्रेडरिक टोटेनहैम ने इसे 'श्री गांधी की कुछ शानदार परियोजना' के रूप में वर्णित किया लेकिन, वे इस सत्याग्रह के पीछे जो, जन आंदोलन उभर रहा था, और पूर्ण स्वराज की जो, ललक जनता के बीच फैल रही थी, को भांप नहीं पाए। एक प्रकार से वायसरॉय, एक दुविधापूर्ण स्थिति का सामना कर रहे थे। 

दांडी यात्रा मार्ग का पूरे इलाके का कुछ भाग, या तो बड़ौदा रियासत के अंदर से गुजरता था पर अधिकांश, वह बॉम्बे प्रेसीडेंसी के आधीन ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। जाहिर है इस यात्रा का क्या असर हो सकता है, यह बंबई के गवर्नर फ्रेडरिक साइक्स, बखूबी महसूस कर रहे थे। अपनी प्रेसीडेंसी में, हो रही राजनीतिक परिस्थितियों पर, गांधी की इस यात्रा को लेकर, फ्रेडरिक साइक्स, चिंतित भी थे। उन्होंने, वायसरॉय को अपनी चिंता से अवगत कराते हुए एक पत्र लिखा कि, "गांधी की इस यात्रा को, लम्बे समय तक जारी रहने की उम्मीद की जा रही है। इससे हम अभी तक, यह अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं कि, इसका असर, पूरे प्रेसीडेंसी में किस प्रकार से पड़ेगा।" इसलिए उन्होंने, यात्रा के दौरान ही, गांधी जी के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई करने का सुझाव दिया।

लेकिन वायसराय, गांधी के खिलाफ, किसी कार्यवाही के लिए, अभी थोड़ा और, समय चाहते थे। वे यह तय नहीं कर पा रहे थे कि, फिलहाल वे इस यात्रा और गांधी के सत्याग्रह से कैसे निपटें। 24 मार्च 1930 को, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को, एक तार भेज कर, उन्होंने कहा कि, 
"....... जहां तक ​​गुजरात का संबंध है, वहां (यात्रा का) स्थानीय प्रभाव काफी है, हालांकि, संभवतः वह क्षणिक भी है ..... जहां तक ​​शेष भारत का संबंध है, ऐसा लग रहा है कि, (यात्रा का) वर्तमान प्रभाव, तुलनात्मक रूप से, (गुजरात की तुलना में) कम ही हो। भारत सरकार का यह विचार है कि, गांधी को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि मामले (सत्याग्रह से जुड़े) इतने बिगड़ न जांए कि, कोई उचित विकल्प ही न बचे या जब तक, बॉम्बे सरकार, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसी आवश्यकता (गांधी को गिरफ्तार करने की) महसूस न करे, और, तत्काल ऐसी कार्रवाई (गांधी की गिरफ्तारी) की मांग न कर दे।" 

वायसरॉय गांधी की दांडी यात्रा को लेकर क्या सोच रहे थे, इसे, उन्होंने कैंटरबरी के आर्कबिशप और अपने मित्र जीआर लेन-फॉक्स, को, कुछ इस प्रकार से लिखा, 'मैने कुछ दिनों पहले साइक्स और हैली के साथ इस पर (गांधी की गिरफ्तारी पर) चर्चा की थी और हम सभी (इस बात पर) सहमत थे कि आखिर कब तक कोई इस मूर्खतापूर्ण नमक स्टंट पर उनको (गांधी को)  गिरफ्तार करने से बच सकता है, लेकिन, हमें शायद ऐसा कुछ (गांधी की गिरफ्तारी को लेकर) करना चाहिए।"

भारत सरकार, के सामने एक दिक्कत और भी थी कि, वह अगर गांधी जी को गिरफ्तार करती भी तो, किस कानून के अंतर्गत करती? अभी नमक बना कर, कोई कानून तोड़ा नहीं गया था। गांधी जिस तरह से घूम घूम कर जन सभाओं में अपनी बात कह रहें हैं, उन्हे हिंसक और भड़काऊ भी नहीं कहां जा सकता था। कानून के जानकारों ने सरकार को बताया कि, गांधी की गिरफ्तारी, आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा 117, के अंतर्गत की जा सकती है। लेकिन यह प्राविधान तो, जमानतीय था। अगर वे जमानत पर छूटना चाहते हैं तो अदालत उन्हे जमानत दे भी देगी। इस कानून से तो, उनकी यात्रा और सत्याग्रह रोका भी नहीं जा सकता था। बंबई के गवर्नर का यह मानना था कि, गांधी की गिरफ्तारी, की भी जाय तो किसी लंबी अवधि के लिए उन्हें जेल में रखा जाय। गिरफ्तारी और जेल जाने की स्थिति में, 'अगर गांधी, भूख हड़ताल कर देते हैं तब, उन्हें हिरासत में मरने की बजाय, रिहा कर दिया जाना चाहिए।'

गाँधी की दांडी यात्रा के प्रारंभ होने के एक सप्ताह बाद ही, अंग्रेजी अखबार, द टाइम्स ऑफ इंडिया ने, वायसरॉय लॉर्ड इरविन और बंबई के गवर्नर, फ्रेडरिक साइक्स के समान ही, गांधी के इस सत्याग्रह पर एक सख्त टिपणी की थी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने,  यात्रा के एक सप्ताह पहले, 5 मार्च 1930 को सरदार वल्लभभाई पटेल को गिरफ्तार किये जाने के सरकार के कदम की सराहना की और गांधी की गिरफ्तारी के लिए,  ब्रिटिश प्रेस के बयानों से, अनुकूल उद्धरण भी प्रकाशित किये। हालांकि, गांधी के खिलाफ, गंभीर कानूनी कार्रवाई और उनकी तत्काल गिरफ्तारी के बारे में अखबारों की राय अलग अलग थी। गांधी की गिरफ्तारी को लेकर, सरकार के, प्रांतीय सरकार, भारत सरकार और ब्रिटेन की सरकार में अनेक तरह के, द्वंद्व और भ्रम की स्थिति थी। लॉर्ड इरविन ने स्पष्ट रूप से अपना इरादा, गांधी की गिरफ्तारी को लेकर नहीं बनाया था, क्योंकि उन्होंने दांडी यात्रा के लगभग दो महीने बाद तक, गांधी की गिरफ्तारी का आदेश नहीं दिया था।

एक तरफ, वाइसरॉय, गांधी की गिरफ्तारी पर अभी कुछ और आगा पीछा सोचने के पक्ष में थे तो, बम्बई के गवर्नर, फ्रेडरिक साइक्स ने, समय बीतने के साथ साथ, गांधी की यात्रा के साथ जो जन जागरण हो रहा था, उसे लेकर, बहुत, चिंतित थे। उन्होंने, लॉर्ड इरविन से गांधी की गिरफ्तारी के बारे में विचार करने और, सत्याग्रह के प्रति सख्त दृष्टिकोण अपनाए जाने के लिए, सभी संभावित विकल्पों और एक निश्चित समय पर, कार्रवाई करने के लिये, चर्चा हेतु, दिल्ली में एक बैठक आयोजित करने के लिए अनुरोध किया। वाइसरॉय और बम्बई के गवर्नर, के बीच, 27 मार्च 1930 को मुलाक़ात हुई। उस बैठक में, फ्रेडरिक साइक्स ने, बम्बई प्रेसिडेंसी, में गांधी के सत्याग्रह का, जनता पर जो व्यापक प्रभाव पड़ रहा है पर, विस्तृत चर्चा के लिए एक व्यापक 'ड्राफ्ट नोट' तैयार किया था। उन्होंने कहा कि, यात्रा को लेकर, लोगों में बहुत उत्साह है, पटेलों (मुखियाओं) के पर्याप्त संख्या में, इस्तीफे हो गए हैं, और अब भी हो रहे हैं, और अहमदाबाद, कैरा, भड़ोंच और सूरत में, सत्याग्रही स्वयंसेवकों की भर्ती, तेजी से की जा रही है। दांडी यात्रा मार्ग पर, गांधी, भारी भीड़ को आकर्षित कर रहे हैं। लग रहा है कि लोग, भू-राजस्व (लगान) देने के लिए भी इनकार कर सकते हैं। इसलिए, उन्होंने गांधी की गिरफ्तारी और लंबे समय तक उन्हें, कारावास में डालने से लेकर पूरे अभियान के प्रति, सरकार का क्या रुख रहे, इस पर विचार करने की, आवश्यकता पर जोर दिया। गवर्नर ने यह भी कहा कि, सरकार के इरादों के बारे में, सरकार की तरफ से, एक दृढ़निश्चय भरे बयान की, तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि उन्हें लग रहा था, कि गांधी की दांडी यात्रा, जल्द ही, बम्बई सरकार के शासन को एक गंभीर चुनौती दे सकती है।'

दिल्ली में बैठे वाइसरॉय और बंबई में नियुक्त गवर्नर, गांधी की गिरफ्तारी और उसके संभावित परिणाम के बारे में, तमाम किंतु परंतु पर चिंतन मनन कर रहे थे, पर गांधी, रास कस्बे में निर्भीकता से अपनी बात जनता के समक्ष रख रहे थे। तारीख थी, 19 मार्च 1930, यानी यात्रा का आठवां दिन। गांधी रास कस्बे में सरदार पटेल की गिरफ्तारी की बात फिर दुहराते हैं और कहते हैं, 
"आज हम उस तालुका में प्रवेश कर गए हैं जिसमें सरदार वल्लभभाई को गिरफ्तार कर जेल की सजा सुनाई गई थी और जिस इलाके में, उन्होंने 1924 में इतना जोरदार संघर्ष किया था कि, सरकार को आखिरकार अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी और जनता को न्याय मिला। (गांधी खेड़ा सत्याग्रह का उल्लेख कर रहे थे) जिस अन्याय के लिए संघर्ष की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी, सरकार को जनता की मांग पहले (आंदोलन से पहले) ही मांग लेनी चाहिए थी। पर जनता को उसके लिए सत्याग्रह करना पड़ा। और सरदार को आपकी सेवा करने के इनाम के रूप में जेल की सजा सुना दी गई!"

