Saturday, 3 September 2022

तीस्ता सीतलवाड, जेल से रिहा / विजय शंकर सिंह


जमानत के बाद तीस्ता सीतलवाड, Teesta Setalvad  जेल से बाहर आ गईं। जिन आरोपों पर, तीस्ता जेल में बन्द थीं उसी मुकदमे में जस्टिस खानविलकर की फैसले में दी गई टिप्पणी के आधार पर, गुजरात के रिटायर्ड डीजी आरबी श्रीकुमार भी जेल में बंद हैं। जस्टिस खानविलकर ज़किया जाफरी की पुनः जांच की याचिका के मामले में, 25 जून को अपना फैसला सुनाते हैं और 26 जून को, गुजरात पुलिस, उक्त फैसले में अंकित कुछ अंशों के आधार पर मुकदमा दर्ज कर, तीस्ता सीतलवाड और आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार कर लेती है। 

क्या यह पहले से तय था कि फैसले में तीस्ता और श्रीकुमार पर साजिश गढ़ने की बात लिखी जाएगी और दूसरे ही दिन इन दोनो को जेल भेज दिया जायेगा या यह महज संयोग है कि जस्टिस खानविलकर, ने कुछ प्रतिकूल टिप्पणी की और दूसरे ही दिन, गुजरात पुलिस, जीडी में रवानगी दर्ज कर, दोनो को, गिरफ्तार करने के लिए मुंबई की ओर निकल पड़ी! जो भी हो, लेकिन, जस्टिस खानविलकर का ज़किया जाफरी मामले में दिया गया फैसला, जो उनके रिटायरमेंट के कुछ दिन पहले ही आया था, देश के न्यायिक इतिहास में एक विवादित फैसले के रूप में जाना जाएगा। 

तीस्ता एक सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और यह उनका काम है कि, वे लोगों को अन्याय के खिलाफ जागरूक करें, उनको कानूनी राय दिलवाएं, उनके लिए कानूनी सहायता उपलब्ध कराएं और यह सब करना न तो कोई अपराध है और न ही अनैतिक। उन्होंने वही किया। पर यह कहा गया कि उन्होंने कुछ दस्तावेज़ फर्जी बनाए। अगर दस्तावेज फर्जी बनाए तो, एसआईटी जिसके काम की प्रशंसा अदालत कई बार कर चुकी है, ने तीस्ता के खिलाफ जांच के ही दौरान कोई मुकदमा क्यों नहीं दर्ज कर के कार्यवाही की। दस्तावेज फर्जी यदि सुप्रीम कोर्ट ने पाए तो कानूनी कार्यवाही अदालत को ही करनी चाहिए थी। आखिर तीस्ता की जमानत के मामले पर विचार करते हुए, सीजेआई ने यह टिप्पणी भी की थी, कि एफआईआर में सिवाय जस्टिस खानविलकर के फैसले के अंशों के कुछ भी नहीं है। फिर जिस तरह से बिना पूरी विवेचना किए, पुलिस गिरफ्तारी के लिए दौड़ी, उससे ही यह पता चलता है कि, सरकार का उद्देश्य क्या था और है। 

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले में उल्लिखित शब्द, kept the pot boiling, ही नरेंद्र मोदी की असल मुसीबत है। लंबे समय तक यह मामला क्यों जिंदा रखा गया, लोग इसे भुला क्यों नहीं देते हैं, यह असल समस्या है और दंगो में मारे गए निर्दोष नागरिकों का प्रेत इन्हें, अब भी घेरे रहता है। न केवल गुजरात दंगे में मारे गए एहसान जाफरी और उनकी सोसायटी के लोग, बल्कि, हरेन पांड्या की हत्या से लेकर, सीबीआई के जज बीएम लोया की संदिग्ध मौत का प्रेत आज भी, सरकार के सबसे महत्वपूर्ण लोगों को अपनी गिरफ्त में यदा कदा लेते रहता है। 

तीस्ता अब बाहर हैं। पर यह उनकी अंतरिम जमानत है। उन्हे नियमित जमानत लेनी होगी, जिसका मामला गुजरात हाईकोर्ट में अभी भी लंबित है। पर जिन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत तीस्ता को दी है, वे विंदु लगभग जमानतीय अपराध के हैं और मुझे लगता हैं, इस मुकदमे में जमानत, तीस्ता मिल भी जायेगी। सुप्रीम कोर्ट ने अब बर्तन को बर्नर को उतार लिया है, पर यह भी अंत नहीं है। कल कोई नया प्रकरण सामने आता है तो उसमे भी याचिका दायर हो सकती है। पर फिलहाल तो बर्तन को ठंडा किया जा रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट की इस बात के लिए भी आलोचना की जा रही है कि उसने जल्दबाजी में सारी याचिकाएं निपटा दीं, पर यहीं एक सवाल यह भी उठता है कि, आखिर किसी मामले को अदालत, कब तक के लिए लंबित रख सकती है। फिलहाल तो तीस्ता आजाद हैं और उस मुकदमे में कुछ होना भी नहीं है, सरकार का एक ही उद्देश्य था, अपनी हनक और खीज जताना और डराना जो उसने तीस्ता जो 26 जून से जेल में रख कर पूरा करने की कोशिश कर भी ली।

(विजय शंकर सिंह)

Friday, 2 September 2022

तीस्ता सीतलवाड को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिली / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने आज 2 सितंबर, को सोशल एक्टिविस्ट, तीस्ता सीतलवाड़ को अंतरिम जमानत दे दी है। तीस्ता, 2002 के गुजरात दंगों के संबंध में, मामलो को दर्ज कराने के लिए दस्तावेजों के फर्जी तैयार करने के आरोप में, 26 जून से हिरासत में है। उच्च न्यायालय द्वारा मामले में नियमित जमानत पर विचार किए जाने तक उन्हे अपना पासपोर्ट सरेंडर करने के लिए कहा गया है। वे विदेश यात्रा नहीं कर पाएंगी। 

सीजेआई, यू.यू.  ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया ने, अदालत में  कहा कि,
"तीस्ता नाम की एक महिला 2 महीने से हिरासत में है और जांच तंत्र को 7 दिनों की अवधि के लिए हिरासत में पूछताछ का समय दिया गया था।मिला है। तीस्ता के खिलाफ कथित अपराध वर्ष 2002 से संबंधित हैं और अधिक से अधिक 2012 तक के संबंधित दस्तावेज पेश करने की मांग की गई थी। इस प्रकार, यह विचार बनता था कि हिरासत में पूछताछ सहित जांच के आवश्यक तत्व, पूरे हो जाने के बाद, मामला एक स्वरूप  ले लेता है, जहां अंतरिम जमानत की राहत स्पष्ट रूप से दी जा सकती है।"

आगे अदालत ने कहा, 
"हमारे विचार में, अपीलकर्ता अंतरिम जमानत पर रिहाई का हकदार है। यह कहा जाना चाहिए कि जैसा कि सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया था कि मामला अभी भी उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। इसलिए हम इस पर विचार नहीं कर रहे हैं कि, अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा किया जाए या नहीं। उस जमानत की विंदु पर उच्च न्यायालय द्वारा विचार किया जाना है। हम केवल इस दृष्टिकोण से विचार कर रहे हैं कि क्या इस मामले पर विचार के दौरान अपीलकर्ता की हिरासत पर, राज्य द्वारा जोर दिया जाना चाहिए?"

तीस्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि 
"उनके खिलाफ प्राथमिकी में वर्णित तथ्य और कुछ नहीं बल्कि कार्यवाही की पुनरावृत्ति है जो 24 जून के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ समाप्त हो गई और तीस्ता के खिलाफ आरोपित अपराध भी नहीं बनता है।"

गुजरात सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि,
"जमानत के लिए आवेदन उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है और इस तरह इस मामले को तत्काल सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई के लिए स्वीकार करने के बजाय उच्च न्यायालय पर ही, विचार करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। कथित अपराध में तीस्ता की संलिप्तता की ओर इशारा करते हुए प्राथमिकी में जो कुछ भी कहा गया है, उसके अलावा और भी पर्याप्त सामग्री है।"

सरकार की ओर से पेश हुए एएसजी एसवी राजू ने यह भी कहा कि,
"भले ही सीआरपीसी की धारा 340 के तहत जालसाजी की शिकायत दर्ज करनी पड़े, लेकिन धारा 195 के तहत बार संज्ञान के स्तर पर लागू होगा न कि प्राथमिकी के स्तर पर।"

तीस्ता ने, अंतरिम जमानत देने से गुजरात हाई कोर्ट के इनकार के खिलाफ, सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जकिया जाफरी द्वारा दायर याचिका को खारिज करने के एक दिन बाद, तीस्ता को, 26 जून को मुंबई से गुजरात एटीएस द्वारा, धारा 468, 194, 211, 218 आर/डब्ल्यू 120 बी आईपीसी के तहत गिरफ्तार किया गया था।  

सितंबर, 1, को पीठ ने तीस्ता को अंतरिम जमानत देने की अपनी इच्छा जाहिर भी कर दी थी। पीठ ने, मामले की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर भी संकेत किया, जो उसके अनुसार अदालत के समक्ष कुछ जटिल सवाल खड़ा कर रही थी। 

