Sunday, 26 September 2021

डॉ मनमोहन सिंह, को जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं / विजय शंकर सिंह

2014 का चुनाव समाप्त हो गया था । भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल चुका था । कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बुरे दिनों में थी । मोदी का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था । शपथ ग्रहण के मुहूर्त की प्रतीक्षा थी । इतिहास का यह एक करवट था । मोदी जिस प्रचार और समर्थन के ज़ोर पर दिल्ली की गद्दी पर पहुंचे थे उसकी प्रतिध्वनि सुनायी दे रही थी । इन सब के बीच पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का एक अख़बार के लिये इंटरव्यू चल रहा था ।

डॉ सिंह स्वभाव से ही अल्पभाषी और मृदुभाषी हैं । ज़ोर से भी नहीं बोलते और नाटकीयता और मंचीय भंगिमा से दूर , किताबों की दुनिया में रमे रहने वाले शख्श हैं । नियति ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया और वे नेहरू , इंदिरा के बाद सबसे अधिक समय तक रहने वाले पीएम बने । अध्यापक , बैंकिंग प्रशासक, रिजर्व बैंक के गवर्नर, वित्त मंत्री के आर्थिक सलाहकार, फिर स्वयं वित्त मंत्री, और अंत में प्रधान मंत्री की कुर्सी तक वे पहुंचे ।

1991 के कठिन दिनों में जब देश अस्थिर था, राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी, रामजन्मभूमि आंदोलन से सांप्रदायिक वातावरण और मण्डल आयोग की संस्तुतियों के माने जाने के कारण जातिगत संघर्ष का वातावरण बन गया था। एक अनिश्चय, अविश्वास और अस्थिरता का माहौल, अर्थव्यवस्था में बन चुका था। ऐसे वातावरण में, तब पीवी नरसिम्हाराव ने देश की कमान संभाली और मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने ।

तब तक दुनिया एक ध्रुवीय बन चुकी थी। सरकार की नीति मुक्त व्यापार की बनी । देश की खिड़कियाँ और दरवाज़े खोल दिए गए । अचानक समृद्धि आयी । पर जीवन की मूल समस्या और नेताओं का प्रिय वाक्य कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उत्थान , अफ़साना ही बना रहा । फिर भी इंफ्रास्ट्रक्चर में वृद्धि, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में वैश्वीकरण जन्य प्रतियोगिता और निजीकरण से देश मे नौकरियाँ बढ़ी और जीवन स्तर भी लोगों का बदला।

फिर वही डॉ मनमोहन सिंह,  2004 से 2014 तक देश के प्रधान मंत्री बने । 2009 में वे दूसरे कार्यकाल के लिये चुने गए। पर यूपीए 2 के कार्यकाल के अंतिम तीन साल, उनके और सरकार के लिये कठिन बीते । कई घोटालों की शिकायतें हुयी,  और अकर्मण्यता और उनकी अनदेखी करने के आरोप भी उनपर  लगे । अंततः 2014 में इनके नेतृत्व में कांग्रेस को अत्यंत शर्मनाक हार झेलनी पडी ।

उस पत्रकार से बात करते हुए जब एक सवाल उनसे यह पूछा गया कि
" आप अपने कार्यकाल का आकलन कैसे करना चाहेंगे ? "
डॉ सिंह थोड़ी देर चुप रहे । क्या कहते । हार को पचाने में वक़्त लगता है । वह कोई जनाधार वाले लोकप्रिय नेता तो थे नहीं । उनका ज्ञान और उनकी प्रतिभा ही उनकी पूंजी है। उन्होंने फिर स्वभावतः धीरे से एक वाक्य कहा,
" इतिहास मेरा मूल्यांकन करते समय मेरे प्रति दयालु रहेगा । वह इतना निर्मम नहीं रहेगा जितना की आज मिडिया और विपक्ष है । "

मनमोहन सिंह एक खलनायक थे उस समय । जनज्वार भी अज़ीब होता है । उमड़ता है तो सारे अच्छे कामों को भी बहा ले जाता है । उसे दो ही श्रेणी दिखाई देती है । या तो देव या दानव । इंसान की कल्पना वह कर ही नहीं पाता । यह उन्माद की मोहावस्था होती है । जो परिपक्व नेता होते हैं वे इन परिस्थितियों को जानते हैं और वे इसकी काट भी रखते हैं । पर डॉ सिंह कोई पेशेवर नेता तो थे नहीं । उनका अपना कोई जनाधार भी नहीं था । बिरादरी , धर्म , जाति के समीकरणों में वे कभी पड़े ही नहीं । नौकरशाही का जो एक सतत आज्ञा पालक भाव होता है , वह उनमें बना रहा । यह उनकी कमज़ोरी भी आप कह सकते हैं और उनकी ताक़त भी ।

अब जब लग्भग साढ़े 7 साल से अधिक, नरेन्द्र मोदी की सरकार बने हो गया है, अर्थव्यवस्था को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सारी सरकारी संपदा को बेचकर जीवन यापन करने के कठिन दिन आ गए हैं। अर्थव्यवस्था में सुधार की गुंजाइश भी नही दिख रही है। हर तरफ महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक अनिश्चितता तथा नैराश्य के बादल उमड़े आ रहे हैं। आखिर, 2014 वाले अच्छे दिन के शोर कम हुये और मुगालता टूटा तथा गर्द ओ गुबार थमा तो फिर जिस तस्वीर पर घूल जम चुकी थी, उसे फिर साफ़ किया जाने लगा । डॉ मनमोहन सिंह बेहतर लगने लगे । लोग उन्हें सुनने लगे। वे अब भी तेज नहीं बोलते हैं, पर जो भी बोलते हैं सटीक और तथ्यपूर्ण बोलते हैं। अर्थव्यवस्था पर अक्सर आने वाले, उनके बयान से आप यह परिवर्तन महसूस कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन समसामयिक काल में नहीं किया जा सकता है । मूल्यांकन सदैव सापेक्ष होता है । उनके दस साल सदैव कसौटी पर परखे जाते रहेंगे , कभी तो उनके पक्ष में या उनके विरोध में । इतिहास किसी को नहीं छोड़ता है।  आज उन्ही डॉ मनमोहन सिंह का जन्म दिन है । वे स्वस्थ और सानंद रहें । यही शुभकामनाएं है।

