Thursday, 3 June 2021

इस्मत चुगताई - संस्मरण :04

शाहिद साहब के साथ मैं भी एम. असलम साहब के यहाँ ठहर गयी. सलाम व दुआ भी ठीक से नहीं हुई थी कि उन्होंने झाड़ना शुरू कर दिया. मेरे अश्लील लेखन पर बरसने लगे. मुझ पर भी भूत सवार हो गया. शाहिद साहब ने बहुत रोका, मगर मैं उलझ पड़ी.
“और आपने जो ‘गुनाह की रातें’ में इतनी गन्दी-गन्दी पंक्तियाँ लिखी हैं. सेक्स एक्ट का वर्णन किया है, सिर्फ़ चटखारे के लिए.”
“मेरी और बात है, मैं मर्द हूँ.”
“तो इसमें मेरा क्या कुसूर है.”
“क्या मतलब?” वह गुस्से से लाल हो गये.
“मतलब ये कि आपको खुदा ने मर्द बनाया है इसमें मेरा कोई दखल नहीं और मुझे औरत बनाया है इसमें आपका कोई दखल नहीं. मुझसे आप जो चाहते हैं, वह सब लिखने का हक आपसे नहीं माँगा, न मैं आज़ादी से लिखने का हक आपसे माँगने की ज़रूरत समझती हूँ.”
“आप एक शरीफ मुसलमान खानदान की पढ़ी-लिखी लड़की हैं.”
“और आप भी पढे-लिखे और शरीफ खानदान से हैं.”
“आप मर्दों की बराबरी करना चाहती हैं?”
“हरगिज़ नहीं. क्लास में ज्यादा नम्बर पाने की कोशिश करती थी और अक्सर लड़कों से ज्यादा नम्बर ले जाती थी.” मैं जानती थी मैं कठदलीली की अपनी खानदानी आदत पर उतारू हूँ. मगर असलम साहब का चेहरा तमतमा उठा और मुझे डर हुआ कि या तो वह मुझे थप्पड़ मार देंगे या उनकी दिमाग़ी नस फट जायेगी.

शाहिद साहब की रूह फना (एक उर्दू मुहावरा है, तंग आना के अर्थ में) बस वह रोने ही वाले थे. मैंने बड़ी नर्म आवाज़ में हौले से कहा…”असल में असलम साहब मुझे कभी किसी ने नहीं बताया कि ‘लिहाफ़’ वाले सब्जेक्ट पर लिखना गुनाह है. न मैंने किसी किताब में पढ़ा कि इस…बीमारी…या…लत… के बारे में नहीं लिखना चाहिए. शायद मेरा दिमाग़ अब्दुर्रहमान चुग़ताई का ब्रश नहीं, एक सस्ता कैमरा है. जो कुछ देखता है, खट से बटन दब जाता है. मेरी कलम मेरे हाथ में बेबस होती है, मेरा दिमाग़ उसे बहका देता है. दिमाग और कलम के किस्से में हस्तक्षेप नहीं हो पाया.”
“आपको मज़हबी तालीम नहीं मिली.”
“अरे असलम साहब! मैंने ‘बहुश्ती जेवर’ पढ़ा. उसमें ऐसी खुली-खुली बातें हैं” मैंने बहुत मासूम सूरत बना कर कहा! 

असलम साहब कुछ परेशान-से हो गये. मैंने कहा, “जब बचपन में मैंने वो बातें पढ़ीं तो मेरे दिल को धक्का-सा लगा, वो बातें गन्दी. फिर मैंने बी.ए. के बाद पढ़ा तो मालूम हुआ कि वो बातें गन्दी नहीं हैं, बड़ी समझ-बूझ की बातें हैं जो हर आदमी को मालूम होनी चाहिए. वैसे लोग चाहें तो मनोविज्ञान और मेडिकल की किताबें हैं, उन्हें भी गन्दी कह दें.” 

दनादन खत्म होकर बातें नर्म लहजें में होने लगीं. असलम साहब काफी ठंडे हो गये. इतने में नाश्ता आ गया. और हम चार आदमियों के लिए इतना लम्बा-चौड़ा दस्तरख्वान सजा कि जिस पर पन्द्रह आदमी आसानी से खा सकते थे. तीन-चार तरह के अंडे, सादे तले हुए, खागीना, उबले हुए, शामी कबाब और क़ीमा, पराठे भी और पूरियाँ भी, तोस (टोस्ट), सफेद और पीला मक्खन, दही और दूध, शहद और सूखे-ताजे मेवे, अंडे का हलवा, गाजर का हलवा और हलवा सोहन.

“या अल्लाह क्या क़त्ल करने का इरादा है.” मैंने बहुत जलाया था. इसलिए उनके लेखन की तारीफ शुरू कर दी. मैंने उनकी ‘नरगिस’ और ‘गुनाह की रातें’ पढ़ी थीं. बस उनको ही खूब आसमान पर चढ़ाया. आखि़र में वह कुछ कायल से हुए कि कभी-कभी नंगापन साफगोई का काम करती है और अच्छी तालीम देती है. फिर उन्होंने खुद अपनी एक-एक किताब की खूबियाँ गिनानी शुरू की और मूड बहुत खुशगवार हो गया. बड़ी नरमी से बोले.
“तुम जज से माफी माँग लो.”
“क्यों? हमारे वकील तो कहते हैं, हम मुकदमा जीत जायेंगे.”
“नहीं, वह साला बकता है, तुम और मंटो माफी माँग लो तो वह मुकदमा खत्म हो सकता है. पाँच मिनट की बात है.”
“यहाँ के इज्जतदार लोगों ने सरकार पर जोर डालकर हम पर यह मुकददमा चलवाया है.”
“बकवास” असलम साहब बोले, मगर आँख नहीं उठा सके.
“तो फिर क्या सरकार ने या शायद बरतानिया के बादशाह ने यह कहानियाँ पढ़ी जो उन्हें मुकददमा चलाने की सूझी?”

“असलम साहब ये तो सच है कि कुछ साहित्यकारों, आलोचकों और भद्रजनों ने सरकार का ध्यान इस तरफ खींचा कि यह किताबें अनैतिकता फैलाने वाली हैं, उन्हें जब्त कर लिया जाये.” शाहिद साहब धीरे-से बोले.
“अगल अश्लील लेखन पर प्रतिबन्ध न लगाया गया तो क्या इनको सिर पर रखा जाये.” असलम साहब फट पड़े. शाहिद साहब कुछ अचकचा गये.
“तब तो हम सजा के ही हक़दार हैं.” मैंने कहा.
“फिर वही कठबहसी!”
(जारी)

© अनन्या सिंह
#vss

पाकिस्तान का इतिहास - अध्याय - 49.


“सर! पाकिस्तान को कायद-ए-आजम और मुस्लिम लीग ने बनाया। आज आप उसके नुमाइंदे हैं। कश्मीर मसला खत्म करने के लिए आपका नाम सोने के लफ़्ज़ों में लिखा जाएगा।”

- लेफ़्टिनेंट जनरल अजीज ख़ान प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से [ऑपरेशन कोह-ए-पाइमा (कारगिल) की जानकारी देते हुए]

मेरी रुचि भारतीय कोण से कारगिल युद्ध जानने की अब कम थी। क्योंकि वह दिन-रात उन दिनों टेलीविजन पर देखते थे। बरखा दत्त नामक पत्रकार उस युद्ध के दौरान सीमा पर रिपोर्टिंग के लिए मशहूर हुई थी। हमारे समय में यह ‘ऑपरेशन विजय’ पाकिस्तान पर विजय-पताका लहराने के बिम्ब की तरह देखा गया। पाकिस्तान इस युद्ध को किस तरह देखता है, यह मेरा कौतूहल था। 

भारत और पाकिस्तान, दोनों ही क्रमश: ‘पाकिस्तान अकपाइड कश्मीर’ और ‘इंडिया हेल्ड कश्मीर’ शब्द प्रयोग करते हैं। अमरीका कश्मीर के लिए ‘इंडिया अकपाइड जम्मू एंड कश्मीर’ प्रयोग करता रहा है। कुछ देश ‘इंडिया एडमिनिस्टर्ड कश्मीर’ भी प्रयोग करते हैं। 

पत्रकार नसीम ज़ाहरा ने पाकिस्तान के अफ़सरों से बात कर कारगिल पर पाकिस्तानी दृष्टिकोण से पुस्तक लिखी है, जो वहाँ की कहानी कहता है।

उनकी रिपोर्ट के अनुसार मई, 1999 में पहली बार प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के पास जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की टीम एक मानचित्र हाथ में लिए पहुँचती है। उस मानचित्र पर कुछ भी लिखा नहीं था, बस यूँ ही निशान बने थे। उन्हें समझाया गया कि मुजाहिद्दीन कश्मीर पर कब्जे के लिए तैयार हैं, जिसके लिए पाँच फेज में काम होगा। पहला फेज पूरा हो चुका है।

प्रधानमंत्री पहले तो चौंक गए, मगर पूछा कि हमारी सेना क्या भारत से युद्ध लड़ने जा रही है? 

