Tuesday, 6 October 2020

हाथरस गैंगरेप, बलात्कार कानून और राजनीति / विजय शंकर सिंह

अंत मे तमाम हंगामों और आरोप प्रत्यारोप के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने हाथरस गैंगरेप की जांच सीबीआई को सुपुर्द कर दी। यह निर्णय पहले ही हो जाना चाहिए था फिर भी देर से हुए इस निर्णय का स्वागत है। सीबीआई को जांच सौंपने के पहले 1 अक्टूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए अपने ग्यारह पृष्ठों के आर्डर में जो बात कही है, वह एक निर्वाचित सरकार पर आक्षेप की तरह से है। इस मामले के दो पहलू हैं। पहला, गुड़िया के साथ मारपीट और दुष्कर्म होने की घटना और दूसरी रात के अंधकार में उसके शव का बिना उसके परिवार की सहमति से अंतिम संस्कार कर दिया जाना। हाईकोर्ट की मुख्य आपत्ति शव के अंतिम संस्कार को लेकर है। हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान का यही कारण बताया है, 'अधिकारियों की घोर लापरवाही और उनके इस कदाचार से न केवल शव के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है, बल्कि, पीड़िता के पूरे परिवार के मौलिक अधिकारों को आघात पहुंचा है।' अब इस मामले में 12 अक्टूबर को पुनः अदालत इसकी सुनवाई करेगी। यह भी कहा जा रहा है कि सरकार का जो दृष्टिकोण पहले सख्त था, वह इसलिए भी नरम हो गया क्योंकि इस बात की आशंका थी कि हो सकता है अदालत ही सीबीआई जांच का आदेश कर दे। जो भी हो, अब यह जांच राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गयी है और जो भी होगा वह अब सीबीआई द्वारा ही किया जायेगा।

महात्मा गांधी के जन्मदिन के एक दिन पहले दिए गए अपने आदेश में, हाईकोर्ट ने गांधी जी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि,
"तुम्हें एक जन्तर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ:
जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो वह उस आदमी के लिये कितना उपयोगी होगा? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानि क्या उसे उन करोडों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ?
तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।"

अब इस घटना की क्रोनोलॉजी पर एक नज़र डालते हैं।
● 14 सितंबर की सुबह पीड़िता अपनी मां के साथ चारा काटने के लिए खेत पर गई थी। उसकी मां ने बताया, ''सुबह करीब 9:45 बजे मैंने देखा कि मेरी बेटी वहां नहीं है. मैंने सोचा कि वो घर चली गई होगी लेकिन फिर मैंने उसकी चप्पलें देखीं. हमने कुछ वक्त तक उसे तलाशा और फिर हमें वो एक पेड़ के पास मिली.''
● इसके बाद पीड़िता स्थानीय अस्पताल भेजी गयी, फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज रेफर की गयी फिर वहां से उसे दिल्ली सफदरजंग हॉस्पिटल भेजा गया जहाँ 29 सितंबर को उसकी मृत्यु हो गयी।
● तब तक उस मुकदमे की विवेचना स्थानीय पुलिस ही करती रही। अभियुक्त पकड़े भी गए और पीड़िता का अंतिम बयान भी दर्ज कराया गया जो अब क़ानून के अनुसार, मृत्युपूर्व बयान माना जा सकता है।
● 29-30 सितंबर की रात लगभग ढाई बजे हाथरस में पीड़िता का अंतिम संस्कार किया गया।
● प्रशासन पर यह आरोप है कि, पीड़िता के परिवार को घर में बंद कर दिया गया था और शव उन्हें देखने तक नहीं दिया गया था।
● 30 सितंबर की सुबह मुख्यमंत्री लखनऊ में, एसआईटी की घोषणा करते हैं और एसआईटी को जांच रिपोर्ट देने के लिये सात दिन का समय दिया गया।
● 1 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी, जो पीड़ित परिवार से मिलने हाथरस जा रहे थे को ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर हिरासत में ले लिया गया।
● उन्हें पीड़ित परिवार के परिजनों से मिलने के लिये जाने नहीं दिया गया।
● 1 अक्टूबर को ही एडीजी प्रशांत कुमार ने लखनऊ में कहा कि, एसएफएल रिपोर्ट में शुक्राणु मिलने की पुष्टि नहीं हुई है जिससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार नहीं किया गया था।
● 2 अक्टूबर की शाम 4 बजे एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को दी।
● इस रिपोर्ट के बाद, हाथरस के एसपी, डीएसपी समेत 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया। दोनों पक्षों का नार्को टेस्ट कराने का फैसला योगी सरकार ने लिया।
● मीडिया को 3 अक्टूबर की सुबह 10 बजे पीड़िता के परिजनों से मिलने की इजाजत मिली। उसके पहले मीडिया को वहां जाने नहीं दिया जा रहा था।
● 3 अक्टूबर को राहुल और प्रियंका गांधी हाथरस गए और उन्होंने परिजनों से मुलाकात की।
● 3 अक्टूबर की रात सरकार ने यह मामला सीबीआई को सौंपने का फैसला किया ।
● लेकिन तब तक सरकार की क्षवि का जो नुकसान और फजीहत होनी थी वह हो चुकी थी।

सरकार ने कहा है कि, हाथरस गैंगरेप मामले में उसके घर वालों, वादी और अन्य का नार्को टेस्ट कराया जाएगा। लेकिन अब जांच एजेंसी बदल चुकी है तो अब यह सीबीआई का निर्णय होगा कि, नार्को टेस्ट कराया जाय अथवा नहीं। हाथरस गैंगरेप में पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट, उसे लगी चोटें, चोटों के काऱण हुयी मृत्यु से यह तो प्रमाणित है ही कि, उसके साथ एक हिंसक घटना घटी है। अब सवाल उठता है बलात्कार हुआ है या नहीं ? और यह हिंसक घटना किसके द्वारा की गयी है ? अभियुक्तों की नामजदगी सही है या गलत। यह सब विवेचना में देखा ही जायेगा।

फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर, एडीजी लॉ एंड ऑर्डर का कहना है कि सैम्पल में वीर्य नहीं मिला है इसलिए बलात्कार की पुष्टि नहीं की जा सकती है। लेकिन, एडीजी धारा 375 आइपीसी जिसमे बलात्कार की परिभाषा दी गयी है में, 2013 के पहले की परिभाषा का पाठ कर रहे हैं। 2013 मे इस धारा में संशोधन हो गया है और अब वीर्य मिले या न मिले, योनि में प्रवेशन ( पेनिट्रेशन ) हुआ हो या न हुआ हो, इसे बलात्कार का अपराध माना जायेगा । सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि, पीड़िता ने अपने बयान में क्या कहा है। जो कुछ भी उस बयान में कहा गया होगा वह अब पीड़िता की मृत्यु के बाद उसके मृत्युपूर्व बयान में बदल जायेगा जो, साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत एक प्रबल साक्ष्य माना जाता है। मुकदमे का यह एक प्रमुख आधार बनेगा।

अब एक नज़र बलात्कार कानून के इतिहास और संशोधनों पर पढ़ लें। भारत में बलात्कार को स्पष्ट तौर पर भारतीय दंड संहिता आइपीसी में परिभाषित अपराध की श्रेणी में वर्ष 1860 में शामिल किया गया। आइपीसी की धारा 375 में बलात्कार को परिभाषित किया गया तथा इसे एक दंडनीय अपराध बनाया गया। इसी पेनल कोड की धारा 376 के अंतर्गत बलात्कार जैसे अपराध के लिये न्यूनतम सात वर्ष तथा अधिकतम आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया।

कानून में, बलात्कार की परिभाषा में निम्नलिखित बातें शामिल की गई हैं :
● किसी पुरुष द्वारा किसी महिला की इच्छा या सहमति के विरुद्ध किया गया शारीरिक संबंध।
● जब हत्या या चोट पहुँचाने का भय दिखाकर दबाव में संभोग के लिये किसी महिला की सहमति हासिल की गई हो।
● 18 वर्ष से कम उम्र की किसी महिला के साथ उसकी सहमति या बिना सहमति के किया गया संभोग।
● इसमें अपवाद के तौर पर किसी पुरुष द्वारा उसकी पत्नी के साथ किये गये संभोग, जिसकी उम्र 15 वर्ष से कम न हो, को बलात्कार की श्रेणी में नहीं शामिल किया जाता है।

26 मार्च, 1972 को महाराष्ट्र के देसाईगंज पुलिस स्टेशन में मथुरा नामक एक आदिवासी महिला के साथ पुलिस कस्टडी में हुए एक बलात्कार के मामले में, सेशन कोर्ट ने आरोपी पुलिसकर्मियों को इस आधार पर बरी कर दिया था कि उस महिला के साथ पुलिस स्टेशन में संभोग तो हुआ था किंतु बलात्कार होने के कोई प्रमाण नहीं मिले थे और वह महिला यौन संबंधों की आदी थी। सेशन कोर्ट के इस फैसले के विपरीत उच्च न्यायालय ने आरोपियों के बरी होने के निर्णय को वापस ले लिया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने फिर उच्च न्यायालय के फैसले को बदलते हुए यह कहा कि इस मामले में बलात्कार के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं उपलब्ध है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि महिला के शरीर पर कोई घाव या चोट के निशान मौजूद नहीं है जिसका अर्थ है कि तथाकथित संबंध उसकी मर्ज़ी से स्थापित किये गए थे। मथुरा मामले के बाद देश में बलात्कार से संबंधित कानूनों में तत्काल बदलाव की मांंग होने लगी। परिणामस्वरूप आपराधिक कानून (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1983 पारित किया गया। 1983 में आइपीसी में धारा 228A जोड़ी गई जिसके अनुसार, बलात्कार जैसे कुछ अपराधों में पीड़ित की पहचान गुप्त रखी जाए तथा ऐसा न करना दंडनीय अपराध माना जाय।
दिसंबर 2012 में निर्भया कांड के बाद 2013 में इस एक्ट में संशोधन कर के बलात्कार की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाया तथा दंड के प्रावधानों को कठोर किया गया। कुछ मामलों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया जिनमें पीड़ित की मौत हो या उसकी अवस्था मृतप्राय हो जाए। साथ ही, कुछ नए प्रावधान भी जोड़े गए, जैसे,
● आपराधिक इरादे से बलपूर्वक किसी महिला के कपड़े उतारना,
● यौन संकेत देना तथा पीछा करना आदि शामिल हैं।
● सामूहिक बलात्कार के मामले में सज़ा को 10 वर्ष से बढ़ाकर 20 वर्ष या आजीवन कारावास कर दिया गया।
● अवांछनीय शारीरिक स्पर्श, शब्द या संकेत तथा यौन अनुग्रह (Sexual Favour) करने की मांग करना आदि को भी यौन अपराध में शामिल किया गया।
● लड़की का पीछा करना करने पर तीन वर्ष की सज़ा ।
● एसिड अटैक के मामले में सज़ा को दस वर्ष से बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दिया गया।
● 16 वर्ष से कम आयु की किसी लड़की के साथ हुए बलात्कार के लिये न्यूनतम 20 वर्ष का कारावास तथा अधिकतम उम्र कैद का प्राविधान भी जोड़ा गया।
● न्यूनतम सज़ा के प्रावधान को सात वर्ष से बढ़ाकर अब 10 वर्ष कर दिया गया है।

हाथरस गैंगरेप की घटना को लेकर विपक्ष सक्रिय और लामबंद हुआ तो सरकार ने न केवल सीबीआई जांच के आदेश किये बल्कि हाथरस के एसपी सहित कुछ पुलिस अधिकारियों को भी निलंबित किया। लेकिन सरकार का सबसे अपरिपक्व कदम था, घटनास्थल और गांव में मीडिया को प्रतिबंधित कर देना और पीड़िता के घर वालों के साथ, जिला मैजिस्ट्रेट का अपत्तिजनक व्यवहार। ऐसे मामले में डीएम का यह कहना कि यह मीडिया वाले तो आज हैं कल नही रहेंगे लेकिन हम तो कल भी रहेंगे, एक बचकाना कथन था। निश्चित ही मीडिया को प्रतिबंधित करने के लिये सरकार की तरफ से ही कोई निर्देश दिया गया होगा। तभी जब इस बात पर किरकिरी हुयी तो सरकार ने उच्च स्तर पर प्रशासनिक परिवर्तन किए। सरकार का दृष्टिकोण भी कुछ नरम पड़ा और विपक्षी नेताओं को पीड़िता के घर पर जाने की अनुमति भी दी गयी। यह भी खबर है कि प्रधानमंत्री जी ने भी इस घटना में हस्तक्षेप किया और तब जाकर सरकार की रणनीति बदली। भाजपा के अंदर भी इस घटना को लेकर मंथन हुआ और बिहार के आसन्न चुनाव ने सरकार को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया।