गांधी ने यात्रा के दौरान जितनी भी सभाएं की, उन सब सभाओं में, उन्होंने, सरदार पटेल की गिरफ्तारी का उल्लेख किया और जनता को याद दिलाया कि, सरदार की गिरफ्तारी पर जनता स्वयंस्फूर्त, सड़कों पर उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ, क्यों नहीं आ गई। उन्होंने सीधे सवाल पूछा, 
"अब सवाल यह है कि, जिस कारण से, उन्हें (सरदार पटेल को) जेल भेजा गया है, उनकी (पटेल द्वारा की गई जनता की) सेवा के लिए आप क्या कर सकते हैं और मुझे क्या करना चाहिए?"
फिर गांधी आगे कहते हैं, 
"कुछ मुखियाओं और मातादारों ने इस्तीफा दे दिया है।  मैं उन्हें बधाई देता हूं।  हालांकि, अभी भी कई ऐसे हैं जो सरकारी लाइन को नहीं छोड़ पा रहे हैं। मेरे सामने एक भी, ऐसा व्यक्ति नहीं आया है, जिसने वेतन से जुड़े होने के कारण प्रधान का पद स्वीकार किया हो। मुखियाओं को, लोगों का अपमान करने का विशेषाधिकार है या यह कहा जा सकता है कि उन्हें लोगों पर किए गए अपमान में भाग लेने का अधिकार है।  उनके पदों से चिपके रहने का अनुचित कारण यह है कि, यह विशेषाधिकार उनके मूल स्वार्थ को संतुष्ट करता है। लेकिन कब तक इन गांवों को निचोड़ने में वे (मुखिया) अपनी भूमिका निभाते रहेंगे? क्या सरकार द्वारा की जा रही लूट पर अभी तक आपकी आंखें नहीं खुली हैं?"

मुखिया यानी विलेज हेडमेन के बारे में बताते हुए गांधी कहते है, 
"मुखिया, तलाटी और रवनिया गाँवों में सरकार के प्रतिनिधि होते हैं, और इन व्यक्तियों के माध्यम से सरकार, अपना प्रशासन चलाती है।  एक गाँव जो, मुट्ठी भर आदमियों (मुखियाओं) से डरता है और अपनी इच्छा के विपरीत, कार्य करता रहता है, इससे न तो मुखियाओं, तायती या रावणियों की प्रतिष्ठा बढ़ती है, और न ही ग्रामीणों की। सरदार इस आतंक को खत्म करने के लिए काफी प्रयास कर रहे थे। सरदार ने, न तो कभी यहां भाषण दिया और न ही यहां वे, उपद्रव मचाने आए थे। न तो मजिस्ट्रेट ने, और न ही, जनता ने, उनसे, किसी तरह की, समस्या का सामना किया।  जिस उद्देश्य के लिए सरदार ने, आप सब से संपर्क किया था, वह किसी से छिपा नहीं था। सत्याग्रही, कोई रहस्य नहीं रखता।  एक बच्चा भी देख सकता है कि सत्याग्रही कैसे खड़ा होता है, बैठता है, खाता है और पीता है। कोई भी, उसके खातों की भी जांच कर सकता है। सरदार जैसे सत्याग्रही के पास क्या रहस्यमय हो सकता है?  वह यहां मेरे लिए (नमक सत्याग्रह का) रास्ता बनाने आये था। वह यहां नमक सत्याग्रह का संदेश देने आये थे। हम दोनों ने यह योजना बनाई थी कि, यह मेरे माध्यम से होगा और जिन्हें मैं अपने साथ ले जा रहा हूं, हम सब मिल कर, नमक कानून तोड़ेंगे। आप मेरे साथ आने वाले बहुत से व्यक्तियों को नहीं जानते हैं। लेकिन, वे सभी सरदार के प्रति समर्पित जन सेवक हैं। सरदार ने ऐसा करके कौन सा अपराध कर दिया, मैं इसे, समझ नहीं पाया इसकी जानकारी जिलाधिकारी को भी नहीं होगी।"

सरदार पटेल पर ही मुख्यत अपनी बात केंद्रित रखते हुए, गांधी बोलना जारी रखते हैं,
"सरदार को तीन महीने की जेल की सजा दी गई, यह सरदार और सरकार दोनों के लिए शर्म की बात है। उनके जैसे (सत्याग्रही) व्यक्ति को सात साल के कारावास की सजा दी जानी चाहिए या निर्वासित किया जाना चाहिए था।  मुझे भी, तीन महीने की कैद की सजा देना सरकार के लिए उचित नहीं होगा। जीवन के लिए निर्वासन या फांसी, मेरे जैसे व्यक्ति के लिए उपयुक्त सजा होगी। मैं देशद्रोह का दोषी हूं।  सरकार के खिलाफ देशद्रोह करना मेरा धर्म है। मैं लोगों को यह धर्म सिखा रहा हूं। एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत अत्याचार किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत, अमीर और गरीब को नमक जैसी वस्तु पर एक ही समान कर का भुगतान करना  पड़ता है, जिसके अंतर्गत, चौकीदार, पुलिस और सेना पर अत्यधिक रकम खर्च की जा रही है, जिसके अंतर्गत, उच्चतम कार्यपालक (वायसरॉय) को जो वेतन मिलता है वह, एक किसान की आय से, पांच हजार गुना अधिक होता है, जिसके अंतर्गत, 25 करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व, नशीले पदार्थों और शराब से प्राप्त होता है, जिसके अंतर्गत, हर साल 60 करोड़ रुपये मूल्य का विदेशी कपड़ा आयात किया जाता है, और जिसके अंतर्गत, करोड़ों लोग बेरोजगार बने हुए हैं। ऐसे शासन के खिलाफ उठ खड़ा हो जाना और नष्ट करना, यह प्रार्थना करना कि उनकी (सरकार की) नीतियों को, आग, भस्म कर दे, यही धर्म है।"

फिर खुद को मिली सजा, जो उन्हे देशद्रोह के लिए 1924 में मिली थी का उल्लेख करते हुए कहते हैं,
"इसी तरह के एक देशद्रोह के अपराध के लिए, मुझे एक बार, छह साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी, लेकिन दुर्भाग्य से, मैं बीमार पड़ गया और मुझे रिहा कर दिया गया क्योंकि यह महसूस किया गया था कि, मुझे अब जेल में नहीं रखा जाना चाहिए। अब फिर से एक बादल घुमड़ रहा है, आप इसे ऐसा कह सकते हैं, या, धूमधाम के साथ एक 'संकट' (गिरफ्तारी का संकट) मेरे पास आ रहा है। मुझे भी गिरफ्तार कर लिया जाए तो अच्छा होगा।  अगर मजिस्ट्रेट मुझे तीन महीने की कैद की सजा देता है तो, यह उसके लिए शर्म की बात होगी। राजद्रोह के एक दोषी को, अंडमान, भेज दिया जाना चाहिए। उसे आजीवन निर्वासन की सजा या फांसी की सजा दी जानी चाहिए।  देशद्रोह को अपना कर्तव्य मानने वाले मेरे जैसे किसी व्यक्ति को, इससे कम क्या सजा दी जा सकती है?"