ऐसा पाकिस्तान में अक्सर होता है कि सेना अपना काम करने के बाद प्रधानमंत्री से पूछती कम, बताती ज्यादा है। यह तरीका यूँ भी ग़लत है क्योंकि सेना के पास कूटनीतिक ज्ञान कम होता है। नवाज़ शरीफ़ के लिए भले वह सैन्य मानचित्र काला अक्षर भैंस बराबर हो, मगर राजनीति और विदेश नीति की समझ तो उन्हें ही थी।

नवाज़ को यह भी बताया गया कि इसमें अलग से खर्च नहीं लगेगा, पाकिस्तानी सेना का बैज इस्तेमाल नहीं होगा। यह कश्मीरी जिहादियों का युद्ध ही होगा, भारत-पाक नहीं। इसका उद्देश्य कश्मीर और भारत को जोड़ने वाले सुरंगों, पुलों और दर्रों पर कब्जा करना है, ताकि भारतीय सेना को रसद न पहुँच सके। उनका यह भी कहना था कि पहली फेज की खबर भारतीय इंटेलिजेंस को नहीं हुई थी। 

इस पूरी प्रक्रिया से जनरल अयूब ख़ान के ऑपरेशन जिब्राल्टर की याद आती है। 1965 में इस कारण भारत-पाक युद्ध हो गया था, और कश्मीर में पाकिस्तान को ठीक-ठाक शुरुआती बढ़त मिली थी। कारगिल जितनी ही जोखिम भरी घुसपैठ थी, उतनी ही कम योजनाबद्ध। अगर इसे पाकिस्तान सेना द्वारा पूर्ण सीमा-युद्ध में नहीं बदलना था, तो यह एक ‘डेड एंड’ पर खड़ी थी। यह सोच ही बेवक़ूफ़ाना थी कि कुछ प्रशिक्षित जिहादी भारतीय सेना से लड़ लेंगे, और पाकिस्तानी सेना को बस तमाशा देखना होगा।

बहरहाल जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की योजना नेपथ्य में रहने की नहीं, बल्कि युद्ध की ही थी। वह पाकिस्तानी सेना को नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ने का निर्देश रहे थे। 

नवाज़ शरीफ़ ने तलब की, “यह मैं क्या सुन रहा हूँ? आपकी फ़ौज ने एल ओ सी पार कर ली?”

मुशर्रफ़ ने कहा, “ठीक सुना है ज़नाब!”

“किसके कहने पर?”

“मैंने खुद यह फ़ैसला लिया। आप कहें तो वापस बुला लूँ?”

3 मई को ही कुछ स्थानीय गड़ेड़ियों ने भारतीय सेना को घुसपैठ की खबर कर दी थी। जिस समय जनरल मुशर्रफ़ और नवाज़ यह बात कर रहे थे, उस समय तो दोनों देशों की वायुसेना युद्ध शुरू कर चुकी थी। भारतीय थल-सेना कारगिल की ओर बढ़ रही थी। 

नवाज़ शरीफ़ छाती फुला कर कहते हैं, “यह बताइए जनरल, श्रीनगर पर हम झंडा कब फहरा रहे हैं?”

जनरल मुशर्रफ़ मुस्कुरा देते हैं। उन्हें भी शायद मालूम था कि झंडा तो नहीं फहरा पाएँगे, मगर वज़ीर-ए-आज़म की गद्दी ज़रूर छीन लेंगे। 
(क्रमश:)

प्रवीण झा
© Praveen Jha

पाकिस्तान का इतिहास - अध्याय - 48.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2021/06/48.html
#vss

विरोध को कुचलने का हथियार बनती रही है देशद्रोह की धारा 124A / विजय शंकर सिंह


एक अच्छी खबर यह है कि, वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर दर्ज सेडिशन का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। यह सरकार हर उस व्यक्ति के पीछे पड़ी है जो उससे सवाल पूछता है, उसकी कैफियत और हैसियत पर सवाल उठाता है और संविधान के मौलिक अधिकारों में दिए गए अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का एक नागरिक के रूप में सदुपयोग करता है। विनोद दुआ के खिलाफ दर्ज मुक़दमें का खारिज होना, सरकार के जिद अहंकार और ठसपन पर एक संवैधानिक चोट है।

अभी यूपी में रिटायर्ड आईएएस अफसर, सूर्य प्रताप सिंह के खिलाफ 6 मुक़दमे प्रदेश के विभिन्न जिलों में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारावदर्ज कराए गए हैं। उन पर यह आरोप है कि उन्होंने कुछ चुभते हुए सवाल, कोविड संक्रमण, अस्पतालों की बदइंतजामी, गंगा में बहते शव, और सरकार की नाकामी पर ट्वीट कर के सरकार से पूछ लिये थे। एक लोकतांत्रिक सरकार का यह कर्तव्य है, कि वह इन सवालों का जवाब देती और अपना पक्ष रखती, पर उसने सूर्य प्रताप सिंह को, धौंस में लेने के लिये, उन पर मुक़दमे दर्ज कर दिए। इस संदर्भ भी एक अच्छी खबर यह है कि, सूर्य प्रताप सिंह को भी, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से राहत मिली है और अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। 

अब जरा पिछले सालों मे सेडिशन के दर्ज मुकदमो का विवरण देखते हैं। 
● किसान आंदोलन के दौरान कुल 6 मुक़दमे सेडिशन के दर्ज किए गए।
● सीएए आंदोलन के दौरान कुल 25 मुक़दमे सेडिशन के दर्ज किए गए। 
● यूपी में हाथरस गैंगरेप के बाद कुल 27 मुक़दमे सेडिशन के दर्ज किए गए।
● 2014 के बाद 405 दर्ज सेडिशन के मुकदमो में से 96% वे मुक़दमे हैं जिनमे किसी राजनीतिक नेता की आलोचना की गयी है।
● इनमे से 149 दर्ज वे मुक़दमे हैं, जिनमे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना की गयी है। 
● 144 दर्ज वे मुक़दमे है, जिंसमे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आलोचना की गयी है। 
● इन दर्ज मुकदमो में उन मुकदमो की संख्या 28 % है जो सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के विपरीत दर्ज किए गए हैं। 
● अधिकतर सेडिशन के मुकदमे देश मे चल रहे विभिन्न आंदोलनों के संदर्भ में दर्ज किए गए हैं। जैसे बीजेपी शासित राज्यो में 3700 लोगो पर सीएए आंदोलन में शरीक होने के कारण सेडिशन का मुकदमा दर्ज किया गया।
● सबसे अधिक सेडिशन के मुकदमे दर्ज  करने वाले 5 राज्यो में, 4 राज्य, बिहार, यूपी, कर्नाटक और झारखंड भाजपा शासित है। झारखंड सब गैर भाजपा शासित राज्य हो गया है। 
● उत्तर प्रदेश में 2010 के बाद सेडिशन के दर्ज 115 मुक़दमो में से 77 % योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल के हैं। 

भारतीय न्याय प्रणाली ब्रिटिश न्याय प्रणाली से विकसित हुयी है। 1861 में बने तीन कानूनों, भारतीय दंड संहिता आईपीसी या इंडियन पेनल कोड,  दंड प्रक्रिया संहिता, सीआरपीसी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड,  भारतीय साक्ष्य अधिनियम यानी इंडियन एविडेंस एक्ट से भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था की नींव पड़ी। इसी समय आपराधिक न्याय व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप इंडियन पुलिस एक्ट को संहिताबद्ध किया गया जिससे आधुनिक पुलिस व्यवस्था की शुरुआत हुयीं।

124A के वर्तमान स्वरूप के लिये महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक को श्रेय देना चाहिये। तिलक को अंग्रेज़ भारतीय असंतोष का जनक या फादर ऑफ इंडियन अनरेस्ट कहते थे। 1897 में उनपर चले एक मुक़दमे ने इस धारा को राजद्रोह बनाम देशद्रोह की बहस में जन्म दे दिया। यह धारा संज्ञेय और अजमानतीय बनायी गयी।

पहले यह धारा पढ़ लें।
" जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घॄणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का, प्रयत्न करेगा या अप्रीति प्रदीप्त करेगा, या प्रदीप्त करने का प्रयत्न करेगा, वह आजीवन कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से, जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुर्माने से दंडित किया जाएगा । "

