Friday, 11 December 2020

नए कृषि कानूनो के विधिक परीक्षण की आवश्यकता है / विजय शंकर सिंह

अगर आप को लगता है कि नया कृषि कानून केवल किसानों का ही अहित करेगा तो यह आप का भ्रम है। कृषि और किसानों के विषय पर नियमित अध्ययन और लेखन करने वाले पत्रकार, पी साईंनाथ ने द वायर में एक विस्तृत लेख लिख कर इन कानूनों में व्याप्त विधिक विरोधाभासों को उजागर किया है। अब कृषि कानून में जो कानूनी विरोधाभास है, उसकी चर्चा करते हैं। 

“No suit, prosecution or other legal proceedings shall lie against the Central Government or the State Government, or any officer of the Central Government or the State Government or any other person in respect of anything which is in good faith done or intended to be done under this Act or of any rules or orders made thereunder.”

उपरोक्त उद्धरण द फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स ( प्रोमोशन एंड फैसिलिटेशन ) एक्ट 2020 की धारा 13 का है। इसे हिंदी में पढ़े, 

" कोई भी वाद, या अभियोजन, या अन्य कोई भी विधिक कार्यवाही, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, या केंद्रीय सरकार के किसी अधिकारी या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या किसी भी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध, जिसने कोई भी कार्य यदि बद इरादे या बद इरादे के उद्देश्य से नहीं किया है तो, उसके विरुद्ध नहीं की जा सकेगी। " 

यह तीन कृषि कानूनो में से वह एक महत्वपूर्ण कानून है जो, निजी मंडी या किसी को भी, जो पैन कार्ड धारक है, कृषि उत्पाद खरीदने की शक्ति और अधिकार प्रदान करता है। 

हालांकि, देश मे और भी ऐसे कानून हैं जो, सरकारी अफसरों को, कर्तव्य पालन के दौरान, उनके द्वारा किये गए कतिपय कार्यो को, जो नेकनीयती से किये गए हैं, के संबंध में, अभियोजन के खिलाफ रक्षा कवच के रूप में बनाये गए हैं। पर यह कानून, इस प्रकार के संरक्षण प्रदान करने वाले कानूनो में सबसे अलग प्रकृति का है। लोकसेवकों को ही नहीं, ऐसे संरक्षण, इन कानूनों के इतर, उन सबको दिया जाना चाहिए, जो कोई भी कार्य बद इरादे या बिना मेंसेरिया के करते हैं। अपराध का मूल ही मेंसेरिया से शुरू होता है। लेकिन वे जो कर रहे हैं वह नेक इरादे से ही कर रहे हैं, यह एक अस्पष्ट और धुंधली व्याख्या है। वह कर क्या रहे हैं यह भी, नेक और बद इरादे की तरह, उससे कम महत्वपूर्ण नहीं बात नहीं है। 

अब इसी अधिनियम की धारा 15 को देखें, 

“No civil court shall have jurisdiction to entertain any suit or proceedings in respect of any matter, the cognizance of which can be taken and disposed of by any authority empowered by or under this Act or the rules made thereunder.”

" इस अधिनियम के अंतर्गत या इस अधिनियम के अंतर्गत बने किसी भी नियमावली के सम्बंध में, किसी भी सिविल यानी दीवानी न्यायालय को कोई भी वाद सुनने या संज्ञान लेने, या अन्य किसी भी प्रकार की सुनवाई करने का अधिकार नही होगा।"

अब सवाल उठता है कि धारा 13 के अंतर्गत केंद्र सरकार और राज्य सरकार तथा इनके अधिकारियों को इस प्रकार का विधिक संरक्षण तो दिया ही गया है पर इन सबके साथ यह भी लिखा गया है कि कोई अन्य व्यक्ति, तो यह कोई अन्य व्यक्ति, जो न सरकार है और न ही लोकसेवक, तो वह कौन है, जिसे इस प्रकार का सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है ? क्या यह सुरक्षा कवच, बड़े या बहुत बड़े व्यापारियों, कम्पनियों और कॉरपोरेट के लिये तो नहीं इस कानून में बनाया गया है ? यह प्राविधान, इसे उन कानूनो से अलग करता है जहां लोकसेवकों को पहले से ही इस प्रकार की लीगल इम्युनिटी प्राप्त है। 

धारा 15 का शुरुआती वाक्य कि 'कोई भी वाद, अभियोजन या विधिक कार्यवाही नही चलाई जा सकेगी' न केवल किसानों को ही ऐसा करने के लिये प्रतिबन्धित करता है बल्कि इस प्रकार के सभी न्यायिक रास्ते बंद कर देता है जो किसी भी व्यक्ति को विधिक विकल्प पाने का एक मौलिक अधिकार देता है। यह अधिकार, किसी किसान संगठन को भी दीवानी न्यायालय में जाने के अधिकार से वंचित करता है। 

हमारा संविधान हर नागरिक को न्यायालय जाने और वाद दायर करने का मौलिक अधिकार देता है, पर यह कानून, उक्त अधिकार को प्रतिबंधित करता है। इस प्रकार का विधिक सुरक्षा कवच या लीगल इम्युनिटी अनेक संदेहों को जन्म देता है। यह 1975 - 77 के आपातकाल की भी याद दिलाता है जब सरकार ने नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए थे। साथ ही यह एक स्वेच्छाचारी कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखलंदाजी भी है। इसे यदि लागू किया गया तो नौकरशाही का एक सामान्य अधिकारी भी न्यायपालिका के रूप में बदल जाएगा और वह, जज भी होगा, अभियोजक भी और फैसले को लागू कराने वाला एक्जीक्यूटिव भी। यह संविधान की मूल अवधारणा चेक और बैलेंस तथा शक्ति पृथक्करण के विरुद्ध है। केवल किसानों से जुड़ा यह कानून एक सामान्य किसान को सर्वशक्ति सम्पन्न कॉरपोरेट के समक्ष एक भोज्य की तरह लाकर रख देता है। 

इस कानूनो के इन विधिक विरोधाभासों पर दिल्ली बार काउंसिल ने भी, अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। दिल्ली बार काउंसिल ने प्रधानमंत्री जी को जो चिट्ठी भेजी है, में यह लिखा है कि, 
" कैसे एक दीवानी प्रकृति का वाद, सुनवाई करने और निपटाने के लिये ऐसे प्रशासनिक तंत्र को दिया जा सकता है जो न्यायपालिका का अंग ही न हो और वह सीधे कार्यपालिका के अंतर्गत आत्व हो ? " 
इस प्रशासनिक तंत्र में एसडीएम और जिलाधिकारी आते हैं। वे न्यायपालिका के अंग नही है अतः वे न्यायिक स्वतंत्रता की श्रेणी में भी नहीं आते हैं। कार्यपालिका का यह तबका अपने कार्यप्रणाली में किस प्रकार सरकार के निर्णयों और इरादे से आज़ाद ख्याल है यह किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में वही फैसले आएंगे जो सरकार के मनमाफिक होंगे। सरकार किस तरफ रहेगी यह बताने की आवश्यकता नही है क्योंकि, आज यह पूरा कानून और इस व्यापक जन आंदोलन को देख कर यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि सरकार किसकी तरफ है, कॉरपोरेट या बड़ी कम्पनियों की तरफ या किसानों की तरफ।

बार काउंसिल का यह भी कहना है कि,
" कार्यपालिका को न्यायपालिका की शक्तियां इस प्रकार हस्तांतरित कर देना एक खतरनाक संकेत और बडी भूल होगी। " 
पत्र में अंग्रेजी के शब्द डैंजरस और ब्लंडर लिखे गए हैं। बार काउंसिल को यह भी आशंका है कि इसका असर वकालत के पेशे पर भी पड़ेगा। इससे दीवानी और जिला न्यायालयों के अधिकारों पर भी असर पड़ेगा। 

अब इन्ही कृषि कानूनो के एक और कानून, द फार्मर्स ( इम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन ) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंश  एंड फार्म सर्विसेज एक्ट 2020 को भी देखें। इस अधिनियम की धारा 18 भी बार बार नेक इरादे से किये गए कर्तव्यों की बात करती है। धारा 19 के अनुसार, 

“No civil Court shall have jurisdiction to entertain any suit or proceedings in respect of any dispute which a Sub-Divisional Authority or the Appellate Authority is empowered by or under this Act to decide and no injunction shall be granted by any court or other authority [emphasis added] in respect of any action taken or to be taken in pursuance of any power conferred by or under this Act or any rules made thereunder.”

" इस कानून के या इस कानून के अनुसार बनाये गए नियमो के अंतर्गत, दी गयी शक्तियों और अधिकार से सम्पन्न किसी भी सब डिविजनल अधिकारी ( एसडीएम ) या अपीली अधिकारी द्वारा जारी किए गए किसी भी आदेश के बारे में, कोई भी वाद किसी भी सिविल न्यायालय में न तो दायर किया जा सकेगा और न ही उसे ( सिविल न्यायालय को ) उक्त आदेश को स्थगित ( स्टे ) करने, या उस पर सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार रहेगा। " 

अब इसी के साथ संविधान का अनुच्छेद 19 भी पढ़ लें, जो हर नागरिक को अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी, शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने, सभा करने, जुलूस निकालने और संगठन बनाने का मौलिक अधिकार देता है। जब कि इस कृषि कानून की यह धारा 19, व्यक्ति के न्यायालय जाने तक के अधिकार को छीन ले रही है। इस अधिनियम की धारा 19 न केवल संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करती है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 32, जो हर नागरिक को न्यायालय में जाने और न्यायिक राहत पाने का मौलिक अधिकार देती है, को भी बाधित करती है। संविधान का अनुच्छेद 32, संविधान के मूल ढांचे का एक भाग है और संविधान के मूल ढांचे के साथ छेड़छाड़ करने का अधिकार संसद को भी नहीं है। 

इन कानूनों में कानून बनाने की स्थापित परंपराओं का भी पालन नही किया गया है। यह कहना है,  सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील व बीजेपी के नेता अश्विनी उपाध्याय का। अश्विनी उपाध्याय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में कहा है कि 
" कानून बनाने से पहले उसके ड्राफ्ट को पब्लिक डोमेन में डालना जरूरी है और तभी लोग सुझाव देंगे और फिर जो कानून बनेगा उसमें खामियों की संभावना कम रहेगी। कृषि कानून के बारे में भी पहले ड्राफ्ट जनता के सामने नहीं आया। ऐसे में आपसे आग्रह है कि कोई भी नया कानून जब बनाना है तो ड्राफ्ट 60 दिनों पहले वेबसाइट पर डाला जाए ताकि लोगों का सुझाव आ सके।"

उपाध्याय जी का यह तर्क इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आज जिन तीन कृषि कानूनो को सरकार बार बार किसान हितैषी बता रही है, उनके बारे में पहले ही दिन से किसान संगठन यह सवाल सरकार से पूछ रहे हैं कि यह कानून किस किसान या किसान संगठन की मांग या अनुरोध पर लाये गए हैं ? यहीं यह सवाल उठता है कि क्या यह कानून विश्व बैंक और कॉरपोरेट को खेती सेक्टर में जबरन घुसा कर देश की कृषि आर्थिकि को तो बर्बाद करने के लिये नहीं लाये गए हैं ? 

एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय आगे अपने पत्र में कहते हैं कि,  
" कानून बनाने के लिए जो मौजूदा प्रक्रिया अपनाई गई है वह सवैधानिक नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रक्रिया में सेक्रेटरी कानून का ड्राफ्ट तैयार करता है और कैबिनेट उसे पास करता है और फिर जब सदन के सामने उसे पेश किया जाता है तो जनता को उस बारे में थोड़ी सी जानकारी मिल पाती है।"
लेकिन इन कानूनो के अध्यादेश भी लॉक डाउन के समय चुपके से लाये गए और जब इन्हें संसद में पेश किया गया तो, इन पर खुल कर बहस भी नहीं हुयी।  राज्यसभा में तो उपसभापति हरिवंश जी ने माइक म्यूट करा कर बेहद अलोकतांत्रिक और शर्मनाक तरीके से इन कानूनों को पारित करा दिया। हरिवंश जी का आचरण देश के संसदीय इतिहास में एक काले धब्बे की तरह याद रखा जाएगा। 

अश्विनी उपाध्याय कुछ सुझाव भी देते हैं। वे लिखते हैं, 
" कानून बनाने की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा को छोड़ अन्य विषय पर जब भी कानून बनाना हो तो दो महीने पहले उसका ड्राफ्ट सरकार के संबंधित मिनिस्ट्री के वेबसाइट पर आना चाहिए ताकि पब्लिक उसे देख सके। इससे ड्राफ्ट कानून पर चर्चा होगी और एक्सपर्ट की ओपिनयिन आएगी। साथ ही उस कानून के बारे में सांसद और विधायक अपने इलाके में चर्चा करेंगे। इससे आम लोगों के बीच कानून के बारे में पहले ही चर्चा हो चुकी रहेगी और इससे संबंधित तमाम सुझाव मिलेंगे। फिर ड्राफ्ट में जरूरी संशोधन कर नया ड्राफ्ट बनाया जा सकेगा और फिर कैबिनेट के सुझाव भी इसमें शामिल होंगे और फिर संसद के सामने कानून पेश किया जा सकेगा और बहस के बाद कानून बनेगा और इस दौरान सदस्यों के सुझाव भी शामिल होंगे तो फिर गलती का अंदेशा नहीं होगा।" 

सच कहिये तो इस कानून को संसदीय समिति के पास परीक्षण के लिये भेजा जाना चाहिए था। यदि संसदीय समिति के पास परीक्षण के लिये भेजा गया होता तो हो सकता है कानून में ऐसी विसंगतियां नहीं होती। इस कानून की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की खबर भी है। अदालत का क्या दृष्टिकोण होता है वह एक अलग बिंदु है। पर किसानों को अपनी मांगों के साथ अपनी समस्याओं के बारे में शांतिपूर्ण ढंग से धरना, प्रदर्शन और आंदोलन करने का अधिकार है और वे अपनी बात मजबूती से रख भी रहे हैं। उनका सरकार के साथ संवाद भी जारी है। सरकार को चाहिए कि वह या तो इन कानूनो को वापस ले ले या इनका कार्यान्वयन स्थगित कर दे और किसान संगठनों के साथ कृषि सुधार कार्यक्रम पर आगे बढ़े।

( विजय शंकर सिंह )

Thursday, 10 December 2020

शब्दवेध (35) ज्ञान शब्द की व्याख्या.

“Know exactly what you know.” Hardayal
आज हम  ज्ञान  की चर्चा करेंगे, जो हमारे पास इतना अधिक है कि जितना है उससे अधिक कुछ पाना ही नहीं चाहते।  समस्त ज्ञान की  कसौटी  अपनी ज्ञान सीमा को बनाना चाहते हैं।  यदि वह हमारे उपयोग का  सिद्ध हुआ तो  उसे सही,  नहीं हुआ तो मूर्खता और यदि मूर्खता सिद्ध न की जा सके तो उसे  नीयत की खोट सिद्ध करके  अपनी  ज्ञान सीमा की पवित्रता बनाए रखना चाहते हैं।  आगे बढ़ने से पहले  ज्ञान शब्द की व्याख्या दो कारणों से जरूरी लगी।  एक तो इसलिए कि हम भाषा की विकास प्रक्रिया में जिस बिंदु पर पहुँचे थे उसमें आँख के पर्याय ‘कण्’ पर चर्चा चल रही थी, जिससे इस शब्द की उत्पत्ति हुई है; दूसरे जो अपने  को ज्ञानी मानते हैं वे यह भी नहीं जानते कि इसका मूल अर्थ क्या है। 

ज्ञान का अर्थ है आँख। विश्वसनीय का अर्थ, आँखों देखा। अविश्वसनीय का, कानों सुना, या ‘सुना-सुनाया’।  ज्ञान की ये दो ही इंद्रियाँ है। शेष तीन अवर्णनीय हैे, इसलिए वेदन की इन्द्रियाँ हैं, यद्यपि वेद में ज्ञात और अनुभूत और कल्पनीय सभी का समावेश है।  आँख की यह महिमा सभी समाजों और भाषाओं में दुहराई गई है।  आंखें खोलो,  मतलब, 1-  नींद से जागो, 2.  होश में आओ, 3.  सोचो।  इससे उल्टा मुहावरा है, आंखें मूंदे रहो और आँखें बंद हो जाना तो मौत का पर्याय है।  तमिल की एक कहावत है, एण्णुम् एऴुत्तुम् कण्णं नत्तगुम् -  गणना और  अक्षरज्ञान दोनों हमारी दो आंखें है। 

ज्ञान शब्द आँख के जिस पर्याय से निकला है, वह है कण>< कन।  अंग्रेजी का एक शब्द है ken, जिसका  मतलब है समस्त ज्ञान और बोध व्यवस्था, one's range of knowledge or understanding.अंग्रेजी का एक दूसरा शब्द है जिससे हम बहुत अच्छी तरह परिचित हैं know, जिसे कहने को तो लातिन ‘ग्नॉस’ जो ऐग्नॉस्टिक - संशयवादी में मिलेगा, पर है यह भी ‘क्न’ का परवर्ती।  हमारी भाषाओं का अ-कार  अंग्रेजी में प्रायः  ए-कार में बदल जाता है (बनारस > Benaras), कभी-कभी  उ-कार/ इ-कार/ओ-कार में, पद (foot), बन्ध (bind/ bond).  इसी तरीके से कण् एक ओर तो ken  बना है  तो दूसरी ओर स्वरलोप से क्न ( know, knowledge)।  यह स्वरलोप  यूरोप में नहीं हुआ, कौरवी प्रभाव से भारत में ही संपन्न हो चुका था।   संभवतः  कन पूर्वी से  कौरवी भाषा में पहुंचा तो इसके दो रूप हुए,  एक  स्वरलोप से कन् का क्न,   दूसरा क्न के  न-कार का  र-कार में बदलना- क्र,  और तीसरा क्न के दंत्य वर्ण का तालव्य  हो जाना और सावर्ण्य के नियम से न का ञ मेे बदल कर ‘ज्ञ’ हो जाना (कन>क्नान>ज्ञान)। एक अन्य परिवर्तन कण्  की अघोष ध्वनि का घोषित होना था  जो संभवत बहुत पहले पूर्वी में घटित हो चुका था (कन- गन,  गनल)। 

आज तक इन परिवर्तनों को जिस तर्क से समझा जाता रहा है,  उससे हमारी समझ  आरंभ से ही अलग है अतः हम इन परिवर्तनों को संस्कृत की विकास-प्रक्रिया में  योगदान करने वाली भारतीय बोलियों  की भूमिका का हाथ मानते हैं, जिनकी ध्वनि संपदा  परस्पर कुछ भिन्न थी। तमिल की  इस समस्या को समझने में सबसे बड़ी भूमिका हम यह मानते हैं  कि  उसको सामने रखकर ही हम यह समझ सकते हैं अधिकांश दूसरी बोलियों की ध्वनि संख्या उससे मिलती-जुलती थी।  यदि  एक सिरे पर  तमिल थी,  दूसरे सिरे पर भोजपुरी  जिसमें  सघोष महाप्राण ध्वनियों के लिए  विशेष आग्रह देखने में आता है। अनेक ऐसी बोलियाँ थीं जो  इन दोनों अतियों के बीच पड़ती थीं और  उन्हीं शब्दों को  ग्रहण करते हुए अपनी ध्वनि सीमा में  ढाल लिया करती थीं। काल-क्रम में इन बोलियों का मेल हो गया। इस सामाजिक और भाषिक रचाव को नस्लवादी आग्रहों के कारण समझने से इन्कार करते हुए जिन परिवर्तनों को  ध्वनि नियमों के अनुसार,  अथवा ऐतिहासिक  क्रम  में घटित  परिवर्तन माना जाता रहा।  परंपरावादी भारतीय और आधुनिक पाश्चात्य भाषाविद दोनों नस्लवादी आग्रहोंं से ग्रस्त थे। सज कहें तो ऐतिहासिक कारणों से होने वाले परिवर्तन भी सामाजिक भागीदारी में आए परिवर्तन के परिणाम हैं इसे हम पहले भी स्पष्ट कर आए हैं। भाषा में घटित बदलाव में कुछ हाथ मनुष्य की कौतुकी प्रकृति का रहा है, जिसमें वह जानता भी नहीं कि प्रचलित शब्द का अपने आत्मीय के लिए परिवर्तित करने के साथ जो प्रयोग कर रहा है, वह अर्थ को संवेद्य बनाते हुए भाषा की प्रकृति को भी प्रभावित कर रहा है।[1]