अपनी संभावित गिरफ्तारी पर वे जनता से कहते हैं, 
"सरकार समझती होगी,​​ कि, सरदार को तीन महीने की कैद की सजा देकर वह लोगों को डराने और दबाने में सक्षम नहीं होगी। यह तथ्य कि, आप यहाँ हजारों की संख्या में निकल आए हैं, यह दर्शाता है कि, आप एक उत्सव की (सत्याग्रह के उत्सव) प्रतीक्षा कर रहे हैं। अगर मुझे और मेरे साथियों को गिरफ्तार किया जाता है, तो आपको, जश्न मनाने के लिए कुछ समझना चाहिए। लेकिन क्या आप इसे केवल उत्सव का एक अवसर मानकर (घरों में) चुप बैठ जाएंगे? क्या मुखिया और मातादार अपने दफ्तरों से ऐसे ही चिपके रहेंगे जैसे मक्खियाँ गंदगी से चिपकी रहती हैं? (तब) यह वाकई शर्म और दुख की बात होगी।"

अपने भाषण का समापन करते हुए, गांधी कहते हैं,
"आज आपने मुझे जो पैसा दिया है, उसका मेरे लिए कोई मूल्य नहीं है। जब मैंने करोड़ों रुपये जमा किए थे, तो मेरे लिए उनका मूल्य था।  उन करोड़ों रुपये ने, अपने मूल्य से कई गुना अधिक सेवा की है। पर, आज मुझे पैसे की नहीं, बल्कि आपकी सेवाओं की आवश्यकता है। यहां उपस्थित सभी स्त्री-पुरुष अपना नामांकन करा लें। जब आपकी बारी आती है तो आप नमक कानून का उल्लंघन करने के लिए तैयार रहें।  यहां तक ​​कि महिलाएं भी इस नेक संघर्ष में हिस्सा ले सकती हैं और बहुतों ने पहले ही अपना नामांकन करा लिया है। इस धार्मिक संघर्ष में किसी को, चोट पहुँचाना शामिल नहीं है। हम खुद मुश्किलें झेलकर, सरकार को सबक सिखाएंगे और ऐसा करके हम, अपने पक्ष में दुनिया की राय बनाएंगे।  और, अंत में, हम अपने शासकों का हृदय परिवर्तन करा लेंगे। हालांकि, वर्तमान में, सरकार न्याय करने के बजाय उत्पीड़न करने में लिप्त है। कलकत्ता के मेयर श्री सेनगुप्ता जैसा व्यक्ति, जिसका नाम बंगाल में हर कोई जानता है, बर्मा में कैद हैं।  सरकार ने उन लोगों को गिरफ्तार करने की नीति अपनाई है जो, किसी भी अपराध के दोषी नहीं हैं। ऐसे समय में जब देश निराशा में रो रहा है, और हजारों लोग अपनी शिकायतें लेकर, आगे आ रहे हैं, सरकार को नमक कर जैसी चीज को खत्म कर देना चाहिए और (जनता की) अन्य शिकायतों का भी निवारण करना चाहिए। लेकिन यह सरकार ऐसा नहीं कर सकती। यह लोगों के पास, करोड़ों रुपये बचे हुए नहीं देख सकती है।  यह इतना अपमानजनक व्यवहार कर रही है कि, यह राशि इंग्लैंड भेज दी जाए।  इस तरह के उत्पीड़न से खुद को मुक्त करने की दिशा में पहला कदम, नमक कर को समाप्त करना है।  हम नमक कर कानून का, इस हद तक उल्लंघन करेंगे कि, हमें चाहे, जो भी दंड, दिया जाय, उसे भुगतने के लिए तैयार रहें - चाहे वह कारावास हो, कोड़े लगें या कोई अन्य।
(गुजराती नवजीवन, 23-3-1930)
....क्रमशः

विजय शंकर सिंह
Vijay Shanker Singh 

गांधी की दांडी यात्रा (7) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/10/7.html

Tuesday, 4 October 2022

एक निंदनीय और शर्मनाक कृत्य / विजय शंकर सिंह

टेलीग्राफ की इस खबर पर कि,
"एक दुर्गा पूजा पंडाल में वे, गांधी जी को महिषासुर के रूप के दिखा रहें हैं," पर जिसे हैरानी हो, तो हों, पर मुझे इन घृणावादी धर्मांध और फासिस्ट सोच वाले संगठन की इस कृत्य से कोई हैरानी नहीं हो रही हैं। 
2022 में गांधी इनके लिए महिषासुर हैं, तो 1945 में गांधी ही नहीं, नेहरू, पटेल, सुभाष, आजाद, राजाजी सहित सभी प्रमुख स्वतन्त्रता संग्राम के योद्धा, इनके लिए रावण थे। हिंदू महासभा और आरएसएस, आजादी के आंदोलन के विरुद्ध अंग्रेजों के मुखबिर थे। 

1945 में अग्रणी पत्र में छपा यह कार्टून देखिए, एक तरफ गांधी और उनके साथ आजादी के लिए लड़ने वाले, अग्रिम पंक्ति के नेता, रावण के दश सिर की तरह हैं, और उनकी हत्या करने के इरादे से तीर खींचता हुआ, माफी मांग कर, 60 रुपए पेंशन पर गुजारा करने वाला और जिन्ना से मिल कर धर्मांध राष्ट्रवाद का सिद्धांतकार, तथा खुद ही खुद को वीर कहने वाला, सावरकर और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी दूसरी तरफ हैं। 

गांधी को महिषासुर के रूप में चित्रित कर के गांधी का अपमान करने वाले इस संगठन के लोगों ने गांधी का सम्मान ही कब किया है और गांधी का व्यक्तित्व, इनसे सम्मान की अपेक्षा, करता भी नहीं है। पर दुर्गापूजा के इस पावन पर्व पर, क्या यह, अपने निकृष्ट सोच के साथ, दुर्गा को अपमानित और विवादित करना नहीं है? 

(विजय शंकर सिंह

Monday, 3 October 2022

कमलाकांत त्रिपाठी / विशाखदत्त का प्रयोगधर्मी नाटक मुद्राराक्षसम्‌ (7)


मुद्राराक्षसम्‌ का संक्षिप्त भावानुवाद: षष्ठ अंक ~

मुद्राराक्षसम्‌ का छठा अंक कथात्मक अन्विति एवं चरित्रांकन की दृष्टि से बेजोड़ है। नाटककार विशाख़दत्त का अन्विति-विषयक अदम्य आत्मविश्वास ही है जो  इस अंक में एक पात्र द्वारा सामान्य नाटकों में अन्विति के स्खलन पर चुटकी लेने के रूप में व्यक्त होता है.

इस अंक का नाम है कपटपाश, यानी फाँसी का छद्म फंदा. पाँचवें अंक के अंत में हम राक्षस को हताश, निराश और पराजय-बोध से टूटा हुआ छोड़कर आए हैं. इस अंक में चाणक्य ऐसी स्थितियों का सृजन करता है जो राक्षस को उसकी नई भूमिका की ओर अग्रसर करती हैं. पहले अंक में राक्षस के सच्चे मित्र चंदनदास ने उसके परिवार को समर्पित करने के बजाए मृत्युदंड का वरण किया था (और फ़िलहाल बंदीगृह में पड़ा हुआ है). यही राक्षस की कमज़ोर नस है, जिसका इस्तेमाल चाणक्य नाटक के उदात्त राष्ट्रीय अभिप्रेत की सिद्धि के लिए  करना चाहता है. पहले ही अंक में राक्षस के चरित्र के मूल्यांकन से उसने पूर्वानुमान कर लिया था कि, जैसे राक्षस का परिवार बचाने के लिए चंदनदास अपना उत्सर्ग करने को तैयार है, वैसे ही राक्षस भी उसे बचाने के लिए ख़ुद को उत्सर्ग करने की कोशिश करेगा और वही होगा उसे बृहत्तर राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए उत्प्रेरित करने का सही वक़्त. चाणक्य को अब इसी अवसर को साकार करने के लिए कुशल गुप्तचरों  के माध्यम से सघन प्रयास करना है. चंदनदास की रक्षा के लक्ष्य से राक्षस के कुसुमपुर पहुँचते ही चाणक्य का एक गुप्तचर उससे जैसे अनायास मिल जाता है, जो प्रकटत: अपने परम मित्र की आसन्न मृत्यु से विचलित स्वयं गले में रस्सी का फंदा लगाकर आत्महत्या करने जा रहा है. राक्षस के विकट मानसिक संत्रास और उसकी नैराश्यपूर्ण अनिश्चितता के इस दौर में उसके लिए यही छद्म उपक्रम निर्णायक साबित होता है. और यही है कपटपाश का कमाल जो इस अंक के नामकरण को सार्थक करता है. 

पहला दृश्य: 

सिद्धार्थक मलयकेतु के सैन्य-पड़ाव से लौटकर, चाणक्य को, और उसके कहने पर चंद्रगुप्त को, वहाँ के घटित के बारे में सूचना देने और चंद्रगुप्त से यथोचित पुरस्कार पाने (थर्ड डिग्री का मुवावज़ा भी शामिल रहा होगा!) के बाद, दूसरे मिशन पर निकला है. इसमें उसे अपने मित्र, एक और गुप्तचर, समिद्धार्थक को साथ लेना है, जिसके लिए वह उसके घर जा रहा है. समिद्धार्थक भी बहुत दिनों से मुलाक़ात न होने से सिद्धार्थक को खोजता उधर ही आ निकलता है.

दोनों मिलते हैं तो पहले तो समिद्धार्थक की उत्सुकता शांत करने के सिलसिले में सिद्धार्थक द्वारा किए गए वर्णन से मालूम होता है कि मलयकेतु के शिविर में आगे क्या-क्या हुआ. मलयकेतु की आज्ञा से पाँच मुख्य राजाओं के मौत के घाट उतार दिए जाने के बाद अन्य सहयोगी राजा भी अपने-अपने सैन्य-दल के साथ शिविर छोड़कर चले गए; उन्हें लगा, मलयकेतु इतना अविचारी है कि इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इस घटना से मलयकेतु के सभी सामन्त भी बेहद खिन्न हो गए. ऐसे में मलयकेतु का विश्वास जीतकर उसके सहायक बने  भागुरायण आदि मगध के आठों अधिकारियों ने उसे घेरकर बंदी बना लिया. 