 1. याचिकाकर्ता 2 महीने से अधिक समय से हिरासत में है।  कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है।

 2. सुप्रीम कोर्ट द्वारा जकिया जाफरी के मामले को खारिज करने के अगले ही दिन प्राथमिकी दर्ज की गई और एफआईआर में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के अलावा और कुछ नहीं बताया गया है।

 3. गुजरात उच्च न्यायालय ने 3 अगस्त को तीस्ता की जमानत याचिका पर नोटिस जारी करते हुए एक लंबा स्थगन दिया, जिससे नोटिस का जवाब देने के लिए, 6 सप्ताह का समय दिया जो अनावश्यक रूप से अधिक था।

 4. कथित अपराध, हत्या या शारीरिक चोट की तरह गंभीर नहीं हैं बल्कि, अदालत में दायर दस्तावेजों की कथित जालसाजी से संबंधित हैं।

 5. इनमे, ऐसा कोई अपराध नहीं हैं जो जमानत देने पर रोक लगाते हों।

सॉलिसिटर जनरल ने याचिका की पोषणीयता/मेंटेनेबिलिटी पर प्रारंभिक आपत्ति जताई है, जिसमें कहा गया है कि उच्च न्यायालय के समक्ष, एक याचिका दायर करने के विकल्प चुन लेने के बाद, तीस्ता अब संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर नही कर सकती हैं। 
एसजी ने कहा, 
"न्यायिक राहत का एक विकल्प चुनने के बाद, यह एक सिद्धांत की बात है, जहां एक वादी के पास दो वैकल्पिक उपचार होते हैं और वह स्वेच्छा से एक का चयन कर लेता है तो, उसे दूसरा विकल्प चुनने से रोक दिया जाता है।"

कल सीजेआई ने, गुजरात सरकार से, इस मामले में हुई प्रगति के बारे में पूछा था, क्योंकि तीस्ता ने दो महीने की हिरासत की अवधि पूरी कर ली है। पीठ ने पूछा, 
"पिछले दो महीनों में आपको, तीस्ता के विरुद्ध, क्या सामग्री या सुबूत मिले हैं?क्या आपने चार्जशीट दाखिल की है या जांच चल रही है?"  

एसजी ने आज यह भी कहा कि तीस्ता ने विवेचना में, जांच एजेंसी के साथ सहयोग नहीं किया है। इस पर सीजेआई ने पूछा, 
"कितने दिनों उससे पूछताछ की गई?"  
एसजी ने उत्तर दिया, 
"7 दिन। लेकिन उसने जवाब देने से इनकार कर दिया।"

कल, सीजेआई ने गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा तीस्ता की जमानत याचिका को बिना किसी अंतरिम राहत के 6 सप्ताह की अवधि के लिए स्थगित करने पर चिंता व्यक्त की थी। सीजेआई ने कहा, 
"इस तरह के मामले में, उच्च न्यायालय 3 अगस्त को नोटिस जारी करता है और इसे 19 सितंबर को वापस करने योग्य बनाता है? किस लिए, 6 सप्ताह,  जमानत के मामले को वापस करने योग्य बनाया जाता है? क्या गुजरात उच्च न्यायालय में यह मानक प्रथा है? हमें एक मामला दें, जहां एक महिला  इस तरह के किसी एक मामले में शामिल रही हो और HC ने इसे 6 सप्ताह का समय, जवाब दाखिल करने के लिए दिया हो। वापस करने योग्य बना दिया है?"  
सीजेआई की यह, कल की मौखिक थी।

सॉलिसिटर जनरल ने आज पीठ को सूचित किया कि,
"उन्होंने इस पहलू की जांच की है और प्रस्तुत किया है कि "उच्च न्यायालय ने समान रूप से वही किया जो उच्च न्यायालय सभी के साथ करता है।"
उन्होंने अगस्त के कुछ आदेशों का हवाला दिया जहां सुनवाई की अगली तारीख अक्टूबर में तय की गई थी।
एसजी ने कहा, "मेरे निवेदन में, उच्च न्यायालय ने सूचीबद्ध मामलों की संख्या को देखते हुए अपनाई गई समान प्रथा को जारी रखा, उसने एक उचित तारीख दी।"

वरिष्ठ वकील, कपिल सिब्बल ने, तीस्ता की तरफ से, तब दावा किया कि, उनके पास 28 मामलों की एक सूची है जहां उसी न्यायाधीश ने, जिसने तीस्ता के मामले को स्थगित कर दिया था, कुछ ही दिनों में जमानत भी दे दी है।
हालांकि, एसजी ने सिब्बल के हस्तक्षेप पर कड़ी आपत्ति जताई और उनसे राज्य या न्यायपालिका को "बदनाम" नहीं करने का आग्रह किया।
एसजी ने कहा, "वह बेहतरीन जजों में से एक हैं, उनके पीठ पीछे कुछ मत कहो... उन्होंने समान रूप से, सही तरीके से कार्य किया और इससे वे विचलित नहीं हुए।"

एफआईआर के बारे में, एसजी ने कहा कि, 
"कई लोगों ने एसआईटी से संपर्क किया, जो इस घटना की जांच कर रही थी, कुछ "पहले से टाइप किए गए बयान के काग़ज़", कथित तौर पर तीस्ता द्वारा लोगों को वितरित किए गए थे। यह कोई साजिश थी, हमारे पास सामग्री है। लेकिन, साजिश का हिस्सा कौन थे? साजिश का मकसद क्या था? अभी इसकी जांच की जा रही है। हमारे पास धारा 164 सीआरपीसी के तहत दो बयान हैं, जो प्रथम दृष्टया यह बताते हैं कि, यह एक साजिश थी। कुछ खास हासिल करने की सोची समझी साजिश। न कि कोई गलतफहमी की कोई बात थी।"

एसजी ने न्यायालय के समक्ष धारा 161 गवाहों के बयान प्रस्तुत किए और कहा,
"ऐसा नहीं है कि यह बिना सबूत का मामला है। यहएक साजिश है। और जांच एक बहुत ही महत्वपूर्ण चरण में है।"
उन्होंने कहा कि, "उन्होंने न्यायालय के अवलोकन के लिए एक सीलबंद लिफाफे में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज धारा 164 सीआरपीसी का बयान भी प्राप्त किया है।"

कल कपिल सिब्बल ने तीस्ता के खिलाफ मामले में दायर जाली दस्तावेजों के आरोपों से इनकार किया था और तर्क दिया था कि सभी दस्तावेज एसआईटी द्वारा दायर किए गए थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि, यह एफआईआर, बनाए रखने योग्य नहीं है और केवल सीआरपीसी की धारा 195 आर/डब्ल्यू 340 के तहत संबंधित अदालत द्वारा की गई शिकायत के आधार पर ही संज्ञान लिया जा सकता है।"
इसका जवाब देते हुए एसजी ने दावा किया कि,
"फर्जीवाड़ा कोर्ट के बाहर हुआ।  और इस प्रकार, धारा 340 सीआरपीसी के तहत यह बार लागू नहीं होगा। मेरे पास इकबाल सिंह मारवा का निर्णय है। यदि मिथ्याकरण न्यायालय की हिरासत से पहले था, तो बार नहीं आएगा।"

सीजेआई ने एसजी से पूछा कि क्या तीस्ता ने गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश की थी। सीजेआई ने कहा, 
"यदि आदमी 2014 में संपन्न मुकदमे में शपथ पर गवाही देता है, तो क्या इस महिला ने गवाह पर दबाव बनाने का कोई आरोप लगाया है? यह मुकदमा जमानत के योग्य हैं," 
"हम जांच कर रहे हैं," एसजी ने इस सवाल का जवाब दिया।

एएसजी एसवी राजू ने यह भी प्रस्तुत किया कि प्रथम दृष्टया, यह दिखाने के लिए सबूत हैं कि हस्ताक्षर धोखे से प्राप्त किए गए थे।
"यदि हस्ताक्षर धोखे से प्राप्त किए जाते हैं, तो यह जालसाजी है। भले ही धारा 340 सीआरपीसी के तहत शिकायत दर्ज करनी पड़े। इसकी जांच वर्जित नहीं है। यह तय कानून है। 195 के तहत बार संज्ञान के स्तर पर लागू होता है, एफआईआर के स्तर पर नहीं। यह तय स्थिति है।"

(विजय शंकर सिंह) 

Thursday, 1 September 2022

पॉलिटिकल फंडिंग में पारदर्शिता लाये बिना, सार्वजनिक जीवन मे भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है / विजय शंकर सिंह