हम पाते हैं कि ज्ञानी के लिए सं. में क्न/क्नु प्रचलित था जो वचक्नु = वाग्विद, वाचक्नवी - वाग्विदा (गार्गी) में बचा रह गया है।  हिं. का जाना सं. की गम् धातु से और जानना ज्ञा धातु से नहीं निकले हैं जाना अधिक पुराना रूप है जिसे समेटने के लिए गम् के कौरवी रूप ग्म का प्रयोग हुआ पर चल नहीं पाया,  तो ज्म रूप कल्पित किया गया पर जम/यम - यमति/ जमति, याति/जाति रूप चलन में रहे। इसी तरह जानना ज्ञान से अधिक पुराना है जो रूपावली में, जानाति, जानन्ति, जानतां  साफ दिखाई देता है।  ऋ. में ज्ञ का उत्पादन, जनन जिसने सर्वकल्याणी धरती और आकाश को पैदा किया)  (यो जजान  रोदसी विश्वशंभुवा; जिसने पत्थर के भीतर आग पैदा की, यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान..;  जिसने सूर्य को और उषाओं को पैदा किया (यो सूर्यं यो उषसः जजान; अपनी महिमा से श्वेत और अरुणाभ रंगों को पैदा किया (श्वेतं जज्ञानमरुषं महित्वा ।
 
और कभी कभी जाति और परिवार जन, कुनबे के सभी लोग सो जाएँ (ससन्तु सर्वे ज्ञातयः)  आशयों में हुआ है। ज्ञान के आशय में दो तीन बार ही प्रयोग हुआ है,   अज्ञात, अपरिचित दुराग्रही और निकृष्ट शत्रु हमें परास्त न करें (मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो माशिवासो अव क्रमुः); वे अपने निवास को जानते हैं,  ( ते जानत स्वमोक्यं), स्वर्गोपम प्रथम ऋत को जानते हुए (जानन्नृतं प्रथमं यत्स्वर्णरं प्रशस्तये कमवृणीत सुक्रतुः)।

हमारे लिए रोचक बात यह है कि कन्  जल,  उत्पादन,  और  दर्शन  तीनों भाव लिए हुए  प्रयोग में आता रहा ओर यह  भी केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। अंग्रेजी के कीन (keen - eager, acute of mind), किन ( kin- a person of the same family, relatives); किथ (knowledge, native land) शब्दों के कोश में दिए अर्थ से भी इसका आभास होता है, पर केंडल (candle. L. candela from candere ‘to glow’)   candour - whiteness purity, from L. candere - to shine) के विषय में कोई दुविधा नहीं रह जाती कि ‘कन’ से इनका सीधा संबंध है।
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[1]कृष्ण कान्ह, कन्नन, कन्न, कनु बनने के बाद भी कृष्ण ही रहता है परंतु इस कौतुक में कान्हा या कन्हैया बन कर कनवाह या कर्णधार से अभिन्न हो जाने के कारण संसार को भवसागर के रूप में बीच में लाकर उससे पार लगाने की भूमिका में भी पहुँचा देता है जो दुलार से बदली गई ध्वनि में कल्पना में भी नहीं था।

भगवान सिंह 
( Bhagwan Singh )

शब्दवेध (34) मुड़ मुड़ कर भी देख

हम पहले की एक छोटी कड़ी से बात आरंभ करना चाहते हैं।  भारतीय भाषाओं में  भाषा के लिए  कोई  ऐसा शब्द नहीं है  जो सीधे जिह्वा से जुड़ा हो, जबकि पश्चिमी भाषाओं में, लगभग सभी में, सबसे प्रचलित नाम  जिह्वा पर आधारित है - टंग, लैंग्वेज।  मेरी जानकारी की भारतीय भाषाओं में  भाषा के लिए जो शब्द हैं वे  इतने अलग-अलग  स्रोतों से आए हुए हैं कि  अनेक  तो जिह्वा  और होंठ   ही नहीं,  मुख तक से भी संबंधित नहीं किए जा सकते।  हम उनके अर्थ से उनकी संज्ञा पर पहुंचते हैं,  अधिकांश का भाव  प्रकाशन,   विश्लेषण,  आघात,  और ज्ञान है।  यहां हम  इनकी विस्तृत व्याख्या में नहीं जा सकते।   

ध्यान दो तथ्यों की ओर दिलाना चाहते हैं,  पहला यह  कि मनुष्य  दसियों हजार साल  से  बोलता चला आया था परंतु  बोलने की क्रिया  और  भाव को भी कोई नाम दिया जा सकता है इसकी ओर उसका ध्यान बहुत विलंब से ही गया -  तब, जब  उसे  अभिव्यक्ति की भूमिका का पता चल चुका था और वही नामकरण के समय चेतना में सर्वोपरि था।  

इसके बाद भी जैसा कि हम देख आए हैं भाषा के लिए कुछ शब्द हमारे  उच्चारण तंत्रों पर आधारित हैं।  संभव है  भारोपीय भाषा [1] ईरान में पहुंची उससे पहले से  वहां भाषा के लिए जिह्वा की सक्रियता और  निर्णयकारी भूमिका को देखते हुए जबान  का प्रयोग चलन में आ चुका रहा हो।  जिह्वा की  जिस भूमिका की और ध्यान प्रमुख रूप में  हमारे विचार-केंद्र था, वह था इसका स्वादग्राही  पक्ष  - रसना, यद्यपि उच्चारण में इसकी भूमिका के विषय में जितनी बारीक जानकारी भारतीय वैयाकरणों को थी वह दूसरे देशों से बहुत आगे थी।  परंतु यह जानकारी  उच्चारण स्थानों  के जिह्वा द्वारा स्पर्श तक सीमित थी, उच्चारण उन स्थानों की  भूमिका से संभव हो पाता था।,  

इसके जिस दूसरे  गुण की ओर उनका ध्यान गया  वह थी  इसकी वक्रता,  या मुड़ने की क्षमता जो  उच्चारण में ‘जिह्वा’ के  सबसे निकट पड़ने वाले  ‘जिह्म’  शब्द से ध्वनित होता है।  और रिह, लिह, लेलिह्यमान से  जो प्रकट है, वह भी  चखने, चाटने,  निगलने  से संबंध रखता है।  अजीब बात है,  चखना, चक्षण- देखना, (स्वाद) जानना  का ओर ध्यान गया, तो भी बोलने की तरफ नहीं।   तमिल में  जिह्वा का जो पर्याय  हैं वह भी स्वाद लेने से ही संबंधित है।  यह सभी  बनावटी नाम है,  और शब्द गढने वालों  की अपनी  सीमाओं को प्रकट करते हैं।   जो भी हो  आर्थी   स्रोत पर ध्यान देने पर हम पाते हैं कि उर्दू का जबान शब्द  यूरोप तक भाषा के लिए प्रयुक्त हुआ।

यही स्थिति  शब्दों के अर्थ के मामले में पाई जाती है।   भारतीय भाषाओं में  अर्थ के लिए  मन से  जुड़ा कोई शब्द नहीं है,  निचोड़ने (अर्थ, निष्कर्ष,आशय ) सार तत्व (सारांश), हृदय को प्रभावित करने वाला भाव (मर्म) से जुड़े शब्द हैं,   और  धारणा  या स्थापना (मान्यता, मन्तव्य)  अवश्य देखने में आते हैं।   ईरानी क्षेत्र में  ‘मानी’, या मान्यता को ही अर्थ का द्योतक  माना गया।  यही यूरोप तक पहुंचा  जिसमें हम अंग्रेजी में मीनिंग शब्द को प्रयोग में आते देखते हैं।

शब्दों का एक विशेष दिशा में प्रभाव और उसके पीछे के हिस्से में उसका अभाव किस बात का  द्योतक है ?  मैक्समुलर ने  ऐसे शब्दों का संकलन किया था जो भारत में नहीं पाए जाते परंतु आगे यूरोप तक पाए जाते हैं।   इन्हीं के आधार पर उसने यह दावा किया था  मेरे पास इस बात के निर्णायक प्रमाण हैं कि  भाषा भारत से  ईरान में पहुंची थी  न कि इसके विपरीत। उनके अपने ही ठोस प्रमाण के आधार पर यह सिद्ध होता था भारोपीय भाषा भारत से निकलकर यूरोप तक फैली है।   

मैक्स मूलर ने  भारोपीय के स्थान पर,  शब्द की  संक्षिप्तता को देखते हुए  इस भाषा के लिए “ आर्य भाषा”  के प्रयोग का  सुझाव दिया था,   और  उसमें भी  यह दिखाया था की आर्य शब्द  का प्रसार आयरलैंड तक है,   परंतु ज्यों ज्यों हम पश्चिम की ओर बढ़ते जाते हैं,  प्रयोग विरल होता जाता है।  

सत्य किसी अंग में नहीं होता,   अपने  पूरे पिंड में समाया होता है, और   पाश्चात्य अध्येताओं ने  जब भी इसके किसी  को्ण को ईमानदारी से परखने का प्रयत्न किया तो उनके नतीजे ठीक वही आते थे जो मैंक्स मुलर के ऊपर के कथन में मूर्त है।   परंतु   बेईमानी  की हद यह कि  स्वयं  मैक्स मूलर   अपने खोए हुए सच का  सामना नहीं कर सके। उपनिवेशिक तकाजों और नस्लवादी पूर्वाग्रहों से  उन्हें लीपापोती करते हुए मूल निवास को मध्य एशिया में स्थापित करने की, और यूरोप के अलग-अलग जत्थों को अलग अलग होकर वहीं से भेजने की  कवायद करनी पड़ी।

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[1] हम पीछे कह आए हैं कि  संस्कृत अथवा  वैदिक भाषा की तुलना में  भारोपीय शब्द  आज का  गढ़ा हुआ  होने के बाद भी,  इस दृष्टि से अधिक उपयुक्त है कि  यह संस्कृत नहीं थी,  वैदिक कालीन बोलचाल की भाषा थी जो संस्कृत के निकट थी परंतु  इसके चरित्र को निर्धारित करने वाले वे सभी लोग थे जो विदेश व्यापार में किसी ना किसी भूमिका में सक्रिय थे।और जो  अपने दायरे में घर से लेकर बाहर तक अपनी बोली नहीं बात करते थे। भारोपीय संकल्पना में यह तथ्य सम्मिलित नहीं है परंतु  उसका चरित्र ही निर्धारित नहीं है  इसलिए उसमें इन सभी को शामिल किया जा सकता है और उसे नए सिरे से परिभाषित किया जा सकता है।

भगवान सिंह
( Bhagwan Singh )