इस सूचना पर समिद्धार्थक की एक बड़ी दिलचस्प टिप्पणी है—संसार तो यही कहता है कि ये आठों अधिकारी चंद्रगुप्त से खार खाकर मलयकेतु का आश्रय लिए थे; यह तो वैसे ही हुआ जैसे कोई अयोग्य कवि (संस्कृत में नाटककार भी कवि है) अपने नाटक की मुखसंधि (प्रारम्भ) में कुछ कहे, और निर्वहण संधि (अंत) में करा कुछ और डाले. आत्मविश्वास से भरे विशाखदत्त को यह चुटकी लेने का अवसर है क्योंकि इस नाटक के दर्शक इस प्रसंग की असलियत और एकरूपता के निर्वाह को भलीभाँति जानते हैं. सिद्धार्थक इसके समाधान में बस इतना ही कहता है कि आर्य चाणक्य की नीति को नमस्कार है, जो उसी तरह अज्ञेय है, जैसे दैव (भाग्य) की गति.

फिर समिद्धार्थक के पूछने पर सिद्धार्थक इसके आगे का घटनाक्रम बताता है. हुआ यह कि मलयकेतु के बंदी बनाए जाने के बाद, पल-पल की ख़बर रखने वाला चाणक्य मगध की विशाल सेना लेकर कुसुमपुर से निकला और मलयकेतु के शिविर पहुँचकर सरदारों से रहित समस्त म्लेच्छ (विजातीय) सेना को वश में कर लिया. 

समिद्धार्थक: ‘अरे, संसार के सामने अपने अमात्य-पद को त्यागने के बाद आर्य चाणक्य ने क्या फिर से उसे ग्रहण कर लिया है?’

सिद्धार्थक: ‘तुम बहुत भोले हो समिद्धार्थक. जिस आर्य  चाणक्य के चरित्र  की थाह अमात्य प्रवर राक्षस तक नहीं लगा पाए, उसे तुम लगाना चाहते हो.’ 

समिद्धार्थक: ‘अच्छा तो यह बताओ, अमात्य प्रवर राक्षस इस समय हैं कहाँ?’

सिद्धार्थक: ‘शिविर में चारों तरफ भय से अफरा-तफरी मची थी, तभी वहाँ से निकल लिए. हम लोगों का साथी उदुम्बर (एक और गुप्तचर) उनके पीछे लगा है. आर्य चाणक्य को सूचना मिली है कि इधर पाटलिपुत्र ही आए हैं....लगता है चंदनदास के प्रति स्नेह ही इधर खींच लाया है उन्हें.’

समिद्धार्थक: ‘तब तो चंदनदास को मुक्ति मिल जाएगी अब.’ 

सिद्धार्थक: ‘उस बेचारे को अभी मुक्ति कहाँ!....आर्य चाणक्य की आज्ञा है कि हम दोनों उसे वध-स्थल पर ले चलें...’

समिद्धार्थक: ‘आर्य चाणक्य के पास कोई जल्लाद नहीं है क्या? हम लोगों को ऐसे क्रूर काम पर लगाने का क्या मतलब?’ 

सिद्धार्थक: ‘मित्र, इस संसार में जीने की इच्छा रखनेवाला कौन ऐसा है जो चाणक्य की आज्ञा का उल्लंघन करे.....चलो हम लोग चांडाल का वेश धारणकर चंदनदास को फाँसी की जगह ले चलें.’ 

(दोनों निकल जाते हैं.)

दूसरा दृश्य: 

स्थान है कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) नगर का एक जीर्ण उद्यान. मंच पर एक व्यक्ति प्रवेश करता है. हाथ में एक रस्सी लिए हुए, जिसके सिरे पर फंदा बना हुआ है. दर्शकों को क्या मालूम कि यह कौन है. यह वही है—गुप्तचर निपुणक, जो पहले अंक में लोगों की ख़बर पाने के लिए यमपट दिखलाकर गीत गाता था. है यह बहुत निपुण. पूरा कलाकार. पहुंचते ही अपनी फंदेवाली रस्सी की तारीफ़ में प्राकृत का एक श्लोक ठोंक देता है (संस्कृत नाटक में सभी सामान्य जन प्राकृत ही बोलते हैं, संस्कृत के साथ-साथ दर्शक प्राकृत भी समझते रहे होंगे)—

छग्गुणसंजोअदिढा उवाअपरिवाडिघडिअपासमुही।
चाणक्कणीतिरज्जू रिपुसंजमअज्जआ जअदि॥6:4॥ 

संस्कृत छाया—

षड्गुणसंयोगदृढा उपायपरिपाटीघटितपाशमुखी।
चाणक्यनीतिरज्जू रिपुसंयमनोद्यता जयति॥

[शत्रु (राक्षस) को वश में करने के लिए चाणक्य की नीति की तरह यह रस्सी सर्वोत्तम है. इसके छ: गुण (सूत) हैं जो इसे मज़बूत बनाते हैं. चार उपायों की परिपाटी से इसे बनाया गया है (सूत कातना, उसे तानना, फिर माँजना, फिर बँटकर रस्सी बनाना) और इसके सिरे (मुख) पर एक फंदा भी है. {चाणक्य-नीति के भी छ: गुण हैं—संधि, विग्रह, आसन, यान, द्वैधीभाव और आश्रय. वह भी चार उपायों से काम करती है—साम, दाम, भेद और दंड. वह जिसकी ओर मुख कर लेती है, बच नहीं सकता.}]

फिर वह काम की बात पर आता है और चारों ओर देखकर--

‘उदुम्बर ने यही जगह तो बताई थी. और आर्य चाणक्य ने उसी की बताई जगह पर अमात्य राक्षस को खोजने को कहा था....हाँ-हाँ, वह रहे. सिर पर पर्दा डाले हुए. इधर, इसी उद्यान की तरफ़ तो आ रहे हैं. देखें, किधर बैठते हैं. तब तक एक पेड़ की आड़ में हो जाता हूँ.’

राक्षस के हाथ में खड्ग है लेकिन आँखों में आँसू. समय के इस फेर पर उसे रोना आ रहा है. उसका स्वगत कथन--नंदकुल की राजलक्ष्मी एक स्वैरिणी स्त्री की तरह महाराज नंद को छोड़कर इस नौबढ़ चंद्रगुप्त के पास चली गईं. और उन्हीं के पीछे-पीछे अंधानुकरण करनेवाली प्रजा भी. पर्वतक और फिर मलयकेतु का सहारा लेकर राजलक्ष्मी को वापस लाने के लिए इतना यत्न किया, लेकिन सारा किया-कराया मिट्टी में मिल गया, नंदकुल का शत्रु यह चाणक्य जो बीच में आ गया. लेकिन इस बेचारे ब्राह्मण को क्या दोष देना, भाग्य ही हमसे शत्रुता करने पर आमादा है. मूर्ख मलयकेतु को समझ में ही नहीं आया कि भला राक्षस अपने स्वामी के शत्रु के साथ संधि कैसे कर सकता है! राक्षस नष्ट भले हो जाए, शत्रु के खेमे में कभी नहीं जाएगा. मलयकेतु द्वारा लगाया गया लांछन सह लेगा लेकिन लोगों का यह कहना नहीं सह पाएगा कि राक्षस शत्रु की कुटिलता के सामने हार गया....फ़िलहाल कहाँ जाऊँ? चलो इसी उद्यान में बैठकर चंदनदास का कुछ समाचार मालूम करने की कोशिश करता हूँ....आह! पहले मैं जब इस नगर में हज़ारों सामंतों से घिरा धीरे-धीरे चलता हुआ निकलता था तो नगरवासी एक-दूसरे को द्वितीया के चाँद की तरह दुर्लभ मुझको उँगली के संकेत से दिखाते थे, आज उसी नगर के इस उद्यान में चोर की तरह हड़बड़ी में घुस रहा हूँ.... चलो, इस टूटी शिला पर ही बैठ जाता हूँ. 

राक्षस वहाँ बैठकर दूर से आती नगाड़े और शंख के साथ मांगलिक गीतों की आवाज़ सुनता है...तो यह मलयकेतु के पकड़े जाने की ख़ुशी में हो रहा होगा.

निपुणक सक्रिय हो जाता है. राक्षस के सामने आकर, लेकिन उसे अनदेखा करते हुए, रस्सी का फंदा अपने गले में डाल लेता है. 

‘लगता है, मेरी तरह ही कोई दु:खी इंसान है,’ राक्षस बुदबुदाता है और उसके पास जाकर--‘भले मानुस, यह क्या कर रहे हो?’

निपुणक: ‘आर्य, अपने प्रिय मित्र के विनाश से दु:खी मुझ-जैसा अभागा और क्या करेगा!’

राक्षस: ‘मित्र, तुम्हारा दु:ख मेरे-जैसा ही है. गुप्त न हो और बताने में कष्टकारी न हो तो जानना चाहता हूँ.’

