Monday, 28 December 2020

शब्दवेध (48) सभी द्रव पानी हैं

जब रंग, प्रकाश और आग पानी हो सकते है तो सभी द्रव पानी हों, यहाँ तक कि सभी आर्द्र पदार्थ पानी हों, इसमें हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए।   परेशानी यह सोच कर होती है कि  भाषा का काम है फर्क करना-  विष और अमृत दोनों को पानी तो नहीं कहा जा सकता।  

यह सही है  कि  विशेष शब्दों को  इनके लिए रूढ़ कर दिया गया, परंतु उसके बाद इनका प्रयोग पानी के लिए तो नहीं होना चाहिए था।  ऐसा है,  पर क्यों है,  इसे समझना, भाषा की कुछ बुनियादी समस्याओं को समझने जैसा है। यह  वाक् (language), व्यावहारिक भाषा या जबान (vernacular), तकनीकी भाषा (jargon), वाणी (ideolect) के जटिल संबंधों की समस्या है। यह, सच कहें तो, भाषा की समस्या न हो कर पारस्परिक संपर्क में आने वाले समुदायों की समस्या है जो एक  ही भाषा नहीं बोलते फिर भी आर्थिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक कारणों से न्यूनाधिक जुड़े रहते हैं और जहाँ एक ही भाषा बोलते दिखाई देते हैं वहाँ भी सामाजिक हैसियत, आर्थिक औकात, पेशे, रुचि यहाँ  तक कि वय और लैंगिकता के आधार पर अलग अलग भाषाएं बोलते हैं 

इस लिए बहुत सारे परिवर्तन उनके अपने दायरे में होते हैं जिनसे शेष समाज अछूता रह जाता है। इनमें कुछ, जिनमें जान होती है, धीरे धीरे छन कर, सभी स्तरों तक पहुँचते और स्वीकार कर लिए जाते है परंतु यह यात्रा  अधूरी रह जाती है।  इसका उल्लेख मात्र यह स्पष्ट करने के लिए किया कि साहित्यिक भाषा, यहाँ तक कि संस्कृत जैसी नियंत्रित और निखोट मान ली जाने वाली भाषा तक में रूपावली से ले कर लिंग आदि  के अनियमित प्रयोग क्यों होते रहे, इसे भी इस तर्क से ही समझा जा सकता है। हम इस जटिल विषय की पड़ताल में नहीं जाएँगे। हमारा उद्देश्य केवल इतने से सिद्ध हो जाता है कि अनियमितताओं का भी अपना तर्क होता है।

पानी के कितने पर्याय हो सकते हैं  इसकी गणना असंभव है।  भाषा कहती है, ‘मैं मनुष्यों आवेगो और विचारों से   भर देती है, मेरा प्रवेश धरती और आकाश सभी में  है - अहं जनाय समदं कृणोमि अहं द्यावापृथिवी आ विवेश और  ‘मेरी उत्पत्ति जल से है’ - मम योनिः अप्सु अन्तः समुद्रे। समस्त नाम,  जल के नाम।    परंतु द्रव पदार्थों की गणना संभव है  और समस्या यहां भेद  और अभेद की है।  विशिष्ट कार्यों और वस्तुओं में रूढ  हो जाने के बाद भी उन शब्दों के जल वाचक बने रहने में है।

नून  का प्रयोग लवण  के लिए होने के बाद जल के लिए या किसी ऐसे भाव और विचार जिससे जल की याद आए, इसका प्रयोग नहीं होना चाहिए. परंतु होता है जैसे नमक के लिए राम रस का प्रयोग होता है। देवरिया जिले में एक स्थान का नाम नूनखार है- अर्थात् वह स्थान जहाँ का पानी खारा है।  दूसरे भी कई शब्द है जिनमें नून  का भाव पानी  में बचा रह गया है ।                                                                        

घी  <> घृत - 
ऋग्वेद में सामान्यतः घी के लिए घृत का प्रयोग  देखने में आता है.  परंतु साथ ही  जल के लिए इसका प्रयोग होता है। इस दुहरे प्रयोग का ध्यान रखते हुए  धातुकारों ने  ‘घृ’  का अर्थ किया  (क्षरण) वह जो छलकता है,  बहता है। पश्चिमी अनुवादक नियमित रूप से ‘घी’ ही करते हैं जिसे (अव स्मयन्त विद्युतः पृथिव्यां यदी घृतं मरुतः प्रुष्णुवन्ति ।। 1.168.8 के अनुवाद में देखा जा सकता है। कृषि के अनुरूप  वर्षा का  बहुत मार्मिक चित्रण किया गया है,  जब मरुद्गण धरती को  सिंचित कर रहे हैं, बिजलियां धरती की ओर नीचे देखती हुई हँस रही हैं।  ग्रिफिथ महोदय का अनुवाद है: the lightnings laugh upon the earth beneath them, what time the Maruts scatter forth their fatness, शब्द अनुवाद में कोई चूक नहीं,  कोई यह नहीं कह सकता कि उसे वैदिक भाषा नहीं आती, संदर्भ की चिंता नहीं,   इससे यदि अनुवाद में अटपटी लगती है तो यही उनका उद्देश्य था, परंतु साथ  ही यह भी स्वीकार करना होगा सायण के अनुवाद की कमियों को पहचानते हुए अनेक स्थलों पर उन्होंने अधिक सही अनुवाद किया है।

तेल
तेल के विषय में एक बहुत गलत धारणा पाई जाती है कि यह पहले  तिल से निकाला गया इसलिए इसे तेल की संज्ञा मिली ।  ज्ञानमंडल के कोश में इसका अर्थ दिया गया है बीज, वनस्पतियों आदि से निकलने या विशेष उपाय द्वारा निकाला जाने वाला तरल पदार्थ इसलिए उसमें  तैल  का अर्थ   आ गया है  तिल को पेर कर निकाला हुआ तेल। यह अर्थ गलत है क्योंकि तिल का अर्थ ही था, जल।  ल-कार प्रियता के कारण  तिर का तिल हो गया, और नम भूमि के लिए तिल्विल (तिलु नम + इल - धरती - तिल्विल) = सिंचित भूमि।  भद्रे क्षेत्रे निमिता तिल्विले वा … 5-62-7 में  स्थूणायूपयष्टिरवस्थित  -जिससे खूँटी-खूँट् निकाले जा चुके हैं ऐसे सुथरे नम खेत में। 
 
हम भी बचपन में  बरसात के बाद पानी में डूबे हुए भाग से पानी हटने के बाद जमीन के नीचे से जगह-जगह पानी ऊपर निकलता था  उसे  तेलगगरा कहते थे।  नदी के या पानी के पास  की  कतिपय बस्तियों के नाम  तिल से आरंभ होते हैं जैसे तिलसर।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


Ghalib - Karte kis munh se ho gurabat kii shikayat / करते किस मुंह से हो गुरबत की शिकायत / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 117.
करते किस मुंह से हो, गुरबत की शिकायत ग़ालिब, 
तुम को बे-महरीये याराने वतन याद नहीं !! 

Karte kis munh se ho, gurbat kii shikayat Ghalib
Tum ko be-mahriiye yaraane watan yaad nahin !!
- Ghalib 

तुम किस मुंह से विदेशियों की शिकायत करते हो, क्या तुम्हें अपने देशवासियों की निष्ठुरता याद नहीं है। 

ग़ालिब परदेस में है। तब परदेश का अर्थ भारत के बाहर नहीं बल्कि अपने शहर, के बाहर जाने, को भी परदेस ही कहते थे। जब कोई उनसे कहता है कि परदेस में लोगों ने उनके साथ निष्ठुरता की तो वे अपने ही देस, शहर, गांव के लोगों की उपेक्षा और निष्ठुरता की याद दिलाते हैं। वे कहते हैं कि इन्ही निष्ठुरता और उपेक्षा के कारण ही उन्हें तो देश छोड़ना पड़ा। यदि देशवासियों या अपने वतन के ही लोगों ने अपनापन जताते हुए कोई उचित कामकाज और आश्रय प्रदान कर दिया होता, तब दर - दर की खाक छानने की क्या ज़रूरत ही क्या थी। अपनो की बेदर्दी और उपेक्षा ने ही तो, घर, शहर छोड़ने को बाध्य किया है। परदेस में तो वहां के लोगों ने अपनी उदारता दिखाकर, अपने यहां शरण और अवसर दिया, यह बात तो किसी को भूलनी नहीं चाहिए । कम-से-कम इस बात के लिए तो हम सबको उनका ( परदेस वालों का ) ऋणी होना चाहिए। यदि परदेस में किसी ने कोई अशोभनीय और अनुचित बर्ताव कर भी दिया, तो उनकी अन्य कृपा और सहायता को देखते हुए उनसे किसी प्रकार की गंभीर शिकायत तो नहीं ही होनी चाहिए। ऐसी किसी शिकायत से पहले अपने देशवासियों की निष्ठुरता और उपेक्षा को ध्यान में रखना चाहिए, जिन्होंने देस छोड़ने और परदेस की शरण लेने को विवश कर दिया है। 

( विजय शंकर सिंह )

Sunday, 27 December 2020

शब्दवेध (47) रंगों के लिए है शब्द ?