नये कृषि कानून में जमाखोरी को क्यों वैध बनाया गया है ? / विजय शंकर सिंह

8 दिसंबर, को किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में भारत बंद का आह्वान किया था। बंद सफल रहा । सबसे उल्लेखनीय बात थी कि, इस बंद में देश मे कहीं से भी हिंसा के समाचार नहीं मिले। लंबे समय के बाद, देश मे जनहित के मुद्दे पर जनता जागरूक दिखी और उसने अपने हक़ के लिये आवाज़ उठाई। सभी विरोधी दल, कुछ को छोड़ कर किसानों के इस बंद के साथ थे। जो बंद के साथ नहीं थे, वे भी किसान आंदोलन के ही पक्ष में खड़े रहे। बंद की सफलता का सरकार पर प्रभाव, केवल इसी से लगाया जा सकता है कि बंद के ही दिन गृहमंत्री अमित शाह ने किसान संगठनों को बातचीत के लिये बुलाया। किसान संगठनों का एक प्रतिनिमंडल सीपीएम नेता हन्नान मोल्लाह के नेतृत्व में अमित शाह से मिला भी। पर वहां भी बात नहीं बनी। किसानों ने एक और केवल एक ही मांग रख दी, कि पहले यह तीनों कृषि कानून सरकार वापस ले तब आगे की बात हो। 

सरकार ने 9 दिसम्बर को होने वाली सरकार - किसान वार्ता टाल दी और किसानों को समस्या के समाधान हेतु एक प्रस्ताव दिया, जिंसमे यह भी अंकित था कि सरकार एमएसपी को सुनिश्चित करेगी। लेकिन इसका कोई उल्लेख नहीं था कि, वह आखिर इसे सुनिश्चित करेगी कैसे। सबसे आश्चर्यजनक कदम, सरकार द्वारा जमाखोरी को वैध बनाने के कानून से जुड़ा था, जिसपर एक शब्द भी नही कहा गया। यह बात किसी के भी समझ से परे है कि, आखिर, जमाखोरों को जमाखोरी की अनुमति कानूनी रूप से वैध बनाने से किस किसान का भला होगा। यह एक सामान्य सी बात है कि, जमाखोरी से बाजार में कृत्रिम कमी पैदा की जाती है और फिर दाम बढ़ने घटने के मूल आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, चीजों की कीमतें बढ़ने लगती हैं। फिर जैसे ही बाजार में जमा की हुयी चीजें झोंक दी जाती हैं तो, फिर कीमत गिरने लगती है। यह एक प्रकार से बाजार को नियंत्रित करने का पूंजीवादी तरीका है। पहले ईसी एक्ट या आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत सरकार को यह शक्ति मिली थी कि वह कृत्रिम रूप से बाजार में बनाये जा रहे चीजों की कमी और अधिकता को नियंत्रित कर सके। और जैसे ही ईसी एक्ट में छापे पड़ने लगते थे, चीजों के दाम सामान्य होने लगते थे। अब न तो यह कानून रहा और न ही जमाखोरी कोई अपराध। अब पूरा बाजार, उपभोक्ता, किसान सभी इन्ही जमाखोरों के रहमो करम पर डाल दिये गए हैं। यह कानून खत्म कर के सरकार ने खुद को ही महंगाई के घटने बढ़ने से अलग कर लिया है। 

जब नमक बनाकर नमक कानून तोड़ने के दृढ़ संकल्प के साथ,  महात्मा गांधी, दांडी के लिये, अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से 12 मार्च 1930 को निकले थे तब उनके साथ केवल कुछ ही लोग थे। 14 से 16 घँटे पैदल चल कर 24 दिन के बाद 6 अप्रैल 1930 को जब वे सागर तट पर पहुंचे, तो उनके साथ अपार भीड़ थी, जन समूह था। शुरुआत में इस यात्रा को हल्के में लेने वाली ब्रिटिश हुकूमत का अमला भी था। जब इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनी तो,  किसी को नहीं पता था कि एक चुटकी नमक से दुनिया का सवसे ताकतवर साम्राज्य कैसे हिल जाएगा ? इसका मज़ाक़ अंग्रेजों ने भी उड़ाया और उन लोगो ने भी शंका की दृष्टि से गांधी के इस कदम को देखा, जो स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी के साथ थे । पर जब गांधी जी ने सागर तट से सागर जल लेकर एक चुटकी नमक उछाल दिया तो साम्राज्य का इकबाल दरकने लगा।

उल्लेखनीय है कि भारत में अंग्रेजों के समय नमक उत्पादन और विक्रय के ऊपर बड़ी मात्रा में कर लगा दिया था और नमक जीवन के लिये आवश्यक वस्तु होने के कारण भारतवासियों को इस कानून से मुक्त करने और अपना अधिकार दिलवाने हेतु ये सविनय अवज्ञा का कार्यक्रम आयोजित किया गया था।  कानून भंग करने के बाद सत्याग्रहियों ने अंग्रेजों की लाठियाँ खाई थी परंतु पीछे नहीं मुड़े थे. इस आंदोलन में कई नेताओं को गिरप्तार कर लिया। यह आंदोलन पूरे एक साल चला और 1931 को गांधी-इर्विन समझौते से खत्म हो गया। सरकार झुकी। और वह सरकार झुकी जिसके साम्राज्य में सूरज नही डूबता था और जो सागर की लहरों पर शासन करता था।

आज हमारी सरकार ने, नये तीन कृषि कानूनों द्वारा, उन कृषि उत्पादों को भी, जो जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें हैं, को आवश्यक वस्तु की सूची से ही नही निकाल दिया गया है, बल्कि जो कानून जमाखोरी को अपराध घोषित करता था उसे ही सरकार ने खत्म कर दिया है।  यानी अब जो चाहे,जितना चाहे और जब तक चाहे, उन आनाज फसल, कृषि उत्पादों का असीमित भंडारण कर सकता है। बाजार में मांग और पूर्ति का संतुलन बिगाड़ सकता है। चाहे वह अकाल जैसी स्थिति दैवी आपदाओं के समय ला सकता है। 1941 42 के समय बंगाल का अकाल ऐसे ही जमाखोरों की करतूत का परिणाम था, जिसके ऊपर ब्रिटिश सरकार का वरदहस्त था। 

कल्पना कीजिए, अगर जमाखोरों का एक सिंडिकेट बन जाय और देश भर के कृषि उत्पाद के खरीद, विक्रय और भंडारण को नियंत्रित करने लगे तब सरकार के पास ऐसा कौन सा कानून है जो उसके अंतर्गत जमाखोरों के खिलाफ वह कोई कानूनी कार्यवाही कर सकेगी ? यह आंदोलन किसानों के लिये कितना लाभकारी है और कितना हानिकारक, इसका अध्ययन किसान संगठन और कृषि अर्थशास्त्री कर ही रहे हैं, पर यह कानून, सबको प्रभावित करेगा। बिचौलियों को खत्म करने के नाम पर लाया गया यह कानून, अंततः जमाखोरों और मुनाफाखोरों के लिए एक पनाहगाह के रूप में ही बन कर रह जायेगा। न केवल जनता बल्कि सरकार खुद ही अपने पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम सरकारी राशन प्रणाली, खाद्य सुरक्षा कानून आदि के क्रियान्वयन के लिये इन्ही जमाखोरों के सिंडिकेट पर निर्भर हो जाएगी। 

हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हैं, पर 12 अक्टूबर, 2020 को जारी किए गए ‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ में शामिल 117 देशों में भारत को 94 वां स्थान प्राप्त हुआ है। हम अपने पड़ोसी देशों में नेपाल, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान से ही बेहतर स्थिति में हैं। सरकार ने खुद ही 80 करोड़ लोगों को गेहूं चना तथा अन्य खाद्यान्न अभी दिया है। ऐसी स्थिति में जब 80 करोड़ लोग सरकार प्रदत्त खाद्यान्न सुविधा पर निर्भर हैं तो सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म कर के जमाखोरी को वैध बना देने का कानून मेरी समझ से बाहर है। भूख की पूर्ति मनुष्य की प्रथम आवश्यकता है, पर सरकार इस समस्या के प्रति भी असंवेदनशील बनी हुयी है। यह निंदनीय है और शर्मनाक भी। 

क्या अधिक लोकतंत्र से आर्थिक सुधारों को लागू करने में नीति आयोग को मुश्किलें आ रही हैं ? अगर नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत की बात सुनें तो लगता है कि लोकतंत्र आर्थिक सुधारों की दिशा में एक बाधा है। देश के थिंकटैंक, नीती आयोग के प्रमुख अमिताभ कांत ने कहा है कि, देश मे लोकतंत्र कुछ ज्यादा ही है, इस लिये आर्थिक सुधारों में दिक्कत हो रही है। हालांकि पीटीआई के हवाले से कहा गया उनका बयान, सार्वजनिक होते ही, विवादित हो गया फिर उनकी यह सफाई भी आ गयी कि, उनका यह आशय नहीं था। पर एक सवाल अक्सर उठता है कि आर्थिक  सुधार के ये कार्यक्रम किसका सुधार कर रहे हैं ? 

31 मार्च 2020 तक, जब कोरोना ने अपनी हाज़िरी दर्ज भी नहीं कराई थी, तब तक जीडीपी गिर कर, अपने निम्नतम स्तर पर आ चुकी थी। आरबीआई से उसका रिज़र्व लिया जा चुका था। तीन बैंक, यस बैंक, पंजाब कोऑपरेटिव बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक बैठ गए थे, बैंकिंग सेक्टर को बचाने के लिये कुछ बैंकों को एक दूसरे में विलीन करना पड़ा। बैंकों में अब कितना आर्थिक सुधार चाहिये सर ?

हम जीडीपी में बांग्लादेश से भी पीछे हैं। बेरोजगारी चरम पर है। 2016 के बाद सरकार ने बेरोजगारी के आंकड़े देना बंद कर दिये हैं। मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स गिरने लगा और इतना गिरा कि शून्य से नीचे आ गया। आयात निर्यात में कमी आयी। भुखमरी इंडेक्स में हम 107 देशों में 94 नम्बर पर आ गए । प्रसन्न वदनं के देश मे खुशहाली इंडेक्स में हम 144 वे स्थान पर रौनक अफरोज हैं। जीडीपी यानी विकास दर ही नहीं गिर रही है, बल्कि जीडीपी संकुचन की ओर बढ़ रही है। 

अब लोकतंत्र का हाल देख लीजिए। 'डेमोक्रेसी के वैश्विक सूचकांक' में भारत की रैंक में 10 स्थानों की गिरावट, यानी 41 से 51वें स्थान पर हम फिलहाल हैं।भारत की स्थिति अब पाकिस्तान से ही कुछ बेहतर है। भारत को दोषपूर्ण लोकतंत्र की श्रेणी में रखा गया है जबकि दुनिया मे श्रेष्ठ लोकतंत्र नार्वे का माना गया है. दूसरे नंबर पर आइसलैंड और तीसरे स्थान पर स्वीडन है. इसके बाद यूरोप के अन्य देश-फिनलैंड, स्विट्जरलैंड और डेनमार्क आदि हैं।

कानून और व्यवस्था की स्थिति तथा अपराध, जब कर्फ्यू लगा दिया जाता है तब बिलकुल नियंत्रित हो जाता है। पर इसके लिये पूरे शहर को तो नीम बेहोशी की हालत में बराबर नही रखा जा सकता है ! नीति आयोग एक एक्सपर्ट थिंक टैंक है। वह देश की आर्थिक बेहतरी के लिए  सोचता है और योजनाएं बनाता है। पर 2016 के बाद जब से नोटबन्दी हुयी देश की अर्थव्यवस्था गिरती ही चली गयी। नोटबन्दी किसका आइडिया था सर ? आप यानी नीति आयोग का या किसी और का ? 