1870 तक यानी आईपीसी के संहिताबद्ध होने के 9 साल बाद यह धारा आईपीसी में जोड़ी गयी। हालांकि यह विचार 1835 के ड्राफ्ट पेनल कोड जो लार्ड थॉमस मैकाले ने तैयार किया था, में आ चुका था। जब यह धारा जोड़ी गयी तो इसके जोड़ने का उद्देश्य ब्रिटिश राज के विरुद्ध किसी भी प्रकार के जन असंतोष को दबाना था जो 1857 के विप्लव को सफलतापूर्वक कुचल देने के बाद भी देश मे कहीं न कहीं उभर जाया करता था। 1870 में यह धारा आईपीसी में जोड़ी गयो।

धारा 124A आईपीसी के अंतर्गत पहला मुकदमा 1891 में दर्ज हुआ जो बंगाल से निकलने वाले एक अखबार बंगोबासी के संपादक के विरुद्ध था। बांग्ला अखबार बंगोबासी ने ' सहमति की उम्र ' के नाम से एक लेख लिख कर ब्रिटिश सरकार के एज ऑफ कंसेंट बिल 1891 की तीखी आलोचना की थी। 19 मार्च 1891 को पारित इस कानून के अनुसार लड़कियों के साथ यौन संबंध बनाने की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल कर दी गयी। इसमे भी विवाहित और अविवाहित का कोई भेद नहीं रखा गया था। 12 साल की कम उम्र की विवाहित महिला से यौन संबंध बनाना भी अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया। अपने अनेक पुनर्जागरण के अभियान के बाद भी तत्कालीन बंगाल में बाल विवाह जोरो से प्रचलित था। बंगोबासी ने इस कानून के साथ ब्रिटिश राज की भी तीखी आलोचना की। इस आलोचना के कारण इस पर इस धारा के अंतर्गत मुकदमा कायम किया गया। लेकिन अदालत में जब यह मुकदमा पहुंचा तो इसपर जजों में एकराय नहीं बनी। संपादक ने भी माफी मांग ली और मुकदमा एक राय न होने से खारिज हो गया।

1897 में तिलक के लिखे गये लेखों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी। तिलक ने अपने पत्र केसरी में मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी के संदर्भ से कई लेख लिखे जिनमें ब्रिटिश हुकूमत की तीखी आलोचना थी।  पुणे के अंग्रेज़ शासकों को लगा कि तिलक के लेख को पढ़ कर ही चाफेकर बंधुओ ने रैंड और उसके सहयोगी आयस्टर की हत्या की है । यह घटना 22 जून 1897 में घटी थी। चाफेकर बंधुओं, वासुदेव और हरि चाफेकर के खिलाफ तो हत्या का मुकदमा चला और उन्हें फांसी की सज़ा हुयी। तिलक के खिलाफ 124A के अंतर्गत राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।

इस धारा में असंतोष, डिसफेक्शन के बजाय इसे डिसलॉयल्टी पढा गया और यह गैर वफादारी, राज यानी क्राउन का विरोध माना गया। इस प्रकार असंतोष राजद्रोह में तब्दील हो गया। इस मुक़दमे में जो बहस हुयी है उस पर लिखी एक पुस्तक द ट्रायल ऑफ तिलक, तिलक के कानूनी ज्ञान और उनकी तर्कशीलता को प्रमाणित करती है। पहली बार इस मुक़दमे में घृणा, शत्रुता, नापसंदगी, मानहानि आदि जैसे भाव जो जनता को किसी भी सरकार से असंतुष्ट करते हैं, राज्य या सरकार के विरुद्ध परिभाषित कर के राजद्रोहात्मक माने गये। तिलक को इस अपराध में सज़ा हो गयी। वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें अपने लेखों के कारण राजद्रोह की सज़ा भुगतनी पड़ी।

एक साल बाद उनकी सहायता में जर्मन अर्थशास्त्री और न्यायविद मैक्स वेबर सामने आए। उनके मुक़दमे की अपील में नए तरह से बहस हुई और सेडिशन को नए सिद्धांत के अनुरूप व्याख्यायित किया गया। यह सिद्धांत स्ट्रेची का था जिनके अनुसार उपनिवेशवादी ताकतें अक्सर अपने अपने उपनिवेश में आज़ाद पसंद लोगो के विरुद्ध उन्हें प्रताड़ित करने के लिये राजद्रोह का बेजा इस्तेमाल करती रहती हैं जबकि यह एक प्रकार की अभिव्यक्ति है। इस बार तो तिलक एक साल के बाद ही छूट गए। पर केसरी में ही लिखे एक अन्य लेख के कारण उनके खिलाफ 1908 में फिर 124A का मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमे 1909 में उन्हें 6 साल की सज़ा मिली जो उन्होंने मांडले जेल में बिताया था। इसी मुक़दमे में तिलक ने अपना पक्ष रखते हुए यह कालजयी वाक्य कहा था, " स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा । " इस वाक्य को राजद्रोही माना गया।

1897 के बाद 1922 में यही मुकदमा महात्मा गांधी पर चला। गांधी जी ने अपने पत्र यंग इंडिया में ब्रिटिश शासन की नीतियों की तगड़ी आलोचना करते हुये कई लेख लिखे थे। कुछ लेख किसानों की समस्या पर जो उन्होंने चंपारण में निलहे ज़मीदारों के अत्याचार को देखा था पर लिखे थे। गांधी ने इस एक्ट को ही जनविरोधी और दमनकारी बता दिया और यह भी कह दिया कि उन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध लेख लिखा है और यह राजद्रोह है तो वे राजद्रोही हैं। उन्होंने जो कहा उसे उन्ही के शब्दों में पढ़े,

“Section 124A under which I am happily charged, is perhaps the prince among the political sections of the IPC designed to suppress the liberty of the citizen.”
( धारा 124A जिसके अंतर्गत मैं प्रसन्न हूँ कि मुझे आरोपित किया गया है, के बारे में यही कहूंगा कि यह धारा सभी प्राविधानों के अंतर्गत आईपीसी में एक राजकुमार की तरह है जो नागरिकों की स्वतंत्रता को कुचलने के लिये रखी गयी है। )
महात्मा गांधी को भी छह साल की सज़ा मिली थी।

भगत सिंह के ऊपर भी यही मुकदमा चला था। हालांकि उनके ऊपर सांडर्स हत्याकांड का भी मुकदमा चला था। जबकि भगत सिंह का नाम इस मुक़दमे की एफआईआर में भी नहीं था और राजद्रोह साबित भी नहीं हो पाया था। पर भगत सिंह अंग्रेजों के लिये बड़ा खतरा बन सकते थे और अंग्रेज़ उनकी वैचारिक स्पष्टता और मेधा को जान गए थे । उनका एक ही उद्देश्य था भगत सिंह को फांसी पर लटका देना जो उन्होंने 23 मार्च 1931 में कर दिया।

आज़ादी के बाद जब संविधान सभा की कार्यवाही चल रही थी, तो 29 अप्रैल 1947 को इस धारा पर लंबी बहस हुई। क्योंकि यह धारा कहीं न कहीं संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को अवक्रमित करती है। सरदार पटेल ने  केवल भाषण और नारों को सेडिशन मानने से इनकार कर दिया। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सोमनाथ लाहिड़ी ने कहा कि ब्रिटेन में भी जहां से यह धारा आयातित की गयी है, सरकार के विरुद्ध कुछ भी तीखी बात या नीतियों की निंदा की जाय वह तब तक राजद्रोह नहीं माना जाता है जब तक कि कोई ऐसा उपक्रम न किया गया हो जो देश और राज्य के विरुद्ध युद्धात्मक हो। संविधान सभा मे लंबी बहस के बाद यह सहमति बनी कि केवल आलोचनात्मक और निंदात्मक भाषणों के ही आधार पर किसी के विरुद्ध यह आरोप नहीं लगाया जा सकता है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध होगा। अतः इस धारा में संशोधन किये गए। 2 दिसंबर 1948 को सभी सदस्यों की तरफ से सेठ गोविंद दास ने इस संशोधन पर प्रसन्नता व्यक्त की।

संविधान सभा ने सेडिशन शब्द को ही यह मान लिया कि यह केवल बाल गंगाधर तिलक को दंडित करने के लिये गलत तरह से परिभाषित और व्याख्यायित किया गया था। जब कि असंतोष और राजद्रोह में अंतर है। संविधान सभा के सभी सदस्य स्वाधीनता संग्राम के सेनानी थे। एक सदस्य ने कहा कि
" जन असंतोष को मुखर कर के ब्रिटिश राज की आलोचना में तो हम सब शामिल थे। अगर आलोचना का यह मार्ग बाधित कर दिया जाएगा तो सरकारें निरंकुश हो जायेंगीं । अब हमारे पास अभिव्यक्ति की आज़ादी का मौलिक अधिकार है और एक फ्री प्रेस है। अब हमें इस धारा से मुक्ति पा लेनी चाहिये। "
26 नवम्बर 1949 को पूर्ण हुये संविधान ने सेडिशन शब्द से तो मुक्ति पा ली और एक स्वस्थ लोकतांत्रिक देश के हम भारत के लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में संविधान ने एक नायाब मौलिक अधिकार तो दे दिया पर आईपीसी में यह धारा बनी रही।