इस प्रकरण में सबसे बड़ी गलती यह हुयी कि, पीड़िता के शव का रात के अंधेरे में बिना उसके परिवारीजन द्वारा पूछे अंतिम संस्कार कर देना। इससे प्रशासन सीधे कठघरे में आ गया। लेकिन इसके बाद भी, प्रशासनिक गलतियां या मिसहैंडलिंग एक एक कर के होती रहीं, जैसे, डीएम का पीड़िता के घर वालो को धमकी देना, एडीजी लॉ एंड ऑर्डर का बलात्कार के अपराध को, फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर एक जजमेंटल तऱीके से नकार देना, विपक्षी नेताओं, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ बदसलूकी, पहले न जाने देना, फिर उन्हें जाने देने की अनुमति देना, टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन और आरएलडी के जयंत चौधरी पर लाठीचार्ज, मीडिया कर्मियों के साथ जगह जगह रोकटोक आदि अनेक कारण ऐसे हैं जो इस घटना को लगातार सुर्ख़ियों में बनाये रहे और इन सबकी एक विपरीत प्रतिक्रिया ही होती रही। सबसे बड़ी भूल प्रशासन की यह रही कि, उसने पीड़िता के दादा के हस्ताक्षर से एक टाइपशुदा बयान ले लिया कि, वे पुलिस कार्यवाही से संतुष्ट हैं। इस कागज़ ने प्रशासन की भूमिका को और संदिग्ध कर दिया। अगर पीड़िता के दादा पुलिस तथा प्रशासनिक कार्यवाही से संतुष्ट हैं भी इसका कोई भी असर इस मुकदमे पर नहीं पड़ने जा रहा है।

अधिकतर टीवी चैनल जो अमूमन सरकार के साथ खड़े दिखते हैं, वे इस मामले में सरकार के आशानुरूप इस घटना की रिपोर्टिंग नहीं कर पाए। टीवी मीडिया और सोशल मीडिया पर लगातार हो रही इस घटना की कवरेज ने सरकार को निरन्तर सवालों के घेरे में बनाये रखा। विपक्षी नेताओं को न जाने देने का निर्णय, सरकार के लिये ही आफ़ते जाँ बन गया। क्योंकि सरकार को दो ही दिन में प्रबल विरोध के कारण अपने मीडिया और विपक्षी नेताओं के हाथरस न जाने देने के आदेश वापस लेने पड़े। मीडिया को प्रतिबंधित करने का निर्णय जिस किसी का भी हो वह बेहद त्रुटिपूर्ण रहा। इससे न केवल मीडिया खिलाफ हो गया, बल्कि सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप पर भी सवाल उठने लगे।

अब यह कहा जा रहा है कि हाथरस गैंगरेप मामले पर राजनीति हो रही है। अगर यह राजनीति है तो ऐसी राजनीति का स्वागत किया जाना चाहिए। हर उस विधिविरुद्ध, संविधान के विपरीत और देश तथा समाज को हानि पहुंचाने के लिये किये जा रहे ऐसे कृत्यों पर राजनीति की जानी चाहिए और उसकी खामियो को उजागर किया जाना चाहिए। केवल पूंजीपतियों से चंदा लेकर, लफ्फाजी और लंतरानी भरी वाचाल मुद्रा में चुनाव सभाओं में जनता से झूठे वादे कर के सत्ता में आ जाना, फिर उन सब वादों को निर्लज्जता से जुमला कह उन्हें भूल जाना और उनकी याद दिलाने वालों को, राजनीतिक शुचिता का उपदेश देना, ही राजनीति नही होती है !

जब राजनीति के कारण ही सरकारें, सत्ता में आती है और सत्ता से बाहर फेंक दी जातीं हैं, जब अफसरों की पोस्टिंग और तबादले राजनीति के आधार पर होते हैं, जब जांच के आदेश और जांच के निष्कर्ष पर कार्यवाही राजनीति के मद्देनजर होती है, जब गनर शैडो और सुरक्षा कर्मी राजनीति के आधार पर लोगो को दिए और लिए जाते हैं, जब मीडिया का हेडलाइन मैनेजमेंट राजनीति के आधार पर तय होता है, तो अगर एक लड़की जिसे बेहद बर्बर तऱीके से तड़पा तड़पा कर मार दिया गया है तो फिर ऐसे गर्हित अपराध पर राजनीति क्यों नहीं होनी चाहिए ? अगर राजनीति ऐसे अवसर पर मूक और बांझ हो जाय तो, ऐसी निकम्मी और निरुद्देश्य राजनीति का कोई अर्थ नहीं है।

बल्कि, अन्याय, अत्याचार, संस्थागत एकाधिकारवाद यानी तानाशाही, राजनीतिक वादा फरामोशी, झूठ और जुमले परोसने आदि के खिलाफ खड़ा होना भी राजनीति है। बल्कि सच कहें तो, राजनीति का उद्देश्य भी यही है कि समाज को एक सार्थक दिशा की ओर ले जाया जाय। जब भी कभी आदिम समाज मे सभ्यता के अंकुर फूटे होंगे और समाज को व्यवस्थित करने की बात सोची गयी होगी और इस दिशा में कदम बढ़ाया गया होगा तो राजनीति का जन्म हुआ होगा। राजनीति देश और समाज को संवारती है और उसे प्रगतिपथ पर आगे भी ले जाती है और वही राजनीति जब गर्हित उद्देश्य से दुष्प्रेरित होती है तो देश समाज और अंत मे सत्ता को भी गर्त में धकेल देती है। फिर उसी गर्त से कोई उठता है, मसीहा सा दिखता है, और फिर एक नयी राजनीति शुरू होती है । वह एक नए दिन का प्रत्यूष होता है।

( विजय शंकर सिंह )
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Monday, 5 October 2020

हाथरस गैंगरेप, बलात्कार कानून और राजनीति / विजय शंकर सिंह

अंत मे तमाम हंगामों और आरोप  प्रत्यारोप के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने हाथरस गैंगरेप की जांच सीबीआई को सुपुर्द कर दी। यह निर्णय पहले ही हो जाना चाहिए था फिर भी देर से हुए इस निर्णय का स्वागत है। सीबीआई को जांच सौंपने के पहले 1 अक्टूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए अपने ग्यारह पृष्ठों के आर्डर में जो बात कही है, वह एक निर्वाचित सरकार पर आक्षेप की तरह से है। इस मामले के दो पहलू हैं। पहला, गुड़िया के साथ मारपीट और दुष्कर्म होने की घटना और दूसरी रात के अंधकार में उसके शव का बिना उसके परिवार की सहमति से अंतिम संस्कार कर दिया जाना। हाईकोर्ट की मुख्य आपत्ति शव के अंतिम संस्कार को लेकर  है। हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान का यही कारण बताया है, 'अधिकारियों की घोर लापरवाही और उनके इस कदाचार से न केवल शव के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है, बल्कि, पीड़िता के पूरे परिवार के मौलिक अधिकारों को आघात पहुंचा है।' अब इस मामले में 12 अक्टूबर को पुनः अदालत इसकी सुनवाई करेगी। यह भी कहा जा रहा है कि सरकार का जो दृष्टिकोण पहले सख्त था, वह इसलिए भी नरम हो गया क्योंकि इस बात की आशंका थी कि हो सकता है अदालत ही सीबीआई जांच का आदेश कर दे। जो भी हो, अब यह जांच राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गयी है और जो भी होगा वह अब सीबीआई द्वारा ही किया जायेगा। 

महात्मा गांधी के जन्मदिन के एक दिन पहले दिए गए अपने आदेश में, हाईकोर्ट ने  गांधी जी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि,  
"तुम्हें एक जन्तर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ:
जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो वह उस आदमी के लिये कितना उपयोगी होगा? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानि क्या उसे उन करोडों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ? 
तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।"

अब इस घटना की क्रोनोलॉजी पर एक नज़र डालते हैं। 
● 14 सितंबर की सुबह पीड़िता अपनी मां के साथ चारा काटने के लिए खेत पर गई थी। उसकी मां ने बताया, ''सुबह करीब 9:45 बजे मैंने देखा कि मेरी बेटी वहां नहीं है. मैंने सोचा कि वो घर चली गई होगी लेकिन फिर मैंने उसकी चप्पलें देखीं. हमने कुछ वक्त तक उसे तलाशा और फिर हमें वो एक पेड़ के पास मिली.''
● इसके बाद पीड़िता स्थानीय अस्पताल भेजी गयी, फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज रेफर की गयी फिर वहां से उसे दिल्ली सफदरजंग हॉस्पिटल भेजा गया जहाँ 29 सितंबर को उसकी मृत्यु हो गयी। 
● तब तक उस मुकदमे की विवेचना स्थानीय पुलिस ही करती रही। अभियुक्त पकड़े भी गए और पीड़िता का अंतिम बयान भी दर्ज कराया गया जो अब क़ानून के अनुसार, मृत्युपूर्व बयान माना जा सकता है। 
● 29-30 सितंबर की रात लगभग ढाई बजे हाथरस में पीड़िता का अंतिम संस्कार किया गया। 
● प्रशासन पर यह आरोप है कि,  पीड़िता के परिवार को घर में बंद कर दिया गया था और शव उन्हें देखने तक नहीं दिया गया था।  
● 30 सितंबर की सुबह मुख्यमंत्री लखनऊ में, एसआईटी की घोषणा करते हैं और एसआईटी को जांच रिपोर्ट देने के लिये सात दिन का समय दिया गया। 
● 1 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी, जो पीड़ित परिवार से मिलने हाथरस जा रहे थे को ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर हिरासत में ले लिया गया। 
● उन्हें पीड़ित परिवार के परिजनों से मिलने के लिये जाने नहीं दिया गया।
● 1 अक्टूबर को ही एडीजी प्रशांत कुमार ने लखनऊ में कहा कि,  एसएफएल रिपोर्ट में शुक्राणु मिलने की पुष्टि नहीं हुई है जिससे स्पष्ट होता है कि बलात्कार नहीं किया गया था। 
● 2 अक्टूबर की शाम 4 बजे एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को दी। 
● इस रिपोर्ट के बाद, हाथरस के एसपी, डीएसपी समेत 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया। दोनों पक्षों का नार्को टेस्ट कराने का फैसला योगी सरकार ने लिया।
● मीडिया को 3 अक्टूबर की सुबह 10 बजे पीड़िता के परिजनों से मिलने की इजाजत मिली। उसके पहले मीडिया को वहां जाने नहीं दिया जा रहा था। 
● 3 अक्टूबर को राहुल और प्रियंका गांधी हाथरस गए और उन्होंने परिजनों से मुलाकात की।
● 3 अक्टूबर की रात सरकार ने यह मामला सीबीआई को सौंपने का फैसला किया ।
● लेकिन तब तक सरकार की क्षवि का जो नुकसान और फजीहत होनी थी वह हो चुकी थी।  

सरकार ने कहा है कि, हाथरस गैंगरेप मामले में उसके घर वालों, वादी और अन्य का नार्को टेस्ट कराया जाएगा। लेकिन अब जांच एजेंसी बदल चुकी है तो अब यह सीबीआई का निर्णय होगा कि, नार्को टेस्ट कराया जाय अथवा नहीं। हाथरस गैंगरेप में पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट, उसे लगी चोटें, चोटों के काऱण हुयी मृत्यु से यह तो प्रमाणित है ही कि, उसके साथ एक हिंसक घटना घटी है। अब सवाल उठता है बलात्कार हुआ है या नहीं ? और यह हिंसक घटना किसके द्वारा की गयी है ? अभियुक्तों की नामजदगी सही है या गलत। यह सब विवेचना में देखा ही जायेगा। 

फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर, एडीजी लॉ एंड ऑर्डर का कहना है कि सैम्पल में वीर्य नहीं मिला है इसलिए बलात्कार की पुष्टि नहीं की जा सकती है। लेकिन, एडीजी धारा 375 आइपीसी जिसमे बलात्कार की परिभाषा दी गयी है में, 2013 के पहले की परिभाषा का पाठ कर रहे हैं। 2013 मे इस धारा में संशोधन हो गया है और अब वीर्य मिले या न मिले, योनि में प्रवेशन ( पेनिट्रेशन )  हुआ हो या न हुआ हो, इसे बलात्कार का अपराध माना जायेगा । सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि, पीड़िता ने अपने  बयान में क्या कहा है। जो कुछ भी उस बयान में कहा गया होगा वह अब पीड़िता की मृत्यु के बाद उसके मृत्युपूर्व बयान में बदल जायेगा जो, साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत एक प्रबल साक्ष्य माना जाता है। मुकदमे का यह एक प्रमुख आधार बनेगा।

अब एक नज़र बलात्कार कानून के इतिहास और संशोधनों पर पढ़ लें। भारत में बलात्कार  को स्पष्ट तौर पर भारतीय दंड संहिता आइपीसी में परिभाषित अपराध की श्रेणी में वर्ष 1860 में शामिल किया गया। आइपीसी की धारा 375 में बलात्कार को परिभाषित किया गया तथा इसे एक दंडनीय अपराध बनाया गया। इसी पेनल कोड की धारा 376 के अंतर्गत बलात्कार जैसे अपराध के लिये न्यूनतम सात वर्ष तथा अधिकतम आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया। 

कानून में,  बलात्कार की परिभाषा में निम्नलिखित बातें शामिल की गई हैं :
● किसी पुरुष द्वारा किसी महिला की इच्छा या सहमति के विरुद्ध किया गया शारीरिक संबंध।
● जब हत्या या चोट पहुँचाने का भय दिखाकर दबाव में संभोग के लिये किसी महिला की सहमति हासिल की गई हो।
● 18 वर्ष से कम उम्र की किसी महिला के साथ उसकी सहमति या बिना सहमति के किया गया संभोग।
● इसमें अपवाद के तौर पर किसी पुरुष द्वारा उसकी पत्नी के साथ किये गये संभोग, जिसकी उम्र 15 वर्ष से कम न हो, को बलात्कार की श्रेणी में नहीं शामिल किया जाता है।

26 मार्च, 1972 को महाराष्ट्र के देसाईगंज पुलिस स्टेशन में मथुरा नामक एक आदिवासी महिला के साथ पुलिस कस्टडी में हुए एक बलात्कार के मामले में, सेशन कोर्ट ने आरोपी पुलिसकर्मियों को इस आधार पर बरी कर दिया था कि उस महिला के साथ पुलिस स्टेशन में संभोग तो हुआ था किंतु बलात्कार होने के कोई प्रमाण नहीं मिले थे और वह महिला यौन संबंधों की आदी थी। सेशन कोर्ट के इस फैसले के विपरीत उच्च न्यायालय ने आरोपियों के बरी होने के निर्णय को वापस ले लिया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने फिर उच्च न्यायालय के फैसले को बदलते हुए यह कहा कि इस मामले में बलात्कार के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं उपलब्ध है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि महिला के शरीर पर कोई घाव या चोट के निशान मौजूद नहीं है जिसका अर्थ है कि तथाकथित संबंध उसकी मर्ज़ी से स्थापित किये गए थे। मथुरा मामले के बाद देश में बलात्कार से संबंधित कानूनों में तत्काल बदलाव  की मांंग होने लगी। परिणामस्वरूप आपराधिक कानून (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1983 पारित किया गया। 1983 में आइपीसी में धारा 228A जोड़ी गई जिसके अनुसार, बलात्कार जैसे कुछ अपराधों में पीड़ित की पहचान गुप्त रखी जाए तथा ऐसा न करना दंडनीय अपराध माना जाय। 
दिसंबर 2012 में निर्भया कांड के बाद  2013 में इस एक्ट में संशोधन कर के बलात्कार की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाया तथा दंड के प्रावधानों को कठोर किया गया। कुछ मामलों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया जिनमें पीड़ित की मौत हो या उसकी अवस्था मृतप्राय हो जाए। साथ ही, कुछ नए प्रावधान भी जोड़े गए, जैसे, 
● आपराधिक इरादे से बलपूर्वक किसी महिला के कपड़े उतारना, 
● यौन संकेत देना तथा पीछा करना आदि शामिल हैं।
● सामूहिक बलात्कार के मामले में सज़ा को 10 वर्ष से बढ़ाकर 20 वर्ष या आजीवन कारावास कर दिया गया।
● अवांछनीय शारीरिक स्पर्श, शब्द या संकेत तथा यौन अनुग्रह (Sexual Favour) करने की मांग करना आदि को भी यौन अपराध में शामिल किया गया।
● लड़की का पीछा करना करने पर तीन वर्ष की सज़ा ।
● एसिड अटैक के मामले में सज़ा को दस वर्ष से बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दिया गया। 
● 16 वर्ष से कम आयु की किसी लड़की के साथ हुए बलात्कार के लिये न्यूनतम 20 वर्ष का कारावास तथा अधिकतम उम्र कैद का प्राविधान भी जोड़ा गया। 
● न्यूनतम सज़ा के प्रावधान को सात वर्ष से बढ़ाकर अब 10 वर्ष कर दिया गया है।

हाथरस गैंगरेप की घटना को लेकर विपक्ष सक्रिय और लामबंद हुआ तो सरकार ने न केवल सीबीआई जांच के आदेश किये बल्कि हाथरस के एसपी सहित कुछ पुलिस अधिकारियों को भी निलंबित किया। लेकिन सरकार का सबसे अपरिपक्व कदम था, घटनास्थल और गांव में मीडिया को प्रतिबंधित कर देना और पीड़िता के घर वालों के साथ, जिला मैजिस्ट्रेट का अपत्तिजनक व्यवहार। ऐसे मामले में डीएम का यह कहना कि यह मीडिया वाले तो आज हैं कल नही रहेंगे लेकिन हम तो कल भी रहेंगे, एक बचकाना कथन था। निश्चित ही मीडिया को प्रतिबंधित करने के लिये सरकार की तरफ से ही कोई निर्देश दिया गया होगा। तभी जब इस बात पर किरकिरी हुयी तो सरकार ने उच्च स्तर पर प्रशासनिक परिवर्तन किए। सरकार का दृष्टिकोण भी कुछ नरम पड़ा और विपक्षी नेताओं को पीड़िता के घर पर जाने की अनुमति भी दी गयी। यह भी खबर है कि प्रधानमंत्री जी ने भी इस घटना में हस्तक्षेप किया और तब जाकर सरकार की रणनीति बदली। भाजपा के अंदर भी इस घटना को लेकर मंथन हुआ और बिहार के आसन्न चुनाव ने सरकार को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया। 

इस प्रकरण में सबसे बड़ी गलती यह हुयी  कि, पीड़िता के शव का रात के अंधेरे में बिना  उसके परिवारीजन द्वारा पूछे अंतिम संस्कार कर देना। इससे प्रशासन सीधे कठघरे में आ गया। लेकिन इसके बाद भी, प्रशासनिक गलतियां या मिसहैंडलिंग एक एक कर के होती रहीं, जैसे, डीएम का पीड़िता के घर वालो को धमकी देना, एडीजी लॉ एंड ऑर्डर का बलात्कार के अपराध को, फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर एक जजमेंटल तऱीके से नकार देना, विपक्षी नेताओं, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ बदसलूकी, पहले न जाने देना, फिर उन्हें जाने देने की अनुमति देना, टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन और आरएलडी के जयंत चौधरी पर लाठीचार्ज, मीडिया कर्मियों के साथ जगह जगह रोकटोक आदि अनेक कारण ऐसे हैं जो इस घटना को लगातार सुर्ख़ियों में बनाये रहे और इन सबकी एक विपरीत प्रतिक्रिया ही होती रही। सबसे बड़ी भूल प्रशासन की यह रही कि, उसने पीड़िता के दादा के हस्ताक्षर से एक टाइपशुदा बयान ले लिया कि, वे पुलिस कार्यवाही से संतुष्ट हैं। इस कागज़ ने प्रशासन की भूमिका को और संदिग्ध कर दिया। अगर पीड़िता के दादा पुलिस तथा प्रशासनिक कार्यवाही से संतुष्ट हैं भी इसका कोई भी असर इस मुकदमे पर नहीं पड़ने जा रहा है। 

अधिकतर टीवी चैनल जो अमूमन सरकार के साथ खड़े दिखते हैं, वे इस मामले में सरकार के आशानुरूप इस घटना की रिपोर्टिंग नहीं कर पाए। टीवी मीडिया और सोशल मीडिया पर लगातार हो रही इस घटना की कवरेज ने सरकार को निरन्तर सवालों के घेरे में बनाये रखा। विपक्षी नेताओं को न जाने देने का निर्णय, सरकार के लिये ही आफ़ते जाँ बन गया। क्योंकि सरकार को दो ही दिन में प्रबल विरोध के कारण अपने मीडिया और विपक्षी नेताओं के हाथरस न जाने देने के आदेश वापस लेने पड़े। मीडिया को प्रतिबंधित करने का निर्णय जिस किसी का भी हो वह बेहद त्रुटिपूर्ण रहा। इससे न केवल मीडिया खिलाफ हो गया, बल्कि सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप पर भी सवाल उठने लगे। 

अब यह कहा जा रहा है कि हाथरस गैंगरेप मामले पर राजनीति हो रही है। अगर यह राजनीति है तो ऐसी राजनीति का स्वागत किया जाना चाहिए। हर उस विधिविरुद्ध, संविधान के विपरीत और देश तथा समाज को हानि पहुंचाने के लिये किये जा रहे ऐसे कृत्यों पर राजनीति की जानी चाहिए और उसकी खामियो को उजागर किया जाना चाहिए। केवल पूंजीपतियों से चंदा लेकर, लफ्फाजी और लंतरानी भरी वाचाल मुद्रा में चुनाव सभाओं में जनता से झूठे वादे कर के सत्ता में आ जाना, फिर उन सब वादों को निर्लज्जता से जुमला कह उन्हें भूल जाना और उनकी याद दिलाने वालों को, राजनीतिक शुचिता का उपदेश देना, ही राजनीति नही होती है ! 