2014 का चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ा गया था क्योंकि इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन की जड़ में, तत्कालीन यूपीए सरकार पर, भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों के धब्बे थे। गुजरात मॉडल, विकास, और भ्रष्टाचार मुक्त देश आदि शिगूफे हवा में उछाले जा रहे थे। स्विस बैंकों में जमा धन एक बड़ा मुद्दा बना हुआ था। साथ ही, पीएम का वह महत्वपूर्ण भाषण कि, 'यदि स्विस बैंक में जमा सारा काला पैसा, वापस आ जायेगा तो, हर नागरिक के खाते में पंद्रह पंद्रह लाख यूं ही आ जायेंगे।' यह बात भी सही है कि तब नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री नहीं बने थे, और वे गुजरात के विकास मॉडल को, जिसके तब वे लंबे समय से मुख्यमंत्री थे, के अग्रदूत के रूप में देखे जा रहे थे। तब न राममंदिर का प्रमुखता से जिक्र होता था, न ही हिंदू खतरे में आया था, न गौरक्षा एजेंडे में था, न घर वापसी का दीवानापन था, तब खूबसूरत सपनों का बाजार सजा था, टीवी 'हम मोदी जी को लाने वाले हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं' जैसे विज्ञापनों से गुलजार था, मोदी जी एक त्राता के रूप में आकार ग्रहण कर रहे थे और डॉ मनमोहन सिंह, एक खलनायक के रूप में बदल रहे थे। 'सबका साथ, सबका विकास' का नशा तारी था और वक्त बदल रहा था। 

लेकिन, जब सत्ता 2014 में बीजेपी को मिल गई तो उनके खूबसूरत संकल्पपत्र धरे के धरे रह गए, स्विस बैंक के काले धन पर, एक कमेटी तो बनी पर उसने क्या किया यह आज तक पता नहीं चला, रूपया 15 लाख सबके खाते में आने की बात जुमला कह दी गई, और जो वादे में नहीं था, वह लागू किया जाने लगा और वादे, जुमलों में तब्दील होने लगे, और अंत में शब्द जुमला भी असंसदीय मान कर चर्चा से हटा दिया गया। भ्रष्टाचार पर न तो बात हुई और न ही इस बात की पड़ताल की कोशिश ही हुई कि, आखिर राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार का मूल कारण क्या है और उसका समाधान क्या हो।

राजनीतिक जीवन में जैसी चुनाव प्रक्रिया है, उसे देखते हुए भ्रष्टाचार एक बीमारी नहीं एक जरूरत का रूप ले चुका है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा, राजनीतिक जीवन में संगठित भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण है। निर्वाचन आयोग द्वारा बार बार इस चेतावनी के बाद कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को पारदर्शी बनाया जाय, संसद ने न तो इसे गंभीरता से लिया और न ही भ्रष्टाचार के इस मूल कारण को रोकने के लिए कोई जतन ही किए। और तो और इलेक्टोरल बॉन्ड के रूप के राजनैतिक चंदे की एक ऐसी अपारदर्शी योजना लाई गई जिसने कॉर्पोरेट और सत्तारूढ़ दल के बीच जो भ्रष्ट गठबंधन है उसे और मजबूत ही किया।

चुनाव आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक दलों को मिलने वाले, ₹20 हजार, से ऊपर दिए जा रहे चंदे में 41.5 प्रतिशत की गिरावट आई है। यानी छोटे चंदे कम हुए हैं और बड़ी धनराशि जो अमूमन कॉर्पोरेट से मिलते हैं उनमें वृद्धि हुई है। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-20 में, बीजेपी को, ₹785.7 करोड़, कांग्रेस को ₹139 करोड़, एनसीपी को, ₹59.9 करोड़, सीपीएम को, ₹19.7 करोड़, तृणमूल कांग्रेस को, ₹8.08 करोड़, और सीपीआई को, ₹1.29 करोड़ का चंदा मिला है। 

वित्त वर्ष 2020-21 में, क्रमशः, बीजेपी को, ₹477.5 करोड़, (गिरावट 39% की), कांग्रेस को ₹74.5 करोड़ (46 % की गिरावट), एनसीपी को ₹26.2 करोड़, सीपीएम को ₹12.8 करोड़, तृणमूल कांग्रेस को, ₹42.5 लाख, सीपीआई को, ₹1.49 करोड़ का चंदा मिला। रिपोर्ट के मुताबिक बसपा ने हमेशा की तरह अपनी अनुदान रिपोर्ट में 20 हजार रुपये से अधिक का शून्य चंदा दिखाया है। ₹20 हजार से ऊपर के चंदे के संदर्भ में अधिकांश पार्टियों के चंदे 41.5% की गिरावट हुई है। 

जो आंकड़े दिए गए हैं, वे राजनीतिक दलों को मिले चंदे का पूरा विवरण नहीं है। ₹20 हजार, या इससे कम राशि का चंदा भी लोग देते हैं। बीएसपी अपने आय के खाते में ऐसे ही चंदे का विवरण बताती है। 2014 के बाद, सरकार ने पॉलिटिकल फंडिंग के लिए, इलेक्टोरल बॉन्ड, यानी पार्टियों को चंदा देने का एक ऐसा तरीका लागू किया गया जो विशेषज्ञों की नजर में अपारदर्शी था। कहां तो जरूरत थी कि पॉलिटिकल फंडिंग को पारदर्शी बनाया जाय और आय व्यय का विवरण, राजनीतिक दलों की अधिकृत वेबसाइट पर नियमित रूप से डाली जाए, उसे अपडेट किया जाय, लेकिन एक ऐसी व्यवस्था लाई गई जिसने चुनाव सुधार के सबसे महत्वपूर्ण विंदु, पोलिटिकल फंडिंग को और भी जटिल बना दिया।  इस प्रकार, पिछले कुछ सालों में, पॉलिटिकल पार्टियों को जिस माध्यम से सबसे अधिक चंदा मिल रहा है, वह, इलेक्टोरल बॉन्ड यानी चुनावी बॉन्ड है।  यह मोदी सरकार द्वारा लाई गई एक गोपनीय पोलिटिकल फंडिंग व्यवस्था है, जो चंदा देने वालों को उनकी पहचान गोपनीय रखने की सुविधा प्रदान देता है। इसलिए,  इलेक्टोरल बॉन्ड को चुनावी फंडिंग की पारदर्शिता में एक बड़ा रोड़ा बताया गया है। यह मामला,  सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है,  जिस पर सुनवाई होनी है। 

अब सवाल उठता है कि इलेक्टोरल बंद की जरूरत क्यों पड़ी ? यह कोई मजबूरी थी या कुछ और ? हुआ यह कि, चुनाव आयोग के नियमों के अंतर्गत, सभी राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपये से अधिक की धन राशि वाले चंदों का विवरण, निर्वाचन आयोग अनिवार्यतः देना होता है, जिसमें, चंदा देने वाले व्यक्ति, कंपनी या ट्रस्ट का नाम, उनके द्वारा दी गई चंदा की राशि, उसका पता, पैन नंबर, चेक/डीडी नंबर, बैंक का नाम और पता दर्ज करना होता है। लेकिन, इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये मिले चंदे में यह सब विवरण देने की जरूरत नहीं है। किस दल को कितना चंदा मिला यह तो राजनीतिक दलों की ऑडिट रिपोर्ट से पता चल जाता है पर वह चंदा किस व्यक्ति, कम्पनी या ट्रस्ट ने दिया है, इसकी जानकारी नहीं मिल पाती है। इस अपारदर्शी प्राविधान से सरकार पर, आरोप लगने लगा कि, इलेक्टोरल बॉन्ड आने के बाद से मोटी कमाई करने वाले लोग, कॉरपोरेट्स और कंपनियां चंदा देने के लिए इस गोपनीय रास्ते का इस्तेमाल कर रही हैं। चुनाव सुधार और चुनावी फंडिंग की पादर्शिता की दिशा में काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने इस मुद्दे पर आपत्ति की है एक बार फिर, पॉलिटिकल फंडिंग के इस संवेदनशील विंदु को उठाया है। 

इस संस्था के प्रमुख मेजर जनरल अनिल वर्मा (रिटायर्ड) ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया,
"मैं ये कहता रहा हूं कि अब राजनीतिक दलों की कमाई का बड़ा जरिया इलेक्टोरल बॉन्ड है। यह राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों दोनों के साथ हो रहा है। यह राजनीतिक दलों और चंदा देने वालों दोनों के लिए सुविधाजनक है, ये उन्हें गोपनीयता भी देता है।"
वहीं एडीआर के संस्थापक जगदीप छोकर ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया,
"बिल्कुल सत्ताधारी पार्टी को ज्यादा चंदा मिला है। लेकिन जो चंदा मिला है, वह सिर्फ बहुत छोटा सा हिस्सा (टिप ऑफ आइसबर्ग) है। राजनीतिक दलों की असली कमाई इससे कहीं अधिक है।"