1950 में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों ने सरकार को इस धारा में आवश्यक संशोधन करने पर विवश कर दिया। पहला मुकदमा आरएसएस के पत्र ऑर्गनाइजर से जुड़ा था, और दूसरा एक अन्य मुकदमा क्रॉस रोड मैगजीन का था। इन दोनों ही पत्रिकाओं में तत्कालीन सरकार की तीखी आलोचना और निंदा की गयी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में सरकार का पक्ष लिया और स्वतंत्रता के शैशव को देखते हुए ऐसी आलोचना से परहेज बरतने के लिये सम्पादकों से कहा। पर कोई दण्डात्मक कार्यवाही नहीं हुयी। लेकिन अदालत ने इसे देशद्रोह नहीं माना बल्कि एक गैर जरूरी आलोचना माना। इस फैसले की आलोचना हुयी और इस धारा में एक संशोधन लाया गया।

सरकार की आलोचना और निंदा जो आज कुछ लोगो द्वारा देशद्रोह समझ ली गयी है, के संबंध में तब जवाहरलाल नेहरू ने इस धारा के बारे में संसद में संशोधन पेश करते समय क्या कहा था, यह पढ़ना दिलचस्प रहेगा। उन्होंने कहा था,
“Take again Section 124A of the Indian Penal Code. Now so far as I am concerned that particular section is highly objectionable and obnoxious and it should have no place both for practical and historical reasons, if you like, in any body of laws that we might pass. The sooner we get rid of it the better,”
( धारा 124A, भारतीय दंड संहिता, का ही उदाहरण लें, इस प्राविधान के बारे में जहां तक मैं समझता हूं, यह धारा न केवल आपत्तिजनक है बल्कि अप्रिय भी है। अतः व्यवहारिक और ऐतिहासिक कारणों से इस धारा की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर आप सभी सहमत होंगे तो एक नया कानून बनेगा। जितनी जल्दी हो सके हम इस प्राविधान से मुक्ति पा लें। "
हालांकि नेहरू के इन शब्दों में कहे गए अपनी बात के बावजूद यह प्राविधान आईपीसी में बना रहा। लेकिन नेहरू के संसद में कहे गए शब्द और उनकी भावनाएं इस जुर्म के ट्रायल के समय अदालतों द्वारा स्वीकार किये गये और 1950 में ही धारा 124A के अंतर्गत दर्ज किये गए मुकदमों में कुछ उच्च न्यायालयों ने अभियुक्तों को बरी कर दिया।

आज़ादी के बाद 124A आईपीसी का सबसे चर्चित मुकदमा बिहार के केदारनाथ का था जो केदारनाथ बनाम बिहार राज्य 1962 के नाम से प्रसिद्ध है। केदारनाथ ने एक सार्वजनिक सभा मे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की तीखी आलोचना करते हुये बरौनी में कहा था,
" To-day the dogs of CID are loitering around Barauni. Many official dogs are sitting even in this meeting. The people of India drove out the Britishers from this country and elected these Congress goondas to the gaddi.”
( आज सीआईडी के कुत्ते बरौनी में इधर उधर घूम रहे हैं। बहुत से सरकारी कुत्ते इस सभा मे भी मौजूद हैं। देश की जनता ने इस देश से अंग्रेज़ो को उखाड़ कर भगा दिया, और इन कांग्रेसी गुंडों को गद्दी सौंप दी। )
यहां सीआईडी, इंटेलीजेंस खुफिया शाखा की पुलिस के लिये कहा गया है। क्योंकि पहले खुफिया शाखा भी सीआईडी का ही एक अंग हुआ करती थी। अब वह एक स्वतंत्र विभाग है। उन्होंने कांग्रेस पार्टी और सरकार को भ्रष्टाचार, काला बाज़ारी, पूंजीवादी और ज़मींदारों की प्रतिनिधि बताते हुए एक क्रांति कर के देश से भगा देने का आह्वान किया था।

केदारनाथ के इस भाषण पर स्थानीय पुलिस थाने द्वारा खुफिया रिपोर्ट के आधार पर धारा 124A आईपीसी का एक मुकदमा दर्ज हुआ और उनके खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल हुआ जिसमें ट्रायल के बाद उन्हें सजा मिली।

अपनी सज़ा के खिलाफ केदारनाथ ने पटना  हाईकोर्ट में अपील की पर उन्हें उक्त अपील में कोई राहत नहीं मिली बल्कि हाईकोर्ट से भी उनकी सज़ा बहाल रही । हाईकोर्ट ने सेडिशन पर कहा कि, यह धारा उन अप्रिय और भड़काऊ शब्दों के लिये दण्डित करने की शक्ति  देती है जिससे कानून और व्यवस्था की गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है और हिंसा भड़क सकती है। सेडिशन के लिये हाईकोर्ट ने सज़ा तो बहाल रखी पर इस धारा के संबंध में जजों की राय इस प्रकार थी।
“It has been contended that a person who makes a very strong speech or uses very vigorous words in a writing directed to a very strong criticism of measures of Government or acts of public officials, might also come within the ambit of the penal section. But, in our opinion, such words written or spoken would be outside the scope of the section.”
( इस प्राविधान में यह अंकित है कि अगर कोई व्यक्ति किसी उत्तेजक भाषण या लेख में भड़काऊ शब्दों के साथ सरकार और उसके कार्यकलापों तथा उसके अधिकारियों की ऐसी आलोचना करता है तो वह दंड का भागी होगा। लेकिन हमारी राय के अनुसार ऐसे लिखे और बोले गये शब्द इस धारा के प्राविधान से बाहर हैं। )

हाईकोर्ट ने यह तो माना कि केदारनाथ द्वारा दिया गया भाषण आक्रामक और भड़काऊ है और सज़ा भी बहाल रखी पर इसे राजद्रोह मानने से इनकार कर दिया। यह एक अजीब फैसला था। राजद्रोह का जब दोष ही नहीं बनता तो सज़ा किस बात की। केदारनाथ ने इस फ़ैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट में एक संविधान पीठ का गठन इस अपील की सुनवायी के लिये हुआ। संविधान पीठ ने पहली बार सेडिशन पर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया, जिससे यह धारा परिभाषित हुयी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, आज़ादी मिलने तक 124A के बारे में दो विचार थे, जो इस धारा के संबंध में फेडरल कोर्ट और प्रिवी काउंसिल के फैसलों पर आधारित थे। 1949 में प्रिवी काउंसिल जो सभी कॉमनवेल्थ देशों की साझी सर्वोच्च अपीलीय अदालत थी को भारत सरकार ने एक कानून बनाकर समाप्त कर दिया था । आज़ादी के पहले फेडरल अदालतों की यह धारणा थी कि, " लोक व्यवस्था अथवा लोक व्यवस्था के भंग हो जाने की आशंका ही इस प्राविधान को दंड संहिता में जोड़े जाने का आधार है, इसलिए फेडरल अदालतों के फैसलों के अनुसार, अकेले उत्तेजक और भड़काऊ शब्दावली युक्त भाषणबाजी भी किसी भी हिंसक घटना को जन्म दे सकती है अतः सेडिशन का आरोप बनता है। "

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फेडरल कोर्ट के इन फैसलों की जब संविधान के अनुच्छेद 19A के परिप्रेक्ष्य मे व्याख्या की तो, इस प्राविधान को 19A ( बोलने की आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ) के विपरीत तो पाया, लेकिन इसे संविधान विरुद्ध नहीं मानते हुये रद्द नहीं किया। हालांकि केदारनाथ को इस अपराध का दोषी नहीं पाया गया और उन्हें बरी कर दिया।

इस मुक़दमे में सुप्रीम कोर्ट ने सेडिशन कानून को बनाये रखने की बात कह कर उसे संविधान विरुद्ध नहीं माना है लेकिन अदालत ने यह भी साफ कर दिया जैसा सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध वकील फली एस नारीमन कहते हैं कि,
" केवल सरकार की आलोचना चाहे वह कितनी भी निर्मम और घृणा भरी हो के आधार पर किसी के विरुद्ध सेडिशन का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। "

उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि धारा 121, 122 और 123 आईपीसी में राज्य के विरुद्ध युद्ध की घोषणा, युद्ध का षडयंत्र और राज्य प्रमुख के हत्या या उनपर हमले की बाते हैं तो ये धाराएं सही मायने में देशद्रोह हैं। इन प्राविधानों में कभी कोई विवाद नहीं उठा है।