जब राजनीति के कारण ही सरकारें, सत्ता में आती है और सत्ता से बाहर फेंक दी जातीं हैं, जब अफसरों की पोस्टिंग  और तबादले राजनीति के आधार पर होते हैं, जब जांच के आदेश और जांच के निष्कर्ष पर कार्यवाही राजनीति के मद्देनजर होती है, जब गनर शैडो और सुरक्षा कर्मी राजनीति के आधार पर लोगो को दिए और लिए जाते हैं, जब मीडिया का हेडलाइन मैनेजमेंट राजनीति के आधार पर तय होता है, तो अगर एक लड़की जिसे बेहद बर्बर तऱीके से तड़पा तड़पा कर मार दिया गया है तो फिर ऐसे गर्हित अपराध पर राजनीति क्यों नहीं होनी चाहिए ? अगर राजनीति ऐसे अवसर पर मूक और बांझ हो जाय तो, ऐसी निकम्मी और निरुद्देश्य राजनीति का कोई अर्थ नहीं है। 

बल्कि, अन्याय, अत्याचार, संस्थागत एकाधिकारवाद यानी तानाशाही, राजनीतिक वादा फरामोशी, झूठ और जुमले परोसने आदि के खिलाफ खड़ा होना भी राजनीति है। बल्कि सच कहें तो, राजनीति का उद्देश्य भी यही है कि समाज को एक सार्थक दिशा की ओर ले जाया जाय। जब भी कभी आदिम समाज मे सभ्यता के अंकुर फूटे होंगे और समाज को व्यवस्थित करने की बात सोची गयी होगी और इस दिशा में कदम बढ़ाया गया होगा तो राजनीति का जन्म हुआ होगा। राजनीति देश और समाज को संवारती है और उसे प्रगतिपथ पर आगे भी ले जाती है और वही राजनीति जब गर्हित उद्देश्य से दुष्प्रेरित होती है तो देश समाज और अंत मे सत्ता को भी गर्त में धकेल देती है। फिर उसी गर्त से कोई उठता है, मसीहा सा दिखता है, और फिर एक नयी राजनीति शुरू होती है । वह एक नए दिन का प्रत्यूष होता है। 

( विजय शंकर सिंह )

Saturday, 3 October 2020

भटक चुकी राजनीति को पटरी पर लाना ज़रूरी है / विजय शंकर सिंह

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी कल 3 अक्टूबर  हाथरस गैंगरेप की पीड़िता के घर मे थी। वे वहां अन्य विपक्षी सांसदों के साथ गैंगरेप की पीड़िता के परिवारीजनों से मिलने गयीं थी। उनके दिल्ली से हाथरस और फिर, हाथरस में पीड़िता के घर से बहुत सी फोटो लगातार सोशल मीडिया पर साझा की जा रही हैं। उन तस्वीरों पर, लोग अपनी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। वे तस्वीरे कुछ को भावुक कर दे रही हैं तो कुछ को इनमे बेहतर राजनीति की सम्भावनाये दिख रही हैं। हाथरस गैंगरेप कांड का एक मॉडल केस के रूप में अध्ययन किया जाना चाहिए, कि ऐसे कौन से कारण थे जो, अपराध की इस घटना को इतना अधिक प्रचारित कर दिये कि सरकार तक इसकी आंच पहुंचने लगी। 

इस केस के दो पहलू हैं। एक तो आपराधिक मुकदमा, जिसकी तफतीश पहले हाथरस पुलिस ने की, फिर जब बवाल मचा तो उसे एसआईटी को सौंप दी गयी, और जब बवाल थामे थम नहीं सका तो उसे सीबीआई को सौंप दिया गया। ताज़ी स्थिति यह है कि अब उस केस की विवेचना सीबीआई करेगी। दूसरा पहलू है कि हाथरस के जिला स्तरीय अधिकारियों से लेकर, सरकार तक किसकी किसकी भूमिका इस केस में क्या क्या रही और कैसे कानून व्यवस्था की जटिल समस्याएं उत्पन्न होती रही। 

अपराध की जांच तो, सीबीआई करेगी। जिसका अपना एक स्टैंडर्ड प्रोसीजर है, और उनकी तफतीश का तरीका भी पुलिस से अलग होता है। हालांकि वे भी मुकदमे की तफतीशें सीआरपीसी द्वारा प्रदत्त उन्ही शक्तियों के आधार पर करते हैं जिन पर भारत भर की पुलिस तफतीश करती है। लेकिन वे गहराई  से मुकदमो की तह में जाते हैं। सामान्य पुलिस की तुलना में, उनके पास समय और संसाधन भी अधिक होते हैं। 

कुछ हाल की राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुकदमो की जांचों को लेकर सीबीआई पर ज़रूर सवाल खड़े हुए हैं पर यह मुकदमा, सवाल खड़े हुए मुकदमो की तुलना में बिल्कुल भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील नहीं है। यह अपराध का एक केस है जो सरकार और अफसरों की मिस हैंडलिंग से इतना चर्चित हो गया। क्या क्या कमियां हुयी है,  इस पर भी आगे अलग से बात होगी। 

फिलहाल तो सोशल मीडिया पर लगातार शेयर की जा रही, विपक्ष के हाथरस दौरे की तस्वीरों और राहुल औऱ प्रियंका गांधी सहित अन्य सांसदो के दौरे की बात की जाय। तीन दिन पहले भी राहुल और प्रियंका दोनो ही हाथरस के लिये दिल्ली से निकले थे, और ग्रेटर नोयडा के पास उन्हें रोक लिया गया था, और वे पैदल ही हाथरस के लिये निकल पड़े। लेकिन फिर उन्हें रोका गया, बल प्रयोग किया गया, फिर उन्हें गिरफ्तार किया गया और, अंत मे बिना मुचलके के रिहा कर दिया गया। हाथरस न जाने देने का फैसला निश्चित ही सरकार का रहा होगा लेकिन यह भी हो सकता है कि, हाथरस से जिला मैजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक की कोई गोपनीय रिपोर्ट भी इस आशय की भेजी गयी हो कि, इन नेताओं के आने से हाथरस में कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है। 

3 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने पुनः हाथरस जाने की बात कही और उन्हें अनुमति दे दी गयी। लेकिन इस बार का यह दौरा अकेले नहीं बल्कि 40 अन्य सांसदों के साथ का था। अनुमति मिलने के बाद, दिल्ली यूपी सीमा पर, डीएनडी फ्लाईओवर पर उन्हें फिर रोका गया और प्रियंका गांधी से बदतमीजी की गई और कार्यकर्ताओं पर लाठी चार्ज भी हुआ। पुलिस की लाठी रोकते और एक पुलिस कांस्टेबल द्वारा प्रियंका गांधी को पकड़ते हुए एक फ़ोटो बहुत शेयर हो रही है। जब उन्हें हाथरस जाने की अनुमति सरकार ने विपक्षी नेताओं को दे दी थी तो, तो फिर डीएनडी पर रोकने की क्या ज़रूरत थी, यह बात समझ से परे हैं। 

अब जरा राजनीति के बदलते कलेवर पर एक चर्चा करते हैं। वर्ष 2014 के बाद जानबूझकर कर एक धारणा सबके मन मे सत्तारूढ़ दल के समर्थकों द्वारा फैलाई जा रही है कि विपक्ष की लोकतंत्र में कोई ज़रूरत नही है। विपक्षी नेताओं के प्रति अपमानजनक शब्द, मीम आदि जानबूझकर कर फैलाये गए और हर वह काम किया गया जिससे यह अवधारणा स्थापित हो जाय कि, विपक्ष देश की राजनीति में एक बोझ है, और उसकी कोई जगह नहीं है। साथ ही यह भी अवधारणा बनाई गई कि सरकार की आलोचना, सरकार से सवाल जवाब, और सरकार के कामो के सुबूत मांगना एक पाप है और यह देशद्रोही कृत्य है। 

एक ऐसी मानसिकता जानबूझकर कर बेहद शातिराना तरीके से स्थापित करने की कोशिश की गई कि सरकार कोई गलती कर ही नहीं सकती और विपक्ष सरकार के खिलाफ नहीं बल्कि देश के खिलाफ है। बाद में सरकार का अर्थ केवल नरेंद्र मोदी समझाया जाने लगा। यही सिलसिला राफेल, नोटबन्दी, जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा, बालाकोट आदि आदि मामलो में हुआ और सरकार समर्थक मित्र एक संगठित तरह से इसे देशद्रोह कह कर प्रचारित करते रहे। 

देशद्रोह एक ऐसा आक्षेप है जो अक्सर किसी को भी बैकफुट पर ला देता है क्योंकि देशद्रोही शब्द के साथ कोई भी जुड़ना नही चाहता। यह अलग बात है कि आज जो दूसरों को बात बात पर, देशद्रोही घोषित करते रहते हैं, वे देश की आज़ादी की लडाई के समय जब देशप्रेम और राष्ट्रवाद की सबसे अधिक ज़रूरत थी तो वे साम्प्रदायिक मुस्लिम लीग के साथ थे या अंग्रेजी हुक़ूमत के। अब यह आप के ऊपर है कि आप उन्हें देशद्रोह की कोटि में रखते हैं या नही। 

जब सरकार समर्थको और भाजपा आईटी सेल ने विपक्ष के नेताओ के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाना शुरू किया तो, इसकी प्रतिक्रिया में सबसे अधिक मज़ाक़ प्रधानमंत्री का बनाया गया। अब यह मज़ाक़ इतना अधिक बढ़ गया कि सुप्रीम कोर्ट तक को यह कहना पड़ा कि प्रधानमंत्री का सम्मान किया जाना चाहिए। व्यंग्य, कार्टून, नेताओ की मिमिक्री आदि तो दुनियाभर में नेताओ के बनते रहते हैं पर अपशब्दों और झूठे तथ्यों के आधार पर सत्ता और विपक्ष के नेताओं के मज़ाक़ उड़ाने की यह प्रवित्ति 2014 के बाद राजनीतिक विमर्श की एक नयी शैली बन गई। 

इसका परिणाम यह हुआ कि गम्भीर, चिंतनशील, तथ्यपरक और वैचारिक पीठिका पर आधारित राजनीतिक बहस धीरे धीरे नेपथ्य में पहुंचा दी गई। यह स्थिति सरकार के लिये इसलिए फायदेमंद रही कि उसकी नीतियों, कामकाज और राजनीतिक विचार पर होने वाली गम्भीर बहसें और सवाल जवाब करने वाले या तो खुद ही धीरे धीरे कम हो गए, या वे भी विरोध और समर्थन की उसी विदूषक शैली में शामिल हो गए। यह केवल सोशल मीडिया पर ही नहीं हुआ, बल्कि यही प्रवित्ति विधायिकाओं के शीर्ष राज्यसभा तक पहुंच गयी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि राज्यसभा के उपसभापति जो मूलतः इस वैचारिक पीठिका के नहीं है, वे भी जितनी मनमर्जी किसान कानूनो के पारित होने के समय सदन में दिखा सकते थे, दिखा गए। 

मुझे लगता है यह सब अनायास नहीं हुआ बल्कि यह सब सायास किया गया। यह एक रणनीति थी कि, एक ऐसा भ्रम फैला दिया जाय कि, लोग यह सहज ही विश्वास कर लें कि, विपक्ष के नाम पर केवल निकम्मे और अगम्भीर लोगों का एक समूह है जो, न तो सरकार की सरकार की आलोचना ही ढंग से कर पाता है और न ही सरकार की उन नीतियों का विकल्प ही प्रस्तुत कर पाता है जिनकी वह आलोचना करता है। यानी एक अगम्भीर, गैरजिम्मेदार और मसखरा विपक्ष है, जो नीति और विचार धुँधता की गिरफ्त में है। 

सबसे अधिक मज़ाक़ और तमाशा कांग्रेस के राहुल गांधी का बनाया गया क्योंकि सरकार को सबसे अधिक खतरा वहीं से था और अब भी है। सरकार और सत्तारूढ़ दल कितनी ही बार वे यह कहें कि वे राहुल गांधी को गंभीरता से नहीं लेते हैं, लेकिन कटु सत्य यह है कि वे राहुल को बेहद गम्भीरता से लेते हैं। राहुल को न केवल अयोग्य बल्कि गैरजिम्मेदार नेता के रूप में प्रचारित किया गया साथ ही, राहुल गांधी द्वारा गम्भीर विषयों पर की गई तथ्यपरक प्रतिक्रियाओं की भी खिल्ली उड़ाई गयी और हतोत्साहित किया गया। 

संघ परिवार की गांधी नेहरू की विरासत, सोच और मानसिकता से पुराना बैर है और यह बैर इतना गहरे तक पैठा हुआ है कि, 2 अक्टूबर को जब पूरी दुनिया, महात्मा गांधी का जन्मदिन, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मना रही थी तो भारत मे ट्विटर गोडसे अमर रहे हैं से भरा हुआ था। मुझे गांधी के बरअक्स गोडसे को खड़ा करने के उनके प्रयासों पर कभी हैरानी नहीं हुयी। मैं इसे संघ के लिये एक अदद रोल मॉडल ढूंढ़ने की कवायद के रूप में देखता हूँ। रोल मॉडल न मिलने की उनकी खीज पर तरस खाता हूँ। 

अगर वे गोडसे अमर रहे कह कर खुश हैं तो उन्हें बिल्कुल खुश रहने दें। लेकिन उनसे एक सवाल पूछिये कि क्या वे अपनी संतान को गोडसे के पथ पर ही चलने के लिये तो प्रेरित करेंगे ? वे इसका उत्तर नकारात्मक ही देंगे। एक बात मैं दावे से कह सकता हूँ कि  जितना गांधी वांग्मय मैंने पढ़ा है उससे मैं यह समझ पाया हूँ, कि अगर किन्ही कारणों या चमत्कार वश गांधी, गोडसे द्वारा गोली मारने के बाद भी जीवित बच जाते तो वे गोडसे को निश्चय ही माफ कर देते।