© विजय शंकर सिंह 


दोहरा चरित्र जीना, अधम और निर्लज्जता है / विजय शंकर सिंह

घर मे कुछ और बाहर कुछ। घर मे गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष सबको रावण के दस शिर की तरह, और बाहर बिना गांधी चर्चा के इनकी यात्रा ही नहीं पूरी होती है। घर मे यह गांधी हत्या को गांधी वध कहते हैं, गोडसे का बयान मैंने गांधी को क्यों मारा, का बार बार उल्लेख करते हैं, गोडसे और आप्टे की मूर्ति बनाते हैं, गांधी हत्या की मॉक ड्रिल करते हैं, और बाहर बापू बापू कहते इनकी जुनाब नहीं थकती है। 'अधम निलज्ज लाज नहि तोही !' रामचरितमानस की यह चौपाई बरबस याद आ गयी। 

प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी जी अमेरिका में क्या कह रहे है, उसे  यहां हिंदी में पढ़े, 
“ वैश्विक चुनौतियों का सामना विज्ञान सम्मत, तर्कपूर्ण और प्रगतिशील सोच से ही किया जा सकता है “! 
पर भारत मे न तो वे और उनकी विचारधारा के लोग न तो सोच में वैज्ञानिक हैं, न ही चिंतन में उनके तार्किकता है, न शासन में लोककल्याण की भावना है और न वे आचरण में सहिष्णु हैं। 

संघ, भाजपा का हर कदम देश और जनता को बांट कर देखने के लिये अभिशप्त है। इनका हर बयान समाज को बांटने वाला, और हर कानून केवल पूंजीपतियों के हित को दृष्टि में रख कर बनाने की मानसिकता वाला रहता है, जब वे घर मे रहते हैं। पर बाहर, वे उदारता का लबादा ओढ़ लेते हैं। जबर्दस्ती ओढ़ा हुआ लबादा, बार बार सरकता है, थामे नहीं थमता है, असहज तो करता ही है, पर वे भी क्या करें, जब विचार दारिद्र्य और वैचारिक धुंधता हो तो ऐसा लबादा, दिखाने के लिये ही सही, ओढ़ना पड़ता ही है। दोहरा चरित्र जीना ही पड़ता है ! 

इनका राष्ट्रनिर्माण, और चरित्र निर्माण क्या है, यह आज तक आरएसएस के मित्र नही बता पाए। कभी उन्हें सबका डीएनए एक लगने लगेगा, कभी वे, सबका भारतीयकरण करने लगेंगे तो कभी, सभी जो इस देश मे रहते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, इन्हें हिंदू लगने लगते हैं ! आज तक यह संघी मित्र तय ही नहीं कर पाए कि, वे कहना और करना क्या चाहते हैं।  गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद, सुभाष को न मानिये। कांग्रेस की नीतियों की खूब आलोचना भी कीजिये। कोई भी व्यक्ति या विचारधारा, आलोचना, बहस, समीक्षा से परे नहीं है। संघ और भाजपा भी अपनी विचारधारा के अनुसार, सरकार चलाने के लिये, स्वतंत्र है, पर हे आरएसएस के मित्रों आप यही बता दीजिए कि आप कैसा भारत चाहते हैं ? 

वैसा, जैसा, मोदी जी, अमेरिका में दिए इस बयान में कह रहे हैं, या वैसा जो आप लोग, एक दूसरे के कान में फूंकते हैं और अपने समूह में एक दूसरे से बतियाते हुए कहते हैं ? मैं मोदी जी के इस बयान से सहमत हूँ, पर मुझे संशय है कि, मोदी जी यह बात, घर मे भी इसी प्रकार से कहेंगे, जैसा वे बाहर कह रहे हैं। क्योंकि उन्हें भी घर मे श्मशान और कब्रिस्तान ही नज़र आने लगता है। वे भी कपड़ो से पहचानने का नुस्खा बताने लगते हैं। 'घरे बाहिरे' में सोच और मानसिकता का यह अंतर अब उन्हें सच मे, हास्यास्पद बना दे रहा है। उन्हें बाहर यानी विदेश में, गांधी,नेहरू के वे सब उद्धरण सुनने पड़ रहे हैं, जिनसे वे घर मे परहेज करते हैं। 

जब सरकार को यह रहस्य पता है कि, 'वैश्विक चुनौतियों का सामना, वैज्ञानिक सोच और प्रबुद्ध तार्किकता के साथ ही किया जा सकता है' तो सरकार ने साल 2014 में सत्ता पाने के बाद इस सोच के अनुरूप, किया क्या है, यह बात सरकार से पूछी जानी चाहिए ? क्या हम उम्मीद करें कि, जब प्रधानमंत्री जी स्वदेश वापस लौट कर आएंगे तो वे अपने इसी सुभाषित के अनुरूप हम सबको एक नया मार्ग दिखाएंगे ? उनकी सोच, मानसिकता और कलेवर बदला हुआ होगा ? अगर ऐसा हुआ तो यह परिवर्तन सुखद होगा। 

राष्ट्रवाद, एक भावना है जो, किसी को भी, उसके मन मे, अपने देश के प्रति समर्पण का भाव जगाती है। इसी उदात्त भावना ने, देश को ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्त होने के लिये अनुप्राणित किया और गांधी, भगत सिंह, सुभाष बाबू ने अपनी अपनी सोच से, इस अहंकारी और उपनिवेशवादी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिये, अपना सबकुछ समर्पित कर दिया। लाखों ज्ञात, अज्ञात, अल्पज्ञात, जैसे लोगो की आज़ाद भारत मे सांस लेने की मनोकामना पूरी हुयी। स्वाधीनता संग्राम को इसीलिए, राष्ट्रवादी आंदोलन कहा जाता है, क्योंकि वह धर्म, जाति, क्षेत्र की सीमाओं से परे था। पर यहीं एक सवाल उठ खड़ा होता है कि, आज बात बात पर खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले आरएसएस के लोग उस समय, जब आज़ादी की लड़ाई, गांव, देहात के खेतों, सड़कों से लेकर बर्मा की सीमा तक पर लड़ी जा रही थी, तब कहां थे ? अफसोस, वे अंग्रेजों और जिन्ना के साथ थे। क्या तब राष्ट्रवाद की भावना उनमे हिलोर नहीं मार रही थी ?