रंगों के लिये शब्द है तो, पर नहीं भी है, क्योंकि रंगों के इतने भेद हैं कि सभी के लिए सही संज्ञा का प्रयोग किया जाए तो एक अलग कोश बन जाए, इसलिए अपनी मुश्किल को आसान बनाने के लिए मनुष्य विविध रंगीन वस्तुओ और फूलों के नाम जोड़ कर बहुत प्राचीन काल से रंगो के लिए संज्ञाएँ गढ़ता आया है - रुपहला, सुनहला, तामई, लोहित, मटमैला, धूमिल, केसरी,  गेरुआ,  हल्दिया (हरित/हारिद्र),  गुलाबी, धानी (+ रंग) और ऐसे सभी नामों के विषय में यह कहा जा सकता है कि ये जल की ध्वनि पर आधारित नही हैं।   

परंतु जिनके रंग को संज्ञा बनाया गया है उनसे स्वयं भी  कोई ध्वनि पैदा नहीं होती।  हमारे सुझाए गए नियम के अनुसार वे अपनी संज्ञा  के लिए जल की  किसी ध्वनि पर आधारित होने को बाध्य है।  गुलाब (गुल + आब) का नाम तो ऐसा कि हम इसे पानी का फूल कह सकते हैं।  धान, धन, (धान्य, धन्य),  तन (तने - धनाय, सा.)  का पानी से क्या संबंध है इसे इसी बात से समझा जा सकता है जल को धनों का धन ( धनंधनम्), और वृष्टिदाता इन्द्र को महाधन कहा गया है। आप-जल >अप्न धन। 

अनाजों में धान धन का पर्याय इसलिए हो गया कि देवों ने धान की खेती से कृषि आरंभ की थी। पलाश - पत्तों वाला, के आदि में आया पल>प्ल, अं. पूल (pool) जलवाची है। उसे यह संज्ञा संभवतः उसकी पत्तियों की उपयोगिता समझ में आने के बाद मिली। पर रंग के लिए पलाश का प्रयोग नहीं होता। उसके फूल का अलग नाम टेसू है, पर अभी इससे मिलता-जुलता जलवाची नाम नहीं सूझ रहा। धातुओं में सभी का नाम जलपरक है। 

सभी धातुओं में चमक होती है, सभी एक निश्चित तापमान पर पिघल कर पानी हो सकती हैं, कारण कुछ भी हो पर अर्थ, द्रव, सु-अर्ण, रज-त, लहू-लोह, तम - पानी, >तामा/ताँबा/ताम्र, कन्-पानी+चन-पानी=कंचन, काच, कांस्य, रंगों के लिए जो पुराने नाम :  नीर-जल >नील> नीड(नेस्ट) छाया;   पीतु-जल> पीत>पीतल, पीला,  अर/अरु-जल >अरुण, अरुष; सर/हर/सरि/हरि- जल, नदी > हरा,  हरित (पीला, हरा, भूरा); बभ्रु वर्ण के विकास के कई चरण हैं - पूः >पूर/पुर/प्रू (आपप्रुषी)> पूर्ण के समानान्तर महाप्राण प्रेमी बोलियाें में फुर> फुल्ल, full/ fill, फ्रू >fruit, भर/भुर/भूरि,भ्र, भृशं,आदि।  इसी क्रम में भ्रूभ्रू> बभ्रु का और इसके अधिक पुराने रूप से भूरा का नामकरण हुआ लगता है। काला, कृष्ण पर हम पहले चर्चा कर आए हैं।   
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प्रकाश के लिए शब्द
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पाणिनि  के धातु पाठ की  कुछ  धातुएँ हमारे  लिए बहुत उपयोगी हैं, ‘चंचु गत्यर्थाः, 190. ३००, चक तृप्तौ, 783. ३०१, चक तृप्तौ प्रतिघाते च, 93. ३०२, चकाशृ दीप्तौ, 1074.   इसका बोलियों के अनुरूप पाठ करें ताे इसमें चंचल के लिए चंचु, छक कर खाने पीने के लिए चक, छकने,  छकाने और छक्का छुड़ाने के लिए एक अलग चक की और  देखने (चक्षु/ चक्षण), चकराने, चकित होने के लिए एक अन्य चक धातु की कल्पना की गई है जो  वर्णविपर्यय के कच>कश>काच/काश का रूप ले सकती थी। 

उनकी समस्या लिखित या मानक भाषा में उपलब्ध समान मूल और अर्थ वाले घटकों का निर्धारण था। ध्वनियों की स्वायत्तता की ओर उनका ध्यान गया ही न था।  हमारे लिए अंतिम सूत्र का महत्व यह है कि काश का अर्थ वही है जो प्र- उपसर्ग के बिना समझ में न आता, पर पहले व्यवहार में था, यह ला.   cos-metic और cos-mos, सजावट और जगमगाहट से प्रकट है ।   मूल कस/ करस > कर्स जलवाची पद के पीछे वही तर्क था जो सरकर, सरकना, शर्करा, अं.शर्क (shirk) के पीछे ।  इससे बोलियों का कसना, कसौटी, कसक फा. कश -*जल> कश्ती, कशमकश, कशिश, कोशिश, कशीदा आदि व्युत्पन्न हैं। करस >कर्ष> कष (निकष), कृशानु>कृष >कृष्ण का रूप लेता है।  कश/ काश जलर्थक से प्रकाश का रूप लेता है, पर यह हैरान करने वाली बात है कि उपसर्ग के बिना अनेक शब्दों का प्रयोग ही नहीं होता (भा, वदन्ती, तीक आदि भी इन्हीं में आते हैं)। 
  
भा 
वर्गीय ध्वनियों  में अंतर प्राय: अर्थभेदक नहीं है।इसका कारण यह है  कि आरंभ में एक ही शब्द को अलग-अलग बोलियों के लोग  पारस्परिक संपर्क में आने के बाद प्रायः अपनी सीमा में सुनते और बोलते थे, यह हम पहले भी कह आए हैं। लंबे समय के बाद जब दूसरों की ध्वनियों को अधिक सटीक रूप में बोलने का अभ्यास उन्हें हो गया और उनकी ध्वनि माला विस्तृत हो गई तो उसके बाद जो शब्द  गढ़े गए  उनमें अर्थ भेदकता दिखाई देती ।  इसलिए सघोष महाप्राण ध्वनियों वाले शब्दों का  अघोष अल्पप्राण  प्रतिरूप मिलता है तो वह अलग शब्द नहीं है,  एक अलग बोली बोलने वालों के द्वारा उच्चरित वही शब्द है।

जो बात भा, भी, भू से स्पष्ट नहीं होती  वह पा, पी पू से  समझ में आ सकती है। पा - पानी, पाला - तुहिन, त. पाल्, ते. पालु - दूध, हिं. पालन, पालि, पालना; त. पार्- देख, भो. कान पारना [1], पावस-बरसात, भो, पलानी - छानी/छप्पर, झोंपड़ी। अब हम भा- *पानी, > भाप, भो. भास- दलदल, भासना- दलदल में धँसना, भाँति- प्रतिबिंब, प्रतिरूप, भा- प्रकाश, भानु- सूर्य, भान प्रतीति, (आ-/प्र-/स- भा), भाषा आदि पर दृष्टिपात कर सकते हैं।

ज्योति
जोति/ जोत[2], ज्योति में विशेष अंतर नहीं है। जोत और जोति अधिक नियमित और अधिक पुराने हैं। जैस जूर्णि - लपट, जार, जरा, जराना - जिनकाे सं. ज्वाला ज्वलन  बना लेती है।  भो. पूर्वरूप ही जल, ज्वाला और ज्योति> की विकासरेखा को अधिक स्पष्ट करती है। भो. जूरल - उपलब्ध होना,(जो जुटना, जुड़ना, जोड़ना में कुछ धुँधला रह जाता। भो. जुड़ाइल - ठंढा होना, जूड़ी, जाड़ा इस शब्द समूह के जल से संबंध को प्रकट करता वहीं इसको जलाने, सुखाने, निर्जीव करने के लिए झूर, *झु/झू-आग, (झोंसल, झुँझलाइल, झुराइल) कौरवी प्रभाव में महाप्राणन खो कर जू, जरा, जार, जूर्णि बना। द्युति के प्रभाव में जोति ने ज्योति का रूप लिया।