गोडसे हत्या का एक अपराधी था। जघन्य कृत्य था उसका। उसे कानून ने दोषी पाया और मृत्युदंड की सज़ा दी। गांधी और गोडसे दोनों का अस्तित्व, अंधकार और प्रकाश की तरह है। गांधी प्रकाश हैं तो गोडसे अंधकार। अब यह गोडसे अमर रहे मानने वालो के ऊपर है कि वे अपनी संतति को कौन सी दिशा देना चाहते हैं। जो मित्र गोडसे अमर रहे सम्प्रदाय के है, उनपर कोई भी प्रतिक्रिया न दें।  उनकी मजबूरी समझे। संघ को रोल मॉडल की तलाश है। वह भगत सिंह, सरदार पटेल से लेकर सुभाष बाबू तक एक अदद रोल मॉडल की तलाश में भटक रहे हैं। वे अपने रोल मॉडल के खोखलेपन से भी परिचित हैं और भारतीय समाज की उनके प्रति  अस्वीकार्यता का भी उन्हें पर्याप्त ज्ञान है। 

तभी कभी भी उनके बारे में कोई सार्वजनिक समारोह या सेमिनार आदि आयोजित नहीं करते हैं। आज भी जब प्रधानमंत्री जब विदेश जाते हैं तो अहिंसा, बुद्ध और गांधी का ही नाम लेते है। स्वाधीनता संग्राम में अपने जीवन के अंडमान पूर्व काल मे एक उल्लेखनीय भूमिका निभाने के बाद भी वे खुलकर सावरकर का नाम लेने से परहेज करते हैं। लेकिन जन्मजात भ्रमित समाज बन चुका संघ परिवार आज भी एक अदद रोल मॉडल की तलाश में है। इसी तलाश ने नरेंद्र मोदी को एक नए रोल मॉडल या मसीहा या अवतार के रूप में स्थापित करने की कोशिश तो की पर बेहद भोंडे तरह से। 

दिक्कत यह है कि जब भी, वह रोल मॉडल  ढूंढते निकलते हैं वहां उन्हें अपनी विचारधारा के विपरीत ही कुछ न कुछ ऐसा मिल जाता है, जिससे वे असहज होने लगते हैं । दुष्प्रचार एक धुंध की तरह होता है। जब धुंध छंटती है तो सब साफ हो ही जाता है। रोल मॉडल का अभाव और नया मनमाफिक रोल मॉडल ढूंढ या न गढ़ पाने की असफलता से वे एक स्वाभाविक खीज से भर जाते हैं। उस खीज पर तरस खाइए, न कि उनका मज़ाक़ उड़ाइये। यही कारण है गांधी नेहरू की विरासत जो स्वाभाविक रूप से आज राहुल और प्रियंका के माध्यम से सामने आ रही है उन्हें बार बार असहज करती है। पर वे कुछ कर भी नहीं पाते हैं। 

अगर भाजपा की ही बात मान लें तो, सोनिया गांधी इंग्लैंड की महारानी से भी अमीर है, वाड्रा एक बड़े भूमाफिया हैं, राहुल गांधी एक गैरजिम्मेदार नेता है जिनका आईक्यू स्तर कम है, पर आज 6 साल की सत्ता के बाद भी सरकार ने न तो सोनिया गांधी की संपत्ति की जांच की और न वाड्रा जेल गए। ऐसे आरोप लम्बे समय तक, टिक नहीं पाते हैं, जबकि आरोप लगाने वाले सत्ता में हों और उन आरोपो पर सरकार कुछ कर न सकें । 

हाथरस में विपक्षी नेताओं की पीड़ित परिवार से मिलने की तस्वीरों में अगर राजनीति खोजी जा रही है तो ऐसी राजनीति का स्वागत किया जाना चाहिए। अगर कुछ मित्रो को यह नाटक तथा नौटंकी लग रही है तो ऐसे नाटक और अभिनय का स्वागत किया जाना चाहिए। भाजपा आईटीसेल ने अपने समर्थकों का सबसे बड़ा नुकसान यह किया है कि, उनके दिमाग और चिंतनशीलता को प्रोग्राम्ड कर दिया है कि वे आसमान और प्रकृति के रंग भी साम्प्रदायिक और सामाजिक भेदभाव के चश्मे से देखने लगे। जिस संस्कृति में अभय का भाव सबसे उच्च नैतिक भाव हो, वहां समाज को निरन्तर भयभीत करके रखने की एक रणनीति जानबूझकर अपनाई गई। 

डरा हुआ समाज, एकजुट तो हो जाता है, पर भय पर बनी हुयी वह एकजुटता, हिंसक, विधितोड़क और आत्मविश्वास से हीन बना देती है। ऐसा समाज देश का ही अंत मे अहित करता है। मुस्लिम लीग के रूप में एमए जिन्ना ने मुसलमानों को ऐसे ही बहुसंख्यकवाद का भय दिखा कर एकजुट किया था और अपना लक्ष्य पाकिस्तान को पाया था  पर विडंबना देखिए, उसी पाकिस्तान में आज मुस्लिम बहुसंख्यक हैं फिर भी वे वहां की धार्मिक अल्पसंख्यक जमात से डर रहे हैं और आज भी डर का उनका मनोविज्ञान गया नहीं है। डर का मनोविज्ञान घृणा उत्पन्न करता है और यह इतनी मानसिक विकृति ला देता है कि ज़िंदगी के रंग भी अलग अलग खानों में बंट जाते है। साहित्य संगीत, कला, भाषा, प्रतीक सब कुछ इसी चश्मे से देखने के कारण उनमे से अधिकांश, वैज्ञानिक चिंतन से दूर जा चुके होते हैं। 

इसका परिणाम यह हुआ कि जब गम्भीर विमर्श की बात आती है तो सत्तारूढ़ दल के मित्रगण या तो बगलें झांकने लगते हैं या, बहस को जानबूझकर कर अपने चिरपरिचित एजेंडे पर ले जाने की कोशिश करने लगते हैं। वे वर्तमान से अतीत की ओर दौड़ पड़ते है और अतीत की भूलो से कुछ सीख कर उसे परिमार्जित करने के बजाय, इतिहास के पन्नो में बहस को उलझा देते है।  यह आप उनके प्रवक्ताओं के बहस के अंदाज़ से समझ सकते है। जब आप बंटने और बांटने की मानसिकता से संक्रमित हो जाएंगे तो यह सिलसिला केवल धर्म के ही आधार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह जाति, उपजाति, और इतना अंदर तक आ जायेगा कि गांव घर का पड़ोस भी बंट जाएगा। हाथरस गैंगरेप की घटना के बाद अभियुक्तों के सजातीय पंचायत की बैठक से यह स्पष्ट संकेत मिलने लगा है। 

राजनीति की उदात्त, गम्भीर और वैचारिक पीठिका पर आधारित विमर्श की शैली पटरी से उतर चुकी है या कहिये जानबूझकर एक षडयंत्र के अन्तर्गत 2014 से ही उतारी जा रही है । उसे पुनः पटरी पर लाना ज़रूरी है। वह पटरी संविधान, और लोकतांत्रिक परंपराओं से परिभाषित है। संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की अपनी भूमिका है और वह भूमिका लोकतंत्र में सत्ता से कम महत्वपूर्ण नहीं है। हाथरस में आज जो सरकार की दुर्गति हो रही है वह लोकतांत्रिक परंपराओं से बेपटरी होने के कारण हो रही है। यह सब उस ज़िद, अहंकार, और , जहाँ तक मैं देखता हूँ मैं ही हूँ, की अहंकारी मानसिकता का परिणाम है जो 2014 के बाद लगातार, एक जहर की तरह, समाज, राजनीति, और लोगों में भरा जा रहा है। 

राजनीति के इस अलोकतांत्रिक स्वरूप में बदलाव ज़रूरी है। इसीलिये संसद के साथ साथ सड़क के भी महत्व को दुनियाभर के संघर्षशील नेताओ ने समझा है। इसी को दृष्टिगत रख कर डॉ राममनोहर लोहिया ने कभी कहा था, ज़िंदा कौमे पांच साल इंतज़ार नहीं करती है। संघर्ष और जन सरोकार की इस राजनीति का स्वागत किया जाना चाहिए। 

( विजय शंकर सिंह )


महात्मा गांधी को उनकी 150 वीं जयंती पर स्मरण करते हुये / विजय शंकर सिंह



आज महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती है और कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें स्मरण कर रहा है। दुनियाभर में 2 अक्टूबर का दिन अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 15 जून, 2007 को एक प्रस्ताव पारित कर दुनिया से यह आग्रह किया था कि वह शांति और अहिंसा के विचार पर अमल करे और महात्मा गाँधी के जन्म दिवस को "अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस" के रूप में मनाए।

महात्मा गाँधी ने भारत के स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्त्व किया था और अहिंसा के दर्शन का प्रचार किया। गांधी बीसवीं सदी के ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने, राजनीति, समाज, अर्थनीति, दर्शन सहित दुनियाभर के विचारों पर अपनी छाप छोड़ी। वे केवल एक राजनेता ही नही थे। यह माना जाता है कि अहिंसा के दर्शन का विकास महात्मा गाँधी ने प्रसिद्ध रूसी लेखक लेव तोलस्तोय के विचारों से प्रभावित होकर किया था।

अहिंसा की नीति के ज़रिए विश्व भर में शांति के संदेश को बढ़ावा देने के महात्मा गाँधी के योगदान को सराहने के लिए ही इस दिन को 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में मनाने का फ़ैसला विश्व पंचायत में किया गया। इस संदर्भ में 'संयुक्त राष्ट्र महासभा' में भारत द्वारा रखे गए प्रस्ताव का समर्थन उत्साहपूर्वक किया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के कुल 191 सदस्य देशों में से 140 से भी ज़्यादा देशों ने इस प्रस्ताव को सह-प्रायोजित किया। इनमें अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान जैसे भारत के पड़ोसी देशों के अलावा अफ़्रीका और अमरीका महाद्वीप के कई देश भी शामिल थे।

मौजूदा विश्व व्यवस्था में अहिंसा की सार्थकता को मानते हुए बिना वोटिंग के ही सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को पारित कर दिया गया था। 15 जून, 2007 को महासभा द्वारा पारित संकल्प में कहा गया कि-

"शिक्षा के माध्यम से जनता के बीच अहिंसा का व्यापक प्रसार किया जाएगा।" संकल्प यह भी पुष्ट करता है कि "अहिंसा के सिद्धांत की सार्वभौमिक प्रासंगिकता एवं शांति, सहिष्णुता तथा संस्कृति को अहिंसा द्वारा सुरक्षित रखा जाए।"

जब गांधी याद आएंगे तो गोडसे भी याद आएगा। जब गोडसे याद आएगा तो गोडसे के पीछे खड़ा गांधी हत्या का पूरा षडयंत्र भी याद आ जाएगा। जब यह सब याद आएगा तो इतिहास के अनेक वे पल भी बरबस याद आ जाएंगे, जिनकी टीस आज भी उन ज़ख्मो को हरा कर देती है, जो हमने आज़ादी के वक़्त खाये थे। कुछ लोग गांधी को गोडसे की चश्मे से देखने की कोशिश करेंगे और कुछ गांधी को उनके समग्र व्यक्तित्व में ढूंढेंगे। पर गांधी का विरोध हो, या समर्थन, उनमे देवत्व ढूंढा जाय या कुछ और, लेकिन गांधी भुला दिए जाने वाली शख्सियत नहीं है। गांधी जी से मिले, उनसे बोले बतियाये और देखे लोगो के संस्मरण मैं जब भी पढ़ता हूँ तो मुझे अल्बर्ट आइंस्टीन का वही कालजयी शोक संदेश याद आता है जो उन्होंने गांधी जी हत्या पर कहा था। उन्होंने कहा था, आने वाली पीढियां मुश्किल से यक़ीन कर पाएंगी कि, हाड़ मांस का कोई पुतला इस धरती पर कभी था भी। दुनिया मे कम ही ऐसे देश होंगे जहां गांधी की प्रतिमा न हो और उनकी याद में कोई स्मारक न हो।