गांधी, भगत सिंह, सुभाष में मतभेद तब भी थे और कम नहीं थे। यह मतभेद, उनमे, स्वाधीनता संग्राम के तरीक़ो पर, अपनी अपनी विचारधारा के आधार पर, ब्रिटिश सरकार के प्रति रणनीति को लेकर थे, पर ये सब महानुभाव, इस बात पर एकमत थे कि, अंग्रेजों को भारत से भगा दिया जाना चाहिए। पर उसी समय 1925 मे गठित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), अंग्रेजों को भारत से भगाने के सवाल पर क्यों नही, इनके साथ खड़ा था ? अगर वह गांधी से असहमत भी था तो, उसने, स्वाधीनता संग्राम के उस महायज्ञ में, अलग से अपना कोई आंदोलन क्यों नही छेड़ा ? 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे अंग्रेजों के साथ क्यों बने रहे ? जिन्ना के साथ हमख़याल होने की उनकी क्या मजबूरी थी ? यह सवाल संघ के मित्रों से ज़रूर पूछा जाना चाहिए। 

राष्ट्रवाद जब भावना से अलग हट कर एक राजनीतिक कलेवर में किसी राजनीतिक वाद का रूप ले लेता है तो, वह देश और समाज के लिये खतरनाक भी हो जाता है। राष्ट्रवाद या सावरकर और जिन्ना मार्का राष्ट्रवाद, एक घातक औऱ उन्मादी राष्ट्रवाद है। दरअसल, राष्ट्रवाद कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है। यह मूलतः यूरोपीय फासिज़्म के समय की विकसित सोच है जो श्रेष्ठतावाद पर आधारित है। श्रेष्ठतावाद, हर दशा में भेदभावमूलक समाज का निर्माण करता है। श्रेष्ठतावाद, समरसता का विरोधी है। यह धर्म, जाति की श्रेष्ठतावाद में समाज को बांटे रखता है। इसी कौमी श्रेष्ठतावाद की सोच पर जिन्ना और सावरकर का द्विराष्ट्रवाद खड़ा हुआ और उसका परिणाम, भारत विभाजन के रूप में हुआ।

© विजय शंकर सिंह 

Saturday, 25 September 2021

अवधेश पांडेय - चर्चा गांधी बनाम भगतसिंह नहीं गांधी संग भगतसिंह होनी चाहिए.

जो कभी  नहीं बीतता  है और लगातार हमारे साथ साये की तरह चलता रहता है उसको इतिहास कहते हैं।इतिहास एकदम तटस्थ होता है न किसी के प्रति निर्दयी और न किसी पर मेहरबान होता है। इतिहास व्यक्तियों को नहीं  व्यक्तियों की परछाई को नापता है। जब व्यक्ति की परछाई बहुत बड़ी हो जाती है तो  वह व्यक्ति इतिहास के उस कालखंड को लांघकर  हमारे वर्तमान से जुड़ जाता है। लेकिन दुर्भाग्य से जिनका इतिहास नहीं होता वे किसी के कंधे का इस्तेमाल करके अपनी परछाई को बड़ी करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन इतिहास उन्हें जगह नहीं देता है। 

इतिहास अपने बड़े पात्रों  को सहेजता है और उन्हें वर्तमान की ओर ढकेल देता है। महात्मा गांधी और भगतसिंह दोनों बड़े पात्रों को इतिहास ने हमारे सम्मुख धकेल दिया है । दुर्भाग्य से हम छोटे लोग इतिहास के इन बड़े पात्रों के बारे में कुछ नहीं जानते। पाकिस्तान के लाहौर की सेंट्रल जेल में आज से 90 साल पहले 23 मार्च 1931 को जो तीन सपूत फांसी के फंदे पर झूले और कुछ देर कुछ देर थरथराने के बाद शांत हो गए। उन तीन बड़े लोगों के बारे में हम छोटे लोग कुछ नहीं जानते।  आज अगर ये तीन सपूत बोल सकते तो वे हमसे पूछते कि हम भारत के लिए शहीद हुए या पाकिस्तान के लिए?   इस प्रश्न का  जवाब किसी के पास नहीं है।  आज पाकिस्तान के लाहौर में सेंट्रल जेल का कोई अस्तित्व नहीं वहां एक बड़ा सा कॉम्प्लेक्स बन गया है और चमचमाती सड़कों पर  रातदिन गाड़ियां दौड़ती रहती हैं। 

इतिहास इन तीन लाशों पर रुका नहीं  इतिहास लाहौर से चला और 30 जनवरी 1948 को  बिड़ला हाउस दिल्ली पहुंच गया। यहां एक 78 साल के बूढ़े आदमी को जिसे हम राष्ट्रपिता कहते थे , प्रार्थना के समय जाते हुए सामने से आकर एक हट्टाकट्टा आदमी तीन गोलीं मारता है। जिस तरह से वे तीन लाशें फांसी पर लटकते हमने देखीं उसी तरह एक बड़ा आदमी जिसे हम अपना वटवृक्ष कहते थे तीन गोलियां खाकर भर भरा कर गिर गया। उसकी भी लाश थोड़े समय तक थरथराती है और शांत हो जाती है।

जो हरा घाव है उस घाव को भरना सीखो।
जो भरी आंख है उस आंख में उतरना सीखो।
ये अपने या पराए हैं ये बात बहुत छोटी है।
तुम बड़े लोग हो तो बड़ी बात करना भी सीखो।।

आज हम  गांधी और भगतसिंह को लड़ाने में इतना व्यस्त हैं कि हम खुद कहाँ खड़े हैं हम  खुद किससे लड़ रहे हैं हमें पता ही नहीं। गांधीजी और भगतसिंह दोनों के रास्ते अलग हैं, कार्यक्रम अलग हैं, दोनों के संगठन अलग हैं, दोनों के काम करने के तरीके बिल्कुल अलग हैं। लेकिन फिर भी दोनों में समानता है दोनों के लक्ष्य देश को आजाद कराना है ।