जबकि धारा 124A जिसमे केवल " बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घॄणा या अवमान पैदा करने " की अभिव्यक्ति को देशद्रोह या राजद्रोह या सेडिशन कहा गया है, में जब से यह धारा बनी है तब से विवाद उठता रहा है और आज भी बना हुआ है। हर बार अदालतों में इसकी वैधानिकता को चुनौती दी गयी है। इस धारा की परिभाषा को देखते हुए इस बात की संभावना अधिक है कि इसका सत्ता या पुलिस अपने हित मे दुरूपयोग करे। इसके सबसे अधिक शिकार वे अखबार, पत्रिकाएं, टीवी चैनल और पत्रकार बनते हैं और आगे भी  बन सकते है  जो सरकार के सजग और सतर्क आलोचक हैं। विरोधी दल के वे नेता भी शिकार हो सकते हैं जो सत्तारूढ़ दल से वैचारिक आधार पर भिन्न मत रखते हैं और स्वभावतः सरकार के  कटु आलोचक है। ब्रिटिश काल मे भी इस प्राविधान की गाज 1891 में बंगोबासी, 1897 और 1908 में लोकमान्य तिलक ,1922 में महात्मा गांधी और 1929 में भगत सिंह और साथियों पर गिरी थी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की जान है। 1215 में इंग्लैंड के मैग्ना कार्टा, 1688 में इंग्लैंड की ग्लोरियस रिवोल्यूशन और 1789 में हुयी फ्रांस की क्रांति ने मनुष्य के जीवन मे अभिव्यक्ति और जीवन के उदार सिद्धांतों का बीजारोपण किया। यह धारा कहीं न कहीं उस उदार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत ठहरती है। हर मुक़दमे में विरोधाभास उभर कर सामने आया है। तिलक, गांधी और भगत सिंह तथा साथियों को दी गयी सज़ायें कानूनी आधार पर नहीं बल्कि राजनैतिक और प्रशासनिक आधार पर दी गयीं थी क्योंकि हम गुलाम थे। ग़ुलाम भला आज़ादी के सपने कैसे देख सकता है ! पर अब एक सार्वभौम, स्वतंत्र और विधि द्वारा शासित एक कल्याणकारी राज्य है तो ऐसे राज्य से अपेक्षाये भी होंगी और कभी न कभी, कहीं न कहीं किसी न किसी विंदु पर सरकार की आलोचना भी  होगी। अतः केवल इस आधार पर कि किसी ने सरकार की निर्मम आलोचना, लेख लिख कर और भाषण देकर कर दिया है तो उसे देशद्रोही ठहरा दिया जाय यह एक अधिनायकवादी कदम होगा न कि लोकतांत्रिक।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस चंद्रचूड़ ने यूपी सरकार के ऊपर तंज कसते हुए कहा है कि,
"अखबारों में गंगा में बहते शव की खबरों पर, देशद्रोह का कोई मुकदमा सरकार ने अभी दर्ज किया है या नहीं।"

सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि देश भर में दर्ज देशद्रोह के मुकदमो की समीक्षा के लिये एक न्यायिक समिति बनाये और अभिव्यक्ति की आज़ादी को हनन करते हुए देशद्रोह के जो मुकदमें दर्ज किए गए हैं उन्हें ख़ारिज कर, एक विस्तृत दिशा निर्देश जारी करे। देश और देशद्रोह को जितना हल्का इस सरकार ने, ज़रा ज़रा सी बात पर सेडिशन का मुकदमा दर्ज कर, बना दिया है उतना तो ब्रिटिश राज ने भी नही किया था। जनता को डरा कर उस पर राज नही किया जा सकता है पर एक लोकतांत्रिक गवर्नेंस की यह छोटी सी, पर बेहद महत्वपूर्ण बात इस सरकार के लोगो को बिल्कुल समझ मे नहीं आएगी।

( विजय शंकर सिंह )

पाकिस्तान का इतिहास - अध्याय - 48.


“दक्षिण एशिया अब दुनिया की सबसे खतरनाक जगह बन गयी है”
- बिल क्लिंटन (भारत-पाक परमाणु बम परीक्षण पर)

परमाणु बम ही आधुनिक दुनिया में शांति-दूत बनता जा रहा है। यह अजीब विडंबना है। पूर्व भारतीय सेनाध्यक्ष शंकर राय चौधरी ने भारतीय संसद पर हमले के समय युद्ध न होने का कारण यह परमाणु बम ही बताया। 1971 युद्ध के पाँच दशक गुजर गए, एक से एक मिसाइल बन गए, संसद और मुंबई ताज जैसे खतरनाक हमले हुए, मगर कोई बड़ा युद्ध ही नहीं हुआ। क्यों? 

अटल बिहारी वाजपेयी ने जनवरी में जब चुनावी घोषणापत्र जारी किया था तो उसमें लिखा था कि हम परमाणु शक्ति का पुनराकलन करेंगें। यह बात तो दुनिया भी सोच रही थी कि भारत ने 1974 के बाद कोई परीक्षण क्यों नहीं किया। राजीव गांधी ने 1989 में परमाणु बम टीम बनायी, लेकिन उसके बाद उनकी सरकार ही गिर गयी, फिर मृत्यु हो गयी। वाजपेयी जब 1996 में मात्र तेरह दिन के लिए आए, उसमें भी एक परीक्षण की तैयारी कर ली थी, जो हो न सका। इसे राजनीतिक दाँव भी कहा जा सकता है, जो उनके दल को भारत में स्थापित कर देती। मगर मामला इतना सरल भी नहीं था।

1995 में परमाणु देशों ने नॉन-प्रॉलिफरेशन ट्रीटी (NPT) को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया। इसका अर्थ यह था कि पाँच बड़ी शक्तियों के अलावा कोई परीक्षण नहीं कर सकता। तो भारत या पाकिस्तान परमाणु बम का क्या अचार डालते? उनके अरबों खर्च हो चुके थे, आपसी रंजिश चरम पर थी। परीक्षण तो जल्द से जल्द करना ही था। 

अमरीका ने भारत-पाक जैसे देशों पर CTBT हस्ताक्षर करने का दबाव डालना शुरू किया। इन दोनों ने भी लखनवी ‘पहले आप’ रुख अपनाया। पाकिस्तान ने शर्त रखी कि पहले भारत हस्ताक्षर करे। भारत अड़ गया कि वह पहले नहीं करेगा। 

वाजपेयी सरकार ने लौटते ही आनन-फानन परीक्षण कर लिया। यह बात कहीं लिखी नहीं गयी, न ही इसके प्रमाण हैं, मगर जिस फुर्ती से पाकिस्तान ने परीक्षण किया, मुझे लगता है दोनों देशों ने बात कर ली थी। यह भी मुमकिन है कि दोनों के गुप्तचरों से खबर मिली होगी। जो भी हो, इतिहास में पहली बार दो पड़ोसी देशों ने एक ही महीने में इतने परमाणु बम धमाके किए। वह भी बिना किसी युद्ध के। 

बल्कि युद्ध तो छोड़िए, नवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी गर्मजोशी से मिलते हुए दोनों देशों के मध्य बस सेवा चालू कर रहे थे। ऐसा सौहार्दपूर्ण माहौल तो वर्षों से नहीं दिखा था। परमाणु बम तो वाकई जादू कर गया।

यह जरूर हुआ कि अमरीका ने दोनों देशों पर कुछ पाबंदियाँ लगा दी, लेकिन अब वे अमरीका को भी समझ चुके थे। चार दिन बैन लगाएँगे, पाँचवे दिन कहेंगे कि आगे से मत फोड़ना।

खैर, ऐसा भी नहीं कि भारत-पाक के गिले-शिकवे मिट गए। बल्कि अब तो वह होने वाला था, जो वर्षों से नहीं हुआ था। भारतीय सेना को कश्मीर के कारगिल जिले में कुछ गतिविधियों की खबर मिली। नवाज़ शरीफ़ ने एक नया जनरल नियुक्त किया था, जिनका नाम था परवेज़ मुशर्रफ़। 
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha

पाकिस्तान का इतिहास - अध्याय - 47.
http://vssraghuvanshi.blogspot.com/2021/06/47.html 
#vss