गांधी के शरीर पर भी हमला उन्ही के देश मे किया गया, हत्या भी यहीं हुयी और उनके विचारों के खिलाफ भी सबसे अधिक विरोध और दुष्प्रचार भारत मे ही फैलाया गया और अब भी फैलाया जा रहा है। यह कोशिश अब भी जारी है कि उन्हें किसी खांचे में समेट दिया जाय। पर गांधी सिमटते ही नहीं। वे तो खुशबू की तरह हवा में बिखर गए हैं। यह लोकतांत्रिक मानसिकता, बहुलतावादी सोच और हमारी समृद्ध सभ्यता और संस्कृति की महानता है कि हम किसी भी विचार को जस का तस स्वीकार नही करते हैं। बहस और शास्त्रार्थ की यह समृद्ध परंपरा हमे तथ्यान्वेषण की ओर तत्पर और विचारोत्तेजक बनाये रहती है। अमर्त्य सेन के शब्दों में कहूँ तो, हम सब आर्ग्यूमेंटेटिव, बहस प्रिय भारतीय है। हमारे अंदर का नचिकेता अब भी सक्रिय है। गांधी पर हिंदी के प्रख्यात लेखक नरेश मेहता ने अपने एक प्रसिद्ध उपन्यास, वह पथ बंधु था में एक वाक्य लिखा है जो मुझे बरबस याद आ जाता है। वाक्य है, " धर्म के क्षेत्र में बुद्ध ने, साहित्य के क्षेत्र में तुलसी ने और राजनीति के क्षेत्र में गांधी ने भारतीय मानस को जितनी गहराई से प्रभावित किया वह अद्भुत है।"

महात्मा गांधी की 150 वी जयंती पर गांधी जी का विनम्र स्मरण और पत्रकारिता के संदर्भ में उनका एक उद्धरण पढ़े,

"अख़बारों की नफरत पैदा करनेवाली बातों से भरी हुई कुछ कतरनें मेरे सामने पड़ी हैं. इनमें सांप्रदायिक उत्तेजना, सफेद झूठ और खून-खराबे के लिए उकसानेवाली राजनीतिक हिंसा के लिए प्रेरित करनेवाली बातें हैं. निस्संदेह सरकार के लिए मुकदमे चलाना या दमनकारी अध्यादेश जारी करना बिल्कुल आसान है. पर ये उपाय ऐसे लेखकों का हृदय-परिवर्तन तो कतई नहीं करते, क्योंकि जब उनके हाथ में अख़बार जैसा प्रकट माध्यम नहीं रह जाता, तो वे अक्सर गुप्त रूप से प्रचार का सहारा लेते हैं.’

इसका वास्तविक इलाज तो वह स्वस्थ लोकमत है, जो विषैले समाचार-पत्रों को प्रश्रय देने से इनकार करता है. हमारे यहां पत्रकार संघ है. वह एक ऐसा विभाग क्यों न खोले, जिसका काम विभिन्न समाचार-पत्रों को देखना और आपत्तिजनक लेख मिलनेपर उन पत्रों के संपादकों का ध्यान उस ओर दिलाना हो? दोषी समाचार-पत्रों के साथ संपर्क स्थापित करना और जहां ऐसे संपर्क से इच्छित सुधार न हो, वहां उन आपत्तिजनक लेखों की प्रकट आलोचना करना ही इस विभाग का काम होगा.

अख़बारों की स्वतंत्रता एक बहुमूल्य अधिकार है और कोई भी देश इस अधिकार को छोड़ नहीं सकता. लेकिन यदि इस अधिकार के दुरुपयोग को रोकने की कोई सख्त कानूनी व्यवस्था न हो, केवल बहुत नरम किस्म की कानूनी व्यवस्था हो, जैसा कि उचित भी है, तो भी मैंने जैसा सुझाया है, रोकथाम की एक आंतरिक व्यवस्था करना असंभव नहीं होना चाहिए और उसपर लोगों को नाराज भी नहीं होना चाहिए। "

( विजय शंकर सिंह )



कानून - बलात्कार की धारा 375 आइपीसी / विजय शंकर सिंह


सरकार ने कहा है कि, हाथरस गैंगरेप मामले में उसके घर वालों वादी और अन्य का नार्को टेस्ट कराया जाएगा। नार्को टेस्ट किसी व्यक्ति के झूठ को पकड़ने के लिये कराया जाता है पर वह उस झूठ को पकड़ने के लिये जिसे जानबूझकर कर छुपाया जा रहा हो। यह टेस्ट उन मिथ्यावाचनो के लिये नहीं जो खुले आम बोले जाते हैं और जिनके बारे में यह आम धारणा बन जाती है कि यह तो झूठ ही बोला जा रहा है। 

हाथरस गैंगरेप में पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट, उसे लगी चोटें, चोटों के काऱण ही हुयी मृत्यु से यह तो प्रमाणित है ही कि, उसके साथ एक हिंसक घटना घटी है। अब सवाल उठता है बलात्कार हुआ है या नहीं ? एडीजी लॉ एंड ऑर्डर का कहना है कि सैम्पल में वीर्य नहीं मिला है तो बलात्कार की पुष्टि नहीं की जा सकती है। एडीजी धारा 375 आइपीसी जिसमे बलात्कार की परिभाषा दी गयी है में 2013 के पहले की धारा का पाठ कर रहे हैं। 2013 मे इस धारा में संशोधन हो गया है और अब वीर्य मिले या न मिले, योनि में प्रवेशन ( पेनिट्रेशन )  किया गया हो या न किया गया हो, इसे बलात्कार का अपराध माना जायेगा और यह अपराध धारा 376 आइपीसी में दिए गए दंडो से दण्डित किया जाएगा। 

पीड़िता की इस मेडिकल जांच की रिपोर्ट से अपराध शिथिल नहीं हो जाता है। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि, पीड़िता ने पुलिस को क्या बताया है। पीड़िता ने अपने बयान में बलात्कार किये जाने की बात कही है, और इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर है। वीडियो से अधिक महत्वपूर्ण है वह दस्तावेज जिस पर पीड़िता का बयान दर्ज है। उसमें उसने क्या कहा है ? अब जो भी उस बयान में कहा गया होगा वह अब स्वतः पीड़िता की मृत्यु के बाद मृत्युपूर्व बयान में बदल जायेगा जो, साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत एक प्रबल साक्ष्य माना जाता है। मुकदमे का यही आधार बनेगा।

अब रहा सवाल पीडिता के घर वालों के नार्को टेस्ट का । हो सकता है एसआइटी को कोई ऐसी जानकारी मिली हो कि उसके घर वाले कुछ छिपा रहे हों या झूठ बोल रहे हों तो उसका पता लगाने के लिये नार्को टेस्ट कराने की बात सोची गयी हो। लेकिन यह बात अदालत में एसआईटी को नार्को टेस्ट कराने से पहले  अनुमति के लिये बतानी भी होगी। नार्को टेस्ट भी जबर्दस्ती नहीं कराया जा सकता है इसकी सहमति ली जाती है। लेकिन एसआईटी को यह बताना पड़ेगा कि जिसका नार्को टेस्ट कराया जाना है वह छुपा क्या रहा है और कौन सा सच एसआईटी जानना चाहती है। 

अमूमन वादी पक्ष का नार्को टेस्ट नहीं होता है क्योंकि वह पीड़ित भी होता है। इस केस में यह अपवादस्वरूप निर्णय क्यों लिया गया है, यह मैं बता नहीं पाऊंगा। वादी और उसका पक्ष तो निरन्तर पूछताछ और बयान के लिये उपलब्ध रहता है। फिर वह छुपा क्या रहा है ? यह  हो सकता है कि, वह अपने आरोप बढ़ा चढ़ा कर लगा रहा हो, और कभी कभी ऐसा होता भी है कि आरोप बढ़ा चढ़ा कर लगाए जाते हैं । इसीलिए तो विवेचना के तमाम कानूनी प्राविधान बने हैं कि उसके आरोपो की सत्यता की परख की युक्तियुक्त तरह से कर ली जाय।  सच, अगर पता भी हो कि वह सच है तो, इसे सक्षम न्यायालय में साबित करना पड़ता है। अक्सर सच, आरोपों और बचाव के युद्ध मे कही दबा रहता है उसे निकालना और सामने लाना पड़ता है। डिगिंग द ट्रुथ का मुहावरा इसीलिए बना है। विवेचना की सफलता और कुशलता, उसी दबे ढंके सत्य को ढूंढ कर लाने में है। 

अब एक नज़र बलात्कार कानून के इतिहास और संशोधनों पर पढ़ लें। भारत में बलात्कार (Rape) को स्पष्ट तौर पर भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) में परिभाषित अपराध की श्रेणी में वर्ष 1960 में शामिल किया गया। उससे पहले इससे संबंधित क़ानून पूरे देश में अलग-अलग तथा विवादास्पद थे।

● वर्ष 1833 के चार्टर एक्ट (Charter Act, 1833) के लागू होने के बाद भारतीय कानूनों के संहिताबद्ध करने का कार्य प्रारंभ किया गया। इसके लिये ब्रिटिश संसद ने लॉर्ड मैकॉले की अध्यक्षता में पहले विधि आयोग का गठन किया। आयोग द्वारा आपराधिक कानूनों को दो भागों में संहिताबद्ध करने का निर्णय लिया गया। इसका पहला भाग भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) तथा दूसरा भाग दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure-CrPC) बना।

आइपीसी के अंतर्गत अपराध से संबंधित नियमों को परिभाषित तथा संकलित किया गया। इसे अक्तूबर 1860 में अधिनियमित किया गया लेकिन 1 जनवरी, 1862 में लागू किया गया। जबकि सीआरपीसी ( CrPC )आपराधिक न्यायालयों की स्थापना तथा किसी अपराध के परीक्षण एवं मुकदमे की प्रक्रिया के बारे में है।

आइपीसी की धारा 375 में बलात्कार को परिभाषित किया गया तथा इसे एक दंडनीय अपराध बनाया गया। इसी पेनल कोड की धारा 376 के अंतर्गत बलात्कार जैसे अपराध के लिये न्यूनतम सात वर्ष तथा अधिकतम आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया। 

कानून में,  बलात्कार की परिभाषा में निम्नलिखित बातें शामिल की गई हैं :
● किसी पुरुष द्वारा किसी महिला की इच्छा (Will) या सहमति (Consent) के विरुद्ध किया गया शारीरिक संबंध।
● जब हत्या या चोट पहुँचाने का भय दिखाकर दबाव में संभोग के लिये किसी महिला की सहमति हासिल की गई हो।
● 18 वर्ष से कम उम्र की किसी महिला के साथ उसकी सहमति या बिना सहमति के किया गया संभोग।

इसमें अपवाद के तौर पर किसी पुरुष द्वारा उसकी पत्नी के साथ किये गये संभोग, जिसकी उम्र 15 वर्ष से कम न हो, को बलात्कार की श्रेणी में नहीं शामिल किया जाता है।

वर्ष 1972 का मामला:
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वर्ष 1860 के लगभग 100 वर्षों बाद तक बलात्कार तथा यौन हिंसा के कानूनों में कोई बदलाव नहीं हुए लेकिन 26 मार्च, 1972 को महाराष्ट्र के देसाईगंज पुलिस स्टेशन में मथुरा नामक एक आदिवासी महिला के साथ पुलिस कस्टडी में हुए बलात्कार ने इन नियमों पर खासा असर डाला।

सेशन कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्वीकार करते हुए आरोपी पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया कि उस महिला के साथ पुलिस स्टेशन में संभोग हुआ था किंतु बलात्कार होने के कोई प्रमाण नहीं मिले थे और वह महिला यौन संबंधों की आदी थी।

हालाँकि सेशन कोर्ट के इस फैसले के विपरीत उच्च न्यायालय ने आरोपियों के बरी होने के निर्णय को वापस ले लिया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने फिर उच्च न्यायालय के फैसले को बदलते हुए यह कहा कि इस मामले में बलात्कार के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं उपलब्ध है।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि महिला के शरीर पर कोई घाव या चोट के निशान मौजूद नहीं है जिसका अर्थ है कि तथाकथित संबंध उसकी मर्ज़ी से स्थापित किये गए थे।

आपराधिक क़ानून में संशोधन
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मथुरा मामले के बाद देश में बलात्कार से संबंधित कानूनों में तत्काल बदलाव  की मांंग होने लगी। परिणामस्वरूप आपराधिक कानून (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1983 [Criminal Law (Second Amendment) Act of 1983] पारित किया गया।