भगतसिंह का एक गम्भीर व्यक्तित्व थे। वे कहते थे कि क्रांति का मतलब केवल बम या पटाखे चलाने से नहीं है, अपितु  गंभीर चिंतन  और विचार विमर्श से जनता की गोलबंदी करना है। उन्होंने कहा भी था कि वे महात्मा गांधी और उनके अहिंसा के तरीके का इसलिए विरोध कर रहे थे क्योंकि देश वर्तमान में अहिंसा की भाषा समझने लायक नहीं है।  इसलिए कि उनको लगता था कि महात्मा गांधी एक अत्यंत असंभव आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं।लेकिन वे गांधीजी के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त करते हुए कहते हैं कि महात्मा गांधी ने लोक जागरण का जो महान कार्य किया है उंसके लिए उन्हें कोटि कोटि सलाम ।

दूसरी ओर गांधीजी कहते हैं कि मैं भी क्रांतिकारी हूँ लेकिन बंदूख की दम पर हम अंग्रेजों से नहीं जीत सकते।   जब हम हिंसा का सहारा लेकर राजनीतिक या सामाजिक परिवर्तन की बात करते हैं तो संघर्ष सिकुड़ जाता है। अंग्रेजों पर बन्दूखें बहुत हैं हम उनसे उस हथियार से लड़ेंगे जिसका उन्हें अभी ज्ञान भी नहीं है। 

गांधीजी जानते थे कि  क्रांतिकारियों के सशत्र दल गोपनीय होते हैं, जो छिपकर दुश्मन पर घात लगाने की पद्धति पर आधारित होते हैं। ऐसी स्थिति में भारत की गरीब, असहाय जनता इन हिंसक आंदोलनों का खुलकर साथ नहीं दे सकती।

गांधी का मानना था कि कोई भी हिंसात्मक संघर्ष स्वभाव से जनतांत्रिक नहीं होता। इसलिए गांधी जो सिद्धांत गढ़ रहे थे उसमें कोई गोपनीयता नहीं, कोई घात या प्रतिघात नहीं था, उसमें कोई षड़यंत्र की बू नहीं थी, जो कुछ है वह जनता के सामने है। इसलिए गांधी के अहिंसा  के व्यापक सिद्धांत में भगतसिंह का विशिष्ट सिद्धांत भी समाहित था। 

ऐतिहासिक दस्तावेज कुछ और सत्य से किसे लेना देना है। कौन इतना पढ़ेगा कि दरअसल गांधीजी ने भगतसिंह की फांसी को लेकर कितनी बहस वाइसराय से की। वायसराय गांधीजी को प्रस्ताव देते हैं कि हम करांची कांग्रेस तक फांसी टाल सकते हैं।  अंग्रेजों की गांधीजी को घेरने की कूटनीति और गांधीजी की दूरदृष्टि ही थी कि  गांधीजी वाइसराय से उलटकर कहते हैं कि 'देखिये या तो आप भगतसिंह की फांसी को हमेशा के लिए रद्द करें और अगर फांसी रद्द नहीं कर सकते तो फिर मुझे कोई घूस न दें। मैं झेलूंगा जो मुझे झेलना है। लेकिन में आप से कोई घूस नहीं चाहता हूँ। फांसी का मुझ पर एक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा लेकिन मैं उसको झेलने के लिए तैयार हूं लेकिन मैं  अंग्रेजों से कोई गुप्त समझौता नहीं कर सकता हूँ। या तो आप फांसी रद्द करो और नहीं तो फिर मेरे लिए बीच का रास्ता मत निकालो।'

24 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दिए जाने की अगली सुबह गांधीजी जैसे ही कराची के पास मालीर स्टेशन पर पहुंचते हैं तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की। गांधीजी विचलित नहीं हुए उन्होंने कहा-

'‘काले कपड़े के वे फूल तीनों देशभक्तों की चिता की राख के प्रतीक थे.’ 26 मार्च को कराची में प्रेस प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा –

‘‘मैं भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में बदलाव नहीं करा सका और इसी कारण नौजवानों ने मेरे प्रति अपने क्रोध का प्रदर्शन किया है बेशक, उन्होंने ‘गांधीवाद का नाश हो’ और ‘गांधी वापस जाओ’ के नारे लगाए और इसे मैं उनके क्रोध का सही प्रदर्शन मानता हूं। मैं यहां अपना बचाव करने के लिए नहीं बैठा हूँ, इसलिए मैंने आपको विस्तार से यह नहीं बताया कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए मैंने क्या-क्या किया। मैं वाइसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह से मैंने समझाया. समझाने की जितनी शक्ति मुझमें थी, सब मैंने उन पर आजमा देखी।

लेकिन इन सब बातों के बावजूद आज जब भी चर्चा भगत सिंह की शहादत की होती है तो वह अंततः गांधी तक ही जा पहुंचती हो? लेकिन जब हम दोनों शख्शियतों को देखते है तो ऐसी चर्चाएं मात्र 23 साल के युवा भगतसिंह की अद्भुत शहादत का गुमान और एक बूढ़े गांधी द्वारा उन्हें न बचाये जा सकने की शिकायत एक साथ मौजूद रहती है। हम शहीद सपूत को शहीद राष्ट्रपिता से लड़ाकर अपना कद बड़ा करने की कोशिश करते हैं। जरूरत इस बात की है कि हम उस कालखंड में जाकर इन महान शख्सियतों को समझने की कोशिश करें। यही भगतसिंह व गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

© अवधेश पांडे
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प्रवीण झा - रूस का इतिहास (1)

साइबेरिया एक सोया हुआ प्रदेश। 
दुनिया के सबसे विशाल देश का सबसे बड़ा क्षेत्र, जहाँ लगभग उतने ही लोग रहते हैं, जितने भारत के एक राज्य पंजाब में। आज से सौ साल पहले वहाँ इसके दशांश रहते थे, जबकि इस क्षेत्र में चार भारत जैसे देश समा जाएँ। 