निपुणक: ‘न गुप्त है न बताने में कष्टकारी, लेकिन प्रिय मित्र के विनाश से दुखी अब मैं प्राण त्यागने में इतना (पूरी बात बताने का) भी विलम्ब नहीं कर सकता.’

राक्षस: (स्वगत) ‘मित्र चंदनदास की विपत्ति में मेरे कुछ न कर पाने को न जानते हुए भी इसने मुझे लज्जित कर दिया.’ (प्रकट) ‘भद्र, यदि न गुप्त है, न बताने में कष्टकर, तो कृपया बता ही दीजिए.’

निपुणक: ‘आर्य का आग्रह अजीब है, लेकिन कोई चारा भी तो नहीं. तो सुनिए.... इस नगर में विष्णुदास नामका एक जौहरी है...’

‘अरे वह तो अपने चंदनदास का मित्र है’ राक्षस बीच में बुदबुदा उठता है. फिर पूछता है—‘क्या हुआ उसका?’

निपुणक: ‘वही मेरा प्रिय मित्र...’

राक्षस: (प्रसन्न होकर, स्वगत) ‘अरे इसने विष्णुदास को प्रिय मित्र कहा, तब तो चंदनदास का समाचार भी जानता होगा.’

निपुणक: ‘तो वह विष्णुदास अपनी सम्पत्ति ग़रीबों में बाँटकर आग में प्रवेश करने की इच्छा से नगर के बाहर चला गया है. इसके पहले कि उसकी बुरी ख़बर सुनूँ, अपने को ख़त्म करने इस उद्यान में आया हूँ.’

राक्षस: ‘भद्र, तुम्हारा मित्र आग में क्यों प्रवेश करना चाहता है? क्या वह किसी असाध्य रोग से पीड़ित है?’

निपुणक: ‘नहीं तो.’ 

राक्षस: ‘तो क्या राजा के कोप का शिकार हो गया है, जो आग और विष-जैसा ही होता है.’

निपुणक: ‘ऐसा न कहें, महानुभाव. चंद्रगुप्त के राज्य में ऐसी निर्दयता नहीं होती.’

राक्षस: ‘तो क्या किसी ऐसी स्त्री के प्रति अनुरक्त है, जो अप्राप्य है?’ 

निपुणक: ‘पाप शांत हो. मेरे मित्र में ऐसी कोई उछृंखलता नहीं.’

राक्षस: ‘तो क्या आपकी तरह उसके भी किसी मित्र का विनाश हुआ है?’

निपुणक: ‘और क्या!’

राक्षस: (घबराहट के साथ स्वगत) ‘तो चंदनदास ही विष्णुदास का वह प्रिय मित्र है जो उसके आग में प्रवेश करने का कारण है. तभी तो मेरा हृदय छटपटा रहा है.’ (प्रकट) ‘विष्णुदास के प्रिय मित्र के बारे में, जिसके प्रति प्रेम के कारण वह जान देने को तत्पर है, थोड़ा विस्तार से बताएँगे?’ 

निपुणक: ‘आर्य, अब मुझ हतभाग्य के जान देने में और विलंब मत कराइए.’

राक्षस: ‘संक्षेप में तो बता सकते हैं?’ 

निपुणक: (स्वगत) ‘अब क्या उपाय है!, बताना ही पड़ेगा. (प्रकट) तो सुनिए....’

राक्षस: ‘भद्र, सुन रहा हूँ.’

निपुणक: ‘इस नगर में चंदनदास नामका एक जौहरी सेठ है. वही हमारे विष्णुदास का मित्र है. आज विष्णुदास ने चंद्रगुप्त से निवेदन किया कि मेरे घर में परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त सम्पत्ति है, उसी की अमानत लेकर चंदनदास को छोड़ दें.’

राक्षस: (स्वगत) ‘वाह विष्णुदास, वाह, कैसा मित्र-प्रेम! जिस सम्पत्ति के लिए पुत्र अपने माता-पिता को और माता-पिता अपने पुत्र को शत्रु के समान मार डालते हैं, जिसके लिए मित्र प्रेमभाव छोड़ देते हैं, उसी को पाप के समान इस तरह छोड़ देने को तैयार! तुम्हारे-जैसे वणिक के वणिकपने के बावजूद तुम्हारा धन सार्थक  है.’                                        
(प्रकट) ‘फिर चंद्रगुप्त ने उसे क्या जवाब दिया?’ 

निपुणक: ‘आर्य, चंद्रगुप्त ने कहा--मैंने चंदनदास को धन के लिए नहीं बाँधा है. इसने अमात्य प्रवर राक्षस का परिवार छिपाकर रखा है और बार-बार कहने पर भी सौंपने को तैयार नहीं. यदि यह अब भी सौंप दे तो इसके प्राण बच जाएँगे, नहीं तो प्राणदंड निश्चित है....और अब तो उसे फाँसी के स्थान पर भी ला दिया गया है. विष्णुदास यह तय करके, कि इसको फ़ाँसी पर चढ़ाए जाने के पहले ही, अपने को आग में नष्ट कर दूँ, शहर से निकल गया है. मैं भी विष्णुदास के बारे में अप्रिय समाचार सुनने के पहले फाँसी लगा लूँ, यही सोचकर यहाँ आया हूँ.’

राक्षस: ‘भद्र, चंदनदास को प्राणदंड अभी दिया तो नहीं गया?’ 

निपुणक: ‘आज दिया जाएगा. अभी भी उससे बार-बार अमात्य राक्षस का परिवार सौंपने को कहा जा रहा है. लेकिन उसका मित्र-प्रेम टस से मस नहीं हो रहा….अब मुझे भी मरने में विलंब नहीं करना चाहिए.’

राक्षस: ‘वाह, चंदनदास वाह! (स्वगत) शरणागत (कपोत) की रक्षा में राजा शिवि ने जो यश कमाया था, तुम्हारा तो उससे भी बढ़कर है, वहाँ तो कपोत याचना करने पहुँच गया था, यहाँ तो तुम्हारा मित्र तुमसे दूर है.’ (प्रकट)—‘भद्र, शीघ्र जाकर अपने मित्र विष्णुदास को आग में प्रवेश करने से रोको. मैं चंदनदास को फाँसी से बचाता हूँ.’

निपुणक: ‘कैसे बचाएँगे, जरा मैं भी तो सुनूँ.’

राक्षस: (तलवार खींचता है) ‘मेरे पुरुषार्थ में एकमात्र और परम सहायक यह है न.’

निपुणक: ‘इस हालत में आपको ठीक-ठीक पहचान तो नहीं पा रहा हूँ, लेकिन क्या कृपा करके मेरी इस शंका का निवारण करेंगे कि मैं प्रात:स्मरणीय, श्रद्धेय अमात्य प्रवर राक्षस के सामने खड़ा हूँ, जिसके बारे में विदित है कि उन्होंने चंदनदास को जीवन देने का वादा किया है?’ (इसी के साथ वह राक्षस के चरणों में गिर जाता है). 

राक्षस: ‘हाँ भाई, स्वामी (नंद) के विनाश का अनुभव करने को अभिशप्त, और मित्र चंदनदास की दारुण विपत्ति का कारण, मैं ही वह सचमुच का राक्षस (दानव) हूँ जिसके नाम का प्रात:स्मरण अब अमंगलकारी है.’

निपुणक फिर से राक्षस के चरणों में गिरता है—‘मेरा सौभाग्य कि आपके दर्शन हुए.’ 

राक्षस: ‘भद्र उठो-उठो. समय नहीं है. जाकर विष्णुदास से निवेदन करो कि राक्षस अभी चंदनदास को मृत्यु से छुड़ाता है.’ राक्षस तलवार खींचे हुए घूमकर चलने को उद्यत होता है.

निपुणक फिर से राक्षस के चरणों में गिरता है और उसे जाने नहीं देता. ‘नाराज़ न हों अमात्य. संभव नहीं है यह. इस नगर में पहले हुए एक प्रसंग के बाद ‘दुष्ट’ चंद्रगुप्त सावधान हो गया है. आर्य शकटदास को फाँसी देने की आज्ञा हुई थी. लेकिन फाँसी के स्थान पर ले जाए जाते समय उन्हें कोई छुड़ाकर देशांतर भगा ले गया. फिर तो चंद्रगुप्त का भड़का हुआ क्रोध जल्लादों को मारकर ही शांत किया जा सका (पाठक जानते हैं, यह सफ़ेद झूठ है; सब कुछ प्रायोजित था, पहले से सिखाए हुए जल्लाद तो चाणक्य के गुप्तचर सिद्धार्थक की आँख का इशारा पाकर ख़ुद ही भाग खड़े हुए थे—अंक-एक). तब से जल्लाद किसी अपरिचित को शस्त्र लिए हुए आगे-पीछे देखते हैं तो अपनी जान की रक्षा के लिए फाँसी की सज़ा पाए हुए को तुरंत मार देते हैं. तो तलवार लेकर आपके वहाँ जाने पर चंदनदास का वध थोड़ा और जल्दी हो जाएगा, बस.’