Wednesday, 2 June 2021

क्या हम मूढ़तंत्र यानी काकिस्टोक्रेसी की ओर जा रहे हैं ? / विजय शंकर सिंह

हर तरफ गवर्नेंस की विफलता दिख रही है। महंगाई बढ़ रही है, महंगाई भत्ते कम हो रहे हैं, इलाज के अभाव में लोग मर रहे हैं। दो नए वायरस डेल्टा और कप्पा ने लोगो को तबाह करना शुरू कर दिया है। पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी की सपने दिखाने वाली सरकार की जीडीपी माइनस - 7.5 % तक गिर जाने का अनुमान है। बांग्लादेश तक हमसे आगे निकल गया है। अरुणाचल और लद्दाख में 'न कभी घुसा था और न घुसा है', वाला चीन, दक्षिणी छोर पर कुछ ही नॉटिकल मील की दूरी पर श्रीलंका के एक बंदरगाह में मंदारिन में अपने आ जाने की सूचना दे रहा, उसने दुनिया की सबसे प्राचीन माने जाने वाली द्रविड़ सभ्यता और तमिल भाषा को श्रीलंका से बेदखल करने का मन बना लिया है। और सरकार, एक राज्य में चुनाव हार जाने की खीज, एक अनावश्यक मुद्दे को तूल देकर एक रिटायर्ड नौकरशाह का जवाबतलब कर के उतार रही है। 

यहीं यह सवाल उठता है कि, आखिर हम गवर्नेंस की ओर जा रहे हैं ? क्या हम मूढ़तंत्र यानी काकिस्टोक्रेसी की ओर जा रहे हैं ? अनेक शासन पद्धतियों के बीच एक अल्पज्ञात शासन पद्धति है काकिस्टोक्रेसी, Kakistocracy . इसका अर्थ है, सरकार की एक ऐसी प्रणाली, जो सबसे खराब, कम से कम योग्य या सबसे बेईमान नागरिकों द्वारा संचालित की जाती है। इसे कोई शासन प्रणाली नहीं कही जानी चाहिये बल्कि इसे किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के एक ग्रहण काल की तरह कहा जा सकता है जब हम निकम्मे लोगों द्वारा शासित हो रहे हों तब। यह शब्द 17 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इस्तेमाल किया गया जब फ्रांस का लोकतंत्र और इंगलेंड का शासन गड़बड़ाने लगा था। इंग्लैंड ने तो अपनी समृद्ध लोकतांत्रिक परम्परा के कारण  खुद को संभाल लिया था पर फ्रांस ख़ुद को संभाल नहीं पाया था। तब अयोग्य और भ्रष्ट लोगों द्वारा शासित होने के कारण , 1829 में यह शब्द एक अंग्रेजी लेखक द्वारा इस्तेमाल किया गया था। मैने अपनी समझ से इसका हिंदी नाम मूढ़तन्त्र रखा है। मुझे शब्दकोश में इसका शाब्दिक अर्थ नहीं मिला।

इस का शाब्दिक अर्थ यूनानी शब्द काकिस्टोस जिसका मतलब ' सबसे खराब ' होता है और क्रेटोस यानी ' नियम ' , को मिला कर बनता है, सबसे खराब विधान । ग्रीक परम्परा से आया यह शब्द पहली बार अंग्रेजी में इस्तेमाल किया गया था, फिर राजनीति शास्त्र के विचारकों ने इसे अन्य भाषाओं में भी रूपांतरित कर दिया ।

राजनीतिशास्त्र के अनुसार इस की अकादमिक परिभाषा इस प्रकार है ~

A "kakistocracy" is a system of government which is run by the worst, least qualified, or most unscrupulous citizens.

( काकिस्टोक्रेसी, शासन की एक ऐसी प्रणाली है जो सबसे बुरे, सबसे कम शिक्षित और सबसे निर्लज्ज लोगों द्वारा संचालित की जाती है ।)

यह कोई मान्य शासन प्रणाली नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र का ही एक विकृत रूप है । लोकतंत्र जब अपनी पटरी से उतरने  लगता है और शासन तंत्र में कम पढ़े लिखे और अयोग्य लोग आने  लगते हैं तो व्यवस्था का क्षरण होंने लगता है। उस अधोगामी व्यवस्था को नाम दिया गया काकिस्टोक्रेसी । लोकतंत्र में सत्ता की सारी ताक़त जनता में निहित है। जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है और वे चुने हुये प्रतिनिधि एक संविधान के अंतर्गत देश का शासन चलाते हैं। शासन को सुविधानुसार चलाने के लिये प्रशासनिक तंत्र गठित किया जाता है जो ब्यूरोक्रेसी के रूप में जाना जाता है। ब्यूरोक्रेसी, सभी प्रशासनिक तंत्र के लिये सम्बोधित किया जाने वाला शब्द है। जिसने पुलिस, प्रशासन, कर प्रशासन आदि आदि सभी तंत्र सम्मिलित होते हैं। इसी को संविधान में कार्यपालिका यानी एक्ज़ीक्यूटिव कहा गया है। ब्यूरोक्रेसी मूलतः सरकार यानी चुने हुये प्रतिनिधियों के मंत्रिमंडल के अधीन उसके दिशा निर्देशों के अनुसार काम करती है। पर ब्यूरोक्रेसी उस मन्त्रिमण्डल का दास नहीं होती है और न ही उनके हर आदेश और निर्देश मानने के लिये बाध्य ही होती है । ब्यूरोक्रेसी का कौन सा तंत्र कैसे और किस प्रक्रिया यानी प्रोसीजर और विधान यानी नियमों उपनियमों के अधीन काम करती है , यह सब संहिताबद्ध है। नौकरशाही से उन्हीं संहिताओं का पालन करने की अपेक्षा की जाती है । पर यहीं पर जब ब्यूरोक्रेसी कमज़ोर पड़ती है या स्वार्थवश मंत्रिमंडल के हर काम को दासभाव से स्वीकार कर नतमस्तक होने लगती है तो प्रशासन पर इसका बुरा असर पड़ता है और एक अच्छी खासी व्यवस्था पटरी से उतरने लगती है । ऐसी दशा में चुने हुये प्रतिनिधियों की क्षमता, मेधा और इच्छाशक्ति पर यह निर्भर करता है कि वे कैसे इस गिरावट को नियंत्रित करते हैं। अगर सरकार का राजनैतिक नेतृत्व प्रतिभावान और योग्य नेताओं का हुआ तो वे ब्यूरोक्रेसी को वे कुशलता से नियंत्रित भी कर लेते हैं अन्यथा ब्यूरोक्रेसी बेलगाम हो जाती है और फिर तो दुर्गति होनी ही है। इसी समय राजनैतिक नेतृत्व से परिपक्वता और दूरदर्शिता की अपेक्षा होती है। इसे ही अंग्रेज़ी में स्टेट्समैनशिप कहते हैं।

लोकतंत्र में जनता का यह सर्वोच्च दायित्व है कि वह जब भी चुने अच्छे और योग्य लोगों को ही चुने और न ही सिर्फ उन्हें चुने बल्कि उन पर नियंत्रण भी रखे। यह नियंत्रण, अगर चुने हुये प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का कोई प्राविधान संविधान में नहीं है तो, वह मीडिया, स्थानीय प्रतिनिधि पर दबाव, आंदोलन आदि के द्वारा ही रखा जा सकता है और दुनिया भर में जहाँ जहाँ लोकशाही है, जनता अक्सर इन उपायों से अपनी व्यथा और नाराज़गी व्यक्त करते हुये नियंत्रण रखती भी है। इसी लिये दुनिया भर में जहां जहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है वहां वहां के संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है। जनता का यह दायित्व और कर्तव्य भी है कि वह निरन्तर इस अधिकार के प्रति सजग और जागरूक बनी रहे और जिन उम्मीदों से उसने सरकार चुनी है उसे जब भी पूरी होते न देखे तो निडर हो कर आवाज़ उठाये । इसी लिये लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को पर्याप्त महत्व दिया है और विरोध कोई हंगामा करने वाले अराजक लोगों का गिरोह नहीं है वह सरकार को जागरूक करने उसे पटरी पर बनाये रखने के उद्देश्य से अवधारित किया गया है । यह बात अलग है कि इसे देशद्रोही कह कर सम्बोधित करने का फैशन हो गया है।

लोकतंत्र तभी तक मज़बूत है जब तक जनता अपने मतदान के अधिकार के प्रति सचेत है और सरकार चुनने के बाद भी इस बात पर सचेत रहे कि चुने हुये प्रतिनिधि उसके लिये, उसके द्वारा  चुने गए हैं। पर हम चुन तो लेते हैं पर चुनने के बाद सरकार को ही माई बाप मानते हुये उसके हर कदम का दुंदुभिवादन करने लगते हैं । यही ठकुरसुहाती भरा दासभाव लोकतंत्र को क्षरित करता है और ऐसे ही लोकतंत्र फिर, धीरे धीरे मूढ़तन्त्र में बदलने लगता है।

एक अच्छा प्रशासक और सरकार कभी भी द्वेषभाव से काम नही करती है। पर मोदी सरकार का स्थायी भाव ही द्वेष भाव है। सरकार ने जिस रिटायर्ड अफसर अलपन बंदोपाध्याय को धारा 51 डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के अंतर्गत एक नोटिस जारी किया है, उसमे एक साल की सज़ा का प्राविधान है। अलपन बंदोपाध्याय से तीन दिन में ही यह लिखित रूप से बताने के लिये कहा गया है कि, क्यों न धारा 51, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के अंतर्गत उनके खिलाफ कार्यवाही की जाय ? यह नोटिस उनके रिटायर होने के कुछ ही घन्टे पहले उन्हें दी गयी है। उन्होंने अपना सेवा विस्तार लेने से मना कर दिया और 31 मई 2021 को रिटायर हो गए। अब वे मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार हैं। 