इसके अलावा IPC में धारा 228A जोड़ी गई जिसमें कहा गया कि बलात्कार जैसे कुछ अपराधों में पीड़ित की पहचान गुप्त रखी जाए तथा ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान किया जाए।

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए बलात्कार तथा हत्या के मामले के बाद देश में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 पारित किया गया जिसने बलात्कार की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाया तथा इसके अधीन दंड के प्रावधानों को कठोर किया।

इस अधिनियम में जस्टिस जे. एस. वर्मा समिति के सुझावों को शामिल किया गया जिसे देश में आपराधिक कानूनों में सुधार तथा समीक्षा के लिये बनाया गया था। इस अधिनियम ने यौन हिंसा के मामलों में कारावास की अवधि को बढ़ाया तथा उन मामलों में मृत्युदंड का भी प्रावधान किया जिसमें पीड़ित की मौत हो या उसकी अवस्था मृतप्राय हो जाए।

इसके तहत कुछ नए प्रावधान भी शामिल किये गए जिसमें 
● आपराधिक इरादे से बलपूर्वक किसी महिला के कपड़े उतारना, 
● यौन संकेत देना तथा पीछा करना आदि शामिल हैं।
● सामूहिक बलात्कार के मामले में सज़ा को 10 वर्ष से बढ़ाकर 20 वर्ष या आजीवन कारावास कर दिया गया।
● अवांछनीय शारीरिक स्पर्श, शब्द या संकेत तथा यौन अनुग्रह (Sexual Favour) करने की मांग करना आदि को भी यौन अपराध में शामिल किया गया।
● लड़की का पीछा करना करने पर तीन वर्ष की सज़ा ।
● एसिड अटैक के मामले में सज़ा को दस वर्ष से बढ़ाकर आजीवन कारावास में बदल दिया गया।

नाबालिगों के मामले में कानून
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जनवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक आठ वर्षीय बच्ची के साथ हुए अपहरण, सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के मामले के बाद पूरे देश में इसका विरोध हुआ तथा आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग की गई।

इसके बाद आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 [Criminal Law (Amendment) Act, 2018] पारित किया गया जिसमें पहली बार यह प्रावधान किया गया कि 12 वर्ष से कम आयु की किसी बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में न्यूनतम 20 वर्ष के कारावास या मृत्युदंड की सज़ा का प्रावधान होगा।

इसके अनुुुसार आइपीसी में एक नया प्रावधान भी जोड़ा गया जिसके द्वारा 16 वर्ष से कम आयु की किसी लड़की के साथ हुए बलात्कार के लिये न्यूनतम 20 वर्ष का कारावास तथा अधिकतम उम्र कैद की सज़ा हो सकती है।
IPC, 1860 के तहत बलात्कार के मामले में न्यूनतम सज़ा के प्रावधान को सात वर्ष से बढ़ाकर अब 10 वर्ष कर दिया गया है।

मैं 2013 में धारा 375 का जो संशोधन हुआ है उसे अंग्रेजी में नीचे दे दे रहा हूँ, आप उसे भी पढ़ सकते हैं। 

SECTION 375
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Section 375 of the Indian Penal Code defines rape as "sexual intercourse with a woman against her will, without her consent, by coercion, misrepresentation or fraud or at a time when she has been intoxicated or duped, or is of unsound mental health and in any case if she is under 18 years of age."  
 
It's rape if it falls under following categories:
1. Against her will.
2. Without her consent.
3. With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested in fear of death or of hurt.
4. With her consent, when the man knows that he is not her husband, and that her consent is given because she believes that he is another man to whom she is or believes herself to be lawfully married.
5. With her consent, when, at the time of giving such a consent, by reason of unsoundness of mind or intoxication or the administration by him personally or through another of any stupefying or unwholesome substance, she is unable to understand the nature and consequences of that to which she gives consent.
6. With or without her consent, when she is under sixteen years of age. Explanation: Penetration is sufficient to constitute the sexual intercourse necessary to the offence of rape.
 
Consent under Section 375
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Consent is defined as clear, voluntary communication that the woman gives for a certain sexual act. Marital rape is an exception to giving consent as it is not a crime under the Indian Penal Code, as long as the woman is above 18 years of age.
 
Exceptions to Section 375
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Sexual intercourse by a man with his own wife who is above the age of 18, is not sexual assault.
 
यह मूल धारा 375 आइपीसी थी। अब 2013 में जो संशोधन किया गया है उसे पढ़े, 
Amendment to Sec 375 IPC
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The Criminal Law (Amendment) Act, 2013 or the Nirbhaya Act, was passed in Parliament to amend Section 375. To remove ambiguity in the earlier law and provide for strict punishment in cases of rarest cases of sexual violence, the legislation was expanded to define acts like penetration of penis into vagina, urethra, anus or mouth, or any object or any part of body to any extent into the aforesaid woman body parts (or making another person do so), as constituting an offence of sexual assault. Applying mouth or touching private parts were also classified as offences of sexual assault.
 
Punishment
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 Except in certain aggravated situations, the punishment will be imprisonment of not less than seven years but it may extend to imprisonment for life, and shall also be liable to fine. In aggravated situations, punishment will be rigorous imprisonment for a term which shall not be less than 10 years but which may extend to imprisonment for life, and shall also be liable to fine.

( विजय शंकर सिंह ) 

Friday, 2 October 2020

बढ़ते अपराध और पुलिस के समक्ष साख का संकट / विजय शंकर सिंह


हाथरस गैंगरेप के मामले में एक महत्वपूर्ण अपडेट यह है कि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान ले लिया है। पीड़िता की रात में, हाथरस जिला प्रशासन द्वारा चुपचाप अंतिम संस्कार कर दिए जाने के बारे में मीडिया में सरकार और प्रशासन पर लगातार उठ रहे  सवालों पर संज्ञान लेते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने आज इस महत्वपूर्ण मामले में दखल दिया है।  हाईकोर्ट के जज, जस्टिस राजन  रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए कोर्ट के वरिष्ठ रजिस्ट्रार को 'गरिमामय अंतिम संस्कार के अधिकार' के शीर्षक  से एक जनहित याचिका दायर करने के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।

हाथरस के बलात्कार का मामला अभी थमा भी नहीं था कि, जिला बलरामपुर में गैसड़ी से एक 19 वर्ष की लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म किये जाने की खबर मिली है, जिंसमे पीड़िता की मृत्यु हो गयी है। कहा जा रहा है, महाविद्यालय में प्रवेश लेने के लिए निकली छात्रा का अपहरण कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। इस जघन्य अपराध में, अस्पताल पहुंचने से पहले ही पीड़िता ने दम तोड़ दिया। पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म का केस दर्ज कर दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। शव को पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया गया है।

मीडिया की खबरों के अनुसार, छात्रा मंगलवार सुबह 10 बजे एक निजी महाविद्यालय में दाखिला लेने के लिए गयी थी।  देर शाम तक घर नहीं लौटी तो परिजनों ने बेटी की तलाश शुरू की। इसी बीच छात्रा बदहवास एवं गंभीर हालत में घर पहुंची। छात्रा ने कहा कि उसे एक युवक कॉलेज ले गया था। प्रवेश के बाद वही युवक उसे लेकर गैसड़ी बाजार पहुंचा और अपने घर ले गया। जहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इलाज के लिए ले जाते समय रास्ते में ही छात्रा की मौत हो गई है। बुधवार सुबह गैसड़ी की पुलिस मामले को संदिग्ध मानते हुए मृतका का शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा था। परिजनों की आशंका पर पुलिस दो लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। 

पूरे देश मे महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में उल्लेखनीय ढंग से वृद्धि हुयी है। वर्ष 2019 में अब तक दर्ज मामलों के मुताबिक भारत में औसतन 87 बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं।  2019 के शुरुआती नौ महीनों में महिलाओं के खिलाफ अबतक कुल 4,05, 861 आपराधिक मामले दर्ज हो चुके हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो  ( एनसीआरबी ) के आंकड़ों के अनुसार, यह 2018 की तुलना में सात प्रतिशत अधिक है। "भारत में अपराध -2019" रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध पिछले साल के मुकाबले 7.3 प्रतिशत बढ़ गए हैं। 

वर्ष 2019 में प्रति एक लाख महिला आबादी पर 62.4 % मुकदमे दर्ज हुए हैं, जबकि वर्ष 2018 में यह आंकड़ा 58.8 प्रतिशत था। देशभर में वर्ष 2018 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 3,78, 236 मामले दर्ज किए गए थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में देश में बलात्कार के कुल 33,356 मामले दर्ज हुए हैं जबकि वर्ष  2017 में यह संख्या 32,559। इन आंकड़ों के अनुसार, 
“भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज इन मामलों में से अधिकांश  'पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता' (30.9 प्रतिशत) के मामले हैं,  इसके बाद उनकी 'शीलता का अपमान करने के इरादे से महिलाओं पर हमले' (21.8 प्रतिशत), 'महिलाओं के अपहरण' (17.9 प्रतिशत) के मामले दर्ज हैं."

हाथरस गैंगरेप के मामले में, एक कागज सोशल मीडिया पर घूम रहा है जिंसमे ओमप्रकाश नामक एक व्यक्ति लिख कर दे रहा है कि उसे सरकार से कोई शिकायत नहीं है। धैर्य और शांति की पराकाष्ठा का प्रतीक है यह कागज़ी दस्तावेज। यह दस्तावेज खुद ही यह प्रमाणित करता है कि इसे लिखाने के लिए इलाके के पुलिस अफसर को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी। 

क्या यह कल्पना की जा सकती हैं कि, जिसकी बेटी के साथ दुराचार हुआ, गला दबा कर मार डालने की कोशिश की गयी, बलात्कार हुआ, और कई दिन तक मुकदमा नहीं लिखा गया, कोई गिरफ्तारी नहीं हुयी, अभियुक्त खुलेआम घूमते रहे, पीड़िता के परिवार को धमकियां मिलती रहीं, अंतिम संस्कार के समय उसकी मां और भाभी बिलखती रही, पल पल पर सोशल मीडिया पर ऐसे  वीडियो आ आ कर हम सबको विचलित करते रहे, और उसी के घर का एक सदस्य सरकार को एक प्रशस्ति पत्र स्वेच्छा से सौंप दे कि वह संतुष्ट है ! कमाल का सब्र है और कमाल की सरकार। 

सोशल मीडिया पर जो कागज़ घूम रहा है, उसमें लिखा है, 
" मैं ओम प्रकाश पुत्र स्व० बाबूलाल निवासी ग्राम वूलगढी थाना चन्दपा तहसील हाथरस जनपद हाथरस बयान करता हूँ कि मेरी मा0 मुख्यमंत्री जी, उ0प्र0 शासन लखनऊ से दूरभाष पर वार्ता हुई। मा० मुख्यमंत्री जी द्वारा मेरी समरत माँगों को पूरा करने का आश्वासन दिया गया। मैं मा0 मुख्यमंत्री जी के आश्वासन से संतुष्ट हूँ एवं उनका आभार व्यक्त करता हूँ। इस दुख की घड़ी में जिन लोगों ने हमारा साथ दिया उनका भी आभार व्यक्त करता हैं एवं सभी लोगों से अपील करता हूँ कि किसी भी प्रकार का धरना प्रदर्शन न करें। शासन/प्रशासन की कार्यवाही से पूरी तरह से संतुष्ट हूँ।" 
दिनांक : 30.09.2020
ओम प्रकाश पुत्र स्व0 बाबूलाल निवासी ग्राम बूलगढ़ी थाना चंदपा तहसील हाथरस

ठीक इसी प्रकार कुछ सालों पहले, सीबीआई जज लोया के बेटे ने भी कैमरे के सामने आ कर कहा था कि, उनके पिता की मृत्यु एक स्वाभाविक मृत्यु थी। लेकिन लोया की संदिग्ध मृत्यु की जांच का आदेश कहीं कोर्ट न कर दे, इसलिए दिल्ली से मुम्बई तक की सरकारों ने देश के सबसे महंगे वकीलों को पैरवी के लिए  सुप्रीम कोर्ट तक तैनात कर रखा था। क्योंकि इस संदिग्ध हत्याकांड में शक की सुई भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में से एक, पर आ रही थी।