द्युति
द्युति का कहानी भिन्न है। यह ती - जल से व्युत्पन्न है। ती, तर, तिर, तृ के जलवाची होने पर कोई संदेह नही। यह ते. तिय्यन - मीठा, भो. तेवना - भोजन को सुस्वाद बनाने के लिए कोई खाद्य या पेय में भी लक्ष्य किया जा सकता है। त. में तिकऴ़ - चमक, द्युति, तिट्टम् - सटीकता, समतलता; तिट्टि - खिड़की; ती - आग, ताप, बुराई । यह  ती, दी, धी, तेव (तेवर), देव और संस्कृतीकरण से द्यु, द्यौस, (>धौंस), (प्र)तीक, तिथि, टीक, टिकोरा, सटीक, टीका, ठीक, ठेका आदि की एक विशाल शब्दावली का जनन करता है और इसकी कुछ शब्दावली पूरे भारोपीय क्षेत्र में फैलती है, इस झमेले में न पड़ेंगे। य़हाँ तक कि यह भी तय करना नहीं चाहेंगे कि मूल तमिल का 'ती' है या भो. का 'धी', धिकवल - गर्म करना, पर यह याद दिला सकते हैे कि धिक्कार का मतलब ‘आग लगे’, ‘भाड़ में जा’ है।        

दूसरे सभी पर्यायों का भी यही हाल है।_
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[1] इसमें त. कान< कन/कण् और पार-देखना  का भो. में समावेश के बाद एक नया रूप, जिसका प्रयोग तो होता है पर बिंब नहीं उभर पाता।
[2] हम अपनी व्याख्या में उन मामलों में जिनमें यह निश्चित है कि कुरुक्षेत्र में आने वाले उन वस्तुओं/ संकल्पनाओं से अनभिज्ञ नहीं रहे होंगे भोजपुरी के पूर्व रूपों को  अधिक भरोसे का मानते हैं। जोति, जोन्ही, जोहल, जूरल, झुराइल, झूर, चान, अँजोर, अँजोरिया, अन्हरिया, उज्जर, उजियार उजास। जैसे ऋग्वेद के हवाले जहाँ सुलभ हुए वहाँ नाम लेकर इसलिए देते हैं कि वह प्राचीनतम कृति है और उसमें हमें लिखित शब्दों के प्राचीनतम ही नहीं अपितु कभी कभी संक्रमणकालीन रूप भी मिल जाते हैं, उसी तरह भो. का विशेष उल्लेख इसलिए महत्व रखता है कि भारोपीय का आद्य रूप उसी में संरक्षित है। भाषा के इतिहास की तलाश करने वाला इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )


शब्दवेध (46) अंधेरे के लिए शब्द नही


अंधकार
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अकेला यह शब्द है जिस पर कुछ भरोसा किया जा सकता था,   परंतु  यह भी अँधेरे के लिए रूढ़ है। इसका अर्थ अँधेरा नहीं होता। अंध/ अंधस का अर्थ है  रस,  सोमरस। ऋग्वेद में अंध शब्द का इस  आशय  में 24 बार प्रयोग हुआ है:
इन्द्रो यद्वृत्रमवधीत् नदीवृतं उब्जन् अर्णांसि जर्हृषाणो अन्धसा ।। 1.52.2 (इन्द्र ने अंधस् की मस्ती में आकर जलप्रवाह को अवरुद्ध करने वाले वृत्र का  वध  करके जल धाराओं को मुक्त किया 

सीदता बर्हि: उरु वो सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः ।। 1.85.6 ( मरुद्गण, आपके आसन के लिए चटाई बिछा दी गई है आप उस पर विराजमान हों और सोमरस के पान से मस्त हों।)

पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम् ।  इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे  ।  1.135.4 
(सोमपान पर तुम्हारा प्रथम अधिकार है, वृष्टिकारी इन्द्र तुझे हम अपने आसवित सोम के पान के लिए बुला रहे हैं) , आदि।

परंतु ऐसा नहीं है कि  उस समय अंधे को अंधा नहीं कहा जाता रहा हो।  आपसी सहयोग से अंधे और लंगड़े के  पहाड़ पार करने की कहानी,  जिसे आपने बचपन में कई बार सुना और बच्चों को यदा-कदा सुनाया होगा, वह ऋग्वेद के समय में  भी सुनी सुनाई जाती थी, यह दूसरी बात है कि  इसे आपसी सूझ का परिणाम  न मान  कर देव कृपा से प्रेरित बताया जाता था: 
याभिः शचीभिः वृषणा परावृजं प्रान्धं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः । 1.112.8  जिस दूरदर्शिता से दूर देश में गए असहाय अंधे और लंगड़े को यात्रा में समर्थ बनाया था।'  

दो बार और दोहराया गया है।
नीचा सन्तमुदनयः परावृजं प्रान्धं श्रोणं श्रवयन् त्सास्युक्थ्यः ।। 2.13.12 
प्रान्धं श्रोणं च तारिषद्विवक्षसे ।।10.25.11
 
अश्विनी कुमार अपनी चिकित्सा से अंधे की आँखों की रोशनी लौटा देते है, क्षीणकाय को हृष्टपुष्ट कर  देते हैं,टूटी हड्डी जोड़ सकते हैं (अन्धस्य चिन्नासत्या कृशस्य चिद्युवामिदाहुर्भिषजा रुतस्य चित्,  ऋ. 10.39.3)। वैदिक जन  मनाते हैं कि उनके शत्रुओं को  कुछ दिखाई न दे और उनकी अपनी रातें भी  जगमग रहें (अन्धेनामित्रास्तमसा सचन्तां सुज्योतिषः अक्तवः तान् अभि ष्युः, 10.89.15) अंधेरी से प्रकाश की ओर ले चलने की चिंता करने वाले अंधेरे  का अर्थ न जानते हों,  यह संभव है ही नहीं।  अंतर केवल यह कि उन्हें भूला नहीं है कि अंध का अर्थ  पानी हुआ करता था,  रस/सोमरस हो सकता है,  और अंधकार तो है ही।  

अंध  उसी  समूह में आता है जिसमें अत/ अद, इत/इद, उत/उद, अंत/अंद, इंत/ इंद, उंद, अंध, इंध, ऊध आदि। इन सबका एक अर्थ जल है, पर इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें अनेक से व्याकरणिक पद बने हैं। अत/ अतर -पानी, अतरौली, अतरौली, अतरौलिया - तटीय स्थान नाम (यद्यप् अलीगढ़ में स्थित अतरौली गंगा की वर्तमान धारा से काफी दूर है) अत/ आत- उसके आगे/बाद; अतः - इसलिए, अत/अद् -पीना/खाना,  अत्रि- खानेवाले, अद्य-खाद्य, अत्र (त्र< तर- 1.जल, 2. स्थान, 3. तुलनात्मक प्रत्यय (सं., फा. -तर, अं. अर), 4. स्थानवाचक - यहाँ,  और 5.   अन्द> अन्ध> अन्न), आदि- आरंभ, इत्यादि - इति-अंत+आदि= समस्त > आदि=इत्यादि), अंत - निकट, भीतर (अंतर/ अन्तः>अंदर)[1]।  

हम इसकी विस्तृत समीक्षा में नहीं जाएंगे क्योंकि यह  संस्कृत के विकास में जिस संक्रमण का सूचक है,  उस पर जितनी गंभीर चर्चा जरूरी है वह फेसबुक के मंच के संभव नहीं है जहां लोग मैत्री के आधार पर सहमति या मौन असहमति जताते हैं, कितनों ने धैर्यपूर्वक कई बार पढ़ कर साझा और ग्रहण किया यह पता नहीं चल पाता।

हम अंधकार के पर्याय बात करते हुए जिस तथ्य को रेखांकित करना चाहते हैं,  वह यह कि जल की किसी ध्वनि के  वाचिक अनुवाद से ही अंधकार को संज्ञा मिली। यहां  यह अवश्य स्मरण कराना चाहते हैं कि तमिल में  अंद का प्रयोग  स्थानवाची  विशेषण के लिए होता है जिसका बोलचाल में  'अ'-कार ही रह जाता है - अन्दम् ( अ-) - वह. इसे  अंतम, अंधम् कुछ भी पढ़ा जा सकता है।  इसलिए संस्कृत के अंधे के लिए  एक अलग शब्द ‘अन्धन् -चलता है।