अब इलेक्टोरल बॉन्ड से किसको कितना चंदा मिला है, इस पर चर्चा करते हैं। 
० वित्त वर्ष 2019-20 में बीजेपी को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये सर्वाधिक 2 हजार 555 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। 
० इससे पहले 2018-19 में पार्टी को 1450 करोड़ रुपये का चंदा इलेक्टोरल बांड से मिला था। 
० वहीं कांग्रेस को 2019-20 में इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये 317.8 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। हालांकि 2020-21 में ये काफी घटकर महज 10 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.
० अगस्त 2021 में एडीआर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि साल 2019-20 में राजनीतिक दलों ने कुल 3 हजार 429.56 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड को भुनाया था। इसमें से 76 फीसदी राशि अकेले बीजेपी के खाते में गई थी। वहीं कांग्रेस को सिर्फ 9 फीसदी राशि प्राप्त हुई थी।
० वर्ष 2019-20 में राष्ट्रीय पार्टियों (बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी, बीएसपी, टीएमसी और सीपीआई) ने अलग-अलग माध्यमों को मिलाकर कुल 4 हजार 758 करोड़ रुपये की कमाई की थी, जिसमें से 3 हजार 623.28 करोड़ रुपये (76.15%) की आय अकेले बीजेपी को हुई थी। 
० इस दौरान कांग्रेस की कमाई 682.21 करोड़ रुपये और सीपीआई को सबसे कम 6.58 करोड़ रुपये थी.
० वित्त वर्ष 2018-19 से 2019-20 के बीच महज एक साल में भाजपा की आय में 50.34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी. वहीं इस दौरान कांग्रेस की आय 25.69 फीसदी घट गई थी.
एडीआर के मुताबिक बीजेपी की 70 फीसदी से अधिक की कमाई इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये होती है. वहीं कांग्रेस की कमाई में 46.59 फीसदी, तृणमूल कांग्रेस की कमाई में 69.92 फीसदी और एनसीपी की कमाई में 23.95 फीसदी हिस्सा इलेक्टोरल बॉन्ड का है।

जैसे नोटबंदी और जीएसटी के भी नए नए नियम बनाए जाते रहे, कुछ वैसा ही प्रयोग इलेक्टोरल बांड के साथ भी होता रहा। कुछ उदाहरण देखें। 
० 2017 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने, जब पहली बार, इलेक्टोरल बॉन्ड का प्रस्ताव, संसद में रखा तब, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आरबीआई ने चेतावनी दी थी कि, इस तरह के बॉन्ड का दुरुपयोग मनी लाउंड्रिंग के लिए हो सकता है। लेकिन देश के सबसे बड़े बैंक की यह चेतावनी अनसुनी कर दी गई। 
० जब योजना की रूपरेखा पेश हुई तो वह कुछ इस प्रकार थी। 
केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एसबीआई को इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने का अधिकार दिया गया। 
० इसे कोई भी व्यक्ति, कारपोरेशन, एनजीओ अथवा कानूनी रूप से वैध संस्था खरीद सकता है और अपनी पसंद के राजनीतिक दल को दान कर सकता है।
० पॉलिटिकल पार्टी चंदे में मिले, इस धनराशि को, एक तयशुदा बैंक एकाउंट में जमा कर देगी। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि, आरबीआई ने इस योजना के लागू होने तक, इसका विरोध किया और बार बार कहा कि, यह योजना मनी लांड्रिंग का एक नया रास्ता खोलेगी जिससे देश में काले धन की समस्या होगी। जब सरकार ने आरबीआई की नहीं सुनी तो, रिजर्व बैंक ने, दो महत्वपूर्ण सुझाव देकर, इस योजना में मनी लॉन्ड्रिंग की संभावना को सीमित करने की कोशिश की। वे है, 
० बॉन्ड को साल में सिर्फ दो बार नियत समय के भीतर बेचा जाएगा। इसे विंडो कहा गया।
० खरीददार को इसे खरीदने के 15 दिन के भीतर अपनी पार्टी के खाते में जमा करवाना होगा। 
० जनवरी 2018 में वित्त मंत्रालय ने इलेक्टोरल बॉन्ड के क्रय विक्रय से, संबंधित नियमावली जारी की। इस नियमावली में, यह प्राविधान रखा गया कि,
० इलेक्टोरल बॉन्ड साल में चार बार बेचे जाएंगे।
० बिक्री की तारीख से 15 दिनों के भीतर ही इन्हें भुना लेना होगा और फिर राजनीतिक दल इसका इस्तेमाल अपने चुनाव प्रचार में कर सकते हैं.
लेकिन कर्नाटक चुनाव से पहले मई 2018 में प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर 10 दिन के लिए अतिरिक्त विंडो खोल कर, 1 से 10 मई, 2018 के बीच,  इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए।

इसी संदर्भ में एक रोचक घटना का उल्लेख करना उल्लेखनीय होगा। 24 मई 2018 को एसबीआई ने वित्त मंत्रालय को एक पत्र भेजकर बताया कि 'एक अज्ञात राजनीतिक दल के प्रतिनिधि, बैंक की दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में 20 करोड़ कीमत के इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आए, इनमें से, आधे बॉन्ड, ₹10 करोड़ के, 3 मई और आधे 5 मई, 2018 को खरीदे गए थे। यह बॉन्ड जैसा कि, एसबीआई ने बिक्री के वक्त ही, बता दिया था, और बांड पर यह निर्देश लिखा भी था कि, 15 दिन के बाद ये इलेक्टोरल बांड, काल बाधित यानी, एक्सपायर हो जाएंगे। इसके बावजूद राजनीतिक दल के वे प्रतिनिधि बैंक की शाखा में उन्हें भुनाने के लिए अड़ गए। वित्त मंत्रालय को भेजी गई एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया कि, राजनीतिक दल के प्रतिनिधि का तर्क है कि, बॉन्ड को भुनाने के लिए जो 15 दिन दिए गए हैं वो 15 कार्य दिवस हैं न कि 15 कैलेंडर दिवस।'
नई दिल्ली स्थिति एसबीआई ब्रांच ने उसी दिन अपने कारपोरेट कार्यालय को इसकी सूचना दे दी। 24 मई, 2018 को एसबीआई के उप निदेशक ने वित्त मंत्रालय को पत्र लिखकर पूछा कि, 'क्या वो इस एक्सपायर बॉन्ड को भुनाने की इजाजत देंगे।'

बैंक ने सरकार को लिखा, 
“कुछ खरीददार हमारे पास यह तर्क लेकर आए हैं कि ये बॉन्ड 15 वर्किंग दिवस तक वैध हैं। हमारा आग्रह है कि आप इस मामले को स्पष्ट करें कि क्या बॉन्ड को भुनाने के लिए तय 15 दिन की सीमा 15 कार्य दिवस है या 15 कैलेंडर दिवस की।” 
वित्त मंत्रालय में उप निदेशक विजय कुमार ने कहा, “यह स्पष्ट है कि वर्णित तिथि का मतलब है कुल 15 दिन यानि इसमें गैरकामकाजी दिवस भी शामिल हैं।”
अतः बॉन्ड एक्सपायर हो चुके थे, और मौजूदा प्रवाधानों के तहत यह पैसा प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कर देना था जो कि एक आधिकारिक फंड है और सामाजिक और आपदाग्रस्त कार्यों के लिए इस्तेमाल होता है। 
लेकिन किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ। वित्त मंत्रालय ने, बाद में निर्देश भेजा कि,
"नियमों में पूरी स्पष्टता के अभाव में कुछ बॉन्ड जो पिछले विंडो से खरीदे गए है, उन बॉन्ड होल्डर्स को एसबीआई क्रेडिट कर सकती है, यदि ऐसे बॉन्ड जो 10 मई, 2018 के पहले खरीदे गए थे.” साथ ही यह भी जोड़ दिया कि, 
"भविष्य में इस तरह की सुविधा नहीं मिलेगी।”

अक्सर हम राजनीतिक दलों के नेताओं को सार्वजानिक जीवन में शुचिता और भ्रष्टाचार पर भाषण देते, देखते सुनते रहते हैं, पर किसी भी राजनीतिक दल की सरकार ने लोकतंत्र के इस दीमक का पेस्ट कंट्रोल करने का कोई प्रयास करते नहीं देखा और देखा भी तो, उन्हे निर्वाचन आयोग, अदालत और अन्य एनजीओ के उन प्रयासो पर खामोशी ओढ़ते हुए देखा। आरटीआई के दायरे में राजनीतिक दल खुद को लाने के लिए भी तैयार नहीं हैं। यह तो टीएन शेषण, लिंगदोह, जैसे कुछ काबिल मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की सजगता और दृढ़ता का परिणाम है कि, चुनाव में काफी हद तक काले धन पर रोक लगाने की कोशिश हुई लेकिन यह सारे प्रयास भी अभी तक चुनाव प्रक्रिया को, बहुत कुछ साफ सुथरा नहीं कर पाए हैं। सरकार और संसद को, पॉलिटिकल फंडिग को न केवल पारदर्शी बनाना होगा बल्कि उसे, राजनैतिक दलों को आरटीआई के दायरे में भी लाने पर विचार करना होगा। इससे पूंजी और सत्ता का गंदा गठजोड़ टूटेगा और उसका सीधा असर, सार्वजनिक जीवन पर पड़ेगा।

(विजय शंकर सिंह)

कनक तिवारी / उदार गांधी की नज़र में सावरकर-कथा (4)