राक्षस: (स्वगत) ‘कष्ट है! दुष्ट चाणक्य की नीति के अगम्य मार्ग को समझना कठिन है.’ उसे हताशा होती है, भ्रम-मिश्रित झुँझलाहट भी—‘यदि शकटदास को चंद्रगुप्त की आज्ञा से मेरे पास लाया गया, ताकि वह उस तरह का पत्र लिखकर मुझे फँसा सके, तो जल्लादों को नाहक क्यों मार डाला गया? और यदि शकटदास का मेरे पास लाया जाना प्रायोजित नहीं था तो इस तरह का कुत्सित कार्य वह सोच भी कैसे सका! संशय में मेरी बुद्धि कुछ तय नहीं कर पा रही है (राक्षस अब तक यही समझे हुए था कि शकटदास पाटलिपुत्र में कैद अपने परिवार की सुरक्षा के लिए चाणक्य के पक्ष से मिल गया था, जो, पाठक जानते हैं, महज़ उसका भ्रम था).

फिर विचार करने के बाद राक्षस पुन: बुदबुदाने लगता है—यदि इसकी संभावना है कि, मेरे द्वारा चंदनदास को छुड़ाने का उद्योग करने से पहले ही, मेरे हाथ में तलवार देखकर, जल्लाद उसका वध कर देंगे, तो यह तलवार का समय नहीं है. और नीति का मार्ग तो विलम्ब से फल देता है, इसलिए यहाँ उसका भी कोई उपयोग नहीं. लेकिन भयंकर विपत्ति में फँसे प्रिय मित्र चंदनदास के प्रति उदासीन भी नहीं रहा जा सकता. तो?... ठीक है, समझ में आ गया. इस नश्वर शरीर का मूल्य देकर ही चंदनदास को बचाया जा सकता है. तो वही सही...

इस तरह कपटपाश नामक इस छठे अंक के समाप्त होते-होते राक्षस एक निश्चित निर्णय पर पहुँच चुका है. और चाणक्य की उदात्त योजना भी अपने लक्ष्य से बस जरा-सी दूर रह गई है. उसके पूर्ण होने के लिए सातवाँ अंक. ध्यातव्य है कि इस छठे अंक में राक्षस का चरित्र आईने की तरह साफ़ होकर चमक उठता है, और यह भी कि उसके संबंध में चाणक्य का आकलन कितना सटीक है!
.............
(क्रमश:)

कमलाकांत त्रिपाठी
Kamlakant Tripathi 

विशाखदत्त का प्रयोगधर्मी नाटक मुद्राराक्षसम्‌ (6)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/09/6_30.html 

Sunday, 2 October 2022

पुलिस के सामने किए गए कबूलनामे की वीडियोग्राफी सबूत के रूप में मान्य नहीं है / विजय शंकर सिंह

एक हत्या के मामले में, दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने, एक महत्वपूर्ण निर्णय में, कहा है कि,  "
एक हत्या के मामले में समवर्ती दोषसिद्धि को रद्द करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस के सामने किए गए कबूलनामे की वीडियोग्राफी सबूत के रूप में अस्वीकार्य है।

सीजेआई, उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 161 के तहत एक आरोपी द्वारा पुलिस को दिया गया बयान सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं है।

सीजेआई, जस्टिस उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने, इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए  कहा है कि, 
"दंड प्रक्रिया संहिता, सीआरपीसी की धारा 161 के अंतर्गत, किसी आरोपी द्वारा, पुलिस को दिया गया बयान, कानून की निगाह में, सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं है।"

इस मामले में, अभियुक्तों को निचली अदालत ने आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया था और उनकी अपील कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट, हाइकोर्ट द्वारा अपील खारिज कर दिए जाने के बाद, की गई अपील की सुनवाई कर रही थी। 

अपील में, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि 
"अभियोजन का पूरा मामला तथाकथित इकबालिया बयानों या अभियुक्तों द्वारा दिए गए स्वैच्छिक बयानों पर आधारित है, जब वे पुलिस हिरासत में थे।  पुलिस के अनुसार, सभी आरोपियों को एक स्कूल की इमारत से गिरफ्तार किया गया और अगले दिन औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया।  उन्होंने अपने द्वारा किए गए 24 अपराधों को कबूल किया।  कैसे उन्होंने हत्याओं की योजना बनाई और उन्हें अंजाम दिया, इसके बारे में उनका कबूलनामा एक वीडियो में रिकॉर्ड हो गया है, जिसे अदालत के सामने भी प्रदर्शित किया गया था।  ट्रायल कोर्ट ने माना था कि, 'इन वीडियो टेपों का इस्तेमाल, सबूत के तौर पर भी, किया जा सकता है। ट्रायल कोर्ट के इस तर्क को, उच्च न्यायालय ने भी माना और सजा बरकरार रखी। 

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि, 
"ट्रायल कोर्ट और अपीलीय कोर्ट दोनों ने अभियुक्तों के स्वैच्छिक बयानों और उनके वीडियोग्राफी बयानों पर भरोसा करने में पूरी तरह से गलती की। भारत के संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत, एक आरोपी को, खुद के खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। फिर, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (इंडियन एविडेंस एक्ट) 1872 की धारा 25 के तहत, एक पुलिस अधिकारी के समक्ष एक आरोपी द्वारा दिया गया इकबालिया बयान सबूत के रूप में अस्वीकार्य है।"
अदालत ने हाल ही में वेंकटेश @ चंद्रा बनाम कर्नाटक राज्य के एक फैसले का भी हवाला दिया | 

आगे शीर्ष अदालत का फैसला कहता है, 
"अपराध वास्तव में भयानक था, कम से कम कहने के लिए। फिर भी, अपराध को वर्तमान अपीलकर्ताओं से जोड़ कर देखना, एक रूटीन है, जिसे कानून के स्थापित सिद्धांतों के तहत कानून की अदालत में, साबित किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं किया गया है।"
यानी 161 सीआरपीसी के बयान के बाद, पुलिस को 164 सीआरपीसी के अंतर्गत भी मैजिस्ट्रेट के सामने अभियुक्त का बयान दर्ज कराना चाहिए था। वीडियोग्राफी हो या कागज पर दिया गया अभियुक्त का बयान, सीआरपीसी की धारा 161 में अदालत में, एविडेंस एक्ट के अनुसार, सुबूत के रूप में मान्य नहीं है। 

(विजय शंकर सिंह)

Saturday, 1 October 2022

गांधी की दांडी यात्रा (7) एक अहिंसक क्रांति का आह्वान / विजय शंकर सिंह


आनंद से रवाना होकर, गांधी और उनके सहयात्री, अपने लक्ष्य की ओर बढ़े। यात्रा सुबह, एक प्रार्थना के बाद शुरू हो जाती थी और सुबह के दस बजे तक जितनी दूरी तय की जा सकती थी, वह दूरी तय की जाती थी। गांधी जी का उद्देश्य सविनय अवज्ञा आन्दोलन और केवल नमक बनाकर, कानून तोड़ना ही नहीं था, बल्कि उनका उद्देश्य, इसी यात्रा के माध्यम से लोगों को जागृत करना था और वे देश भर में यह संदेश देना चाहते थे, अब यदि हमें, पूर्ण स्वराज्य चाहिए तो, उसके लिए प्राणपण से जुटना और पूरी शक्ति से, लड़ना होगा। 26 जनवरी 1930 का पूर्ण स्वराज्य का संकल्प, जो हमने लिया है, यूं ही घर बैठे और याचिकाओं, सभाओं और अधिवेशनों में पारित किए गए, प्रस्तावों से नहीं पूरा होने वाला है। इसके लिए एकजुटता भी जरूरी है तो, जरूरी है, मानसिक दृढ़ता भी। असलाली से आनंद तक वे लगभग हर जगह उन्होंने बड़ी - बड़ी जनसभाएं की, उन सभाओं में, उनके इस सत्याग्रह अभियान को जनता का अच्छा खासा समर्थन भी मिलता था, और वे अपनी बात जनता के सामने रखते हुए चलते जाते थे। 

यात्रा के इसी क्रम में वे बोरसाद पहुंचे और वहां जनता को संबोधित करते हुए कहा, 
"एक समय, मैं पूरी तरह से, (ब्रिटिश) साम्राज्य के प्रति वफादार था और दूसरों को वफादार रहना सिखाता भी था। मैंने जोश के साथ "गॉड सेव द किंग" (ब्रिटिश राष्ट्रगान) गाया और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को ऐसा करना सिखाया। अंत में, मेरी आंखों की, पट्टी खुल गई, और जादू टूट गया। मुझे एहसास हुआ कि, यह साम्राज्य वफादारी के लायक नहीं था। मुझे लगा कि यह देशद्रोह के लायक है। इसलिए मैंने राजद्रोह को अपना धर्म बना लिया है। मैं दूसरों को यह समझाने की कोशिश करता हूं कि, जहां देशद्रोह हमारा धर्म है, वहां वफादार होना पाप है। इस सरकार के प्रति निष्ठावान होना, यानी इसके कल्याण की कामना करना, भारत के लोगों के दिलों के बीमार होने की कामना करने के समान है। हमें देश से लूटे गए करोड़ों रुपये के बदले में कुछ नहीं मिलता है;  अगर हमें कुछ मिलता है, तो वह लंकाशायर की रेंज है। इस सरकार की नीति को मंजूरी देना गरीबों के खिलाफ देशद्रोह करना है। आपको, अपने आप को इस अपराध से मुक्त कर लेना चाहिए। मुझे विश्वास है कि, मैंने ऐसा किया है।  इसलिए मैं इस सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण युद्ध छेड़ने के लिए तैयार हो गया हूं। मैं नमक कानून का उल्लंघन कर इसकी शुरुआत कर रहा हूं। इसी उद्देश्य से मैं यह मार्च निकाल रहा हूं। जगह-जगह हजारों स्त्री-पुरुषों ने इस अभियान को, अपना आशीर्वाद दिया है। यह आशीर्वाद मुझ पर नहीं, बल्कि संघर्ष पर बरसा है।"