रात/रात्रि
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रात के साथ रत, रत्न- चमकीले पत्थर, रातना - लाल होना,  रतनार - ललौंहा, रत्ती - गुंजा, (लाल रंग का एक छोटा सा फल जिसे इसी नाम के बाट के भार की समानता के कारण संज्ञा दी गई)  के साथ रख कर समझें। यह समझने में कठिनाई न होगी कि इस नामकरण का आधार अँधेरा नहीं अपितु रात के आसमान की जगमगाहट है। ऋग्वेद में रात की जगमगाहट का एक बहुत मनोरम चित्रण है- 

पितरों ने जैसे किसी काली घोड़ी को मोतियों से सजा दिया  हो 
(अभि श्यावं न कृशनेभिरश्वं नक्षत्रेभिः पितरो द्यामपिंशन् । ) 

रात के नामकरण के पीछे यही जगमगाहट है। परंतु हमारी समस्या तो रात को जलपरक सिद्ध करने की है।यह री- टपकना, बहना, उफनना  (रीयते) से संबंध रखता है जिसमें गति और प्रवाह भी आते हैं, रीति, रति, रा (राति- दान), रात समाहित हैं। 
अन्तरिक्षे पथिभि- ईयमानो न नि विशते कतमच्चनाहः । अपां सखा प्रथमजाः ऋतावा क्व स्विज्जातो कुत आबभूव, 10.168.3 
(वायुदेव अंतरिक्ष के मार्ग से प्रवाहित होते है, कभी एक दिन के लिए भी कहीं ठहरते नहीं हैं, जल के मित्र हैं, अपने व्रत से अडिग हैं, सर्व-प्रथम उत्पन्न हुए, वे कहां से पैदा हुए, किधर से आए?)[2]।

रजनी
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रजनी के विषय में किसी संदेह की आवश्यकता नहीं कि यह रज-जल, रज्जु (तुलना करें, रस>रश्मि>रसरी>रस्सी से), राज, रजत से और फिर रात की जगमगाहट की याद दिलाता है।  जब इस शब्द का अर्थ समझ में आ जाएगा, तब अं, ला, रायल और इनके लातिन पूर्वरूपों का भी अर्आथ समझ  में आ जाएगा।

नक्त 
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नक- जल (नक्र- जलचर), नक्श - नख-शिख, रूप, नक्शा, नक्षत्र, E. night, Ger. nacht, L. nox, G. nyx को एक साथ रखकर देखें, किसी व्याख्या की आवश्यकता न पड़ेगी। यहाँ तक कि यह समझ में आ जाने के बाद कि र और ल ही में अभेद नहीं है, न और ल में भी अभेद है, भाषा की कई पहेलियाँ सुलझ जाएँगी। तभी आप नाइट की जगमगाहट और लाइट, डिलाइट ब्लाइट और साइट के और  सं. नक्ष, लक्ष, लख, बिलख, लाक्षा (लाख) की आपसी कडी को समझ सकेंगे।

मसि
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मसि का अर्थ है स्याही - कालिमा युक्त।  इसका दूसरा नाम है रोशनाई, प्रकाशित करने वाली। हिंदी में जिसके लिए लिपि का प्रयोग होता है, उसके लिए एक और शब्द का प्रयोग होता था, ‘दिपि’’ - प्रदर्शित करने वाला। इसी तर्क से ऋग्वेद में लिखित वाणी को सूर्या या सू्र्य की दुहिता कहा गया, परंतु उसमें उलझने का यह सही स्थान नहीं है। ङाँ  यह याद दिलाने का सही समय तो है ही कि जब हम दाढी-मूँछ आने के लिए मसें भींगने का मुहावरा प्रयोग में लाते हैं, तो मस के साथ मास/माह<> मस/मह= चंद्रमा की याद रहती है या नहीं। मह, मघ, मेह, मेघ और जल के संबंधों को समझने के लिए  जाहिर है, कुछ अध्ययन जरूरी हो सकता है।  मह का अर्थ जल है और जब आप किसी को महान कहते हैं तो उसे जलवान अर्थात् द्रव्यवान भी कहते हैं, इसका आप को पता न रहा  हो तो अब हो जाना चाहिए।

डार्क (dark)/ ब्लैक (black)/ ग्लूम (gloom)
यदि हम अंधकार के अंग्रेजी पर्यायों पर विचार करें तो वहां पर  भी वही  तर्क लागू होता दिखाई देगा। सं. द्र>द्रु>द्रप्स > ड्रा (draw), ड्राप(drop),  ड्रिंक (drink), ड्राइव (drive), के बीच के संबंधों को समझने का प्रयत्न करें, ब्लीक (bleak) >< ब्लीच (bleech) , ब्लैक (black)<ब्लैंक (blank), फ्लो (flow)/ब्लो (blow, - ब्लॉट blot, को और ग्लूम (gloom) को ग्लो (glow), ब्लूम (bloom) को ब्लो (blow)/फ्लो (flow), सैड (sad) को सैट- (satisfaction) से मिलाकर  समझें तो पता चलेगा यह तर्क भारतीय बोलियों से आरंभ हो कर यूरोप तक काम करता रहा।  
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[1] यह भाषा के में एक बहुत निर्णायक मोड़ को दर्शाता है। पहले यहाँ के लिए ई का,  समीप और निम्न के ईं/इत/इंत/इत्र का बीच और ऊपर के लिए ऊ/ऊँ/ऊत्र और दूरस्थ के लिए अ/आ/आँत/अत्र का प्रयोग होता था। इसकी हल्का आभास ऋग्वेद से और द्रविड़ मानी जाने वाली बोली कुऱुख में मिलता है। सं. भी इससे पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई। ऋ. में ईं/ईम् - भो. ई, हिं इ(-स/-धर), कु. इतरम्- यहाँ में, सं. इतःततः> इतस्ततः के इतः में  में इसे लक्ष्य किया जा सकता है।  होना इसे भी इतःअतः चाहिए था, जैसा कु. के अतरम् में अं के अदर में मिलता है।  परंतु  इस संक्रमण के कारण  ‘ई’ का स्थान ‘अ’ ने ले लिया। अ का स्थान कुछ समय के लिए ई ने ग्रहण किया( फा. इंतहा, इन्तकाल) फिर ‘त’ ने (सं. तत, ततः, अं. दैट that, there) में देखा जा सकता है। इत्र-अत्र अब अत्र-तत्र हो गया। अंत का भो. अन्ते, हि. सं. अन्त में ‘अ’ की दूरता बनी रही। वैदिक अन्त- निकट, अन्तेवासी आदि में निकटता का सूचक बन गया। 
[2] इस ऋचा को नासदीय सूक्त के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

शौर्यगाथा - सर्वश्रेष्ठ स्नाइपर - फिनलैंड का सिमो हयहा.

क्या कोई एक फौजी इतना तगड़ा योद्धा हो सकता है की वो अपने देश की आर्मी से हज़ारों गुना ताकतवर आर्मी को अकेले रोक सकता हो ?
इसका जवाब है हाँ !

एक हुआ है, फ़िनलैंड का फौजी सिमो हयहा ! हयहा दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा स्नाइपर हुआ है। उस से ज्यादा दुश्मन फौजी अकेले किसी ने नहीं मारे। उसके अलावा कोई फौजी ऐसा नहीं है जिसने पूरा साल अपने से हज़ारों गुना ताकतवर फौज को अकेले रोके रखा हो !

हयहा एक बर्फीले इलाके में 1905 में पैदा हुआ बच्चा था, जोकि टीनएज आते आते एक बेहतरीन शिकारी बन चुका था। उसके गाँव में ठण्ड इतनी ज्यादा पड़ती थी की उसमे आप और मैं सर्वाइव भी नहीं कर सकते हैं। एक छोटा सा घाव आपकी ज़िन्दगी ले सकता है वहाँ !

सिमो हयहा एक छोटी बोल्ट एक्शन राइफल से शिकार किया करता था, जो कि उस समय तक ऑउटडेटेड भी हो चुका था और 1928 में उसकी मैन्युफैक्चरिंग भी बंद हो गयी थी !