(19)  गांधी की नज़र से हिन्दू महासभा और उसके नेताओं (जिनमें प्रमुख सावरकर ही थे) की गतिविधियां ओझल नहीं होती थीं। गांधी की कालजयी, वस्तुपरक और सयानी नस्ल की टिप्पणियां भारतीय इतिहास का अनिवार्य हिस्सा हैं। उन्हें उनके वक्त की घटनाओं के संदर्भ से अलग कर समझने की कोशिश इतिहास को ही समझने की कोशिश के साथ अन्याय होता है। इसलिए बीसवीं सदी के भारत के सबसे बड़े विचारक और मसीहा की राय को आज भी यदि तटस्थ लेकिन उर्वर समझ में लाना हो तो शब्दकृपण लेकिन भाव से भरपूर गांधी के लफ़्ज इतिहास के कूडे़दान पर जो लोग फेंकने की कोशिश करते हैं, वे अपने मुंह मिया मिट्ठू तो बन सकते हैं, लेकिन वक्त उनकी हैसियत को खुद ही समझा देता है। 

(20) ‘यंग इंडिया‘ के अपने लेख 26 मई, 1920 के बाद भी गांधी हिन्दू महासभा और सावरकर को लेकर आज़ादी के दौर में उनके लिए प्रशंसा के विशेषण इस्तेमाल करने में कई तरह के अलंकारों की भाषा में उनके यथार्थ को बूझते हैं। मसलन 4 मार्च, 1926 को गांधी ने अपने नोट्स में लिखा कि लंदन में श्याजीकृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर से मिले थे। तो वे दोनों गांधी को गीता और रामायण की समझ के उलट भावार्थ समझाना चाहते थे। अपने विनोद की अभिव्यक्ति में गांधी कहते हैं कि ऋषि वेदव्यास को चाहिए था कि वे युद्ध के बदले कोई और रूपक गढ़ते। उससे रामायण और गीता का जनोपयोगी भावार्थ और अभीष्ट संदेश पीढ़ि़यों को मिल सकता। व्यंग्य में गांधी कहते हैं जब इन जैसे पढे़ लिखे लोगों तक को रामायण और गीता का भाष्य उलट तरह समझ आता है। तब साधारण पाठकों के बारे में क्या कहा जाए। इसी तरह उनकी नज़र सभी शास्त्रों और उपनिषदों को खंगाल कर गलत हासिल ही निकालती रहेगी। 

(21)  गांधी ने अलबत्ता सावरकर द्वारा रत्नागिरि में किए गए समाजसेवा के काम की तारीफ की थी। यह अफवाह उड़ाई जाती है कि गांधी ने सावरकर की माफी के लिए हस्ताक्षर किए थे अथवा सावरकर ने गांधी के उकसावे पर माफीनामे लिखे थे। 20 जुलाई, 1937 को शंकरराव देव को लिखे पत्र में गांधी ने साफ लिखा कि मैंने सावरकर की रिहाई के संबंध में उनके पक्ष में किसी दस्तावेज पर दस्तखत नहीं किए क्योंकि सावरकर तो यूं ही छूटने वाले थे। इसी बीच नया अधिनियम लागू जो हो गया था और इसलिए वे छोड़ ही दिए गए। गांधी ने स्पष्ट किया कि सावरकर बंधुओं और मेरे बीच निश्चित रूप से मतभेद हैं लेकिन उनकी रिहाई में अनावश्यक विलंब संबंधी कानूनी रुकावटों को लेकर मेरी कानूनसम्मत राय रही है। 

(22) सियासत के छोटे छोटे सवाल भी गांधी के जेहन से बाहर नहीं होते थे। सावरकर और हिन्दू महासभा की गतिविधियों से आज़ादी के योद्धा गांधी का सरोकार होना स्वाभाविक था। 2 नवम्बर, 1939 को लंदन में हाउस आफ लाॅर्ड्स में लाॅर्ड जेटलैंड ने कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था कह दिया था। गलतबयानी के कटाक्ष से विचलित गांधी ने ‘मैंचेस्टर गार्जियन‘ के भारत स्थित सम्वाददाता को दी गई भेंट में कहा कि वे लाॅर्ड जेटलैण्ड के कथन से अचंभित रह गए हैं।....कांग्रेस में अलबत्ता अधिकतर हिन्दू हैं तो। फिर भी सभी वर्गों और धर्मों के बहुत सारे हिंदुस्तानी उसमें शामिल हैं।....कांग्रेस कभी भी मजहबी नस्ल की पार्टी नहीं रही। जेटलैंड ने हिन्दू महासभा को लेकर तो कुछ नहीं कहा। 

(23) गांधी कुटिल साम्राज्यवादी खतरा और साजिश सूंघ लेते हैं और दो टूक कहते हैं ‘‘हिन्दू महासभा एक साम्प्रदायिक संस्था है। इसकी स्थापना इसलिए की गई है कि भद्र कुलीन हिन्दुओं की भी यह धारणा थी कि कांग्रेस हिन्दुओं के विशेषाधिकारों की रक्षा नहीं करती और न कर सकती है।‘‘.              यह थी तीक्ष्ण बुद्धि गांधी की विस्फोटक लगते बयान पर तात्कालिक प्रतिक्रिया। इतिहास ने गांधी को बीज बुद्धि दी थी। उन्हें अहसास था हिन्दू महासभा और सावरकर से उनका क्या रिश्ता बनेगा।
(जारी)

कनक तिवारी
(Kanak Tiwari) 

उदार गांधी की नज़र में सावरकर-कथा (3) 
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/09/3.html 

गंगोली, गाजीपुर के राही मासूम रजा / विजय शंकर सिंह

उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में एक जिला है ग़ाज़ीपुर। सोया हुआ, खामोश पर सरसब्ज़ और प्रतिभासंपन्न।  गंगा इस इस ज़िले को सींचती हुयी गुज़रती हैं। इसी ज़िले के एक गाँव गंगौली में राही मासूम रज़ा का जन्म 1 सितंबर 1925 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। इसके बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे। उनका देहांत, 15 मार्च 1992 को हुआ था। 

उन्होंने मूलतः  फिल्मों की पटकथाएं और संवाद लिखे हैं, पर उनकी प्रसिद्धि फ़िल्मी लेखन से अलग भी है। उनका लिखा एक उपन्यास है आधा गाँव। पूर्वाचल के किसी भी आम गांव जैसे, एक गांव की कहानी है आधा गांव। जब यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था तो, शीघ्र ही चर्चित भी हो गया। उपन्यास की प्रशंसा तो हुई ही, आलोचना भी कम नहीं हुयी, कारण, .उपन्यास में कहीं कहीं गालियों का भी उल्लेख किया गया है। यह गालियां आम जन मानस में बैठी हुई गलियां है, जो जाने अनजाने और निष्काम भाव से जुबां से झरती रहती है। पर शुचिता और नैतिकता अक्सर मिथ्या और ओढ़े हुए नैतिकतावादियों को अधिक असहज करती है तो, इस उपन्यास को लेकर साहित्यिक आलोचना के केंद्र में गालियां ही रहीं और उपन्यास का शिल्प, कथानक, समाज का चित्रण आदि गौण हो गया। 

इस उपन्यास में गाँव और गाँव के जन, समाज , उनकी विसंगतियों और विडम्बनाओं का बहुत ही विषद ढंग से वर्णन किया गया है। यह उपन्यास उत्तर प्रदेश के एक नगर गाजीपुर से लगभग ग्यारह मील दूर बसे गांव गंगोली के शिक्षा समाज की कहानी कहता है। राही नें स्वयं अपने इस उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा है कि 
“वह उपन्यास वास्तव में मेरा एक सफर था। मैं गाजीपुर की तलाश में निकला हूं लेकिन पहले मैं अपनी गंगोली में ठहरूंगा। अगर गंगोली की हकीकत पकड़ में आ गयी तो मैं गाजीपुर का एपिक लिखने का साहस करूंगा।"
पर महाभारत जैसे महान एपिक की पटकथा लिखने वाले राही साहब, गंगौली की हकीकत पकड़ पाए या नहीं, यह तो पता नहीं, पर वे गाजीपुर पर कोई एपिक नहीं लिख सकें। 

राही मासूम रजा का दूसरा उपन्यास “हिम्मत जौनपुरी” मार्च 1969 में प्रकाशित हुआ था। आधा गांव की तुलना में यह जीवन चरितात्मक उपन्यास बहुत ही छोटा है। हिम्मत जौनपुरी लेखक के बचपन का साथी था और लेखक का विचार है कि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था।

उसी वर्ष राही का तीसरा उपन्यास “टोपी शुक्ला” प्रकाशित हुआ। इस महत्वपूर्ण राजनैतिक समस्या पर आधारित चरित्र प्रधान उपन्यास में भी, उसी गांव के निवासियों की जीवन गाथा का वर्णन किया गया है। राही साहब, इस उपन्यास के द्वारा यह बतलाते हैं कि सन्‌ 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन का ऐसा कुप्रभाव पड़ा कि अब हिन्दुओं और मुसलमानों का एक साथ मिलकर रहना अत्यन्त कठिन हो गया।

सन्‌ 1970 में प्रकाशित राही मासूम रजा के चौथे उपन्यास “ओस की बूंद” का आधार भी देश का नासूर बन चुकी, हिन्दू-मुस्लिम समस्या है। इस उपन्यास में पाकिस्तान के बनने के बाद जो सांप्रदायिक दंगे हुए, उन्हीं का जीता-जागता चित्रण एक मुसलमान परिवार की कथा द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