अब डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट क्या है, इसे संक्षेप में देखिए। यह एक्ट, 2004 में आयी भयंकर सुनामी के कारण राहत कार्यो में कोई बाधा न हो, इसलिए वर्ष 2005 में यूपीए सरकार के समय संसद द्वारा पारित किया गया। 24 मार्च 2020 को पहली बार यह एक्ट देश मे कोरोना महामारी के समय, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉर्टी द्वारा लागू किया गया। इसका उद्देश्य, महामारी से निपटने में सभी विभागों और लोगो की वैधानिक सहायता लेना है। यह एक्ट जिला मैजिस्ट्रेट को दवा, ऑक्सीजन और अन्य हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के संबंध में जिला मैजिस्ट्रेट को अतिरिक्त शक्तियां देता है जिससे महामारी का मुकाबला किया जा सके। केंद्रीय गृह सचिव इस अथॉर्टी एनडीएमए के चेयरमैन होते हैं और यह एक्ट पूरे भारत मे 30 जून तक लागू है।

उक्त नोटिस के अनुसार,
" 28 मई को कलाईकुंडा में पीएम द्वारा एक मीटिंग आयोजित की गयी थी। उस मीटिंग में मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को भी बुलाया गया था। पीएम और उनके दल के लोगो ने 15 मिनट तक के लिये मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की प्रतीक्षा की। थोड़ी देर बाद मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव दोनो आये और थोड़ी देर बाद चले गए। यह कृत्य डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट धारा 51 (b)  के अंतर्गत कदाचार में आता है।" 

कानूनी जानकारों का कहना है कि, इस नोटिस में यह साबित करना होगा कि, दोषी अधिकारी बिना किसी उचित काऱण और वैधानिक आधार के जानबूझकर कर उक्त मीटिंग से अनुपस्थित रहा। केंद्र सरकार यह साबित नही कर पायेगी क्योंकि, मुख्य सचिव तो मुख्यमंत्री के साथ ही हैं। वे मुख्यमंत्री के साथ प्रधानमंत्री के सामने गए भी। ममता बनर्जी ने जो पत्र लिखा है उसमें उन्होंने यह कहा है कि वे पीएम से पूछ कर ही मीटिंग से बाहर मुख्य सचिव के साथ अगले दौरे के लिये गयी थीं। यही बात उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में भी कही है। यही बात कोलकाता के अखबारों ने छापा भी है।

अब अलपन बंदोपाध्याय इस नोटिस का क्या जवाब देते हैं यह तो उनके जवाब के बाद ही पता लग सकता है। पर मुख्य सचिव के एक एक मीटिंग का मिनिट्स रहता है। हर समीक्षा की डिटेल रहती है।  जिस मुख्य सचिव को, उनके कोविड से जुड़े काम को देखते हुए केंद्र सरकार ने 31 अगस्त तक का सेवा विस्तार देती है वही सरकार एक मीटिंग में जिंसमे वे मुख्यमंत्री के साथ गए भी हैं, इस आधार पर उन्हें नोटिस जारी करती है कि, उन्होंने महामारी के संदर्भ में जानबूझकर लापरवाही बरती है।

पर केंद्र सरकार को यूपी में महामारी की भयावह दुरवस्था, गंगा में बहते शव, रेत में दफन मुर्दे, उनके कफ़न घसीटते लोग, ऑक्सीजन की कमी से तड़प तड़प कर मरते लोग, घर की जमापूंजी बेच कर निजी अस्पतालों में अपना सब कुछ गंवा कर मृतक मरीज लेकर लौटते लोग, चुनाव के दौरान सैकड़ो मरे हुए शिक्षक और कर्मचारी नहीं दिखते हैं क्योंकि यहां वही दल सत्ता में है जो केंद्र में है। पर बंगाल के मुख्य सचिव ज़रूर दिख गए जो मीटिंग में गए भी थे और मुख्यमंत्री के साथ ही थे। अजीब वक़्त है, और अजीब सरकार भी, न इलाज मयस्सर है, न कफ़न दफन, न सम्मान से अंतिम संस्कार और अफसर चाहे जितना भी सीनियर हो वह चैन से रिटायर भी नहीँ हो पा रहा है।

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 1 June 2021

पाकिस्तान का इतिहास - अध्याय - 47.


इमरान खान एक भी सीट नहीं जीत सके। 1997 के उनके पहले चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि पाकिस्तानी राजनीति में वह कोई हैसियत नहीं रखते। सीमा के दूसरी तरफ़ भारत की राजनीति ज़रूर करवटें ले रही थी। 

1996 में पहली बार एक हिन्दूवादी दक्षिणपंथी कही जाने वाली भाजपा केंद्र में आयी। हालांकि वह तेरह दिन ही टिक सकी, मगर अब वह मुख्यधारा में मज़बूती से खड़ी थी। कांग्रेस उनके समक्ष कुछ कमजोर दिख रही थी। यह लगने लगा था कि अगले चुनाव में भी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनेगी। भारत में ऐसी सरकार का आना पाकिस्तानी सियासत के लिए अच्छा भी था कि धर्म के नाम पर एकता बनी रहेगी, और बुरा था कि दोनों ही देशों पर शक्ति-प्रदर्शन का दबाव होगा। 

उनके पड़ोस अफ़ग़ानिस्तान में अलग ही गदर मचा था। पहले मुजाहिद्दीन सोवियत से लड़ रहे थे। उनके जाने के बाद आपस में लड़ रहे थे। 

मेरे एक पड़ोसी उसी दौरान अफ़ग़ानिस्तान से शरणार्थी बन कर नॉर्वे आए थे। उनके घर मैंने दीवाल पर एक बड़ी तस्वीर देखी। तस्वीर चित्र की तरह उकेरी थी तो पहचान में बस यही आ रहा था कि कोई दाढ़ी वाले कबीलाई नेता हैं। मैंने स्मरण से अंदाज़ा लगाने की कोशिश की। वह मशहूर मुजाहिद्दीन नेता गुलबुद्दीन हिकमतयार तो नहीं थे, जो उस दौरान अफ़ग़ानिस्तान के अधिकांश इलाकों पर राज करते थे। न ही वह वहाँ के सोवियत समर्थित पूर्व राष्ट्राध्यक्ष नजीबुल्लाह थे। न ही वह ईरान समर्थित पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी थे। मैंने थक-हार कर पूछ लिया है कि यह महाशय कौन हैं? 

उन्होंने चौंक कर कहा कि इनको नहीं जानते? यह अहमद शाह मसूद हैं!

अहमद शाह मसूद पक्के अफ़ग़ानी व्यक्ति थे, और उत्तर अफ़ग़ानिस्तान में उनकी ठीक-ठाक चलती थी। वह सरकार का भी हिस्सा रहे। लेकिन अफ़ग़ानिस्तान एक गृह-युद्ध से गुजर रहा था, और मुजाहिद्दीन गुटों में कड़ा संघर्ष चल रहा था। अंदाज़न पचास हज़ार से अधिक अफ़ग़ानी इस गृहयुद्ध में ही मारे गए। इतने ज़ुल्म तो सोवियत ने नहीं किए।

 ( पूर्व राष्ट्रपति नज़ीबुल्लाह को लटका कर जश्न मनाते तालिबान )

इस मध्य पाकिस्तान के ISI और अरब अमीरों के मदद से एक और शक्ति मजबूत हो रही थी। मुल्ला उमर नामक एक सुन्नी जिहादी धर्मगुरु, जिन्होंने अपनी एक आँख युद्ध में खो दी थी, युवाओं के आदर्श बन कर उभर रहे थे। उनके और उनके जैसे अन्य लोगों के शिष्य ‘तालिबान’ कहला रहे थे। जैसे सिख शब्द शिष्य से जन्मा है, उसी तरह तालिबान शब्द भी शिष्य या छात्र के लिए पश्तो शब्द है। हालांकि तालिबान एक कट्टर इस्लामी संगठन बनता जा रहा था, जो पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर पल रहा था। मैं यहाँ अमरीका की भूमिका पर नहीं लिख रहा, लेकिन कालांतर में यह बात सिद्ध हुई कि उन्हें अमरीका का सहयोग हासिल था।