फ़िनलैंड एक छोटा सा देश है, इसलिए बाकियों की तरह सिमो हयहा को भी जरूरी मिलिट्री ट्रेनिंग लेनी पड़ी, जोकि उसके जैसे योद्धा को फिनेस्स देने में सहायक हुई। वह रेगुलरली आर्मी में भी स्कीइंग और शूटिंग के कम्पटीशन जीतता रहता था। उसके निशाने इतने तगड़े थे की वो एक मिनट में अलग अलग जगह खड़े 16 लोगों को जहां चाहता वहाँ गोली मार के ढेर कर सकता था ! वह एक तगड़ा रेसर भी था और उसने आर्मी में एथलेटिक्स में भी मैडल लिए हुए थे। 

फिर आया नवम्बर 30 1939, जब दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकत सोवियत यूनियन ने फ़िनलैंड पर हमला बोल दिया ! सिमो हयहा एक गाँव का लड़का था जिसे वर्ल्ड पॉलिटिक्स वगैरह के बारे में कुछ ख़ास नहीं पता था ना उसे इंटरेस्ट था। ना उसे स्टालिन के बारे में कुछ ख़ास नॉलेज थी, और ना ही सोवियत यूनियन की ताकत का कुछ ख़ास अंदाज़ा था। उसे बस एक आउटडेटेड बन्दूक चलानी आती थी जिसमे निशाना लगाने के लिए ऊपर लेंस भी नहीं हुआ करता था, लेकिन उससे वह बहुत बहुत ही ज्यादा अच्छे तरीके से चला सकता था।

उसने कोला रीजन में 34 वीं इन्फैंट्री रेजिमेंट ज्वाइन कर ली, जहां पर,  सोवियत हमला करने वाले थे ! सोवियत की आठवीं आर्मी पूरे इलाके को रौंदते हुए आ रही थी। उनके पास एक से बेहतर एक फौजी था, स्नाइपर थे, फ़िनलैंड की सेना से कई गुना बड़ी आर्मी थी। लेकिन उनके पास सिमो हयहा नहीं था। 

पूरे इलाके में बर्फ थी और जंगल था,
और उस साल बर्फ भी तगड़ी गिरी हुई थी, लगभग 2 मीटर गहरी, और टेम्परेचर माइनस 30 डिग्री पहुंचा हुआ था। सिमो हयहा ने मांगकर अपनी फेवरेट बन्दूक Finnish Mosin Nagant M28 ली। उसके अफसरों ने कहा की ये बन्दूक कचरा है, और 11 साल से इसकी प्रोडक्शन तक बंद है, यह छोटी भी है और भारी भी, आजकल तो मॉडर्न स्नाइपर राइफल्स का ज़माना है, बिना लेंस के दूर का शिकार तुम्हे दिखेगा ही नहीं निशाना लगाने के लिए। 
लेकिन सिमो हयहा अड़ा रहा की उसे तो यही बन्दूक चाहिए, और अंत में उसे वो बन्दूक दे दी गयी !

सिमो हयहा एक नेचुरल शिकारी था, उसको पता था की इतनी ठण्ड में हाथ काँप सकते हैं इसलिए बन्दूक का वजन स्नाइपर के हक़ में काम करेगा ! यह ऐसा ही था जैसे क्रिकेट में भारी बैट, जिसे चलाना आता है उसके लिए वरदान है, जिसे नहीं आता वो जल्द गेंद को निक करके चलता बनेगा !

सोवियत के पास टैंक थे, आदमी बहुत ज्यादा थे, आर्टिलरी थी, जबकि फ़िनलैंड  के पास कुछ नहीं था, या अभी तक उन्हें पता नहीं चला था की उनके पास क्या है !

सोवियत आर्मी आगे बढे जा रही थी,
सिमो हयहा ने अपने आपको भारी सफ़ेद स्नो सूट में बाँध लिया था, और स्नाइपर मास्क पहन लिया था,
और बर्फ में छुपकर लेट गया था एक जगह पर। उसने अपने अफसरों को बोल दिया था की वो अकेले काम करता है, इसलिए उसके इलाके में किसी और को अभी तैनात ना करे, क्यूंकि हो सकता है वो भी उसकी गोली का शिकार हो जाएगा। 

अफसरों को लगा की यह पागल है ससुरा,सोवियत इसको पहले ही दिन मार गिराएंगे, लेकिन उसकी बात मान ली गयी, क्यूंकि एक तो वो लोकल था, दूसरा उसके निशानों पर लोगों को विश्वास था वो मिलिट्री में कई मैडल जीत चुका था। 

सिमो हयहा के अनुसार एक स्नाइपर के लिए सबसे जरूरी  चीज़ है पेशेंस,
जोकि अच्छे निशाने से भी ज्यादा जरूरी है। एक स्नाइपर को यह मान के चलना चाहिए कि, दिन रात कोई गोली उसका इंतज़ार कर रही है, किसी पेड़ पर, किसी गड्ढ़े में, किसी पत्थर के पीछे,
इसलिए उसे अपनी इंस्टिंक्ट और पेशेंस पर हमेशा कायम रहना चाहिए। 

सिमो हयहा अपने साथ एक दिन का खाना रखता था, और 50 से 60 राउंड गोलियां, ,लक्यूंकि वो अपनी मोबिलिटी के साथ कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं करना चाहता था और ना ही दुश्मन के लिए कोई सुराग छोड़ना चाहता था, कि यहां सिमो हयहा आया था ! जब वह किशोरावस्था में शिकार किया करता था तो उसने अपने स्पॉट्स पहचान कर तय कर रखे थे, जहां पर वो बर्फ का किला बनाता था,  ताकि जानवर को अंदाजा ही ना हो सके कि, यहां कोई बैठा भी हुआ है। 

वह एक कपडे में बर्फ लपेट कर अपने मुंह में डाल लेता था, ताकि उसकी सांस किसी को दिखाई ना दे। बर्फीले इलाकों में सांस दूर से ही नजर आ जाती है। वह जहां बन्दूक रखता था, वहाँ बर्फ को अच्छे से सख्त कर  लेता था, ताकि एक तो बन्दूक न हिले, और दूसरा बर्फ भी ना हिल पाए, क्यूंकि हिलती हुई बर्फ दीखते ही दूसरी तरफ का जानवर सतर्क हो जाएगा। इस मामले में दूसरी तरफ के स्नाइपर सतर्क हो जाते उसकी सांस और बर्फ के हिलने से। 

सिमो हयहा 150 मीटर तक की दूरी तक 1 मिनट में 16 लोगों को ढेर कर सकता था, और हुआ भी वही। सोवियत आये और सिमो हयहा ने एक पूरी यूनिट मार गिराई ! सोवियत फौजी  इस से पहले की बन्दूक से निशाना भी कर पाते उनका मुंह आसमान देख रहा होता था। 
खबर सोवियत आर्मी तक भी पहुंची और फ़िनलैंड आर्मी तक भी। फ़िनलैंड आर्मी के अफसरों को यकीन नहीं हुआ की सिमो हयहा ने पूरी यूनिट उड़ा दी है सोवियत की। लेकिन सोवियत फ़ौज़ियों ने लाशें देख ली थी और उन्हें पता चल गया था की आगे यमराज उनका इंतज़ार कर रहा है। 

इस प्रकार ऐसी ही रणनीति से, सिमो हयहा ने कई सोवियत पोजीशन की पहचान की, और सभी ठिकानों को  लाशों से भर दिया। कई लाशें तो बर्फ में खड़ी ही रहीं। इतनी ठंड थी कि, कुछ तो, हाथ पाँव में घाव की वजह से ही मर गए। लेकिन ऐसे बहुत कम थे। ज्यादातर सिमो हयहा की गोली से ही मरे। सैकड़ों सोवियत फौजी बर्फ में मरे पड़े थे, क्रिसमस से पहले वाले दिन तो उसने एक ही बार में 25 सोवियत फौजी मार गिराए थे। 

सिमो हयहा ने बाद में बताया की स्नाइपर राइफल के लेंस रिफ्लेक्ट करते हैं और उसी से वे निशाने पर आते ही मारे गए। इसलिए उसकी आउटडेटेड राइफल के आगे, मॉडर्न स्नाइपर राइफल बेअसर थी। दूसरा मॉडर्न स्नाइपर राइफल में लेंस बन्दूक के ऊपर होता है जिस से इंसान का सर राइफल के ऊपर लाना पड़ता है, जबकि पुराने में लेंस था ही नहीं तो उसका सर बन्दूक के नीचे रहता था ! और क्यूंकि ज्यादातर लोगों की उस पुरानी राइफल से प्रैक्टिस नहीं थी, इसलिए उसके खिलाफ  उस समय कोई कम्पटीशन था ही नहीं। ना फिनलेंड की आर्मी में ना ही सोवियत आर्मी में ! वह उसका इलाका था और वह अपने इलाके का शेर था। 