मेरी इच्छा है कि कभी मॉस्को से व्लादीवॉस्तोक की वह दुनिया की सबसे लंबी ट्रेन यात्रा करूँ, जो लगभग छह दिन तक चल कर नौ हज़ार किलोमीटर से अधिक का सफर तय करती है। यूराल के पहाड़ों को पार कर एक ऐसे वीराने में ले जाती है, जहाँ पृथ्वी का कठिनतम मौसम है। जहाँ ठंड होती है तो -70 डिग्री का तापमान, और गर्मी होती है तो 34 डिग्री। 

कई वर्षों तक यह एक रहस्यमय प्रदेश रहा, जहाँ सभ्यता का ‘स’ भी नहीं पहुँच पाया था। जब रूस के ज़ार (सम्राट) का इस क्षेत्र पर कब्जा हुआ, उस समय भी यह इलाका ऐसा नहीं था जहाँ ‘मनुष्य’ रहते हों। किंवदंतियाँ प्रचलित थी कि यहाँ कुछ नरभक्षी तांत्रिकों और जंगली आदि-मानवों का वास है।

यहाँ का कानून दुनिया के कानून से अलग था। यह रूस में होकर भी रूस नहीं था। एशिया में होकर भी एशिया नहीं था। यहाँ ज़ार से लेकर स्तालिन तक के समय तक ‘काला पानी’ की तरह यातना देने के लिए भेजा जाता। एक साधारण मानव को अगर साइबेरिया में यूँ भी छोड़ दिया जाता; वह या तो मर जाता, या पशु बन जाता। जानवरों को मार कर कच्चा खाने का आदी बन जाता। धीरे-धीरे कुछ जुझारू शिकारी-किसान यहाँ आकर बसने लगे। जिन्हें लगा कि पृथ्वी का यह विशालतम वीरान भू-भाग आखिर वीरान क्यों रहे। 

आज जो कहानी शुरू कर रहा हूँ वह इस मानव-रहित, सभ्यता-रहित जमीन से शुरू तो होती है, मगर खत्म आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी मानव-क्रांति से होती है। इस कहानी को सोचते हुए सत्तर के हिप्पी दशक का एक गीत सुनने लगा, जो किसी कारणवश अभी वायरल हो चला है। 

गीत के बोल हैं-

There lived a certain man in Russia long ago
He was big and strong, in his eyes a flaming glow
Most people looked at him with terror and with fear
But to Moscow chicks he was such a lovely dear

He could preach the Bible like a preacher
Full of ecstasy and fire
But he was also the kind of teacher
Women would desire

‘सालों पहले रहता था रूस में एक आदमी,
वह था बड़ा और तगड़ा, उसकी आँखें थी चमकीली
उसे देख कर लोग खाते थे खौफ़, लेकिन
उससे प्यार करती मॉस्को की हर छोरी

वह पढ़ता था बाइबल जैसे कोई उपदेशक
उसकी वाणी में थी अग्नि, और था परमानंद
लेकिन वह था ऐसा शिक्षक
जिसे चाहती थी हर स्त्री’
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha
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Friday, 24 September 2021

शंभूनाथ शुक्ल - कोस कोस का पानी (1) जीवन में कितने घाट

भीगे चोटी, भीगे कान। 
पंडित जी हो गए असनान।।

हमारे एक दोस्त थे वीर सिंह गुर्जर। सवा छह फ़िट की काया और खूब श्याम रंग, बाल घुंघराले। स्वभाव से एकदम बच्चे, निर्मल और निर्दोष। नोएडा के गाँव चौड़ा रघुनाथ पुर (अब सेक्टर 22) के निवासी थे। पक्के कांग्रेसी थे और उसमें भी बहुगुणा ख़ेमे वाले। लेकिन राजीव गांधी को बहुत पसंद करते थे। उनके पास एक जिप्सी गाड़ी थी। जिसे लेकर वे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आवास पर गए और राजीव जी ने वह गाड़ी ड्राइव भी की। राजीव जी भी उनके भोलेपन के मुरीद थे। वीर सिंह अक्सर मेरे आईटीओ स्थित जनसत्ता के दफ़्तर आते और हम लोग उस मारुति जिप्सी में दिल्ली दर्शन को निकल जाते थे। कभी किसी लाल बत्ती पर न रुकते और क्या मजाल कि कोई पुलिस वाला उन्हें रोक ले। इतनी ज़ोर से हड़काते थे कि डीपी वाला सिपाही पैंट गीली कर देता। लेकिन शाम को हर हाल में एक अंग्रेज़ी शराब की बोतल और पूरे एक मुर्ग़े का गोश्त उनकी दिनचर्या का हिस्सा थे। 

एक दिन मुझसे बोले कि सर जी, बुंदेलखंड घूमने की इच्छा है, घुमा दो। मैंने कहा ठीक है, यहाँ से झाँसी चलते हैं वहाँ से पंडित विश्वनाथ शर्मा वाहन का प्रबंध कर देंगे। बोले, नहीं इसी जिप्सी से चलते हैं। एक सुबह हम निकले। पहले दिल्ली से आगरा और फिर वहाँ से बाग़ी-मार्ग पकड़ा। बाग़ी-मार्ग यानी डकैतों वाला रास्ता। यमुना और चम्बल के बीच का बाह वाला मार्ग। तब यह रास्ता ऊबड़-खाबड़ तो था ही, यहाँ डकैतों के मिल जाने का भी डर था। किंतु वीर सिंह निडर आदमी थे। हम शाम सात बजे ऊदी पहुँचे। वहाँ से इटावा आए। इटावा में तब नई-नई मुलायम सिंह सरकार का रौब था। मैंने उनसे कहा, कि यहाँ अपने नोएडा के अंदाज़ में बात न करना। लेकिन उन्होंने एक यादव जी से अबे-तबे कर ही थी। किसी तरह उनको संकट से निकाला। शाम को वहाँ के एक दबंग और मुलायम सिंह के प्रतिद्वंदी दर्शन सिंह यादव ने भोजन पर बुलाया। हम लोग गए। उनके यहाँ प्रवेश के पूर्व उनके अंगरक्षकों ने हमारी पूरी तलाशी ली। जब हम उनके ड्राइंग रूम में पहुँचे तो भगवान श्रीकृष्ण की एक विशालकाय प्रतिमा रखी थी। वीर सिंह जी प्रतिमा के समक्ष दण्डवत लेट गए। लेकिन भोजन के पूर्व वीर सिंह जी ने इशारा किया कि बिना ‘पान’ के वे भोजन नहीं करेंगे और भोजन में सिर्फ़ बटर चिकेन खाएँगे। अब दर्शन सिंह जी विशुद्ध शाकाहारी। दोनों ही चीजें निषिद्ध। इसलिए मैंने कहा कि हमारे मित्र तो मंगल वार का व्रत करते हैं। मुझे भी ज़्यादा भूख नहीं है। वहाँ से निकलने के बाद उन्होंने अपना पसंदीदा ब्रांड ख़रीदा और पूरी बोतल ख़ाली कर गए। रेलवे स्टेशन के पास एक सरदार जी के ढाबे पर बटर चिकेन मिल गया, जिसे उन्होंने उदरस्थ किया। हम लोग वहाँ से निकले ही थे कि सामने से दर्शन सिंह यादव का क़ाफ़िला गुजरा। मुझे देख कर उनका क़ाफ़िला रुका। ढाबे का मालिक भाग कर आया और उनके पाँव छुए। मैंने कहा, कुछ नहीं बस सरदार जी से पुराना परिचय है इसलिए हम लोग मिलने आ गए। सरदार जी कुछ बोलते उसके पूर्व ही उनका क़ाफ़िला रवाना हो गया, तब ज़ान में ज़ान आई। 