कुछ हद तक अफ़ग़ानी जनता भी तालिबान के साथ थी। वे मुजाहिद्दीनों से तंग आ गए थे। अब कोई भी उनसे बेहतर ही था। तालिबानों ने पहले दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा किया, और फिर काबुल तक पहुँच गए। बुरहानुद्दीन रब्बानी और गुलबुद्दीन हिकमतयार ईरान भाग गए। नज़ीबुल्लाह काबुल के संयुक्त राष्ट्र भवन में जाकर छुप गए। तालिबानों ने सितंबर, 1996 में उन्हें वहाँ से खींच कर निकाला। उनके गले में फंदा डाल कर एक ट्रक के पीछे लटका दिया, और पूरे काबुल की सड़कों पर घुमाया। यह इतना ख़ौफ़नाक मंजर था कि एकबारगी नवाज़ शरीफ़ और पाकिस्तानी सेना भी हिल गयी कि कहीं उन्हें भी ये तबाह न कर दें। 

पाकिस्तान उस इलाके के सबसे गरीब देशों में था, लेकिन पाकिस्तान के पास ऐसी संपत्ति थी जो किसी और देश के पास नहीं थी। यह अब तक वह छुपा कर बैठे थे, क्योंकि दुनिया के सामने लाने की हिम्मत नहीं थी। अमरीका ने नकेल कस रखी थी। 

मार्च 1998 में भारत में वाजपेयी सरकार बनी, और मई के महीने में पोखरन में धमाका हुआ। दो हफ़्ते बाद ही पाकिस्तान के बलूच प्रांत में भी एक धमाका हुआ। 
(क्रमशः)

प्रवीण झा
© Praveen Jha 

पाकिस्तान का इतिहास - अध्याय - 46. 
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मुख्य सचिव को नोटिस और डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट की धारा 51 (b) / विजय शंकर सिंह

एक अच्छा प्रशासक और सरकार कभी भी द्वेषभाव से काम नही करती है। वह अपना एजेंडा, अपने वादे और अपनी मुख्य विचारधारा के साथ टिकी तो रहती है पर प्रशासन में वह नियम कानूनो की शुचिता को बनाये रखती है और उसका प्रशासनिक निर्णय द्वेष रहित ही होता है। पर लगता है केंद्र सरकार का स्थायी भाव ही द्वेष भाव है। सरकार ने अब अलपन बंदोपाध्याय को धारा 51 डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के अंतर्गत एक नोटिस जारी किया है। जिसमे एक साल की सज़ा का प्राविधान है। इस धारा के अंतर्गत, केंद्रीय सरकार के आदेश न मानने या उसमे बाधा पहुंचाने पर दंड का प्राविधान है।

अलपन बंदोपाध्याय से तीन दिन में ही यह लिखित रूप से बताने के लिये कहा गया है कि, क्यों न धारा 51 (b), डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के अंतर्गत उनके खिलाफ कार्यवाही की जाय ?

यह नोटिस उनके रिटायर होने के कुछ ही घन्टे पहले उन्हें दी गयी है। उन्होंने अपना सेवा विस्तार, जो उन्हें 31 अगस्त तक केंद्र सरकार के ही आदेश से मिला था, लेने से मना कर दिया और 31 मई 2021 को ही अपनी अधिवर्षता की आयु पूरी कर के रिटायर हो गए। अब वे मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार हैं। डीओपीटी की यह अजीबोगरीब कार्यवाही देखिए, कि उनके रिटायरमेंट के ही दिन उनका वे केंद्र में तबादला कर रहे हैं। जिसे अलपन ने नही माना और उसी दिन वे रिटायर हो गए। 

अब डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट क्या है, इसे संक्षेप में देखिए। यह एक्ट, 2004 में आयी भयंकर सुनामी के कारण राहत कार्यो में कोई बाधा न हो, इसलिए वर्ष 2005 में यूपीए सरकार के समय संसद द्वारा पारित किया गया है। 24 मार्च 2020 को पहली बार यह एक्ट देश मे कोरोना महामारी के समय, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉर्टी द्वारा लागू किया गया। इसका उद्देश्य, महामारी से निपटने में सभी विभागों और लोगो की वैधानिक सहायता लेना है। यह एक्ट जिला मैजिस्ट्रेट को दवा, ऑक्सीजन और अन्य हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के संबंध में कोई बाधा न हो, इसलिए राजकार्य की सुगमता के लिये, अतिरिक्त शक्तियां देता है जिससे महामारी का मुकाबला किया जा सके। केंद्रीय गृह सचिव इस अथॉर्टी ( एनडीएमए ) के पदेन चेयरमैन होते हैं और यह एक्ट पूरे भारत मे 30 जून 2021 तक लागू है।

आईएएस अफसरों के कैडर नियंत्रण और अन्य कार्यो का निष्पादन डीओपीटी ( डिपार्टमेंट ऑफ कार्मिक एंड ट्रेनिंग ) करता है पर यह नोटिस डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के अंतर्गत जारी किया गया है जिसे गृह मंत्रालय देखता है।

नोटिस में कहा गया है कि चूंकि प्रधानमंत्री जो, एनडीएमए के अध्यक्ष है और वे यास तूफान के संदर्भ में उसकी समीक्षा करने गए थे, तो उस अवसर पर मीटिंग से अनुपस्थित रहना, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट की धारा 51 का उल्लंघन है। यही दोष केंद सरकार अलपन बंदोपाध्याय का बता रही है।

नोटिस के अनुसार,
" 28 मई को कलाईकुंडा में पीएम द्वारा एक मीटिंग आयोजित की गयी थी। उस मीटिंग में मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को भी बुलाया गया था। पीएम और उनके दल के लोगो ने 15 मिनट तक के लिये मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की प्रतीक्षा की। थोड़ी देर बाद मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव दोनो आये और कुछ देर बाद ही चले गए। यह कृत्य डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट धारा 51 (b)  के अंतर्गत कदाचार में आता है।" 

कानूनी जानकारों का कहना है कि, इस नोटिस में, सरकार को यह साबित करना होगा कि,
" दोषी अधिकारी बिना किसी उचित काऱण और वैधानिक आधार के जानबूझकर कर उक्त मीटिंग से अनुपस्थित रहा। "
केंद्र सरकार यह साबित नही कर पायेगी क्योंकि, मुख्य सचिव तो मुख्यमंत्री के साथ ही थे। वे मुख्यमंत्री के साथ प्रधानमंत्री के सामने, उक्त मीटिंग में गए भी। ममता बनर्जी ने जो पत्र प्रधानमंत्री को लिखा है उसमें उन्होंने यह कहा है कि वे पीएम से पूछ कर ही मीटिंग से बाहर मुख्य सचिव के साथ अगले दौरे के लिये गयी थीं। यही बात उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में भी कही है। यही बात कोलकाता के अखबारों ने छापा भी है।

अब अलपन बंदोपाध्याय इस नोटिस का क्या जवाब देते हैं यह तो उनके जवाब के बाद ही पता लगेगा। पर मुख्य सचिव की एक एक मीटिंग का मिनिट्स रहता है। उनका मिनिट दर मिनिट इंगेजमेंट फाइल पर रहता है। उनके द्वारा की गयी,  हर समीक्षा की डिटेल फाइल पर रहती है।  जिस मुख्य सचिव को, उनके कोविड से जुड़े काम को सराहनीय पाते हुए, हुए केंद्र सरकार ने, राज्य सरकार की सिफारिश पर, 31 अगस्त 2021, तक का सेवा विस्तार देती है, वही केंद्रीय सरकार एक मीटिंग में जिंसमे वे मुख्यमंत्री के साथ गए भी हैं, उन्हें, इस आधार पर नोटिस जारी कर देती है कि, उन्होंने महामारी के संदर्भ में जानबूझकर लापरवाही बरती और मीटिंग में उपस्थित नहीं हुए। 

पर केंद्र सरकार को यूपी में महामारी की भयावह दुरवस्था, गंगा में बहते शव, रेत में दफन मुर्दे, उनके कफ़न घसीटते लोग, ऑक्सीजन की कमी से तड़प तड़प कर मरते बीमार नागरिक, घर की जमापूंजी बेच कर निजी अस्पतालों में अपना सब कुछ गंवा कर मरीज का शव लेकर लौटते लोग, चुनाव के दौरान सैकड़ो मरे हुए शिक्षक और कर्मचारी नहीं दिखते हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में भी वही दल सत्ता में है जो केंद्र में है। पर एक विपक्षी दल द्वारा शासित पाश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय, ज़रूर दिख गए जो मीटिंग में गए भी थे और मुख्यमंत्री के साथ ही थे। 

अजीब वक़्त है, और अजीब सरकार भी, न इलाज मयस्सर है, न कफ़न दफन, न सम्मान से अंतिम संस्कार और अफसर चाहे जितना भी सीनियर हो वह चैन से रिटायर भी नहीँ हो पा रहा है।

( विजय शंकर सिंह )