सोवियतस को खबर मिली और ऊपर तक खबर पहुंची तो देश के सबसे बेहतरीन स्नाइपर भेजे गए उस पोजीशन पर। सिमो हयहा ने वो सारे ढेर कर दिए। 
अपनी फेवरेट बन्दूक के अलावा वो हैंड ग्रेनेड भी रखता था और एक सब मशीनगन भी उसके पास थी, जो पहले हिट के बाद उसे वह इस्तेमाल करता था।
इसके अलावा वह एक चाक़ू भी अपने पास शिकार के लिये रखता था। शेष फ़िनलैंड की फौज बहुत पीछे थी, जबकि सिमो हयहा सोवियत की फौजी पोसिशन्स पर अकेले ही मौत बरसाते घूम रहा था। 

सोवियत सेना ने धीरे धीरे उस इलाके में अपनी सेना कई गुना बढ़ा दी। सोवियत सेना की दुनिया मे तगड़ी बेइज़्ज़ती होती जा रही थी। किसी को समझ में नहीं आ रहा था की फ़िनलैंड जैसा मच्छर देश सोवियत आर्मी को कैसे रोक ले रहा है । 

जैसे ही सोवियत आर्मी को शक होता था की यहां पर सिमो हयहा  है वो उस डायरेक्शन में ही हैवी बॉम्बार्डमेंट कर दिया करते थे। लेकिन सिमो हयहा नहीं पकड़ा गया तो नहीं ही पकड़ा गया। वह सोवियत फौजियों को एक एक्सपर्ट शिकारी की तरह मारता रहा। 

सोवियत सेना ने अब अपने सबसे अच्छे कमांडो को सिमो हयहा का शिकार करने के लिए भेजा, जिसे बर्फ में लड़ने का बहुत अनुभव था। सिमो हयहा के अनुसार वह कमांडो सच में बहुत ही  टैलेंटेड था। उसने एक बार भी अपनी पोजीशन नहीं दी, लेकिन सिमो हयहा को पता था कि कोई आसपास है। इतना सन्नाटा किसी शिकारी के कारण ही हो सकता था। दोनों ही पूरा दिन एक दुसरे के इंतज़ार में पोजीशन लिए बर्फ में पड़े रहे।

उस स्नाइपर ने फ़िनलैंड के कई फौजी भी मार दिए थे। पहले वे अलग अलग जगह पोजीशन लेते लेते, लेकिन जैसे ही शाम हुई तो उस कमांडो ने एक गलती कर दी। उसने अपनी बन्दूक वापस मूव करने के लिए थोड़ी सी हिलाई और उसके लेंस से रिफ्लेक्शन आ गयी। बस वहीँ सिमो हयहा ने उसे ढेर कर दिया। सिमो हयहा ने बताया कि, उसने उस कमांडो के सम्मान में उसका चाकू उसके शरीर से ले लिया था। 

सोवियत फौज ने फिर बड़ी बड़ी आयरन शील्ड के साथ इलाके में आगे बढ़ने की स्ट्रेटेजी बनाई, लेकिन सिमो हयहा उन्हें छोटे छोटे गैप से मार देता था। अधिकतर, उस बटालियन के सैनिकों के घुटने में ही गोली मिली थी। 

इन सब कहानियों ने सिमो हयहा  को फिनलेंड और सोवियत दोनों जगह बहुत महशूर कर दिया था। फिनलेंड ने उन्हें ढेरों अवार्ड दिए। जबकि सोवियत सेना ने उसे "WhiteDeath" यानी सफ़ेद मौत का नाम दिया। सोवियत खेमे में उसे एक भूत माना जा रहा था जो हर जगह था और तरफ था। 

80 दिनों के बाद फिनलेंड ने सिमो हयहा को नेशनल हीरो डिक्लेअर कर दिया। 
और उसे कोला क्रॉस दिया जो हमारे परमवीर चक्र की तरह होता है। उसके लिए उस स्पेशल पुरानी गन की प्रोडक्शन शुरू कर दी गयी जिसका आउटडेटेड कह कर मज़ाक़ बनाया गया था। उसे एक कस्टम मेड गन जो विशेषकर उसी के लिये बनाई गयी थी, उपहार में दी गयी। 

यह युद्ध, फ़िनलैंड लगभग जीत चुका था , लेकिन तभी सोवियत के भाग्य से बर्फ कम होने लगी। एक दिन सोवियत आर्मी के हैवी फायर में एक गोली सिमो के  जबड़े पर लगी और वह बेहोश हो गया। लेकिन तब भी सिमो की पोजीशन तब भी सोवियत सेना को नहीं मिल सकी थी। फिनलैंड के सैनिकों ने चुपके से सिमो को हॉस्पिटल पहुंचाया लेकिन सिमो कॉमा में जा चुके थे। जब उन्हें वापस होश आया तो फ़िनलैंड और सोवियत में युद्ध विराम हो चुका था। 
सिमो हयहा ने अपने देश को गुलामी से बचा लिया था। 

सोवियत, फिनलैंड का केवल 25,000 वर्ग मील का  इलाका कब्ज़ा कर पाए थे। देश बच गया था लेकिन सिमो का घर अब सोवियत यूनियन का हिस्सा था। पूरे युद्ध मे लाखो सैनिकों को गंवाने के बाद सोवियत यूनियन को कुछ हज़ार वर्गमील ही ज़मीन मिली थी। यह सोवियत संघ की तब तक की सबसे बुरी हार मानी जाती है। और वह भी केवल एक जुझारू और बहादुर सिमो के हाथों। 
किसी ने कल्पना भी नहीं की थी  सकता कि फ़िनलैंड सोवियत सेना को रोक भी  सकता था। 

सिमो हयहा 2002 तक ज़िंदा रहे, और सोवियत संघ तथा रूस में भी एक बहादुर सैनिक की तरह सम्मान पाते रहे।  उन्हें आज तक का सर्वश्रेष्ठ स्नाइपर योद्धा माना जाता है, और शायद यह  सही भी है।

किशन रूमी
( Kishan Rumi )

Ghalib - Kyon bote ho tumbe / .क्यों बोते हो तुम्बे - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 116.
क्यों बोते हो तुम्बे,
गर बाग ग़द्दाये मय नहीं है !!

Kyun bote ho tumbe,
Gar baag gaddaye may nahin hai !!
- Ghalib

यदि उद्यान और बेल, शराब के भिखारी नही हैं तो, इन बागों और खेतों में तुम्बे क्यों बोए जाते !

तुम्बा एक गोल कद्दू होता है जिसके अंदर का गूदा निकाल कर उसे सुखा कर एक पात्र का रूप दिया जाता है। ग़ालिब का इशारा इसी पात्र की ओर है जो उनके लिये मय यानी मदिरा का चषक बन जाता है। यह तुम्बे भी मधुपात्र के रूप में मय के तलबगार हैं।

ग़ालिब का शेर, सुनने में थोड़ा मजाकिया भले ही लगे, पर यह भी उनके द्वारा कम शब्दों में अभिव्यक्त एक दर्शन है। ग़ालिब का जीवन दर्शन आनंदवाद पर आधारित है। हालांकि उनके जीवन मे बेहद दुःख भरे पल भी आये और उनका निजी जीवन कष्ट और अभाव से भरा रहा। कुछ तो अपनी बुरी आदतों के कारण तो कुछ अपने स्वाभिमान भरे स्वभाव के काऱण वे निरन्तर अर्थाभाव में भी रहे। पर इन सबके बावजूद ग़ालिब, अपने घर की टूटी और उखड़े पलस्तर की दीवारों के बीच उगे झाड़ झंखाड़ में भी वसंत यानी बहार की आमद ढूंढ लेते हैं।

ग़ालिब का आनंदवाद यानी आलमे मस्ती, दैहिक आनन्द के बजाय एक सूफियाना आत्मिक आनन्द के रुप मे उनकी शायरी और खतों में बिखरा पड़ा है। यह सूफीवाद का तसव्वफ है जो मन को बाह्य संसार से दूर हटा कर खुद में ही खुद की तलाश की ओर ले जाने की बात करता है। यही दर्शन, रहस्यवाद का है और सूफी परंपरा का भी है। यह दर्शन एकेश्वरवाद की पराकाष्ठा है और यही वेदांत का अद्वैतवाद है। फुटहि कुंभ, जल जलहिं समाना !