एक बात स्प्ष्ट है, यदि आर्थिक सुधारों के एजेंडे के केंद्र में जनता, जनसरोकार, लोककल्याणकारी राज्य के उद्देश्य और जनहित के कार्यक्रम नहीं हैं तो वह और जो कुछ भी हो, सुधार जैसी कोई चीज नहीं है। लोग व्यथित हों, पीड़ित हों, खुद को बर्बाद होते देख रहे हों, और जब वे अपनी बात, अपनी सरकार से कहने के लिए एकजुट होने लगें तो थिंकटैंक को इसमे टू मच डेमोक्रेसी नज़र आने लगी ! इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि इन सब आर्थिक सुधारों की कवायद के केंद्र में, जनता के बजाय कोई और है। और जो है, वह अब अयाँ है। 

जैसे ब्रिटिश काल मे विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार हुआ था, और वह भी एक जनांदोलन बन गया था, वैसे ही कहीं आने वाले समय मे अम्बानी और अडानी से जुड़े कॉर्पोरेट के खिलाफ जनता का आक्रोश न शुरू हो जाय। तीन कृषि कानूनो पर सरकार का रवैया, जनता और किसान समस्याओं के समाधान के बजाय, कॉरपोरेट या अम्बानी अडानी के हित की तरफ अधिक झुका लग रहा है। किसान संगठन ने सरकार का कानून में संशोधन के प्रस्ताव खारिज कर दिए हैं और वे अब भी इन कानूनों के वापस लेने के अतिरिक्त किसी अन्य विकल्प पर राजी नहीं है। आंदोलन लंबा चलेगा। यह हिंसक न हो और सिविल नाफरमानी की राह पर ही रहेगा तो अपने लक्ष्य में सफल भी होगा। सरकार को भी चाहिए कि अगर कानून को फिलहाल वह रद्द नहीं करती है तो उसे स्थगित करे और नए सिरे से कृषि सुधारो के लिये किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों और अन्य कानूनी एक्सपर्ट की एक कमेटी बना कर एक तय समयसीमा में नए कानून लाये और समस्या का समाधान ढूंढे। 

( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 9 December 2020

8 दिसंबर के भारत बंद के बाद किसान आंदोलन / विजय शंकर सिंह

8 दिसंबर, को किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में भारत बंद का आह्वान किया था। बंद सफल रहा । सबसे उल्लेखनीय यह बात थी कि, इस बंद में देश मे कहीं से भी हिंसा के समाचार नहीं मिले। लंबे समय के बाद, देश मे जनहित के मुद्दे पर जनता जागरूक दिखी और उसने अपने हक़ के लिये आवाज़ उठाई। सभी विरोधी दल, कुछ को छोड़ कर किसानों के इस बंद के साथ थे। जो बंद के साथ नहीं थे, वे भी किसान आंदोलन के ही पक्ष में खड़े रहे। बंद की सफलता का सरकार पर प्रभाव, केवल इसी से लगाया जा सकता है कि बंद के ही दिन गृहमंत्री अमित शाह ने किसान संगठनों को बातचीत के लिये बुलाया। किसान संगठनों का एक प्रतिनिमंडल हन्नान मोल्लाह के नेतृत्व में अमित शाह से मिला भी। पर वहां भी बात नहीं बनी। किसानों ने एक और केवल एक ही मांग रख दी, कि पहले यह तीनों कृषि कानून सरकार वापस ले तब आगे की बात हो। 

सरकार ने 9 दिसम्बर को होने वाली सरकार - किसान वार्ता टाल दी और किसानों को समस्या के समाधान हेतु एक प्रस्ताव दिया, जिंसमे यह भी अंकित था कि सरकार एमएसपी को सुनिश्चित करेगी। लेकिन इसका कोई उल्लेख नहीं था कि, वह आखिर इसे सुनिश्चित करेगी कैसे। सबसे आश्चर्यजनक कदम, सरकार द्वारा जमाखोरी को वैध बनाने के कानून से जुड़ा था, जिसपर एक शब्द भी नही कहा गया। यह बात किसी के भी समझ से परे है कि, आखिर, जमाखोरों को जमाखोरी की अनुमति कानूनी रूप से वैध बनाने से किस किसान का भला होगा। यह एक सामान्य सी बात है कि, जमाखोरी से बाजार में कृत्रिम कमी पैदा की जाती है और फिर दाम बढ़ने घटने के मूल आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, चीजों की कीमतें बढ़ने लगती हैं। फिर जैसे ही बाजार में जमा की हुयी चीजें झोंक दी जाती हैं तो, फिर कीमत गिरने लगती है। यह एक प्रकार से बाजार को नियंत्रित करने का पूंजीवादी तरीका है। पहले ईसी एक्ट या आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत सरकार को यह शक्ति मिली थी कि वह कृत्रिम रूप से बाजार में बनाये जा रहे चीजों की कमी और अधिकता को नियंत्रित कर सके। और जैसे ही ईसी एक्ट में छापे पड़ने लगते थे, चीजों के दाम सामान्य होने लगते थे। अब न तो यह कानून रहा और न ही जमाखोरी कोई अपराध। अब पूरा बाजार, उपभोक्ता, किसान सभी इन्ही जमाखोरों के रहमो करम पर डाल दिये गए हैं। यह कानून खत्म कर के सरकार ने खुद को ही महंगाई के घटने बढ़ने से अलग कर लिया है। 

किसानों का यह आंदोलन, केंद्र सरकार द्वारा तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लम्बे समय से चल रहा है। पहले यह कानून एक अध्यादेश के रूप में जून 2020 में लाये गए, जिसे बाद में संसद से पारित करा कर क़ानून के रूप में लागू कर दिया। यह कानून, अनाज की मंडियों में निजी या कॉरपोरेट क्षेत्र के प्रवेश, जमाखोरी को अपराध मानने वाला कानून खत्म करने और कांट्रेक्ट फार्मिंग को वैधानिक स्वरूप देने के बारे में हैं। इसका सबसे अधिक विरोध पंजाब और हरियाणा में जहां उन्नत कृषि व्यवस्था और सरकारी मंडियों का एक सुनियोजित संजाल है, वहां से शुरू हुआ और फिर धीरे धीरे यह आंदोलन पूरे देश मे फैल गया। पंजाब में किसानों के धरने के बाद किसानों ने दिल्ली चलो का आह्वान किया और वे सरकार की तमाम बंदिशों के बाद भी दिल्ली पहुंचे पर जब उन्हें दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दिया गया तो, उन्होंने सिंघु सीमा पर धरना दे दिया। यह धरना 11 दिनों से चल रहा है और उसी के क्रम में 8 दिसंबर को भारत बंद का आयोजन किसान संघर्ष समिति की तरफ से किया गया है। शुरुआत में यह आंदोलन, पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित रहा, पर अब इसका प्रभाव, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक पहुंच गया है। साथ ही वे राज्य जो दिल्ली से दूर हैं, उनके यहां भी किसान अपनी अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलित हैं। 8 दिसंबर का बंद कितना व्यापक रहता है और इसका क्या असर सरकार पर पड़ता है इसका पता तो 9 दिसम्बर के बाद ही लग पायेगा। 

कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है और इस वार्ता का अगला क्रम 9 दिसंबर को भी प्रस्तावित है। 3 दिसंबर को, केंद्र सरकार के साथ हुई बातचीत को लेकर 4 दिसंबर को एक बार फिर किसान संगठनों ने आपस में चर्चा की और संयुक्त किसान मोर्च की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि  किसान, तीनों कानून को रद्द करे बिना, नहीं मानेंगे । हालांकि, सरकार इन कानूनों में, कुछ संशोधन करने के लिए तैयार है लेकिन किसानों ने सरकार से साफ कह दिया है कि सरकार तीनों कानून वापस ले। इन मांगों में प्रस्तावित बिजली अधिनियम 2020 को वापस लेने की भी मांग जुड़ गयी है। 

तीनो कृषि कानूनो को लेकर यह आशंका उठ रही है कि यह तीनों कानून खेती किसानी की संस्कृति और परम्परागत खेती को नष्ट कर देंगे और लंबे समय से हुए भूमि सुधार के अनेक कदम प्रतिगामी हो जाएंगे। इस आंशका का आधार आखिर क्या है ? कैसे किसान विरोधी यह तीन कानून देश की कृषि व्यवस्था की कमर तोड़कर किसानों को, कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के गुलाम बनाने के लिए और आम जनता के लिये खाने पीने की चीजों को महंगा कर कॉरपोरेट की जेबें भरने के लिए लाए गए हैं ? 