रहने के लिए इटावा में ज़िला परिषद का गेस्ट हाउस मिल गया। उस समय ज़िला परिषद के अध्यक्ष राम गोपाल यादव जी थे। सुबह वीर सिंह जी जब स्नान को गए तब घंटे भर बाद लौटे। मैंने कहा, यहाँ पानी की कमी है, इतनी देर नहाओगे तो हो चुका। और मैं बाथरूम गया तो नल से बस एक बाल्टी पानी निकला। बाहर आया तो वीर सिंह बोले- 
“भीगे चोटी, भीगे कान, 
पंडित जी हो गए असनान।।” 
(जारी)

© शंभूनाथ शुक्ल 
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दिल्ली दंगो के मुकदमों के लिये दिल्ली पुलिस आयुक्त ने नयी एसआईटी गठित की

दिल्ली पुलिस आयुक्त राकेश अस्थाना ने फरवरी, 2020 में राष्ट्रीय राजधानी में हुए दिल्ली दंगों की जांच की निगरानी के लिए एक विशेष जांच प्रकोष्ठ (एसआईसी) का गठन करने का आदेश जारी किया है। यह आदेश अस्थाना ने 19 सितंबर 2021 को जारी किया गया है। 

"जांच में तेजी लाने और उसे सुव्यवस्थित ढंग से सम्पन्न करने के लिए, उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामलों की उचित तरह से जांच और अदालत में 'पैरवी' सुनिश्चित करने के अतिरिक्त, उत्तर-पूर्वी दिल्ली जिले में दर्ज और जांच  किये जा रहे मुकदमो की विवेचना हेतु, एक विशेष जांच प्रकोष्ठ (एसआईसी) का गठन किया गया है।" 
इस आदेश में एसआईसी के मुखिया, विशेष पुलिस आयुक्त होंगे। इसके अलावा, विशेष जांच प्रकोष्ठ में पूर्वी रेंज के लिए एक संयुक्त सीपी, उत्तर-पूर्व के लिए एक डीसीपी और उत्तर-पूर्व के लिए एक अतिरिक्त डीसीपी-I भी शामिल रहेंगे।

आदेश में निम्न कार्यों को सूचीबद्ध किया गया है। 

1. समिति उत्तर-पूर्वी जिले में जांच किए जा रहे सभी लंबित जांच/लंबित ट्रायल दंगा मामलों का जायजा लेगी और दंगों के मामलों की त्वरित जांच और प्रभावी अभियोजन सुनिश्चित करने के लिए तुरंत एक समयबद्ध रणनीति तैयार करेगी। जांच के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्य पर जोर दिया जाना चाहिए।

 2. लंबित तफटीशों के सभी मामलों की ठीक से जांच की जाएगी और सभी संभावित सबूत जोड़कर जांच को अधिक प्रभावी और समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए उपयुक्त रूप से निर्देशित किया जाएगा।

3. समिति सभी पूरक आरोपपत्रों को न्यायालय में शीघ्रता से दाखिल करना सुनिश्चित करेगी।

4. सभी मामलों में, जहां फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) के परिणाम लंबित हैं, एफएसएल परिणामों में तेजी लाने के अनुरोध के साथ निदेशक एफएसएल के साथ व्यक्तिगत सम्पर्क कर के कार्रवाई की जाएगी।  एफएसएल परिणाम प्राप्त करने के लिए, इन मामले को प्राथमिकता के आधार पर संबंधित एफएसएल डिवीजनों के साथ बातचीत किया जाएगा। 

5. प्रत्येक तारीख पर अभियोजन पक्ष के मामले का प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व करने के लिए, सभी मामलों में अदालत में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए यह अधिकारी व्यक्तिगत रूप से विशेष लोक अभियोजकों (एसपीपी) के साथ संपर्क में रहेंगे।  सुनवाई की प्रत्येक तारीख से पहले उन्हें पहले से ही पूरी तरह से सभी मामलो में ब्रीफ कर दिया जाएगा।

6. मामले में विशेष  लोक अभियोजक, यदि किन्ही, अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण अदालत में उपस्थित होने में असमर्थ है, तो अदालत को यह बात पहले से बता दी जाएगी। ताकि अदालत को कोई असुविधा न हो और न्यायालय से आवश्यकतानुसार उपयुक्त स्थगन लिया जा सके।  ऐसे मामलों में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अदालत में तथ्यों को प्रभावी ढंग से पेश करने के लिए अदालत में मौजूद रहेंगे।