इस छोटे से शेर में वे उस तुम्बे को भी मदिरा जो यहां आनंद या ईश्वर के आशीष का प्रतीक है के रूप में देखते हैं और कहते हैं उक्त मस्ती या आनन्द के तलबगार या भिखारी या गदाई तो यह सारा उद्यान और बेलें हैं। सारी प्रकृति उस आनंद मदिरा, मय की खोज में है तभी तो प्रकृति ने यह तुम्बे जो एक प्रकृति प्रदत्त पात्र हैं, उपजाए हैं। इन्हें बोने वाले लोग भी प्रकृति के इस संदेश को समझते हैं तभी तो वे इसे बोते हैं।

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 26 December 2020

क्या 29 दिसंबर की सरकार - किसान वार्ता, फैक्ट्स और लॉजिक्स पर हो पाएगी ? / विजय शंकर सिंह

30 दिन के शांतिपूर्ण धरने और लगभग 35 किसानों की अकाल मृत्यु के बाद, सरकार ने किसानों से बातचीत शुरू करने के लिये किसानों को ही बातचीत का एजेंडा सुझाने के लिये एक पत्र लिखा इसके पहले सरकार के संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल द्वारा सरकार की तरफ से किसान संगठनों से नियमित पत्राचार किया जा रहा था। यह पत्र अब तक का अंतिम पत्राचार है । इस पत्र में सरकार ने बातचीत के मुद्दें किसानों से ही मांगे हैं कि वे किन विषयो पर सरकार से बात करना चाहते हैं। किसान संगठनो ने 26 दिसंबर को सायंकाल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के यह बताया कि, सरकार के पत्र का उन्होंने उत्तर दे दिया है औऱ सरकार को अपना एजेंडा भी स्पष्ट कर दिया है ।किसान नेताओं ने सरकार के साथ बातचीत के लिए 29 दिसंबर को सुबह 11 बजे का वक्त तय किया है, और जगह के रूप में दिल्ली के विज्ञान भवन को चुना गया है। 

आंदोनकारी 40 किसान संगठनों के मुख्य संगठन संयुक्त किसान मोर्चा की एक बैठक में यह फैसला किया गया और किसान नेताओं की तरफ से प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषणा की गयी।सरकार ने किसानों से बातचीत की अपील करते हुए उन्हें अपनी पसंद की जगह और भी तय करने के लिये उक्त पत्र में कहा था।कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले एक महीने से दिल्ली की अलग-अलग सीमा पर हजारों किसान आंदोलन कर रहे हैं और धरने पर बैठे हैं। किसान नेताओं की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वराज्य अभियान के योगेंद्र योदव ने बताया, कि, 'हम केंद्र सरकार के साथ 29 दिसंबर को सुबह 11 बजे एक और दौर की बातचीत का प्रस्ताव रखते हैं।' योगेंद्र यादव के ट्वीट कर के चार विन्दुओ का एक एजेंडा भी दिया है। एजेंडे के विंदु इस प्रकार हैं।
● तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए अपनाए जाने वाली क्रियाविधि 
● एमएसपी की कानूनी गारंटी की प्रक्रिया 
● पराली जुर्माना से किसानों को मुक्ति 
● बिजली कानून के मसौदे में बदलाव। 

यह पहली बातचीत नही है बल्कि यह रुकी हुयी बातचीत का अगला कदम है। छह दौर की बातचीत सरकार और किसानों के बीच हो चुकी है, जिंसमे सरकार की ओर से कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल भाग ले चुके हैं। एक दौर की बातचीत में अमित शाह गृहमंत्री भी शामिल हो चुके हैं। सरकार कुछ संशोधनों के लिये राजी होने की बात कह रही है पर किसान संगठन हर हालत में इन कानूनों को रद्द करने और एक राष्ट्रीय किसान आयोग बना कर कृषि से जुड़ी समस्याओं पर विन्दुवार विचार चाहते हैं। अब आगे होता क्या है यह तो 29 दिसंबर को ही पता चल सकेगा। 

किसानों ने कृषि बिल को समझा है या नही, या कितना समझा है यह तो मैं नहीं बता पाऊंगा, पर एक बात तय है कि किसानों ने कृषि कानून बनाने वालों के इरादे और नीयत को ज़रूर समझ लिया है। कृषि कानून बनाने वालों का इरादा 2014 से ही एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाने का है जिंसमे सब कुछ, सारी सम्पदा कुछ चुनिंदा लोगो के ही हांथो में केन्दित हो और पूरा समाज बस दो ही खेमे में बंट जाय। एक के पास सब कुछ हो और दूसरे के पास बस उतना ही बचे, जितना की सांस लेने की रिवायत निभाई जा सके। जनता जब सत्ता के इरादे को समझ लेती है तो लड़ाई दिलचस्प हो जाती है। 

बात बहुत सीधी है। 
किसान को उपज का उचित मूल्य मिलना चाहिए या नहीं। 
इस सवाल के उत्तर पर सब राजी होंगे, कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना चाहिए। 

अब उचित मूल्य क्या होगा ? 
उचित मूल्य को ही तय करने के लिये सरकार ने एपीएमसी कानून बनाया है और एक फॉर्मूले के अनुसार, फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार तय और घोषित करती है और फिर उसी मूल्य पर सरकार फसल खरीदती है। 

क्या सभी किसानों को सरकार द्वारा घोषित एमएसपी की कीमत मिल रही है ? 
नहीं। केवल 6% को मिल रही है। 
यह कहना है शांता कुमार कमेटी का। 

सभी किसानों को उनके फसल की उचित कीमत क्यों नहीं मिल रही है ? 
क्योंकि मंडी का विस्तार हर जगह नहीं है और किसान निजी व्यापारियों को अपनी उपज बेचने के लिये मजबूर हैं क्योंकि सरकार सब खरीद नहीं पा रही है। 

अब यह कहा जा रहा है कि, सरकार अपने सिस्टम की कमी के कारण किसानों की पूरी उपज खरीद नहीं पा रही है तो सरकार ने यह तय किया कि, किसी भी पैन कार्ड धारक को यह अधिकार दे दिया गया कि, वह किसानों की उपज, एक समानांतर मंडी बना कर खरीद सकता है। लेकिन निजी क्षेत्र की यह समानांतर मंडियां, टैक्स फ्री रहेंगी, जबकि सरकार अपनी मंडी पर टैक्स लेती रहेगी। 

जब निजी मंडियों को यह अधिकार सरकार दे रही है कि, वह अपनी मंडी बना कर फसल खरीद सकती है तो, यह बाध्यता उन निजी मंडी वालों पर क्यों नहीं डाल देती कि फसल की खरीद सरकार द्वारा तय किये गए एमएसपी से कम कीमत पर नहीं होगी ?
इससे कम से कम, किसान इस बात पर तो निश्चिंत हो जाएंगे कि उन्हें कम से कम फसल का न्यूनतम मूल्य तो मिल ही जाएगा, चाहे फसल सरकार खरीदे या निजी कॉरपोरेट। आखिर सरकार, खुद तो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि उपज खरीदती ही है। फिर मनमाना दाम तय करने की कृपा, अधिकार और विकल्प सरकार निजी क्षेत्र को क्यों उपलब्ध करा रही है ? इससे किसानों को क्या लाभ होगा ? क्या निजी क्षेत्र, किसानों के हित मे फसल की कीमतें तय करेंगे या अपने व्यापारिक लाभ के हित मे ? इसका सीधा उत्तर होगा कि पूंजीपति पहले अपना लाभ देखेगा। लोककल्याणकारी राज्य के लिये सरकार प्रतिबद्ध है न कि पूंजीपति। 

आखिर जब सरकार खुद ही एमएसपी पर खरीद कर रही है तो निजी क्षेत्र को भी एमएसपी पर खरीद करने से सरकार क्यों नहीं कानूनन बाध्य कर सकती है ? 
इस मुद्दे पर सरकार किसानों के पक्ष में क्यों नहीं खड़ी दिख रही है और क्यों सरकार पूरी निर्लज्जता के साथ चहेते पूंजीपतियों के पक्ष में दिख रही है ? 
क्या यह सवाल आप के दिमाग मे नहीं उठता है ? 