संक्षेप में इसे देखें, 
● कॉरपोरेट की पहली समस्या थी, कि, कृषि संविधान की समवर्ती सूची में है। अर्थात, इस विषय पर केंद्र और राज्य दोनों ही इससे संबंधित कानून बना सकते हैं। ऐसे में अलग अलग राज्यों में उनकी कृषि व्यवस्था के अनुसार, अलग अलग, कानून उन राज्यों ने बनाये हैं। उनके यहां फसल की खरीद, उन्ही नियम और कायदों से की जाती है। कॉरपोरेट को अलग अलग राज्यो में कृषि उत्पाद खरीदने के लिये अलग अलग नियम कायदों से रूबरू होना पड़ता है। अब कॉरपोरेट की इस समस्या का यही हल था कि, कोई एक कानून ऐसा बने जो सभी राज्यो पर समान रूप से लागू हो। 
कॉरपोरेट की इस समस्या के समाधान के लिये राज्यों के अधिकार का अतिक्रमण करते हुए, केंद्र सरकार ने, पूरे देश के लिए एक अलग एक्ट बना दिया। इस एक्ट में किसी को कहीं भी फसल बेचने का अधिकार दे दिया गया। 

● कॉरपोरेट की दूसरी समस्या थी कि, यदि कॉरपोरेट पूरे देश के किसानों से खाद्यान्न खरीदेंगे और उसका भंडारण करेंगे, तो इसमे सबसे बड़ी बाधा, विभिन्न राज्यों द्वारा बनाये गए जमाखोरी  रोकने के लिये बने कानून हैं। इसमें सबसे बड़ी बाधा, आवश्यक वस्तु अधिनियम, ईसी एक्ट था। यह कानून, भंडारण की सीमा तय करने और जमाखोरी को रोकने के लिये तरह तरह की बंदिशें लगाता था। इन कानूनो के कारण, कॉरपोरेट कोई भी खाद्यान्न अधिक मात्रा में लंबे समय तक अपने गोदामो में स्टोर नहीं कर सकता था। कॉरपोरेट का इरादा ही है फसल या खाद्यान्न किसानों से मनमाने दाम पर खरीद कर उसे स्टोर करना और जब बाजार में बढ़े भाव हों तो उसे बेचने के लिये बाजार में निकालना। इस प्रकार कॉरपोरेट बाजार पर अपना नियंत्रण बनाये रखना चाहता है। पर ईसी एक्ट कॉरपोरेट के इस इरादे पर अंकुश की तरह था। 
कॉरपोरेट की इस समस्या का समाधान, केंद्र सरकार नेआवश्यक वस्तु अधिनियम को खत्म कर और जमाखोरी को वैध बना कर, कर दिया। अब खाद्यान्न की जमाखोरी कितनी भी मात्रा तक और कितने भी समय तक करना अपराध नहीं रह गया।

● कॉरपोरेट के सामने तीसरी बड़ी  समस्या थी कि, किसान तो फसल अपनी ज़रूरत मर्जी से उगाते हैं, और इस पर सरकार या किसी का कोई दबाव नहीं है।
इस समस्या के समाधान के लिये केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून  बना दिया जिससे किसान को अब कॉन्ट्रेक्ट में बांध कर कॉरपोरेट ही निर्देशित करेगा की किस प्रकार की फसल किसान को उगानी है।

पंजाब ही नहीं भारत मे किसान आंदोलनों का एक समृद्ध इतिहास रहा है। पंजाब के किसान प्रतिरोध का इतिहास तो, 1906 - 07  से शुरू होता है, जब शहीद भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह ने पगड़ी सम्भाल जट्टा नाम से एक किसान आंदोलन की शुरूआत की थी। आज के इस आंदोलन के समर्थन में, कनाडा, यूरोप, अमेरिका, इंग्लैंड, हर जगह लोग प्रदर्शन औऱ एकजुटता प्रदर्शित कर रहे है। हालांकि भारत सरकार ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो के बयान पर अपने आंतरिक मामलों में दखल बताया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है। 9 दिसंबर की सरकार और किसानों की बातचीत में यह आशा की जानी चाहिए कि किसानों की मांग सरकार स्वीकार कर लेगी और अगर सरकार के पास कोई अन्य कृषि सुधार का एजेंडा है तो, सरकार उसे भी किसान संगठनों से बातचीत कर के आगे बढ़ेगी। 

सरकार का यह स्टैंड है कि, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो का किसान आंदोलन को समर्थन हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है। इसे कूटनीतिक परंपरा के विपरीत मानते हुए, विदेश मंत्रालय द्वारा, कनाडा के उच्चायुक्त को यह बात समझा भी दी गयी है। 
लेकिन, यूरोपीय यूनियन के देशो के सांसदों द्वारा , भारतीय सांसदों को दरकिनार कर कश्मीर घाटी का दौरा कराना, और उनसे यह सर्टिफिकेट लेना कि कश्मीर में  सब ठीक है, क्या हमारे आंतरिक मामलों में जानबूझकर कर यूरोपीय यूनियन को दखल करने के लिये आमंत्रित करना नहीं था ? 
हाउडी मोदी के दौरान, अब की बार ट्रम्प सरकार की बात सार्वजनिक रूप से एक जनसभा में प्रधानमंत्री जी द्वारा कहना, क्या अमेरिका की अंदरूनी राजनीति में वह भी तब, जबकि वहां चुनाव साल भर के अंदर होने वाले हों तो, एक हस्तक्षेप नहीं है ? 
किसान आंदोलन के समर्थन में अमेरिका, यूरोप, इंग्लैंड आदि देशों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रवक्ता ने भी इस आंदोलन के पक्ष में अपने बयान जारी किए हैं। 

किसान बिल पर बीजेपी का कहना है कि उसने कांग्रेस का ही एजेंडा पूरा किया है। सरकार के अनुसार,  कांग्रेस का वायदा एपीएमसी क़ानून को समाप्त करने का था, ताकि कृषि व्यापार को सभी बंदिशों से मुक्त किया जा सके। यह बात अर्धसत्य है। कांग्रेस ने इसके साथ कुछ राइडर भी रखे थे। सुरक्षा कवच के रूप में रखे गए यह राइडर, भी कांग्रेस के घोषणा पत्र का अंग थीं। पत्रकार आवेश तिवारी ने इन सुरक्षा कवच का उल्लेख अपनी फेसबुक वॉल पर किया है। उसे मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।
● पहला: अभी एक मंडी औसतन साढ़े चार सौ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करती है। काँग्रेस का  वायदा इसे समाप्त कर हर प्रमुख गांव में ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ किसान बाज़ार तैयार करने का था। 
● दूसरा: कांग्रेस  ने वायदा किया था कि किसानों के हितों की रक्षा के लिए कृषि आयात और निर्यात की एक विशेष पॉलिसी तैयार की जाएगी।
● तीसरा: कांग्रेस ने एमएसपी तय करने नया का सिस्टम सुझाया था। अभी एमएसपी का निर्धारण कमीशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस ( सीएसीपी ) तय करता है। कांग्रेस का वायदा था कि इसे हटाकर एमएसपी तय करने की ज़िम्मेदारी एक नेशनल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर डेवलपमेंट एंड प्लानिंग ( एंसीएडीपी ) की होनी चाहिए। इस नए कमीशन में किसान भी मेंबर होंगे और उनका परामर्श भी फसल की कीमत तय करते ध्यान में रखा जाएगा।ऐसा वायदा इसलिए किया गया था क्योंकि अभी किसानों की राय को मानना अनिवार्य नहीं है। उनकी राय को नकारा जा सकता है।
● चौथा: सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच कांग्रेस की न्याय योजना थी, जिसमें हमने देश की 20% सबसे ग़रीब परिवारों को 72,000 रुपया सालाना देने का वायदा किया था। ये परिवार सीमांत किसानों और खेतिहर मज़दूरों के हैं.
● पांचवां: सुरक्षा कवच के रूप में खाद्य सुरक्षा क़ानून को ठीक से लागू करना था। यह क़ानून यूपीए की सरकार ने बनाया था जिसके अंतर्गत देश के 70% लोग इसका फ़ायदा उठा सकते हैं। 
यदि इस क़ानून को ठीक से लागू किया जाता है तो किसानों से सरकारी ख़रीद बहुत बढ़ जाएगी।लेकिन मोदी सरकार तो इसे उल्टा कमज़ोर करने की तैयारी में है। 2020 के इकोनॉमिक सर्वे में सरकार ने खाद्य सुरक्षा क़ानून के दायरे में आने वाली जनता की संख्या को 70% से कम करके 20 प्रतिशत तक सीमित करने का सुझाव दिया है।

किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस काटजू ने अपने ब्लॉग में सरकार को इसका हल सुझाते हुए कुछ विकल्प बताए हैं। उन्होंने इस आंदोलन को हाल का सबसे बड़ा आंदोलन बताया है। उनके अनुसार, 
● बहुत लम्बे समय बात देश में कोई आंदोलन हो रहा है जो जाति/धर्म की सीमाओं को तोड़ रहा है...
● राम मंदिर का आंदोलन हिंदुओं का था।
● जाट, गुज्जर, एससी/एसटी, मुसलमान वग़ैरह भी अलग अलग आंदोलन करते रहे हैं।
● लेकिन किसानों का यह आंदोलन ऐतिहासिक है, जिसमें सभी जातियों/ धर्मों का समावेश है..क्योंकि सभी धर्म और जातियाँ किसी न किसी रूप में खेती किसानी से जुड़ी हैं। 

इसका समाधान सुझाते हुए, जस्टिस काटजू ने कहा है कि, 
● सरकार एक अध्यादेश जारी करके इन क़ानूनों को “कंडिशनल लेजिसलेशन” घोषित कर सकती है। 
● “कंडिशनल लेजिसलेशन” वे क़ानून होते हैं जो अस्तित्व में तो होते हैं लेकिन ज़रूरत पड़ने पर ही लागू किए जाते हैं।
● ऐसा हुआ तो ये क़ानून वापस भी नही होगा और इस पर तत्काल अमल भी नही होगा। यह बीच का रास्ता है। 
● इस बीच एक आयोग बने जिसमें सरकार, किसानों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ हों और वो इन क़ानूनों की समीक्षा करे। 
लेकिन यह तभी सम्भव है जब सरकार किसानों की समस्या के प्रति गम्भीर हो। 

गृहमंत्री से वार्ता की विफलता और 9 दिसंबर को सरकार के प्रस्ताव को किसानों द्वारा खारिज कर दिए जाने के बाद, यह आंदोलन सरकार के साथ साथ कॉरपोरेट के भी खिलाफ हो गया है। कॉरपोरेट में भी यह आंदोलन मुख्यतः रिलायंस और अडानी ग्रुप के खिलाफ है। जनता में यह सामान्य धारणा बैठ गयी है कि आर्थिक सुधारों के नाम पर लाये जाने वाले तमाम कानून कहीं न कहीं इन्ही दो घरानों के हितसाधक हैं। किसानों ने रिलायंस और अडानी ग्रुप के उत्पादों के बहिष्कार की घोषणा की है।

( विजय शंकर सिंह )

पगड़ी संभाल जट्टा, सन 1907 का किसान आंदोलन / विजय शंकर सिंह

सरदार अजीत सिंह, अमर शहीद भगत सिंह के चाचा थे। उन्होंने एक किताब लिखी है, बरीड अलाइव। आज जब देश भर के किसान, दिसंबर की इस ठंड में अपने परिवार के साथ, दिल्ली सीमा स्थित, सिंघु नामक स्थान पर, एक लाख ट्रैक्टरों और अन्य लवाजमे के साथ सरकार द्वारा पारित तीन किसान विरोधी, कृषि कानूनो  को वापस लेने के लिये आंदोलित हैं और, सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं और इसी क्रम में, 8 दिसंबर को जब एक सफल भारत बंद का आयोजन वे कर चुके हैं तो, सरदार अजित सिंह के नेतृत्व में, आज से 113 साल पहले किया गया पंजाब का एक किसान आंदोलन, पगड़ी सम्भाल जट्टा की याद और उसकी चर्चा करना स्वाभाविक है। 