गांधी में अपार धैर्य था। पर उनका भी धीरज टूटने लगा था। ब्रिटिश राज को अक्सर वे एक न्यायप्रिय शासन मानते थे, पर न्यायप्रियता का यह ढोंग जब 1919 में रॉलेट एक्ट कानून को थोपने, जलियांवाला बाग नरसंहार पर ब्रिटिश सरकार का बर्बर चेहरा देखने और स्वशासन की मांग को दरकिनार कर के साइमन कमीशन में एक भी भारतीय नियुक्त न करने, जैसी बातें, सामने आईं तो, वे इस अन्यायी ब्रिटिश राज के खिलाफ, पूरी आक्रमकता के साथ खड़े हो गए। उसी का उल्लेख करते हुए, वे जनसभा में कह रहे हैं,
"हमारे धैर्य की कड़ी परीक्षा ली गई है।  हमें अपने आप को इस सरकार के जुए से मुक्त करना होगा और स्वराज पाने के लिए हमें किसी भी कठिनाई को झेलने के लिए तैयार रहना होगा।  स्वराज पाना हमारा कर्तव्य भी है और हमारा अधिकार भी। मैं इसे एक धार्मिक आंदोलन मानता हूं क्योंकि देशद्रोह हमारा धर्म है। मैं हर पल, इस सरकार के अंत की कामना करता हूं। मुझे अपने शासकों के एक बाल भर भी कोई अपेक्षा नहीं है। हम निश्चित रूप से उनके सामने नहीं झुकेंगे। इसलिए, कृपया अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत हो जाएं और भारत के खिलाफ अपने पापों को धो लें। आज हम नमक कानून की अवहेलना कर रहे हैं।  कल हमें अन्य कानूनों को, रद्दी कागज की टोकरी में फेंकना होगा।  ऐसा करते हुए हम, इतने घोर असहयोग का अभ्यास करेंगे कि, अंतत: ब्रिटिश के लिए, प्रशासन चलाना ही संभव नहीं रहेगा। जो सरकार, अपना शासन चलाने के लिए, हमारे खिलाफ बंदूकें तानें, हमें जेल भेजें, हमें फांसी दें, उसका सहयोग हम बिलकुल नहीं करेंगे। लेकिन ऐसी सजा, सरकार, कितनों को दे सकती है?  कोशिश करो और गणना करो कि, तीस करोड़ लोगों को फांसी देने में, एक लाख अंग्रेजों को कितना समय लगेगा।  लेकिन वे इतने क्रूर भी नहीं हैं।"

लेकिन गांधी के इस आक्रामक प्रतिरोध में भी, ब्रिटिश के प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी। वे असहयोग की बात कर रहे थे, वे एक ऐसे आंदोलन की बात कर रहे थे, जो ऐसी स्थिति बना दे कि, शासन करना ही, ब्रिटिश राज के लिए, असंभव हो जाय और वे यहां से चले जाए। ब्रिटिश जनता के बारे में, वे कहते हैं, 
"वे भी हमारे जैसे इंसान हैं और शायद हम वही काम कर रहे होंते, जो वे कर रहे हैं, अगर हम उनकी स्थिति में होते तो। इसलिए मुझे नहीं लगता कि, इसके लिए उन्हें दोषी ठहराया जाना चाहिए।  लेकिन मुझे उनकी नीति इतनी कड़वी लगती है, कि अगर मैं कर सकता तो, आज ही, उनकी नीतियों को नष्ट कर देता, चाहे मुझे सलाखों के पीछे डाल दिया जाए या मुक्त रहने दिया जाए, या नष्ट कर दिया जाए।  मैं यहां आपके सामने जो सांस लेता हूं तो, हर सांस के साथ मैं यही चाहता हूं।" 

चाहे दक्षिण अफ्रीका में गांधी का सत्याग्रह हो, या, भारत में उनके द्वारा छेड़े गए सविनय अवज्ञा आंदोलन, दोनो ही, सत्याग्रहो में, उन्होंने संबंधित गवर्नर या वाइसरॉय को, अपने हर उठाए जाने वाले कदम और आंदोलन के औचित्य के बारे में, पूरी बात पत्रों द्वारा सूचित करने के बाद ही, वे आगे बढ़े थे। उन्होंने पर्याप्त समय भी उस समस्याओं के समाधान के लिए, सरकार को दिया और अपनी तरफ से, समस्याओं का समाधान सुझाया भी। पर जब उनकी शिकायतों पर, राज्य द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई, तब उन्होंने सत्याग्रह की राह चुनी और जब उन्होंने आंदोलन छेड़ा, तो फिर वे पीछे नहीं हटे। नमक सत्याग्रह के संदर्भ में भी वे, वायसरॉय को भेजे गए अपने पत्रों का हवाला देते हुए, जनता के समक्ष अपनी बात रख रहे हैं,
"कोई नहीं कहता है कि, नमक कर न्यायसंगत है। कोई नहीं कहता है कि, सेना और प्रशासन पर खर्च जायज है। कोई नहीं मानता है कि, भू-राजस्व वसूलने की नीति न्यायोचित है, और न ही वास्तव में लोगों से 20 से 25 करोड़ रुपये वसूल कर, उन्हें शराबी और अफीम का आदी बनाकर उनके घरों को तोड़ना उचित है। ब्रिटिश अधिकारियों को मैने, इस तथ्य से अवगत कराया और पूछा कि, क्या यह सब सच है ? और इसके बारे में क्या किया जा सकता है ? सरकार को, धन की आवश्यकता है।  किस उद्देश्य के लिए उनको धन की आवश्यकता है?  लोगों का दमन करने के लिए?"
 
नमक कानून के एक दमनकारी प्राविधान का उल्लेख करते हुए वह कह रहे हैं, 
"हाल ही में सरकार ने सिपाही के पद से ऊपर के सभी पुलिस अधिकारियों को नमक कानून को लागू करने वाले अधिकारी के रूप में नियुक्त किया है। उसमें निहित अधिकार के परिणामस्वरूप, एक पुलिसकर्मी भी मुझे गिरफ्तार कर सकता है और, वह जो भी करना चाहे, कर सकता है। अगर वह मुझे गिरफ्तार करने में विफल रहता है तो, यह उसकी कायरता मानी जाएगी। यहाँ हम एक ऐसा कानून देखते हैं, कि गिरफ्तार करने में हुई विफलता को, पुलिस द्वारा प्रदर्शित कायरता, घोषित करता है और विभाग इस, कायरता पर, कठोर दंड दे सकता है। किसी अन्य अधिनियम में जबकि ऐसा प्राविधान नहीं है। कोई भी सिपाही जो हमें नमक बनाते हुए देखता है, जो हमें खारे पानी का पैन गर्म करते हुए देखता है, हमें गिरफ्तार कर सकता है, पैन छीन सकता है और पानी फेंक सकता है। ऐसा क्यों है?  यह अन्याय क्यों?  इस तरह के अपमानजनक आचरण और ऐसी अमानवीय नीति का विरोध करना हमारा धर्म है।"
 
गांधी ने सत्याग्रह के लिए, जनता को, प्रेरित और जागृत किया तो, उन्होंने धन की व्यवस्था के लिए चंदा एकत्र करने की परंपरा भी शुरू। वे धन की मांग करते थे, और उन्हे धन बराबर मिल भी रहा था। उनका निजी जीवन और आचरण इतना सादगी भरा और ईमानदार था कि, लोग यह जानते थे कि जो भी पैसा वे दे रहे हैं, उसका दुरुपयोग न तो गांधी जी करेंगे और न ही करने देंगे। दक्षिण अफ्रीका के उनके सत्याग्रह में जेआरडी टाटा ने, गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर, दो बार पच्चीस, पच्चीस हजार रुपए गांधी जी को भेजे थे। टाटा से गांधी जी का संपर्क नहीं था लेकिन गोपाल कृष्ण गोखले का संपर्क था। इस घटना का विस्तृत उल्लेख, रामचंद्र गुहा की पुस्तक गांधी बिफोर इंडिया में किया गया है। 