अब सवाल उठता है कि क्या तय किया गया न्यूनतम मूल्य पर्याप्त है या नहीं। इस पर किसान संगठन और कृषि अर्थविशेषज्ञों से सरकार बात कर सकती है। बातचीत स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट और उसके फॉर्मूले पर हो सकती है । पर फिलहाल किसानों को उतना मूल्य तो मिले ही, जितना सरकार ने खुद ही एमएसपी के रूप में तय किया है। 

मेरा मानना है कि 
● एमएसपी और सरकारी खरीद, व्यापक तौर पर हो रहे निजीकरण की ओर बढ़ता हुआ एक कदम है। 

● अधिक नहीं बस तीन चार साल में ही कृषि उत्पादों की खरीद सरकार कम करते करते बंद कर देगी। 

● एमएसपी ज़रूर धूम धड़ाके से हर साल घोषित होगी, पर वह किसानों को मिलेगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी सरकार नहीं देने जा रही है। वह इस मामले में कोई भी दबाव या कानून बना कर कॉरपोरेट को बांधने नहीं जा रही है। 

● हालांकि यह बात सरकार बार बार कह रही है कि वह एमएसपी मिले यह सुनिश्चित करेगी। पर सरकार यह सुनिश्चित कैसे कर पायेगी, यह सरकार को भी पता नहीं है।

● किसी एमएसपी जैसे बाध्यकारी प्राविधान के अभाव में, सरकारी मंडी के समानांतर खड़ी कॉरपोरेट मंडी व्यवस्था,  फसलों की कीमत खुद ही बाजार के सिद्धांत से तय करेगा। बाजार में जिसका वर्चस्व होगा वह कीमत तय करेगा और कीमतों को नियंत्रित भी करेगा। किसान यहां न तो एकजुट हो पायेगा और न ही वह अपने पक्ष में कोई सौदेबाजी कर पायेगा। सरकार तो साथ छोड़ ही चुकी है। अब बस जो उसे कॉरपोरेट या निजी क्षेत्र दाम थमा देंगे, उसे लेकर वह घर लौट जाएगा और इसे अपनी नियति समझ कर स्वीकार कर लेगा। 

● एमएसपी पर फसल खरीदने की कोई कानूनन बाध्यता निजी क्षेत्र पर नही होगी। अतः निजी क्षेत्र पर कोई कानूनी दबाव भी नहीं रहेगा। रहा सवाल नैतिक दबाव का तो, दुनिया मे फ्री लंच नहीं होता जैसे मुहावरे कहने वाले कॉरपोरेट, इन सब नैतिक झंझटों से मुक्त रहते है, यह सब टोटके आम जन के लिये हैं। 

● जब कभी किसानों का दबाव पड़े या चुनाव का समय नज़दीक आये तो, हो सकता है तब, सरकार, निजी क्षेत्र से एमएसपी पर खरीद करने के लिये कोई अपील भी जारी कर दे। पर यह सब महज औपचारिकता ही होगी। निजी क्षेत्र का दबाव ग्रुप सदैव सरकार और संसद पर मज़बूत रहता है और इसका कारण इलेक्टोरल बांड और चुनावी चंदे हैं। 

● अब नये कृषि कानून में जमाखोरी को वैधानिक स्वरूप मिल गया है तो, जो जितना बड़ा पूंजीपति होगा, वह उतनी ही अधिक जमाखोरी करेगा और बाजार को अपनी उंगली पर नचायेगा। 

● खेती किसानी करने वाला किसान अपने घर परिवार के लिये तो ज़रूरी अनाज और खाद्यान्न रख लेंगे पर सबसे अधिक नुकसान उनका होगा जो बाजार से अनाज खरीद कर खाते हैं। क्योंकि अनाज की कीमतों पर कोई नियंत्रण सरकार का नहीं रहेगा क्योंकि वे अब आवश्यक वस्तु नहीं रह गयी हैं।

यह खतरा यहीं नहीं थमेगा बल्कि इसका असर देश की कृषि आर्थिकी और कृषि से जुड़ी ग्रामीण संस्कृति पर पड़ेगा। सरकार को फिलहाल तीनो कृषिकानून रद्द करके एक किसान आयोग जिसमे किसान संगठन और कृषि विशेषज्ञों की एक टीम हो, गठित कर के एक व्यापक कृषि सुधार कार्यक्रम के लिये आगे बढ़ना चाहिए। 

प्रधानमंत्री कहते हैं कि किसान कानूनो पर बात फैक्ट्स और लोजिक्स पर बात होनी चाहिये। बात सही है। पर नोटबन्दी से लेकर, आज तक जितने भी कानून बने वे अफरातफरी में ही पारित किए गए और उन्हें सेलेक्ट कमेटी को भी नही भेजा गया जहां कि कानूनो की फैक्ट्स और लोजिक्स पर ही बात होती है और मीनमेख देखा जाता है। जो कुछ कमियां होती हैं उन्हें दूर किया जाता है। 

यह तीनों कानून भी संसद से पारित कराने के पहले सेलेक्ट कमेटी को भेजे जाने चाहिए थे, पर उसे से हरिवंश जी ने सत्यनारायण बाबा की कथा की तरह पढ़ते हुए ध्वनिमत से पारित घोषित कर दिया। जैसे लगता था कि यही बयाना लेकर वह उस दिन सदन में आये थे। बात तो उस दिन ही फैक्ट्स और लोजिक्स पर होनी चाहिए थी। यह कहा जा सकता है कि सदन में हंगामा हो गया। तब दूसरे दिन सदन इसे बहस के लिये रख सकता था। लेकिन जब रविवार को सदन बैठे और यह संकल्प कर के उप सभापति बैठे कि 1 बजे तक यह काम निपटा ही देना है तो बहस की गुंजाइश तो स्वतः खत्म हो जाती है। इस जल्दीबाजी से तो यही लगता है कि आज ही कानून पारित कराने का किसी से वादा किया गया था, और उसे पूरा कर दिया गया। 

इस जन आंदोलन को लेकर सरकार समर्थक मित्रों और भाजपा का दृष्टिकोण बेहद अलोकतांत्रिक रहा। जन आंदोलन कोई भी हो, किसी भी मुद्दे पर हो, यदि वह शांतिपूर्ण तरह से हो रहा है तो उस आंदोलन का संज्ञान लेना चाहिए, उसकी तह में जाना चाहिए न कि आंदोलन में शामिल जनता को विभाजनकारी आरोपो से लांछित करना चाहिए। ऐसा नही है कि यह देश का पहला या आखिरी जन आंदोलन है, बल्कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में आंदोलन होते रहे हैं और भारत मे भी यह अनजाना दृश्य नही है । पर किसी भी जनांदोलन के विरुद्ध इस प्रकार का शत्रुतापूर्ण आलोचना का भाव लोकतंत्र की सारी मर्यादाओं और मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है। 
सरकार ने खुद भी इस आंदोलन को हतोत्साहित करने का प्रयास किया। पहले पुलिस के बल पर रोकने की कोशिश की फिर अपने आइटीसेल के बल पर दुष्प्रचार की फिर विपक्ष पर किसानों को भड़काने और बरगलाने का इल्जाम लगा कर, फिर विदेशी फंडिंग से प्रायोजित आंदोलन बता कर, फिर चहेती मीडिया के बल पर मिथ्या खबरों को प्रसारित कर के। पर आंदोलनकारियों के मनोबल, उत्साह, रणनीति, जनता के सहयोग, सोशल मीडिया द्वारा मिल रही सच्ची खबरों के कारण सरकार अपने मिशन में सफल नहीं हो पायी। हालांकि सरकार इसी बीच बातचीत का सिलसिला बनाये भी रही, पर सजग, सचेत और जागरूक किसान संगठन भी सरकार के झांसे में नहीं आये और वे यह बात समझ गए कि यह तीनों कृषि कानून, किसानमार कानून हैं। 

सरकार का कहना है कि यह कृषि कानून किसानों के हित मे हैं। किसान कह रहे हैं कि इससे वे बर्बाद हो जाएंगे। अब सरकार उन कानूनो को रद्द करे और फैक्ट्स और लोजिक्स पर किसानों को समझाये और यह सब पारदर्शी तरीके से हो न कि गुपचुप तऱीके से इसे लैटरल इंट्री वाले फर्जी आईएएस ड्राफ्ट कर के रख दें और सरकार यह ढिंढोरा पीट दे कि यह कृषि सुधार का एक क्रांतिकारी कदम है। 

यह खुशी की बात है कि प्रधानमंत्री जी को कम से कम यह एहसास तो हो गया कि कानूनो पर फैक्ट्स और लोजिक्स के अनुसार बहस होनी चाहिए। लेकिन यह बहस कानून पारित होने के पहले होनी चाहिए न कि कानून बन जाने के बाद, जब पूंजीपति बोरा, ट्रक, साइलो आदि का जुगाड़ कर लें और जब दिल्ली घिर जाय, 40 किसान ठंड से धरनास्थल पर दिवंगत हो जांय, तो सरकार कहे कि, आओ अब बात करें, फैक्ट्स और लोजिक्स पर !

( विजय शंकर सिंह )