7. टीम यह सुनिश्चित करेगी कि सभी गवाह और जांच अधिकारी समय पर अदालत में पेश हों। उन्हें ठीक से अपने मामले की जानकारी हो और वे अच्छी तरह से अदालत में अपना पक्ष रखने के लिये तैयार रहें। यदि किसी मामले में, आईओ अदालत में उपस्थित होने में असमर्थ है, तो, एसआईसी स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को निर्देश देगा कि या तो मामले में स्वयं उपस्थित हों या अदालत की सहायता के लिए मामले के तथ्यों से अच्छी तरह से परिचित एक जिम्मेदार अधिकारी को नियुक्त करें। 

8. पुलिस मुख्यालय ने 14 पुलिस अधिकारियों को इस टीम के साथ संबद्ध किया है, जो पहले से ही दंगों के दौरान उत्तर-पूर्वी जिले में नियुक्त रह चुके हैं, और इन मामलों की जांच में अपना योगदान दे चुके हैं, ताकि लंबित तफ़्तीशों के मामलों की, शेष जांच को पूरा किया जा सके।  निगरानी प्रकोष्ठ यह सुनिश्चित करेगा कि इन सभी अधिकारियों को वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए उचित रूप से कार्य और निगरानी की जा रही है या नहीं। 

9. केजी त्यागी, एसीपी (सेवानिवृत्त) को अदालती मामलों में दंगा मामलों की निगरानी के लिए सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है।  

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 21 September 2021

असग़र वजाहत - पाकिस्तान में ट्रेन का सफ़र (3)

                    ( असग़र वजाहत )

सर्दी इतनी बढ़ गई थी कि मैं कूपे में टहलने पर मजबूर हो गया था। एक स्टेशन पर  ट्रेन रुकी।  बाहर प्लेटफार्म से 'चाय चाय' की आवाजें आने लगीं । मैंने चाय वाले को आवाज दी लेकिन कोई नहीं आया। मैंने कुछ और ऊंची आवाज में  चाय वाले को पुकारा  लेकिन कोई नहीं आया।  फिर मैं चीखने लगा  लेकिन कोई चाय वाला नहीं आया।

ट्रेन  रेंगने लगी। इतना चीखने चिल्लाने से  सर्दी और ज्यादा लगने लगी थी  लेकिन कूपे के अंदर टहलने के अलावा  और कोई रास्ता न था।  शायद मैं सभी कपड़े  पहन चुका था  क्योंकि बैग  काफी खाली लग रहा था।

अगले स्टेशन पर भी यही हुआ। बात समझ में आई कि चाय वाले हैं फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट की तरफ नहीं आते। इसका मतलब यह था की पूरी रात मुझे चाय न मिल सकेगी और कूपे में टहलते हुए रात गुजारनी पड़ेगी।

लेकिन चाय के मामले में किस्मत इतनी खराब नहीं थी। एक बड़े स्टेशन पर चाय वाला आया मैंने उसे सौ का नोट दिया और पांच चाय मांगी। उस जमाने में पाकिस्तान में बीस रुपये की एक चाय मिला करती थी। चाय वाले ने मेरी तरफ कुछ अजीब नजरों से देखा लेकिन जल्दी ही खिड़की पर उसने छोटे-छोटे चाय के पांच कप रख दिए। एक कप मैंने फौरन हलक में उंडेल लिया। लगा गला ऊपर से नीचे तक किसी ने चाकू से काट दिया हो। चाय सकरीन में बनाई गई थी ।लेकिन इस तकलीफ के बावजूद मैं चार कप चाय और  पी गया। सोचा हलक का जो हाल होगा सो देखा जाएगा फिलहाल सर्दी से बचने का इंतजाम जरूरी है।

बहावलपुर स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो कूपे में एक साहब आ गए ।अधेड़ उम्र वाले दुबले पतले सज्जन ने ऊपर की सीट पर अपना बिस्तर बिछाया और सामने बैठ गए । मुझसे पूछने लगे,  क्या मैं सिगरेट पी सकता हूं? 
मैंने कहा, जरूर जरूर पियें। 
मैं उनसे यह कह नहीं सकता था कि उनके आ जाने से मैं इतना खुश हूं कि अगर वो कुछ और भी कहते तो मैं उसके लिए भी तैयार हो जाता।
सिगरेट पीने के बाद सज्जन ऊपर चले गए। लेट गए और शायद जल्दी ही सो गए। मैं उनको दिखाने के लिए सीट पर लेट गया लेकिन नींद आने का सवाल न था। छोटी-छोटी  झपकियां आती रहीं। इसी दौरान किसी स्टेशन पर तीन लोग कूपे में और आए। इनमें दो आदमी थे और एक महिला। आते ही तीनों ने लंबी तानी।

सूरज नहीं निकला था लेकिन हल्का सा उजाला हो गया था। मैंने खिड़की से बाहर देखा। दूर एक तालाब दिखाई दिया जिसका पानी चमक रहा था। तालाब के किनारे एक दो मंजिला कच्चा मकान नजर आया जिसकी एक खिड़की से रोशनी आ रही थी। दूसरी तरफ खजूर के कुछ पेड़ भी खड़े थे। मैंने कैमरा निकाला और सोचा, रात भर तकलीफ उठाने के बाद अगर सुबह एक अच्छी तस्वीर मिलती है तो यह घाटे का सौदा न होगा।

मैंने कई बार कैमरा क्लिक किया। सामने की सीट पर लेटी महिला जाग गयीं। 
उन्होंने मुझसे कहा -  लगता है आपको फोटोग्राफी का बड़ा शौक है?
मैंने कहा -  मैं जो कुछ देख रहा हूं वह शायद दोबारा न देख सकूंगा.... इसलिए चाहता हूं कि  जो कुछ अच्छा नजर आ रहा है उसे कैमरे में कैद कर लूं।
महिला ने कहा -  आप कहां से आए हैं?
पाकिस्तान में जिन लोगों ने मुझसे यह सवाल किया था कि आप कहां से आए हैं उनको मैंने एक ही जवाब दिया था और वह यह कि मैं दिल्ली से आया हूं।
इस जवाब के पीछे छिपी धारणा, विश्वास और विचार को जो लोग समझ लेते थे, मुस्कुरा देते थे और जो नहीं समझते थे उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता था।