सन्‌ 1973 में राही साहब का पांचवा उपन्यास “दिल एक सादा कागज” प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के रचना-काल तक सांप्रदायिक दंगे कम हो चुके थे। पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था और भारत के हिन्दू तथा मुसलमान शान्तिपूर्वक जीवन बिताने लगे थे। इसलिए राही ने अपने उपन्यास का आधार बदल दिया। अब वे राजनैतिक समस्या प्रधान उपन्यासों को छोड़कर मूलतः सामाजिक विषयों की ओर उन्मुख हुए।

सन्‌ 1977 में प्रकाशित उपन्यास “सीन 75” का विषय भी फिल्मी संसार से लिया गया है। इस सामाजिक उपन्यास में बम्बई महानगर के उस बहुरंगी जीवन को विविध कोणों से देखने और उभारने का प्रयत्न किया गया है जिसका एक प्रमुख अंग फिल्मी जीवन भी है। विशेषकर इस उपन्यास में फिल्मी जगत से सम्बद्ध व्यक्तियों के जीवन की असफलताओं एवं उनके दुखमय अन्त का सजीव चित्रण किया गया है।

सन्‌ 1978 में प्रकाशित राही मासूम रजा के सातवें उपन्यास “कटरा बी आर्जू” का आधार फिर से राजनैतिक समस्या हो गया है। इस उपन्यास के द्वारा लेखक यह बतलाना चाहते हैं कि इमरजेंसी के समय सरकारी अधिकारियों ने जनता को बहुत कष्ट पहुंचाया था।

राही मासूम रजा की अन्य कृतियाँ है - मैं एक फेरी वाला, शीशे के मकां वाले, गरीबे शहर, क्रांति कथा (काव्य संग्रह), हिन्दी में सिनेमा और संस्कृति, लगता है बेकार गये हम, खुदा हाफिज कहने का मोड़ (निबन्ध संग्रह) साथ ही उनके उर्दू में सात कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। इन सबके अलावा राही ने फिल्मों के लिए लगभग तीन सौ पटकथा भी लिखी है। राही ने साहित्य की लगभग हर विधा पर कलम चलाया है और उन्होंने, दस-बारह कहानियां भी लिखी हैं। कहते हैं, जब वो इलाहाबाद में थे तो उर्दू रिसाला रूमानी दुनिया के लिए पन्द्रह-बीस उपन्यास उर्दू में, उन्होंने दूसरों के नाम से भी लिखा है। उनका लेखन विपुल है और वे हिंदी उर्दू के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। 

फिल्मों की बात करें तो, राही साहब को ' मैं तुलसी तेरे आँगन की ', के  सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया था और, बीआर चोपड़ा द्वारा निर्देशित महाभारत सीरियल का संवाद इन्होने ही लिखा था।   कट्टरता हर युग और धर्म में रही है पर तमाम शोर शराबे के बाद भी यह कुछ खास मस्तिष्कों तक ही सीमित रही है। राही साहब, महाभारत के सीरियल की पटकथा के संदर्भ में अपना एक रोचक संस्मरण बार बार सुनाते थे। 

वे बताते थे कि, जब महाभारत सीरियल की पटकथा लिखने का ऑफर उनके पास आया तो, उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया लेकिन जैसे ही यह बात सार्वजनिक हुई, हिंदू समाज के कुछ कट्टर धर्मांध लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और उन्हें अपशब्दों भरे पत्र लिखे गए। तब सोशल मीडिया नहीं था, अपनी बात कहने का प्रचलित माध्यम, या तो पत्र लेखन था या, अखबार थे। लेकिन यह विरोध इकतरफा नहीं रहा। राही साहब के समर्थन में भी पत्र लिखे गए और उन पत्रों की संख्या, उनके विरोध में लिखे पत्रों से कहीं अधिक थी। राही साहब भी ठहरे गाजीपुरी, उन्होंने जिद कर लिया कि, अब महाभारत सीरियल की पटकथा लिखेंगे तो वे ही लिखेंगे और उन्होंने उसे लिखा भी। 

लेकिन राही साहब अपने लिखने की मेज पर, अपशब्दों से भरे विरोध में लिखे गए पत्रों का बंडल भी सजा कर रखते थे और नीचे उन पत्रों के गट्ठर थे जो उनके समर्थन में लिखे गए थे। जब कोई राही साहब से पूछता था कि वे इतने गालियों भरे पत्रों के बाद भी क्यों महाभारत की पटकथा लिखने को राजी हुए, तो वे, मेज पर रखे बंडल और गट्ठर दोनो ही दिखाते थे और कहते थे कि, समर्थन में आए पत्रों की तुलना में गालियां बहुत कम हैं और इससे उन्हे हौसला मिला कि वे इस महान महाकाव्य पर बन रहे सीरियल की पटकथा लिखें।

राही साहब बिलकुल सही कह रहे थे, हिंदुस्तान की यही तासीर भी है कि, धर्मांधता और कट्टरता न तो इसका मूल स्वभाव है और न ही स्थाई भाव। देश को कट्टरता के झोंकने की सारी कोशिशों के बाद, आज भी धर्मांध संगठन अपना इच्छित एजेंडा पूरा नहीं कर पा रहे हैं। कमाल यह भी है कि, विरोध में पत्र लिखने वालों में, न केवल हिंदू कट्टरपंथी थे, बल्कि मुस्लिम धर्मांध भी थे। दरअसल, बेकरार रहने के लिए करार चाहिए तो एक की कट्टरता बनी रहे, इसके लिए दूसरे का कट्टर होना भी लाजिमी है। दोनो की धर्मांधता और कट्टरता, एक दूसरे के लिए, खाद पानी जैसा काम करती है। आइंस्टीन का सापेक्षतावाद यहां भी प्रासंगिक हो जाता है !

अब उनकी यह प्रसिद्ध कविता पढ़ें .....

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बंदा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस खून और आँसू, चीखें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाजे
खून में लिथड़े कमसिन कुरते
जगह जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाजों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और खून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।

डॉ राही मासूम रज़ा साहब को उनके जन्मदिन पर उनका विनम्र स्मरण।

(विजय शंकर सिंह)


कनक तिवारी / उदार गांधी की नज़र में सावरकर-कथा (3)


#(12) गांधी ने 26 मई 1920 को ‘यंग इंडिया‘ में आगे लिखा कि दोनों भाइयों को जेल में नजरबंद रखने का यही एक प्रतिबंध हो सकता है कि वे लोकसुरक्षा के लिए खतरा हैं। अंगरेज सम्राट ने भारत के वाइसराॅय को राजनीतिक कैदियों के मामले में सार्वजनिक क्षमादान का अधिकार दे दिया है  कि वे उसे इस तरह इस्तेमाल करें जो लोकसुरक्षा के अनुकूल हो। गांधी ने कहा कि जब इस बात का मुकम्मिल सबूत नहीं मिले कि दोनों भाई राज्य के लिए खतरा होंगे, तब उन्हें बंद रखना ठीक नहीं है। वे काफी दिन जेल में काट चुके। उनका वजन भी कम हो गया है और उन्होंने अपने इरादे सार्वजनिक कर दिए हैं। उन्हें वाइसराॅय द्वारा जेल से छोड़ने का हुक्म देना उसी तरह है जिस तरह किसी जज को अख्तियार होता है कि वह अपराधी को कानून में प्रावधानित चाहे तो कम से कम सजा दे। यदि उन्हें इसके बावजूद निरोध में रखा जाता है तो कारण बताते जनता के लिए सरकार की ओर से पूरा ब्यौरा प्रकाशित होना चाहिए। 

(13) गांधी के इस लेख को डूबते सावरकर का तिनका बनाया जा रहा है। कोई भी समझ सकता है कि जब कोई व्यक्ति (1) अपनी क्रांतिकारिता को ही जमींदोज कर रहा है। (2) छूट जाने पर वह गवर्नमेंट आॅफ इंडिया एक्ट, 1919 के तहत आचरण करने की प्रतिबद्धता का बयान कर रहा है। (3) ऐलानिया कह रहा है कि अंगरेजी अधिनियम के तहत उसे देश के लिए कुछ करने की राजनीतिक जिम्मेदारी मिल जाएगी। (4) वे ब्रिटेन से भारत की आजादी भी नहीं चाहते। (5) उनका यह भी कहना है कि ब्रिटेन की संगति में रहकर ही भारत की तकदीर गढ़ी जा सकती है। 

(14) अंगरेज की कुटिलता यह थी कि वह उन्हें ही माफी देता (1) जिनके मन में अंगरेजी हुकूमत से पारस्परिक कड़वापन ही खत्म हो जाए। (2) जिन्होंने अपनी राजनीतिक बढोतरी के जोश में कानून तोड़ा लेकिन भविष्य में उसका पालन करने वचनबद्ध होंगे। (3) सरकार को भरोसा है कि उसकी यह उदारता ऐसे लोगों के लिए न्यायोचित होगी जो उसके खिलाफ अपराधों के उनके द्वारा घटित होने की संभावना को ही निर्मूल कर देंगे। (4) ऐसी रिहाई सशर्त ही होनी थी, बिना ऊपर की शर्तों के कारण ही। (5) अंगरेज शायद रिहाई प्राप्त कैदियों से ही मुखबिर बनाना चाहते थे। बाद में हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों ने यही तो किया। 