पगड़ी संभाल जट्टा नामक इस किसान  आंदोलन ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। पंजाब के घर-घर से किसान, पगड़ी संभाल जट्टा गाते हुए, अपनी मांगों के समर्थन में पूरे पंजाब में फैल गए थे । तब का पंजाब आज के पंजाब से कई गुना बड़ा था। आज का पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के साथ पाकिस्तान का पंजाब भी, 1907 के पंजाब में शामिल था। तब भी विरोध तीन किसान विरोधी कानूनों का था। यह अलग बात है कि वे आज के तीन कृषि कानूनों की तरह नहीं थे। 

अंग्रेजों ने एक के बाद तीन ऐसे कानून बनाये थे, जो किसानों को पूरी तरह से, अपना गुलाम बना सकते थे। तब के ये तीन कानून थे, दोआब बारी एक्ट, पंजाब लैंड कॉलोनाइजेशन एक्ट और पंजाब लैंड एलियनेशन एक्ट। इन कानूनों के अनुसार, नहर बनाकर विकास करने के नाम पर किसानों से,  औने-पौने दामों पर जबरन उनकी जमीन का अधिग्रहण किया जाने लगा। इसके साथ ही साथ पंजाब सरकार ने कई तरह के टैक्स भी किसानों पर थोप दिए। तब  सरदार अजीत सिंह ने इन कानूनो के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। हालांकि इस आंदोलन को पगड़ी संभाल जट्टा जैसा अलग-सा नाम, सरदार अजित सिंह ने नहीं बल्कि एक पत्रकार ने दिया था। 

मार्च 1907 में पंजाब अब पाकिस्तान के जिला लायलपुर जो अब फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है में किसानों की एक बडी रैली, ब्रिटिश राज द्वारा बनाये गए तीन कृषि कानूनो के खिलाफ हुयी। तब वहां पंजाबी के एक स्थानीय अखबार 'झांग स्याल' ने इस आंदोलन को कवर किया। उस अखबार के सम्पादक थे, बांके दयाल। बांके दयाल ने इस आंदोलन पर एक गीत लिखा औऱ उसे किसानों के आंदोलन के दौरान गाया। गीत के बोल, पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल थे। यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ और बच्चे बच्चे की जुबान पर चढ़ गया। बात में यह गीत, आंदोलनों में गाया जाने वाला एक प्रसिद्ध पंजाबी गीत बन गया। पगड़ी, पंजाबियों और किसानों के लिए स्वाभिमान और गर्व बात होती है और, इससे इस गाने के बोल सीधे जन जन के  सम्मान के प्रतीक बन गए। इसी लोकप्रिय गीत से, इस आंदोलन का नाम ही पगड़ी संभाल जट्टा पड़ गया। 

पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के जनक अजीत सिंह ने प्रदर्शन से पहले अंग्रेजों द्वारा पारित कानून को सब को पढ़ और उसका अनुवाद, पंजाबी में कर के सुनाया, ताकि प्रदर्शन का हिस्सा बनने जा रहे, हर किसान अंग्रेजी कानून से होने वाले नुकसान से परिचित हो सके। उनकी जीवनी, बरीड लाइफ़-  ऑटोबायोग्राफी, स्पीचेस, एंड राइटिंग्स ऑफ एन इंडिसन रिवोल्यूशनरी अजीत सिंह, जिसका संपादन, पदमन सिंह और जोगिंदर सिंह ढाँकी ने किया है में इस आंदोलन का विस्तृत और रोचक विवरण दिया गया है। 

इस आंदोलन में पूरे पंजाब में, जगह जगह, किसान इकट्ठे हुए और उन्होंने उक्त कानूनो को रद्द करने की मांग को लेकर, भारी प्रदर्शन किया। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण और योजनाबद्ध था। प्रदर्शन के शांतिपूर्ण और  योजनाबद्ध रहने से, अंग्रेज बल प्रयोग का रास्ता नहीं अपना सके और धीरे धीरे आम जनता जो इन कृषि कानूनो से सीधे प्रभावित नहीं थी, वह भी इस आंदोलन से जुड़ने लगी।मामले की गम्भीरता को देखते हुए, ब्रिटिश पंजाब के गवर्नर ने उन कानूनो में कुछ हल्के - फुल्के बदलाव भी किए। लेकिन इस आंदोलन पर कोई बहुत असर नहीं पड़ा। अंत मे अंग्रेजों ने आंदोलन के मुख्य नेता, अजीत सिंह को पंजाब से बहिष्कृत कर दिया। अजीत सिंह इसके बाद अफगानिस्तान, ईरान, इटली और जर्मनी तक गए और उन्होंने विदेशों में ब्रिटिश राज की इन ज्यादतियों के खिलाफ जन मानस बनाया। 

पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन की शुरुआत तो अजीत सिंह के नेतृत्व में हुयी थी, लेकिन, देश मे चल रहे स्वाधीनता संग्राम के कारण, शीघ्र ही देश के प्रमुख क्रांतिकारी भी उस आंदोलन में शामिल होने लगे। उस समय पंजाब के सबसे लोकप्रिय नेता लाला लाजपत राय थे। उन्हें यह भनक लग गयी थी कि, इस आंदोलन से डरे हुए अंग्रेज, किसान कानूनों में थोड़ी बहुत छूट देने वाले हैं। उन्होंने पहले तो इस आंदोलन को स्थगित करने की सोची,  लेकिन उन्हें भी, जल्दी यह अहसास हो गया कि अब यह आंदोलन, केवल किसानों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह जागृति ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सघन हो रही है। उन्होंने इस आंदोलन और इस गीत को आज़ादी के आंदोलन में बदल दिया।

1907 में देश मे आज़ादी के आंदोलन का स्वरूप वह नही था जो महात्मा गांधी के स्वाधीनता संग्राम में आ जाने के बाद हो गया था। 1907 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में टूट हो गयी थी। एक गुट जो गोपाल कृष्ण गोखले के नेतृत्व में अलग था वह नरम दल कहलाया और दूसरा जो बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में था वह गरम दल कहलाया। गोखले और तिलक दोनो का ही ब्रिटिश हुक़ूमत के प्रति दृष्टिकोण अलग अलग था। गोखले जहां बातचीत और कानूनी सुधारो के माध्यम से देश की जनता को ब्रिटिश राज में ही अधिक अधिकार दिलाने के पक्षधर थे, वहीं तिलक, स्वराज्य मेंरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा, का उद्घोष कर चुके थे। गांधी तब दक्षिण अफ्रीका में थे। तब कांग्रेस के नेतृत्व की त्रिमूर्ति बाल लाल पाल के रूप में जानी जाती थी। ये थे, महाराष्ट्र से बाल गंगाधर तिलक, पंजाब से लाला लाजपतराय, और बंगाल से बिपिन चंद्र पाल। लाला लाजपतराय के पंजाब के किसान आंदोलन का समर्थन करने से आंदोलन, अंग्रेजी हुकूमत के लिये और सिरदर्द बन गया। 

वैसे तो इस आंदोलन में सम्पूर्ण तत्कालीन पंजाब के किसान इसमें शामिल थे, लेकिन इस आंदोलन का मुख्य केंद्र लायलपुर बनाया गया जो भौगोलिक रूप से पंजाब के बीच मे पड़ता था।  साथ ही ब्रिटिश सेना से रिटायर हुए बहुत से पंजाब के पूर्व सैनिक भी बहुतायत से लायलपुर के आसपास बस गए थे। आंदोलन के आयोजकों ने यह समझा था कि पूर्व फौजी मौजूदा फौजियों जो ब्रिटिश सेना और पुलिस में है को भी, अपने साथ जोड़ लेंगे। इस प्रकार इस आंदोलन की योजना बहुत ही सोच समझ कर बनायी गयी थी। पगड़ी सम्भाल जट्टा आंदोलन के किसानों का कहना था कि यह अंग्रेजी कानून उन्हें अपनी खेती की जमीनों से नहर के नाम पर अंग्रेजों ने के लिये बेदखल कर देगा। अंग्रेजी हुकूमत उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लेगी। साल 1907 में हुए पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के दौरान काफी हिंसा भी बाद में हुई । तब अंग्रेजों की लगातार ज्यादतियों से परेशान किसानों ने रावलपिंडी, गुजरावाला और लाहौर में हिंसक प्रदर्शन किए। अंग्रेज अफसरों पर हमले हुए, उन्हें मारा-पीटा गया और अपमानित करने के लिए कीचड़ फेंकने जैसे काम भी भीड़ ने किये। 

छिटपुट उपद्रव और यत्रतत्र  मारपीट की घटनाओं के अतिरिक्त हिंसा की बड़ी घटनाएं  भी हुई। सरकारी दफ्तरों में आगजनी की कोशिश हुई और तार की लाइनें खराब कर दी गईं। लाहौर में वहां के एसपी को पीटा गया। मुल्तान में किसानों के समर्थन में रेलवे के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए और वे वापस तभी लौटे जब कृषि कानूनों में सरकार ने बदलाव किये।. अंग्रेज अफसरों ने, आंदोलन जन्य हिंसक गतिविधियों को देखते हुए अपने परिवारों को बम्बई भेज दिया ताकि हालात यदि और बिगड़ते हैं तो, उन्हें इंग्लैंड भेजा जा सके।
पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के नेता अजीत सिंह ने इन सब घटनाओं का उल्लेख अपनी आत्मकथा में किया है। अंग्रेजों को बाद में समझ आया कि किसानों का यह गुस्सा और प्रदर्शन  का कारण केवल कृधि कानून ही नहीं था। उक्त कृषि कानून, इस आंदोलन का तात्कालिक कारण ज़रूर था, लेकिन, इस आक्रोश के पीछे अंग्रेजी राज से मुक्ति की कामना भी थी। पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन भी देश की आजादी के आंदोलनों का हिस्सा बना। 

शहीदे आज़म भगत सिंह पर आधारित फिल्मों में अक्सर आने वाला यह गीत 'पगड़ी सम्भाल जट्टा' आज भी हमे स्वाधीनता संग्राम की उदात्त भावना से जोड़ देता है। बांके दयाल जी की यह गीत, इतने जोश और उत्साह के साथ सभी आन्दोलनकारियों द्वारा गया जाता रहा है कि उस आन्दोलन का नाम ही 'पगड़ी सम्भाल जट्टा आन्दोलन' पड़ गया। बाद में भगत सिंह की टोली के लोगों ने भी यह गीत अपना लिया। पूरा गीत इस प्रकार है। यह गीत, अपने मूल स्वरुप और भाषा में एक यादगार कविता है। 

पगड़ी सम्भाल जट्टा

पगड़ी सम्भाल जट्टा 
पगड़ी सम्भाल ओ।

हिंद सी मंदर साडा, इस दे पुजारी ओ। 
झींगा होर अजे, कद तक खुआरी ओ। 
मरने दी कर लै हुण तूं, छेती तैयारी ओ। 
मरने तों जीणा भैड़ा, हो के बेहाल ओ। 
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

मन्नदी न गल्ल साडी, एह भैड़ी सरकार वो। 
असीं क्यों मन्निए वीरो, इस दी कार वो। 
होइ के कटे वीरो, मारो ललकार वो।

ताड़ी दो हत्थड़ वजदी, 
छैणियाँ नाल वो। 
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

फ़सलां नूं खा गए कीड़े। 
तन ते न दिसदे लीड़े। भुक्खाँ ने खूब नपीड़े। रोंदे नी बाल ओ। पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

बन गे ने तेरे लीडर।
राजे ते ख़ान बहादर।
तैनू फसौण ख़ातर।
विछदे पए जाल ओ।
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

सीने विच खावें तीर।
रांझा तूं देश ए हीर।
संभल के चल ओए वीर।
रस्ते विच खाल ओ।
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा ?