दिल्ली सुनते ही ऊपर सोए दोनों आदमी नीचे उतर आए और हम लोगों के बीच बातचीत शुरू हो गई। महिला ने एक बड़ा सा फ्लास्क खोला गरम गरम चाय अपने दो साथियों को देने के बाद मेरी तरफ भी बढ़ाई। वाह मजा आ गया। कुछ खाने को भी था।
बातचीत पाकिस्तानी रेलवे पर होने लगी।
मैंने पूछा - सीटों पर जो रकसीन चढ़ा है उस पर ER क्यों लिखा है?
उनमें से एक ने कहा, यह पार्टीशन के टाइम मिला हुआ डिब्बा है।
- इतना पुराना अब तक चल रहा है?
एक ने कहा -  पाकिस्तान रेलवे का हाल  न पूछिए।
दूसरा बोला -  रेलवे की न जाने कितनी ज़मीन बेंच कर खा गए।
पहले ने कहा -  ज़मीन.... अरे साहब जमीन तो छोटी चीज है इन्होंने  पटरिया बेच डालीं... सिग्नल बेंच डालें.... रेलवे को बिल्कुल खोखला कर दिया..
मैंने कहा -  कोई पूछताछ करने वाला नहीं है ।
एक बोला -  जनाब  इस पूरे मुल्क में किसी की अकाउंटेबिलिटी नहीं है, कोई जवाबदेही नहीं है। - लोग बैंकों से करोड़ों का  लोन लेकर वापस नहीं करते कोई पूछने वाला नहीं।
- फौज इस मुल्क को खा गई ....पहले दो टुकड़े करवा दिए और अब दीमक की तरह लगी हुई है 

मैं यह सब सुनकर  बहुत हैरान न था। क्योंकि मुझे पता था कि ये लोग जो कह रहे हैं वह सच है। मुझे डॉ आयशा सिद्दीका की किताब याद आ गई जो उन्होंने पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जाने वाले  व्यापार पर लिखी है। उन्होंने एक नया टर्म दिया है - Milbus  यानी मिलिट्री बिजनेस। उन्होंने  बहुत गंभीरता से, शोध करने के बाद, आंकड़े और उदाहरण देते हुए यह साबित किया है कि पाकिस्तान की सेना देश की सब से बड़ी लैंडलॉर्ड  ( ज़मीन की मालिक /भूस्वामी) है। सेना जमीन बेचने का कारोबार ही नहीं करती बल्कि उसके  अन्य व्यापार भी हैं जिसमें सिटी मॉल वगैरा भी शामिल है। सेना द्वारा किए जाने वाले इस  व्यापार का मुनाफा सबसे ऊंची अधिकारी से लेकर  सैनिक तक को मिलता है।

कुछ देर के बाद बातचीत भारत-पाकिस्तान की तुलना पर आ गई। बांग्लादेश बनने से पहले पाकिस्तान से आए लोग भारत और पाकिस्तान की तुलना करते हुए पाकिस्तान को बड़ा और अच्छा सिद्ध करने की कोशिश करते थे। यह कोशिश काफी बचकानी होती थी लेकिन मध्यम वर्ग को आकर्षित करती थी।  जैसे पाकिस्तान में 'टेरिलीन' बहुत सस्ता है, जापानी गाड़ियां कितनी सस्ती है, खाना-पीना कितना सस्ता है, कितनी आसानी से मकान बनाया जा सकता है। कितनी आसानी से नौकरियां मिलती हैं।
बांग्लादेश बन जाने के बाद स्थिति बिल्कुल बदल गई है अब कोई पाकिस्तानी कभी यह नहीं कहता कि पाकिस्तान भारत से अच्छा है।  सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत का एक रुपया पाकिस्तान के दो रुपए के बराबर है। भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में जो काम हुआ है (जो अपर्याप्त है और जिसकी हम सब आलोचना करते हैं) वह पाकिस्तान की तुलना में बहुत उल्लेखनीय है।

उनमें से एक ने कहा -  आप चाहे जो कहें, भारत में लाख कमियां हो  सकती हैं ..लेकिन भारत  ने तरक्की की है.... और कोई मुल्क जब तरक्की करता है तो उसका फायदा सबको होता है...
महिला ने कहा-  मेरी तो भारत जाने की बड़ी ख्वाहिश है।
एक आदमी बोले-  पाकिस्तान में तो हर दूसरा आदमी भारत जाना चाहता है... देखने के लिए घूमने के लिए....
मैंने कहा -  भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो एक बार पाकिस्तान आना, देखना और घूमना चाहते हैं 
उनमें से एक ने कहा- लेकिन दोनों तरफ की सरकारें यह नहीं चाहतीं।
दूसरे ने कहा-  देखिए किसी भी मुल्क के अवाम किसी भी दूसरे मुल्कों के अवाम के दुश्मन नहीं होते... अब पाकिस्तानी अवाम को भारत दुश्मनी से क्या मिल जाएगा? हां दोस्ती से बहुत कुछ मिल सकता है..... लेकिन अफसोस यह है कि सरकारों को दुश्मनी से बहुत कुछ मिलता है.....
मुझे रघुवीर सहाय की कविता 'पैदल आदमी' याद आ गयी।

कराची कंटोनमेंट रेलवे स्टेशन पर वे उतर गए। मैं अकेला रह गया। ट्रेन लगता था अपने गंतव्य पर पहुंचने के प्रति बहुत उदासीन है। इस तरह चल रही थी जैसे कोई ठेल रहा हो।

कराची रेलवे स्टेशन पर इतना सन्नाटा था कि मुझे बहुत बुरा लगा। स्टेशन तो बड़ा था लेकिन कोई चहल-पहल नजर न आती थी। न तो ट्रेनें ही खड़ी थीं, न मुसाफिर। यह लगता था जैसे इस स्टेशन का बहुत कम इस्तेमाल होता है।
अलीगढ़ के पुराने दोस्त डॉ जमाल नकवी जरूर मुझे लेने के लिए खड़े थे।
(समाप्त)

असग़र वजाहत
© Asghar Wajahat

पाकिस्तान में ट्रेन का सफर (2)
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2021/09/2_21.html 

असग़र वजाहत, हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार और नाटककार हैं और जामिया यूनिवर्सिटी में हिंदी के प्रोफेसर रह चुके हैं।
#vss