एक कानूनी स्थिति यहां स्पष्ट कर दूं कि, भारतीय आपराधिक कानून प्रणाली के अनुसार, अपराध, राज्य बनाम होते हैं। घर के किसी व्यक्ति द्वारा उस अपराध के बारे में कोई कार्यवाही न करने या न चाहने के बावजूद, वह मुकदमा न तो खत्म होता है और न खारिज। राज्य उस मुकदमे में एक पक्ष होता है। 

हाथरस मामले में, रात के अंधेरे में बिना पीड़िता के माता पिता की सहमति और अनुमति के चोरी छुपे पीड़िता का शव जला दिये जाने का निंदनीय आइडिया, वहां के डीएम और एसपी के दिमाग से उपजा आइडिया था, या सरकार में बैठे कुछ आला और नज़दीकी अफसरों का कोई ऐसा निर्देश, यह तो पता नही है, पर गैंगरेप पर मचे आक्रोश से कहीं अधिक सरकार के इस मूर्खतापूर्ण निर्णय की चर्चा हो रही है और अब तक सरकार की छीछालेदर हो रही है, और आगे भी होगी। 

अब कहा जा रहा है कि डॉक्टर ने कहा है कि बलात्कार की पुष्टि नहीं हुयी। यहीं यह सवाल उठता है कि, फिर उक्त पीड़िता से बदतमीजी, गला दबा कर मार डालने की कोशिश, इतने  वहशियाना तरह से पीटना कि, रीढ़ की हड्डी टूट जाय, का मोटिव क्या था ? महज़ छेड़छाड़ या बलात्कार की कोशिश ? इतनी मारपीट और ज़बरदस्ती तो, किसी न किसी बद इरादे से ही की गयी होगी ? बलात्कार अगर वह बद इरादा नहीं था तो फिर अपराध का मोटिव क्या था ? बिना बद इरादे के कोई अपराध घटित नहीं होता है। 

जब पीड़िता जीवित थी और अस्पताल में रही होगी तब उसका बयान तो लिया ही गया होगा। क्या उस बयान में पीड़िता ने बताया है कि उसके साथ क्या क्या हुआ है ? वह बयान अब मृत्यु पूर्व बयान मान लिया जाएगा। घटना के लगभग एक हफ्ते से अधिक समय तक वह अस्पताल में रही, क्या उस बीच उसका बयान मैजिस्ट्रेट के सामने कराया गया ? मुझे उम्मीद है ज़रूर कराया गया होगा। और अब वही बयान मुकदमे का आधार  बनेगा। गांव देहात में पीड़ित लड़कियां अक्सर रेप या बलात्कार शब्द का प्रयोग नहीं करती हैं, वे इसे गलत काम करना कह कर बताती हैं। 

इस मामले पर राजनीति हो रही है, और होनी भी चाहिए। जब सरकार राजनीति के कारण ही सत्ता में आती है और सत्ता से बाहर जाती है, जब अफसरों की पोस्टिंग  और तबादले राजनीति के आधार पर होते हैं, जब जांच के आदेश और जांच के निष्कर्ष पर कार्यवाही राजनीति के मद्देनजर होती है, जब गनर शैडो और सुरक्षा कर्मी राजनीति के आधार पर लोगो को दिए और लिए जाते हैं, जब मीडिया का हेडलाइन मैनेजमेंट राजनीति के आधार पर तय होता है, तो अगर एक लड़की जिसे बेहद बर्बर तऱीके से तड़पा तड़पा कर मार दिया गया तो फिर ऐसे गर्हित अपराध पर राजनीति क्यों नहीं होगी ? अगर राजनीति ऐसे अवसर पर मूक और बांझ हो जाय तो, ऐसी निकम्मी और निरुद्देश्य राजनीति का कोई अर्थ नहीं है। 

हाथरस गैंगरेप की यह घटना कोई पहली बलात्कार की घटना नहीं है। बल्कि हाथरस गैंगरेप के बाद ही, बलरामपुर, बुलंदशहर, खरगौन, राजस्थान अन्य जगहों पर होने वाली ऐसी घटनाओं की सूचना मिल रही हैं। क्या पता यह लिखते पढ़ते कहीं और से न ऐसी ही कोई अन्य,  दुर्भाग्यपूर्ण खबर मिल जाय। बलात्कार जैसे अपराध की जिम्मेदारी से समाज को मुक्त नहीं किया जा सकता है। यह जिम्मेदारी देश काल के वातावरण पर भी है। आप यह जिम्मेदारी नेट और अश्लीलता पर भी थोप सकते हैं। पर इन सब मामलो में घटना की सूचना मिलते ही मुकदमा दर्ज करने और मुल्ज़िम को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी तो पुलिस पर ही आएगी।  जहां मुकदमा लिखने और गिरफ्तारी की कार्यवाही तुरन्त हो जाती है वहां स्थितियां नियंत्रित रहती है और जहां इसे तोपने ढांकने और दाएं बाए करने की कोशिश की जाती है वहीं हाथरस जैसा कोई न कोई कांड उछल जाता है। 

आज अगर कोई यह सोचे कि वह किसी अपराध की खबर या उससे जुड़ी कोई बात छुपा लेगा तो वह गफलत में है। जब हर हांथ में स्मार्टफोन हो, कैमरा और वायस रिकॉर्डर हो तो कैसे कोई कुछ छिपा सकता है ? तमाम ड्यूटियों और घेरेबंदी के बाद भी, पीड़िता के अंतिम संस्कार की तमाम वीडियो दुनियाभर में फैल रही हैं। लगभग सबने उन्हे देखा है। जो न भी देखना चाहे तो भी हथेली में पड़ा फोन उसे दिखाने लगता है। ऐसे में कैसे इस प्रकार की किसी घटना को छुपाया जा सकता है ? हाथरस में जिलाधिकारी द्वारा पीड़िता को धमकाने और समझाने का भी एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिंसमे डीएम यह कहते हुए सुने जा रहे हैं कि,
" आज मीडिया है, यह चली जायेगी, कल तक बाकी मीडिया भी नही दिखेगी और दिखेगा तो सिर्फ यही सरकारी तंत्र,, मान भी जाओ । " 

एक बात और । सरकार या सत्ता या पुलिस, इनके प्रति जनता में अविश्वास का एक स्थायी भाव होता है। यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। यह आज से नहीं है, बल्कि पुलिस के बारे में तो बहुत पहले से ही है। कुछ अधिकारी इसके अपवाद हैं और यह उस अधिकारी की निजी साख के कारण है न कि संस्थागत साख के कारण। ऐसे में सरकार, और अफसर के बयान पर लोग यक़ीन नहीं करते। वे लोग भी कम ही यक़ीन करते हैं जो अफसर और सरकार के बेहद करीब होते हैं। 

यह साख का ही संकट है कि सीबीआई जज ब्रजमोहन लोया के बेटे से सरकार को परोक्ष रूप से टीवी पर कहलवाना पड़ा कि 'सब चंगा सी' औऱ अब यही साख का संकट हाथरस पुलिस को बाध्य कर रहा है कि वह एक एनओसी, पीड़िता के घर वालों से प्राप्त करे कि, 'हम खुश है, सरकार आप से !' जब कानून के तयशुदा मार्ग से भटक कर कानून को लागू करने की कोशिश की जाती है तो ऐसे ही हास्यास्पद शॉर्टकट एलीबाई दिमाग मे आती है। 
जब देश के सत्ता में बैठे नेतागण अपने खिलाफ दर्ज मुकदमो को सत्तासीन होते ही येन केन प्रकारेण वापस लेने की जुगत में लग जाएंगे तो ऐसे आपराधिक मनोवृत्ति के नेताओं की रहनुमाई में यदि आप अपराध मुक्त समाज और प्रशासन की कल्पना करते हैं तो यह, हम सबकी मासूमियत है। ठोंक दो के फरमान, अरमान, और इम्तिहान के बाद भी, अगर उत्तरप्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति नहीं सुधरती है तो, क्या किया जाना चाहिए ?

( विजय शंकर सिंह )

Thursday, 1 October 2020

जब आर्थिक संकट गहराने लगता है तो फासिज़्म बेनकाब हो जाता है / मुकेश असीम

जब तक पूँजीवादी व्यवस्था की लूट सामान्य ढंग से चलती है वह जनतांत्रिक मुखौटा लगाये रहता है। जैसे ही आर्थिक संकट बढने लगता है बढती पूँजी के मुकाबिल मुनाफा कम तेजी से बढता है तो उसे लूट के नये निर्मम रास्ते अपनाने पडते हैं - निजीकरण, सार्वजनिक संसाधनों की लूट, शिक्षा स्वास्थ्य आदि सार्वजनिक सेवाओं को निजी महँगा करना, वंचित समुदायों के लिए कुछ हद तक मददगार योजनाओं को बंद करना, श्रमिकों से कम मजदूरी पर अधिक काम लेना, सुरक्षा इंतजामों पर खर्च बंद कर देना, गरीब किसानों को अपना उत्पाद कम से कम कीमत पर बेचने को मजबूर करना, वगैरह। 

किंतु सामान्य जनतांत्रिक मुखौटे में इस निर्मम लूट को चलाना मुमकिन नहीं होता। उसके लिए एक निरंकुश सत्ता चाहिए, साथ ही एक ऐसा गुंडा दल भी जो किसी भी विरोधी को कुचल डालने के लिए सत्ता की मदद में भीड़ भी जुटा सके। यही फासीवाद की मूल पहचान है जो आर्थिक संकट के वक्त में पूँजीवादी लूट को बढाने का औजार है।

फासीवाद अपनी लूट के लिए सामाजिक समर्थन दो तरह से जुटाता है। एक, उसके जरिये विकास तेज करने का सपना दिखा कर। दूसरे, विरोधियों को हमेशा समाज से काट 'अन्य' बनाकर। 'अन्य' कभी हरामखोर कामचोर श्रमिक होते हैं, कभी 'माओवादी' आदिवासी होते हैं तो कभी नॉर्थ ईस्ट के 'चिंकी', कभी 'अलगाववादी' कश्मीरी तो कभी 'पाकिस्तानी' मुसलमान, कभी आरक्षण की खैरात माँगने वाले दलित तो कभी 'हिंदी विरोधी' तमिल, या 'देशद्रोही' वामपंथी। यह अन्यकरण फासिस्टों को हमेशा इनमें से किसी हिस्से को कुचलने के लिए शेष को अपने पक्ष में जुटाने या चुप रखने में मदद करता है क्योंकि ये सब एक व्यापक एकता में गुँथ विरोध में जुट जायें तो फासिस्टों की चिंदियां उड जायेंगी।

इस काम में इनकी सक्रिय या छिपी मदद वो करते हैं जो इस दमन के खिलाफ संघर्षों को एक समुदाय तक सीमित करने के भावनात्मक तर्क देते हैं। मुसलमानों की लडाई है तो मुसलमान बनकर ही लडनी पडेगी; या मुसलमानों का तो बस बहाना है असली अत्याचार तो दलितों आदिवासियों पर है बस वे ही लडेंगे; कश्मीरियों को अपने लिये खुद हथियार उठाने चाहिये या लड सिर्फ वामपंथी ही रहे हैं बाकी सब धोखा दे रहे हैं; उत्तर भारत वाले तो सब गोबर बुद्धि हैं, शिक्षित दक्षिण वालों को या सारे प्रगतिशील बंगालियों को अपना अलग फासिस्ट मुक्त देश बना लेना चाहिए; ऐसे सब जितने बड़े लडाकू विचार देने वाले कूढमगज हैं ये चाहे अनचाहे फासिस्टों की मदद करते हैं, संघर्षों को एक दायरे में महदूद कर उनके कुचले जाने की तैयारी का हिस्सा होते हैं। इनसे सावधान रहना चाहिए। 

इसके पक्ष में हाना आरेंट जैसे 'यहूदियों को यहूदी बनकर लडना चाहिए' वाले उद्धरण जो बाँट रहे हैं उनसे पूछिये कि दुनिया भर के तीन करोड़ गैर यहूदी हिटलर मुसोलिनी को मिटाने में अपनी जान की कुर्बानी नहीं देते तो  अकेले यहूदी खुद लड लेते?

( मुकेश असीम )