अब इसके बाद क्या बचा? ऐसी राजाज्ञा को सिर पर लादकर, जेल से मुक्ति पाकर, क्रांतिधर्मिता को रफादफा कर गांधी का कंधा पकड़ने की जरूरत कहां बची? गांधी ने तो 1919 की राजाज्ञा के पांच महीने बाद ‘यंग इंडिया‘ में लेख उन सभी राजनैतिक कैदियों के वास्ते लिखा था जो इंकलाब और आजादी से बचकर गुमनामी और गुलामी का जीवन जीने का कायर ऐलान कर रहे थे। यह तो दो ऐलानों का मिलन हुआ। शाही ऐलान और गुलामी के ऐलान का। 

(15) गांधी यहां साफ कर देते हैं कि आजादी की लड़ाई और क्रांतिकारिता से कन्नी काट ही ली गई है। तो ऐसे सभी व्यक्तियों को जिनमें सावरकर बंधु भी शामिल हैं, शाही ऐलान के तहत छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्हें छोड़ने की गांधी ने अपनी कोई स्वैच्छिक तजबीज नहीं की। गांधी बैरिस्टर थे। उनका कहना था जब बाकी राजनीतिक कैदी पंजाब में छोड़ दिए गए, तो सावरकर बंधुओं को तो छोड़ा ही जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भी जंगे आजादी का अपना लबादा तो उतार दिया है। गांधी ने साफ किया कि शाही फरमान संदेहजनक प्रकरणों में ही नहीं, सभी प्रकरणों के लिए लागू था। वाइसराॅय को इतना ही कहना है कि ऐसों के छोड़ दिए जाने से लोकसुरक्षा को खतरा नहीं होगा। साफ है केवल उन्हें छोड़ा जाए जिनके वजूद में क्रांति और अंगरेजों से लड़ने की ताब खुदकुशी कर चुकी हो। वही तो सावरकर ने किया। ऐसे पराजित व्यक्ति से लोकसुरक्षा को क्या खतरा हो सकता था? 

(16) हालांकि यह भी सही है कि वाइसराॅय मांटेग्यू ने तब तक सावरकर बंधुओं से मिले माफीनामे पर विचार करने से इंकार कर दिया था। इसलिए गांधी जी ने जोर देकर कहा कि उनके प्रकरण आलमारियों में बंद नहीं रखे जा सकते। यह देश को जानने का हक है कि इस ऐलान के बावजूद ऐसा क्या है जिसकी वजह से उनको नहीं छोड़ा जा रहा है। अंगरेजों की नीयत, कानूनों की मंशा और भारतीय संघर्षकथा में सावरकर की भूमिका तथा सजा को लेकर इतिहास की नजर से गांधी हर मकड़जाल निकाल देते हैं। सरल हृदय के लेकिन कम्प्यूटरनुमा दिमाग के गांधी दो टूक कहते हैं। गांधी मनुष्य की स्वायत्तता और उसकी आज़ादी पर किसी भी तरह की गैरकानूनी सरकारी बंदिश लगाए जाने की गुलाम भारत में भी संवैधानिक भाषा में मुखालफत करते हैं। 

(17) यह गौरतलब है सावरकर बंधुओं की कथित हिंसात्मक गतिविधियों को लेकर ही गांधी ने उन्हें कभी नहीं बख्शा। गांधी के वक्तव्य में द्वैध और श्लेष की कूटनीतिक राॅकेटनुमा प्रहारशक्ति दोनों पढ़ी जा सकती है। गांधी के मुताबिक जनता को भी सावरकर भाइयों पर आरोपित हिंसात्मक या अन्य कानूनतोड़क कार्यवाहियों की पूरी जानकारी होने का जनतांत्रिक अधिकार है। गांधी की समझ में इसके बावजूद सावरकर बंधुओं और जनता दोनों के नैसर्गिक अधिकारों को रहस्यमयता का कानूनी लबादा ओढ़कर अंगरेज कुचल रहे थे। 

(18) ताजा इतिहास को यह भी मालूम होना चाहिए। सावरकर की रिहाई के लिए दिए जाने वाले माफीनामे के समर्थन में अनुरोध पत्र पर गांधी के दस्तखत की उम्मीद महसूस की गई थी। गांधी ने दस्तखत करने से इंकार किया। लेकिन सयानेपन तथा मानवीय उदारता के चलते मनुष्यता के लिए अपनी भूमिका का सचनामा गांधी ने 27 जुलाई 1937 के बाॅम्बे क्राॅनिकल के अपने पत्र में लिखा ‘‘सावरकर मानते होंगे कि मैंने उनकी रिहाई के लिए भरसक कोशिश तो की थी। वे यह भी मानेंगे कि मेरे और उनके बीच लंदन में हुई पहली मुलाकात के वक्त आत्मीय रिश्ते थे।‘‘ शेगांव से 12 अक्टूबर 1939 को लिखे पत्र में गांधी ने फिर खुलासा किया वे अपनी बात समझाने के लिए सावरकर के घर भी गए थे। भले ही उसे ठीक नहीं समझा गया हो।

कनक तिवारी
(Kanak Tiwari) 

उदार गांधी की नज़र में सावरकर-कथा (3)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/08/2_30.html 


सुप्रीम कोर्ट में तीस्ता सीतलवाड की जमानत याचिका पर सुनवाई शुरू / विजय शंकर सिंह

सुप्रीम कोर्ट ने, आज 1 सितंबर, गुरुवार को सोशल एक्टिविस्ट, तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ, दर्ज मामले के संबंध में, गुजरात राज्य के वकील से कई सवाल किए। तीस्ता, 2002 के गुजरात दंगों के संबंध में, एक कथित साजिश के आरोप में जेल में हैं, और जिनकी जमानत की सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। तीस्ता, 25 जून से लगातार जेल में है।

लाइव लॉ वेबसाइट के अनुसार, सीजेआई, यूयू ललित के नेतृत्व वाली एक पीठ ने सुनवाई के दौरान एक बिंदु पर यह संकेत भी दिया कि, अदालत, तीस्ता सीतलवाड़ को अंतरिम जमानत दे सकती है  लेकिन अंततः भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा किए गए बार-बार अनुरोध पर सुनवाई को कल दोपहर 2 बजे के लिए स्थगित कर दिया।

सीजेआई, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की खंडपीठ, जो तीस्ता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें गुजरात उच्च न्यायालय के अंतरिम जमानत देने से इनकार करने को चुनौती दी गई थी, ने कहा कि "मामले की चार या पांच विशेषताएं हमें परेशान करती हैं"।
पीठ ने निम्नलिखित विशेषताओं की ओर इशारा किया:
० याचिकाकर्ता 2 महीने से अधिक समय से हिरासत में है।  कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है।
० सुप्रीम कोर्ट द्वारा जकिया जाफरी के मामले को खारिज करने के अगले ही दिन प्राथमिकी दर्ज की गई थी और प्राथमिकी में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के अलावा और कुछ नहीं बताया गया है।
० गुजरात उच्च न्यायालय ने 3 अगस्त को तीस्ता की जमानत याचिका पर नोटिस जारी करते हुए एक लंबा स्थगन दिया, जिससे नोटिस 6 सप्ताह के लिए वापस करने योग्य हो गया।
० कथित अपराध हत्या या शारीरिक चोट की तरह गंभीर नहीं हैं, बल्कि अदालत में दायर दस्तावेजों की कथित जालसाजी से संबंधित हैं।
० ऐसे कोई अपराध नहीं हैं जो जमानत देने पर रोक लगाते हों।

सुनवाई में सीजेआई ललित, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (तीस्ता की ओर से) और एसजी तुषार मेहता के बीच व्यापक बातचीत हुई। भारत के मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित ने भी मौखिक रूप से टिप्पणी की कि तीस्ता के खिलाफ आरोपित अपराध सामान्य आईपीसी अपराध हैं, जिसमें जमानत देने पर कोई रोक नहीं है।
"इस मामले में कोई अपराध नहीं है जो इस शर्त के साथ आता है कि यूएपीए, पोटा की तरह जमानत नहीं दी जा सकती है। ये सामान्य आईपीसी अपराध हैं ... ये शारीरिक अपराध के अपराध नहीं हैं, ये अदालत में दायर दस्तावेजों के अपराध हैं। इन मामलों में  , सामान्य विचार यह है कि पुलिस हिरासत की प्रारंभिक अवधि के बाद, ऐसा कुछ भी नहीं है जो जांचकर्ताओं को हिरासत के बिना जांच करने से रोकता है ... और अदालत के कई निर्णयों के अनुसार, एक महिला अनुकूल उपचार की हकदार है।"