इसी धन का उल्लेख करते हुए गांधी आगे कहना जारी रखते हैं, 
"अगर आपको लगता है कि आपने मुझे जो पर्स भेंट किया है, उसके लिए मुझे आपका आभारी होना चाहिए, तो मुझे कहना चाहिए कि मैं आभारी हूं।  लेकिन मेरी भूख पैसे से नहीं मिटेगी। मेरी इच्छा है कि आप सभी स्त्री-पुरुष इस यज्ञ में अपना नाम दर्ज कराएं। यह मेरी प्रबल इच्छा है कि, इस हाई स्कूल में पढ़ने वाले सभी छात्र (जिस हाई स्कूल में यह जनसभा हो रही थी) जो पंद्रह वर्ष से अधिक आयु के हैं, और सभी शिक्षक भी अपना नामांकन कराएं।  जापान, चीन, मिस्र, इटली, आयरलैंड और इंग्लैंड में जहां कहीं भी क्रांति हुई है, वहां छात्रों और शिक्षकों ने प्रमुख भूमिका निभाई है।  यूरोप में, 1914 में 4 अगस्त को युद्ध छिड़ गया, और जब मैं उसी महीने की 6 तारीख को इंग्लैंड पहुंचा, तो मैंने पाया कि छात्रों ने कॉलेज छोड़ दिया था और हथियारों के साथ बाहर निकल गए थे। यहाँ इस धर्मयुद्ध में सत्य, अहिंसा और क्षमा ही अस्त्र हैं।  ऐसे शस्त्रों के प्रयोग का परिणाम ही हितकर हो सकता है और ऐसे संघर्ष में भाग लेना प्रत्येक विद्यार्थी और शिक्षक का कर्तव्य है।  ऐसे समय में जब भारत को गुलामी से मुक्त करने के लिए अंतिम संघर्ष किया जा रहा है, कोई भी छात्र या शिक्षक जो अपने घर या स्कूल में बना रहता है, उसे अपने देश के लिए देशद्रोही माना जाएगा।  क्या ऐसे समय में, आप दिल से कविताएँ सीखने में लगे रहेंगे, जब सरदार जैसा व्यक्ति सलाखों के पीछे है?  जिस प्रकार घर में आग लगने पर, सभी उसे बुझाने के लिए बाहर निकल आते हैं, उसी प्रकार आप सभी को हमारे देश के इन कष्टों को समाप्त करने के लिए बाहर निकल आना चाहिए।"

भारत आते ही गांधी समझ गए थे, कि सांप्रदायिक राजनीति, देश की एकता में एक बड़ी बाधा है। अंगेजो को, यह राजनीति हर मौके पर लाभ पहुंचाती रहती थी। ब्रिटिश 1857 के हिंदू मुस्लिम एकता के साथ हुए विप्लव से, यह सीख चुके थे, कि किसी भी तरह का सांप्रदायिक सद्भाव, उनके साम्राज्य के लिए घातक होगा। गांधी इस सद्भाव के जीवन पर्यंत लड़ते रहे और अपनी जान तक दे दी। इस सांप्रदायिक मतभेद को रेखांकित करते हुए वे कहते हैं,
"जो लोग कहते हैं कि हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और अन्य लोग एकजुट नहीं हुए हैं, वे झूठ बोलते हैं। यह नमक कर सभी पर समान रूप से लागू होता है। उस कर को समाप्त करने के लिए सभी को एक साथ क्यों नहीं आना चाहिए जिससे एक भैंस और एक गाय भी नहीं बच सकती है ? लोगों की कठिनाइयों को दूर करने के लिए मैं खुद भी (ब्रिटिश सरकार के समक्ष) जमीन पर दण्डवत हुआ, पर कोई फायदा नहीं हुआ। मैंने, वायसरॉय को, अपील भेजने अपनी बात समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सभी जानते हैं कि, मैं विनम्र भाषा का प्रयोग करना जानता हूं। लेकिन मैं तब एक क्रांतिकारी बन गया, जब राजनीति और अनुनय विनय निष्फल साबित हो गए। मुझे अपने आप को एक क्रांतिकारी के रूप में वर्णित करने में शांति मिलती है और मैं कुछ हद तक अपने धर्म का पालन करता हूं।"

अक्सर क्रांति, संघर्ष, युद्ध, लड़ाई आदि शब्द, हिंसक गतिविधियों से जोड़ दिए जाते हैं, पर गांधी, क्रांति की एक रोचक व्याख्या करते हैं,
"एक ऐसी क्रांति में जो शांत, शांतिपूर्ण और सत्य हो, आपको अपने आप को नामांकित कराना चाहिए, चाहे आप किसी भी धर्म के हों।  यदि आप ईमानदारी से अपने आप को सूचीबद्ध करते हैं और, यदि आप अपने साहस को बनाए रख सकते हैं, तो नमक कर समाप्त कर दिया जाएगा, यह प्रशासन समाप्त हो जाएगा और वायसराय को, भेजे गए, पत्र में वर्णित सभी कठिनाइयों के साथ-साथ, उन सभी कठिनाइयों को भी समाप्त कर दिया जाएगा। फिर जब नई प्रशासनिक नीतियां बनानी होंगी तो सांप्रदायिक विवादों को सुलझाने और सभी को संतुष्ट करने का समय आ जाएगा। मैं आप सभी को ईश्वर के नाम से आमंत्रित करता हूं।  इस आंदोलन में अंग्रेज भी शामिल होंगे।  क्या वे एक अन्याय को सही ठहराने के लिए कई, अन्य अन्याय करेंगे?  और क्या वे बेगुनाहों को सलाखों के पीछे डालेंगे, उन्हें कोड़े मारेंगे और उन्हें फाँसी देंगे?"

और उनके भाषण का अंत, इस दार्शनिक और प्रेरक अंदाज में होता है। 
"जो असत्य है, जो अन्याय है, उसमें ईश्वर की कभी मर्जी नहीं हो सकती।  यह उतना ही स्पष्ट है, जितना मैं, आपसे यहाँ और अभी बोलते दिख रहा हूँ। मैं समान और स्पष्ट रूप से देखता हूं कि, इस प्रशासन के दिन पूरे हो रहे हैं, पूर्ण स्वराज दृष्टिगोचर हो रहा है। ऐसे समय में हम, चुनौतियो से, भाग जाते हैं, तो, हमारे समान अयोग्य कौन होगा?"
(गुजराती नवजीवन, 23/03/1930)

आणंद के बाद उनका यह बोरसाद का भाषण था। यह बड़ी जनसभा थी और, यहां उन्होंने लंबा भाषण भी दिया। इसके बाद वे रास कस्बे के लिये रवाना हो गए, जहां वल्लभभाई पटेल को गिरफ्तार किया गया था।  रास तक जनसभाओं का सिलसिला लंबा चलता है और उसके बाद लंबी जनसभाएं इक्का दुक्का ही हुई हैं। गांधी असलाली से, बोरसाद तक आते आते, क्रांति की, जान देकर भी, आजादी पाने का आह्वान करते दिखे। धन की तुलना में, उन्होंने जन जन का आह्वान किया। ब्रिटिश राज को, असहयोग से पंगु बना देने की बात की और क्रांति की बात की, बदलाव की अलख जगाई। लेकिन क्रांति और बदलाव की बात करते करते भी, अपनी अहिंसा और सत्य के मार्ग से, गांधी, जरा भी कहीं, विचलित होते नहीं दिखे। वायसरॉय को जो पत्र उन्होंने नमक कानून या अन्य सुधारो के लिए लिखे थे, उनका तो उन्हे कोई उत्तर ही नहीं मिला था। और जब, उन्होंने नमक कानून तोड़ने के लिए, सत्याग्रह की बात की, तो, जो उत्तर उन्हे मिला, वह एक ठंडा जवाब था। लगा अंग्रेज मुतमइन थे कि, यह आंदोलन भी फ्लॉप हो जाएगा या इसका कोई भी असर देश पर नहीं पड़ेगा, और यदि कुछ पड़ेगा तो वह भी, इतना नहीं होगा कि, उसे नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा। 

लेकिन वायसरॉय का, गांधी की दांडी यात्रा को लेकर किया गया आकलन गलत निकला। पांच दिन की यात्रा की जैसी खबरें अखबारों में छपी, और कांग्रेस की गतिविधियां जिस तरह से देश के विभिन्न हिस्सों में बढ़ रही थीं, उससे, वायसरॉय के सचिवालय से लेकर लंदन तक ब्रिटिश सरकार की चिंता भी बढ़ रही थी। अब गांधी, रास कस्बे में थे। इसी कस्बे में, सरदार बल्लभ भाई पटेल की गिरफ्तारी, नमक सत्याग्रह की तैयारी अभियान के समय, हुई थी। रास में वे, जापान, चीन, मिस्र, इटली, आयरलैंड और इंग्लैंड में, छात्रों और शिक्षकों की क्रांति में उनकी भूमिका पर एक अपनी बात रखते हैं, और उधर वाइसरॉय, इस सत्याग्रह को रोकने के लिए प्रशासनिक गतिविधियां सक्रिय करने में जुटे हैं। 
....क्रमशः

(विजय शंकर सिंह)

गांधी की दांडी यात्रा (6)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/09/6_27.html