सरदार अजीत सिंह (1881–1947) ने भारत में ब्रितानी शासन को चुनौती दी तथा भारत के औपनिवेशिक शासन की आलोचना और खुलकर विरोध भी किया। उन्हें राजनीतिक 'विद्रोही' घोषित कर दिया गया था। उनका अधिकांश जीवन जेल में बीता। इनके बारे में कभी बाल गंगाधर तिलक ने कहा था ये स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने योग्य हैं । जब तिलक ने ये कहा था तब सरदार अजीत सिंह की उम्र केवल २५ साल थी।  1909 में अजीत सिंह, देश सेवा के लिए विदेश यात्रा पर केवल 28 वर्ष की उम्र में  निकल गए थे। इरान के रास्ते तुर्की, जर्मनी, ब्राजील, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान आदि देशों में रहकर उन्होंने क्रांति का बीज बोया। वे नेता जी सुभाष चंद्र बोस के भी सम्पर्क में रहे। मार्च 1947 में वे भारत वापस लौटे। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो उनका देहांत हो गया। 

( विजय शंकर सिंह )


Monday, 7 December 2020

शब्दवेध (33) बात आँखों पर आ गई

यह कम रोचक नहीं है कि  जल के जिस  नाद का अनुवाचन  अक्षर रूप में किया गया,  अक्ष का भी उसी से संबंध है। अक्षमाल  जो  मनके  या  रोजरी  का सबसे पुराना रूप है, उसी मूल से संबंधित है। मनुष्य अपना हिसाब जिन  आदिम  विधियों से करता था,  उनमें  एक था किसी डंडे पर कटाव करना या निशान बनाना जो आगे चलकर लंबाई नापने के पैमाने (measuring rod) के काम आया।

दूसरा था किसी लता या रस्सी में गांठ लगाना और इसी का अगला चरण था किसी धागे में छेद बने ऐसे बीज जिनमें घुन न लग सके,(जैसे पतजीव, इमली का चिंआ, या गुंजाफल) गूँथते या कम करते जाना। बाद में इनका स्थान मूंगों, मनकों, कौड़ियों और सुगंधित काठ,  कांसे, चांदी या सोने के तराशे या ढाले हुए दानों ने ले लिया।  गणित का विकास इसी विधि से हुआ। 

जीवन में  स्थायित्व आने के बाद इसमें रोड़ियों से भी मदद ली जाने लगी।  और फिर दीवारों पर चिन्ह या बार।  

लेखन का आदिम संकेतन  भित्ति चित्रों से  या कहें चित्र कथाओं से आरंभ हुआ, जिसके प्रमाण शैलाश्रयों, गुफाओं और कंदराओं में मिलते हैं। संभवतः  इन्हें  अमूर्तन के बाद  अक्षर कहा जाने लगा।  वह जिसे मिटाया नहीं जा सकता,  जिसमें अंकित होने के बाद  किसी वस्तु या घटना को विस्मृत नहीं किया जा सकता।  हम यहां यह निवेदन कर रहे हैं की अक्षर वाणी के  चिन्हित  रेखांकन के,  या आंखों से देखे जा सकने वाले (अक्षिगम्य)  चिन्हों के लिए प्रयोग हुआ।  प्रमाण मान्य  सिद्धांत नहीं; साक्ष्यों पर आधारित अनुमान  मात्र है। 

गणना के लिए अंक या आंक,   आंकना -  मूल्यांकन करना;  शब्दचित्र के लिए आखर, पौधे की  आंख से  निकलने वाले कुछ मुड़े हुए करचे के लिए  अँखुआ ><अंकुर > अंकुश/ अंकुशी और फिर पिंड या काया से अंकुर की तरह निकले भागों के लिए अंग और फिर कार्य में सहायक अंगों और उसके बाद में ज्ञानेन्द्रियों के लिए और इसके बाद किसी संरचना के घटकों के लिए इसका अर्थविस्तार होता गया। आश्चर्य तब होता है जब क्रोड >गोद (कोला>भो. कोराँ) के लिए इसका प्रयोग होते पाते हैं, परन्तु होता उन्हें ही है जो फूले हुए पेट को अंक समझ बैठें।  इसकी मूल संकल्पना उदर विवर/कोटर के रूप में की गई।    
 
बोएज भाषा संरचना के इस तर्क तक पहुँचते हैं, पर इसके मर्म तक इसलिए नहीं पहुँच पाते क्योंकि जिन अमेरिकी आदिम जनों की बोलियों को समझने के प्रयत्न में वह अपने निष्कर्ष तक पहुँचे थे, उनसे उनका आंतरिक लगाव नहीं था, जो संकल्पनाओं और संवेदनाओं की बुनावट को समझने के लिए जरूरी है। रिचर्ड्स ने (द मीनिंग ऑफ मीनिंग) में  उनके द्वारा भाषा विषयक वस्तुपरक चर्चा में  विचारणीय जिन तीन बिंदुओं पर ध्यान देने का सुझाव दिया गया है वे निम्न प्रकार हैं : 1. भाषा की ध्वनि संपदा: 2. उस ध्वनिसंपदा द्वारा व्यक्त विचार-संपदा; और (3) ध्वनि गुंफों को मिलाने और ढालने की युक्ति(याँ)।[1] हम किन विचारणीय पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी मानते हैं इसका उल्लेख हम कर आए हैं और वह किसी न किसी रूप में पूरी लेखमाला में उदाहृत मिलेगा।  

अब हम आँख के लिए प्रयुक्त ‘कण्’ को ले सकते हैं जिसे काल्डवेल ने द्रविड़ का माना है और यह लगता भी द्रविड़ का है। परन्तु इसकी जैसी व्याप्ति सं., हिं., और भो. में देखने में आती है वह बहुत प्राचीन स्तर की साझेदारी को प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात यह कि जिस जलवाची शब्द कन् से चमक, प्रकाश और फिर आँख की संज्ञा मिली है वह तमिल में मेरे देखने में नहीं आई।  भो. कनइल, नकइल में प्रयुक्त कन् और नक का अर्थ जल है, कनई - कीचड़ है। नदी या जलाशय  के किनारे बसे स्थान नामों में कन् - कनखल, कानपुर, कनौज, कन्नानूर में आया कन्- जलवाचक है। नक/ मक - का अर्थ भी जल है और नक्र कहें या मक्र (मगर) का अर्थ पानी का जंतु है। मक्कड़जाल और मगरमच्छ के आँसू  मगर और बंदर की कहानी के बाद गढ़े गए शब्द हैं। कंज का अर्थ जलज है।  कहें कण् का पुराना रूप कन रहा लगता है, कम से कम संस्कृत में इसको कण् कौरवी प्रभाव कह सकते हैं।  मूल कन था यह कंज, कनक -1. अनाज( गेहूँ[, 2. सोना [2],  कन् का आद्यक्षर जब तालव्य हो जाता है तो चन- जल, चणक - चना, और कन्+चन् दोनों के योग से कंचन - सोना,  काँच>काच - शीशा, कांस्य / काँसा। 

जो भी हो, यद्यपि कण आँख के अर्थ में सं- में नहीं मिलता, पर भो. में नीलाक्ष व्यक्ति के लिए कँड़जाह प्रचलित है जो या तो अपने कौरवी प्रतिरूप का अपभ्रंश है या इस क्षेत्र में छिट-फुट बसी उस बोली से आया है जिसकी तमिल से निकटता थी। देखने के लिए भी भो.हिं. या संस्कृत में कण् से कोई शब्द नहीं निकला है, पर भेंगी आँख वाले के लिए कनढेबर शब्द का चलन है। पर इसमें आए कन का आँख से नहीं कोण या तिरछेपन से संबंध है। ढेबर प्रकाश या दृष्टि के लिए आया है। एक पुराने नेता यू. एन. ढेबर के नाम में यही सुदर्शन या द्र्ष्टा वाला भाव है।  अभी तक ढिबरी को उसके नाम और काम से जानते रहे हैं पर इसका अर्थ समझ में नहीं आता रहा है तो अब समझ में आ जाना चाहिए।

यही बात तमिल के लिए भी कही जा सकती है।  उसमें  देखने के लिए पार् और नोड का प्रयोग होता है।  नोडु अं. नोट, नोटिस और नोड - गाँठ  की निकटता चौंकाती है, पर हम इस पर अधिकार के साथ कुछ कह नहीं सकते, यद्यपि होने को तो कुछ दूर का नाता नॉड का भी हो सकता है। भो. हिं. में कनखी मारने का प्रयोग कण् के अधिक निकट है।  कनीनिका - आँख की पुतली और काना- एकाक्ष।
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[1] Boas ...formulates as the three points to be considered in the objective discussion of languages. 
First, the constituent phonetic elements of the language;
 Second, the groups of ideas expressed by phonetic groups; 
Third, the method of combining and modifying phonetic groups. 
 "All speech," says Dr Boas explicitly, 'is intended to serve for the communication of ideas." Ideas, however, are only remotely accessible to outside inquirers, and we need a theory which connects words with things through the ideas, if any, which they symbolize. 
 
[2] सभी खाद्य और पेय - द्रव और आर्द्र पदार्थों को, तथा चमकदार द्रव्यों को उनका नाम जबवाची शब्दों से मिला है।

भगवान सिंह 
( Bhagwan Singh )