सीजेआई ने आगे कहा, 
"एफआईआर जैसा कि दस्तावेजों में है, उसमे, अदालत में जो हुआ, उससे ज्यादा उसमे कुछ भी नहीं है। तो, क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अलावा, तीस्ता के खिलाफ कोई अतिरिक्त सामग्री पुलिस के पास है? पिछले दो महीनों में, क्या आपने चार्जशीट दायर की है या जांच चल रही है? पिछले दो महीनों में आपको क्या सामग्री मिली है?  नंबर एक, महिला ने दो महीने की कस्टडी पूरी कर ली है।  नंबर 2, आपसे हिरासत में पूछताछ की गई है।  क्या आपने इससे कुछ हासिल किया है? इस तरह के मामले में, उच्च न्यायालय 3 अगस्त को नोटिस जारी करता है और इसे 19 सितंबर की तारीख तय करता है। इतना लम्बा समय ? आश्चर्य जताया है।"

CJI ने पूछा कि, 
"क्या गुजरात उच्च न्यायालय में यह एक स्टैंडर्ड चलन है कि जमानत की याचिकाओं पर लंबी तारीखें दी जाएं ? हमें एक भी मामला दिखा दें, जहां एक महिला इस तरह के मामले में शामिल हो,  और हाइकोर्ट ने उसे 6 सप्ताह का समय, सुनवाई के लिए दिया हो ?" 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया, 
"किसी भी महिला ने इस तरह के अपराध नहीं किए हैं।"
पीठ ने सॉलिसिटर जनरल के तर्क के जवाब में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए लंबे स्थगन के बारे में टिप्पणी की कि 
"यह एक असाधारण मामला नहीं था जहां सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना चाहिए। इसने अंतरिम जमानत देने और गुण-दोष के आधार पर मामले की सुनवाई जारी रखने की भी इच्छा व्यक्त की।"

सीजेआई ने एसजी से जांच के सटीक "काल और दिशा" के बारे में भी पूछा।
" आपकी शिकायत में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अलावा कुछ भी नहीं है। इसलिए, अगर फैसला 24 जून को आता है, तो 25 को शिकायत दर्ज हो जाती है। जिस अधिकारी ने शिकायत की, वह इसके अलावा अन्य जानकारी, नहीं दे पाया। एक दिन के भीतर एक शिकायत दर्ज की गई ... चार या पांच ऐसे विंदु या विशेषताएं हैं, जो हमें परेशान कर रहे हैं।"

सॉलिसिटर जनरल ने अनुच्छेद 136 के, क्षेत्राधिकार के तहत तीस्ता की जमानत याचिका पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में प्रारंभिक आपत्ति उठाई।
"मेरा पहला तर्क यह है कि यह सब किसी अन्य सामान्य अभियुक्त की तरह उच्च न्यायालय के समक्ष जाना चाहिए ... मैं इसके बारे में बहुत दृढ़ता से महसूस करता हूं इसलिए मुझे यह कहने के लिए क्षमा करें। वास्तव में इस प्रकृति की स्थिति में, यदि कोई अन्य सामान्य वादी इस अदालत में आया होता तो, क्या उसका मामला सुना जाता ? हजारों अन्य वादी भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं ... बड़ी संख्या में अभियुक्तों के लिए, ये तारीखें दी जाती हैं। लेकिन सभी आरोपी इतने शक्तिशाली नहीं हैं कि इस तरह की धारणा अदालत के मस्तिष्क में जगा सकें।"

एसजी ने आगे कहा, 
"यह ऐसा कोई मामला नहीं है जहां एक आरोपी, अनुच्छेद 136 के तहत इस अदालत में पहुंचा हो और उसे राहत दी जाय। राज्य किसी भी आरोपी के लिए कोई विशेष उपचार नहीं चाहता है। याचिकाकर्ता को कोई विशेष उपचार देने की आवश्यकता नहीं है ... राज्य कानून के शासन का पालन करना चाहेगा,  कानून की समानता।"

तीस्ता ने, अंतरिम जमानत देने से गुजरात हाई कोर्ट के इनकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।  उन्हें 26 जून को गुजरात एटीएस द्वारा मुंबई से गिरफ्तार किया गया था, जिसके एक दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने जकिया जाफरी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य के उच्च पदस्थ अधिकारियों और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कथित बड़ी साजिश में एसआईटी की क्लीन चिट को चुनौती दी गई थी।  

जकिया जाफरी की याचिका को खारिज करते हुए, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की अगुवाई वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं को मामले को जिंदा रखने, पॉट बोयलिंग और विशेष जांच दल के जांच पर, सवाल उठाने के लिए "दुस्साहस" दिखाने का दोषी ठहराया था  और कहा था कि, 
"इस तरह के दुरुपयोग में शामिल सभी लोग  प्रक्रिया, कटघरे में रहने और कानून के अनुसार आगे बढ़ने की जरूरत है"।

अगले ही दिन, गुजरात एटीएस ने तीस्ता सीतलवाड़, आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट (जो पहले से ही एक अन्य मामले में कारावास की सजा काट रहे हैं) को 2002 के दंगों के संबंध में जाली दस्तावेजों का उपयोग करके झूठी कार्यवाही दर्ज करने का आरोप लगाते हुए गिरफ्तार कर लिया।

तीस्ता के एडवोकेट, कपिल सिब्बल के  तर्क इस प्रकार हैं ~
"सुप्रीम कोर्ट का फैसला 24 (जून) को आया, एफआईआर 25 (जून) को दर्ज हुई  एक दिन के भीतर वे जांच नहीं कर सकते थे," 
उन्होंने जालसाजी के आरोपों से इनकार किया और तर्क दिया कि, 
" सभी दस्तावेज एसआईटी द्वारा दायर किए गए थे। "मैंने कुछ भी दर्ज नहीं किया।" 
सिब्बल ने आगे कहा कि 
"इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती है जब सभी कार्यवाही अदालत में हुई है। जब न्यायिक कार्यवाही के संबंध में आरोप जालसाजी या प्रतिवाद से संबंधित हैं, तो एफआईआर बनाए रखने ही योग्य नहीं है और केवल 195 आर / डब्ल्यू 340 सीआरपीसी के अनुसार संबंधित न्यायालय द्वारा की गई शिकायत के आधार पर संज्ञान लिया जा सकता है। सभी "अपराधों में से 471 (आईपीसी) का अपराध ही संज्ञेय है, बाकी गैर-संज्ञेय हैं। सवाल यह है कि सभी दस्तावेज अदालत में दायर किए गए हैं। यदि कोई गड़बड़ी या जालसाजी है, तो यह है कि अदालत शिकायत दर्ज कर सकती है। कोई भी एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती है तो एफआईआर कैसे दायर की जा सकती है?" 

धारा 194 के तहत अपराध का उल्लेख करते हुए (अपराध की सजा के इरादे से झूठे सबूत देने या गढ़ते हुए) आईपीसी, सिब्बल ने तर्क दिया कि 
"यह केवल अदालत द्वारा किया जा सकता है। 194 के तहत कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती है।" 
तीस्ता के खिलाफ आरोपित अन्य अपराधों में धारा 211 (घायल करने के इरादे से झूठा आरोप) आईपीसी शामिल है जो 3 साल के साथ गैर-संज्ञेय, जमानती और दंडनीय है। धारा 218 (लोक सेवक गलत रिकॉर्ड बनाना या सजा से व्यक्ति को सजा से बचाने के इरादे से लिखना) 3 साल की जेल अवधि के साथ दंडनीय है। सॉलिसिटर जनरल ने हालांकि याचिका की स्थिरता के लिए एक प्रारंभिक आपत्ति उठाई है, जिसमें कहा गया है कि उच्च न्यायालय के समक्ष जाने के बाद, तीस्ता अब संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय का रुख नहीं कर सकता है। "उच्च न्यायालय, सुनवाई के लिए याचिका स्वीकार तो कर लेता है, पर, कोई विशेष उपचार नहीं देता है। अन्य नागरिक भी जेल में समान हैं। क्या यह न्यायालय अभ्यास (अनुच्छेद के तहत शक्ति) 136 के अंतर्गत इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकता ?"

इस पर सोलिसिटर जनरल ने कहा, 
"सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने यह, माना है कि नियमित मामलों में, उच्च न्यायालयों को ही अंतिम अधिकार बनना चाहिए, भले ही वे गलत हों। शीर्ष अदालत को केवल असाधारण मामलों में ही हस्तक्षेप करना चाहिए ...उसे, सेशन कोर्ट या उच्च न्यायालय के खिलाफ अपील की नियमित अदालत  नहीं बनना चाहिए है। तो उच्च न्यायालय में असफल होने के बाद भी, यदि याचिकाकर्ता आता है, तो कानून निर्धारित किया जाता है, उच्च न्यायालय को अंतिम मध्यस्थ होना चाहिए। वह उच्च न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा किए बिना इस अदालत में पहुंच गई है।" 

हालांकि, सीजेआई ने जवाब दिया, "उच्च न्यायालय का कहना है कि जमानत के लिए अंतिम अधिकार एक सिद्धांत नहीं है ... हमें प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखना होगा।" 
सुनवाई जारी है।

(विजय शंकर सिंह)